WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 Question Answer – ठेले पर हिमालय

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ‘ठेले पर हिमालय’।
– उक्त कथन किस रचनाकार के किस पाठ से लिया गया है ? उक्त कथन द्वारा लेखक क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर :
उक्त कथन धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ सं. लिया गया है।
एक दिन लंखक अपने उपन्यासकार मित्र के साथ पान की दुकान पर खड़े थे कि तभी एक बर्फवाला ठेले पर बर्फ की सिल्लियाँ लादे आया। उस बर्फ से भाप उड़ रही थी। मित्र ने बर्फ से उड़ते भाप के सौंदर्य के प्रभावित होकर कहा – यही बर्फ तो हिमालय की शोंभा है। बस फिर क्या था। लेखक को अपने ताजी रचना के लिए तुरंत बैठे बिठाए एक शीर्षक मिल गया – ‘ठेले पर हिमालय’।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

प्रश्न 2.
ओ नये कवियों ! ठेले पर लादो । पान की दुकानों पर बिको।
– वक्ता कौन है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता लंखक धर्मवीर भारती हैं।
लंखक ने अपनन उपन्यासकार मित्र के कथन पर अपनी रचना के लिए तत्काल शीर्षक बना डाला – ‘ठंले पर हिमालय’। यह शीर्षक उन्हें इतना अच्छा लगा कि उन्होंने नए कवियों को भी सलाह दे डाली कि यदि उन्हें भी यह शीर्षक पसंद आया हों तो वे भी हिमालय को अपनी रचना से निकाल कर ठेले और पान की दुकानों तक ले आए ताकि वह सामान्य पाठक के लिए भी माह्म हो सके। साधारण लोग भी उसका आनंद उठा सकें।

प्रश्न 3.
मैं जानता हूँ, क्योंकि वह बर्फ मैंने भी देखी है।
– वक्ता कौन है ? अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता धर्मवौर भारती हैं।
लखक ने ‘ठेले पर हिमालय’ वाली बात अपने उपन्यासकार मित्र को बताई तो उनके हाव-भाव से यह लगा कि यह बात उनके मन को खरोंब गई है। मित्र की एसी प्रतिक्किया स्वभाविक थी क्योंक जिसने भी एक बार हिमालय के सौंदर्य को देख लिया है उसके मन पर वह एक ऐसी खरों छोड़ जाती है, जिसे याद कर दुख ही होता है। लेखक को भी यही अनुर्भुति थी क्यांक उन्हांने भी हिमालय के उस असौम सौंदर्य को देखा है, गहराई से महसूस किया है।

प्रश्न 4.
कितना कष्टप्रद, कितना सूखा और कितना कुरूप है वह रास्ता।
– यहाँ किस रास्ते के बारे में कहा गया है ? रास्ते का वर्णन करें ?
उत्तर :
यहाँ उस रास्ते के बारे में कहा गया है जो कोसी से कौसानी को ओर जाता है। उस रास्ते में पानी का कहीं नामो-निशान नहीं है, पहाड़ भी हरियाली के अभाव में सूखे और भूरे नजर आते है। कुल मिलाकर वह रास्ता कष्टप्रद, सुखा और कुरूप दिखाई देता है।

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प्रश्न 5.
शुक्ल जी जैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है।
– शुक्ल जी कौन हैं ? उनके बारे में ऐसा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :
शुक्ल जी लंखक के मिम्र हैं।
शुक्ल जी के द्वारा प्रात्साहित किए जाने पर ही लेखक अपने मित्र तथा पत्नी के साथ कौसानी के लिए रवाना हुए थे। इतना ही नहीं, शुक्ल जी ने पूरे सफर के लिए उनका गाइड बनना भी स्वीकार कर लिया था तथा अपने दिए गए समय के अनुसार वे लेखक के सामने उपस्थित भी हो गए। शुक्ल जी की इसी व्यवहार कुशलता के कारण यह कहा गया है कि उनके जैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है।

प्रश्न 6.
उन्हें देखते ही हमारी भी सारी थकान काफूर हो जाया करती थी।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘ठेले पर हिमालय’ तथा रचनाकार धर्मवीर भारती हैं।
शुक्ल जी लेखक के मित्र हैं। वे अपनी बात तथा धुन के पक्के हैं। सबसे बड़ी खूबी उनकी व्यवहार कुशलता तथा खुशामजाजी है। इन्हीं गुणों के कारण लेखक जब भी शुक्ल जी को देखते हैं तो उनकी सारी थकान दूर हो जाती है ।

प्रश्न 7.
और खासी अटपटी चाल थी बाबू साहब की ।
– यहाँ किसके बारे में कहा गया है। उसकी चाल को अटपटा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :
शुक्ल जी अपने साथ अपने एक और मित्र को लेकर आए थे। लेखक ने उस मित्र का वर्णन इस प्रकार किया है – ” लम्बा-दुबला शरीर, पतला-साँवला चेहरा, एमिल जोला-सी दाढ़ी, ढीला-ढाला पतलून, कधे पर पड़ी हुई ऊनी जार्कन, बगल में लटकता हुआ जाने थर्मस या कैमरा या बाइनाकुलर।” – इन सारी चीजों को मिलाकर लेखक को उनकी चाल काफी अटपटी मालूम हो रही थी।

प्रश्न 8.
कोसी से बस चली तो सारा दृश्य बदल गया ।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत कथन धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
मझकाली से कोसी तक का सफर आँखों को बड़ा ही थका देने वाला था। कहीं कोई हरियाली नहीं, पानी का तो नामो-निशान भी नहीं। लेकिन बस ज्योहि कोसी से चली तो प्राकृतिक सौंदर्य ही बदल गया – कल-कल करती कोसी नदी, छोटे-छोटे सुन्दर गाँव, मखमली खेत, पहाड़ी डाकखाने और नदी-नाले पर बने हुए पुल- ये सब मिलकर एक जादुई वातावरण की सृष्टि कर रहे थे।

प्रश्न 9.
पर ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ रही थी, त्यों-त्यों हमारे मन में एक अजीब-सी निराशा छायी जा रही थी।
– आगे कौन बढ़ रही थी ? किसके मन में निराशा छायी जा रही थी और क्यों ?
उत्तर :
बस आगे बढ़ रही थी।
लेखक सांच रहं थे कि उनकी बस ज्यों-ज्यों कौसानी के निकट आती जाएगी दृश्य और भी सुंदर होता जाएगा लेकिन बात उल्टी हो गई। कौसानी से करीब छ: किलोमोटर दूर रहने पर भी कौसानी के उस सौददर्य का कहों नामो-निशान न था। यह देखकर ही लेखक के मन में निराशा छायी जा रही थी।

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प्रश्न 10.
बिल्कुल ठगे गए हम लोग। कितना खिन्र था मैं।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से ली गयी है।
जब लेखक अपने मित्रों के साथ कौसानी के बस-अह्डु पर उतरे तों पहली नज़र में उन्हे केवल एक छोटा-सा, बिल्कुल उजडाा-सा गाँव नजर आया। बर्फ का तो कहीं नामो-निशान न था। यह देखकर उन्हें लगा कि वे यहाँ आकर उगे गए हैं और यही सोचकर उनका मन खिन्न हो आया।

प्रश्न 11.
अकस्मात् हम एक-दूसरे लोक में चले आए थे।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘ठेले पर हिमालय’ तथा रचनाकार धर्मवौर भारती हैं।
बस से उतरने पर जब लेखक की नजर सामने घाटी की ओर गई तो वे वहाँ का दृश्य देखकर बिल्कुल ठगे-से रह गए। घाटी में प्रकृति का अपार सौंदर्य बिखरा पड़ा था। यह सब देखकर लेखक तथा उनके मित्रों को ऐसा लगा कि वे अचानक एक दूसरे ही लोक में घले आए हैं।

प्रश्न 12.
गाँधी जी ने यहीं अनासक्ति योग लिखा था।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से ली गई है।
गाँधी जी ने भी अपना कुछ समय कौसानी में बिताया था। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण ऐसा है जो हमें सांसारिकता सं अलग करके आध्यात्मिकता से जोड़ देता है। यही कारण है कि ‘अनासक्ति योग’ नामक पुस्तक की रचना गाँधी जी ने यहीं की थी।

प्रश्न 13.
खिड़की से झाँक रहा है, कहीं गिर न पड़े।
– पाठ का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम है – ‘ठेले पर हिमालय’।
कौसानी पहुँचने पर एक क्षण के लिए लेखक को एक हिम शिखर के दर्शन हुए लेकिन फिर वह बादलों के पीछे तुरंत लुप्त हो गया। इस मनोरम दृश्य को लेखक के अतिरिक्त उनके साथ आए सभी ने देखा। उस हिम शिखर के बारे में
लेखक कल्पना करते हैं मानो उसे बाल शिखर जान किसी ने भीतर खोंच लिया क्योंकि वह कहीं आकाशरूपी खिड़की से कहीं नीचे न गिर पड़े।

प्रश्न 14.
सारी खिन्नता, निराशा, थकावट – सब छू-मन्तर हो गयी। हम सब आकुल हो उठे।
– उद्धुत कथन के वक्ता कौन हैं ? वक्ता के ऐसा कहने का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
उद्धृत कथन के वक्ता लेखक धर्मवीर भारती हैं।
लेखक तथा उनके साथ के सोगों ने हिम शिखर के दर्शन मात्र कुछ ही समय के लिए किए थे लेकिन उसी दर्शन ने उनलोगों की सारी खिन्रता, निराशा तथा थकावट को छू-मन्तर कर दिया था। एक बार पुनः उसी सौदर्य के दर्शन के लिए वे सब आकुल हो उठे।

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प्रश्न 15.
निरावृत…. असीम सौंदर्य-राशि हमारे सामने अभी-अभी अपना घूँघट धीरे से खिसका देगी और ….. और तब ?
– प्रस्तुत पंक्ति कहाँ से ली गई है ? पंक्ति का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पक्ति ‘ठेले पर हिमालय’ पाठ से ली गई है।
लेखक एक क्षण के लिए हिम शिखर के दर्शन कर पाए थे और फिर वह बादलों में छिप गया। वे अब उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे – जब बादलरूपी घूँघट हट जाएंगे और हिमालय की निरावृत ….. असीम सौंदर्य राशि उनके सामने होगी – तब वे जी भर कर उस सौंदर्य को अपनी आँखों से देख पाएंगे।

प्रश्न 16.
सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था।
– रचना का नाम लिखें। किसका दिल बुरी तरह क्यों धड़क रहा था ?
उत्तर :
रचना का नाम है – ‘ठले पर हिमालय’।
लेखक उस समय की कल्पना कर रहे थे जब हिमालय का निरावृत अपार सौंदर्य उनके सामने होगा। उस सौंदर्य को अपनी आँखों से दंखना और उसकी सुंदरता का पान करने की कल्पना मात्र से ही लेखक का दिल वुरी तरह धड़क रहा था।

प्रश्न 17.
अब समझे यहाँ का जादू।
– उक्त कथन किस रचनाकार के किस पाठ से लिया गया है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
उक्त कथन धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
जब तक लेखक ने कौसानी की कत्यूर घाटी तथा हिम शिखर के सौंदर्य के दर्शन नहीं किए थे तब तक उनका मन खिन्न था लेकिन अब उनकी सारी खित्रता दूर हो गयी थी। शुक्ल जी लेखक में आए इसी बदलाव को देखक मुस्कुरा रहे थे मानो कह रहे हों – “इतने अधीर थे, कौसानी आयी भी नहीं और मुँह लटका लिया। अब समझे यहाँ का जादू।”

प्रश्न 18.
और फिर सब खुल गया।
– वक्ता कौन है ? अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता लेखक धर्मवीर भारती हैं।
लेखक तथा उनके साथ आए सभी लोग डाक बंगले के बरामदे में बैठकर हिम शिखर के सौंदर्य को निहार रहे थे। हिम शिखरों पर छाए बादल धीरे-धीरे नीचे की ओर सरक रहे थे तथा एक-एक करके नये-नये शिखरों की हिम रेखाएँ, उनका सौदर्य खुलता जा रहा था। और फिर सारे बादलो के हट जाने से पूरे हिम शिखरों का सौंदर्य एकबारगी आँखों के सामने आ गया।

प्रश्न 19.
हिम्मत है ? ऊँचे उठोगे ?
– उक्त कथन किस रचनाकार के किस पाठ से लिया गया है ? यह कौन, किससे कह रहा है ?
उत्तर :
उक्त कथन धर्मवीर भारती के ‘ठेले पर हिमालय’ पाठ से लिया गया है।
लेखक को ऐसा लगता है कि वह हिमालय की ऊँचाई के सामने छोटे भाई की तरह है। लेखक को नीचे कुण्ठित तथा लज्जित भाव से खड़ा हुआ देखकर मानो हिमालय उसे उत्साहित करते हुए बड़े भाई की तरह उसे चुनौती दे रहा हो “हिम्मत है? ऊँचे उठोगे ?”

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प्रश्न 20.
हम हर पर्सपेक्टिव हिमालय देखूँगा।
– व्रक्ता कौन है ? अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता शुक्ल जी के साथ आया चित्रकार सेन हैं ।
चित्रकार सेन अचानक ही बातें करते-करते सिर के बल खड़ा होकर हिमालय को देखने लगे – ‘हम हर पर्सपक्टिव (क्षैतिज) हिमालय देखूँगा।’ उसके इस कथन में उन चित्रकारों तथा चित्र शैलियों के प्रति विक्षोभ है जोकिसी चीज को सीधे न देखकर उसे विभिन्न कोणों से देखते हैं तथा वह आम आदमी की समझ से बाहर हो जाता है।

प्रश्न 21.
आज भी उसकी याद आती है, तो मन पिरा उठता है।
अथवा
प्रश्न 22.
उस दर्द को समझता हूँ।
– उपर्युक्त कथन के वक्ता कौन हैं ? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
उपर्युक्त कथन के वक्ता धर्मवीर भारती हैं।
लेखक को जब भी कौसानी तथा वहाँ से हिम शिखरों के सौंदर्य की याद आती है तो वहाँ से अलग होने का भाव उनके मन को दुःख देता है। पहले उन्होंने अपने उपन्यासकार मित्र के दुःख को नहीं समझा था लेकिन जब से उन्होने स्वयं उस सौंदर्य को देखा है – वे अपने मित्र के उस दर्द को समझ सकते हैं।

प्रश्न 23.
किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था- ‘कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो’
– पाठ और रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ ‘ठेले पर हिमालय’ तथा इसके रचनाकार धर्मवीर भारती हैं।
लेखक की इच्छा थी कि वे हमेशा उसी हिम शिखरों के सौंदर्य के बीच रहें लंकिन यह संभव नही है। कुछ ऐसी ही भावनाओं के वशीभूत तुलसीदास ने भी यह कहा होगा कि आखिर मैं कब तक इस दशा में पड़ा रहूँगा, कब आपके (श्री राम) दर्शन होंगे।

प्रश्न 24.
वहीं मन रमता है, मैं करूँ तो क्या करूँ ?
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता धर्मवीर भारती हैं।
लेखक भले ही कौसानी से लौट आए हैं लेकिन हिमालय का, वहाँ की घाटियों का वह सौंदर्य आज भी उनको आँखों के सामने नाय रहा है। वे बार-बार वहाँ जाना चाहते हैं। उनके मन में यह भाव आता है कि अपने आने का संदेशा हिमालय को भेज दे क्यांकि उनका मन तो वहीं रम गया है और मन है कि उनका कहना नहीं मानता, कहीं और वास करना नहीं चाहता।

प्रश्न 25.
मन में बेसाख् यही आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लूँ, आँखों से लगा लूँ।
– वक्ता कौन है ? वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता धर्मवीर भारती हैं।
जब लेखक ने कत्यूर घाटी के सौदर्य को देखा तो वे उसके सौदर्य में बँधकर रह गए। हरे मखमली खेत, रास्त के किनारे सफेद पत्थरों के कतार और इधर-उधर से आकर आपस में मिल जानेवाली नदियाँ ऐसी लगती थी मानो फूलों की लड़ियाँ हों। यह सौंदर्य देखकर लेखक के मन में यह ख्याल आता है कि इन लड़यों को उठाकर वे कलाई में लपंट ले या फिर इन्हें अपनी आँखो से लगाकर उसकी शीतलता, उसके सुगंध को अनुभव करें।

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प्रश्न 26.
आप लोग खुशकिस्मत हैं साहब।
अथवा
प्रश्न 27.
आज तो आपके आते ही आसार खुलने के हो रहे हैं।
– वक्ता और श्रोता कौन हैं ? वक्ता के ऐसा कहने का कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता कौसानी डाक बँगले का खानसामा है तथा श्रोता लेखक तथा उनकी मित्र-मंडली हैं।
लेखक के आने के चौदह दिनों पहल से ही कई दूरिस्ट हिमालय के दर्शन के लिए रूके थे लंकिन वे हिमालय के हिम-शिखरों को नहों देख पाए। लेखक और उनके मित्र को पहले ही दिन हिम शिखरों के सौदद्य के दर्शन हो गए इसलिए खानसामा उन्हें खुर्शकिस्मत बता रहा है। इतना ही नहों, उनलोगों के आते हो बादल भी छँटने लगे थे। मौसम खुलने लगा था।

प्रश्न 28.
यह पहली बार मेरी समझा में आ रहा था।
– किसकी समझ में पहली बार क्या आ रहा था ?
उत्तर :
कौसानी से हिमालय के दर्शन से लेखक को ऐसा लगा मानो उसके सारे संघर्ष, अन्तर्द्धन्द्ध तथा ताप नप्ट हो रहे हैं । अब लखक के समझ में यह बात आई कि क्यों प्राचीन साधक अपन दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों से मुक्ति पाने के लिए हिमालय की ही शरण मे ज्ञात थे।

प्रश्न 29.
पर सब चुपचाप थे।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत प्रक्त धर्मवोर भारती के गात्रा-वृतांत ‘ठले पर हिमालय’ से लो गई है।
कौसानी में जब सूरज डुबने लगा तो उसकी लालिमा से ग्लेशियरों के जल भी पिघले हुए केसर के समान लगने लगे सफंद कमल का रंग लाल हो गया तथा धाटियों का रंग गहरा नीला प्रतीत होने लगा। सौदर्य के इस बदलतं रूप को सब अपनी आँखों सं चुपचाप निहार रहे चं मानों सबकी वाणी मूक हो गई हो। वह सौदर्य केवल अनुभव करने की चीज़ थी।

प्रश्न 30.
यह मेरा मन इतना कल्पनाहीन क्यों हो गया है ?
– वक्ता का नाम लिखें। वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता धर्मवीर भारती है।
रात में चाँद के निकलन के बाद लेखक डाक बँगले के बरामदे में एक आराम कुर्सी लेकर र बसे अलग-थलग बैठकर यह सांचने लगं – आज तक हिमालय के सौंदर्य का देखकर न जाने कितने कवियों ने कितनी ही रचनाएँ की है। और एक वे हैं कि कावता लिखना तो दुर उनके मन में इस सौंदर्य का वर्णन करने वाला एक शब्द भी नहीी जग रहा है। आखिर उनके साथ ऐसा क्यों हों गहा है ? उनका मन इतना कल्पनाविहीन क्यों हो गया है ?

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प्रश्न 31.
भगवान का क्या-क्या करतूत इस हिमालय में होता है।
– वक्ता का नाम लिखें। कथन का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता चित्रकार संन हैं।
कौसानो तथा हिमालय के सौंदर्य ने सबको अभिभूत किया था लेकिन इस सौंदर्य से सबसे ज्यादा खुश चित्रकार सेन था। वह प्रकृति के क्षण-प्रति-क्षण बदलते रूप को देखकर आश्चर्यचकततथा। अपने इसी भाव को व्यक्त करने के लिए वह कह उठना है कि न जाने भगवान का क्या-क्या करतूत इस हिमालय में होता है।

प्रश्न 32.
कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को कहा है – चिरन्तन हिम।
– रचना तथ्रा रचनाकार का नाम लिखें। अंश का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर :
गचना ‘ठेले पर हिमालय’ तथा रचानाकार धर्मवीर भारती हैं।
हिमालय के शिखर आदिकाल से हो बर्फ सं ढके है। इसके शिखर करी भी हिमविहीन नहीं होंते सालों भर इनपर बर्फ जमा ही रहता है। हिमालय की इसी विशेषता से प्रभावित होकर कुछ विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम कहा हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘ठेले पर हिमालय’ का सारांश अपने शब्दों में लिखें ।
प्रश्न – 2: ‘ठेले पर हिमालय’ में वर्णित लेखक की कौसानी-यात्रा का वर्णन करें ।
प्रश्न – 3 : यात्रा वृतांत की दृष्टि से ‘ठेले पर हिमालय’ की समीक्षा करें।
प्रश्न – 4 : ‘ठेले पर हिमालय’ के आधार पर लेखक की यात्रा का वर्णन करें।
प्रश्न – 5 : कौन-सी घटना थी जिसने लेखक को कौसानी-यात्रा के लिए प्रेरित किया? ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक रचना के आधार पर वर्णन करें।
प्रश्न – 6 : ‘ठेले पर हिमालय’ में वर्णित लेखक के विभिन्न अनुभवों के बारे में लिखें ।
प्रश्न – 7: ‘ठेले पर हिमालय’ के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करें ।
उत्तर : किसी भी यात्रा-वृतांत की सबसे बड़ी विशेषता उसका कौतूहल होता है । अगर पाठक मे यात्रा-वृतांत से कौतूहल न पैदा हो तो वह सफल यात्रा-वृतांत नहीं हो सकता । इस दृष्षि से धर्मवीर का यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ को श्रेष्ठ यात्रा-वृतांत कहा जा सकता है क्यांकि इसका शीर्षक ही मन में कौतूहल पैदा करता है ।

लेखक एकबार पान की दुकान पर अपने एक उपन्यासकार मित्र के साथ खड़े थे कि तभी ठेले पर बर्फ लांद हुए बर्फ वाला आया । उसमें से भाप उड़ रही थी । उपन्यासकार मित्र अल्मोड़ा के थे । वे उस बर्फ के सौदर्य में खो गए और कहा – ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।’ बस क्या था लेखक को अपनी रचना के लिए बना-बनाया तत्काल एक शीर्षक मिल गया – ‘ठेले पर हिमालय’।

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उस घटना से प्रेरित होकर हिमालय पर जमे बर्फ के सौंदर्य को देखन के लिए लेखक ने अपने मित्रों के साथ कौसानी की यात्रा तय कर ली । कौसानी में आगे के मार्गदर्शन के लिए जब उन्हांन बस से शुक्लजो को देखा तो अब तक की यात्रा की सारी थकान गायब हो गयी । शुक्ल जी के साथ उनके शहर के मशहूर चित्रकार सनन भी थे जिनकी वेशभूषा तथा व्यक्तित्व बड़ा अटपटा-सा था ।

जबतक लेखक और उनके मित्र सोमेश्वर घाटी नहीं पहुँचे, वे रास्ते के सौदर्य सं निराश थे। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें यह आभास हो गया कि कौसानी की तुलना स्विटजरलेण्ड से क्यां की गई है –
” इइतना सुकुमार, इतना सुंदर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक कि लगा इस धरती पर तो जूते उतारकर, पॉँव पोंछकर आगे बढ़ना चाहिए ।”

डाकबंगले पर पहुंनते ही उनलोगों को एक क्षण के लिए बर्फ से ढके हिमालय के दर्शन हुए और फिर वह बादलों के बीच छिप गया । इस क्ष के दर्शन से ही लेखक को जो सुखद अनुभूति हुई उससे वे समझ गए कि प्राचीन काल में साधक अपने दैहिक, दैविक तथः मौतिक ताप को नष्ट करने के लिए हिमालय क्यों जाते थे ।

उस यात्रा को काफी समय के बाद भो जब लेखक हिमालय के उस सौददर्य को याद करते हैं तो उन्हें अपने मित्र तथा उनके दर्द की याद करते हैं । लेकिन बार-बार उस सौदर्य के दर्शन कर पाना संभव नही है। न जान फिर वह अवसर जीवन में कब आ पाएगा । तुलसी ने भी इसी भावना के वश में होकर कहा होगा –
‘कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो’

फिर भी लेखक निराश नहीं हैं। वह अवसर उनके जीवन मे कभी न कभी फिर अवश्य आएगा।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि लेखक की कौसानी-यात्रा का वर्णन हमे प्रारंभ से लेकर अंत तक बाँधे रखती है तथा लेखक जिन अनुभूतियों से गुजरते हैं – वह अनुभूति पाठक की हो जाती है। सफल यात्रा-वृतांत का यही सबसे बड़ा गुण है तथा इस आधार पर इसका शीर्षक ‘ठले पर हिमालय’ भी सर्वथा उपयुक्त है ।

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है – यह किसने क्या देखकर कहा ?
उत्तर :
लेखक के उपन्यासकार मित्र ने ठले पर रखे बर्फ से उठती भाप की सुंदरता का देखकर कहा।

प्रश्न 2.
लेखक को अपने यात्रा-वृतांत का शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ की प्रेरणा किसकी बात से मिल्नी ?
उत्तर :
लेखक को अपने यात्रा-वृतांत के शीर्षक की प्रेरणा अपने उपन्यासकार मित्र की बात से मिलो।

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प्रश्न 3.
अपने शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ के बारे में लेखक ने नए कवियों से क्या कहा है ?
उत्तर :
अपने शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ के बारे में लेखक ने नए कवियों से कहा है – “इसे ले जायँ और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ बैडोल-बेतुकी लिख डालें ।”

प्रश्न 4.
नये कवियों की पंक्तियों को लेखक ने ‘बेडोल-बेतुकी’ क्यों कहा है ?
उत्तर :
नये कवियों की कविता न तो मन को छूती है और न ही छंद के नियमों का पालन करती है. इसलिए उनकी पंक्तियों को लेखक ने बैडोल-बेतुकी कहा है ।

प्रश्न 5.
सुललित गीतकारों से लेखक ने बर्फ को क्या कहकर डाँटने को कहा है ?
उत्तर :
सुललित गीतकारों से लेखक ने बर्फ को यह कहकर डाँटने को कहा है – “उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो ?’

प्रश्न 6.
लेखक ने जब अपने मन की अनुभूति को उपन्यासकार मित्र को बताया तो उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर :
लेखक ने जब अपने मन की अनुभूति को उपन्यासकार मित्र को बताया तो उनक मित्र को प्रतिक्रिया से ऐसा लगा मानो वह बर्फ उनके मन को कहीं खराँच गई है ।

प्रश्न 7.
किसके मन पर हिमालय की बर्फ एक ऐसी खरोंच छोड़ जाती है, जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है ?
उत्तर :
जिसने एक बार भी हिमालय के सौदर्य को देख लया है उसके मन पर हिमालय की बर्फ एक ऐसी खरोंच छोड़ जाती है, जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है ।

प्रश्न 8.
कितना कहप्रद, कितना सूखा और कितना कुरूप है – यह किसके बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
गह उस रास्ते के बारे में कहा गया है जो रास्ता कोसी से कौसानी की ओर जाता है।

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प्रश्न 9.
‘बिल्कुल शैतान की आँत मालूम पड़ता है’ – प्रस्तुत वाक्य किसके लिए कहा गया है?
उत्तर :
प्रस्तुन वाक्य कासी से कौसानी की आर जाने वाले सूखे, भूरे, ढाल को काटकर बनाए गए रास्ते के बारे में कहा गया है ।

प्रश्न 10.
हमलोगों की जान में जान आयी – किनलोगों की जान में जान आई और क्यों ?
उत्तर :
जब लंखक और उनके मित्र ने लॉरीी (बस) से शुक्लजी को उतरते देखा तो उनकी जान में जान आई क्योंकि आगे के सफर के मार्गदर्शक वही थे ।

प्रश्न 11.
पर शुक्लजी के साथ यह नई मूर्ति कौन है – यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है ?
उत्तर :
यहाँ शुक्लजी के चित्र्रकार मित्र संन के बारे में कहा जा रहा है।

प्रश्न 12.
उमी रुपये से घूपकर छुद्वियाँ बिता रहे हैं – कौन, किस रुपये से घूमकर छुद्वियाँ बिता रहा है?
उन्तर :
शुक्लजी के वित्रकार मित्र संन को उनके कुछ चित्रों पर अकादमी की और से पुरस्कार स्वरूप रुपये मिले थे। वे उन्हों रुपयों सं अपनी खुद्टियाँ बिता रहे थे।

प्रश्न 13.
आते समय लेखक के सहयोगी ने कौसानी के बारे में क्या कहा था ?
उत्तर :
लखक के एक सहययागी ने कौसानी आते समय उनसे यह कहा था कि कश्मीर के मुकाबले उन्हे कौसानी ने अधिक मांह है, गाँधीजी ने अनासक्ति-यांग यहीं लिखा था और यं भी कहा था कि स्विटजरलेण्ड का आभास कौसानी में हो होता है ।

प्रश्न 14.
गाँधीजी ने अनासक्ति योग कहाँ लिखा था ?
उत्तर :
गाँधी जी नं अनासक्तियोग कौसानी में लिखा था।

प्रश्न 15.
कौसानी कहाँ बसा हुआ है ?
उत्तर :
सांमश्वर की घाटी के उत्तर में ऊँची पर्वतमाला के शिखर पर कौसानी बसा हुआ है।

प्रश्न 16.
कौसानी के बस अड्डे पर पहुँचकर लेखक को क्या लगा ?
उत्तर :
कौसानी के बस अड्डे पर पहुँचकर लेखक की कह लगा कि वे ठगे गए हैं क्योंकि वहाँ एक उजड़ा-सा गाँव था और वर्फ का नों कहीं नामो-निशान न था।

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प्रश्न 17.
लेखक ने किन्नर और यक्ष के कहाँ वास करने का अंदाजा लगाया ? क्यों ?
उत्तर :
कॉसानी पर्वतमाला की कत्यृर घाटी में किन्नर और यक्ष के वास करने का अंदाजा लेखक ने लगाया क्यांकि वहाँ का सौंदर्य अनुपम है।

प्रश्न 18.
आपस में उलझ जानेवाली बेलों की लड़ियों-सी नदियों को देखकर लेखक के मन में क्या खयाल आया ?
उत्तर :
बेलों की लड़यों सी उलझी नदियों कां देखकर लेखक के मन में यह खयाल आया कि इन लड़ियों को उठाकर वे कलाई में लपेट लें, आँखों से लगा लें ।

प्रश्न 19.
इतना सुकुमार, इतना सुन्दर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक-किसे कहा गया है?
उत्तर :
कत्यूर की रग-बिरगी घाटी का इतना सुकुमार, इतना सुन्दर, इतना सजा हुआ और निष्कलक कहा गया है।

प्रश्न 20.
खिड़की से झाँक रहा है, कहीं गिर न पड़े – किसके बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
यह बर्फ से ढंक बाल-हिमाशिखर जो बादलों के पीछे छिप गया था, के बारं में कहा गया है ।

प्रश्न 21.
किसकी सारी खिन्नता, निराशा, थकावट सब छू-मन्तर हो गई ? क्यों ?
उत्तर :
लंखक को सारी खिन्नता, निराशा, थकावट – सब छू-मंतर हो गई क्योंकि उसने एक क्षण के लिए ही सही पर हिमाशिखर के दर्शन कर लिए थे।

प्रश्न 22.
निरावृत…असीम सौंदर्य राशि हमारे सामने अभी-अभी अपना घूँघट धीरे से खिसका देगी किसके बारे में कहा जा रहा है ?
उत्तर :
यहाँ हिमालय के सौंदर्य के बार में कहा जा रहा है ।

प्रश्न 23.
‘अब समझे यहाँ का जादू’ – कौन, किससे कह रहा है ?
उत्तर :
यह लेखक के मित्र शुक्लजी लंखक से कह रहे हैं।

प्रश्न 24.
आप लोग खुशकिस्मत हैं साहब – वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता कौसानी डाकबंगले का खानसामा तथा श्रोता लेखक व उनके मित्र हैं।

प्रश्न 25.
और फिर सब खुल गया – सब खुल गया का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
‘सब खुल गया’ का अर्थ हिमालय के शिखरों का बादलों के परदे से निकल आना है ।

प्रश्न 26.
यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था ? किसकी समझा में पहली बार क्या आ रहा था ?
उत्तर :
लेखक को हिमालय का सौंदर्य देखकर पहली बार यह समझ में आ रहा था कि प्राचीन काल में साधक अपनी दैहिक, दैविक तथा भौनिक ताप को कम करने के लिए हिमालय क्यो जाते थे।

प्रश्न 27.
विदेशियों ने हिमालय के बर्फ को क्या कहा है ?
उत्तर :
विद्देशियों ने हिमालय के बर्फ को ‘चिरतन हिम’ कहा है ।

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प्रश्न 28.
लेखक हिमालय को किसकी तरह कहते हैं ?
उत्तर :
लेखक हिमालय को अपने बड़े भाई की तरह कहते हैं।

प्रश्न 29.
‘बाद में मालूम हुआ’ – किसे क्या बाद में मालूम हुआ ?
उत्तर :
लेखक को यह बाद मे मालूम हुआ कि चित्रकार सेन बम्बई की अत्याधुनिक चित्रशैली से थोड़ा नाराज है ।

प्रश्न 30.
‘आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है’ – किसकी याद आने पर किसका मन पिरा उठता है ?
उत्तर :
हिमालय और उसके सौंदर्य की याद आने पर आज भी लेखक का मन पिरा उठता है।

प्रश्न 31.
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो – किसने कहा था ?
उत्तर :
यह तुलसीदास ने कहा था ।

प्रश्न 32.
लेखक का मन कहाँ रमता है ?
उत्तर :
लंखक का मन हिमालय-शिखरों पर रमता है ।

प्रश्न 33.
उन्हीं डँचाइयों पर तो मेरा आवास है – किन उँचाइयों पर किसका आवास है ?
उत्तर :
हिमालय को उँचाइयों पर लेखक के मन का आवास है।

प्रश्न 34.
रबीन्द्र की पंक्ति कौन गा उठा ?
उत्तर :
रवोन्द्र की पक्ति चित्रकार सेन गा उठा।

प्रश्न 35.
ज्यों-ज्यों कौसानी निकट आने लगा – उसका क्या प्रभाव लेखक पर दिखने लगा?
उत्तर :
कौसानी के निकट आते- आते अधैर्य, असतोष तथा क्षोभ का भाव लेखक पर दिखने लगा।

प्रश्न 36.
अकस्मात् वह शीर्षासन करने लगा – कौन शीर्षासन करने लगा ?
उत्तर :
अकस्मात् चित्रकार सेन शीर्षासन करने लगा ।

