WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

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प्रतिरोध और आन्दोलन Class 10 WBBSE MCQ Questions

A. बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर (Multiple Choice Question & Answer) : (1 Mark)

प्रश्न 1.
तीतूमीर का वास्तविक नाम था –
(क) चिराग अली
(ख) हैदर अली
(ग) मीर निसार अली
(घ) तोराप अली
उत्तर :
(ग) मीर निसार अली

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प्रश्न 2.
संन्यासी-फकीर विद्रोह की मुख्य नेत्री थी –
(क) रानी कर्णावती
(ख) रानी शिरोमणि
(ग) देवी चौधरानी
(घ) रानी दुर्गावनी
उत्तर :
(ग) देवी चौधरानी

प्रश्न 3.
कोल विद्रोह (1831-32 ई०) में हुआ था –
(क) मेदिनीपुर में
(ख) झाड़ग्राम में
(ग) छोटानागपुर में
(घ) रांची में
उत्तर :
(ग) छोटानागपुर में

प्रश्न 4.
भारत में प्रथम जंगल नियम पारित हुआ था –
(क) 1859 ई० में
(ख) 1860 ई० में
(ग) 1865 ई० में
(घ) 1878 ई० में
उत्तर :
(ग) 1865 ई० में

प्रश्न 5.
सुई मुण्डा नेता थे –
(क) चुआड़ विद्रोह
(ख) कोल विद्रोह
(ग) सन्थाल हूल विद्रोह
(घ) मुण्डा विद्रोह
उत्तर :
(ख) कोल विद्रोह

प्रश्न 6.
बारासात विद्रोह का नेतृत्व किया था :
(क) दूधू मियाँ
(ख) दिगम्बर विश्वास
(ग) तीतूमीर
(घ) बिरसा मुंडा
उत्तर :
(ग) तीतूमीर।

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प्रश्न 7.
इनमें से किस विद्रोह का सम्बन्ध देवी चौधुरानी से है ?
(क) फकीर विद्रोह
(ख) पागलपन्थी विद्रोह
(ग) पावना विद्रोह
(घ) सन्यासी विद्रोह
उत्तर :
(घ) सन्यासी विद्रोह

प्रश्न 8.
मोपला विद्रोह भारत के किस क्षेत्र में हुआ था ?
(क) मालावार क्षेत्र
(ख) जंगल महल क्षेत्र
(ग) खान प्रदेश
(घ) अवध क्षेत्र
उत्तर :
(क) मालावार क्षेत्र

प्रश्न 9.
बंगाल में वहाबी आन्दोलन का नेता था ?
या, बंगाल में वहाबी आन्दोलन की शुरूआत
(क) मजनू शाह
(ख) टीपू शाह
(ग) तीतूमीर
के द्वारा हुई थी।
उत्तर :
(ग) तीतूमीर

प्रश्न 10.
‘काटोंग बाबा काटोंग’ किस विद्रोह का नारा था ?
(क) मुण्डा विद्रोह
(ख) संथाल विद्रोह
(ग) कोल विद्रोह
(घ) चुआड़ विद्रोह
उत्तर :
(ग) कोल विद्रोह

प्रश्न 11.
बाबा तिलक माँझी का सम्बन्ध किस विद्रोह से है ?
(क) भील विद्रोह
(ख) रम्पा विद्रोह
(ग) मुण्डा विद्रोह
(घ) संथाल विद्रोह
उत्तर :
(घ) संथाल विद्रोह

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प्रश्न 12.
केशव चन्द्र सेन द्वारा किसकी सहायता के लिए ‘संगत सभा’ की स्थापना की गई थी ?
(क) अनाथ बच्चों के लिए
(ख) मझदूरों की सहाबता के लिए
(ग) विधवा स्त्रियों के लिए
(घ) सुखा राहत के लिए
उत्तर :
(ग) विधवा स्त्रियों के लिए

प्रश्न 13.
फूलों और झानों जुड़वा बहनों ने किस विद्रोह का नेतृत्व किया था ?
(क) संथाल विद्रोह
(ख) भील विद्रोह
(ग) चुआड़ विद्रोह
(घ) मोपला विद्रोह
उत्तर :
(क) संथाल विद्रोह

प्रश्न 14.
1825 ई० में खान देश के भील विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था ?
(क) चितर सिंह
(ख) सेवरम
(ग) टीपू शाह
(घ) तीरथ सिंह
उत्तर :
(ख) सेवरम

प्रश्न 15.
1882 ई० बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित उपन्यास ‘आनन्द मठ’ किस विद्रोह की घटना पर आधारित है ?
(क) पागलपन्थी विद्रोह
(ख) चुआड़ विद्रोह
(ग) संयासी विद्रोह
(घ) रंगपुर विद्रोह
उत्तर :
(ग) संयासी विद्रोह

प्रश्न 16.
कोल विद्रोह का तत्कालिक कारण था –
(क) संधालों से रेल मार्ग निर्माण में बेगारी कराना
(ख) वन सुरक्षा कानून का लागू होना
(ग) आदिवासी महिलाओं के साथ की जा रही बदसलुकी(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) आदिवासी महिलाओं के साथ की जा रही बदसलुकी

प्रश्न 17.
किसने ोेषणा किया की दिकुओं से अब हमारी लड़ाई होगी और उनके खून से जमीन लाल झण्डे का तरह लाल होगी?
(क) जोआ भगत
(ख) भगीरथ मांझी
(ग) सुई मुण्डा
(घ) बिरसा मुण्डा
उत्तर :
(घ) बिरसा मुण्डा

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प्रश्न 18.
‘तीनकठिया व्यवस्था’ का सम्बन्य किस आन्दोलन से है ?
(क) तिभागा आन्दोलन
(ख) संथाल विद्रोह
(ग) नील विद्रोह
(घ) पाइक विद्रोह
उत्तर :
(ग) नील विद्रोह

प्रश्न 19.
नील किसानों की दुर्दशा का सर्वप्रथम उल्लेख किस समाचार पत्र ने किया था ?
(क) संजीवनी
(ख) संदेश
(ग) सोम प्रकाश
(घ) हिन्दू पेट्रियाट
उत्तर :
(घ) हिन्दू पेट्रियाट

प्रश्न 20.
घाटशिला का जमींदार जगत्नाथ सिंह किस विद्रोह से सम्बंधित थे ?
(क) पाइक विद्रोह
(ख) पावना विद्रोह
(ग) चुआड़ विद्रोह
(घ) रम्पा विद्रोह
उत्तर :
(ग) चुआड़ विद्रोह

प्रश्न 21.
वहाबी आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र था –
(क) पटना
(ख) बारासात
(ग) सिधाना
(घ) उक्त सभी
उत्तर :
(घ) उक्त सभी

प्रश्न 22.
औपनिवेशिक वन अधिनियम लागू हुआ था :
(क) 1860 ई० में
(ख) 1865 ई० में
(ग) 1870 ई० में
(घ) 1866 ई० में
उत्तर :
(ख) 1865 ई० में।

प्रश्न 23.
मजनूँशाह जिस विद्रोह के नेता थे, वह विद्रोह था –
(क) पावना विद्रोह
(ख) संथाल विद्रोह
(ग) महाविद्रोह
(घ) फकीर विद्रोह
उत्तर :
(घ) फकीर विद्रोह।

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प्रश्न 24.
किसने खुद को ‘धरती बाबा’ घोषित किया था ?
(क) बिरसा मुण्डा
(ख) सिद्धू
(ग) कानू
(घ) भैरव
उत्तर :
(क) बिरसा मुण्डा।

प्रश्न 25.
“पागल पंथी विद्रोह” का उत्पत्ति केन्द्र था –
(क) फरीद्युर
(ख) रंगपुर
(ग) मैमनसिंह
(घ) पावना
उत्तर :
(ग) मैमनसिंह।

प्रश्न 26.
“संसार का वास्तविक मालिक अल्लाह है।” – किसने कहा है ?
अथवा
जमीन अल्लाह का दान है ………. ने कहा था –
(क) शरीयत उल्लाह
(ख) द्घूमियाँ
(ग) तितूमीर
(घ) सैयद अहमंद
उत्तर :
(क) शरीयत उल्लाह।

प्रश्न 27.
‘कोल विद्रोह’ के नेता कौन थे ?
(क) बुद्धा भगत
(ख) सुई मुन्डा
(ग) बिरसा मुण्डा
(घ) भवानी पाठक
उत्तर :
(क) बुद्धा भगत।

प्रश्न 28.
‘बंगाल के नाना साहेब’ की उपाधि किसे दी गई है ?
(क) रामरतन मल्लिक
(ख) हरीश्चन्द्र मुखोपाध्याय
(ग) दिगम्बर विश्वास
(घ) दीनबंधु मित्र
उत्तर :
(क) रामरतन मल्लिक।

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प्रश्न 29.
द ग्रेट रिवेलियन (The Great Rebellion) के लेखक हैं –
(क) रजनी पाम दत्ता
(ख) तालमोज खाल्देन
(ग) पी॰ सी॰ जोशी
(घ) चार्ल्स रेक्स
उत्तर :
(क) रजनी पाम दत्ता।

प्रश्न 30.
संथाल विद्रोह का नेता कौन था ?
(क) दुर्जन सिह
(ख) भवानी पाठक
(ग) सिधू
(घ) बिरसा मुण्डा
उत्तर :
(ग) सिधू।

प्रश्न 31.
‘दामिन-ए-कोह’ शब्द का अर्थ है –
(क) भूमि का किनारा
(ख) सागर का किनारा
(ग) पहाड़ी का किनारा
(घ) जंगल का किनारा
उत्तर :
(घ) जंगल का किनारा।

प्रश्न 32.
कौन-सा विद्रोह भगनाडिही में हुआ था ?
(क) भील विद्रोह
(ख) रंगपुर विद्रोह
(ग) मोपला विद्रोह
(घ) संथाल विद्रोह
उत्तर :
(घ) संथाल विद्रोह।

प्रश्न 33.
मुण्डा विद्रोह का नेता था :
(क) बिरसा मुण्डा
(ख) दुर्जन अली
(ग) मुशा मुण्डा
(घ) डिकू मुण्डा
उत्तर :
(क) बिरसा मुण्डा।

प्रश्न 34.
सन् 1857 ई० की क्रान्ति में अवध से विद्रोह का नेतृत्व किया –
(क) लक्ष्मीबाई
(ख) नानासाहब
(ग) बेगम हजरत महल
(घ) ताँत्या टोपे।
उत्तर :
(ग) बेगम हजरत महल।

प्रश्न 35.
“गदर पार्टी” का गठन किया था –
(क) सावरकर
(ख) लाला हरदयाल
(ग) लाला लाजपत राय
(घ) इनमें से किसी ने नह
उत्तर :
(ख) लाला हरदयाल।

प्रश्न 36.
चुआड़ का अर्थ होता है –
(क) उच्च जाति के लोग
(ख) निम्न जाति के लोग
(ग) आदिवासी
(घ) असभ्य लोग
उत्तर :
(घ) असभ्य लोग

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प्रश्न 37.
उलगुलान शब्द सम्बन्धित है –
(क) कोल विद्रोह से
(ख) चुआड़ विद्रोह से
(ग) संथाल विद्रोह से
(घ) मुंडा विद्रोह से
उत्तर :
(घ) मुंडा विद्रोह से

प्रश्न 38.
‘एका’ आन्दोलन कहाँ हुआ था ?
(क) संयुक्त राज्य में
(ख) मध्य राज्यों में
(ग) बिहार में
(घ) बंगाल में
उत्तर :
(क) संयुक्त राज्य में।

प्रश्न 39.
द्वितीय चुआड़ विद्रोह का नेता कौन था ?
(क) सिथू
(ख) दुर्जन सिंह
(ग) विरसा मुण्डा
(घ) मुशा साह
उत्तर :
(ख) दुर्जन सिंह।

प्रश्न 40.
नील आयोग का गठन हुआ था :
(क) 1860 ई० मे
(ख) 1865 ई० में
(ग) 1870 ई० में
(घ) 1875 ई० में
उत्तर :
(क) 1860 ई० में।

प्रश्न 41.
1855 ई० के किस दिन संथाल विद्रोह हुआ था ?
(क) 20 जून को
(ख) 23 जून को
(ग) 28 जून को
(घ) 30 जून को
उत्तर :
(घ) 30 जून को।

प्रश्न 42.
आदिवासी लोगों का सम्बन्ध इनमें से किस विद्रोह से नहीं है ?
(क) चुआड़ विद्रोह
(ख) कोल विद्रोह
(ग) सन्धाल विद्रोह
(घ) पावना विद्रोह
उत्तर :
(घ) पावना विद्रोह।

प्रश्न 43.
संन्यासी विद्रोह का नेता था :
(क) सिधू
(ख) मुशा अली
(ग) भवानी पाठक
(घ) तीतूमीर
उत्तर :
(ग) भवानी पाठक।

प्रश्न 44.
अचल सिंह नेता थे –
(क) कोल विद्रोह
(ख) संथाल विद्रोह
(ग) नील विद्रोह
(घ) चुआड़ विद्रोह
उत्तर :
(घ) चुआड़ विद्रोह।

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प्रश्न 45.
फराजी विद्रोह के संस्थापक थे –
(क) शरीयतुल्लाह
(ख) तीतूमीर
(ग) दुद्दूमियाँ
(घ) सैयद अहमद
उत्तर :
(क) शरीयतुल्लाह।

प्रश्न 46.
रंगपुर विद्रोह के नेता थे –
(क) शिवराम
(ख) नुरूलुद्दीन
(ग) मजनु शाह
(घ) भवानी पाठक
उत्तर :
(ख) नुरूलुद्दीन।

प्रश्न 47.
रम्मा विद्रोह को नेतुत्व किसने किया था ?
(क) अलुरी सीताराम राजू
(ख) सिंगार वेल्लु चेट्टियार
(ग) बाबा रामबन्द्र
(घ) मदारी पासी
उत्तर :
(क) अलुरी सीताराम राजू।

प्रश्न 48.
चुआड़ विद्रोह के प्रमुख नेता थे –
(क) बुदु भगत
(ख) दुर्जन सिंह
(ग) केशव भगत
(घ) नरेन्द्र शाह
उत्तर :
(ख) दुर्जन सिंह

प्रश्न 49.
नील विद्रोह कब हुआ था ?
(क) 1857 ई० में
(ख) 1858 ई० में
(ग) 1859 ई० में
(घ) 1861 ई० में
उत्तर :
(ग) 1859 ई० में

प्रश्न 50.
चुआड़ विद्रोह हुआ था-
(क) 1750-51 ई० में
(ख) 1800 ईं० में
(ग) 1798-99 ई० में
(घ) 1801 ई० में
उत्तर :
(ग) 1798-99 ई० मे

प्रश्न 51.
संथाल विद्रोह कब हुआ था ?
(क) 1750-51 ई० में
(ख) 1855 ई० में
(ग) 1850 ई० में
(घ) 1860 ई० में
उत्तर :
(ख) 1855 ई० में

प्रश्न 52.
बुद्ध भगत किस विद्रोह का नेता था ?
(क) चुआर विद्रोह का
(ख) संथाल विद्रोह का
(ग) कोल विद्रोह का
(घ) संन्यासी विद्रोह का
उत्तर :
(ग) कोल विद्रोह का

प्रश्न 53.
मुण्डा विद्रोह कब हुआ ?
(क) 1800 ई० में
(ख) 1850 ई० में
(ग) 1870 ई० में
(घ) 1900 ई० में
उत्तर :
(घ) 1900 ई० में।

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प्रश्न 54.
भील विद्रोह कहाँ हुआ था ?
(क) बंगाल में
(ख) बिहार में
(ग) गुजरात में
(घ) महाराष्ट्र में
उत्तर :
(ग) गुजरात में।

प्रश्न 55.
कोल विद्रोह कब आरम्भ हुआ था ?
(क) 1831 ई० में
(ख) 1835 ई० में
(ग) 1840 ई० में
(घ) 1848 ई० में
उत्तर :
(क) 1831 ई० में

प्रश्न 56.
बाबा तिलक माँझी के नेतृत्व में संथाल विद्रोह हुआ था-
(क) 1784 ई० में
(ख) 1793 ई० में
(ग) 1790 ई० में
(घ) 1799 ई० में
उत्तर :
(क) 1784 ई० में।

प्रश्न 57.
बंगाल में स्थायी बन्दोवस्त का प्रवर्तक कौन था ?
(क) लॉर्ड हेस्टिंग्स
(ख) लॉर्ड वेलेजली
(ग) लॉर्ड कार्नवालिस
(घ) लॉर्ड रिपन
उत्तर :
(ग) लॉर्ड कार्नवालिस

प्रश्न 58.
राजस्थान में भील विद्रोह कब हुआ था ?
(क) 1820 ई० में
(ख) 1821 ई० में
(ग) 1825 ई० में
(घ) 1830 ई० में
उत्तर :
(ख) 1821 ई० में

प्रश्न 59.
फराजी आन्दोलन था-
(क) कृषक आन्दोलन
(ख) मजदूर आन्दोलन
(ग) धार्मिक आन्दोलन
(घ) सामाजिक आन्दोलन
उत्तर :
(ग) धार्मिक आन्दोलन

प्रश्न 60.
वहाबी आन्दोलन का प्रवर्तक था –
(क) अब्दुल वहाब
(ख) सैख्यद अहमद बरेलवी
(ग) वली अल्लाह
(घ) तीतूमीर
उत्तर :
(क) अब्दुल वहाब

प्रश्न 61.
बंगाल में संन्यासी विद्रोह हुआ –
(क) 1760 ई० में
(ख) 1770 ई० में
(ग) 1780 ई० में
(घ) 1790 ई० में
उत्तर :
(ख) 1770 ई० में।

प्रश्न 62.
पागलपंधी विद्रोह का प्रथम चरण का समय कब से कब तक था ?
(क) 1820-1825 ई तक
(ख) 1822-1827 ई तक
(ग) 1825-1827 ई० तक
(घ) 1825-1829 ई० तक
उत्तर :
(ग) 1825-1827 ई० तक।

प्रश्न 63.
मेघालय में खासियों के विद्रोह का नेतुत्व किया था-
(क) सिद्धू-कानू
(ख) बिरसा मुण्डा
(ग) तीरत सिंह
(घ) सीता राजू
उत्तर :
(ग) तीरत सिंह

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प्रश्न 64.
संथाल विद्रोह कब से कब तक चला ?
(क) 1851-52 ई० तक
(ख) 1852-53 ई० तक
(ग) 1854-55 ई० तक
(घ) 1855-56 ई० तक
उत्तर :
(घ) 1855-56 ई० तक

प्रश्न 65.
छोटानागपुर में काश्तकारी अधिनियम पारित हुआ –
(क) 1899 ई० में
(ख) 1900 ई० में
(ग) 1908 ई० में
(घ) 1901 ई० में
उत्तर :
(ग) 1908 ई० में।

प्रश्न 66.
पधिमी तट के खान देश जिले में भील नामक आदिवासी द्वारा विद्रोह हुआ –
(क) 1810-20 ई० तक
(ख) 1811-21 ई० तक
(ग) 1812-22 ई० तक
(घ) 1812-19 ई० तक
उत्तर :
(घ) 1812-19 ई० तक

प्रश्न 67.
हाजी शरीयत उल्ला ने किस धार्मिक सम्रदाय की स्थापना की थी ?
(क) वहाबी
(ख) फराजी
(ग) सूफी
(घ) भक्ति
उत्तर :
(ख) फराजी

प्रश्न 68.
कृषक राहत अधिनियम कब पारित हुआ था ?
(क) 1870 ई० में
(ख) 1872 ई० में
(ग) 1875 ई० में
(घ) 1880 ई० में
उत्तर :
(ग) 1875 ई० में

प्रश्न 69.
रम्पाओं (रम्पा) का विद्रोह कब हुआ था ?
(क) 1879 ई० में
(ख) 1880 ई० में
(ग) 1881 ई० में
(घ) 1882 ई० में
उत्तर :
(क) 1879 ई०

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प्रश्न 70.
बस्तर का विद्रोह कब हुआ था ?
(क) 1900 ई० में
(घ) 1910 ई० में
(ग) 1920 ई० में
(घ) 1930 ई० में
उत्तर :
(ख) 1910 ई०

प्रश्न 71.
बंगाल में ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना हुई –
(क) 1557 ई० में
(ख) 1657 ई० में
(ग) 1757 ई० में
(घ) 1857 ई० में
उत्तर :
(ग) 1757 ई० में

प्रश्न 72.
सन् 1855 ई० में संथालों ने किस अंग्रेज कमांडर को हराया ?
(क) कैप्टन नेक फेविले
(ख) लेफ्टिनेंट बास्टीन
(ग) मेजर बरो
(घ) कर्नल ह्वाइट
उत्तर :
(ग) मेजर बरो

प्रश्न 73.
‘हो’ विद्रोह हुआ –
(क) 1620-21 के दौरान
(ख) 1720-21 के दौरान
(ग) 1820-21 के दौरान
(घ) 1920-21 के दौरान
उत्तर :
(ग) 1820-21 के दौरान

प्रश्न 74.
1908 के ‘छोटानागपुर काश्त अधिनियम’ ने रोक लगाई –
(क) वन-उत्पाद के स्वतंत्र उपयोग पर
(ख) वनों को जलाने पर
(ग) बंधुया मजदूरी पर
(घ) खूंटकटी भूमि व्यवस्था पर
उत्तर :
(ग) बंधुया मजदूरी पर

प्रश्न 75.
मानव बलि प्रथा निषेध किये जाने के कारण अंग्रेजों के विरुद्ध विरोध करने वाली जनजाति का नाम बताएँ –
(क) कूकी
(ख) खोंड
(ग) उरांव
(घ) नाइकदा
उत्तर :
(ख) खोंड

प्रश्न 76.
महाराष्ट्र में ‘रामोसी कृषक जत्था’ किसने स्थापित की थी ?
(क) न्यायमूर्ति राणाड़े
(ख) गोपाल कृष्ण गोखले
(ग) वासुदेव बलवंत फड़के
(घ) ज्योतिबा फूले
उत्तर :
(ग) वासुदेव बलवंत फड़के

प्रश्न 77.
छोटानागपुर जनजाति विद्रोह कब हुआ ?
(क) 1808-09 ई० में
(ख) 1820 ई० में
(ग) 1858 ई० में
(घ) 1829 ई० में
उत्तर :
(ख) 1820 ई० में।

प्रश्न 78.
‘उलगुलान’ (महाविद्रोह) से कौन जुड़ा था ?
(क) संथाल
(ख) कच्छा नागा
(ग) कोल
(घ) वीरसा मुण्डा
उत्तर :
(घ) वीरसा मुण्डा

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प्रश्न 79.
खैरवार आदिवासी आन्दोलन कब हुआ ?
(क) 1860 ई० में
(ख) 1874 ई० में
(ग) 1870 ई० में
(घ) 1861 ई० में
उत्तर :
(ख) 1874 ई० में।

प्रश्न 80.
पागलपंथी विद्रोह की प्रकृति थी –
(क) किसान आन्दोलन
(ख) धार्मिक आन्दोलन
(ग) कर सुधार आन्दोलन
(घ) अर्द्ध धार्मिक आन्दोलन
उत्तर :
(घ) अर्द्ध धार्मिक आन्दोलन।

प्रश्न 81.
वर्ष 1765 में दीवानी प्रदान किये जाने के बाद ब्रिटिश सबसे पहले निम्नलिखित में से किस पर्वतीय जनजाति के सम्पर्क में आए ?
(क) गारो
(ख) खासी
(ग) कूकी
(घ) टिप्पराह
उत्तर :
(ख) खासी

प्रश्न 82.
किस कृषक विद्रोह के नेताओं ने यह नारा दिया- ‘हम महारानी और सिर्फ महारानी की रैयत होना चाहते हैं’ ?
(क) पावना विद्रोह
(ख) दक्कन विद्रोह
(ग) चम्पारण का नील विद्रोह
(घ) नील विद्रोह
उत्तर :
(क) पावना विद्रोह।

प्रश्न 83.
किस प्रदेश में ब्रिटिश के विरुद्ध वीरसा मुण्डा विद्रोह का संचलन रहा था ?
(क) पंजाब
(ख) छोटानागपुर
(ग) तराई
(घ) मणिपुर
उत्तर :
(ख) छोटानागपुर

प्रश्न 84.
‘दादनी प्रथा’ (Dadani System) का संबंध है-
(क) संन्यासी विद्रोह से
(ख) फराजी आन्दोलन से
(ग) नील विद्रोह से
(घ) पागलपंथी विद्रोह से
उत्तर :
(ग) नील विद्रोह से।

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प्रश्न 85.
‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) नाटक का अंग्रेजी में अनुवाद किया –
(क) माइकेल मघुसूटन दत्त ने(ख) दीनबंधु मित्र ने
(ग) हरिश्न्द्र मुखर्जी ने
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) माइकेल मधुसूदन दत्त ने।

प्रश्न 86.
पागलपंथी विद्रोह के नेता थे-
(क) टीपू
(ख) मजनूनशाह
(ग) चिराग अली
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) टीपू

प्रश्न 87.
सैबद अहमद कहाँ के थे ?
(क) बिहार के
(ख) भागलपुर के
(ग) रायबरेली के
(घ) पटना के
उत्तर :
(ग) रायबरेली के।

प्रश्न 88.
पावना में किसान विद्रोह कब हुआ ?
(क) 1840 ई० में
(ख) 1850 ई० में
(ग) 1865 ई० में
(घ) 1870 ई० में
उत्तर :
(घ) 1870 ई० में

प्रश्न 89.
कहाँ के किसान नील की कृषि के कारण पीड़ित थे ?
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) बंगाल
(ग) महाराष्ट्र
(घ) गुजरात
उत्तर :
(ख) बंगाल

प्रश्न 90.
तारीख-ए-मुहम्मदिया के नेता थे –
(क) दुधू मियां
(ख) अब्दुल वहाब
(ग) टीपू शाह
(घ) सैयद अहमद बरेलव
उत्तर :
(घ) सैयद अहमद बरेलवी

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

प्रश्न 91.
फराजी आन्दोलन के जन्मदाता थे –
(क) हाजी शरीयतुल्लाह
(ख) दुधू मियां
(ग) अब्दुल वहाब
(घ) तीतूमीर
उत्तर :
(क) हाजी शरीयतुल्लाह

प्रश्न 92.
तीतूमीर ने अपना बंस का किला कहाँ बनवाया था ?
(क) नारकेलेक्ड़िया (बारासात) में
(ख) सुलपुर में
(ग) फरीदपुर में
(घ) हैदरपुर में
उत्तर :
(क) नारकेलबेड़िया (बारासात) में

प्रश्न 93.
फराजी का क्या अर्थ है –
(क) नास्तिक
(ख) अल्लाह का सेवक
(ग) परिश्रम करनेवाला
(घ) सुस्त व्यक्ति
उत्तर :
(ख) अल्लाह का सेवक

प्रश्न 94.
‘दारुल उल हर्ब’ का अर्थ होता है –
(क) अल्लाह की भूमि
(ख) मित्रों की भूमि
(ग) दुश्मनों की भूमि
(घ) किसी की नहीं
उत्तर :
(ग) दुश्मनों की भूमि

प्रश्न 95.
अरब में वहाबी धर्म सुखार किसने शुरू किया ?
(क) मजनू शाह
(ख) अब्दुल बहाव
(ग) तीतूमीर
(घ) दुधू मियां
उत्तर :
(ख) अब्दुल वहाब।

प्रश्न 96.
सबसे अधिक दिनों तक चलने वाला विद्रोह था –
(क) मुण्डा विद्रोह
(ख) संद्यदिहिलोह (अकीर हिलेह)
(ग) रंगपुर विद्रोह
(घ) भील विद्रोह
उत्तर :
(ख) संन्यासी विद्रोह (फकीर विद्रोह)

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

प्रश्न 97.
आदिवासी लोग किस प्रकार की कृषि करते थे ?
(क) आधुनिक कृषि
(ख) परम्परागत कृषि
(ग) झूम कृषि
(घ) व्यापारिक कृषि
उत्तर :
(ग) झूम कृषि

प्रश्न 98.
किस ऐक्ट के द्वारा किसानों को नील की खेती के लिए बाध्य किया गया ?
(क) रेग्यूलेशन V एवं VII
(ख) रेग्यूलेशन – XI
(ग) रेग्यूलेशन – IX
(घ) रेग्यूलेशन – ।
उत्तर :
(क) रेग्यूलेशन V एवं VII

प्रश्न 99.
फराजी नामक धार्मिक सम्पदाय की स्थापना कब हुई ?
(क) 1801 ई० में
(ख) 1802 ई० में
(ग) 1803 ई० में
(घ) 1804 ई० में
उत्तर :
(घ) 1804 ई० में

प्रश्न 100.
बंगाल में अकाल कब पड़ा था ?
(क) 1772 ई० में
(ख) 1771 ई० में
(ग) 1770 ई० में
(घ) 1780 ई० में
उत्तर :
(ग) 1770 ई० में

प्रश्न 101.
‘द संथाल इन्स्योरेक्शन’ नामक पुस्तक किसने लिखा ?’
(क) डॉ॰ काली किंकर दत्ता
(ख) आर० सी॰ मजुमदार
(ग) एस० सी॰ राय
(घ) बी० बी० राय
उत्तर :
(क) डॉ॰ काली किंकर दत्त

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

प्रश्न 102.
कृषक राहत अधिनियम कब पारित हुआ था ?
(क) 1870 ई० में
(ख) 1872 ई० में
(ग) 1875 ई० में
(घ) 1880 ई० में
उत्तर :
(ग) 1875 ई० में

प्रश्न 103.
1922 ई० में किसके नेतृत्व में वन कानून लाया गया –
(क) श्यामगंजन
(ख) दुर्जल सिंह
(ग) सीता राजू
(घ) जगत्राथ सिंह
उत्तर :
(ग) सीता राजू

प्रश्न 104.
पावना में लागू था –
(क) स्थाई बन्दोवस्त
(ख) महलवाड़ी व्यवस्था
(ग) सहायक संधि
(घ) रैयतवाड़ी
उत्तर :
(क) स्थाई बन्दोवस्त

प्रश्न 105.
चुआड़ विद्रोह का द्वितीय चरण माना जाता है-
(क) 1798-1799 ई० तक
(ख) 1799-1800 ई0 तक
(ग) 1797-1778 ई० तक
(घ) 1796-1798 ई0 तक
उत्तर :
(क) 1798-1799 ई० तक

प्रश्न 106.
रंगपुर के किसान ने किनके अत्याचारों से तंग आकर विद्रोह किया-
(क) कम्पनी के अत्याचारों से
(ख) जमींदार देवी सिंह के अत्याचारों से
(ग) किसानों के अत्याचारों से
(घ) नूरुद्दीन के अत्याचारों से
उत्तर :
(ख) जमींदार देवी सिंह के अत्याचारों से

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (Fill in the blanks) : (1 mark)

1. बहावी का अर्थ है…………|
उत्तर : पुर्नजागरण

2. सैय्यद अहमद बरेलवी के ऊपर……….. का प्रभाव अधिक था।
उत्तर : दिल्ली के संत शाहवली उल्लाह एवं अरब के अब्दुल वहाब।

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

3. भारत में ‘तारीख-ए-मुहम्मदिया’ आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र…………था।
उत्तर : पटना।

4. ………… में वहाबियों और सिक्खों के बीच बालाकोट में भयकर युद्ध हुआ।
उत्तर : सन् 1831 ।

5. ………… भारत की प्राचीन आदिवासियों की एक जाति है, जो झारखण्ड के जंगल क्षेत्र में निवास करती है।
उत्तर : कोल।

6. कोलों के प्रमुख परम्परागत हधियार…………. थे।
उत्तर : तीर- धनुष, माले एवं कुल्हाड़ी

7. संथाली तीर-धनुष, कुल्हाड़ी एवं …………के साथ…………हुए जमींदारों तथा महाजनों के घरों को लुटते थे।
उत्तर : नगाड़ा, पीटते।

8. …………ने संथाल विद्रोह को स्वाधीनता संग्राम की संज्ञा दी है।
उत्तर : डॉ॰ रमेश बन्द्र मजुमदार।

9. मुण्डा विद्रोह में…………की भी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
उत्तर : महिलाओं।

10. रंगपुर विद्रोह का दमन …………नामक स्थान पर पूर्ण रूप से हो गया।
उत्तर : पटग्राम।

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11. मेवाड़ में भील ………… लम्बे समय से वसूल करते आ रहे थे।
उत्तर : मोलाई एवं रखवाली।

12. बंगाल में वहाबी आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य …………लाना था।
उत्तर : मुस्लिम समाज में सुधार।

13. तीतूमीर का बारासात का विद्रोह …………में हुआ।
उत्तर : नारकेलबेरिया।

14. बंगाल में प्रमुख बुद्धिजीवियों,…………ने पाबना आन्दोलन का समर्थन किया।
उत्तर : बंकिमचन्द्र चटर्जी तथा आर०सी० दत्त।

15. नील विद्रोह का नेता………… थे।
उत्तर : रामरतन मल्लिक।

16. …………प्रमुख कथन एक नील काश्तकार हाजी मुल्ला की है।
उत्तर : ‘भीख माँग लूँगा परन्तु नील नहीं उगाऊँगा’ नामक।

17. 1857 ई० में भील विद्रोह के नेता भगोजी तथा…………थे।
उत्तर : काजल सिंह।

18. फकीर विद्रोह 1776 ई० से 1777 ई० तक………… में हुआ।
उत्तर : बंगाल।

19. फराजी आन्दोलन के धार्मिक नेता…………थे।
उत्तर : शरीयतुल्लाह।

20. वहाबी आन्दोलन को…………आन्दोलन भी कहा जाता है।
उत्तर : वल्लीउल्लाह।

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

21. नील विद्रोह सर्वप्रथम बंगाल के ………………..जिले में हुआ था।
उत्तर : नदिया।

22. कोल विद्रोह के नेता……………….. थे।
उत्तर : बुद्ध भगत।

23. ………………..और……………….. संथाल विद्रोह के नेता थे।
उत्तर : सिद्धू कान्हू।

24. ……………….. ई० में बारासात विद्रोह हुआ था।
उत्तर : 1931 ई०।

25. ………………..ने आनन्द मठ लिखा।
उत्तर : बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय।

26. कोल लोग ………………..में निवास करते थे।
उत्तर : छोटानागपुर अंचल।

27. ‘दारूल-हर्व’ का अर्थ ………………..होता है।
उत्तर : काफिरों के देश।

28. ‘दारूल इस्लाम’ का अर्थ ………………..है।
उत्तर : मुसलमानों का देश।

29. हाजी शरीयत उल्लाह के बाद दूधू मियां ………………..के नेता बने।
उत्तर : फराजी आंदोलन।

30. ……………….. ने नील दर्पण नाटक की रचना की।
उत्तर : दीनबंधु मित्र।

सही कथन के आगे ‘ True ‘ एवं गलत कथन के आगे ‘ False ‘ लिखिए : (1 mark)

1. फराजी एक प्राचीन जनजाति का नाम है।
उत्तर : False

2. मीर निसार अली ने बाँस के किले का निर्माण किया था।
उत्तर :True

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3. भारत में वहाबी आन्दोलन की शुरूआत शाह वलीउल्लाह ने की थी।
उत्तर : False

4. सिद्ध कोल विद्रोह के नेता थे।
उत्तर : False

5. बीरसा मुण्डा नील विद्रोह के नेता थे।
उत्तर : False

6. जोआ भगत चुआड़ विद्रोह के नेता थे।
उत्तर : False

7. बुद्धू भगत एवं केशव भगत चुआड़ विद्रोह के नेता थे।
उत्तर : False

8. संथाल विद्रोह के नेता सिद्धू-कानू को गिरफ्तार कर फाँसी दे दी गयी।
उत्तर : True

9. तीतूमीर ने फराजी आन्दोलन का नेतृत्व किया।
उत्तर : False

10. कोल जाति के लोगों का प्रधान पेशा कृषि था।
उत्तर : True

11. दामन-ए-कोह का अर्थ पहाड़ों का प्रस्तर प्रदेश है।
उत्तर : True

12. तीतूमीर का विद्रोह बारासात विद्रोह के नाम से जाना जाता है।
उत्तर : True

13. चुआड़ विद्रोह बिहार में हुआ।
उत्तर : False

14. रंगपुर विद्रोह के नेता बिरसा मुण्डा थे।
उत्तर : False

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

15. फराजी शब्द का अर्थ अल्लाह (ईश्वर) का सेवक है ।
उत्तर : True

16. भील विद्रोह छोटानागपुर में हुआ।
उत्तर : False

17. वीरसा मुण्डा की मृत्यु चालीस वर्ष की आयु में हुई थी।
उत्तर : False

18. पाबना विद्रोह सन् 1850 में हुआ।
उत्तर : False

19. वीरसा मुण्डा के राजनीतिक गुरू आनन्द पाण्डे थे।
उत्तर : True

20. 1860 ई० में फराजी आन्दोलन का दमन कर दिया गया।
उत्तर : True

21. पागलपंथी विद्रोह के नेता इनायत अली थे।
Answer: False

22. संन्यासी और फकीर दोनों विद्रोह 40 वर्षों तक बंगाल में चलता रहा।
उत्तर : True

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

23. ‘दारूल हर्ब’ का अर्थ ‘काफिरों का देश’ से है।
उत्तर : True

24. फकीर विद्रोह बिहार में चलाया गया।
उत्तर : False

25. ‘तारीख-ए-मुहम्मदिया’ का अर्थ ‘मुस्लिम समाज में पुनरुद्धार आन्दोलन’ से है।
उत्तर : True

26. ‘दादनी प्रथा’ का संबंध फराजी आन्दोलन से है।
उत्तर : False

27. नील की प्रमुख फैक्टरियाँ फरीदपुर, पावना, जैसोर तथा ढाका में थी।
उत्तर : True

28. 1856 ई० तक संथाल विद्रोह को कुचल दिया गया।
उत्तर : False

29. सेवारम के नेतृत्व में पुन: भील आन्दोलन 1831 ई० एवं 1840 ई० में हुए।
उत्तर : False

30. 1960 ई० तक वहाबी आन्दोलन का दमन कर दिया गया।
उत्तर : False

31. चुआड़ विद्रोह गैर जनजाति किसानों का विद्रोह था।
उत्तर : True

32. नील विद्रोह 1857 ई० में आरम्भ हुआ था।
उत्तर :True

33. नील दर्पण माइकेल मधुसूदन दत्त ने लिखा।
उत्तर : False

34. सिद्धू-कानू को गिरफ्तार कर आजीवन जेल की सजा दी गयी।
उत्तर : False

35. तीतूमीर ने फराजी आन्दोलन का नेतृत्व किया।
उत्तर : False

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन

36. नील विद्रोह की शुरूआत विष्णु चरण विश्वास और दिगम्बर विश्वास ने नदिया जिला के चौगच्वा गाँव में की थी।
उत्तर : True

निम्नलिखित कथनों की सही व्याख्या चुनकर लिखिए : (1 Mark)

प्रश्न 1.
कथन : अंग्रेजी सरकार ने अधिनियम III 1872 ई० में पास किया था।
व्याख्या 1 : इसका उद्देश्य हिन्दू, मुसलमान एवं ईसाई समाज को संगठित करना था।
व्याख्या 2 : इसका उद्देश्य जनसाधारण की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति करना था।
व्याख्या 3 : इस अधिनियम का उद्देश्य बालविवाह एवं बहुविवाह प्रथा को बन्द करना एवं विधवाविवाह को कानूनी सिद्ध करना।
उत्तर :
व्याख्या 3 : इस अधिनियम का उद्देश्य बालविवाह एवं बहुविवाह प्रथा को बन्द करना एवं विधवाविवाह को कानूनी सिद्ध करना।

प्रश्न 2.
कथन : ‘एका’ आन्दोलन का सूत्रपात उत्तर प्रदेश में हुआ था।
व्याख्या 1 : यह एक व्यक्तिगत आन्दोलन था।
व्याख्या 2 : यह एक किसान आन्दोलन था।
व्याख्या 3 : यह एक श्रमिक आन्दोलन था।
उत्तर :
व्याख्या 2 : यह एक किसान आन्दोलन था।

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प्रश्न 3.
कथन : संथाल व कोल आदिवासी ‘दिकू’ लोगों से क्षुख्य थे -‘
व्याख्या 1 : ‘दिकू’ लोग आदिवासियों का शोषण करते थे।
व्याख्या 2 : वे आदिवासियों से बेगारी करवाते थे।
व्याख्या 3 : उनकी भूमि छिनने का प्रयास करते थे।
उत्तर :
व्याख्या 1 : ‘दिकू’ लोग आदिवासियों का शोषण करते थे।

प्रश्न 4.
कथन : आदिवासियों के मन में मिशनरियों के खिलाफ असंतोष था।
व्याख्या 1 : मिशनरियाँ उन्हें केवल सुझाव देती थी।
व्याख्या 2 : मिशनरियाँ उन्हें अपना घर्म बदलने को कहती थी।
व्याख्या 3 : मिशनरियाँ उनकी कई प्रकार से सहायता करती थी।
उत्तर :
व्याख्या 2 : मिशनरियाँ उन्हें अपना धर्म बदलने को कहती थी।

प्रश्न 5.
कथन : संथाल विद्रोह का मुख्य कारण दामिन-ए-कोह पर अधिकार करना था।
व्याख्या 1: यह एक उपजाऊ भूमि था।
व्याख्या 2 : क्षेत्र धार्मिक मान्यताओं के साथ था।
व्याख्या 3 : कर-मुक्त भूमि
उत्तर : व्याख्या 3 : कर-मुक्त भूमि

प्रश्न 6.
कथन : ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में आदिवासियों की आस्था नहीं थी क्यों
व्याख्या 1 : न्याय प्रशासन की दृष्टि से आदिवासी समाज भिन्न था।
व्याख्या 2 : आदिवासियों को समय के साथ-साथ काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था।
व्याख्या 3 : न्याय प्रशासन से कई बार उन्हें न्याय नहीं मिला था।
उत्तर :
व्याख्या 3 : न्याय प्रशासन से कई बार उन्हें न्याय नहीं मिला था।

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प्रश्न 7.
कथन : संथाल विद्रोह को कुचल दिया गया।
व्याख्या 1: संथाल अंग्रेजी सेना का मुकाबला अपने परम्परागत हथियार तीर या कुल्हाड़ियों से करते रहे।
व्याख्या 2 : संथाल युद्ध छापामार प्रणाली से करते रहे।
व्याख्या 3 : संथालों के नेता सिद्धू तथा कानू को गिरफ्तार कर फाँसी दी गई।
उत्तर :
व्याख्या 1 : संथाल अंग्रेजी सेना का मुकाबला अपने परम्परागत हथियार तीर या कुल्हाड़ियों से करते रहे।

प्रश्न 8.
कथन : सन्यासी विद्रोह 1770 ई० में बंगाल में ही शुरू हुआ था।
व्याख्या 1 : संन्यासियों के अनुयायी शंकराचार्य थे।
व्याख्या 2 : संन्यासियों को सिर्फ श्रमण करने पर रोक थी।
व्याख्या 3 : संन्यासियों पर धार्मिक कर बढ़ाने तीर्थ स्थानों पर आने-जाने तथा मंदिरों में प्रवेश निषेध को लेकर क्षुब्ध थे।
उत्तर :
व्याख्या 3 : संन्यासियों पर धार्मिक कर बढ़ाने तीर्थ स्थानों पर आने-जाने तथा मंदिरों में प्रवेश निषेध को लेकर क्षुब्ध थे।

प्रश्न 9.
कथन : 1860 ई० में ब्रिटिश सरकार ने रेग्यूलेशन XI पारित किया।
व्याख्या 1 : अंग्रेजों ने अग्रिम राशि लेने वाले किसानों को बाध्य किया कि वे नीलहे साहबों की आर्थिक क्षति को पूरा करें।
व्याख्या 2 : नील की खेती बंगाल में बंद कर दी गई।
व्याख्या 3 : सती प्रथा को प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया।
उत्तर : व्याख्या 2 : नील की खेती बंगाल में बंद कर दी गई।

प्रश्न 10.
कथन : संथाल विद्रोह का कारण था-
व्याख्या 1 : भू-राजस्व बढ़ गया था, अत: किसान कर देने में लाचार हो गये।
व्याख्या 2 : बाहर के लोग संथालों के क्षेत्र में आकार बस गये थे।
व्याख्या 3 : ईसाई मिशनरियाँ संथालों का धर्म परिवर्तन कर रही थीं।
उत्तर :
व्याख्या 3 : ईसाई मिशनरियाँ संथालों का धर्म परिवर्तन कर रही थीं।

स्तम्भ ‘क’ को स्तम्भ ‘ख’ से सुमेलित कीजिए :

प्रश्न 1.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) ‘The Santhal Insurrection’ पुस्तक (a) भवानी पाठक एवं देवी चौधुरानी
(ii) दक्कन विद्रोह के नेता (b) सैय्यद अहमद बरेलवी
(iii) दूधू मियाँ के पुत्र (c) उमा नाइक
(iv) फकीर विद्रोह के हिन्दू नेता (d) डॉ० काली किंकर दत्त
(v) ‘तारीख-ए-मुहम्मदिया’ के नेता (e) नोवा खाँ

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) ‘The Santhal Insurrection’ पुस्तक (d) डॉ० काली किंकर दत्त
(ii) दक्कन विद्रोह के नेता (c) उमा नाइक
(iii) दूधू मियाँ के पुत्र (e) नोवा खाँ
(iv) फकीर विद्रोह के हिन्दू नेता (a) भवानी पाठक एवं देवी चौधुरानी
(v) ‘तारीख-ए-मुहम्मदिया’ के नेता (b) सैय्यद अहमद बरेलवी

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प्रश्न 2.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) तीतूमीर का जन्म (a) हिरिया
(ii) भारत में वहाबी आन्दोलन के नेता (b) मुल्ला कादर
(iii) भील नेता (c) अक्षय कुमार दत्त
(iv) खुलना में नील विद्रोह (d) चौबीस परगना में
(v) ‘तत्वबोधिनी’ के सम्पादक (e) शेख कमारत अली

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) तीतूमीर का जन्म (d) चौबीस परगना में
(ii) भारत में वहाबी आन्दोलन के नेता (e) शेख कमारत अली
(iii) भील नेता (a) हिरिया
(iv) खुलना में नील विद्रोह (b) मुल्ला कादर
(v) ‘तत्वबोधिनी’ के सम्पादक (c) अक्षय कुमार दत्त

प्रश्न 3.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) चुआड़ विद्रोह (a) बंगाल
(ii) कोल विद्रोह (b) मिदनापुर
(iii) भील विद्रोह (c) खान देश
(iv) संन्यासी विद्रोह (d) छोटानागपुर

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) चुआड़ विद्रोह (b) मिदनापुर
(ii) कोल विद्रोह (d) छोटानागपुर
(iii) भील विद्रोह (c) खान देश
(iv) संन्यासी विद्रोह (a) बंगाल

प्रश्न 4.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) कोल विद्रोह (a) 1855-56 ई०
(ii) संथाल विद्रोह (b) 1831-32 ई०
(iii) मुण्डा विद्रोह (c) 1783 ई०
(iv) रंगपुर विद्रोह (d) 1899-1900 ई०

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) कोल विद्रोह (b) 1831-32 ई०
(ii) संथाल विद्रोह (a) 1855-56 ई०
(iii) मुण्डा विद्रोह (d) 1899-1900 ई०
(iv) रंगपुर विद्रोह (c) 1783 ई०

प्रश्न 5.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) 1831 ई० (a) संथाल विद्रोह
(ii) 1855 ई० (b) कोल विद्रोह
(iii) 1899 ई० (c) नील विद्रोह
(iv) 1859 ई० (d) मुंडा विद्रोह

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) 1831 ई० (b) कोल विद्रोह
(ii) 1855 ई० (a) संथाल विद्रोह
(iii) 1899 ई० (c) नील विद्रोह
(iv) 1859 ई० (d) मुंडा विद्रोह

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प्रश्न 6.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) चुआड़ विद्रोह (a) बुद्धू भगत
(ii) कोल विद्रोह (b) सिद्धू, कानू
(iii) संथाल विद्रोह (c) वीरसा
(iv) मुण्डा विद्रोह (d) दुर्जन सिंह

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(i) चुआड़ विद्रोह (d) दुर्जन सिंह
(ii) कोल विद्रोह (a) बुद्धू भगत
(iii) संथाल विद्रोह (b) सिद्धू, कानू
(iv) मुण्डा विद्रोह (c) वीरसा

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 5 वैकल्पिक विचार एवं प्रयास

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WBBSE Class 10 History Chapter 5 Question Answer – वैकल्पिक विचार एवं प्रयास

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Very Short Answer Type) : 1 MARK

प्रश्न 1.
श्रीरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना किस वर्ष में हुई थी ?
उत्तर :
1800 ई० में।

प्रश्न 2.
‘बसु विज्ञान मंदिर’ संस्था की स्थापना किसने किया था ?
उत्तर :
जगदीश चन्द्र बसु ने।

प्रश्न 3.
बंगाल के किस सदी को नवजागरण सदी कहा जाता है ?
उत्तर :
बंगाल में 19 वीं सदी को नवजागरण सदी कहा जाता है।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 5 वैकल्पिक विचार एवं प्रयास

प्रश्न 4.
‘श्री रामपुर त्रयी’ किसको कहा जाता है?
उत्तर :
श्री रामपुर मिशनरी प्रेस के संस्थापक विलियम कैरी, जोशुआ मार्शमैन एवं विलियम वार्ड को संयुक्त रूप से ‘श्री रामपुर त्रयी’ कहा जाता है।

प्रश्न 5.
एक व्यंगचित्र शिल्पी का नाम लिखें।
उत्तर :
गगनेन्द्र नाथ टैगोर।

प्रश्न 6.
एण्टी सर्कुलर सोसाइटी के संस्थापक कौन थे?
उत्तर :
सचीन्द्र नाथ बसु ने।

प्रश्न 7.
बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना किसने किया था ?
उत्तर :
जानाथन डंकन ने।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 5 वैकल्पिक विचार एवं प्रयास

प्रश्न 8.
विश्व भारती की स्थापना में किस जमींदार का योगदान था ?
उत्तर :
रायपुर के जमीदार सीतिकान्त सिन्हा का।

प्रश्न 9.
1906 ई० में स्थापित बंगाल तकनीकी संस्थान का उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
बंगाल में तकनीकी शिक्षा का प्रसार करना।

प्रश्न 10.
भारत में किसने व्यवसायिक मुद्रण की शुरूआत की थी ?
उत्तर :
उपेन्द्रनाथ राय चौधरी।

प्रश्न 11.
‘छेड़े आसा ग्राम’ पुस्तक के लेखक कौन है ?
उत्तर :
दक्षिणा रंजन मुखर्जी।

प्रश्न 12.
गगनेन्द्र नाथ टैगोर किस प्रकार की चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध थे ?
उत्तर :
हास्य व्यग्य चित्रकारी के लिए।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 5 वैकल्पिक विचार एवं प्रयास

प्रश्न 13.
संजीवनी साप्ताहिक पत्रिका के सम्पादक कौन थे ?
उत्तर :
‘कृष्ण कुमार मित्र।

प्रश्न 14.
दक्षिण एशिया का पहला छापाखाना (मुद्रणालय) 1913 ई० में किसने स्थापित किया था?
उत्तर :
उपेन्द्रनाथ राय चौधरी ने।

प्रश्न 15.
1917 ई० में ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ की स्थापना किसने की थी ?
उत्तर :
जगदीश चन्द्र बसु ने।

प्रश्न 16.
इण्डियन एसोसिएसन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइन्स के एक शानदार शिक्षक का नाम बताइए।
उत्तर :
महेन्द्रलाल सरकार।

प्रश्न 17.
श्रीरामपुर त्रयी मठ की स्थापना किसने की थी ?
उत्तर :
डॉ॰ विलियम कैरी ने।

प्रश्न 18.
सिल्वालेवी कौन थे ?
उत्तर :
सिल्वा लेवी फ्रान्स के एक महान शिक्षाशास्त्री थे, जिन्होनें शान्ति-निकेतन की काफी प्रशंसा की थी।

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प्रश्न 19.
बंगाल में प्रथम ‘अंघ विद्यालय’ कब खोला गया ?
उत्तर :
बंगाल में प्रथम ‘अंध विद्यालय’ सन् 1925 में खोला गया।

प्रश्न 20.
‘ए नेशन इन मेकिंग’ (A Nation in Making) के रचनाकार कौन थे ?
उत्तर :
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी।

प्रश्न 21.
भारतीय समाचार पत्र अधिनियम (Vernacular Press Act) कब पारित किया गया था ?
उत्तर :
सन् 1878 में।

प्रश्न 22.
चन्द्रशेखर बेंकटरमन को अन्य किस नाम से भी जाना जाता था ?
उत्तर :
रमन प्रभाव (Raman Effect) के नाम से।

प्रश्न 23.
‘बंगाल गजट’ नामक समाचार-पत्र का पहला प्रकाशन कब हुआ ?
उत्तर :
1780 ई० में।

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प्रश्न 24.
‘बंगाल तकनीकी संस्थान’ (Bengal Technical Institute) की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1906 में।

प्रश्न 25.
उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी के पुत्र का क्या नाम था ?
उत्तर :
सुकुमार रॉय।

प्रश्न 26.
‘बंगाल गजट’ नामक समाचार-पत्र का पहला प्रकाशन किसने किया ?
उत्तर :
जेम्स अगस्ट्स हिक्की ने।

प्रश्न 27.
‘संवाद कौमुदी’ का सम्पादन कब हुआ ?
उत्तर :
सन् 1821 ई० में।

प्रश्न 28.
‘सोमप्रकाश’ साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन कब हुआ ?
उत्तर :
सन् 1858 ई० में।

प्रश्न 29.
‘इंडियन मिरर’ पत्रिका का सम्पादन कब हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1861 ई० में।

प्रश्न 30.
‘बंगवासी’ पत्र के सम्पादक कौन थे ?
उत्तर :
जोगेन्द्रनाथ बोस।

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प्रश्न 31.
पुर्तगालियों ने सर्वप्रथम मुद्रणालय (प्रेस) की स्थापना कहाँ किया ?
उत्तर :
गोवा में।

प्रश्न 32.
एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना किसने किया ?
उत्तर :
सर विलियम जोन्स ने।

प्रश्न 33.
उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1915 में।

प्रश्न 34.
जगदीश चन्द्र बसु का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1858 में।

प्रश्न 35.
जगदीश चन्द्र बसु की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1937 में।

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प्रश्न 36.
‘कलकत्ता विज्ञान कॉलेज’ (Calcutta Science College) की स्थापना किसने किया ?
उत्तर :
आशुतोष मुखर्जी ने।

प्रश्न 37.
देश का पहला ‘होमियोपैथी मेडिकल कॉलेज’ की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1880 में।

प्रश्न 38.
‘हिन्दू पैट्रियट’ समाचार-पत्र किसके द्वारा सम्पादित हुआ था ?
उत्तर :
हरीशचन्द्र मुखर्जी द्वारा।

प्रश्न 39.
‘हिन्दू पैट्रियट’ समाचार-पत्र कब प्रकाशित हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1853 ई० में।

प्रश्न 40.
‘सुलभ समाचार’ बंगला का महत्वपूर्ण दैनिक पत्र किसके द्वारा सम्पादित किया गया था ?
उत्तर :
केशवचन्द्र सेन के द्वारा।

प्रश्न 41.
‘अल हिलाल’ नामक पत्रिका किसके द्वारा सम्पादित किया गया था ?
उत्तर :
मौलाना अबुल कलाम आजाद द्वारा।

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प्रश्न 42.
सेंट जेवियर्स कॉलेज की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
सेंट जेवियर्स कॉलेज की स्थापना सन् 1860 में हुई थी।

प्रश्न 43.
जगदीश चन्द्र बसु के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर :
भगवान चन्द्र बसु।

प्रश्न 44.
चन्द्रशेखर बेंकट रमन का देहान्त कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
बैंगलोर, कर्नाटक, भारत में।

प्रश्न 45.
‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ के रचनाकार कौन थे ?
उत्तर :
मौलाना अबुल कलाम आजाद।

प्रश्न 46.
‘युगान्तर’ की स्थापना की थी।
उत्तर :
अरविंद घोष की।

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प्रश्न 47.
किस शताब्दी के उत्तरार्ध में कलकत्ता दक्षिण एशिया का प्रमुख छापाखाना केन्द्र के रूप में उभरा था ?
उत्तर :
18 वीं शताब्दी में।

प्रश्न 48.
1770 से 1800 ई० के बीच शॉ टेरेस के तत्वावधान में कितने छापेखाने चलते थे ?
उत्तर :
चालीस।

प्रश्न 49.
उपेन्द्र किशोर राय चौधरी द्वारा लिखित रचनाएँ कौन सी हैं ? नाम लिखें।
उत्तर :
बालक, छेलेदेर रामायण, छेंदेर महाभारत, दुनदुनर बोई इत्यादि।

प्रश्न 50.
नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1906 ई० में।

प्रश्न 51.
भारत में आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रवर्तक कौन थे ?
उत्तर :
आचार्य जगदीशचन्द्र बसु।

प्रश्न 52.
मैकाले शिक्षा पद्धति का प्रमुख उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
मैकाले द्वारा अंग्रेजी शिक्षा प्रारम्भ करने का प्रमुख उद्देश्य भारत में अंग्रेजी सरकार के प्रति एक ऐसा वर्ग तैयार करना, जो रूप-रंग से भारतीय हो, पर सभ्यता और बुद्धि से अंग्रेज हो।

प्रश्न 53.
इसाई धर्म के प्रति ग्रांट डफ का क्या विचार था ?
उत्तर :
ग्रांट डफ का विचार था कि भारत में इसाई धर्म का अधिक प्रचार-प्रसार हो।

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प्रश्न 54.
रवीन्द्रनाथ टैगोर के माता-पिता का क्या नाम था ?
उत्तर :
इसके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर तथा माता का नाम शारदा देवी था।

प्रश्न 55.
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार शिक्षा की कौन-सी भाषा होनी चाहिए ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार शिक्षा की भाषा मातृभाषा के माध्यम से होनी चाहिए।

प्रश्न 56.
विश्व भारती कहाँ स्थापित है ?
उत्तर :
विश्व भारती बंगाल के शान्ति निकतन में स्थापित है।

प्रश्न 57.
विश्वभारती के प्रमुख उद्देश्यों में से किसी एक उद्देश्य को बताएँ।
उत्तर :
भारतीय संस्कृति एवं आदशों का उद्देश्यों के आधार पर शिक्षा प्राप्त करें।

प्रश्न 58.
विश्वभारती में शिक्षा किस प्रकार प्रदान की जाती है ?
उत्तर :
विश्व भारती में शिक्षा प्राच्य तथा पाश्चात्य संस्कृति में समान्त्रय स्थापित करके शिक्षा प्रदान की जाती है।

प्रश्न 59.
विश्व भारती की किसी एक विशेषता को बताएँ।
उत्तर :
विश्व भारती की एक प्रमुख विशेषता इसका सैद्धान्तिक रूप से एक मौलिक तथा आवासीय शिक्षण संस्थान है। यह संस्थान भारत का प्रतिनिधित्व करती है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Type) : 2 MARKS

प्रश्न 1.
चार्ल्स विल्किन्स कौन थे ?
उत्तर :
चार्ल्स विल्किन्स एक अंग्रेज विद्वान थे। इन्होंने ही सर्वप्रथम गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। इन्होंने ने ही पंचानन कर्मकार के साथ मिलकर पहला छापाखाना का टाइपफेस का निर्माण किया था।

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प्रश्न 2.
बांग्ला लाइनोटाइप छपाई का क्या महत्व था ?
उत्तर :
बांग्ला लाइनोटाइप के विकास से बांग्ला भाषा में समाचार, पत्र-पत्रिकायें पुस्तके तेजी से छपने लगे। फलस्वरूप छापाखाना, प्रकाशन, पुस्तक व्यवसाय का तेजी से विकास हुआ।

प्रश्न 3.
बंगाल में छापाखाना के विकास में पंचानन कर्मकार की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
भारत में पंचानन कर्मकार एवं चार्ल्स विल्किस को बंगला तथा नागरी मुद्रण (अक्षर टाइप) का जनक माना जाता है। पंचानन कर्मकार छपाई के अक्षर बनाने वाले कलाकार थे। जिन्होंने 700 देवनागरी की एक सुन्दर माला तैयार की थी। इन्हीं के कारण श्री रामपुर मिशन छापाखाना का विकास हुआ। जहाँ से देवनागरी संम्बन्धी सभी माँगे देश भर में पूरी होती थी। इस प्रकार उन्होंने कम लागत में मुद्रण कला के विकास मे महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने बंगला हरफ के अलावा अरबी, फारसी, गुरूमुखी, मराठी तेलगु, वर्मी चीनी आदि 14 भाषाओं के वर्णमालाओं का हरफ (अक्षर) बनाया था। इसलिए छपाई की दुनिया में उनकी विशिष्ट पहचान एवं योगदान है।

प्रश्न 4.
बंगाली छापाखाना के इतिहास में बटाला प्रकाशन का क्या महत्व है ?
उत्तर :
कोलकाता के चितपुर सड़क मार्ग (रोड) पर स्थित ‘बटाला प्रकाशन’ का यही महत्व है कि यह बंगला भाषा तथा अन्य भाषा का सबसे पुराना प्रकाशन शिल्प केन्द्र था। यहाँ से देशी मजदूरों द्वारा हाथ की छपाई, चित्र, कहानियाँ, छोटीछोटी पुस्तकें, अनुवादित साहित्य तथा बाबू समाज के लोगों के सम्बन्ध से जुड़ी बातें प्रकाशित होती थी।

प्रश्न 5.
उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध ‘सभा समिति युग’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
उन्नीसवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में राजनैतिक एकता तथा जनमत तैयार करने के उद्देश्य से अनेकों बंग भाषा प्रकाशिका सभा, जमींदार सभा, भारतीय सभा आदि सभा-समितियों का गठन हुआ। इसलिए डॉ॰०निल सेन ने उन्नीसवी सदी को सभा-समितियों का युग कहा है।

प्रश्न 6.
विश्व-भारती की स्थापना किसने और किस उद्देश्य से की थी ?
उत्तर :
विश्व-भारती की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। इसका उद्देश्य खुले वातांवरण में परम्परागत एवं आधुनिक दोनों प्रकार की साथ-साथ शिक्षा देने के लिए किया गया था।

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प्रश्न 7.
कलकत्ता सांइस (विज्ञान) कालेज की स्थापना किसने और कब की थी ?
उत्तर :
कलकत्ता विज्ञान कालेज की स्थापना आशुतोष मुखर्जी ने सन् 1904 में की थी।

प्रश्न 8.
‘श्री रामपुर त्रयी’ किसको कहा जाता है ?
उत्तर :
श्री रामपुर मिशनरी प्रेस के संस्थापक विलियम कैरी, जोशुआ मार्शमैन एवं विलियम वार्ड को संयुक्त रूप से ‘श्री रामपुर त्रयो’ कहा जाता है।

प्रश्न 9.
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट क्या था ?
उत्तर :
1878 ई० में वायसराय लाईड लिटन ने देशी समाचार पत्रों के प्रकाशन पर रोक लगा दिया था। इसे ही वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट कहा जाता है।

प्रश्न 10.
प्रिंटिंग प्रेस का जनक किसे कहा जाता है ?
उत्तर :
उपेन्द्र किशोर रायचौधुरी को प्रिंटिंग प्रेस का जनक कहा जाता है। इनके द्वारा ‘U. N. Roy and Sons’ मुद्रणालय की स्थापना की गई थी, जो दक्षिण एशिया का पहला मुद्रणालय या प्रेस था, जहाँ से काले एवं सफेद (Block and White) तथा रंगीन (Colourtul) फोटोग्राफ्स मुद्रित होते थे।

प्रश्न 11.
पंचानन कर्मकार कौन थे ? उन्होने कुल कितने भाषाओं के हरफ बनाये थे ?
उत्तर :
मुद्रण कला में बंगला अक्षर (हरफ) के जनक का नाम पंचानन कर्मकार था। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के त्रिवेणी में हुआ था। कलकत्ता में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई तब इन्होंने उसके प्रेस में कार्य किया था। बंगला हरफ के अलावे इन्होंने अरबी, फारसी, गुरूमुखी, मराठी, तेलगु, वर्मी, चीनी आदि 14 भाषाओं के वर्णमालाओं का हरफ बनाया था।

प्रश्न 12.
यू० एन० राय प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना किसके द्वारा एवं कब की गई ?
उत्तर :
यू० एन० राय प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना उपेन्द्र किशोर राय चौधरी द्वारा 1885 ई० में की गई जो उस समय की एक बेहतरीन एवं दक्षिणी एशिया का प्रथम प्रिंटिग प्रेस था।

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प्रश्न 13.
कलकत्ता विज्ञान कॉलेज की स्थापना किसने और कब की ?
उत्तर :
कलकत्ता विज्ञान कॉलेज (Calcutta Science College) : कलकत्ता विज्ञान कॉलेज जो बंगाल में विज्ञान के क्षेत्र में हुई विकास का प्रतीक माना जाता है, की स्थापना सन् 1914 में आशुतोष मुखर्ज़ी ने किया था। उनके इस कार्य में श्री तारकनाथ पालित और श्री रासविबहारी बोस ने सहयोग दिया।

प्रश्न 14.
इण्डियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइन्स की स्थापना क्यों की गई ?
उत्तर :
भौतिक, रसायन, जीव विज्ञान, ऊर्जा बहुलक तथा पदार्थों के सीमावर्ती क्षेत्रों में मौलिक शोध कार्य के लिए सन् 1876 में इसे स्थापित की गई।

प्रश्न 15.
आशुतोष मुखर्जी क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
श्री आशुतोष मुखर्जी एक प्रसिद्ध वकील, कलकत्ता विश्वविद्यालय के उप-कुलपति और प्रसिद्ध विद्वान थे। शिक्षा के क्षेत्र में आशुतोष मुखर्जी का बहुत बड़ा योगदान है।

16.
‘द बंगाल गजट’ के शीघ्र बाद किन पत्रों का प्रकाशन हुआ ?
उत्तर :
कलकत्ता गजट (1784 ई०), बंगाल जनरल (1785 ई०), कलकत्ता क्रॉनिकल (1786 ई०) एवं द एशियाटिक मिरर आदि पत्रों का प्रकाशन हुआ।

प्रश्न 17.
किस काल को बंगाल का नव जागरण काल कहा जाता है ?
उत्तर :
19 वीं शदी के प्रारम्भिक काल को जो राजा राममोहन राय (1774-1833 ई०) से प्रारम्भ होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861 – 1941 ई०) तक के समय को बंगाल का नवजागरण काल कहा जाता है।

प्रश्न 18.
बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना क्यों किया गया ?
उत्तर :
विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के प्रसार के लिए इस कॉलेज की स्थापना की गई।

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प्रश्न 19.
उपेन्द्र किशोर रॉय चौधरी कौन थे ?
उत्तर :
उपेन्द्र किशोर रॉय चौधरी बंगाल के प्रमुख साहित्यकार, चित्रकार एवं तकनीशियन थे। इन्होंने आधुनिक अक्षर कला का निर्माण किया था।

प्रश्न 20.
हिन्दू कॉलेज की स्थापना किस उद्देश्य से हुई थी ?
उत्तर :
हिन्दू कॉलेज की स्थापना का उद्देश्य यूरोप तथा इग्लैंण्ड से आने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को हिन्दी भाषा की शिक्षा देने के उद्देश्य से की गई थी।

प्रश्न 21.
प्रिंटिंग प्रेस का आदि युग किस काल को कहा जाता है ?
उत्तर :
18 वीं सदी के अंतिम समय को ही प्रिंटिंग प्रेस का आदि युग कहा जा सकता है क्योंकि उसी दौरान बंगाल में मुद्रण उद्योग की स्थापना की शुरुआत हुई थी।

प्रश्न 22.
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा के संबंध में क्या विचार था ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा के संबंध में कहना था कि ‘सरोंच्च शिक्षा वही है जो सम्पूर्ण दृष्टि से हमारे जीवन में सामंजस्य स्थापित करती है।”

प्रश्न 23.
छापेखाने ने जन-जीवन को कैसे प्रभावित किया ?
उत्तर :
छापेखाने से विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार के द्वार खुले। स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छाप कर फैला सकते थे। छपे हुए संदेश के जरिये वे लोगों को अलग ढंग से सोचने के लिए बाध्य कर सकते थे। इस बात का जन-जीवन के कई क्षेत्रों में गंभीर प्रभाव पड़ा। उनमें आधुनिकता के प्रति जागरुकता आयी।

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प्रश्न 24.
रमण प्रभाव क्या था ?
उत्तर :
1912 ई० में सी.वी. रमन यूरोप गये तथा वहाँ प्रकाश विकिरण पर खोज किया और यह प्रमाणित किया कि ग्रकाश तथा पदार्थ के अणुओं के आपसी टकराव से प्रकाश नये रंग में परिवर्तित हो सकता है। यह आविष्कार ‘रमण प्रभाव’ के नाम से विख्यात है।

प्रश्न 25.
तारकनाथ पालित एवं रासबिहारी घोष कौन थे ?
उत्तर :
तारकनाथ पालित एवं रासबिहारी घोष बंगाल के प्रसिद्ध वकील एवं समाज सुधारक थे। इन महापुरुषों ने कलकत्ता साइंस कॉलेज की स्थापना के लिए आर्थिक सहायता दी थी।

प्रश्न 26.
तारक नाथ पालित का नाम क्यों स्मरणीय है ?
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा परिषद्, बंगाल ने स्वदेशी औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने के लिए बेंगाल टेक्नीकल इन्स्टीट्यूट (BIT) की स्थापना किया। इसकी स्थापना के लिए श्री तारकनाथ पालित ने 10 लाख रुपए तथा अपर सर्कुलर रोड स्थित अपने आवास को भी दान कर दिया। बंगाल की तकनीकी शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए श्री तारक नाथ पालित स्मरणीय है।

प्रश्न 27.
कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना के दो उद्देश्य बताओ।
उत्तर :
(i) उच्च शिक्षा का प्रसार एवं भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा में शिक्षित करने के उद्देश्य से कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। (ii) इसकी स्थापना लंदन विश्वविद्यालय के स्तर पर हुई थी जिसमें 41 सदस्यों की एक समिति बनाकर नीति निर्धारण का उद्देश्य रखा गया।

प्रश्न 28.
राष्ट्रीय शिक्षा परिषद से आप क्या समझते है ?
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा परिषद या नेशनल काउन्सिल आंफ एडुकेशन की स्थापना 1906 ई० में की गई। इसका मुख्य उद्देश्य स्कूलों में विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना था। पराधीन भारत में नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन एक ऐसी संस्था थी जो राष्ट्रीय नियंत्रण के आधार पर छात्रों में ऐसी वैज्ञानिक एवं तकनकी शिक्षा का प्रसार करना चाहती थी, जो अंग्रेजी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को चुनौती दे सके।

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प्रश्न 29.
एन. बी. हेलहेड क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
एन. बी. हेलहेड ने हिन्दू धर्म शास्त्रों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद कर A Code of Gentoo Laws के नाम से प्रकाशित किया था।

प्रश्न 30.
प्रिंटिंग प्रेस के विकास का काल किस समय को कहा जाता है ?
उत्तर :
19 वीं सदी के पूवार्द्ध समय को प्रिंटिंग प्रेस के विकास का काल माना जाता है जब विलियम कैरी तथा कुछ और अंग्रेजों ने हुगली के श्रीरामपुर में ‘श्रीरामपुर मिशन प्रेस’ की स्थापना किया था।

प्रश्न 31.
प्रिंटिंग प्रेस के विकास का आधुनिक युग किस काल को कहा जाता है ?
उत्तर :
19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा 20 वीं सदी के पूवार्द्ध से प्रिटिंग प्रेस के विकास को आधुनिक युग माना जाता है जब एक के बाद एक प्रिंटिंग प्रेसों की स्थापना होने लगी।

प्रश्न 32.
औपनिवेशिक शिक्षा नीति क्या था ?
उत्तर :
भारत में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करने में ब्रिटिश सरकार के अतिरिक्त ईसाई धर्म के प्रचारको और प्रबुद्ध भारतीयों की प्रमुख भूमिका रही। किन्तु भारतीयों को शिक्षित करने के पीछे उनका उद्देश्य एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो अंग्रजों के सहायक की भूमिका अदा कर सकें। गवर्नर जनरल की कौसिल के सदस्य मैकाले ने अपने महत्वपूर्ण आलेखपत्र द्वारा अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने पर जोर दिया था।

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प्रश्न 33.
औपनिवेशिक शिक्षा नीति के प्रति रवीन्द्रनाथ का मत क्या था ?
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा की आवश्यकता, उसके स्वरूप एवं लक्ष्य आदि पर बोलते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा, “भारत में विदेशियों द्वारा शिक्षा का नियंत्रण और निर्देशन सबसे अधिक अस्वाभाविक घटना है। स्वय अपने प्रयासों और साधनों के द्वारा सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। देश की आवश्यकताओं को पूरा करना ही भारत में राष्ट्रीय शिक्षा का उद्देश्य और लक्ष्य हो।”

प्रश्न 34.
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शांतिनिकेतन के प्रति क्या धारणा थी ?
उत्तर :
‘शांति निकेतन’ की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने सन् 1863 में किये थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘शांति निकेतन’ आश्रम से बड़ा ही लगाव था। वे वहाँ अक्सर जाया करते थे। उनको वहाँ का वातावरण बड़ा ही मनमोहक लगता था। इसी कारण रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने वहाँ अर्थात् ‘शांति निकेतन’ में सन् 1901 में पाँच छात्रों को लेकर एक आश्रम या विद्यालय खोले थे। उनका मानना था कि शांतिनिकेतन ‘शांति का घर’ है जहाँ लोग मन की एकाग्रता पाते हैं।

प्रश्न 35.
शिक्षा में मनुष्य एवं परिवेश के शामिल होने के प्रति रवीन्द्रनाथ टैगोर का मत क्या था ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने खुद ‘प्रकृति’ को महान शिक्षक का दर्जा दिया है, जो हमेशा जीवित रहता है अर्थात् महान शिक्षक होने के साथ-साथ, एक जीवित शिक्षक भी। ‘प्रकृति’ के साथ रहकर अबोध बच्चे या बालक या बालिका जीवन के हर एक रहस्य को सीख पाते हैं। टैगोर जी का मानना है कि समाज में पठन-पाठन का केन्द्र या विद्यालय खुले प्राकृतिक वातावरण में हो ताकि बच्चे खुले प्राकृतिक वातावरण में पढ़कर विकसित हो पायेंग।

प्रश्न 36.
‘गोरा’ उपन्यास की रचना कब और किसके द्वारा की गई ?
उत्तर :
गोरा उपन्यास की रचना रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा 1909 ई० में की गई थी।

प्रश्न 37.
‘भारतमाता’ का चित्र का क्या महत्व शा ?
उत्तर :
भारतमाता अवनीन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा बनाई गई एक अनमोल चित्र था जो दुर्गा मा की प्रतिकृति जैसी थी। इस कलाकृति ने भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना को बहुत ही प्रखर किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय यह कलाकृति लोगों के लिए एक आदर्श बन गई थी।

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प्रश्न 38.
जगदीश चन्द्र बसु ने बोस इन्सटीच्युट की स्थापना क्यों किया ?
उत्तर :
जगदीश चन्द्र बसु के प्रयास से बंगाल में सन् 1917 में ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ की स्थापना किया गया। बाद में चलकर ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ का नाम ‘बोस संस्था’ (Bose Institute) रखा गया जहाँ विज्ञान से संबंधित हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है। इस संस्थान के द्वारा ‘कलेरा’ के विष प्रभाव पर किये गये कार्य काफी महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 39.
तकनीकी शिक्षा की संवर्द्धन के लिए सोसाईटी की स्थापना किसने किया और उसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
सन् 1938 में कांग्रेस सरकार ने ‘मेघनाद साहा’ की अध्यक्षता में तकनीकी शिक्षा से संबंधित एक समिति का गठन किया। इस समिति ने भारत के विभिन्न प्रान्तों में तकनीकी शिक्षा के विकास पर जोर दिया। इस समिति के अन्य सदस्य थे – जगदीश चन्द्र बोस, बीरबल साहनी, शान्तिस्वरूप भटनागर एवं नजीर अहमद।

प्रश्न 40.
कलकत्ता मदरसा की स्थापना कब और किसने किया ?
उत्तर :
कलकत्ता मदरसा की स्थापना गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने सन् 1781 में किया।

प्रश्न 41.
‘स्कूल बुक सोसाइटी’ (School Book Society) की स्थापना कब और किसने किया ?
उत्तर :
‘स्कूल बुक सोसाइटी’ (School Book Society) की स्थापना सन् 1817 में डेविड हेयर ने किया।

प्रश्न 42.
विश्वभारती विश्वविद्यालय के प्रमुख दो उद्देश्य क्या है ?
उत्तर :
(i) भारतीय संस्कृति एवं आदर्शों के आधार पर शिक्षा प्रदान करना।
(ii) प्राच्य-पाश्चात्य संस्कृतियों में समन्वय स्थापित करना।

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प्रश्न 43.
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘ब्रहाचर्य आश्रम’ नामक विद्यालय की स्थापना किया, इस कार्य में उनका साथ किन-किन लोगों ने दिया ?
उत्तर :
महान शिक्षाविद् बह्मबांधव उपाध्याय, सतीश चन्द्र राय, मोहित चन्द्र सेन, अजीत कुमार चक्रवर्ती तथा विलियम पियरसन आदि।

प्रश्न 44.
‘विद्या-भवन’ में क्या-क्या सिखाया जाता है ?
उत्तर :
‘विद्या-भवन’ में प्राच्य की विभिन्न भाषाओं, साहित्य एवं संस्कृति पर शोध कार्य सिखाया जाता है।

प्रश्न 45.
रवीन्द्र भवन की स्थापना क्यों की गई ?
उत्तर :
इसकी स्थापना सन् 1942 में रवीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्यों का अध्ययन करने के लिए किया गया। इसके बगल में ही विचित्र भवन है जिसमें टैगोर जी द्वारा लिखी किताबें, उनकी चित्रकारी, पत्र, उनकी पुस्तकालय तथा उनसे जुड़ी विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ रखी गईं हैं।

प्रश्न 46.
‘कला भवन’ की स्थापना क्यों की गई थी ?
उत्तर :
‘कला भवन’ की स्थापना, विभिन्न प्रकार की चित्रकारी शिक्षा प्रदान करने के लिए किया गया था। यह शिक्षा नन्दलाल बोस के नेतृत्व में दिया जाता था। यहाँ लकड़ी पर नक्काशी, स्थापत्य कला की योजना तथा पत्थर की मूर्तियों एवं सूईयों से विभिन्न प्रकार की कलाकारी करना सिखाया जाता है।

प्रश्न 47.
‘हिन्दी भवन’ में क्या-क्या सिखाया जाता है ?
उत्तर :
‘हिन्दी भवन’ में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन एवं उन पर शोध करना सिखाया जाता है।

प्रश्न 48.
‘चीन भवन’ क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
इसलिए कि वहाँ पर हिन्दी-चीन पारम्परिक संबंध पर अध्ययन एवं शोध कार्य करना सिखाया जाता है। इसकी स्थापना 1937 ई० में प्राध्यापक ‘तान युन सान’ (Tan Yun San) ने किया था।

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प्रश्न 49.
‘पाठ भवन’ तथा ‘शिक्षा भवन’ की स्थापना क्यों किया गया ?
उत्तर :
क्योंकि ‘पाठ भवन’ में माध्यमिक स्तर की शिक्षा एवं ‘शिक्षा भवन’ में उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती थी।

प्रश्न 50.
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा के संबंध में क्या विचार था ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा के संबंध में विचार ‘ससर्वोच्च शिक्षा वही है जो समूर्ण सृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है।”

प्रश्न 51.
किस काल को बंगाल का नवजागरण काल कहा जाता है, और क्यों ?
उत्तर :
1861 ई० से 1941 ई० के बीच के समय को ‘बंगाल का पुर्नजागरण काल’ कहा जाता है, व्योंकि इस काल में साहित्य, कला, समाचार पत्र, पत्रिकाओं, ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी शिक्षा आदि का पर्याप्त विकास हुआ, जिसके कारण लोगों में सामाजिक और राजनीतिक विकास हुआ इसीलिए इस काल को बंगाल का नवजागरण काल कहा जाता है।

प्रश्न 52.
बंगाल में प्रेस (छापाखाना) की स्थापना सर्वप्रथम किसने और कब की ?
उत्तर :
बंगाल में सबसे पहले प्रेस की स्थापना Statesman ने 1770 ई० में की थी।

प्रश्न 53.
श्रीरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना कब और किसने किया था ? आगे चलकर इसका किस प्रेस के साथ विलय हो गया ?
उत्तर :
श्रीरामपुर मिशन प्रेस की स्थापना सन् 1800 में सर विलियम केरी एवं विलियम वार्ड ने की थी। आगे चलकर 1835 ई० में बापटिस्ट मिशन प्रेस के साथ इसका विलय हो गया, यह प्रेस देशी भाषा में पुस्तकों का प्रकाशन करता था।

प्रश्न 54.
भारत में सबसे पहले प्रेस की स्थापना किसने और कब की थी ?
उत्तर :
भारत में सबसे पहले प्रेस की स्थापना पुर्त्तगालियों ने 1550 ई० में की थी।

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प्रश्न 55.
बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना कब और किस उद्देश्य से की गई थी ?
उत्तर :
1921 ई० में कोलकाता में Bengal Engeneering College की स्थापना की गई थी। बाद में इसका स्थानान्तरण 1947 ई० में हावड़ा के शिवपूर में की गई थी। बंगाल में तकनीकी शिक्षा की बढ़ावा देने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी।

प्रश्न 56.
बंगाल का पहला समाचार पत्र कौन-सा था ? उसका प्रकाशन कब और किसने किया ?
उत्तर :
बंगाल का पहला समाचार-पत्र बंगाल गजट था, जिसका प्रकाशन 1780 ई० में जे० के० हिक्की ने किया था।

प्रश्न 57.
उपेन्द्र किशोर रॉय चौधरी द्वारा छापी गई दो पुस्तकों का नाम बताइए।
उत्तर :
उपेन्द्र किशोर रॉय चौधरी द्वारा छापी गई दो पुस्तक हैं – छेलेदेर रामायण, छेलेदेर महाभारत तथा दून्दूनेर बोई प्रकाशित किया था।

प्रश्न 58.
U.N. Roy and Sons प्रेस की स्थापना कब और किसने की थी ?
उत्तर :
1913 ई० में U.N.Roy द्वारा U.N.Roy and Sons प्रेस की स्थापना की गई थी, जो एशिया का सबसे बड़ा प्रेस था।

प्रश्न 59.
‘आधुनिक अक्षर निर्माण कला (Block Making)’ का निर्माण किसने किया तथा इसके साथ ही उन्होंने क्या शुरू किये ?
उत्तर :
‘आधुनिक अक्षर निर्माण कला (Block Making)’ का निर्माण उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी ने किया तथा इसके साथ ही उन्होंने ‘रंगीन निर्माण कला’ (Colour Block Making) की भी शुरूआत किये।

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प्रश्न 60.
‘प्रकाशन घर’ के नाम से किसे जाना जाता था ? गणितीय विश्लेषण तथा वैज्ञानिक तरीकों से छाया-प्रति (Negative making) का निर्माण किसने किया ?
उत्तर :
‘प्रकाशन घर’ के नाम से ‘यू० एन० रॉय एण्ड सन्स (U.N. Roy and Sons) नामक प्रेस को जाना जाता था। गणितीय विश्लेषण तथा वैज्ञानिक तरीकों से छाया-प्रति (Negative making) का निर्माण उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी के पुत्र सुकुमार रॉय ने किया।

प्रश्न 61.
भारतीय समाचार पत्र अधिनियम (Vernacular Press Act) किसने और क्यों पारित किया था ?
उत्तर :
भारतीय समाचार पत्र अधिनियम (Vernacular Press Act) लार्ड लिटन ने पारित किया था ताकि भारतीय समाचारपत्रों पर प्रतिबंध लगाया जा सके।

प्रश्न 62.
भारतीय समाचारपत्र अधिनियम (Vernacular Press Act) को कब और किसने समाप्त किया?
उत्तर :
भारतीय समाचारपत्र अधिनियम (Vernacular Press Act) को सन् 1882 में लॉड रिपन ने समाप्त किया।

प्रश्न 63.
किन-किन लोगों ने बंगालियों द्वारा संचालित तथा संपादित पत्रों की संख्या में प्रगति लाया ?
उत्तर :
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्ण कुमार मित्र, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर तथा अरबिंद घोष आदि ने बंगालियों द्वारा संचालित तथा सपादित पत्रों की संख्या में प्रगति लाये।

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प्रश्न 64.
चन्द्रशेखर वेंकटरमन को कब नोबेल पुरस्कार मिला और क्यों ?
उत्तर :
चन्द्रशेखर वेंकटरमन को सन् 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला क्योंकि उन्होंने सन् 1928 में ‘प्रकाश के प्रकीर्णन’ के प्रभाव पर अपना बहुर्चित आविष्कार किया था। [नोट : भौतिक विज्ञान के कारण नोबेल पुरस्कार मिला]]

प्रश्न 65.
कब और किसने रमन प्रभाव को अंतर्राष्ट्रीय ऐतिहासिक रासायनिक युगांतकारी घटना की स्वीकृति प्रदान की ?
उत्तर :
सन् 1998 में ‘अमेरिकन केमिकल सोसाइटी’ (American Chemical Society) ने रमन प्रभाव को अंतर्राष्ट्रोय ऐतिहासिक रासायनिक युगांतकारी घटना की स्वीकृति प्रदान की।

प्रश्न 66.
कब और कहाँ चन्द्रशेखर वेकटरमन भौतिक के विविध विषयों पर शोध कार्य करते थे ?
उत्तर :
सन् 1907 से लेकर 1933 ई० तक ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेश ऑफ साईन्स’ में चन्द्रशेखर वंक्टरमन भौतिक के विविध विषयों पर शोध कार्य किया करते थे।

प्रश्न 67.
18 वीं शताब्दी के अंत में बंगाल से कौन-कौन पत्र प्रकाशित हुए ?
उत्तर :
कलकत्ता कैरियर, एशियाटिक मिरर तथा ओरिएंटल स्टार आदि।

प्रश्न 68.
हिन्दू कॉलेज के सदस्यों का नाम बताइए, जिन्होंने इसकी स्थापना किया ?
उत्तर :
डेविड हेयर, राजा राममोहन राय और न्यायाधीश एडवर्ड हाइड ईस्ट इत्यादि।

प्रश्न 69.
भारत में आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंघान के संस्थापक कौन थे ? उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी ?
उत्तर :
आचार्य जगदीश चन्द्र बोस तथा उनकी उपलब्धि बोस इंस्टीट्यूट की स्थापना की।

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प्रश्न 70.
राष्ट्रीय योजना आयोग से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक कौन थे ?
उत्तर :
वेज्ञानिक मेघनाद साहा तथा ज्ञानचन्द्र घोष।

प्रश्न 71.
बोस इंस्टीट्यूट की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
प्रमुख उद्देश्य बंगाल में विज्ञान की प्रगति को बढ़ावा देना था।

प्रश्न 72.
बोस संस्थान में किन-किन विषयों पर अनुसंधान होता था ?
उत्तर :
भौतिकी, रसायन प्लांट वायोलोजी, माइक्रो, बायोलॉजी, बायो कैमिस्ट्री, बायो फिजिक्स, एनिमल फिजियोलॉजी एवं पर्यावरण विज्ञान आदि।

प्रश्न 73.
अलीगढ़ साइण्टिफिक सोसाईटी की स्थापना किसने और कब की ?
उत्तर :
सर सैयद अहमद खान ने 1864 ई० में।

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प्रश्न 74.
नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन के प्रमुख सदस्य कौन-कौन थे ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर, अरविन्द घोष, राजा सुबोध चन्द्र मल्लिक, ब्रजेन्द्र किशोर राय चौधरी आदि।

प्रश्न 75.
बनारस संस्कृत कॉलेज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
हिन्दू कानून, धर्म और साहित्य का विकास करना।

प्रश्न 76.
हिन्दू कॉलेज की स्थापना किस उद्देश्य से हुई थी ?
उत्तर :
हिन्दू कॉलेज की स्थापना का उद्देश्य अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं तथा यूरोष और एशिया के साहित्य एवं विज्ञान की शिक्षा देना था।

प्रश्न 77.
जन शिक्षा समिति का गठन किसने और कब किया ?
उत्तर :
विल्सन ने 1823 ई० में गठन किया।

प्रश्न 78.
कलकत्ता विज्ञान कॉलेज से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिकों के नाम बताइए ।
उत्तर :
प्रमुख वैज्ञानिक पी० सी० रॉय, सी० वी० रमन तथा के० एस० कृष्णन आदि थे।

प्रश्न 79.
ग्रांट डफ कौन थे ?
उत्तर :
ग्रांट डफ एक उच्ब स्तरीय ब्रिटिश आधिकारी था। उसने भारत में ईसाई धर्म के प्रचार का समर्थन किया था।

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प्रश्न 80.
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किन-किन क्षेत्रों में योगदान किए ?
उत्तर :
इन्होन धर्म तथा सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए साथ ही न्यायसंगत राजनीतिक व्यवस्था के लिए बहुत काम किये।

प्रश्न 81.
रवीन्द्रनाथ रामायण तथा महाभारत को पाठ्यक्रम में क्यों शामिल करना चाहते थे ?
उत्तर :
इसलिए शामिल करना चाहते थे कि बच्चे इनके माध्यम से अपनी भाषा एवं संस्कृति सीखेंगे तथा चरित्र का गठन करेंगे।

प्रश्न 82.
चन्द्रशेखर वेंकटरमन क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
चन्द्रशेखर वेंकटरमन आई० ए० सी० एस० (I.A.C.S.) ने 1907 से 1933 ई० तक भौतिकी के विविध विषयों पर शांधकार्य करते रहे तथा 1928 ई० में उन्होंने प्रकाश के प्रकीर्णन के प्रभाव पर अपना बहुचर्चित आविष्कार किया जिसने उन्हे ख्याति के साथ अनेक पुरस्कार भी दिलवाए, जिनमें 1930 ई० में प्राप्त नोबेल पुरस्कार भी शामिल है। इन सभी कार्यों के वजह से ही वे प्रसिद्ध है।

प्रश्न 83.
राश्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल के मुख्य दो उद्देश्य को लिखें।
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र के विकास के लिये विज्ञान और तकनीकी शिक्षा प्रदान करना था।

प्रश्न 84.
किस उद्देश्य से बंगाल टेक्नीकल इन्स्टीट्यूट की स्थापना की गई ?
उत्तर :
बंगाल टेक्नीकल इन्सटीटयूट राष्ट्रीय शिक्षा परिषद द्वारा स्वदेशी उद्योग लगाने के लिये स्थापना की गई।

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प्रश्न 85.
शांति निकेतन में विद्यालय की स्थापना किसने और कब की ?
उत्तर :
शांतिनिकेतन में विद्यालय की स्थापना रवीन्द्रनाथ के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1863 ई० में की।

प्रश्न 86.
प्रफुल्ल चन्द्र राय क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
प्रफुल्ल चन्द्र राय ने बंगाल केमिकल एवं फर्मसेयुटिकल वर्क्स नामक संस्था की स्थापना की इसलिये वे प्रसिद्ध हुए।

प्रश्न 87.
रवीन्द्रनाथ ने खुले आकाश में प्रकृति के बीच शिक्षा संस्थान की स्थापना क्यों की ?
उत्तर :
वे मानते थे कि बढ़ते हुए बच्चे के सुसुप्त गुणों के उचित विकास के लिये प्रकृति के साथ तादाम्य आवश्यक है।

संक्षिप्त प्रश्नोत्तर (Brief Answer Type) : 4 MARKS

प्रश्न 1.
छपी पुस्तकों एवं शिक्षा के विस्तार में सम्बन्ध का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
छपी पुस्तकों और शिक्षा के विस्तार में सम्बन्ध :- भारत में छपी पुस्तक और शिक्षा प्रसार दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए है। सर्वपथम 1557 ई० में पुर्तगालियों ने गोवा में छापाखाना की स्थापना की। इसके बाद धीरे-धीरे देश के विभिन्न भागो में अनेको छापाखाना स्थापित हुए। जिनमें बंगाल के उपेन्द्र किशोर राय चौधरी, श्रीरामपुर त्रयी का विशेष योगदान रहा। छापाखाना स्थापित होने से पुस्तकों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, व्यंग चित्रों का छपाई करना सरल हो गया। छापा खानों से छपने वाली पुस्तको से लोग ब्रिटिश सरकार की आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक नीतियों के साथ-साथ पश्चिमी ज्ञान, विज्ञान तकनीकी से सम्बन्धित विषय आदि छपने लगे तथा लोगों तक सस्ती कीमत पर आसानी से पहुँचने लगी।

जिससे देश की जनता घर बैठे तथा पुस्तकालयों के द्वारा इन बातों की जानकारी प्राप्त करने लगी। फलस्वरूप उनमें जागरुकता आयी। अंग्रेजों के अच्छे-बूरे कर्मो से लोग परिचित हुए। उनमें अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित होकर लड़ने जैसी राष्टोय भावना का संचार हुआ। शुरु में छपी पुस्तकों का प्रभाव समाज के धनी सम्पन्न शिक्षित तथा प्रभावशाली वर्ग तक सोमित रहा। बाद में धीरे – धीरे उसका प्रचार-प्रसार होते हुए समाज के मध्यम तथा अन्य पिछड़े वर्ग तक पहुँचा।

इस प्रकार छपी पुस्तक और शिक्षा प्रसार दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गए तथा देश के सभी वर्गों तक शिक्षा को पहुँचाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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प्रश्न 2.
बंगाल में विज्ञान चर्चा के विकास में डा० महेन्द्रलाल सरकार का क्या योगदान था ?
या
विज्ञान के विकास में ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइस’ का महत्व स्पष्ट करें।
या
‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
या
‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ (IACS) पर संक्षिप्त प्रकाश डालें।
उत्तर :
बंगाल में 20 वी शताब्दी के प्रारम्भ में विज्ञान के क्षेत्र में अनेको विकास हुए, जैसे – ‘कलकत्ता विज्ञान कॉलेज’ और ‘बसु विज्ञान मंदिर’ की स्थापना आदि। इन सभी विकासों में ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर, द्र कल्टीवेशन ऑफ साइस(ACS)’ महत्वपूर्ण स्थान रखता था, जो भौतिक, रासायनिक, जैविक ऊर्जा तथा पदार्थ विज्ञान् की शिक्षा प्रदान किया जाता था।

इस संस्था के पहले विज्ञान के क्षेत्र में 19 वीं शताब्दी के अंत तक विभिन्न संस्था को स्थापित किया गया, जिनमें कलकत्ता विश्वववद्यालय (1857 ई०) और होमियोपैथी मेडिकल कॉलेज (1880 ई०) तथा कलकत्ता साईस कॉलेज (1914 ई०) आदि हैं।

इस शोध संस्था को 29 जुलाई, 1876 ई० को डॉ॰ महेन्द्रलाल सरकार ने स्थापित किया था। ऐसा माना जाता है कि यह शोध संस्था भारत का सबसे प्राचीनतम शोध संस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य भौतिकी, रासायन, जीव विज्ञान, ऊर्जा, बहुलक तथा पदार्थों के विषय में छात्र-छात्राओं को जानकारी देना तथा शिक्षित करना था ताकि छात्र-छात्राएँ विज्ञान के क्षेत्र में अग्रसर रूप से प्रौढ़ हो पायें। यह संस्था छात्र-छात्राओं को मानक (Doctorate) की उपाधि भी प्रदान करती है।

इसी शोध संस्था में ‘चन्द्रशेखर वेंकटरमन’ सन् 1907 से लेकर 1933 ई० तक भौतिक विज्ञान पर शोध कार्य करते रहे। इन्होंने ही सर्वप्रथम सन् 1928 ई० में ‘किरणों के परावर्तन का प्रभाव’ (Celebrated effect on scattering of light) अर्थात ‘भौतिक विज्ञान’ की खोज किया, जो बाद में चलकर ‘रमन इफेक्ट’ के नाम से जाना गया। इसी पर ‘सी० वी० रमन’ को सन् 1930 ई० में ‘नोबेल पुरस्कार’ दिया गया था जो विज्ञान के जगत में एक अहम स्थान रखती है। इतना ही नहीं ‘अंरिकन केमिकल सोसाइटी’ (American Chemical Society) ने सन् 1998 में ‘रमन प्रभाव’ (Raman Effect) को अरर्राष्ट्रोय ऐतिहासिक रासायनिक युगांतकारी घटना की स्वीकृति प्रदान की है।

‘IACS’ के प्रति डॉ॰ महेन्द्रलाल सरकार की योजना बहुत ही महत्वपूर्ण थी। उनका उद्देश्य मौलिक अन्वेषण करने के साध-साध विज्ञान को लोकप्रिय भी बनाना था। इसीलिए उसकी स्थापना उन्होंने किया था। धीरे-धीरे यह शोध संस्था विज्ञान, ध्वनि विज्ञान, प्रकाश के प्रकीर्णन, चुम्बकत्व आदि विषयों में शोध का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। इस प्रकार बगाल में विज्ञान की शिक्षा को बढ़ावा देने में डॉ० महेन्द्र लाल सरकार का महत्वपूर्ण योगदान था।

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प्रश्न 3.
बंगाल में तकनीकी शिक्षा के विकास का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
19 वी सदी की आरम्भ तक बंगाल में देशी और परम्परागत तरीकें से ही शिक्षा पद्धति का विकास हुआ, इसके विकास में 1784 ई० में सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित Asiatic Society का बड़ा योगदान रहा। विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए इसकी स्थापना की गयी थी। इसी संस्था के स्थापना के बाद 1828 ई० में कलकत्ता मेडिकल एवं फििजकल सोसाइटी, 1835 ई० में Calcutta Medical College, 1847 ई० में हावड़ा के निकट शिवपुर में बंगाल का पहला Shibpur Engineering College, 1876 ई० में महेन्द्र लाल सरकार द्वारा Indian Association for the Cultivation of Science को स्थापना की गई, इसी संस्था के अध्ययनकर्त्ताओं एवं शोधकत्ताओं विविन्न क्षेत्रों में नई-नई खांज की जिसमें C.V. Raman द्वारा किरणों के परावर्तन के प्रभाव की खोज (1928) ई० था। Raman Effects को खोज और इस पर 1930 ई० में नोबेल पुरस्कार मिला था।

इसके बाद 1904 ई० में आशुतोष मुखर्जी द्वारा Calcutta Science College की स्थापना की गई इस कॉलेज के कुछ प्रमुख छात्र सत्येन्द्रनाथ बोस, आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय, सी॰ वी० रमण, जगदीशचन्द्र बसु ने विज्ञान के क्षेत्र में नयी ऊँचाईया को छुआ और इस संस्थान को नई दिशा प्रदान की, 1906 ई० में प्रफुल्लचन्द्र राँय द्वारा देश की पहली मेडिसिन एवं रसायन बनाने वाले कपनी Bengal Chemical and Phramcetical Works की स्थापना की, 1917 ई० में कलकत्ता के महान वैज्ञानिक जगदोश चन्द्र बसु ने बसु विज्ञान मन्दिर की स्थापना की आगे चलकर इसका नाम Bose institute पड़ा। इस संस्थान ने भी विज्ञान के क्षेत्र में नई-नई खोजों की खोज कर महान उपलब्धि प्राप्त की, तथा देश और डुनिया मे भारत को गौरव दिलायी।

बगाल में तकनीकी शिक्षा के विकास में औद्योगिक अनुसंधान परिषद का महत्वपूर्ण योगदान रहा, इसके प्रयास से अलोगद्ध में Scientific Society, Bengal Technical Institute की स्थापना हुई, जिसकी स्थापना 1906 ई० में नारक्रनाथ पालित ने किया था।
इस प्रकार बंगाल में स्वदेशी आन्दोलन के ज्वार ने बंगाल में विज्ञान, तकनीकी एवं उच्च शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 4.
बंगाली छापाखाना के विकास में गंगा किशोर भद्टाचार्य का क्या योगदान था?
उत्तर :
बर्द्रवान जिले के वहड़ा ग्रामवासी गंगकिशोर भट्टाचार्य का बंगला मुद्रणालय (छापाखाना) उद्योग के विकास में विशिष्ट योगदान है। वे बंगाली पहला मुद्रण व्यवसायी, पुस्तक व्यवसायी प्रकाशक एवं ग्रन्थाकार थे। वे काम-काज की खोज में श्रीरामपुर मिशनरी के सम्पर्क में आये और अपनी सेवा शुरू की।

श्रीरामपुर मिशनरी छापाखाना में वे मुद्रण संपादन और प्रकाशन का कार्य करते थे। इसके बाद वे 19 वीं शताब्दी के दूसरे उसक में वे श्रोरामपुर मिशनरी छापाखाना कार्य छोड़कर कलकत्ता चले आये और यहाँ पर अपना छापाखाना स्थापित किया। इस प्रकार से वे यहाँ पर मुद्रण (छापाखाना) और पुस्तक विक्रय का कारोबार शुरू किया। इसके बाद वे कलकत्ता से छापाखाना के कारोबार को लेकर अपने गाँव बहड़ा चले गये।

गंगकिशार भट्टाचार्य ने अपने गाँव में ‘बग्ला गजट यन्तालय’ नाम से छापाखाना खोला। यही से उन्होंने साप्ताहिक प्रत्रिका ‘बग्ला गजट’ का प्रकाशन शुरू किया। इसी छापाखाना से वे भारत चन्द्र द्वारा सम्पार्दित सचित्र प्रथम बांग्ला भाषा पुस्तक ‘आन्नदामंगल’ को प्रकाशित किया। इसी प्रकार से उन्होंने ‘ए ग्रामर इन इंग्लिस एण्ड बंगाली’, ‘गणित नामता’, व्याकरण लिखने का आदर्श, ‘हितोपदेश’, ‘दायभाग’ एवं चिकित्सापर्व नामक अन्य पुस्तकों का प्रकाशन किया।
इस प्रकार छापाखाना के क्षेत्र में प्रथम बंग्ला व्यवसायी के रूप में इनका अमूल्य योगदान रहा।

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प्रश्न 5.
श्रीरामपुर मिशन प्रेस किस प्रकार एक अग्रणी मुद्रण प्रेस के रूप में परिणत हुआ ?
उत्तर :
1800 ई० से 1837 ई० के 38 वर्षों तक बंगला मुद्रण और प्रकाशन के क्षेत्र में श्रीरामपुर मिशन प्रेस का महत्वपूर्ण योगदान रहा तथा यह निम्नलिखित कार्यों के द्वारा देश का अग्रणीय छापाखाना बन सका –
(i) 1800 ई० में विलियम केरी ने श्रीरामपुर मिशन प्रेस तथा श्रीरामपुर वायोपिस्ट मिशन प्रेस की स्थापना की। इन दोनों छापाखानों में दो वर्ष पहले से लकड़ी के छपाई यन्त्र से विभिन्न देशी भाषा और बंगला भाषा में पुस्तक एवं पत्रिकायें छपती रही। 1812 ई० से इन छापाखानों में लोहे के यन्त्रों द्वारा छपाई होने लगी।
(ii) विलियम केरी ने जशुआ मार्शमैन, विलियम वार्ड और चार्ल्स ग्राण्ट को साथ लेकर पुस्तक छापने के कार्यक्रम का बीड़ा उठाया। पुस्तक छपाई के क्षेत्र में श्रीरामपुर त्रयी की विशिष्ट भूमिका रही।
(iii) श्रीरामपुर मिशन छापाखाना से पहली पुस्तक वाइविल का अनुवाद छपा था। इस प्रेस से पहले-पहल धार्मिक पुस्तकों का अनुवाद ही छपते रहे। इसके बाद छात्रों की पाठ्यपुस्तके, पत्र-पत्रिकाए जैसे दिगदर्शन, समाचार दर्शन, बंगाल गजट, संवाद कौमुदी तथा अनुवादित पुस्तके सिहांसन बत्तीसी, हितोपदेश, राजाबली, प्रबोध चन्द्रिका, लिपिमाला आदि अन्य महत्वपूर्ण पुस्तके प्रकाशित होने लगी।
(iv) इसी प्रेस से फोर्टविलियम कॉलेज के साथ-साथ अन्य स्कूल एवं कालेजों की पाठ्य-पुस्तके छपने लगी। इस प्रकार मिशन प्रेस सहयोगी के हिसाब से व्यापारिक रूप से पुस्तके छापने लगा।
(v) श्रीरामपुर मिशन प्रेस एक काठ की छपाई मशीन से छापाखाना का व्यवसाय शुरू किया जो 1832 तक आते-आते 18 लौहे के छापाखाना स्थापित कर लिए। जिसमें 40 भाषाओं में 2 लाख से अधिक पुस्तके छपने व प्रकाशित होने लगी। इस प्रकार से श्रीरामपुर मिशन प्रेस देश में सबसे बड़ा छापाखाना बन सका।

प्रश्न 6.
बंगाल में कारीगरी शिक्षा के विकास में बंगाल टेक्निकल (तकनीकी) इंस्टीट्यूट की क्या भूमिका थी?
उत्तर :
बंगाल में कारीगरी शिक्षा के विकास में बंगाल तकनीकी संस्थान की भूमिका :- बंगाल में तकनीकी शिक्षा का ज क तारकनाथ पालित को माना जाता है। सर्वप्रथम 25 जुलाई, 1906 ई० को कलकत्ता में उन्होंने तकनीकी स्कूल की स्थांगा की। बाद में इसे राष्ट्रीय शिक्षा परिषद के अधीन कर दिया गया।

इसकी स्थापना का उद्देश्य बंगाल के युवा वर्ग में तकनीकी और कारीगरी शिक्षा के विकास को बढ़ावा देना था। इस कॉलेज में वर्कशाप के साथ-साथ शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के निवास करने की सुख-सुविधा की व्यवस्था की गयी थी। धीरे – धीरे इसमें शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की संख्या बहुत अधिक हो गयी तथा इसका नाम बंगाल सहित पूरे देश में चर्चित हो गया। तब इसका नाम बदल कर यादवपुर तकनीकी कॉलेज रख दिया गया।

जिसे 1955 ई० में स्वायतशासी संस्था की मान्यता प्रदान कर दी गयी। इसके बाद यहाँ बड़ी संख्या में बंगाल के तथा भारत के अन्य भागों से छात्र आकर सफलतापूर्वक तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने लगे और यहाँ से शिक्षा प्राप्त छात्र राज्य और देश के विभिन्न भागों में तकनीकी शिक्षा प्रदान करने लगे। इस प्रकार बंगाल तकनीकी संस्थान ने बंगाल में कारीगरी शिक्षा के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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प्रश्न 7.
बंगाल में प्रिंटिंग प्रेस के विकास में उपेन्द्र किशोर राय चौधरी की भूमिका का वर्णन करो।
उत्तर :
20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में बंगला साहित्य एवं प्रेस में अदभुत परिवर्तन आया जिसके कारण बंगला साहित्य (Bengali Literature) और मुद्रण (Press) दौर बढ़े। ऐसा लगा मानो उनमें जान आ गयी। इसके पहले 19 वीं शताब्दी के मध्य तक इन दोनों क्षेत्रों में कोई पहल नहीं था, जिसके कारण बंगला साहित्य एवं मुद्रण (Press) पिछड़ता चला गया था। लेकिन 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एक ऐसे व्यक्ति का अभ्युदय हुआ जिनके प्रयास से बंगला साहित्य एवं मुद्रण (Press) का पर्याप्त विकास हुआ। उस महान व्यक्ति का नाम ‘उपेन्द्रकिशोर राय चौधरी’ था।

उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी का जन्म सन् 1863 में बांग्लादेश के मैमन सिंह जिला के मोउसा या मसूया गाँव में हुआ था जो उस समय बंगाल के अन्तर्गत था, अब यह बंगाल से अलग हो गया है अर्थात् यह गाँव अब बंगलादेश का हिस्सा बन चुका है। उनके पिता का नाम कालीनाथ राय था। उनके पिता द्वारा दिया गया नाम कामदारंजन राय था। पाँच वर्ष की उम्र में एक अणुत्रक जमींदार ने उन्हें गोद ले लिया था और उनका नया नाम ‘उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी’ रखा था। वे द्वारिकानाथ गाँगुली के दामाद, लोकम्रिय हास्य लेखक सुकुमार राय के पिता तथा अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सत्यजीत राय के दादा थे। उनकी मृत्यु सन्श 915 में हो गयी।

उपेन्द्रकिशोर रॉय चौधरी एक प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार थे। इसके साथ ही वे एक प्रसिद्ध चित्रकार, सितारवादक, गीतकार, तकनीशियन तथा उत्साही व्यवसायी भी थे। उन्होंने भारत में पहली बार बच्चोंके लिए ‘संदेश’ नामक पत्रिका का शुभारंभ किया, जो एक बंगाली मिठाई के नाम पर रखी गयी थी। इन्होंने दक्षिण एशियां में प्रेस के क्षेत्र में ‘आधुनिक अक्षर निर्माण कला’ (Block making) का निर्माण किया तथा इसके साथ ही ‘रंगीन ब्लाक मेंकिग’ (Colour block making) का भी शुरूआत किये। इतना ही नहीं, उन्होंने कलकत्ता में भी यह परम्परा शुरू की।