प्रश्न 37.
लेखक क्या देखकर पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया ?
उत्तर :
जब लेखक कौसानी बस अड्डे पर उतरे तो सामने की घाटी का आपार सौदर्य देखकर पत्थर की मूर्चि-से स्तख्ध रह गए

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प्रश्न 38.
सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था – किसके दिल क्यों बुरी तरह धड़क रहा था?
उत्तर :
लेखक का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि क्या होगा जब हिमालय उसके सामने ससौददर्य और अनावृत होगा।

प्रश्न 39.
लेखक के साथ कौन-कौन कौसानी गए थे ?
उत्तर :
लंखक के साथ उनकी पत्नी, चित्रकार सेन, शुक्ल जी तथा एक मित्र कौसानी गए थे।

प्रश्न 40.
नगाधिराज, पर्वत सम्राट किसे कहा गया है ?
उत्तर :
हिमालय को नगाधिराज, पर्वत समाट कहा गया है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
घर्मवीर भारती का जन्म कब हुआ था ?
(क) 25 दिसंबर सन् 1926
(ख) 24 दिसंबर सन् 1925
(ग) 26 दिसंबर सन् 1927
(घ) 28 दिसंबर सन् 1931
उत्तर :
(क) 25 दिसंबर सन् 1926

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प्रश्न 2.
भारती जी ने निम्नलिखित में से किन दो साप्ताहिक पत्रों का संपादन किया था ?
(क) ‘दिनमान’ और ‘संगम’
(ख) ‘संगम’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’
(ग) ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’
(घ) ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’.
उत्तर :
(ग) ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।

प्रश्न 3.
भारती जी को निम्न में से किस उपाधि से अलंकृत किया गया ?
(क) पद्माश्री
(ख) साहित्य अकादमी
(ग) भारती सम्मान
(घ) साहित्य भूषण
उत्तर :
(क) पड्शश्री।

प्रश्न 4.
धर्मवीर भारती ने निम्न में से किस विधा में नहीं लिखा ?
(क) कविता
(ख) कथा
(ग) नाटक
(घ) व्यंग्य
उत्तर :
(घ) व्यंग्य ।

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प्रश्न 5.
‘गुनाहों का देवता’ (उपन्यास) किसकी रचना है ?
(क) प्रिमचंद की
(ख) जैनेनेन्र की
(ग) धर्मवीर भारती की
(घ) यशपाल की
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती की।

प्रश्न 6.
‘सूरज का सातवां घोड़ा’ (उपन्यास) के लेखक कौन हैं ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) उषा प्रियवदा
(घ) दिनकर
उत्तर :
(ख) धर्मवौर भारती।

प्रश्न 7.
‘कनुप्रिया’ (काव्य) के कवि कौन हैं ?
(क) धर्मवीर भारती
(ख) पंत
(ग) प्रसाद
(घ) निराला
उत्तर :
(क) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 8.
‘ठण्डा लोहा’ (काव्य) के कवि कौन हैं ?
(क) महादेवी
(ख) प्रसाद
(ग) बिहारी
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती।

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प्रश्न 9.
‘अन्धायुग’ (काव्य-नाटक) किसकी रचना है ?
(क) दिनकर की
(ख) धर्मवोर भारती की
(ग) मैथिलीशरण गुप्त की
(घ) तुलसी की
उत्तर :
(ख) धर्मवौर भारती की।

प्रश्न 10.
‘सात गीतवर्ष’ (कविता) के रचयिता कौन हैं ?
(क) प्रसाद
(ख) पंत
(ग) निराला
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 11.
‘मानस-मूल्य’ के लेखक कौन हैं ?
(क) जैनेन्द्र
(ख) अरुण कमल
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) यशपाल
उत्तर :
(ग) धर्मवौर भारती।

प्रश्न 12.
‘साहित्य’ किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद्य की
(ख) नगेन्द्र की
(ग) रामचंद्र शुक्ल की
(घ) धर्मवीर भारती की
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती की।

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प्रश्न 13.
‘नदी प्यासी थी’ के रचनाकार कौन है ?
(क) महादेवी
(ख) प्रियंवदा
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) सर्वेश्वर
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 14.
‘कही-अनकही’ (निबंध-संग्रह) के निबंधकार कौन हैं ?
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) प्रेमचंद
(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी
उत्तर :
(ख) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 15.
‘ठेले पर हिमालय’ किसकी रचना है ?
(क) धर्मवीर भारती की
(ख) अरुण कमल की
(ग) दिनकर की
(घ) द्विवेदी की
उत्तर :
(क) धर्मवीर भारती की।

प्रश्न 16.
‘पश्यन्ती’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) रामचंद्र शुक्ल
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 17.
‘ठेले पर हिमालय’ किस विधा की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) नाटक
(ग) उपन्यास
(घ) यात्रा-वृतांत
उत्तर :
(घ) यात्रा-वृतांत ।

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प्रश्न 18.
‘ठेले पर हिमालय’ में कहाँ से कहाँ तक की यात्रा का विवरण है ?
(क) नेनीताल के कौसानी तक
(ख) राजगीर से कौसानी तक
(ग) नौनीताल से कोसी तक
(घ) कोसी से कत्यूर तक
उत्तर :
(क) नैनीताल के कौसानी तक ।

प्रश्न 19.
विश्व की प्रसिद्ध भाषाओं की कविताओं का अनुवाद भारती जी ने किस नाम से किया है ?
(क) मतान्तर
(ख) देशान्तर
(ग) दिशान्तर
(घ) लिप्यान्तर
उत्तर :
(ख) देशान्तर ।

प्रश्न 20.
‘सपना अभी भी’ (काव्य) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) मोहन राकेश
(ख) रेणु
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) अश्क
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 21.
‘आद्यन्त’ (काव्य) किसकी रचना है ?
(क) धर्मवीर भारती की
(ख) निराला की
(ग) नागार्जुन की
(घ) अजेय की
उत्तर :
(क) धर्मवौर भारती की।

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प्रश्न 22.
‘मुर्दों का गाँव’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है ?
(क) अज्ञेय की
(ख) कमलेश्वर की
(ग) धर्मवीर भारती की
(घ) राजेन्र्र यादव की
उत्तर :
(ग) धर्मवौर भारती की।

प्रश्न 23.
‘बन्द गली का आखिरी मकान’ किसकी कृति है ?
(क) मन्नू भंडारी की
(ख) राजेन्द्र यादव की
(ग) यशपाल की
(घ) धर्मवीर भारती की
उत्तर :
(घ) धर्मवोर भारती की ।

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प्रश्न 24.
‘साँस की कलम से’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) कमलेश्वर
(ख) प्रेमचंद
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) निर्मल वर्मा
उत्तर :
(ग) धर्मवोर भारती ।

प्रश्न 25.
‘ग्यारह सपनों का देश’ के उपन्यासकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) इंशाअल्ला खाँ
(ग) भारतेन्दु
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवौर भारती।

प्रश्न 26.
‘कुछ चेहरे, कुछ चिन्तन’ के निबंधकार कौन हैं ?
(क) हरिशकर परसाई
(ख) मंजुल भगत
(ग) भौष्म साहनी
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 27.
‘स्वर्ग और पृथ्वी’ के उपन्यासकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचद
(ख) पाश
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) निर्मल वर्मा
उत्तर :
(ग) धर्मवोर भारती।

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प्रश्न 28.
‘मुक्त क्षेत्र : युद्ध क्षेत्रे’ रिपोतार्ज किसने लिखा है ?
(क) ज्ञान प्रकाश
(ख) धर्मवौर भारती
(ग) रेणु
(घ) निराला
उत्तर :
(ख) धर्मबीर भारती ।

प्रश्न 29.
‘युद्ध-यात्रा’ रिपोतार्ज के रचनाकार कौन हैं ?
(क) निराला
(ख) ज्ञानरंजन
(ग) धर्मवोर भारती
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 30.
‘यात्रा-चक्र’ यात्रा-वृतांत के लेखक कौन हैं ?
(क) धर्मवीर भारती
(ख) प्रेमचंद
(ग) अरुण कमल
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(क) धर्मवौर भारती ।

प्रश्न 31.
लेखक के मित्र का जन्म-स्थान कहाँ है ?
(क) अल्मोड़ा
(ख) कौसानी
(ग) नैनीताल
(घ) दिल्ली
उत्तर :
(क) अल्मोड़ा

प्रश्न 32. लेखक के मित्र पेशे से क्या हैं ?
(क) शिक्षक
(ख) शिक्षक एवं उपन्यासकार
(ग) दुकानदार
(घ) डॉक्टर
उत्तर :
(ख) शिक्षक एवं उपन्यासकार ।

प्रश्न 33.
लेखक कौसानी क्यों गए थे ?
(क) बर्फ देखने
(ख) गाँव देखने
(ग) घाटी देखने
(घ) पूजा-पाठ करने
उत्तर :
(क) बर्फ देखने ।

प्रश्न 34.
कोसी से कौसानी जानेवाली सड़क कैसी लगती है ?
(क) सीधी
(ख) शैतान की आँत
(ग) सॉप की आँत
(घ) उवड़-खाबड़
उत्तर :
(ख) शैतान की आंत ।

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प्रश्न 35.
कौसानी में लेखक किसका इंतजार कर रहे थे ?
(क) बस का
(ख) रेल का
(ग) शुक्ल जी का
(घ) सेन का
उत्तर :
(ग) शुक्ल जी का ।

प्रश्न 36.
मुसाफिरों के चेहरे पीले क्यों पड़ गए थे ?
(क) भय से
(ख) बीमारी से
(ग) लापरवाह ड्राइवर के कारण
(घ) रंग पड़ जाने से
उत्तर :
(ग) लापरवाह ड्राइवर के कारण ।

प्रश्न 37.
कैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से मिलता है ?
(क) सेन जैसा
(ख) खानसामा जैसा
(ग) शुक्लजी जैसा
(घ) लेखक जैसा
उत्तर :
(ग) शुक्लजी जैसा।

प्रश्न 38.
किसने लेखक को कौसानी आने का उत्साह दिलाया था ?
(क) शुक्ल जी ने
(ख) सेन ने
(ग) रवीन्द्र ने
(घ) पत्नी ने
उत्तर :
(ख) शुक्ल जी ने ।

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प्रश्न 39.
शुक्ल जी के साथ नई मूर्त्ति कौन थे ?
(क) खानसामा
(ख) ड्राइवर
(ग) चित्रकार सेन
(घ) गणेश
उत्तर :
(ग) चित्रकार सेन ।

प्रश्न 40.
शुक्लजी के साथ आए व्यक्ति का नाम क्या था ?
(क) सेन
(ख) गुप्ता जी
(ग) रवीन्द्र
(घ) राजेन्द्र
उत्तर :
(क) सेन ।

प्रश्न 41.
अकादमी से किसकी कृतियों पर पुरस्कार मिला था ?
(क) लेखक
(ख) खानसामा
(ग) सेन
(घ) रवीन्द्र
उत्तंर :
(ग) सेन ।

प्रश्न 42.
शुक्लजी के मित्र सेन पेशे से क्या थे ?
(क) चित्रकार
(ख) फोटोग्राफर
(ग) डॉकटर
(घ) शिक्षक
उत्तर :
(क) चित्रकार ।

प्रश्न 43.
कोसी के पहला पड़ाव कौन-सा आया ?
(क) सोमेश्वर की घाटी
(घ) कौसानी
(ग) कश्मीर घाटी
(घ) कत्यूर
उत्तर :
(क) सोमेश्वर की घाटी।

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प्रश्न 44.
कोसी से कौसानी की दूरी कितनी है ?
(क) 20 कि०मी०
(ख) 24 कि०मी०
(ग) 30 कि॰मी०
(घ) 50 कि०मी०
उत्तर :
(ख) 24 कि॰मी० ।

प्रश्न 45.
स्विटजरलैण्ड का आभास कहाँ होता है ?
(क) कौसानी में
(ख) कश्मीर में
(ग) नैनौताल में
(घ) दार्जीलिंग में
उत्तर :
(क) कौसानी में।

प्रश्न 46.
गाँधी जी ने ‘अनासक्तियोग’ कहाँ लिखा था ?
(क) गुजरात में
(ख) अहमदाबाद में
(ग) कौसानौ में
(घ) दक्षिण अफ्रीका में
उत्तर :
(ग) कौसानी में।

प्रश्न 47.
सोमेश्वर की घाटी के उत्तर में क्या है ?
(क) ऊँची पर्वतमाला
(ख) कल-कारखाने
(ग) सेव के बाग
(घ) स्विट जरलैण्ड
उत्तर :
(क) ऊँची पर्वतमाला ।

प्रश्न 48.
कल्यूर घाटी कहाँ स्थित है ?
(क) कौसानी में
(ख) कशमीर में
(ग) दार्जीलिंग में
(घ) देहरादून में
उत्तर :
(क) कौसानी में ।

प्रश्न 49.
कित्रर कौन हैं ?
(क) देवज्ञाति
(ख) सुर
(ग) असुर
(घ) राक्षस
उत्तर :
(क) देवजाति।

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प्रश्न 50.
यक्ष कौन हैं ?
(क) रक्षक
(ख) भक्षक
(ग) दानव
(घ) डाकू
उत्तर :
(क) रक्षक

प्रश्न 51.
आपलोग खुशकिस्मत हैं साहब – वक्ता कौन है ?
(क) लेखक
(ख) सेन
(ग) खानसामा
(घ) चित्रकार
उत्तर :
(ग) खानसामा ।

प्रश्न 52.
निम्न में से कौन ताप की श्रेणी में नहीं आता है ?
(क) दैहिक
(ख) दैविक
(ग) आध्यात्मिक
(घ) भौतिक
उत्तर :
(ग) आध्यात्मिक।

प्रश्न 53.
सब चुपचाप थे – सब कौन हैं ?
(क) घाटी
(ख) बस के यात्री
(ग) लेखक के साथवाले लोग
(घ) खानसामे
उत्तर :
(ग) लेखक के साथवाले लोग ।

प्रश्न 54.
सेन किसकी पंक्ति गा उठा ?
(क) मुकेश की
(ख) रवीन्द्र की
(ग) कबीर की
(घ) निराला की
उत्तर :
(ख) रवीन्द्र की।

प्रश्न 55.
हिमालय का सौंदर्य देखकर लेखक की टोली में सबसे अधिक खुश कौन था ?
(क) लेखक
(ख) शुक्ल जी
(ग) सेन
(घ) पत्नी
उत्तर :
(ग) सेन ।

प्रश्न 56.
किसकी याद आने से लेखक का मन पिरा उठता है ?
(क) पत्नी की
(ख) मित्र की
(ग) हिमालय की
(घ) यात्रा की
उत्तर :
(ग) हिमालय की।

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प्रश्न 57.
लेखक को कौन बार-बार बुलाती हैं ?
(क) पत्नी
(ख) सुन्दरता
(ग) हिमशिखरों की उँचाइयाँ
(घ) घाटी
उत्तर :
(ग) हिमशिखरों की ऊँचाइयाँ ।

प्रश्न 58.
नहीं बन्धु…… आऊँगा । बंधु कौन है ?
(क) लेखक
(ख) मित्र
(ग) सेन
(घ) हिमालय
उत्तर :
(घ) हिमालय ।

प्रश्न 59.
मैं करूँ तो क्या करूँ-वक्ता कौन है ?
(क) सेन
(ख) शुक्लजी
(ग) मित्र
(घ) लेखक
उत्तर :
(घ) लेखक ।

प्रश्न 60.
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो – किसका कथन है ?
(क) कबीर का
(ख) लेखक का
(ग) सूरदास का
(घ) तुलसीदास का
उत्तर :
(घ) तुलसीदास का।

टिप्पणियाँ

किन्नर :- प्रस्तुत शब्द् धर्मवोर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
महाभारत और पुराणों में हिमालय क्षेत्र में बसनेवाली इस जाति का उल्लेख है। किनररों को देवताओं का गायक और भक्त कहा गया है। किन्नरों के दाढ़ी-मूँछ नहीं के बराबर निकलती है और कभी-कभी चेहरा देखकर तुरंत स्त्री-पुरुष में अंतर नहीं मालूम होता है।

यक्ष :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
यक्ष देवयानन की एक जाति थी। इसे महाभारत में शूद्रदेवता कहा गया है। ये लोग कुबेर के उपासक थे और उसकी सपन्ति की रक्षा करते थे। कुबेर का यक्ष का राजा कहा गया है।

तुलसी (तुलसीदास) :- प्रस्तुत शब्द धर्मवोर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
‘रामचरितमानस’ के रचयिता संत तुलसीदास के जन्म स्थान के बारे में विवाद है। तुलसीदास द्वारा राित काव्य भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायक, जोवन को मर्यादित करनेवाली तथा उपयोगी है। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों में रामचरितमानस, कवितावली, विनय पत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

गोमती :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
गोमती नदी का उल्लेख ‘ऋग्वेद’ तथा ‘महाभारत’ मे हुआ है। ॠग्वेद में इस सिंधु की सहायक नदी बताया गया है। कुछ मंथों में यह वैदिक सभ्यता का केन्द्र स्थल है और कुरूक्षेत्र में बहती है। वर्तमान गोमती उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले सं नकलकर नंमिषारण्य और लखनऊ होती हुई जौनपुर के निकट गंगा में मिलती है।

कोसी :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारतो के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
गंगा की यह सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह एवरेस्ट और कंचनजंघा के बीच से प्रवाहित होकर जयनगर नामक स्थान पर मैदान में उतरती है। इसकी धारा बड़ी भयानक है तथा यह तेजी से अपना मार्ग बदलती है। 200 वर्ष पहले यह बिहार में पूर्णिया के निकट बहती थी लंकिन अब लगभग 70 मील पश्चिम में खिसक गई है। इसे बिहार की ‘शोक नदी’ भी कहतं हैं।

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कश्मीर :- प्रस्तुत शब्द धर्मवौर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
कश्मीर का पूरा नाम ‘जम्मृ और कश्मीर’ है। यह देश के धुर उत्तर में स्थित एक सीमांत प्रदेश है। इसकी सीमायें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और तिब्बत से मिलती है। यह प्रदेश अपनी प्राकृतिक शोभा के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी इसका बड़ा महत्व है।

ताप :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।हमार प्राचीन साहित्य में ताप (कष्ट) तीन प्रकार के बताए गए हैं – दैहिक, दैविक तथा भौतिक। दैहिक का अर्थ देह से जुड़ी, दैविक का अर्थ देवताओं से जुड़ी तथा भौतिक अर्थ सासारिक कष्टों से जुड़ा है। इन कष्टों को दूर करने के लिए ग्राचौन साधक हिमालय जाते थे।

चाँद (चंद्रमा) :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
चंद्रमा पृथ्वी का अकेला छोटा उपप्रह है। चंदमा के निर्माण के बारे में कई मत हैं। एक के अनुसार यह पृथ्वी के दूटने से बना है। अन्य मत के अनुसार यह सौरमंडल में कहीं और से भटक कर आया और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में बँध गया।

शैतान :- प्रस्तुत शब्द धर्मवोर भारतो के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
शैतान एक फरिश्ता था जिसने ईश्वर को आज्ञा का उल्लंधन किया और स्वर्ग से निकाला गया। तब से वह मनुष्यों को पाप की आर उन्मुख करता है। शैतान शब्द का प्रयोग वैसे मनुष्य के लिए भी किया जाता है जो दूसरों का बुरा चाहता है।

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बाइनाकुलर (दूरबीन) :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतात ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
बाइनाकुलर लंबी नलीनुमा एक यंत्र होता है जिसमें लेंस लगा होता है। इससे हमें दूर की वस्तु भी निकट तथा साफसाफ दिखाई देती है। अभी बड़े-बड़े शक्तिशाली बाइनाकुलर से तारों का भी अध्ययन किया जाता है अब तो ऐसे बाइनाकुलर भो हैं जिनसे रात के अंधेरे में भी देखा जा सकता है।

पाठ्याधारित व्याकरण :

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डॉं० धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन् 1926 को इलाहाबाद (प्रयाग) के अतरसुइया मुहल्ले में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री चिरंजीव लाल वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती चंदा देवी था । धर्मवीर भारती पाँच भाइयों में से एक थे ।

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बालक धर्मवीर बचपन में एक-दो वर्ष पिता के साथ आज़मगढ़ और मऊनाथ भंजन में रहे। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई । इलाहाबाद के डी० ए० वी० हाई स्कूल में पहली बार चौथी क्लास में नाम लिखाया गया। आठवीं कक्षा में थे तभी पिता का देहांत हो गया । उसके बाद बहुत गरीबी में दिन बीते। प्रयाग में बसे मामा श्री अभयकृष्ण जौहरी के परिवार के साथ रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त की। कायस्थ पाठशाला इंटर कॉलेज से सन् 1942 में इंटरमीडियट पास किया ।

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बयालीस के आंदोलन में भाग लिया और पढ़ाई एक बरस रुक गयी । सन् 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से बी० ए० की डिग्री प्राप्त की व हिन्दी में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर चिंतामणि घोष मैडल के हकदार बने । सन् 1947 में वही से प्रथम श्रेणी में एम० ए० करने के बाद डॉ० धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन में सिद्ध साहित्य पर शोध प्रबंध लिखकर पी-एच० डी० की डिग्री प्राप्त की।

इन्हें छात्र जीवन से ही द्यूशनें कर आत्मनिर्भर होना पड़ा । एम० ए० की पढ़ाई का खर्च ‘अभ्युदय’ (सम्पादक : श्री पद्यकांत मालवीय) में पार्ट टाइम काम करके निकाला । 1948 में ‘संगम’ (सम्पादक : श्री इलाचंद्र जोशी) में सहकारी संपादक नियुक्त हुए । दो वर्ष वहाँ काम करने के बाद हिंदुस्तानी अकादमी में उपसचिव का कार्य किया । तदुपरांत प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापक नियुक्त हुए । सन् 1960 तक वहाँ कार्य किया ।

प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान ‘हिंदी साहित्य कोश’ के सम्पादन में सहयोग दिया। ‘निकष’ पत्रिका निकाली तथा ‘आलोचना’ का सम्पादन भी किया । उसके बाद ‘धर्मयुग’ में प्रधान सम्पादक पद पर बम्बई आ गये । ‘धर्मयुग’ हिंदी के सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक के रूप में स्थापित हुआ । 1987 में डॉ० भारती ने अवकाश ग्रहण किया । 1989 में हृदय रोग से गंभीर रूप से बीमार हो गये । गहन चिकित्सा के बाद प्राण तो बच गये किन्तु स्वास्थ्य पूरी तरह कभी सुधरा नहीं और 4 सितंबर 1997 को देहावसान हो गया। नींद में ही मृत्यु ने वरण कर लिया ।

यात्राएँ : सन् 1961 में कामनवेल्थ रिलेशन्स कमेटी के आमंत्रण पर प्रथम विदेश यात्रा पर इंगलैंड तथा यूरोप भ्रमण । पश्चिम जर्मन सरकार के आमंत्रण पर 1964 में जर्मनी यात्रा तथा 1966 में भारतीय दूतावास के निमंत्रण पर इंडोनेशिया तथा थाइलैंड की यात्राएँ की । सितंबर 1971 में मुक्तिवाहिनी के साथ बांग्ला देश की गुप्त

यात्रा की तथा क्रांति का पहला आँखों देखा प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया । भारत-पाक युद्ध 1971 के दौरान भारतीय स्थल सेना के साथ वास्तविक युद्ध स्थल पर निरंतर उपस्थित रहकर युद्ध के वास्तविक मोर्चे के रोमांचक अनुभवों को लिपिबद्ध किया । इसके पहले ऐसा काम कभी किसी पत्रकार ने नहीं किया। भारतीय मूल की मारिशसीय जनता की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए जून 1974 में मारिशस की यात्रा की ।

फिर ऐफ्रो-एशियाई कान्क्रेंस में भाग लेने के लिए पुन: मारिशस गये । 1978 में चीन की सिनुआ संवाद समिति के आमंत्रण पर भारत सरकार के डेलीगेशन के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा पर गये। 1991 में परिवार के साथ अमरीका यात्रा पर गये और अपने भारत देश के तो हर प्रांत में बार-बार अनेक यात्राएँ कीं । यात्राएँ डॉ० भारती को बहुत सुख देती थीं।

अलंकरण तथा पुरस्कार : 1972 में पद्म श्री से अलंकृत हुए । 1997 में महाराष्ट्र रांज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ रचना को प्रतिवर्ष 51,000 रु० का पुरस्कार देने की घोषणा की । पुरस्कार का नाम है – “धर्मवीर भारती महाराष्ट्र सारस्वत सम्मान”। 1999 में युवा कहानीकार उदाय प्रकाश के निर्देशन में साहित्य अकादमी दिल्ली के लिए डॉ० भारती पर वृत्त चित्र का निर्माण हुआ।

अनेक पुरस्कारों में से कुछ इस प्रकार है –

  • 1997 – संगीत नाटक अकादमी के मनोनीत सदस्य
  • 1984 – हल्दी घाटी श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार (महाराणा मेवाड़ फाउडेशन)
  • 1985 – साहित्य अकादमी रल्न सदस्यता सम्मान
  • 1986 – संस्था सम्मान – उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
  • 1988 – सर्वश्रेष्ठ नाटककार पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली
  • 1989 – डॉ० राजेन्द्रपसाद शिखर सम्मान, बिहार सरकार
  • 1989 – गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
  • 1989 – भारत भारती पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
  • 1990 – महाराष्ट्र गौरव – महाराष्ट्र सरकार
  • 1991 – साधना सम्मान, केडिया स्मृति न्यास
  • 1992 – महाराष्ट्राच्या सुपुत्रांचे अभिनंदन सम्मान, वसंत राव नाईक प्रतिष्ठान
  • 1994 – व्यास सम्मान, के० के० बिड़ला फाउंडेशन
  • 1996 – शासन सम्मान, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
  • 1997 – उत्तर प्रदेश गौरव, अभियान सम्मान संस्थान

साहित्य-परिचय :-

कहानी-संग्रह :

  • मुर्दों का गाँव – 1946
  • स्वर्ग और पृथ्वी – 1946
  • चाँद और दूटे हुए लोग – 1955
  • बंद गली का आखिरी मकान – 1969
  • साँस की कलम से (समस्त कहानियाँ एक साथ) – 2000

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कविता :

  • ठंडा लोहा – 1952
  • अंधायुग – 1954
  • सात गीत वर्ष – 1959
  • कनुप्रिया – 1959
  • सपना अभी भी – 1993
  • आद्यन्त – 1999

उपन्यास :

  • गुनाहों का देवता – 1949
  • सूरज का सातवां घोड़ा – 1952
  • ग्यारह सपनों का देश (प्रारंभ व समापन) – 1960

निबंध :

  • ठेले पर हिमालय – 1958
  • पश्यंती – 1969
  • कही अनकहनी -1970
  • कुछ चेहरे कुछ चिंतन -1995
  • शब्दिता – 1997

रिपोर्टिंग

  • युद्ध-यात्रा -1992
  • मुक्त क्षेत्र : युद्ध क्षेत्रे – 1973

आलोचना :

  • प्रग्गतिवाद-एक समीक्षा – 1949
  • मानव-मूल्य और साहित्य – 1960

एकांकी-संग्रह :

  • नदी प्यासी थी – 1954

अनुवाद :

  • ऑस्कर वाइल्ड की कहानियाँ – 1946
  • देशांतर (इक्कीस देशों की आधुनिक कविताएँ) – 1960

शोध प्रबंध :

  • सिद्ध साहित्य – 1968

यात्रा-विवरण :

  • यात्रा चक्र – 1968

पत्र-संकलन :

  • अक्षर अक्षर यज्ञ -1999

साक्षात्कार :

  • धर्मवीर भारती से साक्षात्कार – 1999

ग्रंथावली :

  • धर्मवीर भारती ग्रंथावली (9 खंडों में) -1998

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 52

  • दिलचस्प = आकर्षक
  • यकीन = विश्वास
  • सिलें = बड़े दुकड़े
  • तत्काल = तुरंत
  • कौंध = चमक।
  • बैडौल = अनगढ़
  • बेतुकी = बिना तुक के
  • सुललित = अच्छे

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पृष्ठ सं० – 53

  • तमाम = बहुत सारी पिरा = दु:ख ।
  • कष्टप्रद = कष्ट देने वाला ।
  • कुरूप = असुंदर
  • एकरस = एक जैसा ।
  • नौसिखिया = नया-नया सीखा हुआ
  • लापरवाह = परवाह नहीं करनेवाला
  • उमस = गर्मी
  • लारीं = बस ।
  • प्रसन्नवदन = खुशी से खिले हुए ।
  • सफर = यात्रा ।
  • काफूर = गायब।
  • जर्किन = जैकेट
  • बाइनाकुलर = दूरबीन
  • अटपटी = अजीब।
  • सोंकिया = सींक के जैसा ।
  • ताड़कर = समझकर ।
  • मशहूर = प्रसिद्ध ।
  • कृतियों = रचना, चित्र।
  • करतब = करिश्मा
  • सुडौल = गोल-मटोल ।

पृष्ठ सं० – 54

  • कल-कल = पानी की आवाज ।
  • निर्जन = जहाँ कोई जन (व्यक्ति) न हो ।
  • कंकड़ीली = कंकड़ (छोटे – छाटे पत्थर के टुकड़े) से भरी ।
  • सुहावना = अच्छा ।
  • तन्द्रालस = नींद से बोझिल।
  • अतुलित = जिसकी तुलनां न की जा सके ।
  • माह = आकर्षित ।
  • आभास = अनुभव ।
  • संशय = शक, संदेह ।
  • क्षोभ = गुस्सा ।
  • खिन्न = चिढ़ा हुआ ।
  • अनखाते = झुंझलाते।
  • अपार = जिसका पार (सीमा ) न हो ।
  • किन्नर = देवताओं की एक जाति ।
  • शिलाएँ = पत्थर ।
  • बेलों = फूलों।
  • लड़ियों = मालाओं ।
  • लोक = दुनिया।
  • सुकुमार = कोमल ।
  • निष्कलंक = बिना कलंक के ।
  • कोहरे = कुहासे ।
  • अकस्मात् = अचानक।

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पृष्ठ सं० – 55

  • अटल = नहीं टलने वाला ।
  • रूपहला = चाँदी के रंग का ।
  • नगाधिराज = हिमालय।
  • हर्षातिरेक = खुशी के कारण।
  • लुप्त = गायब ।
  • छू-मन्तर = गायब ।
  • आकुल = बेचैन ।
  • निरावृत = बिना किसी आवरण के, नंगा ।
  • असीम = जिसकी सीमा न हो ।
  • अभिप्राय = मतलब ।
  • अधीर = व्याकुल ।
  • खानसामे = खाना बनानेवाला ।
  • आसार = उम्मीद ।
  • रहस्यमयी = रहस्य से भरी ।
  • पीर = दर्द ।
  • संवेदन = भाव ।
  • अन्तर्द्वन्द्व = अंदर का द्वंद्व (असमंजस) ।
  • दैहिक = देह से जुड़ी हुई।
  • दैविक = देवताओं से जुड़ी हुई ।

पृष्ठ सं० – 56

  • भौतिक = सांसारिक ।
  • उदित = उगा, प्रकट हुआ ।
  • शाश्वत = लागातार, निरंतर ।
  • अविनाशी = कभी नहीं नाश होने वाला ।
  • सुदूर = बहुत दूर ।
  • दर्रों = दो पर्वतों के बीच की संकरा रास्ता।
  • ग्लेशियर = बर्फ का पहाड़ ।
  • अन्धड़ = तूफान ।
  • आत्मलीन = आत्मा में लीन।
  • सम्राट = महाराज।
  • समक्ष = सामने।
  • चेष्टा = कोशिश ।
  • सहसा = अचानक ।
  • तन्द्रा = नींद ।
  • सक्रिय = क्रियाशील।
  • अदम्य = जिसका दमन (दबाया) नहीं किया जा सके ।
  • वण्डरस्ट्रक = आश्चर्यच्चकि।
  • करतूत = करिश्मा ।
  • अकस्मात् = अचानक ।
  • शीर्षासन = सिर के बल किया जाने वाला एक योगासन।
  • अत्याधुनिक = अत्यंत आर्धुनिक ।
  • उज्ज्वल = सफेद ।
  • भेंट = मिला ।

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पृष्ठ सं० – 57

  • पिरा = दुःख ।
  • स्मृतियों = यादों ।
  • कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो = कबतक इस दशा में रहूँगा ।
  • हिमशिखर = बर्फ
  • से ढकी शिखर । सन्देशा = संदेश ।
  • बंधु = भाई ।
  • आवास = घर ।
  • मन रमता है = मन लगता है ।

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Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना सार-लेखन to reinforce their learning.