उन्होंन स्वयं एक प्रकाशन संस्था का निर्माण किया तथा अपने प्रकाशन घर का नाम ‘यू० एन० राय एण्ड सन्स’ (U. N. Roy and Sons) रखा जहाँ से अनेकों रचनाएँ प्रकाशित हुई जिनमें ‘छेलेदेर या छोटोदेर रामायण’, ‘छोटोदेर महाभारत’, ‘गोपी गाइन बाघा बाइन’ तथा ‘टुनटुनीर बोई’ इत्यादि प्रमुख रचनाएँ हैं। इतना ही नहीं, इन्होंने वैज्ञानिक तरीकों से ‘छाया-प्रति’ (Negative making) का भौ निर्माण किया था। इस कार्य की प्रशंसा न केवल भारत में हुआ था बल्कि बिटन की प्रत्रिका ‘पनरोज एनुवल वॉल्यूम – XI’ (Penrose Annual Volume – XI) में भी काफी कुछ छपा था।

इनके द्वारा स्थापित मुद्रणालय दक्षिण एशिया का पहला मुद्रणालय या प्रेस था, जहाँ से काले एवं संफेद (Block and White) तथा रंगीन (Colourful) फोटोग्राफ्स मुद्रित होते थे।

प्रश्न 8.
विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना तथा उसके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गये योगदान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना : विश्वभारती की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बीरभूम जिले के बोलपृर संशंश से 2 की॰ मी॰ दूर शांतिनिकेतन नामक स्थान पर स्थापित किया था। प्रारम्भ में यह एक विद्यालय था, जिसे रोंन्द्रनाथ ने पाँच छात्रों को लेकर शुरू किया था। शुरू में यह विद्यालय अध्यात्मिक ध्यान और मनोयोग का केन्द्र था। 1908 ई० में इसमें अन्य विषयों की शिक्षा दी जाने लगी। 23 दिसम्बर 1931 ई० को भारत सरकार ने इसे महाविद्यालय को मान्यता दी। जब यह महाविद्यालय पूरे देश में शिक्षा और ज्ञान का केन्द्र बन गया, तब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1951 ई० में इसे पूर्ण विश्वविद्यालय की मान्यता प्रदान की गई और रवीन्द्रनाथ ठाकूर इसके पहले कुलपति थे। आज यह पूरे देश में विश्व-भारती केन्द्रीय विश्वविद्यालय के नाम से विख्यात हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान : रवीन्द्रनाथ ने बोलपूर के निकट शांतिनिकेतन में 1901 ई० में जिन पाँच छात्रों को लेकर शातिनिकेतन विद्यालय के रूप में शुरुआत की वो 1951 ई० तक आते-आते शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय का रूप ग्रहण कर लिया, जहाँ देश और विदेश के विद्यार्थी अपने धर्म, संस्कृति, भाषा, कला, संगीत, विज्ञान, स्थापत्य कला विभिन्न सामाजिक विज्ञान आदि विषयों का अध्ययन करते हैं। शांतिनिकेतन में विद्यार्थियों को शिक्षा बन्द कमरे में नहीं, बल्कि प्रकृति के गोद में वृक्षों के छाया तले, योग्य गुरूओं द्वारा दी जाती हैं। यहाँ का शांत, आदर्श, खुला वातावरण भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था ‘गुरूकूल’ के शिक्षा व्यवस्था की याद दिलाती है। आज यह विश्वविद्यालय देश और विदेश में शिक्षा, सास्कृतिक और बौद्धिक ज्ञान के आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

प्रश्न 9.
रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा प्रतिपादित शिक्षा के उद्देश्य को संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर की दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य : रवीन्द्रनाथ जी एक महान प्रकृति प्रेमी, संगीत प्रेमी, विद्यानुरागी, शिक्षा-शास्त्री थे, वे बच्चों को चारदिवारी के बन्द कमरे में शिक्षा ने देकर खुले, स्वस्थ और शांत वातावरण में शिक्षा देने के पक्षधर थे, उनकी दृष्टि में शिक्षा के निम्न उद्देश्य थे –

  1. सत्य के विभिन्न रूपों की प्राप्ति के लिए विभिन्न दृष्टिकोण से मानव मस्तिष्क का अध्ययन किया जाना।
  2. प्राचौन और नवीन विधि से पढ़ने-पढ़ने के तौर-तरिकों में सम्बन्ध बनाये रखना चाहिए।
  3. पूर्वी तौर-तरिकें और पध्विमी तौर-तरिकें को एक दूसरे से जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिए, तथा एक-दूसरे के संभावित अच्छे विचारों का आदान-प्रदान किया जाना चाहिए।
  4. बच्चों को पुस्तकीय ज्ञान के अतिरिक्त अध्यात्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक विषयों का भी ज्ञान देना चाहिए।
  5. इन्हीं उंदेश्यां को ध्यान में रखते हुये छात्रों के सर्वोमुखी उन्नति के लिए उन्होंने सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में शांतिनिकेतन में विश्वभारती स्थापना की थी।

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प्रश्न 10.
बंगाल की राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा नीति : 1905 ई० में बंगाल विभाजन के फलस्वरूप बंगाल व देश में उभरे स्वदेशी आन्दोलन के ज्वार ने भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (बंगाल) को जन्म दिया, इस समय बंगाल के तथा देश के कई बुद्धजीवीयों ने मिलकर 1906 ई० में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद कि स्थापना की, जिसका उद्देश्य देश का निर्माण और विकास करना था, इस परिषद कं अधक प्रयास से देश के विभिन्न भागों में देशी-भाषा और मातृ-भाषा में अनेकों विद्यालय, स्कूल, तकनीकी कॉलेज, इंजीनियरिंग एवं मेडिकल कॉलेज स्थापित किये गये। इस परिषद की स्थापना में महेन्द्रलाल सरकार, तारकनाथ पालित, अरविन्द घाष, रासबिहारी बोस, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, आशुतोष चौधरी का विशेष योगदान रहा, इसके प्रयास से हि देश में विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा का विकास हुआ और भारत आधुनिक शिक्षा के रास्ते पर चल पड़ा।

प्रश्न 11.
विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना तथा उसके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गये योगदान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
विश्वभारती की स्थापना में टैगोर की शिक्षा संबंधी धारणा का वर्णन करो।
उत्तर :
विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना :- विश्वभारती की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1863 ई० में बीरभूम जिले के बोलपुर स्टेशन से 2 कि०मी० दूर शांति निकेतन नामक स्थान पर स्थापित किया था। प्रारम्भ में यह एक विद्यालय था, जिसे रवीन्द्रनाथ ने पाँच छात्रों को लेकर शुरु किया था। शुरु मे ही यह विद्यालय अध्यात्मिक ध्यान और मनायोग का केन्द्र था। 1908 ई० में इसमें अन्य विषयों की शिक्षा दी जाने लगी। 23 दिसम्बर 1931 ई० को भारत सरकार ने इसे महाविद्यालय की मान्यता दी, तब यह महाविद्यालय के रूप पूरे देश में शिक्षा और ज्ञान का केन्द्र बन गया, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1951 ई० में इसे पूर्ण विशविद्यालय की मान्यता प्रदान की गई और रवीन्द्रनाथ ठाकूर इसके पहले कुलपति बने। आज यह पूरे भारत में विश-भारती केन्द्रीय विश्शविद्यालय के नाम से विख्यात है।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान :- रवीन्द्रनाथ ने बोलपुर के निकट शांतिनिकेतन में 1901 ई० में पाँच छात्रों को लेकर शातिनिकेतन में विद्यालय के रूप में शुरुआत की, और 1951 ई० तक आते-आते शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय का रूप ग्रहण कर लिया। जहाँ देश और विदेश के विद्यार्थी अपने धर्म, सस्कृति, विज्ञान, स्थापना कला विभिन्न समाजिक विज्ञान आदि विषयों का अध्ययन करते हैं, यहाँ का शांत, आदर्श, खुला वातावरण भारत के प्राचीन शिक्षा व्यवस्था ‘गुरुकुल’ के शिक्षा व्यवस्था की याद दिलाती है। आज यह विश्चविद्यालय देश और विदेश में शिक्षा संस्कृति और बौद्धिक ज्ञान के आकर्षण का केन्द्र बन गया है।

प्रश्न 12.
बंगाल की राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा नीति :- 1905 ई० में बंगाल विभाजन के फलस्वरूप बंगाल व देश में उभरे स्वदेशी आन्दोलन के ज्वार ने भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (बंगाल) को जन्म दिया, इस समय बंगाल के तथा देश के कई बुद्ध-जीवियों ने मिलकर 1906 ई० में ‘राष्ट्रीय’ शिक्षा परिषद की स्थापना की जिसका उद्देश्य देश का निर्माण और विकास करना था। इस परिषद के अथक प्रयास से देश के विभिन्न भागों में देशी-भाषा और मातृभाषा में अनेकों स्कूल, तकनीकी कालेज, इंजीनीयरिंग एवं मेडिकल कालेज स्थापित किये गये। इस परिषद की स्थापना में महेन्द्रलाल, तारकनाथ पालित, अरविन्द घोष, रासविहारी बोस, सुरेन्द्रनाथ बेनर्जी, आशुतोष चौधरी का विशेष योगदान रहा। इनके प्रयास से ही देश में विज्ञान तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा का विकास हुआ और भारत आधुनिक शिक्षा के रास्ते पर चल पड़ा।

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प्रश्न 13.
आधुनिक चिकित्सा के विकास में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की भूमिका/योगदान का सक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में आधुनिक चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए लार्ड विलियम बेंटिक के प्रयास व आदेश से 28 जनवरी 1835 ई० को कलकत्ता में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। इसकी स्थापना से भारत में उच्च च्चिकित्सा के शिक्षा क्षेत्र में एक नये युग की शुरुआत हुई। इस कॉलेज में देश के नवयुवको को आधुनिक चिकित्सा की सुविधा प्रदान की गयी। इस मेडिकल काँलेज में दवाओं की शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थी को मानव-शरीर की चिर-फाड़ की शिक्षा दी जाने लगी।

प० मधुसूदन गुप्ता भारत और एशिया के पहले शल्य डाक्टर बने, उनके इस सफल कार्य के लिए अंग्रेज सरकार ने उन्हें 50 तोपों कों सलामी दी। इस कॉलेज से शिक्षा प्राप्त कर विद्यार्थी देश के विभिन्न भागों में जाकर आधुनिक चिकित्सा का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रकार कलकत्ता मेडिकल कॉलेज ने देश के विभित्र-प्रान्तों में पश्चिमी आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 14.
औपनिवेशिक शिक्षा से तुम क्या समझते हो ? शिक्षा-शास्त्रियों ने इस शिक्षा नीति की समालोचना क्यों किया है ?
उत्तर :
औपनिवेशिक शिक्षा : भारत में शिक्षा को लेकर अनेक उतार-चढ़ाव हुआ जिसमें भारत देश का भविष्य निहित था। उतार-चढ़ाव कहने का मतलब अंग्रेजो के समय में भारतीय शिक्षा में अनेकों बदलाव किया गया। यह सभी बदलाव देखा जाय तो अंग्रेज अपने पक्ष में ही करते थे। अपनी सभ्यता तथा संस्कृति को भारतीय शिक्षा के माध्यम से भारतवासियों के ऊपर थोपना चाहते थे। अर्थात् अंग्रेजी प्रशासन भारतवासियों के शोषण करने हेतु हर हथकण्डे अपनाया करते थे। परन्तु इस प्रशासन में ही कुछ ऐसे गवर्नर-जनरल भी थे, जो न केवल अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देते थे बल्कि संस्कृति शिक्षा को भी बढ़ावा देते थे।

अंग्रेजों या अंग्रेजी प्रशासन द्वारा भारत में प्राच्य शिक्षा के अलावा पाश्चात्य शिक्षा को अधिक महत्त्व देते थे। वे प्राच्य एवं पाश्चात्य भाषाओं में समन्वय सथापित न करके उनमें मतभेद पैदा किया करते थे ताकि प्राच्य भाषा का अन्त हो जाये। लेकिन कुछ गवर्नर जनरल पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ प्राच्य शिक्षा को भी लेकर चलना चाहते थे। एसे गवर्नर-जनरलों ने बहुत सारे विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना किये।

समालोचना : भारतीय शिक्षा शास्त्रियों ने औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की समालोचना प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था के आधार पर किये। इसके निम्न कारण हैं –
i. लार्ड मैकाले की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी यह थी इसके द्वारा छात्रों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता से दूर रखने का प्रयास किया गया था। इस शिक्षा व्यवस्था को धर्म से भी दूर रखा गया था। रवीन्द्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थी के मस्तिष्क में धार्मिकता का विकास हो तथा नैतिकता और चरित्र का विकास भारतीय आदर्शों के अनुकूल हो।

ii. मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा को अनदेखा किया गया था जबकि अधिकतर शिक्षाविद् यह मानते थे कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए। महान चिन्तक रवीन्द्रनाथ ने अपने विद्यालय में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को ही माना।

iii. मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य मात्र रोटी और भौतिकता तक सीमित था। भारत में शिक्षा व्यवस्था के संचालक साधु-संत तथा ऋषि-मुनि थे जो नैतिक गुणों और आध्यात्मिकता पर जोर देते हैं।

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प्रश्न 15.
बंगाल में ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद’ (National Education Council) के अवदान का अभिमूल्यन करो।
उत्तर :
राष्ट्रीय शिक्षा परिषद : तकनीकी शिक्षा के विकास में ‘नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन’ था ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद’ का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य छात्र-छात्राओ को तकनीकी शिक्षा प्रदान कराना था। इतना ही नहीं, छोटे-छोटे बच्चों को तकीनीकी शिक्षा किस प्रकार प्राप्त हो इसका भी ध्यान रखा जाता था। इस कार्य में अनेकों तकनीकी शिक्षा के प्रेरणा स्रोत थे जिनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर, अरबिन्द घोष, राजा सुबोध चन्द्र मल्लिक, ब्रजेन्द्र किशोर रॉय चौधरी इत्यादि उल्लेखनीय है।

ऐसे तो माना जाता है कि राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल (The National Council of Education’ Bengal) का जन्म बंग-भंग के दौरान किया गया स्वदेशी आन्दोलन (1905 ई०) द्वारा हुआ था अर्थात् राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् बंगाल की स्थापना सन् 1906 में प्रमुख शिक्षाविदों के सम्मिलित प्रयासों से हुआ था। इस परिषद् के तहत राज्य के समस्त विज्ञान एवं तकनीकी स्कूल एवं कॉलेज खोले गये। इसी परिषद् ने ‘बंगाल तकनीकी कॉलेज (B.I.T.) की स्थापना किया। बाद में चलकर राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल सन् 1955 में ‘यादवपुर विश्वविद्यालय’ में मिला दिया गया। इस परिषद की स्थापना में प्रमुख भूमिका ‘रासबिहारी घोष’, ‘आशुतोष चौधरी’, ‘हिरेन्द्रनाथ दत्त’ तथा ‘सुरेन्द्रनाथ बनरी’ ने पालन किया था।

इस तरह बंगाल में विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के विकास में ‘कलकत्ता विज्ञान कॉलेज’ तथा ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद्, बंगाल’ की अहम या महत्वपूर्ण भूमिका रही।

प्रश्न 16.
मानव, प्रकृति एवं शिक्षा के समन्वय में रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, चिन्तक तथा समाज सुधारकों में गिने जाते थे। इसी आधार पर रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि के साथ-साथ एक महान शिक्षक भी थे। टैगोर जी ने एक शिक्षक के रूप में छात्रों एवं छात्राओं के लिए हर सम्भव कार्य किये जिनकी जरूरत उनको थी। एक शिक्षक के रूप में टैगोर जी का प्रारम्भिक कार्य छात्र-छात्राओं को सही आचरण, व्यवहार और अच्छी ज्ञान प्राप्त कराना था।

रवीन्द्रनाथ टैगोर खुद एक शिक्षक थे। इसीलिए उन्होंने ‘पकृति’ को महान शिक्षक की दर्जा दिया है, जो हमेशा जीवित रहता है अर्थात् महान शिक्षक होने के साथ-साथ, एक जीवित शिक्षक भी। ‘प्रकृति’ के साथ रहकर अबोध बच्चे जीवन के हर एक रहस्य को सीख पाते हैं। ‘प्रकृति’ एक अबोध मनुष्य को बोधगम्य बनाती है। टैगोर जी का मानना है कि समाज में पठन-पाठन का केन्द्र या विद्यालय खुले प्राकृतिक वातावरण में हों ताकि बच्चे खुले प्राकृतिक वातावरण में पढ़कर विकसित हो पायेंगे। इतना ही नहीं, बच्चे प्रकृति की गोद में रहकर ममता रूपी प्यार पाकर बहुत कुछ सीख पाते हैं। इस संदर्भ में रवीन्द्रनाथ टैगोर का कथन है –

” सांसारिक बन्धनों में पड़ने से पहले बालकों को अपने निर्माण काल में प्रकृति का प्रशिक्षण प्राप्त करने दिया जाना चाहिए।” रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार प्रकृति या वातावरण में एक विद्यालय के सभी सामान हैं । जैसे – किताबें, पाठ्यक्रम, डेस्क, श्यामपट, शिक्षक या शिक्षिका तथा विद्यालय का माहौल आदि। अर्थात् प्रकृति या वातावरण खुद एक शिक्षक है, उनकी विभिन्न दृश्य किताबें एवं पाठ्यक्रमें हैं, जहाँ बच्चे प्रकृति या वातावरण में विद्यालय के भाँति पढ़ते एवं सीखते हैं। इसीलिए टैगोर जी के अनुसार प्रकृति या वातावरण एक महान जीवित शिक्षक है।
उपर्युक्त उल्लेखों से हम पाते हैं कि प्रकृति या वातावरण सही रूप में एक महान् जीवित शिक्षक है, जिसका वर्णन टैगोर जी ने किया है।

प्रश्न 17.
विज्ञान के विकास में ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ की भूमिका क्या थी ?
या
विज्ञान के विकास में ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ का क्या महत्व है ?
या
‘बसु विज्ञान मन्दिर’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
विज्ञान के विकास के लिए अनेकों संस्थाएँ बनाई गई, जो विज्ञान के क्षेत्र में अद्भुत आविष्कार माना जाता है। इन्हीं आविष्कारों के माध्यम से आज विज्ञान इस कदर चल पड़ा है कि मानो लंगड़ा घोड़ा दौड़ पड़ा हो। 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में विज्ञान में अनेकों परिवर्तन आये, जो विज्ञान के विकास को आगे बढ़ाया। इतना ही नहीं, 20 वी शताब्दी में इतना विकास हुआ कि इस दौर को आधुनिक विज्ञान का दौर माना गया। इस दौर को लाने वाले एकमात्र ‘जगदीश चन्द्र बोस’ थे, जिन्होंने अपने अथक प्रयासों से विज्ञान के क्षेत्रों में अद्भुत विकास लाये। इसीलिए तो इन्हें आधुनिक विज्ञान का दाता माना जाता है। इन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में अनेकों आविष्कार किये जिसके बलबुते पर विज्ञान में विकास आ पाया और विज्ञान का स्वरूप आधुनिक हो पाया।

जगदीश चन्द्र बसु के प्रयास से बंगाल में सन् 1917 में ‘बसु विज्ञान मन्दिर’ की स्थापना किया गया। इस संस्था में भौतिकी (Physics), रसायन (Chemistry), वसस्पति-जीव विज्ञान (Plant Biology), अणुजीव विज्ञान (Microbiology), जीवन रसायन (Bio-chemistry), जीव शरीर विज्ञान (Animal Physiology), जीव सूचना विज्ञान (Bio-informatics) एवं पर्यावरण विज्ञान (Environment Science) इत्यादि विषयों पर शोध होता है। बाद में चलकर ‘बसु विज्ञान मन्दि’

का नाम ‘बोस संस्था’ (Bose Institute) रखा गया जहाँ विज्ञान संबंधित हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है। इस संस्थान के द्वारा ‘कलरा’ के विष प्रभाव पर किये गये कार्य काफी महत्वपूर्ण है। इस कार्य में ‘प्रोफेसर एस० एन० दे०’ का अमृल्य योगदान है। इतना ही नहीं, आचार्य जगदीश चन्द्र बसु भारत में ‘आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान’ के संस्थापक माने जाते हैं।

‘बोस संस्थान’ वर्तमान में एक संग्रहालय भी है, जिसका प्रारम्भ खुद आचार्य जगदीश चन्द्र बसु ने अपने समय से ही कर दिया था। वे अपने उपकरणों का प्रदर्शन भी किया करते थे। इस तकनीकी संग्रहालय का मुख्य उद्देश्य आचार्य जगदीश चन्द्र बसु द्वारा उपयोग में लाये गए वस्तुओं उपकरणों एवं स्मृति चिन्हों की प्रदर्शनी है।

उपर्युक्त विवरणों से हमलोग जान पाते हैं कि आचार्य जगदीश चन्द्र बसु द्वारा स्थापित ‘बोस संस्थान’ विज्ञान के विकास के क्षेत्र में एक अद्भुत प्रयास है। जो आधुनिक विज्ञान का प्रतीक माना जाता है, जिसने विज्ञान के क्षेत्र में हलचल मचा दिया।

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प्रश्न 18.
19 वीं शताब्दी में बंगाल में प्रेसों का आविर्भाव किस प्रकार हुआ ?
या
बंगाल में पाठ्यपुस्तकों की छपाई के विकास की परिचर्चा कीजिए।
उत्तर :
19 वीं शताब्दी में बंगाल में प्रेसों के आविर्भाव का स्वरूप मिलाजुला पाया जाता हैं। अर्थात् 19 वीं शताब्दी में प्रेसों के माध्यम से अनेकों पत्र, पत्रिका एवं समाचार पत्र छापे गये जो न केवल बंगला भाषा में थे बल्कि हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में भी थे। ये सभी पत्र, पत्रिका एवं समाचार-पत्र 19 वी शताब्दी के बंगाल में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। 19 वीं शताब्दी में बंगाल में प्रेसों के माध्यम से विभिन्न विषयों, राजनीति से लेकर मनोरंजन के उपलब्ध जानकारी जान पात थे।

19 वीं शताब्दी में अनेक पत्र, पत्रिका और समाचार पत्रों का प्रकाश हुआ था, जिनमें सन् 1780 ई० में ‘जे० के० हिक्की’ का ‘बंगाल गजट’ नामक समाचार पत्र था। यह एक सप्ताहिक पत्र था। परन्तु इसकी प्रतियाँ उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण इसकी जानकारी अपर्याप्त है। सन् 1780 ई० में ही भारत का दूसरा समाचार पत्र प्रकाशित हुआ जिसका नाम ‘इण्डिया गजट’ था। सन् 1818 ई० में ‘मार्शमैन’ के नेतृत्व में बंगाल में ‘दिग्दर्शन’ नामक मासिक पत्रिका बंगला भाषा में निकला।

1818 ई० में बंगाली भाषा में ‘संवाद कौमु’ का प्रकाशन ‘राजा राममोहन राय’ ने किया था। इतना ही नहीं, सन् 1822 ई० में राजा राममोहन राय ने ‘मिरातउल अखबार’ का भी प्रकाशन किया। इन दोनों अखबारों के माध्यम से राजा राममोहन राय सामाजिक एवं धार्मिक सुधार समाज में लाना चाहते थे। राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी भाषा में ‘ब्राह्मिनिकल मैगजीन’ निकाले। इसके बाद द्वारिका नाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर तथा राजा राममोहन राय के प्रयास सन् 1830 ई० में बंगला भाषा में ‘बंगदत्त’ पत्र निकाला गया।

ऐसा माना जाता है कि 19 वीं शताब्दी के मध्य से ही भारत और बंगाल क्षेत्र के अन्तर्गत आधुनिक मुद्रण या प्रेस का आविर्भाव हो चुका था। लेकिन उसका पहल 20 वीं शताब्दी के शुरू आत में उपेन्द्रकिशोर रॉय बौधरी ने किया, जो भारत एवं बंगाल में आधुनिक प्रेस के दाता या जनक माने जाते हैं।

कहा जाता है कि डुबती हुई नैय्या को खेवैय्या पार लगाता है, ठीक उसी प्रकार बंगाल में प्रेसों के विकास की शुरुआत 19 वीं शताब्दी में हुई और इसके सूत्रकार आधुनिक पुरुष राजा राममोहन राय माने जाते थे। जिन्होंने अपने पत्रों के माध्यम से समाज एवं धार्मिक सुधार का बेड़ा उठाये।

प्रश्न 19.
रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा प्रतिपादित शिक्षा का उद्देश्य निर्धारित कीजिए।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, समाज सुधारक एवं राजनैतिक चिन्तक माने जाते थे, इतना ही नहीं, वे एक महान शिक्षावादी भी थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होने अपने जीवन में अनेको महत्वपूर्ण कार्य किये। जैसे शांतिनिकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना। रवीन्द्रनाथ टैगोर शिक्षा के प्रति अत्यन्त ही सजग रहते थे। वे शिक्षा को सर्वोपरि देखना चाहते थे, तभी तो उनका मानना था कि शिक्षा मनुष्य के शरीर के कण-कण में निवास करती है। अर्थात् शिक्षा वह हो जो मनुष्य को सर्वोच्च स्थान दिलाने में मदद करे। इतना ही नहीं,समनुष्य को शिक्षा के माध्यम से जो ज्ञान प्राप्त होता है, उसे मनुष्य का शारीरिक, सामाजिक, मानसिक तथा अन्य विकास होता है जो मनुष्य को प्रगति के रास्ते पर ले जाता है। तभी तो रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा के संबंध में अपना विचार निम्नरूप में व्यक्त करते हैं :-
“सर्वोच्च शिक्षा वही है जो सम्पूर्ण दृष्टि से हमारे जीवन का सामंजस्य स्थापित करती है।”

टैगोर जी ने माना है कि शिक्षा मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, चारित्रिक, विश्व-बंधुत्व और राष्ट्रीयता का विकास करता है। इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को शिक्षा के प्रति समर्पित होना चाहिए। रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने मनुष्य को बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार से हमें शिक्षा आर्जित करना है, जिससे हमें या हमारे भीतर सभी प्रकार का बौद्धक विकास हो पाये, शिक्षा या ज्ञान की प्राप्ति हो सकें। शिक्षा के संबंध में उनका निम्नलिखित सिद्धान्त रहा है कि मनुष्य को शिक्षा प्रहण करके प्रकृति का अनुसरण क्रिया के माध्यम से जीवन क्रियाओं द्वारा, खेल द्वारा, बार-बार अध्ययन द्वारा, मनन द्वारा तथा ध्यान केन्द्रित करके करना चाहिए।

इन सभी सिद्धान्तों के माध्यम से हमें पूर्णरूप से ज्ञान की प्राप्ति होता है जिससे हमारे विभिन्न क्षेत्रों में भी विकास होता है। अर्थात् इन सभी कार्यो के माध्यम से एक अबोध बालक या बालिका को बोध हो पाता है। टैगोर का मानना है कि एक अबोध बालक या बालिका जन्म से ही कुछ न कुछ सीख पाते है। उन्हें इन सभी मार्गों से होकर गुजरना पड़ता है, तभी वे एक बोध या शिक्षित बालक या बालिका हो पाते हैं।

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प्रश्न 20.
‘मानवों’ के संबंध में रवीन्द्रनाथ टैगोर का क्या विचार था ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, सुधारक, सामाजिक, शिक्षाविद के साथ-साथ एक महान चिन्तक भी थे। उनका जन्म कलकत्ता महानगर के जोड़ासाँकू अंचल में हुआ था। भले ही उनका जन्म कोलकत्ता जैसे महानगर में हुआ था, लेकिन वे एक भमणकारी या घुमक्कड़ किस्म से व्यक्ति थे।

कभी यूरोप तो कभी अमेरीका जैसे महान देशों में घुमने के लिए गये थे। लेकिन उनका मूल उद्देश्य विभिन्न मानवों के आंतरिक चरित्र या व्यवहार को टटोलना था। विभिन्न मनुष्यों से मिलकर मनुष्य जाति के व्यवहार को जानना था कि लोग कितने किस्म के होते है, उनके विचार क्या-क्या होते हैं। इतना ही नहीं, दूसरे लोगों के प्रति उनका चरित्र या व्यवहार कैसा होता है।

टैगोर जी का ‘मानवो’ के संबंध में कुछ ऐसा ही विचार था कि विभित्न मानव के विचार या व्यवहार भिन्न-भिन्न होते हैं लेकिन शिक्षा एक ऐसा हथियार है, जिसके माध्यम से मानव का चरित्र तथा व्यवहार दूसरों के प्रति समान हो जाता है अर्थात् दूषित चरित्र और व्यवहार के मानव शिक्षा से जुड़कर शिक्षित हो जाते हैं तथा दूसरों के प्रति अच्छा आचरण व्यक्त करते हैं। टैगोर के अनुसार देखा जाय तो प्रकृति, मानव और शिक्षा तीनों ही देश के लिए उज्ज्वल भविष्य हैं।

टैगोर जी का मानना है कि शिक्षित मानव के अन्दर अच्छी आचरण, चरित्र और व्यवहार का आविर्भाव उसकी रुचि (Interest) से प्राप्त होता है। अर्थात् यदि मनुष्य में रुचि होगी तभी वह शिक्षित हो पायेगा और उसके अन्दर मानसिक, शरीरिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विकास हो पायेगा जो एक सामाजिक मनुष्य के लिए आवश्यक तत्व है।

उपर्युक्त विवरणों से हम पाते हैं कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मनुष्य के प्रति अपना भिन्न विचार व्यक्त किये हैं जिसका संबंध न केवल मनुष्य से है बल्कि शिक्षा एवं प्रकृति से भी है। अर्थात् देखा जाय तो मनुष्य एक ऐसा तत्व है जिसका संबंध प्रकृति एवं शिक्षा से है।

प्रश्न 21.
शांति निकेतन के बारे में रवीन्द्रनाथ टैगोर के क्या विचार थे ?
या
शांति निकेतन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
या
शांति निकेतन की स्थापना में रवीन्द्रनाथ टैगोर का योगदान या भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
‘शांति निकेतन’ का अर्थ होता है, ‘शांति’ अर्थात् ‘शांत’, ‘सुनसान ‘ तथा ‘जहाँ हलचल अधिक न हो’ और ‘निकेतन’ का अर्थ ‘आवास’, ‘घर’ और ‘जहाँ कोई निवास करता हो’, अर्थात् ‘शांति का घर’। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘शांति निकेतन’ ‘शांति का घर’ है। जहाँ सांसारिक समस्यायों से परेशान लोग शांत या एकांत या मन की एकाग्रता पाते हैं। जहाँ संसार का सर्वोच्चतम् सुख प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में देखा जाय तो, ‘शांति निकेतन’ ‘परम सुख़’ न होकर ‘मोक्ष प्राप्ति की जगह’ है, जहाँ लोग सांसारिक समस्याओं से परेशान होकर मोक्ष प्राप्ति के लिए आते हैं।

‘शांति निकेतन’ की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने सन् 1863 में किये थे। शांति निकेतन भारत के पश्चिम बंगाल प्रदेश में वीरभूम जिले के अन्तर्गत बोलपुर नामक छोटे से शहर में है। जो कोलकाता से लगभग 180 कि०मी० उत्तर की ओर स्थित है।

रवीन्द्रनाथ टैगोर को ‘शांतिनिकेतन’ आश्रम से बड़ा ही लगाव था। वे वहाँ अक्सर जाया करते थे। उनको वहाँ का वातावस्ण बड़ा ही मनमोहक लगता था। इसी कारण रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने वहाँ अर्थात् ‘शांतिनिकेतन’ में सन 1901 में पाँच छात्रों को लेकर एक आश्रम या विद्यालय खोले थे। उस आश्रम या विद्यालय का नाम ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ रखा गया था। उनके इस कार्य में उस समय के शिक्षाविद, ब्रह्मबांधव उपाध्याय, सतीश चन्द्र राय, मोहित चन्द्र सेन, अजीत कुमार चक्रवर्ती, चार्ल्स फ्रायर तथा विलियम पियरसन् आदि लोगों ने साथ दिया था।

उपर्युक्त विवरणों के आधार पर देखा जाता है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के पिला ने जो महान कार्य किया था उसे और अधिक विकसित करने का कार्य रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने बड़ी विनम्रता के साथ किया।

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प्रश्न 22.
शांति निकेतन में विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना का क्या उद्देश्य था, संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
‘शांति निकेतन’ की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर ने सन् 1863 ई० में किया था। शांति निकेतन भारत के पश्चिम बंगाल प्रदेश में वीरभूम जिले के अन्तर्गत बोलपुर नामक छोटे से शहर में हैं जो कोलकाता से लगभग 180 कि॰मी० उत्तर की ओर स्थित है।
रीन्द्रनाध टैगोर को शांति निकेतन आश्रम से बड़ा ही लगाव था। वे वहाँ अक्सर जाया करते थे। सन् 1921 ई० में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस विश्वविद्यालय को लोगों को समर्पित कर दिया। सन् 1922 को इस संस्था के नियम कानून बनाए गए, जो इसके उद्देश्यों को सबके समक्ष लाते हैं। इसके उद्देश्य निम्न है –

  1. भारतीय संस्कृति एवं आदर्शों के आधार पर शिक्षा प्रदान करना।
  2. विश्व-बधुत्व को भावना विकसित करके विश्व शाति के लिए आधार बनाना।
  3. प्राच्य-पाश्चात्य संस्कृतियों में समन्व्वय स्थापित करना।
  4. इस संस्था को सास्कृतिक संश्लेषण के साधन के रूप में बनाना।

इस प्रकार हमलोग देखते हैं कि विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना विभिन्न उद्देश्यो को सामने रख कर की गयी थी। इतना ही नहीं, स विश्वाविद्यालय की अपनी कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। इस विश्वविद्यालय में शिक्षक और छात्रों के बीच संबंध अच्छे है।

प्रश्न 23.
रवीन्द्रनाथ टैगोर के बारे में संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, साहित्यकार, समाज सुधारक एवं राजनीतिज्ञ थे। वे अपने विचारों के बड़े ही क्के थे और उनके जीवन में शिक्षा का सर्वोपरि स्थान था। उनका शिक्षा के साथ बहुत ही गहरा रिश्ता था। वे प्रकृति की पाद में रहकर शिक्षा प्राप्त किये थे। इसीलिए वे प्रकृति को शिक्षा की जननी मानते थे।

एसे महान व्यक्ति का जन्म 7 मई, सन् 1861 में ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसीडेन्सी के कलकत्ता में स्थित जोड़ासाँकू हाकुरवाड़ी में हुआ था। इनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर एवं माता का नाम शारदा देवी था। इनके बचपन का नाम रवि’ था। रवीन्द्रनाथ टैगोर के भाई, ‘द्विजेन्द्रनाथ’, ‘सत्येन्द्रनाथ’, तथा ‘ज्योतिरीन्द्रनाथ’ थे तथा बहन ‘स्वर्णकुमारी’ थी जो एक कवसित्री थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी ‘मृणालिनी’ थी, जिनकी सन् 1902 में मृत्यु हो गयी। टैगोर के पाँच बच्चे थे, उनमें से दो बच्चों की मृत्यु बाल्यावस्था में ही हो गई।

रवोन्द्रनाथ टैगोर ने अपने पिता द्वारा स्थापित बोलपुर के शांति निकेतन’ में एक आश्रम या विद्यालय सन् 1901 में खोले। जहाँ वे पाँच छात्रों को लेकर पठन-पाठन का कार्य किया करते थे। उन पाँच छात्रों में उनका एक पुत्र भी शामिल था। उस आश्रम या विध्यालय का नाम ‘बह्मचर्य आश्रम’ (Brahamcharya Ashram) था। उनके इस कार्य में अनेकों शिक्षाविद शामिल थे। जैसे – विलियम पियरसन, अजीत कुमार चक्रवर्ती तथा अन्य आदि।

टैगार जी ने जा विद्यालय खोला था, उसी विद्यालय को सन् 1921 में ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ के रूप में परिवर्तित कर सन् 1922 में इस संस्था का नियम कानून बनाया गया।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की अनेक कृतियाँ हैं, जैसे – उनकी कविता – ‘मानसी’, ‘सोनार तरी’, ‘गीतांजली’, ‘गीतिमाल्य’, ‘बलाका’ तथा ‘भानुसिंह टैगोर की पदावली’। उनका नाटक – ‘बाल्मिकि प्रतिभा’, ‘विसर्जन’, ‘राजा’, ‘डाकघर’, ‘अचलायतन ‘मुक्तधारा’ तथा ‘रक्तकरवी’ आदि।
इसके अलावा उनके और भी कार्य हैं जिनमें ‘गोरा’, ‘जन-गण-मन’, ‘रवीन्द्र संगीत’ तथा ‘आमार सोनार बांगला’ आदि का उल्लेख किया जा सकता है:
सन् 1913 में साहित्य में उनको ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला, जो 25 अप्रैल 2004 ई० को विश्वभारती विश्वविद्यालय से ही चोरी हो गया था।
रीन्द्रनाथ टैगोर की मृत्यु 7 अगस्त, 1941 ई० को (लगभग 80 वर्ष की उम्म में) कलकत्ता में हुई।

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प्रश्न 24.
भारत में तकनीकी शिक्षा के विकास के बारे में संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में तकनीकी शिक्षा के विकास में काफी प्रयास किया गया है। परन्तु इसका सफरा 8 वीं सदी से लेकर 20 वी सदी तक को है। इस दौराना भारत में तकनीकी शिक्षा का विकास जोर-शोर से हुआ 118 वीं सदी से लेकर आजतक भारत में तकनीकी शिक्षा के रूप में विभिन्न संस्थाएँ बनायी गयी, जिसके माध्यम से भारत में तकनीकी शिक्षा का प्रसार-प्रचार और विकास हुआ।

सन् 1938 में कांग्रेस सरकार ने ‘मेघनाथ साहा’ की अध्यक्षता में तकनीकी शिक्षा संबंधित एक समिति का गठन किया। इस समिति ने भारत के विभिन्न प्रान्तों में तकनीकी शिक्षा के विकास पर जोर दिया। इस समिति के अन्य सदस्य थे जगदीश चन्द्र बोस, बीरबल साहनी, शान्तिस्वरूप भटनागर एवं नजीर अहमद। सन् 1942 में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सी० एस० आई० आर) की स्थापना की गई।

सन् 1944 में ए० बी० हिल की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने भारत में वैजानिक एवं तकनीकी शोधों से संबंधित अनेक सिफारिशें की। वैसे इसके पहले बम्बई, मद्रास, कन्नूर तथा कूसौली आदि में तकनीकी को विकसित करने के लिए कई प्रयोगशालाएँ स्थापित की गई। इतना ही नहीं, इस क्षेत्र में अन्य संस्थाने खोलो गई। जिसमें 1864 ई० में सर सैख्यद खान द्वारा अलीगढ़ साइण्टिफिक सोंसाइटी एवं 1876 ई० में एम० एन० सरकार का ‘एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंसेज’ हैं।
इस प्रकार हम लोग देख पाते हैं कि भारत में तकनीकी शिक्षा का विकास निरन्तर होते चला आ रहा हैं।

प्रश्न 25.
राष्ट्रीयता के विकास में प्रेसों तथा मुद्रित पुस्तकों की भूमिका का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
राश्रीयता के विकास में प्रेसों तथा मुद्रित पुस्तकों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसके माध्यम मे ही पूरे राष्ट्र में जानकारी व्याप्त हो पाया है। प्रेस ने जनता को आवश्यक राजनैतिक शिक्षा दी। प्रेस के माध्यम से ही विभिन्न राजनैतिक नेताओं ने अपने विचारों को आम जनता तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की। सरकार की वास्तविक नीति को उसकी दोहरी चालों को तथा उसके द्वारा भारतीयों के शोषण को सबके समक्ष रखने वाला तथा सरकार की कटु आलोचना को जनता तक पहुँचाने वाला माध्यम प्रेस ही था।

भारत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पहले समाचार पत्र ही देश में लोकमत का प्रतिनिधित्व कर रहा था। पत्रकारिता के साथ अनेक प्रतिष्ठित देशभक्तों तथा जाने-माने नेताओं का नाम जुड़ा हुआ था। देशभत्तों ने अपने लाभ या व्यावसायिक दृष्टि से पत्रकारिता को नहीं अपनाया था। उनको समाचार-पत्रों से कोई लाभ नहीं होता था, बल्कि उनको इसके प्रकाशन में आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता था। परन्तु इन सभी समस्याओं के बावजूद भी राष्ट्रीयता के संदर्भ में प्रेसों तथा मुद्रित पुस्तकों की भूमिका अहम मानी जाती है।

प्रश्न 26.
पंचानन कर्मकार और 19 वी सदी के पाठ्यपुस्तकों की छणाई के विकास का वर्णन संक्षेप में करें।
उत्तर :
मुद्रण कला में बगला अक्षर (हरफ) के जनक का नाम पंचानन कर्मकार था। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के त्रिवेणी में हुआ था। कलकत्ता में जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई तब इन्होंने उस के प्रेस में कार्य किया था। बंगला हरफ के अलावे इन्होंने अरबी, फारसी, गुरूमुखी, मराठी, तेलगु, वर्मी, चीनी आदि 14 भाषाओं के वर्णमालाओं का हरफ बनाया था।

19 वी सदी के प्रारम्भ में ही पाठशाला और स्कूल अधिक मात्रा में खुलने लगे। फलस्वरूप पाठ्युपस्तकों की मांग काफी बढ़ गई। श्रीरामपुर मिशनरीज, कलकत्ता बुक सोसाइटी तथा कलकत्ता स्कूल सोसाइटी ने पाठ्यपुस्तक प्रकाशन का कार्य आरम्भ किया। मदन मोहन तारकालंकार और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा रचित विभिन्न वर्ण मालाओं की पुस्तके काफी विख्यात हुई।

छपाई तकनीकी के विकास के कारण पाठचपुस्तकों की उपलब्धता बढ़ गई और यह छात्रों तथा पाठको को सुगमता से प्राप्त होने लगी, जिससे अध्ययन के लिए एक उत्तम माहौल बनने लगा तथा बंगाल ने साहित्य और शिक्षा की अग्रगति में उल्लेखनीय प्रगति प्राप्त किया।
इस प्रकार हमलोग पंचानन कर्मकार और 19 वीं सदी के पाठ्यपुस्तको की छपाई के विकास के बारे में जान पाते हैं।

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प्रश्न 27.
भारतीय मनीषियों ने औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की आलोचना क्यों की ?
उत्तर :
भारतीय मनीषियों ने औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की आलोचना प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था के आधार पर किये। इसके निम्न कारण हैं –
i. लार्ड मैकाले की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी यह थी इसके द्वारा छात्रों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता से दूर रखने का, प्रयास किया गया था। इस शिक्षा व्यवस्था को धर्म से भी दूर रखा गया था। रवीन्द्रनाथ चाहते थे कि विद्यार्थी के मस्तिष्क में धार्मिकता का विकास हो तथा नैतिकता और चरित्र का विकास भारतीय आदर्शों के अनुकूल हो।

ii. मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा को अनदेखा किया गया था जबकि अधिकतर शिक्षाविद यह मानते हैं कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए। महान् चिन्तक रवीन्द्रनाथ ने अपने विद्यालय में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को ही माना।

iii. मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य मात्र रोटी और भौतिकता तक सीमित था। भारत में शिक्षा व्यवस्था के संचालक साधु-संत तथा ऋषि-मुनि थे जो नैतिक गुणों और आध्यात्मिकता पर जोर देते हैं।

विवरणात्मक प्रश्नोत्तर (Descriptive Type) : 8 MARKS

प्रश्न 1.
19 वीं सदी में बंगाल में विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी के विकास का वर्णन करो।
अथवा
बंगाल में विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी के विकास में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज एवं नेशनल कांडसिल आफ एडुकेशन की भूमिका का वर्णन करो।
उत्तर :
बंगाल भारत का एक ऐसा प्रदेश या क्षेत्र है, जहाँ हमेशा विज्ञान एवं तकीकी का विकास होता रहा है। भारत के अन्य क्षेत्रों में भी इसका विकास हुआ है परन्तु देखा जाय तो बंगाल में इन दोनों क्षेत्रों में आज से नहीं बल्कि ब्रिटिश जमाने से ही विकास होता चला आ रहा है। विज्ञान एवं तकनीकी का जहाँ प्रादुर्भाव होता है, वह क्षेत्र अत्यधिक लाभान्वित होता है। विज्ञान एवं तकनीकी किसी प्रदेश को उभारता है तो किसी प्रदेश को नष्ट भी करता है। जैसे – द्वितीय विश्व युद्ध की बात कही जाय तो, जहाँ अमेरिका ने जापान पर बम फेंका तो वहाँ तबाही का दृश्य छा गया। अर्थात् जहाँ अमेरिका ने विज्ञान एवं तकनीकी के माध्यम से अपने आपको मजबूत किया वहीं जापान इन दोनों लाभों से चूक गया। ठीक इसी भाँति बंगाल में 19 वीं शताब्दी से लेकर 20 वी शताब्दी तक विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्रों में विभिन्न विकास हुए।

इसी विकास के क्रम में बंगाल में ‘कलकत्ता विज्ञान कॉलेज’ एवं ‘नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसका उल्लेख निम्नरूप है –
कलकत्ता विज्ञान कॉलेज (Calcutta Science College) : कलकत्ता विज्ञान कॉलेज जो बंगाल में विज्ञान के क्षेत्र में हुई विकास का प्रतीक माना जाता है, की स्थापना सन् 1914 में आशुतोष मुखर्जी ने किया था। उनके इस कार्य में श्री तारकनाथ पालित और श्री रासबिहारी बोस ने सहयोग दिया। तीनों महान् पुरुषों के प्रयास से इस महान संस्था की स्थापना हो पायी। यह कॉलेज वर्तमान में ‘University College of Science and Technology’ के नाम से परिचित है। यह ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय’ के चार प्रमुख कैम्पसों में से एक है। उस समय के महान वैज्ञानिक पी.सी.रॉय, सी.वी.रमन, के एस. कृष्णन इत्यादि इस कॉलेज से जुड़े हुए थे।

इस कॉलेज में भौतिकी, रसायन, जैविक विज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के अनुसंधान या शोध किये जाते थे। विशेष कर Bio-chemistry, Bio-technology तथा Bio-medical जैसे विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर यहाँ चर्चा की जाती थी। इस कॉलेज में छात्र-छात्राएँ बड़े ही रुचि के साथ शिक्षा अर्जित किया करते थे। इस कॉलेज के प्रमुख़ शिक्षकों में सर चन्द्रशेखर वेंकट रमन, शिशिर कुमार मित्र, आचार्य प्रफुल्लचन्द्र रॉय, सत्येन्द्रनाथ बोस, ज्ञान चन्द्र घोष तथा ज्ञानेन्द्र मुखर्जी इत्यादि थे। ये सभी शिक्षके इस कॉलेज में रहकर शोधकार्य करते थे। आचार्य प्रफुल्लचन्द्र रॉय ने ‘बंगाल केमिकल एवं फर्मासेयुटिकल वर्क्स (Bengal Chemical and Pharmaceutical Works) नामक संस्था की स्थापना किया।

नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन : तकनीकी शिक्षा के विकास में ‘नेशनल काउन्सिल ऑफ एडुकेशन’ का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य छात्र-छात्राओं को तकनीकी शिक्षा प्रदान कराना था। इतना ही नहीं, छोटे-छोटे बच्चों को तकीनीकी शिक्षा किस प्रकार प्राप्त हो इसका भी ध्यान रखा जाता था। इस कार्य में अनेकों तकनीकी शिक्षा के प्रेरणा सोत थे जिनमें रवीन्द्रनाथ टैगोर, अरबिन्द घोष, राजा सुबोध चन्द्र मल्लिक, बजेन्द्र किशोर रॉय चौधरी इत्यादि सम्मिलित थे।

राष्ट्रीय शिक्षा परिषद, बंगाल (The National Council of Education, Bengal) का जन्म बंग-भंग के दौरान किये गये स्वदेशी आन्दोलन (1905 ई०) के दौरान हुआ था। इसकी स्थापना सन् 1906 ई० में प्रमुख शिक्षाविदों के सम्मिलित प्रयासों से हुआ था। इस परिषद् के तहत राज्य के समस्त विज्ञान एवं तकनीकी स्कूल एवं कॉलेज खोले गये। इसी परिषद् ने ‘बंगाल तकनीकी कॉलेज’ की स्थापना किया। बाद में चलकर राष्ट्रीय शिक्षा परिषद्, बंगाल को सन् 1955 ई० में ‘यादवपुर विश्वविद्यालय’ में मिला दिया गया। इस परिषद की स्थापना में प्रमुख भूमिका ‘रासबिहारी घोष’, ‘आशुतोष चौधरी’, ‘हिरेन्द्रनाथ दत्त’ तथा ‘सुरेद्र्रनाथ बनर्जी’ ने निभाई थी।
इस तरह बंगाल में विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के विकास में ‘कलकत्ता विज्ञान कॉलेज’ तथा ‘राष्ट्रीय शिक्षा परिषद्, बंगाल’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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प्रश्न 2.
20 वीं शताब्दी में बंगाल के नवजागरण में प्रेस की भूमिका वर्णन कीजिए।
या
19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 20 वीं शताब्दी में बंगाल में प्रेस की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
19 वीं शताब्दी उत्तरार्द्ध तथा 20 वीं शताब्दी में बंगाल में प्रेस की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है जिसकी वजह से छापाखाना का स्तर बढ़ा एवं तरह-तरह के समाचार पत्र, पत्र-पत्रिकाएँ एवं पुस्तके अत्यधिक मात्रा में छपने लगे। इतना ही नहीं, इन सभी समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिका एवं पुस्तको की छपाई का मुख्य उद्देश्य, लोगों को हर प्रकार का या हर क्षेत्रों का ज्ञान देना था। इसी उद्देश्य से छापाखाना से विभिन्न पत्र-पत्रिका, सामाचार पत्र एवं पुस्तकें छपा करता था।

ऐसे तो माना जाता है कि 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में कलकत्ता में स्याही (Ink) द्वारा छुपाई का कार्य किया जाता था जिसका प्रारम्भ ‘ग्राह्म शॉ’ (Grahm Shaw) ने किया था। उसके बाद बंगाल के कई क्षेत्रों में प्रेसों की स्थापना किया गया जिनमें सन् 1800 ई० में विलियम कैरी, विलियम वार्ड तथा कुछ और अंग्रेजों ने मिलकर हुगली के श्रीरामपुर में ‘श्रीरामपुर ‘मिशन प्रेस’ की स्थापना किया था। यहाँ लगभग 45 भाषाओं में हजारों पुस्तकों का प्रकाशन किया जाता था। धीरे-धीरे छपाई के कार्यों में विकास आया।

19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक प्रेसों में अत्यधिक विकास आया, जिसकी वज़ह से बहुत सारी पत्र-पत्रिकायें एवं पुस्तकों का प्रकाशन किया गया। उन सभी पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में कुछ प्रमुख थे – मार्शमैन का ‘दिगदर्शन’, राजा राममोहन राय का ‘संवाद कौमुदी’ तथा ‘मिरातउल अखबार’ एव ‘ब्राह्मिनिकल मैगजीन’, काशीसेन का ‘समाचार दर्पण’, ब्रिटिश व्यापारियों का ‘जेम्स सिल्क बकिंधम’ एवं ‘बंगदत्त’ आदि पत्र-पत्रिका एवं पुस्तके तथा समाचार पत्रें थे।

इसके बाद 20 वीं शताब्दी में छापाखाना में इतना अधिक विकास हुआ कि मानों बंगाल में नवजागरण आ गया हो। अर्थात् बंगाल विकास के पहिए के सहारे दौर पड़ा हो। कहा जाय तो 20 वीं शताब्दी में बंगाल में नवजागरण आने का प्रमुख कारण ‘ ‘छापाखाना’ में विकास ही था। 20 वीं शताब्दी के पहले ही बंगाल में छापाखाना के अनेकों संस्थाएं खोले गये, जिसकेमाध्यम से बंगाल में अनेकों पत्र, पत्रिका एवं पुस्तकों का प्रकाशन किया गया।

उनमें से कुछ पत्र-पत्रिका एवं पुस्तके महत्वपूर्ण हैं, जैसे- ‘सोम प्रकाश’ जिसका प्रकाशन ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने सन् 1859 ई० में किया। सन् 1853 ई० में हरिश्चन्द्र मुखर्जी जी ने ‘हिन्दू पैट्रियॉट’ का सम्पादन किया। सन् 1861 ई० में देवेन्द्रनाथ टैगोर और मनमोहन घोष ने ‘इण्डियन मिरर’ का प्रकाशन किये। लार्ड लिटन ने ‘ वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ लागू किया। केशवचन्द्र द्वारा प्रकाशित बंगला का महत्वपूर्ण दैनिक पत्र ‘सुलभ समाचार’ था। शिशिर कुमार घोष द्वारा सम्पादित ‘अमृत बाजार पत्रिका’ था।

20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों की होड़ मच गयी। इस दौरान बंगवासी, संजीवनी नामक पत्र का भी प्रकाशन हुआ जो बंगाल का प्रमुख पत्र माना जाता था। इनमें बंगवासी नामक पत्र का प्रकाशन जोगेन्द्रनाथ बोस ने किया था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का ‘बंगाली’ पत्र था। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कलकत्ता से सन् 1912 ई० में ‘अल हिलाल’ तथा सन् 1913 ई० में ‘अल बिलाग’ नामक पत्रिका का प्रकाशन किया।

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प्रश्न 3.
विश्वभारती विश्वविद्यालय के उद्देश्यों एवं विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, साहित्यकार, समाज-सुधारक एवं राजनीतिज्ञ थे जिनका जन्म सन् 1816 ई० में कलकत्ता महानगर के जोड़ासाँकू में हुआ था। इनके पिता का नाम महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर एवं माता का नाम शारदा देवी था। सन् 1863 ई० में इनके पिता देवेन्द्रनाथ टेगोर ने बंगाल के वीरभूम जिले के बोलपुर शहर में ‘शांति निकेतन’ आश्रम की स्थापना किया था। इसी आश्रम में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सन् 1901 ई० में एक विद्यालय की स्थापना किये थे जिसका नाम ‘बह्मचर्य आश्रम’ था।

वे पाँच छात्रों को लेकर इस विद्यालय की स्थापना किये थे। इनके इस कार्य में प्रमुख शिक्षाविदों, बहाबांधव उपाध्याय, सतीश चन्द्र राय, मोहित चन्द्र सेन, अजीत कुमार चक्रवर्ती तथा विलियम पिरयसन आदि ने साथ दिया था। बाद में चलकर यह विद्यालय लोकप्रिय बन गयी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस विद्यालय को ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ में रूपान्तरित कर लोगों को समर्पित कर दिया। इसकी स्थापना सन् 1921 ई० में किया गया तथा सन् 1922 ई० में इस संस्था का नियम-कानून बनाया गया।

उद्देश्य : इस संस्था के कुछ प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार से है –
1. भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का केन्द्र :- विश्वभारती विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य है कि छात्र-छात्राओं को शिक्षा या ज्ञान सिर्फ भारतीय संस्कृति, आदर्शों तथा सभ्यता को आधार बना कर दिया जाय न कि पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति को अधार बनाकर। ऐसा करने से छात्र-छात्राओं में अपने देश के प्रति भावनाएँ उत्पन्न होगी न कि द्वेष उत्पत्र होगी।

2. प्राच्य-पाश्चात्य संस्कृतियों में समन्वय :- इस संस्था का एक और मुख्य उद्देश्य था, प्राच्य-पाश्चात्य संस्कृतियों अर्थात् हिन्दी एवं अंग्रेजी संस्कृतियों में समानता स्थापित करना था ताकि इस संस्था में छात्र-छात्राओं न केवल प्राव्य या हिन्दी भाषा में बल्कि पाश्चात्य या अंग्रेजी भाषा में भी शिक्षा अर्जित कर सकें।

3. विश्व में बंधुत्व की भावना की स्थापना :- इस संस्था का तीसरा मुख्य उद्देश्य विश्व बंधुत्व, भाईचारा तथा शांति की भावना को स्थापित करना था, जो छात्र-छात्राओं के मानसिक विकास में सहायता करता है।

4. एशिया में व्याप्त जीवन के प्रति दृष्टिकोण एवं विचारों के आधार पर पश्चिमी देशों से सम्पर्क बढ़ाना।

5. इस संस्था के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए शांति निकेतन में एक ऐसे सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना किया जाय, जहाँ धर्म, साहित्य, विज्ञान एवं हिन्दू, बौद्ध, जैन, मुस्लिम, सिख इसाई और अन्य सभ्यताओं की कला का अध्ययन और उनमें शोधकार्य, पश्चिमी संस्कृति के साथ, आध्यात्मिक विकास के अनुकूल सादगी के वातावरण में किया जाए।

विशेषताएँ : विश्व भारती विश्वविद्यालय की विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

1. विद्या भवन :- इस संस्था के कई विभाग हैं, जिनमें से एक विद्या भवन भी है। जहाँ प्राच्य के विभिन्न भाषाओं, साहित्य एवं संस्कृति पर शोधकार्य होता है।

2. चीन भवन :- यह विभाग भी इस संस्था का ही भाग है, जहाँ हिन्दी-चीनी शिक्षाओं पर अध्ययन एवं शोधकार्य होता है। इस विभाग का गठन सन् 1937 ई० में प्राध्यापक ‘तान युन सान’ के प्रयासों से हुआ था।

3. हिन्दी भवन :- यह विभाग भी इस संस्था की देन है जिसका गठन सन् 1939 ई० में हुआ था, जहाँ पर हिन्दी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन पर शोधकार्य किया जाता है।

4. पाठ-भवन :- इस विभाग में माध्यमिक स्तर पर शिक्षा या ज्ञान दिया जाता था।

5. शिक्षा भवन :- इस विभाग में उच्च-स्तरीय शिक्षा या ज्ञान प्रदान किया जाता था।

6. रवीन्द्र भवन :- इस विभाग की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के साहित्यों का अध्ययन करने के लिए किया गया था । इसकी स्थापना सन् 1942 ई० में हुआ था।

7. कला भवन :- इस विभाग की स्थापना चित्रकारी, लकड़ी पर नक्कशी, स्थापत्य कला की योजना एवं पत्थर की मुर्तियों एवं सूईयों से विभिन्न कलाकारी के लिए किया गया था। यह सभी कला के कार्य ‘नन्द लाल बोस’ के नेतृत्व में किया जाता था। इस विभाग में सन् 1936 ई० में ‘लोक शिक्षा संसद’ की स्थापना किया गया था।

उपर्युक्त उल्लेखों से पाते हैं कि रवीन्द्रनाथ टेगोर जी द्वारा स्थापित ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ के विभिन्न उद्देश्य एवं विशेषताएँ है, जो इस संस्था का भविष्य माना जाता है। इस संस्था की प्रसिद्धि न केवल राष्ट्रिय स्तर पर है, बल्कि अर्त्तराष्ट्रीय स्तर पर भी है।

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प्रश्न 4.
भारत में शिक्षा के संबंध में औपनिवेशिक विचारों पर प्रकाश डालिए।
या
औपनिवेशक शिक्षा पद्धति पर टीप्पणी लिखिए।
उत्तर :
भारत में शिक्षा को लेकर अनेक उतार-चढ़ाव हुआ जिसमें भारत देश का भविष्य निहित था। उतार-चढ़ाव कहने का मतलब अंग्रेजों के समय में भारतीय शिक्षा में अनेकों बदलाव किया गया। यह संभी बदलाव देखा जाय तो अंग्रेज अपने पक्ष में ही करते थे। अपनी सभ्यता तथा संस्कृति को भारतीय शिक्षा के माध्यम से भारतवासियों के ऊपर थोपना चाहते थे।

अर्थात् अंग्रेजी प्रशासन भारतवासियों के शोषण करने हेतु हर हथकण्डे अपनाया करते थे। परन्तु इस प्रशासन में ही कुछ ऐसे गवर्नर-जनरल थे, जो न केवल अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देते थे बल्कि संस्कृति शिक्षा को भी बढ़ावा देते थे।

अंग्रेजों या अंग्रेजी प्रशासन द्वारा भारत में प्राच्य शिक्षा के अलावा पाश्चात्य शिक्षा को अधिक महत्व देते थे। वे प्राच्य एवं पाश्चात्य भाषाओं में समन्वय स्थापित न करके उनमें मतभेद पैदा किया करते थे ताकि प्राच्य भाषा का अन्त हो जाये। लेकिन कुछ गवर्नर जनरल पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ प्राच्य शिक्षा को लेकर चलना चाहते थे। एसे गवर्नर-जनरलों ने बहुत सारे विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना किये। जैसे – ‘वारेन हेस्टिंगस’ ने कलकत्ता में सन् 1781 में एक मदरसा की स्थापना किया, सर विलियम जोन्स ने सन् 1784 में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना किये, तथा जोनाथन डंकन द्वारा बनारस में सन् 1791 में एक संस्कृति कोंलेज की स्थापना किया गया।

इस सभी संस्थाओं का मूल उद्देश्य प्रत्येक जाति, धर्म एवं साहित्य में विकास लाना था। भारतीय शिक्षा को अंग्रेजों ने एक नया रूप दिया जिसमें अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ संस्कृति शिक्षा भी हो। इसी उद्देश्य से सन् 1813 ई० में एक चार्टर एक्ट पास किया गया जिसके तहत प्राच्य शिक्षा या भाषा के स्थान पर पाश्चात्य शिक्षा या भाषा का अधिक महत्व दिया गया।

इतना ही नहीं, प्राच्य तथा पाश्चात्य संस्कृतियों के समन्वय की स्थापना भी किया गया ताकि भारत में शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जाय। परन्तु ऐसा हो न सका। जहाँ समन्वय यानी समानता स्थापित करना था वहाँ असमन्वय यानी असमानता व्याप्त हो गया। औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति के तहत गवर्नर जनरल ‘सर चार्ल्स वुड’ ने भारतीय शिक्षा में कैसे विकास या उन्नति लाया जाय इस विषय में उन्होंने सन् 1854 में वुड डिस्पैच निकाले।

इसके माध्यम से सर चार्ल्स वुड ने भारत में प्राच्य भाषा और पाश्चात्य भाषा दोनों में किस प्रकार से विकास लाया जाय विभिन्न कदम उठाये थे – विद्यालयों में दोनों भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था हो, माध्यमिक स्तर पर हिन्दी भाषा का बोलबाला हो तथा उच्च स्तर पर हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा का भी बोलबाला हो। कॉलेजों में प्रथम भाषा के रूप में पश्चात्य यानी अंग्रेजी भाषा को उपयोग में लाया जाय।

इस प्रकार चार्ल्स वुड ने ‘वुड डिस्पेच’ का गठन किया ताकि प्राच्य यानी हिन्दी भाषा और पाश्चात्य यानी अंग्रेजी भाषा में शिक्षा का आदान-प्रदान हो।

इतना ही नहीं, इसके पहले भी सन् 1817 में भी कुछ इस तरह का कार्य किया गया था। डेविड हेयर, राजा राममाहन राय तथा न्यायाधीश, एडवर्ड हाइड ईस्ट ने मिलकर कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना किये जिसके माध्यम से हिन्दी भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा में भी शिक्षा प्रदान किया जाता था। सन् 1823 में विल्सन की अध्यक्षता में जन शिक्षा की समिति (Committee of Public Instrucations) की स्थापना किया गया। समिति को शिक्षा स्तर में सुधार लाने के लिये बनाया गया था।

शिक्षा के स्तर को किस तरह से विकसित किया गया जाय इसके सन्दर्भ में लगभग सन् 1882 में सर विलियम हण्टर की अध्यक्षता में हण्टर आयोग (Hunter Commission) का गठन किया गया। इसके माध्यम से भारतीय शिक्षा स्तर में विभिन्न विकास लाया गया जिनमें माध्यमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम हिन्दी भाषा हो, उच्च स्तर पर शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा के साथ हिन्दी भाषा को भी रखा जाय। कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा शिक्षा का माध्यम बने। इतना ही नहीं, इनमे व्यायाम की भी व्यवस्था हो ताकि छात्र-छात्राएँ मानसिक तथा शारीरिक रूप से शिक्षा अर्जित कर सके।

औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति में ‘हण्टर आयोग’ के बाद ‘सेण्डलर आयोग’ सन् 1917 में विलियम सेण्डलर की अध्यक्षता में गठित किया गया। इस आयोग का भी उद्देश्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था में उन्नति या विकास लाना था तथा छात्र-छात्राओं के लिए हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा में विभिन्न क्रियात्मक कार्यो की व्यवस्था किया जाना था। ताकि उनमें क्रियात्मक विकास भी हो पाये जो बहुत ही आवश्यक था।

उपर्युक्त विवरणों से पता चलता है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था के संबंध में औपनिवेशकों के भिन्न-भिन्न विचार थे। परन्तु भारतीय शिक्षा व्यवस्था में विकास का एकमात्र कारण प्राच्य या हिन्दी और पाश्चात्य या अंग्रेजी भाषाओं का समागम होना था। आज वर्तमान समय में पाश्चात्य भाषाओं के समागम से भारतीय शिक्षा का विकास तो हुआ है, लेकिन भारतीय संस्कृति नष्ट हो गयी है।

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प्रश्न 5.
मुद्रित साहित्य एवं ज्ञान के प्रसार में संबंध को स्पष्ट करें।
उत्तर :
मुद्रित साहित्य एवं ज्ञान के प्रसार का संबंध ब्रिटिश जमाने से अर्थात् 19 वीं शताब्दी के पहले से ही माना जाता था। मुद्रित साहित्य, जो मुद्रणालय से प्रकाशित होती है उसकी समाज में महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। प्रेसों से जो समाचार-पत्र, पत्रिका एवं पुस्तके छप कर आती हैं वही समाज में, लोगों में तथा छात्र-छात्राओं में ज्ञान को उजागर करती हैं। 19वी शताब्दी में जब बंगाल में मुद्रण या प्रेसों का आविर्भाव हुआ, तब से ज्ञान के क्षेत्र में अत्यधिक विकास हुआ। इतना ही नहीं, विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में भी छापेखाने का जबर्दस्त प्रभाव था।

ऐसा माना जाता है कि भारत में लगभग 1557 ई० में पहला समाचार पत्र एवं पत्रिका निकाला गया और इसकी शुरुआत गोवा में व्याप्त पुर्तगालियों ने किया था। लेकिन सही रूप से भारत, बंगाल में प्रेसों का आविर्भाव 19 वीं शताब्दी से माना जाता है जिसकी पहल ‘ग्राह्म शॉ’ ने कलकत्ता में किया। उन्होंने स्याही के माध्यम से छपाई का कार्य शुरू किया। इस मशोन के द्वारा छपाई कार्य और बाइडिंग कार्य या कम्पोजिंग कार्य भी किया जा सकता था। अर्थात् 19 वीं शताब्दी से सही रूप से प्रेसों के माध्यम से समाचार पत्र, पत्रिका एवं पुस्तकों को छपाई का कार्य ने तीव्र रूप धारण कर लिया।

इस तरह भारत तथा बंगाल में तरह-तरह के समाचार पत्र, पत्रिका एवं पुस्तके आद सामने आने लगे जिससे लोगों को अत्यधिक जानकारी प्राप्त होने लगा। अर्थात् कह सकते हैं कि मुद्रणालयों ने लोगों को ज्ञान-विज्ञान तथा तकनीकी से अवगत कगया बगाल में प्रेस के माध्यम से सन् 1780 में पहला समाचार पत्र ‘द बंगाल गजट’ प्रकाशित हुआ जिसका सम्पादक ‘जेम्स आगस्टस हिक्की’ थे। इस पत्र का दूसरा नाम ‘द कलकत्ता जेनरल एडवरटाइजर’ (The Calcutta General Advertiser) था।

इसी साल एक और समाचार पत्र प्रकाशित हुआ जिसका नाम इण्डिया गजट (India Gazatte) था। सन 1784 में ‘कलकत्ता गजट’ (Calcutta Gazatte) प्रकाशित हुआ एवं 1785 ई० में ‘ओरिएण्टल मैगजीन ऑफ कलकत्ता’ (Oriental Magazine of Calcutta) का प्रकाशन हुआ था।

इसी तरह 18 वीं शताब्दी के अंत तक बंगाल में कई और पत्रों का प्रकाशन किया गया जिनमें ‘कलकत्ता कैरियर’ (Calcutta Carrier), ‘एशियाटिक मिरर’ (Asiatic Mirror), ‘ओरिएण्टल स्टार’ (Oriental star) आदि प्रमुख थे। बम्बई में ‘बम्बई ग़जट’ (Bombay Gazatte) नामक समाचार पत्र के प्रकाशन से ज्ञान के विकास अर्थात् प्रचार-प्रसार में काफी मदद मिला। इतना ही नहीं, इनके प्रकाशन सं केवल जानकारियाँ ही नहीं मिलती थी बल्कि ज्ञान को अर्जित करने की प्रेरणा भी मिलती थी। इसकी मदद या सहायता से विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में आपार उन्नति या विकास हो पाया। अर्थात् म्रेसों के आ जाने से ज्ञान के प्रसार में अत्यधिक मद्द मिला।

19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर 20 वीं शताब्दी तक भारत एवं मुख्य रूप से बंगाल में मानों प्रेसों के गाध्यम से समाचार पत्र, पत्रिका एवं पुस्तकों की होड़ मच गया जिसका सीधा सीधा असर ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी के क्षत्रों पर पड़ा इनमें ‘दिग्रर्शन’, ‘संवाद कौमुदी’, ‘मिरातुल अखबार’, ‘ब्राह्मिनिकल मैगजीन’, ‘ईश्वरचन्द्र विद्यासागर’ की ‘सामपकाश’, ‘लाई्ड लिटन’ का ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’, केशवचन्द्र सेन का ‘सुलभ समाचार’, हरिशचन्द्र मुखर्जी का ‘हिन्दू पैंट्रयाट’, शिशिर कुमार घोष का ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘बंगवासी’, ‘संजीवनी’, ‘बंगाली’ तथा मौलना अबुल कलाभ आजाद का ‘अल हिलाल’ तथा ‘अल बिलाग’ आदि था। इन सभी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से समाज एव लोंगों में ज्ञान यानी जानकारी मिलता था जिसके माध्यम से इसका प्रचार-प्रसार किया जाता था।

इतना ही नहीं, मुद्रण और ज्ञान या जानकारी का संबंध हर क्षेत्रों में भी है। 18 वों शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी तक भारत और मुख्य रूप से बंगाल में प्रेसों का जाल बिछा रहा क्योंकि उस समय हमारा भारतवर्ष अंग्रेजा का गुलाम था। और भारतवासी अंग्रेजों का गुलामी किया करते थे। परन्तु इसका मतलब यह नहीं की उनके भीतर देशर्भक्ति को भावना मर गयी थी। बशर्ते उनके इस भक्ति-भावना को चिंगारी देने की देर थी और यही काम मुद्रणालयों या प्रेसों ने कर दिया।

भारत तथा विशेष रूप से बंगाल के जितने देशभक्त, क्रान्तिकारी एवं अन्य सम्पादक थे, सभी लोगों ने मिलकर अंग्रेज विरोधी ब्रिभिन्न प्रकार के समाचार पत्र, पत्रिका एवं पुस्तके निकाले। जिनका एक ही लक्ष्य अंग्रेज भारत को छोड़ो था। इस तरह अंग्रेजी विरोधी समाचार पत्र, पत्रिका एवं पुस्तकों के समाज में आने से सभी भारतवासियों को एक नई उर्जा मिन्न गयी, जिनके माध्यम से वे अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिये।

प्रेसों ने न केवल लोगों में अपने देश के प्रति देश भक्ति की भावनाको उत्पन्न किया, बल्कि लोगों को विभिन्न प्रकार का ज्ञान भी दिया, जैसे – विभिन्न धर्म की जानकारी, विभिन्न संस्कृतियों में समानता की जानकारी तथा विभिन्न सभ्यता का जान। इतना ही नहीं, लोगों में राजनीति का महत्व भी उजागर किया तथा दुष्ट राजनेताओं के शोषण से बचने के उपाय का ज्ञान भी दिया।

उपर्युक्त विवरणों से पाते हैं कि मुद्रण एक ऐसा माध्यम है, जिसके जरिये ज्ञान का प्रसार किया जा सकता है तथा लांगों को विभिन्न जानकारियाँ भी दिया जा सकता है। मुद्रण के जरिये विभिन्न समाचार पत्रों का प्रकाशन होता है, जिसकं माध्यम से लोगों को विभिन्न क्षेत्रों के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है। यही प्रक्रिया 18 वीं शताब्दी से लेकर 20 वीं शताब्दी तक तीव्र थी और आज भी प्रेस अपने कार्यो में कार्यरत है।

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प्रश्न 6.
व्यावसायिक कार्य के रूप में मुद्रणालय के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
व्यावसायिक कार्य के रूप में मुद्रणालय (Press) की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। मुद्रणालय की स्थापना के बाद यह एक व्यावसायिक कार्य के रूप में विकसित-हुआ। कलकत्ता के जेम्स आगस्टस का प्रेस व्यावसायिक कार्य करता था। इसमें इस्ट इण्डिया कं० का मिलिटरी बिल, भत्ते का फार्म, सामरिक वाहिनी के नियम-कानून आदि छपते थे। हिक्की ने भारत तथा दक्षिण एशिया में सर्वप्रथम साप्ताहिक समाचार पत्र बंगाल गजट, 1780 ई० में अपने भस में छापना शुरू किया।

विलकिन्स ने 1781 ई० में एक प्रेस की स्थापना की। इसका नाम था ‘आनरेबुल कम्पनीज प्रेस’। यह 18 वीं शताब्दी में कलकत्ता का सबसे बड़ा प्रेस हो गया। इस प्रेस में सरकारी काम के साथ-साथ अन्य व्यावसायिक चीजें भी छपती थी। एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका ‘एशियाटिक रिसर्चेज’ विलियम जोन्स द्वारा अनुदित कालीदास की पुस्तक ‘ऋतु संहार’ की छपाई भी इसी प्रेस में हुई थी। 1780-1790 ई० के बीच कलकत्ता के विभिन्न प्रेसों से 19 साप्ताहिक एवं 6 मासिक पत्र प्रकाशित होते थे।

इसके बाद अनेक बंगाली व्यावसायियों ने प्रेसों की स्थापना की। गंगाप्रसाद भट्टाचार्य प्रथम बंगाली प्रकाशक और पुस्तक बिक्रेता थे। इन्होंने ही सर्वप्रथम सचित्र बंगला की पुस्तक ‘अन्नदामगल’ का प्रकाशन किया। इस पुस्तक के चित्र निर्माता थे – रामचन्द्र राय। सन् 1800 तक कलकत्ता में छपी कुल पुस्तकों की संख्या 650 थी।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर के जीवन काल में ही उनकी पुस्तक वर्ण-परिचय के 152 संस्करण छपे और इस पुस्तक की 35 लाख से अधिक प्रतियाँ छात्रों के हाथ में पहुँची। 1869 – 1880 ई० के बीच 12 वर्षों में बाल्य-शिक्षा की 41 लाख से अधिक पुस्तकें छपी। स्कूल बूक सोसायटी ने अपनी स्थापना के चार वर्षो के भीतर केवल बंगला भाषा में 50 हजार पुस्तके छपवाई। प्रेसों के मालिक विभिन्न प्रकार की पुस्तके छाप कर अपना व्यवसाय बढ़ाने लगे।

स्कूली पुस्तकों के अतिरिक्त हितोपदेशक, बत्रिस सिंहासन, तोता इतिहास, बोधोदय, बंगाल पंचविशंति, नीति कथा आदि पुस्तकों की भी मांग तीव्र गति से बढ़ी। भूगोल, इतिहास, साहित्य, गणित, भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, इन्जीनियरिंग, औषधि विज्ञान आदि की पुस्तकों की मांग और बिक्री बढ़ी।

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प्रश्न 7.
रवीन्द्रनाथ शिक्षा के क्षेत्र में प्रकृति, मनुष्य एवं शिक्षा के समन्वय के समर्थक क्यों थे? इस कार्य के लिए उन्होंने क्या किया ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, चिन्तक तथा समाज सुधारकों में गिने जाते थे। इसी आंधार पर रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि के साथ-साथ एक महान शिक्षक भी थे। टैगोर जी ने एक शिक्षक के रूप में छात्रों एवं छात्राओं के लिए हर सम्भव कार्य किये जिनकी जरूरत उनको थी। एक शिक्षक के रूप में टैगोर जी का प्रारम्भिक कार्य छात्र-छात्राओं को सही आचरण, व्यवहार और अच्छी ज्ञान प्राप्त कराना था।

रवीन्द्रनाथ टैगोर खुद एक शिक्षक थे। इसीलिए उन्होंने ‘प्रकृति’ को महान शिक्षक की दर्जा दिया है, जो हमेशा जीवित रहता है अर्थात् महान शिक्षक होने के साथ-साथ, एक जीवित शिक्षक भी। ‘प्रकृति’ के साथ रहकर अबोध बच्चे जीवन के हर एक रहस्य को सीख पाते हैं। ‘प्रकृति’ एक अबोध मनुष्य को बोधगम्य बनाती है। टैगोर जी का मानना है कि समाज में पठन-पाठन का केन्द्र या विद्यालय खुले प्राकृतिक वातावरण में हों ताकि बच्चे खुले प्राकृतिक वातावरण में पढ़कर विकसित हो पायेंगे। इतना ही नहीं, बच्चे प्रकृति की गोद में रहकर ममता रूपी प्यार पाकर बहुत कुछ सीख पाते हैं। इस संदर्भ में रवीन्द्रनाथ टैगोर का कथन है –

“सांसारिक बंन्धनों में पड़ने से पहले बालकों को अपने निर्माण काल में प्रकृति का प्रशिक्षण प्राप्त करने दिया जाना चाहिए।” रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार प्रकृति या वातावरण में एक विद्यालय के सभी सामान हैं। जैसे – किताबें, पाठबक्रम, डेस्क, श्यामपट, शिक्षक या शिक्षिका तथा विद्यालय का माहौल आदि। अर्थात् पकृति या वातावरण खुद एक शिक्षक है, उनकी विभिन्न दृश्य किताबें एवं पाठ्यक्रमें हैं, जहाँ बच्चे प्रकृति या वातावरण में विद्यालय के भाँति पढ़ते एवं सीखते हैं। इसीलिए टैगोर जी के अनुसार प्रकृति या वातावरण एक महान जीवित शिक्षक है।

उपर्युक्त उल्लेखों से हम पाते हैं कि प्रकृति या वातावरण सही रूप में एक महान् जीवित शिक्षक है, जिसका वर्णन टैगोर जी ने किया है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि, सुधारक, सामाजिक, शिक्षाविद के साथ-साथ एक महान चिन्तक भी थे। उनका जन्म कलकत्ता महानगर के जोड़ासाँकू अंचल में हुआ था। भले ही उनका जन्म कोलकत्ता जैसे महानगर में हुआ था, लेकिन वे एक भ्रमणकारी या घुमक्कड़ किस्म से व्यक्ति थे। कभी यूरोप तो कभी अमेरीका जैसे महान देशों में घुमने के लिए गये थे।

लेकिन उनका मूल उद्देश्य विभिन्न मानवों के आंतरिक चरित्र या व्यवहार को टटोलना था। विभिन्न मनुष्यों से मिलकर मनुष्य जाति के व्यवहार को जानना था कि लोग कितने किस्म के होते हैं, उनके विचार क्या-क्या होते हैं। इतना ही नहीं, दूसरे लोगों के प्रति उनका चरित्र या व्यवहार कैसा होता है।

टैगोर जी का ‘मानवो’ के संबंध में कुछ ऐसा ही विचार था कि विभिन्न मानव के विचार या व्यवहार भिन्न-भिन्न होते हैं। लेकिन शिक्षा एक ऐसा हथियार है, जिसके माध्यम से मानव का चरित्र तथा व्यवहार दूसरों के प्रति समान हो जाता है। अर्थात् दूषित चरित्र और व्यवहार के मानव शिक्षा से जुड़कर शिक्षित हो जाते हैं तथा दूसरों के प्रति अच्छा आचरण व्यक्त करते हैं। टैगोर के अनुसार देखा जाय तो प्रकृति, मानव और शिक्षा तीनों ही देश के लिए उज्ज्वल भविष्य हैं।

टैगोर जी का मानना है कि शिक्षित मानव के अन्दर अच्छी आचरण, चरित्र और व्यवहार का आविर्भाव उसकी रुचि (Interest) से प्राप्त होता है। अर्थात् यदि मनुष्य में रुचि होगी तभी वह शिक्षित हो पायेगा और उसके अन्दर मानसिक, शरीरिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विकास हो पायेगा जो एक सामाजिक मनुष्य के लिए आवश्यक तत्व है।

उपर्युक्त विवरणों से हम पाते हैं कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मनुष्य के प्रति अपना भिन्न विचार व्यक्त किये हैं जिसका संबंध न केवल मनुष्य से है बल्कि शिक्षा एवं प्रकृति से भी है। अर्थात् देखा जाय तो मनुष्य एक ऐसा तत्व है जिसका संबंध प्रकृति एवं शिक्षा से है।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 4 संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण

Detailed explanations in West Bengal Board Class 10 History Book Solutions Chapter 4 संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण offer valuable context and analysis.

WBBSE Class 10 History Chapter 4 Question Answer – संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Very Short Answer Type) : 1 MARK

प्रश्न 1.
एन्टी सर्कुलर सोसाइटी की स्थापना किसने की ?
उत्तर :
एन्टी सर्कुलर सोसायटी की स्थापना सचीन्द्र प्रसाद बसु ने की।

प्रश्न 2.
किस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि में ‘भारतमाता’ का चित्र अंकित है ?
उत्तर :
बंग-भंग विरोधी आन्दोलन की पृष्ठभूमि में भारत माता का चित्र अंकित है।

प्रश्न 3.
1857 ई० के विद्रोह के समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री कौन था ?
उत्तर :
लार्ड पार्मस्टन।

प्रश्न 4.
महान विद्रोह का एक मात्र सर्मथन करने वाला अंग्रेज अधिकारी कौन था ?
उत्तर :
कैप्टन गाँर्डन।

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प्रश्न 5.
1857 ई० के विद्रोह को ‘सैनिक विद्रोह’ कहा है ?
उत्तर :
सर जॉन लॉरिन्स एवं ट्रैवेलियन ने।

प्रश्न 6.
‘द ग्रेट रिभोल्ट’ (महान विद्रोह) पुस्तक के लेखक कौन है ?
उत्तर :
अशोक मेहता।

प्रश्न 7.
भारत के किस वर्ग ने 1857 ई० के विद्रोह में साथ नहीं दिया था ?
उत्तर :
प्रबुद्ध मध्यम् वर्ग ने।

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह को सैनिको तक सूचना पहुँचाने का प्रतीक क्या था ?
उत्तर :
रोटी

प्रश्न 9.
1867 ई० में नवगोपाल मिश्र द्वारा गठित ‘हिन्दू मेला’ का आयोज़न किस महीने में होता था ?
उत्तर :
चैत्र महीने में।

प्रश्न 10.
किस पुस्तक को भारतीयों का ‘स्वदेश प्रेम का गीता’ कहा जाता है ?
उत्तर :
आन्नदमठ को।

प्रश्न 11.
किसने कहा कि, “गोरा मात्र एक उपन्यास् नहीं है, यह आधुनिक भारत का महाकाव्य है ?”
उत्तर :
‘कृष्णा कृषलानी’ ने।

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प्रश्न 12.
‘भारतमाता’ की तुलना किससे किया गया है ?
उत्तर :
भारतीय संस्कृति की सभी देवी-देवताओं से, विशेषकर देवी दुर्गा के रूप से।

प्रश्न 13.
‘गोरा’ उपन्यास में ‘गोरा’ का साहित्यिक अर्थ क्या है ?
उत्तर :
‘गोरा’ उपन्यास मे ‘गोरा’ का साहित्यिक अर्थ ‘गौर वर्ण का व्यक्ति’ है।

प्रश्न 14.
किस वर्ष अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘भारतमाता’ का चित्र बनाया ?
उत्तर :
सन् 1905 में।

प्रश्न 15.
‘लैण्ड होल्डर्स एसोसिएशन’ या ‘बंगाल जमींदार सभा’ की स्थापना कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
कलकत्ता में।

प्रश्न 16.
‘इण्डियन लीग’ के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर :
शिशिर कुमार घोष।

प्रश्न 17.
गगनेन्द्रनाथ टैगोर कौन थे ?
उत्तर :
एक उच्चकोटि के चित्रकार थे।

प्रश्न 18.
‘पील आयोग’ (Peal Commission) का गठन किस वर्ष हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1858 ई० में।

प्रश्न 19.
1857 ई० के विद्रोह के तुरन्त बाद इसे एक ‘राष्ट्रीय विद्रोह’ की संज्ञा किसने दी ?
उत्तर :
बेंजामिन डिजरायली ने।

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प्रश्न 20.
किसकी वीरता से प्रभावित होकर ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ह्यूरोज ने कहा- ‘भारतीय कान्तिकारियों में यह अकेली मर्द है’?
उत्तर :
रानी लक्ष्मीबाई के।

प्रश्न 21.
झाँसी में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था ?
उत्तर :
रानी लक्ष्मीबाई ने।

प्रश्न 22.
लखनऊ में 1857 ई० का विद्रोह कब आरंभ हुआ ?
उत्तर :
4 जून, 1857 ई० में।

प्रश्न 23.
महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र किसने पढ़ा था ?
उत्तर :
महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र लार्ड कैनिंग ने पढ़ा था।

प्रश्न 24.
बंगाल में राजनीतिक आन्दोलन को आरम्भ करने का श्रेय किसको है ?
उत्तर :
राजा राममोहन राय को।

प्रश्न 25.
‘बंगभाषा प्रकाशिका सभा’ की स्थापना किस वर्ष हुई ?
उत्तर :
सन् 1836 में।

प्रश्न 26.
‘बंगभाषा प्रकाशिका सभा’ की स्थापना कहाँ हुई थी ?
उत्तर :
कलकत्ता में।

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प्रश्न 27.
‘लैण्ड होल्डर्स एसोसिएशन’ या ‘बंगाल जमींदार सभा’ की स्थापना किस वर्ष हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1838 में।

प्रश्न 28.
‘हिन्दू मेला’ का गठन किस वर्ष हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1867 में।

प्रश्न 29.
‘गोरा’ उपन्यास की रचना कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1909 ई० में।

प्रश्न 30.
‘गोरा’ उपन्यास में ‘गोरा’ का साहित्यिक अर्थ क्या है ?
उत्तर :
‘गोरार’ उपन्यास में ‘गोरा’ का साहित्यिक अर्थ ‘गौर वर्ण का व्यक्ति’ है।

प्रश्न 31.
बरेली में 1857 ई० का विद्रोह किस वर्ष समाप्त हुआ?
उत्तर :
सन् 1858 ई० में।

प्रश्न 32.
फैजाबाद में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर :
मौलवी अहमद उल्ला ने।

प्रश्न 33.
फैजाबाद में 1857 ई० का विद्रोह का किस वर्ष दमन हुआ ?
उत्तर :
सन् 1858 में।

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प्रश्न 34.
फतेहपुर में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर :
अजीमुल्ला ने।

प्रश्न 35.
झाँसी में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर :
रानी लक्ष्मीबाई ने।

प्रश्न 36.
कानपुर में 1857 ई० का विद्रोह कब शुरू हुआ ?
उत्तर :
5 जून, 1857 ई० में।

प्रश्न 37.
लखनऊ में 1857 ई० का विद्रोह कब आरंभ हुआ ?
उत्तर :
4 जून, 1857 ई० में।

प्रश्न 38.
जगदीशपुर में 1857 ई० का विद्रोह कब शुरू हुआ ?
उत्तर :
अगस्त, 1857 ई० में।

प्रश्न 39.
1857 के विद्रोह के संदर्भ में किसने कहा कि – ‘ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय जनता की क्रान्ति’ ?
उत्तर :
कार्ल मार्क्स ने।

प्रश्न 40.
वह कौन-सा ब्रिटिश सेनापति था, जिसकी 1857 ई०के विद्रोह को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही ?
उत्तर :
कैम्पबल।

प्रश्न 41.
1857 ई०के क्रान्ति के स्थानीय विद्रोही नेताओं में सर्वप्रथम प्रसिद्ध कौन था ?
उत्तर :
सतारा के रंगा बापूजी गुप्त जी।

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प्रश्न 42.
बंगाल का प्रथम राजनीतिक संगठन का क्या नाम था ?
उत्तर :
बंगभाषा प्रकाशिका सभा।

प्रश्न 43.
‘वर्तमान भारत’ कब प्रकाशित हुआ ?
उत्तर :
सन् 1905 में। [नोट : इस समय ‘वर्तमान भारत’ एक पुस्तक के रूप में है।]

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Type) : 2 MARKS

प्रश्न 1.
जमींदार सभा एवं भारत सभा में दो अन्तर लिखिए।
उत्तर :
जमींदार सभा और भारत सभा में दो अन्तर निम्नलिखित है –
(i) जमींदार सभा की स्थापना 1838 ई० में द्वारकानाथ ठाकुर ने की थी। जबकि भारत सभा की स्थापना 1876 ई० में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने की थी।
(ii) जमींदार सभा का उद्देश्य जमींदारों के हितों की रक्षा करना था। जबकि भारत सभा का उद्देश्य समान्य व मध्यम वर्गीय जनता के अधिकारों के लिए अंग्रेजों से लड़ना था।

प्रश्न 2.
उन्नीसवीं शताब्दी में राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए ‘भारतमाता’ के चित्र की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
‘भारतमाता’ का चित्र : 19वीं शताब्दी में चित्रित इस चित्र ने भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का प्रचार-प्रसार किया। सन् 1905 में ‘अवनीन्द्रनाथ टैगोर जी ने ‘भारतमाता’ का एक चित्र बनाया जो विभिन्न नामों से भी जाना जाता है, जैसे’भारताम्बा’ (Bharatamba) और ‘बंगमाता’ (Bangmata) आदि। इस चित्र को देखते ही देशवासियों में देश के प्रति लड़ने मरने का साहस व उत्साह पैदा हो जाता था। इस प्रकार भारतमाता का चित्र देशवासियों में देशप्रेम की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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प्रश्न 3.
‘महारानी के घोषणापत्र’ (1858 ई०) का मूल उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
1858 ई० के महारानी विक्टोरिया के ‘घोषणा पत्र’ का मूल उद्देश्य भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कुव्यवस्था को समाप्त करना, और भारत के शासन को प्रत्यक्ष रूप में बिटिश शासन के अधीन लाना तथा नये शासन व्यवस्था के नीतिनियमों से भारतवासियों को परिचित करना और उसके साथ जोड़ना था।

प्रश्न 4.
कार्टून चित्र खींचने के क्या उद्देश्य हैं ?
उत्तर :
कार्टून चित्र (हास्य-व्यंग्य चित्र) चित्रकला की एक शाखा है जिसमें व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिवारिक समस्याओं ज्रुटियों, दोषों को भावपूर्ण तरीकें से व्यंग्य-कटाक्ष के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। इसका उद्देश्य गम्भीर से गम्भीर व बड़े विषय हो या बड़ा व्यक्ति ही क्यों न हो, उनसे जुड़ी बातों को सरल ढंग से कटाक्ष रूप में प्रस्तुत कर समाज के शेष, व विचार को प्रकट करना, तथा उनमें सुधार लाना है। जैसा कि गगनेन्द्रनाथ ठाकुर ने तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था तथा बंगाली समाज के बाबू लोगों की भाव-भंगिमाओं को दर्शाया करते थे।

प्रश्न 5.
हिन्दू मेला की स्थापना का दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर :
उद्देश्य : (i) हिन्दू मेला की स्थापना का मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं को एकत्रित कर उनमें राष्ट्रीयता की भावना को भरना था।
(ii) भारतीय राष्ट्रीय चेतना को अग्रसर करने तथा राष्ट्रीयता की विकास के लिए इसका गठन किया गया था।

प्रश्न 6.
‘भारत सभा’ की स्थापना के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर :
‘भारत सभा’ की स्थापना के दो उद्देश्य निम्नवत् है –
1. देश के लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना।
2. सभी वर्गो, जातियों तथा धर्मों के लोगों में एकता का भाव स्थापित करना था।

प्रश्न 7.
‘आनन्द मठ’ उपन्यास ने किस प्रकार से राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया ?
उत्तर :
प्रेम तथा देश के आजादी के दिवानों द्वारा गाया जाने वाला ‘बन्दे मातरम’ गीत ने देश के नवयवका मातृभूमि के प्रति अट्टूट का संचार किया और वे देश की आजादी के लिए लड़ने-मरने को तैयार होने लगे।

प्रश्न 8.
आनंद मठ किसकी रचना है ? इसका मूल विषय क्या है ?
उत्तर :
आन्नद मठ की रचना ॠषि बंकिम चन्द्र चटर्जी ने की थी। इसका मूल विषय संयासी विद्रोह के द्वारा राष्ट्रीयता की भावना का संचार करना है।

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प्रश्न 9.
1857 ई० के महान विद्रोह का नेतृत्व प्रदान करने वाले दो नेताओं का नाम लिखिए।
उत्तर :
1857 ई० के महान विद्रोह का नेतृत्व प्रदान करने वाले दो नेता नाना साहेब एवं वीर कुँवर सिंह थे।

प्रश्न 10.
हिन्दू मेला की स्थापना किसने और किस उद्देश्य से की थी ?
उत्तर :
हिन्दू मेला की स्थापना 1867 ई० में नव गोपाल मित्र ने की थी। इसकी स्थापना का उद्देश्य भारतीयों का एकता के सूत्र में बाँधना तथा उनमें राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करना था।

प्रश्न 11.
बंगाल का नवजागरण यूरोपीय नवजागरण से किस प्रकार भिन्न था ?
उत्तर :
बंगाल का नवजागरण 16 वीं शताब्दी में केवल शिक्षा समाचार पत्र एवं संगीत तक सीमित था जबकि यूरोप में 14 वी सदी में पुनर्जागरण हुआ तथा उद्योग कला, साहित्य, उद्योग, कृषि व्यापार, यातायात एवं सभी क्षेत्रों में हुआ था। इस प्रकार बंगाल से यूरोप का नवजागरण भिन्न था।

प्रश्न 12.
जमींदार सभा की स्थापना कब और क्यों किया गया था ?
उत्तर :
राजनीतिक सुधारों के लिए राजा राममोहन राय ने जिस आन्दोलन का सूत्रपात किया उसे जारी रखने के लिए बंगाल के जमीदारों ने एक संगठन की बात सोची और उसी के आधार पर द्वारकानाथ टैगोर के प्रयासों के फलस्वरूप 1838 ई० में जमींदार सभा का गठन हुआ।

प्रश्न 13.
शिक्षा के विस्तार में मुद्रित पुस्तकों ने किस प्रकार मुख्य भूमिका पालन की ?
उत्तर :
शिक्षा के विकास एवं प्रसार में प्रेसों तथा मुद्रित पुस्तकों की भूमिका : राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रत्येक पहलू के विषय में वाहे वह शिक्षा हो या सास्कृतिक, आर्थिक हो या सामाजिक, अथवा राजनैतिक, प्रेस तथा उससे मुद्रित पुस्तकों की भूमिका उल्लेखनीय रही है। प्रेस के ही माध्यम से विभिन्न राजनैतिक नेताओं ने अपने विचारों को आम जनता तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की। जनता में जागृति पैदा करने के उद्देश्य से मुद्रणालय और मुद्रित पुस्तकों का सहारा लिया गया।

प्रश्न 14.
1857 ई० के महाविद्रोह के दो विशेषताओं का उल्लेख करो।
उत्तर :
विशेषताएँ : (i) 1857 ई० का महाविद्रोह भारतवासियों के भीतर देश-प्रेम एवं राष्ट्रीय प्रेम की भावना को जागृत किया था।
(ii) इस विद्रोह के नेताओं में राष्ट्रीय चरित्र की भावना कूट-कूट कर भरी थी जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में दिखाई दिया।

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प्रश्न 15.
गगनेन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा चित्रित कुछ कार्टून (हास्याप्रद चित्रों) के नाम बताइए।
उत्तर :
गगनेन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा चित्रित कुछ कार्टून हैं — अद्भुत लोक, नव हुलोड़, बिरूप बाजरा, भोडोर बहादुर, अलिक बाबू, द फाल्स बाबू।

प्रश्न 16.
गगनेन्द्रनाथ टैगोर की दो कार्टुन चित्रों का वर्णन करो।
उत्तर :
गगनेन्द्रनाथ टैगोर एक महान चित्रकार एवं कार्दुनिस्ट थे। सन् 1917 में ‘बाजरा’ एवं ‘अन्दुत लोक’ तथा सन् 1921 में ‘नव हुलोड़े’ आदि इनके कार्दुन चित्र थे जिसमें औपनिवेशिक समाज का व्यंग्यपूर्ण चित्रण को दर्शाती थी। इनके चित्रों में जाति प्रथा, पाखण्ड, हिन्दू पूजारी तथा पथ्थिमी शिक्षा का घोर विरोध भी छिपा रहता था।

प्रश्न 17.
महाराणी की उद्योषणा से तुम क्या समझते हो ?
उत्तर :
महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र 1 नवम्बर, 1858 ई० को इलाहाबाद के मिण्टो पार्क में लार्ड कैनिंग के द्वारा घोषित किया गया जिसमें अनेकों बात कही गयी।
(a) राज्य हड़प की नीति (Doctrine of Lapse) को समाप्त किया गया।
(b) देशी राजाओं और राजकुमारों को अपनी इच्छानुसार अपना उत्तराधिकारी चुनने की छूट दी गयी।
(c) जाति, धर्म तथा रंग का भेदभाव किये बिना सरकारी सेवा में नियुक्ति किया जाये इत्यादि।

प्रश्न 18.
1857 ई० के महाविद्रोह को जन आंदोलन क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
1857 ई० के महाविद्रोह को जन आंदोलन इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस विद्रोह में अधिकांशतः भारतीयों ने भाग लिया था, जिनमें निम्न वर्ग, मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के साथ-साथ कई क्षेत्रो के जमीन्दार और ठेकेदार भी शामिल थे। इस विद्रोह ने लोगों में अपनी मातृभूमि के प्रति भक्ति की भावना भर दिया था। इन्हीं विशेषताओ के कारण इस जन विद्रोह कहा जाता है।

प्रश्न 19.
बंग भाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना कब और क्यों किया गया ?
उत्तर :
बंग भाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना राजा राममोहन राय के अनुयायियों (Followers) ने किया जिनमे गौरीशंकर तर्कबागीस एवं द्वारकानाथ ठाकुर (टैगोर) आदि प्रमुख थे। इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य सरकार के नीतियों की समीक्षा कर उनकी गलतियों को सुधारना था। अत: लोगों में राश्ट्रीयता एवं देश-प्रेम की भावना का प्रचार-प्रसार व जागृति लाने के लिए इस सभा की स्थापना की गई।

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प्रश्न 20.
भारत सभा का गठन कब और किसके द्वारा किया गया था ?
उत्तर :
भारत सभा की स्थापना सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा आनन्द मोहन बोस ने सन् 1876 में अल्बर्ट हॉल (Elbert Hall), कलकत्ता में किये। ‘भारत सभा’ के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी माने जाते थे, जबकि आनन्द मोहन बोस इसके सचिव माने जाते थे। बाद में इसके अध्यक्ष कलकत्ता के प्रमुख बैरिस्टर मनमोहन घोष चुने गए। इस संस्था के अन्य संस्थापकों में शिवनाथ शास्ती तथा द्वारकानाथ गंगोपाध्याय भी थे।

प्रश्न 21.
कब और किसके द्वारा हिन्दू मेला नामक संगठन की स्थापना की गई ? इसे चैत मेला क्यों कहा जाता था ?
उत्तर :
हिन्दू मेला : हिन्दू मेला की स्थापना महान राष्ट्रेमी राज नारायण बोस के प्रमुख शिष्य नव गोपाल मित्र द्वारा सन्र 867 में किया गया। यह मेला प्रत्येक वर्ष के चैत्र महीने में होता था इसीलिए इस मेला को ‘चैत्र मेला’ के नाम से भी जाना जाता था।

प्रश्न 22.
दुर्गादास बनर्जी ने 1857 के विद्रोह का कैसा वर्णन किया है ?
उत्तर :
दुर्गादास बनर्जी जो क्रान्ति के समय वारणसी में सैन्य अधिकारी थे, ने लिखा है कि, “विद्रोही सिपाहियों में अनुशासन का अभाव था। वे दुकानदार, धनिको यहाँ तक कि साधारण जनता को भी लूटते थे। हिन्दूओं को गाय का मांस और मुसलमानों को सुअर का मांस दिखाकर उनसे छिपाये गये धन का पता लगाते थे । वोरी, लूट, बलात्कार आम जीवन की घटना थी। हिन्दू-मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक तनाव अपने चरम पर था।”

प्रश्न 23.
किशोरीचन्द्र मित्र ने 1857 के विद्रोह का कैसा वर्णन किया है ?
उत्तर :
प्रसिद्ध बंगाली विद्वान किशोरीचन्द्र मित्र ने 1857 के विद्रोह के सम्बन्ध में लिखा है कि, ‘ यह मूल रूप में एक सैनिक विद्रोह था जिसमें आम जनता ने भाग नहीं लिया और सैनिकों की भागीदारी भी कम ही थी। विद्रोह में भाग लेने वालों की संख्या, अंग्रेजी सरकार के प्रति सहानुभूति रखने वालों की तुलना में नगण्य थी।”

प्रश्न 24.
1857 ई० की क्रान्ति का तत्कालीन कारण क्या था ?
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति का तत्कालीन कारण गाय और सूअर की चर्बी से बने कारतूस को भारतीय सैनिकों द्वारा चलाने से इन्कार करना तथा अंग्रेज अधिकारी ह्यूडसन द्वारा बार-बार दबाव दिये जाने पर बैरकपूर छावनी के एक सिपाही मंगल पाण्डे द्वारा गोली मार देने से उग्रतम घटना थी।

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प्रश्न 25.
1857 ई० की क्रान्ति में मध्यमवर्ग भाग क्यों नहीं लिया था ?
उत्तर :
1857 ई० के महान विद्रोह में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त उनके रंग में रंगे शिक्षित मध्यमवर्ग ने विशेषकर बंगाली मध्यम वर्ग ने भाग नहीं लिया था, क्योंकि उन्हें अंग्रेजों की नौकरी तथा अन्य सुख सुविधा छीन लिये जाने का भय था, तथा वे अंग्रेजों को आधुनिक भारत का निर्माणकर्ता और न्यायकर्ता मानते थे। इसी स्वार्थ और दकियानूसी (संकीर्ण) सोच के कारण मध्यम वर्ग ने विद्रोह में भाग नहीं लिया था।

प्रश्न 26.
19 वीं शताब्दी के उन महान रचनाओं में से किन्हीं चार का नाम लिखिए जो देशवासियों में राष्ट्रीय भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ?
उत्तर :
नील-दर्पण, आनन्द मठ, जीवनेर झाड़ापाता, वर्तमान भारत, गोरा आदि साहित्य रचनाओं ने देशवासियों में राष्ट्रभावन्म को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 27.
अवनीन्द्र नाथ टैगोर कौन थे ? वे भारतीय इतिहास में क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
अवनीन्द्र नाथ टैगोर एक प्रसिद्ध लेखक, कलाकार और चित्रकार थें। वे भारत-माता, बुद्ध और सुजाता जैसी राष्ट्रीयता के प्रतीक वाले चित्र को बनाये जाने के कारण भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 28.
विद्युत साहिनी सभा की स्थापना किसने और किस उद्देश्य से की थी ?
उत्तर :
विद्युत साहिनी सभा की स्थापना बंगला भाषा के प्रसिद्ध उपन्यासकार काली प्रसन्न सिन्हा ने 14 वर्ष की उम्र में कलकत्ता में की थी।
इसकी स्थापना का उद्देश्य बंगाल में शिक्षा, साहित्य, नाटक, व्यंग्य आदि विधाओं के विकास के लिये किया गया था।

प्रश्न 29.
गगनेन्द्र नाथा टैगोर कौन थे ? वे क्यों भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
गगनेन्द्र नाथ टैगोर बंगला साहित्य के एक प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य चित्रकार (Cartoonist) थे। वे बंगाल के मध्यम बाबू वर्ग के हास्य व्यंग्य चित्र द्वारा उनका उपहास उड़ाये जाने के कारण भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 30.
1857 ई० के विद्रोह की उन दो महिलाओं के नाम लिखिए जिन्होंने क्रान्तिकारियों से गद्दारी करके अंग्रेजों का साथ दिया ?
उत्तर :
राविया बेगम, बेजा बाई, जीनतमहल ने क्रान्तिकारियों से गद्दारी करके अंग्रजों का साथ दिया था।

प्रश्न 31.
किस उपन्यास को स्वदेश प्रेम का गीता कहा जाता है ? क्यो ?
उत्तर :
ॠषि बकिमचन्द्र द्वारा रचित उपन्यास ‘आनन्दमठ’ को ‘स्वदेश प्रेम का गीता’ कहा जाता है, क्योंकि इस पुस्तक ने देशवासियों को देश-प्रेम एवं राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया। जिसके कारण देशवासियों में राष्ट्रीयता का ज्वार उत्पन्न हुआ। इसीलिए आनन्दमठ को स्वदेश प्रेम का गीता कहा जाता है।

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प्रश्न 32.
लार्ड डलहौसी की राज्य हड़प नीति द्वारा हड़पे गये चार देशी राज्यों का नाम बताइए।
उत्तर :
सताड़ा, जैतपुर, संभलपूर, झाँसी थें। इनमें सताड़ा पहला देशी राज्य था, जिसे अंग्रेजो ने हड़प कर अपने राज्य में मिला लिया था।

प्रश्न 33.
1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था ? और उसकी मृत्यु कैसे हुई ?
उत्तर :
1857 ई० के विद्रोह का राष्ट्रीय नेतृत्व बहादुर शाह जफर (II) ने किया था।
अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर (II) को गिरफ्तार कर वर्मा के माण्डले जेल भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई। इस प्रकार एक बादशाह का दुखद अन्त हुआ।

प्रश्न 34.
भारत का अन्तिम गवर्नर जनरल और प्रथम वायसराय कौन था ?
उत्तर :
भारत का अन्तिम गवर्नर जनरल और प्रथम वायसराय लार्ड कैनिंग था।

प्रश्न 35.
तात्या टोपे कौन था ? उसका वास्तविक नाम क्या था ?
उत्तर :
गुल्लि युद्ध प्रणाली में दक्ष तात्या टोपे नानासाहब का सेनापति था। इसका वास्तविक नाम राम चन्द्र पाण्डूरंग था।

प्रश्न 36.
1857 ई० की कान्ति में मर्द का रूप ग्रहण कर क्रान्ति मे भाग लेने वाली महिला का नाम लिखो।
उत्तर :
झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई और अजीजन बाई।

प्रश्न 37.
भारत में सिपाही विद्रोह सबसे पहले कब और कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
भारत में सिपाही विद्रोह 10 मई 1857 ई० को मेरठ में हुआ था। जिसमें 85 घुड़सवार सैनिकों ने विद्रोह किया था।

प्रश्न 38.
रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित दो उपन्यासों का नाम लिखिए।
उत्तर :
गोरा, घोरे बाइरे, चार अध्याय इत्यादि।

प्रश्न 39.
‘आनन्दमठ’ उपन्यास के प्रमुख दो प्रमुख पात्रों के नाम लिखो।
उत्तर :
‘आनन्दमठ’ उपन्यास के प्रमुख दो पात्रों का नाम ‘महेन्द्र’ और ‘कल्याणी’ है।

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प्रश्न 40.
कब और किसने ‘वर्तमान भारत’ को ‘रामकृष्ण मठ’ और ‘रामकृष्ण मिशन’ के मुख्य पत्र के रूप में प्रकाशित किया था ?
उत्तर :
सन् 1899 में ‘उद्बोधन’ प्रकाशन ने ‘वर्तमान भारत’ को ‘रामकृष्ण मठ’ और ‘रामकृष्ष्ण मिशन’ के मुख्य पत्र के रूप में प्रकाशित किया था। [नोट : इस समय ‘वर्तमान भारत’ एक निबन्ध के रूप में है।]

प्रश्न 41.
‘गोरा’ उपन्यास को कब और किस पत्रिका के माध्यम से क्रमबद्ध रूप दिया गया ?
उत्तर :
‘गोरा’ उपन्यास को 1907 ई० से 1909 ई० के बीच ‘प्रवासी’ (Prabasi) पत्रिका के माध्यम से क्रमबद्ध रूप दिया गया।

प्रश्न 42.
व्यंग्य-चित्र से क्या समझते हो ?
उत्तर :
कला मे रूप में व्यग्य-चित्र एक दृश्य कल्पना है जिसका उद्देश्य वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक जीवन को दर्शाना है । मुख्यतः इस कला के दो उद्देश्य होते हैं – प्रथम पूर्ण मनोरंजन और द्वितीय आलोचना करना। साधारणतः मनोरंजन और व्यग्य-चित्रों के दो मुख्य अंग हैं।

प्रश्न 43.
गगनेन्द्रनाथ के प्रमुख व्यंग्य चित्रों के नाम लिखो।
उत्तर :
गगनेन्द्रनाथ टैगोर के व्यंग्य-चित्रों में एमोन कर्म आर कोरबो ना, विरुप बंजारा, आलिक बाबू, My love of my country as Big as I am, आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 44.
गगनेन्द्रनाथ टैगोर के व्यंग्यात्मक चित्रों से क्या जानकारी मिलती है ?
उत्तर :
गगनेन्द्रनाथ टैगोर के व्यंग्यात्मक चित्रों से औपनिवेशिक राजनीति, आमलोगों की जीवन शैली और समाज के उच्च वर्गों के रीति-रिवाजों की जानकारी मिलती है।

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प्रश्न 45.
‘इल्बर्ट बिल विवाद’ कब और किसने पेश किया ?
उत्तर :
सन् 1883 में मिस्टर पी० सी० इल्बर्ट ने पेश किया।