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‘सार-लेखन’ का अर्थ है किसी रचना को संक्षिप्त रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि उस गद्यांश का कोई महत्तपूर्ण विचार छूटना नहीं चाहिए। इसमें से ऐसा अंश निकाल दिया जाए जिससे उस गद्यांश के मूल भाव पर कोई प्रभाव न पड़े।

‘सार’ का अर्थ है ‘मूल तत्व’ अथवा ‘निचोड़’। किसी अनुच्छेद का सार दो वाक्यों में भी दिया जा सकता है कितु सार-लेखन का एक अन्य प्रकार है – संक्षेपण। संक्षेपण में दिए गए ग्यांश को उसके मूल तत्वों को सुरक्षित रखते हुए एक-तिहाई शब्दों तक संक्षिप्त करना होता है। सार-लेखन के दो प्रमुख सोपान हैं –

(अ) सभी मूल विचारों को सीमित रखना।
(ब) एक-तिहाई शब्दों में सीमित रखना।

किसी भी लम्बी-चौड़ी बात को संक्षेप में प्रस्तुत करना एक कला है परन्तु किसी गद्य-पद्य रचना को काट-छाँटकर एक निश्चित परिमाण में प्रस्तुत करना एक कठिन और अभ्यास-जन्य कौशल है। लगातार अभ्यास से संक्षेपीकरण अथवा सार-लेखन की कुशलता विकसित होती है। इससे लेखन में गठन, गुंफन और सामासिकता आती है। सार अथवा सारांश-लेखन पद्यान्मक और गद्यात्मक दोनों ही प्रकार की रचनाओं का संभव है।

सार-लेखन का महत्व : जीवन में कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक बात कहने का महत्त्व सबसे अधिक है। प्रार्थना-पत्र में, आवेदन-पत्र में, विवरण में, अभिव्यक्ति में, अपनी बात समझने में, साक्षात्कार में, लेखन में, समाचार-पत्रों में, दूरदर्शन अथवा रेडियो में सभी क्षेत्रों में यह आवश्यकता होती है जिससे कम से कम समय खर्च करके अधिक से अधिक समय तक बात की जा सके। इसके लिए छात्रों को भाषा की समाहार-शक्ति, विचारों को सघन बनाने के कला, व्यर्थ तथा अव्यर्थ (सार) को समझने की क्षमता का विकास करना चाहिए। दूसरे की बात को अपने शब्दों में प्रवाहपूर्ण ढंग से रखने की कला भी सार-लेखन के लिए आवश्यक है।

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सार-लेखन की प्रक्रिया अथवा विधि :

जिस गद्यांश/निबंध का सार लिखना हो उसे ध्यानपूर्वक एक से अधिकार बार पढ़ना चाहिए। उसे तब तक पढ़ना चाहिए जब तक उसका अर्थ स्पष्ट न हो। कुछ ही देर में केन्द्रीय भाव समझ में आ जाएगा।
विषय के केंद्रीय भाव को रेखांकित कीजिए। इसी में अनुच्छेद का शीर्षक छिपा होता है।
सार-लेखन में ‘उपयुक्त शीर्षक’ का महत्वपूर्ण स्थान है, इसलिए पाठक को अपने मन में दा-तीन शीर्षकों पर विचार करके अंतिम शीर्षक का चुनाव कर लेना चाहिए।
सार-लेखन दिए गए गद्यांश का लगभग एक-तिहाई होता है।
सार-लेखन में वाक्य संक्षिप्त, सरल और स्पष्ट होने चाहिए। उनमें गागर में सागर भरने की शक्ति होनी चाहिए।
मूल अनुच्छेद के शब्द, वाक्य, मुहावरे तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सार-लेखन में नहीं करना चाहिए। अलंकारों, उदाहरणों तथा उद्धरणों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
अंत में सार-लेखन को पुन: पढ़ना चाहिए और देखना चाहिए कि मूल अनुच्छेद की कोई बात छूटी न हो तथा किसी बात की पुनरावृत्ति न हो गई हो, यदि ऐसा हो तो जो भी भूल हो गई हो उसे तुरंत सुधार लेना चाहिए।
यदि शब्द तिहाई से अधिक हों शब्द-संकोचन कला का प्रयोग करना चाहिए। इसमें अनेक शब्दों के लिए एक शब्द का प्रयोग किया जाता है जैसे –
धर्म का उपदेश देना वाला – धर्मोपदेशक।

यदि वाक्य अधिक हों तो दो-तीन सरल वाक्यों को मिलाकर संयुक्त अथवा मिश्र वाक्य में बदल लेना चाहिए।
दिवअर्थक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा विरामदि चिह्नों का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
शीर्षक-सार लिखन के बाद उस कोई शीर्षक भी देना चाहिए। मूल पाठ को पढ़ने से शीर्षक समझ में आ जाता है। मूल की अवधारणा का समझ लन क बाद उसे निकटतम शीर्षक दे देना चाहिए। शीर्षक से विषय का बोध होना चाहिए। उससं वर्ण्य-विषय की झलक मिलनी चाहिए। शीर्षक अनेक बार मूल के प्रारम्भ अथवा अन्त में स्वतः ही होता है। उसं चुन लनना चाहिए अन्यथा संपूर्णता को ध्यान में रखकर अपनी ओर से शीर्षक बनाना चाहिए। शीर्षक संक्षिप्त होना चाहिए।

शीर्षक का चयन : सार-लेखन में शीर्षक का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अच्छे शीर्षक में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

1. अनुच्छेट का कंद्रीय भाव्र या मूल विचार ही शीर्षक में व्यक्त होना चाहिए।
2. शीर्षक अनुच्छेद के कंद्रीय भाव का सही-सही प्रतिनिधि होना चाहिए। अर्थात् उसमें केन्द्रीय भाव से हटकर कोई अर्थ ध्वनित नहीं हांना चानिए और न उसमें केन्द्रीय भाव के किसी अंश की कमी होनी चाहिए।
3. शीर्षक सक्षप्त, स्पष, आकष्षक, अर्थपूर्ण, स्वयं बोलता हुआ-सा होना चाहिए। उसका आकार एक शब्द से एक पदबंध तक हो सकता है कभी-कभी संक्षिप्त सूक्ति भी शीर्षक का स्थान ले सकती है। अच्छा शीर्षक वही है जो पदबंध तक सौमित हों जस -.

अनुशासन/अनुशासन का गित्ज, परिश्रम का महत्त्व, साहस ही जिंदगी, हिम्मत और जिंदगी, श्रद्धा और भक्ति, श्रद्धा और ज्ञानोपल्धि, श्रद्धा से ज्ञान मिलता है आदि।

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उदाहरण 1.
मेरा यह मान्लब्र कदापि नहीं कि विदेशी भाषाएँ सीखनी ही नहीं चाहिए। आवश्यकता, अनुकूलता, अवसर और अवकाश हान पर प्ं त्क नही अनेक भाषाएँ सीखकर ज्ञानार्जन करना चाहिए। द्वेष किसी भाषा से नहीं करना चाहिए। ज्ञान कही भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु अपनी भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देनी चाहिए। क्यांक अपना, अपने टश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नात सं हो सकता है। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और राजनीति की भाषा सदैव लोकभाषा हो होनी चाहिए। अतएव अपनी भाषा के साहित्य की संवा और आभवृद्धि करना, सभी दृष्टियों से हमारा परम धर्म है। (लगभग 110 शब्द)

सार-लेखन-प्रक्रिया : इस अनुच्करंद के महत्त्वपूर्ण विचार-बिंदु निम्नलिखित हैं –

  • ज्ञानार्जन के लिए विदेशी भाषः सीखने में कोई हानि नहीं।
  • किसी भाषा से द्वेष करनन पर उसमें चर्चित ज्ञान से वंचित रह जायेंगे।
  • अपनी भाषा और उसंक साहित्य की उपेक्षा नहीं करती चाहिए।
  • किसी जाति का कल्याण अपनी भाषा से ही होता है।
  • ज्ञान-विज्ञान का वर्णन अपनी भाषा में ही करना चाहिए।
  • अपने साहित्य की सेवा हमारा कर्त्तव्य है।

यं विचार-बिंदु इस प्रकार की अव्यर्वस्थित भाषा में लिखने आवश्यक नहीं, इनका संग्रह-मात्र पर्याप्त है।
शीर्षक-अपनी भाषा का महत्त्व :

सार : लेखक विदेशी भाषा का विरोधी नहीं। उसके अनुसार सभी भाषाओं से ज्ञान-संग्रह उपयोगी है। परंतु किसी राष्ट्र का कल्याण उसकी अपनो भाषा से ही संभव है, अतः अपनी भाषा में साहित्य और ज्ञान की समृद्धि का यत्न करते गहना चाहिए। (लगभग 40 शब्द)

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उदाहरण 2.
लेखक का काम बहुत अंशों में मधु-मक्खियों के काम से मिलता-जुलता है। मधु-मक्खियाँ मकरंद संग्रह करने के लिए कोसों के चक्कर लगाती हैं और अच्छे-अच्छे फूलों पर बैठकर उनका रस लेती हैं। तभी तो उनके मधु में संसार की सर्वश्रेष्ठ मुधरता रहती है। यदि आप अच्छे लेखक बनना चाहते हैं तो आपको भी यह वृत्ति-ग्रहण करनी चाहिए। अच्छे-अच्छे ग्रंथों का खूब अध्ययन कीजिए और उनकी बातों का मनन कीजिए, फिर आपकी रचनाओं में मधु का-सा माधुर्य आने लगेगा। कोई अच्छी उक्ति, कोई अच्छा विचार भले ही दूसरों से ग्रहण किया गया हो, पर यथेष्ट मनन करके आप उसे अपनी रचना में स्थान देंगे तो वह आपका ही हो जाएगा। मनपूर्वक लिखी हुई चीज के संबंध में जल्दी या किसी को यह कहने का साहस ही न होगा कि अमुक स्थान से ली गई है या उच्छिष्ट है। जो बात आप अच्छी तरह आत्मसात् कर लेंगे, तब वह आपकी ही हो जाएगी।

(लगभग 180 शब्द)

मुख्य विचार-बिंदु :

  • लेखक अ, -ग भिम्रियाँ समान होते हैं।
  • अच्छा लेखक ने के लिए मधुमक्खी-वृत्ति अपनानी आवश्यक है।
  • अच्छे ग्रंथ पढ़क नके विचारों का संग्रह कीजिए तथा उनका मनन और चिंतन कीजिए।
  • भली प्रकार चिं न के बाद उन्हें अपनी रचनाओं में प्रयुक्त कीजिए।
  • आत्मसात् कर लेने से वह आपकी बात हो जाएगी।

शीर्षक : अच्छा लेखक कैसे ?

सारांश : अच्छे लेखक मधुमक्खियों की तरह संग्राहक होते हैं। तभी तो उनके ग्रंथों में संसार के श्रेष्ठ ग्रंथों का विचार-मधु मिलता है। अच्छा लेखक बनने के लिए श्रेष्ठ ग्रंथों का अध्ययन कर उत्तम विचारों का संग्रह कीजिए। फिर भली प्रकार उन्हें अपने लेखन में अपना लीजिए। ऐसा करने से वे दूसरों के न रहकर आपके ही प्रतीत होंगे। (लगभग 60 शब्द)

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उदाहरण 3. आधुनिक युग में समाज और राष्ट्र के जीवन में समाचार-पत्रों का बहुत ही विशिष्ट और ऊँचा स्थान है। समाचार-पत्र मानो अपने देश की सभ्यता, संस्कृति और शक्ति के मानदंड बन गए हैं। जिस देश में जितने अच्छे और जितने अधिक समाचार-पत्र होते हैं, वह देश उतना ही उम्नत और प्रभावशाली समझा जाता है। बहुत से क्षेत्रों में जो काम समाचार-पत्र कर जाते हैं, वे बड़ी-बड़ी सेनाएँ और बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ भी नहीं कर पाते। समाचार-पत्र एक ओर तो जनता का मत सरकार और संसद पर प्रकट करते हैं दूसरी ओर देश में सुदृढ़ और संपुष्ट लोकमत तैयार करते हैं। देश को सब प्रकार से जागृत और सजीव रखने में जितनी अधिक सहायता समाचार-पत्रों में मिलती है, उतनी शायद किसी और चीज़ से नहीं। इसलिए आजकल समाचार-पत्र का बहुत महत्त्व है। (लगभग 130 शब्द)

शीर्षक : समाचार पत्रों का महत्त्व।

सारांश : समाचार-पत्र राष्ट्र की संस्कृति एवं शक्ति के परिचायक होते हैं। कई क्षेत्रों में वे बड़ी-बड़ी सेनाओं एवं राजनीतिजों को भी मात कर देते हैं। इनकी श्रेष्ठता तथा संख्या से देश की उन्नति का पता चलता है। जनता का अभिमत सरकार तक पहुँचाने, दृढ़ लोकमत तैयार करने और देश को जागृत करने में उनका पूर्ण योगदान है। (लगभग50 शब्द)

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उदाहरण 4. परिश्रम और निरंतर अभ्यास से कठिन समझे जाने वाले कार्य भी सुगम हो जाया करते हैं। ज्ञान, भाव और कर्म से संबंधित सभी क्षेत्रों में इसका चमत्कार देखा जा सकता है। नियमित अभ्यास वज्र से वज्र मूर्ख को भी चतुर बना देता है। प्यार की अधिकता और नि:स्वार्थता भयंकर से भयंकर और दुष्ट और दुष्ट व्यक्ति को भी अपना बना लेती है। पापी से पापी भी ईश्वर की कृपा का भागीदार बन जाता है। बट्टे की रगड़ से पत्थर की सिल भी चिकनी हो जाती है। (84 शब्द)

शीर्षक : सफलता का राज : निरंतर अभ्यास।

सार : निरतंतर परिश्रिम से कठिनतम कार्य सुगम हो सकते हैं। कठोर साधना से मूर्ख ‘चतुर’, भयंकर दुष्ट ‘आत्मीय’, पापी ‘ईश्वर-अनुग्रही’ तथा पत्थर ‘चिकने’ बन जाते हैं।

उदाहरण 5.
सफल और असफल मनुष्यों में क्या अंतर है ? यह कि एक ने कम काम किया और दूसरे ने अधिक। क्या यही दोनों के परिश्रम के विभिन्न परिणामों का कारण है ? नहीं, बात कुछ और ही है। सफल व्यक्ति ने काम बुद्धिमत्ता से किया, एकाग्रता से किया, उसने अपना दिमाग लगाया। असफल व्यक्ति ने बोझ ढोया। ऐसे लोग काम तो बहुत करते हैं, लेकिन वे अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करते, उनके श्रम और फल को देखकर दया आती है। वे परिस्थितियों को पकड़े रहते हैं। वे यह नहीं जानते कि अवसर से किस प्रकार लाभ उठाना चाहिए। उनमें वह योग्यता नहीं होती, जिससे वे असफलता को सफलता में बदल लें।

शीर्षक : सफलता का रहस्य।

सार : जो लोग अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करते और लगन से काम नहीं करते वे असफल हो जाते हैं ; उनका श्रम बेकार जाता है। ऐसे लोग मात्र परिस्थितियों के दास होते हैं। वे अवसर से लाभ उठाना नहीं जानते।

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उदाहरण 6.
कहा जाता है कि मन बड़ा चंचल होता है। इस पर नियंत्रण दुष्कर है। व्यक्ति कभी-कभी जिस पर से मन को हटाना चाहता है, मन बार-बार उसी की ओर अभिमुख होता है। दूसरी ओर मन की अपार शक्ति का भी बड़ा विशद् वर्णन किया गया है। कहा है ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ यदि मन में दृढ़ संकल्प हो तो असाध्य भी साध्य हो सकता है। योगियों और सिद्धोंने मन पर नियंत्रण कर सर्व-शक्तिमान ईश्वर को पा लिया है। गीता में कहा गया है कि दृढ़तापूर्वक एवं बलपूर्वक ही मन पर नियंत्रण संभव है। इसीलिए दृढ़ निश्चय एवं दृढ़-संकल्प का सर्वोपरि महत्त्व है।

शीर्षक : ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’

सार : अत्यधिक चंचल मन पर नियंत्रण पाना कठिन है। अपार शक्तिशाली मन पर दृढ़ संकल्प तथा दृढ़ निश्चय द्वारा नियंत्रण पाकर ही असाध्य भी साध्य हो जाता है तथा ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण 7.
निंदा का उद्ग्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निंदा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को मिटकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्मक्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

शीर्षक – निंदा की जननी : हीनता।

सार : निंदा अपनी हीनता से जन्मती है। परनिन्दक दूसरों को नीचा तथा स्वयं को ऊँचा समझाकर अहंतुष्टि करते हैं। कर्महीनता तथा पर-निंदा वृत्ति साथ-साथ बढ़ती है।

उदाहरण 8.
माता का स्थान संसार के सारे संबंधों में सर्वोपरि है। शिशु की शरीर-रचना माँ की रक्त-मज्जा से ही होती है। गर्भावस्था में शिशु की रक्षा माता ही करती है। प्रसव-पीड़ा को संसार की सबसे बड़ी पीड़ा माना गया है तथा शिशु को जन्म देने के बाद माता के दुग्ध-पान और अत्यंत सतर्क-सजग अहर्निश देख-भाल से ही संतान के जीवन का विकास होता है। केवल दुग्ध-पान देकर गाय भी गो-माता कहलाती है तथा हम उसकी पूजा करते हैं। धरती हमें अन्र और आश्रय देती है। इसीलिए उसे हम धरती-माता कहते हैं। माँ की महिमा अपार है। इसीलिए कहा गया है, ‘जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’

शीर्षक : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

सार : माता का स्थान संसार के सभी संबंधों में सर्वोपरि है। गर्भावस्था में शिशु की रक्षा करके, उमे जन्म देकर माँ ही उसका लालन-पालन करती है। धरती तथा गौ को भी माता कहा गया है। जननी तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है।

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उदाहरण 9.
सच्चा मित्र एक शिक्षक की भाँति होता है। जिस प्रकार शिक्षक अपने छात्र कों सन्मार्ग की ओर ही अग्रसर करता है, उसी प्रकार एक सच्चा मित्र अपने मित्र को पाप के गर्त में गिरने से बचाता है। मानव-जीवन अधिक रहस्यपूर्ण है। कभी-कभी जीवन में ऐसे अवसर उर्पस्थित हो जाते हैं जब मनुष्य की धर्मबबद्ध न न हो जाती है और उसका मन द्रुतगति से पाप की ओर दौड़ता है। ऐसे समय में मित्र का ही उपदेश अधिक कल्याणकारी सिद्ध होंता है। मित्र के उपदेश का जितना प्रभाव हृदय पर पड़ता है, उतना और किसी का नहीं पड़ता है।

शीर्षक : सच्चा मित्र।

सार : सच्चा मित्र अपने मित्र को पाप के गर्त से बचाकर सन्मार्ग की ओर अग्रसर करता है। धर्मबुद्धि के नष्ट होने पर पाप की ओर दौड़ते मन पर मित्र के उपदेश का ही अधिक प्रभाव होता है।

उदाहरण 10.
हमें सदैव परोपकार करते रहना चाहिए। यदि हम यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना सौभाग्य की बात है, तो परोपकार करने की इच्छा हमारी सर्वोत्कृष्ट प्रेरणा होगी। ऊँचे आयन पर खड़े होका और अपने हाथ में दो पैसे लेकर यह न कहो – “ऐ भिखारी, ले यह मैं तुझे देता हूँ।” वास्तव में तुम्हे इस बात के लिए कृतज्ञ होना चाहिए कि तुम्हें वह निर्धन व्यक्ति मिला, जिसे दान देकर तुमने स्वयं अपना उपकार किया। धन्य पाने वाला नहीं होता, देने वाला होता है। यह कम महत्त्व की बात नहीं है कि इस संसार में तुम्हें अपनी दयालुता प्रकट करने और इस प्रकार पवित्र एवं पूर्ण होने का अवसर प्राप्त हुआ।

शीर्षक – परोपकार की उचित विधि।

सार : परोपकार करते समय हमें मन में यह विचार लाना चाहिए कि निर्धनों की सहायता करना हमाँे सौभाग्य की बात है। हमें गर्व से नहीं, नम्रता से दूसरों की सहायता करनी चाहिए।

उदाहरण 11.
आज अंग्रेजी का अधकचरा ज्ञान रखने वाले शिक्षार्थियों ने ऐसी दूषित प्रवृत्ति का प्रचार किया है कि जिसे देखो वह अपने अंग्रेजी ज्ञान का प्रमाण दो-चार टूटे-फूटे वाक्य बोलकर देना चाहता है। विदेशों में इस प्रवृत्ति के कारण हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो क्षति समय-समय पर पहुँचती रहती है, उससे सभी परिचित हैं अंग्रेजी के इस प्रयोग से विदेशियों को लगता है कि भारत स्वतंत्र तो हुआ, किंतु मानसिक दृष्टि से अभी वह गुलाम है :

शीर्षक : अंग्रेजी का मोह।

सार : अंग्रेजी के अधकचरे ज्ञान को दिखाने की दुष्पवृत्ति के कारण राष्ट्रॉय-गौरव को क्षात पहुँचतो है। इस दुष्मवृत्ति के परिणामस्वरूप विदेशियों को लगता है, भारत अब भी मानसिक दृष्टि से गुलाम है।

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उदाहरण 12.
हम एक ओर तो प्रकृति के उपकरणों की बंदी बना रहे हैं और दूसरी और स्वयं उनके दास बनते जा रहे हैं। अत: इनसे बचने के लिए प्राकृतिक और मानव-निर्मित वातावरण में एक ऐसा तालमंल पैदा होना चाहिए जो प्रकृति के सुंदर स्वरूप को भी खंडित न करे और मानव-विकास की गुंजाइश भी बनी रें। मशीन हमारी स्वामिनी न बनकर सेविका का ही काम करे।हमें वन, पर्वत और नदियों का भरपूर लाभ मिलता रहे, वे मनोरम और उपयोगी रहें। शहरों में आवश्यकता से अधिक जमघट होने का अर्थ होगा ग्रामीण का विनाश, अत: उसे रोकना होगा।

शीर्षक : मानव और प्रकृति।

सार : प्रकृति और मानव-निर्मित वातावरण में सामंजस्य अत्यंत आवश्यक है जिससे प्रकृति की सुंदरता बनी रहे तथा भौतिक उन्नति के लिए वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग भी किया जा सके। मशीनें सेविका के रूप में रहं तथा शहरों में होने वाला जमघट रुके।

उदाहरण 13.
वर्तमान काल विज्ञापन का युग माना जाता है। समाचार-पत्रों के अतिरिक्त रेडियो तथा टेलीविजन भी विज्ञापन के सफल साधन हैं। विज्ञापन का मूल उद्देश्य उत्पादक तथा उपभोक्ता में सीधा संपर्क स्थापित करना होता है। जितना अधिक विज्ञापन किसी पदार्थ का होगा उतनी ही अधिक लोकप्रियता बढ़ेगी। इन विज्ञापनों पर धन तो अधिक व्यय होता है, पर इससे बिक्री बढ़ जाती है। ग्राहक जब इन आकर्षक विज्ञापनों को देखता है तो वह उस वस्तु-विशेष के प्रति आकृष्ट होकर उसे खरीदने के लिए बाध्य हो जाता है।

शीर्षक : विज्ञापन का युग।

सार : समाचार-पत्रों, रेडियो तथा टेलीविजन द्वारा उत्पादक और उपभोक्ता से संपर्क स्थापित होता है। विज्ञापन से वस्तु विशेष की लोकप्रियता, बिक्री बढ़ती है और ग्राहक का वस्तु के प्रति आकर्षण भी बढ़ता है।

उदाहरण : मनुष्य स्वयं भाग्य का निर्माता है। पर कायर मनुष्य नहीं, सबल ही भाग्य निर्माण की सामर्थ्य रखता है। कायर तो दैव ही दैव पुकारता है। साहसी व्यक्ति को अपने मानसिक बल पर अभिमान होता है, उसकी भुजाओं में कार्य करने की शक्ति होती है, वह नियति के हाथ का क्रीड़ा कंदुक बनकर नहीं रहता, कठपुतली की तरह किसी की अँगुलियों पर नहीं नाचता। सिंह नदी को अपने वक्ष के बल पर चीर कर उस पार पहुँचता है, तो साहसी भाग्य को झूठा प्रमाणित कर उसे स्वयं निर्मित करता है। मनुष्य संसार के जितने भी कार्य करता है, उसकी सफलता-असफलता मन पर आधारित है, उसे भाग्य के माथे मढ़ देना मूखों का काम है।

शीर्षक : भाग्य तथा पुरुषार्थ।

सार : साहसी मनुष्य भाग्य के हाथ कठपुतली नहीं बनता अपितु स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करता है क्योंकि उसे अपनी शक्ति पर विश्वास होता है। मानव के समस्त कार्यों की सफलता-असफलता भाग्य पर नहीं, उसके मन पर आधारित है।

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उदाहरण 15.
लोकतांत्रिक अवस्था केवल केंद्र तथा राज्य स्तर पर क्रमशः लोकसभा तथा विधानसभाओं के निर्माण का नाम नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप है – एक विशिष्ट जीवन-पद्धति। जब सामान्य जन को प्रशासन के निम्नतर स्तर पर यह अनुभव होता है कि शासन तंत्र उसके हित एवं कल्याण के लिए सक्रिय है तथा न्याय-व्यवस्था निष्पक्ष और स्वतंत्र है, तभी लोकतन्त्र में उसकी आस्था में निरंतर अभिवृद्धि होती है। ग्राम पंचायतों का विकास भारतीय जनता में इन मूल्यों का विकास-विस्तार नहीं कर पाया, क्योंकि राज्य सरकारों ने इनकी व्यवस्था और आयोजन को अधिकारियों के संरक्षण में रखा जो अपने को जनता के प्रति उत्तरदायी न मानकर सरकार के मुखापेक्षी बने रहने में अपना कल्याण समझते हैं। व्यवस्था के इस दोष को दूर करके ही लोकतंत्र को सफल बनाया जा सकता है।

शीर्षक : लोकतंत्र की सफलता।

सार : लोकतांत्रिक व्यवस्था, केन्द्र तथा राज्य-स्तर पर लोकसभा तथा विधानसभाओं के निर्माण तक सीमित न होकर एक विशिष्ट जीवन-पद्धति है। निम्नतम स्तर पर कल्याणकारी कार्य तथा स्वतंत्र-निष्पक्ष न्याय व्यवस्था से लोकतंत्र की आस्था में वृद्धि होती है। पंचायत व्यवस्था के दोषों को दूर करके हमें लोकतंत्र को सफल बनाना चाहिए।

उदाहरण 16.
किसी भी देश और जाति की सांस्कृतिक चेतना का स्पष्ट चित्र उसकी अपनी भाषा के साहित्य में दिखलाई पड़ता है, क्योंकि समाज और साहित्य एक-दूसरे से अभिन्न है। एक के बिना दूसरे की कल्पना भी संभव नहीं है। रामायण, महाभारत, रामचरितमानस, साकेत, कामायनी और गोदान आदि इसके ज्वलंत प्रमाण हैं। साहित्यकार अपने युग का चितेरा होता है। उसके साहित्य में अपने समाज का जीवन-स्पंदन विद्यमान रहता है। इसी अर्थ में वह उसका दर्पण होता है।

शीर्षक : साहित्य समाज का दर्पण है।

सार : किसी भी देश और जाति की सांस्कृतिक चेतना उसकी भाषा के साहित्य से प्रकट होती है। इस प्रकार समाज और साहित्य परस्पर पूरक हैं। इसीलिए साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है।

उदाहरण 17.
ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ पर्यटन द्वारा हमें सरस और रुचिपूर्ण मनोरंजन भी प्राप्त होता है। विभिन्न स्थानों, वनों, नदी-तालाबों और सागर की उत्ताल तरंगों का अवलोकन कर मन झूम उठता है। पर्यटन हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हितकर है। जलवायु-परिवर्तन से चित्त में सरसता और उत्साह का संचार होता है, जिससे हम प्रसन्न मन:स्थिति में रहते हैं, जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य की अनिवाय शर्त है। देशाटन के दौरान हमें अनेक सुविधाओं और कष्टों का भी सामना करना पड़ता है। इन्हें सहन करके तथा इनका समाधान ढूँढ़ लेने पर हमें अद्भुत खुशी का अनुभव होता है।

शीर्षक : देशाटन।

सार : देशाटन से ज्ञानवर्धन और स्वास्थ्य लाभ होता है। जलवायु-परिवर्तन से मन प्रसन्न रहता है। प्राकृतिक दृश्यों को देखने से मनोरंजन होता है, मन खुशी से नाच उठता है। मन की खुशी ही स्वास्थ्य लाभ की कुंजी है।

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उदाहरण 18.
किसी से कुछ पाने की इच्छा रखना ही मनुष्य के दुख का कारण है। जब तक पाने की इच्छा मनुष्य में विद्यमान है तब तक उसे सच्चे सुख की प्राप्ति होना असंभव है। वस्तुत: सच्चा सुख किसी से कुछ पाने में नहीं वरन् देने में है। जिस प्रकार अंगूर की सार्थकता अपने तमाम रस को निचोड़कर दूसरों के लिए देने में है, उसी प्रकार मनुष्य जीवन की सार्थकता अपनी संपूर्ण क्षमताओं और समृद्धि को दूसरों के लिए अर्पित कर देने में है।

शीर्षक : सच्चा सुख अथवा वास्तविक सुख।

सार : सच्चा सुख परोपकार की भावना में है। किसी से कुछ पाने की इच्छा ही दुख का मूल कारण है। मनुष्य जीवन की सार्थकता अपनी योग्यता, शक्ति और समृद्धि को दूसरों को अर्पित कर देने में है।

उदाहरण 19.
नारी नर की शक्ति है। वह माता, बहन, पत्नी और पुत्री आदि रूपों में पुरुष में कर्तव्य की भावना जगाती है। वह ममतामयी है अत: पुष्प के समान कोमल है, किन्तु चोट खाकर वह अत्याचार के विरुद्ध सन्नद्ध होती है, तो वज्र से भी कठोर हो जाती है। तब वह न माता रहती है, न प्रिया ; उसका एक ही रूप होता है और वह है दुर्गा का। वास्तव में नारी सृष्टि का ही रूप है, जिसमें सभी शक्तियाँ समाहित हैं।

शीर्षक : नारी एक : रूप अनेक/नारी के विभिन्न रूप।

सार : नारी पुरुष की शक्ति है जिसके अनेक रूप हैं। नारी कोमल, कठोर तथा ममतामयी – तीनों रूप धारण करती है। वह सृष्टि का रूप है, जिसमें सभी शक्तियों का समावेश है।

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उदाहरण 20.
धर्म को लोगों ने धोखे की दुकान बना रखा है। वे उसकी आड़ में स्वार्थसिद्धि करते हैं। बात यह है कि लोग धर्म को छोड़कर संप्रदाय के जाल में फँस जाते हैं। संप्रदाय वाक्य कृत्यों पर जोर देते हैं। वे चिह्नों को अपनाकर धर्म के सारतत्व को मसल देते हैं। धर्म मनुष्य की अंतर्मुखी बनाता है, उसके हृद्य के किवाड़ों को खोलता है। उसकी आत्मा को विशाल, मन को उदार तथा चरित्र को उन्नत बनाता है। संमताय संकीर्णता सिखाते हैं। ज्ञात-पाँत, रूप-रंग तथा ऊँच-नीच के भेद-भावों से ऊपर नहीं उठने देते।

शीर्षक : धर्म और संप्रदाय।

सार : धर्म मनुष्य की आत्मा को विशाल, मन को उदार, चरित्र को उन्नत बनाकर उसे अंतर्मुखी बनाता है। संप्रदाय, जात-पाँत, ऊँच-नीच की संकीर्णता सिखाते हैं। अत: मनुष्यों को संप्रदाय के जाल से बचना चाहिए।

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Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना कहानी-लेखन to reinforce their learning.