प्रश्न 46.
‘भारत सभा’ द्वारा किये गये दो महत्वपूर्ण कार्य क्या थे ?
उत्तर :
दो महत्वपूर्ण कार्य : (1) सिविल सर्विस परीक्षा विरोधी आन्दोलन और (2) इल्बर्ट बिल का विरोध आन्दोलन आदि

प्रश्न 47.
‘इण्डियन एसोसिएशन’ की स्थापना कहाँ और किसने किया ?
उत्तर :
कलकत्ता में आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने किया।

प्रश्न 48.
‘आनन्दमठ’ उपन्यास की विषय-वस्तु क्या थी ?
उत्तर :
‘आनन्दमठ’ उपन्यास में 1770 ई० में आरम्भ हुए बंगाल के भीषण आकाल एवं सन्यासी विद्रोह का वर्णन है।

प्रश्न 49.
भारत सभा की स्थापना के दो उद्देश्यों का उल्लेख करो।
उत्तर :
दो उद्देश्य : (1) सम्पूर्ण देश में लोकमत का निर्माण और (2) हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एकता और मैत्री की स्थापना आदि।

प्रश्न 50.
भारतमाता का चित्र किसने और कब बनाया ?
उत्तर :
अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा 1905 ई० में भारतमाता का चित्र बनाया गया। इस चित्र को बंग-भंग के विरोधी आन्दोलनकारियों द्वारा काफी पसन्द किया गया।

प्रश्न 51.
1857 ई० के विद्रोह को सैनिक विद्रोह बतलाने वाले दो इतिहासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर :
(i) ट्रेविलियन (ii) मुइनुद्दीन।

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प्रश्न 52.
1857 ई० के विद्रोह के समय मुगल बादशाह कौन थे एवं अंग्रेजों ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया था ?
उत्तर :
1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का मुगल बादशाह बहादुरशाह जफ्फर (द्वितीय) था।अंग्रेजो ने उनकी पेशन बन्द कर दी। सिक्को पर से उनका नाम हटवा दिया था । इस प्रकार अंग्रेजों ने उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया था।

प्रश्न 53.
1857 ई० के विद्रोह को स्वतंत्रता आंदोलन बतलाने वाले दो इतिहासकारों के नाम लिखिए।
उत्तर :
(i) जे० सी० विल्सन (ii) केथी।

प्रश्न 54.
‘बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी’ की स्थापना किसने और कहाँ किया ?
उत्तर :
जॉर्ज थॉमसन ने कलकत्ता में किया।

प्रश्न 55.
‘ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन’ की स्थापना किसने और कहाँ किया ?
उत्तर :
राजा राधाकान्त देव ने कलकत्ता में किये।

प्रश्न 56.
‘ईस्ट इण्डिया एसोसिएशन’ की स्थापना किसने और किस वर्ष किया ?
उत्तर :
दादाभाई नौरोजी ने सन् 1866 में किया।

प्रश्न 57.
‘पूना सार्वजनिक सभा’ की स्थापना किसने और कहाँ किया ?
उत्तर :
महादेव गोविन्द रानाडे ने पूना में किया।

प्रश्न 58.
‘इण्डियन लीग’ का गठन कब और कहाँ हुआ?
उत्तर :
सन् 1875 में कलकत्ता में।

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प्रश्न 59.
‘कलकत्ता स्टुडेण्ट्स एसोसिएशन’ का गठन कब और किसने किया ?
उत्तर :
सन् 1875 में आनन्द मोहन बोस ने किया।

प्रश्न 60.
‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना किसने और कहाँ किया ?
उत्तर :
ए० ओ० ह्यूम ने बम्बई में किया।

प्रश्न 61.
‘बम्बई प्रेसीडेंसी ऐसोसिएशन’ की स्थापना किसने और कहाँ किये ?
उत्तर :
फिरोजशाह मेहता और बदरुद्दीन तैय्यब जी ने बम्बई में किये।

प्रश्न 62.
‘इण्डियन सोसाइटी’ का गठन कब और किसने किया ?
उत्तर :
सन् 1872 में आनन्द मोहन बोस ने किया।

प्रश्न 63.
‘बॉम्बे ऐसोसिएशन’ का गठन किसने और कहाँ किया ?
उत्तर :
जगत्नाथ शंकर ने बम्बई में किया।

प्रश्न 64.
‘मद्रास महाजन सभा’ की स्थापना कब और किसने किया ?
उत्तर :
सन् 1884 में वी० राघवाचारी एवं एस० अय्यर ने किया।

प्रश्न 65.
‘भारतीय राष्ट्रीय कॉन्क्रेंस’ का गठन कब और किसने किया ?
उत्तर :
सन् 1883 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने किया।

प्रश्न 66.
‘नेशनल इण्डिया एसोसिएशन’ का गठन किसने और कहाँ किया ?
उत्तर :
मेरी कारपेंटर ने लंदन में किया।

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प्रश्न 67.
दिल्ली में 1857 ई० के विद्रोह को किसने और कब दबाया ?
उत्तर :
निकलसन एवं हडसन ने 21 सितम्बर, 1857 ई० में दबाया।

प्रश्न 68.
कानपुर में 1857 ई० के विद्रोह को कब और किसने समाप्त किया ?
उत्तर :
6 दिसम्बर, 1857 ई० में कैम्पबल ने समाप्त किया।

प्रश्न 69.
लखनऊ में 1857 ई० के विद्रोह को कब और किसने दमन किया ?
उत्तर :
21 मार्च, 1858 ई० में कैम्पबल ने दमन किया।

प्रश्न 70.
झाँसी में 1857 ई० के विद्रोह को किस ब्रिटिश नायक ने कब समाप्त किया ?
उत्तर :
बिटिश नायक ह्यूरोज ने 3 अप्रैल, 1858 ई० में समाप्त किया।

प्रश्न 71.
इलाहाबाद में 1857 ई० के विद्रोह को किस ब्रिटिश नायक ने कब समाप्त किया ?
उत्तर :
ब्रिटिश नायक कर्नल नील ने सन् 1858 में समाप्त किया।

प्रश्न 72.
जगदीशपुर में 1857 ई० के विद्रोह को किस ब्रिटिश नायक ने कब समाप्त किया ?
उत्तर :
बिटिश नायक विलियम टेलर एवं विंसेट आयर ने सन् 1858 में समाप्त किया।

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प्रश्न 73.
फतेहपुर में 1857 ई० के विद्रोह को किस ब्रिटिश नायक ने कब दमन किया ?
उत्तर :
बिटिश नायक जनरल रेनर्ड ने सन् 1858 में दमन किया।

प्रश्न 74.
‘नेशनल जिमनासियम’ (National Gymnasium) का गठन कब और किसने किया ?
उत्तर :
‘नेशनल जिमनासियम’ (National Gymnasium) का गठन सन् 1868 में नव गोपाल मित्र ने किया।
[नोट : यह एक जिमनास्टिक स्कूल था।]

प्रश्न 75.
‘नेशनल जिमनासियम’ के प्रमुख सदस्य या छात्र कौन-कौन थे ?
उत्तर :
‘नेशनल जिमनासियम’ के प्रमुख सदस्य या छात्र विपिनचन्द्र पाल, सुन्दरी मोहन दास, राजचन्द्र चौधरी एवं स्वामी विवंकानन्द थे।

प्रश्न 76.
‘आनन्दमठ’ उपन्यास का प्रकाशन कब और किस भाषा में हुआ था ?
उत्तर :
‘आनन्दमठ’ उपन्यास का प्रकाशन सन् 1882 में बंगला भाषा में हुआ था।

प्रश्न 77.
‘आनन्दमठ’ उपन्यास के पृष्ठभूमि की शुरूआत कब और किसके संदर्भ में हुआ था ?
उत्तर :
‘आनन्दमठ’ उपन्यास के पृष्ठभूमि की शुरूआत सन् 1771 में बंगाल के अकाल के संदर्भ में हुआ था।

संक्षिप्त प्रश्नोत्तर (Brief Answer Type) : 4 MARKS

प्रश्न 1.
‘बंगभाषा प्रकाशिका सभा’ को प्रथम राजनैतिक संस्थान कहा जाता है, क्यों ?
उत्तर :
बंगभाषा प्रकाशिका सभा : ‘बंगभाषा प्रकाशिका सभा’ भारत का प्रथम राजनैतिक संगठन थी। इस संगठन की स्थापना सन् 1836 में हुआ था। इसकी स्थापना राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों (Followers) ने किया जिनमें गौरीशंकर तर्कबागीस एवं द्वारकानाथ ठाकुर (टैगोर) आदि प्रमुख थे। इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य सरकार की नीतियों की समीक्षा कर उनकी गलतियों को सुधारना था। यद्यपि इसे बंगाल में कोई संवैधानिक महत्व नहीं मिला फिर भी इस संस्था ने बंगालियों को संगठित कर उन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ क्रान्ति करने के लिए प्रेरित करती थी। इस संस्था ने लोगों में राष्ट्रीयता एवं देश-प्रेम की भावना का प्रचार-प्रसार किया। इसीलिए इस संस्था की भूमिका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस कारण इसे भारत का प्रथम राजनैतिक संस्थान कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
हिन्दू मेला की स्थापना का उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
हिन्दू मेला (Hindu Mela) : भारतीय राष्ट्रीय चेतना को अग्रसर करने तथा राष्ट्रीयता की विकास के लिए इस संस्था का गठन किया गया था। यह एक संस्था नहीं था बल्कि एक मेला था, जो चैत्र महीने में होता था। इसके आयोजन का मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं को एकत्रित कर उनमें राष्ट्रीयता की भावना को भरना था। ‘हिन्दू मेला’ की स्थापना महान राष्ट्रेमी ‘राज नारायण बोस’ के प्रमुख शिष्य ‘नव गोपाल मित्र’ ने सन् 1867 में किया। यह मेला प्रत्येक वर्ष के चैत्र महीने में होता था, इसीलिए इस मेला को ‘चैत्र मेला’ के नाम से भी जाना जाता था। चूँकि यह मेला राष्ट्रीय स्तर पर होता था, इसीलिए इस मेला को ‘राष्ट्रीय मेला’ के नाम से भी जाना जाता था।

प्रश्न 3.
1857 ई० के महाविद्रोह को क्या सामन्त श्रेणी विद्रोह कहा जा सकता है ?
उत्तर :
1857 ई० के महान विद्रोह की प्रकृति के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न इतिहासकारों ने अपने अलग-अलग मत प्रकट किये हैं, उनमें से कुछ इतिहासकारों ने इस महान विद्रोह को सामन्ती श्रेणी का विद्रोह कहा है –
(i) डॉ॰ सुरेन्द्रनाथ सेन ने अपनी पुस्तक 1857 (Eighteen fifty seven) डॉ॰० शशि भूषण चौधरी ने अपनी पुस्तक ‘सिविल रिबेलियन इन द इण्डियन मिनटस 1857-59 ई० में तथा जवाहरलाल नेहरू ने इसे सामन्तशाही विद्रोह कहा है।
(ii) इन इतिहासकारों का मत है कि अंग्रेजों ने ही सामन्तों नवाबों तथा जमीन्दारों से सत्ता छिनी थी। इस कारण यह वर्ग उनसे क्रुद्ध था।
(iii) अंग्रेजों की पश्चिमी संस्कृति के प्रसार तथा अत्याचार से यह वर्ग नाखुश था।
(iv) इस विद्रोह का नेतृत्व बहादुर शाह द्वितीय ने किया तथा इसका साथ नाना साहब, लक्ष्मीबाई हजरत महल, कुंवर सिंह एवं अन्य सामन्तों एवं जमीदारों ने दिया ताकि अंग्रेजों को हराकर पुरातन सामन्ती व्यवस्था स्थापित किया जा सके। इसलिए उमेश चन्द्र मजूमदार ने कहा है – यह विद्रोह मृतप्राय सामन्तो का मृत्युकालीन आर्तनाद था।

इस प्रकार मार्क्सवादी लेखक महान विद्रोह को सामन्तशाही विद्रोह मानते हैं वे कहते हैं कि यह विद्रोह सैनिकों ने शुरू किया था जबकि अन्त में दिल्ली के सिहांसन पर मुस्लिम बादशाह को पुन: बैठा दिया। वास्तव यह विद्रोह न सामन्ती था, न ही सैनिक था विशुद्ध रूप से इसका स्वरूप राष्ट्रीय था। इसमें जनता ने ब्रिटिश शासन का अन्त कर अपना शासन स्थापित करने के उद्देश्य से एकजुट होकर प्रयास किया था। अतः महान विद्रोह की प्रकृति एकदम स्वतन्त्रता संग्राम तथा राष्ट्रीय विद्रोह जैसा था।

प्रश्न 4.
उपनिवेशिक सरकार ने किस उद्देश्य से जंगल कानून लागू किया ?
उत्तर :
भारत में सर्वप्रथम अंग्रेज सरकार द्वारा 1865 ई० तथा 1875 ई० में क्रमश: दो वन कानून पास किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे –

  1. बिटिश राजकीय नौसेना के प्रसार तथा भारतीय रेल पथ के विस्तार के लिए लकड़ियों के स्लिाप बिछाने की आवश्यकता थी। इसलिए सरकार की लोलुप नजर भारतीय वन सम्पदा पर थी।
  2. भारत के विस्तृत वन भूमि का सफाया कर उसे कृषि भूमि में बदलना तथा आदिवासियों की झुम कृषि को रोक कर उसे स्थायी कृषि में परिवर्तित कर भूरा द्वारा अधिक लाभ अर्जित करना था।
  3. वन क्षेत्र एवं वनसम्पदा का अधिग्रहण कर उसका व्यापारिक लाभ अर्जित करना था।
  4. ब्रिटिश सरकार भारत के वन क्षेत्रों को तीन श्रेणियों सुरक्षित वन संरक्षित वन एवं ग्रामीण वन या असुरक्षित वन में विभाजित कर उपनिवेशिक स्वार्थ एवं लाभ कमाने हेतु वन अधिनियम लागू किया था।

इस प्रकार उपनिवेशिक अंग्रेज सरकार का वन कानून बनाने व लागू करने का मुख्य उद्देश्य उपनिवेशिक स्वार्थ की पूर्ति तथा वन क्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करना था। इसको लेकर आदिवासियों की कई जातियों एवं उपजातियों ने विद्रोह किया था।

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प्रश्न 5.
1857 ई. के महाविद्रोह के प्रति शिक्षित बंगाली समाज की धारणा क्या थी ?
उत्तर :
महान विद्रोह के प्रति शिक्षित बंगाली समाज की धारणा : अंग्रेजों को माई-बाप मानने वाला शिक्षित बंगाली समाज की 1857 ई० के महान विद्रोह के प्रति यही धारणा थी कि यदि विद्रोहियों का साथ दिया तो अंग्रेजों की चाटुकारित से मिलने वाली सुख -सुविधा के साधन, अर्थात जमीनदारी, बाबुगिरि नौकरी छिन ली जायेगी। जिससे जीवनजीना कठिन हो जायेगा। कुछ भद्र बंगाली बाबुओं को भय था कि अंग्रेज चले जायेगे तो भारत में पश्चिमी सभ्यता संस्कृति, तथा आधुनिकीकरण के विकास की क्रिया रूक जायेगी।

भारत पुन: अन्धकार के गर्त में डूब जायेगा और चारो तरफ अराजकता की स्थिति फैल जायेगी। इसी भय की वजह से शिक्षित मध्यमवर्गीय बंगाली समाज ने क्रान्तिकारियों का साथ न देकर विद्रोह को कुचलने में अंग्रेज महाम्रभुओं का साथ दिया था। इस प्रकार विद्रोह के प्रति उनकी धारणा राष्ट्रहित के विरुद्ध निजी स्वार्थ से परिपूर्ण उदासीनता की, थी।

प्रश्न 6.
रानी की घोषणा पत्र – 1858 ई० का ऐतिहासिक महत्व क्या था ?
उत्तर :
सन् 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि इसी विद्रोह के परिणामस्वरूप भारतीय प्रशासनिक मामलों में कई प्रकार के परिवर्तन किये गये और इन परिवर्तनों के आधार पर ही महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र भी था। गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया ऐक्ट, 1858 ई० द्वारा किये गये परिवर्तनों की विधिवत घोषणा 1 नवम्बर, 1858 ई० को इलाहाबाद के मिण्टो पार्क में लार्ड कैनिंग के द्वारा किया गया। इस घोषणा पत्र में विभिन्न बाते कही गयी जिनमें –

भारतीय शासन की बागडोर ईस्ट इण्डिया कंपनी से निकलकर इंग्लैण्ड की सरकार के हाथों में चली गयी, जिसके तहत घोषणापत्र में वायसराय उपाधि का प्रयोग प्रथम बार हुआ। गवर्नर जनरल का पद भारत सरकार के विधायी कार्य का प्रतीक था तथा समाट का प्रतिनिधित्व करने के कारण उसे वायसराय कहा गया, अर्थात् भारत के गवर्नर जनरल अब वायसराय बन गए।

विक्टोरिया की घोषणापत्र में कुछ महत्वपूर्ण नीतियों को स्पष्ट किया गया था। इसका प्रथम भाग राजाओं से संबंधित था। इसमे उनके क्षोभ को शान्त करने के उद्देश्य से अंग्रेजी राज्य की अपहरण नीति या राज्य हड़प नीति के त्याग को बात कही गई।

भारतीय जनता के लिए धार्मिक सहनशीलता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया। घोषणा में भारतवासियों पर ईसाई धर्म थोपने की इच्छा एवं अधिकारी का स्वत्व भी त्याग दिया गया।

घोषणापत्र में कहा गया कि शिक्षा, योग्यता एवं ईमानदारी के आधार पर बिना जाति या वंश का ध्यान रखे लोक सेवाओं में जनता की भर्ती की जाय।

भारतीय परम्परागत अधिकारों, रीतिरिवाजों तथा प्रथाओं के सम्मान का उल्लेख किया गया। भारतीय नागरिकों को उसी कर्त्तव्य एवं सम्मान का आभासन दिया गया जो सम्राट के अन्य नागरिकों को प्राप्त थे।

भारत में आन्तरिक शान्ति स्थापित होने के बाद उद्योगों की स्थापना में वृद्धि, लोक-कल्याणकारी योजना, सार्वज़निक कार्य तथा प्रशासन व्यवस्था का संचालन समस्त भारतीय जनता के हित में किये जाने की बात कही गई।

भारतीय सैनिको की संख्या और यूरोपीय सैनिकों की संख्या का अनुपात विद्रोह के पूर्व5: 1 था जिसे घटाकर 2: 1 कर दिया गया। विद्रोह के समय भारतीय सैनिकों की संख्या 2 लाख 38 हजार थी जो घटकर 1 लाख 40 हजार हो गई।

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प्रश्न 7.
1857 ई० की क्रान्ति का तत्कालीन कारण का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
तत्कालीन कारण : 1857 ई० के विद्रोह का तत्कालीन एवं सैनिक कारण गाय, सुअर की चर्बी से बने कारतूस के प्रयोग वाली घटना थी। अंग्रेजों ने सेना के लिए एक नयी राइफल एण्डफिल्ड देने का निश्चय किया। जिसमें प्रयोग होने वाली गोली के मुँह पर गाय, सुअर की चर्बी लगी होती थी। जिसका प्रयोग करने से पहले दाँत से नोचकर बन्दूक में भरनी पड़ती थी।

बैरकपुर छावनी के सैनिको ने इस कारतूस का प्रयोग करने से इन्कार कर दिया, किन्तु रेजीमेण्ट मेजरहुडसन ने बार-बार गोली चलाने के लिए दबाव डालने लगा तब उसे रेजीमेन्ट के एक सैनिक मंगल पाण्डे ने उस अधिकारी को गोली मार दी, यह घटना पूरे देश में आग की तरह फैल गयी, और 1857 ई० की क्रान्ति की ज्वाला धधकती गयी। इस प्रकार 1857 ई० की क्रान्ति में कारतूस वाली घटना 1857 ई० की क्रान्ति का तत्कालीन कारण बन गया।

इस क्रान्ति में कैप्टन गार्डन एक मात्र अंग्रेज अधिकारी था। जो भारतीयों की ओर से लड़ा था। सम्मूर्ण भारत में 31 मई 1857 ई० को यह क्रान्ति सुनिश्चित थी। परन्तु बंगाल के मंगल पाण्डे के कारतूस वाली घटना के कारण यह क्रान्ति 29 मार्च को ही शुरु हो गयी थी। लेकिन वास्तविक रूप से इसकी शुरूआत 10 मई को मेरठ छावनी के सैनिको ने दिल्ली कुच करने के साथ शुरू किया था।

सैनिक कारण : 1857 ई० के क्रान्ति के विद्रोह का सैनिक कारण अंग्रेज सैनिको की अपेक्षा भारतीय सैनिको को कम वेतन देना था। साथ ही भारतीय सैनिको से भेद-भाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों का समुद्र पार करना अनिवार्य कर दिया गया, सैनिको की चिठ्ठी पर शुल्क लगाया गया था। इन्हीं सब कारणों से भारतीय सैनिकों का अंग्रेजों के प्रति अंसतोष बढ़ता गया, यही असंतोष 1857 ई० की क्रान्ति का सैनिक विद्रोह का आधार बना।

प्रश्न 8.
1857 ई० की क्रान्ति के असफलता के कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति के असफलता के कारण : इस जनक्रान्ति की असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे :-
(i) संगठन एवं योजना का अभाव :- 1857 ई० की क्रान्ति में संगठन और कुशल कार्य योजना का अभाव था, जिसके चलते सुनियोजित क्रान्ति की क्रियाकलाप सही समय पर लागू न हो सकी।
(ii) राष्ट्रीय नेतुत्व का अभाव :- 1857 ई॰ की क्रान्ति का पूरे राष्ट्रीय स्तर पर मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन देने वाला कोई सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता नहीं था, अतः राष्ट्रीय नेतृत्व के अभाव में क्रान्ति की कार्य योजना ठीक ढंग से लागू न हो सकी।
(iii) क्रान्ति का समय से पूर्व शुरु हो जाना :- 1857 ई० की क्रान्ति को पूरे देश में 31 मई 1857 ई० को एक ही समय पर एक ही साथ शुरु-करने की योजना तैयार की गई थी, किन्तु दुर्भाग्यवश बैरकपुर छावनी की कारतूस वाली घटना के कारण क्रान्ति समय से पहले 10 मार्च को ही शुरु हो गई। अतः समय से पूर्व क्रान्ति शुरु हो जाने के कारण इसकी योजनाए ठीक समय पर लागू न की जा सकी।
(iv) देशी राजाओं का असहयोग :- क्रान्ति के समय बहुत से देशी राजाओं तथा आरामतलब जिन्दगी जी रहे मध्यमवर्गीय जनता ने क्रान्तिकारियों का साथ न देकर अंग्रेजों का साथ दिया था, ऐसे में राजाओं तथा जनसहयोग के अभाव में क्रान्ति सफल न हो सकी।
(v) अंग्रजों का कुशल नेतृत्व :- क्रान्ति को कुचलने के लिए अंग्रेजी प्रशासन एवं सैनिक अधिकारियों ने बड़ी कुशलता एवं सूझ-बूझ से सेना का नेतृत्व किया। जिसका सामना भारतीय क्रान्तिकारी नहीं कर सके
(vi) अंग्रेजों का कुर दमन चक्र :- अंग्रेजों ने क्रान्ति को दबाने के लिए कठोर एवं कुर दमन चक्र का सहारा लिया, अंग्रेज सैनिकों ने गाँव के गाँव फूक डाले, हजारों लोगों को तोपो के मुह पर बाँधकर एक साथ उड़ा दिया, बहुत से क्रान्तिकारियों को जनता के सामने फाँसी पर लटका दिया गया, अंग्रेजों के इस अमानवीय दमन कार्य से देश की जनता और भयभीत हो उठी, और समय पर क्रान्तिकारियों का साथ न दे सकी, जिसके कारण यह क्रान्ति असफल सिद्ध हो गयी।

प्रश्न 9.
सन् 1857 ई० के विद्रोह को सैनिक विद्रोह भी कहते हैं, वर्णन करें।
उत्तर :
सन् 1857 के विद्रोह को सैनिक विद्रोह भी कहा जाता है, क्योंकि विभिन्न इतिहासकारों का मानना है कि यह विद्रोह सैनिकों के द्वारा ही शुरू किया गया था। इसीलिए इस विद्रोह को सैनिक विद्रोह भी कहा जाता है। हालाँकि इस विद्रोह के अनेकों रूप माने गये है परन्तु इसका यह रूप सबसे प्रभावी माना जाता है। 1857 ई० के विद्रोह का प्रारम्भ मेरठ से माना जाता है, जिसकी शुरूआत 10 मई, 1857 ई० में हुआ। इस विद्रोह में अनेकों नेताओं ने अपनी भूमिका निभाया।

जैसे – बहादुर शाह जफर, नाना साहेब, तात्या टोपे, बेगम हजरत महल, रानी लक्ष्मीबाई, लियाकत अली, कुँअर सिंह, खान बहादुर खाँ, मौलवी अहमद उल्ला, अजीमुल्ला तथा मंगल पाण्डे आदि। इन्होंने अपने देश की आजादी के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिये। ये लोग देश के अनमोल खजाने थे, जो देश के लिए नष्ट हो गये।

सर जॉन लारेन्स और सीले जैसे अंग्रेजी विद्वानों ने इस विद्रोह को ‘सैनिक विद्रोह’ कहा है. क्योंकि अंग्रेजी संनाओं में अधिकतर भारतीय सैनिक ही थे। अंग्रेजी हुकूमत सेनाओं के बीच भेद-भाव करते थे। यही भावना धीरे-धीरे आग की तरह फैलती गयी जिसके कारण बैरकपुर छावनी में नई तकनीकी से बना हुआ कारतूस आया तो सैनिकों में यह अफवाह फैल गयी कि कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी मिलाया गया है। अत:, जो भारतीय सैनिक थे, वे इस कारतूस को मुंह में लेने सं साफ मना कर दिये क्योंकि उनके धर्म पर इसका प्रभाव पड़ता। उन भारतीय सैनिकों में एक मंगल पाण्डे था, जिसने पहली बार इस कारतूस को मुँह से काटने से साफ मना कर दिया। अंग्रेज उनको पकड़कर 8 मई, 1857 ई० को फाँसी पर लटका दिये।

यह खबर फैलते ही न केवल बैरकपुर छावनी में बल्कि समस्त उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में यह विद्रोह शुरू हो गया। पी० ई० रॉबर्द्स भी इसे विशुद्ध सैनिक विद्रोह मानते थे। वी० ए० स्मिथ ने लिखा है कि, “”यह एक शुद्ध रूप से सैनिक विद्रोह था, जो संयुक्त रूप से भारतीय सैनिकों की अनुशासनहीनता एवं अंग्रेज सैनिक अधिकारियों की मूर्खता का परिणाम था।” सुरेन्द्रनाथ सेन ने अपनी पुस्तक ‘एटीन फिफ्टी सेवन’ 1857 ई० में लिखा है, “आन्दोलन एक सैनिक विद्रोह को भौति आरम्भ हुआ, किन्तु केवल सेना तक सीमित नहीं रहा। सेना ने भी पूरी तरह विद्रोह में भाग नहीं लिया।” डॉं० आर० सी० मजुमदार ने इसे ‘सैनिक विप्लब’ बताया।

इस प्रकार हम देख पाते हैं कि ‘चर्बी वाला कारतूस की घटना ही वास्तविक रूप सैनिक विद्रोह को जन्म दिया है। इसीलिए इस विद्रोह को ‘सैनिक विद्रोह’ भी कहा जाता है।

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प्रश्न 10.
1857 ई० के विद्रोह को ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ कहा जाता है, तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर :
सन् 1857 ई० का विद्रोह 10 मई, 1857 ई० को मेरठ से प्रारम्भ हुआ। ऐसे तो यह विद्रोह 29 मार्च 1857 ई० को ही बैरकपुर छावनी से ही आरंभ हो गयी थी, लेकिन इस विद्रोह का सही रूप 10 मई, 1857 ई० को मेरठ से देखा गया। इस विद्रोह में अनेक नेता शामिल थे। जिनमें कुँअर सिंह, लियाकत अली, रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डेय, नाना साहेब, तात्या टोपे, बेगम हजरत महल और बहादुर शाह जफर (II) आदि महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

1857 ई० के विद्रोह को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम भी कहा जाता है। इसके कई कारण हैं। जैसे, इस विद्रोह में अधिकांशत: भारतीयों ने ही भाग लिया था, जिनमें निम्न वर्ग, मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के साथ-साथ कई क्षत्रों के जमीन्दार और ठेकेदार भी शामिल थे। सभी लोगों ने मिलकर अंग्रेजों का विरोध किये ताकि हमारा देश स्वाधीन हो सके। इतना ही नहीं इस विद्रोह की आग इतनी तीव्व गति से फैल गयी मानो आग में किसी ने घी डाल दिया हो।

अर्थात् भारतवासियों में भारत को स्वाधीन कराने की भावना तीव्र हो गयी। यह विद्रोह लोगों में अपनी मातृभूमि के प्रति भक्ति की भावना भर दिया था, जिसके कारण समस्त भारतवासी अपने देश के प्रति अपने प्राण तक न्यौछावर करने के लिए तत्पर हो उठे। इसीलिए 1857 ई० के विद्रोह को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम भी माना जाता है, जिसने भारत के अधिकांश भाग को प्रभावित किया। विभिन्न विद्वानों ने भी 1857 ई० के विद्रोह को ‘भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ माना है, जिनमें सर्वपथम नाम ‘विनायक दामादर सावरकर’ का था।

इसके अतिरिक्त अन्य और भी विद्वान थे जिनके अनुसार यह विद्रोह भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। जिनमें पट्टाभि सीतारमैया, अशोक मेहता तथा बैन्जामिन डिजरेली आदि थे। जिन विद्वानों ने इसे स्वतंत्रता संग्राम माना है, उन्होंने अपने मत के समर्थन में तर्क दिया है कि- “इस संग्राम में हिन्दू और मुसलमानों ने कंधे से कधा मिलाकर समान रूप से भाग लिया और इन्हें जनसाधारण की सहानुभूति प्राप्त थी। अत: इसे केवल सैनिक विद्रोह या सामन्तवादी प्रतिक्रिया अथवा मुस्लिम षड्यंत्र नहीं कहा जा सकता।’

उपर्युक्त विवरणों से देखा जाता हैं कि 1857 ई० का विद्रोह न केवल सैनिक विद्रोह था बल्कि यह विद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी था जिसमें पहली बार भारत के समस्त जाति, धर्म तथा कट्टर थी आदि लोगों ने भाग लिया।

प्रश्न 11.
1857 ई० के विद्रोह में शामिल प्रमुख नेताओं की भूमिका का वर्णन कीजिए ।
उत्तर :
सन् 1857 ई० का विद्रोह एक प्रकार से देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम था जिसमें अपने देश को अंग्रेजी सरकार के गुलामी से बचाने के लिए प्रत्येक धर्म एवं जाति के लोगों ने विभिन्न नेताओं के नेतृत्व में विद्रोह किया। इन विभिन्न नेताओं में दिल्ली के अन्तिम मुगल समाट बहादुरशाह जफर द्वितीय महत्वपूर्ण थे। उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी क्योंकि विद्रोह का सारा बागडोर इनको ही सौंपा गया था। अन्तिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर ने 12 मई, 1857 से दिल्ली में इस विद्रोह की शुरुआत किया था तथा अंग्रेजों का विरोध किया।

इसके बाद विद्रोह का सूत्रपात कानपुर में नाना साहब एवं तात्या टोपे ने संभाला। उन्होंने अपनी वीरता का परिचय देने हुए, सितम्बर, 1857 ई० तक कानपुर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करते रहे।
झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के साथ वीरतापूर्वक विद्रोह करती रही तथा महिला होने के बावजूद वह अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दी।

बिहार के जगदीशपुर में कुँवर सिंह ने इस विद्रोह का सूत्रपात किया। अगस्त, 1857 ई० में उन्होंने बिहार में इस विद्रोह की शुरुआत किया तथा अंग्रेजों के रातों की नींद तक उड़ा दिया।

इसके अतिरिक्त, लखनऊ से बेगम हजरत महल, इलाहाबाद से लियाकत अली, बरेली से खान बहादुर खां, फैजाबाद से मौलवी अहमद उल्ला और फतेहपुर से अजीमुल्ला आदि ने भी इस विद्रोह का सूत्रपात किये तथा अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। उपर्युक्त विवरणों से देखा जाता है कि सन् 1857 ई० का विद्रोह अलग-अलग क्षेत्रों मे भिन्न-भिन्न नेताओं के नेतृत्व में हुआ और सभी नेताओं ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया।

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प्रश्न 12.
1857 ई० की क्रान्ति के परिणामों को उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति के निम्नलिखित परिणाम हुए :
i. इस विद्रोह के बाद भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए, इस्ट इण्डिया के कम्पनी के शासन को समाप्त कर इंग्लैण्ड के महारानी अर्थात् इंग्लैण्ड (ब्रिटिश) ताज के हवाले हो गया।
ii. इस विद्रोह के बाद सैन्य व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए। सेना में ब्राह्मण, क्षेत्रीय एवं मुसलमानों की भर्ती पर रोक लगा दी गई और जाति के आधार पर सैनिकों की भर्ती होने लगी। इस प्रकार भारतीय सेना की संख्या कम करके उसे जाति-वादी सेना बना दिया गया।
iii. इस विद्रोह के बाद महारानी का घोषणा-पत्र लागू हुआ, जिसमें भारतीय राजाओं को आश्वासन दिया गया कि उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। इस घोषणा-पत्र के द्वारा भारतीयों के योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई।
iv. यह क्रान्ति भले ही असफल रही, किन्तु अंग्रेजी शासन के नींव को हिलाने में सफल रहीं, इस भय एवं कमजोरी के कारण अंग्रेज ऐशिया के अन्य देशों, जैसे – चीन, जापान आदि पर अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर सके।

इस प्रकार यह क्रान्ति भले ही असफल रही किन्तु अंग्रेजों को सीख दे गयी, जिसके कारण अंग्रेज भारत के शासन व्यवस्था में सुधार करने के लिए बाध्य हुए और भारतीय भी अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने-मरने को तैयार हो गए।

प्रश्न 13.
सन् 1857 का विद्रोह को क्या सैनिक विद्रोह कहा जा सकता है ?
उत्तर :
सन् 1857 का विद्रोह सैनिक विद्रोह नहीं था। ऐसा इसलिए कहा जाता है कि इस विद्रोह में केवल भारतीय सैनिक भाग नहीं लिये थे बल्कि इस विद्रोह में भारत के उत्तरी अंचल के समस्त निम्नवर्गों ने भाग लिये थे। इसीलिए यह विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह ही नहीं था बल्कि भारतीय निम्नवर्गों का विद्रोह था।

इस विद्रोह में जिन नेताओं ने प्रमुख भूमिका पालन किया उनमें लक्ष्मीबाई, नाना साहब एवं तात्या टोपे थे। जिन्होने निम्न जाति एवं महिलाओं को अपना आधार बनाये थे।

डॉ॰ ताराचन्द के अनुसार भी यह विद्रोह सैनिक विद्रोह न होकर निम्नवर्गो द्वारा अपनी खोई हुई सत्ता को पुन: प्राप्त करने का प्रयास था जो अंग्रेजी प्रशासन से मुक्ति पाना चाहता था। क्योंकि अंग्रेज इन निम्नवर्गों को कुचलने का प्रयास किये थे तथा उन्हें अपना गुलाम भी बनाना चाहते थे।
अतः हम कह सकते हैं कि 1857 का विद्रोह-सैनिक विद्रोह न होकर निम्नवर्गो द्वारा चलाया गया विद्रोह था।

प्रश्न 14.
1857 ई० के विद्रोह के राष्ट्रीय चरित्र का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर :
1857 ई० के विद्रोह के राष्ट्रीय चरित्र का सुन्दर एवं मार्मिक वर्णन किया गया है क्योंक पूर्णरूप से यह विद्रोह देशभक्ति, देशप्रेम एवं राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत है। इस विद्रोह की शुरूआत मेरठ के एक पैदल टुकडी 20 N.I. ने किया था, जो पूर्णरूप से देशप्रेम एवं देशभक्ति पर आधारित था। इतना ही नहीं, सैनिको की देशभक्ति एवं राष्ट्रीय प्रेम का उदाहरण बेरकपुर छावनी के भारतीय सिपाही मंगल पाण्डेय द्वारा देखा गया, जो अंग्रेजों से वीरता पूर्वक लड़ते हुए मारे गये (फाँसी द्वारा)।

इसी प्रकार के कई और वीरतापूर्ण दृश्य भी देखने को मिलते हैं। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जो एक महिला थी, अपन देश की रक्षा के लिए अंग्रेजों से वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारी गयी। इनमें कुट-कुट कर देशभक्ति एवं राष्ट्रीय प्रेम की भावना व्याप्त थी।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सन् 1857 का विद्रोह भारतवासियों के भीतर देशग्रेम एवं राष्ट्रीय प्रेम की भावना को जागृत करता हैं तथा इस विद्रोह के नेताओं में कुट-कुट कर राष्ट्रीय चरित्र की भावना भरी थी, जो भारतीय स्वंतत्रता संग्राम के रूप में दिखायी पड़ी।

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प्रश्न 15.
विक्टोरिया की घोषणा पत्र के प्रमुख बातों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
रानी की घोषणा पत्र- 1858 ई० का ऐतिहासिक महत्व क्या था ?
उत्तर :
महारानी विक्टोरिया का घोषण्णापत्र : 1857 ई० की क्रान्ति के बाद भारत के शासन व्यवस्था में भारी परिवर्तन हुआ, तत्कालीन गर्वनर जनरल लार्ड कैनिंग ने नवम्बर सन् 1858 ई० को इलाहाबाद में अंग्रेजी दरबार का आयोजन किया, और उसी आयोजन मे इग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र को पढ़कर सुनाया, जिसे विक्टोरिया की घोषणापत्र कहा जाता है। इसकी प्रमुख बातें निम्नलिखित थी-

  1. अब से भारत का शासन इंग्लैण्ड के ताज (राजा) के अधीन होगा और उसका प्रतिनिधित्व करने वाला भारत का प्रधान शासक वायसराय कहलायेगा।
  2. भारतीय राजाओं के साथ की गई संधियों को ईमानदारी के साथ लागू किया जायेगा और उन्हें अपने उत्तराधिकारी के लिए बच्चो को गोद लेने का अधिकार दिया जायेगा।
  3. अय कोई भी भारतीय देशी राज्यों को अंग्रेजी राज्य में नहीं मिलाया जायेगा।
  4. क्रान्ति के सभी अपराधियों को क्षमा-दान दे दिया जायेगा।
  5. ब्रिटिश सरकार भारतीयों के सामाजिक और धार्मिक कार्यों में किसी प्रकार की दखलअंदाजी नहीं करेगी।
  6. सभी भारतीयों को योग्यता के आधार पर बिना-किसी भेद-भाव के सरकारी नौकरी पाने का अधिकार होगा।

इसी घोषणा के बाद भारत की शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार एवं परिवर्तन हुआ। 1861 ई० में इसी घोषणा पत्र के आधार पर भारतीय जन सेवा कानून बनाया गया।

प्रश्न 16.
अवनीन्द्रनाथ द्वारा चित्रित की गई भारत माता का चित्र किस प्रकार से भारतीयों के अन्दर राष्ट्रीयता एवं देशप्रेम की भावना को विकास करने में सहायक सिद्ध हुआ।
उत्तर :
भारत माता का चित्र : भारत माता का चित्र 1905 ई० में अवनीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा बनाया गया था। इस चित्र ने एक प्रतीक के रुप में देशवासियों के मन में उत्साह, साहस, राष्ट्रीयता एवं देशप्रेम की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भुमिका निभाई।

1905 ई० में अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने बंग-भंग के विरोध में उत्पन्न हुए स्वदेशी एवं बहिष्कार आन्दोलन के समय देशवासियों में वीरता, उत्साह, साहस, देशप्रेम की भावना को जागृत करने के लिए और अंग्रेजों की गुलामी से देश को आज़ादी दिलाने के लिए एक प्रतीक के रूप में भारत माता (वंग माता) का चित्र एक सुन्दर सन्यासी युवती के रूप में बनाया था, जिसके दंवी लक्ष्मी के समान चार भुजाए थी, जिसके एक हाथ में तलवार, दूसरे हाथ में त्रिशूल, तीसरे हाथ में निरंगा और चौथे हाथ में माला लिये हुए और उनके बगल में शेर का चित्र दर्शाया गया था।

इस प्रकार माँ भारती का यह चित्र एक दंवी के रूप में अपने संतानो को सभी प्रकार का सुख देने का वरदान देते हुए, दिखाई देती है यह चित्र देखते ही दंशवासी अपने सभी भेद-भाव को भूलकर एक-जूट होकर आन्दोलन के लिए मचल कर सक्रिय हो उठते थे। यही चित्र आगंग चलकर देश के स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए शक्ति, साहस, संघर्ष और विजय का प्रतीक बन गई, भारत माता की जयकार लगाते हुए देशवासी स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी आहूति देने के लिए तत्पर होने लगे।

सर्वप्रथम बनारस में भारत माता की मन्दिर स्थापित किया गया, जिसका उद्घाटन साबरमती के संत महात्मा गाँधी ने किया था, इस ग्रकार भारत-माता का चित्र देशवासियों के साहस, शक्ति, संघर्ष, स्वतंत्रता के शक्ति का स्रोत बन कर उन्हें देश-प्रेम के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता रहा।

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प्रश्न 17.
गोरा उपन्यास किस प्रकार से देशवासियों में राष्ट्रीय भावना के विकास में सहायक सिद्ध हुआ?
उन्तर :
गोरा उपन्यास और राष्ट्रीयता की भावना का विकास :- विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा 1909 ई० में लिखित उपन्यास गोरा बंगाल सहित पूरे देश के युषाओं में देश के लिए कुछ कर गुजरने, /मर – मिटने जैसी राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने और बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गांरा उपन्यास में एक गोरे रंग का व्यक्ति जो विदेशी/अंग्रेजों के प्रतीक के रूप मे चित्रित किया गया है। वह गोरा व्यक्ति बिदेशी अंग्रेज होने के बावजूद भी हिन्दू रीति-रिवाज को मानते हुए, देवी-देवता की पूजा पाठ करता है। भारत की आजादी के लिए दुआ माँगता है। इसके माध्यम से टैगोर ने देशवासियों को यह संदेश देने का प्रयास किया था, कि मनुष्य को अपने पूर्व जीवन की क्रियाओं को छोड़कर हिन्दू सभ्यता के वर्तमान सभ्यता और सस्कृति को अपनाना चाहिए।

हमें अपने समाज के कुरीतियों, मतभेदों को त्याग कर, नये राष्ट्रीय, सामाजिक, आर्थिक, सास्कृतिक धार्मिक विचारों को अपनाना चाहिए, जब सात-समुद्र पार का एक विदेशी अपनी सभ्यता-संस्कृति को त्यागकर, भारतीय ब्ननकर समाज और देश के लिए मरमिटने का प्रयास करता है तो हम अपने मिट्टी से जुड़े हुए, भारतीय क्यों नहीं कर सकते? इसी संदेश ने गुलामी की मानसिकता में जी रहे, लोगों को क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए बाध्य किया। हम पुराने कमजोरियों, बुराईयों को त्यागकर नये प्रगतिशील विचारों को अपनाकर आजादी की लड़ाई के लिए संघर्ष करने लगे, इस प्रकार गोरा उपन्यास ने देशवासियों को राष्ट्रीयता एवं देशप्रेम का पाठ-पढ़ाया, जिसकी सबक ने हमें अन्ततः आजादी दिलायी।

प्रश्न 18.
‘वर्तमान भारत’ में स्वामी विवेकानन्द ने किस प्रकार तत्कालीन भारत का वर्णन किया है ?
उत्तर :
भारतीय राष्ट्रीयता के विकास में ‘वर्तमान भारत’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ‘वर्तमान भारत’ में स्वामी विवेकानन्द ने तत्कालीन भारत का वर्णन किया है। विवेकानन्द जी ने ‘वर्तमान भारत’ नामक कृति की रचना सन्1905 में किये। आरम्भ में यह एक प्रकार का निबन्ध था, जिसको सन् 1899 में उद्वोधन प्रकाशन ने ‘रामकृष्ण मठ’ एव ‘रामकृष्ण मिशन’ के मुखपत्र के रूप मे प्रकाशित किया। बाद में स्वामी विवेकानन्द जी ने इस निबंध को पुस्तक का रूप दिया।

इस पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द जी ने तत्कालीन भारत के निम्न जाति एवं गरीबों की दयनीय एवं मार्मिक जींवन का वर्णन किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने जातिवाद पर अपने कठोर विचार व्यक्त किये हैं कि इस देश की जातिवाद रूपी डिम्बक ने इसे खोखला बना दिया है। इसीलिए तत्कालीन भारत के लोगों से वे जातिवाद को समाप्त कर भाईचारें को अपनाने का अपील किये हैं।

अतः देखा जाय तो स्वामी विवेकानन्द जी ने अपनी रचना ‘वर्तमान भारत’ में तत्कालीन भारत का इस रूप में वर्णन किया। जिसमें निम्न जातियों की विभिन्न समस्या एवं जातिवाद को दर्शाया गया है।

प्रश्न 19.
‘समितियों का युग’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
भारत में 18 वीं शताब्दी के अन्त से लेकर 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक कई राजनैतिक समितियों या सभा अथवा संगठन का गठन किया गया जो भारतीय राष्ट्रवाद (Indian Nationalism) के जन्मदाता माने जाते थे। इन समितियों ने ही भारत में राष्ट्रवाद को जन्म दिया अर्थात् बढ़ावा दिया जिसके माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का बोजारोपण किया गया। इन समितियों ने ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमे ‘बगभाषा प्रकाशिका सभा’ तथा ‘बगाल जमीदार सभा’ या ‘लैण्ड होल्डर्स एसोसिएशन’ आदि महत्वपूर्ण थे। इसीलिए डॉ॰ अनिल सेन ने 19 वीं सदी को समितियों का युग कहा है।

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प्रश्न 20.
बंगाल जमींदार सभा किस प्रकार का संस्थान था, इसने किस प्रकार राष्प्रीयता को बढ़ावा दिया ?
उत्तर :
‘बंगाल जमींदार सभा’ या ‘लैण्ड होल्डर्स एसोसिएशन’ : ‘बंगाल जमींदार सभा’ या ‘लैण्ड होल्डर्स एसासिएशन’ भारत में समितियों के युग की दूसरी संस्था थी जिसका गठन सन् 1838 ई० में द्वारकानाथ टैगोर ने कलकत्ता में किया। इतना ही नहीं, इस संस्था के गठन में बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा के जमींदार वर्ग की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस संस्था के प्रमुख भारतीय सचिव प्रसन्न कुमार ठाकुर और द्वारकानाथ ठाकुर आदि थे। अंग्रेजी सचिव या नेता में जॉन क्रॉफर्ड, जे० ए० प्रिसेप, विलियम थियोवेल्ड, थियोडर डिकेस तथा विलियम काब्बी आदि थे। ‘बंगाल जमींदार सभा’ का प्रमुख उद्देश्य जमोंदारों के हितों की रक्षा करना था। इतना ही नहीं, यह संस्था जमींदार वर्ग को बंगाल में बढ़ावा भी देती थी। यह संस्था आधुनिक भारत की ‘प्रथम संवैधानिक राजनीतिक संस्था’ थी।

उपर्युक्त बिवरणों से पाते हैं कि ‘बंग भाषा प्रकाशिका सभा’ एवं ‘बंगाल जमींदार सभा’ दोनों ही भारतीय राष्ट्रवाद को विस्तृत करने में तत्पर संस्थाएँ थी जिसका उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना था।

प्रश्न 21.
गगनेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा अंकित कार्टुन चित्र में किस प्रकार औपनिवेशिक समाज प्रतिविंबितहुआ है ?
अथवा
गगनेन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) की चित्रकारी में औपनिवेशिक समाज का व्यंग्यपूर्ण चित्रण है, कथन को स्पष्ट कीजिए।
अशवा
महान चित्रकार एवं कार्टुनिस्ट गगनेन्द्रनाथ टैगोर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
गगनेन्द्रनाथ टैगोर जी एक महान चित्रकार एवं कार्टुनिस्ट थे। इनका जन्म 18 सितम्बर, 1867 ई० को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसडेन्सी के कलकत्ता में हुआ था। ये रवीन्द्रनाथ टैगोर के भतीजे तथा अवनीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम गगनन्द्रनाथ टैगोर तथा दादा का नाम गिरीन्द्रनाथ टैगोर था। ये एक महान चित्रकार थे। इनकी चित्र दूसरों से हटकर हाती थी तथा प्रत्येक चित्रों में औपनिवेशिक समाज का व्यग्य छिपा होता था। उन्होंने उस समय के जाने-माने चित्रकार हरिनारायण बंदोपाध्याय से प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

गगनेन्द्रनाथ टैंगोर ने चित्रकला एवं कार्टुन से संबंधित अनेको कार्य किये। जैसे- सन् 1917 में ‘बाजरा’ एवं ‘अद्धुत लोक’ तथा सन 1921 में ‘नव हुलोड़े’ आदि थे जो औपनिवेशिक समाज के व्यंग्यपूर्ण चित्रण को दर्शाती थी। इनके चित्रों में विभिन्न प्रकार के व्यंग्य छिपे होते थे। जैसे – जाति प्रथा, पाखण्ड, हिन्दू पुजारी तथा पश्चिमी शिक्षा का घोर विरोध भी छिपा रहता था। इतना हो नहीं, उस समय के प्रसिद्ध नाटककार ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर के नाटक ‘एमन कर्म आर करबो ना’ में गगनेन्द्रनाथ टैगोर के हास्यास्पद चित्रों का समावेश मिलता है। उनके नाटक के प्रमुख पात्र ‘अलिफ बाबू’ तथा ‘द फाल्स बाबू’ इत्यादि गगनेन्द्रनाथ टैगोर के हाथों की उपज हैं।

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प्रश्न 22.
भारत सभा की स्थापना के उद्देश्य एवं इसके कार्य क्या थे ?
उत्तर :
भारत सभा (Indian Association) : भारत में गुप्त समितियों के रूप में ‘भारत सभा’ की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस संस्था की स्थापना सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा आनन्द मोहन बोस द्वारा सन् 1876 में कलकत्ता के इल्बर्ट हॉल (Elbert Hall) में की गई। ‘भारत सभा’ के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनन्द मोहन बोस इसके सचिव माने जाते हैं। बाद में इसके अध्यक्ष कलकत्ता के प्रमुख बैरिस्टर मनमोहन घोष चुने गए। इस संस्था के अन्य संस्थापकों में शिवनाथ शाखी तथा द्वारकानाथ गंगोपाध्याय भी थे।

‘भारत सभा’ के निम्नलिखित उद्देश्य थे, जिनमें

  1. सम्पूर्ण देश में लोकमत का निर्माण करना,
  2. हिन्दूओं और मुसलमानों के बीच एकता एवं मैत्री को स्थापित करना,
  3. सामूहिक आन्दोलनों में किसानों का सहयोग प्राप्त करना, तथा
  4. विभिन्न जातियों में एकता के सूत्र को संचार करना एवं उनके सहयोग को प्राप्त करना इत्यादि।

इस संस्था ने अनेकों आलोलन चलाये जिनमें से कुछ निम्न प्रकार के थे –

1. सिविल सर्विस परीक्षा विरोधी आन्दोलन : ‘भारत सभा’ के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने सिविल सर्विस परीक्षा को भारत में आयोजित किये जाने के उद्देश्य से सिविल सर्विस परीक्षा विरोधी आन्दोलन चलाए। जब लार्ड सेल्वरी ने भागतीयों को ‘इण्डयन सिविल सर्विस’ की परीक्षा से वंचित करने के उद्देश्य से परीक्षा में बैठने की उम्र 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दिया, तो सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने उम्र 19 से बढ़ाकर 21 करने के लिए आन्दोलन चलाया।

2. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट विरोधी आन्दोलन : भारत सभा के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी एवं उनके साथियों ने मिलकर वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट विरोधी आन्दोलन चलाया। जब लार्ड लिटन ने सन् 1878 में यह एक्ट लागू कर भारतीय समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, तब इसके विरोध मे ‘भारत सभा’ ने आन्दोलन चलाया।

प्रश्न 23.
गोरा एवं आनन्दमठ उपन्यासों ने राष्ट्रीयता को जगाने में किस प्रकार सहायक हुआ ?
उत्तर :
‘गोरा’ (Gora) उपन्यास : ‘गोरा’ उपन्यास एक आकर्षक प्रेम-कथा है जिसमें ‘गोरा’ एक प्रमुख नायक के तौर पर है और इसी के नाम पर उपन्यास को नाम ‘गोरा’ शीर्षक के रूप में रखा गया है। ‘गोरा'(Gora) का साहित्यिक अर्थ है ‘गौर वर्ण या जाति’ का व्यक्ति । इस उपन्यास को रचना महान विश्च कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने सन्1 909 में किया था। यह उपन्यास उनके द्वारा रचित बारह (12) उपन्यासों में से एक है। यह एक काफी जटिल उपन्यास माना गया है।

रवोद्र्रनाथ टैगोर जी मूलतः एक कवि थे। उनकी बहुचर्चित काव्यमयी रचना ‘गीतांजलि’ पर उन्हें 1913 ई० में विश्च का सर्वाच्च नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। उन्होंने अपनी इस रचना में सामाजिक एवं राजनैतिक रूप, सामाजिक जीवन एवं बुराइयाँ, बगाली संस्कृति, राष्ट्रीयता की भावना एवं मित्रता आदि को दर्शाया हैं।

रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने अपने उपन्यास ‘गोरा’ में भारतवासियों के प्रति राष्ट्रवाद की भावना को दर्शाया है, जो स्वतंत्रता के मार्ग को दिखाती है। उस समय बंगाल लार्ड कर्जन के बंग-भंग क्रिया की काली छाया से होकर गुजर रहा था। ऐसे समय मेंगोर जी की इस उपन्यास ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया, जा उनके लिए अनमोल था।

‘आनन्दमठ’ (Anandmath) : भारतीय साहित्यिक कृतियों में सर्वप्रमुख स्थान ‘आनन्दमठ’ कृति की है, जिसने भारत में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता के विकास को जन्म दिया अर्थात राष्ट्र के प्रति हमेशा अग्रसर रहा। इसकी रचना बंकिम चन्द्र बटर्जी ने 1882 ई० में किया। इस कृति की रचना बंगला भाषा में किया गया था। यह एक उपन्यास है, जिसकी पृष्ठभृनि की शुरु आत 1771 ई० के बंगाल के अकाल के समय से होती है। यह अकाल वास्तव में सन् 1770 में आया था, परन्तु इसका संचयन सन् 1771 में किया गया।

इस उपन्यास के मुख्य पात्रों में ‘महेन्द्र’ और ‘कल्याणी’ हैं। इतना ही नही, 18 वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह का वर्णन भी इस उपन्यास में किया गया है तथा भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्देमातरम’ (Vande Matramj भी सर्वप्रथम इस उपन्यास में ही प्रकाशित किया गया था।

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प्रश्न 24.
भारतीय साहित्यिक कृतियों के रूप में ‘आनन्दमठ’ तथा ‘वर्तमान भारत’ के द्वारा राष्ट्रीयता या राप्ट्रवाद का विकास या संचार किस प्रकार हुआ?
या, ‘आनन्दमठ’ और ‘वर्तमान भारत’ पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
18 वों शतबब्दी के अंत में भारतीय साहित्यिक कृतियों में कई परिवर्तन आये। अनेक कृतियों की रचना किया गया जिसका एक ही मकसद था, देश के प्रति देश-प्रेम को जागृत करना, राष्ट्रवाद को जन्म देना तथा उनमें विकास. लाना, ंश्रा्वस्यों में देश के प्रति देशभक्ति की भावना को जन्म देना तथा अपने देश को अंग्रेजों के बंधनों से मुक्त कराना।

हाँलाकि ये सभी कार्य 18 वी शताब्दी के मध्य तक अनेकों पत्र-पत्रिकाओं ने किया परन्तु देश के प्रति ऐसी भावना को जागृत नहीं कर पाये, जितना ये साहित्यिक कृतियाँ कर पाये। इन पत्र-पत्रिकाओं में – अमृत बाजार पत्रिका, इण्डिया मिरर, सोमप्रकाश, संवाद कौमुदी तथा संजीवनी आदि प्रमुख थे।

‘आनन्दमठ’ (Anandmath) : भारतीय साहित्यिक कृतियों में सर्वपमुख स्थान ‘आनन्दमठ’ कृति की है, जिसने भारत में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता के विकास को जन्म दिया अर्थात राष्ट्र के प्रति हमेशा अग्रसर रहा। इसकी रचना बंकिम चन्द्र चटुर्जी या चट्टॉपाध्याय ने 1882 ई० में किये। इस कृति की रचना बंगला भाषा में किया गया था। यह एक उपन्यास है, जिसकी पृष्ठभूमि की शुरुआत 1771 ई० के बंगाल के अकाल के समय से होती है।

यह अकाल वास्तव में सन् 1770 ई० में आया था, परन्तु इसका संचयन सन् 1771 ई० में किया गया। इस उपन्यास के मुख्य पात्रों में ‘महेन्द्र’ और ‘कल्याणी’ हैं। इतना ही नहीं, 18 वीं शताब्दी के संन्यासी विद्रोह का वर्णन भी इस उपन्यास में किया गया है तथा भारत का राष्ट्रीय गोत ‘वन्देमातरम’ (Vande Matram) भी सर्वप्रथम इस उपन्यास में ही प्रकाशित किया गया था।

‘वर्तमान भारत’ (Bartaman Bharat) : भारतीय राष्ट्रीयता के विकास मे ‘वर्तमान भारत’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 19 त्वीं सदी में भारतीय लोगों को जागृत करने तथा उनमें देश-प्रेम और देश-भक्ति को जगाने में ‘वर्तमान भारत ‘

ने अहम भूमिका निभाई। इस अनमोल कृति की रचना ‘स्वामी विवेकानन्द जी’ ने सन् 1905 ई० में किया। आरम्भ में यह एक प्रकार का निबंध था, जिसको सन् 1899 ई० में उद्वोधन प्रकाशन ने रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन के मुख्यपत्र के रूप में प्रकाशित किया। बाद में स्वामी विवेकानन्द ने इस निबंध को एक पुस्तक का रूप दिया। इस पुस्तक का उद्देश्य भारत में राष्ट्रीयता का संचार यानि विकास करना तथा देशवासियों के भीतर देशप्रेम और देश-भक्ति की भावना को जागृत करना था। उपर्युक्त विवरणों से पाते हैं कि भारतीय राष्ट्रीयता के संचार यानि विकास के क्षेत्र में ‘आनन्दमठ’ तथा ‘वर्तमान भारत’ की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

प्रश्न 25.
गगनेन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) की चित्रकारी में औपनिवेशिक समाज का व्यंग्यपूर्ण चित्रण है, कथन को स्पष्ट कीजिए।
या
महान चित्रकार एवं कार्टुनिस्ट गगनेन्द्रनाथ टैगोर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
गगनेन्द्रनाथ टैगोर जी एक महान चित्रकार एवं कार्टुनिस्ट थे। इनका जन्म 18 सितम्बर, 1867 ई० को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसिडेन्सी के कलकत्ता में हुआ था। ये रवीद्द्रनाथ टैगोर के भतीजे तथा अवनीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। इनके पिता का नाम गुनेन्द्रनाथ टैगोर तथा दादा का नाम गिरीन्द्रनाथ टैगोर था। ये एक महान चित्रकार थे। इनकी चित्र दूसरों से हटकर होती थी तथा प्रत्येक चित्रों में औपनिवेशिक समाज का व्यंग्य छिपा होता था। उन्होंने उस समय के जाने-माने जलचित्रकार हरिनाराद बबंद्योपाध्याय से प्रशिक्षण प्राप्त किया था।

उन्होंने 1907 ई० में अपने छोटे भाई के साथ मिलकर ‘Indian Society of Oriental Art’ की स्थापना किये। उन्होंने सन् 1906 से लेकर 1910 ई० के बीच जापान के प्रसिद्ध चित्रकार ‘याकोहामा तैकान’ से यूरोपियन रंग एवं जापानी ब्रश तकनीकी का मिश्रण करना भी सीखा। इसीलिए सर्वप्रथम गगनेन्द्रनाथ टैगोर को भारत में चित्रकला के क्षेत्र मे ब्रश के प्रयोग का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने अपनी चित्रकलाओं में भारतीय तकनीकी का एकदम प्रयोग नहीं किया। ठाकुरबाड़ी में 1915 से लेकर 1919 ई० के बीच उन्होंने विचित्रा क्लब प्रतिस्थापित किया, जहाँ कई नामी चित्रकार आते थे।

गगनेन्द्रनाथ टैगोर ने चित्रकला एवं कार्टुन संबंधित अनेको कार्य किये। जैसे- सन् 1917 ई० मे ‘बाजरा’, 1917 में ही ‘अद्धुत लोक’ तथा सन् 1921 ई० मे ‘नव हुलोड़े’ आदि थे जो औपनिवेशिक समाज का व्यग्यपूर्ण चित्रण को दर्शाती थी। इनके चित्रों में विभिन्न प्रकार के व्यग्य छिपे होते थे। जैसे – जाति प्रथा, पाखण्ड, हिन्दू पुजारी तथा पथ्चिमी शिक्षा का घोर विरोध भी छिपा रहता था। इतना ही नहीं, उस समय के प्रसिद्ध नाटककार ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर के नाटक ‘एमन कर्म आर करबो ना’ में गगनेन्द्रनाथ टैगोर के हास्यास्पद चित्रों का समावेश मिलता है। उनके नाटक के प्रमुख पात्र ‘अलिफ बाबू’ तथा ‘द फाल्स बाबू’ इत्यादि गगनेन्द्रनाथ टैगोर के हाथों की उपज हैं।

गगनेन्द्रनाथ टैगोर इसके अतिरिक्त और भी विभिन्न कार्य हैं, जिनमें –

1. ‘सर्वागेर अश्रुपात’- इसमें उन्होंने एक भद्रलाक को पथ्चिमी सभ्यता की नकल करते हुए उसका उपहास किया है।
2. ‘A Noble Man’- इसमें वर्धमान के महाराजा अमीर बंगाली समाज के प्रतीक हैं। मोटे-तगड़े महाराजा एक हास्यात्मक काल्पनिक चरित्र है। इसी तरह और भी कई कार्य हैं, जिनमें उन्होंने व्यंग्यात्मक चित्रों के माध्यम से औपनिवेशिक समाज की आलोचना किये हैं।

उपर्युक्त उल्लेखों से हम पाते हैं कि गगनेन्द्रनाथ टैगोर एक महान चित्रकार एवं कार्टुनिस्ट थे। इनके प्रत्येक चित्र एवं कार्टुन में औपनिवेशिक समाज की व्यंग्यपूर्ण आलोचना पाया जाता है।

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प्रश्न 26.
इल्बर्ट बिल विवाद से क्या समझते हैं ?
या
इल्बर्ट बिल विवाद के बारे में संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर :
इल्बर्ट बिल सन् 1883 ई० में पी०सी० इल्बर्ट ने पेश किया था। यह बिल लाईड रिपन के समय में पारित किया गया था। सर पी०सी० इल्वर्ट लार्ड रिपन की परिषद के विधि सदस्य थे। इस विधेयक में भारतीय न्यायाधीशों के प्रति कहा गया था कि भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपियन अपराधियों के मुकदमें सुनने का अधिकार दिया जाय। परन्तु ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं यूरोपियन रक्षा संघ ने इस बिल का भारत एवं इंग्लैण्ड में विरोध किया जिससे यह बिल एक विवाद का विषय बन गया। इसीलिए इस बिल को ‘इल्बर्ट बिल विवाद’ (libert Bill Controvecy) कहते हैं।

इस बिल के विरोध में यूरोपियन संघों ने जो आन्दोलन चलाया उसका प्रभाव भारत की राजनीति पर गहरा पड़ा, जो निम्न रूप में उल्लेखित है –
1. यूरोपियनों ने इल्बर्ट बिल के विरोध में एक होकर आन्दोलन चलाया, इसने भारतीयो की आँखें खोलने का काम किया।
2. भारतीयों को समझ में आ गया कि उन्हें सरकार से कुछ भी पाने के लिए एक होकर संघर्ष करना पड़ेगा।

उपर्युक्त विवरणों से पाते हैं कि इल्बर्ट बिल विवाद राष्ट्रीय नहीं बल्कि अन्तराष्ट्रीय समस्या या विवाद था।

प्रश्न 27.
क्या आप मानते हैं कि 1857 ई० का विद्रोह मुस्लिम सत्ता की पुन: स्थापना का प्रयास था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
ऐसा माना जाता है कि सन् 1857 के विद्रोह का प्रमुख कारण भारत में मुसलमानों की सत्ता की पुन: स्थापना की अर्थात् मुस्लिम सत्ता को किस प्रकार से भारत में पूर्ण रूप में स्थापित किया जाय तथा भारत में मुस्लिम धर्म का प्रचार-प्रसार किस प्रकार से हो। इसी आधार पर मुसलमानों ने हिन्दुओं के विरूद्ध षड्यंत्र करना शुरू कर दिया।

जिसका परिणाम 1857 ई० का विद्रोह था, जिसमें मुसलमानों ने हिन्दुओं के शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे। इसकी पुष्टि प्रसिद्ध इतिहासकार ‘सर जेम्स आउटरम’ ने किया। स्मिथ ने भी इसका सर्मथन किये। इस आधार पर हम देख पाते हैं कि यह विद्रोह भारतीय मुसलमानों का बड्बंत्र था। इतना ही नहीं यह मुसलमान मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय या जफर के नेतृत्व में मुस्लिम सत्ता स्थाप्ति करना चाहते थे। इस विद्रोह का नेतृत्व बाद में बेगम हजरत महल ने भी की।

परन्तु, देखा जाय तो सर जेम्स आउटरम की यह कथन अर्थहीन एवं असत्य है, क्योंकि यह कांति पूर्ण रूप से भारतीय स्वतंत्रता के लिये हुआ था, जिसमें विभिन्न नेताओं ने अपना योगदान दिये। जैसे – नाना साहब, तात्या टोपे, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, कुवँर सिंह, मंगल पाण्डेल तथा मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर या द्वितीय आदि। इसीलिए यह विद्रोह मुस्लिम सत्ता की पुन: स्थापना का प्रयास न होकर भारतीय स्वतंत्रता की स्थापना का प्रयास था।

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प्रश्न 28.
‘आनन्दमठ’ का प्रसिद्ध गीत ‘वन्देमातरम्’ के महत्व पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
‘आनन्दमठ’ उपन्यास की रचना बंकिम चन्द्र चटर्जी जी ने सन् 1882 में किया। इस कृति की रचना बंगला भाषा में किया गया था जिसकी पृष्ठभूमि की शुरूआत सन् 1771 के बंगाल के अकाल के समय से होती है।
बंकिम चन्द्र चटर्जी ने अपनी उपन्यास ‘आनन्दमठ’ मे ‘वन्देमातरम’ शीर्षक गीत की रचना किये थे। महत्वपूर्ण दृष्टि से इस गोत ने बंगाल विभाजन के समय न केवल बंगालियों बल्कि समस्त भारतवासियों के भीतर राष्ट्रीय प्रेम तथा देशर्ति की भावना को विस्तृत किया था।
मुख्य रूप से बंगाल प्रदेश की क्रांति के लिए यह गीत भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह गीत पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति की भावना फूँक दिया था। ऐसा लगता था मानो कि समस्त भारतवासी अंग्रेजो को कुचल डालेंगे।

ऐसा माना जाता है कि सन् 2003 में वी०वी०सी० वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ‘वन्दमातरम्’ गीत चयनित शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था। अर्थात् इस आयोजन में दुनिया भर के 7000 गीतों को रखा गया था तथा 155 देश के लोगों ने इसमें अपना मतदान किया था।
राष्ट्रीय प्रम एवं देशभक्ति के आधार पर देश के स्वतंत्रत होने के बाद इस गीत को राष्ट्रगीत का मान्यता दिया गया ।

प्रश्न 29.
वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट के बारे में लिखिए।
उत्तर :
भारतवर्ष में भारतीय समाचार पत्रों ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाया जिसके कारण भारतीय समाचार पत्रों ने समस्त भारतवर्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति का आह्नान शुरू कर दिया। देखते ही देखते यह क्रान्ति समस्त भारतवर्ष में आग का रूप ले लिया। भारतीय समाचार पत्रों की भूमिका अंग्रेजों की समस्या बन चुकी थी ।

अंग्रेजी प्रशासन ने भारतीय समाचार पत्र पर लगाम लगाने के लिए लार्ड लिटन को नियुक्त किया । लार्ड लिटन ने ‘भारतीय भाषा समाचार पत्र अधिनियम’ (Vernacular Press Act) को सन् 1878 में पास किया जिसके तहत भारतीय समाधार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। समस्त भारतीय समाचार पत्रों ने इस अधिनियम (Act) का विरोध किया परन्तु ‘पायनियर अखबार’ इस अधिनियम का समर्थन किया था। बाद में चलकर नियुक्त लार्ड रिपन ने इस अधिनियम को सन् 1882 में समाप्त कर दिया जिसके तहत भारतीय समाचार पत्रों पर लगी प्रतिबंध समाप्त हो गयी और स्वतंत्र रूप से भारतीय समाचार पत्र अपना कार्य करने के लिए सक्षम हो गया।

विवरणात्मक प्रश्नोत्तर (Descriptive Type) : 8 MARKS

प्रश्न 1.
1857 ई० के विद्रोह का स्वरूप या प्रकृति एवं विशेषताओं का वर्णन करें। $5+3$ (M. P. 2017)
उत्तर :
सन् 1857 के विद्रोह के स्वरूप (Nature) के सम्बन्ध में इतिहासकारों में बड़ा मतभेद रहा है। इस घटना का इतिहास लेखन किस रूप में किया जाये, यह अभी तक चर्चा का विषय बना हुआ है। पाश्चात्य विद्वानों ने इसे सिपाही विद्रोह, सामन्तवादी प्रतिक्रिया एवं मुस्लिम षड्यंत्र आदि की संजा दी है। दूसरी ओर अधिकांश भारतीय इतिहासकार इसे राष्ट्रीय आन्दोलन स्वीकार करते है जो भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया। मोटे तौर पर विविध विचारधाराओ को दो पक्ष मान सकते हैं।

एक विचारधारा के समर्थकों में लारन्स, जॉन केची, राइसहोम, आउट्रम, मैलीसन, ट्रेविलियन, राबिन्सन, सीले, राबर्ट्स, स्मिथ एवं आर०सी॰ मजुमदार को रखा जा सकता है। इन लेखकों का उद्देश्य निष्पक्ष राय देना नहीं था बल्क यह सिद्ध करना था कि इस विशाल क्षेत्र पर फैले विद्रोह का मूल कारण भारत सरकार की नीतियाँ एवं प्रशासनिक कमजोरी न थी बल्कि सैनिक द्वारा प्रारम्भ किया गया यह विद्रोह था जिसका मूल कारण सैनिकों में व्याप्त असंतोष था जिसमें सामन्तों एवं मुस्लिम वर्ग ने अपने स्वार्थवश सहयोग दिया।

दूसरे पक्ष के समर्थक विद्वानों में विनायक दामोदर सावरकर, सुरेन्द्रनाथ से, शशिभूषण चौधरी, पूरनचद जोशी तथा अशोक मेहता आदि का उल्लेख किया जा सकता है। ये विद्वान 1857 ई० के विद्राह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं।

विभिन्न स्वरूपों के आधार पर 1857 ई० के विद्रोह को निम्नरूप जाना जा सकता है :-

सैनिक विद्रोह : सर जॉन सीले के अनुसार, यह एक पूर्णतया देश भक्तिहीन और स्वार्थ सिद्ध सैनिक विद्रोह था इतना ही नहीं, सर जॉन लॉरिन्स ने भी इस विद्रोह को सैनिक विद्रोह कहा है और इसका प्रमुख कारण ‘चर्बी वाले कारतूस’ को घटना को बताया है। जिसमें बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डे सहित कई भारतीय सैनिकों ने गाय एवं सुअर की चर्बी से बने कारतूस को मुँह में लेने से साफ इन्कार कर दिये थे, (यह एक विशेष प्रकार की कारतूस थी जो मुँह से काटना पड़ता था।) अतः अंग्रेजी सेना ने उनको पकड़कर फाँसी दे दिया। यह खबर आग की तरह पूरे उत्तर भारत में फैल गयी जो इस विद्रोह के शुरू होने का प्रमुख कारण है। इसीलिए इस विद्रोह को सैनिक विद्रोह कहा जाता है।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम : 1857 ई० के विद्रोह को विनायक दामोदर सावरकर, अशोक मेहता, सुरेन्द्रनाथ सेन, शशिभूषण चौधरी तथा पूरनचंद जोशी आदि जी ने भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा है । क्योंकि उनका मानना है कि देश का यह प्रथम राष्ट्रीय आन्दोलन था जिसमें समस्त धर्म, जाति, जमीन्दार एवं ठेकेदार ने भाग लिया था। प्रथम बार भारतीयों ने महसूस किया कि अब हमें अपने देश की आजादी के लिए लड़ना चाहिए। इसीलिए इन विद्वानों ने इस विद्राह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा है।

मुस्लिम सत्ता को पुनःस्थापित करने का प्रयास : सर जेम्स आउट्रम के विचार से यह राष्ट्रीय आन्दोलन नहीं था बल्कि मुस्लिम सत्ता को पुन रस्थापित करने का एक षड्यंत्र था जिसने हिन्दुओं की कठिनाइयों का लाभ उठाया और चर्बी लगे कारतूसो ने इस घटना को द्विगुणित कर दिया। स्मिथ ने आउट्रम के मत का समर्थन करते हुए लिखा है, यह सामन्तवादी पड्यंत्र था जिसकी नींव को मेरठ की दुर्घटना (चिंनगारी) ने समय से पहले ही उखाड़ फेंका।

सामन्ती विद्रोह : डॉ॰ आर० सी० मजुमदार, सुरेन्द्रनाथ सेन, मार्क्सवादी विधारक आर० पी० दत्त और केम्ब्रिज इतिहासकार इरिक स्टोक्स के अनुसार, यह विद्रोह सामन्तों का विद्रोह था। उनके अनुसार यह उनकी अन्तिम परम्परावादी विद्रोह माना जाता था।

उपर्युक्त विवरणों से हम पाते हैं कि 1857 ई० का विद्रोह के स्वरूप में विभिन्नता पायी जाती है, जो महत्वपूर्ण तो है, साथ ही साथ यह विद्रोह एक नयी पीढ़ी का सृजनात्मक प्रतिक्रिया का परिणाम भी माना जाता है।

भारतीय इतिहासकारों एवं विद्वानों तथा पाश्चात्य इतिहासकारों एवं विद्वानों द्वारा दिये गये विवरणों में अभी भी मतभेद की भावना निहित है। अर्थात् 1857 ई० के विद्रोह का स्वरूप अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है कि यह विद्रोह सैनिक विद्रोह था या प्रथम स्वतंत्रता सग्राम है। अगर हमलोग 1857 ई० के विद्रोह की विशेषताओं की बात करें तो इस विद्रोह के स्वरूप में ही इसकी विशेषताएँ छिपी हुई हैं।

1857 ई० का विद्रोह विशेष तौर पर एक सिपाही विद्रोह (Sepoy Munity) तथा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है जिसमें अनेको भारतीय नायकों ने अपने देश के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिये। इतना ही नहीं, यह विद्रोह धीरेधीरे राष्ट्रीय आन्दोलन भी बन गया था। गौर करने की बात यह है कि देश का यह पहला विद्रोह था जिसमें प्रत्येक धर्म एवं जाति के लोगों ने भाग लिया था। इस विद्रोह की ये सभी बड़ी विशेषताएँ मानी गयी हैं। इसके अतिरिक्त इस विद्रोह की अन्य भी विशेषताएँ हैं जैसे- देश का यह पहला विद्रोह था जिसने अंग्रेजों की कमर तक तोड़ दिया।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 4 संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण

प्रश्न 2.
1857 ई० की क्रान्ति के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं तत्कालिन कारणों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
1857 ई० की क्रान्ति के कारण : बहादुर शाह जफर द्वितीय के नेतृत्व में शुरू हुआ, 1857 ई० की क्रान्ति अंग्रेजों के विरूद्ध भारतीय द्वारा एकजुट होकर स्वतंत्रता के लिए लड़ा जाने वाले पहला विद्रोह, क्रान्ति थी, ललकार था। अतः इस विद्रोह के महत्वपूर्ण कारण निम्नलिखित है –
i. राजनीतिक कारण : 1857 ई० की क्रान्ति का राजनीतिक कारण लार्ड डलहौजी (अग्रेजों) की राज्य हड़प नीति थी, इस नीति के कारण भारतीय राजाओं में यह भय फैल गया था, कि अंग्रेज धीरे-धीरे उनके राज्यों को छीनकर अंग्रेजी राज्य में मिला देंगे, क्योंकि इससे पहले अंग्रेजों ने कई भारतीय राज्यों को अपने राज्य में मिला लिया था। सताड़ा, लाई डलहोजी की अपहरण नीति का शिकार बनने वाला पहला राज्य था।

इसके अलावा अंग्रेजों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह जफर को अपमानित करके लाल किले से बाहर निकाल दिया, सिक्कों पर से नाम हटा दिया, सम्पत्ति जब्त कर ली, उनके पेंशन को भी बन्द कर दिया, अनेक राजाओं के किलों को तोड़ दिया गया, इस प्रकार देशी राजाओं के राज्यों के खत्म होंने से लाखों लोग बेरोजगार हो गये। इन्हीं सब राजनीतिक कारण से अंग्रेजों के विरुद्ध देश में एक व्यापक जनविरोधी भावना तैयार हुई। जिसका विस्फोट 1857 ई० की क्रान्ति के रूप में प्रकट हुआ।

ii. सामाजिक कारण : अंग्रेजों की सदैव से यही सोच रही है, कि वे सम्पूर्ण विश्व में सबसे ऊँची और बुद्धिमान जाती है, शेष उनसे नीचे है । यह स्थिति भारतीयों के प्रति और खराब थी, वे भारतीयों को काले तथा कुत्ते कहा करते थे। उनकों नीच दृष्टि से देखते थें, उनके द्वारा संचालित पार्क, होटल, रेलवे के प्रथम क्षेणी के डिब्बे पर मोटे-मोटे अक्षरों से लिखा हुआ रहता था, कि – “कुत्ते और भारतीय के लिए प्रवेश वर्जित है’ (No Entry to dog and Indian) इतना ही नहीं अंग्रेज भारतीयों के निजी-सामाजिक जीवन में भी दखल देने लगें थे, वे सती प्रथा बाल-विवाह की प्रथा की अंत करके विधवाविवाह को बढ़ावा दे रहे थे।

हिन्दू रीती-रीवाज परम्परा का खुलेआम निंदा करते थें, अपनी सभ्यता और संस्कृति का बड़ाई कर भारतीय को नीचा दिखाते थें। भारतीय महिलाओं के साथ र्दुव्यवहार करते थे, जिस प्रकार किसी भी अवसर पर भारतीय को अपमान करने से नहीं चूकते थे। अंग्रेजो की भारतीयों के सामाजिक जीवन में इस तरह की दखलअदाजी स्वीकार नहीं थी, अत: भारतीयों का अंग्रेजों के प्रति नफरत बढ़ता गया, जो 1857 ई० की क्रान्ति के रूप में प्रकट हुआ।

iii. आर्थिक कारण : अंग्रेजों ने अपनी उपनिवेशिक शोषण नीति से भारत के सभी उद्योग-धंधे, व्यापार व्यवसाय, कृषि सब नष्ट कर दिये थे, जिससे देश की आर्थिक स्थिति एक-दम खराबं हो गयी थी, उस पर से असमय अकाल, सूखा, बाढ़ की स्थितियों ने भारतीयों को और दरिद्र बना दिया था, उस पर अंग्रेजों की नयी भूव्यवस्था के कारण जमीन्दारों द्वारा किसानों की भूमि छीनने और उनपर अत्याचार की घटनाएँ बढ़ गयी थी।

अधिकांश लोग बेरोजगार हो गये थे, और अग्रेज का गुलाम बन कर जीवीकापार्जन के लिए मजबूर हो गये थे, इस प्रकार भारतीय का आर्थिक शोषण कर अंग्रेज मालामाल हो गये थे। एसो-आराम की जिन्दगी जी रहे थे। दूसरी तरफ भारतीय जी-तोड़ मेहनत के बाद भी दो जून (वक्त) को रोटी के लिए तरस रहे थे। यही आर्थिक विषमता और असंतोष ने 1857 ई० में भारतीयों को अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने-मरने के लिए विवश कर दिया था।

iv. धार्मिक कारण : 1813 ई० के कम्पनी चार्टर के एक्ट द्वारा ईसाई मिशनरियों को भारत आने की सुविधा प्राप्त हो गयी और वे भारत आकर बिना रोक-टोक के ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करने लगे, वे जेल के कैदियों को नियमित रूप से ईसाई धर्म की शिक्षा देने लगे। लड़कियों के लिए नियमित ईसाई धर्म का शिक्षा दिया जाने लगा। ईसाई धर्म स्वीकार करन वाले सैनिकों को पद उन्नति का लालच दिया जाने लगा, 1850 ई० में धार्मिक अयोग्यता कानून पास करके हिन्दू धर्म के नियमों और कानून को बदल दिया गया।

हिन्दू धर्म में पहले नियम था कि धर्म परिवर्तन करने वाले हिन्दुओं को पिता के सम्पत्ति से वंचित कर दिया जायेगा, किन्तु अंग्रेजों ने इस नियम (कानून) को बदल दिया कि जो ईसाई धर्म स्वीकार करंगा उस पिता के सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। इसी प्रकार उन्होंने सती प्रथा, बाल-विवाह प्रथा, गोद लेने की प्रथा को समाप्त कर दिया एवं विधवा विवाह को अनुमति दे दी।

एक अंग्रेज अधिकारी ने कहा था, कि – “हमारा भारत पर अधिकार करने का अंतिम उद्देश्य है, कि हम भारत को ईसाई देश बना दे।” हिन्दू धर्म में अंग्रेजों एवं उनके कार्यों को शंका की दृष्टि से देखने लगे, उनके इस सब कायों ने भारतीयों के आक्रोश एवं असंतोष की भावना को बढ़ावा दिया जिसका अंतिम परिणाम 1857 ई० का विद्रोह हुआ था।

v. तत्कालीन कारण : 1857 ई० के विद्रोह का तत्कालीन कारण गाय और खुअर की चर्बी से बने कारतूस की प्रयोग वाली घटना थी। अंग्रेजों ने सेना के लिए एक नयी राइफल एण्ड्रफिल देने का निश्चय किया जिसमें प्रयोग होने वाली गोली के मुहँ पर गाय या सुअर की चर्बी लगी होती थी। जिसको प्रयोग करने से पहले दाँत से नोचकर बन्दुक में भरनो पड़ती थी।

बैरकपुर छावनी के सैनिकों ने इस कारतूस का प्रयोग करने से इन्कार कर दिया, किन्तु रेजीमेण्ट के मेजर हुयडसन ने बार-बार गोली चलाने के लिए दबाव डालने लगा तब रेजीमेन्ट के एक सैनिक मंगल पाण्डे ने उस अधिकारी को गोली मार दी. यह घटना पूरे देश में आग की तरह फैल गयी, और 1857 ई० की क्रान्ति की ज्वाला धधकती गयी। इस प्रकार 1857 ई० की क्रान्ति में कारतूस वाली घटना तत्कालीन कारण बनी।

इस क्रान्ति में कैप्टन गार्डन एक मात्र अंग्रेज अधिकारी था, जो भारतीयों की ओर से लड़ा था। सम्पूर्ण भारत में 31 नई 1857 ई० के यह क्रान्ति सुनिश्चित थी, परन्तु बंगाल के मंगल पाण्डे के कारतूस वाली घटना ने यह क्रान्ति 29 मार्च को ही शुरू हो गयी थी।

vi. सैनिक कारण : 1857 ई० के क्रान्ति के विद्रोह का सैनिक कारण अंग्रेज सैनिकों की अपेक्षा भारतीय सैनिको को कम वेतन दिया जाना था। साथ ही भारतीय सैनिकों के साथ भेद-भाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों का समुद्र पार करना अनिवार्य कर दिया गया था। सैनिको को पगड़ी की जगह चमड़े की टोपी अनिवार्य कर दिया गया। सैनकों के चिट्ठी पर शुल्क लगा दिया गया था। इन्हीं सब कारणों से भारतीय सैनिकों का अंग्रेजों के प्रति असंतोष बढ़ता गया, यही असंतोष सैनिक विद्रोह की आधारशिला बनी।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 4 संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण

प्रश्न 3.
19 वीं शताब्दी को समितियों का युग क्यों कहा जाता है ? इसका स्पष्टीकरण करते हुए इस शताब्दी में स्थापित कुछ प्रमुख समिंतियों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध (बाद का समय) की युग को सभा-समितियों का युग कहा जाता है, क्योंकि इस काल में 1857 ई० की क्रान्ति के बाद मध्यमवर्गीय भारतीय जनता ने महसूस किया कि बिना संगठित राजनैतिक संगठन के अंग्रजों के विरूद्ध न लड़ा जा सकता है, और न इन्हें भारत के बाहर खदेड़ा जा सकता है। अतः राजनैतिक सभा-संगठन और समितियों की आवश्यकता को महसूस करते हुए अनेको राजनीतिक संगठन जैसे – जमींदार संगठन, बम्बई एसोसियेशन, बंगाल ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी, हिन्दू मेला, डक्कन एसोसियेशन, मद्रास एसोसियेशन, भारतीय सभा, पूना सार्वजनिक सभा जैसे सैकड़ो संगठन की स्थापना हुई इसलिए डॉ० अनिल सेन ने 19 वी सदी को समितियों का युग कहा है।

19 वीं शताब्दी में स्थापित प्रमुख समितियाँ : डॉ॰ अनिल सेन ने 19 वी शताब्दी को समितियों का युग कहा है । उनमें से कुछ प्रमुख सभा-समितियों और संगठन का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
i. बंग भाषा प्रकाशिका सभा : इस सभा की स्थापना 1836 ई० में राजा राममाहन राय और गौरी शंकर वांगोस ने कलकत्ता में की थी। इस सभा को बंगाल का प्रथम राजनैतिक संगठन माना जाता है। इसकी स्थापना का उद्देश्य सरकारी क्रियाकलापी नीतियों की समीक्षा कर उसमें सुधार लाने के लिए ब्रिटिश सरकार के पास प्रार्थना पत्र भेजना था, आगे चल कर ये संस्था देश के विभिन्न भागों में राजनीतिक संगठन स्थापित करने और ब्रिटिश सरकार के शोषण और अत्याचार को जनता के बीच कर उनमें राष्ट्रीयता और देशप्रेम की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ii. जमींदार सभा : ह्यूडोर डेकेन्स नामक अंग्रेज वकील के सलाह पर 1838 ई० में द्वारिकानाथ टैगोर और राधाकान्त देव ने बंगाल के जमींदारों के अनुरोध पर जमींदारी सभा की स्थापना कलकत्ता में की थी, इसका उद्देश्य जमींदारों के हितों की रक्षा करना, भारतीय जनता के लिए सरकार से कुछ राजनीतिक अधिकार व सुविधाएँ प्राज्त करना था। ये देश का पहला राजनीतिक संगठन माना जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम देश में राजनीतिक एवं सांविधानिक सुधारों की माँग शुरू की। यद्यपि यह संगठन जमीदारो एवं धनी वर्गों का संगठन था तथापि इसने किसानों और प्रजा के हित के लिए भी कई कार्य किये।

iii. भारतीय सभा (Indian Association) : भारतीय सभा की स्थापना 1876 ई० में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और आनन्द मोहन बोस ने कलकत्ता के एलबर्ट हॉल में की थी। यह देश में कांग्रेस की स्थापना से पूर्व पूरे देश का महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली संगठन था।
इस संगठन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य है –
(a) देश के लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना।
(b) सभी जाति, धर्म, सम्पदाय के लोगों में एकता स्थापीत करना।
(c) सिविल सर्विस परीक्षा में भारतीयों के साथ किये जाने वाले भेद-भाव का विरोध करना था।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने पूरे देश में श्रमण कर सिविल-सर्विस परीक्षा के स्थान, तौर-तरीकों, वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, इलबर्ट बिल-विवाद जैसे विषयों को लेकर पूरे देश में प्रचार और आन्दोलन किया तथा अपने द्वारा सम्पादित ‘बंगाली’ समाचार पत्र को मुख्य हथियार के रूप में प्रयोग किया। अन्त: 1885 ई० में इस संगठन का कांग्रेस में विलय कर दिया गया।

iv. हिन्दू मेला : बंगाल के महान राष्ट्रेमी राज नारायण बोस के चर्चित शिष्य नव गोपाल मित्र ने 1867 ई० में कलकत्ता में हिन्दू मेला नामक संगठन की स्थापना की। यह मूल रूप से एक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन था, इसकी स्थापना का उद्देश्य देश के युवाओं में खेल-कूद, कला, शिक्षा, कुश्ती, सांस्कृतिक प्रतियोगिता आदि के माध्यम से युवाओं में अपनी भाषा सभ्यता और संस्कृति के प्रति रूचि पैदा करना, उसे श्रेष्ठ बनाने का निर्माण करना, और उनमें राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावना को जागृत करना और राष्ट्र के नव निर्माण में योगदान देना था।

v. थियूसोफिकल सोसाइटी : मूलतः इस सोसायटी की स्थापना 1856 ई० में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में रूसी महिल एच० पी० ब्लावटिस्ट तथा अमेरिका कर्नल अर्कात् ने की थी। थियोसाफिकल शब्द ग्रीक भाषा के ‘धियोमोफिया’ से बना है, जिसका अर्थ होता है ‘ईश्वर का ज्ञान’। इस संस्था ने भारत के धर्म, शिक्षा और संस्कृति से प्रभावित होकर 1882 ई० में कर्नल अर्कात् ने इसकी एक शाखा मद्रास में स्थापित की जिसका उद्देश्य भारत के लोगों में राष्ट्रीय गौरव और भाईचारे की भावना का विकास करना था। आगे चलकर यह संस्था भारत में सामाजिक एवं राजनीतिक सुधार एवं जागरण का प्रमुख केन्द्र बन गई।

1893 ई० में विवेकानन्द जी ने भारत के प्रतिनिधि के रूप में न्यूयॉर्क के विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लिया और उनके विचारों से प्रभावित होकर आयरलैण्ड की महिला श्रीमती Annie Besant भारत आयी। वह पहले ही इंग्लैण्ड में थियोसोफिकल सोसाइटी की सदस्य बन चुकी थी, उनका भारत के वेदों, संस्कृति और विवेकानन्द के विचारों से विशेष लगाव था, वे भारत आने के बाद ईसाई धर्म को छोड़कर हिन्दू धर्म को ग्रहण की और जीवन भर हिन्दू धर्म, समाज और माँ भारती की सेवा करती रही,

उन्होंने 1913 ई० में ‘भारतीय स्वराज लीग’ नामक संगठन की स्थापना की, और उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर 1916 ई० में होमरूल आन्दोलन की शुरूआत की, जिससे देश के लोगों में राजनीतिक भावना जागृत हुई, उनके इसी अमूल्य योगदान को देखते हुये 1917 ई० में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया, जो कांग्रेस पार्टी की पहली महिला अध्यक्ष थी, इस प्रकार थियोसोफिकल सोसायटी और भारत में उसके अध्यक्ष एनी बेसन्ट ने मरते दम तक मातृभूमि की रक्षा और देश की स्वतंत्रता के लिये कार्य करती रही।

vi. एसियाटिक सोसाइटी : 1784 ई० में सर विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना कलकत्ता में की थी। इस संस्था की स्थापना का उद्देश्य भारत में पथ्चिमी ज्ञान-विज्ञान का प्रचार करना था, आगे चलकर यही संस्था देश का पहला संग्रहालय बना जो आज ‘भारतीय राष्ट्रीय संग्रहालय’ के नाम से जाना जाता है। इसमें इतिहास, राजनीति, धर्मविज्ञान, जीव जन्तुओं एवं अन्य ज्ञानोपयोगी वस्तुओं का संग्रह करके रखा गया है, जो विभिन्न क्षेत्रों में शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 4 संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण

प्रश्न 4.
भारत की क्रान्तिकारी समितियों के रूप में ‘इण्डियन एसोसिएशन’ का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। अथवा, राजनैतिक समिति के रूप में ‘इणिडयन एसोसिएशन’ की भूमिका का वर्णन करो।
उत्तर :
भारत की क्रान्तिकारी गुप्त समितियों के रूप में ‘इण्डियन एसोसिएशन’ की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। 18 वों सदी के अन्त तक तथा 19 वीं सदी के प्रारम्भ में भारत में कई गुप्त समितियों का अविर्भाव हुआ था। इनमें से ही एक ‘इण्डियन एसोसिएशन’ थी। यह संस्था भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करती थी। ऐसे तो हमलोग जानते हैं कि भारत में 19 वीं सदी के प्रारम्भ का समय ‘समितियों का समय’ माना जाता है।

डों० अनिल सेन ने इस समय को ‘समितियों का युग’ (Age of Association) से विभूषित किये थे। सभी संस्थाएँ भारत में अंग्रेजी प्रभाव को कम करने के लिए ही बनी थी जिसका एक ही मकसद था, देश से अंग्रेजों को भगाना। इसी संदर्भ में सभी समितियों या संस्थाओं को गठित किया गया था। इन सभी संख्थाओं में ‘भारत सभा’ (Indian Association) ने देश को आजादी दिलाने में अथक प्रयत्न किया। गुप्त समिति के रूप में तथा देश को आजादी दिलाने के संदर्भ में भारत सभा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भारत सभा (Indian Association) : भारत में गुप्त समितियों के रूप में ‘भारत सभा’ की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस संस्था की स्थापना सुरेन्द्रनाथ बनजीं तथा आनन्द मोहन बोस ने सन् 1876 में अल्बर्ट हॉल (Elbert Hall), कलकत्ता में किये। ‘भारत सभा’ के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी माने जाते थे, जबकि आनन्द मोहन बोस इसके सचिव माने जाते थे। बाद में इसके अध्यक्ष कलकत्ता के प्रमुख बैरिस्टर मनमोहन घोष चुने गए। इस संस्था के अन्य संस्थापकों में शिवनाथ शाख्ती तथा द्वारकानाथ गंगोपाध्याय भी थे।

‘भारत सभा’ के निर्नलिखित उद्देश्य थे, जिनमें –

  1. सम्पूर्ण देश में लोकमत का निर्माण करना
  2. हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एकता एवं मैत्री को स्थापित करना।
  3. सामूहिक आन्दोलनों में किसानों का सहयोग प्राप्त करना। तथा
  4. विभिन्न जातियों में एकता के सूत्र को संचार करना एवं उनके सहयोग को प्राप्त करना इत्यादि।

इस संस्था के विभिन्न शाखाएँ विभिन्न क्षेत्रों में थी। जैसे- आगरा, कानपुर, लखनऊ, मेरठ एवं लाहौर इत्यादि।
‘भारत सभा’ के उद्देश्य का क्षेत्र केवल इंतना तक ही सीमित नहीं था, इस संस्था के नेतृत्व में कई आन्दोलन चलाये गये, जो इनका प्रमुख उद्देश्य भी माना जाता था। ये आन्दोलन कुछ इस प्रकार के थे-
1. सिविल सर्विस परीक्षा विरोधी आन्दोलन : ‘भारत सभा’ के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने सिविल सर्विस परीक्षा को भारत में आयोजित किये जाने के उद्देश्य से सिविल सर्विस परीक्षा विरोधी आन्दोलन चलाये। जब लार्ड सेल्वरी ने भारतीयों को ‘इण्डियन सिविल सर्विस’ की परीक्षा से वंचित करने के उद्देश्य से परीक्षा में बैठने की उम्म 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दिया, तो सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने उम्र 19 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने के लिए आन्दोलन चलाया।

2. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट विरोधी आन्दोलन : भारत सभा के संस्थापक सुरन्द्रनाथ एवं उनके साथियों नें मिलकर वर्नाक्यूलर प्रेंस एक्ट विरोधी आन्दोलन चलाये। जब लार्ड लिटन ने सन् 1878 ई० में यह एक्ट लागू कर भारतीय समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, तब इसके विरोध में ‘भारत सभा’ ने यह आन्दोलन चलाया।
इसके अंतिरिक्त ‘भारत सभा’ ने और कई आन्दोलन चलाये, जिनमें आर्म्स एक्ट तथा इल्बर्ट बिल आद्य महत्वपूर्ण माना जाता है।

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प्रश्न 5.
‘भारतमाता’ के चित्र एवं ‘गोरा’ उपन्यास के द्वारा भारतीयों में राष्ट्रीयता का विकास किस प्रकार हुआ?
या
भारतीय साहित्यिक कृतियों तथा चित्रकला के रूप में ‘भारतमाता’ के चित्र एवं ‘गोरा’ उपन्यास का वर्णन करें। 4 + 4 = 8
उत्तर :
भारतीय साहित्यिक कृतियों तथा चित्रकला के रूप में ‘भारतमाता’ के चित्र एवं ‘गोरा’ उपन्यास की भूमिका को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। इन दोनों कृतियों ने भारतीय राष्ट्रीयता को भारतवासियों के मध्य संचार किया है। 19 वी शताब्दो के प्रारम्भ में इन दोनों कृतियों ने भारतवासियों के भीतर राष्ट्रवाद की भावना को भरा है। राष्ट्रवाद की भावना को जन्म देने का कार्य कई और पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों ने किया जिनमे अमृत बाजार पत्रिका, द हिन्दु, स्वंदेश मित्रम इण्डियन मिरर, सोम प्रकाश, संवाद प्रभाकर तथा संजीवनी आदि प्रमुख थे।

इन सभी पत्र-पत्रिकाओं ने भारतवासियां के भीतर राष्ट्रवाद, देश प्रेम एवं देश- भक्ति आदि की भावनायें जागृत करने में महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। ठीक इसी भॉन ‘गारा उपन्यास एवं ‘भारतमाता’ का चित्र ने भी भारतीयों के भीतर राष्ट्रवाद, देश-प्रेम एवं देश- भक्ति की भावना का जागृत किये हैं तथा अपने देश को अंग्रेजों के बंधनों से मुक्त कराने का प्रयास किये। 19 वी सदी के प्रारम्भ में ये भावनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गयी और चारों तरफ भारतीय साहित्यिक कृतियों की बोल-बाला होने लगा।

‘भारतमाता’ का चित्र : 19 वीं शताब्दी में चित्रित इस चित्र ने भारतवर्ष में राष्ट्रीयता का प्रचार-प्रसार किया। संन् 1905 में अवनीन्द्रनाथ टैगोर जी ने ‘भारतमाता’ का एक चित्र बनाया जी विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे- ‘भारताम्ब्रा’ (Bharatamba) और ‘बंगमाता’ (Bangmata) आदि। ये चित्र भारतवासियों को जागृत करने के लिए बनाया गया था।

जब अंग्रेज हमारे भारतवासियों को अपना गुलाम बना लिये थे तथा उन पर घोर अत्याचार किया जा रहा था, तब अवनीन्द्रनाथ टैगोर जी ने ऐसे मुश्किल समय में भारतीयों को जाग्रत करने तथा अंग्रेजों से अपने देश को मुक्त कराने के लिए ‘भारतमाता’ का चित्र बनाये थे। अवनीन्द्रनाथ टेगोर जी एक महान् चित्रकार तथा लेखक थे। वे गगननेन्द्रनाथ ट्रेगोर जी के छोटे भाई तथा विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर जी के भतीजे थे।

अवनीन्द्रनाथ की ‘भारतमाता’ के चित्र में दर्शाया गया है कि भारतमाता गेरुवा वस्त धारण किये हुए है, हाथां में त्रिशुल लिये हैं तथा साथ में दुष्टों को नाश हेतु शेर भी है। अर्थात् भारतमाता की ऐसे चित्र को देखकर समस्त भारतवासियों के भीतर अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति की भावना जागृत हो उठती है, जो राष्ट्रवाद के विकास का प्रतीक माना जाला है। इसी संदभ्भ में सन् 1936 में सर्वपथम वाराणसी में ‘भारतमाता’ का एक मन्दिर भी स्थापित किया गया, जिसका उद्धाटन स्वय महात्मा गाँधी जो ने किया था। इसके बाद से ही समस्त भारतवासी अपने जूलुसों, हड़तालों तथा समारोहों में ‘भारतमाता’ के चित्र का उपयोग बढ़-चढ़कर करने लगे।

‘गोरा’ (Gora) उपन्यास : ‘गोरा’ उपन्यास एक आकर्षक प्रेम-कथा की विषय-वस्तु है। जिसमे ‘गोरा’ एक प्रमुख नायक के तौर पर है और इसी के नाम पर ‘गोरा’ नाम शीर्षक के रूप में रखा गया है। इस उपन्यास का शीर्षक ‘गोरा’ (Gora) का साहित्यिक अर्थ है ‘गौर वर्ण या जाति’ का व्यक्ति। इस उपन्यास की रचना महान विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैंगोर जी ने सन् 1909 ई० में किया। यह उपन्यास उनके द्वारा रचित बारह (12) उपन्यासों में सें एक है। यह काफी जटिल उपन्यास माना गया है।

‘गोरा’ उपन्यास में एक श्यामल वर्ण के व्यक्ति का वर्णन किया गया है, जो बंगाल नामक प्रदेश में रहता है। इस उपन्यास के आरम्भ से लेकर अन्त तक गोरा, जो कि इस उपन्यास का मुख्य पात्र है, को हिन्दू रीति-रिवाजों को मानते एवं पूजापाट करते दिखाया गया है। रवीन्द्रनाथ टैगोर जी मूलतः एक कवि थे। उनकी बहुर्चर्चित काव्यमयी रचना ‘गोनार्जालि’ पर उन्हें 1913 ई० में विश्य का सर्वोच्च नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। उन्होंने अपनी इस रचना में सामाजिक एवं राजनैतिक रूप, सामाजिक जीवन एवं बुराइयां, बंगाली संस्कृति, राष्ट्रीयता की भावना एवं मित्रता आदि को दर्शाये है –
रवीन्द्रनाथ जी की ‘गोरा’ उपन्यास की रचना देश के तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक दृश्यों की भूमि पर किया गया है।

अत: इससे प्रतीत होता है कि भारतीय साहित्यिक कृतियों एवं चित्रकला के रूप में ‘भारतमाता’ का चित्र एवं ‘गोरा’ उपन्यास की महत्वपूर्ण भूमिका है जिसने देश के केवल नौजवानों को ही नहीं बल्कि समस्त भारतवासियों के अन्दर देशप्रेम एवं देशभक्ति की भावना को भर दिया है।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 4 संगठनात्मक क्रियाओं के प्रारम्भिक चरण : विशेषताएँ तथा विश्लेषण

प्रश्न 6.
महारानी विक्टोरिया के घोषणा-पत्र की प्रमुख शर्तें क्या थीं?
उत्तर :
सन् 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि इसी विद्रोह ने अंग्रेजी सरकार की कमर तोड़ दी थी तथा भारतवासियों में एक जजबा भरी स्वतंत्रता को जन्म दे दिया था। 1857 ई० के विद्रोह के परिणामस्वरूप भारतीय प्रशासनिक मामलों में कई प्रकार के परिवर्तन किये गये और इन परिवर्तनों के आधार पर महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र भी था। गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1858 ई० द्वारा किये गये परिवर्तनों की विधिवत घोषणा 1 नवम्बर, 1858 ई० को इलाहाबाद के मिण्टो पार्क में लार्ड कैनिंग के द्वारा किया गया। इस घोषणा पत्र में विभिन्न बाते कही गयो। जिनमें –
भारतीय शासन की बागडोर ईस्ट इण्डिया से निकलकर इंग्लैण्ड सरकार के हाथों में चली गयी, जिसके तहत घोषणापत्र में वायसराय उपाधि का प्रयोग प्रथम बार हुआ। गवर्नर जनरल का पद भारत सरकार के विधायी कार्य का प्रतीक था तथा सम्राट का प्रतिनिधित्व करने के कारण उसे वायसराय कहा गया, अर्थात् भारत का गवर्नर जनरल अब वायसराय बन गया।

विक्टोरिया की घोषणापत्र में कुछ महत्वपूर्ण नीतियों को स्पष्ट किया गया था। इसका प्रथम भाग राजाओं से संबंधित था। इसमें उनके क्षोभ को शान्त करने के उद्देश्य से अंग्रेजी राज्य की अपहरण नीति या राज्य हड़प नीति के त्याग की बात कही गई, जिसकी चर्चा ‘सहायक संधि नीति’ एवं ‘जब्ती के सिद्धान्त’ नामक अध्याय में की गई है।

भारतीय जनता के लिए धार्मिक सहनशीलता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया। घोषणा में भारतवासियों पर ईसाई धर्म थोपने की इच्छा एवं अधिकारी का स्वत्व भी त्याग दिया गया। इसमें स्पष्ट किया गया है कि भारतीय जनता के धार्मिक जीवन में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा। इस क्षेत्र में अधिकारियों द्वारा किया गया आज्ञा का उल्लंघन रानी की अत्यधिक अप्रसन्नता का कारण होगा।

घोषणापत्र में कहा गया कि शिक्षा, योग्यता एवं ईमानदारी के आधार पर बिना जाति या वंश का ध्यान रखे लोक सेवाओं में जनता की भर्ती की जाय।

भारतीय परम्परागत अधिकारों, रीतिरिवाजों तथा प्रथाओं के सम्मान का उल्लेख किया गया। भारतीय नागरिकों को उसी कर्त्तव्य एवं सम्मान का आश्रासन दिया गया जो सम्राट के अन्य नागरिकों को प्राप्त थे।

भारत में आन्तरिक शान्ति स्थापित होने के बाद उद्योगों की स्थापना में वृद्धि, लोक-कल्याणकारी योजना, सार्वजनिक कार्य तथा प्रशासन व्यवस्था का संचालन समस्त भारतीय जनता के हित में किये जाने की बात कही गई।

विधि निर्माण के समय प्राचीन परम्पराओं एवं व्यवहार को भी ध्यान में रखा जाये। इसी तरह उत्तराधिकार एवं भूसम्पत्ति के मामले में भी पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाय। दूसरे शब्दों में पैतृक भूमि से लगाव को दृष्टिगत रखते हुए भारतवासियों के परम्परागत अधिकारों की रक्षा का आधासन दिया गया। भूमि के अधिकारों को तब तक निभाने की बात कही गई जब तक शासन द्वारा लगाये गये कर (Tax) का भुगतान कृषक वर्ग करता रहे।

भारतीय सैनिकों की संख्या और यूरोपीय सैनिकों की संख्या का अनुपात विद्रोह के पूर्व $5: 1$ था जिसे घटाकर $2: 1$ कर दिया गया। विद्रोह के समय भारतीय सैनिकों की संख्या 2 लाख 38 हजार थी जो घटकर 1 लाख 40 हजार हो गई।

भारत की देखभाल के लिए एक नये अधिकारी ‘भारतीय राज्य सचिव’ (Secretary States of India) की नियुक्ति की गई तथा इनकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक ‘मंत्रणा परिषद’ बनाई गई। इनमें 8 सदस्यों की नियुक्ति सरकार द्वारा एवं 7 की ‘कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स’ द्वारा होनी तय की गई।

इस प्रकार घोषणा में 1857 ई० के विद्रोह के लिए जिम्मेदार, भारतीय नरेशों की अंग्रेजी राज्य की अपहरण नीति, भारतीयों को बलपूर्वक ईसाई बनाने का भय, कृषकों तथा भू-स्वामियों की भूमि अपहरण की शंका के समाधान का प्रयास किया गया । अत: उपर्युक्त व्याख्या से यह देखा जाता है कि 1857 ई० के विद्रोह के परिणामस्वरूप महारानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र को जारी किया गया था जिसके तहत भारतवासियों के पक्ष एवं विपक्ष में बहुत सारी शर्तें या बाते कही गयी थी जो महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

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प्रश्न 7.
भारत के तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक स्थिति पर ‘गोरा’ उपन्यास का क्या प्रभाव पड़ा है ?
उत्तर :
‘गोरा’ उपन्यास महान विश्व कवि ‘रवीन्द्रनाथ टैगोर’ द्वारा रचित एक जटिल उपन्यास है जिसकी रचना इन्होने सन् 1909 में किया गया था। इन्होंने ‘गोरा’ उपन्यास का गठन देश के तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक दृश्यों की भूमि पर किये हैं। इसी कारण इस उपन्यास के नायक गोरा में हम दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण तथा ऐनी बेसेंट की भूमिका को पाते हैं।

‘गोरा’ उपन्यास में एक श्यामल वर्ण के व्यक्ति का वर्णन किया गया है, जो बंगाल नामक प्रदेश में रहता है। टैगोर जी ने अपनी रचना में सामाजिक एवं राजनैतिक रूप, सामाजिक जीवन एवं बुराईयाँ आदि का वर्णन किये हैं।

‘गोरा’ उपन्यास ने हिन्दू समाज के विभिन्न बुराईयों तथा महिलाओं के ऊपर हुए अत्याचार को प्रदर्शित किया है। जो तत्कालीन भारत के सामाजिक स्थिति पर प्रभाव डालता है और जिसके माध्यम से ‘गोरा’ नायक हिन्दू धर्म की तमाम संकीर्णताओं को तोड़कर देशभक्त हो जाता है।

इतना ही नहीं, टैगोर जी ने विधवाओं की नारकीय जीवन का वर्णन ‘हरिमोहिनी’ पात्र के द्वारा किये हैं, जिसमें कहा गया है कि बंगाली संस्कृति में प्रेम-विवाह वर्जित है। इन्होंने भारतीय बंगाली समाज में प्रेम-विवाह की भावना को भी जन्म दिये है तथा मध्यम वर्गों को सम्मानित स्थान दिये हैं।

तत्कालीन भारत के राजनीतिक स्थिति पर ‘गोरा’ उपन्यास का जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है। टैगोर जी ने अपने उपन्यास में भारतवासियों के प्रति राष्ट्रवाद की भावना को दर्शायें है, जो स्वतंत्रता के मार्ग को दिखलाती हैं। उस समय बंगाल लाई कर्जन के बंग-भंग की छाया से ओत-प्रोत होकर गुजर रहा था। ऐसे समय में टैगोर जी की इस उपन्यास ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार किया, जो उनके लिए अनमोल था।

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प्रश्न 8.
आनन्दमठ उपन्यास की पृष्ठभूमि एवं प्रमुख पात्रों के क्रिया-कलापों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारतीय साहित्यिक कृतियों में सर्वप्रमुख स्थान ‘आनन्दमठ’ की है, जिसने भारत में राष्ट्रवाद के विकास को जन्म दिया। इस कृति की रचना बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 1872 ई॰ में किया। इस कृति की रचना बंगला भाषा में किया गया था।

‘अनन्दमठ’ एक उपन्यास है, जिसकी पृष्ठभूमि की शुरूआत 1771 ई० के बंगाल के अकाल के समय से होती है। यह अकाल वास्तव में सन् 1770 में आया था, परन्तु इसका संचयन सन् 1771 में किया गया।

इस उपन्यास के मुख्य पात्रों में ‘महेन्द्र’ और ‘कल्याणी’ हैं। इतना ही नहीं, 18 वीं शताब्दी के सन्यासी विद्रोह का वर्णन भी इस उपन्यास में किया गया है-तथा भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्देमातरम्’ भी सर्वपथम इस उपन्यास में ही प्रकाशित किया गया था।

सन् 1770 के बंगाल के अकाल के समय ‘महेन्द्र’ तथा ‘कल्याणी’ तड़प रहे थे, कष्ट से तिलमिला रहे थे। उन दोनों की दशा बहुत ही खराब थी। कल्याणी जंगल में घूमने वाले शिकारियों से बचने के लिए घने जंगल में अपने नवजात शिशु को लंकर भागी जाती है। एक नदी के किनारे बेहोश होकर गिर जाती है। जब उसे होश आता है तो अपने आप को एक हिन्दू भिक्षु संत सत्यानन्द के पास पाती है। संत सत्यानन्द कल्याणी एवं उसके नवजात शिशु की सहायता करता हैं। जब महेन्द्र अपनी पत्नी कल्याणी एवं बच्चे से मिलता है और संत सत्यानन्द के बारे में जानता है, तो बहुत ही प्रभावित होता है तथा वे एक-दूसरे के प्रति मानवता की कसम लेते हैं।

सन्यासियों की ऐसी प्रवृत्ति को देखकर महेन्द्र दंग रह जाता हैं। वह भी सन्यासी की मदद करना चाहता हैं। जब सन्यासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किये तब महेन्द्र तथा उसका पुत्र उनका साथ दिये, वे भी अंग्रेज के विरोधी हो गये। अतः इस विद्रोह में सन्यासी का नेतृत्व महेन्द्र करता है और वह वीरतापूर्वक अंग्रेजों से लड़ाई करता है। परन्तु सन्यासियों की कमजोर नीति के कारण सन्यासी विद्रोह का दमन हो जाता है।

उपर्युक्त विवेचन से हम पाते हैं कि बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में पूर्ण रूप से संन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है जो अंग्रेज विरोधी आन्दोलन था।

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 2 सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण

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सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण Class 10 WBBSE MCQ Questions

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर (Multiple Choice Question & Answer) : (1 Mark)

प्रश्न 1.
‘ग्रामवार्ता प्रकाशिका’ प्रकाशित होती थी –
(क) जेसोर से
(ख) रानाधाट से
(ग) कुष्ठिया से
(घ) बारासात से
उत्तर :
(ग) कुष्ठिया से

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प्रश्न 2.
कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम बी.ए. परीक्षा हुई थी –
(क) 1857 ई० में
(ख) 1858 ई० में
(ग) 1859 ई० में
(घ) 1860
उत्तर :
(ख) 1858 ई० में

प्रश्न 3.
कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के प्रथम प्रिसिपल थे –
(क) डॉ० एम० जे० ब्राम्ली
(ख) डॉ॰ एच० एच० गूडिव
(ग) डॉ॰ एन० वालिश
(घ) डॉ॰ जे॰ ग्रान्ट
उत्तर :
(क) डॉ॰ एम० जे० ब्राम्ली

प्रश्न 4.
‘नीलदर्पण’ के अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशक थे –
(क) कालीप्रसन्न सिंह
(ख) माइकल मधुसूदन दत्त
(ग) हरिश्चन्द्र मुखोपाध्याय
(घ) रेव. जेम्स लॉग
उत्तर :
(घ) रेव. जेम्स लॉग

प्रश्न 5.
सतीप्रथा बन्द हुई –
(क) 1828 ई० में
(ख) 1829 ई० में
(ग) 1830 ई० में|
(घ) 1860 ई० में|
उत्तर :
(ख) 1829 ई० में

प्रश्न 6.
सर्व धर्म-समन्वय आदर्श का प्रचार किये थे –
(क) विजयकृष्ण गोस्वामी
(ख) स्वामी विवेकानन्द
(ग) श्रीरामकृष्ण
(घ) केशवचन्द्र सेन
उत्तर :
(ग) श्रीरामकृष्ण

प्रश्न 7.
वामाबोधिनी पत्रिका के सम्पादक थे –
(क) उमेश चन्द्र दत्त
(ख) शिशिर कुमार घोष
(ग) कृष्णचन्द्र मजुमदार
(घ) 1856 ई० में
उत्तर :
(क) उमेश चन्द्र दत्त

प्रश्न 8.
साधारण जनशिक्षा समिति का गठन हुआ –
(क) 1713 ई० में
(ख) 1913 ई० में
(ग) 1813 ई० में
(घ) 1823 ई० में
उत्तर :
(घ) 1823 ई० में

प्रश्न 9.
‘नवविधान’ किसके द्वारा स्थापित किया गया –
(क) दयानन्द सरस्वती
(ख) केशवचन्द्र सेन
(ग) स्वामी विवेकानन्द
(घ) द्वारका नाथ विद्याभूषण
उत्तर :
(ख) केशवचन्द्र सेन

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प्रश्न 10.
वह नाम जो भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार से संबंधित नहीं है :
(क) राजा राममोहन राय
(ख) कालीप्रसन्न सिन्हा
(घ) 1823 ई० में
(ग) डेविड हेयर
उत्तर :
(ख) कालीप्रसन्न सिन्हा

प्रश्न 11.
‘हिन्दू पेट्रियट’ पत्रिका ने किस कानून को ‘भारत का गुलाम कानून’ की संज्ञा दी थी ?
(क) स्वदेशी पत्र कानून को
(ख) प्रवासी कानून को
(ग) इल्बर्ट कानून को
(घ) नाट्य निषेध कानून को
उत्तर :
(ख) प्रवासी कानून को

प्रश्न 12.
तत्वबोधिनी पत्रिका के सम्पादक थे –
(क) अक्षय कुमार दत्त
(ख) स्वर्ण कुमारी बसु
(ग) देवेन्द्र नाथ टैगोर
(घ) शिशिर कुमार घोष
उत्तर :
(ग) देवेन्द्र नाथ टैगोर

प्रश्न 13.
इनमें से कौन ‘श्रीरामपुर-त्रयी’ नाम से जाने जाते हैं ?
(क) केरी-डफ-मार्शमैन
(ख) केरी-मार्शमैन-वाई्ड
(ग) केरी-वार्ड-हिक्की
(घ) केरी-डफ-हेयर
उत्तर :
(ख) केरी-मार्शमैन-वार्ड

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से किस भारतीय ने 1893 ई० में ‘शिकागो विश्व धर्म’ सम्मेलन में भाग लिया था ?
(क) स्वामी परमहंस ने
(ख) स्वामी द्यानन्द सरस्वती ने
(ग) स्वामी विवेकानन्द ने
(घ) स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने
उत्तर :
(ग) स्वामी विवेकानन्द ने

प्रश्न 15.
कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय के प्रथम स्नातक (ग्रेजुएट) छात्र थे –
(क) बंकिम चन्द्र घटर्जी
(ख) यदुनाथ सरकार
(ग) क और (ख) दोनों
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) क और (ख) दोनों

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प्रश्न 16.
डेविड हेयर की सहायता से राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ‘हिन्दू कॉलेज’ का वर्तमान नाम क्या है ?
(क) प्रेसीडेंसी कॉलेज
(ख) बेथुन कालेज
(ग) मेट्रोपोलिटन कॉलेज
(घ) सेंट जान्स कॉलेज
उत्तर :
(क) प्रेसीडेंसी कॉलेज

प्रश्न 17.
भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता किसे कहा जाता है ?
(क) वारेन हेस्टिंग को
(ख) चार्ल्स ग्राण्ट को
(ग) राजा राममोहन राय को
(घ) लार्ड मैकाले को
उत्तर :
(ख) चार्ल्स ग्राण्ट को

प्रश्न 18.
भारतीय शिक्षा का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है –
(क) मैकाले मिनट को
(ख) वुड्स घोषणा पत्र को
(ग) रेले आयोग के विवरण को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) वुड्स घोषणा पत्र को

प्रश्न 19.
बंगला भाषा में प्रकाशित प्रथम पत्रिका थी –
(क) दिग्दर्शन
(ख) समाचार दर्पण
(ग) बंग दर्शन
(घ) सोम प्रकाश
उत्तर :
(ख) समाचार दर्पण।

प्रश्न 20.
“जीवन स्मृति” आत्मकथा है –
(क) महात्मा गाँधी
(ख) विपिनचन्द्र पाल
(ग) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(घ) सुभाषचन्द्र बोस
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाथ टैगोर ।

प्रश्न 21.
केशव चन्द्र सेन के लिए “बह्मानन्द” की उपाधि शब्द का प्रयोग किसने किया ?
(क) राजा राममोहन राय
(ख) रवीद्द्रनाथ टैगोर
(ग) देवेन्द्रनाथ टैगोर
(घ) उमेश चन्द्र दत्त
उत्तर :
(ग) देवेन्द्रनाथ टैगोर।

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प्रश्न 22.
विजय कृष्ण गोस्वामी किस सिद्धान्त के प्रवर्तक थे ?
(क) वैष्णववाद
(ख) कृष्णवाद
(ग) शैववाद
(घ) भक्तिवाद
उत्तर :
(क) वैष्णववाद

प्रश्न 23.
‘हिस्ट्री ऑफ बंगाल’ पुस्तक के लेखक हैं –
(क) सुशोभन सरकार
(ख) सुमित सरकार
(ग) यदुनाथ सरकार
(घ) सुमित रॉंय
उत्तर :
(ग) यदुनाथ सरकार।

प्रश्न 24.
कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना किसके द्वारा की गई थी ?
(क) लॉर्ड वेलेजली
(ख) लॉर्ड डलहौजी
(ग) लॉर्ड विलियम बेंटिक
(घ) लॉर्ड केनिंग
उत्तर :
(ग) लॉर्ड विलियम बेंटिक।

प्रश्न 25.
किस वर्ष विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ था ?
(क) 1817 ई०
(ख) 1835 ई०
(ग) 1857 ई०
(घ) 1856 ई०
उत्तर :
(घ) 1856 ई०

प्रश्न 26.
किस उपन्यास में ‘बंदेमातरम्’ गीत उल्लेखित है ?
(क) राजसिंहा
(ख) सरला देवी चौधुरानी
(ग) आनन्दमठ
(घ) गोरा
उत्तर :
(ग) आनन्दमठ।

प्रश्न 27.
ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन की स्थापना किसने की ?
(क) राजा राधाकान्त देव
(ख) दादाभाई नौरोजी
(ग) जगन्नाथ शंकर
(घ) मैरी कार्षेटर
उत्तर :
(क) राजा राधाकान्त देव।

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प्रश्न 28.
भारत का प्रथम आधुनिक पुरुष किसे कहा जाता है ?
(क) विद्यासागर
(ख) डिरोंजियो
(ग) डेविड हेयर
(घ) राममोहन
उत्तर :
(घ) राममोहन राय ने।

प्रश्न 29.
बंगला लिपि को सर्वप्रथम छापने के लिए किसने प्रयल्न किया ?
(क) विलियम कैरी
(ख) पंचानन कर्मकार
(ग) जेम्स आगस्टस
(घ) चार्ल्स विल्कन्स
उत्तर :
(घ) चार्ल्स विल्कन्स।

प्रश्न 30.
“हिस्ट्री आफ ब्रिटिश इंडिया” किसके द्वारा रचित है ?
(क) कैथरीन मेये
(ख) जेम्स मोल
(ग) रामचन्द्र गुहा
(घ) जवाहरलाल नेहरू
उत्तर :
(ख) जैम्स मोल।

प्रश्न 31.
बंगाल की प्रथम राजनीतिक पत्रिका थी –
(क) बंग दर्शन
(ख) सोम प्रकाश
(ग) सुधाकर
(घ) दिग्दर्शन
उत्तर :
(ख) सोम प्रकाश।

प्रश्न 32.
एक पुस्तक के रूप में ‘वर्ण-परिचय’ का प्रकाशन वर्ष में हुआ था –
(क) 1850 ई०
(ख) 1855 ई०
(ग) 1860 ई०
(घ) 1865 ई०
उत्तर :
(ख) 1855 ई०।

प्रश्न 33.
‘मैकाले मिनट्स’ पारित हुआ था :
(क) 1834 ई० में
(ख) 1835 ई० में
(ग) 1836 ई० में
(घ) 1838 ई० में
उत्तर :
(ख) 1835 ई० में।

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प्रश्न 34.
कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम महिला स्नातक हैं :
(क) लीला नाग
(ख) चन्द्रमुखी बसु
(ग) कल्पना दत्त
(घ) सरला देवी चौधुरानी
उत्तर :
(ख) चन्द्रमुखी बसु।

प्रश्न 35.
सर्वप्रथम किसने मृत शरीर (शव) को मेडिकल कॉलेज में चीर-फाड़ करवाया था ?
(क) तारकनाथ पालित
(ख) मधुसूदन गुप्ता
(ग) मधुसूदन दत्त
(घ) दीनबंधु मित्रा
उत्तर :
(ग) मधुसूदन दत्त।

प्रश्न 36.
‘एकेडेमिक एसोसिएशन’ की स्थापना किया था :
(क) राममोहन राय
(ख) ताराचन्द मित्रा
(ग) डिरोजिओ
(घ) केशवचन्द्र सेन
उत्तर :
(ग) डिरोजिओ।

प्रश्न 37.
बेथुन स्कूल की स्थापना किया था :
(क) राममोहन राय
(ख) ड्रिंकवाटर बेथुन
(ग) राधाकान्त देब
(घ) डेविड हेयर
उत्तर :
(ख) ड्रिंकवाटर बेचुन।

प्रश्न 38.
बाउल सम्राट के रूप में कौन जाने जाते थे ?
(क) कंगाल हरिनाथ
(ख) लालन फकीर
(ग) दीनद्याल
(घ) जयदेव
उत्तर :
(ख) लालन फकीर।

प्रश्न 39.
“मानव निर्माण धर्म (Man making religion)” किसने कहा था ?
(क) स्वामी विवेकानन्द
(ख) रवीन्द्रनाथ टेगोर
(ग) विद्यासागर
(घ) देवेन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर :
(क) स्वामी विवेकानन्द।

40. वुड्स डिस्पैच प्रकाशित हुआ था :
(क) 1852 ई० में
(ख) 1854 ई० में
(ग) 1856 ई० में
(घ) 1858 ई० में
उत्तर :
(ख) 1854 ई० में।

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प्रश्न 41.
‘निम्नमुखी छनन नीति’ (अधोमुखी निस्पद्न) (Downward Filtration Policy) का सृजन किसने किया था ?
(क) चार्ल्स वुड
(ख) थॉमस बैंिंगटन मैकुले
(ग) हण्टर
(घ) विलियम केरी
उत्तर :
(ख) थॉमस बेबिंगटन मैकुले।

प्रश्न 42.
‘वर्ण परिचय’ की रचना किया था :
(क) तारकनाथ मुखोपाध्याय
(ख) ईश्वर गुप्ता
(ग) विद्यासागर
(घ) मघुसूदन गुप्ता
उत्तर :
(ग) विद्यासागर।

प्रश्न 43.
बेलगछिया मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई थी :
(क) 1914 ई० में
(ख) 1915 ई० में
(ग) 1916 ई० में
(घ) 1918 ई० में
उत्तर :
(ग) 1916 ई० में।

प्रश्न 44.
‘हमारा पशु सुलभ आचरण महिलाओं को शिक्षित किये बगैर दूर नहीं हो सकता” – यह किसका मत है ?
(क) जगदीश चन्द्र बसु
(ख) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ग) स्वामी विवेकानन्द
(घ) राममोहन राय
उत्तर :
(ग) स्वामी विवेकानन्द।

प्रश्न 45.
बंगला में प्रथम साप्ताहिक समाचार-पत्र था :
(क) हिकीज गजट
(ख) पार्थनोन
(ग) हिन्दू पैट्रियट
(घ) बंग दर्शन
उत्तर :
(क) हिकीज गजट।

प्रश्न 46.
‘ग्रामवार्ता प्रकाशिका’ के प्रथम सम्पादक कौन थे ?
(क) हरिनाथ मजुमदार
(ख) मधुरानाथ मोइत्रो
(ग) गिरीश चन्द्र घोष
(घ) हरीश्चन्द्र मुखर्जी
उत्तर :
(क) हरिनाथ मजुमदार (कंगाल हरीनाथ)।

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प्रश्न 47.
कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी की स्थापना किसने की ?
(क) रंद्रकांत देव
(ख) डेविड हेयर
(ग) स्वामी विवेकानन्द
(घ) मधुसूदन गुप्ता
उत्तर :
(ख) डेविड हेयर।

प्रश्न 48.
“जोतो मत तोतो पथ” वाक्य किसने कहा था ?
(क) देवेन्द्र नाथ टैगोर
(ख) केशव चन्द्र सेन
(ग) स्वामी विवेकानन्द
(घ) श्री रामकृष्ण
उत्तर :
(घ) श्री रामकृष्ण।

प्रश्न 49.
वामाबोधिनी का मुख्य उद्देश्य था –
(क) महिलाओं को जागरुक करना
(ख) राष्ट्रवाद का प्रसार करना
(ग) ब्रिटिश का विरोध करना
(घ) सती प्रथा का विरोध करना
उत्तर :
(क) महिलाओं को जागरुक करना।

प्रश्न 50.
(क) मेहन्द्र लाल सरकार
(ख) आचार्यप्रफुल्लचन्द्र रॉय
(ग) सर आशुतोष मुखोपाध्याय
(घ) मेघनाथ साहा
उत्तर :
(ग) सर आशुतोष मुखोपाध्याय

प्रश्न 51.
हिन्दू पैट्रियट के सम्पादक थे –
(क) राममोहन राय
(ख) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ग) दीनबन्धु मित्र
(घ) हरीशचन्द्र मुखर्जी
उत्तर :
(घ) हरीशचन्द्र मुखर्जी।

प्रश्न 52.
नील दर्पण नामक नाटक के द्वारा लिखा गया।
(क) दीनबंधु मित्र
(ख) हरीशचन्द्र मुखोयाष्यांय
(ग) विध्यासागर
(घ) नवीनचन्द्र सेन
उत्तर :
(क) दीनबंधु मित्र।

प्रश्न 53.
सती प्रथा निषेध कानून किस गर्वनर जनरल द्वारा पास किया गया –
(क) लॉड रिपन
(ख) लॉर्ड विलियम बेन्टिक
(ग) लॉर्ड कार्नवालिस
(घ) लॉर्ड कर्जन
उत्तर :
(ख) लॉर्ड विलियम बेन्टिक।

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प्रश्न 54.
हिन्दू पैट्रियट था :
(क) धार्मिक पत्रिका
(ख) राष्ट्रवादी पत्रिका
(ग) मेहनतकशों की पत्रिका
(घ) किसानों की पत्रिका
उत्तर :
(घ) किसानों की पत्रिका।

प्रश्न 55.
‘नील दर्पण’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया था :
(क) माइकल मधुसूटन दत्ता
(ख) दीनबंधु मित्रा
(ग) जेम्स लांग
(घ) बंकिम चन्द्र चट्टोपाष्याय
उत्तर :
(क) माइकल मघुसूदन दत्ता।

प्रश्न 56.
ग्रामवार्ता प्रकाशिका सर्वप्रथम प्रकाशित हुई :
(क) 1860 ई० में
(ख) 1862 ई० में
(ग) 1863 ई० में
(घ) 1864 ई० में
उत्तर :
(ग) 1863 ई० में।

प्रश्न 57.
वर्तमान भारत के लेखक हैं –
(क) स्वामी विवेकानन्द
(ख) बंकिम चन्द्र
(ग) स्वामी सुधानन्द
(घ) स्वामी सत्यानन्द
उत्तर :
(क) स्थामी विवेकानन्द्र।

प्रश्न 58.
निम्नोक्त में से किस अधिनियम के तहत एक लाख रु० भारत में शिक्षा के संप्रसारण पर किया जाना था ?
(क) चार्टर्ड अधिनियम, 1813 ई०
(ख) बार्टर्ड अधिनियम, 1818 ई०
(ग) भारत सरकार अधिनियम, 1835 ई०
(घ) भारत सरकार अधिनियम, 1856 ई०
उत्तर :
(क) चार्टर्ड अधिनियम, 1813 ई०

प्रश्न 59.
हुतोम प्यानचार नकशा लिखा था –
(क) हरीश चन्द्र मुखर्जी
(ख) प्यारीचन्द्र मित्रा
(ग) कालीप्रसन्न सिंहा
(घ) शियनाथ शास्ती
उत्तर :
(ग) कालीप्रसन्न सिंहा।

प्रश्न 60.
भारत में प्रथम छात्र संगठन था :
(क) एकेडेंमिक एसेसिएन
(ख) पार्थेनन
(ग) अनुशीलन समिति
(घ) एम० एम० सी०
उत्तर :
(क) एकेडेमिक एसोसिएशन।

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प्रश्न 61.
एक समाचार-पत्र, जो 19 वीं सदी में प्रकाशित हुआ था :
(क) बामबोधिनी
(ख) संवाद कौमुदी
(ग) द रिफार्मर
(घ) नील दर्पण
उत्तर :
(ग) द रिफार्मर।

प्रश्न 62.
‘जेनरल एसेम्बली इंस्टीच्युसन ‘ की स्थापना किसने किया ?
(क) अलेक्जेंडर डफ
(ख) राममोहन राय
(ग) राधाकान्त देव
(घ) डेविड हेयर
उत्तर :
(क) अलेक्जेंडर डफ।

प्रश्न 63.
आनंदमठ उपन्यास के लेखक हैं –
(क) रवीन्द्रनाथ –
(ख) दीनबंधु
(ग) बंकिम चन्द्र चटर्जी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) बकिम बन्द्र चटर्जी।

प्रश्न 64.
हिन्दू पेट्रियाट समाचार पत्र था –
(क) दैनिक
(ख) साप्ताहिक
(ग) मासिक
(घ) वार्षिक
उत्तर :
(ख) साप्ताहिक।

प्रश्न 65.
दीनबंघु मित्र द्वारा रचित एक नाटक है –
(क) बाम बोधिनी
(ख) ग्रामवार्ता
(ग) नील दर्पण
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) नील दर्पण।

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प्रश्न 66.
एंग्लो हिन्दू कॉलेज कि स्थापना हुई –
(क) 1921 ई० में
(ख) 1757 ई० में
(ग) 1857 ई० में
(घ) 1860 ई० में
उत्तर :
(ग) 1857 ई० में।

प्रश्न 67.
विद्यासागर का जन्म हुआ था –
(क) 1820 ई० में
(ख) 1815 ई० में
(ग) 1825 ई० में
(घ) 1805 ई० में
उत्तर :
(क) 1820 ई० में।

प्रश्न 68.
‘नजरूल’ के नाम से जाने जाते हैं –
(क) कवि नजरुल इस्लाम
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) मु० इकबाल
(घ) मु० मोहसिन
उत्तर :
(क) कवि नजरुल इस्लाम।

प्रश्न 69.
हिन्दू कॉलेज की स्थापना की थी –
(क) राजा राममोहन राय
(ख) विद्यासागर
(ग) डेविड हेयर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) डेविड्ड हेयर।

प्रश्न 70.
जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथुन का जन्म हुआ था –
(क) 1801 ई० में
(ख) 1815 ई० में
(ग) 1825 ई० में
(घ) 1805 ई० में
उत्तर :
(क) 1801 ई० में।

प्रश्न 71.
कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई थी –
(क) 1820 ई० में
(ख) 1835 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1800 ई० में
उत्तर :
(ख) 1835 ई० में।

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प्रश्न 72.
कवि नजरूल इस्लाम की मृत्यु कब हुई थी ?
(क) 29 अगस्त, 1976 ई० में
(ख) 30 सितम्बर, 1976 ई० में
(ग) 29 अक्टूबर, 1976 ई० में
(घ) 29 नवम्बर, 1976 ई० में
उत्तर :
(क) 29 अगस्त, 1976 ई० में।

प्रश्न 73.
आत्मीय सभा की स्थापना हुई थी –
(क) 1814 ई० में
(ख) 1815 ई० में
(ग) 1820 ई० में
(घ) 1821 ई० में
उत्तर :
(ख) 1815 ई० में।

प्रश्न 74.
नील दर्पण प्रकाशित की गई –
(क) 1859 ई० में
(ख) 1860 ई० में
(ग) 1861 ई० में
(घ) 1865 ईं० में
उत्तर :
(क) 1859 ई० में।

प्रश्न 75.
कलकत्ता मदरसा की स्थापना हुई –
(क) 1781 ई० में
(ख) 1782 ई० में
(ग) 1784 ई० में
(घ) 1792 ई० में
उत्तर :
(क) 1781 ई० में।

प्रश्न 76.
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की स्थापना किसने की –
(क) वारेन हेस्टिग्स
(ख) जोनाथन डंकन
(ग) डेविड हेयर
(घ) सरविलियम जोन्स
उत्तर :
(घ) सरविलियम जोन्स।

प्रश्न 77.
गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक के कार्यकारिणी परिषद के सदस्य थे –
(क) चार्ल्स ट्रेवियन
(ख) एच० एच० विहसन
(ग) लाई्ड मैकाले
(घ) पिन्सप
उत्तर :
(क) चार्ल्स ट्रेवलियन।

प्रश्न 78.
कब अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम निश्चित किया गया –
(क) 1833 ई० में
(ख) 1813 ई० में
(ग) 1835 ई० में
(घ) 1859 ई० में
उत्तर :
(ग) 1835 ई० में।

प्रश्न 79.
हिन्दू बालिका विद्यालय की स्थापना की गई –
(क) 1848 ई० में
(ख) 1849 ईే० में
(ग) 1835 ई० में
(घ) 1859 ई० में
उत्तर :
(ख) 1849 ई० में।

प्रश्न 80.
1835 ई० में मेडिकल कॉलेज बंगाल या कलकत्ता कॉलेज व अस्पाताल की स्थापना का उद्देश्य था –
(क) चिकित्सा शिक्षा के लिए
(ख) माध्यमक शिक्षा के लिए
(ग) उच्च शिक्षा के लिए
(घ) स्नातक कोर्स के लिए
उत्तर :
(क) चिकित्सा शिक्षा के लिए।

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प्रश्न 81.
ब्रह्म समाज की स्थापना हुई –
(क) 1818 ई० में
(ख) 1815 ई० में
(ग) 1816 ई० में
(घ) 1828 ई० में
उत्तर :
(घ) 1828 ई० में।

प्रश्न 82.
किनके प्रयास से 1829 ई० में लार्ड विलियम बैंटिक के शासन काल में सती प्रथा को अवैघ घोषित किया गया –
(क) राजा राममोहन राय
(ख) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
(ग) स्वामी विवेकानन्द
(घ) हेनरी लुई विवियन देरोजियो
उत्तर :
(क) राजा राममोहन राय।

प्रश्न 83.
तरूण बंगाल या नव बंगाल स्थापित किया गया –
(क) राजा राममोहन राय द्वारा
(ख) स्यामी विवेकानन्द
(ग) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा
(घ) हेनरी लुई विवियन देरोजियो
उत्तर :
(घ) हेनरी लुई विवियन देरोजियो।

प्रश्न 84.
‘विधवा पुर्नर्विवाह कानून’ लागू करवाया गया –
(क) राजा राममोहन राय द्वारा
(ख) स्वामी विवेकानन्द राय
(ग) ईश्वरबन्द्र विद्यासागर द्वारा
(घ) हेनरी लुई विवियन देरोजियो
उत्तर :
(ग) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर द्वारा।

प्रश्न 85.
भारत में राष्ट्रवाद का विकास कब हुआ ?
(क) 17 वी शताब्दी
(ख) 18 वीं शताब्दी
(ग) 19 वी शताब्दी
(घ) 20 वीं शताब्दी
उत्तर :
(ग) 19वीं शताब्दी।

प्रश्न 86.
हरिनाथ मजूमदार का जन्म कब हुआ था ?
(क) 1833 ई०
(ख) 1834 ई०
(ग) 1835 ई०
(घ) 1836 ई०
उत्तर :
(क) 1833 ई०।

प्रश्न 87.
मेट्रोपोलिटन इन्स्टीट्यूशन की स्थापना किसने किया ?
(क) इश्वर चन्द्र विद्यासागर
(ख) राजा राममोहन राय
(ग) रवीन्द्रनाच टैगोर
(घ) उमेश वन्द्र दत्त
उत्तर :
(क) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर।

प्रश्न 88.
भारतीय पुर्नजागरण का पिता किसे कहा जाता हैं ?
(क) डेविड हेयर
(ख) राजा राममोहन राय
(ग) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
(घ) रवीन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर :
(ख) राजा राममोहन राय।

प्रश्न 89.
बाउल संगीत के संस्थापक कौन थे ?
(क) विजय कृष्ण गोस्वामी
(ख) ललन फकीर
(ग) रामकृष्ण परमहंस
(घ) विवेकानन्द
उत्तर :
(ख) ललन फकीर।

प्रश्न 90.
मासिक पत्रिका ‘दिग्दर्शन’ का शुभारम्भ किया गया –
(क) 1818 ई० में
(ख) 1819 ई० में
(ग) 1820 ई० में
(घ) 1821 ई० में
उत्तर : (क) 1818 ई० में।

प्रश्न 91.
‘मिरातुल-अखबार’ किनकी रचना है ?
(क) राजा राममोहन राय की
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की
(ग) रामकृष्ण परमहंस की
(घ) स्वामी विवेकानन्द की
उत्तर :
(क) राजा रामामोहन राय की।

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प्रश्न 92.
‘हुतोम प्यानचर नक्शा’ था एक –
(क) गद्य
(ख) काव्य
(ग) रेखाचित्र
(घ) नाटक
उत्तर :
(ग) रेखाचित्र।

प्रश्न 93.
‘हुतोम प्यानचर नवशा’ का प्रकाशन कब हुआ ?
(क) 1850 ई० में
(ख) 1860 ई० में
(ग) 1861 ई० में
(घ) 1870 ई० में
उत्तर :
(ग) 1861 ई० में।

प्रश्न 94.
फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कब हुई ?
(क) 1600 ई० में
(ख) 1700 ई० में
(ग) 1800 ई० में
(घ) 1900 ई० में
उत्तर :
(ग) 1800 ई० में।

प्रश्न 95.
डेविड हेयर की मृत्यु कब हुई थी ?
(क) 1817 ई० में
(ख) 1825 ई० में
(ग) 1835 ई० में
(घ) 1842 ई० में
उत्तर :
(घ) 1842 ई० में।

प्रश्न 96.
वेदान्त कॉलेज की स्थापना कब हुआ था ?
(क) 1815 ई० में
(ख) 1817 ई० में
(ग) 1825 ई० में
(घ) 1830 ई० में
उत्तर :
(ग) 1825 ई० में।

प्रश्न 97.
वेदान्त कॉलेज़ के संस्थापक कौन थे ?
(क) राजा राममोहन राय
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) राजा राधाकांत देव
(घ) देरोजियों
उत्तर :
(क) राजा राममोहन राय।

प्रश्न 98.
काला ज्वर के दवा की खोज किसने किया ?
(क) उपेन्द्रनाथ बहाचारी
(ख) मेघनाथ साहा
(ग) जगदीशचन्द्र बसु
(घ) सत्येन्द्रनाथ बोस
उत्तर :
(क) उपेन्द्रनाथ ब्रह्मचारी।

प्रश्न 99.
‘नव वेदान्त’ के प्रेरणा स्रोत माने जाते हैं –
(क) स्वामी विवेकानन्द
(ख) राजा राममोहन राय
(ग) केशवचन्द्र सेन
(घ) रामकृष्ण परमहस
उत्तर :
(क) स्वामी विवेकानन्द।

प्रश्न 100.
पाश्चात्य देशों में किसे तूफानी हिन्दू कहा गया ?
(क) स्वामी विवेकानन्द
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) मु॰ इकबाल
(घ) केशवचन्द्र सेन
उत्तर :
(क) स्वामी विवेकानन्दु।

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प्रश्न 101.
बेलूर मठ की स्थापना कब हुई थी ?
(क) 1895 ई० में
(ख) 1896 ई० में
(ग) 1897 ई० में
(घ) 1898 ई० में
उत्तर :
(ख) 1896 ई० में।

प्रश्न 102.
विश्व धर्म परिषद, शिकागो का आयोजन कब हुआ था ?
(क) 1892 ई० में
(ख) 1893 ई० में
(ग) 1894 ई० में
(घ) 1895 ई० में
उत्तर :
(ख) 1893 ई० में।

प्रश्न 103.
साधारण ब्रहम समाज के संस्थापक थे –
(क) शिवनाथ शास्त्री
(ख) राजा राममोहन राय
(ग) देवेन्द्रनाथ टैगोर
(घ) स्वामी विवेकानन्द
उत्तर :
(क) शिवनाथ शास्त्री।

प्रश्न 104.
ग्रांट मेडिकल कॉलेज की स्थापना कहाँ हुई थी ?
(क) बम्बई
(ख) दिल्ली
(ग) कलकत्ता
(घ) मद्रास
उत्तर :
(क) बम्बई।

प्रश्न 105.
कलकत्ता में प्रथम मदरसा की स्थापना किसने की ?
(क) वारेन हेस्टिंस
(ख) राबर्ट क्लाइव
(ग) सर बिलियम जोन्स
(घ) लॉर्ड कैनिंग
उत्तर :
(क) वारेन हेस्टिंग्स।

प्रश्न 106.
दक्षिण भारत का विद्यासागर किसको कहा जाता है ?
(क) वोरेशलिगम पुन्तलु
(ख) राजा राममोहन राय
(ग) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(घ) नारायण गुरु
उत्तर :
(क) वीरशालिंगम पुन्तलु।

प्रश्न 107.
‘तत्वब्योधिनी’ पत्रिका के प्रवर्तर्क कौन थे ?
(क) देवेन्द्रनाथ टैगोर
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) नारायण गुरू
(घ) गदाधर चटर्जी
उत्तर :
(क) देवेन्द्रनाथ टेगोर।

प्रश्न 108.
कंगाल फकीर चंद (Kangal Fakir Chand) के नाम से जाने जाते हैं –
(क) हरिनाथ मजूमदार
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) राजा राममोहन राय
(घ) गिरीश चन्द्र घोष
उत्तर :
(क) हरिनाथ मजूमदार।

प्रश्न 109.
‘विजय बसंत’ (Bijay Basanta) किसने लिखा ?
(क) हरिनाथ मजूमदार
(ख) इकबाल
(ग) मिरीशचन्द्र घोष
(घ) राजा रामामोहन राय
उत्तर :
(क) हरिनाथ मजूमदार।

प्रश्न 110.
‘राजयोग’ किसने लिखा ?
(क) स्वामी विवेकानन्द
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) राजा राममोहन राय
(घ) हरिनाथ मजूमदार
उत्तर :
(क) स्वामी विवेकानन्द।

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प्रश्न 111.
‘भक्ति योग’, ‘कर्म योग’ तथा ‘ज्ञान योग’ किसने लिखा ?
(क) स्वामी विवेकानन्द
(ख) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(ग) राजा राममोहन राय
(घ) हरिनाथ मजूमदार
उत्तर :
(क) स्वामी विवेकानन्द।

प्रश्न 112.
स्वामी विवेकानन्द की मृत्यु कब हुआ था ?
(क) 1902 ई० में
(ख) 1903 ई० में
(ग) 1904 ई० में
(घ) 1905 ई० में
उत्तर :
(क) 1902 ई० में।

प्रश्न 113.
स्वामी विवेकानन्द जी ने इंग्लैण्ड में किसको अपना शिष्य बनाया ?
(क) सिस्टर निवेदिता को
(ख) हेराल्ड को
(ग) ए० मुखर्जी को
(घ) न्यूयॉर्क हेराल्ड को
उत्तर :
(क) सिस्टर निवेदिता को।

प्रश्न 114.
राजा रामामोहन राय जी की मृत्यु कहाँ हुई थी ?
(क) सेटेटेम, मिटल, इल्लेड्ड
(ख) बंगाल, बिटिश इण्डिया
(ग) ओंकलैण्ड
(घ) राधानगर
उत्तर :
(क) स्टेप्लेटोन, बिरटल, इंग्लैण्ड।

प्रश्न 115.
‘संवाद कौमुदी’ किसकी रचना है ?
(क) राजा राममोहन राय की
(ख) झ्वरचन्द्र विद्यासागर की
(ग) केश्वचन्द्र सेन की
(घ) मु० इकबाल की
उत्तर :
(क) राजा राममोहन राय की।

प्रश्न 116.
ललन फकीर की मृत्यु कब हुई ?
(क) 1890 ई० में
(ख) 1892 ई० में
(ग) 1894 ई० में
(घ) 1896 ई० में
उत्तर :
(क) 1890 ई० में।

प्रश्न 117.
ललन फकीर वास्तविक रूप में किस देश के थे ?
(क) इण्डिया के
(ख) बंगलादेश के
(ग) बिहार के
(घ) नेपाल के
उत्तर :
(ख) बंगलादेश के।

प्रश्न 118.
‘Shob Loke Koy Lalon Ki Jat Shongshare’ नामक song किसका हैं ?
(क) ललन फकीर का
(ख) राजा रामामोहन राय का
(ग) मु० इकबाल का
(घ) केश्वचन्द्र सेन का
उत्तर :
(क) ललन फकीर का।

प्रश्न 119.
विजय कृष्ण गोस्वामी की मृत्यु कह हुई ?
(क) 1899 ई० में
(ख) 1900 ई० में
(ग) 1901 ई० में
(घ) 1902 ई० में
उत्तर :
(क) 1899 ई० में।

प्रश्न 120.
बंगला गद्य का निर्माता (जनक) कहा जाता है –
(क) ललन फकीर को
(ख) स्वामी विवेकानन्द को
(ग) रबीन्द्रनाथ टैगोर को
(घ) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
उत्तर :
(घ) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर को।

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प्रश्न 121.
‘History of Bengal’ पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
(क) भी० स्मीथ
(ख) मैकुलेय
(ग) जे० एन० सरकार
(घ) सुमित सरकार
उत्तर :
(ग) जे० एन० सरकार।

प्रश्न 122.
1893 ई० में विश्व धर्म सम्मेलन, जिसमें स्वामी विवेकानन्द भाग लिये थे, कहाँ आयोजित हुआ था
(क) न्यूयार्क शहर में
(ख) शिकागो शहर में
(ग) कलकत्ता में
(घ) मद्रास में
उत्तर :
(ख) शिकागो शहर में।

प्रश्न 123.
‘एशियाटिक सोसाइटी’ की स्थापना हुई –
(क) 1784 ई० में
(ख) 1744 ई० में
(ग) 1755 ई० में
(घ) 1745 ई० में
उत्तर :
(क) 1784 ई० में।

प्रश्न 124.
ब्रह्म समाज के संस्थापक थे –
(क) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
(ख) राजा राममोहन राय
(ग) रवीन्द्र नाथ
(घ) विवेकानन्द
उत्तर :
(ख) राजा राममोहन राय।

प्रश्न 125.
कलकत्ता विश्वविद्यालय का स्थापना हुआ –
(क) 1856 ई० में
(ख) 1857 ई० में
(ग) 1888 ई० में
(घ) 1899 ई० में
उत्तर :
(ख) 1857 ई० में।

प्रश्न 126.
‘शिक्षा परिषद’ की स्थापना हुई –
(क) 1842 ई० में
(ख) 1855 ई० में
(ग) 1854 ई० में
(घ) 1866 ई० में
उत्तर :
(क) 1842 ई० में।

प्रश्न 127.
हिन्दू कॉलेज की स्थापना कब हुआ ?
(क) 1816 ई० में
(ख) 1817 ई० में
(ग) 1819 ई० में
(घ) 1820 ई॰ में
उत्तर :
(ख) 1817 ई० में।

प्रश्न 128.
‘हिन्दू फिमेल स्कूल’ को किस नाम से जाना जाता है ?
(क) हिन्दू स्कूल
(ख) वेदान्त स्कूल
(ग) बेथुन कॉलेज
(घ) हण्टर स्कूल
उत्तर :
(ग) बेधुन कॉलेज।

प्रश्न 129.
रेग्यूलेशन xvii कब पारित हुआ था ?
(क) 1827 ई०
(ख) 1829 ई०
(ग) 1830 ई०
(घ) 1855 ई०
उत्तर :
(ख) 1829 ई०

प्रश्न 130.
तत्वबोधिनी पत्रिका निम्नलखित किस विषय से सम्बन्धित है ?
(क) समाज सुधार
(ख) शैक्षिणिक सुधार
(ग) नारी जागरण
(घ) वैज्ञानिक खोंज
उत्तर :
(क) समाज सुधार

प्रश्न 131.
‘हिन्दू गट्रियाट’ पत्र का प्रकाशन कब हुआ था ?
(क) 185 ई。
(ख) 1853 ई०
(ग) 1857 ई。
(घ) 1905 ईं०
उत्तर :
(ख) 1853 ई०

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 2 सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 132.
रवीन्द्रनाथ टैगोर के लेख और कविताएं किस पत्रिका में छपते थे ?
(क) ग्राम वार्ता प्रकाशिका
(ख) हिन्दू पेट्रियाट
(ग) वामबोधिनी पत्रिका
(d) सबमें
उत्तर :
(क) ग्राम वार्ता प्रकाशिका

प्रश्न 133.
इनमें से किसने नारी शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया था ?
(क) राजा राममोहन राय
(ख) लॉडं मैकाले
(ग) ड्रिंकवाटर बेथुन
(घ) डेविड हेयर
उत्तर :
(ग) ड्रिंकवाटर बेथुन

प्रश्न 134.
राजा राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि किसने दी थी ?
(क) लार्ड विलियम वेंटिक ने
(ख) मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने
(ग) बहादुरशाह द्वितीय ने
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने
उत्तर :
(ख) मुगल बादशाह अकबर द्वितीय ने

प्रश्न 135.
अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘हिन्दू पैट्रियट’ के प्रथम सम्पादक कौन थे ?
(क) गिरीश चन्द्र घोष
(ख) मधुसूदन राय
(ग) हरीश चन्द्र मुखर्जी
(घ) श्रीनाथ घोष
उत्तर :
(क) गिरीश चद्द्र घोष

प्रश्न 136.
दीनबन्यु कृत ‘नील दर्पण’ नाटक के वर्णन का मूल विषय वस्तु क्या है ?
(क) नीलहे गोरे व्यापारियों के अत्याचार को उजागर करना
(ख) नील कृषकों की दुर्दशा को उजागर करना
(ग) पुलिस और ठेकेदारों के अत्याचार को दिखाना
(घ) उक्त सभी
उत्तर :
(घ) उक्त सभी

प्रश्न 137.
किस एक्ट के आधार पर बाल विवाह को गैर-कानूनी बताया गया ?
(क) रेग्युलेटि एक्ट
(ख) पिट्स एक्ट
(ग) चाइल्ड मैरिज एक्ट
(घ) शारदा एक्ट
उत्तर :
(घ) शारदा एक्ट

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प्रश्न 138.
‘डान समिति’ के संस्थापक थे –
(क) सतीश चन्द्र मुखर्जी
(ख) शचौन्द्र प्रसाद बसु
(ग) प्रमथनाथ मित्र
(घ) अरबिन्द घोष
उत्तर :
(क) सतीश चन्द्र मुखर्जी

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (Fill in the blanks) : (1 mark)

1. फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना …………. ई० में हुई।
उत्तर : 1800 ई०।

2. प्रफुल्लचन्द्र राय …………. के प्रोफेसर थे।
उत्तर :
प्रेसीडेंसी कॉलेज

3. ………. में विधवा पुर्नर्विवाह अधिनियम पारित हुआ।
उत्तर : 1856 ई०।

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4. कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना …………. में हुआ था।
उत्तर : 1857 ई०।

5. राजा राममोहन राय के प्रयास से …………. पर रोक लगी।
उत्तर : सती प्रथा।

6. विवेकानन्द …………. के शिष्य थे।
उत्तर : रामकृष्ण परमहंस।

7. महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने …………. की स्थापना की।
उत्तर : आदि ब्रह्म समाज।

8. सती प्रथा …………. समाज में बहुत प्राचीन काल से थी।
उत्तर : हिन्दू।

9. नरेन्द्र दत्त …………. के नाम से प्रसिद्ध है।
उत्तर : स्वामी विवेकांनन्द।

10. वामाबोधिनी पत्रिका …………. भाषा में प्रकाशित होती थी।
उत्तर : बंगला।

11. हिन्दू पेट्रियट …………. था।
उत्तर : पत्रिका।

12. काली प्रसन्ना सिंह …………. के प्रसिद्ध लेखक थे।
उत्तर : उड़ीसा।

13. नील दर्पण नाटक …………. की रुदशा को दर्शाता है।
उत्तर : किसानों।

14. ग्रामवार्ता …………. में साप्ताहिक पत्रिका के रूप में छपने लगी।
उत्तर : 1871 ई० में।

15. कवि नजरूल इस्लाम का जन्म हुआ था।
उत्तर : 1899 ई० में।

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16. ई० के चार्टर एक्ट के अनुसार भारत में शिक्षा सम्बन्धी कार्यों पर एक लाख रुपये वार्षिक व्यय करने की व्यवस्था की गई।
उत्तर : 1813 ई०।

17. ऐसे भारतीय थे जिन्होंने सर्वप्रथम पाश्चात्य मेडिसिन के अनुसार किसी मानव के शव का विच्छेदन किया था।
उत्तर : मधुसूदन गुप्त।

18. विजय कृष्ण गोस्वामी का जन्म में हुआ।
उत्तर : 1841 ई०।

19. ललन फकीर का जन्म …………… ई० में हुआ।
उत्तर : 1774 ई०।

20. …………… को भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता माना गया है ।
उत्तर : चार्ल्स ग्राण्ट को।

21. हेनरी देरोजियो का जन्म …………… ई० में हुआ।
उत्तर : 1809 ई०।

22. राजा राममोहन राय ने …………… में आत्मीय सभा की स्थापना की।
उत्तर : 1815 ई०।

23. वामाबोधिनी पत्रिका के प्रथम संपादक …………… थे।
उत्तर : उमेशचन्द्र दत्त।

24. …………… की रचना दीनबन्धु मित्र ने की।
उत्तर : नील दर्पण।

25. हुतोम प्यानचर नक्शा के रचयिता …………… हैं।
उत्तर : काली प्रसन्ना सिंह।

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26. मैकाले …………… शिक्षा का समर्थक था।
उत्तर : पाश्चात्य।

सही कथन के आगे ‘ True ‘ एवं गलत कथन के आगे ‘ False ‘ लिखिए : (1 mark)

1. मध्यमवर्गीय शिक्षित बंगालियों को नृत्य के लिए उदयशंकर ने उत्साहित किया था।
उत्तर : True

2. रामकृष्ण मिशन की स्थापना श्रीरामकृष्ण ने की थी।
उत्तर : False

3. ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना शिवनाथ शास्त्री तथा आनंद मोहन बसु ने की थी।
उत्तर : True

4. स्कूल बुक सोसाइटी की स्थापना 1817 ई० में हुई थी।
उत्तर : True

5. “वीरअष्टमी व्रत” प्रारम्भ किया गया था सरला देवी चौधुरानी द्वारा।
उत्तर : True

6. कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम स्नातक थी चन्द्रमुखी बोस।
उत्तर :True

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7. बंगाल के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन के समय को ही नवजागरण काल कहा जाता है।
उत्तर : True

8. डेविड हेयर 1890 ई० में शिक्षा प्रचार के लिए कलकत्ता आये थे।
उत्तर : False

9. सर विलियम जोन्स को भारत का ऑक्सफोर्ड कहा जाता है।
उत्तर : False

10. जुलाई 1823 ई० में गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने लोक शिक्षा समिति की स्थापना की।
उत्तर : True

11. 1835 ई० में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गईं।
उत्तर : True

12. राजा राममोहन राय ने 1825 ई० में कलकत्ता में वेदान्त कॉलेज की स्थापना की।
उत्तर : False

13. 1822 ई० में पहली साप्तहिक पत्रिका संवाद कौमुदी को प्रारम्भ किया गया।
Answer: False

14. भारतीय ब्रह्म समाज का संचालन केशव चन्द्र सेन ने किया था।
Answer: True

15. 1913 ई० में रवीन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला।
Answer: True

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16. वामाबोधिनी पत्रिका एक बंगला पत्रिका है।
Answer: True

17. वामाबोधिनी पत्रिका मात्र 6 वर्ष तक ही प्रकाशित हो सका।
उत्तर : False

18. हिन्दू पैट्रियट की भाषा अंग्रेजी थी।
उत्तर : True

19. यंग बंगाल के संस्थापक दयानन्द सरस्वती थे।
उत्तर : False

20. बेथुन स्कूल की स्थापना 1836 ई० में हुई।
उत्तर : True

21. नारी शिक्षा को बढ़ावा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने दी।
उत्तर : False

22. राधा कान्त देब एक प्रमुख लेखक थे।
उत्तर :True

23. नील दर्पण किसानों की दशा पर प्रकाश डालता है।
उत्तर : True

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24. कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना बिहार में हुई।
उत्तर : False

25. राजा राम मोहन राय का जन्म 1772 ई० में हुआ।
उत्तर : True

26. बेथुन स्कूल की स्थापना लड़कियों की शिक्षा के लिए हुई थी।
उत्तर : False

27. ग्राम वार्ता प्रकाशिका नारी जागरण से सम्बन्धित है।
उत्तर : True

28. राधाकान्त देव स्त्री शिक्षा के विरोधी थे।
उत्तर : True

29. कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना के समय उसके एकमात्र भारतीय स्टाफ पं० मधुसूदन दत्त थे।
उत्तर : False

30. राजा राममोहन राय ने डेविड हेयर स्कूल की स्थापना की।
उत्तर : False

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31. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने सती-प्रथा के विरोध में आन्दोलन चलाया।
उत्तर : False

निम्नलिखित कथनों की सही व्याख्या चुनकर लिखिए : (1 mark)

प्रश्न 1.
कथन : उन्नीसवीं शताब्दी का बंगाल नवजागरण खूब सीमित था।
व्याख्या 1 : क्योंकि बंगाल में नवजागरण केवल गाँव में हुआ था।
व्याख्या 2 : क्योंकि यह नवजागरण केवल मात्र साहित्यिक क्षेत्रों में सीमित था।
व्याख्या 3 : क्योंकि यह नवजागरण केवल मात्र पाश्चात्य शिक्षित प्रगतिशील समाज के मध्य तक सीमित था।
उत्तर :
व्याख्या 3 : क्योंकि यह नवजागरण केवल मात्र पाश्चात्य शिक्षित प्रगतिशील समाज के मध्य तक सीमित था।

प्रश्न 2.
कथन : भारत में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार हुआ –
व्याख्या 1 : भारत के अधिकांश व्यक्ति पाश्चात्य शिक्षा के सर्मथक थे।
व्याख्या 2 : अंग्रेज भारतीयों को शिक्षित लिपिक बनाना चाहते थे।
व्याख्या 3 : भारत सरकार सबको शिक्षित बनाना चाहती थी।
उत्तर :
व्याख्या 2 : अंग्रेज भारतीयों को शिक्षित लिपिक बनाना चाहते थे।

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प्रश्न 3.
कथन : बंकिम चन्द्र चटर्जी ने ‘आनन्दमठ’ की रचना किया –
व्याख्या 1 : भारतीय परम्परा और संस्कृति को विकसित करने के लिए।
व्याख्या 2 : बंगाल के युवाओं में साहित्यिक जागरूकता पैदा करने के लिए।
व्यख्या 3 : देश में उग्र राष्ट्रीयता एवं देश भक्ति को विकसित करने के लिए।
उत्तर :
व्याख्या 3 : देश में उग्र राष्ट्रीयता एवं देश भक्ति को विकसित करने के लिए।

प्रश्न 4.
कथन : यूरोप के बाजार में नील की जबरदस्त माँग थी क्योंकि –
व्याख्या 1 : नील से दवाइयाँ बनती थी।
व्याख्या 2 : चित्रकार नील का व्यवहार चित्रों को बनाने में करते थे।
व्याख्या 3 : नील का व्यवहार कपड़ों को रंगने में किया जाता था।
उत्तर :
व्याख्या 3 : नील का व्यवहार कपड़ों को रंगने में किया जाता था।

प्रश्न 5.
कथन : विद्यासागर को नारी स्वतंत्रता का अग्रदूत कहा जाता है।
व्याख्या 1 : वे केवल महिलाओं को शिक्षित करना चाहते थे।
व्याख्या 2 : उन्होंने विधवा पुन्विवाह के लिए कार्य किया।
व्याख्या 3 : उन्होंने महिलाओं के सामूहिक विकास का प्रयास किया था।
उत्तर :
व्याख्या 3 : उन्होंने महिलाओं के सामूहिक विकास का प्रयास किया था।

प्रश्न 6.
कथन : हुतुम प्यांचार नक्शा उपन्यास की रचना तत्कालीन सामाज़िक व्यवस्था की समालोचना के दृष्टिकोण से किया गया है।
व्याख्या 1 : एक भद्र व्यक्ति को हुतुम कहा गया है।
व्याख्या 2 : भारत की कई संभ्रांत सामाजिकता की समालोचना की गई है।
व्याख्या 3 : समाज एव राजनीति की यह एक समालोंचना है।
उत्तर :
व्याख्या 2 : भारत की कई संभ्रांत सामाजिकता की समालोचना की गई है।

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प्रश्न 7.
कथन : डेविड हेयर ने स्कूल बुक सोसायटी की स्थापना सन् 1817 ई० में की।
व्याख्या 1 : वे स्कूलों की स्थापना करना चाहते थे।
व्याख्या 2 : वे स्कूलौं किताबों को बेचना चाहते थे।
व्याख्या 3 : वे पाश्चात्य शिक्षा को फैलाना चाहते थे।
उत्तर :
व्याख्या 3 : वे पाश्चात्य शिक्षा को फैलाना चाहते थे।

प्रश्न 8.
कथन : 19 वीं शताब्दी के नवजागरण का प्रभाव पूरे भारतवर्ष पर पड़ा।
व्याख्या 1: 19 वीं शताब्दी के समय बंगाल सहित भारत में सामाजिक, सास्कृतिक, राजनीतिक तथा धार्मिक सुधार आन्दोलन का सूत्रपात हुआ।
व्याख्या 2 : बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ।
क्याख्या 3 : डेविड हेयर का भारत में शिक्षा प्रचार हुआ।
उत्तर :
व्याख्या 1: 19 वीं शताब्दी के समय बंगाल सहित भारत में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा धार्मिक सुधार आन्दोलन का सूत्रपात हुआ।

प्रश्न 9.
कथन : प्रारम्भ के वर्षो में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय शिक्षा में रुचि नहीं दिखाई।
व्याख्या 1 : कम्पनी ईसाई धर्म को भारत में सह देना चाहती थी।
व्याख्या 2 : अंग्रेजी कम्पनी भारत में प्राच्य भाषाओं (अरबी फारसी और संस्कृत) को सह देकर अंधेरे में रखना चाहती थी।
व्याख्या 3 : कम्मनी भारत में रहना चाहती थी।
उत्तर :
व्याख्या 2 : अंग्रेजी कम्पनी भारत में प्राच्य भाषाओं (अरबी फारसी और संस्कृत) को सह देकर अंधेरे में रखना चाहती थी।

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प्रश्न 10.
कथन : ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने ब्राह्मण वर्ग के एकाधिकार को समाप्र कर गैर-ब्राह्मण विद्यार्थियों को संस्कृत कॉलेज में प्रवेश देना प्रारम्भ किया क्योंकि –
व्याख्या 1 : वे भाषा के स्वरूप को सरल बनाना बाहते थे।
व्याख्या 2 : उन्होंने हिन्दू समाज के निम्न वर्गो को संस्कृत पढ़ने की अनुमति प्रदान की।
व्याख्या 3 : उन्होंने भारतीय संस्कृति की महानता को सिद्ध किया।
उत्तर :
ख्याख्या 2 : उन्होंने हिन्दू समाज के निम्न वर्गों को संस्कृत पढ़ने की अनुमति प्रदान की।

प्रश्न 11.
कथन : राजाराम मोहन राय ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया क्योकि –
व्याख्या 1 : वे भारतीयों को ईसाई बनाना चाहते थे।
व्याख्या 2 : वे प्राच्य शिक्षा के पक्षधर नहीं थे।
व्याख्या 3 : वे भारत में आधुनिकता का प्रसार करना घाहते थे।
उत्तर :
व्याख्या 3 : वे भारत में आधुनिकता का प्रसार करना चाहते थे।

प्रश्न 12.
कथन : राजा राममोहन राय को प्रथम आधुनिक व्यक्ति कहा जाता है –
व्याख्या 1 : क्योंकि राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की।
व्याख्या 2 : अंग्रेजी शिक्षा का प्रबल समर्थन किया।
व्याख्या 3 : हिन्दू धर्म की कमियों को सुधारने में योगदान दिया।
उत्तर :
व्याख्या 2 : अंग्रेजी शिक्षा का प्रबल समर्थन किया।

स्तम्भ ‘क’ को स्तम्भ ‘ख’ से सुमेलित कीजिए : (1 Mark)

प्रश्न 1.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) कालीप्रसन्न सिंह (क) नवम्बर 1954 ई०
(ii) पाण्डीचेरी, चन्दननगर, माही का विलय (ख) हूतोम पेंचार नक्शा
(iii) 1854 ई० (ग) कलकत्ता इंजीनियरिग कॉलेज की स्थापना
(iv) 1856 ई० (घ) सेट जॉन्स कॉलेज की स्थापना

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) कालीप्रसन्न सिंह (ख) हूतोम पेंचार नक्शा
(ii) पाण्डीचेरी, चन्दननगर, माही का विलय (क) नवम्बर 1954 ई०
(iii) 1854 ई० (घ) सेट जॉन्स कॉलेज की स्थापना
(iv) 1856 ई० (ग) कलकत्ता इंजीनियरिग कॉलेज की स्थापना

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प्रश्न 2.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) दीपाली संघ (क) सतीशचन्द्र मुखर्जी
(ii) डॉन सोसाइटी (ख) प्रीतिलता वादेदर
(iii) दरभंगा किसान विद्रोह (ग) लीला नाग
(iv) चटगाँव शस्तागार लूट (घ) स्वामी विद्यानन्द

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) दीपाली संघ (ग) लीला नाग
(ii) डॉन सोसाइटी (क) सतीशचन्द्र मुखर्जी
(iii) दरभंगा किसान विद्रोह (घ) स्वामी विद्यानन्द
(iv) चटगाँव शस्तागार लूट (ख) प्रीतिलता वादेदर

प्रश्न 3.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) डलहौजी (क) भारतीय साम्यवादी दल
(ii) नवगोपाल मित्र (ख) दीपाली संघ
(iii) मानवेन्द्रनाथ रॉय (ग) रेलवे
(iv) लीला रॉय (घ) हिन्दू मेला

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) डलहौजी (ग) रेलवे
(ii) नवगोपाल मित्र (घ) हिन्दू मेला
(iii) मानवेन्द्रनाथ रॉय (क) भारतीय साम्यवादी दल
(iv) लीला रॉय (ख) दीपाली संघ

प्रश्न 4.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) बामबोधिनी पत्रिका (क) हरिनाथ मजूमदार
(ii) हिन्दू पैट्रियाट (ख) काली प्रसाद सिंह
(iii) ग्रामवार्ता प्रकाशिका (ग) गिरिशचन्द्र घोष
(iv) हुतोम पेंचार नक्शा (घ) उमेशचन्द्र दत्त

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) बामबोधिनी पत्रिका (घ) उमेशचन्द्र दत्त
(ii) हिन्दू पैट्रियाट (ग) गिरिशचन्द्र घोष
(iii) ग्रामवार्ता प्रकाशिका (क) हरिनाथ मजूमदार
(iv) हुतोम पेंचार नक्शा (ख) काली प्रसाद सिंह

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प्रश्न 5.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) कलकत्ता मदरसा (क) 1792 ई०
(ii) एशियाटिक सोसाइटी (ख) 1781 ई०
(iii) बनारस संस्कृत कॉलेज (ग) 1784 ई०
(iv) हिन्दू बालिका विद्यालय (घ) 1849 ई०

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) कलकत्ता मदरसा (ख) 1781 ई०
(ii) एशियाटिक सोसाइटी (ग) 1784 ई०
(iii) बनारस संस्कृत कॉलेज (क) 1792 ई०
(iv) हिन्दू बालिका विद्यालय (घ) 1849 ई०

प्रश्न 6.

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) विधवा विवाह (क) ड्रिंकवाटर बेथुन
(ii) नारी शिक्षा (ख) राष्ट्रीय पत्र
(iii) वामाबोधिनी पत्रिका (ग) ईश्ररचन्द्र विद्यासागर
(iv) हिन्दू पेट्रियाट (घ) उमेश चन्द्र दत्त

उत्तर :

‘क’ स्तम्भ ‘ख’ स्तम्भ
(i) विधवा विवाह (ग) ईश्ररचन्द्र विद्यासागर
(ii) नारी शिक्षा (क) ड्रिंकवाटर बेथुन
(iii) वामाबोधिनी पत्रिका (घ) उमेश चन्द्र दत्त
(iv) हिन्दू पेट्रियाट (ख) राष्ट्रीय पत्र

 

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

Detailed explanations in West Bengal Board Class 10 History Book Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण offer valuable context and analysis.

WBBSE Class 10 History Chapter 3 Question Answer – प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Very Short Answer Type) : 1 MARK

प्रश्न 1.
‘उलगुलान’ का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
‘उलगुलाम’ कोल भाषा परिवार का शब्द है, जिसका तात्पर्य है महान हलचल (भारी उथल-पुथल)।

प्रश्न 2.
सन्यासी विद्रोह के एक नेता का नाम लिखें।
उत्तर :
भवानी पाठक।

प्रश्न 3.
फकीर विद्रोह कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
बंगाल में।

प्रश्न 4.
फकीर विद्रोह कब शुरु हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1776 ई० में।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 5.
फराजी आन्दोलन कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
बंगाल के फरीदपुर जिला में।

प्रश्न 6.
फराजी आन्दोलन कब प्रारम्भ हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1820 ई० में।

प्रश्न 7.
दुधू मियाँ का वास्तविक नाम क्या था ?
उत्तर :
मोहम्मद मोहसिन।

प्रश्न 8.
वहाबी आन्दोलन की शुरूआत कब हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1831 ई० में।

प्रश्न 9.
वहाबी आन्दोलन कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश आदि में। (नोट :- यह आन्दोलन सर्वप्रथम अरब में हुआ था।)

प्रश्न 10.
‘नील आयोग’ (Indigo Commission) का गठन किसने किया था ?
उत्तर :
अंग्रेजी सरकार ने।

प्रश्न 11.
‘नील आयोग’ का गठन किसलिए किया गया था ?
उत्तर :
नील की खेती संबंधित जाँच के लिए।

प्रश्न 12.
पाबना विद्रोह कब शुरू हुआ ?
उत्तर :
1873 ई० में।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 13.
पाबना विद्रोह कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
बंगाल का पाबना जिला, (जो अब बंगलादेश का अंश बन चुका है।)

प्रश्न 14.
कोल विद्रोह की समाप्ति कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1832 ई० में।

प्रश्न 15.
रंगपुर विद्रोह कब हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1783 ई० में।

प्रश्न 16.
‘नील आयोग’ का गठन कब हुआ ?
उत्तर :
सन् 1860 ई० में।

प्रश्न 17.
पाबना विद्रोह किस प्रकार का विद्रोह था ?
उत्तर :
यह विद्रोह एक किसान विद्रोह था।

प्रश्न 18.
बंगाल में ‘प्रजास्वत्व कानून’ कब पारित हुआ ?
उत्तर :
सन् 1885 में।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 19.
मुण्डा विद्रोह किस प्रकार का विद्रोह था ?
उत्तर :
जनजातीय प्रकार का विद्रोह।

प्रश्न 20.
भील विद्रोह किस प्रकार का विद्रोह था ?
उत्तर :
जनजातीय प्रकार का विद्रोह था।

प्रश्न 21.
मुण्डा विद्रोह किसके विरुद्ध शुरू हुआ था ?
उत्तर :
बिटिश शासन के विरुद्ध ।

प्रश्न 22.
‘रंगपुर विद्रोह’ किसके विरुद्ध शुरू हुआ ?
उत्तर :
जमींदार देवी सिंह के विरुद्ध।

प्रश्न 23.
संन्यासी विद्रोह किस प्रकार का विद्रोह था ?
उत्तर :
धार्मिक प्रकृति का।

प्रश्न 24.
फकीर विद्रोह की समाप्ति कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1777 ई० में।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 25.
फराजी आन्दोलन कब समाप्त हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1860 ई० में।

प्रश्न 26.
वहाबी आन्दोलन किस प्रकार का आन्दोलन था ?
उत्तर :
धार्मिक व कृषक आन्दोलन।

प्रश्न 27.
वहाबी आन्दोलन की शुरूआत कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1831 ई० में।

प्रश्न 28.
तीतूमीर का वास्तविक नाम क्या था ?
उत्तर :
मीर निसार अली।

प्रश्न 29.
पागलपंथी विद्रोह किस प्रकार का विद्रोह था ?
उत्तर :
अर्द्ध धार्मिक व कृषक विद्रोह था।

प्रश्न 30.
रम्पा विद्रोह की समाप्ति कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1880 में।

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प्रश्न 31.
‘गुण्डा धुर’ कौन थे ?
उत्तर :
गुण्डा धुर बस्तर विद्रोह के नेता थे।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Type) : 2 MARKS

प्रश्न 1.
सन्यासी-फकीर विद्रोह असफल क्यों हो गया ?
उत्तर :
कमजोर संगठन व नेतृत्व धन की कमी, साम्पदायिकता के कारण एकता का अभाव, अंग्रेजों की संगठित सैन्य नीति तथा क्रुरता पूर्वक दमनात्मक कार्यवाही के कारण सन्यासी-फकीर विद्रोह असफर्ल हो गया।

प्रश्न 2.
नील विद्रोह में इसाई मिशनरियों की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
नील विद्रोह में इसाई मिशनरियों ने सक्रीय भूमिका निभाई। उन्होंने इस आन्दोलन का समर्थन किया। चर्च मिशनरी के पादरी रेवरेंड जेम्स लॉग नीलदर्पण नाटक को पढ़कर बहुत द्रवित (भावुक) हुए और उन्होंने नीलदर्पण का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया। इसके लिए उन्हें एक महीने की जेल की साजा काटनी पड़ी।

प्रश्न 3.
दूधू मियाँ को क्यों याद किया जाता है ?
उत्तर :
फराजी आन्दोलन के प्रमुख नेता दूधू मियाँ ने बगांल में जंमीदारों, महाजनों, नीलहे साहबों, नील व्यापारियों के अत्याचार एवं शोषण के खिलाफ समाज को संगठित कर आन्दोलन शुरू किया। वे प्रचालित कर की दर तथा गैर-कानूनी कर वसूली के विरुद्ध जनमत को जागृत किया, और कहा कि जिस भूमि पर खेती करते हैं वह हमारी है। उन्होंने कई स्थानों पर अपनी प्रशासनिक व्यवस्था शुरू की थी। इसी संघर्ष के लिए दूधू मियाँ को भारतीय इतिहास में याद किया जाता है।

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प्रश्न 4.
नील विद्रोह में हरीश्चन्द्र मुखोपाध्याय की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
हिन्दू पैट्रियॉट पत्रिका के सम्पादक हरीश चन्द्र मुखर्जी नीलकर साहबों के शोषण एवं अत्याचार को अपने समाचार पत्र में विस्तार के साथ छापते थे। इस तरह उन्होंने नीलहे साहबों के अत्याचार के विरुद्ध शिक्षित मध्यमवर्गीय समाज को संगठित एवं जागरूक बनाने का प्रयास किया।

प्रश्न 5.
कोल विद्रोह का क्या कारण था ?
उत्तर :
अंग्रेजों द्वारा कोलों से उनकी साफ की गई जंगल की जमीन की सिक्ख तथा मुसलमानों को अधिक लगान पर देने के कारण कोल विद्रोह हुआ था।

प्रश्न 6.
क्या फराजी आन्दोलन धर्म पुर्नजागरण आन्दोलन था ?
उत्तर :
फराजी आन्दोलन इस्लाम में बाहर से आयी कुरीतियों को दूर कर इस्लाम के मौलिक स्वरूप को स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया एक धार्मिक पुनर्जागरण आन्दोलन था। अत: इसे धर्म पुनर्जागरण आन्दोलन कहा जा सकता है।

प्रश्न 7.
नीलक नील की खेती करने वालों के ऊपर किस प्रकार का अत्याचार करते थे ? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
नीलक नील की खेती करने वालों को जबरदस्ती अग्रिम धन देकर नील की खेती करवाते थे, तथा लागत से कम कीमत पर खरीदते थे। इन्कार करने पर उन्हें, तथा उनके बीबी बच्चों बहू-बेटियों को शारीरिक यातना देते थे। उनके फसल तथा घरों को जला देते थे। इस प्रकार वे अमानवीय अत्याचार करते थे।

प्रश्न 8.
क्रान्ति से तुम क्या समझते हो ?
उत्तर :
अधिकार एवं संगठनात्मक संरचना में होने वाला एक मूलभूत परिवर्तन जो अति अल्प समय में ही घटित होता है, क्रान्ति कहलाता है। क्रांति के उदाहरण हैं 18 वीं शताब्दी की यूरोप की औद्योगिक कांति, जुलाई की क्रांति, फरवरी क्रांति तथा फ्रांसीसी क्रांति आदि ।

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प्रश्न 9.
मुंडा विद्रोह का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
मुण्डा विद्रोह का मुख्य उद्देश्य दिकुओं के शेषण व अत्याचार से मुक्ति पाना, ईसाईयों धर्म-प्रचारकों से अपने धर्म की रक्षा करना था।

प्रश्न 10.
मुण्डा विद्रोह की दो विशेषताओं का उल्लेख करो।
उत्तर :
1899 ई० में शुरू हुए मुण्डा विद्रोह की दो विशेषताएँ निम्नलिखित थी –
(i) यह दिकुओं के विरुद्ध एक संगठित जन जाति विद्रोह था।
(ii) इस विद्रोह में आदिवासी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था।

प्रश्न 11.
नील विद्रोह का सर्मथन करने वाले एक समाचार पत्र तथा एक नाद्य पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर :
नोल विद्रोह का सर्मथन करने वाला एक समाचार पत्र का नाम “हिन्दू पेट्रियाट” तथा नाट्य पुस्तक “नील दर्पण” है।

प्रश्न 12.
दिकू से आप क्या समझते है ?
उत्तर :
संथाल परगना के आदिवासी क्षेत्रों में मैदानी भागों से आकर रहने वाले सेठ, साहुकार महाजन, ठेकेदारों अर्थात बाहरी लोगों को संथाली दिक कहते थे।

प्रश्न 13.
युवा बंगाल क्या है ?
उत्तर :
देरेजियों के अनुयायी को यंग या युवा बंगाल कहा जाता था। राम गोपाल घोष, कृष्ण मोहन बनर्जी, दक्षिणा रंजन मुखर्जी आदि उनके शिष्य थे।

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प्रश्न 14.
चुआड़ (चुआर) कौन थे ?
उत्तर :
चुआड़ एक आदिम जाति है, जो बंगाल के मिदनापुर तथा बांकुड़ा जिले के जंगल महल क्षेत्र में रहते थे। जहाँ पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भूमि कर (Land Tax) अत्यधिक बढ़ा दिया था। चुआड़ जाति के लोग ब्रिटिश सरकार से छुटकारा चाहते थे। अत: रायपुर के एक विद्रोही जमींदार ‘दुर्जन सिंह’ ने सन् 1798 में उन चुआड़ जाति के लोगों द्वारा की जाने वाली चुआड़ विद्रोह का नेतृत्व किया।

प्रश्न 15.
भगनाडिह का मैदान यादगार क्यों है ?
उत्तर :
भग्नाडिह का मैदान इसलिए यादगार है क्योंकि सिद्ध एवं कानू के नेतृत्व में होने वाला संथाल विद्रोह का प्रमुख केन्द्र था।

प्रश्न 16.
संथाल विद्रोह एवं कोल विद्रोह के दो नेताओं के नाम बताओ।
उत्तर :
संथाल विद्रोह के दो नेता सिद्धू एवं कानू थे, तथा कोल विद्रोह के नेताओं में बुद्दू भगत, केशव भगत एवं मदारी महतो आदि प्रमुख थे।

प्रश्न 17.
नील विद्रोह के दो नेताओं के नाम बताओ।
उत्तर :
नील विद्रोह के दो नेताओं का नाम ‘दिगम्बर विश्षास’ और ‘विष्णु चरण विश्चास’ था।

प्रश्न 18.
बारासात विद्रोह क्या है ?
उत्तर :
तीतूमीर ने अपने 600 समर्थकों को लेकर बारासात के पास नारकेलबेरिया में बाँस का एक किला बनवाया जहाँ पर देखते ही देखते, जमीन्दारों एवं पूँजीपती वर्ग द्वारा सताये गये लोगों को (लगभग 6000 लोग) तीतूमीर ने अपने साथ जोड़ लिया और उन्हें अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण देने लगा। तीतूमीर एवं उनके अनुयायिओं ने सन् 1831 में बारासात के पास अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसी विद्रोह को ‘बारासात विद्रोह’ कहा जाता है।

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प्रश्न 19.
बिरसा मुण्डा कौन था ?
उत्तर :
बिरसा मुण्डा, मुण्डा जन-जाति विद्रोह का नेता था, जिसने 899 ई॰ में दिकुओं और अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था।

प्रश्न 20.
मुहम्मद मोहसिन कौन थे ?
उत्तर :
मुहम्मद मोहसिन हाजी शरीयतुल्ला का पुत्र तथा फराजी आंदोलन के नेता थे। ये दुधू मियाँ के नाम से प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 21.
पाबना के किसान आंदोलन के दो विशेषताएँ बताओ।
उत्तर :
विशेषताएँ : (i) किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर चलाये गये आंदोलन के बावजूद हिंसक वारदाते नाममात्र ही हुई। (ii) इस क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से मुसलमान थे लेकिन अंग्रेजों एवं जमींदारों ने इसे सांप्रदायिक दंगे का नाम दिया ।

प्रश्न 22.
हाजी शरीयतुल्ला कौन थे ?
उत्तर :
हाजी शरीयतुल्ला फराजी आन्दोलन के जन्मदाता थे। इन्होंने 1804 ई० में फराजी नामक धार्मिक सम्प्रदाय की स्थापना की।

प्रश्न 23.
‘तारीक-ए-मुहम्मदिया’ आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
‘तारीक-ए-मुहम्मदिया’ आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य ‘काफिरों के देश’ (दारूल हर्ब) को मुसलमानों का देश (दारूल इस्लाम) में बदलना था।

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प्रश्न 24.
तीतूमीर कौन था ?
उत्तर :
तीतूमीर सैख्यद अहमद के अनुयायी तथा बंगाल में वहाबी आन्दोलन का नेता था।

प्रश्न 25.
‘मिदनापुर की लक्ष्मीबाई’ के नाम से किसे जाना जाता था, और वह किस आदिवासी विद्रोह से जुड़ी हुई थी ?
उत्तर :
‘मिदनापुर की लक्ष्मीबाई’ के नाम से रानी शिरोमणी को जाना जाता है। वे चुआड़ विद्रोह से जुड़ी हुई थी।

प्रश्न 26.
संन्यासी विद्रोह के दो नेताओं के नाम बताइए।
उत्तर :
भवानी पाठक और देवी चौधुरानी।

प्रश्न 27.
डाहर (Dahar) का क्या अर्थ है ? सिद्ध-कान्हू डाहर कहाँ स्थित है ?
उत्तर :
डाहर का अर्थ रास्ता (Street) होता है। कलकत्ता के एस्लानेड रोड (Esplanade Row) को सिद्धू-कान्हू डाहर नाम दिया गया है।

प्रश्न 28.
रंगपुर विद्रोह कब और क्यों हुआ था ?
उत्तर :
यह विद्रोह 1783 ई० में अत्याचारी जमींदार देबी सिंह के विरुद्ध किया गया था क्योंकि उसने एक निश्चित राजस्व पर जमीन कम्पनी से लेकर किसानों को रैयत के रूप में जमीन देकर उनसे मनमाना भू-राजस्व वसूलता था जिससे किसानों के भीतर उसके प्रति असंतोष की भावना बढ़ने लगी जो अन्त में विद्रोह का कारण बना।

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प्रश्न 29.
औपनिवेशिक वन (अरण्य) कानून क्या है ?
उत्तर :
भारतीय वनों पर ब्रिटिश आधिपत्य हासिल करने के लिए 1865 ई० में एक कानून बनाया गया, जिसे औपनिवेशिक वन (अरण्य) कानून – 1865 (Colonial Forest Act- 1865) कहा जाता है। इस कानून व्यवस्था में आदिवासियों का आस्था नहीं था।

प्रश्न 30.
‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) किसका नाटक है और इसकी विषय-वस्तु क्या है ?
उत्तर :
‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) ‘दीनबंधु मित्र’ का नाटक है तथा इसमें नील की खेती करने वाले किसानों पर नीलहे गोरे द्वारा किये गये अत्याचार को दिखाया गया है।

प्रश्न 31.
‘तिसाला’ क्या था ?
उत्तर :
‘तिसाला’ एक नये प्रकार का भूमि कर (Land Tax) था, जो राजस्थान में आदिवासी भीलों के ऊपर लगाया गया था। जिसके प्रतिवाद में भील विद्रोह हुआ था।

प्रश्न 32.
नील विद्रोह की दो विशेषताएँ बताओ।
उत्तर :
विशेषताएँ : (i) यह विद्रोह अंग्रेजी प्रशासन के खिलाफ एक किसान विद्रोह था।
(ii) इस विद्रोह में प्रथम बार देखा गया कि नीलहे किसानों के साथ मध्यम वर्ग एवं जमींदार वर्गों ने भी भाग लिया।

प्रश्न 33.
राजा नीलमणि सिंह देव कौन थे ?
उत्तर :
राजा नीलमणि सिंह देव पंचेत क्षेत्र के जमींदार थे। उन्होंने संथाल विद्रोहियों की भरपूर मद्द की थी। अंग्रेज सेनाओं ने राजा को गिरफ्तार कर कारागार में डाल दिया था।

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प्रश्न 34.
संन्यासी एवं फकीर विद्रोह से क्या समझते है ?
उत्तर :
सरकार ने संन्यासियों के तीर्थयात्रा जाने एवं मनाने पर रोक लगा दिया। इससे संन्यासी लोग बहुत क्षुब्ध हुए। अन्याय के विरुद्ध संन्यासियों के लड़ने की परम्परा थी और उन्होंने जनता से मिलकर कम्पनी की कोठियों तथा कोषों पर आक्रमण किए और कम्पनी के सैनिकों के विरुद्ध बहुत वीरता से लड़े।
फकीर विद्रोह, फकीरों द्वारा किया गया एक आन्दोलन था, जो सन् 776 से लेकर 1777 ई० के बीच बंगाल में हुआ था। घुमक्कड़ जाति के लोगों को फकीर माना जाता है, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घुमते हैं तथा अपना जीवन-यापन किया करते हैं।

प्रश्न 35.
ब्रिटिश सरकार ने वन अधिनियम क्यों पारित किया ?
उत्तर :
वन के प्रयोग और वन की सम्पदा पर सरकारी नियंत्रण और इजारेदारी की स्थापना का कार्य लार्ड डलहौजी के समय में आरम्भ किया गया और इसी उद्देश्य से वन कानून को 1865 ई० में पारित किया गया। 1878 ई० में दूसरा कानून बनाकर सरकार ने अपने अधिकारों के क्षेत्र को बढ़ा लिया।

प्रश्न 36.
विद्रोह से तुम क्या समझते हो ?
उत्तर :
प्रर्चलित व्यवस्था में परिवर्तन की माँग को लेकर जन समुदाय द्वारा आन्दोलन करना विद्रोह कहलाता है। विद्रोह अल्पकालीन या दीर्घकालीन हो सकता है। विद्रोह व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों हो सकते हैं। ब्रिटिश शासन काल में घटित रंगपुर विद्रोह, पावना विद्रोह, नील विद्रोह तथा सिपाही विद्रोह आदि विद्रोह के उदाहरण हैं।

प्रश्न 37.
दुर्जन सिंह कौन थे ?
उत्तर :
दुर्जन सिंह चुआड़ विद्रोह के प्रमुख नेता थे। 1798 ई० में अपने 1500 चुआड़ आदिवासी समर्थकों के साथ दुर्जन सिंह ने मिदनापुर के राजपुर परगना के 30 गाँवों पर अधिकार कर कम्पनी के दफ्तर पर धाबा बोल दिया। यद्यपि अंग्रेजों ने चुआड़ विद्रोहियों को पराजित कर दिया लेकिन शालबनी में चुआड़ों ने अंग्रेज छावनी को नष्ट कर दिया।

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प्रश्न 38.
पाइक कौन थे ? अंग्रेजी शासन के विरुद्ध इन लोगों ने चुआड़ों का साथ क्यों दिया ?
उत्तर :
बाँकुड़ा तथा मिदनापुर में पाइक जनजाति का आदि निवास स्थान था। भुगल काल में इन पाइकों को इस क्षेत्र में शान्ति स्थापना का कार्य दिया गया था। लेकिन अंग्रेजी शासन में इन पाइको को नौकरी से निकाल दिया। नौकरी से निकाल दिया गया। अत: अंग्रेजी शासन से नाराज इन पाइकों ने चुआड़ों का साथ दिया।

प्रश्न 39.
पाइक कौन थे ? अंग्रेजी शासन के विरुद्ध इन लोगों ने चुआड़ों का साथ क्यों दिया ?
उत्तर :
बाँकुड़ा तथा मिदनापुर में पाइक जनजाति का आदि निवास स्थान था। मुगल काल में इन पाइको को इस क्षेत्र में शान्ति स्थापना का कार्य दिया गया था। लेकिन अंग्रेजी शासन में इन पाइको को नौकरी से निकाल दिया गया। अत: अंग्रेजी शासन से नाराज इन पाइकों ने चुआड़ों का साथ दिया।

प्रश्न 40.
देवीसिंह कौन था ?
उत्तर :
देवीसिंह रंगपुर का एक इजारदार था। हेस्टिंग्स द्वारा भूमि राजस्व बढ़ाने से उत्साहित देवीसिंह ने जमींदार और साधारण लोगों पर अधिक कर लगा दिया। समय पर कर न देने वालों पर अमानुषिक अत्याचारों के साथ जमीन के अधिकार से भी वंचित करने लगा। अत: 18 जनवरी, 1783 ई० को नुरुलद्दीन के नेतृत्व में रंगपुर के किसानों ने देवीसिंह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

प्रश्न 41.
मजनू शाह कौन थे ?
उत्तर :
मजनू शाह एक सूफी सन्त थे जिनके नेतृत्व में 1763 ई० में फकीर आन्दोलन शुरू हुआ। अपने समर्थकों के साथ मजनू शाह ने सन्यासी आन्दोलन में भाग लिया। 1786 ई० में इन्होंने पूर्वी तथा उत्तरी बंगाल पर आक्रमण की योजना बनायी। कालेश्वर के युद्ध में घायल मजनू शाह की 1787 ई० में मृत्यु हो गयी।

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प्रश्न 42.
मूसा शाह कौन थे ?
उत्तर :
मूसा शाह, मजनू शाह के प्रमुख सहायक और फकीर आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। 1786 ई० में इन्हीं के नेतृत्व में मजनू शाह ने पूर्वी तथा उत्तरी बंगाल पर आक्रमण करने की योजना बनायी थी।

प्रश्न 43.
करीम शाह कौन थे ?
उत्तर :
बंगाल के प्रकृतिवादी पागलपंथियों ने करीम शाह के नेतृत्व में जमीन तैयार किया जिनका समाज पर काफी प्रभाव था। करीम शाह की शिक्षाएँ सुफी तथा हिन्दु दर्शन से प्रभावित थीं जिसमें स्थानीय रीति-रिवाज, परम्परा और धार्मिक मान्यताओं को काफी महत्व दिया गया। सभी मनुष्य को समान मानकर करीमशाह और उनके समर्थक लोगों को ‘भाई साहब’ कहकर सम्बोधित करते थे।

प्रश्न 44.
चाँद बीबी क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
पागलपंथी विचारधारा के प्रसार में करीम शाह की पत्नी चाँद का भी महत्वपूर्ण स्थान है। 1813 ई० में करीम शाह की पत्नी चाँद बीबी का भी समाज पर काफी प्रभाव था। लोग इन्हें अम्मा जी या पीर माता कहकर पुकारते थे।

प्रश्न 45.
खुटकटि व्यवस्था से क्या समझते है ?
उत्तर :
छोटानागपुर पठारी क्षेत्र में निवास करने वाले मुण्डा जाति के आदिवासी लोगों की सामुहिक कृषि को खुटकटि कहा जाता था। इस व्यवस्था के अर्त्तगत मुण्डा लोग अपने क्षेत्र की भूमि पर मिल-जुलकर खेती करते थे, और उससे होने वाले उत्पादन को अपनी आवश्यकता के अनुसार बाँट लेते थे।

प्रश्न 46.
किस आन्दोलन को वलीउलाह आन्दोलन कहा जाता है और क्यों ?
उत्तर :
वहाबी आन्दोलन को वलीउल्लाह आन्दोलन भी कहा जाता है क्योंकि भारत में इस आन्दोलन की शुरूआत दिल्ली के शाह वलीउल्लाह ने अरब के अब्दुल वहाब आन्दोलन से प्रभावित होकर शुरू किया था। इसीलिए इस आन्दोलन को वलीउल्लाह आन्दोलन कहा जाता है।

प्रश्न 47.
नामधारी आन्दोलन क्या था ? इस आन्दोलन की प्रकृति क्या थी ?
उत्तर :
1840 ई० में सियान साहिब (भगत जवाहर मल) के नेतृत्व में सिख धर्म में फैली सामाजिक व धार्मिक बुराईयों को दूर करने के लिए जो आन्दोलन शुरू किया था। उसे कूका आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। 1872 ई० में इस आन्दोलन का नेतृत्व ‘गम सिंह द्वारा किया गया। तब इस आन्दोलन को नामधारी आन्दोलन के नाम से जाना जाने लगा।

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प्रश्न 48.
भारतीय वन अधिनियम कब पास हुआ और इसका सबसे अधिक प्रभाव किसके ऊपर पड़ा ?
उत्तर :
सन् 1865 में तत्कालीन वायसराय सर जॉम्सो द्वारा भारतीय वन अधिनियम पास किया गया, इस अधिनियम द्वारा देश के सम्पूर्ण वनों पर ब्रिटिश सरकार का अधिकार स्थापित हो गया। वनों की गलत कटाई और कुमरी या झूम या स्थान्तरित कृषि पर रोक लग गया। इस कानून का सबसे अधिक प्रभाव देश के जंगलों में रहने वाली विभिन्न जंगली जाती के आर्थिक दशा पर पड़ा।

प्रश्न 49.
ऊलगुलान या उलुगखनी विद्रोह से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
1900 ई० में राँची के दक्षिण भाग में विरसा मुण्डा के नेतृत्व में हुए महान विद्रोह को ही उलगुलान (महान हलचल) विद्रोह कहा जाता है। इस विद्रोह में महिलाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण इसे उलगखनी विद्रोह भी कहा जाता है।

प्रश्न 50.
क्रान्ति, विद्रोह और उपद्रव किस प्रकार एक दूसरे से भिन्न हैं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
सम्पूर्ण व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन के लिए देश की अधिकांश जनता द्वारा संगठित रूप से कियां गया वृहद आन्दोलन का रूप क्रान्ति कहलाता है। यह हिंसक और अहिंसक किसी भी प्रकार की हो सकती है, इसका परिणाम दूरगामी और प्रभावशाली होता है। जैसे – औद्योगिक क्रांति (अहिंसक), रूसी क्रान्ति (हिंसक) इत्यादि।
विद्रोह : जब किसी व्यवस्था के खिलाफ अधिकांश लोग संगठित रूप से विरोध करते हैं, तो उसे विद्रोह कहते हैं। यह क्रान्ति और उपद्रव के बीच का व्यवस्था परिवर्तन वाला आन्दोलन है। जैसे – नील विद्रोह, पावना विद्रोहह इत्यादि।
उपद्रव : जब सरकार या किसी व्यवस्था के खिलाफ समाज के कुछ जाति और वर्ग के लोगों द्वारा परिवर्तन के लिए किया जाने वाला प्रयास उपद्रव या प्रजाक्षोभ कहलाता है। यह छोटे स्तर पर छोटी-छोटी माँगों के लिये किया जाता है, माँग पूरा होने के साथ इसका उद्देश्य समाप्त हो जाता है। जैसे – कोल उपद्रव, चुआड़ उपद्रव इत्यादि।

प्रश्न 51.
‘फराजी’ और ‘वहाबी’ शब्द का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
‘फराजी’ का अर्थ – अल्लाह या ईश्वर का सेवक और ‘वहाबी’ का अर्थ – पुर्नजागरण है।

प्रश्न 52.
दारूल हर्व एवं दारूल इस्लाम का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
1. ‘दारूल हर्व’ अरबी भाषा का शब्द हैं, जिसका अर्थ है, काफिर या शत्रु का देश।
2. दारूल इस्लाम का अर्थ है, इस्लाम का देश अर्थात् इस्लाम के अनुयायियों के निवास करने लायक भूमि।

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प्रश्न 53.
‘दामिन-ए-कोह’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
‘दामिन-ए-कोह’ संथाली भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है, संथालों की घनी आबादी का क्षेत्र। संथाल परगना में संथाल आदिवासी जंगलों को साफ करके उस क्षेत्र में घनी आबादी या बस्ती बनाकर निवास करते थें, तो वे अपनी निवास भूमि को ‘दामिन-ए-कोह’ कहते थें।

प्रश्न 54.
भील विद्रोह कब, कहाँ, क्यों और किसके नेतुत्व में किया गया था ?
उत्तर :
1820 ई० में गुजरात में महाराष्ट्र के खान देश में निवास करने वाले भील आदिम जाति के लोगों ने अंग्रेज सरकार और देशमुखों के शोषण के विरूद्ध अपनी स्वतंत्रता के लिए विद्रोह किया था
यह आन्दोलन दशरथ माँझी और काजल सिंह के नेतृत्व में हुआ था।

प्रश्न 55.
खाँसी विद्रोह कब, कहाँ, क्यों और किसके नेतृत्व में हुआ था ?
उत्तर :
1828-1833 ई० के बीच में मेघालय क्षेत्र के खाँसी जनजाति के लोगों ने उस क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार द्वारा सड़क निर्माण करने के विरोध में तीरथ सिंह और मुकुन्द सिंह के नेतृत्व में खाँसी विद्रोह हुआ था। जिसे कुछ शर्तों के साथ इस आन्दोलन को अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा।

प्रश्न 56.
ठगी प्रथा क्या थी और इसे किसने समाप्त किया ?
उत्तर :
19 वीं शताब्दी में उत्तर भारत और मध्य भारत में कुछ लोग राह चलते हुए धनी लोगों, व्यापारियों, यात्रियों को धांखा देकर उनकी सम्प्ति को ठग लेते थें, और जान से मार देते थें। राह चलते इसी सामाजिक अपराध को ठगी प्रथा कहा जाता था। जिसे 1835 ई० में लाई विलियम बेंटिक ने समाप्त किया था।

प्रश्न 57.
अंग्रेजो के शासनकाल में भारतीय जंगलों के बड़े पैमाने पर काटे जाने के क्या कारण थे।
उत्तर :
बिंटिश भारत में भारतीय जंगलों के बड़े पैमाने पर काटे जाने का मूल कारण भारत में रेलवे का विकास करना, चाय एवं कहवा के बगानों को लगाने, जहाज निर्माण के लिए, फर्नीचर एवं भवन समाग्री में लकड़ी की जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का बड़े पैमाने पर कटाव हुआ।

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प्रश्न 58.
1871 ई० के अपराधिक जनजाति कानून क्या था ?
उत्तर :
1871 ई० में अंग्रेजों ने जंगल में निवास करने वाले आदिम जातियों, चरवाहों, बंजारो आदि जातियों का वनों पर से उनका पारम्परिक अधिकार छीनने के लिए और उनका दमन करने के लिए जो कानून पास किया था। उसे ही अपराधिक जनजाति कानून कहा जाता था।

प्रश्न 59.
केनाराम और बेचाराम क्या था ?
उत्तर :
केनाराम और बेचाराम सेठ, साहूकार, महाजन, बनिया आदि द्वारा वस्तुओं को खरीदने और बेचने के लिए प्रयोग किये जाने वाले बटरखरा या एक माप था।
जब महाजने संथालियों या आदिमजाति से अनाज खरीदते थें, तो केनाराम बटखरा का उपयोग करते थें, जो वास्तविक वजन से थोड़ा भारी होता है, उसे केनाराम बटखरा कहा जाता था, और जब वे संथालियों को अनाज व सामान बेचते थें, तो बंचाराम बटखरा का उपयोग करते थें, जिनका वजन सामान्य वजन से कम होता था, उसे बेचाराम बटखरा कहा जाता था।

प्रश्न 60.
अंग्रेजी न्याय-व्यवस्था संथाल विद्रोह का कारण कैसे बनी ?
उत्तर :
अंग्रेजी न्याय-व्यवस्था सदैव अत्याचारियों व शोषणकताओं का संरक्षण करती थी, इस कारण संथालियों का अंग्रेजों की न्याय व्यवस्था से मोह भंग हो गया। वे अपनी रक्षा स्वयंम करने की ठानी, जो अन्त में विद्रोह का कारण बना।

प्रश्न 61.
ब्रिटिश न्याय प्रशासन में आदिवासियों की आस्था क्यों नहीं थी ?
उत्तर :
बिटिश न्याय प्रशासन ने आदिवासियों की जमीन जो जंगलनुमा थी तथा जिसे उन्होंने साफ करके खेती के लायक बनाया था उसे जमीदारों तथा ठेकेदारों को दे दिया था, इसलिये उनका न्याय प्रशासन पर विश्वास नहीं था।

प्रश्न 62.
वहाबी आन्दोलन के दो नेताओं के नाम बताओ।
उत्तर :
सैय्यद अहमद बरेलवी तथा तीतूमीर।

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प्रश्न 63.
संन्यासी विद्रोह के दो प्रमुख कारण बताओ।
उत्तर :
दो प्रमुख कारण :
(i) 1770 ई० का बंगाल में भीषण अकाल के समय शासन द्वारा किसी प्रकार का सहयोग न मिलना।
(ii) प्रशासन द्वारा तीर्थयात्रा पर प्रतिबंध तथा कर लगा देना।

प्रश्न 64.
नील आयोग का गठन क्यों हुआ था ?
उत्तर :
नील विद्रोह के व्यापक जन समर्थन, आन्दोलन के प्रति सरकार का नरम रवैया तथा नीलहे साहबों के अत्याचार तथा किसानों को न्याय देने के लिए सन् 1860 में नील आयोग (Indigo Commission) का गठन किया गया था।

प्रश्न 65.
‘हिन्दू पेट्रियाट’ समाचार पत्र का नील विद्रोह में क्या भूमिका थी।’
उत्तर :
(i) नील की खेती न करनेवाले किसानों की दुर्दशा को उजागर कर जनमत को आन्दोलन के पक्ष में जागृत करना था।
(ii) नील विद्रोह के प्रति हिन्दू-मुस्लिम को एकता के सूत्र में बाँधना आदि।

प्रश्न 66.
‘फराजी’ किसे कहते थे ?
उत्तर :
बंगाल के फरीदपुर जिले के फराजी सम्पदाय के अनुयायियों को फराजी कहते थे।

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प्रश्न 67.
कोल विद्रोह का अंत कैसे हुआ ?
उत्तर :
कोल विद्रोह, जो एक अग्नि का रूप ले चुका था, को दबाने के लिए अंग्रेजी सरकार ने बड़ी संख्या में सेना भेजी। यद्यपि कोलों ने छापामार युद्ध प्रारम्भ किया लेकिन विशाल अंग्रेजी सेना के सामने टिक न सके। हजारों की संख्या में आदिवासी मारे गये तथा अनेकों लोग गिरफ्तार हुये। 1832 ई० तक चारों तरफ आतंक, हिंसा एवं विनाश का नजारा रहा। अन्तत: सैन्य शक्ति के बल पर कोल विद्रोह का अन्त कर दिया गया।

प्रश्न 68.
दौलत सिंह कौन थे तथा उसने कब भील विद्रोह का नेतृत्व किया था ?
उत्तर :
दौलत सिंह राजस्थान का प्रमुख भील नेता थे। उसने 1821 ई० के भील विद्रोह का नेतृत्व किया था।

प्रश्न 69.
भारत में वहाबी आंदोलन के प्रमुख केन्द्र कहाँ-कहाँ थे ?
उत्तर :
पटना, हैदराबाद, बम्बई, बंगाल एवं उत्तर प्रदेश आदि।

प्रश्न 70.
वहाबी आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
वहाबी आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य था –
(i) मुस्लिम धर्म का प्रचार करना तथा
(ii) मुस्लिम समाज में सुधार करना इत्यादि।

प्रश्न 71.
1833 ई० का चार्टर ऐक्ट क्यों महत्चपूर्ण था ?
उत्तर :
ब्रिटिश पार्लियामेंट ने 1833 ई० में चार्टर ऐक्ट परित किया। इस एक्ट के अनुसार नील के व्यापार तथा अन्य वस्तुओं के व्यापार पर और सभी यूरोपीय तथा देशी व्यापारियों के लिए व्यापार के दरवाजे खोल दिये । कम्मनी का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया।

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प्रश्न 73.
फराजी सम्पद्राय का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
फराजी सम्पद्राय का मुख्य उद्देश्य था –
(i) मुसलमानों में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना,
(ii) जमीन्दारों द्वारा कृषकों को शोषण से मुक्ति दिलाना आदि।

प्रश्न 74.
बंगाल में नील के करखाने कहाँ-कहाँ स्थित थे ?
उत्तर :
बंगाल में नील के करखाने फरीदपुर, पावना, जैसोर तथा ढाका आदि नगरों में स्थित थे।

प्रश्न 75.
नील विद्रोह के प्रमुख केन्द्र कौन-कौन थे ?
उत्तर :
मालदा, मुर्शिदाबाद, बारासात, जैसोर, नदिया, फरीदपुर, पावना तथा खुलना आदि नील विद्रोह के प्रमुख केन्द्र थे।

प्रश्न 76.
‘विशा डकैत’ के नाम से अंग्रेज किस व्यक्ति को पुकारते थे ?
उत्तर :
नील विद्रोह के नेता विश्वनाथ सरदार को ‘विशा डकैत’ के नाम से पुकारा जाता था ।

प्रश्न 77.
‘डिंग खरचा’ क्या था ?
उत्तर :
रंगपुर विद्रोह ( 1783 ई०) के दौरान विद्रोह का खर्च वहन करने के लिए जो चन्दा (Donation) उठाया जाता था उसे ही ‘डिंग खरचा’ कहा जाता था।

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प्रश्न 78.
‘खुँतकाठी प्रथा’ क्या था ?
उत्तर :
भूमि के ऊपर मुण्डा समाज का संयुक्त या सामूहिक स्वामित्व होने की प्रथा को ‘खुँतकाठी प्रथा’ कहा जाता था।

प्रश्न 79.
सरदारी विद्रोह क्या था ?
उत्तर :
मुण्डाओं के सामूहिक खेती को जब बनिए, ठेकेदरों तथा जमीन्दारों ने नष्ट करनी शुरू कर दी, तो इन्होंने इस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसी विद्रोह को सरदारी विद्रोह के नाम से भी जाना गया।

प्रश्न 80.
तीतूमीर क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
तीतूमीर बंगाल में वहाबी आन्दोलन के नेता होने के कारण तथा सैयद अहमद के अनुयायी के रूप में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 81.
बाँस का किला किसने और कहाँ बनवाया था ?
उत्तर :
तीतूमीर ने बाँस का किला बारासात के पास नारकेलबेरिया में बनवाया था।

प्रश्न 82.
‘जमींदार सभा’ का गठन कब और किस उद्देश्य से किया गया ?
उत्तर :
जमींदार सभा का गठन सन् 1838 में किया गया तथा इसका प्रमुख उद्देश्य जमींदारों के हितों की रक्षा करना था।

प्रश्न 83.
भारत में वहाबी आंदोलन का नेतुत्व किसके द्वारा हुआ ?
उत्तर :
वहाबी आंदोलन का नेतृत्व पटना में सैयद अहमद बरेलवी द्वारा किया गया।

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प्रश्न 84.
चुआड़ विद्रोह कहाँ-कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
चुआड़ विद्रोह बंगाल के बांकुड़ा, वीरभूम, नरभूमि, दलभूमि इत्यादि स्थानों पर हुआ था।

प्रश्न 85.
नील विद्रोह का समय कब से कब तक माना जाता है ?
उत्तर :
नोल विद्रोह का समय सन् 1859 ई० से लेकर 1860 ई० तक माना जाता है, अर्थात् शुरुआत सन् 1859 में तथा समाप्ति सन् 1860 ई० में।

प्रश्न 86.
नील विद्रोह के दो नेता कौन थे ?
उत्तर :
दिगम्बर विश्थास एवं विष्णु चरण विश्चास।

प्रश्न 87.
पाबना विद्रोह के नेता कौन थे ?
उत्तर :
पाबना विद्रोह के नेता ईशानचन्द्र राय, केशवचन्द्र राय एवं शम्भू पाल आदि थे।

प्रश्न 88.
‘काश्तकारी कानून’ कब और कहाँ पारित हुआ ?
उत्तर :
‘काश्तकारी कानून’ सन् 1885 में बंगाल में पारित हुआ।

प्रश्न 89.
रंगपुर विद्रोह के नेता कौन थे ? इस विद्रोह की प्रकृति क्या थी ?
उत्तर :
रंगपुर विद्रोह के नेता नुरूद्दीन था। इस विद्रोह की प्रकृति जनजाति-किसान विद्रोह जैसी थी ।

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प्रश्न 90.
रंगपुर विद्रोह कहाँ-कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
रंगपुर विद्रोह बंगाल के रंगपुर, दिनाजपुर तथा कूचबिहार जिलों में हुआ था।

प्रश्न 91.
भील विद्रोह का नेतृत्व महाराष्ट्र एवं राजस्थान में किसने किया था ?
उत्तर :
भील विद्रोह का नेतृत्व महाराष्ट्र में सेवाराम (सेवरम) ने तथा राजस्थान में दौलत सिंह ने किया।

प्रश्न 92.
सेवाराम के अतिरिक्त महाराष्ट्र में भील विद्रोह का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर :
सरदार दशरथ, हिरिया, भगोजी तथा काजल सिंह ने किया था ।

प्रश्न 93.
दौलत सिंह के अतिरिक्त राजस्थान में भील विद्रोह का नेतुत्व किसने किया ?
उत्तर :
श्री गोविन्द तथा मोतीलाल तेजावर ने।

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प्रश्न 94.
संथालों पर किन-किन लोगों द्वारा अत्याचार किया जाता था ?
उत्तर :
संथालों या संथालियों पर जमीन्दारों, ठेकेदारों, साहूकारों, नीलहे गोरों द्वारा अत्याचार किया जाता था।

प्रश्न 95.
संन्यासी विद्रोह का केन्द्र कहा था ?
उत्तर :
सन्यासी विद्रोह का केन्द्र समस्त बंगाल था।

प्रश्न 96.
संन्यासी विद्रोह के नेता कौन थे ?
उत्तर :
केना सरकार एवं दिर्जिनारायण।

प्रश्न 97.
फकीर विद्रोह के दो नेता कौन थे ?
उत्तर :
मजनूनशाह और चिराग अली आदि।

प्रश्न 98.
फराजी आन्दोलन के दो नेताओं के नाम क्या थे ?
उत्तर :
हाजी शरीयतुल्ला तथा दूधू मियाँ।

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प्रश्न 99.
वहाबी आन्दोलन क्या है ?
उत्तर :
मुहम्मद अब्दुल वहाब ने अरब में इस्लाम धर्म में व्याप्त बुराईयों को दूर करने के लिए, जिस सुधार आन्दोलन का सूत्रपात किया, उसे वहाबी आन्दोलन कहते हैं।

संक्षिप्त प्रश्नोत्तर (Brief Answer Type) : 4 MARKS

प्रश्न 1.
‘नीलदर्पण’ नाटक से उन्नीसवीं शताब्दी में बंग्ला समाज का चित्रण किस प्रकार मिलता है ?
उत्तर :
1960 ई० में बंगला साहित्यकार दीनबन्धु मित्र द्वारा रचित नीलदर्पण नाटक अपने समय की सामाजिक ऐतिहासिक घटनाओं का सशक्त दस्तावेज है। इस नाटक में लेखक ने बंगाल में नील की खेती करने वाले किसानों पर अग्रेंज नीलहें साहबों, व्यापारियों एवं जमींदारो के अमानवीय अत्याचारों की बड़ी भावपूर्ण मार्मिक चित्रण किया है। इस नाटक के प्रकाशन का एक तरफ बंगाली समाज ने स्वागत किया तो दूसरी तरफ अंग्रेज इससे जलभुन उठे थे।

इस नाटक में बंगाल के ग्रामीण व नगरीय समाज का सजीव वर्णन किया गया है। नीलहे साहबों के अत्याचार से गाँव के छोटे-बड़े सम्पन्न किसान सभी नील की खेती करने से परेशान है। वे गाँव छोड़कर शहर जाना चाहते है। कुछ भी हो जाये लेकिन नोल की खेती करने के लिए तैयार नहीं है। किन्तु पुरखों की बनायी सम्पत्ति, गाँव की मिट्टी की सोधी सुगन्ध, आपसी प्रेम सम्बन्ध उन्हें पलायन करने से रोकती है। स्वरपुर के गोलोक चन्द्र बसु तथा उनके पड़ोसी साधुचरण दास की दुख-भरी बाते गाँव की त्रासदी को ही दशार्ते है। वही दूसरी तरफ बंगाल का पढ़ा-लिखा शहरी समाज उनकी दुर्दशा को देखकर मर्माहत हो उठता है।

उनकी आवाज बनकर उनकी समस्याओं को सामाचार पत्रिकाओं के माध्यम से देश के लोगों के सामने उजागर किया। इस कार्य में ‘समाचार दर्पण’, ‘समाचार चन्द्रिका’, ‘हिन्दू प्रेटियाट’ का अमूल्य योगदान रहा। नीलदर्णण नाटक तो सभी वर्ग के क्रिया-कलापों का जीवन्त दस्तावेज है। दरोगा, मजिस्ट्रेट, वकील, जमीन्दार, सेठ-साहूकार सभी किसानों एवं उनकी बहु-बेटियों का शोषण करते थे। इस प्रकार नील-दर्पण ने तत्कालीन बंगाली समाज की दयनीय दशा का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।

प्रश्न 2.
1855 ई० में सन्थाल विद्रोह के कारण और अन्त का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
संथाल विद्रोह एक आदिवासी या जनजातीय विद्रोह था। जिसमें आदिवासी संथालियों ने अपने स्वाभिमान की रक्षा तथा अस्तित्व के लिए विद्रोह किये। यह विद्रोह सन् 1855 से लेकर 1856 ई० के बीच इन सभी क्षेत्रों में हुआ था, जो बंगाल एवं बिहार से संबंधित हैं। संथालों द्वारा किये गये विद्रोह के कारण निम्नलिखित हैं –
i. भू-राजस्व : संथालियों को सरकार द्वारा जो पर्वतीय एवं वनीय भूमि प्राप्त हुई थी, उन भूमि को संथालियों ने ऊपजाऊ एवं कृषि योग्य बनाकर खेती-बारी करने लगे थे। तभी सरकार ने उनपर भूमि कर लागू कर दिया। इन समस्याओं से परेशान होकर संथालियों ने विद्रोह करने लगे।

ii. जमींदारों का अत्याचार : सरकार द्वारा जमीन्दर वर्ग को संथालियों से राजस्व (लगान) वसूलने का कार्य सौपा गया था। जमींदार वर्ग संथालियों से मनचाहा लगान या कर वसूलता था तथा उनपर घोर अत्याचार भी करता था। ये सभी क्रिया-कलाप या अत्याचार को संथाली वर्ग बर्दास्त नहीं कर पाये और विद्रोह कर दिये।

iii. महाजनों द्वारा अत्याचार : महाजनों ने संथालों को आवश्यकतानुसार 5 से 50 रुपये प्रतिशत की दर से ब्याज लेकर रुपया उधार देना शुरू किये। जो संथाल एक बार कर्ज ले लेता था तो उसे सूद के जाल से निकलना कठिन हो जाता था। इस प्रकार अत्याचार से परेशान होकर वे विद्रोह का मार्ग चुन लिंये।

iv. निलहे साहबों द्वारा अत्याचार : संथालियों के ऊपर न केवल ठेकेदारों, जंमीदारों, रेलकर्मियों का अत्याचार होता था बल्कि निलहे साहबों द्वारा भी उनपर घोर अत्याचार किया जाता था। जो असहनीय था।

v. अंग्रेजी न्याय व्यवस्था : ब्रिटिश सरकार ने जो न्याय व्यवस्था बनाये थे सिर्फ वे अपने फायदे के लिए किये थे। वे संथालियों के लिए कोई भी न्याय व्यवस्था नहीं बनाये थे। इससे संथालियों का समुदाय असंतुष्ट हो उठा था, जिससे वे विद्रोह का मार्ग चुन लिये।