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हमें जीवन में नित्य ही नयी घटनाओं एवं अनुभूतियों से रू-ब-रू होना पड़ता है। इन्हीं घटनाओं और अनुभवों का लिखित रूप ‘कहानी’ कहलाती है और इस विधा को कहानी-लेखन कहते हैं। कुछ कहानियों के लिखने का आधार बचपन में दादी-नानी द्वारा सुनायी गयी कहानियाँ भी होती हैं। अत: हमारे अन्दर की संवेदनाओं की आकर्षक प्रस्तुति ही कहानी-लेखन है।
कहानियाँ मुख्यतः कल्पना, सच्ची घटना, चित्र या शब्द-संकेतों के आधार पर लिखी जाती हैं।
कहानी-लेखन के लिए आवश्यक निर्देश –

  1. सर्वप्रथम कहानी का प्रारूप मन में बना लें।
  2. फिर शब्दों से भरकर साकार रूप दें।
  3. कहानी का उचित एवं आकर्षक शीर्षक दें।
  4. कहानी लिखने में अपने विचारों को न थोपें।
  5. स्पष्ट, सहज एवं शुद्ध भाषा का प्रयोग करें।
  6. कहानी के अन्त में नैतिक या वैज्ञानिक सीख अवश्य दें।

यहाँ शब्द-संकेतों के आधार पर कहानी-लेखन के कुछ उदाहरण दिये जा रहे है –
संकेत (1) : एक नदी – साधु का स्नान – पानी में बिच्छू – साधु द्वारा बचाने का प्रयास – बिच्छू द्वारा डंक मारना – साधु द्वारा फिर उठाना – बिन्छू द्वारा फिर से डंक मारना – साधु का उसे पानो से निकालना – बिच्छू को जान बचना।
कहानी :

प्राणी का स्वभाव

एक दिन एक साधु नदी में स्नान कर रहे थे। अचानक उन्हें पानी में एक बिच्छू दिखायी पड़ा जो अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था। साधु दयालु थे। उन्होंने उसे अपने हाथ में उठा लिया। पर, दुप्प बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। साधु का हाथ हिल जाने से वह फिर से पानी में गिर गया। साधु ने फिर से उसे उठाया, परन्तु उसने फिर उनके हाथ पर डक मार दिया। ऐसा कई बार हुआ। अंतत: साधु ने बिच्छू को नदी के बाहर लाकर जमीन पर छोड़ दिया जिससे वह मरने से बच गया।
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक प्राणी अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करता है और उसी में उसे आनंद का अनुभव होता है।

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संकेत (2) : एक बाह्मण – एक बूढ़ा बाघ-उसके हाथ में सोने का कंगन – वाघ द्वारा बाह्मण को लालन देना लालच में आकर ब्राह्मण का कीचड़ में फँस जाना – बाघ द्वारा उसे खा जाना।
कहानी :

लालच का फल

एक बाह्हण ने एक बूढ़े बाघ के हाथ में सोने का कंगन देखा। बाघ ने उसे पुकारा तो वह उसके नजदीक डरते हुए पहुँचा। बाघ ने कहा कि वह जवानी में किये गये पापों का प्रायश्चित करने के लिए यह सोने का कगन दान करनेवाला है। यह सुनकर बाहाण के मन में लालच आ गया और उसने उस कंगन को प्राप्त करना चाहा। बाय ने कहा कि उसे सामने के पोखरे से स्नान करके आना होगा, तभी उसे वह कंगन मिलेगा। ब्राह्माण जैसे ही पोखरे के नजदीक गया, वह दलदल में फंस गया और मदद के लिए चिल्लाने लगा। बाघ धीरे – धीरे उसके नजदीक पहुँचा और उसे मारकर खा गया।

यह कहानी हमें बताती है कि लालच का फल सदा ही हानिकारक और अनिप्टकारी होता है।

संकेत (3) : सर्दी की रात – भूखा, काँपता पथिक – पेड़ का सोचना – रूखी-सूखी टहनियाँ, पथिक की मीठी नींद।
कहानी :

परोपकारी पेड़

एक रात की बात है, सर्दियों की बरफानी हवा चल रही थी और सर्दी इतनी अधिक थी कि शरीर सुन्र होता जाता था। ऐसे समय में एक थका-माँदा, काँपता-ठिठुरता, भूखा-प्यासा पथिक एक पेड़ के नीचे आया और आराम करने की कोई जगह देखने लगा। पेड़ समझ गया कि यह सर्दी का सताया हुआ है। यदि इसे तापने को जाग न मिली तो यह सर्दी से अकड़कर मर जाएगा। मेरा यह कर्तव्य बनता है कि मुझसे इस मुसाफिर के लिए जो भी बन पड़े मै करूँ।

उस बूढ़े पेड़ के पास अब किसी को देने के लिए भला और बचा ही क्या था ? केवल कुछ रूखी -सूखी टहनियाँ ही दिखाई दे रही थीं। पेड़ ने अपनी वे सूखी टहनियाँ भी उस पथिक के लिए गिरा दी, जिन्हें जलाकर पथिक ने सारी रात आग तापी। आग की गर्मी से उसकी कँपकपी मिट गई, थकान जाती रही और वह आग के उसी ढेर के किनारे रात भर मीठी नींद सोया।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धन्य हैं वे जिनका शरीर आखिरी समय तक दूसरों के उपकार के काम आता है।

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संकेत (4) : मुन्ना – चीजें जगह पर न रखना – कलम, पेंसिल, किताब का न मिलना – पेपर खराब – माँ की सीख।
कहानी :

मुत्रा की कहानी

एक था मुन्ना। उसको शिकायत थी कि उसकी चीजें सही जगह और समय पर नहीं मिलती। एक दिन उसकी परीक्षा थी। स्कूल जाने के समय जब वह ढूंढ़ने लगा तो उसे पेंसिल, कलम, किताब कुछ भी जगह पर न मिली। इन सब चीजों को ढुंढ़ने के बाद जब वह स्कूल पहुँचा तो परीक्षा समाप्त हो चुकी थी।

दूसरे दिन भी वह इसी तरह परीक्षा में काफी देर से पहुँचा और उसकी परीक्षा खराब गई। मुत्रा अपनी इस लापरवाही से खुद भी परेशान था। घरवाले तो परेशान थे ही। तब माँ ने उसे समझाया – “‘बेटा, हर चीज को ठीक जगह पर रखा करो। कपड़े कपड़ों की अलमारी में टाँगा करो। किताबें अपने वस्ते में या अपनी मेज पर सजाकर रखा करो। जूते भी सही जगह पर उतारा करो। फिर सब चीजें सही जगह और सही समय पर मिल जाया करेंगी।

मुन्ना ने माँ की बात मानकर वैसा ही करना शुरु किया और उसकी परेशानी खत्म हो गयी। हमें भी मुन्ना की तरह हमेशा बड़ों की सीख माननी चाहिए।

संकेत (5) : एक ट्रक – सुंदर नहीं – काम सुंदर – खेतों में कूड़े डालना – फसल अच्छी होना – पुरस्कार।
कहानी :

कूड़ेवाला ट्रक

एक ट्रक था। शक्ल-सूरत में वह सुंदर नहीं था। लेकिन वह शहर को साफ-सुथरा और सुन्दर बनाने में सबसे अधिक मदद करता था। फिर भी लोग उसे देखकर नाक-भौं सिकोड़ते और उससे दूर भागते। लोगों के रुखे व्यवहार के बावजूद वह अपना कर्त्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाता था।

किसान ट्रक का कूड़ा अपने खेतों में डलवाते थे। कूड़े से खाद बना और उसका एक-एक कण सोने से भी कीमती बनकर गेहूँ, चावल और मक्का की शक्ल में प्रकट हुआ। जिसे गंदगी कहकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते थे, वही गंदगी अमृत बनकर फसल के हरे-हरे पत्तों में पहुँची। पत्तियों को गाय-भैंस ने खाया तो फिर से ज्यादा दूध देने लगों। कूड़े के खाद की ताकत से ईख की फसल भी अच्छी हुई। फिर धड़ाधड़ गुड़ भी बना, चीनी भी बनी और बच्चों के लिए मिठाइयाँ भी बनीं।

कुछ दिनों के बाद ट्रकों की एक प्रतियोगिता हुई। अनेक रंग-बिरंगे चमचमाते ट्रकों के बीच कूड़ेवाले ट्रक को पहला पुरस्कार मिला।पुरस्कार देनेवाले अधिकारी ने घोषणा की –
” जो मुसीबत में काम आता है वही सच्चा मित्र होता है। कूड़े वाला ट्रक देखने में भले ही सुंदर न हो लेकिन उसके द्वारा किए गए काम ने खेतों को उजड़ने से बचाया, इसलिए उसी की सेवा सबसे अधिक कीमती है।”
सच ही है – कोई अपने अपने सुन्दर रंग-रूप से सुन्दर नहीं होता। सुन्दर वही है जो सुन्दर काम करता है।

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संकेत (6) : राजा का शिकार पर जाना – एक साधु को देखना – मदद की इच्छा – साधु का इन्कार करना – सोने के पर्वत बनाने की बात कहना – राजा का साधु का शिष्य बनना – राजा को ज्ञान होना – सोना पाने से इन्कार करना।
कहानी :

स्वर्ण रसायन

एक बार एक राजा घोड़े पर चढ़कर शिकार को जा रहा था। जाड़े का समय था। थोड़ी-थोड़ी वर्षा भी हो रही थी। उसने देखा कि एक साधु जंगल में अकेला बैठा है। न तो उसके पास खाने का सामान है, न पहनने के लिए कोई कपड़ा है, न रहने के लिए झोपड़ी आदि ही है। राजा को उसकी दशा पर दया आई।

राजा ने साधु की सहायता करनी चाही लेकिन साधु ने कहा – हम कंगाल नहीं हैं। हम रसायन बनाना जानते हैं। यदि हम चाहें तो सोने के पर्वत बना लें। राजा ने सोचा यदि उसके पास ढ़ेर सारा सोना होता तो वह एक-दो राज्य को जीत लेता। उसने साधु से कहा, “भगवन मुझे रसायन बनाना सिखला दीजिए।”

साधु ने कहा कि सोना बनाना एक दिन में नहीं सीखा जा सकता। तुम रोज आया करों, सीख जाओगे।
राजा ने साधु के पास जाना शुरू कर दिया। साधु के उपदेश से एक वर्ष में ही राजा बड़ा ही धर्मात्मा और ज्ञानी हो गया। वह ईश्वर-प्रेम में इतना मग्न हो गया कि सारे संसार के राज्यों को ईश्वर-प्रेम के आगे तुच्छ समझने लगा। एक दिन साधु ने राजा से हँसी-हँसी में कहा कि तुम बहुत-सा ताँबा लाओ, हम सोना बना दें।

राजा ने उत्तर दिया कि महाराज, जिस ताँबे को सोना बनाने की आवश्यकता थी वह सोना बन गया, अब मुझे सांसारिक सोने की कोई आवश्यकता नही रही।
सच ही है कि जो व्यक्ति स्वयं धर्म का आचरण करते हैं वे दूसरों को भी अपने रंग में रंग लेते हैं।

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संकेत (7) : किसान का खेत को सींचना – एक व्यक्ति का जल के सोत के बारे मे पूछना – किसान द्वारा जल के विभिन्न स्रोत तथा सबका स्रोत हिमालय को बताना – ईश्वर एक है का संदेश देना।
कहानी :

ईश्वर एक है

एक किसान अपने खेत को नहर की नाली से सींच रहा था। यह देखकर एक व्यक्ति ने पूछा कि आजकल तो वर्षाऋतु नहीं है फिर यह जल कहाँ से आता है ?
किसान ने उत्तर दिया, “यह जल इस छोटे-से बम्बे में से होकर आता है।”
व्यक्ति ने फिर पूछा, ” इस बम्बे में जल कहाँ से आया ?”
किसान ने कहा, “भाई! यह जल बड़े बम्बे में से आता है।”
व्यक्ति ने फिर पूछा, “इसमें जल कहाँ से आता है ?”
किसान ने कहा, “नहर से।”

  • और नहर में जल कहाँ से आता है ?
  • गंगा नदी से।
  • गंगा में जल कहाँ से आता है ?
  • हिमालय पर्वत से।

उस व्यक्ति ने अंत में कहा, ‘”तुमने पहले ही क्यों न बता दिया कि यह जल हिमालय से आता है।
जिस प्रकार सभी नदी-नालों में हिमालय से जल जाता है और केन्द्र एक है, ठीक उसी प्रकार संसार में जितने मतमतान्तर फैले हुए हैं, सभी एक हैं और उनका निवास-स्थान वेद ही है।

इसका दूसरा भाव यह है कि व्यक्ति चाहे जिस देश, जिस धर्म का हो लेकिन जगत्-पिता एक है। इसलिए आपस में हमें भेद-भाव नहीं रखना चाहिए।

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WBBSE Class 9 Hindi रचना भावार्थ

किसी दिए गये गद्यांश अथवा पद्यांश के अवतरण को समझना तथा उसके अन्दर छिपे हुए मुख्य भाव को संक्षेप में लिखना भावार्थ-लेखन कहलाता है। इसे लिखते समय न तो हर शब्द का अर्थ लिखना पड़ता है और न ही लच्छेदार साहित्यिक भाषा की जरूरत पड़ती है।

भावार्थ-लेखन हेतु आवश्यक निर्देश –

  1. दिए गये अवतरण को ध्यान से पढ़ें और उसमें छिपे भाव को समझने की कोशिश करें।
  2. फिर उस भाव का अति संक्षिप्त रूप अपने शब्दों में लिख जाएँ।
  3. इसमें अनावश्यक शब्दों या बातों का प्रयोग न करें।
  4. इसकी भाषा अलंकारहित, स्पष्ट एवं सरल रखें।
  5. इसमें लंबी-चौड़ी भूमिका की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
  6. भावार्थ को मूल अवरतण से छोटा रखें।
  7. ध्यान रहे, इसमें मूल भाव का कोई भी अंश छूटने न पाये।

भावार्थ-लेखन के कुछ उदाहरण –

अवतरण 1.
आज की कॉन्वेन्टी शिक्षा-पद्धति में बच्चों को तीन वर्ष की उप्र से स्कूल भेजा जाता है। क्या यह कदम उचित और विकासोन्मुख है ? उन्हें सुबह-सुबह तैयार कर बड़े से थैले के साथ विद्यालय भेज दिया जाता है। जिस उग्र में उन्हें स्नेहपूर्ण व्यवहार की आशा रहती है, उसमें उन्हें कुछ निर्दय शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं से पाला पड़ जाता है। ये बच्चे पढ़ेंगे क्या, उन्हें तो ठीक से चड्डी पहनने का भी होश नहीं रहता है। तर्क यह है कि बच्चे कच्ची उप्र से ही शिक्षा का महत्व समझने लगेंगे। पर क्या, उनका मानसिक स्तर ऐसी बातों को समझने लायक होता है ?

भावार्थ :- कच्ची उम्न में बच्चों को परिवार के स्नेह की जरूरत होती है, न कि पुस्तकों से भरे थैले के साथ विद्यालय जाकर माथा-पच्ची करने की। कम उम्र में विद्यालय भेजा जाना, बच्चों की विकास प्रक्रिया में बाधक भी हो सकता है।

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अवतरण 2.
कोई प्रदेश कितना विकसित हो सकता है, इसे आँकने के लिए वहाँ की प्राकृतिक बनावट, जलवायु और पर्यावरण पर ध्यान देना होता है। विकास के लिए वहाँ के उपलब्ध कच्चे माल, श्रमशक्ति एवं शक्ति के साधनों का पूरा-पूरा उपयोग करना आवश्यक होता है। यदि निर्मित माल की खपत के लिए बाजार नजदीक हो, तो यह सोने में सुहागा वाली कहावत को चरितार्थ करता है। अच्छी सड़कें एवं समुचित यातायात-व्यवस्था भी विकास की आवश्यक शर्ते हैं।

भावार्थ :- औद्यांगिक विकास के लिए भौगोलिक परिस्थितियों के साथ कच्चे माल, शक्ति, श्रम और यातायात के साधनों का समुचित उपयोग आवश्यक है।

अवतरण 3.
एक ही समाज में रहनेवाले लोग मानसिक-स्तर पर भिन्न-भित्र होते हैं। इस स्तर का प्रत्यक्ष संबंध होता है – संगति से। व्यक्ति जिस प्रकार की संगति में जीता है, पलता है और बड़ा होता है, उसके अन्दर वैसे ही गुण पनपते हैं। साधुओं के साथ उठने-बैठनेवाला व्यक्ति सद्भाव से अवश्य ही ओत-प्रोत हो जाता है जबकि चोर-उचक्कों की संगति में रहनेवाला निश्चित तौर पर समाज के लिए कलंक ही साबित होता है।

भावार्थ :- संगति के कारण ही एक ही समाज में तरह-तरह के लोग होते हैं। साधुओं की संगति में बैठने वाला साधु प्रकृति का तथा दुष्टों की संगति मे बैठने वाला समाज के लिए कलंक होता है।

अवतरण 4.
भारतवर्ष की शस्य-श्यामला-भूमि अपनी विशेष उर्वरता के कारण कृषि-कार्य के लिए व्ररदान है। तभी तो कृषि-कार्य में यहाँ की कुल आबादी का लगभग 70% संलग्न है। कृषि को सर्वप्रमुख उद्योग का दर्जा प्राप्त होना चाहिए क्योंक यही कुल राष्ट्रीय आय की रीढ़ है। आधुनिक तकनीकी प्रयोग ने कृषि-कार्य का सम्मान और भी बढ़ा दिया है। यह राष्ट्रीय आय के साथ ही विदेशी मुद्रा के अर्जन का भी मुख्य साधन बन गया है। फिर भी सरकार इसे उस रूप में ध्यान नहीं देती जिस रूप में उसे देना चाहिए।

भावार्थ :- भारत में कृषि को सर्वपमुख उद्योग का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि यहाँ की 70 % राष्ट्रीय आय का स्रोत कृषि ही है। फिर भी सरकार कृषि तथा कृषक की ओर समुचित ध्यान नहीं देती।

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अवतरण 5.
अनुशासन मानव-जीवन के अपरिहार्य तत्व है। यह प्रगति और खुशहाली की सीढ़ी है। यह ऐसी सीढ़ी है जिस पर चढ़े बिना कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में उन्नति नहीं कर सकता। विश्व के सभी महापुरूषों में अन्य गुणों के अतिरिक्त अनुशासनरूपी गुण हमेशा पाया गया है। यहाँ तक कि प्रकृति भी अनुशासन की डोर से बंधी रहती है। अगर प्रकृति इसे छोड़ दे, तो प्रलय को कौन रोक सकता है? इसके महत्व को समझनेवाला व्यक्ति ही सफलता का स्वाद चखता है।

भावार्थ :- अनुशासन जीवन का अनिवार्य तत्व है। दुनिया के प्रत्येक महापुरूषों ने अपने जीवन में अनुशासन को महत्व दिया है। अनुशासन के महत्व को समझनेवाला ही सफलता का स्वद चखता है।

अवतरण 6.
वह तोड़ती पत्थर।
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि मैंने पत्थर तोड़ने वाली युवती को इलाहाबाद के पथ पर देखा। जिस पेड़ के नीचे बैठकर उसने पत्थर नोड़ना स्वीकार किया, वह पेड़ भी छायादार नहीं था।

अवतरण 7.
चढ़ रही धूप; गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप, उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगी छा गई
प्राय: हुई दुपहर-वह तोड़ती पत्थर।

भावार्थ :- दिन चढ़ने के साथ-साथ हर क्षण धूप तेज होती जा रही थी। गर्मी के दिन थे। दिन अपने तमतमाते रूप में था। तभी शरीर को झुलसा देनेवाला लू भी चलने लगी। सूर्य की प्रचण्ड ताप से धरती भी रूई के समान जल रही थी! चारों ओर छा गए धूल के कण भी चिनगारी के समान छा गए थे और इन्हीं के बीच वह युवती पत्थर तोड़ रही थी।

अवतरण 8.
नव गति, नव लय, ताल छन्द नव,
नवल कण्ठ, नव जल्द-मन्द्र रव;
नव नभ के नव विहग-वृन्द को;
नव पर नव स्वर दे।

भावार्थ :- हे सरस्वती, तुम मेरे जीवन में नयी, गति, नई आवाज, नए ताल छंद और नए स्वर भर दो, जो बादल के गंभीर गर्जन के समान हो। नए आकाश के नए पक्षियों को मुक्त उड़ान भरने के लिए नए पंख और नए स्वर दो।

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अवतरण 9.
मैं अकेला;
देखता हूँ, आ रही
मेरे दिवस की सांध्य बेला।
पके आधे बाल मेरे
हुए निष्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मन्द होती आ रही,
हट रहा मेला।

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि मैं अकेला पड़ गया हूँ। मैं देख रहा हूँ कि मेरे जीवन की संध्या बेला आ चुकी है। मेरे बाल आधे पक चुके हैं, गालों को लालिमा खत्म होकर झुर्रियाँ भर रही हैं, मेरे पैरों में भी पहलेवाली शक्ति नहीं रही। मेरे आसपास से अब लोगों का मेला भी हटने लगा है।

अवतरण 10.
सिंही की गोद से
छीनती रे शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण? रे अजान।
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष
दुर्बल वह –

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि सिंहनी की गोद से कोई उसका शिशु नहीं छीन सकता। और अपने प्राण रहते वह ऐसा होने भी नहीं देगी। केवल भेड़ की माता ही अपने शिशु को छीन लिए जाने पर भी केवल आँसू बहाकर रह जाती है क्योंकि वह दुर्बल है।

अवतरण 11.
भीष्म हों अथवा युधिष्ठिर या कि हों भगवान,
बुद्ध हों कि अशोक, गाँधी हों कि ईसु महान,
सिर झुका सबको, सभी को श्रेष्ठ निज से मान
मात्र वाचिक ही उन्हें देता हुआ सम्मान।

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि इस संसार में चाहे भीष्म पितामह हों, युधिष्ठिर हों, कृष्ण हों, बुद्ध हों, अशोक हों, महात्मा गाँधी हों या फिर ईसा मसीह हों सबने अपने से इन्हें श्रेष्ठ माना। लेकिन केवल मौखिक स्तर पर ही। उनके वचनों को अपने जीवन में नहीं उतारा।

अवतरण 12.
यह मनुज ज्ञानी, श्रृंगालों, कुक्करों से हीन
हो, किया करता अनेकों क्रूर कम्र मलीन।
देह ही लड़ती नहीं, है जूझते मन-प्राण,
साथ होते ध्वंस में इसके कला-विज्ञान

भावार्थ :- यह ज्ञानी मनुष्य सियारों और कुत्तों से भी गया-गुजरा और नीच बनकर बहुत से गंदे और निर्दयी काम करता है। जब वह युद्ध करता है तो केवल इसका शरीर ही युद्ध में हिस्सा नहीं लेता बल्कि इसके विनाशकारी कार्यों में इसका साथ कला और विज्ञान भी देते हैं।

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अवतरण 13.
साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे ?)
तब कैसे सीखा डंसना
विष कहाँ पाया।

भावार्थ :- कवि नगरवासियों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि साँप! तुम तो सभ्य नहीं हुए, न तो तुम्हें नगर में बसना ही आया। क्या मेरी एक बात का उत्तर दोगे ? तब तुमने डंसना कैसे सीखा। विष कहाँ से पाया?

अवतरण 14.
मनमोहिनी प्रकृति की जो गोद में बसा है।
सुख स्वर्ग सा जहाँ है, वह देश कौन-सा है।।
जिसके चरण निरन्तर रत्नेश धो रहा है।
जिसका मुकुट हिमालय, वह देश कौन-सा है।

भावार्थ :- कवि भारत के बारे में कहते हैं कि जो मन को मोहनेवाली प्रकृति की गोद में बसा है, जहाँ का सुख स्वर्ग के समान है, जिसके चरणों को सागर धोता है तथा जिसका मुकुट हिमालय है- वह देश कौन-सा है?

अवतरण 15.
“यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
सुख-दु:ख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।
पथ में रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता।
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।
चलना ही चलना है, जीवन चलता ही रहता है।
मर जाना ही रुक जाना है, नर्झर यह झरकर कहता है।”

भावार्थ :- कवि कहता है कि मानव के जीवन में झरने के जल की तरह मस्ती, उल्लास और आनन्द है। जिस तरह झरना का जल रास्ते में दोनों तटों पर कभी पत्थर से तो कभी बन से टकराता हुआ मस्ती में प्रवाहित होता है, उसी तरह मनुष्य भी अपने जीवन में सुखों-दुःखों के बीच जीवन व्यतीत करता है। मानव को झरना संदेश देता है कि जीवन में रुकना मृत्यु का सूचक है अत: जीवन में निरन्तर गतिशील बने रहो।

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अवतरण 16.
सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही।
संघर्ष से हटकर जिए, तो क्या जिए हम या कि तुम।
जो नत हुआ, वह मृत हुआ, ज्यों वृन्त से झरकर कुसुम। (मॉडल प्रश्न – 2007)

भावार्थ :- जीवन का नाम ही संघर्ष है। संघर्ष के बिना मानव-जीवन का कोई महत्त्व नहीं है। जो व्यक्ति जीवन में हार मान लिया वह झेरे हुए फूल की तरह मृतक के समान है।

अवतरण 17.
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखत न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।

भावार्थ :- उद्धृत अंश में गरीबों, सुविधाहीन वर्ग की स्थिति को रूपायित किया गया है। यह वर्ग सभी की और आशापूर्ण नेत्रों से देखता है लेकिन इन पर कोई दया दृष्टि नहीं डालता, जो लोग इन पर दया दृष्टि डालते हैं वे लोग दीनबंधु (गरीबों के मित्र या भगवान) की तरह सम्माननीय हो जाते हैं।

अवतरण 18.
जे गरीब पर हित करें, ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्णा मिताई जोग।।

भावार्थ : यहाँ मध्यकालीन भक्त रहीम दोहे के माध्यम से बताते हैं कि गरीबों पर स्नह लुटाने वाला उनसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करने वाला ही वास्तविक अर्थ में बड़ा होता है। इसी कथन को उन्होंने कृष्ण भगवान और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर दिखाया है।

अवतरण 19.
दूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।

भावार्थ :- इस दोहे में रहीम अच्छे लोगों (सज्जनों) के रूठ जाने पर भी हर प्रयत्न करके उन्हे मना लेने को कहते हैं, क्योंकि सज्जन व्यक्ति हमारे शुभेच्छु होते हैं, उनके प्रत्येक आचरण में हमारा कल्याण छिपा रहता है।

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अवतरण 20.
विद्याधन उद्यम बिना, कहो जु पावै कौन।
बिना डुलाए ना मिले, ज्यों पंखा को पौन।।

भावार्थ :- इस दोहं में श्रम की महत्ता को व्यंजित किया गया है। बिना परिश्रम के सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, अतः मनुष्य को सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम करना चाहिए। इसी भाव को ध्यान में रखकर दोहे में कहा गया है कि-विद्या तथा धन (या विद्यारूपी धन) बिना परिश्रम के काई नहीं पा सकता, जैसे पंखा को बिना हिलाए हवा नहीं मिल सकती।

अवतरण 21.
कारज धीरे होतु है, काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचो नीर।।

भावार्थ :- मनुष्य का स्वभाव अत्यन्त चंचल है, वह किसी भी कार्य का त्वरित परिणाम चाहता है, जबकि यथार्थ में ऐसा नहीं होता है। त्वरित परिणाम वाले कार्य की पूर्णता में सन्देह बना रहता है साथ ही वे हमारे लिए हानिकारक भी होते हैं। प्रस्तुत दोहे में यही भाव व्यंजित है कि-किसी कार्य में विलम्ब होने पर अधीर नहीं होना चाहिए। समय पर ही पेड़ पर फल लगेंगे चाहे हम उसे कितना ही सींचें।

अवतरण 22.
लोग यों ही झिझकते सोचते,
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।
किंतु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें,
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।।

भावार्थ :- इस संसार का नियम है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, कुछ पकड़ने के लिए कुछ छोड़ना पड़ता है। इस पाने-खोने या पकड़ने-छोड़ने की प्रतिक्रिया में ही मनुष्य की प्रगति का रहस्य छुपा हुआ है। इसी प्रसंग में उक्त अंश उद्धत है, जिसका अर्थ है-अक्सर लोग घर को छोड़ने में झझझके हैं। लेकन जिसने भी महान् लक्ष्य के लिए घर छोड़ा, वे स्वाति नक्षत्र की बूँद की तरह मोती में बदल जाते हैं।

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अवतरण 23.
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है, और मृतक समान है।

भावार्थ :- संसार के प्रत्येक देश क निवासियो में अपने देश के लिए स्वाभाविक प्रेम होता है, उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता का गर्व होता है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है। जिस मनुष्य में अपने देश या संस्कृति के प्रति सम्मान या गौरव की भावना नहीं पायी जाती, वह मनुष्य विवेकशून्य होता है। जिस व्यक्ति को अपन तथा अपने देश पर अभभमान नहीं है, वह मनुष्य नहीं, मनुष्य के रूप में पशु तथा मृतक के समान है।

अवतरण 24.
देखो कृषक शोणित सुखाकर, हल तथापि चला रहे
किस लोभ में इस आँच में वे, जिन शरीर जला रहे।

भावार्थ :- कृषक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वे समस्त देश में खाद्य उत्पादन को बनाये रखते हैं। कृषकों का स्वयं का जीवन अत्यन्त दुरूह तथा कष्टकर होता है, लेकिन फिर भी धरतीपुत्र होने के कारण, नि:स्वार्थ भाव से वे अपने कर्म में लगे रहते हैं। इस कार्य में उनके घर के अन्य प्राणी भी सहयोग करते हैं। किसान कड़ी धूप में अपना खून जलाकर भी हल चला रहे हैं। पता नहीं, इस धूपरूपी आँच में किस लोभवश वे अपना शरीर जला रहे हैं ?

अवतरण 25.
मध्याह्न है उनकी स्त्रियाँ, ले रोटियाँ पहुँची वहीं,
हैं रोटियाँ रूखी, है खबर शाक को उनकी नहीं।
संतोष से खाकर उन्हें फिर, काम में वे लग गए,
भरपेट भोजन पा गए तो, भाग्य मानो जग गए।

भावार्थ :- उद्धृत अंश में किसानों के निस्वार्थ कर्म, सरल स्वभाव तथा कठिन जीवन- परिस्थितियों की ओर संकेत किया गया है। किसान पूरे देश में खाद्यपूर्ति करते हैं, लेकिन स्वयं आधा-अधूरा भोजन भी भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करते हैं और फिर अपने कर्म में लग जाते हैं
। दोपहर में किसानों की पत्नी रूखी रोटियाँ लेकर खेत में आती हैं। रोटियाँ बिना शाक की हैं। वही रूखी रोटियाँ खाकर किसान संतोषपूर्वक अपने काम में लग जाता है। भरपेट रोटियाँ मिल जाय, यही उनका सौभाग्य है।

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अवतरण 26.
वह्लि, बाढ़, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर ?
निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भंगुर जीवित जन,
मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन।

भावार्थ :- मनुष्य को जीवन संघर्ष में बचे रहने या विजयी बनने के लिए प्रकृति के कोप (आग, बाढ़, तूफानों इत्यादि) से बचने के लिए उचित संसाधनों की खोज करनी चाहिए-अन्यथा वह इस संघर्ष में नष्ट हो जायेगा। आग, बाढ़, बिजली तथा तूफानों की विभीषिका के बीच भला कोमल मनुष्य कैसे रह सकता है ? प्रकृति निष्ठुर है और मानव क्षणभंगुर। प्रकृति के कोप से बचने के लिए उचित साधनों का होना मनुष्य के लिए आवश्यक है।

अवतरण 27.
जीवन की क्षण-धूलि रह सके, जहाँ सुरक्षित
रक्त मांस की इच्छाएँ जन को हों पूरित !
मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें – मानव ईश्वर !
और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर ?

भावार्थ :- इस संसार में सामंजस्यपूर्ण स्थिति पैदा करके इस धरती को ही स्वर्ग के रूप में बदला जा सकता है। मनुष्य स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा करता है। यदि सभी लोग एक-दूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए प्रेमपूर्ण ढंग से आपस में आचरण करें, तो इस धरती को ही स्वर्ग के रूप में बदल दिया जा सकेगा। जहाँ मानव के क्षणभंगुर जीवन की सुरक्षा हो, जहाँ उसकी इच्छाएँ पूरी हो तथा आपस में प्रेम से रह सके, तो इससे अलग कौन-सा स्वर्ग धरती पर हो सकता है ?

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अवतरण 28.
पक्षी और बादल,
ये भगवान के डाकिए हैं,
जो एक महादेश से
दूसरे महादेश को जाते हैं,
हम तो समझ नहीं पाते हैं,
मगर उनकी लायी चिट्वियाँ
पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।

भावार्थ :- इस संसार में जितने भी प्राणी हैं उन सभी के सन्दनों की भाषा प्रकृति समझती है। एक देश का मनुष्य दूसरे देश या क्षेत्र की या पशु-पक्षियों की भाषा नहीं समझ पाता। इस धरती पर सभी सजीव प्रकृति की संतान हैं, अत: प्रकृति उनकी भाषा समझ लेती है और वैसा ही आचरण करती है। पक्षी और बादल केवल प्रकृति के अंग नहीं, बल्कि भगवान के संदेशवाहक हैं। ये भगवान का संदेश लेकर एक महादेश से दूसरे महादेश जाते हैं। इनके द्वारा लाए संदेशों को हम भले न बाँच पाएँ लेकिन पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ इन संदेशों को बाँचकर हम तक पहुँचाते हैं।

अवतरण 29.
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ;
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

भावार्थ :- मनुष्य अत्यन्त महत्वाकांक्षी होता है। वह केवल कल्पनाएँ करना ही नहीं जानता है, बल्कि उन कल्पनाओं को विधिन्न उपादानों के द्वारा साकार करना भी जानता है। आज मनुष्य की प्रर्गति इसी कहानी को सुना रही है। यह मनुष्य साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि उस मनु का पुत्र है। जो केवल कल्पना या विचारों की दुनिया में नहीं जीता। वह अपने स्वप्न को साकार करने का भी सामर्थ्य रखता है।

अवतरण 30.
स्वर्ग के सप्राट को जाकर खबर कर दे,
“रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने, इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं।”

भावार्थ :- इस अंश में मनुष्य की सतत्रप्रगति तथा उसकी महत्वाकांक्षा की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ नित नवीन रूप धारण करती हैं, जिन्हें वह पूरा करने का प्रयास करता है। कवि इन्द्र को सावधान करते हुए कहता है कि मनुष्य ने असीम लालसा और बुद्धि का उपयोग कर केवल धरती ही नहीं, आकाश पर भी अपना अधिपत्य जमा लिया है। यदि इन्हें रोका नहीं गया, तो एकदिन ये स्वर्ग पर भी अधिकार जमा लेंगे।

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अवतरण 31.
है अनिश्चित, किस जगह पर
बाग, वन सुन्दर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा खतम हो
जायेगी, यह भी अनिश्चित,
अनिश्चित कल सुमन, कब
कंटकों के शर मिलेंगे,
कौन सहसा छूट जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा
तू न, ऐसी आन कर ले।

भावार्थ :- कवि जीवन-पथ पर चलने के संदर्भ में यह कह रहा है कि जीवनरूपी यात्रा में कब सुन्दर बाग-वन मिलेंगे और कब यात्रा खत्म हो जायेगी, यह अनिश्चित है। कभी फूल तो कभी काँटे की तीखी धार भी मिलेगी। हो सकता है कि कोई साथी सहसा हमसे छूट जाय या नये साथी मिल जाएँ। चाहे कुछ भी हो, हमें यह प्रण कर लेना है कि हम अपने कदम को रुकने न देंगे।

अवतरण 32.
जो धर्मो के अखाड़े हैं
उन्हें लड़वा दिया जाये।
जरूरत क्या कि हिन्दुस्तान पर
हमला किया जाये !!

भावार्थ :- किसी देश को कमजोर बनाने का सबसे सरल तरीका है वहाँ के निवासियों को कमजोर बना देना। निवासियों को कमजोर बनाने का तरीका है उनमें आपस में फूट डाल देना और उनमें फूट धर्म के माध्यम से ही डाली जा सकती है। हमारे शत्रुओं की यह साजिश है कि धर्म के नाम पर भारत के लोगों को आपस में लड़ा दिया जाय। इससे जो नुकसान होगा वह किसी हमले से कई गुणा बड़ा होगा, फिर हिन्दुस्तान पर हमला कंरने की जरूरत ही क्या है !

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अवतरण 33.
ये मुल्क इतना बड़ा है
यह भी बाहर के
हमले से,
न सर होगा !
जो सर होगा तो बस
अन्दर के फितने से।

भावार्थ :- कोई भी देश या व्यक्ति बाहरी आघातों या आक्रमणों से कमजोर या नष्ट नहीं होता है। देश या व्यक्ति को नष्ट होने में आन्तरिक कारक ही मुख्य भूमिका निभाते हैं। यदि देश या व्यक्ति आन्तरिक रूप से मजबूत रहे, तो उसे नष्ट करने की शक्ति किसी में नहीं है। भारत इतना विशाल है कि बाहरी हमले इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। यदि यह नष्ट होगा तो केवल आंतरिक कलह से – कवि का ऐसा कहना है।

अवतरण 34.
वो टक्कर हो कि सब कुछ
युद्ध का मैदान
बन जाए !
कभी जैसा नहीं था, वैसा
हिन्दुस्तान बन जाए।

भावार्थ :- किसी देश की प्रगति से ईर्ष्याभाव रखनेवाली शक्तियाँ चाहती हैं कि यह देश इतनी गिरी हुई हालत में चला जाए, जितना अतीत में न हुआ हो। इस अंश में भी यही भाव भारत. देश के सन्दर्भ में व्यंजित हुआ है। यहाँ कवि आतंकवादियों एवं शत्रु देशों की मंशा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि भारत में कुछ धार्मिक, राजनैतिक, भाषाई तथा प्रांतीयता के झगड़े बो दिए जायं। ऐसा करने से शांति और अहिंसा का यह हिन्दुस्तान युद्ध-क्षेत्र में बदल जायेगा।

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अवतरण 35.
लेकिन उनसे कौन कहे –
प्रगति, पिछलग्गूपन नहीं है
और जीवन, आगे बढ़ने के लिए
दूसरों का मुँह नहीं ताकता !