संथालियों ने अपना विद्रोह राजमहल के पास जो ‘दामन-ए-कोह’ अर्थात् ‘संथाल परगना’ बनाये थे, वहीं से ही सिद्ध और कानू तथा चाँद और भैरव के नेतृत्व में शुरुआत किये। देखते ही देखते यह विद्रोह पूरे बंगाल एवं बिहार में फैल गया।

विद्रोह का दमन व अन्त : ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह को बड़ी ही नृशंसता से दमन कर दिया। जगह-जगह गिरफ्तारी तथा छापेमारी किया गया तथा सिद्ध एवं कान्हू को गिरफ्तार कर फाँसी दे दिया गया। इसी के साथ विद्रोह का अन्त हो गया।

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प्रश्न 3.
बारासात विद्रोह क्या था ? इसकी असफलता के क्या कारण थे ?
उत्तर :
तीतूमीर का वास्तविक नाम मीर निसार अली था, परन्तु ये तीतूमीर के नाम से ही जाने जाते थे। तीतूमीर ने अपने 600 समर्थकों को लेकर बारासात के पास नारकेलबेरिया में बाँस का एक किला बनवाया जहाँ पर सताये गये हजारों लोगों को तीतूमीर ने अपने साथ रखा और उन्हें अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण देने लगे। अतः तीतूमीर एवं उनके अनुयायियों ने सन् 1831 ई० में बारासात के पास अंभेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसी विद्रोह को ‘बारासात विद्रोह’ कहा जाता है।

इस विद्रोह के असफलता के निम्नलिखित कारण थे :-
(i) तीतूमीर ने अंग्रेजों का सामना करने के लिए ‘बाँस का किला’ तैयार करवाया जिसमें विभिन्न प्रकार के हथियार (तलवार, बर्घे तथा लाठियां) रखे जाते थे, जो विद्रोहियों का प्रमुख हथियार था। परन्तु अंग्रेजों के नवीन तकनीकी के हथियार के सामने उनकी हधियार टिक न पाये और ब्रिटिश गोलों के भार से तीतूमीर का ‘बाँस का किला’ ध्वस्त हो गया।
(ii) तीतूमीर मारा गया और उसके 350 सहयोगी गिरफ्तार कर लिये गये। नेतृत्व का अभाव तथा सरकारी दमन के कारण तीतूमीर का बारासात आन्दोलन असफल रहा।
(iii) संगठन, कुशल रणनीति एवं धन का अभाव।
उक्त कारणों ने बारासात विद्रोह को असफल बना दिया।

प्रश्न 4.
कोल विद्रोह पर सक्षिप्त टिष्पणी लिखिए।
उत्तर :
कोल विद्रोह : कोल, छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों में निवास करने वाली एक आदिवासी जाती है। इस जाति के लोग अपने क्षेत्र में जंगलों को साफ करके खेत बनाकर सामूहिक खेती करके शांति पूर्वक जीवन-यापन कर रहे थे। जब पूरे देश में अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया तो उस क्षेत्र में बाहर से हिन्दू-मुस्लिम, सिख आदि समुदायों के लोग तथा सेठ, साहुकार, महाजन, जमींदार आदि आकर बसने लगे, जिससे उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप होने से उनका जीवन जीना कठिन हो गया इसके अलावा उनको अंग्रेजों की स्वतंत्रता,

न्याय एवं प्रशासनिक व्यवस्था से भी मोह भंग हो गया, इन्हीं सब कारणों से उनका जीवन अव्यवस्थित हो गया जिनके शोषण अत्याचार से बचने और अपनी स्वतंत्र अस्तित्व की रक्षा के लिए बुद्ध भगत के नेतृत्व में संगठित होकर 1829 ई० में अंग्रेजी और बाहरी लोगों (दिकृओं) के विरूद्ध हजारों कोल, उड़ाव, मुण्डा जातियों ने आक्रमण कर दिया, पूरे क्षेत्र में सरकारी सम्पत्ती को तोड़-फोड़ दिया गया। जमीन्दारों एवं दिकुओं की सम्पत्ती को लूट लिया गया। सरकारी भवनों को जला दिया गया, इस विद्रोह की व्यापकता को देखते हुये अंग्रेजी सरकार को सेना भेजकर विद्रोह को 1848 ई० में दबा दिया गया।

महत्व या परिणाम : यद्यपि 1848 ई० में भंयकर संघर्ष के बाद कोल विद्रोह को अंग्रेजों ने सैनिक शक्ति के बल पर दबा दिया। इस विद्रोह के नेता बुद्धू भगत, केशव भगत, जोआ भगत मारे गये हजारों पुरूष और औरत कोल विद्रोहियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इस तरह कोल विद्रोही लगभग 10 वर्षों तक अपने छापामार युद्ध (गुरिल्ला युद्ध), प्रणाली तथा हिंसात्मक प्रणाली द्वारा अंग्रेजों तथा दिकूओं को परेशान करते रहे।

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प्रश्न 5.
मुण्डा विद्रोह पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
मुण्डा विद्रोह : ‘मुण्डा’ छोटा नागपुर क्षेत्र में निवास करने वाली एक आदिवासी जाति है। इस जाति के लोग जंगलों को साफ कर सामूहिक खेती करते थे जिसे खुटकट्टि कहा जाता था, जब इनकी सामूहिक खेती को बाहर से आये बनिये, ठेकेदार, जमींदार नष्ट करनी शुरू कर दी तो इनके विरूद्ध मुण्डा जाति के लोगों ने विरसा मुण्डा के नेतृत्व में संगठित होकर 1899 ई० में अंग्रेजों और दिकूओं के विरूद्ध विद्रोह कर दिया, जिसे मुण्डा विद्रोह कहते हैं। इस विद्रोह में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इसलिए उलुगखनी विद्रोह भी कहा जाता है। चूँकि यह विद्रोह अंग्रेजों कि शासन व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह कर स्वयं अपनी जाति के शासन स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया। इसलिए इस विद्रोह को सरदारी विद्रोह भी कहा जाता था।

मुण्डा विद्रोह आदिवासी विद्रोह में सबसे महत्वपूर्ण विद्रोह माना जाता है, इस विद्रोह का नेता विरसा मुण्डा स्वंय को भगवान का दूत घोषित कर अपने समर्थकों को सिंगगोगा की पूजा करने का आदेश दिया और अंग्रेजों का विरोध कर अपने जाति का शासन स्थापित करने का प्रयास किया, व्यापक विद्रोह के बाद विरसा मुण्डा को 1900 ई० में गिरफ्तार कर राँची जेल में डाल दिया गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गयी। इस प्रकार नेतृत्व के अभाव में 1901 ई॰ में मुण्डा विद्रोह का अन्त हो गया।

इस आन्दोलन की व्यापकता के प्रभाव को देखते हुए सरकार ने 1908 ई॰ में छोटानागपुर कास्तकारी कानून बनाकर मुण्डा आदिवासियों को कुछ सुविधाँए दी गई। उस क्षेत्र में बाहरी लोग के प्रवेश पर रोक लगा दिया गया, इनकी जमीन की खरीद-बिक्रों पर रोक लगा दिया गया, और उनके जमीन पर आदिवासियों के अधिकार को स्वीकार कर लिया गया।

प्रश्न 6.
पावना विद्रोह पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
पावना विद्रोह : पावना पूर्वी बंगाल (वर्तमान बंगलादेश) का एक प्रमुख जिला था, जब इस क्षेत्र में अंग्रेजों ने स्थायी बन्दोबस्त व्यवस्था लागू कि, तो यहाँ के जमीन्दारों ने किसानों पर मनमाने तरीके से अनेकों प्रकार के उपकरों (अप्बाव) लगाया, और किसानों से जबरदस्ती वसूल करने लगे, जो किसान कर नहीं देते थे उनकी जमीन छीनने लगे। शुरू में तीन किसानों ने ‘किसान संघ’ बनाकर शांतिपूर्ण तरीके से जमीन्दारों को लगान नहीं देने का जागरूकता अभियान जगाया, इसी बीच 1885 ई० में सरकार ने बंगाल प्रजास्वत कानून पास किया, इस कानून के अनुसार किसानों को उनकी पैतिक भूमि से अलग नहीं किया जा सकता।

इस कानून के बाद किसानों ने शाहचंद, शम्भु पाल एवं खुदी मल्लाह के नेतृत्व में जमींदार के विरूद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया। छोटी-मोटी घटनाओं के साथ शांतिपूर्ण तरीके से किसान अपनी लड़ाई लड़ते रहे । वे कानूनी लड़ाई में विजयी हुए सरकार 1885 ई० में बंगाल कास्तकारी कानून पास किया जो केवल खानापूर्ति एवं दिखावा मात्र था।

इस प्रकार पावना विद्रोह अंग्रेजों और जमीदारों के विरूद्ध था, इस विद्रोह में किसानों का नारा था, कि “हम केवल महारानी का रैयत होना चाहते है, किसी दूसरे का नहीं।” इस आन्दोलन को श्रृषि बंकिमचन्द्र चटर्जी, आनंद मोहन बोस, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी तथा कैम्पवेल नामक अंग्रेज ने समर्थन किया था। 1885 ई० के कास्तकारी कानून से किसानों को थोड़ीबहुंत राहत तो अवश्य मिली, किन्तु वे जमींदारों के चंगुल से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाये।

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प्रश्न 7.
बारासात विद्रोह और उसके महत्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
बारासात विद्रोह ; भारत में वहाबी आन्दोलन की आग उत्तर-प्रदेश के मेरठ और बरेली से उत्पन्न होकर बिहार होते हुए बंगाल तक फैल चुका था। बंगाल में वहाबी आन्दोलन का नेतृत्व मीर निसार अली अर्थात् तीतूमीर ने किया था। शुरू-शुरू में बंगाल में वहाबी आन्दोलन का उद्देश्य दारूल हर्व (शत्रु या काफिरों का देश) को दारूल इस्लाम (मुस्लमानों के रहने का पवित्र इस्लाम) देश बनाना तथा इस्लाम में बाहर से आयी धार्मिक बुराइयों को दूर करना था, किन्तु बाद में तीतूमीर ने इस आन्दोलन को किसानों के हितों की रक्षा से जोड़ दिया। किसानों पर अत्याचार करने वाले जमीन्दारों, महाजनों एवं अंग्रेजी शासन के विरूद्ध उसने अपने समर्थकों को लेकर संघर्ष शुरू कर दिया।

सबसे पहले तीतूमीर ने ‘गोबरडांगा’ के राजा को पराजित किया, जिससे उसका साहस बढ़ गया और उसने अपने आप को बादशाह घोषित कर दिया। इसके बाद उसने अपने समर्थको को रहने और उनके लड़ने के हथियारों को रखने के लिए ‘बारासात के नारकेलबेरिया’ नामक स्थान पर बाँस का किला बनवाया।

अधिक उत्साह एवं घमण्ड से चूर तीतूमीर ने जमीन्दारों, नील व्यपारियों के विरूद्ध संघर्ष की घोषणा कर दी, उसने बारासात के जमीन्दार कृष्ण राय पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण की खबर सुनते ही कलकत्ता से अंग्रेजो की सेना बारासात पहुँची और वहाँ पहुँचकर बाँस के किलों को घेर लिया। एक तरफ से तीरों की वर्षा तो एक तरफ से गोली की वर्षा होने लगी। अन्त में अंग्रेज सैनिकों ने बाँस के किले में आग लगा दिया, जिसमें तीतूमीर और उसके बहुत से समर्थक मारे गये, 350 से अधिक विद्रोही गिरफ्तार हुए। 1931 ई० के बारासात के इसी विद्रोह को बारासात विद्रोह के नाम से जाना जाता है।

महत्व : बारासात विद्रोह को अंग्रेजों ने भले ही सैनिक शक्ति के दम पर दबा दिया, इसके बावजुद भी यह आन्दोलन कई माइनों मे देश के लिए प्रेरणादायी रहा, इस आन्दोलन ने किसानों को संगठित होकर जमीन्दारों और अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया। जिससे प्रभावित होकर देश के कई भागों में किसान आन्दोलन शुरू हुए, इस आन्दोलन की व्यापकता और प्रभाव के सामने ईस्ट इण्डिया कम्पनी सरकार को किसानों के सुधार के कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा। यही बारासात विद्रोह का यही महत्व रहा है।

प्रश्न 8.
(i) पागलपंथी विद्रोह और (ii) रंगपूर विद्रोह पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
(i) पागलपंथी विद्रोह : भूमिका : 1825 ई० में बंगाल के कुछ क्षेत्रों में पागलपंथी नाम का एक धार्मिक पंथ था, जो सत्य, समानता एवं भाईचारे के सिद्धान्त पर आधारित था, जब इस पंथ के लोगों ने जमीन्दार और महाजनों के शोषण एवं अत्याचार के विरूद्ध करमन शाह के नेतृत्व में सशस्त्र आन्दोलन चलाया, तब इस विद्रोह का नेतृत्व करमन शाह के पूत्र तीतूमीर ने किया, उसने मैमन सिंह जिले के शेरपुर नगर पर अधिकार कर अपना शासन चलाने लगा लेकिन 1831 ई० में अंग्रेजों ने सैन्य द्वारा इस विद्रोह का अन्त कर दिया।

(ii) रंगपुर विद्रोह : भूमिका : रंगपूर पूर्वी बंगाल का एक जिला था, वहाँ के किसानों ने अपने जमीन्दार देवी सिंह के घोर अत्याचारों से तंग आकर 1783 ई० में किसान नेता नूरूद्दीन के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया उन्होंने जमींदार को लगान देना बन्द कर दिया, किन्तु देवी सिंह ने अंग्रेजों की सहायता पाकर 1809 ई० में इस विद्रोह को दबाने में सफल रहा।
इस प्रकार रंगपूर विद्रोह संगठन, साधन, कुशल नेतृत्व के अभाव में असफल हो गया।

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प्रश्न 9.
मोपला विद्रोह क्या था ? इसके महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
मोपला दक्षिण भारत के मालावार क्षेत्र में निवास करने वाला एक मुस्लिम समुदाय था, मूल रूप से यह अरब देश से आये मुसलमानों का एक समुदाय था, जो दक्षिण भारत के मालावार क्षेत्र में खेती कर जीवन-यापन कर रहे थे। 1792 ई० में लगान वृद्धि और भूमि पर मालिकाना हक को लेकर उन्होंने जमीन्दारों और अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र विद्रोह किया था, जिसे मोपला विद्रोह कहा जाता है। सरकार ने सैन्य शक्ति के बल पर इस विद्रोह को दबा दिया।
महत्व : मोपला विद्रोह की प्रकृति मूल रूप से आर्थिक थी लगान वृद्धि के विरोध में यह आन्दोलन शुरू हुआ था। इस आन्दोलन से सरकार लगान वृद्धि को घटाने के लिए बाध्य हुई। इस आन्दोलन की सफलता से प्रेरित होकर देश के कई भागों में किसान आन्दोलन शुरू हुए।

प्रश्न 10.
चुआड़ विद्रोह का वर्णन कीजिए।
अथवा
चुआड़ विद्रोह के महत्वं या परिणाम का वर्णन करें।
उत्तर :
चुआड़ विद्रोह : चुआड़ जाति पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के उत्तर-पश्चिम भाग के जंगल महल क्षेत्र में निवास करने वाली एक आदिवासी है। इस क्षेत्र में चुआड़ जाति के लोग खेती करके और जंगली जानवरों का शिकार करके शांतिपूर्वक जीवन जी रहे थे, कुछ चुआड़ों को जमीन्दारों की सेवा करने के बदले बिना कर देनी वाली जमीन मिली थी, एसे चुआड़ को ‘पाइक’ कहते थे।

जब अंग्रेजों ने बंगाल में स्थायी भूमि बन्दोबस्त व्यवस्था लागु कर जमीन पर भारी कर लगा दिये तो उस क्षेत्र का जमींदर जगन्नाथ सिंह, चुआड़ों और पाइकों ने बढ़ाया गया कर देने से इन्कार कर दिया तथा 1798 ई० में जगत्नाथ सिंह के नेतृत्व में 50 हजार से भी अधिक चुआड़ और पाइकों ने मिलकर अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया, इसी विद्रोह को ‘चुआड़ विद्रोह’ कहा जाता है।

महत्व या परिणाम : इस प्रकार मेदिनपुर के जंगल महल से शुरू हुआ चुआड़ विद्रोह बाकुड़ा, बीरभूम सहित कई जिलों में फैल गया। छापामार युद्ध प्रणाली द्वारा लगभग 30 वर्षो तक यह युद्ध चलता रहा, जिसे 1822 ई० में अंग्रेजों ने सैनिक शक्ति के बल पर निर्ममतापूर्वक कुचल दिया। अत: यह विद्रोह बिना किसी सफलता के समाप्त हो गया।

प्रश्न 11.
रंगपुर विद्रोह (Rangpur Revolt) का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
कृषक विद्रोहों में रंगपुर विद्रोह एक महत्वपूर्ण विद्रोह माना जाता है। यह विद्रोंह बिहार एवं उड़ीसा के कृषक विद्रोहों की भाँति ही था, जो बंगाल में हुआ। बंगाल के कई क्षेत्रों में यह विद्रोह चला था, खासकर रंगपुर, जो वर्तमान समय में बंगलादेश में यह क्षेत्र है।

यह विद्रोह सन् 1783 में कम्पनी के अधीन इजारेदारी या जमींदार देबी सिंह के विरुद्ध रंगपुर के हिन्दू-मुस्लिम किसानों एवं श्रमिकों ने किया था। कम्पनी के अधीन इजारदार देबी सिंह ने रंगपुर के किसानों से भूमि को छिन लिया था तथा उनके ही भूमि को रैयत (भाड़ा) के तौर पर किसानों को देते थे और इतना ही नहीं उस पर कर (Tax) भी लागू कर दिये थे। ऐसे कर (Tax) को राजस्व कर (Land Tax) कहते हैं, जो उस क्षेत्र के लोगों के ऊपर लादा गया था। यदि रंगपुर के किसान लोग इस कर को नहीं दे पाते थे, तो उनपर घोर यातना किया जाता था। इतना ही नहीं, उनके ऊपर इजारदार देवी सिंह के ठेकेदार एवं लठैत द्वारा भयकर अत्याचार किया जाता था तथा अत्याचार स्रियों एवं बूढ़े तथा बच्चों पर भी किया जाता था। यह अत्याचार की प्रक्रिया वर्षो से चल रहा था।

अत: उस क्षेत्र के पीड़ित किसानों ने सन् 1783 में वीरजी नारायण के नेतृत्व में यह विद्रोह किये। यह विद्रोह बगाल के कई क्षेत्रों, जैसे- दिनाजपुर तथा कूचबिहार जैसे स्थानों में आग की भाँति फैल गया। अंग्रेजों पर आश्रित इजारेदार देबी सिंह ने किसानों एवं श्रमिकों को बुरी तरह से कुचल डाला तथा इस विद्रोह को हमेशा के लिए दबा दिया गया।

रंगपुर विद्रोह के निम्नलिखित महत्व हैं –

  1. रंगपुर विद्रोह ने अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की बुराइयों को स्पष्ट कर दिया।
  2. इस विद्रोह ने यह सिद्ध कर दिया कि कम्पनी के लंदन स्थित ब्रिटिश अधिकारी, गोमाश्ता, दलाल सभी भारतीय किसनों का शोषण करते हैं।
  3. वारेन हेस्टिंग्स ने भूमि सुधार के लिए इजारेदारी व्यवस्था द्वारा भूमि को पट्टे पर देने की व्यवस्था की थी जिसने भूमि व्यवस्था की कमियों को उजागर कर दिया।
  4. इस विद्रोह ने अंग्रेजों को चौकन्ना कर दिया और वे भावी कृषक आन्दोलन से बचने के लिए भू-राजस्व में कई सुधार किये।

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प्रश्न 12.
भील विद्रोह पर टिष्पणी लिखें।
या, भील विद्रोह का महत्व लिखें।
उत्तर :
आदिवासी विद्रोहों में भील विद्रोह अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। भील विद्रोह निम्नलिखित दो स्थानों में प्रमुख रूप से हुआ था, जिनमें ‘महाराष्ट्र’ एवं ‘राजस्थान’ हैं। इसके अलावे यह ‘गुजरात’ तथा ‘मध्यप्रदेश’ में भी हुआ था। यह विद्रोह महाराष्ट्र में सन् 1818 से लेकर 1831 ई० तक चला तथा राजस्थान में 1821 से लेकर 1825 ई० के मध्य में हुआ था।

महाराष्ट्र के खानदेश में भीलों का अस्तित्व था, जिन्हें दबाने और खत्म करने के उद्देश्य से अंग्रेजी सरकार ने उनके ऊपर भिन्न-भिन्न प्रकार के कर (Tax) जैसे- भूमिकर (Land Tax) एवं कृषि कर (Agriculture Tax) लगाया करती थी। अंग्रेजों के अत्याचार से परेशान भील जाति के लोगों या किसानों और मजदूरों ने सेवरम या सेवाराम के नेतृत्व में विद्रोह कर दिये। यह विद्रोह आदिवासी विद्रोह में सबसे चर्चित एवं महत्वपूर्ण मानी जाती है।

राजस्थान के दक्षिणी भाग में भील जातियों का समागम था जिनके ऊपर अंग्रेजी सरकार एवं जमींदारों और साहूकारों का बारम्बार आक्रमण तथा अत्याचार होता था। वे भीलों का शोषण किया करते थे। इस प्रकार राजस्थान के भीलों ने दौलत सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी सरकार के साथ-साथ साहूकारों तथा जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिये।

आदिवासी जाति भीलों ने अपने वर्चस्व, आत्म-सम्मान तथा अपनी भूमि के रक्षा हेतु यह विद्रोह किया। भले ही यह विद्रोह समाप्न कर दिया गया परन्तु इसका प्रभाव देश-दुनिया के समस्त आदिवासी जातियों के ऊपर पड़ा है, जो अंग्रेजों, उपनिवेशवादों तथा स्थानीय जमीन्दारों, साहूकारों तथा ठेकेदारों द्वारा शोषित थे।

प्रश्न 13.
मुंडा विद्रोह का ऐतिहासिक महत्व लिखें।
उत्तर :
मुण्डा विद्रोह एक जनजाति या आदिवासी जाति द्वारा किया गया विद्रोह था। ऐसा भी माना जाता है कि मुण्डा विद्रोह जनजाति या आदिवासी विद्रोह न होकर एक प्रकार से किसान विद्रोह (Peasant Revolt) था जिसमें न केवल मुण्डा जाति नहीं बल्कि किसानों ने भी इस आन्दोलन में भाग लिया था। भारतीय इतिहास में आदिवासी विद्रोहों में इस विद्रोह को महत्ता अनमोल मानी जाती हैं। यह विद्रोह एक प्रकार से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रतीक भी माना जाता था।

मुण्डा विद्रोह की शुरूआत दक्षिणी बिहार के छोटानागपुर इलाके के अन्तर्गत राँची, सिंहभूम, पलामू तथा हजारीबाग इत्यादि क्षेत्रों में हुआ था। बिहार के मुण्डा जाति समर्थक वीरसा मुण्डा ने अपने अथक प्रयत्नों से सन् 1899 से लेकर 1900 ई० तक इस विद्रोह को चलाया। बिटिश सरकार के अधीन जमींदारों एवं साहूकारों ने मुण्डा जाति पर अग्नि वर्षा की भाँति बरस पड़े और उनका खूब शोषण तथा अत्याचार किये, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजी सत्ता ने इस विद्रोह को पूर्ण रूप से दबा दिया। परन्तु इस विद्रोह की महत्ता और योगदान भारतीय इतिहास में अनमोल माना ज़ाता है।

अन्य महत्व के रूप में :

  1. सरकार ने मुण्डा लोगों की मांग पर पुन: विचार शुरू किया। सन् 1903 में छोटानागपुर टिनेन्सी ऐक्ट (Chhotanagpur Tenancy Act) पास किया गया और मुण्डाओं की खुरकटि कृषि परम्परा को मान्यता दी गई।
  2. इस आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य मुण्डा राज्य की स्थापना करना था।
  3. विद्रोह समाप्ति के बाद भी भारत देश में मुण्डा जाति के विद्रोह के प्रतीक भी बनाया गया है, जो उनका बर्चस्व कायम रखता है।
  4. आन्दोलन की असफलता के बाद भी वीरसा मुण्डा अपने समर्थकों का एकमात्र नेता मान लिये गये। लोग वीरसा मुण्डा की पूजा देवता की तरह करने लगे।

यद्यापि मुण्डा विद्रोह तो असफल हो गया परन्तु अपनी स्वतंत्रता के लिए इनका संगठित प्रयास इतिहास के पन्नों में अमर हो गया तथा न केवल यह विद्रोह भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना गया बल्कि विश्च के इतिहास में भी इस जाति को स्थान दिया, जो अपने आप में गर्व की बात है।

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प्रश्न 14.
संथाल (हूल) (विद्रोह) के ऐतिहासिक महत्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
आदिवासी विद्रोहों में से संथाल विद्रोह एक महत्वपूर्ण विद्रोह माना जाता है । यह विद्रोह बंगाल एवं बिहार में सिद्ध एव कानू दो संथाली भाईयों के नेतृत्व में सन् 1855 से लेकर 1856 ई० तक चलाया। यह विद्रोह ब्रिटिश सरकार द्वारा बढ़ायी गई कर या लगान (Tax), जमीदारों, ठेकेदारों, साहूकारों, नीलहे गोरों, ईसाई मिशनरियों एवं असंतोष-जनक न्याय व्यवस्था के विरुद्ध किया गया था।
इस विद्रोह के ऐतिहासिक महत्व को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है –

  1. यह महंत्वपूर्ण विद्रोह संथालियों के प्रति अपनेवर्चस्व को कायम रखने की बड़ी चुनौती थी, जो इस जाति ने भरपूर्ण निभायी।
  2. इस विद्रोह में देखा गया कि संथालियों ने खुद एक नये समाज की स्थापना किया, जो ‘संथाल परगना’ के नाम से जाना जाता है और भारतीय इतिहास के आदिवासी जातियों में महत्वपूर्ण माना जाता है।
  3. इस विद्रोह का प्रमुख उद्देश्य भारत के विभिन्न जगहों पर आदिवासियों के अपने वर्चस्व को कायम रखना।
  4. यह विद्रोह भले ही अपने उद्देश्य में असफल हो गया परन्तु आज संथालियों की महत्ता सिर्फ एकमात्र दो संथाली भाईयो ‘सिद्व ‘और ‘कानू’ की वजह से बढ़ गया है।

आज भी संथाली जाति की बात की जाती है, तो उनको याद जरूर किया जाता है। अतः इस प्रकार से हमलोग देख पाते हैं कि भारतीय इतिहास में आदिवासी विद्रोह में संथाल विद्रोह की महत्त्वपूर्ण या अनमोल ऐतिहासिक महत्ता है।

प्रश्न 15.
‘तारिख-ए-मुहम्मदिया’ (Tarikah-i-Muhammadiya) के बारे में क्या जानते हो।
उत्तर :
‘तारिख-ए-मुहम्मदिया’ का अर्थ ‘पुनरुद्धार’ या ‘नवजागरण’ होता है। अर्थात् मुस्लिम समाज में नवजागरण आना या मुस्लिम समाज का पुनरुद्धार होना होता है। चूँकि ‘तारिख-ए-मुहम्मदिया’ मुस्लिम शब्द है, इसलिए ‘पुनरुद्धार’ इसका मुस्लिम शब्द है और ‘नवजागरण’ हिन्दी शब्द है।
‘तारिख-ए-मुहम्मदिया’ का संबंध मुस्लिम समाज से है, इसीलिए इनके नेता ‘सैयद अहमद बरेलवी’ का प्रमुख उद्देश्य मुस्लिम समाज में फैली हुई कुरीतियों एवं बुराईयों को समाप्त कर नये सोच, विकास तथा उन्नति को स्थापित करना था।

इसी का नाम समाज का पुनरुद्धार होता है। सैयद अहमद बरेलवी के ऊपर दिल्ली के संत शाहवली उल्लाह तथा अरब के अब्दुल वहाब का प्रभाव अधिक था। इस कारण उनके द्वारा चलाये गये इस आन्दोलन को ‘वहाबी आन्दोलन’ तथा ‘वली उल्लाह’ आन्दोलन भी कहते हैं। वास्तव में देखा जाय तो यह ‘पुनरुद्धार आन्दोलन’ न होकर ‘सुधार आन्दोलन’ था, जो मुस्लिम समाज में चलाया गया था।

इस आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र उत्तरी-पश्चिमी कबायली प्रदेश में सियाना केन्द्र था। भारत में प्रमुख केन्द्र पटना था। इसके अतिरिक्त हैदराबाद, मद्रास, बम्बई, बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी इसका केन्द्र बनाया गया था।

देखा जाय तो इस आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य काफिरों का देश (दारूल हर्ब) को मुसलमानों का देश (दारूल इस्लाम) में बदलना था। इतना ही नहीं, यह आन्दोलन अंग्रेजों के अलावा जमीन्दारों, महाजनों तथा नीलहे साहबों के विरुद्ध भी किया गया था। ‘तारिख-ए-मुहम्मदिया’ आन्दोलन, मुसलमानों का मुसलमानो द्वारा चलाया गया मुसलमानों के लिए आन्दोलन था। यह कभी भी राष्ट्रीय रूप नहीं ले पाया।

प्रश्न 16.
नील विद्रोह के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
नील विद्रोह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एक किसान आन्दोलन था जो बंगाल एवं बिहार में किया गया था। यह विद्रोह सन् 1859 ई० से लेकर 1860 ई० के बीच चला था और इस विद्रोह के नेता का नाम ‘दिगम्बर विभास’ और ‘विष्णु चरण विश्वास’ था।
नील विद्रोह नोलहे साहबों या गोरों के विनाशकारी नीतियों के विरुद्ध किया गया था अर्थात् नीलहे और (अंग्रेज) नीलहे किसानों के जमीन को छीन लिया करते थे तथा उन किसानों को उनके ही भूमि पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया करते थे। फलस्वरूप विष्णुचरण विश्वास एवं दिगम्बर विश्चास के नेतृत्व में यह आन्दोलन चलाया गया।

इस आन्दोलन के निम्नलिखित महत्व हैं –
1. यह विद्रोह अंग्रेजी प्रशासन के खिलाफ एक किसान विद्रोह थी।
2. इस विद्रोह में प्रथम बार देखा गया कि नीलहे किसानों के साथ मध्यम वर्ग एवं जमींदार वर्गों ने भी भाग लिया।
3. इस विद्रोह से प्रेरित होकर महात्मा गाँधी जी ने अपना चम्पारण सत्याग्रह आन्दोलन बिहार में चलाया।
4. इस विद्रोह से प्रेरित होकर बंगाल के सुप्रसिद्ध नाटककार ‘दीनबन्धु मित्र’ ने नील की खेती की समस्या पर ‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) नामक नाटक की रचना की, जिसका ‘माइकेल मधुसूदन दत्त’ ने अंग्रेजी में अनुवाद किया।
5. यह विद्रोह अपने अंजामों तक लगभग सफल माना जाता है, क्योंकि यह विद्रोह सन् 1857 के महा क्रान्ति के बाद ही किया गया था जिसमें जन समर्थन अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध उमड़ कर सामने आया।

इस विद्रोह में न केवल मध्यम वर्ग और जमीन्दार वर्ग शामिल थे बल्कि शिक्षित वर्ग भी शामिल थे, जो एक बड़ी एवं महत्वपूर्ण बात कहलाती है।

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प्रश्न 17.
भारत में वहाबी आन्दोलन क्यों हुआ था ? इसका स्वरूप क्या था ?
उत्तर :
वहाबी आन्दोलन एक धार्मिक आन्दोलन माना जाता था। इस आन्दोलन के विभिन्न स्वरूप हैं। यह आन्दोलन अरब, भारत एवं भारत के क्षेत्र बंगाल में किया गया था। अरब एवं भारत में वहाबी आन्दोलन का स्वरूप एक धार्मिक आन्दोलन था जो इस्लाम धर्म का प्रचार करने के लिए किया गया था। परन्तु भारत के क्षेत्र बंगाल में यह कृषक आन्दोलन के रूप में उभरा था। अब्दुल वहाब नाम का एक सुधारक जिसने इस्लाम धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए सुधार आन्दोलन चलाया, वही ‘वहाबी आन्दोलन’ के नाम से जाना जाता है। भारत में इस आन्दोलन के म्रमुख नेता ‘सैय्यद अहमद बरेलवी’ थे। इस आन्दोलन के दो प्रमुख उद्देश्य थे –
(i) इस्लाम धर्म का प्रचार करना एवं
(ii) मुस्लिम समाज में सुधार करना।

सैख्यद अहमद ने इस आन्दोलन को देशव्यापी बनाने के लिए एक संगठन बनाया। भारत में इसका मुख्य केन्द्र पटना था। इसके अतिरिक्त हैदराबाद, मद्रास, बम्बई, बंगाल तथा उत्तर प्रदेश में भी इसकी शाखाएँ स्थापित की गयी। वे भारत में अंग्रेजी शासन का विरोध करने लगे। देश में इनके द्वारा स्थापित शाखाएँ इस सम्रदाय के लिए धन एवं धार्मिक सेना में सैनिकों की भर्ती करने में नेता सैय्यद अहमद बरेलवी की मदद करती थी।
इस प्रकार हमलोग भारत में वहाबी आन्दोलन के विभिन्न स्वरूप को संक्षिप्त में देख पाते हैं।

प्रश्न 18.
औपनिवेशिक वन कानून ने आदिवासियों के जीवन-यापन को किस प्रकार प्रभावित किया ?
उत्तर :
भारतीय वनों पर ब्रिटिश आधिपत्य कायम करने के लिए 1865 ई० में एक कानून बनाया गया, जिसे औपनिवेशिक वन कानून (1865) कहा जाता हैं। इस कानून के तहत यह घोषित किया गया कि ऐसी कोई भी जमीन जिस पर वृक्ष है वह सरकारी वन समझी जायेगी और उन पर सरकार का आधिपत्य होगा। भारत के आदिवासी साधारणतया वनों या पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते थे तथा वनों से प्राप्त फल-फूल, लकड़ी, शिकार तथा साधारण कृषि से अपनी सीमित आवश्यकताओं कां पूरा करते थे। वे वन भूमि को साफ कर तथा निम्न और अनुपजाऊ भूमि को आबाद कर कृषि करते थे। पर ब्विटिश सरकार ने विभिन्न कानून तथा नियम तथा फायदों से बन सम्पद से आदिवासियों को वंचित कर दिया।

ब्रिटिश सरकार ने सन् 1864 में वन विभाग का गठन किया तथा ‘डायटिक वांडिस’ नामक एक जर्मन को वन विभाग का इंस्पेक्टर जनरल के रूप में नियुक्त किया। सरकार ने सन् 1865 में ‘भारतीय वन कानून’ बनाकर वन सम्पदा के ऊपर भारतीयों के अधिकारों को समाप्त कर दिया। सन् 1876 मे ‘भारतीय वन कानून’ पास हुआ। इस कानून के द्वारा वन संपदा पर सरकारी अधिकार और बढ़ गया।

इस प्रकार हमलोग देख पाते हैं कि औपनिवेशिक वन कानून ने आदिवासियों के जीवन यापन पर कठोराघात किये, जिससे उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

प्रश्न 19.
राज विद्रोह, अभ्युत्थान तथा क्रांति से क्या समझते हैं ?
उत्तर:
राज विद्रोह (Rebellion), अभ्युत्थान (Uprising) तथा क्रांति (Revolution) देखने में एक जैसे लगते हैं, परन्तु इन शब्दों के अर्थ में अन्तर है। राजद्रोह या विद्रोह से तात्पर्य प्रचलित व्यवस्था में परिवर्तन की माँग को लेकर विरोधी जन समुदाय द्वारा आन्दोलन करना हैं। विद्रोह अल्पकालीन या दीर्घकालीन हो सकता हैं। विद्रोह व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों हो सकते हैं। बिंटिश शासन काल में घटित रंगपुर विद्रोह, पावना विद्रोह, नील विद्रोह तथा सिपाही विद्रोह आदि विद्रोह के उदाहरण हैं।

अभ्युत्थान (Uprising) से तात्पर्य किसी प्रचलित व्यवस्था के विरूद्ध एक भाग का संघर्ष। विभित्र समयों के सामरिक अभ्युत्यान इस संबंध में उल्लेखनीय हैं। सन् 1857 में भारतीय सेना के एक अंश द्वारा ब्रिटिशों के विरूद्ध सिपाही विद्रोह या 1946 ई० में घटित नौ सेना विद्रोह।

विप्लव या क्रांति (Revolution) से तात्पर्य व्यवस्था में एकाएक तेजी से परिवर्तन। क्रांति के उदाहरण हैं 18 वी शताब्दी की यूरोप की औद्योगिक क्रांति, जुलाई की क्रांति, फरवरी क्रांति तथा फ्रांसीसी क्रांति आदि।
इस प्रकार हमलोग राजविद्रोह, अभ्युत्थान तथा क्रांति शब्दों में विभिन्न अर्थ को देख या जान पाते हैं।

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प्रश्न 20.
ब्रिटिश शासन की पहली शताब्दी में किसान आंदोलन की शुरूआत के क्या कारण थे ?
उत्तर :
भारत में ज़ब ब्रिटिश शासन का आगमन हुआ तो अंग्रेजी प्रसाशन ने सबसे पहले भारतीय किसानों पर अपना निशाना साधा। उसने भारतीय किसानों को अपना गुलाम बनने पर मजबूर किया। उनके जमीनों को छीना, उनपर अत्याचार किया तथा विभिन्न विदेशी नीतियों को उनपर थोप दिया। यही सभी कारण था, जिसके फलस्वरूप किसानों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन कर दिया।

इसके अतिरिक्त अन्य कारण है, जो इस प्रकार से है :-

  1. इंग्लैण्ड में कच्चे मालों की आपूर्ति करने के लिए तथा अन्य उद्योगों के लिए किसानों को नगदी फसल – जैसे – नील, जूट, अफीम आदि की कृषि करने के लिए बाध्य किया जाने लगा।
  2. परिवार बढ़ने के कारण किसानों की भूमि टुकड़ों में बटने लगी। इस भूमि से किसानों की आवश्यकता पूरी नहीं होती थौ, अतः वे विद्रोह करने लगे।
  3. अंग्रेजी शासन काल में किसानों को कर नकद देना पड़ता था। इस समय महाजन या सूदखोर या साहुकार वर्ग का उदय हुआ। जब किसान कम कर देते थे तो ये सभी मिलकर उनपर अत्याचार करते थे, जो आगे किसान आंदोलन को जन्म दिया

प्रश्न 21.
नील विद्रोह के समर्थन में आमजनता के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
नील विद्रोह (1859-1860 ई०) को भरपूर जनसमर्थन मिला था। ‘तत्वबोधिनी’ के सम्पादक अक्षय कुमार दत्त, बगाल के गिरीश चन्द्र घोष ने किसानों पर नीलहे के अत्याचार की कहानियों को प्रकाशित किया। बंगाल के सुप्रसिद्ध नाटककार दीबन्धु मित्र ने नील की खेती की समस्या पर ‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) नामक नाटक की रचना की। जिसका अंग्रेजी में अनुवाद माइकल मधुसूदन दत्त ने किया। इसके अतिरिक्त प्रेस एवं मंचों के माध्यम से भी नील विद्रोह को भरपूर जनमसर्थन मिला।

प्रेस एवं मंच के माध्यम से मध्यम वर्गीय बुद्धि जीवियों ने उस आंदोलन का समर्थन किया। सर्वप्रथम सन् 1822 मे नीलहों के अत्याचारों की खबर ‘सामचार चन्द्रिका, और ‘समाचार दर्पण’ में प्राकशित हुई। हरिशचन्द्र मुखर्जी ने ‘ हिन्दू पेट्रियाट’ (Hindu Patriat) के माध्यम से किसानों की दुर्दशा एवं अत्याचारों को जनता एवं सरकार तक पहुँचाने का प्रयास किया। मनमोहन घोष, शिशिर कुमार घोष, किशोरी चन्द्र मित्र तथा द्वारकानाथ विद्याभूषण ने भी नील किसानो की सहायता अनेक प्रकारसे की और उनको नेतृत्व दिया। जैसोर एवं नदिया से प्रकाशित होने वाले विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने भी नीलह अंग्रंजों के अत्याचार की कहानियाँ छापी।

इस प्रकार से नील विद्रोह को भरपूर जन समर्थन मिला, जो अपने आप में महत्चपूर्ण स्थान रखता है।

विवरणात्मक प्रश्नोत्तर (Descriptive Type) : 8 MARKS

प्रश्न 1.
नील विद्रोह क्या था ? इस विद्रोह के कारण और महत्व पर प्रकाश डालए।
उत्तर :
नील विद्रोह : 1860 ई० में बंगाल के नदिया जिले के नील की खेती करने वाले के किसानों ने दिगम्बर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास (विश्वा बन्धु) के नेतृत्व में अंग्रेज नील व्यापारी और जमीन्दारों के विरूद्ध जो आन्दोलन शुरू किया उसे नील विद्रोह के नाम से जाना जाता है।

नील विद्रोह का कारण : नील विद्रोह की प्रकृति आर्थिक थी। अंग्रेज नील व्यापारी एवं जमीदार यहाँ के किसानों के कुछ जमीन पर नील की खेती करने के लिए बाध्य किया जाता था। सरकार ने नीलहे व्यापारियों के पक्ष में तीनकठिया व्यवस्था लागू की थी कि प्रत्येक किसान को अपने कुल भूमि के 3 / 20 हिस्से पर नील की खेती करना आवश्यक था, जिस तीनकठिया व्यवस्था कहा जाता था, जो किसान इस व्यवस्था को नहीं मानता उन पर तरह-तरह के अत्याचार किये जाते थें।

किसानों को नील की फसल का इतना कम कीमत दिया जाता था, कि किसानों का सालों भर अपने और अपने परिवार का पेट पालना कठिन हो जाता था। इसी दुर्दशा और अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए नदिया जिले के किसानों ने विष्णु विश्वास और दिगम्बर विश्वास के नेतृत्व में संगठित और एकजूट होकर नीलहे अंग्रेजों और जमीन्दारों के विरुद्ध 1860 ई० में विद्रोह कर दिया।

इस विद्रोह को संगठित करने प्रचारित करने तथा सफल बनाने में हरीशचन्द्र मुखर्जी द्वारा सम्पादित हिन्दू पैट्रियाट समाचार-पत्र तथा दीन बन्धू मित्र द्वारा रचित नाटक नील दर्षण का बहुत बड़ा योगदान रहा।

सर्वप्रथम हिन्दू पैट्रियाट ने ही नील किसानों की दुर्दशा का उल्लेख किया और संघर्ष कर रहे किसानों के समर्थन में घनघोर अभियान चलाया। जिसका प्रभाव हुआ कि बंगाल के पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वर्गों के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम, ईसाई, सेठ साहुकार, छात्र, स्ती, किसान-मजदूर सभी वर्गों ने इस आन्दोलन का समर्थन किया और भाग लिया। इस आन्दोलन की एकजूटता और व्यापकता के कारण सरकार का रवैया भी आन्दोलनकारियों के प्रति नरम और संतुलित रहा और 1861 ई० में सरकार ने इस विद्रोह को सर्तकता के साथ दबा दिया।

महत्व या परिणाम : 1861 ई० में समाप्त हुए नील विद्रोह का भारतीय किसान आन्दोलन में महत्वपूर्ण प्रभाव एव महत्व रहा जिसे हम निम्न रूप में व्यक्त कर सकते है :

  1. यह भारत का पहला संगठित किसान जन आन्दोलन था जिसमें समाज के सभी वर्गो ने भाग लिया था।
  2. इस आन्दोलन का ईसाई मिश्नरियो ने भी समर्थन किया था। अतः इस आन्दोलन से सभी धर्मों की एकता को बढ़ावा मिला।
  3. इस आन्दोलन की व्यापकता के सामने अंग्रेजी सरकार को घूटने टेकने पड़े उन्होंने किसानों के शोषण के जाँच के लिए सर्टनकर आयोग की स्थापना की।
  4. सेटनकर आयोग ने अपनी जाँच में किसानों के आरोपों को सही पाया, फलस्वरूप लार्ड कैनिंग ने शीघ्र ही नीलहे व्यापारी और जमीन्दारों से ददनी प्रथा, तीनकठिया प्रथा को समाप्त कर राहत प्रदान की।
  5. इस आन्दोलन की सफलता से पेरित होकर ही महात्मा गाँधी ने अपना पहला सफल चम्पारण आन्दोलन शुरू किया था।

इसी आन्दोलन के द्वारा गाँधी जी ने चम्पारण जिले में चल रही तीनकठिया व्यवस्था को समाप्त कराने और उसके शोषण से किसानों को मुक्त कराने में सफल रहे। चम्पारण की सफलता ने ही गाँधी को पूरे देश का राष्ट्रीय नेता बना दिया।

इस प्रकार नील विद्रोह ने भारत में किसान आन्दोलन के लिए प्रेरित किया और जो आगे चलकर देश की स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए मार्ग प्रशस्त किया, इस कारण इस आन्दोलन का महत्व और भी बढ़ जाता है।

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प्रश्न 2.
संथाल विद्रोह की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
संथाल विद्रोह एक आदिवासी या जनजातीय विद्रोह था। जिसमें आदिवासी संथालियों ने अपने स्वाभिमान की रक्षा तथा अस्तित्व के लिए विद्रोह किये। ये जातियाँ छोटानागपुर, पलामू, मेदनीपुर, बाँकुड़ा, हजारीबाग, कटक, वीरभूम, मानभूम, दलभूमि आदि के क्षेत्रीय जंगलों में निवास करती हैं। वन क्षेत्रों में रहने वाली अदिवासी संथाल धीरे-धीरे खेती एवं पशुपालन में रूचि लेने लगे थे। यह विद्रोह सन् 1855 से लेकर 1856 ई० के बीच इन सभी क्षेत्रों में हुआ था, जो बंगाल एवं बिहार से संबंधित हैं। संथालों द्वारा किये गये विद्रोह के कारण निम्नलिखित हैं –
भू-राजस्व : संथालियों को सरकार द्वारा जो पर्वतीय एवं वनीय भूमि प्राप्त हुई थी, उन भूमि को संथालियों ने ऊपजाऊ एवं कृषि योग्य बनाकर खेती-बारी करने लगे थे। तभी सरकार ने उनपर भूमि कर लागू कर दिया। जिसका विरोध संथाली लोग करने लगे। इतना ही नहीं, सरकारी कर्मचारी लोग उनसे अत्यधिक कर वसूलते थे। इन सभी समस्याओं से परेशान होकर संथालियों ने विद्रोह करने का काम ढूँढ़ लिये।

जमींदारों का अत्याचार : भू-राजस्व नीति के अन्तर्गत अंग्रेजी सरकार द्वारा स्थायी भूमि व्यवस्था लागू किया गया जिसके कारण संथालियों एवं सरकार के बीच जमीन्दार वर्ग का जन्म हुआ। यही जमीन्दार वर्ग उन दोनों के बीच मध्यस्थ बने थे। सरकार द्वारा जमीन्दर वर्ग को संथालियों से राजस्व (लगान) वसूलने का कार्य सौंपा गया था। जमीदार वर्ग संथालियों से मनचाहा लगान या कर वसूलता था तथा उनपर घोर अत्याचार भी करता था। ये सभी क्रिया-कलाप या अत्याचार को संथाली वर्ग बर्दास्त नहीं कर पाये और विद्रोह कर दिये।

महाजनों द्वारा अत्याचार : संथालों की शान्तिमय हरी-भरी बस्ती में आस-पास से धूर्त व्यापारियों एवं महाजनों की जाति भी आकर बसने लगी। व्यापारी एवं महाजन अपने तरह-तरह के व्यापारिक दाँव-पेचों से सरल प्रकृति के संथालों का शोषण करना शुरू किये। महाजनों ने संथालों को आवश्यकतानुसार 5 से 50 रुपये प्रतिशत की दर से ब्याज लेकर रुपया उधार देना शुरू किये। जो संथाल एक बार कर्ज ले लेता था तो उसे सूद के जाल से निकलना कठिन हो जाता था। इस प्रकार अत्याचार से परेशान होकर वे विद्रोह का मार्ग चुन लिये।

व्यापारियों का अत्याचार : व्यापारियों का भी अत्याचार एवं शोषण कम न था। वे धूर्ततापूर्वक उनकी फसले कम कीमत पर खरीद लेते थे। धीरे- धीरे व्यापारियों के शोषण एवं महाजनों के अत्याचार बढ़ जाने से संथालों की भावना भी उग्र होती गयी और वे ‘हूल’ अर्थात् विद्रोह की तैयारी में जुट गये।

ठेकेदारों द्वारा अत्याचार : संथालियों के ऊपर ठेकेदारों का भी भयकर अत्याचार था । ये ठेकेदार लोग ब्रिटिश सरकार से भूमि ठेके पर लेते थे और संथालियों को भूमि मनचाहा लगान (Tax) पर देते थे। यदि जो संथाली लोग कर नहीं दे पाते थे तो उन पर कठोर अत्याचार होता था। ऐसा ही कार्य वे संथालियों के ऊपर करते थे, जिससे परेशान होकर वे विद्रोह का रास्ता चुन लिये।

रेलकर्मियों द्वारा अत्याचार : राजमहल पहाड़ियों पर रेलपथ के निर्माण कार्य शुरु होने पर वहाँ अंग्रेज अधिकारी एवं कर्मचारी रेलकर्मियों के रूप में पहुँचे। हजारों की संख्या में स्थानीय कर्मचारी भी रेलपथ निर्माण कार्य में लगाये गये। रेल कर्मचारी एवं अधिकारी सीधे-सादे संथालों को नौकरी देने की लालच देकर उनके बकरे, मुर्गे आदि पशुओं को बिना पैसे दिये ही खा जाते थे। यदि वे प्रतिवाद करते तो उनपर तरह-तरह के अत्याचार किये जाते थे।

निलहे साहबों द्वारा अत्याचार : संथालियों के ऊपर न केवल ठेकेदारों, जमींदारों, रेलकर्मियों का अत्याचार होता था बल्कि निलहे साहबों द्वारा भी उनपर घोर अत्याचार किया जाता था। जो असहनीय था।

ईसाई मिशनरियों द्वारा धार्मिक अत्याचार : धर्म प्रचारक के रूप में पहुँचे ईसाई मिशनरियों के लोगों ने भी जोर जबरदश्ती से संथालों को धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनने के लिए मजबूर करना शुरू किया। इन कायों से संथालों की धार्मिक परम्परा एवं संस्कृति का नाश होने लगा। धर्मान्तरण के इस कार्य से भी संथाल समुदाय के लोग विक्षुब्ध थे।

अंग्रेजी न्याय व्यवस्था : बिटिश सरकार ने जो न्याय व्यवस्था बनाये थे सिर्फ वे अपने फायदे के लिए किये थे। वे संथालियों के लिए कोई भी न्याय व्यवस्था नहीं बनाये थे। इससे संथालियों का समुदाय असंतुष्ट हो उठा था, जिससे वे विद्रोह का मार्ग चुन लिये।
संथालियों ने अपना विद्रोह राजमहल के पास जो ‘दामन-ए-कोह’ अर्थात् ‘संथाल परगना’ बनाये थे, वहीं से ही सिद्ध और कानू तथा चाँद और भैरव के नेतृत्व में शुरुआत किये। देखते ही देखते यह विद्रोह पूरे बंगाल एवं बिहार में फैल गया।

विद्रोह का दमन : ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह को बड़ी ही नृशंसता से दमन कर दिया। जगह-जगह गिरफ्तारी तथा छापेमारी किया गया तथा सिद्ध एवं कान्हू को गिरफ्तार कर फाँसी दे दिया गया।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 3.
पाबना विद्रोह के बारे में संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
पाबना (पाबना) विद्रोह (1873-76) : बगाल में पबना जिले के यूसफशाही परगना के किसानों ने 18591873 तक कर वृद्धि का विरोध नहीं किया और अधिक बढ़ी हुई दर पर भी बिना किसी विरोध के लगान देते रहे। 1859 के रेंट अधिनियम ने किसान असन्तोष को बढ़ाया। दूसरे, जमींदार कृषकों से उनकी जमीन पर से उनका अधिकार छीन लेना चाहते थे। भूमि के मालिक को किसानों से जबरन हस्ताक्षर करवाकर पट्टेदार बना दिया गया। किन्तु उन्हें नए कानूनों की जानकारी शिक्षित लोगों से होती रहती थी जिससे उन पर हो रहे अत्याचारों का ज्ञान हुआ। त्रिपुरा में अनुचित बेगार भी ली जाती थी जिससे वे अत्यधिक त्रस्त थे, अतः किसानों ने अपने को संगठित करना शुरू किया।

1873 ई० में ‘एगरेरियन लोग’ का गठन किया गया, पूरे जिले के किसान इसके सदस्य बन गए। यह आशर्यजनक घटना थी कि कृषको ने ब्रिटिश शासन का विरोध नहीं किया प्रत्युत वे ‘इंग्लैण्ड की रानी”‘ का किसान बने रहना चाहते थे, किन्तु उनके विरुद्ध हो रहे अन्याय एवं अत्याचार का उन्होंने विरोध किया। लीग ने जमींदारों की लगान वृद्धि के विरुद्ध मुकदमे भी शुरू किये और लगान देना बंद कर दिया। किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर चलाये गये आन्दोलन के बावजूद हिंसक वारदात नाममात्र को ही हुई और कृषक मुख्यतः जमींदारों से अपनी सम्पत्ति बचाने का ही प्रयास कर रहे थे। जैसे-जैसे विद्रोह बढ़ा।

जमींदारों ने किसानों से बदला लेने के उपाय किये। यह विद्रोह ढाका, राजशाही, त्रिपुरा, जैदपुर, बाकरगंज और बोगरा में फैल गया। इस क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से (लगभग 70 प्रतिशत) मुसलमान थे, लेकिन अंग्रेजों एवं जमीदारों ने इसे साम्प्रदायिक दंगे का नाम दिया।

यह उल्लेखनीय है कि केशवचन्द्र राय एवं शंभुनाथ पाल जैसे कृषक नेता हिन्दू थे। सरकार ने विवश होकर 1879 में एक रेंट कमीशन नियुक्त करना पड़ा। इस आन्दोलन का बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय एवं रमेशचन्द्र दत्त जैसे युवा बुद्धिजीवियों ने समर्थन किया था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, आनन्द मोहन बोस और द्वारकानाथ गांगुली ने भी इण्डियन एसोसिएशन के माध्यम से 1880 के दशक में कृषक संगठनों की मदद की एवं कृषक अधिकारों का समर्थन किया। अतः सरकार ने रेंट कमीशन की सिफारिश पर 1885 का बंगाल काश्तकारी कानून पारित किया।

प्रश्न 4.
बंगाल के फकीर और सन्यासी विद्रोह पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
फकीर विद्रोह : बंगाल में 1776-77 ई० के बीच अंग्रेजी शासन के धार्मिक प्रतिबंध तथा शोषण और कुशासन के खिलाफ मजमून शाह के नेतृत्व में जो विद्रोह हुआ था, उसे फकीर विद्रोह कहा जाता है। मजमून शाह के मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्रों चिराग अली शाह, मूसा शाह ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया था। इस विद्रोह में हिन्दू नेता भवानी पाठक और बर्दवान की रानी सरला देवी चौधुरानी ने भी सहायता की थी।

फकीर विद्रोह का मुख्य कारण मुस्लिम फकीरों के देश में घूमने-फिरने पर रोक लगा देना, उनकी तीर्थ-यात्रा पर कर लगाना था। मुस्लमान फकीरों ने अंग्रेजों के इस कार्य को अपने धार्मिक जीवन में हस्तक्षेप माना, अतः उन्होंने अपने धर्म की स्वतंत्रता और अपने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मजमून शाह के नेतृत्व में संगठित होकर अंग्रेजी शासन के विरूद्द विद्रोह कर दिया।

फकीर विद्रोह का स्वरूप (प्रकृति) पूर्ण रूप से धार्मिक था। कमजोर संगठन, गरीबी, उंचित नेतृत्व की कमी, साम्पदायिक एकता का अभाव तथा अंग्रेजों की कठोर एवं निर्मम सैनिक कारवाई के बल पर इस विद्रोह को दबा दिया गया। अतः यह विद्रोह बिना किसी अपेक्षित परिणाम के समाप्त हो गया।

सन्यासी विद्रोह : बंगाल में 1763-80 ई० तक मे लगभग 40 वर्ष तक बर्दवान के सन्यासियों ने अंग्रेजों के शोषण अत्याचार, कुशासन के विरूद्ध जो आन्दोलन शुरू किया था, उसे सन्यासी आन्दोलन कहा जाता है।

इस आन्दोलन का नेतृत्व भवानी पाठक ने किया था, इसके अलावा चिराग अली, मूसा शाह, सरलादेवी चौधुरानी ने भी साथ दिया था। इस विद्रोह का मार्मिक वर्णन बंकिम चन्द्र ने अपने उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में किया था।

कारण : बंगाल के ढाका से 1763 ई० में शुरू हुये सन्यासी विद्रोह के निम्नलिखित कारण थे –

  1. अंग्रेजी शासन का सन्यासियों के आन्तरिक क्रिया कलाप में हस्तक्षेप करना।
  2. सन्यासियों के देश में घूमने-फिरने पर रोक लगाना।
  3. सन्यासियों के तीर्थ-यात्रा पर कर लगाना और उसे नहीं चुकाने पर उन पर विभिन्न प्रकार से अत्याचार करना।
  4. अंग्रेजों द्वारा किसानों पर हो रहे शोषण और अत्याचार से तथा, 1770 ई० की महाअकाल के प्रभाव से मुक्ति दिलाने का प्रयास करना था।

उपर्युक्त कारणों एवं परिस्थितियों में सन्यासियों के सामने विद्रोह के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था, फलस्वरूप 1763 ई० में भवानी पाठक के नेतृत्व में सन्यासी एवं फकीरों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। शुरू में इस विद्रोह का स्वरूप धार्मिक था, किन्तु आगे चलकर किसानों से जुड़कर आर्थिक रूप ग्रहण कर लिया।

विस्तार : सन्यासी विद्रोह की शुरूआत ढाका से हुआ था, जो धीर- धीरे बाँकुड़ा, मालदह, रंगपूर, दिनाजपूर, मैमन सिंह, फरीदपूर, कूचबिहार आदि जिलों से होते हुए ‘ओउ्म वन्दे मात्रम’ नारे के साथ पूरे बंगाल में फैल गया।

प्रभाव : सन्यासी विद्रोह 1763 ई० से शुरू होकर लगभग 1800 ई० तक चलता रहा। इस विद्रोह को आर्थिक मदद देने में बर्दमान (बंगाल) के राजा-रानी (सरला) का विशेष योगदान रहा। धन की कमी, संगठन, उचित नेतृत्व, एकता के भावना को कमी के कारण वारेन हेस्टिंग्स ने इस विद्रोह को भिखारियों एवं डकैतों का उपद्रव की संज्ञा देते हुये सैनिक ताकत के बल पर दबा दिया। इस प्रकार यह विद्रोह लम्बे संघर्ष के बाद भी बिना उद्देश्य प्राप्ति के समाप्त हो गया। किन्तु इस विद्रोह ने बंगाल के आदिवासियों, जनजातियों एवं किसानों में एकता और संघर्ष की भावना पैदा कर दी। इस विद्रोह से प्रेरित होकर देश के कई भागों में आदिवासी एवं किसान विद्रोह होने लगे।

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प्रश्न 5.
फराजी एवं वहाबी आन्दोलन के कारण और प्रभाव का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
फराजी आन्दोलन : बंगाल में मुस्लिम समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले फराजी लोगों ने अंग्रेजों और भूजमीन्दारों के विरूद्ध 1818 ई० के आसपास जो आन्दोलन शुरू किया। उसे फराजी आन्दोलन के नाम से जाना जाता है। फराजी का अर्थ-अल्लाह का सेवक, इस आन्दोलन का नेता हाजी शरीयतुल्लाह थे।

कारण : फराजी आन्दोलन की प्रकृति धार्मिक थी, फराजी सिद्धान्त के मानने वाले लोगों का मानना था कि हिन्दू धर्म से जो लोग इस्लाम धर्म में आये हैं। वे अपने साथ हिन्दू धर्म के बहुत से आचार-विचारों को लेकर इस्लाम में आये हैं। इसलिये इस्लाम का मौलिक रूप दूषित हो गया है। अतः ऐसे लोगों से छुटकारा पाने के लिए इस्लाम धर्म में सुधार करने के लिए फराजी आन्दोलन को जोड़ दिया, और उन्होंने अपने अनुयायियों को ललकारा कि अब बंगाल की धरती दारूल हर्व (शतनु का देश) हो गया है, इसलिये शत्रुओं के शासन को जड़ से उखाड़ फेंक कर मुस्लिम राज्य के स्थापना के लिए जीने-मरने के लिए तैयार हो जाये, इसी घोषणा के साथ 1818 ई० के आसपास बंगाल के फरीदपूर जिले में यह आन्दोलन शुरू हो गया, जो देखते-देखते बंगाल के आधे से अधिक जिले में फैल गया।

प्रभाव/परिणाम : फराजी आन्दोलन का परिणाम हुआ कि बहुत से फराजीयों ने जमीन्दारों को कर देना बंद कर दिया, और उनके घर तथा फसलों को लूटने लगें, क्योंकि उनका मानना था कि ‘सारी भूमि का मालिक खुदा है” – यही उनका नारा भी था। अन्त में जमीन्दारों के दबाव में सरकार को सेना भेजकर आन्दोलन का दमन करना पड़ा। दुधूमियाँ जो हाजी शरीयतुल्लाह के पुत्र थे उनको गिरफ्तार कर लिया गया, किन्तु प्रमाण के अभाव में जेल से छूट गयें, और तीन वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो गयी, इस प्रकार एक धर्म सुधार आन्दोलन अपनी धार्मिक संकीर्णता, योग्य नेताओं के अभाव और कुशल प्रबन्धन को कमी के चलते (कारण) असफल सिद्ध हो गया। इसके बहुत से कार्यकता वहाबी दल में चले गये। इस प्रकार यह आन्दोलन बिना अपने उद्देश्य प्राप्ति के समाप्त हो गया।

वहाबी आन्दोलन : अरब देश के वहाबी आन्दोलन से प्रभावित होकर 1740 ई० के आस-पास वलीठल्लाह के नेतृत्व में इस्लाम धर्म में सुधार के लिए जो आन्दोलन शुरू हुआ उसे वहाबी आन्दोलन कहा जाता है। चूँकि इस आन्दोलन की शुरुआत वलीउल्लाह ने किया था इस कारण इसे व्लीउल्लाह आन्दोलन भी कहा जाता है, किन्तु भारत में इस आन्दोलन को फैलाने में सैयद अहमद बरेलवी का मुख्य योगदान रहा, इसलिये बरेलवी को इस अन्दोलन का मुख्य नेता माना जाता है।

कारण : वहाबी आन्दोलन के जन्मदाता अरब देश के मुहम्मद इब्न अब्दूल वहाब थे, जिन्होंने 1700 ई॰ में अरब देश में इस्लाम धर्म में दूसरे धर्मो से आयी प्रथा और परम्परा को दूर करने के लिए वहाबी आन्दोलन की शुरूआत की थी। जब दिल्ली के नेता वलीउल्लाह हज करने के लिए मक्का गये तो वे वहाँ के वहाबी आन्दोलन के सुधार कार्यो से प्रभावित हुए तथा भारत में ठीक उसी तरह इस्लाम धर्म के उत्थान और शुद्धिकरण के लिए वहाबी आन्दोलन की शुरूआत की, किन्तु उन्हें इस कार्य में विशेष सफलता नहीं मिली, किन्तु जब 1882 ई० में सर सैयद अहमद बरेलवी ने इस आन्दोलन का नेतृत्व शुरू किया।

तब उन्होंने इस्लाम धर्म के साथ-साथ इसे किसानों के शोषण-अत्याचार से जोड़कर अंग्रेजों के विरूद्ध आर्थिक एवं राजनीतिक आन्दोलन का रूप दे दिया, तब यह आन्दोलन उग्र रूप धारण कर लिया और इसके अनुयायी अंग्रेजी शासन के अत्याचार से मुक्त होने के लिए संघर्ष करते हुए लड़ने-मरने को तैयार हो गये।

इन्हीं उपर्युक्त परिस्थितियों एवं कारणों की पृष्ठभूमि में वहाबी आन्दोलन शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह आन्दोलन उत्तरप्रदेश, बंगाल, बिहार, हैदराबाद तक फैल गया। इस आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव को देखकर अंग्रेजो ने सैनिक शक्ति के बल पर इसे दबा दिया।

महत्व : वहाबी आन्दोलन की प्रकृति धार्मिक व राजनीतिक थी । यद्यषि इस आन्दोलन को अंग्रेजों ने सैनिक शक्ति के बल पर दबा दिया। किन्तु यह आन्दोलन लम्बे समय तक अंग्रेजों को परेशान किये रखा, इस आन्दोलन से एक तरफ हिन्दूमूस्लिम एकता को बढ़ावा मिला तो दूसरी तरफ अंग्रेजों के विरूद्ध स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए मार्ग तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजों के ‘फूट-डालों और शासन करो’ नीति के विरूद्ध थे देश का पहला आन्दोलन था, जिसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने भाग लिया था।

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प्रश्न 6.
कोल विद्रोह के बारे में लिखें।
उत्तर :
कोल विद्रोह : छोटानागपुर क्षेत्र में कोल (कोलियर) जनजाति निवास करते हैं। इस जाति की अनेक शाखायें हैं जिनके अलग-अलग मुखियाओं के स्वतंत्र राज्य थे। इनको ‘मुख्या’ राजा कहा जाता था। ताराचन्द ने लिखा है कि कोलों ने इसलिए विद्रोह किया (1831-32 ई०) कि उनके गाँव को कोल मुखियों (मुण्डाओं) के हाथ से छीन कर परदेशी सिक्खों और मुसलमानों को दिया जा रहा था।

छोटानागपुर के आदिवासी बाहरी लोगों को अपनी स्वतंत्रता में बाधक मानते थे। इस विद्रोह का एक अन्य कारण भूमि प्रबंध, लगान वसूली का तरीका एवं साहूकारी व्यवस्था भी थी। कहा जाता है कि दरअसल भूमि सम्बन्धी असन्तोष ही इसका मूल कारण था। ‘हो’ और ‘मुण्डों’ के बीच पुरानी ग्राम्य समाज व्यवस्था चली आ रही थी। सात से बारह गाँवों पर एक पीर होता था। इसका प्रधान या नेता ‘ मानकी’ कहलाता था। वह इन गाँवों के लगान के प्रति सरकार या जमीदार के प्रति जिम्मेदार था। वह गाँवों के मुखियों के कार्यों की निगरानी करता था।

ये मुखिया ‘मुण्डा’ कहलाते थे। ये मुण्डे पुलिस का भी काम करते और अपने-अपने गाँवों का प्रतिनिधित्व करते थे। कम्पनी के भूराजस्व प्रबंध ने परम्परागत व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया था। ब्रिटिश राजस्व व्यवस्था के बाद स्थानीय जमींदार/ राजा द्वारा आदिवासी रैयत पर दबाव डालते थे, फलस्वरूप उनके द्वारा विरोध करने और सरकार द्वारा सैनिक कार्रवाई करने के घटना क्रम का पहला उदाहरण 1790 ई० के बाद के वर्षों में पालामऊ (जो छोटानागपुर पठार का उत्तरी प्रवेश द्वार है) में देखने को मिलता है।

अंग्रेजों ने समस्या के शीघ्य समाधान के लिए राजा को हटाकर उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को बैठा दिया किन्तु इससे समस्या का अन्त नहीं हुआ। जैसा विदित है कि समस्या का वास्तविक कारण तो ब्रिटिश राजस्व व्यवस्था थी। स्थायी बन्दोबस्त ने जमींदारों को भूस्वामी बना दिया। 1793 के रेगुलेशन XVII (धारा II) के द्वारा लगान की शीघ्र वसूली की व्यवस्था कर दी गई।

जमींदारों, स्वतंत्र ताल्लुकेदारों तथा अन्य वास्तविक भूस्वामियों और इजारेदारों को, जिन्होंने सीधे सरकार पदाधिकारी को सूचना दिये बगैर बकाया लगान के लिए रैयतों, अवर लगान भोगियों और आश्रित ताल्लुकेदारों की फसल, भूमि की अन्य उपज- उनकी जमीदारी ठेके की सीमा में हो या बाहर कुर्क कर सकते है और उस सम्पत्ति को बकाया राशि की वसूली के लिए नीलाम करवा सकते हैं। कोलियरों की भाषा में उनकी जमीने छीन करदिकूओं (परदेशियो) को दी जा सकती थी और यह उनके लिए एक गंभीर समस्या बन गई।

अंग्रेजों ने कर अदा करने के लिए आदिवासी राजाओं को बाध्य कर दिया। कर का भुगतान न किये जाने पर राजा को बदलना आम बात थी। दूसरी ओर आदिवासी अपने क्षेत्र में विदेशियों को प्रवेश करने नहीं देना चाहते थे। कोल प्रजाति की एक शाखा ‘होश’ ने अपने प्रदेश में बाहरी व्यक्तियों को घुसने से रोकने के लिए अपनी सीमाओं पर प्रबंध किये।

पोराइट के राजा ने विवश होकर कर देना स्वीकार कर लिया था। परन्तु होश ऐसा नहीं चाहते थे। 1820 ई० में पोलिटिकल एजेण्ट के कोल्हन और चौबीसा क्षेत्र में प्रवेश करने पर उसका सशस्त विरोध उनकी उपरोक्त नीति का अंग था। 1827 ई० में उनके अनेक ग्राम जलाकर नष्ट कर दिये गये और उन्हें जमीदारों को कर देने, कम्पनी की प्रभुसत्ता स्वीकार करने को विवश किया।

जमींदारों की लगान का भुगतान न करने पर जमीनें नीलाम की जाने लगी और मैर्दानी भाग से आये लोगों को जमीनों पर अधिकार मिलने लगा। आदिवासियों पर उनके द्वारा निर्मित शराब पर उत्पादन शुल्क थोप दिया गया और उन्हें अफीम की खेती करने को बाध्य किया गया। कम्पनी कानूनों का उल्लघन करने पर आदिवासियों को कचहरियों में ले जाया जाने लगा। इन परिस्थितियों ने कोलियरों को संघर्ष करने के लिए मजबूर किया। विद्रोह का एक अन्य कारण आदिवासी स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार भी था।

अयोध्या सिंह ने लिखा है कि इस तरह कोलों के बीच असन्तोष तो बहुत दिनों से काम कर रहा था, लेकिन उसका फौरी कारण गैर आदिवासियों द्वारा जमीन के अलावा उनकी स्त्रियों को छीन लेना था। छोटानागपुर के महाराजा के भाई हरनाथ शाही ने अपनी जमीदारी के कुछ गाँवों की खेती की जमीन पुश्त दर पुश्त खेती करने वाले आदिवासियों से छीनकर अपने प्रिय पात्र कुछ मुसलमानों, सिक्खों आदि को सौंप दी।

सिंहभूमि की सीमा के पास बारह गाँव ही सिंगराय नामक ‘मानकी’ के थे। उनसे छीनकर सिक्खों को दे दिये गये। मानकी के सिर्फ गाँव ही नहीं छीन गये उनकी दा बहनां के साथ दुर्व्यबहार किया गया। सिक्खों ने उनके साथ बलात्कार किया। यही शिकायत मुसलमान किसानों के ंखलाफ थी। जफरअलो नामक एक किसान ने सिहभमि के बांदगांव के मुण्डा सुर्गा पर बड़ा अत्याचार किया।

साथ ही उनकी पत्यो को उठा ले गया और उसकी इज्ज़त लीटी परदेशियों के इन व्यवहारों ने आग में घी का काम कर दिया। उपरंक्त घटनाओं के कारण से कोलों का असन्तोष चरमसीमा तक पहुँच गया। राँची, सिंहभूमि, पालामऊ और मानभूमि यदि जिला के सभी आदिवासियों ने 1831 ई़० में एक साथ विद्रोह कर दिया। विद्रोह का प्रारम्भ हिंसा और लूटपाट से हुआ। कहा जाता है कि इस विद्रोह में लगभग एक हजार गैर-आदिवासयों को मार ड़ाला गया।

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प्रश्न 7.
मुंडा विद्रोह का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
मुंडा विद्रोह : मुंडा आदिवासियों का विद्रोह 1874 ई० से 1901 ई० के मध्य हुआ। 1895 ई० के बाद इसका नलन्ध बरसा मुंडा ने क्रिया, अत: इसे बिरसा मुंडा विद्रोह भी कहा जाता है। दक्षिण बिहार के छोटानागपुर इलाके के लगभग 400 वर्ग मील क्षेत्र में मुंडा निवास करते थे। प्रो. बिपिनचन्द्र ने लिखा है कि मुंडा जाति में सामूहिक खेती का प्रचलन ‘ग. लंक्नि जागीरदारों, ठंकेदार (लगान वसूलने वालों), बनियों और सूदखोरों ने सामूहिक खेती की परम्परा पर हमला कर दया ! मुंडा सरदार 30 वर्ष तक सामूहिक खती के लिए लड़ते रहे। मुंडा अंचल की जमीने मुंडा लोगो के हाथ से निकल कर साहकारों एवं जमोदारों के हाथ में जा रहो थी। ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था ने उन्हें कृषक से मजदूर बानन को वाध्य क्रिया ‘इस कारण उनमें धीरे-धीर असन्तोष बढ़ने लगा।

ब्रिटिश शासन जमीदारों एवं साहूकार वर्ग के उत्थान का एक महन्त्वगण काण्क था। इस काला में इन वर्गों को आदिवासियों के शोषण करने की पूरी तरह छूट थी मुडों ने अपने सरदारों क नंतृत्व में इन लंगां के बिर्द आन्दोलन शुरू किया। उनका यह आन्दोलन ‘सरदारी लड़ाई’ के नाम से प्रसिद्ध था। इस विद्रांह का सम्बन्ध शुरू ों इसाई धर्म से था। के. एस. सिह ने लिखा है कि आदिवासी इस कारण ईसाई धर्म स्वीकार कर रंह भे जिससे जर्मन भिश्नरी जरीदारों के अत्यान्यारों को समाप्त करवा दें।

1857 ई० के समय कुछ जमींदारों ने मिशन पर भी हमला किया क्यांक निक्री मुडा लोगों के प्रति सहानुभूति रखते थे। 1858 ई० से हमें ईसाई आदिवासियों द्वारा अत्याचारी जमींदारों के खिलाफ लड़ने के प्रमाग मिलने लगते हैं। यह प्रवृत्ति 1862 ई० से 1882 ई० के बीच बहुत आम तो 1867 इ० में 14000 ईसाइयों ोे छोटानागुर के राजा और स्थानीय पुलिस के खिलाफ औपनिवेशिक अधिकारियों को अं भो दो थी 1 वेटखल नोगों के जमीन पर टखल दिलाने के भी कुछ प्रयास किये गये थे।

मार्च 1879 ई० में मुंडा लोगों यह घोगणा की कि छोटानागभुर उनका है। 1881 ई० में कुछ मुडा सरदारों ने ‘जान द बेणटिस्ट’ के नेतृत्व में देवसा के त्य की घंषणा कर दी। इसके बाद विद्रोह में कुछ बदलाव आया। जर्मन पादरियों से अभ्रसन्न होकर मुंडा लोगों ने उनसे चाना मम्बन्ध विन्छद कर लिया। कुछ समय तक उनका झुकाव कैथोलिक मिशन की ओर रहा, किन्तु औपनिवेशिक गरामक और जमींदार विद्राह को ख़ा करने क लिए आपस में सहयोग करने लगे। परिणामतः सभी विद्रोही यूरोपीय लोगों, दाई मिशनों, सरकारी अफसरों, जमींदारों और दिकुओं के खिलाफ हो गये।

इन गरिम्थितियों में उनका नंत्त्व बिरसा मुंडा ने अपने हाथ में ले लिया। बिरसा का जन्म राँची जिले के एक गाँव में बढाई के ख्वतो करने वाल एक परिबार में 1874 ई० में हुआ था। उसकी प्रारम्भिक शिक्षा चौबासा के मिशन स्कूल में हुई थी जहाँ रसंन अंग्रज़ी का साधारण ज्ञान भी प्राप्त किया था। प्रारम्भ में बिरसा अपने दवा के ज्ञान और बीमारों को ठीक करने की प्रक्नि के काएण जाने गए थे! ईसाई धर्म प्रचारको के प्रभाव में आकर वह ईसाई बन गया किन्तु इससे उसकी आत्मा को गान्त नहीं भिलो और उसने अपन पूर्वंजों के धर्म को स्वीकार कर लिया। 1895 ई० में उसने एक नया मत चलाने का निश्धय क्या और अपन समर्धकों को सिग बागा की पूजा करने की सलाह दी। उसने अपने समर्थको को स्वच्छता, शुद्ध नैतिक जांवन यापन करने एव मांस भक्षण न करने को प्रेरित किया।

बिरसा न घंषित किया कि उसका विद्रोह आत्मरक्षा के लिए था तथा उन तत्त्वों के लिये जो कि बाहरी जनता की अनाधिकारी चेष्टाओं से जोवित बच गये थे। मुण्डा समाज का पुनर्गठन करना भी उनका उद्देश्य था। शीघ्र ही बिरसा ने अंग्रेजी भूराजस्व व्यवस्था का विरोध करना शुरू किया। सुरेश सिंह की मान्यता हैं कि भूमि की समस्या मुण्डाओं के असन्तांष तथा विद्रोह का मूल कारण थी। स्थायी बन्दोबस्त ने मुण्डाओं को भी प्रभावित किया। वनों से लकड़ी काटने के प्रांतबध सम्बन्धी कानून ने उन्हें अपने परम्परागत अधिकार से वंचित कर दिया था। जगल साफ करके खंती नहीं की जा मकनो थी।

बनो मे अपने पालतृ जानवरों को चराने पर प्रतिबंध था। इस प्रकार सुरेशसिंह के विचार से उनका विद्रोह मुख्य रूप मू सामाजिक एवं आर्थिक शक्तियों के विरुद्ध था। अतः बिरसा विद्रोह को केवल एक धार्मिक आन्दोलन नहीं कहा जा सकता: मुंडा लाग एक एसी स्थिनि की कल्पना करने लगे जिसमें न तो देशी और न विदेशी शोषक हो। ताकतवर शासक से जीत क प्रयास में व ‘जगल के पर्नी’ पर विभास करने लगे और उन्ह ऐसा विभास हो गया कि वो उन्हं अपराजेय बना दंगा। इस विद्राह में महिलाओं की भूमिका भी महत्तपूर्ण थी। कुछ मामलों में हिसा भी हुई, लेकिन विद्राह में गरीब गैर आदवासियां क खिलाफ कोई भाव न था।

1899 ई० में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बिरसा ने मुंडा जाति का शासन स्थापित करने के लिए विद्रोह का ऐलान किया। उसने इसके ठेकेदारों, जागीरदारों, राजाओं, हाकिमों और इसाइयों का कत्ल करने का भी आह्दान किया। उसन कहा कलयुग को खत्म कर सतयुग लाएँगे और घोषणा की कि ‘दिकुओं (गैर आदिवासियों) से अब हमारी लड़ाई होगी और उनके खून से जमीन इस तरह लाल होगी जैसे लाल झंडा” “मगर उसने यह भी हिदायत दी कि गरीब गैर आदिवासियों पर हाथ न उठाया जाए।

5 जनवरी 1900 ई० को सम्पूर्ण मुंडा क्षेत्र में विद्रोह फैल गया। लगभग 6 हजार मुंडा तीर-तलवार, कुल्हाड़ी आदि हथियारों से लैस होकर बिरसा के साथ हो गए। छ: और सात जनवरी को क्रमशः दो एवं एक कान्सटेबल को मार डाला तथा स्थानीय महाजनों के घरों को जला दिया गया जिसमें गया नामक मुंडा का हाथ था। सरकार ने राँची एवं सिंहभूमि में सेना की तीन टुकड़ियाँ तैनात कर दी।

बिरसा को 3 फरवरी 1900 ई० को सिंहभूमि में गिरफ्तार कर, राँची जेल में डाल दिया और जृन में वह जेल में ही हैजे से पीड़ित होकर मर गया। इस तरह विद्रोह का दमन कर दिया गया पर मुण्डाओं में बिरसा अमर हो गया।

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प्रश्न 8.
महाराष्ट्र के भील विद्रोह के बारे में लिखे।
उत्तर :
भींग विद्रोह : महाराष्ट्र के वन्य प्रदेशों, गुजरात, मध्यप्रदेश एवं दक्षिणी राजस्थान में भील जनजाति बड़ी संख्या में निवास करती है : 1857 ई० से पूर्व भीलों के दो अलग-अलग विद्रोह हुए। 1818 ई० से 1831 ई० तक महाराष्ट्र के भीलों ने विद्रोह किया तथा दूसरे राजस्थान के भीलों ने 1821 ई० से 1825 ई० के मध्य बगावत की।

महाराष्ट्र का भील तिद्रोह : महाराष्ट्र के खानदेश में भील काफी संख्या में निवास करते है। इसके अतिरिक्त उत्तर में विन्ध्य से लेकर दक्षिण-पश्चिम में सहाद्रि एवं पश्चिमी घाट क्षेत्र में भीलों की बस्तियाँ देखी जाती हैं। 1861 ई० में पिण्डारियों के दबाव से ये लोग पहाड़ियों पर विस्थापित होने को बाध्य हुए। पिण्डारियों ने उनके साथ मुसलमान भौलों के सहयोग से क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। इसके अतिरिक्त सामन्ती अत्याचारों ने भी भीलों को विद्रोही बना दिया। जसदन्तराव होल्कर के विद्रोह के दौरान पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेनाओं ने भीलों की बस्तियाँ नष्ट कर दी थी। भीलों में इससे भी रोष व्याप्त था। इस तरह सामन्तीय अत्याचार से पीड़ित भील अंग्रेजी प्रभुत्व को भी उचित नहीं मानते थे।

1818 ई० में खानदेश पर अंग्रेजी आधिपत्य की स्थापना के साथ ही भीलों का अंग्रेजों से संघर्ष शुरू हो गया। कैप्टेन बिग्स ने उनके नेताआ को गिरफ्तार कर लिया और भीलों के पहाड़ी गाँवों की ओर जाने वाले मार्गो को अंग्रेजी सेना ने सील कर दिया, जिससे उन्हे रसद मिलना कठिन हो गया। दूसरी ओर एलफिस्टन ने भील नेताओं को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया और उन्हें अनक प्रकार की रियायतों का आथासन दिया।

पुलिस में भर्ती होने पर अच्छे वेतन दिये जाने की घोषणा की। किन्तु अधिकांश लोग अंग्रेजों के विरुद्ध बने रहे। 1819 ई० में पुन: विद्रोह कर भीलों ने पहाड़ी चौकियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। अंग्रेजों ने भील विद्रोह को कुचलने के लिए सतमाला पहाड़ी क्षेत्र के कुछ नेताओं को पकड़ कर फॉसी दे दी। किन्तु जन सामान्य की भीलों के प्रति सहानुभूति थी। इस तरह उनका दमन नहीं किया जा सका।

1820 ई० में भील सरदार दशरथ ने कम्पनी के विरुद्ध विद्रोह शुरू कर दिया। पिण्डारी सरदार शेख दुल्ला ने इस विद्रोह में भीलों का साथ दिया। मेजर मोर्टिन को इस उपद्रव को दबाने के लिए नियुक्त किया गया, उसकी कठोर कार्रवाई से कुछ भील सरदारों ने आत्मसमर्पण कर टिया। 1822 ई० में भील नेता हिरिया ने लूट-पाट द्वारा आतंक मचाना शुरू किया, अतः 1823 ई॰ में कर्नल राबिन्सन को विद्राह का दमन करने के लिए नियुक्त किया गया।

उसने बस्तियों में आग लगवा दी और लोगों को पकड़-पकड़कर क्रूरता से मारा। 1824 ई० में मराठा सरदार त्रियंबक के भतीजे गोड़ा जी दंग्गलया ने सतारा के राजा को बगलाना के भोलों के सहयोग से मराठा राज्य की पुनस्थ्थापना के लिए आह्नान किया। भीलों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया एवं अंग्रेजी सेना से भिड़ गये तथा कम्पनी सेना को हराकर मुरलीहर के पहाड़ी किले पर अधिकार कर लिया।

परन्तु कम्पनी की बड़ी बटालियन आने पर भीलों को पहाड़ी इलाकों में जाकर शरण लेनी पड़ी। तथापि भीलों ने हार नहीं मानी और पेड़िया, बून्दी, सुतवा आदि भील सरदार अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते रहे । कहा गया है कि लेफ्टिनेंट आउट्रम्, कैप्टन गिरबी एवं ओवान्स ने समझा-बुझाकर तथा भेद नीति द्वारा विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। आउट्रम के प्रयासों से अनेक भील अंग्रेज सेना में भर्ती हो गये और कुछ शान्तिपूर्वक ढंग से खेती करने लगे। उन्हें तकाबी ऋण दिलवाने का आश्चासन दिया।

1826 ई० में दांग सरदारों एवं लोहारा के भीलों ने पुन: उपद्रव मचाया, किन्तु अंग्रेजों ने इसे भी शान्ति से दबा दिया। कहा जाता है कि देशमुखों ने भी विद्रोही भीलों की मदद की थी। अंग्रेजों ने भील विद्रोह का दमन करने के लिए भील सेना को उनके विरुद्ध खड़ा कर दिया और इस तरह विद्रोह शान्त हो गया। आगे जाकर 1831 ई० में धार (दक्षिणो-पश्चमी मध्य प्रदेश), 1846 ई० में मालवा, 1852 ई० में खानदेश और 1857 ई० में भागोजी तथा काजरसिंह नामक भील नेता के नेतृत्व में अंग्रेजों से लोहा लिया। किन्तु उपरोक्त सभी विद्रोहों को कठोरता पूर्वक कुचल दिया गया।

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प्रश्न 9.
राजस्थाना के भील विद्रोह का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
राजस्थान का भील आन्दोलन : राजस्थान में भील, मीणा, गरासिये आदि जातियाँ प्राचीन काल से निवास करता आयी है। वस्तुत: ये जातियाँ यहाँ के मूल निवासी थे। राजपूतों के राज्य स्थापित होने के पूर्व राजस्थान के कई इलाको में इन जनजातियों के छोटे-बड़े अनेक जनपद थे। मेवाड़ राज्य की रक्षा में वहाँ के भीलों की सदैव ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण था कि मेवाड़ के राजचिन्ह मे राजपूत के साथ एक धनुर्धारी भील का चित्र अंकित था। समय के बदलाव के साथ ये बहादुर जातियाँ अन्य जातियों से अलग-थलक पड़ गया।

राष्ट्र की मूल धारा से उनका सम्पर्क टूट गया। वं सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से एकदम पिछड़ गये। उन्हें वनवासी, आदिवासी और कहीं-कहीं तो जरायम पेशा जातियों की संज्ञा तक दी जाने लगी। ब्रिटिश काल में देश के अन्य भागों की तरह राजस्थान में भी सरकार और साहूकार ने समान रूप से इन जातियों का शोषण किया। अंग्रेजों ने जिस प्रकार अन्य प्रदेशों में जन-जातियों को ब्रिटिश कानूनों का पालन करने तथा भूराजस्व अदा करने के लिए बाध्य किया वही नीति राजस्थान में भील आन्दोलनों के विरुद्ध अपनाई गई। मेवाड़ के भील ‘भोलाई’ एवं ‘रखवाली’ लम्बे समय से वसूल करते आ रहे थे।

अपने आक्रमणों से इस इलाके के ग्रामों एवं यात्रियों को बचाये रखने के प्रतिफल रूप में ‘भोलाई’ एवं ‘रखवाली’ वसूल की जाती थी। कर्नल टॉड की सलाह से मेवाड़ के महाराणा ने भीलों के इस अधिकार को समाप्त कर दिया। इसका भीलों ने विरोध किया। कहा जाता है कि बाद में भील विद्रोह की आशंका सं ‘रखवाली’ वसूल करने की अनुमति प्रदान कर दी गई थी, किन्तु ‘भोलाई’ का अधिकार न रहा। अंग्रेजों के अनुरूप राजाओं ने भी वनों से लकड़ी काटने पर प्रतिबंध लगा दिये और महुवा के फूल एकत्र करने पर भी गेक लगा दी थी।

जंगलों से लकड़ी एवं घास काटने का एकमात्र अधिकार ठेकेदारों को था। जो सबसे ऊँची बोली लगाता था उसे वनों सेलकड़ी एवं घास काटने का अधिकार मिलता था। इस प्रकार राजाओं ने भी वनों को अपने लाभ का साधन बना लिया और धनी साहूकार या महाजन लोगों को ही इस प्रकार के ठेके मिलते थे। इतना ही नहीं नमक उत्पादन की स्वतंत्रता भी नही रहीं। यह भी ठेके पर दिया जाने लगा।

‘कृता’ के समय लगान भी अधिक निश्धित कर दिया जाता था। इसी प्रकार ‘तिसाला’ नामक नया भूमि कर लगा दिया गया। इस व्यवस्था में भील क्षेत्रों में साहूकारों का आगमन हुआ और शोषण की न रुकने वाली प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। बाहर कं व्यापारी उनकी सामग्री को कौड़ियों के भाव खरीदते थे और उनके द्वारा (बनियों को) बेची जाने वाली वस्तुएँ महंगी बेची जानी थी। कई गुना ब्याज पर भीलों को ऋण दिया जाता था और ऋण के भुगतान न कर पाने पर बन्धक श्रमिक बनाकर उनसं काम लिया जाता था। ज्ञातव्य है कि राजस्थान से बन्धक श्रमिक प्रथा का उन्मूलन बीसवीं सदी के $80-90$ के दशक में किया जा सका।

भीलों में डाकन प्रथा का प्रचलन था अर्थात् कुछ औरतों को डाकन या जादूगरनी समझकर भयंकर यातनायें दी जाती थी। इसी प्रकार सती प्रथा का भी बोलबाला था। इन कुरीतियों को समाप्त करने के लिए स्थानीय नरेशों ने प्रयत्ल किये। किन्तु ये कुप्रथायें इतनी जड़ें जमा चुकी थीं कि इन पर प्रतिबंध लगाना भीलों के लिए सहज न था। इस प्रकार उनकी अन्तर्मुखी व्यवस्था को, पूँजीवादी ब्रिटिश व्यवस्था ने, जिसका राजस्थान में भी प्रसार हो रहा था, भंग कर दिया। सड़कें बनाई जान लगी और आदिवासी इलाकों में यातायात के विकास के साथ भीलों का बाह्य व्यक्तियों से सम्पर्क बढ़ा और ये लोग अपनी पृथकता को बनाये नहीं रख सके।

इस आदिवासी समाज ने साहूकारी व्यवस्था के शोषण एवं अन्य हो रहे बदलावों से प्रेरित होकर 1821 ई० में विद्रोह करना शुरु किया जिसका द्मन करने के लिए एक ब्रिटिश अधिकारी नियुक्त किया गया, किन्तु उसे अधिक सफलता नहीं मिलो। भौलों का नेतृत्व दौलतसिंह कर रहा था, उसने 1826 ई० में आत्मसमर्पण कर.दिया। तथापि भीलों ने हथियार नहीं डाले और अपना संघर्ष जारी रखा। दक्षिण राजस्थान की रियासते : मेवाड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़ के राजाओं ने आदिवासी विद्रांह के दमन हेतु बिटिश सरकार से सहयोग की मांग की।1841 ई० में ब्रिटिश सरकार ने ‘ मेवाड़ भील कोर्ष्स” की स्थापना की। खंरवाड़ा इसका केन्द्र बनाया गया। इन सब प्रयासों के बावजूद भील विद्रोह का दमन नहीं किया जा सका।

प्रश्न 10.
बंगाल में फराजी और वहाबी आंदोलन का स्वरूप क्या था ?
उत्तर :
बंगाल में फराजी आंदोलन का स्वरूप :- फराजी आंदोलन को एक प्रकार का किसान आंदोलन माना जाता है जो बिटिश सरकार के खिलाफ किया गया था। फराजी एक मुस्लिम सम्रदाय था, जो बंगाल के फरीदपुर जिले के रहन वाले थे। उन फराजी मुसलमानों के ऊपर ब्रिटिश सरकार ने घोर अत्याचार किये थे जिनके विरूद्ध फराजियों ने विद्रोह किये। फराजी लांग बगाल के फरीदपुर के निवासी हाजी शरीयतुल्ला द्वारा चलाए गए सम्र्रदाय के अनुयायी थे।

ये जमीदारों द्वारा किसानों के शाषण के विरूद्ध थे। ये ब्रिटिश सरकार को बाहर निकालकर बंगाल में मुस्लिम शासन स्थापित करना नाहते थे। फराजी आंदोलन का स्वरूप धार्मिक होते हुए भी सामाजिक था। इस सम्पदाय का मुख्य उदेश्य भले ही मुस्लिम राज्य की स्थापना रहा हो परन्तु हाजी शरीयतुल्ला इस बात से भी चिंतित थे कि उस समय मुस्लिम समाज में कई प्रकार के बुराईयाँ भी आ गई थी।

मुसलमानों में व्याप्त बुराईयों को दूर करने के लिए उन्होंने फराजी आंदोलन चलाया। उनके पुत्र टुद्ड़ मियाँ ने इस आन्दोलन को विशुद्ध मुस्लिम आंदोलन से जन आंदोलन में बदलने का काफी प्रयास किया। उनके प्रयासों के देखकर शोषित हिन्दू भी इसमें शामिल हो गए। दूधू मियाँ ने बंगाल को कई क्षेत्रों में विभक्त कर प्रत्येक क्षेत्र में एक खलीफा नियुक्त किया। खलीफा अपने क्षेत्र में फराजियों को संगठठत करते थे। फराजी आदोलन के नेताओं में प्रमुख हाजी शरीयतुल्ला तथा उनके पुत्र दूधू मियाँ थे।

बंगाल में वहाबी आंदोलन का स्वरूप :- वहाबी आंदोलन एक धार्मिक आंदोलन माना जाता था। इस आंदोलन $े$ विभिन्न स्वरूप हैं। यह आदोलन भारत, अरब तथा भारत के क्षेत्र बंगाल में किया गया था। अरब एव भारन में वहाबी आंदोलन का स्वरूप एक धार्मिक आंदोलन था। जो इस्लाम धर्म का प्रचार करने के लिए किया गया था। परन्तु भारत के क्षेत्र बंगाल में यह कृषक आंदोलन के रूप में उभरा था। वहाबी आंदालन के प्रवर्तक रागबंर्ली के सैग्यद अहमद बरेलबी थे।

सैख्यद अहमद इस्लाम में हुए सभी परिवर्तनों तथा सुधारों के विरूद्ध थे। वह हजरत मुहम्मद साहब के समय को पुन स्थापित करना चाहते थे। इस प्रकार से यह एक पुनरूद्धार आंदोलन था। वहाबी आंदोलन का आर्तिक्भिक स्वरूप धार्मिक था। उनका उद्देश्य काफिरों के देश (दार-उल-हर्ब) को मुसलमानों के देश (दार-उल-इस्ल!म) में बदलनः था। इन्होने भारत में अंग्रेजी शासन का विरोध किया तथा मुसलमनों को जमीन्दारों तथा सूदखोरों के शोषण एव अत्याचार का विरोध करने के लिए भी प्रेरित किया।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 3 प्रतिरोध और आन्दोलन : विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 11.
औपनिवेशक वन कानून तथा ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का वर्णन करें।
उत्तर :
वन के प्रयोग और वन की सम्पदा पर सरकारी नियत्रण और इजारेदारी की स्थापना का कार्य लार्ड इलहोजो के समय में आरम्भ किया गया। वन विभाग की स्थापना 1864 ई० में की गई तथा वन कानून को 1865 ई० में पारित किया गया। 1878 ई० में दूसरा कानून बनाकर सरकार ने अपने अधिकारों के क्षेत्र को बढ़ा लिया। इन कानूना के फलस्वरूप 1900 ई० तक भारत की जमीन के क्षेत्र का पाँचवा हिस्सा आरक्षित सरकारी वनों में बदल गया।

वनों पर बढ़ते सरकाती अधिकारों का किसानों ने कई प्रकार से विरोध किया, जिसमें सरकारी अधिकारियों पर हमला एव उनकी हत्या भा शामिल था आदिवासियों का इस परम्परा में विश्वास रहा है कि जमीन पर स्वामित्व छोटे समूहों अथवा छोटे गावों का होता है। कोई एक व्यक्ति उसका स्वामी नहीं हो सकता है। भूमि पर समुदाय के सभी लोगों का समान अधिकार होता है। केवल ‘वृद्धाओ की ग्राम समिति’ को ही भूमि के बंटवारे अथवा उसे फिर से बांटने का अधिकार होता है।

वनों को साफ करके उनको कृषि योग्य बनाना तथा इसमें कृषि कार्यों का सम्पादन करना, ये सारी बाते गाँव के पुजारी अथवा वृदा की सर्मिति के देख-रेख में किया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आदिवासी समाज में भूमि के व्यक्तिगत स्वामित्व का अस्त्व ही नहीं था आवश्यकता होने पर अथवा परिवार के बड़ा होने पर समुदाय जमीन पर उनके व्यक्तिगत स्वामित्व को भी मान्यता देता था स्पष्ट है कि उनकी यह जीवन शैली सभ्य समाज की जीवन-शैली से पूर्णतः भिन्न थो जिसमे व्यक्तिगत स्वामित्व की परम्परा हैं। जिसे देश में त्याग दिया गया। त्रिटिश कानून व्यवस्था का भी पूरा सरक्षण प्राप्त था।

न्याय प्रशासन के दृष्टि से भी आदिवासी समाज दूसरों से भिन्न था। आदिवासियों के मुकदमों के फैसले ग्राम समिति किया करती थी। फैसलों के लिए उन्हें धन तथा समय बर्बाद नहीं करना पड़ता था। उनकी न तो आधुनिक ढंग की अदालते होती थी और न ही उन्हें अपने मुकदमों की पैखी के लिए वकोल रखने पड़ते थे। किन्तु अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों में भी अपनी कानून व्यवस्था को अनिवार्य बना दिया। इससे आदिवासियों की समस्या और बढ़ गयी, उन्हें मीलों चलकर अदालतों मे जाना पड़ता था।

अपने मुकदमों की पैरवी के लिए महँगे वकील रखने पड़ते थे। गवाहों को इकट्ठा करना पड़ता था और उनपर होने वाला खर्च को उठाना पड़ता था। कई बार मुकदमों की सुनवायी होती थी और ऊपर की अदालतों में अपीलें होती थी। इस प्रकार फैसला होने तक उनको काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता तथा दीत्रानी मुकटमें पर तो समय और रूपये और भी अधिक व्यय होते थे। मुकदमे जीतने पर भी उन्हें लागू कराने में काफी कठिनाईयाँ होती थी। इस प्रकार ब्रिटिश न्याय-व्यवस्था में आदिवासियों की आस्था नहीं रह गयी।

पुन: 1922 में सीता राजू के नेतृत्व में वन कानून एव साहूकारों के शाषण के विरुद्ध विद्रोह हो गया। परन्तु 1924 ई० में अंग्रंजों ने सीता राजू की हत्या करके विद्रोह को समाप्त कर दिया।

WBBSE Class 10 History MCQ Questions Chapter 1 इतिहास की अवधारणा

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इतिहास की अवधारणा Class 10 WBBSE MCQ Questions

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर (Multiple Choice Question & Answer) : (1 Mark)

प्रश्न 1.
मोहनबगान क्लब् आई.एफ.ए. शील्ड किस वर्ष जीता था ?
(क) 1890 ई० में
(ख) 1905 ई० में
(ग) 1911 ई० में
(घ) 1917 ई० में
उत्तर :
(ग) 1911 ई० में

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प्रश्न 2.
दादा साहब फाल्के युक्त थे –
(क) फिल्म
(ख) खेल
(ग) स्थानीय इतिहास चर्चा
(घ) पर्यावरण इतिहास चर्चा
उत्तर :
(क) फिल्म

प्रश्न 3.
‘जीवनेर झड़ापाता’ ग्रन्थ है –
(क) एक उपन्यास
(ख) एक काव्यग्रन्य
(ग) एक जीवनी
(घ) एक आत्मकथा
उत्तर :
(घ) एक आत्मकथा

प्रश्न 4.
‘सोम प्रकाश’ था-
(क) दैनिक समाचारपत्र
(ख) साप्ताहिक पत्रिका
(ग) पाक्षिक पत्रिका
(घ) मासिक पत्रिका
उत्तर :
(ख) साप्ताहिक पत्रिका

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प्रश्न 5.
भारत में फुटबाल खेल किसके द्वारा प्रारम्भ किया गया ?
(क) अंग्रेज
(ख) डच
(ग) फ्रांसीसी
(घ) पुर्तगाली
उत्तर :
(क) अंग्रेज

प्रश्न 6.
विपिनचन्द्र ने लिखा है –
(क) सत्तर बच्छर
(ख) जीवन स्मृति
(ग) ए नेशन इन मेकिंग
(घ) आनन्दमठ
उत्तर :
(क) सत्तर बच्छर

प्रश्न 7.
कलकत्ता विज्ञान कॉलेज का इतिहास पाया जा सकता है –
(क) चित्रकारिता के इतिहास में
(ख) खेल-कूद के इतिहास में
(ग) विज्ञान और प्राद्यौगिकी के इतिहास में
(घ) पर्यावरण के इतिहास में
उत्तर :
(ग) विज्ञान और प्राद्यौगिकी के इतिहास में।

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प्रश्न 8.
‘बंगदर्शन’ का प्रथम प्रकाशन हुआ था –
(क) 1818 ई० में
(ख) 11858 ई० में
(ग) 1872 ई० में
(घ) 1875 ई० में
उत्तर :
(ग) 1872 ई० में।

प्रश्न 9.
इतिहास के जनक हैं :
(क) हेरोडोट्स
(ख) मैकाले
(ग) अरस्तू
(घ) गिब्बन
उत्तर :
(क) हेरोडोट्स।

प्रश्न 10.
किसने कहा, “इत्र
(क) हेरोडोट्स
(ख) अरस्तू
(ग) मैकाले
(घ) गिब्बन
उत्तर :
(ख) अरस्त

प्रश्न 11.
‘गोज’, ‘फेरेरो’ तथा ‘जॉन रिचर्ड’ कौन थे ?
(क) प्रसिद्ध इतिहासकार
(ख) प्रसिद्ध साहित्यकार
(ग) प्रसिद्ध निबन्धकार
(घ) प्रसिद्ध लेखक
उत्तर :
(क) प्रसिद्ध इतिहासकार।

प्रश्न 12.
‘प्रागैतिहासिक काल’ (Pro-historic Age) किसे कहते हैं ?
(क) घटनाओं के लिखित विवरण को
(ख) घटनाओं के लिखित विवरण जो पढ़े नहीं गए
(ग) घटनाओं के अलिखित विवरण को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) घटनाओं के अलिखित विवरण को।

प्रश्न 13.
‘सामाजिक इतिहास’ से क्या तात्पर्य है –
(क) से तरह का सूर्भू झहिल
(ख) नगरीय इतिहास
(ग) खेलों का इतिहास
(घ) परम्परागत इतिहास
उत्तर :
(क) नये तरह का सम्पूर्ण इतिहास ।

प्रश्न 14.
इतिहास लेखन को नई दिशा किसके कारण मिली ?
(क) पुनर्जागरण
(ख) धर्मयुद्ध
(ग) धर्म सुधार आंदोलन
(घ) विश्वयुद्ध
उत्तर :
(क) पुनर्जागरण

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प्रश्न 15.
“इतिहास एक विज्ञान से न ज्यादा है, न कम।” – यह किसका कथन है ?
(क) ई० एच० कार
(ख) जे॰ बी० ब्यूरी
(ग) जेम्स मिल
(घ) लियोपोल्ड रॉंके
उत्तर :
(ख) जे० बी० व्यूरी

प्रश्न 16.
निम्न में से किस शहर का प्राचीन नाम हस्तिनापुर था ?
(क) कुरूक्षेत्र
(ख) काशी
(ग) दिल्ली
(घ) उज्जैन
उत्तर :
(ग) दिल्ली

प्रश्न 17.
कलकत्ता (कोलकाता) नगर स्थापित हुआ था –
(क) 1490 ई० में
(ख) 1590 ई० में
(ग) 1690 ई० में
(घ) 1790 ई० में
उत्तर :
(ग) 1690 ई० में

प्रश्न 18.
भारत की पहली आंचलिक प्रमाणिक एतिहासिक पुस्तक है –
(क) राजतरंगिनी
(ख) भारत एक खोज
(ग) प्रयाग प्रशस्ती
(घ) मुद्राराक्षस
उत्तर :
(क) राजतरंगिनी

प्रश्न 19.
विश्व पारिस्थितिकी या पर्यावरण दिवस मनाया जाता है –
(क) 15 मार्च को
(ख) 1 मई को
(ग) 5 जून को
(घ) 5 जुलाई को
उत्तर :
(ग) 5 जून को

प्रश्न 20.
“सभी इतिहास समकालीन इतिहास होता है।” – यह किसका कथन है ?
(क) बेनेडिटो क्रोस
(ख) कार्ल मार्क्स
(ग) डी०डी० कोसान्बी
(घ) यदुनाथ सरकार
उत्तर :
(क) बेनेडिटो क्रोस

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प्रश्न 21.
‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ द्वारा सबसे पहले किस समाचार के प्रकाशन पर प्रतिबन्घ लगा था ?
(क) बंग-दर्शन
(ख) बगांली
(ग) समाचार दर्पण
(घ) सोम प्रकाश
उत्तर :
(घ) सोम प्रकाश

प्रश्न 22.
‘कथक’ लोकनृत्य भारत के किस राज्य का परम्परागत नृत्य है ?
(क) असम
(ख) उत्तर-प्रदेश
(ग) उड़िसा
(घ) कर्नाटक
उत्तर :
(ख) उत्तर-मदेश

प्रश्न 23.
गुप्तकालीन चित्रकला की गुफा अजन्ता-एलोरा भारत के किस राज्य में स्थित है ?
(क) मध्य प्रदेश
(ख) मेघालय
(ग) महाराष्ट्र
(ख) गुजरात
उत्तर :
(ग) महाराष्ट्र

प्रश्न 24.
भारत में निम्न वर्ग से जुड़े लोगों के इतिहास लिखने वाले पहले इतिहासकार हैं –
(क) शोभन सरकार
(ख) यदुनाथ सरकार
(ग) रमेश चन्द्र मजुमदार
(घ) रंजीत गुहा
उत्तर :
(घ) रंजीत गुहा

प्रश्न 25.
ओलम्पिक विजेता साक्षी मलिक का सम्बन्ध किस खेल से है ?
(क) टेनिस से
(ख) तीरादांजी से
(ग) तैराकी से
(घ) कुश्ती से
उत्तर :
(घ) कुश्ती से

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प्रश्न 26.
‘जीवनेर झाड़ापाता’ सर्वप्रथम किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था –
(क) प्रवासी पत्रिका
(ख) देश पत्रिका
(ग) समाचार दर्पण
(घ) बंग-दर्शन पत्रिका
उत्तर :
(ख) देश पत्रिका।

प्रश्न 27.
नया सामाजिक इतिहास लेखन की दिशा में इनमें से किसका महान योगदान है ?
(क) जॉन मार्शल
(ख) हर्बट गुडमैन
(ग) लार्ड ब्वाइस
(घ) लार्ड मैकुले
उत्तर :
(ख) हर्बर्ट गुडमैन।

प्रश्न 28.
दादा-साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जाता है –
(क) फिल्म के क्षेत्र में
(ख) शिक्षा के क्षेत्र में
(ग) नृत्य के क्षेत्र में
(घ) चित्रकला के क्षेत्र में
उत्तर :
(क) फिल्म के क्षेत्र में।

प्रश्न 29.
‘दास कैपिटल’ किसके द्वारा लिखी गई पुस्तक है –
(क) कार्ल मार्क्स
(ख) जी० एम० ट्रेविलियन
(ग) गिब्स
(घ) राँके
उत्तर :
(क) कार्ल मार्स्स।

प्रश्न 30.
मनुष्य ने पहिए का आविष्कार किया –
(क) मध्य पाषाण काल
(ख) पूरा पाषाण काल
(ग) नव पाषाण काल
(घ) इसमें से किसी काल में नहीं
उत्तर :
(ग) नव पाषाण काल।

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प्रश्न 31.
बंग दर्शन के सम्पाद्क थे –
(क) बिकिम चन्द्र चट्टोगाध्याय
(ख) विपिन चन्द्र पाल
(ग) हरिशचन्द्र मुखोपाध्याय
(घ) उमेश चन्द्र दत्त
उत्तर :
(क) बंकिम वन्द्र चट्टोपाध्याय।

प्रश्न 32.
‘एनल्स स्कूल’ के इतिहासकार हैं –
(क) लुसियन फेवर
(ख) रणजीत गुहा
(ग) डेविड अर्नल्ड
(घ) पैट चैपमैन
उत्तर :
(क) लुसियन फेवर।

प्रश्न 33.
‘सत्तर बच्छर’ किसकी आत्मजीवनी है ?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) सरला देवी चौधरानी
(ग) सुरेन्द्रनाथ बंद्योपाध्याय
(घ) विपिनबन्द्र पाल
उत्तर :
(घ) विपिनचन्द्र पाल।

प्रश्न 34.
बंगाल की प्रथम राजनीतिक पत्रिका थी –
(क) बंग दर्शन
(ख) सोम प्रकाश
(ग) सुधाकर
(घ) दिम्दर्शन
उत्तर :
(ख) सोम प्रकाश।

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प्रश्न 35.
बंगाली में भोजन बनाने की पद्धति पर आधारित प्रथम पुस्तक थी –
(क) बामबोधिनी
(ख) पाक राजेश्वर
(ग) राजर्षि
(घ) हिन्दू पैट्रियॉट
उत्तर :
(ख) पाक राजेश्वर।

प्रश्न 36.
किस खेल को 22 गज का खेल कहा जाता है ?
(क) हॉंकी
(ख) क्रिकेट
(ग) फुटबॉल
(घ) रग्बी
उत्तर :
(ख) क्रिकेट।

प्रश्न 37.
जवाहरलाल नेहरू द्वारा इन्दिरा गाँधी को लिखे गये पत्रों का हिन्दी अनुवाद किसने किया ?
(क) खुशवन्त सिंह
(ख) कृष्ण बन्दर
(ग) मुंशी प्रेमचन्द
(घ) सादत हुसैन
उत्तर :
(ग) मुशी प्रेमचन्द।

प्रश्न 38.
इको-नारीवादी आन्दोलन (फेमिनिज्म) क्या है ?
(क) नारी एवं पर्यावरण आन्दोलन
(ख) पुरुष एवं पर्यावरण आन्दोलन
(ग) पकृति एवं मानव आन्दोलन
(घ) पुरुष एवं नारी आन्दोलन
उत्तर :
(क) नारी एवं पर्यावरण आन्दोलन।

प्रश्न 39.
नवीन सामाजिक इतिहास में निम्नलिखित में से किसका वर्णन है ?
(क) शासक और राज्य
(ख) तानाशाही मालिक
(ग) साधारण जनता
(घ) खास व्यक्ति
उत्तर :
(ग) साधारण जनता।

प्रश्न 40.
सन् 1911 में I.F.A. शील्ड कीसने जीता था –
(क) महम्मड़ स्पोटिंग
(ख) मोहनबागान
(ग) ईस्टबंगाल
(घ) कलकत्ता नाइट राइडर्स
उत्तर :
(ख) मोहनबागान।

प्रश्न 41.
कल्हाण ने निम्नोक्त में से किस पुस्तक का लेखन किया :
(क) राजतरंगिनी
(ख) इलाहाबाद प्रशस्ति
(ग) गीत गोविन्द
(घ) राजस्थान का इतिहास
उत्तर :
(क) राजतरंगिनी।

प्रश्न 42.
राजा हरीशचन्द्र फिल्म के निर्देशक थे –
(क) दादा-साहेब फाल्के
(ख) सत्यजीत राय
(ग) मृणाल सेन
(घ) तपन सिन्हा
उत्तर :
(क) दादा-साहेब फाल्के।

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प्रश्न 43.
पंजाब में ऊँट की सवारी गीत को क्या कहते है ?
(क) टण्पा
(ख) ठुमरी
(ग) भटियाली
(घ) गज़ल
उत्तर :
(क) टष्पा

प्रश्न 44.
निम्नोक्त में से कौन परिवेश आन्दोलन है ?
(क) चिपको आन्दोलन
(ख) वन आन्दोलन
(ग) नदी आन्दोलन
(घ) स्वतंत्रता आन्दोलन
उत्तर :
(क) चिपको आन्दोलन।

प्रश्न 45.
निम्न में से आधुनिक भारत के इतिहास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत कौन-सा है?
(क) अभिलेख
(ख) सिक्के
(ग) सरकारी दस्तावेज
(घ) यात्रियों के विवरण
उत्तर :
(ग) सरकारी दस्तावेज।

प्रश्न 46.
आधुनिक भारतीय इतिहास के तत्वों के रूप में पत्रों को में बांटा गया है।
(क) एक भाग
(ख) दो भागों
(ग) तीन भागों
(घ) चार भागों
उत्तर :
(ख) दो भागों।

प्रश्न 47.
एनल्स स्कूल सिद्धांत के इतिहासकारों द्वारा निम्न में से किस प्रकार की इतिहास का अध्य किया गया है ?
(क) नयी सामाजिक इतिहास
(ख) खेल-कूद इतिहास
(ग) कला इतिहास
(घ) शहरी इतिहास
उत्तर :
(क) नयी सामाजिक इतिहास।

प्रश्न 48.
जीवनेर झड़ापाता आत्मजीवनी के द्वारा लिखा गया।
(क) रबीन्द्रनाथ टैगोर
(ख) सरला देवी चौधुरानी
(ग) सुकुमार रॉय
(घ) दौनबंधु मित्र
उत्तर :
(ख) सरला देवी चौधुरानी।

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प्रश्न 49.
विश्व के प्रथम चलचित्र का निर्माण हुआ था :
(क) 1890 ई० में
(ख) 1895 ई० में
(ग) 1898 ई० में
(घ) 1900 ई० में
उत्तर :
(ख) 1895 ई० में।

प्रश्न 50.
निम्नवर्गीय इतिहास के अग्रदूत हैं –
(क) डॉं० रणजीत गुहा
(ख) सी॰ एम० जोशी
(ग) ए० ल० राईज
(घ) दादाभाई नौरोजी
उत्तर :
(क) डॉ॰ रणजीत गुहा।

प्रश्न 51.
कला इतिहास के लेखको को जाना जाता है :
(क) कला इतिहासकार के रूप में
(ख) कला प्रेमी के रूप में
(ग) कला समालोचक के रूप में
(घ) कला निर्देशक के रूप में
उत्तर :
(क) कला इतिहासकार के रूप में।

प्रश्न 52.
चमड़े की पुरानी जूते की खोज हुई :
(क) अमेरिका की गुका से
(ख) भौमबेटका की गुका से
(ग) कुफा की गुफा से
(घ) लूना की गुफा से
उत्तर :
(क) अमेरिका की गुफा से।

प्रश्न 53.
विश्व में सर्वप्रथम चलचित्र का आरंभ किसने किया ?
(क) सैयद बन्धु
(ख) अगस्त बन्धु
(ग) लुमियर बन्धु
(घ) राईट बन्धु
उत्तर :
(ग) लुमियर बन्धु।

प्रश्न 54.
‘सोम प्रकाश’ था :
(क) साप्ताहिक पत्रिका
(ख) मासिक पत्रिका
(ग) पक्षिक पत्रिका
(घ) दैनिक पत्रिका
उत्तर :
(क) साप्ताहिक पत्रिका।

प्रश्न 55.
नवीन सामाजिक इतिहास ने 20 वीं शताब्दी के में महत्व प्राप्त किया।
(क) 40 वें दशक
(ख) 50 वें दशक
(ग) 60 वें दशक
(घ) 70 वें दशक
उत्तर :
(घ) 70 वें दशक।

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प्रश्न 56.
कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन सर्वप्रथम किस देश ने करवाया ?
(क) रोम
(ख) ब्रिटेन
(ग) जर्मनी
(घ) भारत
उत्तर :
(ख) बिटेन

प्रश्न 57.
फॉर्मूला वन रेस किस खेल से जुड़ा है ?
(क) बॉंक्सिंग
(ख) फुटबॉल
(ग) कार रेसिंग
(d) क्रिकेट
उत्तर :
(ग) कार रेसिंग

प्रश्न 58.
पुरातन सामाजिक इतिहास की समय-सीमा क्या थी ?
(क) 1950 ई० में
(ख) 1960 ई० में
(ग) 1970 ई० में
(d) 1980 ई० में
उत्तर :
(ख) 1960 ई० में

प्रश्न 59.
भारत में रेलवे का निर्माण किसके शासनकाल में हुआ ?
(क) क्लाईव के समय
(ख) बेंटंक के समय
(ग) डलहौसी के समय
(d) हेस्टिंग्स के समय
उत्तर :
(ग) डलहौसी के समय।

प्रश्न 60.
इनमें से क्या निष्पादित कला (Performing Arts) नहीं है।
(क) कुश्ती
(ख) संगीत
(ग) नृत्य
(घ) ड्रामा
उत्तर :
(ख) संगीत

प्रश्न 61.
भारत में पहली रेल कब चली थी –
(क) 1850 ई०
(ख) 1853 ई०
(ग) 1855 ई०
(घ) 1857 ई०
उत्तर :
(ख) 1853 ई०

प्रश्न 62.
रसगुल्ला की खोज की गई –
(क) हराधन घोष
(ख) हराधन मोयरा
(ग) हरिपद भौमिक
(घ) नोवीन चन्द्र दास
उत्तर :
(घ) नोवीन चन्द्र दास

प्रश्न 63.
ओलम्पिक खेल का आयोजन सर्वप्रथम कहाँ हुआ था ?
(क) रोम
(ख) ग्रीस
(ग) हड़प्पा
(घ) मिश्र
उत्तर :
(ख) ग्रीस

प्रश्न 64.
भारतीय संगीत की उत्पत्ति का स्रोत कहाँ से माना गया है ?
(क) पुराणों से
(ख) वेदों से
(ग) उपनिषद से
(घ) महाकाव्यों से
उत्तर :
(ख) वेदो से

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प्रश्न 65.
भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना कब हुई थी ?
(क) 1860 ई० में
(ख) 1861 ई० में
(ग) 1862 ई० में
(घ) 1863 ई० में
उत्तर :
(ख) 1861 ई० में

प्रश्न 66.
भाप से चलने वाले इंजन की खोज किसने की ?
(क) जेम्सवाट
(ख) जार्ज स्टीफेंशन
(ग) मैकेडम
(घ) आर्कराइट
उत्तर :
(ख) जार्ज स्टीफेंशन

प्रश्न 67.
‘सत्तर बच्छर’ ग्रन्य है।
(क) उपन्यास
(ख) एक काव्य ग्रन्ध
(ग) एक जीवनी
(घ) एक आत्मकथा
उत्तर :
(ग) एक जीवनी

प्रश्न 68.
“The States of Indian Cricket : Anceidotal Histories” के रचयिता हैं –
(क) बोरिया मजुमदार
(ख) धनराज पिल्लई
(ग) रामचन्द्र गुहा
(घ) सचिन तेन्दुलकर
उत्तर :
(क) बोरिया मजुमदार

प्रश्न 69.
ताराचन्द द्वारा लिखित पुस्तक थी –
(क) इवाल्यूशन ऑफ इण्डिया एण्ड पाकिस्तान
(ख) ट्रान्सफर आफ पावर
(ग) हिस्ट्री ऑफ द इण्डियन कांग्रेस
(घ) हिस्ट्री ऑफ द फ़डम मूवमेन्ट इन इण्डिया।
उत्तर :
(घ) हिस्ट्री ऑफ द फीडम मूवमेन्ट इन इण्डिया।

प्रश्न 70.
सुमो पहलवानी का खेल प्रचलित है –
(क) भारत में
(ख) जापान में
(ग) चीन में
(घ) ग्रीस में
उत्तर :
(ख) जापान में

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प्रश्न 71.
‘ए हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री’ पुस्तक के लेखक कौन हैं ?
(क) जगदीश चन्द्र बसु
(ख) प्रफुल्ल चन्द्र राय
(ग) महेन्द्रलाल सरकार
(घ) तारकनाथ पालित
उत्तर :
(ख) प्रफुल्ल बन्द्र राय।

प्रश्न 72.
इको फेमिनिज्म पर अनुसंधान कार्य करने वाला व्यक्ति था :
(क) सुसा स्टोन
(ख) फ्रांसोवा दोबन
(ग) माईकल मैन
(घ) रामचन्द्र गुहा
उत्तर :
(ख) फ्रांसोवा दोबन।

प्रश्न 73.
भारतीय पुनर्जागरण का पिता किसे कहा जाता है –
(क) डेविड हेयर
(ख) रवीन्द्रनाथ टैगोर
(ग) ईश्वर चन्द्र विद्यासागर
(घ) राजाराम मोहन राय
उत्तर :
(घ) राजाराम मोहन राय

प्रश्न 74.
‘विश्व युद्ध का जन्म’ पुस्तक की रचना की गई थी –
(क) क्लेरेडन द्वारा
(ख) एस० बी० फेय द्वारा
(ग) श्यूसी डायट्स द्वारा
(घ) हेरोडोट्स द्वारा
उत्तर :
(ख) एस० बी॰ फेय द्वारा

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प्रश्न 75.
भारत का प्रारम्भिक इतिहास (Early History of India) के लेखक थे –
(क) जेम्स मिंसेप
(ख) जॉन स्दुअर्ट मिल
(ग) विसेन्ट स्मिथ
(घ) आर॰ सी॰ मजुमदार
उत्तर :
(ग) विसेन्ट स्मिथ

प्रश्न 76.
ब्रिटिश संग्रहालय (British Museum) की स्थापना हुई थी –
(क) 1750 ई० में
(क) 1753 ई० में
(ग) 1760 ई॰ में
(घ) 1757 ई० में
उत्तर :
(क) 1750 ई० में

प्रश्न 77.
प्रथम भारतीय फिल्म है –
(क) बालिका बधु
(ख) आलमआरा
(ग) राजा हरीश्वन्द्र
(घ) शकुन्तलम
उत्तर :
(ग) राजा हरीश्चन्द्र

प्रश्न 78.
‘पिता का पत्र पुत्री के नाम’ में पिता हैं –
(क) जवाहरलाल नेहरू
(ख) महात्मा गाँधी
(ग) विपिन चन्द्र पाल
(घ) रवीन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर :
(क) जवाहरलाल नेहरू

प्रश्न 79.
1931 ई० में प्रदर्शित भारत की प्रथम बोलती फिल्म थी –
(क) शाहजहाँ
(ख) आलमआरा
(ग) राजा हरीश्चन्द्र
(घ) जहाँआरा
उत्तर :
(ख) आलमआरा

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प्रश्न 80.
‘मनुष्य का समय के साथ प्रकृति की शक्तियों से सम्बन्ध स्थापना इतिहास’ – कहलाता है –
(क) नवीन सामाजिक इतिहास
(ग) पर्यावरण का इतिहास
(ग) विजान और तकनीकी का इतिहास
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) विज्ञान और तकनीकी का इतिहास

प्रश्न 81.
‘हिस्ट्री ऑफ क्रिटिश इंडिया’ के लेखक हैं –
(क) जेम्स मिल
(ख) रामचन्द्र गुहा
(ग) जवाहरलाल नेहरू
(घ) केथरिया मेया
उत्तर :
(क) जेम्स मिल

प्रश्न 82.
‘नर्मदा बचावो आन्दोलन’ के प्रमुख नेता थे –
(क) सुन्दर लाल बहुगुणा
(ख) मेधा पाटेकर
(ग) नाना पाटेकर
(घ) महा केता देवी
उत्तर :
(ख) मेधा पाटेकर

प्रश्न 83.
फोटोग्राफी में व्यवहत कागज था :
(क) मैलोटाइप
(ख) कैलोटाइप
(ग) टैलोटाइप
(घ) माइलोटाइप
उत्तर :
(ख) कैलोटाइप।

प्रश्न 84.
भारत का प्रथम फोटोग्राफर था :
(क) माइकल मैन
(ख) लीना दिनदयाल
(ग) दोबन
(घ) माइकल कॉसबी
उत्तर :
(ख) लीना दिनदयाल।

प्रश्न 85.
भारत का प्रथम चलचित्र (मूक) राजा हरिश्चन्द्र को बम्बई के क्राटोनेशन सिनेमा हॉल में प्रदर्शित किया गया :-
(क) 1912 ई० में
(ख) 1913 ई० में
(ग) 1930 ई० में
(घ) 1931 ई० में
उत्तर :
(ख) 1913 ई० में।

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प्रश्न 86.
शहरों के विकास का इतिहास आरम्भ हुआ था –
(क) 7000 से 6000 ई० पू०
(ख) 7000 से 5000 ई० पू०
(ग) 7000 से 3000 ई० पू०
(घ) 7000 से 4000 ईं० पू०
उत्तर :
(क) 7000 से 6000 ई० पू०।

प्रश्न 87.
‘इण्डिया विन्स फ्रीडम’ आत्मजीवनी पुस्तक शी –
(क) मौलाना अबुल कलाम आजाद का
(ख) विपिन चन्द्र पाल का
(ग) सुभाषचन्द्र बोस का
(घ) जवाहरलाल नेहरू का
उत्तर :
(क) मौलाना अबुल कलाम आजाद का।

प्रश्न 88.
‘बंगदर्शन’ तथा ‘सोम प्रकाश’ किस भाषा के समाचार पत्र थे –
(क) हिन्दी
(ख) उर्दू
(ग) मराठी
(घ) बंगला
उत्तर :
(घ) बंगला।

प्रश्न 89.
नवीन सामाजिक इतिहास का उदय कब हुआ था :
(क) 1950 के दशक में
(ख) 1970 के दशक में
(ग) 1960 के दशक में
(घ) 1980 के दशक में
उत्तर :
(ग) 1960 के दशक में।

प्रश्न 90.
‘कृषि’ की खोज किस युग में हुई थी।
(क) पूर्व पाषाण युग
(ख) धातु युग
(ग) नव पाषाण युग
(घ) आधुनिक युग
उत्तर :
(ग) नव पाषाण युग।

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प्रश्न 91.
कताई-बुनाई या वस्त्र-विन्यास कला का आविष्कार किस युग में हुआ।
(क) पूर्व पाषाण युग में
(ख) नव पाषाण युग में
(ग) मध्य पाषाण युग में
(घ) धातु युग में
उत्तर :
(ख) नव पाषाण युग में।

प्रश्न 92.
पिदस इण्डिया ऐक्ट कब पारित हुआ।
(क) 1773 ई० में
(ख) 1784 ई० में
(ग) 1774 ई० में
(घ) 1805 ई० में
उत्तर :
(ख) 1784 ई० में।

प्रश्न 93.
सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना भारत में कब हुई :
(क) 1772 ई० में
(ख) 1774 ई० में
(ग) 1773 ई० में
(घ) 1775 ई० में
उत्तर :
(ख) 1774 ई० में।

प्रश्न 94.
जवाहरलाल नेहरू जेल में रहते हुए बेटी इंदिरा गाँथी को कितने बार पत्र लिखे थे –
(क) 140 बार
(ख) 100 बार
(ग) 120 बार
(घ) 146 बार
उत्तर :
(घ) 146 बार।

प्रश्न 95.
बाइबल में किस खेल का उल्लेख है –
(क) फुटबॉल
(ख) टेनिस
(ग) कुश्ती
(घ) क्रिकेट
उत्तर :
(ग) कुश्ती।

प्रश्न 96.
निम्नलिखित में कौन सरकारी दस्तावेज में शामिल नहीं है –
(क) सरकारी अविकारियेंबे पष
(ख) पुलिस के पत्र
(ग) आत्मकथा
(घ) गोपनीय रिपोर्ट
उत्तर :
(ग) आत्मकथा।

प्रश्न 97.
भारत में सन् 1774 ई० सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हुई थी, इसके प्रथम न्यायाधीश कौन थे –
(क) सर इलिजा एम्पी
(ख) अरविन्द घोष
(ग) वारेन हेस्टिंग्स
(घ) नंद कुमार
उत्तर :
(क) सर इलिजा एम्पी।

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प्रश्न 98.
नारी इतिहास लेखन का प्रारम्भ किस देश में हुआ ?
(क) भारत
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका
(ग) चीन
(घ) फ्रांस
उत्तर :
(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 99.
किसके द्वारा भारत में सन् 1913 में ‘कॉटोनेशन सिनेमा घर’ (बम्बई) में ‘राजा हरिश्चन्द्र’ प्रदर्शन से सिनेमा का इतिहास प्रारम्भ होता है-
(क) प्रभात मुखर्जी
(ख) इकबाल
(ग) दादा-साहेब फाल्के
(घ) नौरोजी
उत्तर :
(ग) दादा-साहेब फाल्के।

प्रश्न 100.
नवजागरण काल में इटली के प्रमुख चित्रकार थे –
(क) लियोनार्दो द बिंसी
(ख) माइकल एंजलो
(ग) राफेल
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 101.
‘द लास्ट सफर’ अमर कृति की रचना किसने की थी –
(क) लियोनादों द विंशी
(ख) माइकल एंजलो
(ग) राफेल
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(क) लियोनार्दो द विशी।

प्रश्न 102.
‘हिस्टोरिका’ नामक पुस्तक की रचना किसने किया ?
(क) मेगास्थनीज ने
(ख) हेरोडोट्स ने
(ग) डाइमेवस ने
(घ) टॉलसौ ने
उत्तर :
(ख) होरोडोट्स ने।

प्रश्न 103.
‘कुश्ती’ नामक खेल का संबंध किस प्राचीन सभ्यता से है –
(क) सुमेर सभ्यता से
(ख) मिस सभ्यता से
(ग) ग्रीस सभ्यता से
(घ) उपर्युक्त सभौ से
उत्तर :
(घ) उपर्युक्त सभी से।

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प्रश्न 104.
भारत में चलचित्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र को जाजा जाता है –
(क) बॉलीवुड
(ख) हॉलीवुड़
(ग) टॉलीवुड
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर : (क) बॉल. उड।

प्रश्न 105.
स० रा० अमेरिका के चलचित्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र को जाना जाता है –
(क) वॉलीयुड
(ख) हॉंलीवुड
(ग) टॉलीवुड
(घ) उपर्युक्त सभी
उत्तर :
(ख) होलीवुड।

प्रश्न 106.
‘पिट्स इण्डिया एक्ट’ के विरोध में किसने इस्तीफा दिया ?
(क) बर्क ने
(ख) वारेन हेस्टिंग्स ने
(ग) राबर्ट क्लाइब ने
(घ) लाई कार्नवालिस ने
उत्तर :
(ख) वारेन हेस्टिंग्स ने।

प्रश्न 107.
सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम न्यायाधीश ने किसको फाँसी की सजा दी ?
(क) नंद कुमार को
(ख) बाबुलाल को
(ग) नंद लाल भट्टावार्य को
(घ) गगाधर को
उत्तर :
(क) नंद कुमार को।

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प्रश्न 108.
नगरीय इतिहास लेखन का अभ्युदय कब हुआ ?
(क) सत्रहवौं शताब्दी
(ख) उन्नीसवीं शताब्दी
(ग) बीसवी शताब्दी
(घ) इककीसवी शताब्दो
उत्तर :
(ग) बीसरीं शताब्दी

प्रश्न 109.
‘सामाजिक इंग्लैण्ड’ (Social England) नामक पुस्तक की रचना किसने किया ?
(क) ट्रेल और मैन
(ख) रील और फ्रेटेग
(ग) जोंन रिचर्ड
(घ) ट्रेवेलियन
उत्तर :
(क) ट्रेल और मेन।

प्रश्न 110.
‘इंग्लैण्ड का सामाज्रिक इतिहास’ नामक पुस्तक किसने लिखा ?
(क) ट्रेवेलियन ने
(ख) ट्रेल और मैन ने
(ग) रील और फेटेग ने
(घ) जॉन रिचर्ड ने
उत्तर :
(क) ट्रेवेलियन ने।

प्रश्न 111.
कथकली नृत्य जुड़ा हुआ है –
(क) केरल राज्य से
(ख) तमिलनाहु राज्य से
(ग) बिहार राज्य से
(घ) त्रिपुरा राज्य से
उत्तर :
(क) केरल राज्य से।

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (Fill in the blanks) : (1 Mark)

1. सरलादेवी चौधरानी की आत्मकथा ग्रंथ का नाम …………. |
उत्तर : जीवनेर झड़ापाता।

2. सबसे पहले नियण्डरस्थल मानव ने …………. का अविष्कार किया।
उत्तर : आग।

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3. पहिए का आविष्कार …………. में हुआ था ।
उत्तर : नव पाषाण युग।

4. ……… की आत्मकथा ‘द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेन्ट विद डुथ’ था, जिसका पहला अंग्रेजी संस्करण 1927 ई० में प्रकाशित हुआ।
उत्तर : महात्मा गाँधी।

5. अल हिलाल में प्रकाशित हुआ।
उत्तर : सन् 1912

6. सर्वप्रथम तथा ने सामाजिक इतिहास का अध्ययन किया।
उत्तर :

  • रील
  • फ्रेटेग।

7. काल में मनुष्यों को खेती का ज्ञान नहीं था।
उत्तर :
पुरापाषाण।

8. जीवनेर झड़ापाता की रचना की हैं।
उत्तर :
सरला देवी चौधुरानी।

9. बंग-दर्शन पत्रिका का पहला प्रकाशन ई० में हुआ।
उत्तर :
1872 ई० में।

10. के संस्थापक ईश्वरचन्द्र विद्यासागर थे ।
उत्तर :
सोम प्रकाश

11. इंग्लैण्ड में क्लेरेंडन ने की रचना की।
उत्तर :
महान गृहयुद्ध।

12. ई० में आनन्दमठ का प्रकाशन हुआ।
उत्तर :
1882 ई० में।

13. जीवनेर झड़ापाता की आत्मकथा है।
उत्तर :
सरला देवी चौधुरानी।

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14. सोम प्रकाश के सम्पादक थे।
उत्तर :
द्वारकानाथ विद्याभूषण।

सही कथन के आगे ‘ T’ एवं गलत कथन के आगे ‘F’ लिखिए : (1 mark)

1. ‘सोमप्रकाश’ पत्रिका के सम्पादक द्वारकानाथ विद्याभूषण थे।
उत्तर : True

2. ‘नील दर्पण ‘ का अंग्रेजी अनुवाद जेम्सलांग ने किया था।
उत्तर : False

3. गिब्बन के शब्दों में ‘इतिहास उपन्यास से शुरू होता है और निबंध में खत्म होता है।”
उत्तर : False

4. 1896 ई० में आधुनिक ओलम्पिक खेलों का पुन: आरम्भ किया गया।
उत्तर : True

5. प्रथम बोलती फिल्म आलमआरा 1931 ई० में प्रदर्शित की गई थी।
उत्तर : True

6. ‘इवाल्यूशन ऑफ इण्डिया एण्ड पाकिस्तान (1858-1947 ई०), का सम्पादन सी० एच० फिलिप्स ने किया था।
उत्तर : False

7. रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा का नाम ‘जीवनेर झरापाता’ है।
उत्तर : False

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8. पुरातन सामाजिक इतिहास की समय-सीमा 1960 ई० तक मानी जाती है।
उत्तर : True

9. ‘महान गृह युद्ध की’ पुस्तक रचना इंग्लैण्ड के क्लेरैंडन ने की।
उत्तर : True

10. ओलम्पिक खेलों का आयोजन सर्वप्रथम मिस्र में हुआ था।
उत्तर : False

11. सरकारी दस्तावेजों की सहायता से आधुनिक भारत के इतिहास को जानने में मदद मिलती है।
उत्तर : True

12. खेल का इतिहास काफी पुराना नहीं है।
उत्तर : False

13. सैन्य इतिहास से हमें सशस्त्र युद्धों की जानकारी मिलती है।
उत्तर : True

14. रवीन्द्रनाथ के प्रोत्साहन से विपिन चन्द्र पाल सक्रिय राजनीति में आये।
उत्तर : False

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15. विपिन चन्द्र पाल का अपने पिता से विरोध हुआ, अत: वे नौकरी करने उड़ीसा चले गये।
उत्तर : True

16. ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ एक संस्मरण है।
उत्तर : True

17. सोम प्रकाश का प्रकाशन ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने किया।
उत्तर : False

18. बंग दर्शन ने बंगाली राष्ट्रीय अस्मिता को एक नयी पहचान दी।
उत्तर : True

19. ‘जीवनेर झड़ापाता’ एक आत्मजीवनी है।
उत्तर : True

निम्नलिखित कथनों की सही व्याख्या चुनकर लिखिए : (1 Mark)

Question 1.
कथन : सरलादेवी चौधुरानी ने लक्ष्मी भंडार की स्थापना की थी।
व्याख्या 1 : विदेशी सामान बेचने के लिए।
व्याख्या 2 : आन्दोलनकारी महिलाओं की सहायता के लिए।
व्याख्या 3 : स्वदेशी सामानों को बेचने के लिए।
उत्तर :
व्याख्या 3 : स्वदेशी सामानों को बेचने के लिए।

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Question 2.
कथन : जवाहर लाल नेहरू का अपनी पुत्री इंदिरा को पत्र लिखने का उड्देश्य था।
व्याख्या 1 : इंदिरा के पत्र पढ़ने की रूचि को पूरा करना।
व्याख्या 2 : भारत की सभ्यता एवं संस्कृति के साथ विश्व की सभ्यताओं की जानकारी देना।
व्यखख्या 3 : इंदिरा में राजनीतिक समझ पैदा करना।
उत्तर :
व्याख्या 2 : भारत की सभ्यता एवं संस्कृति के साथ विश्व की सभ्यताओं की जानकारी देना।

Question 3.
कथन : सामान्य मनुष्य का इतिहास ही सभ्यता का इतिहास होता है, क्योंकि –
व्याख्या 1 : सामान्य मनुष्य का इतिहास ही सभ्यता की स्थापना करते हैं।
व्याख्या 2 : शासक सामान्य मनुष्यों पर ही शासन करते हैं।
व्याख्या 3 : प्रत्येक महान पुरूष ही साधारण पुरूष होता है।
उत्तर :
व्याख्या 1 : सामान्य मनुष्य का इतिहास ही सभ्यता की स्थापना करते हैं।

Question 4.
कथन : पाक शैली का सूत्रपात्र हुआ ?
व्याख्या 1 : आदिमानव शिकार करना जान गये थे।
व्यख्या 2 : आदिमानव ने जंगली पौधें उगाए थे।
व्याख्या 3 : आदिमानव (नियण्डरथल मानव) ने आग का आविष्कार किया और मानव मांस भूनकर खाने लगे।
उत्तर :
व्याख्या 3 : आदिमानव (नियण्डरथल मानव) ने आग का आविष्कार किया और मानव मांस भूनकर खाने लगे।

Question 5.
कथन : भारत में छाया चित्रकारों को बढ़ावा मिला।
व्याख्या 1 : छाया चित्रकारों ने स्टुडियों खोले और भारत में समितियों का गठन किया।
व्याख्या 2 : छाया चित्रकारों ने कला को बढ़ावा दिया।
व्याख्या 3 : उन्होंने दूटी-फूटी इमारतों और मनोहारी भू-दृश्यों की यात्राएँ कीं।
उत्तर :
व्याख्या 1 : छाया चित्रकारों ने स्टुडियों खोले और भारत में समितियों का गठन किया।

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Question 6.
कथन : इंटरनेट (अन्तरजाल) ने विश्व में एक क्रांति ला दी है।
व्याख्या 1 : इंटरनेट देश और समाज के लिए अनिवार्य बन गया है।
व्याख्या 2 : इंररनेट उपभोक्ताओं को बहुआयामी साधन उपलब्ध कराता है एवं सूचना प्रौद्योगिकी के रूप में विश्च स्तर पर काम कर रहा है।
व्यखख्या 3 : इंटरनेट का चलाना आसान है।
उत्तर :
व्याख्या 2 : इंटरनेट उपभोक्ताओं को बहुआयामी साधन उपलब्ध कराता है एवं सूचना प्रौद्योगिकी के रूप में विश्च स्तर पर काम कर रहा है।

Question 7.
कथन : इतिहास एक वैज्ञानिक की भांति विशेषज्ञ के रूप में कालखण्ड का चित्र प्रस्तुत करता है।
व्याख्या 1 : इतिहास में स्रोत सामग्रियों को विश्लेषण तथा तुलनात्मक अध्ययन द्वारा रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
व्याख्या 2 : इतिहासकार वैज्ञानिक होते हैं।
व्याख्या 3 : इतिहास कालक्रम के आधार पर सोत सामग्रियों को उपलब्ध कराते हैं।
उत्तर :
व्यख्या 1 : इतिहास में स्रोत सामग्रियों को विश्लेषण तथा तुलनात्मक अध्ययन द्वारा रूपरेखा प्रस्तुत करता है।

Question 8.
कथन : सोम प्रकाश का प्रकाशन ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने किया था।
व्याख्या 1 : एक बधिर विद्वान को रोजगार देने के उद्देश्य से।
व्याख्या 2 : बंगाली पत्रिका के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने के लिए।
व्याख्या 3 : ल्रिटिश शासन की प्रशंसा करने के लिए।
उत्तर :
व्याख्या 1 : एक बधिर विद्वान को रोजगार देने के उद्देश्य से।

Question 9.
कथन : बंकिम चन्द्र चटर्जी के ‘बंग दर्शन’ पत्र को बहुत ख्याति मिली क्योंकि –
व्याख्या 1 : इसका सम्पादन बंकिम चन्द्र चटर्जी ने किया।
व्याख्या 2 ; इसका सम्पादन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किया।
व्याख्या 3 : इसने बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उत्तर :
व्याख्या 3 : इसने बंग-भंग विरोधी आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Question 10.
कथन : बिना सामाजिक इतिहास के इतिहास का अध्ययन अधूरा है क्योंकि –
व्याख्या 1 : नूतन सामाजिक इतिहास लोगों के बारे में बताता है।
व्याख्या 2 : नूतन सामाजिक इतिहास में समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है।
व्याख्या 3 : नूतन सामाजिक इतिहास आम लोगों का इतिहास है।
उत्तर :
व्याख्या 2 : नूतन सामाजिक इतिहास में समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है।

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Question 11.
कथन : सरकारी अभिलेख भारतीय इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है ?
व्याख्या 1 : इससे विट्रीश सरकार के बारे में सूचना प्राप्त की जा सकती है।
व्याख्या 2 : इससे नागरिको का चारित्रिक विश्लेषण किया जा सकता है।
व्याख्या 3 : अभिलेखों द्वारा प्रकाशित सूचना सत्य स्वीकार की जाती है।
उत्तर :
व्याख्या 3 : अभिलेखों द्वारा प्रकाशित सूचना सत्य स्वीकार की जाती है।

Question 12.
कथन : महेन्द्रलाल सरकार का नाम भारतीय विज्ञान के इतिहास के क्षेत्र में याद किया जाता है।
व्याख्या 1 : वे भारत के प्रथम वैज्ञानिक थे।
व्याख्या 2 : उन्होंने भारत में I.A.C.S. की स्थापना की थी।
व्याख्या 3 : वे बसु विज्ञान मंदिर में शिक्षण का कार्य करते थे।
उत्तर :
व्याख्या 2 : उन्होंने भारत में।.A.C.S. की स्थापना की थी।

स्तम्भ ‘क’ को स्तम्भ ‘ख’ से सुमेलित कीजिए : (1 Mark)

प्रश्न 1.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) जवाहरलाल नेहरू (i) सत्तर बच्छर
(b) जीवनेर झरापाता (ii) 776 ई०
(c) विपिनचन्द्र पाल (iii) ‘पिता का पुत्री’ को पत्र
(d) ओलम्पिक खेल (iv) सरला देवी चौधुरानी

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) जवाहरलाल नेहरू (iii) ‘पिता का पुत्री’ को पत्र
(b) जीवनेर झरापाता (iv) सरला देवी चौधुरानी
(c) विपिनचन्द्र पाल (i) सत्तर बच्छर
(d) ओलम्पिक खेल (ii) 776 ई०

प्रश्न 2.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) कालिदास (i) विश्व युद्ध का जन्म
(b) थ्यूसीडायड्स (ii) महान गृह युद्ध
(c) एस० बी० फेय (iii) मेघदूतम
(d) क्लेरेडन (iv) पोलोपोशियन युद्ध का इतिहास

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) कालिदास (iii) मेघदूतम
(b) थ्यूसीडायड्स (iv) पोलोपोशियन युद्ध का इतिहास
(c) एस० बी० फेय (i) विश्व युद्ध का जन्म
(d) क्लेरेडन (ii) महान गृह युद्ध

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प्रश्न 3.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) जीवनेर झरापाता (i) द इण्डियन स्ट्रगल
(b) रविन्द्रनाथ टैगौर (ii) सरला देवी चौधुरानी
(c) विपिन चन्द्र पाल (iii) जीवन स्मृति
(d) सुभाष चन्द्र बोस (iv) सत्तर बच्छर

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) जीवनेर झरापाता (ii) सरला देवी चौधुरानी
(b) रविन्द्रनाथ टैगौर (iii) जीवन स्मृति
(c) विपिन चन्द्र पाल (iv) सत्तर बच्छर
(d) सुभाष चन्द्र बोस (i) द इण्डियन स्ट्रगल

प्रश्न 4.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) टाइम्स ऑफ इण्डिया (i) बंगला
(b) बंगवासी (ii) हिन्दी
(c) उदन्त मार्तण्ड (iii) अंग्रेजी
(d) गदर (iv) पंजाबी

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) टाइम्स ऑफ इण्डिया (iii) अंग्रेजी
(b) बंगवासी (i) बंगला
(c) उदन्त मार्तण्ड (ii) हिन्दी
(d) गदर (iv) पंजाबी

प्रश्न 5.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) आधुनिक ओलम्पिक खेल (i) बंगला
(b) हड़प्पा और मोहनजोदांड़ो की खुदाई (ii) आसाम
(c) दृश्य कला का उदाहरण (iii) पंजाब
(d) पहिये का अविष्कार (iv) आन्ध्रा

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) आधुनिक ओलम्पिक खेल (iii) पंजाब
(b) हड़प्पा और मोहनजोदांड़ो की खुदाई (iv) आन्ध्रा
(c) दृश्य कला का उदाहरण (i) बंगला
(d) पहिये का अविष्कार (ii) आसाम

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प्रश्न 6.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) कुच्चीपुड़ी (i) बंगला
(b) भांगड़ा (ii) आसाम
(c) विहु (iii) पंजाब
(d) छाऊ नृत्य (iv) आन्ध्रा

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) कुच्चीपुड़ी (iv) आन्ध्रा
(b) भांगड़ा (ii) आसाम
(c) विहु (iii) पंजाब
(d) छाऊ नृत्य (iv) आन्ध्रा

प्रश्न 7.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) यु० एन० ब्रह्मचारी (i) वाणभट्ट
(b) हर्ष चरित्र (ii) बाल गंगाधर तिलक
(c) बंकीम चन्द्र चट्रजी (iii) 1896 ट्रीटमेन्ट ऑफ कालाजार
(d) केसरी (iv) विजनन रहस्य

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) यु० एन० ब्रह्मचारी (iii) 1896 ट्रीटमेन्ट ऑफ कालाजार
(b) हर्ष चरित्र (i) वाणभट्ट
(c) बंकीम चन्द्र चट्रजी (iv) विजनन रहस्य
(d) केसरी (ii) बाल गंगाधर तिलक

प्रश्न 8.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) ट्रान्सफर ऑफ पावर (i) इण्डियन नेशनल कांग्रेस
(b) मौलाना आजाद (ii) संस्कृत
(c) फोटोग्राफी (iii) एन० मैसर्ग
(d) नाद्यशास्त्र (iv) अन्नपूर्णा दत्त

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) ट्रान्सफर ऑफ पावर (iii) एन० मैसर्ग
(b) मौलाना आजाद (i) इण्डियन नेशनल कांग्रेस
(c) फोटोग्राफी (iv) अन्नपूर्णा दत्त
(d) नाद्यशास्त्र (ii) संस्कृत

प्रश्न 9.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) सोम प्रकाश (i) 1872 ई०
(b) बंगर्दशन (ii) जयदेव
(c) गीत गोवीन्द (iii) ग्रीस
(d) हेरोडोटस (iv) 1858 ई०

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) सोम प्रकाश (iv) 1858 ई०
(b) बंगर्दशन (i) 1872 ई०
(c) गीत गोवीन्द (ii) जयदेव
(d) हेरोडोटस (iii) ग्रीस

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प्रश्न 10.

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमेस्ट्री (i) दादा साहेब फालके
(b) चोखेर बाली (ii) प्रफुल चन्द्र राय
(c) राजा हरिश्चन्द्र (iii) बुद्धिष्ट
(d) धरनी (iv) रविन्द्रनाथ टैगोर

उत्तर :

स्तम्भ ‘क’ स्तम्भ ‘ख’
(a) हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमेस्ट्री (ii) प्रफुल चन्द्र राय
(b) चोखेर बाली (iv) रविन्द्रनाथ टैगोर
(c) राजा हरिश्चन्द्र (i) दादा साहेब फालके
(d) धरनी (iii) बुद्धिष्ट

 

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 2 सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण

Detailed explanations in West Bengal Board Class 10 History Book Solutions Chapter 2 सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण offer valuable context and analysis.

WBBSE Class 10 History Chapter 2 Question Answer – सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Very Short Answer Type) : 1 MARK

प्रश्न 1.
‘ग्रामवार्ता प्रकाशिका’ के सम्पादक कौन थे ?
उत्तर :
हरिनाथ मजुमदार।

प्रश्न 2.
साधारण ब्रह्म समाज की स्थापना किस वर्ष में हुई थी ?
उत्तर :
1878 ई० में।

प्रश्न 3.
वर्ण परिचय किसने लिखा है ?
उत्तर :
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने।

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प्रश्न 4.
बंगाल तकनीकी संस्थान की स्थापना किस वर्ष में हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1906 ई० में।

प्रश्न 5.
लीला नाग (राय) किस संस्था से जुड़ी थी ?
उत्तर :
लीला नाग ‘दिपाली संघ’ संस्था से जुड़ी थी जिसकी स्थापना उन्होंने ही 1923 ई० में ढाका में की थी।

प्रश्न 6.
किस पत्रिका को ग्रामीण समाचार पत्रों का जन्मदाता कहा जाता है ?
उत्तर :
ग्रामवार्ता प्रकाशिका को।

प्रश्न 7.
भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता किसे कहा जाता है ?
उत्तर :
चार्ल्स ग्राण्ट को।

प्रश्न 8.
एक प्राच्यवादी शिक्षा समर्थक का नाम लिखिए।
उत्तर :
एच०एच०विल्सन।

प्रश्न 9.
‘भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा’ (महान घोषणा) किसे कहा जाता है ?
उत्तर :
चार्ल्स वुड के घोषणा (डिस्पैच) को।

प्रश्न 10.
देरेजियों के अनुयायी क्या कहलाते थे ?
उत्तर :
युवा बंगाल।

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प्रश्न 11.
एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना किसने और कब किया ?
उत्तर :
सर विलियम जोन्स ने, 1784 ई० में।

प्रश्न 12.
ललन फकीर कौन थे ?
उत्तर :
ललन फकीर बंगाली बाउल संत, फकीर, गीतकार, समाज सुधारक तथा चिंतक थे।

प्रश्न 13.
देरोजियो कौन थे ?
उत्तर :
देंरोजियो हिन्दू कॉलेज के प्राध्यापक एवं यंग या तरुण बंगाल के संस्थापक थे।

प्रश्न 14.
‘दादन’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
नील की खेती के लिए दिया जाने वाला अग्रिम धन राशि को दादन कहा जाता था।

प्रश्न 15.
पश्चिम बंगाल का कौन-सा क्षेत्र जंगल महल के नाम से जाना जाता है ?
उत्तर :
पश्चिम मिदनापुर।

प्रश्न 16.
‘शब्द कल्पद्रुम’ किसने प्रकाशित किया ?
उत्तर :
राजा राधाकांत देब ने।

प्रश्न 17.
आदि ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ?
उत्तर :
देवेन्द्रनाथ टैगोर ने।

प्रश्न 18.
कलकत्ता विश्व विद्यालय के प्रथम उप-कुलपति कौन थे ?
उत्तर :
सर जेम्स विलियम कोलविन (Sir James William Colvine) कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रथम उप-कुलपति थे।

प्रश्न 19.
बोस संस्थान की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
1917 ई० में ।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 2 सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 20.
हाजी मुहम्मद मोहसीन कौन थे ?
उत्तर :
हाजी मुहम्मद मोहसीन बंगाल के फराजी आंदोलन के प्रमुख नेता थे।

प्रश्न 21.
हिन्दू पैट्रियट पत्रिका का सम्पादन कार्य कब और किसके नेतृत्व में आरम्भ हुआ था ?
उत्तर :
1853 ई० में मधुसूदन राय, श्री नाथ घोष, गिरिशचन्द्र घोष के नेतृत्व में।

प्रश्न 22.
विजय कृष्ण गोस्वामी कौन थे ?
उत्तर :
विजय कृष्ण गोस्वामी बंगाल के धर्म एवं समाज सुधारकों में से एक थे।

प्रश्न 23.
“सती” प्रथा को किसने और कब अवैध घोषित किया ?
उत्तर :
राजा राममोहन राय के प्रयास से ब्रिटिश सरकार ने, 1829 ई० में अवैध घोषित किया ?

प्रश्न 24.
समाचार चंद्रिका का प्रकाशन किसने किया ?
उत्तर :
समाचार चंद्रिका का प्रकाशन भवानी चरण बंद्योपाध्याय ने किया।

प्रश्न 25.
विधवा पुर्नविवाह कानून को किसने और कब पास करवाया।
उत्तर :
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर द्वारा, 13 जुलाई 1856 ई० में।

प्रश्न 26.
रामकृष्ण मिशन की स्थापना किसने और कब किया ?
उत्तर :
स्वामी विवेकानन्द ने, 1897 ई० में।

प्रश्न 27.
कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी।
उत्तर :
24 जनवरी 1857 ई० में।

प्रश्न 28.
नव विधान ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की ?
उत्तर :
नव विधान ब्रह्म समाज की स्थापना केशवचन्द्र सेन ने की।

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प्रश्न 29.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
1887 ई० में।

प्रश्न 30.
बेथुन स्कूल की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
1849 ई० में।

प्रश्न 31.
राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
1934 ई० में।

प्रश्न 32.
वुड्स डिस्पैच कब और किसने प्रकाशित किया ?
उत्तर :
सन् 1854 में चार्ल्स वुड ने।

प्रश्न 33.
हण्टर आयोग का गठन किसने किया ?
उत्तर :
विलियम हण्टर ने।

प्रश्न 34.
भारत की प्रथम महिला डाक्टर (चिकित्सक) कौन थी ?
उत्तर :
आनन्दी गोपाल जोशी।

प्रश्न 35.
वामाबोधिनी पत्रिका का सम्पादन कब आरम्भ हुआ ?
उत्तर :
अगस्त 1863 ई० में हुआ।

प्रश्न 36.
वामाबोधिनी मासिक पत्रिका का प्रकाशन किसने किया ?
उत्तर :
उमेशचन्द्र दत्त जी ने।

प्रश्न 37.
पाश्चात्यवादी कौन कहे जाते थे ?
उत्तर :
पहला दल जो भारतीय शिक्षा पद्धति का गठन करता है उसे पाश्चात्यवादी कहा जाता है।

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प्रश्न 38.
बनारस विशविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1916 ई०।

प्रश्न 39.
1813 ई० के चार्टर एक्ट में क्या व्यवस्था की गई ?
उत्तर :
1813 ई० के चार्टर एक्ट में इसाई धर्म के प्रचारकों को भारत में इसाई धर्म प्रचार करने की अनुमति दी गई ।

प्रश्न 40.
मधुसूदन गुप्त जी कौन थे?
उत्तर :
मधु सूदन गुप्त जी एक भारतीय डाक्टर थे जिन्होंने सर्वपथम पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान में प्रशिक्षण प्राप्त किया।

प्रश्न 41.
पूना कॉलेज की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1851 में।

प्रश्न 42.
ब्रह्म मैरेज एक्ट कब पास हुआ ?
उत्तर :
1872 ई० में।

प्रश्न 43.
नील दर्पण के रचयिता कौन थे ?
उत्तर :
दीनबंधु मित्र।

प्रश्न 44.
ग्रामवार्ता पत्रिका कब और किसने प्रकाशित किया ?
उत्तर :
1863 ई० में हरिनाथ मजुमदार ने।

प्रश्न 45.
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर :
1820 ई० में, मिदनापुर जिला के वीरसिंह ग्राम में हुआ।

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प्रश्न 46.
राजा राममोहन राय का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर :
1772 ई० में बंगाल के हुगली जिला के राधानगर ग्राम में हुआ।

प्रश्न 47.
डेविड हेयर का जन्म कब हुआ।
उत्तर :
1775 ई० में।

प्रश्न 48.
मधुसूदन गुप्ता जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर :
15 नवम्बर 1800 ई० को बंगाल के हुगली जिला में।

प्रश्न 49.
रामकृष्ण परमहंस का देहांत कब हुआ ?
उत्तर :
16 अगस्त, 1886 ई० में।

प्रश्न 50.
रामकृष्ण परमहंस का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर :
18 फरवरी 1836 ई० में बंगाल के हुगली जिले में हुआ।

प्रश्न 51.
राजा राममोहन राय की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर :
1833 ई० में।

प्रश्न 52.
मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1916 ई० में।

प्रश्न 53.
पटना विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1917 ई० में।

प्रश्न 54.
लखनऊ विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1925 ई० में।

प्रश्न 55.
पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1882 ई० में।

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प्रश्न 56.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1887 ई० में।

प्रश्न 57.
‘एग्रीकलचरल हार्टीकलचर सोसाइटी ऑफ इण्डिया’ की स्थापना कब हुई।
उत्तर :
1817 ई० में।

प्रश्न 58.
सेंट जॉन्स कॉलेज की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1852 ई० में।

प्रश्न 59.
रूड़की इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1847 ई० में।

प्रश्न 60.
कलकत्ता मेडिकल ऐण्ड फिजिकल सोडायटी की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1828 ई० में।

प्रश्न 61.
भारतीय विज्ञान अकादमी की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1934 ई० में।

प्रश्न 62.
मद्रास विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1875 ई० में।

प्रश्न 63.
दो प्राच्यवादी समर्थकों के नाम बताइए।
उत्तर :
एच०टी० प्रिंसेप और एच०एच०विल्सन आदि।

प्रश्न 64.
दो आंग्लवादी समर्थकों के नाम बताइए।
उत्तर :
लार्ड मैकाले और मुनरो आदि।

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प्रश्न 65.
ऊस्मानिया विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1918 ई॰ में।

प्रश्न 66.
अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
सन् 1925 ई० में।

प्रश्न 67.
अजमेर तथा पंजाब में मेडिकल कॉलेज की स्थापना कब हुइ ?
उत्तर :
सन् 1847 ई० में तथा सन् 1861 ई० में।

प्रश्न 68.
पूसा कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना किसने और कहाँ की ?
उत्तर :
लार्ड कर्जन ने दिल्ली में।

प्रश्न 69.
देरोजियो के द्वारा सम्पादित पत्रिकाओं के नाम बताइए।
उत्तर :
हैस्पेरस, कलकत्ता साहित्यिक गजट, ईस्ट इण्डिया व इण्डिया गजट आदि।

प्रश्न 70.
विधवा पुनर्विवाह सभा की स्थापना किसने और कब की ?
उत्तर :
विष्णु शाख़ी पंडित ने 1850 ई० में की।

प्रश्न 71.
वैद्यक की डिग्री किसने प्राप्त की ?
उत्तर :
पं० मधुसूदन गुप्ता ने।

प्रश्न 72.
हिन्दू पैट्रियाट की रचना किसने की ?
उत्तर :
हिन्दू पैट्रियाट की रचना हरिश्चन्द्र मुखर्जी ने की।

प्रश्न 73.
‘ग्रामवार्ता प्रकाशिका’ सर्वप्रथम कब प्रकाशित की गई ?
उत्तर :
ग्रामवार्ता प्रकाशिका सर्वप्रथम 1863 ई० में प्रकाशित की गई।

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प्रश्न 74.
‘हुतोम पेंचार नक्शा’ का प्रथम एवं द्वितीय भाग कब प्रकाशित हुआ ?
उत्तर :
हुतोम वेचार नक्शा का प्रथम एवं द्वितीय भाग 1863 और 1864 ई० में प्रकाशित हुई।

प्रश्न 75.
बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना किसने और कब की ?
उत्तर :
बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना जोनाथन डंकन द्वारा 1792 ई० में की गई।

प्रश्न 76.
लार्ड विलियम बेंटिक कौन था ?
उत्तर :
लार्ड विलियम बेटिंक भारत का पहला गर्वनर जनरल था।

प्रश्न 77.
कलकत्ता में हिन्दू बालिका स्कूल किसने स्थापित किया ?
उत्तर :
कलकत्ता में हिन्दू बालिका स्कूल की स्थापना ड्रिकवाटर बेथुन ने किया।

प्रश्न 78.
बंगाल में नवजागरण का विस्तार किसने किया ?
उत्तर :
राजा राममोहन राय ने विस्तार किया।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Type) : 2 MARKS

प्रश्न 1.
मधुसूदन गुप्त कौन थे ?
उत्तर :
मधुसूदन गुप्त प्रथम भारतीय थे, जिन्होने सामाजिक कुसंस्कारो को तोड़कर 10 जनवरी 1836 को कलकत्ता मेंडिकल कॉलजे में शव का चीर-फाड़ (अन्त्य परीक्षण) किया था । इन्होने संस्कृत में ज्ञान प्राप्त करने के बाद 1926 ई० में कॉलेज के बैधक श्रेणी में भर्त्ती हो गये और पश्चिमी चिकित्साशास्त्र का अध्ययन शुरू किया था ।

प्रश्न 2.
‘मैकाले मिनिट’ क्या है ?
उत्तर :
1813 ई० के ब्रिटिश संसद के आज्ञा-पत्र के बाद भारत में ‘जन शिक्षा समिति’ के अधिकारियों के बीच प्राच्य एवं पाश्चात्य शिक्षा के विकास को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। इस विवाद को दूर करने के लिए 1934 ई० में मैकाले समिति गठित हुई। 1935 ई० में मैकाले ने अपने ‘विवरण पत्र’ में प्राच्य शिक्षा को महत्वहीन बताते हुए ज्ञान-विज्ञान आधारित अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने तथा यह शिक्षा समाज के उच्च वर्ग से निम्न वर्ग की ओर हो का सुझाव दिया। उसका यही सुझाव ‘मैकाले मिनट’ (मैकाले विवरण) कहलाता है।

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प्रश्न 3.
सामाज़िक सुधार में यंग बंगाल की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
कलकत्ता हिन्दू कॉलेज के अध्यापक तथा उनके अनुयायियों को ‘यंग बंगाल’ के रूप में जाना जाता है। इन्होंने हिन्दू धर्म में प्रचालित धार्मिक सामाजिक कुसंस्कारों का विरोध किया तथा स्ती शिक्षा, अधिकार, स्वतन्रता का प्रचार-प्रसार किया। इस प्रकार यंग बगाल ने समाज को तर्कसंगत और प्रगतिशील रास्ते पर लाने में अपना योगदान दिया।

प्रश्न 4.
मधुसूदन गुप्त क्यों याद किये जाते हैं ?
उत्तर :
पे० मधुसूदन गुप्त का जन्म 1800 ई० में हुगली जिला के वैद्यवाटी नामक स्थान में हुआ था। वही प्रथम भारतीय थे जिन्होंने सबसे पहले पाश्चात्य मेडिसिन के अनुसार किसी मानव शव का विच्छेदन (चीर-फाड़) किया था। इसलिए वे चिकित्सा के क्षेत्र में स्मरणीय है।

प्रश्न 5.
बंगाल में नारी शिक्षा के विस्तार में राजा राघाकान्त देव की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर :
महाराजा नवकृष्ण देव के दत्तक पुत्र राजा राधाकान्त देव कट्टरवादी हिन्दू होते हुए भी उन्होंने अपने निजी खर्चे से नारी शिक्षा के लिए प्राथमिक स्कूल खुलवाये तथा नारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका अदा की।

प्रश्न 6.
भारत का ब्रह्म समाज विभाजित क्यों हुआ ?
उत्तर :
सभी धर्मो की शिक्षा, अर्त्तजातीय विवाह आदि विषय, को लेकर केशव चन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ टैगोर में मतभेद हो गया। इसके बाद टैगोर ने सेन को आचार्य पद से हटा दिया। परिणामस्वरूप 1866 ई० में भारत का बह्म समाज दो भागों में विभाजित हो गया।

प्रश्न 7.
वुड्स डिस्पैच (1854) की किन्हीं दो संस्तुतियों का उल्लेख करें।
उत्तर :
वुड्स डिस्पैच (घोषणा) की दो संस्तुतियाँ निम्नलिखित है-
(i) सरकारी स्कूलों एवं कालेजों में दी जाने वाली शिक्षा धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए।
(ii) सरकार जन साधारण की शिक्षा का उत्तरदायित्व स्वयम् वहन करें।

प्रश्न 8.
डेविड हेयर क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर :
भारत में पश्चिमी अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देने, हिन्दू स्कूल एवं स्कूल बुक सोसायटी जैसी संस्थाओं की स्थापना के कारण डेविड हेयर भारत में प्रसिद्ध है।

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प्रश्न 9.
‘यंग बंगाल सोसाइटी’ के रूप में कौन जाने जाते थे ?
उत्तर :
देरोजियो के नेतृत्व मे ‘यंग बंगाल’ (Young Bengal) नामक संस्था का गठन हुआ और इनके अनुयायी ‘युवा बंगाल’ कहलाए। इनके द्वारा चलाया गया आन्दोलन ‘यंग बंगाल आन्दोलन’ (Young Bengal Movement) कहलाया। ‘नव बंगाल’ के सदस्यों द्वारा न सिर्फ जाति-पाँत, मूर्ति-पूजा, सती-प्रथा, स्त्रियों की उपेक्षा तथा छुआछूत की निन्दा की जाती थी, बल्कि हिन्दू धर्म का भी विरोध किया जाता था।

प्रश्न 10.
ब्रह्म समाज के किन्हीं दो समाज सुधार क्रियाकलापों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
(i) बह्म समाज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धान्त एकेश्वरवाद का सिद्धान्त था। बह्म समाजी एक ब्रह्म अथवा ईश्वर को मानते थे और केवल उसकी उपासना में ही विश्वास रखते थे।
(ii) ब्लह्म समाज के अनुयायी मूर्ति-पूजा एवं अन्य बाह्य आडंबरों के विरोधी थे। वे प्रार्थना में विश्वास करते थे, उनकी प्रार्थना प्रेम तथा सत्य पर आधारित थी।

प्रश्न 11.
वुड का घोषणा पत्र क्या है ? अथवा, वुड का घोषणा पत्र से क्या समझते हो ?
उत्तर :
बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड ने 19 जुलाई 1854 ई० को भारतीय शिक्षा के सम्बन्ध में एक विस्तृत योजना लॉर्ड डलहौजी को प्रस्तुत किया। उसे ही “वुड का घोषणा” पत्र कहते हैं। इस घोषणा पत्र को भारत का शिक्षा का मौग्नकार्टा भी कहा जाता है।

प्रश्न 12.
बामबोधिनी पत्रिका का प्रथम संपादक कौन थे, तथा इस पत्रिका का उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
उमेश चन्द्र दत्त बामबोधिनी के प्रथम सम्पादक थे। इस पत्रिका का उद्देश्य घरेलू महिलाओ को शिक्षित और जागरूक बनाना था।

प्रश्न 13.
“भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता” किसे कहा जाता है और क्यों ?
उत्तर :
वार्ल्स ग्राण्ट को भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता माना जाता है। इन्होने ही सबसे पहले अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने का सर्मथन किया था।

प्रश्न 14.
कलकत्ता मेडिकल कालेज की स्थापना के दो उद्देश्य बताओ।
उत्तर :
(i) इस कॉलेज के साथ एक वृहद अस्पताल की भी स्थापना की गई थी। इसका उद्देश्य मरीजों का इलाज रियायती दर पर करना था।
(ii) कलकत्ता मेडिकल कॉलेज भारत में पहली ऐसी संस्था थी जो पूरी तरह पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञानपर आधारित थी। इसका उद्देश्य देश के चिकित्सा छात्रों को पश्चिमी चिकित्सा शिक्षा का ज्ञान देना था।

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प्रश्न 15.
वामाबोधिनी पत्रिका के प्रकाशन का मूल उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
वामाबोधिनी पत्रिका के प्रकाशन का मूख्य उद्देश्य घरेलू कार्यों में व्यस्त नारियों को शिक्षित, जागरूक एवं उनके मानसिक विकास के लिए उनके सामने ऐसे साहित्य एवं विषय-वस्तु को प्रस्तुत करना था, कि वो गृह कार्य के साथ-साथ बच्चों के पालन करने में कुशलता प्राप्त करने के साथ अपने शिक्षा और अधिकारों के प्राप्ति के लिए जागरूक बन सके।

प्रश्न 16.
ग्रामवार्ता प्रकाशिका का प्रकाशन कब और किसके द्वारा शुरू हुआ ? और इस पत्रिका की मूल विषय-वस्तु क्या थी ? उद्देश्य लिखें।
उत्तर :
ग्रामवार्ता प्रकाशिका एक मासिक पत्रिका थी । जिसका प्रकाशन एवं संपादन 1863 ई० में हरिनाथ मजूमदार द्वारा शुरू किया गया था।
इस पत्रिका का मूल विषय बंगाली समाज में व्याप्त सामाजिक एवं धार्मिक बुराइयों को उजागर कर उससे पीड़ित असहाय लोगों की दीन-दशा में सुधार लाना था।

प्रश्न 17.
बेथून महोदय कौन थे ?
उत्तर :
बेथून महोदय एक अंग्रेज अधिकारी थे जिनकी सहायता से ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने भारत में महिला शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अनेकों स्कूल-कॉलेज खुलवाए थे।

प्रश्न 18.
कब किसके और किस उद्देश्य से कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई थी ?
उत्तर :
1835 ई० में लार्ड विलियम बेंटिक और मधुसूदन गुप्ता के प्रयास से कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। इसकी स्थापना का उद्देश्य भारतीय छात्रों को पश्चिमी औरधि विज्ञान एवं चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा देना था।

प्रश्न 19.
आत्मीय सभा की स्थापना कब और किसने की थी ? इसकी स्थापना का उद्देश्य क्या था ?
उत्तर :
1815 ई० में राजा राममोहन राय ने कलकत्ता में आत्मीय सभा की स्थापना,की। आगे चलकर ये सभा बह्म समाज के नाम से प्रसिद्ध (परिवर्तित) हो गयी। इसका उद्देश्य एके भरवाद में विश्वास की भावना को प्रचारित करना, मूर्ति पूजा, विधवा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा आदि समाजिक एवं धार्मिक बुराइयों का विरोध कर हिन्दू धर्म एवं समाज में सुधार लाना था।

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प्रश्न 20.
एक समाज सुधारक के रूप केशवचन्द्र सेन के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
केशवचन्द्र सेन का बंगाल के समाज सुधारकों में एक बड़ा नाम था। राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद बहा समाज दो भागों में बंट गया तो उन्होंने 1866 ई० में भारत ब्रह्म समाज की स्थापना कर उसके शिक्षा एवं उद्देश्य को राष्ट्रीय स्तर तक पँहुचाया तथा पक्धिमी शिक्षा स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया किन्तु कम उप्र (14 वर्ष) में ही अपनी पूत्री का विवाह कूचबिहार के राजा से करके स्वंय बाल विवाह का उल्लंघन कर बैठे। इस कारण उनके समर्थक उनसे नाराज हो गये, इसके बाद भारत ब्रह्म सामज का धीरे-धीरे पतन हो गया।

प्रश्न 21.
नव विधान की स्थापना किसने किस उद्देश्य से किया था ?
उत्तर :
नव विधान की स्थापना केशवचन्द्र सेन ने की थी। इसकी स्थापना सभी धर्मों की एकता को लेकर उनमें विश्वास बनाये रखने के लिए की गयी थी।

प्रश्न 22.
हाजी मोहम्मद मोहसीन कौन थे ?
उत्तर :
हाजी मोहम्मद मोहसीन बंगाल में फराजी आन्दोलन के प्रवर्तक और नेता थे। जिन्होंने इस्लाम धर्म में सुधार लाने के लिए फराजी आन्दोलन की शुरूआत की थी। आगे चलकर यह आन्दोलन किसान आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। ये अपने अनुयायीयों के बीच दूधूमियाँ के नाम से प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 23.
नव वेदान्ता क्या है ?
उत्तर :
19 वी सदी में हिन्दू धर्म की विशेषताओं को नये सिरे से परिभाषित करने के लिए स्वामी विवेकानन्द ने वेदों की जो आधुनिक व्याख्या करके पश्चिमी विचारों से समन्वय स्थापित करने का जो प्रयास किया, उसे नव वेदान्ता कहा जाता है।

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प्रश्न 24.
दक्षिण भारत का विद्यासागर किसे और क्यों कहा जाता है ?
उत्तर :
बिरसा लिंगम पंतलु को दक्षिण भारत का विद्यासागर कहा जाता है। जिस प्रकार उत्तर भारत में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए ‘स्त्री शिक्षा का प्रचार’ विधवा विवाह का समर्थन, सती प्रथा और बाल विवाह का विरोध कर स्त्रियों की दशा में सुधार लाने का अथक प्रयास किया, ठीक उसी तरह पंतलु मे भी दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक राज्यों में सुधार कार्य किया। इसीलिए उन्हें दक्षिण भारत का विद्यासागर कहा जाता है।

प्रश्न 25.
किसके प्रयास से और कब सती प्रथा निषेध और विधवा पुर्न विवाह कानून पास हुआ ?
उत्तर :
राजा राममोहन राय के अथक प्रयास से गर्वनर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक के समय 4 दिसम्बर 1829 ई० को सती प्रथा निषेध कानून पास करवाया।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने 13 जुलाई 1856 ई० में लार्ड डलहौजी के समय विधवा पूर्न विवाह कानून पास करवा कर इसको कानूनी मान्यता दिलवायी।

प्रश्न 26.
एसियाटिक सोसाइटी की स्थापना कब और किसने किस उद्देश्य से की थी ?
उत्तर :
एसियाटिक सोसाइटी की स्थापना सन् 1784 में सर विलियम जोन्स ने कलकत्ता में की थी। इसकी स्थापना का उद्देश्य पक्विमी ज्ञान-विज्ञान के शिक्षा को बढ़ावा देना था। आज इसे भारतीय संग्रहालय के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 27.
बाउल सम्राट किसे कहा जाता है ? और क्यों ?
उत्तर :
ललन फकीर को बंगला लोक गीत (बाउल गीत) का सम्राट कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने लोक गीत के माध्यम से लोगों के बीच प्रेम और भाईचारें की भावना को बढ़ावा दिया था। उनके गीत प्राय: प्रवासी पत्रिका में प्रकाशित होते रहते थे जिससे उनके गीत लोगों तक आसानी से पँहुचते रहे और उनके मन भाते रहे । इसलिए उन्हे बाउल सम्राट कहा जाता है।

प्रश्न 28.
ड्रेन ऑफ वेल्थ (धन का बर्हिगमन) पुस्तक के लेखक कौन हैं ? इसकी मुख्य विषय-वस्तु क्या है ?
उत्तर :
दादा भाई नौराजी Drosin of wealth के लेखक हैं। इसकी पूस्तक की मुख्य विषय वस्तु अंग्रेजों द्वारा भारतीय धन को तरह-तरह से लूटकर यूरोप और इंग्लेण्ड में लेने जाने के कारण भारत की आर्थिक दुर्दशा का चित्रण है।

प्रश्न 29.
फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कब, किसके द्वारा और किस उद्देश्य से की गयी थी ?
उत्तर :
फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना 1800 ई० में लार्ड वेलेजली द्वारा की गई थी। इसकी स्थापना का उद्देश्य अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारियों को भारतीय भाषा की शिक्षा देने के लिए की गयी थी।

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प्रश्न 30.
प्राच्यवादी किनें कहा जाता था ?
उत्तर :
लोक शिक्षा की सामान्य समिति में 10 सदस्य शामिल थे जिसमें एक दल परम्परागत तथा दूसरा अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन करता था । इसमें परम्परागत समर्थक प्राच्यवादी कहलाये।

प्रश्न 31.
हण्टर आयोग का गठन क्यों हुआ ?
उत्तर :
1882 ई० में विलियम हण्टर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग का उद्देश्य केवल प्राथमिक शिक्षा के विकास की कार्य की समीक्षा प्रस्तुत कर सुझाव देना था, परन्तु इसने माध्यमिक शिक्षा के लिएभी कई सुझाव दिया था।

प्रश्न 32.
विजय कृष्ण गोस्वामी कौन थे ?
उत्तर :
विजय कृष्ण गोस्वामी बंगाल के एक धर्म एवं समाज सुधारक थे। इन्हें चैतन्य महामभु का अवतार भी कहा जाता था। ये वैष्णववाद के प्रवर्तक माने जाते थे। इनका जन्म 2 अगस्त, 1851 ई० को नदिया जिले के शांतिपुर नामक स्थान में हुआ था।

प्रश्न 33.
‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) किसका नाटक है और इसकी विषय-वस्तु क्या है ?
उत्तर :
‘नील दर्पण’ (Nil Darpan) ‘दीनबंधु मित्र’ का नाटक है तथा इसकी मुख्य विषय वस्तु इसमें किसानों पर नीलहे गोरों द्वारा किये गये अत्याचार तथा शोषण सम्बन्धि बातें है।

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प्रश्न 34.
कंगाल हरीनाथ का नाम क्यों स्मरणीय है ?
उत्तर :
कंगाल हरीनाथ को एक समाज सुधारक के रूप में याद किया जाता है। इनका वास्तविक नाम हरीनाथ मजुमदार था। इनके संपादन में ही ‘प्रामवार्ता प्रकाशिका’ पत्रिका का सर्वपथम प्रकाशन हुआ। माना जाता हैं कि इस पत्रिका के प्रकाशन के लिए इन्हें दूसरों से आर्थिक सहायता माँगनी पड़ी थी, तभी से ये कंगालफकीरचंद के नाम से मशहूर हुए।

प्रश्न 35.
देरोजियो क्यों प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
देरोजियो हिन्दू कॉलेज के प्राध्यापक एवं यंग बंगाल के संस्थापक थे। उन्होंने धर्म के क्षेत्र में फैले आडम्बर, अंध विश्वास तथा पुरोहितवाद का विरोध किया तथा हिन्दू समाज की कुरीतियों को समाप्त कर, नारी शिक्षा एवं नारी अधिकारों की माँग की। इन्हीं प्रगतिशील विचारों एवं सुधार कायों के लिए वे भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है।

प्रश्न 36.
‘मनेर मानुष’ नामक पुस्तक की रचना किसने और किसके बारे में की ?
उत्तर :
सुनील गंगोपाध्याय ने ‘मनेर मानुष’ नामक पुस्तक की रचना की। इस पुस्तक में बंगाल के बाउल सम्राट लालन फकीर के जीवन के बारे में लिखी गई है ।

प्रश्न 37.
हरीश चन्द्र मुखोपाध्याय को क्यों याद किया जाता है ?
उत्तर :
हरीश चन्द्र मुखोपाध्याय इसलिए याद किये जाते हैं कि सिपाही विद्रोह के समय हिन्दू पैट्रियट पत्रिका जिसका प्रकाशन मधुसूदन राय के स्वामित्व तथा गिरीश घोष के सम्पादन में हुआ था, के माध्यम से इन्होंने नील की खेती करने वाले कृषकों के ऊपर हो रहे अत्याचार को देश के सामने उजागर करने में अहम भूमिका का पालन किया था। इसलिए उन्हे भारतीय इतिहास में याद किया जाता है।

प्रश्न 38.
हिन्दू पैट्रियट पत्रिका का सम्पादन कार्य कब और किसके नेतृत्व में आरम्भ हुआ था ?
उत्तर :
1853 ई० में मधुसूदन गुप्त, श्री नाथ घोष, गिरिशचन्द्र घोष के नेतृत्व में।

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प्रश्न 39.
लॉर्ड मैकाले भारत में किस प्रकार की शिक्षा देना चाहता था ?
उत्तर :
वे चाहते थे कि भारत में अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से एक ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार हो, जो -रक्त और रंग से तो भारतीय हो किन्तु विचार और स्वभाव से अंग्रेज हो, जो समय आने पर अंग्रेजों का शुभचितंक और रक्षक सिद्ध हो सके।

प्रश्न 40.
विधवा पुर्नविवाह कानून को किसने और कब पास करवाया।
उत्तर :
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर द्वारा, 13 जुलाई 1856 ई० में।

प्रश्न 41.
सर्वधर्म समन्वय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों का एक उद्देश्य माना है तथा सभी धर्म ईश्वर तक पहुँचाने में विभिन्न धर्म मार्गो का काम करते हैं। इसे ही सर्व धर्म समन्वय कहा जाता है।

प्रश्न 42.
नवजागरण काल किसे कहते हैं ?
उत्तर :
बंगाल में सामयिक पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों का प्रकाशन आरम्भ हुआ। बंगाल के इस सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन के समय को ही नवजागरण काल कहा जाता है।

प्रश्न 43.
लार्ड विलियम बेंटिक कौन थे ?
उत्तर :
लार्ड विलियम बेंटिक भारत के गवर्नर-जनरल थे। वे भारत में आँग्ल-शिक्षा के समर्थक थे। लार्ड विलियम बेंटिक ने शिक्षा के माध्यम के प्रश्न को सुलझाने के लिए लार्ड मैकाले की सहायता की। अंग्रेजी शिक्षा का सूत्रपात करने का श्रेय लार्ड विलियम बेंटिक को प्राप्त है।

प्रश्न 44.
19 वीं सदी के बंगाल में नारी की सामाजिक स्थिति कैसी थी ?
उत्तर :
बंगाल में महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय थी। नारी को शिक्षा का अधिकार नहीं था। बाल विवाह, बहु विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों से समाज भरा पड़ा था। शिक्षा का अभाव होने के कारण महिलाओं की दशा द्यनीय हो गई थी।

प्रश्न 45.
राधाकांत देव कौन थे ?
उत्तर :
राधाकान्त देब 19 वीं सदी के समाज सुधारकों में से एक थे जिन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया था तथा नारी शिक्षा के संप्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

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प्रश्न 46.
आदि ब्रहम समाज के विभाजन के क्या कारण थे ?
उत्तर :
आदि ब्रह्म समाज के संस्थापक तथा उनके सहधर्मी प्रचारक विवाह की एक न्यूनतम आयु का प्रचार किया करते थे परन्तु 1878 ई० में स्वय केशवचन्द्र द्वारा अपनी पुत्री का 13 वर्ष की आयु में विवाह कर देने के कारण आदि ब्रह्म समाज के ही सहयोगी आनन्दमोहन बोस, द्वारिकानाथ गांगुली द्वारा तीब्र पतिवाद हुआ और वे लोग बह्म समाज से अलग होकर एक नये साधारण बह्म समाज की स्थापना कर लिये।

प्रश्न 47.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार क्यों करना चाहती थी ?
उत्तर :
वे चाहते थे कि भारत में अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से एक ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार हो, जो -रक्त और रंग से तो भारतीय हो किन्तु विचार और स्वभाव से अंग्रेज हो, जो समय आने पर अंग्रेजों का शुभचितंक और रक्षक सिद्ध हो सके। इसी उद्देश्य से ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार एवं प्रचार करना चाहती थी ।

प्रश्न 48.
औपनिवेशिक शासन के दौरान आदिवासी विद्रोह के दो कारण बताइए।
उत्तर :
(i) लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा लागू किया गया स्थाई भूमि बन्दोबस्त व्यवस्था के कारण संथालो की भूमि उनके हाथ से निकल गयी।
(ii) महाजनों द्वारा दिये गये कर्ज पर 50% से 500% सूद (ब्याज) वसूल किये जाने से संथाल किसानों की दरिद्रता बहुत बढ़ गयी थी। कर्ज न चुकाने के चलते उनके खेत, जानवर, घर सब छीन लिये जाते थे। इस तरह उन्हें गुलामी जैसा जीवनजीना पड़ रहा था।

प्रश्न 49.
नील दर्पण का अंग्रेजी अनुवाद किसने और किसके प्रयास से किया ?
उत्तर :
माइकेल मधुसूदन दत्त ने काली प्रसन्न सिंहा तथा गिरीश चन्द्र घोष के प्रोत्साहन पर इस पुस्तक का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया।

प्रश्न 50.
लार्ड मैकाले भारत में किस प्रकार की शिक्षा देना चाहते थे ?
उत्तर :
जो रक्त और रंग से भारतीय हो किन्तु बुद्धि, चरित्र, विचारधारा एवं रहन सहन से अंग्रेज हो, ऐसी शिक्षा देना घाहता था लार्ड मैकाले।

प्रश्न 51.
सामाजिक सुधार में ब्रह्म समाज की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
ब्रह्म समाज के अनुयायी मूर्ति-पूजा एवं अन्य आडम्बरों के विरोधी थे तथा वे प्रार्थना में विश्वास करते थें, वे उँचनीच नहीं मानते थे। वे सबको भाई मानते थे तथा समाज के लोगों की सेवा में विश्वास करते थें। इस तरह समाज सुधार में अपना योगदान दिया।

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प्रश्न 52.
भारत में अंग्रेजों द्वारा आधुनिक शिक्षा लागू करने के प्रमुख दो उद्देश्य क्या थे ?
उत्तर :
(i) भारतीयों को ईसाई बनाना
(ii) विचार और स्वभाव से भारतीयों को अंग्रेज बनाना।

प्रश्न 53.
क्यों ब्रिटिश सरकार ने 1878 ई० में धारावाहिक सोम प्रकाश के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया ?
उत्तर :
लार्ड लिटन के वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम के पारित हो जाने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पत्र का प्रकाशन बंद कर दिया गया, व्योंकि इस पत्रिका के माध्यम से अंग्रेजी शासन के विभिन्न जनस्वार्थ विरोधी नीतियों का विरोध किया जाता था तथा अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार किया जाता था। इसी कारण सोम प्रकाश के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगाया गया था।

प्रश्न 54.
“हन्टर कमीशन” के बारे में क्या जानते हैं ?
उत्तर :
1882 ई० में विलियम हण्टर की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग का उद्देश्य केवल प्रार्थमिक शिक्षा के विकास की कार्य समीक्षा प्रस्तुत कर सुझाव देना था, परन्तु इसने माध्यमिक शिक्षा के लिएकी कई सुझाव दिया था।

प्रश्न 55.
ब्रह्म समाज की स्थापना किस उद्देश्य से की गई थी ?
उत्तर :
बहल्न समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य समाज की कुरीतियों, सती प्रथा, बहुपल्ली प्रथा तथा जातिवाद का विरोध करना था।

प्रश्न 56.
‘इलर्बट बिल विवाद’ कब और किसने पेश किया ?
उत्तर :
सन् 1883 ई० में मिस्टर पी० सी० इल्बर्ट ने पेश किया था।

प्रश्न 57.
‘हुतोम पेंचार नक्शा’ किसकी रचना है इसकी विषय वस्तु क्या है ?
उत्तर :
हुतोम पेंचार नक्शा के रचनाकार काली प्रसन्ना सिंहा है। इस व्यंगात्मक पुस्तक के द्वारा लेखक ने उस समय के समाज में व्याप्त आडम्बरयुक धार्मिक त्योहार, ब्राह्मणवाद साहेब एवं बाबू जैसी परम्पराओं पर व्यग्य किया गया है।

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प्रश्न 58.
‘आनन्द मठ’ उपन्यास का मूल विषय क्या था ?
उत्तर :
‘आनन्द मठ’ उपन्यास का मूल विषय संयासी विद्रोह के द्वारा राष्ट्रीयता की भावना का संचार करना है।

प्रश्न 59.
भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा किसे कहा जाता है ?
उत्तर :
भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा वुड्स डिस्पैच को कहा जाता है क्योंकि इसने भारतीय शिक्षा पर एक व्यापक योजना प्रस्तुत की थी। इसी घोषणा के बाद भारत में आधुनिक शिक्षा का तेजी से प्रचार-प्रसार हुआ।

प्रश्न 60.
गदाधर चट्टोपाध्याय या गदई महाराज कौन थे ?
उत्तर :
रामकृष्ण परमहंस जी गदई महाराज के नाम से जाने जाते थे। इनका जन्म 18 फरवरी, 1836 ई० में बंगाल के हुगली जिले में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् इन्होंने दक्षिपेश्वर के काली मंदिर में पुरोहित का कार्य करना आरम्भ किया और अपने जीवन को माँ काली के चरणों में ही उत्सर्ग कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि इन्हें माँ काली के साक्षात् दर्शन हुए थे।

संक्षिप्त प्रश्नोत्तर (Brief Answer Type) : 4 MARKS

प्रश्न 1.
‘हूतोम पेंचार नवशा”‘ ग्रन्थ उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाली समाज का किस प्रकार का चित्र प्रस्तुत करता है ?
अथवा
काली प्रसन्न सिन्हा द्वारा रचित ‘हूतोम पेंचार नक्शा” में कलकत्ता के सामाजिक दशा का संक्षेप में चित्रण कीजिए।
उत्तर :
काली प्रसन्न सिन्हा बंगला साहित्य के एक प्रगतिशील लेखक थे। उन्होंने कलकत्ते की बोल-चाल की बंगला भाषा में ‘हुतोम पेंचार नवशा”‘ नामक व्यंग्यात्मक रचना प्रस्तुत की जिसमें उस समय के कलकतिया समाज का अच्छा चित्र प्रस्तुत किया गया है। जो निम्नवत् है –
(i) पुस्तक के प्रथम भाग में कलकत्ता के चरक पर्व, दूर्गापूजा, रथयात्रा, रामलीला आदि का सजीव चित्रण है।
(ii) उन्होंन कलकत्ता में एका-एक धनी हो गये नये बबबू समाज की छवि का चित्रण करते हुए लिखा है कि अंग्रेजी पढ़ा-लिखा लोग लाट साहब तथा लखनवी नवाब बन गये है।
(iii) काली पसन्न सिन्हा ने इस पुस्तक में कलकत्ता समाज के तीन वर्गों की झाँकी प्रस्तुत की है पहला वे लोग जो अंग्रेजी पढ़कर अंग्रेजी संस्कृति का अन्धानुकरण कर उसमें रच-बस गये थे और अपने ही समाज को उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे थे।
(iv) कलकत्ता में दूसरा वर्ग अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग अंग्रेजों का अनुकरण नहीं कर रहे थे।
(v) तीसरा वर्ग अंग्रेजी पढ़े-लिखे उन लोगों का था जो छल कपट जालसाजी एवं धोखे-बाजी से धन कमाने में लगे थे। जिनका चरित्र निन्दनीय था।
इस प्रकार उन्होंने ‘हुतोम पेंचार नक्शा’ पुस्तक में बदलते कलकतिया एवं बंगाली समाज के जन-जीवन की सजीव छवि प्रस्तुत की है।

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प्रश्न 2.
इस देश के चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज की क्या भूमिका धी ?
अथवा
19 वीं सदी में भारत में आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के प्रसार में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के योगदान का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
भारत में परम्परागत चिकित्सा के विपरीत आधुनिक और पाश्चात्य विकासोनमुखी चिकित्सा के पठन-पाठन को जारी रखने के लिए 1935 ई० में लार्ड विलियम बेटिंक तथा मोतीलाल के प्रयास से स्थापित हुआ। इसके योगदान को निम्नरूपों में देखा जा सकता है –
(i) कलकत्ता मेडिकल कॉलेज एशिया का दूसरा बड़ा यूरोपिय ढंग का कॉलेज था। यहाँ आधुनिक ढंग से यूरोपीय चिकित्सा की शिक्षा दी जाती थी। एम० जे० ब्रामिल शल्य चिकित्सा के सुपरिटेन्डेन्ट थे। इनके द्वारा छात्रों को चिर-फाड़ की शिक्षा दी जाती थी।

(ii) डॉ॰ मधुसूदन गुप्ता और इनके सहयोगियों द्वारा आधुनिक शल्य चिकित्सा दी जाती थी। इन्होंने उच्च व कुलीन परिवारों के बच्चों को शवों के न छूने की धारणा को बदला। इसका परिणाम हुआ की बड़ी संख्या में कुलीन परिवार तथा अन्य छात्र मेडिकल कॉलेज में प्रवेश करने लगे।

(iii) कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में सभी वर्ग एवं वर्ण के छात्रों का आसानी से दाखिला हो जाता था। कादम्बनी गाँगुली देश की पहली.आधुनिक ढंग की चिकित्सक थी। उसी तरह बहुत छात्र शिक्षा प्राप्त कर देश के विभिन्न भागों में आधुनिक चिकित्सा को बढ़ाया तथा भारत में चिकित्सा विद्यालय के विकास में नये युग की शुरूआत की थी। जिसपर आज का हमारा चिकित्सा विज्ञान व शिक्षा की नीव खड़ी है।

प्रश्न 3.
स्वामी विवेकानन्द के धार्मिक सुधारों के आदर्शों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
स्वामी विवेकानन्द के धार्मिक सुधारों के आदर्शों की व्याख्या : रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने अपने अल्पकाल के जीवन में ही धर्म के मर्म को समझा और उसके सत्य रूप की व्याख्या की ।नका कहना था कि बह्माण्ड की रचना किसी ईश्षर या बाहरी शक्ति ने नहीं की है, बल्कि यह मनुष्य स्वयंम के बौद्धिक शक्ति का कार्य है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म मे रहकर मानवीय कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। दूसरे धर्म की निन्दा-नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा किसी भी धर्म के अनुयायी को अपने धर्म त्यागने की जरुरत नहीं है।

प्रत्येक धर्म को अपनी स्वतन्त्रता और विशिष्टता को बनाये रखते हुए दूसरे धर्म के भावों को ग्रहण करते हुए उत्नत होना होगा। यही सच्चा धर्म है। उन्होंने भारत भ्रमण के समय सभी धर्मो, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, जैन के मूल को समझा और सभी धर्मों में उन्होंने एक ही शाश्वत तत्व मानव सेवा को देखा और उसको संग्रह कर उसी के अनुरूप धार्मिक आचरण की शिक्षा दी। उन्होंने धर्म में बाह्य आडम्बर की घोर निन्दा की है।

वे कहते थे – हमारे धर्म रसोई घर में है, पतीले में है, हमारे स्वभाव में है, मुझे मत छुओं मैं पवित्र हूँ। मैं उस धर्म में विश्धास नहीं कर सकता जो विधवा के आँसू नहीं पोछ सकते, किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकते। अपने गुरू के ‘सर्व धर्म समभाव’ के गुण को अपनाते हुए, सभी धर्म एवं सम्पदायों के बीच सद्भाव एवं समन्वय स्थापित करने, मानव सेवा को सर्वोपरी मानते हुए आदि अन्य धार्मिक विचारों को प्रचार-प्रसार के लिए ही कलकता के निकट बेलूर मठ की स्थापना की जो उनके तथा रामकृष्ण मिशन के सुधार कारों का केन्द्र बना।

उन्होंने संदेश दिया कीमानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड तथा अन्य धार्मिक विसंगतियों के खिलाफ संघर्ष किया और मानव की उन्नति के लिए ईमानदार कोशिशे की हैं। उनके यही धार्मिक सुधारों के आर्दश हमें धार्मिक सुधार व परिर्वतन के लिए प्रेरणा प्रदान करती हैं।

प्रश्न 4.
पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार में राजा राममोहन राय की भूमिका का वर्णन करो।
उत्तर :
पाश्चात्य शिक्षा के विकास में राजा राममोहन राय की भूमिका : भारत में पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार में भारत के आधुनिक पुरुष राजा राममोहन राय की भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी। राजा राममोहन राय अरबी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, लैटिन, यूनानो, हिबू इत्यादि भाषाओं के ज्ञाता थे। ये पश्चिम के आधुनिक देशों के उदारवादी, बुद्धिवादी सिद्धान्तों से बहुत प्रभावित थे । वे हिन्दू शिक्षा को यूरोपिय शिक्षा के वैज्ञानिक आदर्श पर संगठित करना चाहते थे ।

इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होने भूगोल, ज्योतिष शास्त, ज्यामिती और व्याकरण आदि विषयों पर बंगला में पाठ्य पुस्तकें लिखीं। उन्होंने सन् 1817 ई० में पाश्चात्य शिक्षा को अपना समर्थन देने के लिए डंविड हेयर की सहायता से कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की जो अब प्रेसीडेंसी कॉलेज के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार उन्होंने आधुनिक भारत में पाश्चात्य शिक्षा की नीव रखी, इसलिए इन्हें भारत का आधुनिक पुरुष कहा जाता है। राजा राम मोहन राय ने अंग्रेजी शिक्षा को बहुत आगे बढ़ाया तथा इसे बंगाल का एक प्रमुख अंग बनाया।

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प्रश्न 5.
बामबोधिनी पत्रिका ने किस प्रकार बंगाल में नारी शिक्षा को बढ़वा दिया ?
उत्तर :
बामबोधिनी पत्रिका का बंगाल में नारी शिक्षा के विकास में योगदान : बामबोधिनी पत्रिका बंगाल में कलकत्ता से बंगला भाषा में प्रकाशित होने वाली एक’ मासिक पत्रिका थी, जिसका प्रकाशन 1863 ई० में उमेशचन्द्र दत्त ने शुरु किया था।
‘इस पत्रिका के प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य बंगाल के घरों में कैद महिलाओं को शिक्षित करना और उनके अधिकारों को दिलाने का प्रयास करना था।”

बामबोधिनी पत्रिका का प्रकाशन महिला शिक्षा के विकास के लिए ही हुआ था। इस पत्रिका ने नारी शिक्षा और अधिकार से वंचित नारियों के अधिकारो को समाचारो में प्रकाशित किया। उन्हे शिक्षा देने के लिए कलकत्ता और ढाका में अनेकों महिला स्कूल-कालेज खोले गये। बेथून कालेज सहित 35 महिला विद्यालय की स्थापना में बामबोधिनी पत्रिका का विशेष योगदान रहा। इस पत्रिका ने समाज में महिलाओं की बदलती हुई भूमिका को महसूस किया, उनके उत्थान के लिए सरल भाषाओं में उनके अधिकारों की माँग को समाज के सामने उठाया जिससे बंगाल के धनी, प्रतिष्ठित लोगों ने उनकी दयनीय स्थिति को महसूस किया और उनके अधिकार दिलाने के लिए प्रयास शुरु किये।

जिनमें उमेशचन्द्र दत्त, वसन्त कुमार दत्त, सुकुमार दत्त, राधाकान्त देव, तारा कुमार ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। फलस्वरूप महिलाओं की स्थिति में बद्लाव आया जिसका गवाह खुद बामबोधिनी पत्रिका बनी। अत: कहा जा सकता है, कि सामाजिक बुराईयों से पीड़ित मूक महिलाओं की आवाज बनकर बामबोधिनी पत्रिका ने महिलाओं की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दशा में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस पत्रिका के प्रयास से ही स्त्रियां शिक्षा के प्रति जागरूक हुई और उनको अधिकार मिली।

प्रश्न 6.
मैकाले विवरण पत्र/मिनट पर सक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
मैकाले शिक्षा नीति : भारत की शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप निर्धारित करने को लेकर पाश्वात्य (अंग्रेजी) एवं प्राच्य (हिन्दी) वादियों के बीच विवाद उत्पन्न हो जाने के कारण उसे दूर करने के लिए तत्कालिन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेटिंक ने 1834 ई० में अपने कार्यकारिणी के एक सदस्य लार्ड मैकाले को लोक शिक्षा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया, और उसे इस समस्या को दूर करने के लिए सुधार व विवरण पत्र प्रस्तुत करने को कहा, लार्ड मैकाले ने 2 फरवरी 1835 ई० को अपना रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारत में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान पर आधारित शिक्षा देने की सिफारिश की।

उसे ही मैकाले का विवरण कहा जाता है। जिसे थोड़े -से हेर-फेर के बाद लार्ड विलियम बेटिंक ने स्वीकार कर पूरे देश में लागू कर लिया। उसी समय से देश के सभी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा कर दिया गया। तब से लेकर आज तक यह जारी है। इस प्रकार मैकाले और अंग्रेजी सरकार दोनों की आवश्यकताएँ पूरी हो गई। वे चाहते थे कि भारत में अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से एक ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार हो, जो -रक्त और रंग से तो भारतीय हो किन्तु विचार और स्वभाव से अंग्रेज हो, जो समय आने पर अंग्रेजों का शुभचितंक और रक्षक सिद्ध हो सके।

उनकी यह सोच 1857 ई० के विद्रोह के समय सत्य सिद्ध हुई, अंग्रेजी पढ़े- लिखें लोगों ने महान विद्रोह के समय भारतीयों का साथ न देकर अंग्रेजों का साथ दिया था। इस विवरण पत्र में मैकाले ने अंग्रेजों को दुनिया का सबसे सभ्य और बुद्धिमान जाति बताया था, तथा भारतीयों के लिए शिक्षा में शुद्धिकरण (education filtration) की नीति लागू की थी। मैकाले का मानना था कि जब उच्च वर्ग शिक्षित हो जायेगा, तो अन्य वर्ग अपने-आप शिक्षित हो जायेगें।

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प्रश्न 7.
वुड्स घोषणा पत्र से क्या समझते है ? भारतीय शिक्षा के विकास में इसके योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
वुड्स डिस्पैच का घोषणापत्र : बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के सभापति/ अध्यक्ष ‘चार्ल्स वुड’ ने 19 जुलाई 1854 ई० को भारतीय शिक्षा में सुधार के सम्बन्ध में तत्कालीन वायसराय लार्ड डलहौजी को जो विस्तृत याजना प्रस्तुत की ही उसे ‘वुड का घोषणपत्र’ कहा जाता है। इस घोषणापत्र में कुल (100) अनुच्छेद थे। भारत में पहली बार बहुत बड़े पैमाने पर शिक्षा में सुधार लाने की सुझाव और घोषणाए वुड डिस्पैच द्वारा की गयी थी। जिसके फलस्वरूप भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अनेकों सुधार हुए तथा स्कूल, कालेज एवं विश्रविद्यालय स्थापित हुए। इस कारण वुड-डिसैच का भारतीय शिक्षा ‘मैग्नाकार्ता’ कहा जाता है।

वुड्स डिस्पैच का भारतीय शिक्षा के विकास में योगदान :- चार्ल्स वुड ने अपने घोषणा पत्र मे भारतीय शिक्षा मे सुधार औ विकास के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव दिए थे :-

  1. सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए।
  2. सरकार की शिक्षा नीति पश्चिमी शिक्षा के प्रचार-प्रसार की होनी चाहिए।
  3. स्त्री शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा के विकास के लिए अलग-अलग स्कूल खोले जाने चाहिए।
  4. शिक्षा के विकास के लिए निजी क्षेत्रों को भी बढ़ावा देने के लिए सरकार को आर्थिक सहायता देनी चाहिए।
  5. गाँव में देशी भाषा के प्राथमिक स्कूल तथा जिला केन्द्रों में अंग्रेजी और देशी दोनो भाषाओं के स्कूल और कॉलेज खोले जाने चाहिए।
  6. लन्दन में oxford university (आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय) की तरह बम्बई, मद्रास और कलकत्ता में विश्चविद्यालय स्थापित किए जाए तथा उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा हो।
  7. ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रत्येक प्रान्तों में एक-एक डायरेक्टर की अध्यक्षता में शिक्षा विभाग की स्थापना की जाए। जो प्रतिवर्ष नियमित रूप से शिक्षा व्यवस्था की देखभाल करें। और प्रतिवर्ष सरकार को अपनी रिर्पोट प्रस्तुत करें।
  8. अध्यापको की ट्रेनिंग, नियुक्ति और वेतन की व्यवस्था सरकार स्वय करे।

इस प्रकार इस सिफारिश के बाद लार्ड डलहौजी ने 1855 ई० में एक अलग ‘लोक शिक्षा विभाग’ की स्थापना की और पूरी तरह से चार्ल्स के घोषणापत्र को लागू कर दिया। इसके बाद भारत मे उनकों स्कूल, कॉलेज, महिला कॉलेज, विश्वविद्यालय 1857 ई० [ कलकत्ता, बम्बई, मद्रास] कृषि विश्वविद्यालय [… कृषि विश्वविद्यालय बिहार ] इंजीनियरिंग कॉलेज खोले गए। इस कार्य में ईसाई मिशनरियों ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार चार्ल्स तुड की घोषणापत्र ने भारत में व्यवस्थित रुप से शिक्षा के विकास में अमूल्य योगदान दिया। जिसके दिखाये रास्ते के अनुसार आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था चल रही है।

प्रश्न 8.
नव बंगाल आंदोलन में देरोजियों के योगदान का वर्णन कीजिए।
अथवा
हेनरी लुई विवियन डेरोजियो पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर :
हेनरी लुई विवियन डेरोजियो बंगाल के एक महान समाज सुधारक थे जिन्होंने अपने माध्यम से बंगाल में कम समय में ही बिटिश विरोधी क्रांति को जन्म दिया था। उन्होंने भारतीय समाज में फैले बुराईयों, कुरूतियों तथा बाह्यआडम्बरों को नष्ट करने का आहवान किये। हेनरी डेरोजियो पुर्तगाली पिता तथा भारतीय माता के सन्तान थे। भारतीयता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। उनका जन्म सन् 1809 ई० में हुआ था। 1823 ई० में शिक्षा समाप्त कर वे भागलपुर के कोठी में क्लर्क बन गये। 1827 ई० में वे कलकत्ता लौट आये तथा पत्रकारिता और साहित्य रचना में रूचि लेने लेगे। उन्होंने ‘इण्डिया गजट’, ‘कलकत्ता लिटरेरी गजट’ तथा ‘बंगाल एनुअल’ जैसे कई पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन में भाग लिये । सन् 1828 ई० में देरोंजियों ने ‘फकीर ओंफ जंधीरा’ (Fakir of Janghira) नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना किये।

डेरोजियो के नेतृत्व में ‘यंग बंगाल’ (Young Bengal) नामक संस्था का गठन हुआ और इनके अनुयायी ‘युवा बंगाल’ कहलाए। इनके द्वारा चलाया गया आन्दोलन ‘यंग बंगाल आन्दोलन’ (Young Bengal Movement) कहलाया। ‘नव बंगाल’ के सदस्यों में कुछ इतने उप्र विचारों वाले थे जो जाति-पाँत, मूर्ति-पूजा, सती-प्रथा, स्त्रियों की उपेक्षा तथा छुआछूत की निन्दा ही नहीं करते थे, बल्कि हिन्दू धर्म का भी विरोध करते थे। सन् 1831 ई० में देरोजियो के आकस्मिक मृत्यु के बाद इनके शिष्य कृष्ण मोहन बनर्जी, राम गोषाल घोष, महेश चन्द्र घोष एवं दक्षिणारंजन मुखर्जी आद ने युवा बंगाल (Young Bengal) को आगे बढ़ाए।

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प्रश्न 9.
नारी शिक्षा के प्रसार में राजा राममोहन राय एवं विद्यासागर के योगदानों की समीक्षा करो।
उत्तर :
राजा राममोहन राय : राजा राम मोहन रॉय को भारत का आधुनिक पुरुष कहा जाता है। राजा राममोहन रॉय अरबी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, लैटिन, यूनानी, हिबू इत्यादि भाषाओं के ज्ञाता थे। ये पश्चिम के आधुनिक देशों के उदारवादी, बुद्धिवादी, सिद्धान्तों से बहुत प्रभावित थे। वे हिन्दू शिक्षा को यूरोपिय शिक्षा के वैज्ञानिक आदर्श पर संगठित करना चाहते थे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने भूगोल या ज्योतिष शास्त्र, ज्यामिती और व्याकरण आदि विषयों पर बंगला में पाठ्य पुस्तकें लिखीं। उन्होंने सन् 1817 में पाश्चात्य शिक्षा को अपना समर्थन देने के लिए डेविड हेयर की सहायता से कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की।

इस प्रकार उन्होंने आधुनिक भारत में पाश्चात्य शिक्षा की नींव रखा। इसके साथ ही उनकी सबसे बड़ी देन थी स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचारों से मुक्ति का संग्राम क्योंकि उन्हें सम्पत्ति का अधिकार नहीं था, शिक्षा पाने का कोई अधिकार नहीं था। पति के शव के साथ स्त्रियों को सती कर दिया जाता था था। अत:, 1819 ई० में उन्होंने महिलाओं की मुक्ति का आंदोलन छेड़ दिया। उनकी चेष्टा थी महिलाओं को सम्पत्ति में अधिकार मिलें, शिक्षा का अधिकार मिले और इस दिशा में उन्होंने अपना महत्वपूर्ण अवदान प्रस्तुत किया।

विद्यासागर : विद्यासागर के जीवन का संकल्प था शिक्षा-सुधार, शिक्षा का प्रचार तथा स्त्रियों के लिए हर प्रकार की सामाजिक स्वतंत्रता। स्त्री शिक्षा के प्रचार के लिए उन्होंने अत्यधिक कार्य किये। उन्होंने अनुभव किया था कि शिक्षा के बिना स्त्रियों की दशा में सुधार नहीं हो सकता। हिन्दू बलिका विद्यालय की स्थापना के लिए उन्होंने बेथून साहब की सहायता से बथथन कॉलेज की स्थापना की। बंगालियों के सामाजिक इतिहास में इसका काफी महत्व है।

शिक्षा निदेशक के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने बंगाल में अनेक बालिका विद्यालयों की स्थापना की। उन्होंने देशी शिक्षा के प्रसार के लिए सरकार को अधिकाधिक देशी विद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया। शिक्षा जगत में धार्मिक संर्कीणता को दूर करने के लिए संस्कृत कॉलेज में गैर-वाह्यण छात्रों को पढ़ने का अवसर दिया। बच्चों को आसानी से बंगला सीखने के लिए उन्होंने वर्ण परिचय, लघु सिद्धान्त कौमुदो, बोधोदय, कथा माला आदि पुस्तकों की रचना की। शिक्षा प्रसार तथा नारी उत्थान में विद्यासागर का यांगदान अविस्मरणीय है।

प्रश्न 10.
‘नील दर्पण’ नामक नाटक में व्यक्त नील की खेती करने वाले किसानों की व्यथा को अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
नील दर्पण के रचनाकार कौन थे ? इस पुस्तक की मुख्य विषय वस्तु क्या है ? यह पुस्तक किस प्रकार नील के खेती करने वाले किसानों को नील्हे गोरी, नीला व्यापारी के शोषण एवं अत्याचार से मुक्ति दिलाने का कार्य किया ?
उत्तर :
नोल दर्पण नाटक के रचनाकार दीन बन्धु मित्र थे, जिसका 1861 ई० में माइकेल मधुसूदन दत्त ने बंगला भाषा से अंग्रेजी में अनुवादन किया।
विषय वस्तु : नोल दर्पण नाटक की मूल विषय वस्तु नील की खेती करने वाले किसानों की दुर्दशा का चित्रण है।
नील दर्पण नाटक का योगदान : नील दर्पण नामक नाटक पुस्तक दीन-बन्धु मित्र द्वारा 1860 ई० में बंग्ला भाषा में लिखी गई एक उत्तम नाटक हैं। जिसमें ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत नील की खेती करने वाले बंगाल के किसानों पर अंग्रेज नील व्यापारी, जमींदारों, सेठ-महाजनों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक के कारण ही अंग्रेज नील व्यापारियों के शंषण का अमानवीय चेहरा देश-दुनिया के सामने उजागर हुआ। जिसके कारण बंगाल के शिक्षित वर्गों, हिन्दु-मुस्लिम वर्गों ने नील विद्रोह का समर्थन किया।

इस समर्थन का प्रभाव हुआ कि देश के प्रमुख समाचार पत्रों ने नील विद्राह के समर्थन में अभियान चलाया, इस कार्य में हरिषचन्द्र मुखर्जी द्वारा सम्पादित हिन्दू पौट्रियाट समाचार पत्र सबसे आगे रहा। इतना ही नहीं ईसाई मिशनिरियों ने भी इस आन्दोलन का समर्थन किया। इस प्रकार नील-दर्पण और समाचार पत्रों ने नील किसानों का समर्थन किया। इस प्रकार नील-दर्पण और समाचार पत्रों ने नील किसानों के समर्थन में व्यापक जनसमर्थन तैयार किया।

इस दबाव के चलते अंग्रेजी सरकार का व्यवहार इस्र आन्दोलन के प्रति काफी नरम और संतुलित रहा, इसी दबाव के चलते सरकार ने किसानों के शोषण के जाँच के लिए सेर्टनकर आयोग का गठन किया आयोग ने जाँच में किसानों के आरोप को सही पाया। फलस्वरूप तत्कालीन वायसराय लार्ड केनिंग ने किसानों को शीघ्र राहत देने के लिए ‘दादन प्रथा’ को समाप्त किया। जिससे किसानों को राहत मिली, इस प्रकार नील-दर्पण नाटक ने नील किसानों को नील-व्यापारियों से अत्याचार को छुटकारा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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प्रश्न 11.
19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में बंगाली समाज की दशा कैसी थी ? उसे संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
19वीं शताब्दी के बंगाली समाज की दशा : 19 वीं सदी में बंगाली समाज अनेकों प्रकार के सामाजिक, रीति-रीवाजों, धार्मिक कुसंस्कारों में जकड़ा हुआ था। इस कारण बंगाली समाज की दशा बहुत दयनीय हो गई थी। धर्म, जाति, सम्पदाय आदि के आधार पर समाज बँटा हुआ था। समाज में छुआ-छूत, ऊँच-नीच, सती प्रथा, बाल विवाह, कन्या भूण हत्या, बली प्रथा जैसी अनकों धार्मिक एवं सामाजिक प्रथाएँ प्रचलित थी, समाज में स्त्रियों की दशा शोचनीय थी। उन्हें घर के बाहर निकलकर शिक्षा ग्रहण करने की मनाही थी, केवल उच्च वर्ग की स्त्रियाँ घर पर पढ़ पाती थी।

समाज के सभी वर्ग के लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। शिक्षा पर जमीदारों एवं सामंतों का प्रभाव था। बंगाल के इसी सामाजिक पिछ्छड़पन का लाभ उठाकर ईसाई मिश्नरियों ने बंगाल में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से गणित-ज्ञान-विज्ञान शिक्षा के साथ-साथ ईसाई धर्म का भी प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया। इस कारण बंगाली समाज में विघटन और बिखराव हुआ। कुछ लोग पश्चिमी शिक्षा और ईसाई धर्म को अहण कर अंग्रेजी शासन का समर्थन करना शुरू कर दिये। इस तरह बंगाली समाज अंग्रेजी शासनकाल में विघटन, शोषण एवं अत्याचार का सामना करते हुये मुक्ति पाने के प्रयास में लगा रहा। ऐसी थी 19 वीं शताब्दी की बंगाल की सामाजिक दशा।

प्रश्न 12.
हिन्दू पैट्रियटट अपने समय की एक राष्ट्रवादी पत्रिका थी – स्पष्ट कीजिए।
अथवा
19 वीं शताब्दी के द्वितीयार्द्ध में बंगाल की विभिन्न समस्याओं को उजागर करने में हिन्दू पैट्रियॉट की क्या भूमिका थी ?
अथवा
कैसे कह सकते हैं कि हिन्दू-पैट्रियॉट राष्ट्रीय विचारों वाली पत्रिका थी ?
उत्तर :
हिन्दू पैट्रियॉट समाचार पत्र : हिन्दू पैट्रियॉट कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली एक अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र था। इसका प्रकाशन मधुसूदन राय ने 1853 ई० में शुरू किया था ! तथा हरीषचन्द्र मुखर्जी 1856 ई० में इसके प्रथम सम्पादक थे।

गिरिषचन्द्र घोष (1893-95 ई०) में हिन्दू पैट्रियॉट अपने समय की एक प्रमुख राष्ट्रवादी समाचार पत्र था। इस समाचार पत्र ने उस समय के प्रांत और देश में घटने वाली छोटी-बड़ी सभी घटनाओं जैसे क्रांतिकारी आन्दोलनों, किसान आन्दोलनों, सिपाही विद्रोह जैसी घटनाएँ प्रमुखता के साथ छपती थी। इस प्रकार देश में अंग्रेजों के शासन की अच्छी-बुरी खबरों को देश के जन-जन तक पहुँचाने और उनमें जागरूकता लाने में हिन्दू पैट्रियॉट समाचार पत्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

सबसे पहले इसी समाचार पत्र ने 1857 ई० की कान्ति के वीर लड़ाकों कुँवर सिंह, लम्बी बाई, तात्या तोपे की प्रशंसा की ता वहीं बूढ़े मुगल सम्माट बहादुरशाह के नेतृत्व की आलोचना की इसी पत्रिका ने नील की खेती करने वाले भारतीय किसानों पर नीलक व्यापारियों के शोषण के हक के अधिकार की बात को सामने लाया। इसी समाचारपत्र ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, इमीप्रेशन बिल, इल्बर्ट बिल का खुलकर या जमकर विरोध किया।

इस प्रकार इस पत्र ने उस समय की सभी ज्वलंत खबरों एवं समस्याओं को देशवासियों के सामने उजागर कर उनके अन्दर जागरूकता, संघर्ष करने की भावना और देश-प्रेम की भावना को जन्म दिया। अतः यह पूर्ण रूप से सही लगता है कि हिन्दू पैट्रियॉट पत्र भारत के राष्ट्रीय विचारों को व्यक्त करने वाला समाचार पन्न था। जिसने देश की आजादी के आन्दोलन को आगे बढ़ाने में बड़े हिम्मत के साथ काम किया अर्थात् योगदान दिया।