भावार्थ :- जो लोग यह समझते हैं कि किसी के विचारों से प्रभावित होकर उसके पीछे चलना ही प्रगतिशीलता है, तो यह गलत है। प्रगतिशील होने का अर्थ पिछलग्गू होना नहीं, बल्कि स्वयं को आगे बढ़ाना है और इसके लिये किसी का मुँह ताकने की आवश्यकता नहीं है।

अवतरण 36.
हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर, पार्थिव पूजन ?
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन !
संग-सौध में हो श्वृंगार मरण का शोभन
नग्न, क्षुधातुर वास विहीन रहें जीवित जन।

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर और अपार्थिव पूजन हो रहा है। कैसा आश्चर्य है कि मनुष्य तो बेचारा नगा, भूख से आकुल-व्याकुल और आवास-विहीन रहे और मृतक का संगमरमर के वैभवपूर्ण भवन में भृंगार होता रहे।

अवतरण 37.
भले बुरे सब एक सौं, जौ लौ बोलत नाहिं।
जानि परतु है काक-पिक, ॠतु बसंत के माहिं।।

भावार्थ :- मौन गंभीर पुरुषों का आभूषण है। जो व्यक्ति जितना ही धैर्यवान और गंभीर होगा, वह उतना ही मितभाषी होगा। ऐसे पुरुषों के वचन अत्यन्त मृदु और स्नेहयुक्त होते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह हमेशा “सत्य वद् प्रियंवद्” सिद्धान्त पर अमल करे। प्रिय या मधुर बोलने वाला व्यक्ति सभी का प्रिय पात्र होता है। यही बात प्रस्तुत दोहे के माध्यम से कही गई है कि-जब तक व्यक्ति बोलता नहीं, उसके भले -बुरे की पहचान नहीं होती, जिस प्रकार कौए और कोयल की पहचान बसंत ऋतु में ही होती है।

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अवतरण 38.
सबै सहायक सबल के, कोड न निबल सहाय।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय।।

भावार्थ :- इस संसार का नियम है कि सभी लोग बलवानों की ही सहायता करते हैं, क्योंकि उनसे लोगो को भय होता है। इसी तथ्य को गोस्वामी जी ने ‘रामचरितमानस’ में भी कहा है ‘भय बिनु होय न प्रीति’। इसी भावना को यह दोहा भी व्यक्त करता है कि-सब सबल की ही सहायता करते हैं, निर्बल की सहायता कोई नहीं करता। जिस प्रकार पवन दीपक को बुझा देता है, लेकिन आग को और भी बढ़ा देता है।

अवतरण 39.
अपनी पहुँच बिचारि के, करतब करिए दौर।
तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर।।

भावार्थ :- मनुष्य को अपनी हैसियत (स्थिति) का अन्दाजा लगाकर ही कोई कार्य करना चाहिए, अन्यथा मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। जो व्यक्ति विवेकवान् हैं, वे समय के पलड़े में अपने और अपनी परिस्थित्यो को तौलकर ही कोई कार्य करते हैं। प्रस्तुत दोहे का निष्कर्ष भी यही है कि-मनुष्य को अपनी सामर्थ्य का विचार करके ही कोई कार्य करना चाहिए। उसे उतना ही पैर फैलाने चाहिए, जितनी लम्बी चादर हो।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 Question Answer – संस्कृति है क्या?

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
संस्कृति ऐसी चीज है, जिसे लक्षणों से तो हम जान सकते हैं, किन्तु उसकी परिभाषा नहीं दे सकते।
– लेखक का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लेखक का नाम रामधारी सिंह ‘दिनकर’ है।
दिनकर के अनुसार संस्कृति हमारे लक्षणों से प्रकट होती है। लेकिन उसकी कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती। एक कहावत भी है, ‘संस्कृति हमारे अंदर का गुण है, लेकिन सभ्यता वह चीज है, जो हमारे पास है।’ संस्कृति हमारे प्रत्येक के व्यवहार से प्रकट होती है और सभ्यता की पहचान हमारी सुख-सुविधा की चीजों से प्रकट होती है।

प्रश्न 2. हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत ही होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 3.
यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर सुसंस्कृत आदमी सभ्य ही होता है।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के सांस्कृतिक निबंध ‘संस्कृति है क्या’ निबंध से ली गई है।
दिनकर के अनुसार सुसभ्य और सुसंस्कृत होना दो अलग बातें हैं। हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत नहीं हो सकता और हर सुसंस्कृत आदमी सुसभ्य नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए सुसभ्य आदमी भी तबीयत से नंगा हो सकता है और सुसंस्कृत व्यक्ति भी सुख-सुविधा की चीजों के अभाव में सभ्य नहीं दिख सकता है।

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प्रश्न 4.
उसे सुसंस्कृत समझने में कोई उज्र नहीं होना चाहिए।
– रचनाकार कौन हैं ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचनाकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।
प्रस्तुत पंक्ति में छोटानागपुर के आदिवासियों के बारे में कहा गया है। उनके पास सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण या साधन नहीं हैं । इसलिए उन्हें पूर्ण रूप से सभ्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। लेकिन उनमें मानवीय गुणों जैसे दयामाया, सच्चाई और सदाचार आदि की कमी नहीं है। इसलिए उन्हें सुसंस्कृत मान लेने में कोई परेशानी नहीं है।

प्रश्न 5. ये लक्षण आज की यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जाते हैं।

प्रश्न 6. वे जाति की संस्कृति का निर्माण करते थे।

प्रश्न 7.
सभ्यता और संस्कृति में एक मौलिक भेद है।
– ‘वे’ से किसकी ओर संकेत किया गया है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘वे’ से हमारे ॠषिगण संकेतित हैं।
प्रचीन भारत में ऋषि-मुनि जंगलों में सदाधारपूर्ण एवं सादा जीवन व्यतीत करते थे। फूस की झोपड़ियों में रहना, प्रकृति एवं उसके समस्त प्राणियों से प्यार करना, अपना सारा कार्य स्वयं करना, मिट्टी के बरतनों में खाना बनाना, प्ततों में खाना तथा शिक्षा दान करते हुए राष्ट्र की उन्नति के बारे में सोचना ही उनकी जिंदगी थी। रहन-सहन के आधार पर उन्हें यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्य नहीं कह सकते। लेकिन, वे संस्कृति के निर्माणकर्त्ता चे।

प्रश्न 8.
उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है।
– पाठ का नाम लिखें। यहाँ किसकी संस्कृति के बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘संस्कृति है क्या ?’ है।
यहाँ उन लोगों की संस्कृति के बारे में कहा गया है, जो लोग दुर्गुणों के गुलाम न रहकर उन्हें ही अपना गुलाम बनाना चाहते हैं। लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग, द्वेष, काम, वासना आदि पर मनुष्य की जो जाति जितनी ही विजयी होती है, उसकी संस्कृति उतनी ही श्रेष्ठ समझी जाती है।

प्रश्न 9.
संस्कृति, सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के निबंध ‘संस्कृति है क्या ?’ से ली गई है।
सभ्यता के साधन, सुख-सुविधा के साधन होते हैं। इसलिए उन्हें देखा जा सकता है। संस्कृति व्यक्ति के अंदर निहित होती है। इसलिए उसे देखा नहीं जा सकता है। संस्कृति, सभ्यता के अंदर उसी तरह छिपी रहती है, जैसे फूलों में सुगंध। फूल, सभ्यता का प्रतीक है, उसे देखा जा सकता है। सुगंध, संस्कृति का प्रतीक है, उसे अनुभव से ही जान सकते हैं।

प्रश्न 10.
‘अपस्टार्ट’ को लोग बुरा समझते हैं।
– प्रस्तुत पंक्ति किस पाठ की है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति ‘संस्कृति है क्या ?’ पाठ से ली गई है।
जो लोग अचानक पैसे वाले हो जाते हैं अथवा किसी को ऊँचा पद प्राप्त हो जाता है, तो उसे चिढ़ाने के लिए अंग्रेजी शब्द ‘अपस्टार्ट’ का प्रयोग किया जाता है। इस शब्द के मूल में यह भाव छिपा है, कि अघानक पद या पैसा प्राप्त हो जाने से कोई व्यक्ति उसके अनुरूप व्यवहार नहीं प्राप्त कर सकता है। इसमें समय लगता है।

प्रश्न 11. हम जो कुछ करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है।

प्रश्न 12.
जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के निबंध ‘संस्कृति है क्या ?’ से ली गई है।
सारे भारतीय धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करते है। ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए मनुष्य में जन्म लेता है। गीता में श्रीकृष्ण से लेकर बुद्ध और महावीर ने इस बात को स्वीकारा है। किसी के अच्छे संस्कार को देख कर या प्रतिभा को देख कर लोग उसका संबंध पूर्व जन्म से जोड़ते हैं। पूर्व जन्म का संस्कार जन्मजन्मांतरों तक चलता रहता है।

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प्रश्न 13.आदान-प्रदान की प्रक्रिया संस्कृति की जान है।

प्रश्न 14. संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।

प्रश्न 15. जो जाति केवल देना ही जानती है, लेना कुछ नहीं, उसकी संस्कृति का एक न एक दिन दिवाला निकल जाता है।

प्रश्न 16. कूपमंडूकता और दुनिया से रूठकर अलग बैठने का भाव संस्कृति को ले डूबता है।

प्रश्न 17.पहले एक भाषा में ‘शेली’ और ‘कीट्स’ पैदा होते हैं तब दूसरी भाषा में रवींद्र उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 18. सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार पर भी पड़ता है।

प्रश्न 19.
एक देश में जो धर्म खड़ा होता है, वह दूसरे देशों में धर्मों को भी बहुत-कुछ बदल देता है।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
उपर्युक्त पंक्ति ‘संस्कृति है क्या ?’ निबंध से ली गई है।
संस्कृति के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि इसका विकास एकांगी नहीं होता है। संसार की जितनी भी विकसित संस्कृतियाँ हैं, उन्होंने दूसरी संस्कृतियों से बहुत कुछ लिया है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति की संगति का अन्छा या वुरा असर पड़ता है, ठीक वैसे ही एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति प्रभावित होती है । यह बात केवल आचार-विचार या पहनावेओढ़ावे में ही नहीं है। संस्कृति साहित्य को भी प्रभावित करती है।

उदाहरण के लिए भारत के कवि गुरू कहे जाने वाले रवांद्रनाथ ठाकुर का साहित्य अंग्रेजी के ‘शेली’ और ‘कीट्स’ से प्रभावित है। ईसा मसीह के सिद्धांत भी बुद्ध से प्रभावित है। अगर भारत का संपर्क यूरोप से नहीं हुआ होता, तो भारत में नवजागरण नहीं हुआ होता। और न ही राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद जैसे विचारक या समाज-सुधारक पैदा हुए होते। इस प्रकार निष्कर्ष के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि परस्पर आदान-प्रदान की प्रकिया ही संस्कृति के प्राण हैं।

प्रश्न 20.
भारत देश और भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है।
– रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘संस्कृति है क्या ?’ है और इसके रघनाकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।
भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता ने अनेक सभ्यता एवं संस्कृति को प्रहण किया है। कला, साहित्य, संस्कृति तथा विज्ञान का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जिसमें दूसरी संस्कृति की झलक नहीं मिलती हो।

इसका सष्ट रूप से प्रभावहमें वास्तु-कला एवं संगोत-कला पर दिखाई देता है। येप्रभाव भारतीय संस्कृति में इस प्रकार घुलमिल गए हैं, कि उन्हें अलग करके देख पाना संभव नहीं है। इसलिए भारत और भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान हैं।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘संस्कृति है क्या ?’ पाठ का सारोश अपने शब्दों में लिखें।
प्रश्न – 2 : संस्कृति है क्या ?’ पाठ का मूल भाव लिखें।
प्रश्न – 3 : ‘संस्कृति है क्या $?’ निबंध के माध्यम से ‘दिनकर’ में हमें क्या संदेश देना चाहा है ?
प्रश्न – 4 : संस्कृति है क्या ? पाठ में व्यक्त ‘दिनकर’ के विचारों पेर प्रकाश डालें।
प्रश्न – 5 : ‘संस्कृति है क्या ?’ पाठ के उद्देश्य पर प्रकाश उालें।
उत्तर : ‘संस्कृति है क्या ?’ दिनकर का सांस्कृतिक निबंध है, जिसमें उन्होंने संस्कृति, सभ्यता, इसके उपकरण तथा दोनों का एक-दूसरे पर प्रभाव की चर्चा करते हुए यह संदेश देना चाहा है कि विभिन्न संस्कृतियों के मेल से ही बनी संस्कृति का स्थान सबसे ऊँचा होता है।

दिनकर के अनुसार संस्कृति को परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता, वह केवल लक्षणों से प्रकट होती है। हमारे खानेपीने, रहन-सहन, सोच-विचार यहाँ तक कि हमारे रोने-हँसने तक से हमारी संस्कृति प्रकट होती है। जिन चीजों का हम दैनिक जीवन में व्यवहार या निर्माण करते हैं उनसे हमारी सभ्यता प्रकट होती है जैसे – सड़क से लेकर हवाई जहाज तक निर्माण या फिर चाहे वह घर का ही निर्माण क्यों न हो। दिनकर का ऐसा कहना है कि हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत हो यह जरूरी नहीं क्योंकि सुसंस्कृत व्यक्ति भी तबीयत से नंगा हो सकता है।

यूरोपीय परिभाषा के अनुसार हम छोटानागपुर के आदिवासियों को सभ्य नहीं कह सकते क्योंकि सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण उनके पास नहीं हैं। फिर भी उनमें दया-माया, सदाचार, परोपकार तथा सदाधार जैसे गुण हैं इसलिए इन्हें सुसंसकृत माना जा सकता है।

प्रावीन काल के हमारे ऋषि भी महलों में नहीं, फूस की झोपड़ियों में रहते थे, मिद्टी के बर्तनों में भोजन पकाते तथा पत्तों पर खाना खाते थे; वे जंगलों के जीवों से प्यार करते तथा अपने सारे कार्य स्वयं ही किया करते थे। इन्हीं गुणों के कारण वे न केवल सुसंस्कृत थे बल्कि संस्कृति का निर्माण करने वाले थे।

दिनकर ने संस्कृति और प्रकृति में भी अंतर स्पष्ट किया है तथा यह कहा है कि क्रोध मनुष्य की प्रकृति तथा लोभ में पड़ना उसका स्वभाव है। बहुत सारे दुर्गुण प्रकृतिदत्त हैं और जो इनपर विजय प्राप्त कर लेते हैं उनकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची मानी जाती है।

सभ्यता की अपेक्षा संस्कृति अधिक टिकाऊ होती है क्योंकि सभ्यता की साप्मगियाँ तो तुरंत नष्ट हो सकती हैंलेकिन संस्कृति नहीं। संस्कृति का निर्माण भी अचानक नहीं हो जाता है बल्कि उसके निर्माण में सैकड़ों वर्ष लगते हैं।

संस्कृति के बारे में दिनकर ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही- वह यह है कि संस्कृति का विकास आदान-प्रदान से होता है। जो जाति या देश अपने-आपको दूसरी संस्कृतियों से काटकर रखती है एक न एक दिन उसका पतन हो जाता है। संस्कृति का विकास एक दूसरे के संपर्क से होता है। उदाहरण के लिए यदि हमारा सपर्क, यूरोप से नहीं होता तो भारत में नवजागरण नहीं आता और न ही राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद तथा गाँधी जैसे समाज सुधारक पैदा होते।

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दिनकर ने इस निबंध के माध्यम से हमें यह संदेश देना चाहा है कि भारत देश तथा भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है क्योकि यहाँ की संस्कृति में अनेक संस्कृतियों का मिश्रण है।
अंत में इस निबंध के उद्देश्य को दिनकर के शब्दों में ही व्यक्त कर सकते हैं –
“‘उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, देश में जहाँ जो हिन्दू बसते हैं, उनकी संस्कृति एक है एवं भारत की प्रत्येक क्षेत्रीय विशेषता हमारी इसी सामासिक संस्कृति की विशेषता है। तब हिन्दू और मुसलमान हैं जो देखने में अब भी दो लगते हैं, किन्तु उनके बीच भी सांस्कृतिक एकता विद्यमान है, जो उनकी भिन्नता को कम करती है। दुर्भाग्य की बात है कि हम इस एकता को पूर्ण रूप से समझने में असमर्थ रहे हैं।”

प्रश्न 6 : संस्किति है क्या ? निब्ध के आध्थार पर संस्किति आर सम्या सें अंदर स्पष्ट करें

प्रश्न-7 : दिनकर के विचार के अनुसार संस्कृति और सभ्यता में क्या अंतर है?

प्रश्न – 8 : पतित पाठ के आघार पर सस्कृति तथा सध्यता में अंतर लिखें।
उत्तर :
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति है क्या?’ निबंध में संस्कृति और सभ्यता पर विचार करते हुए इन दोनो के बीच अंतर स्पष्ट किया है। साधारणतः लोग संस्कृति और सभ्यता को एक-दूसरे का पर्याय मान लेते हैं लेकिन वास्तव में दोनों में बहुत ही सूक्ष्म अंतर है।
दिनकर के अनुसार संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है लेकिन सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है।

संस्कृति की पहचान लक्षणों से होती है जबकि सभ्यता की पहचान सुख-सुविधा तथा ठाट-बाट के साधनों से होती है। इस दृष्टि से छोटानागपुर के आदिवासी पूर्ण रूप से सभ्य नहीं कहे जा सकते क्योंकि सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण उनके पास नहीं है।
सभ्यता के भीतर संस्कृति उसी तरह छिपी रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूल में सुगंध।

सभ्यता के निर्माण तथा नष्ट होने में संस्कृति की अपेक्षा काफी समय लगता है। संस्कृति को आसानी से नष्ट नहीं किया जा सकता।
आदिकालीन साहित्यकार, चित्रकार, मूर्तिकार आदि हमारी संस्कृति के रचनेवाले हैं। संस्कृति तथा सभ्यता दोनों का ही विकास परस्पर आदान-प्रदान से होता है। संसार का कोई भी राष्ट्र या जाति यह दावा नहीं कर सकती कि वह दूसरे की संस्कृति-सभ्यता से प्रभावित नहीं है।

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प्रत्येक देश या जाति सभ्यता के उपकरण के मामले में दूसरों का कितना ही नकल कर ले लेकिन सभी अपनी संस्कृति को, परंपरा को यथावत बनाएं रखना चाहते हैं क्योंकि –

वह न तो हिंदू है, न मुस्लिम है,
न द्रविड़ है, न आर्य है,
न परंपरा का हर प्रहरी
पुरी का शंकराचार्य है।

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति क्या है ?
उत्तर :
संस्कृति ऐसी चीज है जिसे लक्षणों से तो जान सकते हैं लेकिन उसकी परिभाषा नहीं दी जा सकती।

प्रश्न 2.
अंग्रेजी में संस्कृति के बारे में क्या कहावत है ?
उत्तर :
अंग्रेजी में संस्कृति के बारे में यह कहा गया है कि संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है।

प्रश्न 3.
अंग्रेजी में सभ्यता के बारे में क्या कहावत है ?
उत्तर :
अंग्मेजी में सभ्यता के बारे में कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है।

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प्रश्न 4.
ऐसा क्यों नहीं कहा जा सकता कि हर सुसंस्कृत आदमी सभ्य ही होता है ?
उत्तर :
ऐसा इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि सभ्यता की पहचान सुख-सुविधा और ठाठ-बाट है।

प्रश्न 5.
छोटानागपुर की आदिवासी जनता पूर्ण रूप से सभ्य क्यों नहीं कही जा सकती ?
उत्तर :
छोटानागपुर की आदिवासी जनता को पूर्ण रूप से सभ्य इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके पास सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण नहीं हैं।

प्रश्न 6.
छोटानागपुर के आदिवासियों में कौन कौन-से गुण हैं ?
उत्तर :
छोटानागपुर के आदिवासियों में दया-माया, सच्चाई और सदाचार के गुण हैं।

प्रश्न 7.
प्राचीन भारत के ऋषियों का रहन-सहन कैसा था ?
उत्तर : प्राघीन भारत के ऋषि फूस की झोपड़ियों में रहते थे, वह जंगलों के जीवों से दोस्ती तथा प्यार करने में हिचकिचाते नहीं थे, मिट्टी के बर्त्तनों में रसोई पकाते तथा पत्तों पर खाना खाते थे।

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प्रश्न 8.
हमारी भारतीय संस्कृति का निर्माण करनेवाले कौन थे ?
उत्तर :
हमारी भारतीय संस्कृति का निर्माण करनेवाले जंगलों में सादा तथा सदाचारपूर्ण जीवन बिताने वाले ॠषिगण थे।

प्रश्न 9.
संस्कृति और सभ्यता के बारे में साधारण नियम क्या है ?
उत्तर :
सस्कृति और सभ्यता के बारे में साधारण नियम यह है कि दोनों का विकास एक साथ होता है और दोनों ही एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 10.
घर बनाना स्थूल रूप से किसका कार्य होता है ?
उत्तर :
घर बनाना स्थूल रूप से सभ्यता का कार्य होता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य की प्रकृति, स्वभाव तथा प्रकृतिदत्त गुण क्या हैं ?
उत्तर :
गुस्सा करना मनुष्य की प्रकृति, लोभ में पड़ना उसका स्वभाव तथा ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष तथा कामवासना आदि उसके प्रकृतिदत्त गुण हैं।

प्रश्न 12.
आदमी और जानवर में कब कोई भेद नहीं रह जाएगा ?
उत्तर :
जब प्रकृतिदत्त गुणों जैसे ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष, काम-वासना आदि पर नियंत्रण न रखा जाये तो आदमी और जानवर में कोई भेद्न नहीं रह जाएगा।

प्रश्न 13.
मनुष्य की कोशिश क्या होती है ?
उत्तर :
मनुष्य की कोशिश यह होती है कि वह कोध के वश में नहीं रहे कोध ही उसके वश में रहे।

प्रश्न 14.
किसकी संस्कृति ऊँची समझी जाती है ?
उत्तर :
जिस जाति का व्यक्ति अपने दुर्गुणों पर जितना ही ज्यादा विजयी होता है उसकी संस्कृति उतनी ही ऊँची समझी जाती है।

प्रश्न 15.
सभ्यता संस्कृति के भीतर किस रूप में रहती है ?
उत्तर :
सभ्यता के भीतर संस्कृति वैसे ही रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूल में सुगंध।

प्रश्न 16.
सभ्यता और संस्कृति में से ज्यादा कौन टिकाऊ है और क्यों ?
उत्तर :
सभ्यता और संस्कृति में से ज्यादा टिकाऊ संस्कृति है क्योंकि सभ्यता की सामत्रियाँ नष्ट हो सकती हैं लेकिन संस्कृति नहीं।

प्रश्न 17.
‘अपस्टार्ट’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता है ?
उत्तर :
जो व्यक्ति अचानक धनी हो जाता है या उसे कोई ऊँचा पद प्राप्त हो जाता है उसके लिए ‘अपस्टार्ट’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 18.
संस्कृति की झलक किसमें दिखाई पड़ती है ?
उत्तर :
खाने-पीने, रहन-सहन, सोचने-समझने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने आदि जो कुछ भी हम करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 19.
असल में संस्कृति क्या है ?
उत्तर :
असल में संस्कृति जिंदगी जीने का तरीका है जिसकी छाप सदियों से जमा होकर समाज में छायी रहती है।

प्रश्न 20.
संस्कृति हमारा पीछा कब तक करती है ?
उत्तर :
संस्कृति हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती है।

प्रश्न 21.
अपने यहाँ संस्कार के बारे में कौन-सा एक साधारण कहावत है ?
उत्तर :
अपने यहाँ साधारण कहावत है कि जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है।

प्रश्न 22.
हमारी संस्कृति का प्रभाव कब तक चलता रहता है ?
उत्तर :
हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।

प्रश्न 23.
हमारी संस्कृति के रचयिता कौन हैं ?
उत्तर :
जो आदिकाल से हमारे लिए काव्य और दर्शन की रचना करते आए हैं, चित्र और मूर्ति बनाते आए हैं वे ही हमारी संस्कृति के रचयिता हैं।

प्रश्न 24.
संस्कृति का क्या स्वभाव है ?
उत्तर :
संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।

प्रश्न 25.
कौन-सा भाव संस्कृति को ले डूबता है ?
उत्तर :
कूपमंडूकता तथा दुनिया से रूठकर अलग बैठने का भाव संस्कृति को ले डूबता है।

प्रश्न 26.
‘शेली’ तथा ‘कीट्स’ कौन हैं ?
उत्तर :
शेली तथा कीट्स दोनों ही अंग्रेजी भाषा के विश्वप्यसिद्ध कवि हैं।

प्रश्न 27.
उर्दूभाषा तथा मुगल-कलम की चित्रकारी भारत को किसकी देन है ?
उत्तर :
उद्दूभाषा तथा मुगल-कलम की चित्रकारी दोनों ही मुसलमानों की देन हैं।

प्रश्न 28.
अगर यूरोप से भारत का संपर्क नहीं हुआ होता तो क्या होता ?
उत्तर :
अगर यूरोप से भारत का संपर्क नहीं होता तो राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद तथा गाँधी जैसे सुधारकों का जन्म नहीं हुआ होता।

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प्रश्न 29.
दो जातियों के परस्पर मिलने से क्या होता है ?
उत्तर :
दो जातियों के परसर मिलने से जिंदगी की एक नयी धारा फूटती है जिसका प्रभाव दोनों जातियों पर पड़ता है।

प्रश्न 30.
सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव हमारे रहन-सहन तथा कला के अलावे किस पर पड़ता है ?
उत्तर :
सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव हमारे रहन-सहन तथा कला के अलावे दर्शन और विचार पर भी पड़ता है।

प्रश्न 31.
सांस्कृतिक दृष्टि से कौन-सा देश या जाति अधिक शक्तिशाली माना जाता है ?
उत्तर :
जिस देश या जाति में अंधिक से अधिक सांस्कृतिक सम्मिश्रण तथा सामंजस्य हो वह अधिक शक्तिशाली माना जाता है।

प्रश्न 32.
ऐसा क्यों नहीं कहा जा सकता कि हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत ही होता है
उत्तर :
सुसभ्य आदमी भी तबीयत से मनचला तथा नंगा हो सकता है, इसलिए हर सुसभ्य आदमी को सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 33.
कौन-से लक्षण यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जा सकते ?
उत्तर :
हमारे खषियों के रहन-सहन के लक्षणों को यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जा सकते।

प्रश्न 34.
घर का नक्शा पसंद करने के पीछे कौन-सी रूचि काम करती है ?
उत्तर :
घर का नवशा पसंद करने के पीछे हमारी सांस्कृतिक रूचि काम करती है।

प्रश्न 35.
कौन-से प्रभाव का क्रम निरंतर चलता ही रहता है ?
उत्तर :
सभ्यता का प्रभाव संस्कृति पर तथा संस्कृति का प्रभाव सभ्यता पर पड़ने का क्रम निरंतर चलता ही रहता है।

प्रश्न 36.
संस्कृति के निर्माण में कितना समय लगता है ?
उत्तर :
संस्कृति के निर्माण में सैकड़ों वर्षों का समय लगता है।

प्रश्न 37.
हमारे पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला, सिनेमागृह आदि किसके उपकरण हैं?
उत्तर :
हमारे पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला तथा सिनेमागृह आदि हमारी संस्कृति के उपकरण हैं।

प्रश्न 38.
संसार का कोई भी देश क्या दावा नहीं कर सकता ?
उत्तर :
संसार का कोई भी देश यह दावा नहीं कर सकता कि उसपर किसी अन्य देश की संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ा है।

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प्रश्न 39.
भारत की विचारधारा पर विज्ञान का प्रभाव किसके कारण पड़ा ?
उत्तर :
यूरोप से संपर्क के कारण भारत की विचारधारा पर विज्ञान का प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 40.
संस्कृति की जान किसे कहा गया है ?
उत्तर :
आदान-प्रदान की प्रक्रिया को संस्कृति की जान कहा गया है।

प्रश्न 41.
भारत देश तथा भारतीय संस्कृति किस दृष्टि से संसार में सबसे महान है ?
उत्तर :
भारत की सामासिक संस्कृति में अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियाँ पची हुई हैं, इसलिए भारत तथा भारतीय संस्कृति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘दिनकर’ किस कवि का उपनाम है?
(क) बालकृष्ण शर्मा का
(ख) रामनरेश त्रिपाठी का
(ग) रामधारी सिंह का
(घ) जयशंकर प्रसाद का
उत्तर :
(ग) रामधारी सिंह का।

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प्रश्न 2.
दिनकर का जन्म कब हुआ था?
(क) 23 दिसम्बर, 1908 को
(ख) 23 जनवरी, 1908 को
(ग) 23 फरवरी, 1908 को
(घ) 23 जुलाई, 1908 को
उत्तर :
(क) 23 दिसम्बर, 1908 को ।

प्रश्न 3.
दिनकर कैसे कवि के रूप में अधिक प्रतिष्ठित हैं?
(क) रीतिबद्ध कवि
(ख) भक्त कवि
(ग) युग-चारण कवि
(घ) चारण-कवि
उत्तर :
(ग) युग-चारण कवि।

प्रश्न 4.
‘कुरूक्षेत्र’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) पंत
(ख) नागार्जुन
(ग) गुप्तजी
(घ) दिनकर
उत्तर :
(घ) दिनकर।

प्रश्न 5.
‘कुरूक्षेत्र’ काव्य की पृष्ठभूमि क्या है?
(क) राम वन गमन
(ख) महाभारत
(ग) प्रथम विश्वयुद्ध
(घ) द्वितीय विश्वयुद्ध
उत्तर :
(घ) द्वितीय विश्वयुद्ध।

प्रश्न 6.
दिनकर ने महाभारत के कर्ण के चरित्र पर आधारित कौन-सा काव्य लिखा?
(क) कुरूक्षेत्र
(ख) रश्मिरथी
(ग) रेणुका
(घ) हुँकार
उत्तर :
(ख) रश्मिरथी।

प्रश्न 7.
दिनकर का कामाध्यात्म संबंधी महाकाव्य कौन-सा है?
(क) रशिमरथी
(ख) उर्वशी
(ग) नील कुसुम
(घ) रेणुका
उत्तर :
(ख) उर्वशी।

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है?
(क) रेणुका
(ख) हुँकार
(ग) कुकुरमुत्ता
(घ) द्वन्द्वगीत
उत्तर :
(ग) कुकुरमुत्ता।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है?
(क) रसवंती
(ख) सामधेनी
(ग) कुरूक्षेत्र
(घ) नीरजा
उत्तर :
(घ) नीरजा।

प्रश्न 10.
‘मिट्टी की ओर’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) कुँवर नारायण
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) दिनकर
(घ) अज्ञेय
उत्तर :
(ग) दिनकर।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है?
(क) बापू
(ख) गीतर्व
(ग) धूप और धुआं
(घ) रश्मिरथी
उत्तर :
(ख) गीतपर्व।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है ?
(क) नील कुसुम
(ख) नये सुभाषित
(ग) नीलांबरा
(घ) परशुराम की प्रतीक्षा
उत्तर :
(ग) नीलांबरा।

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प्रश्न 13.
निम्न में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है ?
(क) हारे को हरिनाम
(ख) संचयिता
(ग) परिक्रमा
(घ) रश्मिलोक
उत्तर :
(ग) परिक्रमा।

प्रश्न 14.
‘अर्द्धनारीश्वर’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) पंत
(ख) दिनकर
(ग) शमशेर
(घ) अज्षेय
उत्तर :
(ख) दिनकर।

प्रश्न 15.
‘भारतीय संस्कृति के चार अध्याय’ किसकी रचना है?
(क) दिनकर की
(ख) मुक्तिवोध की
(ग) निराला की
(घ) पंत की
उत्तर :
(क) दिनकर की ।

प्रश्न 16.
‘शुद्ध कविता की खोज’ के लेखक कौन हैं?
(क) धूमिल
(ख) दिनकर
(ग) रामदरश मित्र
(घ) नरेश मेहता
उत्तर :
(ख) दिनकर।

प्रश्न 17.
‘रेती के फूल’ और ‘उजली आग’ के रचियता कौन हैं?
(क) दिनकर
(ख) रघुवीर सहाय
(ग) अज्ञेय
(घ) निराला
उत्चर :
(क) दिनकर।

प्रश्न 18.
‘हे राम’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) सर्वेश्वर
(ग) अज़ेय
(घ) दिनकर
उत्तर :
(घ) दिनकर।

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प्रश्न 19.
निम्न में से कौन-सी रचना दिनकर की नहीं है?
(क) सप्तपर्णा
(ख) लोकदेव नेहरू
(ग) प्रसाद, पंत् और मैथिली शरण गुप्त
(घ) काव्य की भूमिका
उत्तर :
(क) सप्तपर्णा।

प्रश्न 20.
दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किस विधा की रचना है?
(क) संस्मरण
(ख) संस्कृति का इतिहास
(ग) रेखाचित्र
(घ) एकांकी
उत्तर :
(ख) संस्कृति का इतिहास ।

प्रश्न 21.
दिनकर का ‘अर्द्धनारीश्वर’ किस विधा की रचना है?
(क) निबंध
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) कहानी
उत्तर :
(क) निबंध।

प्रश्न 22.
‘उर्वशी’ प्रबंध-काव्य के रचियता कौन हैं?
(क) प्रसाद
(ख) पंत
(ग) दिनकर
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ग) दिनकर।

प्रश्न 23.
कामाध्यात्म की भावभूमि पर आधारित ग्रंध है –
(क) कामायनी
(ख) उर्वशी
(ग) एकलव्य
(घ) आकाशगंगा
उत्तर :
(ख) उर्वशी।

प्रश्न 24.
‘प्रसाद, पंत और मैथिलीशरण’ के लेखक हैं –
(क) दिनकर
(ख) अझेय
(ग) नगेंद्र
(घ) यशपाल
उत्तर :
(क) दिनकर।

प्रश्न 25.
‘लोकदेव नेहरू’ के रचयिता हैं?
(क) प्रसाद
(ख) दिनकर
(ग) अमृतराय
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ख) दिनकर।

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प्रश्न 26.
दिनकर की रचना में किन शब्दों की बहुलता है?
(क) तत्सम्
(ख) तद्भव
(ग) देशज
(घ) विदेशज
उत्तर :
(क) तत्सम्।

प्रश्न 27.
दिनकर ने भारत-पाकिस्तान के युद्ध की पृष्ठभूमि पर किस काव्य की रचना की?
(क) उजली आग
(ख) परशुराम की प्रतीक्षा
(ग) हारे को हरिनाम
(घ) कुरूक्षेत्र
उत्तर :
(ख) परशुराम की प्रतीक्षा

प्रश्न 28.
महाभारत की कथा पर आधारित दिनकर का कौन-सा काव्य है?
(क) रश्मिरथी
(ख) हुँकार
(ग) कुरूक्षेत्र
(घ) है राम
उत्तर :
(ग) कुरूक्षेत्र।