प्रश्न 13.
19 वीं सदी में बंगाल के सामाजिक सुधार आन्दोलन में तरूण या युवा बंगाल आन्दोलन के योगदान का वर्णन कीजिए ?
उत्तर :
युवा बंगाल आन्दोलन : 19 वी शताब्दी के बंगाली समाज में युवा बंगाल आन्दोलन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यंग बंगाल आन्दोलन के प्रवर्तक (जन्मदाता) हेनरी विवियन देरोजियो थे, वह हिन्दू कॉलेज के अंग्रेजी और इतिहास के शिक्षक थे और वे एक प्रगतिशील-विचारक थे। उन्होंने कॉलेज के युवाओं को स्वतंत्रता, समानता, सत्यता, प्रेम, सत्य की पूजा के लिए म्रेरित किया तथा बंगाली समाज में व्याप्त जाति-पाति, उँच-नीच, छुआ-छूत, सती प्रथा, बली प्रथा, बाल विवाह का विरोध किया तथा स्त्री शिक्षा का समर्थन किया।

उन्होंने अपने इन प्रगतिशील विचारों के लिए अनेक संगठनों, सभाओं, क्लबों की स्थापना की जिसमें एकेड़ी एसोसियेसन (Academic Association), बंग हित सभा, डिबेटिंग क्लब, युवा बंगाल नामक संगठन प्रमुख थे। डेरेजियो ने अपने विचारों को प्रचारित करने के लिये ईस्ट इण्डिया और इण्डिया गजट जैसे समाचार पत्रों की संपादन किया। उनके प्रगतिशील क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर बंगाल का युवा वर्ग उनका अनुयायी (शिष्य) बन गया, उनके शिष्यों को ही युवा बंगाल कहा जाता है। जैसे-जैसे बंगाल का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग देरेजियो के विचारों से जुटता गया वैसे-वैसे युवा बंगाल आन्दोलन जोर पकड़ता गया।

इस प्रकार बंगाली समाज में राजा राममोहन राय के बाद देरोजियों और उनका बंगाल आन्दोलन ऐसा कार्य था जिसने बंगाली समाज में व्याप्त धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक बुराइयों को दूर कर बंगाली समाज को प्रगति के पथ पर लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

1831 ई० में डेरेजियो की अचानक मृत्यु होने के बाद उनके शिष्य कृष्णमोहन बनर्जी, राम गोपाल घोष, महेशचन्द्र घोष एवं दक्षिणानंदन मुखर्जी ने उनके सुधार कार्यों, नारी शिक्षा, नारी अधिकार, प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक, जमीन्दारों के अत्याचारों पर रोक, मजदूरों की दशा में सुधार, सरकारी नौकरियों में भारतीयों की भागीदारी आदि विषयों को जोरदार ढंग से आगे बढ़ाने का प्रयास किया, किन्तु आपसी मतभेद के कारण उनके समर्थकों में मतभेद उत्पन्न हो गया फलस्वरूप आन्दोलन में बिखराव आ गया फिर भी यह आन्दोलन बंगाल की समाजिक परिस्थितियों के अलावा भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में भारत के नवयुवको को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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प्रश्न 14.
W.W. Hunter आयोग और सैडलर विश्वविद्यालय आयोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
W.W. Hunter आयोग : वुड डिस्यैच द्वारा भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की समीक्षा के लिए 1882 ई० में W.W. Hunter की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया। जिसका कार्य प्राथमिक शिक्षा के विकास के कार्यों की समीक्षा का सुझाव देना था। किन्तु आयोग ने प्राथमिक के साथ-साथ माध्यमिक तथा अन्य शिक्षा के क्षेत्रों में भी सुझाव दिया। आयोग ने सरकार को प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में विशेष सुधार और विस्तार पर ध्यान देने की बात कही।

प्राइमरी स्कूलों को ग्रामपंचायतों और नगरपालिकाओं के नियत्रण में रखने की बात कही। कॉलेजों से माध्यमिक स्कूलों को अलग करने और उन्हें विशेष आर्थिक सहायता देने पर जोर दिया। माध्यमिक शिक्षा को दो भागों में विभाजित कर शिक्षा देने के व्यवस्था कि सिफारिश की। कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में छात्रों के स्वरोजगार के लिए उन्हें व्यावसायिक शिक्षा देने पर जोर दिया। स्त्री शिक्षा के लिए अलग से स्कूल खोलने की सिफारिस की गयी।

इस प्रकार Hunter आयोग के सुझाव के बाद देश में माध्यमिक शिक्षा का तेजी से विकास हुआ। लगभग स्कूलों की संख्या दोगुनी हो गयी। तकनीकी कॉलेज भी 72 से 191 हो गये। किन्तु प्राथमिक शिक्षा के प्रति सरकार उदासीन बनी रही। इस कारण उसका समुचित विकास नहीं हो सका।

सैडलर विश्वविद्यालय आयोग : भारत में विश्चविद्यालय स्तर के शिक्षा में सुधार के लिए 1917 ई० में सरकार ने डॉ० एम० इ० सैडलर की अध्यक्षता में कलकत्ता विधविद्यालय की जाँचकर सुझाव देने के लिए आयोग गठित किया गया था। इस आयोग ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था का गहरा अध्ययन कर सुझाव दिया कि स्कूल की शिक्षा बारह वर्ष तक होनी चाहिए इसके बाद बी.ए/बी.काम./बी.एस.सी (B.A/B.com/B.Sc.) की 3 वर्ष का अनिवार्य पाठ्यक्रम होना चाहिए।

कलकत्ता विश्चविद्यालय के भार को कम करने के लिए ढाका में एक नयी विश्चविद्यालय की स्थापना करनी चाहिए, महिलाओं के शिक्षा के विकास के लिए अलग से महिला शिक्षा बोर्ड बनाना चाहिए, विश्धविद्यालय के नियम सरल होनी चाहिए। विश्चविद्यालयों में पूर्ण स्वाययत्त, आवासीय व्यवस्था का विकसित किया जाना चाहिए। विज्ञान एक तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए। इस सुझाव के बाद भारत में कुल सात नये विश्धविद्यालय (मैसूर, पटना, बनारस, ढाका, उस्मानिया, लखनऊ एवं अलीगढ़) की स्थापना हुई थी।

प्रश्न 15.
19 वीं सदी में बंगाल के सामाजिक जीवन में हिन्दू पैट्रियट एवं ग्रामवार्ता प्रकाशिका के अवदानों की समीक्षा करो।
उत्तर :
हिन्दू पैट्रियट : हरिशचन्द्र मुखर्जी के सम्पादन में हिन्दू पैट्रियट साम्राज्यवादी अन्याय के खिलाफ विद्रोह का मुख्यपत्र बन गया। 19 वीं शताब्दी के उत्तर्राद्ध में इसने नील की खेती करने वाले किसानों के ऊपर नीलहे साहबों के द्वारा किए गए अत्याचारों को सबके सामने उजागर किया। 1875 ई० में जब ‘जगदनदा मुखर्जी’ नामक एक अमीर बंगाली ने प्रिस ऑफ वेल्स को अपने निवास पर आमंत्रित किया तब हिन्दू पैट्रियोंट ने छापा कि इससे राष्ट्रवादी हितों का अपमान हुआ है।

कृष्ण दास पाल के सम्पादन में हिन्दू पैट्रियट ने प्रवासी विधेयक, स्वदेशी पत्र कानून और इल्बर्ट बिल इत्यादि विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। कृष्णदास पाल ने प्रवासी विधेयक का विरोध किया तथा इस विधेयक के माध्यम से चाय के बगानों में कार्य करने वाले श्रमिकों के ऊपर होने वाले अत्याचार को अनुचित बताया तथा इस पत्र ने प्रवासी विधेयक को भारत का गुलाम कानून कहा।

ग्रामवार्ता प्रकाशिका : 19 वी शताब्दी में प्रकाशित यह समाचार पत्र काफी महत्वपूर्ण था। इसका प्रथम प्रकाशन अप्रैल 1863 ई० में हुआ। इसके संपादक हरिनाथ मजुमदार थे। जून-जुलाई 1864 ई० तक यह द्विसाप्ताहिक एवं अपैलमई 1871 में साप्ताहिक पत्र हो गया था। आरंभ में यह समाचार-पत्र कलकत्ता के गिरिश विधाराना प्रेस में छपता था। 1864 ई० में यह सामाचार पत्र कुमारखाली के माथुरनाथ प्रेस से छपने लगा। 1873 ई० में कुमारखाली प्रेस माधुरनाथ मोइत्रा के द्वारा हरिनाथ जी को दान दे दिया गया।

इस पत्र में मुख्य रूप से साहित्य, दर्शन एवं विज्ञान के लेख छपते थे। प्रसिद्ध बंगाली विद्वान इस पत्र में अपने लेख लिखते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर के दर्शन, विज्ञान एवं साहित्य के लेख एवं उनकी कविताएँ इस पत्र में छपी थी। प्रसिद्ध मुस्लिम लेखक मीर मोशार्रफ हुसैन तथा प्रसिद्ध लेखक एवं पत्रकार जलधर सेन ने अपने साहित्यिक जीवन का आरम्भ इसी पत्र में काम करके किया था।

हरिनाथ जी ने 18 वर्षों तक इस पत्र का संपादन किया तथा सामाजिक कुरीतियों एवं राजनीतिक खामियों को उजागर किया। इस पत्र के द्वारा जबरन नील की खेती कराने वाले अंग्रेजों पर उन्होंने जोरदार प्रहार किया था।

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प्रश्न 16.
भारत में पाश्चात्य शिक्षा के संप्रसारण का वर्णन करो।
उत्तर :
अंग्रेजी शिक्षा : मैकॉले की शिक्षा पद्धति विप्रवेशन सिद्धान्त या अधोमुखी निस्यन्दन सिद्धांत पर आधारित था। इस सिद्धान्त में माना जाता है कि यदि उच्च वर्ग के कुछ लोगों को शिक्षित कर दिया जाए तो वे मध्यम वर्ग के और अधिक लोगों को शिक्षित करेंगे एवं फिर ये शिक्षित लोग निम्न वर्ग के काफी लोगों को शिक्षित करेंगे। परन्तु भारत में यह प्रयास पूर्णत: सफल नहीं हो सका। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के विकास का दूसरा चरण लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में शुरू हुआ।

इसके पूर्व 1835 ई० में लोक शिक्षा समिति 20 विद्यालयों को चला रही थी। 1837 ई० में इनकी संख्या बढ़कर 48 हो गई। लाई्ड ऑकलैण्ड ने बंगाल को 9 भागों में विभक्त किया और प्रायः प्रत्येक जिले में विद्यालय स्थापित किए। 1840 ई० तक इस प्रकार के 40 विद्यालय थे। 1835 ई० में कलकता मेडिकल कॉलेज की नीव लार्ड विलियम बेंटिक के समय में पड़ी। 1854 ई० में लार्ड डलहौजी ने 33 प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की। 1851 ई० में पूना संस्कृत कॉलेज और अंग्रेजी स्कूल को मिलाकर पूना कॉलेज बनाया गया। 1854 ई० में बम्बई में मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। 1852 ई० में सेंट जान्स कॉलेज की स्थापना की गई।

इस योजना के तहत भारत में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से उच्च शिक्षा दिए जाने पर बल दिया गया साथ ही साथ देशी भाषा के विकास को महत्व दिया गया। लन्दन विश्वविद्यालय के आधार पर कलकता, बम्बई एवं मद्रास में तीनविश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। इस घोषणा में तकनीकी एवं व्यावसायिक विश्वविद्यालय की स्थापना पर भी बल दिया गया।

प्रश्न 17.
भारत में पाश्चात्य शिक्षा के दोष एवं कमियाँ क्या थी ?
उत्तर :
1813 ई० के चार्टर में इस बात की व्यवस्था की गई थी कि भारत में शिक्षा पर कम्पनी 1 लाख रुपये वार्षिक खर्च करे, लेकिन 20 वर्ष तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। 1833 ई० में चार्टर में एक बार फिर संसद ने कम्पनी को यह निर्देश दिया कि वह एक लाख रुपये वार्षिक की रकम भारत में शिक्षा पर खर्च करे। अब कम्पनी इस निर्देश की अवहेलना करने की स्थिति में नहीं थी। इसी चार्टर के मद्देनजर एक समिति का निर्माण किया गया, जो लोक शिक्षा की सामान्य समिति के नाम से जानी जाती है। इस समिति में 10 सदस्य शामिल थे, जिसमें सपरिषद् गवर्नर जनरल भी शामिल था।

इस समिति के गठन के साथ ही भारत में विचारधारा के आधार पर इस समिति के 10 सदस्यों में दो दल बन गए थे। एक दल ‘भारतीय शिक्षा पद्धति’ और भारतीय भाषाओं की वकालत कर रहा था, जबकि दूसरा दल ब्रिटिश भाषा की वकालत कर रहा था। पहला दल प्राच्यवादी के नाम से जाना जाता है। इस विचारधारा के समर्थक एच० टी० प्रिसेप एवं एच० एच० विल्सन थे। इन्होंने हिन्दूओं एवं मुस्लिमों के पुराने साहित्य के पुनरुत्थान को अधिक महत्व दिया। दूसरा दल आग्लवादी के नाम से जाने जाते थे। इस पाश्चात्य या आग्ल शिक्षा के समर्थकों का नेतृत्व मुनरो एवं एल्फिस्टन ने किया, जिसका समर्थन मैकाले ने भी किया।

मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा की वकालत करते हुए 1835 ई० में एक पत्र जारी किया जो मैकाले स्मरण पत्र के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी शिक्षा के समर्थन में शिक्षित भारतीयों का एक वर्ग भी सामन आया जिसका नेतृत्व राजा राममोहन राय कर रहे थे। अन्तत: वायसराय लॉर्ड विलियम बेंटिक ने एक प्रस्ताव के द्वारा मैकाले के दृष्टिकोण को अपना लिया। इस प्रकार प्राच्य और पाश्चात्य शिक्षा के बीच उत्पत्न गतिरोध समाप्त हो गया तथा अंग्रेजी भाषा भारतीयों के लिए शिक्षा व्यवस्था का आधार बना।

प्रश्न 18.
19 वीं सदी में साहित्य एवं समाचार-पत्रों ने समाज को किस प्रकार प्रभावित किया ?
उत्तर :
साहित्य : भारतीय साहित्यिक कृतियों में सर्वप्रमुख स्थान ‘आनन्दमठ’ कृति की है, जिसने भारत में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता के विकास को जन्म दिया अर्थात राष्ट्र के प्रति हमेशा अग्रसर रहा। इसकी रचना बंकिम चन्द्र चटर्जी या चट्टोपाध्याय ने 1882 ई० में किया। इस कृति की रचना बंगला भाषा में किया गया था। 18 वी शताब्दी के संन्यासी विद्रोह का वर्णन भी इस उपन्यास में किया गया है। भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्देमातरम’ (Vande Matram) इसी उपन्यास से लिया गया है, जो स्वतन्त्रता आन्दोलन का शहीद मंत्र बन गया था।

भारतीय राष्ट्रीयता के विकास में ‘वर्तमान भारत’ की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 19 वीं सदी में भारतीय लोगों को जागृत करने तथा उनमें देश-प्रेम और देश-भक्ति को जगाने में ‘वर्तमान भारत’ ने अहम भूमिका निभाई। इस अनमोल कृति की रचना ‘स्वामी विवेकानन्द जी’ ने सन् 1905 ई० में किया। इस पुस्तक का उद्देश्य भारत में राष्ट्रीयता का संचार यानि विकास करना तथा देशवासियों के भीतर देशप्रेम और देश-भक्ति की भावना को जागृत करना था।

समाचार-पत्र : आधुनिक भारत के इतिहास को विश्लेषित करने में तत्कालीन झ्रमाचार-पत्र एवं पत्रिकायें काफी मददगार साबित होते हैं। 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में भारत में बहुत बड़े पैमाने पर समाचार-पत्रों का प्रकाशन हुआ जिनसे हमें इतिहास के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती है। इस काल के कुछ प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इण्डिया, स्टेट्समैन, मद्रास मेल, पायोनियर, सिविल एण्ड मिलेटरी गजट (सभी अंग्रेजी) ; अमृत बाजार पत्रिका, बंगवासी, सोमप्रकाश, बंगदर्शन (सभी बंगला) ; केसरी मराठी ; कवि वचन सुधा, प्रदीप, हरिजन, उदन्त मार्तदण्ड (हिन्दी) ; अल हिलाल, अल बिलाल, हमदर्द (उर्दू) एवं गदर (पंजाबी) इत्यादि थे। ये सभी समाज एवं राष्ट्र की उन्नति में अपना अमूल योगदान दिया ।

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प्रश्न 19.
19 वीं सदी के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में रामकृष्ण परमहंस की भूमिकाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
रामकृष्ण परमहंस की भूमिका : भारतीय संस्कृति तथा आध्यात्म के प्रति पूर्ण आस्था रखते हुए भी श्री रामकृष्ण परमहंस सभी धर्मों की सत्यता पर विश्वास करते थे। सभी प्रकार की धार्मिक साधनाओं में वे उसी ईश्वर को पाते थे जिसकी तरफ सभी कदम बढ़ाते रहे हैं। यद्यपि सबके मार्ग अलग-अलग हैं। एक मुसलमान सूफी से उन्होंने मुस्लिमसाधना की दीक्षा ली और ईसाई पादरी से पढ़वा कर बाइबल सुनते रहे । वे सिक्ख गुरूओ को आदर की दृष्टि से देखते रहे और समाधि की अवस्था में माँ काली तथा कृष्ण के अतिरिक्त ईसामसीह और बुद्ध के भी दर्शन करते रहे।

रामकृष्ण काली के अनन्य उपासक थे। वे गुरू भक्त थे। वे हिन्दू धर्म के रक्षक थे। यद्यपि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा नहीं मिली, तथापि वे नवीन पश्चिमी विचारों से अवगत थे। वे ईसाई और इस्लाम धर्म से भी प्रभावित थे। उनका मानना था कि सभी धर्मों में एक ही ईश्वर का वास है। अत: आदमी को चाहिए कि वह जिस धर्म में पैदा हुआ है उसी को माने। रामकृष्ण विश्वजनीन धर्म के समर्थक थे। वे सुलह-ए-कुल के पक्षधर थे।

यही कारण है कि उनके शिष्य विभिन्न धर्मों के अनुयायी थे। उनके शिष्य उन्हें ईश्वर तुल्य समझते थे। रामकृष्ण को न तो संस्कृत और न ही अंग्रेजी भाषा का ज्ञान था, वे बंगला के भी पंडित नहीं थे किन्तु वे सभी से अच्छी तरह बात-चीत कर लेते थे। उनकी यह उक्ति पाहम, नाहम: तू ही, तू ही अत्यंत ही प्रसिद्ध है जो उनके धार्मिक उपदेश का सार है। इसका सरल अर्थ है, वे (परमहंस) कुछ नहीं हैं। वे कोई औपचारिक गुरू न थे, वे कहते थे, मैं किसी का भी गुरू नहीं हूँ। मैं हर आदमी का शागिर्द हूँ।” 15 मार्च 1866 ई० को रामकृष्ण परमहंस जी का देहांत हो गया।

उनके लिए मानव-सेवा ही ईश्वर सेवा था। रामकृष्ण परमहंस के महान व्यक्तित्व तथा सरल और आदर्शपूर्ण जीवन का लोगों के ऊपर व्यापक प्रभाव पड़ा। उनके उपदेशों से लोगों में धार्मिक कट्टरता तथा सामाजिक रूढ़ियों के प्रति अरूचि उत्पन्न हुई तथा साम्र्रदायिक भावना का हास हुआ। इनके इन्हीं सर्व धर्म समभाव के सिद्धान्तों को दूर-दूर तक फैलाने के लिए उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने अथक प्रयत्न किया तथा बेलूर में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

प्रश्न 20.
विधवा पुनर्विवाह पर संक्षिप्त निबंध लिखे।
उत्तर :
18 वीं शताब्दी के भारतीय समाज में विशेष रूप से उच्च जातीय हिन्दूओं में विधवा विवाह की अनुमति नहीं थी। 1829 ई० में सती-प्रथा निषेध कानून पास हो जाने तथा विधवा-विवाह का प्रचलन न होने के कारण हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई थी, अन्ततः ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जैसे उदार एवं विद्वान भारतीय के अथक प्रयासों के परिणाम स्वरूप गर्वनर जनरल लार्ड डलडौसी की कौसिल के सदस्य जे० पी० ग्रांट ने एक बिल प्रस्तुत किया जो 13 जुलाई, 1856 ई० को विधवा पुनर्विवाह अधिनियम के नाम से पास कर दिया गया।

दक्षिण भारत में वीरसालिंगन पंतलू और पश्चिमी भारत में महादेव गोविन्द नाराडे, प्रोफेसर डी० के० कर्बे, आर० जी० भंडारकर और बी० एम० मालाबारी जैसे समाज सुधारकों ने विधवा पुनर्विवाह के कार्य को आगे बढ़ाया। प्रोफेसर कर्वे ने विधुर होने पर 1893 ई० में स्वय एक बाहाण विधवा से विवाह कर समाज के सामने आर्दश प्रस्तुत कर विधवा विवाह को बढ़ावा देने का सराहनीय कार्य किया।

प्रश्न 21.
विजय कृष्ण गोस्वामी पर एक टिष्पणी लिखें।
उत्तर :
विजय कृष्ण गोस्वामी बंगाल के एक प्रमुख धर्म सुधारक एवं समाज सुधारक थे। इन्हें चैतन्य महाप्रभु का अवतार कहा जाता था। ये वैष्णवाद सिद्धान्त के प्रवर्त्तक माने जाते थे। इनका जन्म 2 अगस्त, 1841 ई० को नदिया जिले के शांतिपुर नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम आनन्द किशोर गोस्वामी था, जो एक महान भक्त थे। देवेन्द्रनाथ टैगोर से प्रभावित होकर इन्होंने ‘ब्रह्म समाज’ की सदस्यता स्वीकार किया था। उन्होंने भारत भ्रमण कर ब्रहा समाज के सिद्धान्तों का प्रचार भी किया था। परम सत्य की खोज में उन्होंने ‘ब्यह्मानन्द परमहंस’ को अपना गुरू बनाया और परम सत्य की प्राप्ति के लिए लोगों में प्रचार प्रसार करने लगे।

विजय कृष्ण गोस्वामी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा शान्तिपुर के गोविन्द स्वामी से ली बाद में 1859 ई० में वे कोलकाता आए और संस्कृत कॉलेज में भर्ती हो गये। इन्होंने औषधियों का भी गहरा अध्ययन किया। वे 1863 ई० में पूर्वी बंगाल में आये तथा केश्वचन्द्र सेन के साथ कुछ समय के लिए ढाका में काम किया।

उन्होंने शान्तिपुर एवं मैमनसिंह में ब्रहम मन्दिरों की स्थापना की। नारी शिक्षा के विकास में उनकी विशेष रूचि थी। उन्होंने जगन्नाथ पुरी धाम में अपने शरीर को त्याग दिया। उनकी समाधि आज भी ‘जातीय बाबर आश्रम’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनकी मृत्यु सन् 1899 ई०’ में हुआ था। इन्होंने ‘श्रीश्री सदगुरूसंग’ (Sri-Sri Sadguru Sangh) नामक पुस्तक भी लिखे थे।

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प्रश्न 22.
सती प्रथा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। –
उत्तर :
सती प्रथा हिन्दू समाज में बहुत प्राचीन काल से चली आ रही थी। इस प्रथा के अनुसार हिन्दू स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ चिता में जलकर भस्म हो जाती थी। कालान्तर में यह एक धार्मिक-कर्तव्य सा बना गया। यह प्रथा उच्च वर्ग के लोगों में ही पाई जाती थी। निम्न-वर्ग के लोग इसके शिकार नहीं बने थे। जो स्त्रियाँ सती नहीं होना चाहती थी, उनके साथ कभी-कभी ज्यादती भी की जाती थी और समाज में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। यह प्रथा अत्यंत ही भयावह और हृदय विदारक बन गई।

इसे दूर करने के लिए प्रयास किये जा रहे थे। बंगाल में सती प्रथा ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। राजा राममोहन राय ने इस प्रथा के विरुद्ध बड़ा जोरदार आंदोलन चलाया। समाज सुधार के क्षेत्र में राजा राम मोहन राय ने हिन्दू-समाज को मूढ़ता और कुरीतियों से मुक्त कराने का संघर्ष आरंभ किया। उनकी सबसे बड़ी देन स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचारों से मुक्त संग्राम था। स्त्रियों के प्रति होनेवाले दुर्व्यवहार की कोई सीमा न थी।

उन्हें संपत्ति पर अधिकार नहीं था। वे या तो आजीवन विधवा जीवन बिताये या पति की चिता में जल मरे। शिक्षा पाने का उन्हें कोई अधिकार न था। घर की दीवारों में कैद, आश्रित और अधम समझी जाने वाली नारी जाति पशुओं की भांति पूरी तरह पुरुष समाज के नियंत्रण में थी 1 पति को अनेक पत्नियाँ रखने का अधिकार था, अतः बहु विवाह की पीड़ा भी स्त्रियों को झेलनी पड़ती थी। राजा राममोहन राय ने 1819 ई० से स्त्रियों की मुक्ति का आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने सती-प्रथा के विरुद्ध जनमत को जगाना आरंभ किया।

कलकत्ता के श्मशान घाटों पर जा-जा कर वे लोगों को सती दाह से रोकने का प्रयत्न करने लगे। उनकी प्रेरणा और प्रार्थना पर गवर्नर जनरल बेंटिक ने सती-प्रथा विरोधी कानून घोषित किया और जब पुरातनपंथियों ने उसका विरोध किया तब राजा राम मोहन राय ने भी अनेक शिक्षित हिंन्दुओ को कानून के पक्ष में प्रस्तुत किया। 1829 ई० में सती प्रथा के विरुद्ध नियम पास कर दिया गया। 1833 ई० में सती प्रथा गेर-कानूनी घोषित कर दिया गया और यह बताया गया कि सती प्रथा को प्रोत्साहित करने वालों को दोषी मान कर उन्हें प्राण दण्ड की सजा दिया जा सकता है।

प्रश्न 23.
स्वामी विवेकानन्द के नव्य वेदान्त के विचारो का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
जैसा कि ऊपर कहा गया है, स्वामी विवेकानन्द ने भारत के जन-समुदाय की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को निकट से देखा तथा समझा था। इस जानकारी की पृष्ठभूमि में ही उनकी दार्शनिक चिन्तन का उद्भव हुआ था। उन्होंने देखा था कि समाज की कुछ कुरीतियाँ समाज में फैले अंधविश्वास एवं अवौद्धिक रूढ़िवाद के कारण उत्पन्न हुई है। इसका मूल कारण लोगों में आध्यात्मिक जागरुकता का अभाव था।

वे आध्यात्मिकता के अंशों को समझने-परखने का प्रयास किया तथा ऐसी विचार-धाराओं को मान्यता दी जिनमें अध्यात्मिक मूल्यों को प्राथमिकता दी गयी थी। इसके लिए उन्होंने वेदों एवं उपनिषदों के ज्ञान को सरल भाषा में व्याख्या की, उनकी यही व्याख्या या भाष्य नव वेदान्त कहलाता है । उनके विचारों पर सबसे गहरा प्रभाव प्राचीन भारतीय दर्शन, विशेषत: वेदान्त दर्शन का है। ऐसा कहा जाता है कि स्वामी विवेकानन्द अपने ढंग के वेदान्ती हैं। उनके अपने दार्शनिक विचारों का मूल प्राचीन भारतीय शास्त्रों मूलतः उपनिषदों तथा वेदान्त-दर्शन था।

उदाहरणतः उनके विचारों का केन्द्रीय अंश जहाँ वे सत्य को पूर्णतः सर्ववादी रूप से स्वीकारते हैं । वेदान्त पर ही आधारित प्रतीत होता है। वे भी विश्व में परिलक्षित कुछ विधरोधाभासों एवं व्याघातों की व्याख्या करने में पारमार्थिक दृष्टि तथा व्यवहारिक दृष्टि में अन्तर करते हैं। फिर भी यह तो स्वीकारना है कि उनके विचारों पर प्रमुख प्रभाव प्राचीन भारतीय दर्शन का है तथा उसमें भी सर्वप्रमुख प्रभाव वेदान्त-दर्शन का है। उन्होंने कहा की व्यक्ति का अन्तःसुरण ही धर्म है। एक व्यक्ति को देवी प्रेरणा मिली है तो प्रत्येक व्यक्ति को मिलने की सम्भावना है । यही धर्म है और स्वामी जी की नव वेदान्ता का मूल मंत्र है ।

प्रश्न 24.
क्रह्म समाज पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
ब्रह्म समाज :- इस समाज की स्थापना 1828 ई० में राजा राममोहन राय के द्वारा की गयी थी। राज राममोहन राय इस संस्था के द्वारा भारतीय संस्कृति का शुद्धिकरण करना चाहते थे। वे उन सब लोगों को प्रत्येक शनीवार के दिन एकत्रित करते थे जो ईश्वर में विश्वास रखते थे किन्तु मूर्ति पूजा के विरोधी थे। राममोहन राय की सन् 1833 में मृत्यु हो जाने के बाद देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने 1842 के बाद बहम समाज के प्रचार-प्रसार का उत्तरदायित्व ग्रहण किया था। देवेन्द्र नाथ ठाकुर भी राजा राममोहन के समान वेदों और उपनिषदों में विश्वास रखते थे।

ब्रह्म समाज का सिद्धान्त :- ब्रह्य समाज के सिद्धान्त सरल एवं सर्वमान्य थे। इनमें सभी धर्मों के सराहनीय तत्वों को सम्मिलित कर लिया गया था।
(i) ब्रह्म समाज का सर्वाधिक महत्तपूर्ण सिद्धान्त एकेश्वरवाद का सिद्धान्त था। बह्म समाजी एक बह्म अथवा ईश्वर को मानते थे और केवल उनकी उपासना में ही विश्वास रखते थे।
(ii) बह्म समाज के अनुयायी मूर्ति-पूजा एवं अन्य बाह्य आडंबरों के विरोधी थे। वे प्रार्थना में विश्वास करते थे उनकी प्रार्थना प्रेम तथा सत्य पर आधारित थी।
(iii) ब्रह्न समाज के अनुयायी जाति-पाँति तथा ऊँच-नीच के भेदभावों में विश्वास नहीं करते थे, उनकी दृष्टि से सभी मानव भाई-भाई थे।
(iv) बह्म समाजी सत्य के अन्वेषक थे और सभी धर्मों से सत्य ग्रहण करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे
(v) ब्रह्म समाजी सभी धरों की मौलिक एकता में विश्वास करते थे और जीवन में नैतिक गुणों के विकास पर बल देते थे। राजा राम मोहन राय ने 1828 ई० से 1830 ई० तक ब्रह्म समाज का नेतृत्व किया। इसकी स्थापना से लगभग दो वर्ष पश्चात वे इंग्लैण्ड चले गए और वही 27 सितम्बर 1833 ई० को उनका देहावासन हो गया।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 2 सुधार, विशेषताएँ एवं निरीक्षण

प्रश्न 25.
श्री रामकृष्ण परमहंस के सर्व धर्म समभाव पर अपना विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी, 1836 ई० में बंगाल के हुगली जिले में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर चटर्जी था। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् इन्होंने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुरोहित का कार्य करना आरम्भ किया और अपने जीवन को माँ काली के चरणों में ही उत्सर्ग कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि इन्हें माँ काली के साक्षात् दर्शन हुए थे।

रामकृष्ण परमहंस भारतीय संस्कृति तथा अध्यात्म में पूरी आस्था रखते थे। इन्होंने सर्व धर्म समन्वय की बात कही। इनकी विश्वास सभी धर्मों की सत्यता में था। वे सभी धर्मो का आदर करते थें। उनके अनुसार राम, कृष्ण, हरि, ईसा, अल्लाह सब एक ईश्वर के ही विभिन्न नाम हैं। वे धार्मिक वाद-विवादों में किसी प्रकार का विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि सभी धर्मों में एक ही समान बाते लिखी हुई हैं। उनका कहना था कि, “धर्म को लेकर हमें वाद-विवाद नहीं करना चाहिए।

सभी धर्म एक ही है।” जैसे सारी नदियाँ समुद्र की ओर जाती है, तुम भी उसी तरफ बहो और दूसरों को भी बहने दो। विभिन्न धर्म के लोगों के बीच होने वाले धार्मिक वाद-विवाद के सम्बन्ध में उनका कहना था कि-धार्मिक वाद-विवाद निरर्थक है। शून्य पात्र में जल भरते समय आवाज होती है परन्तु जब घड़ा भर जाता है, तब कोई आवाज सुनाई नहीं देती। जिस मनुष्य ने भगवान को नहीं पाया है वह केवल भगवान की सत्ता और प्रयोजन को लेकर निरर्थक तर्क करता है परन्तु जिसने ईश्वर को पा लिया है वह मौन रहकर दिव्य आनन्द का भोग करता है तथा सर्व धर्म समन्वय में विश्वास रखता है।

प्रश्न 26.
19 वीं शताब्दी के इतिहास में बंगला साहित्य की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
संस्कृत के नवीन अध्ययन तथा अंग्रेजी के प्रसार से बंगाल के लेखकों में 19 वीं सदी में लहर दौड़ गई। कम्पनी के सरकारी कर्मचारी बंगला सीखने वाले अंग्रेजों के लिये पुस्तकें तैयार करवा रहे थे तथा चर्च के पादरी कृतिवासीय का प्रकाशन और बाइबिल का बंगला अनुवाद करने में लगे हुए थे। बंगाली पत्रकारिता की भी नीव 19 वीं शताब्दी में हो पड़ी। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के जन-समुदाय की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को निकट से देखा तथा समझा था। इस जानकारी की पृष्ठभूमि में ही उनकी दार्शनिक चिन्तन का उद्धव है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप में देखा था कि समाज की कुछ कुरीतियाँ समाज में फैले अंधविश्वास एवं अवौद्धिक रूढ़िवाद के कारण उत्पन्न है। उन्हें प्रतीत हुआ कि इसका मूल कारण यही था कि लोगों में आध्यात्मिक जागरण अनिवार्य है। जहाँ आध्यात्मिकता के अंशों को समझने-परखने का प्रयास किया तथा ऐसी विचार-धाराओं को मान्यता दी जिनमें आध्यात्मिक मूल्यों को प्राथमिकता दी गयी थी । वे विश्व में परिलक्षित कुछ विधरोधाभासीं एवं व्यायातों की व्याख्या करने में पारमार्थिक दृष्टि तथा व्यवहारिक दृष्टि में अन्तर करते हैं। फिर भी यह तो स्वीकारना है कि उनके विचारों पर प्रमुख प्रभाव प्राचीन भारतीय दर्शन का है तथा उसमें भी सर्वप्रमुख प्रभाव वेदान्त-दर्शन का है।

राजा राम मोहन राय ने अपने धार्मिक और सामाजिक विचारों को धरती पर उतारने के लिए 20 अगस्त 1828 को ब्रह्म समाज का गठन किया। इस प्रक्रिया का परिणाम 1830 में एक चर्च की स्थापना के रूप में निकला और ब्रह समाज आंदोलन शुरू हुआ, जो लम्बे समय तक बंगाली समाज की चेतना को प्रभावित करता रहा।

1818 से 1829 के बीच राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा जैसी बुराई पर आक्रमण करते हुए तीन रचनायें प्रकाशित की स सती प्रथा के खिलाफ जनमत बनाने और अंग्रेजों को उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव डालने का श्रेय उनके प्रयासों को ही दिया जाता है। राजा राम मोहन राय ने आधुनिक शिक्षा और विशेष तौर से ख्वी शिक्षा के प्रसार में अगुआ की भूमिका निभाया, उन्हें बंगला गद्य का निर्माता भी कहा जाता है।

प्रश्न 27.
बामबोधिनी पत्रिका ने किस प्रकार नारी शिक्षा एवं महिलाओं की दशा को सुधारने में योगदान दिया? उसका संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर :
बामबोधिनी पत्रिका का प्रकाशन महिला शिक्षा के विकास के लिए ही हुआ था। इस पत्रिका ने नारी शिक्षा और अधिकार से वंचित नारियों के अधिकारो को समाचारो में प्रकाशित किया। उन्हें शिक्षा देने के लिए कलकत्ता और ढाका में अनेको महिला स्कूल-कालेज खोले गये। अत: कहा जा सकता है, कि सामाजिक बुराईयों से पीड़ित मूक महिलाओं की आवाज बनकर बामबोधिनी पत्रिका ने महिलाओं की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दशा में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस पत्रिका के प्रयास से ही स्त्रिया शिक्षा के प्रति जागरूक हुई और उनको अधिकार मिली।

बेथून कालेज सहित 35 महिला विद्यालय की स्थापना में बामबोधिनी पत्रिका का विशेष योगदान रहा। इस पत्रिका ने समाज में महिलाओं की बदलती हुई भूमिका को महसूस किया, उनके उत्थान के लिए सरल भाषाओं में उनके अधिकारों की माँग को समाज के सामने उठाया जिससे बंगाल के धनी, प्रतिष्ठित लोगों ने उनकी दयनीय स्थिति को महसूस किया और उनके अधिकार दिलाने के लिए प्रयास शुरु किये। जिनमें उमेशचन्द्र दत्त, वसन्त कुमार दत्त, सुर्कुमार दत्त, राधाकान्त देव, तारा कुमार ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। फलस्वरूप महिलाओं की स्थिति में बदलाव आया जिसका गवाह खुद बामबोधिनी पत्रिका बनी।

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प्रश्न 28.
क्या डेविड हेयर को पूर्णरूप से भारतीय कहा जा सकता है ? यदि हाँ तो क्यों ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
डेविड हेयर ने 1848 ई० में ब्रिटीश के शासनकाल में अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार तथा प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनके द्वारा कलकत्ता में अनेक शिक्षण संस्थानों की स्थापना हुई। उनका मानना था कि भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नितान्त जरूरत है अतः इसी संदर्भ में उन्होंने राजा राममोहन राय तथा बाबू बूढ़ीनाथ मुखर्जी के साथ मिलकर 1817 ई० में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की तथा 1818 ई० में इन्होंने कलकत्ता स्कूल सोसाइटी की स्थापना की, जिसमें बंगला तथा अंग्रेजी भाषा में पढ़ाई की जाती थी तथा इसके अलावा थनथनिया, कालितल्ला और अरणुतली इत्यादि जगहों में भी स्कूल खोलें। 1880 ई० में डेविड हेयर शिक्षा का प्रसार के लिये कलकत्ता आये अतः उनके द्वारा किये गये शिक्षा का प्रयास तथा शिक्षण संस्थान की प्रतिष्ठापना से उन्हें भारतीय कहा जा सकता है।

प्रश्न 29.
नारी-शिक्षा के विकास में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर एवं ड्रिंकवाटर बेश्यून के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
नारी शिक्षा के क्षेत्र में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के योगदान :- शिक्षा के क्षेत्र में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान नारी शिक्षा के क्षेत्र में था। 19 वीं शताब्दी के भारतीय समाज में नारी शिक्षा के प्रति विरोध की भावनाएँ विद्यमान थीं। अधिकांश उच्च वर्गीय प्रतिष्ठित परिवार अपनी बालिकाओं की शिक्षा के प्रति उदासीन थे, पठन-पाठन से उसे दूर रखना चाहते थे। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर नारी वर्ग को शिक्षित बनाकर उसे अज्ञानता एवं कुरीतियों के अंधकार से बाहर निकालना चाहते थे। उनकी धारणा थी कि शिक्षित नारी ही परिवार, समाज और देश का सबल आधार बन सकती थी। अतः उन्होंने सरकारी निरीक्षक (इन्सपेक्टर) की हैसियत से 35 बालिका विद्यालयों की स्थापना में योगदान दिया। इनमें से कई स्कूलों का अर्थिक भार भी उन्होंने स्वयं उठाया।

नारी शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने बेथुन स्कूल के विकास में परम योगदान दिया। निःसन्देह यह स्कूल 19 वीं शताब्दी के पाँचवें और छठे दशक में नारी शिक्षा के लिए चलाए गए सशक्त आन्दोलन का प्रथम महत्त्वपूर्ण परिणाम था। शीघ्र ही यह स्कूल बंगाल में नारी शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गया। नि:सन्देह ईश्वरचन्द्र विद्यासागर 19 वी शताब्दी में नारी शिक्षा के अम्रदूत थे।

नारी शिक्षा के क्षेत्र में ड्रिंकवाटर बेथ्यून के योगदान : 1849 ई० में गवर्नर जनरल की कौसिल के विधि सदस्य ड्रिंक वाटर बेथुन ने कलकत्ता में हिन्दू बालिका स्कूल के नाम से इसे स्थापित किया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर इस स्कूल के प्रथम सचिव बने। इस स्कूल का प्रमुख उद्देश्य नारी शिक्षा को प्रोत्साहन देना तथा नारियों को आधुनिक शिक्षा पद्धति के अधार पर शिक्षित करना था।

प्रश्न 30.
राजा राममोहन राय उच्च कोटि के समाज सुधारक थे। इस कथन के बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर :
राजा राममोहन राय : राजा राम मोहन रॉय को भारत का आधुनिक पुरुष कहा जाता है। राजा राममोहन रॉय अरबी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, लैटिन, यूनानी, हिबू इत्यादि भाषाओं के ज्ञाता थे। ये पश्चिम के आधुनिक देशों के उदारवादी, बुद्धिवासी, सिद्धान्तों से बहुत प्रभावित थे। वे हिन्दू शिक्षा को यूरोपिय शिक्षा के वैज्ञानिक आदर्श पर संगठित करना चाहते थे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने भूगोल या ज्योतिष शास्त्र, ज्यमिती और व्याकरण आदि विषयों पर बंगला में पाठ्य पुस्तकें लिखीं।

उन्होंने सन् 1817 ई० में पाश्चात शिक्षा को अपना समर्थन देने के लिए डेविड हेयर की सहायता से कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की। इस प्रकार उन्होंने आधुनिक भारत मे पाश्चात्य शिक्षा की नींव रखा। इसके साथ ही उनकी सबसे बड़ी देन थी स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचारों से मुक्ति का संग्राम क्योंकि उन्हें सम्पत्ति का अधिकार नहीं था, शिक्षा पाने का कोई अधिकार नहीं था। पति के शव के साथ स्त्रियों को दिया जाता था था। अतः, 1819 ई० में उन्होंने महिलाओं की मुक्ति का आंदोलन घेड़ दिया। उनकी चेष्टा थी महिलाओं को सम्पत्ति में अधिकार मिलें, शिक्षा का अधिकार मिलें और इस दिशा में वे आजीवन प्रयास करते रहे।

प्रश्न 31.
बंगाल के नवजागरण में केशवचन्द्र सेन के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
बंगाल के नवजागरण में केशवचन्द्र सेन के प्रयास से अखिल भारतीय आंदोलन का रूप ब्रह्म समाज को प्राप्त हुआ था। पश्चिमी शिक्षा का प्रसार, नारी शिक्षा, स्त्रियों के उद्धार आदि कार्यो को पूरा करने के लिये इनके द्वारा इण्डियन रिफार्म एसोसियेस की स्थापना की गई।

उन्नीसवीं सदी में और बीसवीं सदी के शुरूआती वर्षो में बंगाल में हुए समाज सुधार आंदोलनों, देशभक्त-राष्ट्रवादी चेतना के उत्थान और साहित्य-कला-संस्कृति में हुई अनूठी प्रगति के दौर को बंगाल के नवजागरण की संज्ञा दी जाती है। इस दौरान समाज सुधारकों, साहित्यकारों और कलाकरों ने सती-प्रथा, बहु-विवाह, दहेज-प्रथा, जाति-प्रथा और धर्म संबंधी स्थापित परम्पराओं को चुनौती दी। बंगाल के इस घटनाक्रम ने समग्र भारतीय आधुनिकता निर्मिताओं पर अमिट छाप छोड़ी। इसी नवजागरण के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद के शुरुआती रूपों की संरचनाएँ सामने आयी।

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प्रश्न 32.
राष्ट्रीयता के विकास में स्वामी विवेकानन्द के योगदान का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
स्वामी विवेकानन्द ने भारत के जन-समुदाय की सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को निकट से देखा तथा समझा था। इस जानकारी की पृष्ठभूमि में ही उनकी दार्शनिक चिन्तन का उद्रव है। उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप में देखा था कि समाज की कुछ कुरीतियाँ समाज में फैले अंधविश्वास एवं अवौद्धिक रूढ़वाद के कारण उत्पन्न है। उन्हें प्रतीत हुआ कि इसका मूल कारण यही था कि लोगों में आध्यात्मिक जागरण अनिवार्य है। जहाँ आध्यात्मिकता के अंशों को समझनेपरखने का प्रयास किया तथा ऐसी विचार-धाराओं को मान्यता दी जिनमें आध्यात्मिक मूल्यों को प्राथमिकता दी गयी थी। वे विश्व में परिलक्षित कुछ विधरोधाभासों एवं व्याघातों की व्याख्या करने में पारमार्थिक दृष्टि तथा व्यवहारिक दृष्टि में अन्तर करते हैं। फिर भी यह तो स्वीकारना है कि उनके विचारों पर प्रमुख प्रभाव प्राचीन भारतीय दर्शन का है तथा उसमें भी सर्वप्रमुख प्रभाव वेदान्त-दर्शन का है।

प्रश्न 33.
बंगाल के नवजागरण के पक्ष में क्या-क्या तर्क दिए जा सकते हैं ?
उत्तर :
उन्नीसवीं सदी में और बीसवीं सदी के शुरूआती वर्षों में बंगाल में हुए समाज सुधार आंदोलनों, देशभक्तराष्ट्रवादी चेतना के उत्थान और साहित्य-कला-संस्कृति में हुई अनूठी प्रगति के दौर को बंगाल के नवजागरण की संज्ञा दी जाती है। इस दौरान समाज सुधारकों, साहित्यकारों और कलाकरों ने सती-प्रथा, बहु-विवाह, दहेज-प्रथा, जाति-प्रथा और धर्म संबंधी स्थापित परम्पराओं को चुनौती दी। बंगाल के इस घटनाक्रम ने समग्र भारतीय आधुनिकता निर्मिताओं पर अमिट छाप छोड़ी। इसी नवजागरण के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद के शुरुआर्ती रूपों की संरचनाएँ सामने आयी। बंगाल के नवजागरण का विस्तार राजा राममोहन राय(1772-1833) से आरम्भ होकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर(1861-1941) तक माना जाता है। करीब एक सदी तक बदलती हुई आधुनिक दुनिया के प्रति बंगाल की सचेत जागरूकता शेष भारत के मुकाबले आगे रही।

विवरणात्मक प्रश्नोत्तर (Descriptive Type) : 8 MARKS

प्रश्न 1.
बंगाल में उन्नीसवीं शताब्दी में समाज सुधार आन्दोलन में विभिन्न ब्रह्म समाजों की क्या भूमिका थी ?
अथवा
बह्म आन्दोलन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
ब्रह्म समाज : बहा समाज की स्थापना राजा राममोहन राय ने की। राजा राममोहन राय प्रथम भारतीय थे जिन्होंने सर्वप्रथम भारतीय समाज में व्याप्त मध्ययुगीन बुराइयों के विरोध में समाज सुधार आन्दोलन का सूत्रपात किया था। राजा राममोहन राय प्रजातंत्रवादी व मानवतावादी थे।

उनके नवीन विचार धाराओं के कारण ही उन्नीसवीं शताब्दी के भारत में पुनर्जागरण का जन्म हुआ था। उन्हे आधुनिक भारत का पिता कहा जाता है। उनका जन्म 22 मई 1772 ई० को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर आ्राम में हुआ था। वे अनेक भाषाओं जैसे – अरबी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी, लैटीन, यूनानी, हिब्रु के ज्ञाता थे। उच्च शिक्षा माप्त करने के बाद उन्होंने 1803 ई० से 1814 ई० तक कम्पनी की सेवा में विभिन्न पद प्रहण किया था।

राजा राममोहन राय अपने सामाजिक, धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण से इस्लाम के एकेश्वरवाद, सुफीवाद, इसाई धर्म की आचार-शास्त्रीय, नीतिपरक शिक्षा और पश्चिम के आधुनिक देशों के उदारवादी, बुद्धिवादी सिद्धान्तों से बहुत प्रभावित थे। सामाजिक क्षेत्र में राजा राममोहन राय ने हिन्दू समाज की कुरीतियों, सती प्रथा, बहुपत्नी प्रथा, वेश्यागमन, जातिवाद आदि के घोर विरोधी थे। विधवा पुर्नविवाह का उन्होंने समर्थन किया था। 20 अगस्त 1828 ई० में उन्होंने बह्म समाज की स्थापना की थी। ब्रह्म समाज की स्थापना का उद्देश्य था हिन्दू धर्म में सुधार लाना।

इस समाज में प्रत्येक शनिवार को सांय काल सभी सदस्य एकत्रित होते थे। बह्म समाज ने जाति व्यवस्था, बाल-विवाह, सती प्रथा का विरोध किया। राम मोहन राय स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के कट्टर समर्थक थे और इन्होंने स्ती-पुरूष दोनों के लिए आधुनिक शिक्षा पर जोर दिया। इनके प्रयास से ही 1829 ई० में तत्कालीन वायसराय लाई्ड विलियम बेंटिंग ने रेगुलेशन XVII पारित कर सती प्रथा को प्रतिबंधित घोषित कर दिया। 27 सितम्बर 1833 ई० को इंग्लैण्ड के बिस्टल शहर में राम मोहन राय की मृत्यु हो गई।

राजा राम मोहन की मृत्यु के पश्चात बह्म समाज का संचालन महर्षि द्वारिकानाथ टैगोर और पण्डित रामचन्द्र विधा बागीश के हाथों में रहा, तत्पश्चात् देवेद्द्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में ब्रह्म समाज़ की गतिविधियाँ जारी रही थीं। बाद मे केशवचन्द्र सेन ने भी बह्म समाज की सदस्यता ग्रहण की। केशचन्द्र सेन को देवेन्द्रनाथ टैगोर ने आचार्य की उपाधि दी। लेकिन केशवचन्द्र सेन के उदारवादी विचारों के कारण बहा समाज में मतभेद हो गया। ब्रह्म समाज दो भागों में विभाजित हो गया।

आदि ब्रह्म समाज और भारतवर्षीय ब्रह्म समाज : आदि बह्म समाज के प्रणेता देवेन्द्रनाथ टैगोर तथा भारतवर्षीय ब्लह्म समाज के प्रणेता केशवचन्द्र सेन थे। केशवचन्द्र सेन के प्रयत्नों से ही ब्रह्म समाज को अखिल भारतीय आन्दोलन का स्वरूप प्राप्त हुआ था। केशवचन्द्र सेन ने पश्चिमी शिक्षा के प्रसार, स्त्रियों का उक्कर, स्त्री शिक्षा को महत्व आदि को क्रियान्वित करने हेतु इण्डिन रिफॉर्म एसोशियशन की स्थापना की थी। ब्रह्म समाज में दूसरा विभाजन 1878 ई० में हुआ था।

केशवचन्द्र सेन ने अपनी पुत्री का बह्म विवाह कूचबिहार के राजा से करके स्वतः ही इसका उल्लंघन कर दिया। उनके इस प्रयास से उनके अनुयायी परस्पर असंतुष्ट व क्षुब्ध हो उठे, अन्ततः बह्म समाज का पुनः विघटन हो गया। 1878 ई० में ब्रह्म समाज का प्रमुख उद्देश्य था – जाति प्रथा, मूर्ति पूजा विरोध, नारी मुक्ति का समर्थन, जन-सामान्य के कल्याण, नारी शिक्षा, अकाल राहत कोष साथ ही अनाथालयों आदि की स्थापना के लिए साधारण ब्रह्म समाज सदैव प्रयत्मशील रहा।

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प्रश्न 2.
शिक्षा के प्रसार में प्राच्यवादी एवं पाश्चात्यवादी विवाद क्या है ? उच्च शिक्षा के विकास में कलकत्ता विश्वविद्यालय (यूनिवर्सिटी) की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
प्राच्यवादी एवं पाश्रात्यवादी विवाद :- ब्रिटिश भारत में शिक्षा, प्रणाली के विकास पर शिक्षा के नीति निर्धारको द्वारा जो मत प्रस्तुत किये गये, उसको लेकर उनके बीच विवाद हो गया। 1813 ई० के चार्टर ऐक्ट के बाद सरकार यह निर्णय नहीं ले पा रही थी कि-भारत में शिक्षा की कौन सी प्रणाली अपनायी जाये। कुछ प्रबुद्ध लोगों का मानना था कि – शिक्षा धन की तरह उच्य वर्गों से छन कर जन सामान्य वर्ग तक पहुँचेगी। इसी विचार को शिक्षा की ‘छनन नीति’ कहा जाता है।

एक वर्ग का मानना था कि-शिक्षा उच्च और निम्न वर्ग दोनों के लिए समान होनी चाहिए। इसी बात को लेकर उनमें मतभेद उत्पन्न हो गया। तो दूसरा वर्ग प्राच्य (भारतीय परम्परागत शिक्षा) का समर्थक बन गया। पश्चिमी शिक्षा समर्थक अग्रेजी भाषा के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे। मुनरो, लार्ड मैकाले, ट्रैवेलियन तथा राजा राम मोहन राय इसके समर्थक थे। प्राव्य शिक्षा समर्थक भारत के परम्परागत् सामाजिक और सास्कृतिक शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान की शिक्षा देने के का समर्थन कर रहे थे।

इस दल का नेतृत्व लोक शिक्षा समिति के सचिव एच. टी.म्रिंसेप, एच. एच. विल्सन थे। इन समर्थकों के बीच के विवाद को ही प्राव्य और प्राश्चात्य शिक्षा विवाद कहा जाता है। यह विवाद 1935 ई० में मैकाले मिनट के सुझाव के लागू होने के साथ समाप्त हो गया और यह सुनिश्चित हो गया कि भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा और विषय पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान तथा तर्क आधारित सामाजिक विषय होंगे।

उच्च शिक्षा विकास में कलकत्ता यूनिवर्सिटी की भूमिका :- वुड़ डिस्पैच के आधार पर 1857 ई० में कलकत्ता विश्य विद्यालय की स्थापना हुई। यह भारत का ही नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया का पश्चिमी शिक्षा प्रणाली पर आधारित पहला विश्चविद्यालय था। इस विश्चविद्यालय में अंग्रेजी, बंगला तथा अन्य भाषाओं के साथ-साथ राजनीति, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त, कानून, विज्ञान, कला आदि विभिन्न विषय की पढ़ाई होती थी।

जहाँ से विभिन्न विषयों का शिक्षा प्राप्त कर बंगाल तथा देश के विभिन्न भागों में विद्यार्थी जाकर शिक्षा प्रदान करते थे। इस तरह कलकत्ता विश्चविद्यालय बंगाल में उच्च शिक्षा को बढ़ावा दे रहा था। बंकिमचन्द्र चटर्जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सी.वी. रमन, यदुनाथ बोस, कादम्बिनी गांगुली तथा चन्द्रमुखी बसु इस विश्चविद्यालय के प्रमुख छात्र थे। इस विश्चविद्यालय में इसके स्थापना वर्ष से ही लाहौर से लेकर रंगून तक के छात्र एवं छात्राएँ पढ़ने के लिए आया करते थे।

यदुनाथ बोस, बकिम चन्द्र बटर्जी कलकत्ता विश्चविद्यालय से स्नातक (बी.ए.) की डिग्री प्राप्त करने वाले प्रथम छात्र थे तथा चन्द्रमुखी बसु और कादम्बिनी गाँगुली पहली महिला छात्राएँ थी। इस पकार इस विश्चविद्यालय से अनेक छात्र एवं छात्राएँ उच्च शिक्षा ग्रहण कर पूरे राज्य में एक मिशन के तरह शिक्षा को आगे बढ़ाने का काम किया। इसके साथ कई अन्य कॉलेज भी जुड़कर उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने में योगदान दिया।

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प्रश्न 3.
19 वीं सदी के नवजागरण पर प्रकाश डालिए। बंगाल में नवजागरण की अवधारणा के सम्बन्ध में अपना तर्क या विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
उन्नीसवीं सदी में और बीसवी सदी के शुरूआती वर्षो में बंगाल में हुए समाज सुधार आंदोलनों, देशभक्तराष्ट्रवादी चेतना के उत्थान और साहित्य-कला-संस्कृति में हुई अनूठी प्रगति के दौर को बंगाल के नवजागरण की संज्ञा दी जाती है। इस दौरान समाज सुधारको, साहित्यकारों और कलाकरों ने सती-प्रथा, बहु-विवाह, दहेज-प्रथा, जाति-प्रथा और धर्म संबंधी स्थापित परम्पराओं को चुनौती दी। बगाल के इस घटनाक्रम ने समग्र भारतीय आधुनिकता निर्मिताओं पर अमिट छाप छोड़ी। इसी नवजागरण के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद के शुरुआती रूपों की संरचनाएँ सामने आयी। बंगाल के नवजागरण का विस्तार राजा राममोहन राय (1772-1833) से आरम्भ होकर रवोन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) तक माना जाता है।

इस अवधि का सुव्यवस्थित अध्ययन करने वाले इतिहासकार सुशोभन सरकार लिखते हैं कि अंग्रेजी राज, पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और आधुनिक पश्चिमी संस्कृति का सबसे पहला प्रभाव बगाल पर पड़ा जिससे एक ऐसा नवजागरण हुआ जिसे आमतौर पर बंगाल के रिनेसा के नाम से जाना जाता है। करीब एक सदी तक बदलती हुई आधुनिक दुनिया के प्रति बंगाल की सचेत जागरूकता शेष भारत के मुकाबले आगे रही।

इस लिहाज से कहा जा सकता है कि भारत के आधुनिक जागरण में बंगाल द्वारा निभायी गयी भूमिका की तुलना यूरोपीय रिनेसाँ के संदर्भ में इटली की भूमिका से की जा सकती है। इतावली रेनेसाँ की ही तरह बंगाल का नवजागरण कोई जनादोलन नहीं था। इसकी प्रक्रिया और प्रसार कुलीन (उच्च वर्गो) तक ही सीमित था। कुलीनों में भी नवजागरण का प्रभाव अधिकतर हिंदू हिस्से पर ही पड़ा। इस दौरान कुछ मुसलमान हस्तियाँ भी उभरीं (जैसे, सैयद अमीर अली, मुशर्रफ हुसैन, साकेदीन महमूद, काजो नजरूल इस्लाम और रूकैया सखावत हुसैन)।

मोटे तौर पर माना जाता है कि बंगाल के नवजागरण की शुरुआत राजा राममोहन राय से हुई और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ उसका समापन हो गया। सुशोभन सरकार ने इसे पाँच चरणों में बाँट कर देखने का प्रयास किया है । पहली अवधि 1814 ई० से 1833 ई० जिसकी केन्द्रीय हस्ती राजा राममोहन राय थे। 1814 ई० में वे कोलकाता रहने के लिए आये और 1833 ई० में उनका लंदन में देहांत हुआ। दूसरी अवधि उनकी मृत्यु से 1857 ई० के विद्रोह तक जाती है।

तीसरी अव्वधि 1885 ई० में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना तक फैली हुई है। चौथी अवधि 1905 ई० में बंगाल के विभाजन तक और पाँचवी अवधि स्वदेशी आंदोलन से असहयोग आंदोलन और महात्मा गाँधी के नेतृत्व की शुरुआत तक यानी 1919 ई० तक मानी गयी है। राजा राममोहन राय ने अपने धार्मिक और सामाजिक विचारों को धरती पर उतारने के लिए 20 अगस्त 1828 ई० में बह्म सभा का गठन किया।

इस प्रक्रिया का परिणाम 1830 ई० में एक चर्च की स्थापना के रूप में निकला और बह्म समाज आंदोलन शुरू हुआ, जो लम्बे समय तक बंगाली समाज की चेतना को प्रभावित करता रहा। 1818 ई० से 1829 ई० के बीच राजा राममोहन राय ने सती प्रथा जैसी बुराई पर आक्रमण करते हुए तीन रचनाये प्रकाशित की। सती प्रथा के खिलाफ जनमत बनाने और अंग्रेजों को उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव डालने का श्रेय उनके प्रयासों को ही दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने आधुनिक शिक्षा और विशेष रूप से स्त्री शिक्षा के प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाया।

1857 ई० के विद्रोह के बाद बंगाल का पुनर्जागरण साहित्यिक कांति और उसके जरिये राष्ट्रवादी चितन के युग में प्रवेश किया। नील की खेती करवाने वाले अंग्रेजों के जुल्मों के खिलाफ किसानों के संघर्ष में बंगाली बुद्धिजीवियों ने भी अपनी आवाजें बुलंद की। दीनबंधु मित्र के नाटक नील दर्पण ने बंगाल के मानस को झकझोर दिया। धार्मिक सुधारो और पुनरूत्थानवाद के लिहाज से भी यह दौर बहुत ही घटनाप्रद था। दूसरी तरफ केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में युवा बह्म समाज सुधार आंदोलन की अलख जगाये हुए थे।

प्रश्न 4.
सती प्रथा एवं उसे रोकने लिए राजा राम मोहन राय के प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
सती प्रथा : समाज में व्याप्त दोषों में सर्वाधिक घृणित दोष सती प्रथा के रूप में विद्यमान था। सती शब्द का अर्थ है पवित्रता और चरित्रवती स्त्री, किन्तु सामान्यतः इसका अर्थ पतिव्रता स्त्रियों के अपने पतियों के मृत शरीरों के साथ जल जाने की प्रथा से लिया जाने लगा था। हिन्दू समाज में चिरकाल से ही इस प्रथा का प्रचलन था। विचाराधीन काल में देश के अन्य भागों की अपेक्षा बंगाल तथा उत्तर पश्चिम प्रान्त में यह प्रथा अधिक प्रचलित थी।

कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद, पटना, बनारस, बरेली आदि में इसका व्यापक प्रचलन था। मुगल सम्राट अकबर, पेशवाओं और राजा जयसिंह ने भी इस प्रथा को समाप्त करने के निष्फल प्रयत्न किये थे। 19 वीं शताब्दी के दूसरे दशक तक पहुँचते-पहुँचते यहु प्रथा भयंकर रूप में प्रकट होने लगी थी। $1815-1818$ ई० की अवधि में केवल बंगाल में ही 800 स्त्रियाँ सती हो गई थी।

सुपसिद्ध समाज सुधारक राजा राममोहन राय ने सती प्रथा निषेध कानून का नियमन करवाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप गवर्नर-जनरल लार्ड विलियम बैंटिक ने 4 दिसम्बर 1829 ई० के सुप्रसिद्ध सती उन्मूलन कानून के द्वारा इस प्रथा को गैर कानूनी घाषित कर दिया। इसे प्रोत्साहन देने वालों अथवा किसी विधवा को सती होने के लिए विवश करने वालों को प्राण दंड देने की व्यवस्था की गई। इस नियम ने सती प्रथा पर तीव्र आघात किया।

डब्लयू हेग के शब्दों में यह कम्पनी की सरकार द्वारा भारत की सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं में हस्तेक्षेप करने का अत्यन्त साहसिक कद्म था। राजा राम मोहन राय ने जब सती प्रथा पर रोक लगाई थी तब उन्हें अनेक कठिनाईझों का सामना करना पड़ा। उन्हें सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कष्ट का सामना करना पड़ा। राजा राम मोहन राय ने अपने जीवनको शुरू से कष्टदायक बनाने का निश्चय कर दूसरों को सुखी जीवन दिया है। सती प्रथा रोककर उन्होंने समाज को एक नई प्रेरणा दी।

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प्रश्न 5.
कलकत्ता विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षा के प्रसार का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
कलकत्ता विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षा का प्रसार : 24 जनवरी 1857 ई० को बंगाल में कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। पूरे दक्षिण एशिया में यह पाश्चात्य सभ्यता का पहला विश्वविद्यालय था जिसमें कई तरह के विषयों में विद्यार्थी ज्ञानार्जन प्राप्त कर सकते थे। इस विश्वविद्यालय में सभी धर्मों एवं समुदायों के विद्यार्थी विद्या ग्रहण कर सकते थे। पूरे भारत में इस विश्वविधालय की चर्चा होती थी।

इस विश्वविद्यालय से चार नोबल पुरस्कार विजेताओं का संबंध रहा है। रालैण्ड रास, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सी० वी० रमन एवं अमर्त्य सेन। जब इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो इसमे लाहौर से लेकर रंगून तक के विद्यार्थी विद्यार्जन के लिए आते थे। इस व्विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति एवं उपकुलपति गर्वनर जनरल लार्ड कैनिंग एवं सुप्रिम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर जेम्स विलियम कोलबिल थे।

1858 ई० में यदुनाथ बोस एवं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि पाने वाले प्रथम व्यक्ति थे। 30 जनवरी 1858 ई० को कलकत्ता विश्वद्यालय ने संघ की तरह काम करना आरंभ किया। इससे कई अन्य शिक्षण संस्थाएँ इसके साथ जुड़ गई। 1882 ई० में कादम्बिनी गांगुली एवं चन्द्रमुखी बसु स्तातक की उपाधि पाने वाली भारत की प्रथम महिला बनी। कलकत्ता विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देता आ रहा है।

विशेषताएँ : 18 वीं शताब्दी के हिन्दू समाज में वर्षो से पल रहा कुसंस्कार काफी तीव्र हो उठा था। वेदों, उपनिषेदों तथा दर्शनों के मार्ग से भटककर कर शिक्षित समाज की पौराणिक कथाओं और कर्मकांडों में विश्वास करने लगा था। जातिपाँति का भेद-भाव समाज को खंड-खंड कर रहा था। स्त्रियों की स्थिति बड़ी दयनीय थी, इन्हें शिक्षा के क्षेत्र से दूर रखा जाता था। परदा-प्रथा, सती-प्रथा, बेमेल विवाह जैसी कुप्रथाओं की वे शिकार हो रही थी। स्त्री शिक्षा एवं विधवा विवाह को निन्दित कार्य माना जाता था। लड़कियों को शिक्षा देने के प्रयास किये जाने लगे।

उनके लिए कई बालिका विद्यालयों की स्थापना की गई। राजा राम मोहन राय, राधा कांत देव, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, डेविडहेयर एवं ड्रिंकवाटर ब्रेंथुन आदि महापुरुषों ने इस दिशा में सराहनीय कार्य किये, कलकत्ता विश्वविद्यालय की स्थापना की गई जिससे उच्च शिक्षा का प्रसार संभव हो सके, इसकी स्थापना के फलस्वरूप यहाँ पाश्चात्य साहित्य का अध्ययन करने वाले युवकों को पाश्चात्य दर्शन की कई दृष्टियों से प्रभावित किया वे भी भारत में स्वशसन की स्थापना देखने लगे।

टिप्पणियाँ : ब्रिटिश सरकार किसी भी प्रकार के सुधार के पक्ष में नहीं थी। उनकी दृष्टि में भारत एक असभ्य, भष्ट एवं पिछड़ा हुआ देश था। अंग्रेजी शिक्षा का एक प्रयोजन यह भी था कि शिक्षित भारतीय इंग्लैण्ड में बनी वस्तुओं के बाजार का भारत में विस्तार करेंगे। तथाषि बंगाल के कुछ बुद्धिजीवियों ने पाश्वात्य शिक्षा के महत्व को समझा तथा उसके प्रचार-प्रसार में योगदान दिया।

शिक्षा को समाज के प्रत्येक वर्ग में फैलाने की आवश्यकता महसूस की गई एवं महिला शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। 1844 ई० की सरकारी घोषणा के कारण परम्परागत भारतीय शिक्षा प्रणाली समाप्त हो गई। सरकारी नौकरी के लिए अंग्रेजी भाषा अनिवार्य होने के कारण भारतीय जनता में शिक्षा का प्रसार नहीं हो पाया। अंग्रेजी माध्यम के शिक्षण संस्थाओं में फीस देनी पड़ती थी। अतः धनी वर्ग का इस पर एकाधिकार हो गया और शिक्षा का क्षेत्र काफी संकुचित हो गया।

प्रश्न 6.
रामकृष्ण परमहंस के विचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
रामकृष्ण परमहंस का विचार : बंगाल के महान संत रामकृष्ण परमहंस (20 फरवरी 1836 -15 मार्च 1886 ई०) का अनोखा व्यक्तित्व का जन्म गाँव में हुआ था। उन्होंने नाममात्र की भी शिक्षा प्राप्त नहीं की थी किन्तु घोर एकांत में निरंतर आध्यात्मिक साधना करते रहने के कारण वे एक अलौकिक पुरूष बन गये थे।

उनका जीवन धार्मिक साधना का मूर्तिमान स्वरूप था। उनमें हिन्दू धर्म और दर्शन के सभी रूपों अर्थात मूर्ति पूजा, अवतारवाद, भजन, कीर्तन, अद्वैतवाद आदि का अद्भुत समन्वय था। वे धार्मिक कट्टरता एवं संकर्णता को बुरा मानते थे। केवल तर्क के आधार पर धार्मिक सिद्धांतों का विश्लेषण करने से उन्हें चिढ़ थी। भारतीय संस्कृति तथा आध्यात्म के प्रति पूर्ण आस्था रखते हुए भी वे सभी धर्मों की सत्यता पर विश्वास करते थे।

सब प्रकार की धार्मिक साधनाओं में वे उसी ईश्वर को पाते थे जिसके तरफ सभी कदम बढ़ा रहे हैं। यद्यपि सबके मार्ग अलंग-अलग हैं। एक-मुसलमान सूफी से उन्होंने मुस्लिम-साधना की दीक्षा ली और ईसाई पादरी से पढ़वा कर बाइबल सुनते रहे । वे सिक्ख गुरूओं को आदर की दृष्टि से देखते रहे और समाधि की अवस्था में माँ काली तथा कृष्ण के अतिरिक्त ईसामसीह और बुद्ध के भी दर्शन करते रहे । रामकृष्ण काली के अनन्य उपासक थे। वे गुरू भक्त थे।

वे हिन्दू धर्म के रक्षक थे। यद्यपि उन्हें अंग्रेजी शिक्षा नहीं मिली, तथापि वे नवीन पश्चिमी विचारों से अवगत थे। वे ईसाई और इस्लाम धर्म से भी प्रभावित थे। उनका कहना था कि सभी धर्मों में सच्चाई है। ईश्वर एक है। अतः आदमी को चाहिए कि वह जिस धर्म में पैदा हुआ हैं उसी को माने। रामकृष्ण विश्वजनीन धर्म के समर्थक थे। वे सुलह-ए-कुल के पक्षधर थे। यही कारण है कि उनके शिष्य विभिन्न धर्मों के अनुयायी थे ।

उनके शिष्य उन्हें ईश्वर तुल्य समझते थे। रामकृष्ण को न तो संस्कृत और न ही अंग्रेजी का ज्ञान था, वे बंगला के भी पंडित न ये किन्तु वे सभी से अच्छी तरह बात-चीत कर लेते थे। उनकी यह उक्ति पाहम, नाहम: तू ही, तू ही अत्यंत ही प्रसिद्ध है। जो उनके धार्मिक उपदेश का सार है। इसका सरल अर्थ है, वे (परमहंस) कुछ नहीं हैं। वे कोई औपचारिक गुरू न थे, वे कहते थे, मैं किसी का भी गुरू नहीं हूँ। मै हर आदमी का शागिर्द हूँ।”‘ 15 मार्च 1866 ई० को रामकृष्ण परमहंस जी का देहांत हो गया।

उनके लिए मानव-सेवा ही ईश्वर सेवा था । रामकृष्ण परमहंस के महान व्यक्तित्व तथा सरल और आदर्श पूर्ण जीवन का लोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। उनके उपदेशों से लोगों में धार्मिक कट्टरता तथा सामाजिक रूढ़ियों के प्रति अरूचि उत्पन्न हुई तथा सम्र्रदायिक भावना का ह्रास हुआ। इनके इन्हीं सिद्धान्तों को दूर-दूर तक फैलाने के लिए उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने अथक प्रयत्न किया।

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प्रश्न 7.
स्वामी विवेकानंद एवं उनके उपदेशों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
स्वामी विवेकानंद का पूर्व नाम नरेन्द्र दत्त था। संत रामकृष्ण के श्रेष्ठ शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरू के धार्मिक संदेश को विश्वभर में कोने-कोने तक पहुँचाया। उन्होंने न केवल रामकृष्ण की वाणी की व्याख्या की वरन् उसे व्यावहारिक रूप प्रदान कर मानव मात्र का हित साधन किया।

स्वामी विवेकानन्द एक कर्मठ योगी और वेदान्ती थे। उनका असाधारण व्यक्तित्व और उतना ही असाधारण कृतित्व विदेशों में भारतीय संस्कृति का गौरव स्तंभ बन गया तथा एक पराजित गुलाम जाति विश्व की दृष्टि में अभिनन्दनीय बन गई। विवेकानन्द ने अपने संदेश में सामाजिक कर्म और मानव सेवा पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा है ‘ ‘वह ज्ञान निरर्थक है जो संसार को कर्मभूमि मानकर कर्म की प्रेरणा नहीं देता है।

अपने गुरू की भाँति वे सर्व धर्म समभाव का संदेश प्रसारित करते रहे और प्रत्येक धर्म का आदर करते रहे। भारतीय दार्शनिक परंपरा के वे महान् संदेशवाहक थे और वेदान्त के कट्टर समर्थक थे। वे संकीर्णता के घोर विरोधी तथा स्वतंत्रता, समानता और मुक्त चिंतन के प्रचारक थे। उन्होंने तीखे स्वर में कहा था – ‘हमारा ईश्वर खाना पकाने के बर्तन में है और हमारा धर्म है – मुझे छुओ मत मैं पवित्र हूँ। अगर एक शताब्दी तक यह चलता रहा तो हम सब पागलखाने में होंगे ।

अपने गुरू की भाँति वे महान मानवतावादी थे। देश की विपन्नता और गरीबी से दु:खी होकर उन्होंने कहा – “जब तक करोड़ो लोग भूख और असमानता से पीड़ित है तब तक मैं उस हर व्यक्ति को देशद्रोही समझूँगा जो उनके खर्च से शिक्षित बनकर उनके प्रति ध्यान नहीं देता। विवेकानन्द ने कहाँ – ” “मैं उस धर्म में विश्वास नही करता जो किसी विधवा के आँसू नहीं पोछ सकता अथवा किसी अनाथ को रोटी नहीं दे सकता।

अपने गुरू की शिक्षाओं को मूर्त रूप देने के लिए स्वामी जी ने 1896 ई० में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जिसने न केवल भारत वरन् विश्व भर में मानव सेवा हेतु अस्पताल, अनाथालय, पुस्तकालय, शिक्षालय तथा सेवाश्रमों की स्थाना की और वर्तमान में भी उनका संचालन कर रही है। मिशन के सन्यासी अकाल, बाढ़, महामारी जैसे अवसरों पर जन-सहायतार्थ दल के दल निकल पड़ते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने व्यक्ति की मुक्ति की अपेक्षा समाज की मुक्ति अर्थात भलाई पर जोर दिया।

स्वामी विवेकानन्द जी के उपदेश : सभी धर्म सत्य और सुन्दर है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म में रहना चाहिए। ईश्वर निराकार सर्वज्ञ, सर्वशक्तिशाली एवं सर्वव्यापी है। आत्मा पवित्र है। सभी प्राणी संत हैं। यह कहना ठीक नहीं हैं कि कोई व्यक्ति पाप का दोषी है, मूर्ति पूजा करनी चाहिए। हिन्दू-धर्म का हर तर्क महत्वपूर्ण है और इसे अच्छुण रखना चाहिए। सुधारवादी गलती कर रहे हैं। वे आसार के साथ सार को भी दूर कर रहे हैं।

पुराने विचार अंधविश्वास हो सकते हैं, किन्तु उसमें भी सत्यता की झांकी मिल सकती है। हिन्दू सभ्यता संस्कृति सबसे प्राचीन है। यह सभी धर्मो से प्राचीन है। यह सत्य शिव सुन्दरम हैं। हिन्दू धर्म के विरूद्ध यूरोपीय विद्वानों की आलोचनाएँ भान्तिपूर्ण हैं। ईसोई धर्म प्रचारक हिन्दू-धर्म के बारे में गलत प्रचार करते हैं। भारत सदा से ही आध्यात्मिक देश रहा है। इसने प्राचीन काल में विश्व को शिक्षा दी है तथा भविष्य में भी शिक्षा देगा। पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति भौतिकवादी, स्वार्थी एवं कामुक है।

अत: हिन्दू-धर्म के लिए अत्यन्त ही विनाशकारी है। प्रत्यके हिन्दू का यह परम कर्तव्य है कि वह अपने धर्म की रक्षा करें। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को सीखें। वे मांस भक्षण भी करें जिससे मजबूत बन सकें, भारत-भूमि पर वे एक शक्तिशाली सभ्यता का निर्माण करें। विवेकानन्द का विघार था कि प्राचीन भारत ने चीन, यूनान एवं रोम को काफी प्रभावित किया। भारत उनका आदि गुरू रहा है। 4 जुलाई 1902 ई० को मात्र 40 वर्ष की उम्र में स्वामी जी का आकस्मिक देहांत हो गया।

प्रश्न 8.
हाजी मोहम्मद मोहसिन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर :
हाजी मोहम्मद मोहसिन : हाजी मोहम्मद मोहसिन हाजी शरीयत उल्लाह के पुत्र तथा बंगाल में फराजी आंदोलन के प्रमुख नेता थे। ये दूधू मियाँ के नाम से प्रसिद्ध थे। एक क्रांतिकारी होने के पहले ये एक धर्म सुधारक भी थे। इनके पिता ने 1804 ई० में फराजी नामक धार्मिक सम्र्रदाय की स्थापना की थी। अपने पिता के पद चिह्नों पर चलते हुए उन्होंने मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना अपना प्रमुख लक्ष्य बना लिया। इसके साथ ही साथ इन्होंने फराजी कृषकों को जमींदारों के शोषण से मुक्त कराने का बीड़ा भी उठाया।

अपने पिता हाजी शरीयत उल्लाह की मृत्यु के पश्चात् हाजी मोहम्मद मोहसिन ने फराजी आन्दोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लिया। इन्होंने जमीदारों के अत्याचारों के खिलाफ अपने अनुयायियों को संगठित किया। अल्पकाल में ही ढाका फरीदपुर क्षेत्र के असंख्य मुसलमान इस संगठन में शामिल हो गए और स्थान-स्थान पर जमींदारों तथा अंग्रेजी शासन का विरोध करने लगे। इन्होंने अंग्रेज अदालतों का विरोध किया और जगह-जगह ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना की। इन न्यायालयों के माध्यम से जमींदारों के अत्याचार के विरुद्ध रैय्यतों की मदद एवं आपसी झगड़ों को सुलझाया जाता था।

हाजी मुहम्मद मोहसिन के द्वारा चलाया गया आन्दोलन विशुद्ध आन्दोलन था परन्तु बाद में शोषित हिन्दू भी इसमें शामिल हो गये, धीरे-धीरे यह संगठन एक विशाल संगठन बन गया। इन्होंने स्वयं को बंगाल का शासक घोषित कर दिया तथा बहादुरपुर को केन्द्र बनाया। मोहम्मद मोहसिन ने बंगाल को कई भागों में विभक्त कर प्रत्येक क्षेत्र में एक खलीफा नियुक्त किया। खलीफा अपने क्षेत्र में फराजियों को संगठित करने, उनके ऊपर होने वाले अत्याचार का विरोध करने तथा आन्दोलन के लिए धन एकत्र करने का काम करते थे।

धीरे-धीरे यह आन्दोलन फरीदपुर, विक्रमपुर, खुलना और चौबिस परगना जिले में फैल गया। फराजियों के उग्रवादी रूप को देखकर जमींदारों, साहुकारों, नीलहे गोरे एवं कट्टरपंथी मुसलमानों ने फराजियों का दमन करने के लिए सरकार पर दबाव डाला। 1841 ई० में मोहम्मद मोहसिन तथा उनके अनेक अनुयायी गिरफ्तार कर लिए गये, किन्तु सबूतों के अभाव में बरी हो गए। 1857 ई० के विद्रोह के समय इन्हें पुन: गिरफ्तार कर लिया गया। तीन वर्ष बाद 1860 में जेल में ही इनकी मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 9.
भारत में अंग्रेजी शिक्षा के विकास का वर्णन कीजिए। नारी शिक्षा के क्षेत्र में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
अंग्रेजी शिक्षा : मैकॉले की शिक्षा पद्धति विप्रवेशन सिद्धान्त या अधोमुखी निस्यन्दन सिद्धांत पर आधारित थी। इस सिद्धान्त में माना जाता है कि यदि उच्च वर्ग के कुछ लोगों को शिक्षित कर दिया जाए तो वे मध्यम वर्ग के और अधिक लोगों को शिक्षित करेंगे एवं फिर ये शिक्षित लोग निम्न वर्ग के काफी लोगों को शिक्षित करेंगे। परन्तु भारत में यह प्रयास पूर्णत: सफल नहीं हो सका। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के विकास का दूसरा चरण लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में शुरू हुआ।

इसके पूर्व 1835 ई० में लोक शिक्षा समिति 20 विद्यालयों को चला रही थी। लार्ड ऑकलैण्ड ने बंगाल को 9 भागों में विभक्त किया और प्रायः प्रत्येक जिले में विद्यालय स्थापित किए। 1840 ई० तक इस प्रकार के 40 विद्यालय थे। 1837 ई० में इनकी संख्या बढ़कर 48 हो गई। 1835 ई० में कलकता मेडिकल कॉलेज की नींव लार्ड विलियम बेंटिक के समय में पड़ी। 1854 ई० में लाई्ड डलहौजी ने 33 प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की। 1851 ई० में पूना संस्कृत कॉलेज और अंग्रेजी स्कूल को मिलाकर पूना कॉलेज बनाया गया। 1854 ई० में बम्बई में मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। 1852 ई० में सेंट जान्स कॉलेज की स्थापना की गई।

इस योजना के तहत भारत में अंग्रेजी भाषा के माध्यम से उच्च शिक्षा दिए जाने पर बल दिया गया साथ ही साथ देशी भाषा के विकास को महत्व दिया गया। लन्दन विश्वविद्यालय के आधार पर कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में तीन विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। इस घोषणा में तकनीकी एवं व्यावसायिक विश्वविद्यालय की स्थापना पर भी बल दिया गया।

नारी शिक्षा एवं ईश्वरचन्द्र विद्यासागर : विद्यासागर के जीवन का संकल्प था शिक्षा-सुधार, शिक्षा का प्रचार तथा स्त्रियों को हर प्रकार की सामाजिक स्वतंत्रता। स्त्री शिक्षा के प्रचार के लिए उन्होंने अत्यधिक कार्य किये। उन्होंने अनुभव किया कि शिक्षा के बिना स्त्रियों की दशा में सुधार नहीं हो सकता। हिन्दू बलिका विद्यालय की स्थापना के लिए उन्होंने बेथून साहब की सहायता से बेथून कॉलेज की स्थापना की। बंगालियों के सामाजिक इतिहास में इसका काफी महत्व है।

शिक्षा निदेशक के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने बंगाल में अनेक बालिका विद्यालयों की स्थापना की। उन्होंने देशी शिक्षा के प्रसार के लिए सरकार को अधिकाधिक देशी विद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया। शिक्षा जगत में धार्मिक संक्कीणता को दूर करने के लिए संस्कृत कॉलेज में गैर ब्राह्मण छात्रों को पढ़ाने का अवसर दिया। बच्चों को आसानी से बंगला सीखने के लिए उन्होंने वर्ण परिचय, लघु सिद्धान्त कौमुदी, बोधोदय, कथा माला आदि पुस्तको की रचना की। इस प्रकार शिक्षा प्रसार तथा नारी उत्थान में विद्यासागर का योगदान अविस्मरणीय रहा है।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 1 इतिहास की अवधारणा

Detailed explanations in West Bengal Board Class 10 History Book Solutions Chapter 1 इतिहास की अवधारणा offer valuable context and analysis.

WBBSE Class 10 History Chapter 1 Question Answer – इतिहास की अवधारणा

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Very Short Answer Type) : 1 MARK

प्रश्न 1.
‘सोमप्रकाश’ के सम्पादक कौन थे ?
उत्तर :
‘सोमप्रकाश’ के सम्पादक द्वारकानाथ विद्याभूषण थे।

प्रश्न 2.
सरकारी दस्तावेज कहाँ संरक्षित किये जाते है ?
उत्तर :
सरकारी दस्तावेज राष्ट्रीय संग्रहालयों में संरक्षित किये जाते है।

प्रश्न 3.
सरला देवी चौधुरानी की आत्मकथा का नाम क्या है ?
उत्तर :
जीवनेर झड़ा पाता।

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प्रश्न 4.
बंगदर्शन पत्रिका की स्थापना किसने किया था ?
उत्तर :
बंगदर्शन पत्रिका की स्थापना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1872 ई० में किया था।

प्रश्न 5.
जन-गण-मन राष्ट्रगान सबसे पहले कब और किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था ?
उत्तर :
1912 ई० में तत्वबोधिनी पत्रिका में।

प्रश्न 6.
आधुनिक इतिहास लेखन का पिता किसे कहा जाता है ?
उत्तर :
लियोपोल्ड रांके।

प्रश्न 7.
पर्यावरण इतिहास लेखन की परम्परा सर्वप्रथम किस देश में शुरू हुआ ?
उत्तर :
1960 ई० के दशक में अमेरिका में।

प्रश्न 8.
किसने कहा, ‘ ‘इतिहास एक घर है जिसमें सभी विषय समाहित हैं।”
उत्तर :
प्रो० ट्रैलियान ने।

प्रश्न 9.
पहिए एवं कृषि का आविष्कार कब हुआ था?
उत्तर :
पहिए एवं कृषि का आविष्कार नव पाषाण युग में हुआ था ।

प्रश्न 10.
मेधा पाटेकर कौन है ?
उत्तर :
मेधा पाटेकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की प्रमुख नेत्री हैं।

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प्रश्न 11.
मोहन बागान क्लब ने किस वर्ष आई. एफ. ए. शील्ड सर्वप्रथम जीता था ?
उत्तर :
मोहन बागान क्लब ने 1911 ई० में आई, एफ. ए. शील्ड सर्वप्रथम जीता था ।

प्रश्न 12.
‘Decline and fall of the Roman empire’ किसके द्वारा लिखा गया था?
उत्तर :
गिब्मन के द्वारा।

प्रश्न 13.
‘हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इण्डिया’ नामक पुस्तक किसने लिखा ?
उत्तर :
ताराचन्द ने।

प्रश्न 14.
लार्ड लिटन द्वारा भारतीय समाचार पत्र अधिनियम कब पारित हुआ था ?
उत्तर :
लाई लिटन द्वारा भारतीय समाचार पत्र अधिनियम 1878 ई० में पारित हुआ था।

प्रश्न 15.
‘सत्तर बच्छर’ नामक पुस्तक का प्रकाशन कब हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1927 ई० में।

प्रश्न 16.
‘जीवन स्मृति’ ग्रन्थ का प्रकाशन कब हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1912 ई० में।

प्रश्न 17.
जीवन स्मृति किसने लिखा ?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जीवन स्मृति लिखा।

प्रश्न 18.
प्रथम ओलम्पिक खेल कब तथा कहाँ आयोजित किया गया था ?
उत्तर :
प्रथम ओलम्पिक खेल 776 ई० पू॰ यूनान में आयोजित किया गया था।

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प्रश्न 19.
भारत में पहली बार रेल कहाँ से कहाँ तक चली थी ?
उत्तर :
भारत में पहली बार रेल बम्बई से ठाणे तक चली थी।

प्रश्न 20.
भारत में पहली रेल यात्रा किस वर्ष शुरू हुई थी ?
उत्तर :
भारत में पहली रेल यात्रा 1853 ई० में शुरू हुई थी।

प्रश्न 21.
भारत में सर्वप्रथम रेलवे का निर्माण कब हुआ था ?
उत्तर :
1853 ई० में भारत में सर्वप्रथम रेलवे का निर्माण हुआ था।

प्रश्न 22.
नवजागरण का प्रारम्भ सर्वप्रथम किस देश में हुआ था ?
उत्तर :
इटली में।

प्रश्न 23.
फ्रांस की सभ्यता का सर्वेक्षण किसने किया था ?
उत्तर :
रेम्बौड ने किया था।

प्रश्न 24.
किसने कहा, “इतिहास महापुरुषों की जीवन गाथा है।”
उत्तर :
कार्लाइल ने।

प्रश्न 25.
इतिहास क्या है ?
उत्तर :
मानव जीवन से जुड़ी अतीत की महत्वपूर्ण घटनाओं का लेखा-जोखा ही इतिहास कहलाता है ।

प्रश्न 26.
नगरी इतिहास के अन्तर्गत किन-किन क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है ?
उत्तर :
नगरी इतिहास के अन्तर्गत नगरों के निर्माण, विकास, जनसंख्या समस्या आदि का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 27.
सोमप्रकाश का प्रकाशन किसने एवं कब किया ?
उत्तर :
सोमप्रकाश का प्रकाशन ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने सन् 1858 ई० में किया।

प्रश्न 28.
ब्रिटेन में रेल की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर :
1820 ई० में।

प्रश्न 29.
‘जेनरल सोसाइटी’ की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
जेनरल सोसाइटी की स्थापना 1968 ई० में हुई।

प्रश्न 30.
अंग्रेजी का History किस भाषा के शब्द से लिया गया है ?
उत्तर :
अंग्रेजी का History लैटिन भाषा के ‘हिस्टोरिया’ शब्द से निकला गया है।

प्रश्न 31.
बोरिस हेसेन ने किन सिद्धान्तों का पता लगाया ?
उत्तर :
वैज्ञानिक पद्धतियों एवं खोजों के संबंध में।

प्रश्न 32.
प्राचीनकाल के कुछ खेलों का नाम बताइए।
उत्तर :
तीरंदाजी, तैराकी, कुश्ती, भारोत्तोलन तथा ऊँची कूद इत्यादि।

प्रश्न 33.
ओलम्पिक खेलों में कौन-कौन सी प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं ?
उत्तर :
दौड़, तीरंदाजी, निशानेबाजी, जिमनास्टिक, फुटबॉल, कुश्ती, कबड्ड़ इत्यादि।

प्रश्न 34.
वायुयान का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर :
ऑरविल राइट एवं बिलवर राइट ने । (राइट बन्धुओं ने)

प्रश्न 35.
भारतीय फिल्म उद्योग को किस नाम से जाता है ?
उत्तर :
बॉलीवुड (Bollywood) के नाम से।

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प्रश्न 36.
आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के प्रमुख स्रोत क्या-क्या हैं ?
उत्तर :
सरकारी प्रकाशन, मुद्रित नक्शे, निजी पत्र, फोटोग्राफ्स तथा पंजीकृत पत्र इत्यादि।

प्रश्न 37.
‘जीवन-स्मृति’ ग्रन्थ की विषय-वस्तु क्या है ?
उत्तर :
‘जीवन – स्मृति’ ग्रन्थ की विषय वस्तु रवीन्द्रनाथ टेगोर के बचपन के किया-कलापों का वर्णन है।

प्रश्न 38.
‘लेटर्स फ्रॉम ए फादर दू हिज डॉटर’ में कितने पत्रों का संग्रह है ?
उत्तर :
30 पत्रो का संग्रह है।

प्रश्न 39.
इतिहासकार ‘मूर’ ने कपास की कृषि के बारे में क्या कहा है ?
उत्तर :
इतिहासकार ‘मूर’ का मानना है कि कपास की कृषि 9 वीं शताब्दी में स्पेन में शुरू हुई।

प्रश्न 40.
उड़ीसा का सूर्य मन्दिर किसके समय में बनाया गया था ?
उत्तर :
नरसिंह देव प्रथम के समय में बनाया गया था।

प्रश्न 41.
‘हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इण्डिया’ नामक पुस्तक किसने लिखा ?
उत्तर :
ताराचन्द ने।

प्रश्न 42.
‘गवर्नमेंट आर्काइब्ज इन साउथ एशिया’ नामक पुस्तक किसने लिखा ?
उत्तर :
इल्टिस और वेनराइट ने।

प्रश्न 43.
‘इतिहास की रूपरेखा’ किसने लिखा ?
उत्तर :
एच० जी० वेल्स ने।

प्रश्न 44.
किसने छाया चित्रकारी के लिए स्टुडियो की स्थापना की थी ?
उत्तर :
बुर्ने एण्ड शेफर्ड ने।

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प्रश्न 45.
हिन्दू कॉलेज में विज्ञान की पढ़ाई का प्रारम्भ कब शुरु हुआ ?
उत्तर :
सन् 1824 ई० में।

प्रश्न 46.
अभिनय कला का प्राचीनतम उदाहरण कहाँ उपलब्ध है ?
उत्तर :
अभिनय कला का प्राचीनतम उदाहरण वेदों में एवं भरत मुनी द्वारा रचित नाद्य शारू में मिलता है ।

प्रश्न 47.
किसने कहा, “इतिहास अतीत में मानव के कार्यकलापों का विज्ञान है।”?
उत्तर :
इतिहास के जनक हेरोडोट्स ने।

प्रश्न 48.
1930 के उत्खनन में मेसोपोटामिया के किन दो नगरों के अवशेष मिले हैं।
उत्तर :
उर और मारी।

प्रश्न 49.
यूनान के थ्यूसीडायड्स ने किस पुस्तक की रचना की ?
उत्तर :
पोलोपोलेशियन युद्ध का इतिहास (The History of Polopolesian War)।

प्रश्न 50.
पट्टाभि सीतारमैया द्वारा लिखित पुस्तक का नाम क्या है ?
उत्तर :
हिस्ट्री आफ द इण्डियन नेशनल कांग्रेस (2 खण्ड)।

प्रश्न 51.
‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ में पिता और पुत्री कौन है ?
उत्तर :
पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा पुत्री इन्दिरा प्रियदशर्नी है।

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प्रश्न 52.
सोम प्रकाश पत्र क्यों प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर :
सोम प्रकाश समाचारपत्र की प्रसिद्धि का मुख्य कारण जमीदारों तथा नील के ठेकेदारों की कड़ी आलोचना तथा सभी व्यक्तियों के मत को आंदोलन के लिये संगठित करना था।

प्रश्न 53.
बंकिमचन्द्र की पुस्तके किस पत्रिका में प्रकाशित होती थीं ?
उत्तर :
बंग-दर्शन नामक पत्रिका में प्रकाशित होती थी।

प्रश्न 54.
क्षेत्रीय इतिहास के बारे में लिखें।
उत्तर :
क्षेत्रीय इतिहास को अभी तक परम्परागत इतिहास लेखन में महत्ता न दिए जाने से इसका विकास अवरूद्ध था।

प्रश्न 55.
बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना कब और किसने की थी ?
उत्तर :
बंगाल में द्वैध शासन 1765 ई० में रार्बट क्लाइव ने लागू की थी।

प्रश्न 56.
नारी इतिहास क्या है ?
उत्तर :
नारी के संघ्ष अधिकार प्राप्ति, उपलब्षि आदि विषयों का अध्ययन करने वाला सामाजिक इतिहास नारी इतिहास कहलाता है।

प्रश्न 57.
भारत के दो सामाजिक इतिहासकारों का नाम लिखिए।
उत्तर :
रंजीत गुहा, रमेश चन्द्र मजूमदार भारत के सामाजिक इतिहासकार है।

प्रश्न 58.
भारत के दो नाटककारों का नाम लिखिए।
उत्तर :
मणी माधव चाक्चार।

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प्रश्न 59.
भारत में पर्यावरण आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं का नाम लिखिए।
उत्तर :
चाँदनी प्रसाद भट्ट, सुन्दरलाल बहुगुणा एवं मेधा पाटेकर, बाबा आदि पर्यावरण आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Short Answer Type) : 2 MARKS

प्रश्न 1.
स्थानीय इतिहास के अध्ययन का क्या महत्व है ?
उत्तर :
स्थानीय इतिहास स्थान विशेष के भौगोलिक क्षेत्र की छोटी-बड़ी स्थानीय घटनायें संस्कृति, परम्परा, समाजिक, आर्थिक दशायें, खेल-कूद, कला-साहित्य की जानकारी देते है जो सभ्यता-संस्कृति के विकास में पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाते है। कुमुद नाथ मल्लिक की नदिया की कहानी, अमनातुल्ला की कुचविहार का इतिहास तथा सुधीर कुमार मित्र का हुगली जिले का इतिहास इसके उदाहरण है।

प्रश्न 2.
‘सरकारी अभिलेख’ से क्या समझते हैं ?
उत्तर :
राष्ट्रीय एवं प्रान्तीय सरकारों के अभिलेखागारो में सुरक्षित ढंग से रखे गये सरकारी प्रतिवेदन, सरकारी पत्र, प्रुलिस पत्र एवं डायरी, खुफिया रिर्पोट, साक्षात्कार आदि अन्य सरकारी दस्तावेज को सरकारी अभिलेख कहा जाता है।

प्रश्न 3.
समाचार पत्र एवं पत्रिका में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
समाचार पत्र नियमित रूप से प्रतिदिन की घटनाओं एवं सूचनाओं के साथ प्रकाशित होते है । जैसे – सोमप्रकाश 1 जबकि समाचार पत्रिका एक निश्चित अन्तराल पर एक निश्चित उद्देश्य एवं प्राथमिकता के आधार पर प्रकाशित होते है। जैसे – प्रवासी, सबुजपाता एवं बंगदर्शन।

प्रश्न 4.
परिवेश (पर्यावरण) के इतिहास का क्या महत्व है ?
उत्तर :
पर्यावरण का इतिहास मानव सभ्यता का इतिहास है। मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के मनमानी दुरूपयोग ने विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसी के प्रतिक्रिया स्वरूप पर्यावरण को बचाने के लिए ‘चिपको आन्दोलन,’ ‘नर्मदा बचाओं आन्दोलन शुरू हुआ। इस प्रकार पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना पर्यावरण इतिहास का महत्व है।

प्रश्न 5.
स्मृतिकथा अथवा आत्मकथा को आधुनिक भारतीय इतिहास के श्रोत के रूप में किस प्रकार व्यवहार किया जाता है ?
उत्तर :
इतिहास लेखन के क्षेत्र में स्मृतिकथा या आत्मजीवनी को एक प्रमाणिक स्त्रोत के रूप में व्यवहार किया जाता है इससे व्यक्तिगत गुण-स्वभाव के साथ-साथ उस समय के समाज की संस्कृति, घटनाएँ, समस्याए, राष्ट्रीय आन्दोलन आदि अन्य विविध विषयों की जानकारी मिलती है।

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प्रश्न 6.
सामाजिक इतिहास क्या है ?
उत्तर :
वह इतिहास जिसके अन्तर्गत मानव समाज के सभी वर्गों के सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों धर्म, नैतिकता, कृषि, वाणिज्य, खेल-कूद, खान-पान, वेश-भूषा, कला आदि अन्य विषयों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है, उसे सामाजिक इतिहास कहा जाता है।

प्रश्न 7.
इतिहास के स्रोत के रूप में समाचार पत्रों का क्या महत्व है ?
उत्तर :
इतिहास के स्रोत के रूप में समाचार पत्रों का यही महत्व है कि ये समसामयिक घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी होते हैं, इनसे घटनाओं की तिथी, (समय) कारण आदि अन्य बातों की क्रमबद्ध जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 8.
स्थानीय इतिहास से क्या समझते हैं ?
उत्तर :
स्थान विशेष के निवासियों की प्रकृति, इतिहास, आर्थिक क्रिया-कलाप संस्कृति, भाषा, भौगोलिक स्थिति तथा जीवन के तौर-तरीके आदि अन्य जटिल विषयों का अध्ययन स्थानीय इतिहास कहलाता है।

प्रश्न 9.
किस प्रकार एक आत्मकथा इतिहास के एक स्रोत के रूप में उपयोगी है ?
उत्तर :
स्मृति इतिहास जानने की एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है। स्मृति के द्वारा ही आत्मकथा, यात्रा-वृत्तांत, निबध लेखन आदि संपन्न होते हैं। आत्मजीवन मूलक ग्रंथों का प्रधान विषय-वस्तु स्मृति कथा है। स्मृति कथाओं की रचना विशेषकर ज्ञानी व्यक्ति ही करते हैं। उनके द्वारा दिये गये विवरण से अतीत के विभिन्न वास्तविक घटनाओं के तथ्यों की जानकारी प्राप्ति होती है।

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प्रश्न 10.
ब्रिटिश सरकार द्वारा क्यों 1878 ई० में ‘सोमप्रकाश’ पत्रिका का प्रकाशन बन्द कर दिया था ?
उत्तर :
लार्ड लिटन के वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम के पारित हो जाने पर ब्रिटिश सरकार द्वारा इस पत्र का प्रकाशन बंद कर दिया गया, क्योंकि इस पत्रिका के माध्यम से अंग्रेजी शासन के विभिन्न जनस्वार्थ विरोधी नीतियों का विरोध किया जाता था तथा जनमत तैयार किया जाता था। इस प्रकार सरकार जन विरोध की भावनाओं को रोकने के लिए सोम प्रकाश के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी।

प्रश्न 11.
इतिहास क्या हैं ? या इतिहास का अर्थ स्पष्ट करते हुए उसके अध्ययन के आधार तत्वों का उल्लेख कीजिए ?
उत्तर :
इतिहास का अर्थ : इतिहास हिन्दी के दो शब्दों इति + हास से मिलकर बना है। ‘इति का अर्थ है – ऐसा ही’ और ‘हास’ का अर्थ है – ‘हुआ है’। इस प्रकार इतिहास का अर्थ हुआ ऐसा ही हुआ है। अतः इतिहास वह सामाजिक विषय हैं। जिसके अर्न्तगत अतीत की सत्य और महत्वपूर्ण घटनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।
इतिहास के अध्ययन के तत्व : इतिहास मानव समाज के अतीत की घटनाओं का अध्ययन करने वाला महत्त्वपूर्ण सामाजिक विषय हैं। इसलियें इसके अध्ययन के मुख्य तत्व स्थान, समय (काल), व्यक्ति एवं घटनाएँ हैं। इतिहास के इन्हीं चारों तत्वों का विश्वसनीयता एवं परीक्षण के आधर पर घटनाओं का विश्लेषण कर सत्य तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 12.
सामाजिक इतिहास से क्या समझते है ? कितने भेद हैं ?
उत्तर :
सामाजिक इतिहास : मनुष्य के सामाजिक जीवनकाल के विभिन्न पक्षों और रूपों जैसे – सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, सामरिक आदि का अध्ययन किया जाता है, उसे सामाजिक इतिहास कहते हैं।

यह इतिहास के अध्ययन का एक नया दृष्टिकोण हैं। जिसमें मानव जीवन से संबंधित पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। सामाजिक इतिहास के भेद : आधुनिक इतिहासकारों ने अध्ययन की सुविधा के लिये इतिहास को दो भागों में बाँटा है :-
(अ) प्राचीन सामाजिक इतिहास
(आ) नवीन समाजिक इतिहास।

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प्रश्न 13.
इतिहास के अध्ययन में खाद्य इतिहास की भूमिका क्या है ?
उत्तर :
इतिहास द्वारा प्राचीन काल से आधुनिक काल तक लोगों के द्वारा व्यवहार में लाए गए खाद्य पदार्थों का वर्णन है। सभी इतिहासकारों का मानना है मनुष्य आरंभ में मांसाहारी प्राणी था। इसके अलावा किसी स्थान विशेष की भू-प्रकृति, जलवायु, संस्कृति, पेशा, धार्मिक विश्वास एवं परम्परा के द्वारा भी हम लोगों के खाद्य अभ्यास के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं।

प्रश्न 14.
नूतन सामाजिक इतिहास में किन-किन तथ्यों का अध्ययन किया जाता है।
उत्तर :
नूतन सामाजिक इतिहास में मानव जीवन के सामाजिक, धर्म, राष्ट्रीय, अर्थ व्यवस्था, नैतिकता, आचारव्यवहार, भोजन वस्त्र, कला संस्कृति आदि का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 15.
खाद्य इतिहास एवं पाकशैली का सूत्रपात कैसे हुआ ?
उत्तर :
नियण्डरथल मानव ने आग का आविष्कार किया और मानव मांस भुनकर खाने लगा, फलस्वरूप खाद्य इतिहास एवं पाक शैली का सूत्रपात हुआ।

प्रश्न 16.
विज्ञान प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के इतिहास से आप क्या समझते है ?
उत्तर :
इतिहास की इस शाखा में जैविक विज्ञान, इंजोनियरिंग, कम्प्यूटर और सूचना विज्ञान, भूगोल, गणित एवं विकास, दवा, न्यूरोसाइसेस, फार्मेसी, भौतिक विज्ञान, मानसिक रोगो की चिकित्सा, सार्वर्जनिक स्वास्थ एवं प्रौद्योगिक के आविष्कार एवं विकास का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 17.
फोटोग्राफी से क्या लाभ है ?
उत्तर :
फोटोग्राफी की खोज से मनुष्य के अन्दर प्रकृति का रूप, रंग एवं स्वरूप तथा मनुष्य के द्वारा बनाए गये आश्चर्यों को कैमरे में कैद करने की प्रवृत्ति बढ़ गई। फोटोग्राफी के द्वारा मनुष्य को किसी भी स्थान, व्यक्ति एवं घटना की जानकारी मिलती है।

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प्रश्न 18.
खेल के इतिहास से हमें क्या पता चलता है ?
उत्तर :
खेल के इतिहास से हमें पता चलता है कि कौन सा खेल कब, कहाँ शुरू हुआ। इनके खेलने के नियम, तौरतरीके, खिलाड़ियों के गुण-स्वभाव आदि अन्य बातों की जानकारी होती है।

प्रश्न 19.
विपिन्न चन्द्र पाल को घर क्यों छोड़ना पड़ा ?
उत्तर :
विपिन चन्द्र पाल जब बड़े हुए तो उनके पिता से उनकी अनबन हो गयी और उन्होंने स्वतंत्र-जीवन-यापन के लिए घर छोड़ दिया।

प्रश्न 20.
विपिन चन्द्र पाल कैसे व्यक्ति थे ?
उत्तर :
विपिन्न चन्द्र पाल कठोर सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे। वे टूट सकते थे पर अपने सिद्धान्त से हिल नहीं सकते थे। यही कारण है कि विपिन चन्द्र पाल को अपने व्यक्तिगत, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में संघर्ष करना पड़ा।

प्रश्न 21.
सरकारी दस्तावेज क्या है ?
उत्तर :
सरकारी दस्तावेज इतिहास तथा सरकारी क्रिया-कलापों को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसकी मदद से हमें अतीत की विभिन्न पक्षों की जानकारियाँ प्राप्त होती है, जिनका विश्लेषण कर तत्कालीन इतिहास की सत्य बातों को जाना जा सकती है। सरकारी दस्तावेज विभिन्न प्रकार के होते है, जैसे – प्रतिवेदन, विवरण, पुलिस के दस्तावेज तथा गुप्त समाचार इत्यादि।

प्रश्न 22.
नव जागरण काल किसे कहा गया है ?
उत्तर :
19 वीं शदी के प्रारम्भ में भारत के बंगाल में हुए सामाजिक, सांस्कृतिक, रजजनीतिक तथा धार्मिक आंदोलन के कारण लोगों में जागरुकता को ही नव जागरण काल कहा जाता है। नव जागरण काल मुख्यतः राजा राममोहन राय के काल से रवीन्द्रनाथ टैगोर के काल तक माना जाता है।

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प्रश्न 23.
विज्ञान प्रौद्योगिकी और चिकित्सा के इतिहास से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
इतिहास की जिस शाखा में जैविक विज्ञान, इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर और सूचना विज्ञान, भूगोल, गणित एवं विकास, दवा, न्यूरोसाइन्सेस, फार्मेसी, भौतिक विज्ञान, मानसिक रोगों की चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं प्रौद्योगिक के आविष्कार एवं विकास का अध्ययन किया जाता है। उसे विज्ञान प्रौद्योगिकी और चिकित्सा का इतिहास कहते है।

प्रश्न 24.
निम्नवर्गीय इतिहास से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
निम्नवर्गीय इतिहास से आशय उस इतिहास लेखन से है जिसके अन्तर्गत कृषक, मजदूर एवं समाज के निम्नवर्ग के लोगों के रहन-सहन, भाषा, खान-पान एवं आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 25.
आधुनिक काल के इतिहास लेखन में चलचित्र की भूमिका क्या है ?
उत्तर :
चलचित्र का इतिहास किसी समाज या देश की स्थिति का ज्ञान कराती है। कलाकारों ने विभिन्न प्रकार की भूमिकाओं एवं घटनाओं के माध्यम से सजीव चित्रण करते है, उसे देखकर उस समय की राजनीतिक दशा, सामाजिक दशा, लोगों का जीवन-यापन एवं उनकी स्थिति का ज्ञान होता है इससे इतिहास को प्रत्यक्ष रूप से देखने और महशुश करने का अवसर मिलता है जो इतिहास लिखने में चलचित्र भूमिका निभाते है ।

प्रश्न 26.
इतिहास के अध्ययन के तत्व स्वरूप आत्मजीवनी एवं संस्मरणों के महत्व क्या हैं ?
उत्तर :
स्तृति के द्वारा ही आत्मकथा, यात्रा-वृतांत, निबंध लेखन आदि संपन्न होते हैं। आत्मजीवन मृलक ग्रंथों का प्रधान विषय-वस्तु स्मृति कथा है। इस प्रकार स्मृति कथा एक प्रकार का साहित्य है जहाँ लेखक अपने जीवन में घटित घटनाओं का विवरण अपने स्मृतियों के माध्यम से प्रस्तुत करता है जो समसामयिक घटनाओं को समझने में मदद करते है।

प्रश्न 27.
जवाहरलाल नेहरू अपनी पुत्री को पत्र क्यों लिखते थे ?
उत्तर :
जवाहरलाल नेहरू जी को स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अधिकतर समय जेल में रहना पड़ता था और इन्दिरा घर पर रहती थीं, अतः नेहरू जी पत्र के माध्यम से ही उन्हे जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते थे तथा ज्ञान की अनेक बातें समझाया करते थे। इस प्रकार वे देश-दुनिया की संस्कृति की जानकारी देने के लिए अपनी पुत्री इन्दिरा को पत्र लिखा करते थे।

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प्रश्न 28.
सत्तर बच्छर की विषय-वस्तु क्या है ?
उत्तर :
सत्तर बच्छर विपिन चन्द्र पाल की आत्म जीवनी हैजिसकी विषय-वस्तु तत्कालीन भारत की राजनीतिक परिस्थितियों के उल्लेख के साथ-साथ उनकी जीवन से जुड़ी घटनायें है।

प्रश्न 29.
पर्यावरण इतिहास क्या है ?
उत्तर :
इतिहास की वह शाखा जिसमें प्रकृति एवं समय के साथ जमीन, जल, जंगल, वातावरण, जीव-मण्डल तथा मानवीय क्रियाकलापों का प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। उसे पर्यावरण इतिहास कहते है।

प्रश्न 30.
इतिहास के लेखन में फोटोग्राफी किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर :
आधुनिक भारतीय इतिहास में फोटोग्राफी का काफी महत्व है। फोटोग्राफी की खोज 19 वी शताब्दी के तीसरे दशक में हुई थी। ब्रिटिश ईस्ट-इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों ने फोटोम्राफी को काफी महत्व दिया। उनके अनुसार स्थापत्य कला, पुरातात्विक स्मारको तथा यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत को सही रूप में मूल्यांकन करने में फोटोग्राफी की भूमिका काफी सहायक सिद्ध हुई।

प्रश्न 31.
प्रथम ओलम्पिक खेल कब तथा कहाँ आयोजित किए गये ?
उत्तर :
प्रथम ओलम्पिक खेल 776 ई० पू० में यूनान के ओलम्पियाँ नगर में आयोजित किया गया। 1896 ई० में आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुन: यूनान के एथेन्स में आरम्भ किया गया जो आज तक जारी है।

प्रश्न 32.
नारीवादी आन्दोलन (फिमिनिस्ट मुवमेंट) से आप क्या जानते हैं ?
उत्तर :
जिस आंदालन के द्वारा महिलाओं के अधिकार तथा उनकी दशा सुधारने की मांग की गई, उसे ही नारीवादी आन्दोलन (फिमिनिस्ट मुवमेंट) कहा जाता है। जिसकी शुरूआत 1960 के दशक में अमेरिका तथा यूरोपीय देशों में शुरू हुआ था।

प्रश्न 33.
नया सामाजिक इतिहास और परम्परागत इतिहास में एक अन्तर बताइए।
उत्तर :
इतिहास के जिस नवीन शाखा में धर्म, नैतिकता, भोजन, कला, संस्कृति तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को जाना जाता है उसे नूतन सामाजिक इतिहास कहा जाता है जब कि परम्परागत इतिहास में वंशीय, राजनीतिक तथा संवैधानिक इतिहास का अध्ययन किया जाता है। परम्परागत इतिहास में राजनीतिक, वशीय व संवैधानिक इतिहास का अध्ययन किया जाता है।

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प्रश्न 34.
सैनिक इतिहास का उपयोग क्या है ?
उत्तर :
साधारणतया युद्ध को एक राजनीतिक क्रियाकलाप माना जाता है, परन्तु युद्ध में सैन्य इतिहास के द्वारा युद्ध के कारणों, सैन्य नीतियों, रणनीतियों तथा उनके संगठन का अध्ययन किया जाता है। जिससे सैन्य संगठन को अधिक कुशल एवं मजबूत बनाने में सैन्य इतिहास उपयोगी होते है।

प्रश्न 35.
नारी इतिहास लेखन क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
आधुनिक नारीशक्ति के संघर्ष, उपलब्धियों, गाथाओं को सही ढंग से जानने व समझने के लिए नारी इतिहास लेखन आवश्यक है।

प्रश्न 36.
जीवनेर झड़ापाता की लेखिका के कष्टों का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
विश्वप्रसिद्ध कविगुरू रवीन्द्रनाथ की भाँजी सरला देवी चौधुरानी द्वारा लिखित पुस्तक ‘जीवनेर झड़ापाता’ उनकी आत्मजीवनी है जिसमें उन्होंने अपने जीवन के कष्टों का ज़िक्र किया है कि पैदा होते ही माता से तिरस्कार, डर के मारे जोर से क्रन्दन ना करना माता द्वारा उनको कभी न चूमना न तो गोद में लेना तथा उनकी इच्छा के विरूद्ध उनकी शादी कर देना इत्यादि घटनाओं के द्वारा उनके जीवन के अनुहुए पहलुओं की जानकारी से पता चलता है जि उनका बचपन कष्टकारक था।

प्रश्न 37.
डॉ॰ जे० चौबे द्वारा प्रस्तुत ‘कैंची तथा गोंद विधि’ का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
कैंची तथा गोंद विधि उन पद्धतियों में से एक है जिसमें डॉ॰ जे० चौबे ने ऐतिहासिक स्रोतों के उपयोग की पद्धतियों का वर्णन किया है। इस पद्धति के अन्तर्गत तथ्य या साक्ष्मों को ज्यों का त्यों रचना में स्थान दिया जाता है।

प्रश्न 38.
भारत में परिवेश आंदोलन से युक्त कुछ नेताओं के नाम बताओ।
उत्तर :
चाँदनी प्रसाद भट्ट, सुन्दरलाल बहुगुणा एवं मेधा पाटेकर आदि परिवेश आंदोलन से युक्त प्रमुख नेता हैं।

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प्रश्न 39.
इतिहास की विचित्रता से तुम क्या समझते हो ?
उत्तर :
इतिहास की विचित्रता से यही समझा जाता है कि इतिहास के माध्यम से प्राचीन या अतीत की समस्त विषयों एवं घटनाओं का अध्ययन किया जाता है और उसकी जानकारी प्राप्त होती है।

प्रश्न 40.
विपिन चन्द्र पाल की ‘सत्तर बच्छर’ का ऐतिहासिक महत्व क्या है ?
उत्तर :
‘सत्तर बन्छर’ के लेखक विपिन चन्द्र पाल हैं। इस पुस्तक में उन्होंने अपने जीवन के उन महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन किया है जिसके द्वारा हमें उनके स्वभाव, सिद्धान्त एवं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनके कारों का पता चलता है। विपिन चन्द्र पाल एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे, उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया।

संक्षिप्त प्रश्नोत्तर (Brief Answer Type) : 4 MARKS

प्रश्न 1.
नारी इतिहास के ऊपर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
विधाता की नायाब सृष्टि नारी का इतिहास उनके अस्तित्व के संघर्ष, उपलब्धियों एवं योगदान का इतिहास है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक इनका इतिहास संघर्ष तथा योगदान से भरा पड़ा है। मध्यकाल में इनकी छबि घूमिल हुई, निसके कारण उन्हें अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ा। इसी खोये हुए आत्मसम्मान और अधिकारों की प्राप्ति के लिए उन्हें आन्दोलन करने पड़े जिसे ‘नारीवादी आन्दोलन’ कहा जाता है। इस आन्दोलन से राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें काफी बल मिला है।

आज की नारी अपने अधिकार और कर्त्तव्य के प्रति सजग है। वह विविध शक्ति रूपों जैसे – माँ, पत्नी, गृहिणी, क्षत्राणी, खिलाड़ी, वीरागंना आदि रूपों में संस्कृति एवं परम्पराओं की संरक्षिका, शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, स्वतन्त्रता आन्दोलन, विज्ञान-तकनीकी, राजनीति, प्रशासनिक, साहित्यिक, अन्तरीक्ष विज्ञान, कला-खेलकुद सभी क्षेत्रों में अपने कर्त्तव्य कर्मठता और सुजनशीलता के माध्यम से राष्ट्र के निर्माण और विकास में अपना अभूतपूर्व योगदान देते हुए, पुरूष प्रधान समाज को चुनौती दे रही है। इस प्रकार नारी की उपस्थिति, योग्यता, योगदान, उपलब्धिया, मार्मिकता एवं सृजनशीलता प्रत्यक्ष रूप से उनके अस्तित्व का परिचय देती है। चाहे लोपा, मत्रेयी या गार्गी हो चाहे रजिया, नेफरतीती या जीजा बाई होचाहे कल्पना चावला, सुनिता विलियम, इन्दिरा गाँधी, कुमार भण्डारनायके, एनजेला मैथुज व मार्गेट थैचर हो, ये सभी नारियाँ इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में तथा नारी समाज को जागृत एवं प्रेरित करने का कार्य किया।

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प्रश्न 2.
दृश्य कला की एतिहासिक क्षेत्र में चित्रकारी तथा छाया चित्रण (फोटोग्राफी) का विकाश भारत में किस प्रकार हुआ ?
अथवा
आधुनिक इतिहास के अध्ययन में दृश्य कला की धारणाओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक इतिहास की इस शाखा में चित्रकला और छायाचित्र कला के ऐतिहासिक लक्षणों का अध्ययन किया जाता है। चित्रकारी : औपनिवेशिक शासन में कई तरंह के नए कला रूपों, शैलियों, सामग्री और तकनीकों का सूत्रपात हुआ, इन्हें भारतीय कलाकारों ने सभभन्त और जनसाधारण दोनों ही क्षेत्रों ने अपने स्थानीय ग्राहकों और बाजारों के हिसाब से अपनाकर नई शक्ल दी। आप पाएंगे कि जिन दृश्य कलाओं को आप आज स्वाभाविक मान लेते हैं, उनमें से बहुत सारी कलाओं का जन्म उसी काल में हुआ था। उदाहरण के लिए बुर्जियों, मीनारों और महुराबों वाली भव्य सार्वजनिक इमारतें, कई मनोहारी दृश्य, तस्वीर में यथार्थ परक मानव छ्छवि या किसी देवी-देवता की तस्वीर तथा मशीनों द्वारा असंख्य मात्रा में छापी गई तस्वीरें आदि इसी तरह के उदाहरण हैं। मध्ययुग के शासकों ने चित्रकला में अपनी रूचि दिखाते हुए उस समय के प्रमुख चित्रकारों को अपना राजाश्रय दिया। कुछ प्रमुख चित्रकारों तथा उनकी चित्रकारी जैसे लियोनार्दो द विशी कृत मोनालिसा, राफेल कृत द लॉस्ट सॉपर इत्यादि प्रमुख हैं।

छायाचित्रण : उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोप से कई छाया-चित्रकार भारत आने लगे थे। उन्होंने तस्वीरें खींची, स्टुडियो खोले और छायाचित्रकारी की कला को बढ़ावा देने के लिए छायाचित्रकारों से जुड़ी समितियों का गठन किया। इनमें से कुछ ऐसे चित्रकार थे जो अंग्रेज अफसरों की तस्वीरें खींचने लगे थे। इन तस्वीरों में अंग्रेज अफसरों को रोबीले और ताकतवर अंदाज में दिखाया जाता था। कई छायाचित्रकारों ने टूटी-फूटी इमारतों और मनोहारी भू-दृश्यों की खोज में देशभर की यात्राएँ की। कई छाया चित्रकार ऐसे थे जो ब्रिटिश सैनिक विजय के दृश्यों को कैमरे में कैद करते थे। इनके अलावा कई ऐसे छाया चित्रकार भी थे जो भारत को एक आदिम देश साबित करने के लिए यहाँ की सांस्कृतिक विविधता को दर्ज कर रहे थे।

प्रश्न 3.
नवीन सामाजिक इतिहास से आप क्या समझते हैं ? इस प्रकार के इतिहास लेखन की शुरुआत कब व किसके द्वारा शुरू हुआ है ?
उत्तर :
नवीन सामाजिक इतिहास : सामाजिक इतिहास की वह नवीन शाखा जिसके अन्तर्गत सामज की छोटी-बड़ी वे सभी घटनाएँ जो साधारण से साधारण लोगों के जीवन से सम्बंधित हैं। और किसी न किसी रूप में समाज को प्रेरित व आन्दोलित करती हैं, उसे नवीन सामजिक इतिहास कहते हैं।
नवीन समाजिक इतिहास के अर्त्तगत मनुष्य के सामाजिक जीवन के सभी पक्षों, धर्म, आर्थिक क्रियाकलाप, नैतिकता, रीत-रीवाज, खान-पान, भेष-भूषा, खेल-कूद, नृत्य-संगीत, युद्ध आदि का अध्ययन किया जाता है।
नवीन समाजिक अध्ययन की शुरूआत : सर्वप्रथम नीवन समाजिक इतिहास के लेखन की शुरुआत 1960 ई० में जर्मन इतिहासकार रील और फ्रेटेग ने शुरू की थी। इसके बाद इस तरह के इतिहास लिखने की शुरुआत अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, कनाडा में तेजी से शुरु हुई। आज विश्व के हर देशों में ऐसे इतिहास लिखे और पढ़े जाने लगे है।

प्रश्न 4.
नवीन समाजिक इतिहास के विभिन्न आयाम या रूपों से आप क्या समझते हैं ? उन रूपों में से कुछ महत्वपूर्ण रूपों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर :
नवीन सामाजिक इतिहास के आयाम/प्रकार/रूप : नवीन सामाजिक इतिहास के विभिन्न आयाम या स्वरूप का अर्थ हैं मनुष्य के सामाजिक जीवन के सभी प्रकार की घटनाओं का अध्ययन करने से है। इस इतिहास के अन्तर्गत केवल बड़े-बड़े व्यक्तियों के बड़े-बड़े कारनामों का ही नहीं बल्कि साधारण से साधारण लोगों के जीवन एवं उपलब्धियों से जुड़ी घटनाओं का अध्ययन किया जाता है।

नवीन सामाजिक इतिहास के भेद या प्रकार : नवीन समाजिक इतिहास के अध्ययन ने इतिहास के अध्ययन के विषय क्षेत्र को अधिक व्यापक बना दिया हैं। इस दृष्टि से नवीन सामाजिक इतिहास के अर्त्तगत इतिहास के कई आयाम और रूप का विकास हुआ है। जिनमें से कुछ प्रमुख आयाम खेल-कूद का इतिहास, पाक (भोजन) कला का इतिहास, निष्पादित कलाओं का इतिहास, वस्त्रों का इतिहास, दृष्य कला का इतिहास, वास्तुकला का इतिहास, यातायात का इतिहास, स्थानीय इतिहास, सैनिक इतिहास, शहरी इतिहास, पर्यावरण इतिहास, विज्ञान-तकनीकी का इतिहास, महिलाओं का इतिहास, सरकारी दस्तावेज एवं प्रशासनिक इतिहास आदि प्रमुख हैं।

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प्रश्न 5.
ऐतिहासिक स्रोत से क्या समझते हैं ? इसके कितने प्रकार हैं ? यह किस प्रकार इतिहस लेखन में उपयोगी होते हैं ?
Ans.
ऐतिहासिक स्रोत : वह विषय, वस्तु या सामग्री जो अपने काल की इतिहास लिखने और बताने में सहायक होते हैं, उन्हें ऐतिहासिक स्रोत कहते हैं। जैसे : पुरातात्विक अवशेष, शीलालेख, प्राचीन-मुद्राएँ, सरकारी दस्तावेज, समाचार पत्र-पत्रिकाएँ लेखकों के लिखी आत्मकथाएँ ये सभी ऐतिहासिक सोत के उदाहरण हैं।

ऐतिहासिक स्रोत के प्रकार : ऐतिहासिक स्रोतों के दो प्रकार हैं – (i) प्राथमिक स्रोत या प्रधान स्रोत (ii) द्वितीय स्रोत या गोण स्रोत
(i) प्राथमिक या प्रधान स्रोत : वे ऐतिहासिक स्रोत जो मौलिक एवं प्रत्यक्ष रूप में पाये जाते है तथा विश्वसनीय एवं प्रमाणित होते हैं, उन्हें प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोत कहते हैं। पत्र-पत्रिकायें, आत्मकथाएँ, मौलिक सोतों के आधार पर ऐंतिहासिक पुस्तकें आदि हैं।

(ii) द्वितीय या गौण स्रोत : वे एतिहासिक स्रोत जो विभिन्न मौलिक स्रोतों के आधार पर इतिहासकारों द्वारा पुस्तकें लिखी जाती हैं, वे सब द्वितीय एतिहासिक स्रोत कहलाते हैं। जैसे :- इतिहासकार एडम स्मिथ की लिखी पुस्तक ‘ ‘बिटिश इण्डया”, जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी एतिहासिक पुस्तक “भारत एक खोज” क्लहर की लिखी पुस्तक ‘राज तररगिनी इत्यादि। इतिहास लेखन में उपयोग एव/महत्व : इतिहास के मौलिक एवं गौण दोनों स्रोत विभिन्न प्रकार की एतिहासिक सूचनाएँ प्रदान करते हैं। ये सूचनाएँ इतिहास के विद्यार्थी के लिए शोध या खोज करने में उपयोगी होते हैं। और एक पेशेवर इतिहास लेखन के लिए प्रमाणित सोत प्रदान करते हैं। इस प्रकार एतिहासिक सोत मनुष्य के ज्ञान बढ़ाने और इतिहास लेखन में उपयोगी होती हैं।

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प्रश्न 6.
सोमप्रकाश पत्रिका का संपादन कब और किसने शुरू किया ? इस पत्रिका का महत्व या भारतीय आन्दोलन में इसके योगदान का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
Ans.
सोमप्रकाश समाचार पत्र या पत्रिका : सोमप्रकाश समाचार पत्रिका का प्रकाशन 15 नवम्बर 1858 ई० में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने कलकत्ता में किया था। इसका प्रथम सम्पादक द्वारिकानाथ विद्याभूषण थे।
सोमप्रकाश पत्रिका का योगदान : सोमप्रकाश बंगला भाषा में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाला अपने समय का एक चर्चित साप्ताहिक समाचार पत्र था। यह पत्रिका बहुत कम समय में अपनी भाषा की सरलता, निडरता के साथ-साथ आलोचनाओं के कारण ख्याति (प्रसिद्धि) प्राप्त कर ली। प्रति सोमवार को प्रकाशित होने के कारण इस पत्रिका का नाम

सोमप्रकाश पड़ा था। इस पत्रिका ने अंग्रेजों की शोषण नीति, नील किसानों का शोषण, जमींदारों, उद्योगपतियों के अत्याचार, मजदूरों के हितों की रक्षा, बाल-विवाह, बली प्रथा, कुलीन प्रथा का विरोध, विधवा विवाह तथा स्त्री शिक्षा के प्रचार-प्रसार में इस पत्रिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह पत्र बिना किसी डर-भय के अंग्रेजों की शासन नीति और अत्याचार का खुलकर विरोध किया तथा देशवासियों के अन्दर राजनीतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जगारूकता पैदा की।

इस समय की सभी छोटी-बड़ी महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं आर्थिक घटनाएँ इसी पत्रिका में छपा करती थी। इस कारण इस पत्रिका ने अंग्रेजों के विरूद्ध देश की जनता को जागृत एवं संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब 1878 ई० में तत्कालीन वायराय लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट कानून लागू किया, तो उसका सबसे पहला शिकार सोमप्रकाश पत्रिका ही बना अर्थात् अंग्रेजों को शर्तों को न मानने के कारण इस पत्रिका का प्रकाशन बन्द कर देना पड़ा। इस प्रकार आधुनिक भारत को एक नई दिशा देने, भारतीयों की आवाज को बुलंद करने और उनके स्वाभीमान को अंग्रेजों के सामने न झुकने का साहस दिखाया। इस प्रकार सोमप्रकाश पत्रिका ने देश में जागरूकता, उत्साह, साहस एवं देशप्रेम की भावना को जगाने में अमूल्य योगदान दिया।

प्रश्न 7.
यातायात के इतिहास की विशेषता लिखिए।
अथवा
यातायात के इतिहास के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर :
परिवहन का इतिहास हमें नये वैज्ञानिक आविष्कारों के विषय में बतलाता है। विज्ञान की उन्नति से ही परिवहन की उन्नति हुई। जल, स्थल तथा वायु परिवहन सभी विज्ञान के आविष्कार से ही प्रगतिशील हुए। मनुष्य ने सबसे पहले स्थल यातायात की सुविधा दूर-दराज जाने के लिए किया था जो घोड़ों या बैलों से खींची जानेवाली गाडियाँ थीं। फिर उसके बाद यातायात के साधनों में डोंगी, छोटी नाव प्रमुख थी जिससे जलमार्ग द्वारा यात्रा होती थी। धीरे-धीरे यातायात के क्षेत्रों में विकास होता गया। कच्ची सड़कों के स्थान पर पक्की सड़के बनने लगी। जल एवं स्थल से बढ़कर मनुष्य ने वायुमार्ग से भी यातायात के साधनों को बनाया।

पटरियों पर दौड़नेवाली रेलगाड़ियाँ बनाई गई, जल में चलनेवाली छोटी नाव की जगह विशाल एवं कई मंजलों वाली जलयान बनाए गए। यातायात के क्षेत्र में सबसे अधिक विकास औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप हुआ। औद्योगिक क्रांति ने मोटर से चलनेवाले यातायात के साधन बनाए तथा उनके चलने लायक पक्की सड़कें बनाई। आज सड़कों पर साइकिल, मोटर साइकिल, बस, ट्रक, कार एवं इलेक्ट्रानिक गाड़ियां जैसे ट्राम इत्यादि बहुतायत चलती हैं। भारत में पहली बार रेल 1853 ई० में बम्बई से ठाणे तक चली थी। पक्षियों को आकाश में उड़ते देख कभी मनुष्य ने भी इसी तरह उड़ने की कल्पना की थी और उसने अपने मेहनत और लगन से अपने सपने को साकार किया। इस दिशा में प्रथम प्रयास पतंग के रूप में रहा। तत्पश्चात गुख्बारा बनाकर उड़ाया गया। ‘राईट ब्रादर, ऑरबिल राईट और बिलवर राइट” ‘ने इस दिशा में नई उपलब्धियाँ प्राप्त की तथा वायुयान का आविष्कार किया।

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प्रश्न 8.
स्थानीय या आंचलिक इतिहास की विशेषता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
स्थानीय या आंचलिक इतिहास : किसी स्थान या क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले मानव समुदाय के समाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, लोक गाथाएँ आदि की सूचनाओं का संग्रह करने वाला इतिहास आंचलिक या स्थानीय इतिहास कहलाता है। आंचलिक इतिहास में स्थानीय राजाओं – महाराजाओं, प्रजा और उनके क्रियाकलाप का वर्णन होता है। कल्हण द्वारा कशमीर की राजाओं या राजवशो पर लिखी गई पुस्तक ‘राजतरंगिनि” भारत की पहली ऐतिहासिक ग्रंथ स्थानीय इतिहास का उदाहरण है।

इसमें उस स्थान के सांस्कृतिक एवं सामाजिक दशा का वर्णन होता है। घटनाओं की जानकारी स्थानीय लोगों के द्वारा लिखित पत्रों या मौखिक रूप में मिलती है। स्थानीय इतिहास से उन स्थानों की जानाकरी प्राप्त होती है जिनका उल्लेख या महत्व ज्यादा नहीं होता है। इन ऐतिहासिक तथ्यों का संग्रह इतिहासकारों द्वारा शौकिया किया गया होता है जिससे वास्तविक स्थिति का ज्ञान पूरी तरह नहीं हो पाता है।

प्रश्न 9.
खेल-कूद का इतिहास पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
खेल -कूद का इतिहास : मनुष्य के सामाजिक जीवन के शुरुआत के साथ ही मनोरजन के साधन के रूप में खेल-कूद का विकास हो चुका था। मनुष्य के बढ़ते ज्ञान और साधनों ने खेल के रूप एवं प्रकार को परिवर्तित किया जिससे नये-नये खेलो का विकास हुआ। कुश्ती विश्र का सबसे पुराना खेल है। प्राचीन काल में कुश्ती के अलावा दौड़, ऊँची-लम्बी कूद, तैराकी, निशानेबाजी, वजन उठाना, घुड़सवारी जैसे खेल-खेले जाते थे। आजके प्रचलित खेलों में क्रिकेट, टेनिस, फुटबाल, हॉकी बेस-बाल, तैराकी आदि प्रमुख हैं।

आज विभ का सबसे प्रचलित जो ओलम्पिक खेल खेला जाता है। इसकी शुरुआत 776 ई०पू० यूनान के ओल्मपिया नगर से शुरु हुआ था। बीच में 393 ई० के आस-पास रोमन सम्राट थीयोडोसिस ने इस पर रोक लगा दिया था। बाद में 1892 ई० में फ्रांस के प्रयास से इसकी शुरुआत हुई। आज ओलम्पिक (olympic) का खेल विश्भ के भाई-चारे, एकता, शक्ति, शांति और सम्पन्नता का प्रतीक बन गया हैं, इस खेल का आयोजन प्रति चौथे वर्ष में होता है और खेला जाता है।

इस प्रकार खेलो का इतिहास उतना ही पुराना और महत्वपूर्ण है। जितना पुराना मनुष्य और उसका इतिहास है। प्राचीन काल में जब लोगों के पास मनोरंजन के साधन नहीं थे, उस समय खेल-कूद ही मनोरंजन का प्रमुख साधन था, और आज भी बना हुआ है।

प्रश्न 10.
सैनिक इतिहास क्या है ? इसके महत्व पर प्रकाश डालिये।
उत्तर :
सैनिक इतिहास : आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं से देश एवं उसके नागरिको की रक्षा करने वाले वीर,साहसी, लडाकू. योद्धाओ को सैनिक कहते हैं तथा सैनिको के युद्ध की कला, हथियार, अस्त्र-शस्त्र आदि के निर्माण रख-रखाव संचालन, युद्ध के कारण, परिणाम, महत्व, सैनिक के जीवन का इतिहास आदि अन्य विषयों का अध्ययन करने वाला विषय सैनिक इतिहास कहलाता है।

सैनिक इतिहास का महत्व : भारत के प्रसिद्ध कूटनीतिज़ चाणक्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र के सप्तांग सूत्र में सैनिको एवं उनके युद्ध का महत्व का उल्लेख करते हुए कहा है, कि जिस देश की सेना अधिक शक्तिशाली, कुशल अस्त्र-शस्त्रों से युक्त होती है, वो राज्य ही सुरक्षित, शक्तिशाली बन सकता है। इस प्रकार सैनिक इतिहास से हमे उनके खान-पान, रहन-सहन, नियमप्रशिक्षण, युद्ध कला, तकनीकी, हथियारों के निर्माण-संचालन, युद्ध के जय-पराजयों की गाथाओं, नये-नये अस्वों की खोज, उनकी जासूसी आदि बातों की जानकारियाँ प्राप्त होती है, ये सभी जानकारियाँ सैन्य शक्ति को मजबूत बनाती है, जिसकी मजबूती पर देश और नागरिको का जीवन निर्भर करता है, इस कारण सैनिक इतिहास के अध्ययन का महत्व बढ़ जाता है।

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प्रश्न 11.
पर्यावरण इतिहास और उसके महत्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर :
पर्यावरण इतिहास : पर्यावरण इतिहास का अर्थ मानव संसार के संदर्भ में अतीतकाल (भूतकाल) के पर्यावरण के उन परिस्थितियों का अध्ययन करना है। जिसने मानवीय क्रियायों को प्रभावित किया। अत: मानवीय क्रियायों के सम्बन्ध में प्राकृतिक वातावरण के अच्छे व बुरे प्रभावों का अध्ययन पर्यावरण इतिहास कहलाता है।

पर्यावरण इतिहास के अध्ययन की शुरुआत 1960 ई० में अमेरिका से शुरु हुई जो आज धीरे-धीरे पुरे विश्ष में प्रचलित होकर इतिहास के एक महत्वपूर्ण विषय-वस्तु के रूप में स्थापित हो चुका है। पर्यावरण इतिहास के अन्तर्गत मुख्य रुप से तीन विषयों प्रकृति का बदलता स्वरूप प्रभाव और प्रकृति के वस्तुओ का उपयोग, प्रकृति और मनुष्य के समन्वय (सहयोग) से उत्पन्न परिस्थितियों का प्रभाव आदि का अध्ययन किया जाता है।

पर्यावरण इतिहास का महत्व या प्रभाव : पर्यावरण इतिहास का महत्व या प्रभाव यही है कि ये प्रकृति और मनुष्य के मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को दर्शाता है प्रकृति से मनुष्य का प्राचीन काल से ही सम्बन्ध रहा है। इसी प्रकृति के मिट्टी में लोटपोट कर प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर आज मनुष्य यहाँ तक पहुँचा है। किन्तु आज मनुष्य प्रकृति को एक वस्तु मानकर उपयोग करने लगा है। इस कारण पर्यावरण सम्बन्धी उसकी समस्याये-सूखा, बाढ़, मिट्टी अपक्षरण, प्रदूषण जैसीसमस्याएं पैदा हो गई है जिसने मानव सहित पृथ्वी के समस्त जीवधारियों के जीवन के लिये संकट पैदा कर दिया है।

इस प्रकार पर्यावरण इतिहास ने पर्यावरण के उपयोग, बचाव, संरक्षण में योगदान दिया है। आज पर्यावरण को स्वस्थ, सुंदर और सुरक्षित बनाये रखने के लिए कई पर्यावरण आन्दोलन चलाए जा रहे हैं, या गये है। पर्यावरण आन्दोलनों में ‘सुंदरलाल बहुगुणा’ द्वारा गढ़वाल का ‘चिपको आन्दोलन’ तथा ‘बाबा आमटे’ और ‘मेधा पाटेकर’ का ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने वाला पर्यावरण आन्दोलन था। इस तरह पर्यावरण आन्दोलन से जनता में यह जागरण हुआ कि वह उसके रक्षा के लिए सक्रीय हुआ।

प्रश्न 12.
सरकारी दस्तावेज से आप क्या समझते हैं ? यह किस प्रकार इतिहास लेखन में सहायक सिद्ध हुआ है ? उदाहरण सहित इसका स्पष्टीकरण कीजिए।
उत्तर :
सरकारी दस्तावेज (प्रपत्र) : सरकारी दस्तावेज का अर्थ सरकार के उन कागज पत्रों से है जो समय-समय पर एक विभाग के अधिकारी द्वारा दूसरे विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को लिखे जाते हैं। वे सब कागजात सरकारी दस्तावेज कहलाते हैं। इन दस्तावेजो को सरकार द्वारा प्रमाणित तथ्य के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं।
एक सरकारी दस्तावेज के अन्तर्गत अधिकारियों के पत्र, रिर्पोट, आँकड़े, खोज एवं जाँच पत्र समय-समय पर जारी सूचनाएँ, आदि आते हैं।

इतिहास लेखन में योगदान : सरकारी दस्तावेज इतिहास के प्राथमिक स्रोत होते हैं जो योग्य अधिकारियों एवं विद्धानों द्वारा लिखे जाते हैं इस कारण ये अधिक तथ्यपूर्ण, प्रमाणित और विश्शनीय माने जाते हैं। इस कारण इन दस्तावेजो से मिलने वाली सूचनाएँ इतिहास लिखने में तथा इतिहास के शोधकर्त्ता के लिए अधिक उपयोगी और लाभदायक होते हैं।

सरकारी दस्तावेज के सम्बंध में 1905 ई० में ‘लाई्ड कर्जन’ का यह पत्र बताता है कि 1905 ई० में धर्म, जाति एवं भाषा के आधार पर बंगाल का विभाजन कर बंगाल की जनता सहित पूरे देश में फूट डालकर देश को कमजोर बनाना और उन पर मजबूती के साथ शासन करंना था। जबकि उसने उस समय जनता के सामने घोषणा की थी कि प्रशासनिक सुविधा के लिए बंगाल का विभाजन करना आवश्यक है; कर्जन का यह सरकारी पत्र बतलाता है कि कर्जन (उसने) जनता से मिथ्या बोला था। इस तरह सरकारी दस्तावेज घटनाओं का प्रमाणिक बनाने में सबूत का कार्य करते हैं।

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प्रश्न 13.
आत्मकथा या जीवनी से आप क्या समझते हैं ? यह किस प्रकार इतिहास लेखन में उपयोगी है ?
उत्तर :
आत्मकथा/जीवनी :-जब कोई व्यक्ति अपने जीवन से सम्बंधित कार्यों एवं घटनाओं को ईमानदारी से लिखकर या लिखवाकर समाज के सामने प्रस्तुत करता है; तो इस तरह की लिखित पुस्तकें आत्मकथा/जीवनी कहलाती हैं।

इतिहास लेखन में उपयोगी :- आत्मकथा व्यक्ति विशेष के जीवन से सम्बन्धित सत्य घटनाओं के आधार पर लिखी जाती है; इसलिए ये प्रमाणित और विश्शसनीय माने जाते हैं। ऐसी पुस्तके इतिहास के प्राथमिक स्रोत मानी जाती हैं। इन पुस्तकों से अतीत की बहुत सी बातों की जानकारी होती हैं। जो उस समय किसी कारणवश सत्य बाते सामने नहीं आ सकी। कुछ विद्वान आत्मकथा की विश्धसनीयता पर संदेह व्यक्त करते हैं।

व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार अपने फायदे के लिऐ सच्चाई को तोड़-मड़ोर कर प्रस्तुत करते हैं, फिर भी जीवनी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इतिहास लेखन के प्राथमिक प्रमाणिक (प्रमाणित) स्रोत के रूप में अधिक उपयोगी होते हैं। अब्दुल कलाम आजाद की आत्मकथा “अग्नि की उड़ान” तथा सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा पुस्तके ‘प्लेइंग इट माईवे” (“Playing it my way”) ऐसे हीं प्रसिद्ध पुस्तके हैं जो उनके जीवन से सम्बन्धित बातो को समाज के सामने उजागर करने मे सहायक व लाभकारी है।

प्रश्न 14.
बंग-दर्शन पत्रिका का सम्पादन कब और किसके द्वारा शुरू की गयी थी ? यह पत्रिका देशानासियों में किस प्रकार से राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने में सहायक सिद्ध हुई ?
उत्तर :
बंग-दर्शन पत्रिका : बंग-दर्शन बंगला भाषा में प्रकाशित होने वाली एक मासिक पत्रिका थी। इस पत्रिका का प्रकाशन श्री बकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा 1872 ई० में कलकत्ता से शुरू की गयी थी।
इस पत्रिका के माध्यम से हमें उस समय के उपन्यासों, कहानियों, हास्य-व्यंग्य चित्रों, निबन्धों, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, एवं उनकी सूचनाओं आदि विषयों के भिन्न-भिन्न पक्षों की जानकारी प्राप्त होती है।

बंग-दर्शन पत्रिका का भारत की राष्ट्रीयता में योगदान/महत्व : बंगाली जाति के पहचान को देश-दुनिया में उजागर करने एवं बंगाल सहित पूरे देश में राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने में बंग-दर्शन पत्रिका ने महत्वपर्ण योगदान दिया था। इस पत्रिका द्वारा पढ़े-लिखे एवं साधारण वर्ग दोनों के विकास कार्यो का प्रचार होता था, जिससे लोग एक-दूसरे की भावना से परिचित होते थे। इस पत्रिका में पश्चिमी रंग-ढंग में ढले बंगाली बाबू पर व्यंग किया जाता था।

इस पत्रिका में मुस्लिम जमींदारों के विरुद्ध विद्रोह, सन्यासी विद्रोह का भी वर्णन किया गया था; जिससे लोग प्रभावित होकर उस आन्दोलन के पक्ष में उठ-खड़े हुए थे। ‘आनन्दमठ’ उपन्यास की क्रान्तिकारी घटनाओं के प्रकाशन ने देश के नवयुवकों में आजादी की प्राप्ति के लिए संघर्ष करने को प्रेरित किया। फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों में क्रान्तिकारी एवं राजनीतिक संगठनों की स्थापना हुई। आनन्दमठ का ‘बन्दे मात्रम’ गीत-गाते अजादी के दिवाने स्वतंत्रता की बलीबेदी पर कुर्बान हो जाया करते थे।

इस प्रकार बंग-दर्शन पत्रिका ने एक तरफ देश के लोगों को सांस्कृतिक गौरव की प्राप्ति के लिए उत्साहित किया तो दूसरी तरफ अंग्रेजों के शासन के शोषण और अत्याचार के विरुद्ध घृणा और नफरत की भावना पैदा की और इसी भावना ने देश के जन-जन के मन में देश-प्रेम की भावना अर्थात राष्ट्रीयता की भावना को जन्म दिया और आजादी प्राप्ति के लिए लड़नेमरने को तैयार हो गये। इस प्रकार बंग-दर्शन पत्रिका ने देश में राष्ट्रीयता के विकास में अमूल्य योगदान दिया था।

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प्रश्न 15.
आधुनिक इतिहास के अध्ययन के तत्वों में पुलिस एवं गुप्तचरों द्वारा पालन की गई भूमिकाओं की चर्चा करो साथ ही इतिहास की व्याख्या में इन तत्वों की उपयोगिता का भी उल्लेख कीजिए।
अथवा
भारत के आधुनिक इतिहास को जानने में सरकारी दस्तावेजों की उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक भारत के इतिहास को जानने के विभिन्न साधन में सरकारी दस्तावेज एक महत्वपूर्ण सोत है। इनकी मदद से हमें अतीत की घटनाओं की तारीख, स्थान आदि कई महत्वपूर्ण जानकारीयाँ प्राप्त होती हैं। इन जानकारियों को संभाल कर रखा गया था इसलिए इनके नष्ट होने की संभावना भी बहुत कम है।

रिपोर्ट : किसी भी घटना की सरकारी जाँच होती थी एवं सरकार के द्वारा उस घटना पर एक रिपोर्ट तैयार की जाती थी। इन रिपोरों में उस घटना की विस्तृत जानकारी होती थी। उस घटना के आरंभ से लेकर अन्त तक सरकार द्वारा उठाये गये कदम, उस घटना से जुड़े लोगों की जानकारियाँ, सरकारी अफसरों के बयान आदि सभी विषय एकत्रित की गई होती थी। पुलिस की चिट्ठी : किसी भी घटना की जानकारी सबसे पहले पुलिस को होती थी। पहले के समय में चिट्ठियों के द्वारा अधिकारियों तक सूचना पहुँचाई जाती थी। इन चिट्टियों में घटनाओं की जानकारियाँ लिखी होती थी। इन चिट्ठियों के द्वारा उस घटना की पूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इन चिट्ठयों में भेजने वाले एवं पाने वाले दोनों अधिकारियों के नाम लिखे होते थे इस कारण पुलिस पत्र समसामयिक घटनाओं के जानकारी के प्रमाणिक स्रोत माने जाते है।

गोपनीय सूचना : किसी भी घटना की जानकारी या पहले से उक्त घटना के घटने की आशंका को ध्यान में रुख कर सरकार के द्वारा पहले से कई स्थानों पर गुप्तचर लगे रहते थे। इनके द्वारा किसी घटना की सूचना सरकार को पहले मिल जाती थी। ऐसे ही खबर सरकारी विभागों में भी होते थे जो सरकार की सूचनाओं को समाचार-पत्रों एवं विशिष्ट व्यक्तियों को बतलाते थे। इनकी सूचनाएँ भी इतिहास को सही तरींक से जानने में सहायक सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 16.
विपिन चन्द्र पाल द्वारा रचित ‘सत्तर बच्छर’ नाम की आत्म-जीवनी का मुख्य मुद्दा क्या है ?
अथवा
सत्तर बच्छर से हमें कौन-सी ऐतिहासिक जानकारी मिलती है ?
उत्तर :
सत्तर बच्छर : सत्तर बच्छर के लेखक विपिन चन्द्र पाल हैं। यह उनकी आत्मकथा है। इस पुस्तक का प्रकाशन 1927 ई० में हुआ था। इस पुस्तक में उन्होंने अपने जीवन के उन महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन किया है जिसके द्वारा हमें उनके स्वभाव, सिद्धान्त एवं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनके कार्ये का पता चलता है। यह पुस्तक करीब 650 पृष्ठों का है। विपिन चन्द्र पाल ने लोगों को इस पुस्तक की सच्चाई से अवगत कराने के लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण तध्यों को सबके समक्ष उपस्थित करने का प्रयास किया। इस पुस्तक से हमें पता चलता है कि विपिन चन्द्र पाल एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे, उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया।

यहाँ तक कीउनके अनेक सिद्धान्त पिता और पुत्र के मधुर सम्बन्धों के बीच अनबन के कारण बन गये। इस कारण इन्होंने अपने पिता से गुजारा भत्ता लेने से भी इंकार कर दिया और रोजो-रोटी की खोजमें घर छोड़ना पड़ा। इसी क्रम में इन्होंने कटक में प्रधानाध्यापक का कार्य भार संभाला। लेकिन वहाँ भी विद्यालय के प्रबंधक से इनके विचार नहीं मिले जिसके कारण इन्होंने प्रधानाध्यापक के पद से त्याग पत्र दे दिया। विपिन चन्द्र पाल कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे लाल-बाल-पाल की प्रसिद्ध तिकड़ी के सद्स्य थे। इनकी आत्मकथा में तत्कालीन भारत की राजनीतिक परिस्थितियों की महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती है। कांग्रेस के द्वारा चलाये गए विभिन्न आन्दोलनों की विस्तृत जानकारारयाँ, रणनीति एवं तत्कालीन परिस्थितियों का स्पष्ट ज्ञान इस पुस्तक से प्राप्त होता है।

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प्रश्न 17.
सरला देकें की रचना ‘जीवनेर झड़ापाता’ एवं रवीन्द्र नाथ टैगोर की रचना ‘जीवन स्मृति’ के ऐतिहासिक महत्व फा संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
जीवनेर झड़ापाता से हमें कौन-कौन सी ऐतिहासिक जानकारियाँ प्राप्त होती है ?
उत्तर :
जीवनेर झड़ापाता : यह सरला देवी चौधुरानी की आत्मकथा है। ये रवीन्द्रनाथ टेगौर के बड़े भाई की पुत्रो थी। टैगोर परिवार में जन्म लेने के कारण शुरू से ही राजनीति एवं साहित्य में इनकी जिजासा रही। इन्होंने बेधुन स्कूल एवं कालेज से शिक्षा प्राप्त की। यह एक शिक्षाविद् एवं नारीवादी महिला थी। इनकी आत्मकथा में नारियों की स्थिति एवं उनकी समस्याओं का सजीव वर्णन मिलता है। इन्होने नारी उत्थान एवं उनकी शिक्षा के लिए काफी कार्य किया था। इन्होंने कई समाचार पत्रों का अनुवाद भी किया था। उस समय की महिला आत्मकथा की यह एक अनमोल कृति है। इस संस्मरण में सरला के बाल्यकाल का वर्णन है। जैसाकि सरला देवी ने उल्लेख किया है कि जन्म से ही इनके जीवन में पतझड़ शुरू हो गया था जिसकी शुरुआत माता के तिरस्कार से होती है।

जीवनेर झड़ापाता का प्रारम्भ जोड़सांकू के टेगौर परिवार के घर के दूसरे तल्ले से शुरू होता है जहाँ सरला का डूबते सूर्य वाले घर में जन्म होता है। इसके शीघ्र बाद ही घर की परम्परा के अनुसार उसे एक नर्स के हाथों सौप दिया गया। अपने संस्मरण में सरला ने लिखा है कि जब वह चार वर्ष की थी तो संगमरमर पत्थर पर खेलते हुए सीढ़ियों से लुढ़क गयी, दो दाँत टूट गए और वो खून से भर गई। आया के भय से उसे जोर से रोने का साहस भी न था। माँ ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, पिता नीचे आए और उन्होंने दवा आदि लगाई।

वह कहती है कि वह नहीं जान पाई कि माँ का प्यार क्या होता है ? उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध कर दिया गया था। उनका दाम्पत्य जीवन भी सुखमय नहीं बीता और 1923 ई० में उनके पति की मृत्यु हो गई। वह स्वामी विवेकानन्द के विचारों से काफी प्रभावित थी। इस पुस्तक में सरला देवी चौधरानी के महात्मा गाँधी के साथ भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने का वर्णन है। 1944 ई० में सरला देवी चौधुरानी की मृत्यु हो गई। अतः इस पुस्तक से उनके जीवन के विविध पक्षों की जानकारी प्राप्त होती है।

जीवन स्मृति : जीवन स्मृति से हमें रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रारम्भिक 27 वर्षों के जीवन की झाँकी की जानकारी मिलती है। इस पुस्तक में रवीन्द्रनाथ टैगोर के जीवन के उन पहलुओं का वर्णन है जिसके बारे में पूरा विश्व अनजान है। इस पुस्तक में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि उनका बचपन बड़े ही कठोर निर्देशन तथा अनुशासन में बीता, वे प्रकृति की गोद में अपने घर पर ही शिक्षा अध्ययन करते थे। उनकी देखभाल करने वाले उनपर कठोर नियंत्रण रख़ते थे। वे अपने घर के खिकी पर बैठे-बैठे प्राकृतिक दृश्यों को निहारा करते थे तथा उनपर कविताएँ लिखते थे। इसके अलावा उनकी इस पुस्तक में बालकों के मनोविज्ञान का वर्णन भी मिलता है।

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प्रश्न 18.
सोमप्रकाश के द्वारा हमें तत्कालीन इतिहास की जानकारी किस प्रकार मिलती है ?
उत्तर :
सोमप्रकाश एक साप्ताहिक समाचार पत्र था जिसके प्रकाशन की शुरूआत ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने एक वधिर विद्वान को रोजगार देने के उद्देश्य से की थी। 1858 ई० में इस समाचार पत्र ने एक मुकाम प्राप्त कर लिया, परन्तु वधिर विद्वान ने कभी इस पत्र के प्रकाशन में भाग नहीं लिया। इस पत्र की त्रुटियों को देखने, उन्हें सुधारने तथा प्रकाशन का पूरा जिम्मा विद्या भूषण ने उठाया। उस समय बंगाल में दैनिक समाचार पत्र, जैसे – संवाद प्रभाकर तथा संवाद भास्कर ने बंगाल में नैतिक वातावरण को फैलाने में काफी अहम भूमिका निभाई थी। अपनी सहज भाषा, विषय-वस्तु निष्पक्ष आलोचना के द्वारा सोमप्रकाश ने बंगाली समाचार पत्रों में सर्वश्रेष्ठ स्थान ग्रहण कर लिया था। इस प्रकार यह समाचार पर बंगाल के एक बहुत बड़े पढ़े-लिखे वर्ग को प्रभावित किया।

प्रश्न 19.
निष्पादित कलाओं के इतिहास का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
निष्पादित कलाओं के इतिहास का आरम्भ नवपाषाण काल में हुआ था। इस युग में मनुष्यों की रुचि संगीत में थी। इसका पता उस काल के पुरातात्विक वस्तुओं से मिलती है । इन वस्तुओं में हड्डी की सीटियाँ, बाँस की बाँसुरी, सितार और ढोल प्रमुख हैं। इसके द्वारा पता चलता है कि मिस्न में इस सभ्यता में वीणा का प्रयोग होता था। मेसोपोटामिया की सभ्यता में संगीत स्वतंत्र रूप से विकसित तथा बड़े भोजों में संगीत गोष्ठियों का आयोजन आवश्यक रूप से होता था। बाजों में वीणा, खंजड़ी, तुरही, मशक और बाँसुरी का अधिक प्रयोग होता था। सिंधु घाटी सभ्यता के लोग नृत्य एवं संगीत के प्रेमी थे। खुदाई से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति एवं कई तरह के वाद्य यंत्र इसके परिचायक है। भारत में विदेशियों का आगमन एवं विभिन्न संस्कृतियों के लागों के आपस में मिलने से निष्पादित कलाओं जैसे संगीत, नृत्य, नाटक एवं चलचित्र के विभिन्न विधाओं एवं शैलियों का विकास बहुत ही तेज गति से हुआ जिसने भारत की निष्पादित कला-विज्ञान को समृद्ध बनाया।

प्रश्न 20.
‘पिता का पत्र पुत्री के नाम’ शीर्षक ग्रंथ की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कलम के जादूगर मुंशी प्रेमचन्द द्वारा अनुवादित एवं संपादित ‘पिता का पत्र-पुत्री के नाम’ पुस्तक एक संस्मरण या स्मृति ग्रथथ है, जो 30 पत्रों का संप्रह है जिसे पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1928 ई० में अपनी पुत्री इंदिरा गाँधी को लिखा था। इन पत्रों के द्वारा नेहरू जी ने इंदरा को प्राकृतिक इतिहास और विभिन्न सभ्यताओं की कहानी को बताया है। इन पत्रों में अतीतकालीन भारत के साथ वर्तमान भारत की तुलना प्रस्तुत की गयी है। भले ही इन पत्रों के द्वारा नेहरू जी ने अपनी पुत्री को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति तथा विश्व की अन्य सभ्यताओं की जानकारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदान की हो किन्तु आज ये सारे पत्र आधुनिक इतिहास लेखन की दिशा में एक सोत की भूमिका निभाते हैं। इन पत्रों में विभिन्न समय की वृतान्तों का पता चलता है जिसका संयोजन इतिहासकार अपनी पुस्तक के लेखन में प्रमाणिक तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करते है।

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प्रश्न 21.
पहनावे के इतिहास से आप क्या समझते है ?
उत्तर :
शायद ही हमारा ध्यान जाता हो कि हम जो कपड़े पहनते हैं उनका भी एक इतिहास है। पहनावे केआधार पर सामाजिक इतिहास का पता चलता है। विभिन्न वर्गों के लोग मर्द, औरत, बच्चे क्या पहने, इससे दुनिया में लोगों की पहचान बनती है। इन्हीं के जारिये वे खुद को परिभाषित करते हैं। इन्हीं से सभ्यता और सुन्दरता की, शर्म व मर्यादा की हमारी कसौटियाँ बनती हैं। वक्त बदलता है तो बदलते हैं विचार और कपड़ों में आये परिवर्तनों में इन विचारों की झलक आसानी से देखी जा सकती है। नवपाषाण काल में वस्त्र बनाने की कला का अविष्कार कर मनुष्य ने सभ्यता की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया।

पुरापाषाण युग का मानव पेड़ के पत्तो, छालों तथा जानवरों के चमड़े से अपने शरीर ढँकते थें, किन्तु इस युग में उसने कताई और बुनाई का आविष्कार किया वस्त्र तैयार करने के लिए उसने चरखा और करघा बनाया उसने भेड़ों के ऊन और सन से कपड़ा बुनकर पहनना शुरू किया। सभ्यताओं के युग में पुरुष एवं स्त्रियों के बीच वस्त्र विन्यास में विषमता देखने को मिली। मिस्र सभ्यता एवं सुमेर की सभ्यता में औरत और मर्द लुंगी की तरह अधो वस्त्र पहनते थे। स्त्रियाँ छाती तक का भाग ढँकती थीं।

भारत की सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भिन्न-भिन्न ऋतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार के वस्त्र पहनते थे। ये वस्त्र तीन प्रकार के थे अधोवस्त्र, अधिवास और पेशम्। वे मृगछाले का भी प्रयोग करते थे। वे वस्त्र कातने और सीने की कला से परिचित थे। पुरुष पगड़ी बाँधते और शाल धारण करते थे, कपड़े कपास, उन और रेशम से बनते थे, कपड़ों को रंगा जाता था। इस प्रकार कपड़ा के इतिहास से मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास की झलक मिलती है ?

प्रश्न 22.
स्थापत्य अथवा वस्तु कला के इतिहास का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर :
यदि स्थापत्य कला के इतिहास की चर्चा करें तो पाते हैं कि पशु-पालन के लिए मनुष्य को अब एक स्थान पर स्थायी रूप से रहने की आवश्यकता महसूस हुई। पेड़ की खोहों और पर्वत की कन्दराओं को त्यागकर मनुष्य ने झोपड़ियों का निर्माण किया। पहले वह पशुओं के चमड़े का तंबु बनाकर रहता था। अब वह पेड़ की टहनियों, घास-फुस और मिट्टी से झोपड़ी बनाकर रहने लगे। बाद में ईंट और पत्थर के मकान बनने लगे। सभ्यता के काल में विभिन्न सभ्यताओं में कच्ची मिट्टी एवं पक्की ईंटों के मकान बनने लगे। इसका जानकारी अनातोलिया, सीरिया, उत्तरी मेसोपोटामिया, तथा मध्य एशिया में पक्की ईंटों के मकानों के अवशेष मिलते हैं। मिस्न का पिरामिड स्थापत्य कला की उत्कृष्टता का उदाहरण आज भी मौजूद है।

वास्तु-कला से उस समय के राजा की स्थिति उसके तथा साम्राज्य की विशालता का भी अनुमान लगाया जा सकता है। राजा किस धर्म को मानता था, उसके इष्ट लोग कौन थे आदि की जानकारी भी मिलती है। सम्राट अशोक के बौद्ध-मंदिरों से मालूम होता है कि उसकी निष्ठा बौद्ध धर्म में थी, जहाँ-जहाँ उसका साम्राज्य था, वहाँ-वहाँ बौद्ध मठों की स्थापना करवाई गई। इससे पता चलता है कि उसका साम्राज्य कहाँ तक फैला हुआ था। वास्तु-कला प्राचीन युग के इतिहास को जानने का सबसे अच्छा स्रोत है।

इन कलाकृतियों में उस राजा व उसके कार्यों का वर्णन किया गया है। मुगल सम्राट शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल से उनकी अपनी पत्नी के प्रति प्रेम का पता लगता है। प्राचीन काल की अनेक वास्तुकला आज भी अनोखी एवं अनमोल हैं। ग्राचीन समय में निर्मित कुछ वास्तु-कला आज भी मनुष्यों के लिए एक पहेली के समान है।

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प्रश्न 23.
ऐतिहासिक तथ्यों के संग्रहण में अन्तरजाल (इन्टरनेट) के उपयोग एवं दुरूपयोग बताइएँ ।
उत्तर :
आज के वर्तमान युग में इंटरनेट ने अपने आप को ज्ञान-विज्ञान, व्यापार-वाणिज्य एवं सूचनाओं के आदान-प्रदान के क्षेत्र में स्थापित किया है। पहले हमें किसी भी विषय-वस्तुओं को जानने और पहचानने के लिए किताबों का सहारा लेना पड़ता था। परन्तु इंटरनेट के प्रयोग ने इस क्षेत्र में कांति ला दी है। आज इंटरनेट के द्वारा पलक झपकते ही हमें प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान समय की सारी जानकारियाँ प्राप्त हो जाती है। इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र में आए इंटरनेट की क्रांति के द्वारा हमें इतिहास के क्षेत्र में हो रहे नित नये शोध-कार्यो का पता चलता है। किताबों का संग्रह करना लोगों के लिए आर्थिक दृष्टि से कष्टदायक है और सबके लिए संभव भी नहीं है।

लेकिन इंटरनेट के व्यवहार ने इसे सुविधाजनक बना दिया है। इसके माध्यम से हम विश्व के किसी भी स्थान, घटना, व्यक्ति विशेष, भू-प्रकृति, जलवायु एवं वहाँ के लोगों के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का पता मिनटो में कर सकते हैं। इंटरनेट ने लोगों के मध्य संचार व्यवस्था को काफी दुरूस्त किया है। सोशल नेटवर्किंग साइट (Social networking sites) पर करोड़ों लोग एक-दूसर से जुड़े है तथा बातों एवं ज्ञान का आदान-श्रदान करते हैं। इस प्रकार इंटरनेट के प्रयोग ने इनिहास के अध्ययन को काफी सरल एवं सहज बना दिया।

ऐतिहासिक सूचनाओं को संप्रहित करने में इंटरनेट का जितना उपयोग है, उतना ही इसका दूरूपयोग भी है। इंटरनेट पर उपस्थित सूचनाएँ सब समय वैधानिक नहीं होती है। इंटरनेट के प्रयोग ने पुस्तकों के महत्व को कम कर दिया है।

प्रश्न 24.
19 वीं और 20 वीं सदीं में समाचार पत्र और पत्रिकाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर :
आधुनिक भारत के इतिहास को विश्लेषित करने में तत्कालीन समाचार पत्र एवं पत्रिकायें काफी मददगार साबित होते हैं। 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में भारत में बहुत बड़े पैमाने पर समाचार-पत्रों का प्रकाशन हुआ जिनसे हमें इतिहास के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती है । इस काल के कुछ प्रमुख समाचार पत्र हैं टाइम्स ऑफ इण्डिया, स्टेट्समैन, मद्रास मेल, पायनियर, सिविल एण्ड मिलेटरी गजट (सभी अंग्रेजी) ; अमृत बाजार पत्रिका, बंगवासी, सोमप्रकाश, बंगदर्शन (सभी बंगला) ; केसरी मराठी, कवि वचन सुधा, प्रदीप, हरिजन, उदन्त मार्तदप्ड हिन्दी, अल हिलाल, अल बिलाल, हमदर्द (उद्दू), गदर पंजाबी इत्यादि है। इसलिए भारत में 19 वीं सदी को समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं के विकास की सदी माना जाता है।

प्रश्न 25.
विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं दवा के इतिहास का संक्षिप्त परिचय दीजिए ।
उत्तर :
19 वीं और 20 वीं का 200 वर्ष विज्ञान तकीकी दवा के आविष्कारों के वर्ष रहे हैं जिन्होने अनके प्रकार से आम-आदमी के जीवन को प्रभावित किया। बिजली, एंटीबायोटिक्स, टेलीफोन, उपम्रह, उर्जा जैसे आविष्कारों की उपयोगिता किसी एक राष्ट्र-विशेष या समाज-विशेष तक सीमित नहीं रही बल्कि अंततः इनसे समस्त मानव जाति लाभान्वित हुई।

एक विशाल परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय विकास किसी राष्ट्र द्वारा की गई उत्रति के प्रमुख सूचक होते हैं। कोई भी समाज या राज्य प्रौद्योगिक दृष्टि से जितना अधिक उन्नत हैया उसकी अर्थव्यवस्था भी उतनी ही अच्छी होगी। प्रौद्योगिकीय उत्नति और आर्थिक विकास परस्पर संबंधित प्रकियाएँ हैं। विज्ञान की उन्नति दवा के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया। नये-नये प्रयोगों की मदद से दवाएँ विकसित की गई। इस दौर में विटामिन, जीन, इंसुलिन, पेनीसीलिन की खोज हुई। दवा के क्षेत्र में खोज एवं शोध आज भी जारी है :

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प्रश्न 26.
भोजन एवं व्यंजन के इतिहास का संक्षिप्त परिचय दीजिए ।
उत्तर :
सभी इतिहासकारों का मानना है कि मनुष्य आरंभ में मांसाहारी प्राणी था। कई वर्षो तक मनुष्य केवल मांस का ही भक्षण करता रहा। आरंभ से लेकर नव पाषाण काल तक करीब 10,000 वर्ष पहले तक मनुष्य घूम-घूमकर मास एव जंगली फलों का संग्रह करता था। कई इतिहासकार इस बात पर भी समहत हैं कि हमारे पूर्वज जंगली पत्तियों एवं पौधों की जड़ों का भी सेवन करते थे। समय-समय पर जंगली अनाज का भी वे भोजन किया करते थे। उस समय मनुष्य के शरीर में काफी ऊर्जा की आवश्यकता होती थी। उन्हें अपना भोजन खोजने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता था। मनुष्य पहाड़ों की गुफाओं तथा पेड़ों के डालियों पर रहता था।

रहने वे इन कठिन जगहों एवं वातावरण की मुश्किलों के कारण उन्हें भोजन की ज्यादा आवश्यकता पड़ती थी। नवपाषाण युग में मनुष्य स्थायी होकर रहने लगा था। इसी समय खाने की आदतों में काफी बदलाव आया। पशुपालन के वजह से मनुष्य को मांस प्राप्त करना आसान हो गया था। खेती की जानकारी हो जाने के कारण उसने अपने आस-पास की जगहों में अनाज की खेती आरंभ कर दी थी। बाद के समय में मनुष्य ने सब्जियाँ एवं फल उगाना भी सीख लिया था।

प्रश्न 27.
शहरी इतिहास के विकास पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
शहरी इतिहास में एक विस्तृत नगर की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वहाँ के उद्योग, पर्यावरण, लोग, रोजगार, शिक्षा आदि के इतिहास की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। शहरों का निर्माण, शहरों की व्यवस्था, लोगों की अधिकता, गाँवों से शहरों की तरफ पलायन आदि अनेक विषयों का ज्ञान हमें शहरों के इतिहास से ज्ञात होता है।

शहरी जीवन की शुरूआत मेसोपोटामिया में हुई थी। फरात और दजला नदियों के बीच स्थित वह प्रदेश आजकल इराक गणराज्य का हिस्सा है। मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी संपन्नता, शहरी जीवन विशाल एवं समृद्ध साहित्य, गणित और खगोल विद्या के लिए प्रसिद्ध है। शहरी इतिहास में हमें सिन्धु घाटी की नगर सभ्यता का पता लगता है। इनमें हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो नामक नगर विशेष प्रमुख थे। इन नगरों का निर्माण योजमाबद्ध तरीके से हुआ था। पूरा नगर कई भागों में विभक्त एवं मकान एक निश्चित क्रम में बनाये जाते थे।

प्रश्न 28.
आत्म कथा और स्मृति के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर :
स्मृति इतिहास जानने की एक बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है। स्मृति के द्वारा ही आत्मकथा, यात्रा-वृतांत, निबंध लेखन, आदि संपन्न होते हैं। आत्मजीवन मूलक ग्रंथों का प्रधान विषय-वस्तु स्मृति कथा है। इस प्रकार स्मृति कथा एक प्रकार का साहित्य है जहाँ लेखक अपने जीवन में घटित घटनाओं का विवरण अपने स्मृतियों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। भारत में भी ऐसे साहित्यिक स्मृति कथा पाये गये जो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के दृश्य को उपस्थित करते है। स्मृति कथाओं की रचना विशेषकर ज्ञानी व्यक्ति ही करते हैं। उनके द्वारा दिये गये विभिन्न विवरण से अतीत के विभिन्न वास्तविक घटनाओं के तथ्यों की प्राप्ति होती है। उदाहरण स्वरूप 1946 ई० की कलकत्ता में हुए दंगा की घटना विभिन्न व्यक्तियों की स्मृति के माध्यम से ही मिलते हैं।

विवरणात्मक प्रश्नोत्तर (Descriptive Type) : 8 MARKS

प्रश्न 1.
भारत के आधुनिक इतिहास को जानने में सरकारी दस्तावेजों की उपयोगिता का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
आधुनिक भारत को जानने के कई साधन हैं। सरकारी दस्तावेज एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इनकी मदद से हमें अतीत की जानकारियाँ प्राप्त होती है। घटनाओं की तारीख, स्थान आदि महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इन जानकारियों को संभाल कर रखा गया था इसलिए इनके नष्ट होने की संभावना भी बहुत कम है।

रिपोर्ट : किसी भी घटना की सरकारी जाँच होती थी एवं सरकार के द्वारा उस घटना पर एक रिपोर्ट तैयार की जाती थी। इन रिपोर्टों में उस घटना की विस्तृत जानकारी होती थी। उस घटना के आरंभ से लेकर सरकार द्वारा उठाये कदम, उस घटना से जुड़े लोगों की जानकारियाँ, सरकारी अफसरों के बयान आदि सभी घटनाएँ एकत्रित की गई होती थी।

आख्यान : छापाखाने का विकास होने के कारण समाचार-पत्रों के प्रकाशन में अधिकता आ गई। किसी घटना की विस्तृत जानकारियाँ समाचार-पत्रों, लेखों एवं कहानियों के रूप में समय-समय पर प्रकाशित होती रहती थी। इन आख्यानों में घटनाओं की जानकारियाँ छपी होती थी। इनकी उपलब्धता भी आसान थी।

पुलिस की चिट्ठी : किसी भी घटना की जानकारी सबसे पहले पुलिस को होती थी। पहले के समय में चिट्ठियों के द्वारा अधिकारियों तक सूचना पहुँचाई जाती थी। इन चिट्ठियों में घटनाओं की जानकारियाँ लिखी होती थी। इन चिट्ठियों के द्वारा उस घटना की पूर्ण जानकारी प्राप्त होती थी। इन चिट्ठयों में भेजने वाले एवं पाने वाले दोनों अधिकारियों के नाम लिखे हांते थे जिनसे इनकी विश्वसनीयता बनी रहती थी।

गोपनीय सूचना : किसी भी घटना की जानकारी या पहले से उक्त घटना के घटने की आशंका को ध्यान में रुख कर सरकार के द्वारा पहले से कई स्थानो पर गुप्तचर लगे रहते थे। इनके द्वारा किसी घटना की सूचना सरकार को पहले मिल जाती थी। ऐसे ही खबर सरकारी विभागों में भी होते थे जो सरकार की सूचनाओं को समाचार-पत्रों एवं विशिष्ट व्यक्तियों को बतलाते थे। इनकी सूचनाएँ भी इतिहास को सही तरीके से जानने में सहायक होते हैं।

सरकारी राजपत्रित अधिकारी : सरकारी राजपत्रित अधिकारियों पर किसी भी घटना का उत्तरदायित्व होता था। उन्हें घटना की जानकारी देनी पड़ती थी। इन अधिकारियों के द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर उस समय के इतिहास को जाना जाता था।

उस समय में भारत में अंग्रेजों का अधिकार था। अत: सरकारी दस्तावेजों पर पूर्ण रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता था। ये दस्तावेज अंग्रेज अधिकारियों के द्वारा ही तैयार किए गये होते थे। प्रेस के ऊपर अंकुश लगा होने के कारण केवल वही समाचार प्रकाशित होते थे जिन्हें अंग्रेजों की तरफ से स्वीकृति मिली होती थी। जिस प्रकार जालियाँवाला बाग की घटना का पता देशवासियों को काफी दिनों के पश्चात चला था। अतः ये दस्तावेज संपूर्ण इतिहास को सही तरीके से नहीं बता सकते हैं।

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प्रश्न 2.
जवाहरलाल नेहरू के द्वारा इंदिरा गाँधी को लिखे पत्रों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर :
जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। वे अपनी पुत्री इंदिरा प्रियदर्शिनी (बाद में गाँधी) को पत्रों के माध्यम से विश्व की जानकारियाँ दिया करते थे क्योंकि उस समय इंदिरा मसूरी में पढ़ती थी एवं नेहरूजी इलाहाबाद में रहते थे। जब इन्दिरा गाँधी नेहरु जी के साथ रहती थी तो उनसे विभिन्न प्रश्न पूछा करती थी। उनकी इसी जिज्ञासा के कारण नेहरू जी ने उन्हें इन पत्रों के माध्यम से जानकारी द्देनी चाही। 1928 से 1929 ई० के बीच उन्होनें इंदिरागाँधी को 31 चिट्ठियाँ लिखीं थी। इन पत्रों के माध्यम से नेहरू जी ने तत्कालीन भारत की स्थिति कैसी है एवं भारत पहले कैसा था इसकी जानकारी दी है।

उनके पत्रों में उस समय के भारत की राजनीतिक स्थिति एवं सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन मिलता है। उन्होने लिखा है – आज हमारा मुल्क गरीब है और एक विदेशी जाति हमारे ऊपर राज्य कर रहा है। हम अपने ही मुल्क में आजाद नहीं है और जो कुछ करना चाहे नहीं कर सकते। लेकिन यह हाल हमेशा नहीं रहेगा और अगर हम पूरी कोशिश करें तो शायद हमारा देश फिर आजाद हो जाए जिससे हम गरीबों की दशा सुधार सकें और हिन्दुस्तान में रहना उतना ही आरामदेह हो जाए जितना की आज यूरोप के कुछ देशों में है। नेहरू जी के पत्रों से पता लगता है कि भारतीयों की दशा एवं यूरोपिय लोगों के रहन-सहन में क्या अंतर था।

गुलाम देश के लोगों की स्थिति की भी जानकारी हमें प्राप्त होती है। प्रकृति सबसे महान किताब है एवं हर एक पत्थर के पास कहने के लिए एक कहानी होती है। सोचने की शक्ति एवं बुद्धिमता ही जानवर एवं इसानों में फर्क का मुख्य कारण है। भविष्य में इसी में नई पीढ़ी को शक्ति मिलेगी एवं वह दासता की बेड़ियों को तोड़कर आजाद होगा एवं अपने सपनों को पूरा कर सकेगा। हम प्रकृति से अलग नहीं हैं। बचे रहने के लिए हमें प्रकृति के साथ मेल-मिलाप जरूरी है। हमारे ज्ञान की कमी एवं डर के कारण हमारे धर्मो मे अशुद्धियाँ आ गई है। अगर हमने समाज की भलाई के लिए कोई कार्य नहीं किया तो मनुष्य एवं पत्थर में कोई फर्क नहीं होगा।

पिता ने अपनी पुत्री को बतलाया है कि हम एक महान देश के निवासी हैं जो पहले से काफी सभ्य एवं संपन्न था। हमें अपने देश पर गर्व होना चाहिए। दु :ख की बात है कि अभी हम कमजोर एवं गुलाम हैं। ज्ञान एवं एकता से हम इस दु ख की घड़ी से ऊबर सकते हैं। नेहरू जी का यह व्यापक दृष्टिकोण था कि वे पूरे विश्व को एक गाँव के रूप में देखते थे एवं सभी जन-मानस को एक ही परिवार का सदस्य मानते थे।

प्रश्न 3.
बंग-दर्शन एवं सोम प्रकाश पत्रिका का आधुनिक इतिहास लेखन में क्या महत्व है ?
उत्तर :
बंग-दर्शन : 1872 ई० में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के द्वारा आरंभ की गई यह एक मासिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन बंगला भाषा में किया जाता था। 19 वी सदी के दक्षिणार्द्ध में इस पत्रिका ने बंगाल में राष्ट्रीयता की भावना विकसित करने में सहयोग किया था। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय की सभी आंरभिक साहित्य इसी पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। इस पत्रिका ने बंगालियों में राष्टीयता की भावना को जन्म दिया था। बंकिम चन्द्र की इस पत्रिका का प्रकाशन केवल चार सालों तक ही हो सका।

इनते कम समय में भी इस पत्रिका ने बगाल के सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को काफी प्रभावित किया। बंगदर्शन पत्रिका के इतिहास को हम तीन भागों में देखते हैं। पहला बंकिमचन्द्र का काल (1872-1876) दूसरा संजीवचन्द्र चट्टोपाध्याय एवं अंतिम रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1901) 19 वीं सदी के। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याग्र ने पत्रिका के माध्यम से हिन्दू धर्म का प्रचार किया। यह पहली पत्रिका थी जिसने बाबू संस्कृति पर सवाल उठाये थे।

इस विषय को बाद में जोगेन्द्र नाथ विद्याभूषण ने आर्य-दर्शन में उठाया था। अपने नाम बंग दर्शन की तरह ही इस पत्रिका के माध्यम से हमें 19 वी सदी के बंगाल की सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशा का ज्ञान होता है। इस पत्रिका में तत्कालीन मुद्दों को बड़ी सहजता से दर्शाया गया है। समाज में बाबू संस्कृति का चलन, विभिन्न वर्गों के लोगों की स्थिति, समाज में व्याप्त बुराईयाँ, उनको दूर करने के उपाय एवं प्रयत्म, धर्म की व्याख्या आदि अनेक ऐतिहासिक विषयों की जानकारी उस समय की इन जैसी पत्रिकाओं से ही हमें प्राप्त होती है।

सोमप्रकाश का महत्व : ईश्वर चन्द्र विद्यासागार के प्रस्ताव पर एक बंगला समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया गया। इस समाचार पत्र का नाम सोमप्रकाश था। यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र था। इस समाचार पत्र का संपादन एवं प्रकाशन दोनों की जिम्मेदारी द्वारकानाथ विद्याभूषण पर थी। 1858 ई० में इस समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ किया गया था। अपनी गरिमा एवं चमकदार भाषा तथा निडर आलोचना करने के कारण कम समय में ही यह पत्र बंगाल का लोकप्रिय समाचार पत्र बन गया। इस समाचार पत्र ने नील की खेती करने वाले जमीदारों के खिलाफ लोगों को जगाने का प्रयास किया था।

नील कमीशन बनने के पूर्व इस समाचार पत्र की उपयोगिता के विषय में रेव जेम्स ने कहा था – भारतीय जनता की आवाज के रूप में ये पत्रिकायें महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। लार्ड लिटन के वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम के पारित हो जाने पर इस पत्र का प्रकाशन बंद कर दिया गया। स्वतंत्र समाचार-पत्रों के माध्यम से हमें उस समय के सरकारी आदेशों, समाज में भिन्न वर्ग की स्थिति आदि का सही चित्रण मिलता है। नील किसानों के विद्रोह को सरकारी दस्तावेजों में मात्र किसानों का हंगमा बतलाया गया था। उनकी स्थिति तथा उन पर होने वाले जुल्मों का कहीं जिक्र भी नहीं था।

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प्रश्न 4.
जीवनेर झड़ापाता तथा सत्तर बच्छर से हमें कौन-सी ऐतिहासिक जानकारी मिलती है?
उत्तर :
जीवनेर झड़ा पाता : यह सरला देवी चौधुरानी की आत्मकथा है। ये रवीन्द्रनाथ टेगौर के बड़े भाई की पुत्री थी। टैगोर परिवार में जन्म लेने के कारण शुरू से ही राजनीति एवं साहित्य में इनकी जिज्ञासा रही थी। इन्होने बेथुन स्कूल एवं कालेज से शिक्षा प्राप्त की। यह एक शिक्षाविद् एवं नारीवादी महिला थी। इनकी आत्मकथा में नारियों की स्थिति एवं उनकी समस्याओं का सजीव वर्णन मिलता है। इन्होने नारी उत्थान एवं उनकी शिक्षा के लिए काफी कार्य किया था। इन्होंने कई समाचार पत्रों का अनुवाद भी किया था। उस समय की महिला आत्मकथा की यह एक अनमोल कृति है। जीवन को झड़ा पाता नामक पुस्तक का रूप दे दिया गया। इस संस्मरण में सरला के बाल्यकाल का वर्णन है।

जैसा कि सरला देवी ने उल्लेख किया है कि जन्म से ही इनके जीवन में पतझड़ शुरू हो गया जिसकी शुरूआत माता के तिरस्कार से होती है। जीवनेर झड़ा पता का प्रारम्भ जोड़सांकू के टेगौर परिवार के घर के दूसरे तल्ले से शुरू होता है जहाँ सरला का डूबते सूर्य वाले घर में जन्म होता है। इसके शीघ्र बाद घर की परम्परा के अनुसार उसे एक नर्स के हाथों सौंप दिया गया। अपने संस्मरण में सरला ने लिखा है कि जब वह चार वर्ष की थी तो संगमरमर पत्थर पर खेलते हुए सिढ़ियों से लुढ़क गयी, दो दाँत दूट गए और वो खून से भर गई। आया के भय से उसे जोर से रोने का साहस भी न था। माँ ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, पिता नीचे आए और उन्होंने दवा आदि लगाई।

वह कहती है कि वह नहीं जान पाई कि माँ का प्यार क्या होता है। वह स्वामी विवेकानन्द के विचारों से काफी प्रभावित थी। उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध कर दिया गया। उनका दाम्पत्य जीवन भी सुखमय नहीं बीता और 1923 ई० में उनके पति की मृत्यु हो गई। इस पुस्तक में सरला देवी चौधुरानी के महात्मा गाँधी के साथ भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने का वर्णन है। 1944 ई० में सरला देवी चौधरानी की मृत्यु हो गई।

सत्तर बच्छर का महत्व : सत्तर बच्छर के लेखक विपिन चन्द्र पाल हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन 1927 ई० में हुआ था। इस पुस्तक में उन्होंने अपने जीवन के उन महत्वपूर्ण तथ्यों का वर्णन किया है जिसके द्वारा हमें उनके स्वभाव, सिद्धान्त एवं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनके कायों का पता चलता है। यह पुस्तक करीब 650 पृष्ठों की है। विपिन चन्द्र पाल ने लोगों को इस पुस्तक की सच्चाई से अवगत कराने के लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से इस पुस्तक के महत्वपूर्ण तथ्यों को सबके समक्ष उपस्थित करने का प्रयास किया। इस पुस्तक से हमें पता चलता है कि विपिन चन्द्र पाल एक सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे, उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया।

यहाँ तक की उनेक सिद्धान्त पिता और पुत्र के सम्बन्धों के बीच में भी आ गए थे। इस कारण इन्होंने अपने पिता से गुजारा भत्ता लेने से इंकार कर दिया और स्वयं ही रोजी-रोटी की खोज में निकल पड़े। इसी क्रम में इन्होंने कटक में प्रधानाध्यापक का कार्य भार संभाला। लेकिन वहाँ भी विद्यालय के प्रबंधक से इनके विचार नहीं मिले जिसके कारण इन्होंने प्रधान आचार्य के पद से त्याग पत्र दे दिया। विपिन चन्द्र पाल कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे।

वे लाल-बाल-पाल की प्रसिद्ध तिकड़ी के सदस्य थे। इनकी आत्मकथा में तत्कालीन भारत की राजनीतिक परिस्थितियों की महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती है। कांग्रेस के द्वारा चलाये गए विभित्र आन्दोलनों की विस्तृत जानकारियाँ, रणनीति एवं तत्कालीन परिस्थितियों का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त होता है।

प्रश्न 5.
बंग दर्शन पत्रिका के प्रकाशन का मुख्य उद्देश्य क्या था ? इस पत्रिका के विकास में रवीन्द्रनाथ टैगोर की क्या भूमिका थी ?
उत्तर :
बंकिम चन्द्र चटर्जी ने सन् 1872 ई० में ‘बंग दर्शन’ नामक पत्रिका की शुरुआत की थी। यह एक मासिक पत्रिका थी। इसका प्रकाशन बंगला भाषा में किया गया था। इस पत्रिका ने बंगालियों में राष्ट्रीय भावना को जन्म दिया तथा उसे अग्रसर होने का मार्ग प्रशस्त किया।

इस पत्रिका में तत्कालीन मुद्दों को बड़ी सहजता से दर्शाया गया है। इतना ही नहीं, इस पत्रिका का मुख्य उद्देश्य विभिन्न वर्ग के लोगों की स्थिति को सुधारना, समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करना, उनको दूर करने के उपाय एवं ‘प्रत्यन तथा धर्म’ की व्याख्या आदि था। जिस पर बंग दर्शन पत्रिका अपना कार्य करती थी। इतना ही नहीं, इसके अन्य उद्देश्यों में शिक्षित एवं अशिक्षित वर्ग के लोगों के बीच आपसी संबंध तथा भाईचारे को बनाये रखना था।

बंग दर्शन पत्रिका के अन्य उद्देश्यों में, ज्ञान के प्रचार-प्रसार में उपयोगी कदम उठाना था, विकास लाना था। इतना ही नहीं, निम्न वर्गों, मध्य वर्गों तथा उच्च वर्गों के बीच समन्वय को स्थापित करना था, जिससे समाज में ऊँच-नीच की भावना समाप्त हो जाय तथा मानवता के आधार पर समानता को स्थापित करना था। इस पत्रिका के अन्य प्रमुख उद्देश्यों में प्राच्य भाषा को पाश्चात्य भाषा की अपेक्षा प्रमुख स्थान दिलाना था। इस प्रकार हमलोग बंग दर्शन पत्रिका के विभिन्न प्रमुख उद्देश्यों को देख पाते हैं, जो समाज एवं समाजिक क्षेत्र के लिए अधिक उपयोगी है।

दूसरी तरफ हमलोग बंग दर्शन पत्रिका के विकास में रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की भूमिका को विभिन्न रूप में देख पाते हैं। इस पत्रिका के माध्यम से रवीन्द्रनाथ टैगोर जी प्रकाशित कहानियों को संग्रह करते थे । उनका मानना था कि इस पत्रिका की प्रसिद्धि पूरे विश्ध भर में थी। सन् 1901 ई० में ‘नव बंग दर्शन’ का प्रकाशन शैलेशचन्द्र मजुमदार के द्वारा रवीन्द्रनाथ की छोटी कहानियों को प्रकाशित किया जाने लगा।

इतना ही नहीं, इसी पत्रिका से टैगर जी की ‘चोखेर बाली’ (Chokher Bali) नामक कहानियों का क्रम प्रकाशित हुआ जिसे बाद में अनेक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। इस पत्रिका का प्रमुख सम्पादन कार्यालय ‘मजुमदार एजेंसी’ (Majumdar Agency) था, जो बंगाल में था। इतना ही नहीं, इस पत्रिका के माध्यम से टैगोर जी की ‘गीतांजलि’ (Gitanjali) की विभिन्न कविताओं को छापा गया, जिसमें ‘आमार सोनार बांग्ला’ गीत भी था, जो वर्तमान में बंगलादेश का राष्ट्रीय गान भी है।
अतः इस प्रकार रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने ‘बंग दर्शन’ पत्रिका के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

WBBSE Class 10 History Solutions Chapter 1 Ideas of History

प्रश्न 6.
विज्ञान एवं तकनीकी इतिहास का वर्णन कीजिए। नारी आन्दोलन (फेमिनिस्ट मूवमेंट) से क्या समझते हैं ?
उत्तर :
विज्ञान एवं तकनीकी इतिहास हमें विज्ञान और तकनीकी की ओर ले जाता है, जहाँ मनुष्य विज्ञान एवं तकनीकी के सारे संसार को अपने हाथों में कर चुका है। इतिहास की इस शाखा में जैविक विज्ञान, इंजीनीयरिंग, कम्प्यूटर और सूचना विज्ञान, भूगोल, गणित, दवा, न्यूरोसाइँसेस फार्मेसी, भौतिक विज्ञान, मानसिक रोगों की चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ एवं प्रौद्योगिकी के आविष्कार एवं विकास का अध्ययन किया जाता है। विज्ञान एवं तकनीकी इतिहास आधुनिक इतिहास लेखन की एक शाखा है जिसके जरिये मनुष्य अपने घर के समस्याओं को दूर कर लिया है।

भारत में 19 वीं और 20 वीं सदी में विज्ञान एवं तकनीकी के क्षेत्र में विराट परिवर्तन हुआ था। जिसके आधार पर विभिन्न विज्ञान तकनीकी शिक्षा संस्थानें तथा शोध कार्यालय खोले गये, जो भारत को एक नयी दिशा की ओर ले गया, जो विकास का मार्ग था।

इस शाखा का इतिहास देखें तो प्राचीन भारत में इस शाखा में टुक-टाक विकास हो पाया था। परन्तु महानुभावी व्यक्तित्व जेसे :- महान गणितज्ञ आर्यभट्ट, भास्कर एवं ब्रह्मगुप्त आदि ने इस क्षेत्र में अनेकों कार्य किये जिससे इस क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन आ पाया था। वहीं मध्यकालीन भारत की बात करें तो इसमें कुछ कमियाँ पायी गयी थी परन्तु आधुनिक समय की भारत की बात करें तो इस क्षेत्र में काफी विकास रूपी परिवर्तन आया है।

विभिन्न विज्ञान एवं तकनीकी केन्द्रों या संस्थानों का निर्माण किया गया है, जो इस क्षेत्र में विकास का प्रतीक है। जैसे :- ‘एशियाटिक सोसायटी’, ‘इण्डियन मैथेमेटिकल सोसायटी’ (IMS), तथा ‘बोस इंस्टीट्यूट’ आदि।
इस प्रकार हम विज्ञान एवं तकनीकी इतिहास के विवरण के बारे में जान पाते हैं, जो प्रत्येक समय में विस्तृत हुई।

नारी आन्दोलन (फेमिनिस्ट मूवमेंट) : फेमिनिस्ट मूवमेंट का अर्थ होता है, महिलाओं का आन्दोलन अर्थात् प्राचीन काल से महिलाओं के ऊपर जो अत्याचार किया जाता रहा था। उसके खिलाफ तथा अपने अधिकारों के माँग के लिए महिलाओं ने 19वीं सदी में जो आन्दोलन किये उसी आन्दोलन को हमलोग फेमिनिस्ट मूवमेंट (Feminist Movement) के नाम से जानते हैं। इस आन्दोलन को न केवल राष्ट्र के बल्कि समस्त संसार के महिला एवं पुरुष ने मिलकर चलाया था।

जिस समाज में महिला नजर उठाकर बात नहीं कर सकती थी, उसी समाज में आज महिला राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष तथा प्रतिपक्ष के नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर आसीन हुई हैं। जहाँ महिला को समाज में कष्टों का सामाना करना पड़ता था, आज वे सम्मान से उसी समाज में रह पा रही हैं। ऐसा सिर्फ नारी आन्दोलन (फेमिनिस्ट मूवमेंट) (Feminist Movement) से ही संभव हो पाया है।
इस प्रकार महिलाओं ने अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष व आन्दोलन को आज भी जारी रखा है।

West Bengal Board Class 10 History Book Solution in English WBBSE

WBBSE Class 10 History Question Answer West Bengal Board

WBBSE Class 10 History Book Solutions West Bengal Board in English Medium

WBBSE Class 10 History Book Solutions West Bengal Board in Hindi Medium

West Bengal Board Class 10 History Question Papers

WBBSE Class 10 History Syllabus West Bengal Board 2023

Chapter 1 Ideas of History

Varieties of History: New Social History, History of Sports, History of Food habits and Cuisine, History of Performing Arts (Music, Dance, Drama, Cinema), History of Clothing, History of Transportation, History of Visual Arts (Painting, Photography), History of Architecture, Local History, Urban History, Military History, History of Environment, History of Science-Technology and Medicine, Women’s History – Discuss the main features of these different trends of history writing. (Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.).

Methods of using sources in relation to Modern Indian History:
Government Documents (reports/narratives/letters of police/intelligence/government officials).
Autobiography and memoirs (Sattar Bathsar, Bipinchandra Pal; Jibansmrity, Rabindranath Tagore; Jibaner Jharapata, Sarala Devi Choudhurani).
Correspondence (Jawaharlal Nehru’s letters to Indira Gandhi-Letters from a Father to His Daughter)
Periodicals and Newspapers (Bangadarshan and Somprakash) – Short discussion on methods of using these types of sources in relation to Modern Indian History.
Did you know? Importance of Photography in Modern Indian History
Use and abuse of the Internet in collecting historical information
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.).

Part 1 Towards a New Collectivity

Chapter 2 Reform: Characteristics and Observations

19th Century Bengal: Reflections of Society in Periodicals, Newspapers, and Literature: Bamabodhini, Hindu Patriot and Hutom Pyanchar Naksha, Nildarpan, Grambarta Prakashika – Emphatically discuss these particular texts in relation to the general context. (Relevant and contextual illustrations, newspaper reporting, etc.)

19th Century Bengal – Educational Reforms: Characteristics and Observations: Conflicts between Oriental and Western Education, Growth of English Education, Women’s Education, and Iswarchandra Vidyasagar – Discussion should revolve around these issues. Particular emphasis should be given to these four topics: Initiatives for the spread of Western Education: Raja Rammohan Ray and Raja Radhakanta Deb, Initiatives for the spread of Western Education: David Hare and John Elliot Drinkwater Bethune, Calcutta Medical College and the Development of Medical Science, Calcutta University and the Growth of Higher Education.

Did you know? Madhusudan Gupta
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.).

19th Century Bengal – Social Reforms: Characteristics and Observations: Activities of Brahma Samaj and its different denominations, Anti-Sati Movement, ‘Young Bengal’, Widow Remarriage Movement – Discuss these issues, contextually and briefly.

Did you know? Haji Mohammad Mohsin
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.)

19th Century Bengal – Religious Reforms: Characteristics and Observations: Brahma Movement – Evolution, Divisions, Characteristics and Observations; Ramarkrishna’s ideas of Sarva Dharma Samanwaya (religious harmony); Swami Vivekananda’s ideas of Religious Reforms: Navya Vedanta (Neo Vedanta) – Characteristics and Observations.

Did you know? Lalan Faqir, Bijay Krishna Goswami
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.).

Nature and Assessment of the ‘Bengal Renaissance’, Debates regarding the usage of the concept of Renaissance’ in relation to 19th Century Bengal:
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.)

Chapter 3 Resistance and Rebellion: Characteristics and Analyses

A brief introduction to the Colonial Forest Law and reactions of the Adivasi people; in that context discuss the concepts of Rebellion, Uprising, and Revolution. Chuar Rebellion (second phase, Medinipur, 1798-1799), Kol Rebellion (1831-1832), Santhal Hool (1855-1856), Munda Rebellion (1899-1900) – Characteristics and Analyses of these Rebellions with very brief narratives.

Did you know? Rangpur Revolt (1783), Bhil Rebellion (1819)
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Maps with the dates and affected areas of these Rebellions and Revolts, Timeline of these Rebellions and Revolts).

Sanyasi-Fakir Rebellion (1763-1800), Wahabi-Farazi Movement in Bengal – Characteristics and Analyses of these Rebellions with very brief narratives.

Did you know? Pagal Panthi Revolt (first phase, 1825-1827), Tariqah-i-Muhammadiya
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Maps with the dates and affected areas of these Rebellions and Revolts, and Timeline of these Rebellions and Revolts).

Indigo Revolt – Characteristics and Analyses of the Revolt with a very brief narrative.

Did you know? Peasants’ Revolt in Pabna (1870)
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Maps with the dates and affected areas of these Rebellions and Revolts, and Timeline of these Rebellions and Revolts).

Chapter 4 Early Stage of Collective Action: Characteristics and Analyses

Revolt of 1857: Characteristics and Nature (Debates regarding the relationship with ideas of Nationalism) – A brief discussion. In this context emphasis should be given on the two topics; the attitudes of educated Bengali Society towards the Revolt of 1857 and the Queen’s Proclamation (1858).
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Maps with the dates and affected areas of these Rebellions and Revolts, and Timeline of these Rebellions and Revolts).

‘Age of Associations’: Characteristics and Analyses – Bangabhasa Prakashika Sabha, Landholders’ Association (ZamindarSabha), Indian Association, Hindu Mela – Discuss these four initiatives, particularly in relation to the above-mentioned context.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Associations and other contemporary Associations).

Anandamath, Bartaman Bharat, Gora, and Bharatmata (painting) – Discuss briefly how a sense of nationalism is embedded within these works. In that context discuss the topic: Critiques of Colonial Society in Gaganendranath Tagore’s caricatures.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc.).

Part 2 Multiple Voices of Collectivity

Chapter 5 Alternative Ideas and Initiatives (From mid-19th Century to the Early 20th Century): Characteristics and Observations:

Development of Printing press in Bengal: Relation between the printed text and dissemination of knowledge; Printing press as a commercial venture – discuss the initiatives taken by Upendrakishore Roychoudhury and the U.N. ROY & SONS in this context.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned processes and events).

Development of Science and Technical Education in Bengal: In that context briefly discuss the importance of the Indian Association for the Cultivation of Science, the Calcutta Science College, and the Basu Bigyan Mandir; a brief discussion on the development of Technical Education and particularly the role of the National Council of Education and the Bengal Technical Institute in that context.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned processes and events).

Critique of Colonial ideas regarding Education: A brief discussion on ideas of Rabindranath Tagore on Shantiniketan and his initiatives related to the Visvabharati; In this context discuss in short Tagore’s ideas about synthesis among Nature, Humans, and Education.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned processes and events).

Chapter 6 Peasant, Working Class, and Left Movements in 20th Century to the Early 20th Century India: Characteristics and Observations

Relations of the Indian National Congress and Left Politics with Peasant Movements in India:
Anti-Partition Movement in Bengal, Non-Cooperation Movement, Civil Disobedience Movement, and Quit India Movement – Discussion of Peasant Movements in relation to these four movements. In that context also discuss the Eka Movement and the Bardauli Satyagraha briefly.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline on these above-mentioned Movements).

Relations of the Indian National Congress and Left Politics with Working Class Movements in India: Anti-Partition Movement in Bengal, Non-Cooperation Movement, Civil Disobedience Movement, and Quit India Movement – Discussion of Working Class Movements in relation to these four movements. Discuss briefly the issue of the Workers and Peasants’ Party.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Nature, Characteristics, and Observations of the politics and participation of the Left in the Anti-Colonial Movements of 20th Century India

Did you know? M. N. Roy and Left Movement of India
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Chapter 7 Movements Organized by Women, Students, and Marginal People in 20th Century India: Characteristics and Analyses

Nature, Characteristics, and Assessment of Women’s Movement in 20th Century India: Discussion of Women’s Movement in relation to the Anti-Partition Movement in Bengal, Non-Cooperation Movement, Civil Disobedience Movement and Quit India Movement. Discuss briefly the nature of women’s role in Armed Revolutionary struggles. In that context briefly discuss these topics: Deepali Sangha, Pritilata Waddedar, and Kalpana Dutta.

Did you know? Women’s Wing Indian National Army
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Nature, Characteristics, and Assessment of Students’ Movements in 20th Century India: Discussion of Students’ Movement in Relation to the Anti-Partition Movement in Bengal, Non-cooperation Movement, Civil Disobedience Movement, and Quit India Movement. Discuss briefly the nature of students’ role in Armed Revolutionary struggles. In that context briefly discuss these topics: Anti-Circular Society, Bengal Volunteers, Surya Sen, Bina Das, Rashid AN Day.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Development of Dalit politics and Movements in 20th Century India: Nature, Characteristics and Analysis; Debate between Gandhi and Ambedkar regarding Dalit rights; Also discuss briefly the Namasudra Movement in Bengal.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Chapter 8 Post-Colonial India: Second Half of the 20th Century (1947-1964)

Initiatives undertaken and Controversies related to the accession of Princely States with India: (Discuss and demarcate the changing internal and external boundaries of India as a State in the context of the above-mentioned topic with two maps of India, one of 1947 and another of 1964).

Did you know? Kashmir Issue, Annexation of Hyderabad
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Initiatives undertaken and Controversies related to the Refugee Problem in post-1947: In that context briefly discuss the topic: Partition in Autobiography and Memoirs.
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Initiatives undertaken and Controversies related to Linguistic Reorganisation of States (Discuss and demarcate the changing internal boundaries of the Indian nation in the context of the above-mentioned topic with two maps of India one of 1948 and another of 1964)

Did you know? State Reorganisation Commission and Act (1953-1956)
Schedule of Languages in the Indian Constitution (up to 1964)
(Relevant and contextual pictures and illustrations, newspaper reporting, etc, Timeline of these above-mentioned Movements).

Guidelines for Farming Questions
The following types of questions may be framed –

  • Multiple Choice Type Question (M.C.Q.) – One correct answer among four options. 1 mark for each Question.
  • Very Short Answer Type Question (V.S.A.) – It may include true-false, statement, and assertion, fill in the blank, and match the column. 1 mark for each Question.
  • Short Answer Type Question (S.A.) – 2 marks for each Question.
  • Analytical Answer Type Question – 4 marks for each Question.
  • Explanatory Answer Type Question – 8 marks for each Question. (Marks division of this type of question will be 3 + 5, 5 + 3, and 8)

History Syllabus of Class 10 West Bengal Board – Chapters at a Glance

Chapter 1 Ideas of History
History is the study of the progress of human civilizations. It is not confined to the stories of kings, dynasties, wars, and dates. History has broken the barriers of tradition and brought variety and growth in its studies. Thus History sheds light on New Social History, the History of Sports, the History of Food Habits and Cuisine, the History of Performing arts (Music, Dance, Drama, Cinema), the History of Clothing, the History of Transportation, History of Visual Arts (Painting, Photography), History of Architecture, Local History, Urban History, Military History, History of Environment, History of Science-Technology and Medicine, Women’s History, etc. This chapter also deals with Historiography i.e. the history of history writing discussing within its fold + the Rankian School, The Annales School, The Subaltern School, and The New Social History; Study of Modern India; The two main sources – primary sources (Government documents like reports, narratives, diary entries by police, etc), and the secondary sources (autobiography, memoirs; Jibansmriti, Jibaner Jharapata, Sattar Bathsar, correspondence; Letters from a father to his Daughter, Periodicals; Prabasi, Bangadarshan, Newspapers; Som Prakash) help in the reconstruction of History. Importance of photography and uses and Abuses of the Internet in collecting historical information.

Chapter 2 Reforms: Characteristics and Observations
19th century Bengal: Reflections of society through periodicals, newspapers, and literature, like Bamabodhini Patrika, Hindoo Patriot, Hutom Pyanchar Naksha, Nil Darpan, Grambarta Prakashika; Educational Reforms – (a) Role of Christian Missionaries and the Serampore Trio (b) Charter Act of 1813 (c) Anglicist and Orientalist Controversy, (d) Wood’s Despatch; setting up of Calcutta Medical College (1835) and the Universities of Calcutta, Mumbai, Madras (1857), the spread of education among women and the prominent role played by Vidyasagar, David Hare, J.E.D Bethune; Social Reform movements in the 19th century executed by the Brahmos and also the role of Young Bengal and Derozio; Religious Reforms – The Brahmo Movement and the idea of monotheism, Ramakrishna Dev’s idea of ‘Sarva Dharma Samanwaya’ and ‘Neo-Vedanta’ of Swami Vivekananda brought about religious enlightenment; Bengal-Renaissance and the intellectual awakening in 19th century Bengal. But the term is debatable.

Chapter 3
Resistance and Rebellion: Characteristics and Analyses
The victory at Plassey (1757) gave the English East India Company political control of India. The imperialist interest of the company or the British colonial power led them to execute various exploitative measures. To tap the huge natural resources of the Indian forests they formed the Indian Forest Act of 1865 and 1878 thereby depriving the tribal population of their traditional rights in the forests of India and forcing them to rise in rebellion. The imposition of the high rate of land revenue, the breaking down of the economic structure of the country, the oppression and misrule both on the peasants and landlords and zamindars, and the introduction of the sun-set law, the Permanent Settlement Act resulted in various revolts. It was these uprisings, rebellions, and revolts that eventually gave rise to the political consciousness and nationalist outlook of the people of India. Examples – Chuar Rebellion, Wahabi Movement, Indigo Revolt, etc.

Chapter 4 Early Stages of Collective Action: Characteristics and Analyses
One hundred years after the battle of Plassey (1757) in the year 1857 a Great Revolt occurred due to the accumulation of discontent and grievances in the minds of the Indians towards their oppressive and imperialist Colonial rulers. The 19th century observed the growth of collective action in India which was manifested through the Revolt of 1857, the growth of associations, patriotic literature, and works of art like paintings. The collective organization and movements that took place in that period were predominantly against the British, against the age-old superstitions and to promote nationalism. There is a great deal of controversy among historians regarding the nature of the Great Revolt of 1857. Some British historians like Maleson, John Silly, John Keay, etc called it the Sepoy Mutiny which was supported by contemporary Indians like Akshay Kumar Dutta, Durgadas Banerjee, Dadabhai Naoroji, etc. J. B. Norton, Alexander Duff, Outram, Holmes, and even V. A. Smith and Karl Marx accepted the national character of the revolt or termed it a National Revolt. The revolutionary and nationalist thinker Vinayak Damodar Savarkar called it India’s First War of Independence, while R C. Joshi and others called it a National Struggle directed by the feudal lords. The English-educated Bengali intelligentsia being influenced by Western education and reforms of the colonial government did not support the sepoys. It was as a result of the Revolt of 1857, the English East India Company’s rule in India came to an end and power was transferred to the British crown. India was brought under the British crown by the Government of India Act of 1858. Queen Victoria’s famous proclamation was announced by Lord Canning at a grand durbar at Allahabad on 1st November 1858; Before the formation of the Indian National Congress in 1885 many associations were formed in different regions of India like Bombay, Madras, and especially in Bengal namely the Bangabhasa Prakashika Sabha, Landholders ’ society, Hindu Mela, Bharat Sabha, Poona Sarvajanik Sabha, Madras Mahajan Sabha etc.; To enlighten the people in nationalist ideas and patriotism a host of literary works were composed by Bankim Chandra (Anandamath), Rabindranath Tagore (Gora), and Swami Vivekananda (Bartaman Bharat). Their books played quite a significant role in arousing political awareness among the Indians. Mention must be made of the inspirational painting of ‘Bharat Mata’ by Abanindranath Tagore and the satirical sketches and cartoons (University Machine) by Gaganendranath Tagore in this context.

Chapter 5 Alternative Ideas and Initiatives
The social, religious, political, economic, and cultural ideas that developed in the first half of the 19th century underwent a great change and gave rise to new concepts and ideas in the second half of the 19th century. With the advent of Western education, social and political awareness started playing an important role in the minds of the Indian people and society. As a result, there was a drastic change in the thought process of the Indians and alternative ideas triumphed over the practiced ones. 19th century induced nationalism and ideas of national unity among the Indians which were further promoted with the development of the Indian press. Starting from the ‘Bengal Gazettee’ of Hicky (1780) to ‘Sambad Prabhakar’ of Iswarchandra Gupta (1831), newspapers helped generate knowledge and consciousness among the primarily urban people. The development of science and technology was limited during colonial rule. As a result, initiatives were taken by different notable Indians (like Mahendra Lal Sircar, Acharya Jagadish Chandra Bose, etc.) to develop scientific knowledge and research. It was the aim of the colonial government to produce Western-educated Indians who would only serve the need to rule the country. The Indians now started criticizing this colonial concept of education and thought of replacing it with alternative ideas of spreading education. The pioneering personality in this field was Rabindranath Tagore who subsequently formed, ‘Brahmacharyashram’ and ‘Visva Bharati at Shantiniketan, Bolpur.

Chapter 6 Peasant, Working Class, and Left Movements in 20th-Century India
The imperialist attitude of the British affected the peasant community in India strongly in the first half of the 20th Century who, being subjected to a lot of oppression and exploitation, rebelled against the landlords and the imperialist Government. The labour Movement in India which was much more organized aimed against the oppression and deprivation of the workers in the hands of the factory owners. The peasants did not play any significant role in the Anti-Partition Movement but they actively participated in the Non-cooperation Movement (1920), Civil Disobedience Movement (1930), and the Quit India Movement (1942). The working class played a significant role during the Anti-Partition Movement (1905) and organized several strikes against the mill and factory owners in the period. They also participated in the Non-cooperation Movement (1920) and Civil Disobedience Movement (1930). However, their participation in the Quit India Movement (1942) was limited.

Chapter 7 Movements Organised by Women, Students, and the Marginal People in the 20th Century
The 20th century saw the participation of women, students, and marginal people like the Dalits in organizing various movements. Women’s participation could be witnessed during the Anti-Partition Movement, the Non-cooperation Movement, the Civil Disobedience Movement, the Quit India Movement, and also in the armed revolutionary movement. Most of the anti-British movements during the 20th century reached a great dimension through the participation of the student community in India. They fearlessly took part in the Anti-Partition Movement, the Non-cooperation Movement, the Civil Disobedience Movement the Quit India Movement. The revolutionary group of students in Bengal, Bihar, Maharashtra, Punjab, and Uttar Pradesh made notable contributions in India’s struggle for freedom. The movement of the marginal class or the Dalits formed another important feature of the 20th-century movements.

Chapter 8 Post Colonial India Second Half of the 20th Century (1947-1964)
After 190 years of British domination, India won independence on 15th August 1947. But by the provision of the Indian Independence Act the native rulers had the choice to accede either to Pakistan or to India. This resulted in a lot of trouble and Sardar Vallabhbhai Patel, the first Home Minister of independent India was able to merge the native states into the Indian Union. However, Pakistan refused to accept the inclusion of Kashmir to India which resulted in a number of wars, tension between the two countries, and the creation of ‘Pakistan occupied Kashmir ’. The partition of India gave rise to the problems like communal riots and the issues related to the ‘Refugees’. Both the governments of India and Pakistan tried to solve the refugee Problem through the ‘Nehru-Liaquat’ Agreement of 1950. However, the influx of refugees to India continued even after this agreement. The linguistic policies adopted by the Nehru government after independence also created problems and ultimately the government had to concede to the demands of forming states on the basis of languages. By the State Reorganisation Act of 1956, the states of India were also reorganized. Till 1964, there were 14 recognized languages mentioned in the 8th schedule of our constitution. At present, there are 22 recognized languages. Hindi and English are recognized as the official languages of India.

West Bengal Board Class 10 History 1st Summative Evaluation (Total Marks – 40)
Internal Formative Evaluation: (Total Marks – 10)
Month of Evaluation: April

  • Chapter 1 Ideas of History
  • Chapter 2 Reform: Characteristics and Observations
  • Chapter 3 Resistance and Rebellion: Characteristics and Analyses

West Bengal Board Class 10 History 2nd Summative Evaluation (Total Marks – 40)
Internal Formative Evaluation (Total Marks – 10)
Month of Evaluation: August

  • Chapter 4 Early Stages of Collective Action: Characteristics and Analyses
  • Chapter 5 Alternative Ideas and Initiatives (From mid-19th Century to the early 20th Century): Characteristics and Observations.
  • Chapter 6 Peasant, Working Class and Left Movements in 20th Century India: Characteristics and Observations

West Bengal Board Class 10 History 3rd Summative Evaluation (Total Marks – 90)
Internal Formative Evaluation (Total Marks – 10)
Month of Evaluation: December

  • Chapter 7 Movements Organized by Women, Students, and Marginal People in 20th Century India: Characteristics and Analyses
  • Chapter 8 Post-Colonial India: Second Half of the 20th Century (1947-1964)

Note: Chapters prescribed for the First and Second Summative Evaluations are also to be included in the 3rd Summative Evaluation

WBBSE Class 10 History Blueprint for 1st Summative Evaluation (Total Marks – 40)

Topic MCQ (GR. A) VSA (Gr. B) SA (Gr. C) AAT (Gr. D) EAT (Gr. E) Total
Chapter 1 1 × 2 = 2 1 × 2 = 2 2 × 1 = 2 1 question from each chapter. Answer any 2 questions 1 question from each chapter. Answer any 1 question
Chapter 2 1 × 4 = 4 1 × 2 = 2 2 × 2 = 4
Chapter 3 1 × 4 = 4 1 × 2 = 2 2 × 2 = 4
Questions to be given 10 6 5 3 3 27
Questions to be answered 10 6 4 2 1 23
Total Marks 1 × 10 = 10 1 × 6 = 6 2 × 4 = 8 4 × 2 = 8 8 × 1 = 8 40

Note:
Group A: Consists of MCQ. Every question of this group should have four options of answer.
Group B: Should consist of very short answer-type questions (answer should be in a single sentence): True- False, Statement-Assertion. 2 questions from each item will be given (3 × 2 = 6)
Group C: Consists of short answer type conceptual questions. The answer should be in two or three sentences.
Group D: Consists of analytical answer-type conceptual questions. The answer should be in seven or eight sentences.
Group E: Consists of explanatory answer-type conceptual questions. The answer should be in fifteen to sixteen sentences. In this group marks division will be either 3 + 5 or 5 + 3 or 8.

WBBSE Class 10 History Blueprint for 2nd Summative Evaluation (Total Marks – 40)

Topic MCQ (GR. A) VSA (Gr. B) SA (Gr. C) AAT (Gr. D) EAT (Gr. E) Total
Chapter 4 1 × 3 = 3 1 × 2 = 2 2 × 1 = 2 1 question from each chapter. Answer any 2 questions 1 question from each chapter. Answer any 1 question
Chapter 5 1 × 4 = 4 1 × 2 = 2 2 × 2 = 4
Chapter 6 1 × 3 = 3 1 × 2 = 2 2 × 2 = 4
Questions to be given 10 6 5 3 3 27
Questions to be answered 10 6 4 2 1 23
Total Marks 1 × 10 = 10 1 × 6 = 6 2 × 4 = 8 4 × 2 = 8 8 × 1 = 8 40

Note:
Group A: Consists of MCQ. Every question of this group should have four options of answer.
Group B: Should consist of only two items: Match the Column and map pointing**, 3 questions from each item will be given (3 × 2 = 6)
Group C: Consists of short answer type conceptual questions. The answer should be in two or three sentences.
Group D: Consists of analytical answer-type conceptual questions. The answer should be in seven or eight sentences.
Group E: Consists of explanatory answer-type conceptual questions. The answer should be in fifteen to sixteen sentences. In this group marks division will be either 3 + 5 or 5 + 3 or 8.

WBBSE Class 10 History Blueprint for 3rd Summative Evaluation (Total Marks – 90)
Madhyamik Examination

Topic (GR. A) M.C.Q. each question – 1 mark (Gr. B) Very short answer type (V.S.A) each question – 1 mark (Gr. C)

Short answer type (S.A) each question – 2 marks

(Gr. D)

Analytical answer type each question – 4 marks

(Gr. E)

Explanatory answer type each question – 8 marks

Chapter 1 1 × 2 1 × 2 2 × 2 2 questions from Chapter 1 or 2
Chapter 2 1 × 3 1 × 3 2 × 2 1 question from Chapter 2 or 3
Chapter 3 1 × 2 1 × 3 2 × 2 2 questions from Chapter 3 or 4
Chapter 4 1 × 3 1 × 3 2 × 2 1 question from Chapter 4 or 5
Chapter 5 1 × 2 1 × 2 2 × 2 2 questions from Chapter 5 or 6
Chapter 6 1 × 3 1 × 3 2 × 2 1 question from Chapter 6 or 7
Chapter 7 1 × 3 1 × 3 2 × 2 2 questions from Chapter 7 or 8
Chapter 8 1 × 2 1 × 1 2 × 2
Questions to be given 20 20 16 8 3 67
Questions to be answered 20 16 11 6 1 54
Total Marks 1 × 20 = 20 1 × 16 = 16 2 × 11 = 22 4 × 6 = 24 8 × 1 = 8 90
Answer any 16 questions from 20. Have to answer from each item. Answer any 11 questions from 16. Answer a total of 6 questions from four segments. At least 1 question from each segment and another 2 from any segment. Answer any 1 question from 3.

WBBSE Class 10 History Syllabus West Bengal Board

Note:
Group A: Consists of MCQ. Every question of this group should have four options of answer.
Group B: Should consist of True-False, Match the Column, VSA (in one sentence), Map pointing** & Statement-Assertion. 4 questions from each item will be given.
Group C: Consists of short answer type conceptual questions. The answer should be in two or three sentences.
Group D: Consists of analytical answer-type conceptual questions. The answer should be in seven or eight sentences.
Group E: Consists of explanatory answer-type conceptual questions. The answer should be in fifteen to sixteen sentences. In this group marks division of the three questions will be either 3 + 5 or 5 + 3 or 8.

*This question pattern is indicative of the Madhyamik Examination.
**For the visually challenged students, Fill in the blanks will be given as an alternative.

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