प्रश्न 29.
सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार के अलावे पड़ता है ?
(क) पोशाक पर
(ख) सड़क पर
(ग) हवाई जहाज पर
(घ) मोटर बनाने पर
उत्तर :
(क) पोशाक पर ।

प्रश्न 30.
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दंतहीन, विघहीन, विनीत, सरल हो ।। — किसके द्वारा रचित है?
(क) प्रसाद
(ख) पंत
(ग) माखनलाल चतुर्वेदी
(घ) दिनकर
उत्तर :
(घ) दिनकर।

प्रश्न 31.
भारतीय संस्कृति पर आधारित दिनकर का कौन-सा ग्रंध है ?
(क) लोकदेव नेहरू
(ख) अर्द्धनारीश्वर
(ग) भारतीय संस्कृति के चार अध्याय
(घ) रेती के फूल
उत्तर :
(ग) भारतीय संस्कृति के चार अध्याय।

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प्रश्न 32.
दिनकर का देहांत कब हुआ?
(क) 24 अप्रैल 1974
(ख) 25 अप्रेल 1975
(ग) 25 अप्रैल 1976
(घ) 25 अप्पैल 1977
उत्तर :
(क) 24 अप्रैल 1974 ।

प्रश्न 33.
दिनकर की साहित्यिक सेवाओं के लिए किस विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि दी?
(क) दिल्ली विश्वविद्यालय
(ख) विश्व भारती
(ग) भागलपुर विश्वविद्यालय
(घ) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
उत्तर :
(ग) भागलपुर विश्वविद्यालय।

प्रश्न 34.
निम्नलिखित में से दिनकर की अंतिम काव्य-रचना कौन-सी है?
(क) प्रणभंग
(ख) सीपी और शंख
(ग) हारे को हरिनाम
(घ) दिल्ली
उत्तर :
(ग) हारे को हरिनाम।

प्रश्न 35.
संस्कृति क्या है ?
(क) अच्छे गुण
(ख) सभ्यता के सामान
(ग) अच्छी पोशान
(घ) अच्छी मकान
उत्तर :
(क) अच्छे गुण।

प्रश्न 36.
तबीयत से नंगा होना किसके खिलाफ है ?
(क) सभ्यता के
(ख) संस्कृति के
(ग) कानून के
(घ) सभ्य के
उत्तर :
(ख) संस्कृति के।

प्रश्न 37.
सभ्यता की पहचान है ?
(क) सुख-सुविधा
(ख) दुःख-सुख
(ग) सच-झूठ
(घ) लिखना-पढ़ना
उत्तर :
(क) सुख-सुविधा ।

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प्रश्न 38.
उसे सुसंस्कृत समझाने में कोई उज्ञ (हर्ज) नहीं होना चाहिए – ‘उसे’ से कौन संकेतित है?
(क) लेखक
(ख) आदिवासी
(ग) नगरवासी
(घ) ग्रामवासी
उत्तर :
(ख) आदिवासी।

प्रश्न 39.
प्राचीन भारत में ॠषिगण रहते थे ?
(क) महलों में
(ख) कोठे पर
(ग) जंगलों में
(घ) गाँवों में
उत्तर :
(ग) जंगलों में।

प्रश्न 40.
ॠषिगणण किसका निर्माण करते थे ?
(क) झोपडियों का
(ख) संस्कृति का
(ग) तीर-धनुष का
(घ) बर्त्तनों का
उत्तर :
(ख) संस्कृति का।

प्रश्न 41.
सभ्यता और संस्कृति की प्रगति होती है –
(क) एक साथ
(ख) अलग-अलग
(ग) आगे-पीछे
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) एक साथ ।

प्रश्न 42.
हम घर का निर्माण करते हैं –
(क) सभ्यता की प्रेरणा से
(ख) संस्कृति की प्रेरणा से
(ग) इंजीनियर की प्रेरणा से
(घ) माता-पिता की प्रेरणा से
उत्तर :
(ख) संस्कृति की प्रेरणा से।

प्रश्न 43.
गुस्सा करना मानव की
(क) घृणा
(ख) प्रकृति
(ग) लोभ
(घ) ईर्ष्या
उत्तर :
(ख) प्रकृति ।

प्रश्न 44.
मनुष्य कोशिश करता है कि –
(क) गुस्सा के वश में रहे
(ख) गुस्सा उसके वश में रहे
(ग) लोभ के वश में रहे
(घ) द्वेष के वश में रहे
उत्तर :
(ख) गुस्सा उसके वश में रहे ।

प्रश्न 45.
संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा –
(क) मोटी है
(ख) लंबी है
(ग) महीन है
(घ) खुरदुरी है
उत्तर :
(ग) महीन है ।

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प्रश्न 46.
सभ्यता की अपेक्षा कौन अधिक टिकाऊ है ?
(क) लोभ
(ख) ईष्ष्या
(ग) संस्कृति
(घ) गुस्सा
उत्तर :
(ग) संस्कृति ।

प्रश्न 47.
किसका विनाश आसानी से नहीं किया जा सकता ?
(क) कोध का
(ख) लोभ का
(ग) मोह का
(घ) संस्कृति का
उत्तर :
(घ) संस्कृति का।

प्रश्न 48.
अचानक धनी बन गए व्यक्ति के लिए अंग्रेजी में कौन-सा शब्द है ?
(क) रिच
(ख) जेन्टल
(ग) अपस्टार्ट
(घ) डाउन स्टार्ट
उत्तर :
(ग) अपस्टार्ट ।

प्रश्न 49.
किसकी संस्कृति तुरंत नहीं सीखी जा सकती ?
(क) धनी तथा ऊँचे ओहदे वाले की
(ख) धनी की
(ग) ऊँचे ओहदे वाले की
(घ) इनमें से किसी की नहीं
उत्तर :
(क) धनी तथा ऊँचे ओहदे वाले की।

प्रश्न 50.
निम्न में से हमारी संस्कृति की झलक किसमें होती है ?
(क) पूजा-पाठ
(ख) भजन-कीर्तन
(ग) पढ़ना-लिखना
(घ) पहनने-ओढ़ने
उत्तर :
(घ) पहनने-ओढ़ने।

प्रश्न 51.
निम्नलिखित में से कौन हमारी संस्कृति का उपकरण नहीं है ?
(क) पुस्तकालय
(ख) संप्रहालय
(ग) हवाईअड्डा
(घ) नाटकशाला
उत्तर :
(ग) हवाईअड्डा।

प्रश्न 52.
संस्कृति का स्वभाव है कि वह –
(क) कूपमंडूकता से बढ़ती है
(ख) आदान-प्रदान से बढ़ती है
(ग) बात करने से
(घ) हाथ मिलाने से
उत्तर :
(ख) आदान-प्रदान से बढ़ती है ।

प्रश्न 53.
कौन-सा भाव संस्कृति को ले डूबता है ?
(क) दुनिया से रूठकर अलग बैठना
(ख) नाटक करना
(ग) संम्रहालयों को देखना
(घ) सिनेमागृह जाना
उत्तर :
(क) दुनिया से रूठकर अलग बैठना।

प्रश्न 54.
‘शेली’ किस भाषा के कवि हैं ?
(क) हिन्दी
(ख) अंग्रेजी
(ग) चीनी
(घ) जापानी
उत्तर :
(ख) अंग्रेजी।

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प्रश्न 55.
‘कीदस’ किस भाषा के कवि हैं ?
(क) अंगेजी
(ख) जर्मन
(ग) फ्रेंच
(घ) चीनी
उत्तर :
(क) अंग्रेजी ।

प्रश्न 56.
रवीन्द्रनार्थ ठाकुर किस भाषा के कवि हैं ?
(क) हिन्दी
(ख) संस्कृत
(ग) बंग्ला
(घ) अंग्रेजी
उत्तर :
(ग) बंग्ला ।

प्रश्न 57.
अगर मुसलमान इस देश में नहीं आए होते तो –
(क) भारत आज़ाद नहीं होता
(ख) उर्दू भाषा का जन्म नहीं होता
(ग) लोग गरीब रह जाते
(घ) संगीत लुप्त हो जाता
उत्तर :
(ख) उर्दू भाषा का जन्म नहीं होता।

प्रश्न 58.
भारतीय जाति संसार में सबसे महान है क्योंकि –
(क) यहाँ की संस्कृति में अनेक जातियों की संस्कृतियाँ पची हैं
(ख) यह सबसे अलग-थलग है
(ग) ये अच्छी जाति है
(घ) संसार की अकेली जाति है
उत्तर :
(क) यहाँ की संस्कृति में अनेक जातियों की संस्कृतियाँ पची हैं।

प्रश्न 59.
एक जाति का रिवाज दूसरी जाति का बन जाता है ?
(क) बोझ
(ख) ताकत
(ग) रिवाज
(घ) झगड़े का कारण
उत्तर :
(ग) रिवाज।

प्रश्न 60.
कौन-सी प्रक्रिया संस्कृति की जान है ?
(क) बात-चीत की प्रक्रिया
(ख) अकेले रहने की प्रकिया
(ग) कूपमंड्कुता
(घ) आदान-प्रदान की प्रक्रिया
उत्तर :
(घ) आदान-प्रक्रिया की प्रकिया।

प्रश्न 61.
संस्कृति की रचना में समय लगता है ?
(क) पचास वर्ष
(ख) सौ वर्ष
(ग) सैकड़ों वर्ष
(घ) लाखों वर्ष
उत्तर :
(ग) सैकड़ों वर्ष ।

प्रश्न 62.
कौन-सी संस्कृति ऊँची समझी जाती है ?
(क) जो दुर्गुणों पर विजयी होती है
(ख) जो लोभ का गुलाम होती है
(ग) जो कामवासना के अधीन है
(घ) जो गुस्से के वश में हो
उत्तर :
(क) जो दुर्गुणों पर विजयी होती है।

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प्रश्न 63.
गुस्सा करना मनुष्य की है ?
(क) आदत
(ख) प्रकृति
(ग) स्वभाव
(घ) प्रकृतिदत्त गुण
उत्तर :
(ख) प्रकृति ।

प्रश्न 64.
मनुष्य कोशिश करता है कि –
(क) वह लोभ-मोह के वश में रहे
(ख) कामवासना के अधीन रहे
(ग) गुस्सा उसके वश में रहे
(घ) वह गुस्से के वश में रहे
उत्तर :
(ग) गुस्सा उसके वश में रहे।

प्रश्न 65.
निम्नलिखित में से कौन संस्कृति का अंग है?
(क) संगीत
(ख) कड़क
(ग) पोशाक
(घ) अच्छा भोजन
उत्तर :
(क) संगीत ।

प्रश्न 66.
जीवन जीने की कला है ?
(क) संस्कृति
(ख) सभ्यता
(ग) स्वभाव
(घ) प्रकृतिदत्त गुण
उत्तर :
(क) संस्कृति ।

प्रश्न 67.
संस्कृति को हम निम्न से किसकी मदद से जान सकते हैं ?
(क) सभ्यता
(ख) स्वभाव
(ग) लक्षणों
(घ) प्रकृति
उत्तर :
(ग) लक्षणों ।

प्रश्न 68.
संस्कृति की क्या नहीं दी जा सकती ?
(क) परिभाषा
(ख) लक्षण
(ग) जानकरी
(घ) भेद
उत्तर :
(क) परिभाषा।

प्रश्न 69.
लोभ में पड़ना किसका स्वभाव है ?
(क) क्रषियों का
(ख) मनुष्य का
(ग) सुसभ्य का
(घ) सुसंस्कृत का
उत्तर :
(ख) म्नुष्य का।

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प्रश्न 70.
असल में संस्कृति जिंदगी क्या है ?
(क) तरीका
(ख) छल
(ग) लोभ
(घ) कामवासना
उत्तर :
(क) तरीका।

प्रश्न 71.
जिंदगो की नई धारा किससे फूट निकलती है ?
(क) संस्कृति से
(ख) सभ्यता से
(ग) दो जातियों के , लने से
(घ) दो लोगों के मिलने से
उत्तर :
(ग) दो जातिधो के मिलने से ।

प्रश्न 72.
प्राचीन भारत में वषिगणों की जिंदगी का हिस्सा इनमें से नहीं था ?
(क) पत्तों में खाना
(ख) महलों में रहना
(ग) हिचाकिचाहट नहीं दिखाना
(घ) झोषड़ी में वास करना
उत्तर :
(ख) महलों में रहना।

प्रश्न 73.
निम्नलिखित में से कौन प्रकृति का आवेग नहीं है ?
(क) ईष्य्या
(ख) मोह
(ग) राग
(घ) महलो में रहना
उत्तर :
(घ) महलों में रहना।

प्रश्न 74.
निम्नलिखित में से कौन हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती है ?
(क) संस्कार
(ख) संस्कृति
(ग) सभ्य
(घ) सभ्यता
उत्तर :
(ख) संस्कृति ।

प्रश्न 75.
जिसका जैसा संस्कार है उसका वैसा ही –
(क) स्वभाव होता है
(ख) व्यवहार होता है
(ग) पुनर्जन्म होता है
(घ) विचार होता है
उत्तर :
(ग) पुनर्जन्म होता है।

प्रश्न 76.
संस्कार या संस्कृति असल में शरीर का नहीं बल्कि –
(क) पुनर्जन्म का गुण है
(ख) आत्मा का गुण है
(ग) परमात्मा का गुण है
(घ) रूप का गुण है
उत्तर :
(ख) आत्मा का गुण है।

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प्रश्न 77.
हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ कब तक चलता रहता है ?
(क) सौ वर्षो तक
(ख) पाँच वर्षों तक
(ग) जन्म-जन्मांतर तक
(घ) केवल इसी जन्म तक
उत्तर :
(ग) जन्म-जन्मांतर तक ।

प्रश्न 78.
निम्नलिखित में से कौन हमारी संस्कृति का अंश नहीं है ?
(क) त्योहार मनाना
(ख) कपड़े पहनना
(ग) दोस्ती-दुश्मनी का सुलूक करना
(घ) महलों में रहना
उत्तर :
(घ) महलों में रहना।

पाठ्याधारित व्याकरण :

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WBBSE Class 9 Hindi संस्कृति है क्या? Summary

लेखक परिचय

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि, चिंतक, आलोचक, सफल प्रभावी वक्ता एवं लेखक श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म सन् 1908 में मुंगेर (बेगूसराय) जिले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था। सन् 1932 में इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद इन्होंने जीविका के लिए रजिस्ट्रारी और अध्यापन का कार्य भी किया।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या 12

कई वर्षो तक ये मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष-पद को सुशोभित करते रहे। आगे चलकर ये भागलपुर विश्वविद्यालय के उप-कुलपति पद पर भी रहे। स्वतंत्र भारत में राधाकृष्णन तथा नेहरू की छत्रछाया में ये पार्लियामेंट के सदस्य रहे। इसके साथ ही ये हिन्दी उत्थान और प्रचार-कार्य में भारत सरकार को हार्दिक सहयोग देते रहे।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

दिनकर की रचनाओं का विवरण इस प्रकार हैं –
काव्य-संग्रह : रेणुका, रसवंती, द्वन्द्वगीत, धूप-छाँह, सामधेनी, बापू, इतिहास के आँसू, चक्रवाल, ‘नील-कुसुम’।प्रमुख काव्य : कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, हुंकार, परशुराम की प्रतीक्षा, चक्रव्यूह, आत्मजयी, वाजश्रवा के बहाने।
आलोचना : मिट्टी की ओर।
संस्कृति का इतिहास : संस्कृति के चार अध्याय ।

पृष्ठ सं० – 46

  • लक्षणों = गुणों।
  • अंशों = भागों।
  • भिन्न = अलग।
  • व्याप्त = मौजूद, वर्तमान ।
  • अर्जित = प्राप्त ।

पृष्ठ सं० – 47

  • विनय = नम्रता।
  • सदाचार = अच्छा अचारण।
  • उपकरण = साधन, वस्तु।
  • उज = हर्ज।
  • वास करना = रहना।
  • हिचकिचाहट = शर्म, लज्जा।
  • प्रभाव = असर ।
  • स्थूल रूप = मोटे तौर ।
  • निरंतर = लगातार ।
  • राग = प्रेम।
  • द्वेष = जलन।
  • कामवासना = प्रकृतिदत्त = प्रकृति के द्वारा दिया गया।

पृष्ठ सं० – 49

  • सुलूक = व्यवहार।
  • आदान-प्रदान = लेन-देन।
  • दिवाला = । जलाशय = तालाब।
  • कूपमंडूकता = कुएँ का मेढक बने रहना, अपनी दुनिया को ही पूरी दुनिया समझ लेना।
  • अद्भुत = आश्चर्यजनक।
  • उत्स = स्रोत।
  • सुधारक = सुधार करने वाले।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

पृष्ठ सं० – 50

  • रिवाज = रीति, नियम।
  • जज्ब = आत्मसात करना, पचाना।
  • समन्वय = सामंजस्य, ताल-मेल।

WBBSE Class 9 Hindi रचना भाव विस्तार

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना भाव विस्तार to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi रचना भाव विस्तार

प्रश्न : भाव-पल्लवन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
किसी उक्ति, विचार अथवा वाक्य के मूलभाव को विस्तार के साथ समझाकर लिखना भाव-पल्लवन कहलाता है । कभी-कभी थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह दिया जाता है । इसी को ‘गागर में सागर’ भरना कहते हैं। इसी प्रकार की संक्षिप्त सटीक अभिव्यक्ति को विस्तार से प्रस्तुत करना ही भाव-पल्लवन है । मूलभाव को समझाने के लिए किसी उदाहरण, सहायक भाव, धारणा आदि का खण्डन या मण्डन करने के लिए भाव-पल्लवन का उपयोग करते हैं । इसमें मूलभाव की संदर्भगत संगति तथा निहितार्थ का विवेचन करने से भाव-पल्लवन की रचना का शिक्षण होता है। अन्त में सम्पूर्ण विचार में स्थित निहितार्थ या प्रेरणा संदेश लिखा जाता है। भाव-पल्लवन में भाषा, वाक्य गठन और शैलो का विशेष महत्व है। “होनहार बिरवान के होत चीकने पात”-जैसे गम्भीर अर्थ भरे कथनों का भाव-पल्लवन करा कर, शिक्षार्थियों को संक्षेप में कहीं गई किसी गम्भीर उक्ति या विचार को परत-दर-परत खोलना सिखाना भाव-पल्लवन शिक्षण कहलाता है ।

प्रश्न : भाव-पल्लवन के लिए किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
भाव-पल्लवन एक कला है । इसके लिए भाषा-ज्ञान की अपेक्षा होती है। विश्लेषण, तर्क-वितर्क और उचित निर्णय के बिना भाव-पल्लवन या भाव-विस्तार नहीं आ सकता। इसमें प्रारम्भ से ही अपनी बात खोलकर कहनी पड़ती है । प्रत्येक अंश को समझा-समझाकर कहना पड़ता है। नीर-क्षीर विवेक का प्रदर्शन करना पड़ता है और गुम्फित वाक्यों को तोड़कर सरल शब्दावली प्रस्तुत करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में छात्रों के लिए उपर्युक्त बातों पर ध्यान देना आवश्यक है ।

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प्रश्न : निम्नांकित पंक्तियों में निहित भाव का भाव-पल्लवन करें ।

1. ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ ।
(माध्यमिक परीक्षा – 2010)
उत्तर :
आधी भरी गगरी छलकती जाती है, परन्तु पूर्ण भरी गगरी नहीं छलकती है। तात्पर्य यह है कि अपूर्ण या कम ज्ञान बड़ा ही अस्थिर होता है, परन्तु विद्वान व्यक्ति में कभी अस्थिरता नहीं होती। समुद्र में कभी बाढ़ नहीं आती, परन्तु छांटी-छोटी नदियाँ तनिक भी वर्षा में उफनने लगती हैं। अल्प ज्ञान वाला व्यक्ति बना बनाया काम भी नाकामयाब कर देता है, परन्तु धैर्यवान, गम्भीर एवं विद्वान व्यक्ति सहज ही सफल हो जाते हैं। इसलिए अंग्रेजी में कहावत भी है कि कम ज्ञान सदा खतरनाक होता है । जीवन की पूर्णता अधूरा ज्ञान अर्जन में नहीं है, बल्कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में है। दिखावा या अपनेआप को प्रदर्शित करने से व्यक्ति हल्का हो जाता है, इसलिए ही तो कहा गया है कि अधजल गगरी छलकत जाय।

2. चोर की दाढ़ी में तिनका
(माध्यमिक परीक्षा – 2009)
उत्तर :
जो लोग दोषी होते हैं, वे क्षुब्ध और सशंकित होते हैं । इसलिए समय और परिस्थिति के साथ उनका मानसिक और स्वाभाविक संतुलन नहीं हो पाता है और वे पहचान लिए जाते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति का मुखमंडल उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दर्पण होता है, जिसमें उसके सम्पूर्ण जीवन प्रक्रियाएँ छाया के रूप में दिखाई पड़ती हैं। उसकी आत्मिक अशांति के कारण ही उसका चित्त अस्त-व्यस्त हो जाता है जिससे वह इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि अपने दुर्गुणों को स्वयं व्यक्त कर देता है।

3. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
(माध्यमिक परीक्षा – 2008)
उत्तर :
मनुष्य की मानसिक शक्ति वास्तव में उसकी इच्छा-शक्ति पर निर्भर करती है । मन के हारने पर ही मनुष्य हार जाता है तथा मन के जीतने पर मनुष्य जीत जाता है । मनुष्य की हार-जीत वास्तव में मन के अंदर ही निहित होती है। प्रबल इच्छा शक्ति के द्वारा मनुष्य एक बार मृत्यु को भी टाल सकता है । बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा आशा का दामन पकड़े रहता है तथा मन को हारने नहीं देता। विषम परिस्थितियों में भी अपना कार्य करते रहना तथा दृढताापूर्वक हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करना ही मनुष्य को महान बनती है ।

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4. अधिकार खोकर बैठ रहना यह महादुष्कर्म है
(मॉडल प्रश्न – 2007)
उत्तर :
मानव-जोवन में अधिकार एवं कर्त्तव्य दोनों साथ-साथ जीते व मरते हैं। अधिकार विरत होकर जीना, कोई जीना नहीं है। अधिकार का समानार्थी शब्द स्वाभिमान और आत्मशक्ति है। जहाँ अधिकार बोध है, वहीं स्वाभिमान भी है। अपन अधिकारों से वंचित रहना आत्म-गौरवहीनता का सूचक है। अतएव हमें अपने अधिकारों के रक्षार्थ जान तक की भी बाजी लगा देनी चाहिए । अधिकारों के प्रति सजग न रहने पर स्वेच्छारिता, निरकुशता तथा अन्याय की प्रवृक्ति सशक्त होती है । त्याग, तप और शान्ति के नाम पर अधिकार खोकर जीवित रहना, मृत्यु वरण करने के समान है। दिनकर के शब्दों में – छीनता है, स्वप्न कोई और तू, त्याग तप से काम ले, यह पाप है।

5. मानव का परिचय मानवपन
(मॉडल प्रश्न – 2007)
अथवा,
मनुष्य मात्र बन्धु है, यही बड़ा विवेक है
(माध्यमिक परीक्षा – 2013)
उत्तर :
इस संसार में अनेक प्रकार के जीवन हैं। सभी जीवों में मानव अपने बुद्धि के बल पर श्रेष्ठ माना जाता है सामान्य रूप से जो मनुष्य योनि में जन्म लेता है उसे मानव कहा जाता है । लेकिन वास्तव में वही मनुष्य मानव कहलाने का अधिकारी है जिनमें मानवता की भावना निहित होती है। अतः हमें अपने प्रेमभाव को और आत्मीयता को सभी मानव के बोच बॉंटना चाहिए। मानव समाज में सहयोग, परोपकार और सौहार्द्ध के भावना से देवतुल्य बन जाता है। मानव का परिचय उसकी जाति, धन और कुटुम्ब नहीं होता बल्कि उसका मानवपन ही होता है।

6. मनुष्य बन, मनुष्य के गले-गले मिले चलो ।
उत्तर :
मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। वह चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ है । मनुष्यता उसका आभूषण है। मानव योनि में जन्म लेकर भी अगर वह मानवीय गुणों से युक्त नहीं है, तो वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं होता। दया, धर्म, क्षमा, परोपकार, पर दुःख कातरता, श्रद्धा, सहानुभूति, सेवाभाव, कृतज्ञता, ममता, पारस्परिक प्रेम आदि गुणों को धारण करने के कारण ही वह श्रेष्ठ माना जाता है। मानव का यह पुनीत कर्म और धर्म है कि वह मानवीय गुणों से अपने को युक्त कर सच्चा मानव बनने का प्रयत्न करे। सदुगुणों को धारण कर मानव-मानव के बीच पारस्परिक प्रेम की गंगा बहाकर, एक-दूसरे को पेम की डोर में इस प्रकार बाँधने का कार्य करें कि ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, ऊँच-नीच, अमीरगरीब आदि का भेदभाव संसार में उत्पन्न ही न होने पाये। सभी लोग एक ही परमपपिता की संतान हैं। अतः विश्चिन्धुत्व वसुधैव कुटुम्बकम् की अविरल धारा सबके हुदय में समानरूप से प्रवाहित हो, इसके लिए सचेष्ट रहे । एकता, अखंडता, भाईचारे की यह भावना ही इस संसार को स्वर्ग का पर्याय बना सकती है।

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7. “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।”
अथवा,
“रहिमन यह तन सूप है लीजै जगत् पछोर”
उत्तर :
सज्जन व्यक्ति ज्ञानी की भाँति गुणग्राही (तत्व ग्राही) होता है । जिस प्रकार सूप हल्के तत्त्व-हीन छिछले एवं गन्दगी को दूर उड़ा देता है, और गुणकारी पदार्थ अपने पास रख लेता है, ठीक उसी प्रकार संत लोग (सज्जन-व्यक्ति) गुणों एवं अवगुणों से भरे हुए इस संसार से गुणों को ग्रहण कर अवगुणों को छोड़ देते हैं । संत लोग हंस की तरह नीरक्षीर विवेकी होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यदि हंस के सामने जल मिश्रित दूध रख दिया जाय तो वह दूध को ग्रहण कर लेता है, और जल को छोड़ देता है ।
तुलसीदास जी ने लिखा है ।

जड़-चेतन गुण-दोष मय, विश्व कीन्ह करतार ।
संत-हंस गुण गहहिं पय, परिहरि वारि विकार ।।

8. “मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे” ”
अथवा,
“अपने सुख को विस्तृत कर लो जग को सुखी बनाओ”
(माध्यमिक परीक्षा – 2011)
अथवा,
“परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर”
उत्तर :
संसार में मनुष्य के सम्मुख सुख-दुःख, लाभ-हानि इत्यादि स्थितियाँ सदैव आती रहती हैं। इन स्थितियों का सामना करते वक्त अनेक बार उसे दूसरों से सहायता की आवश्यकता पड़ती है, ऐसे समय में जो दूसरों को सुख देकर उसका भला करता है, तो इससे बढ़कर धर्म का कार्य और कुछ नहीं है । इसके विपरीत अनेक बार व्यक्ति दूसरों को अनायास ही कष्ट देकर उसे और दु:खी बनाता है, अथवी कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो दूसरों को कष्ट देकर स्वयं आनन्दित होते हैं। ऐसा करना सबसे बड़ा पाप है ।

अतः ठीक ही कहा गया है कि यदि मनुष्य दूसंरौ की भहलाई मे बलारद्धता है, वद्वी वास्तव में आस्तिक है । ईश्वर उसी की सहायता करते है, जो दूसरों की सहायता करते हैं ऐऐसे लोगों को सांसारिक सुख भी सहजता से उपलष्ध हो जाते हैं, इसके विपरीत दूसरों को सताने वाला स्वयं अनेक विपसियों को निमेंत्रण देता है । क्योंकि मनुष्य सदैव अपने कर्म का फल स्वयं भुगतता है। कहा भी गया है –
कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि से तस फल धाखा ।
इसीलिए मनुष्य को सदैव दूसरो का छपकार करना याधिए।

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9. हम बढ़े छधर कि जिधर सूस्ष्र बौ यु्रार ।
उत्तर :
जिस देश की भूमि पर हम घन्म लिए हैं और जिसकी रज में लोट-लोट कर हम बड़े हुए हैं अथवा जिसके । राष्प्र के संकाट के समब्ब राष्ट्र की रक्ष के सिए यदि हम अनने अस को यैस्धाषर नहीं करते हैं, तो हमारा जीवन जौना धिक्कार है तथा हम अपने देश के लिए भार स्वस्रूप हैं। इस संघ्य मे गोषाल प्रसाद ‘घ्यास’ जो कहते है कि-
वह खून कहो किस मवलन का, जिसमें छबखा्ल का भाम नहीं ।
वह खून कहो किस मतलब क्वा, आा सके देश के काम नहीं ।।

10. निज भाषा उन्नवि अहै, सब छन्नति को मूल ।
उत्तर :
कविवर भारतेन्दुजी की यह ठक्ति सर्षमान्य्य है कि अपनी मातृभापा की उन्नति एवं प्रगति में ही हमारे चतुर्दिक विकास का मूल मन्त्र क्षिपा हुआ है। अपनी मातृभाषा के साथ हमारा अत्यधिक गहरा लगाव है। यही भाषा हमारी संस्कृति परम्परा, जातीय इतिहास और अप्नी परिवेश की ठवज मानी जाती है । अपनी ही भाषा में हमारी संस्कृति बोलती है । परम्मा सांस लेती है और जातीय गौरव छंसता रहता है ।

यही भाषा हमारे मन एवं मस्तिष्क, द्वृय तथा चेतना को अनुकूल तथा स्वाभाविक खुराक देकर हमें सही उन्नति का मार्गदर्शन कराती है और हमारे ऊपर ऐतेहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, पारिवारिक तथा सामाजिक संस्कार का सही छाप छोड़ती है। इसी से हमारी अभिर्यक्ति स्वाभाविक स्वरूप पाती है। इसी से हमारे मन और प्राण को स्वाभाविक खुराक मिलती है। इसके विपरीत विदेशी भाषा व संस्कृति का अनुकूल प्रभाव हमारे मन पर कभी पड़ ही नहीं सकता । क्योंकि उसमें दूसरे देश की इतिहास और परम्परा होती है । इसलिए उसमें आत्मीयता का अभाव होता है । अत: हमें अपनी मातृभाषा से ही उन्नति का मार्ग प्राप्त हो सकता है।

11. करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान
उत्तर :
लगातार परिश्रम करते रहने से व्यक्ति को अवश्य सफलता मिलती है । इसीलिए केवल दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। यदि हम संकल्प कर लेते है कि हमें यह कार्य करना है तो हमारा वह कार्य अवश्य पूरा होगा, क्योंकि दृढ़ संकल्प के पश्चात् ही व्यक्ति सफल होने के लिए लगातार परिश्रम करेगा। लगातार कोई भी काम करते रहने से मनुष्य अवश्य सफल होता है । अतः सफल होने के लिए परिश्रिम करना अत्यंत आवश्यक होता है । कहा जाता है –

यदि व्यक्ति दृढ़ प्रतिज होकर कोई कार्य आरंभ करता है, तो माना जाता है कि उसका आधा काम पूरा हो गया और आधा काम परिश्रम के बल पर पूरा हो जाता है । इसके विपरीत दो नाव पर सवार व्यक्ति कभी पार नहीं पहुँच सकता है। इसी प्रकार अव्यर्वस्थित चित्त वाले मनुष्य की सफलता में सदा संदेह रहता है ।

अत: सब ‘तज हरि भज’ का अनुसरण करके सफलता प्राप्ति के हेतु व्यक्ति को लगातार परिश्रम करते हुए कार्य में संलग्न होना चाहिए। सफलता उसके चरण चूमेगी ।
आभरण निज देह का बस ज्ञान का भंडार है ।
हार को हीरा कहे उस बुद्धि को धिक्कार है ।

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12. अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
अथवा,
का बरषा जब कृषि सुखाने
उत्तर :
मनुष्य-जीवन मे यदा-कदा ऐसे क्षण आया-जाया करते हैं, जिसका सदुपयोग न कर पाने की कसक जीवन भर पीड़ित बनाया करती है । बीता हुआ क्षण पुन: लौट कर नहीं आता है । सुनहरे अवसर बार-बार नहीं मिलते । अत: चतुर एवं कर्मठ व्यक्ति ऐसे अवसरों को हाथ से नही जाने देना चाहते । उसकी आहट के लिये वे हर समय सतर्क एवं सजग रहते हैं और अवसर के आते ही वे उसका लाभ उठाने से नहीं चूकते । सच कहा गया है – ‘ का वर्षा जब कृषि सुखाने’ — फसल के सूख जाने पर यदि वृष्टि होती है तो उससे कोई लाभ नहीं होता। पष्योयों ने पकी फसल के दाने चुन डाले और उसके बाद किसान सुरका के उपाय करल है तो उससे बुगे हुए दाने वापस नहों भिलने । फसल की सुरक्षा के उपाय पहले से ही करने पड़ते हैं। जीवन में सफलता प्राप्ति का सरलतम उपाय यही है कि अवसर को पहचान कर उसका सदुपयोग किया जाय ।

13. निन्दक निबरे राखिये, आँगन कुटी ह्वाव
उत्तर :
मनुष्य स्वभाष से आत्म-प्रशासा-प्रिय होता है । अपने सम्बन्ध में औरों के द्वारा की गई प्रशंसा उसे आनन्द और उल्लास ग्रदान करती है । यह मानवीय कमजोरी है कि अपनी निन्दा भी नहीं सुताती, कह अरशः सत्य ही क्यों न हो । दूसरी और प्रशंसा चाहे कैसी भी क्यों न हो उसे इतनी अच्छी लगती है कि कह अनहित को हित और शत्रु को भो मित्र समझने लगता है । मिथ्या प्रशंसा से अभिदूतत हो उठने वाले की विवेक शक्कि कुज्ठित हो जाती है और वह भलेबुरे की पहचान खो वैठता है। ऐसे लोगों के परतन रव विनाश का मार्ग सहज ही हुल आता है।

मिथ्या प्रशंसा सुन-सुन कर व्यक्ति अपनी मानसिक तथा चारित्रिक कमओरिवो की और ध्यान नहीं दे पाता और वही प्रवृष्ति धातक सिद्ध होती है। अतः निन्दको की उपेक्षा न करके उनकी बातों पर गम्भीरता से विचार करना ही वुद्धिभानी है । यदि उनमें सच्चाई हो तो उनका स्वागत करना चाहिए और जिन बुराइयों की और निन्दक ने संकेत किया हो उन्हें दूर कर अपने व्यक्तित्व को शुद्ध एवं स्वस्थ बनाना चाहिए ।

निन्दकों की कृपा से ही हम अपनी त्रुटियों को जान पाते हैं । इसलिए कबीर जैसे सन्त पुरुष ने सलाह दो है कि निन्दक को अपने ही निकट शरण देनी चाहिए, ताकि बिना साबुन और पानी के ही आचरण शुद्ध हो सके। प्रशंसा के अहितकर प्रभाव से स्वयं को बचाकर निन्दा के कल्याणकारी पक्ष का स्वागत ही व्यक्ति के चरित्र को विकास की सही दिशा प्रदान कर सकता है।

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14. जहाँ चाह, वहाँ राह
उत्तर :
इच्छा-शक्ति मनुष्य के लिए दैवी वरदान है, जो मानव-स्वभाव का अभिन्न अंग है । मनुष्य आशाआकांक्षाओं की प्रेरणा से ही जीवन को गति प्रदान करता है । यदि मन में सच्ची लगन पैदा हो जाती है तो सफलता की प्राप्ति में कोई सन्देह नहीं रह जाता । जहाँ चाह होती है वहाँ राह अपने-आय उभर जाती है । आकाश झुक जाता है, पर्वतों में दरारें पड़ जाती हैं तथा सागर की छाती सूखने लगती है । प्रबल इच्छा-शक्ति का वेग आँधी-तूफान के वेग को भी शान्त और शिथिल बना देता है। प्रत्येक परिश्रमी, कर्मठ तथा कांतिकारी व्यक्तित्व प्रबल इच्छा की ही देन है। स्वर्ग से धरती पर गंगा को उतारने वाले भगीरथ हों, समुद्र की उफनती लहरों पर सेतु रचना करने वाले राम हों अथवा हँसते हुए सूली पर चढ़ जान वाले ईसा मसीह हों, सबमें अद्भुत इच्छा शक्ति थी।

15. दैव-दैव आलसी पुकारा
उत्तर :
आलस्य मानव-स्वभाव की ऐसी निकृष्ट विकृति है जो उसे सर्वथा अकर्मण्य बना देती है। आलसी व्यक्ति सदैव परमुखापेक्षी तथा दूसरों की कृपा-करुणा का आकांक्षी बना रहता है । उसके विकास के सारे मार्ग अवरुद्ध होते है तथा वह निरन्तर मानसिक ग्रंथियों एवं कुण्ठाओं से ग्रस्त रहता है । जीवन के वास्तविक उल्लास से वंचित होकर वह जीवित होते हुए भी मृतक के समान बन जाता है । आलस्य के दुष्मभाव को ध्यान में रखकर संस्कृत की एक सूक्ति में आलस्य को मनुष्य का परम शत्रु कहा गया है – “आलस्यं हि मनुष्यानां शरीरस्थो महान रिपु :”।

आलस्य की प्रवृत्ति व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के लिए एक समान घातक है, यह व्यक्ति की सम्पूर्ण कार्यक्षमता को जहरीली नागिन की तरह डँस लेती है । आलसी व्यक्ति की बुद्धि एवं विवेक शक्ति मन्द हो जाती है, उसका पौरुष-पराक्रम नष्ट हो जाता है तथा उसकी समस्त इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं, वह एक मद्धप की भाँत निष्किय बन जाता है । साधारणतः ऐसे व्यक्ति भाग्य और भगवान के भरोसे संत मलूक दास की पंक्तियाँ दुहराते रहते हैं-

“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम ।
दास मलूका कह गये सबके दाता राम ।।”

16. बड़े न हूजे गुनन बिन विरद बड़ाई पाय
उत्तर :
बड़पन के अभाव में कोई बड़ा नहीं बन सकता । चादुकारों की प्रशंसा अथवा निष्ठा प्रदर्शन से किसी व्यक्ति को बड़ाई मिल सकती है, बड़पन नहीं । खून लगाकर शहीद बनने वाले तथा भस्म लगाकर साधु बनने वाले ढोंगी कदमकदम पर मिल जाते हैं, किन्तु सच्चा शहीद अथवा सच्चा साधु तो लाखों में कोई एक होता है। भारत के राष्ट्रापिता गांधी के शरीर पर साधारण खादी की मोटी धोती थी तथा वे कोई धनवान अथवा उच्च पदासीन राजकीय अधिकारी न थे, किन्तु उन्हें विश्व के महान् पुरुषों में गिना जाता है। इसका एकमात्र कारण है आचार-विचार की पवित्रता तथा उच्चता । परोपकार, अहिंसा, करुणा, प्राणिमात्र के प्रति स्नेह, क्षमशीलता, स्वार्थत्याग, विनम्मता आदि एसं महान् गुण हैं, जिन्हें अपनाकर ही मनुष्य महान् बन सकता है । महानता गुणों की होती है, नाम की नहीं । मनुष्य के कार्य उसे महान् बनाते हैं, बातें नहीं ।

17. अधजल गगरी छलकत जाय ।
उत्तर :
आधी भरी गगरी छलकती जाती है, परन्तु पूर्ण भरी गगरी नहीं छलकती है । तात्पर्य यह है कि अपूर्ण या कम ज्ञान बड़ा ही अस्थिर होता है, परन्तु विद्वान व्यक्ति में कभी अस्थरता नहीं होती। समुद्र में कभी बढढ़ नहीं आती, परन्तु छोटी-छोटी नदियाँ तनिक भी वर्षा में उफनने लगती हैं। अल्प ज्ञान वाला व्यक्ति बना बनाया काम भी नाकामयाब्ब कर देता है, परन्तु धैर्यवान, गम्भीर एवं विद्वान व्यक्ति सहज ही सफल हो जाते हैं। इसलिए अंग्रेजी में कहावत भी है कि कम ज्ञान सदा खतरनाक होता है । जीवन की पूर्णता अधूरा ज्ञान अर्जन में नहीं है, बल्कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में है । दिखावा या अपने-आप को प्रदर्शित करने से व्यक्ति हल्का हो जाता है, इसलिए ही तो कहा गया है कि अधजल गगरी छलकत जाय।

18. जितेन्द्रियता चरित्र बल की कुंजी है ।
उत्तर :
‘जितेन्द्रिय’ का अर्थ है ‘अपनी इन्द्रियों को वश में रखना’ और इन्द्रियों को वश में रखकर ही चरित्र बल को उत्तम बनाया जा सकता है । चरित्र-बल मानव जीवन का प्रमुख अंग है। शारीरिक बल के नष्ट हो जाने पर उसे फिर से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन चरित्र बल नष्ट हो जाने पर उसे कभी भी जीवन में प्राप्त नही किया जा सकता है । चरित्रहीन व्यक्ति को समाज में कभी भी सम्मान प्राप्त नहीं होता । अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने इन्द्रियों को वश में रखकर अपने चरित्र को उत्तम बनाना चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में व्यक्तियों में सद्गुणों का आना असंभव है। अत: यह सष्ट है कि जितेन्द्रियता ही चरित्र बल की कुंजी है ।

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19. नर हो, न निराश करो मन को ।
उत्तर :
कवि मनुष्यों से यह कहना चाहते हैं कि आप मनुष्य होने के कारण वीर-साहसी, बुद्धिमान एवं कर्मशील भी हैं । आप निराश न होकर अपने कर्मपथ पर चलते रहिए । सदियों पुराने इतिहास में यह बताया गया है कि निराशा को त्यागकर मनुष्य ने जब जो कुछ चाहा वह उसे अवश्य मिला है । इसलिए यदि किसी कारणवश आप सफल नहीं हो रहे हैं, तो काई बात नहों, अभी भी निराशा को छोड़कर कर्त्तव्यपथ पर डटे रहिए सफलता अवश्य मिलेगी । सच ही कहा गया है कि –
प्रयत्नेन कार्य सुसिद्धिर्जनानाम्, प्रयत्नेन सद्बुद्धि वृद्धिर्जनानाम् ।
प्रयत्नेन युद्धेजयः स्याज्यनानाम्, प्रयत्नेन विधेयः प्रयत्नेनविधेय ।

20. “जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान ।”
(माध्यमिक परीक्षा – 2012)
उत्तर :
असताष के कारण आज कई सामाजिक कुरीतियाँ और दुराचरण मानव-समाज में घर कर गए हैं। इच्छाओं का दास बनकर नारी अपना तन, पुरूष अपना स्वाभिमान और ईमान बेच रहे हैं। बेटे बेचे जाते हैं, बहुएँ जलाई जाती हैं। मनुष्य और अधिक पाने की लालसा में भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूब गया है । धर्म हो या राजनीति हर क्षेत्र में भष्टाचार है । इसलिए ज्ञानियों, विद्वानों तथा सज्जनों का यह कथन ठीक ही प्रतीत होता है कि ‘जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरि समान’। अर्थात् सन्तुष्ट व्यक्ति के लिए सभी तरह के धन धूल-माटी के समान व्यर्थ होकर रह जाया करते हैं। जो व्यक्ति अपने को नाना प्रकार को बुराइयों से बचाकर रखना चाहता है, उसे केवल संतोष रूपी धन ही अर्जित करना चाहिए ।

21. “दे मन का उपहार सभी को, ले चल मन का भार अकेले ।”
(मॉडल प्रश्न – 2011)
उत्तर :
संसार में मनुष्य के सम्मुख सुख-दु:ख, लाभ-हानि इत्यादि स्थितियाँ सदैव आती रहती हैं । इन स्थितियों का सामना करते वक्त अनेक बार उसे दूसरों से सहायता की आवश्यकता पड़ती है, ऐसे समय में जो दूसरों को सुख देकर उसका भला करता है, तो इससे बढ़कर धर्म का कार्य और कुछ नहीं है । इसके विपरीत अनेक बार व्यक्ति दूसरों को अनायास ही कष्ट टेकर उसे और दुःखी बनाता है, अथवा कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो दूसरो को कष्ट देकर स्वयं आनन्दित होते हैं। ऐसा करना सबसे बड़ा पाप है ।

अत: ठीक ही कहा गया है कि यदि मनुष्य दूसरों की भलाई में लगा रहता है, वही वास्तव में आस्तिक है। ईश्वर उसी की सहायता करतं हैं, जो दूसरों की सहायता करते हैं। ऐसे लोगों को सांसारिक सुख भी सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं, इसके विपरीत दूसरों को सताने वाला स्वय अनेक विर्पत्तियों को निमंत्रण देता है। क्योंकि मनुष्य सदैव अपने कर्म का फल स्वयं भुगतता है । कहा भी गया है – ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।’ इसीलिए मनुष्य को सदैव दूसरों का उपकार करना चाहिए।

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22. ‘गतिशीलता ही जीवन है ।’
(मॉडल प्रश्न – 2011)
उत्तर :
इस क्षणभंगुर संसार की प्रत्येक वस्तु, चाये वह जड़ हो, या चेतन, परिवर्तनशील है। परिवर्तन या गतिशीलता का ही दूसरा नाम संसार है । यदि संसार में गति न हो तो मानव ऊब उठे। सुख-दुःख की धूप एवं छाया में संसार उठताबैठता है । परिवर्तन की महिमा का कहाँ तक वर्णन किया जाय । एक दिन भारत विश्वगुरु था, इसे ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। परतु आज भारत न सोने की चिड़िया है न विश्वगरु । इसी का नाम तो गतिशीलता है । यह परिवर्तन का क्रम सृष्टि में अनवरत रूप से चलता रहता है । कवि पंत ने संसार की इस गतिशीलता पर कहा है –
” आह रे, निष्ठुर परिवर्तन !
एक सौ वर्ष, नगर उपवन, एक सौ वर्ष विजन-वन
यही तो है संसार असार, सुजन, सिंचन, संहार !’’

WBBSE Class 9 Hindi रचना सूक्तिपरक निबंध

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना सूक्तिपरक निबंध to reinforce their learning.

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‘सादा जीवन, उच्च विचार’

‘सादा जीवन, उच्च विचार’, यह सूक्ति जीवन के दो अलग तथ्यों, रूपों को प्रदर्शित करने वाली होते हुए भी मूलत: एक ही सत्य को स्वरूपाकार देने या उजागर करने वाली है। सादा जीवन उन्हीं का हुआ करता है कि जो उच्च विचारशील व्यक्ति हुआ करते है या फिर उच्च विचार वाले व्यक्ति ही सादगी का रहस्य पहचान कर जीवन के रहन-सहन, खान-पान, कार्य-पद्धति आदि को सादा बना कर व्यवहार किया करते हैं। ऐसा कर के वे संसार के लिए आदर्श तो स्थापित करते ही हैं, आदरणीय एवं चिरस्मरणीय भी बन जाते हैं।

सादा जीवन जीने पर विश्वास करने वाला व्यक्ति ईर्ष्या-द्वेष जैसे उन मनो-विकारों से भी बचा रहता है कि जिन्होंने आज पूरी मानवता को आकान्त कर रखा है। उन निहित-स्वार्थों से भी सादगी पसन्द आक्रान्त नही हुआ करता कि जो अनेक प्रकार के भ्रष्टाचारों के कारण बन कर केवल अपने प्रति ही नहीं, सारे विश्व की मानवता के प्रति हीन और आकामक बना दिया करते हैं। स्पष्ट है कि सादे जीवन का मानवीय मूल्यों की दृष्टि से बहुत अधिक महत्व है। इसीलिए हम प्रत्येक ज्ञानी सन्त के जीवन को एकदम सीधा-सादा पाते हैं। आधुनिक युग पुरुष महात्मा गाँधी से बढ़ कर सादगी का और अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है ?

बिना विचारों की उच्चता के न तो आदमी की आत्मा ही ऊँची उठ सकती है और न ही वह कोई ऊँचा या महत्वपूर्ण कर्म करने के लिए ही अनुभाणित हो सकता है। उच्च विचारों से रहित व्यक्ति न तो स्वयं सामान्य स्तर से; सांसारिक ईर्ष्याद्वेष, माया-मोह आदि के मनोविकारों और ख्वार्थों से, दुनिया की झँझटों से छुटकारा पा सकता है। वह छोटी चीजों और बातों के लिए स्वयं तो झगड़ता रहेगा ही, दूसरों को भी लड़ाता-भिड़ाता रहेगा। इसी कारण सन्तजन सादगी के साथ-साथ विचार भी उच्च बनाए रखने की बात कहा और प्रेरणा दिया करते हैं।

संसार ने आज तक आध्यात्मिक, भौतिक, वैज्ञानिक क्षेत्रों में जितनी और जिस प्रकार की भी प्रगति की हैं; वह उच्च विचार एवं धारणाएँ बना कर ही की है। धारणाओं और विचारों को उच्च बनाए बिना जीवन-संसार के छोटे-बड़े किसी भी तरह के किसी आदर्श को प्राप्त कर पाना कतई संभव नहीं हुआ करता। श्रेष्ठ एवं उच्च विचार होने पर सहज सामान्य को तो पाया ही जा सकता है। उच्च शिखर का लक्ष्य सामने रख कर चढ़ाई कर देने पर यदि उसे नहीं, तो उससे कम ऊँचे शिखर तक तो पहुँचा ही जा सकता है। इसलिए उन्नति और सफलता के इच्छुक व्यक्ति को अपनी चेतना को हीन भावों-विचारों से प्रस्त कभी नहीं होने देना चाहिए।

इस प्रकांर स्पष्ट है कि शीर्षक-सूक्ति के दोनों भाग ऊपर से अलग-अलग प्रतीत होते हुए भी अपनी अन्तरात्मा में एक ही सत्य को निहित किए हुए है। वह सत्य केवल इतना ओर यही है कि जीवन में सादगी अपना कर ही उच्च विचार बनाए और पाए जा सकते हैं। इस प्रकार के सादगी और उच्च विचारों से सम्पन्न कर्मयोगियों ने ही संसार को भिन्न आध्यात्मिक एवं भौतिक क्षेत्रों में हुई प्रगति के आदान दिए हैं।

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‘साँच बराबर तप नहीं’
अथवा, ‘जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप’

सन्त कबीर द्वारा रचे गए इस दोहे का पूर्ण रूप इस प्रकार है :-

‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप।

इस नाशवान और तरह-तरह की बुराइयों से भरे संसार में सच बोलना सबसे बड़ी और सहज-सरल तपस्या हैं। सत्य बोलने, सच्चा व्यवहार करने और सत्य मार्ग पर चलने से बढ़ कर और कोई तपस्या है, न हो ही सकती है। इसके विपरीत जिसे पाप कहा जाता है या जो अनेक प्रकार के पाप-कर्म माने गए हैं; बात-बात पर झूठ बोलते रहना; छल-कपट और झूठ से भरा व्यवहार तथा आचरण करना उन सभी से बड़ा पाप है।

जिस किसी व्यक्ति के हृदय में सत्य का वास होता है अर्थात् जिस का आचरण एवं व्यवहार सब तरह से सत्य पर ही आधारित रहा करता है, ईश्वर स्वयं उसके हदय में निवास किया करते हैं। अर्थात् सत्य व्यवहार करने वाले व्यक्ति पर सब तरह से ईश्वर की दयादृष्टि एवं कृपा बनी रहा करती है। इसके विपरीत मिथ्याचरण-व्यवहार करने वाला, हर बात में झूठ का सहारा लेने वाला व्यक्ति न तो चिन्ताओं से छुटकारा प्राप्त कर पाता है, न प्रभु की कृपा का अधिकारी ही बना करता है। सत्य के साधक और व्यवहारक के सामने हर कदम पर अनेकविध कठिनाइयाँ आया करती हैं।

उसे कदम-कदम पर विरोधों, विघ्न-बाधाओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके अपने भी उस सब से घबरा कर साथ छोड़ सकते क्या, अक्सर छोड़ दिया करते हैं। सब तरह के दबाव और कष्ट झेलते हुए सत्य के शोधक और उपासक को अपनी राह पर एक अकेले ही चलना पड़ता है। जो सत्याराधक इन सब की परवाह न करते हुए भी अपनी राह पर दृढ़ता से स्थिर-अटल रह निरनतर बढ़ता रहता है, उसका कार्य किसी भी तरह तप करने से कम महत्वपूर्ण नहीं रेखांकित किया जा सकता। इन्हीं सब तथ्यों के आलोक में सत्य के परम आराधक कवि ने अपने व्यापक एवं प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य को सबसे बड़ा तप उचित ही कहा है।

इसके बाद अनुभव-सिद्ध आधार पर ही कवि सूक्ति के दूसरे पक्ष पर आता है। दूसरे पक्ष में उसने ‘झूठ बराबर पाप’ कह कर झूठ बोलने या मिथ्या व्यवहार करने को संसार का सब से बड़ा पाप कहा हैं। गम्भीरता से विचार करने पर हम पाते हैं कि कथन में वजन तो है ही, जीवन-समाज का बहुत बड़ा यथार्थ भी अन्तर्हित है। यदि व्यक्ति अपनी कमी या बुराई को छिपाता नहीं; बल्कि स्वीकार कर लेता है, तो उसमें सुधार की प्रत्येक संभावना बनी रहती है। लेकिन मानव अपने स्वभाव में बड़ा ही कमजोर और डरपोक हुआ करता है।

वह सच्चाई, कमी या बुराई को छिपाने के लिए अक्सर झूठ का सहारा लिया करता है। बस, जब एक बार झूठ बोल दिया, तो फिर उस एक झूठ को छिपाने के लिए उसे एक-के बाद-एक लगातार झूठ की राह पर बढ़ते-जाने के लिए विवश होते जाना पड़ता है। फिर किसी भी तरह झूठों अर झूठे व्यवहारों से पिण्ड छुड़ा पाना प्राय: असम्भव हो जाया करता है। जीवन जीते-जी नरक बन जाया करता है। आदमी सभी की घृणा का पात्र बन कर रह जाता है।

आदमी का हर तरह का व्यवहार हमेशा सत्यमय एवं सत्य पर आधारित रहना चाहिए। झूठ का सहारा कभी भूल कर भी नहीं लेना चाहिए। गलती हो जाने पर भी यदि व्यक्ति सब-कुछ सच-सच प्रकट कर देता है, तो उसके सुधार की प्रत्येक सम्भावना उसी प्रकार बनी रह सकती है कि जिस तरह डॉक्टर के समक्ष रोग प्रकट हो जाने पर उसका इलाज संभव हो जाा करता है। यदि रोग प्रकट नहीं होगा, तो भीतर-ही-भीतर व्यक्ति के शरीर को सड़ा-गला कर नष्ट कर देगा। उसी प्रकार यदि झूठ का सहारा लेकर बुराई को छिपाया जाएगा, तो जीवन फिर असत्य व्यवहारों का पुलिन्दा बन कर रह जाएगा और बुराइयों का परिहार कभी भी कतई संभव नहीं हो पाएगा।

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‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’
(माध्य्यमिक परीक्षा – 2010)

मज़हब यानि धर्म, सभी ने इन्हें अपने प्रन्थों में बड़ा पवित्र माना और उच्च महत्व दिया है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि ये तो दंगे-फसाद और सिर-फुटौवल हो जाया करते हैं, जिन्हें मज़ही दंगे, जातिगत फसाद या धार्मिक उन्माद कह कर पारिभाषित किया जाता है, वे सब क्या है ? क्यों होते रहते हैं ? क्या वे जरूरी हैं ? क्या इन्हें टाला नहीं जा सकता है ?

मज़हब, जाति और धर्म जब कट्टरता का आवरण पहन कर भीतर से बाहर आ जाया करता है अर्थात् बाह्याचारव्यवहार बन कर अपनी श्रेष्ठता का प्रतिपादन और दूरों के प्रति हेयता का प्रचार-प्रसार करने लगता है, तभी वह दंगेफसाद आदि का कारण बन जाया करता है। जहाँ तक अपने को श्रेष्ठ बताने की बात है, वहाँ तक तो ठीक है और सहनीय भी हो सकती है; पर होता यह है कि हम अपनी बात दूसरों पर थोपने का प्रयत्न करने लगते हैं। जब यों नहीं थोप पाते तो भावनाओं में वह कर उसे बलात् दूसरों पर आरोपित करने लगते हैं।

यह एक वास्तविकता है कि मज़बी-उन्माद भारतीय न होकर बाहर से आई वस्तु है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति तो आरम्भ से ही ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धान्त को मानने वाली रही है। तभी तो कोल-मंगोल, हूण आदि कितने ही आक्रमणकारी यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। कुछ इस तरह घुल-मिल गए कि आज उनकी कोई अलग पहचान तक शेष नहीं रह गई है।

कोई भी मज़हब यह नहीं सिखाता कि आपस में एक-दूसरे का सिर भी फोड़ों और देश या राष्ट्र को भी तोड़ों। इस प्रकार की तोड़-फोड़ की शिक्षा या प्रेरणा देने वाले तत्व वास्तव में मज़हबी एवं धार्मिक तो कभी भी नहीं हुआ करते। निश्चय ही मात्र स्वार्थी तत्व हुआ करते हैं। अंग्रेज क्योंकि भारत को गुलाम बनाए रखना चाहते थे। इस कारण उन्होंने अपनी ‘बाँटों और राज करो’ नीति के तहत भारत में मज़हबी जुनून इस सीमा तक जगाया कि भारत-विभाजन हो जाने के इतने वर्षों बाद भी वह कायम है या उसे निहित स्वार्थी देशी-विदेशी तत्वों द्वारा उसे कायम रखने का षड्यंत्रपूर्ण प्रयास किया जा रहा है। लेकिन स्वतंत्रता-संघर्ष के उन दिनों में शायर अलामा इकबाल का यह कथन जितना सत्य-स्मरणीय था, आज भी है कि

“‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिन्दी हैं हम, वतन है, हिन्दोस्ताँ हमारा।”

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‘जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान’
अथवा, ‘संतोष सबसे बड़ा धन है’

मनुष्य की इच्छा दुनिया में विद्यमान प्रत्येक वसु को पा लेने की हुआ करती है, चाहे उसके हाथ या पहुँच में कुछ हो, या न हो। ये एक साथ सब कुछ पा लेने की इच्छाएँ ही उसे भड़काया और भटकाया करती हैं। इस भड़काव ओर भटकाव के फलस्वरूप जन्म लेता है आदमी का यह असन्तोष का भाव, जो कभी भी सुख-चैन से नहीं बैठने दिया करता और सभी प्रकार की उपाधियों की जड़ है।

आज जीवन और संसार में चारों ओर असन्तोष का व्यापक साम्राज्य छाया हुआ दिखाई देता है। सामान्य-विशेष, छोटेबड़े सभी असन्तुष्ट हैं। इसी कारण सभी स्वार्थ-पीड़ित हो कर, आपाधापी और हिंसा का शस्त्र थाम कर वह सब पा लेना चाहते हैं जो कभी मिल नहीं सकता।फलस्वरूप तरह-तरह के प्रष्टाचार, रिश्वत, काला बाजार, और भी न जाने कितने प्रकार के अनैतिक धन्धे एवं राजगार चारों ओर छा कर आम आदमी का दम घोट देना चाहते हैं। कोई व्यक्ति किसी अन्य को आगे बढ़ते हुए न तो देख पाता है और न सहन ही कर सकता है। इस तरह का असहिष्णुता का भाव कई प्रकार के संघर्षों को जन्म दे रहा है।

आज के आदमी ने अपनी इच्छाओं का विस्तर सुदूर क्षितिज से भी कहीं आगे तक कर लिया है। उन्हें पूरी करने के लिए मनुष्य ने अपना हुदय, हृदय में स्थित भाव-लोक, सहदयता, प्रेम और भाईचारा सभी कुछ बेच खाया है। वह टाँग खींच कर, दूसरों को नीचे गिरा या पीछे धकेल कर भी स्वयं आप-यानि एक अकेला आगे बढ़ जाना चाहता है। आगे बढ़ने पर चाहे उसे मुँह की खानी पड़े, माथा टक्रा कर ओधे मुँह गिरना पड़े, तब भी इच्छाओं-वासनाओं के हाथों का खिलौना बन कर अपने-आप में, अपने वर्तमान में सब-कुछ रहते हुए भी असन्तुष्ट मानव बस आगे ही बढ़ते जाना चाहता है। कहाँ तक और कितना आगे, इस सब का स्यात् उसे भी कतई कुछ ज्ञान नहीं है।

एक वाक्य में यदि कहा जाए, तो अपने सीमित साधनों में ही सन्तुष्ट रहने में ही जीवन के समस्त सुखों का सार तत्व है। जो व्यक्ति इस सन्तोष रूपी धन को अर्जित कर लिया करता है, उसे फिर ओर किसी भी वस्तु की, व्यर्थ की भाग-दौड़ की कतई कोई आवश्यकता नहीं हर जाया करती है। अत: मनुष्य को शेष सभी के व्यर्थ के चक्कर छोड़ कर मात्र सन्तोष रूपी धन अर्जित करने का प्रयास करना चाहिए।

ज्ञानियों, विद्वानों, सज्जनों का अनुभव के आधार पर यह कहना सर्वथा उचित ही प्रतीत होता है कि ‘जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरि समान’ अर्थात् सन्तुष्ट व्यक्ति के लिए संसार के सभी तरह के धन एकदम धूल-माटी के समान व्यर्थ होकर रह जाया करते हैं।

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‘अविवेक विपत्तियों का जनक है’
अथवा, ‘जहँ सुमति तहं सम्पत्ति नाना’

जहाँ अविवेक होता है वहाँ दरिद्रता निवास करती है तथा जहाँ विवेक का वास होता है, वहीं पर लक्ष्मी, सुख और शांति निवास करती है। विवेक से धन-धान्य, सुख-संपत्ति तथा यश-गौरव स्वयं ही खिंचे चले आते हैं। इसीलिए तुलसीदास ने लिखा है –

जहँ सुमति तहं सम्पत्ति नाना।
जहँ कुमति तहं विपत्ति निदाना।।

मनुष्य विवेकर्शील है, अच्छे-बुरे कार्य और उसके परिणाम पर विचार कर सकता है, इसी कारण वह पशु न होकर उससे भिन्न एवं ऊँचा है। नहीं तो आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि शेष सभी तरह को क्रियाएँ मनुष्य एवं पशु में एक समान ही हुआ करतो हैं। मनुष्य अपने-पराये में विभेद भी कर सकता है और धर्म-अधर्म का स्वरूप एवं महत्त्व भी जान-पहचान सकता है, इसी कारण वह विवेकशील प्राणी है। विवेक के बल पर मनुष्य जीवन-समाज के बनाए हुए और स्वयं बन एग सभी नियमों का पालन कर सभी उन्नति और विकास में सहायक बन सकता है और फिर अपने एवं सभी के अधिकारों को पाने या रक्षा के लिए संघर्ष भी कर सकता है। इस प्रकार जीवन-समाज के सभी तरह के सम्बन्धोंसरकारों, प्रगति और विकास का मूलाधार विवेक ही है।

राजपूत वीर तो बहुत हुआ करते थे; पर विवेकसम्मत निर्णय ले पाने की सामर्थ्य नहीं रखा करते थे। इस कारण उनके अपने ही दकम उनके नाश और अधोगति का कारण बनते रहे। यदि वे नीतिवान और विवेकसम्मत निर्णय ले पाने की शक्ति से भी सम्पन्न होते, तो भारत को शतियों तक पराधीनता के कारण जिस दुर्गति का शिकार होना पड़ा, वह न होती। मराठे यदि ग्वालियर की सामान्य विजय से आनन्दोन्मत न हो गए होते, उन्होंने पुरुष होने का अहकार त्याग एक नारी झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई का परामर्श एवं नेतृत्व स्वीकार कर लिया होता, तो बहुत सम्भव है सन् 1857 का स्वतंत्रता-संघर्ष यों असफल न हो गया होता।

इस सारे विवेचन-विश्लेषण के बाद हम कहना मात्र यही चाहते हैं कि न कभी विवेक दामन अपने हाथ से खिसकने दीजिए और न ही तरह-तरह की विपत्तियों को पास फटकने का अवसर प्रदान कीजिए। विवेक-विचार की ऊर्ध्वमुखी मशाल जला कर हमेशा हाथों में थामें रखिए और निश्चिन्त होकर प्रगति और विकास के अविरत पथ पर बढ़ते चलिए। विवेक रूपी मशाल हाथ में रहने पर अविवेकजन्य विपत्तियों का अन्धकार कभी भी पास नहीं फटक पाएगा।

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‘कर्म-प्रधान विश्व रचिराखा’

प्राकृतिक नियम और आत्मिक प्रेरणा से संसार का छोटा-बड़ा हर प्राणी किसी-न-किसी यानि अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप कर्म में निरत रहा करता है। संसार की रचना का मूल उद्देश्य ही अनवरत कर्म कर के, सभी प्रकार के ॠणों से मुक्त होकर जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति या छुटकारा पाना है।

संसार का तुच्छ-से-तुच्छ प्रणी और पदार्थ भी अपने कर्म में लगा रहता है। वृक्ष स्वत: या प्राकृतिक नियम से डोल कर अपने आनन्द-भाव को तो प्रकट किया ही करते हैं संसार को हरियाली, फल-फूल और प्राणवायु भी देते रहते हैं। ऐसा सब करना ही उन का कार्य है और करते रहना ही उनकी मुक्ति है। संसार में वस्तुत: कर्म ही मुक्ति और मुक्ति ही कर्म है। बादल जिन नदियों, सागरों, सरोवरों आदि के जल से बना करते हैं, अपने अस्तित्व एवं व्यक्तित्व को मिटा कर उन सभी को वर्षा से दुबारा भरते रह कर ही कृत्कार्य होते रहते हैं। जाने उनका यह कर्ममय मुक्ति का क्रम कब से चला आ रहा है। तब तक निरन्तर चलता रहेगा कि जब तक यह धराधाम, यह हमारा दृश्य संसार विध्यमान, है।

संसार में सुखों का अधिकारी केवल कर्मवीर व्यक्ति ही हुआ करता है, कर्म से जी चुराने वाला कभी नहीं। वह तो जीते-जो नरक की आग में जलने, विषम यातनाएँ भोगने के लिए बाध्य हुआ करता है। कहावत है कि चलने वाला ही कहीं पहुँच पाता है , राह के किनारे बैठा रहने वाला नहीं। सागर के गहरे में उतर कर गोता लगाने वाला ही भीतर से निकाल कर मोती बाहर ला पाता है, मात्र किनारे बैठ कर यह प्रतीक्षा करते रहने वाला नहीं कि कब भीतर से कोई बवण्डर उभर का मोती बाहर फेंक जाए। ठीक उसी तरह से कर्म-सागर में कूद कर ही इस संसार में सफलता का सुख को मोंती पाया जा सकता है, अन्य किसी भी उपाय से नहीं। संसार में आज हमें जो कई तरह की उन्नति, प्रगति और विकास के उच्च शिख़र दीख पड़ रहे हैं, उन का निर्माण कर्म पर विश्वास रख उसमें जुट जाने वाले कर्मठ व्यक्तियों ने ही किया है। बातों के धनियों या बैठे-बैंठे उबासियाँ लेते हुए हाथों की उँगलियाँ तोड़ते-मरोड़ते रहने वालों ने नहीं।

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‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’

परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

तुलसीदास की यह चौपाई इस कथन का रूपान्तर है –

अष्ठादश पुरापेषु व्यासस्य वचनद्वयम
परोपकार पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥

अठारह पुराणों में व्यास ने दो ही बातें कही हैं – “परोपकार से पुण्य प्राप्त होता है और दूसरों को कष्ट पहुँचाने से पाप होता है।”

आज का नव धनाढ्य वर्ग परोपकार को घृणा की दृष्टि से देखता है फिर भी वह दिखावे के लिए कुछ परोपकार का कार्य करता है ताकि आयकर में चोटी की जा सके। धर्म का वास्तविक अर्थ हुआ करता है उदात मानवीय सद्गुणों का विकास कर उन्हें अपने में धारण करने की क्षमता अर्जित करना। तभी तो ‘धर्म’ की परिभाषा की जाती है कि ‘धारयते इतिह धर्म:’ अर्थात् जिसमें धारण कर पाने की शक्ति हो वही धर्म है, यह सफल-सार्थक हो सकती है।

सभी तरह के उदात एवं उदार सुद्युणों को धारण कर पाने की शक्ति। इस शक्ति से सम्पन्न रहने के कारण ही मनुष्य अपने भीतर भिन्न प्रकार की धार्मिक प्रवृत्तियों कां विकास कर पाता है। उन वृत्तियों में एक महानतम वृत्त है परोपकार करने की। कविवर तुलसीदास ने इसी प्रवृत्ति को महत्व देते हुए, महत्वपूर्ण मानते हुए अपनी महानतम रचना ‘रामचरितमानस’ में एक विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न पात्र के मुख से यह कहलवाया है कि- ‘पर-हित सरिस धर्म नहिं भाई।’ अर्थात् हे भाई, परापकार से बढ़ कर मनुष्य के लिए अन्य कोई धर्म नहीं। संस्कृत में भी इस प्रकार की एक सूक्ति मिलती है। उसके अनुसार- ‘परोपकाराय सत्तां विभूतय:’ अर्थात् सज्जनों द्वारा अर्जित सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ अपने सुख-भोग के लिए न होकर परोपकार या पर-हित-साधन के लिए ही हुआ करती है।

मानव-जीवन की सार्थकता का वास्तविक मानदण्ड यही है कि वह पर-हित-साधन में इस सीमा तक आगे बढ़े कि दूसरो को भी अपने समान, अपने जैसा यानि साधन-सम्पन्न बना दे। शास्त्रीय शब्दों में मानवता का ऋण से मुक्ति पाने का प्रयास परोपकार है और परोपकार सब से बड़ा धर्म। ऐसा धर्म कि जिस की साधना के लिए कहीं जाने आने की कतई कोई जरूरत नहीं, जो सहज साध्य एवं सर्व सुलभ है।

आज दु:खद स्थिति है कि परोपकार के नाम पर लोगों को उल्लू बनाया जा रह है। इस भ्रष्ट व्यवस्था में परहित की बात कौन करें वश चले तो देश को भी बेच डालने में परहेज नहीं। शिकायत किससे की जाय क्योंकि –

बरबाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्नू काफी था।
अंजामे गुलिस्तां क्या होगा, हर शाख पे उल्लू बैठा है।

‘जो तोकूँ काँटा बुए, ताही बोई तू फूल’

सूक्किपरक शीर्षक पंक्ति सन्त कबीर के एक प्रसिद्ध दोहे की पंक्ति है –

”जो तेकूँ काँटा बुए, ताही बोई तू फूल।
तोके फूल-तो-फूल हैं, वाको हैं तिरशूल।।

अर्थात् यदि तेरी राह में कोई काँटे बोता है, तो भी तू बदला लेने की इच्छा से उसकी राह में काँटे मत बो; बल्कि काँटों के स्थान पर अपनी तरफ से फूल ही बोने का प्रयास कर। ऐसा करने पर तुझे तो फूल बोने के कारण बदले में फूल ही फूल प्राप्त होंगे, जबकि काँटे बोने वाले को बदले में काँटे ही मिल पाएँगे। इस सामान्य अर्थ से प्राप्त होने वाला व्याख्यापरक ध्वन्यर्थ यह है कि संसार में रहते हुए यदि कोई व्यक्ति तुम्हारा उपकार या बुरा करता है, तब भी तुम उसका अपनी ओर से भला ही करो। अन्ततोगत्वा भला करने वाले का भला होगा, जबकि बुरा करने वाला अपने बुरे किए का फल बुरा प्राप्त करेगा। इस उक्ति का अर्थ और प्रयोजन व्यक्ति की चेतना को बुरों और बुराइयों से विमुख कर अच्छों और अच्छाइयों की तरपु उन्मुख करना ही है। व्यक्ति को अपने भले के लिए, अन्तिम लाभ के लिए सन्मार्ग पर चलने, कुमार्ग का त्याग करने की प्रेरणा देना ही है।

प्रकृति का सामान्य नियम भी यही है कि बबूल बोने पर आम खाने के लिए नही मिल सकते। आम खाने की इच्छा हो, तो आम के पौधे ही रोपने पड़ेंगे।

आदमी स्वभाव, गुण और कर्म से वास्तव में बड़ा दुर्बल प्राणी है। उसपर बुराई का प्रभाव बड़ी जल्दी पड़ा करता है, जब अच्छाई का प्रभाव पड़ते-पड़ते ही पड़ा करता है। अच्छाई साधना और तत्पश्चर्या से प्राप्त हुआ करती है, जब की गण्डाई या दुष्टता यों ही प्राप्त हो जाया करती है। स्वभाव से पानी की तरह ढलान यानि सरलता की ओर अच्छा बन कर मौनभाव से अच्छाई करते जाने का मार्ग काफी कठिन एवं कष्ट साध्य है। इसी कारण व्यक्ति अच्छा करते-करते अकसर फिसल जाया करता है। बुरे मार्ग पर चलने और बुरा करने के लिए सरलता से तत्पर हो जाया करता है। सो सूक्तिकार व्यक्ति को चारित्रिक दृढ़ता का उपदेश देकर सभी के हित और सुख-साधन की कामना से अनुप्राणित होकर ही काँटे बोने अर्थात् बुरा करने वालों की राह में भी फूल बोने अर्थात् भलाई और प्यार करने की प्रेरणा देना चाहता है।

कटुता से कटुता बढ़ती है, क्रोध से क्रोध बढ़ता है। बैर को प्रेम से ही जीता जा सकता है। जो किसी के बारे में बुरा नहीं सोचता, वही वास्तविक सुख और शांति का अनुभव करता है। ईष्या की आग और द्वेष का धुआँ उससे कोसों दूर रहता है। कवि रहीम ने भी लिखा है –

प्रीति रीति सब सों भली, बैर न हित मित गोत।
रहिमन याही जनम में बहुरि न संगति होत।।

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‘हानि-लाभ, जीवन-मरण,
यश-अपयश विधि-हाथ’

मानव के सभी शुभ कार्यों पर नियंत्रण करने वाली कोई और शक्ति है, जिसके आगे बड़े-बड़े विद्वानों को भी नतमस्तक होना पड़ता है। मानव की प्रिय वस्तुएँ जीवन, यश और लाभ ही है। लेकिन वह न इन्हें बना सकता है और न मिटा सकता है, कोई और ही शक्ति है जो सबको नियंत्रण में रखती है। अन्यथा बड़े-बड़े महाराजाधिराज जिनकी शक्तिसमृद्धि का सब लोहा मानते थे – वे मृत्यु की गोद में क्यों चले जाते ? इन्हीं सब कारणों से तुलसीदास ने लिखा है कि-

“हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि-हाथ।”

अर्थात् जनम से लेकर मृत्यु तक आदमी हानि-लाभ, यश-अपयश जो कुछ भी अर्जित कर पाता है, उसमें उसका अपना वश या हाथ कतई कुछ नहीं रहा करता। विधाता की जब जैसी इच्छा हुआ करती है, तब उसे उसी प्रकार की लाभ-हानि तो उठानी ही पड़ती है, मान-अपमान भी सहना पड़ता है।

कई बार मनुष्य कोई अच्छा कर्म इसलिए करता है कि उसका परिणाम मान-यश बढ़ाने वाला होगा। सो वह उस कर्म को करता जाता है; पर उसके विरोधी पैदा होकर उसके सारे परिश्रम को व्यर्थ कर देते हैं। उसे मान की जगह अपमान और यश की जगह अपयश भोगने को विवश होना पड़ता है।

इस प्रकार यह मान्यता स्वीकार कर ही लेनी चाहिए कि आदमी के अपने हाथ में कुछ नहीं है। जो कुछ हैं, वह विधि के हथ में ही है। वही संसारकर्ता, भर्त्रा और हरता सभी कुछ है। उसी की इच्छा-अनिच्छा और लीला का परिणाम है यह दृश्य जगत। इस का कण-कण उसी से संचालित हुआ करता है। उसी की इच्छा से हवा चलती है, बादल बरसते हैं। चाँद-सूर्य-तारे कम से आते-जाते हैं। वहीं यश-अपयश, मान-सम्मान आदि हर बात कर कर्ता और दाता है। इसी ओर संकेत करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा था – “अपना भला-बुरा सब-कुछ मेरे अर्पित कर दो। तुम केवल कर्त्तव्य कर्म मेरा ही आदेश मान कर करते जाओ।’सो कवि का भी यहाँ यही आशय है किहानि-लाभ, यश-अपयश आदि सभी को भगवान् के हाथ में मान कर अपने कर्त्तव्यों का पालन करते जाओ-बस!”

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‘नर हो, न निराश करो मन को’

जब हम महापुरुषों के जीवन-चरित को पढ़ते हैं तब हमें आश्चर्य होता है कि इन व्यक्तियों में ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उन्होंने कल्पनातीत कार्य कर दिखाया। पता चलता है कि वह शक्ति थी – उनका मनोबल, जिसने उन्हें असाधारण व्यक्तियों की श्रेणी में लाकर खड़ाकर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या थोड़े से वीर मरहठों को लेकर वीर शिवाजी और कंकाल के पुतले महात्मा गाँधी वह सब कर पाते जो उन्होंने कर दिखाया। ऐसे अनेक उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ करता है उसके पीछे उसकी मानसिक शक्ति ही होती है। अगर मानसिक शक्ति दृढ़ तो एक बार मौत भी हार जाती है।

जिस दिन नर मनुष्य निराश या सन्तुष्ट होकर बैठ जाएगा, उस दिन वास्तव में सृष्टि का विकास ही रुक जाएगा, इस बात में तनिक भी सदेह नहीं। निराशा या उदासी यदि जीवन के तथ्य होते, तो आज तक विश्व में जो प्रगति एवं विकास संभव हो पाया है, कदापि न हो पाता। नरता का पहला और अनिवार्य लक्षण है हर हाल में, हर स्थिति में निरन्तर आगेही-आगे बढ़ते जाना ‘जिस तरह जल की नन्हीं, कोमल एवं स्वच्छ धारा अपने निकास-स्थान से निकलकर एक बार जब चल पड़ती है, तो सागर में मिले बिना कभी रुकती या विश्राम नहीं लिया करती; उसी प्रकार नरता भी कभी लक्ष्य पाए बिना रुका नहीं करती।

नर प्राणी किसी बात से निराश होकर बैठ जाए, यह उसे कतई शोभा नहीं देता। निराश होकर बैठ जाना हार तो है ही, श्रेष्ठता से विमुख होना या उसे काल के हाथों गिरवी रखना भी है। किसी भी वस्तु को गिरवी रखने वाला व्यक्ति मानसम्मान एवं आत्मविश्वास के साथ-साथ लोक विश्वास से भी हाथ धो बैठता है। ऐसा होना दूसरे शब्दों में निराशात्तिरेक में उसका नरता से पतित होना है। अपने-आप को कहीं का भी नहीं रहने देने जैसा है। सो नर मनुष्य होकर कभी भूल से भी इस तरह की स्थिति, पतन और गिरावट मत आने दो। बुद्धिमान व्यक्ति को आशावादी होना चाहिए, ताकि वह अपना और अपने देश का कल्याण कर सके। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपना मनोबल बनाए रखना चाहिए क्योंकि मनोबल से ही सफलता कदम चूमती है। जिस व्यक्ति का मनोबल गिर जाता है, वह जीते-जी पशु के समान हो जाता है।

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‘बुरा जो देखन मैं चला’

जहाँ तक आदमी के आम स्वभाव का प्रश्न है, हर आदमी अपनी बड़ी-से-बड़ी बुराई की तरफ ध्यान न दे दूसरों की सामान्य-से-सामान्य बुराई पर नुक्ताचीनी करता रहता है। कहावत भी है न, आदमी को अपनी आँख का शहतीर नजर नहीं आता, जबकि दूसरे की आँख में पड़ा तिनका तक वह देख और ढूँढ लिया करता है। लेकिन यदि मनुष्य अपनी आँख में गढ़े शहतीर मात्र को देखने लगे, यानि सभी लोग अपनी बुराइयाँ खोज कर उन्हें दूर कर लें, तो निस्सन्देह जीवन स्वर्ग-सा सुखदायक बन जाएगा।

वास्तव मं जिस व्यक्ति के अपने भीतर बुराई रहा करती है, उसे सारा संसार बुरा दीख पड़ता है। ठीक यह बात उस व्यक्ति के बारे में भी सत्य है। इसलिए आदमी की पहली आवश्यकता है अपने भीतर की बुराई दूर करे, फिर दूसरों की बुराइयों की तरफ ध्यान दे। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही सन्त कबीर ने अपने अनुभव के आधार पर कहा था –

‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलयों कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न होय।’

अर्थात् जब में संसार में बुरे स्वभाव वाले प्राणियों को खोजने चला, तो मुझे कहीं एक भी व्यक्ति बुरा दिखाई न दिया। इसके बाद जब मैंन अपने भीतर बुराई की खोज आरम्भ की, तो पाया कि वास्तव में इस संसार में मुझ से बढ़ कर बुरा व्यक्ति और कोई नहीं है। स्पष्ट है कि कबीर जैसे सन्त और सत्य के उपासक ने ऐसा कह कर हमें आत्मविश्लेषण करने की प्रेरणा दी है। इस ओर संकेत किया है कि व्यक्ति को अपनी वास्तविकता जान कर ही दूसरों की अच्छाई-बुराई की खोज या विश्लेषण करना चाहिए। दूसरे शब्दों में कुछ कहने-करने का अधिकारी बनने के बाद ही दूसरों से कुछ कहना या कोई व्यवहार करना चाहिए।

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‘काल्ह करे सो आज कर’

सन्त कबीर द्वारा रचे गए एक प्रसिद्ध दोहे का पहला चरण है यह शीर्षक-पँक्ति:-

“काल्ह करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलै होयगी, बहुरि करो कब ।।”

इस का अर्थ, इसकी व्याख्या भी देखने में सीधी और सरल ही है। लेकिन अने भीतर बड़े ही गम्भीर विचार को छिपाए हुए है। सीधा सादा अर्थ है-जो कार्य कल करना है, उसे आज ही कर डालो। जो आज करने का विचार है, उसे अभी आरम्भ कर दो। पता नहीं, अगले ही क्षण प्रलय हो जाए। सो फिर सोचा कार्य कब करोगे? अर्थात् बहुत संभव है कि प्रलय का क्षण उपस्थित हो जाए और उसके कारण फिर कभी भी वह कार्य कर पाने का अवसर ही सुलभ न हो सके।

निश्चय ही सीधे-साधे शब्दों और सरल शैली में कही गई बात का विशेष अर्थ, प्रयोजन एवं महत्व है। सब से महत्वपूर्ण संकेत तो यह है कि कवि ने समय के सुदपयोग करना आवश्यक किया है। दूसरे शब्दों में यह कहा है कि कभी भी आज का काम कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। क्यों नहीं छोड़ना चाहिए, इस तथ्य को समझना और जानना ही वास्तव में इस सूक्ति के वास्तविक अर्थ और भाव तक पहुँचना है। उसे जाने बिना सभी कुछ एकदम सरल एवं सामान्य-सा ही प्रतीत होता है।

तो आखिर वह विशेष कथन का वह विशेष अर्थ एवं रहस्य है क्या ? वह जानने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि भारतीय दार्शनिक-आध्यात्मिक धारणा के अनुसार यदि मृत्यु के समय मरने वाले के मन-मस्तिष्क में कुछ अधूरी एवं अपूर्ण इच्छाएँ शेष रह जाती हें, तो उन्हें पूरा करने के लिए उसे तब तक बार-बार जन्म लेते रहना पड़ता है कि जब तक वे पूर्ण नहीं हो जाया करतीं। पूर्ण करने के चक्कर में आदमी बार-बार जन्म लेता और मरता रहता है।

इस प्रकार आवागमन का चक्कर कभी समाप्त ही नहीं हो पाता। जन्म-मरण के चक्कर में बन्धा प्राणी भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेता, कष्ट भोगता हुआ बड़े ही पुण्य कर्मों के बल से फिर मनुष्य योनि में इसलिए जन्म लेता है कि अच्छे कर्म कर के, सभी तरह की अधूरी रह गई इच्छाएँ समय पर यानि मृत्यु से पहले पूर्ण कर ले और इस तरह लोक-परलोक दोनों तरह की मुक्ति पाने का अधिकारी बन जाए।

समय पर प्रत्येक कार्य सम्पन्न हो सके, इसके लिए भी आवश्यक है कि आज का काम कल पर न छोड़ा जाए। उन्नति और विकास की इच्छा एवं कल्पना भी तभी पूर्ण की जा सकती है कि जब समय पर उचित कार्य सम्पन्न करने की तरफ ध्यान दिया जा सके। महान् लोग जो समय का सदुपयोग करने की शिक्षा दिया करते हैं, तो कहा जा सकता है कि प्रत्येक स्वीकृत कार्य को लगातार लग के साथ-ही-साथ पूर्ण करते जाना ही वास्तव में समय का सदुपयोग हैं। फिर दिनप्रतिदिन आदमी की शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक शक्तियाँ भी तो लगातार क्षीण होती जाया करती हैं। स्वभावतः कार्यक्षमता पर भी असर पड़ता है। यदि व्यक्ति आज का काम कल पर छोडता जाएगा, तो क्या पता वह कल कभी आए या न आए ? क्या पता कि कल तक उसकी आज की-सी कार्यक्षमता रह पाए या नहीं ?

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‘मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे’

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा परिकल्पित एवं विरचित ‘रामचरितमानस’ में दी गई इस सूक्ति का सम्पूर्ण स्वरूप इस प्रकार है:

“जहाँ सुमति तहाँ सम्पत्रि नाना।
जहाँ कुमति तहाँ विपत्ति निधाना।।’

अर्थात् जहाँ यहा जिस व्यक्ति के हृदय एवं समस्त क्रिया-व्यापारों में सुमति या सुबुद्धि का निवास अथवा आग्रह रहा करता है, वहीं पर सभी तरह की सुख-सम्पत्तियाँ सुलभ रहा करती हैं।

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे।

मनुष्य और पशु में यदि कोई अंतर है तो यह है कि पशु परहित की भावना से शून्य होता है। उसके जितने भी कार्य होते हैं वे सभी अपने तक सीमित रहते हैं। यदि मनुष्य भी मनुष्य के साथ ऐसा व्यवहार करे तो फिर मनुष्य और पशु में अंतर ही क्या रह जाएगा। हमारी संस्कृति में मानव-मात्र की कल्याण-भावना निहित है तथा यह संस्कृति ‘वसुधैव कुटंबकम्’ की पवित्र भावना पर आधारित है। सच तो यही है कि संसार में परोपकार के समान न कोई दूसरा धर्म है, न पुण्य।

इस तथ्य को उजागर करने एवं सन्देश को प्रसारित करने के लिए तुलनात्मक दृष्टि अपना कर कवि ने परस्पर विलोम रहने वाले दो शब्दों का बारी-बारी से प्रयोग किया है। एक सुमति-कुमति, दूसरा सम्पत्ति-विपत्ति। ‘सुमति’ का सम्बन्ध ‘सम्पत्ति’ से बताया है; जबकि ‘कुमति’ का सम्बन्ध ‘विपत्ति’ से बताया गया है। मनुष्य क्योंकि सामाजिक, सर्वश्रेष्ठ एवं विचारवान् प्रणी है, इस कारण कवि ने उस से सुमति के द्वारा सम्पत्ति की ओर जाने का आय्रह किया है। व्यक्ति को कुमति का मार्ग त्याग देना चाहिए; क्योंकि वह तरह-तरह की विपत्तियों की ओर ले जाने वाला होता है।

सुमति से काम लेकर सुविचारित ढंग से चलने का मार्ग कठिन हो सकता है, प्राय: हुआ भी करता है। लेकिन जब मनुष्य उस कठिन मार्ग पर साहस और सुविचार से चल कर उसे पार कर लिया करता है, तब जिस सुख एवं आनन्द् की अनुभूति हुआ करती है। इसी तरह कुमति से प्रेरित हो और अविचार या कुविचार का दामन थाम कर चलने से अन्ततोगत्वा जिस प्रकार की आत्मपीड़ा और आत्मसंन्ताप झेलना पड़ा करता है, उसे भी शब्दों द्वारा आकार दे पाना संभव नही हुआ करता। वह तो मात्र झेलने वाला ही हर पल पश्चाताप की आग ने झुलसते रह कर अनुभव कर पाता है।

मानव जीवन का उद्देश्य केवल इतना नहीं है कि खाओ, पीओ और मस्त रहो। गोस्वामी तुलसीदास ने भी कहा है –

“एहि तन कर फल विषय न भाई,
सब छल छांड़ि भजिय रघुराई।।”

अर्थात् इस जीवन का लक्ष्य केवल विषय-वासनाओं में लिप्त नहीं, बल्कि निष्कपट होकर भगवान की भक्ति है। भक्ति भी तभी सफल हो सकती है जब हम दूसरे मानवमात्र के साथ सहानुभूति, सहयोग और संवेदना के साथ पेश आएं। अंग्रेजी का एक कथन है – “The best way to pray to God is to love His creation.”

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‘सबै दिन जात न एक समान’

आज बचपन का कोमल गात
जरा-सा पीला पात
चार दिन सुखद चाँदनी रात
और फिर अंधकार अज्ञात।

इस शीर्ष सूक्ति में सूक्किकार का आशय दिनों के एक समान न जाने से यह है कि व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव आता रहता हे। उतार यानि बुरे एवं कष्टदायक दिनों का आगमन, चढ़ाव यानि सुखदायक अच्दे दिनों का आगमन। अच्छे दिनों का आगमन स्वभावत: बुरे दिनों के गमन या बीत जाने का संकेत है। इस प्रकार जीवन में कभी अच्छे दिन आते हैं, तो बुरे भी आ सकते हैं। इसी तरह बुरे दिन अच्छे दिनों का आगमन स्वभावत: बुरे दिनों के गमन या बीत जाने का संकेत है। इस प्रकार जीवन में कभी अच्छे दिन आते हैं, तो बुरे भी आ सकते हैं। इसी तरह बुरे दिन अच्छे दिनों में भी परिवर्तित हो सकते हैं।

समय का चक्र भी अनवरत गति से ऊपर-नीचे, नीचे-ऊपर घूमता ही रहा करता है। बुरा समय कब चील की तरह झापट्टा मार के व्यक्ति के सारे सुख-संसार को निगल जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। बड़े-बड़े राजाओं-महाराजाओं, समृद्धों-सम्पत्तिवानों को भी समय का शिकार होकर भूखों मरते देखा गया है। दूसरी ओर ऐसा भी देखा गया है कि आज जो बेचारा एक-एक पैसे के लिए तरस रहा है, कल वह दोनों हाथों से धन-सम्पत्ति लुटाता फिर रहा है। आज दूटा-फूटा या पुरानी साइकिल तक सुलभ नहीं, कल कई-कई कारां का मालिक बना फिरता है। इस प्रकार समय के हाथ बड़े लम्बे और मजबूत माने जाते हैं। वे सुख-दु:ख किसी को भी खींच कर व्यक्ति के जीवन को कुछ-का-कुछ बना सकते हैं। एक समय था जब रोम की सभ्यता-संस्कृति की धाक सारे विश्व पर हुआ करती थी, पर आज उसके खण्डहर तक भी काल यानि बलवान समय का ग्रास बन चुके हैं।

यह समय की ही तो बात है कि जिस रावण के एक लाख पुत्र-पौत्र और सवा लाख नाती हुआ करते थे, आज कोई उसका नामलेवा तक बाकी नहीं है। जहाँ कभी सागर लहराया करते थे, आज वहाँ लम्बे रेगिस्तान हैं और उनमें धूलधक्खड़ के बवण्डर ठाठें मारते उड़-फिर रहे हैं। जहाँ कभी ऊँचे पहाड़ हुआ करते थे, पर्वतमालाएँ थीं, आज वहाँ अथाह जल से भरे सागर लहरा रहे हैं। जहाँ कभी बस्तियाँ हुआ करती थीं, वहाँ आज श्मशान-कबिस्तान हैं और कब्रिस्तानों पर बस्तिर्याँ बस रहीं हैं। जहाँ हरे-भरे वन, खेत-खलिहान लहलहाया करते थे, वहाँ आज कंक्रीट के जंगल उग आए हैं। कल-कारखाने खड़े होकर धुएँ के अम्बार उगल रहे हैं। इस प्रकार उतार-चढ़ाव से भरा समय का चक्र कहाँ जा कर रुकेगा, न तो कोई जानता ही है और न इस सम्बन्ध में कुछ कह या कर ही सकता है। बस, वह यह कर सकता है तो इतनाही कि यह तथ्य मान कर सुकर्म करने लगे कि ‘सबे दिन जात न एक समान।’

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‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’

कविवर वृन्द के रचे दोहे की यह एक पंक्ति वास्तव में परिश्रम की निरन्तरता का महत्व बताने वाली है –

“करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निसान।।”

इसकी व्याख्या इस पकार की जा सकती है कि निरन्तर परिश्रम करते रहने से असाध्य माना जाने वाला कार्य भी सिद्ध हो जाया करता है। असफलता के माथे में कील ठोंक कर सफलता पाई जा सकती है। जेसे कुएँ की जात पर लगे पत्थर पर पानी खींचने वाली रस्सी के बार-बार आने-जाने से, कोमल रस्सी की रगड़ पड़ने से घिस कर उस उस पर एक निशान अंकित हो जाया करता है; उसी तरह लगातार ओर बार-बार अभ्यास यानि परिश्रम और चेष्टा करते रहने से एक निकम्मा एवं जड़-बुद्धि समझा-जाने वाला व्यत्रि भी कुछ करने के लायक बन सकता है। सफलता और सिद्धि का स्पर्ष कर सकता है। दूसरे शब्दों में अनवरत परिश्रम और लगन के द्वारा असम्भव समझे जाने वाले कार्यों को भी सम्भव कर के दिखाया जा सकता है।

एकबार वायलिनवादक फ्रिट्ज क्रीसलर से पूछा गया, “आप वायलिन इतना सुंदर कैसे बजा लेते हैं? क्या आप खुशकिस्मत हैं ?” उन्होंने जबाब दिया, “यह अभ्यास के कारप्प है। अगर मैं एक महीने तक अभ्यास न करूँ ते मेरे श्रोता फर्क समझ जाते हैं। अगर मैं एक सप्ताह तक अभ्यास न करूँ तो मेरी पत्नी फर्क बता देती है। अगर मैं एक दिन भी अभ्यास न करूँ तो खुद ही फर्क बता सकता हूँ।”

इसलिए मनुष्य को अपने अध्यवसाय-रूपी रस्सी को समय की शिला पर निरन्तर रगड़ते रहना चाहिए, तब तक लगातार ऐसे करते रहना चाहिए कि जब तक कर्म की रस्सी से विघ्न-बाधा या असफलता की शिला पर घिस कर उनकी सफलता का चिन्ह स्पष्ट न झलकने लगे। मानव-प्रगति का इतिहास गवाह है कि आज तक जाने कितनी शिलाओं को अपने निरन्तर अभ्यास से घिसते आकर, बर्फ की कितने दीवारें पिघला कर वह आज की उन्नत दशा में पहुँच पाया है। यदि वह हार मानकर या एक-दो बार की असफलता से ही घबरा कर निराश बैठे रहता, तो अभी तक आदिम काल कीअन्धेरी गुफाओं ओर बीहड़ वनों में ही भटक रहा होता।

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‘अपना हाथ जगन्नाथ’

‘अपना हाथ जगन्नाथ’ एक लोक-प्रसिद्ध कहावत है। इसका सीधा और स्पष्ट अर्थ यही लिया जाता है कि व्यक्ति अपने हाथ से किए गए कार्यों पर ही विश्वास कर सकता है। उन्हीं के द्वारा परिश्रमपूर्ण कार्य करके अपने घर-परिवार का लालन-पालन तो ठीक प्रकार से कर ही सकता है, अपने लिए यथासम्भव सफलता के प्रत्येक द्वार, प्रत्येक रास्ते का भी उद्घाटन कर सकता है। अपने हाथों की शक्ति आदमी की सब से विश्वसनीय सहकर्मी, साथी और सहयात्री हुआ करती है। जिसे अपने हाथों की शक्ति पर विश्वास रहता है, उसे कभी भूल से भी पराश्रित नहीं बनना पड़ता।

स्वामी रामतीर्थ ने जापान-यात्रा करके और वहाँ की सुख-समृद्धि का रहस्य जान लेने के बाद उन्होंने बड़े सुलझे हुए ढंग से कहा था – “जिस देश के हाथों की डँगलियों और चेहरे पर परिश्रम की धूल नहीं पड़ा करती, वह देशजाति कभी भी उन्नति के शिखर नही छू सकते।” स्पष्ट है कि सब प्रकार की उन्नति और विकास के शिखर छूने के लिए अपने हाथों की उँगलियों में छिपी शक्ति को जगन्नाथ की अनन्त-असीमित शक्तियों के समान ही बनाने की अनिवार्य आवश्यकता हुआ करती है।

ईश्वर ने हाथ दिये ही तरह-तरह के कार्य करने के लिए हैं। इसलिए कि अनवरत कर्म द्वारा संसार-सागर को मथ कर उसमें जो सुख एवं आनन्द-रूपी मोती-माखन छिपा पड़ा है, उसे दोनों हाथ बढ़ा कर अपने लिए समेट लिया जाए।

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‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’

हार-जीत तो आरम्भ से ही जीवन के साथ लगी हुई है, लगी रहती है और आगे भी लगी ही रहेगी। यह जीवन का एक निश्चित एवं परीक्षित सत्य है। सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा लक्ष्य को हासिल करने की गहरी इच्छा शक्ति से आती है। नेपोलियन ने लिखा था – “इंसान जो सोच सकता है और जिसमें यकीन करता है वह उसे हासिल भी कर सकता है।”

सभी कामयाबियों की शुरुआत उन्हें पूरा करने की गहरी इच्छा शक्ति से ही होती है। जिस तरह थोड़ी-सी आग ज्यादा गर्मी नहीं दे सकती, उसी प्रकार कमजोर इच्छा से बड़ी कामयाबियाँ नहीं मिल सकती। असफलता के डर से कुछ लोग कोशिश ही नहीं करते, और साथ ही पीछे न छूट जायं इस डर से वे पीछे भी रहना नहीं चाहते। ऐसे लोग जीतना तो चाहते हैं लेकिन हारने के डर से अपनी मानसिक क्षमताओं का इस्तेमाल नहीं कर पाते। वे अपनी क्षमता इस चिंता में गंवाते हैं कि कहीं हार न जाएँ, बजाए इसके कि जीतने की कोशिश में उसे लगाएँ

मानव-समाज ने अपने आरम्भ काल से लेकर आज तक जितनी प्रगति, जितना विकास किया है, उसके लिए जाने कितनी विघ्न-बाधाएँ सहीं, कितनी-कितनी असफलताएँ झेली और कितनी बार असफल परीक्षण किए, कहाँ है उस सब का हिसाब-किताब ? यदि वह कुछ विघ्न-बाधाएँ देख कर, कुछ असफल परीक्षणों के बाद ही मन मार कर बैठ जाता, तो आज तक की उन्नत यात्रा भला कैसे और क्यों कर के कर पाता ? वहीं अन्धेरी मुफाओं और घने जंगलों के सघन वृक्षों की डालियों में ही उछल-कूद न मचा रहा होता ? पर नहीं, मनुष्य के लिए हार मान हाथ-पर-हाथ धर कर बैठ जाना कतई संभव ही नहीं हुआ करता।

मानव-मान हार को हार मान ही नहीं सकता। सच्चे मनुष्य का मन तो हमेशा जीत के आनन्दोल्लास से भरा रहता है। उत्साह से भरे उसके कर्मठ मन को बढ़ाता हुआ हर कदम जीत या सफलता को निकटतर खींचता हुआ प्रतीत होता है। तभी तो वह गर्मी-सर्दी, वर्षा-बाढ़ आदि किसी की भी परवाह न करते हुए, वसन्त या शरद की सुन्दरता की ओर आकर्षित होते हुए भी उन की अपेक्षा करते हुए अपने गन्तव्य की ओर कदम-दर-कदम हमेशा बढ़ता रहता है-तब तक कि जब तक उस तक पहुँच कर अपना विजय-ध्वज नहीं फहरा देता।

इन तथ्यों के आलोक में शीर्षक-सूक्ति में व्यंजित सत्य को नतमस्तक होकर स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि हार-जीत दोनों मन के व्यापार हैं।

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‘दैव-दैव आलसी पुकारा’

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।

– यह आलसियों का गुरु-मंत्र है। आलसी मनुष्य ही दैव का, भाग्य का अनावश्यक सहारा लेते हैं। ऐसे लोगों का जीवन इसलिए होता है कि वे दूसरें के भोजन पर तिरस्कृत होकर भी पलते रहें तथा दुर्गति का शिकार बनते रहें। ऐसे लोगों से सभी घृणा करते हैं। आलस्य से मानव-जीवन का पतन हो जाता है तथा संसार की समस्त बुराइयाँ उसमें घर कर जाती है। उसे उत्थान की जगह पतन, उन्नति की जगह अवनति तथा यश की जगह अपयश की प्राप्ति होती है। आलस्य उसके जीवन को घुन की तरह खा जाता है।

कर्मशील व्यक्ति समय की गति पहचान औरकर्म-निरत होकर जीवन को सुखी और सफल बना लिया करता है, जबकि निठल्ला भाग्यवादी बैठा-बैठा माथे की लकीरें पीटता रह जाता है। इस तरह से कर्म या पुरुषार्थवादियों की स्पष्ट धारणा है कि:

उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणिन मनोरथै :।
न हि सुपतस्य सिहंस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा :।।

अर्थात् मात्र उद्योग या परिश्रम करते रहने से ही सब तरह के कार्य सिद्ध हो सकते हैं। पुरुषार्थवादियों का यह भी स्पष्ट मानना और कहना है कि “‘उद्योगिनां हि सिंहनुपैति लक्ष्मी:” अर्थात् उद्योग या परिश्रम करते रहने वाले सिंह-समान वीर पुरुषों का वरण ही लक्ष्मी किया करती है। दूसरे शब्दों में परिश्रमी व्यक्ति हर प्रकार की सुख-समृद्धियाँ, धन-सम्पत्तियाँ अपने परिश्रम् के बल पर अर्जित कर लिया करते हैं।

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‘अब पछताय होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत’

अरविंद को मार तुषार गया,
मुस्कराते हुए रवि आये तो क्या।

जब कमलों को पाला मार जाये, प्रात:काल के समय कितनी ही मुस्कुराहट बिखराते हुए सूर्य आये, कोई लाभ नहीं होता। काम बिगड़ जाने पर पश्चात्ताप की अग्नि में स्वयं को जला डालने से ही कुछ बनता है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि अच्छी प्रकार सोच-समझकर कार्य करे, जिससे कि बाद में पछताना न पड़े। कवि गिरधर ने कहा है –

“बिना बिचोट जो करे, सो पाछे पछताय।
काम बिगारे आपनौ, जंग में होत हैसाय ।।”

समय के महत्व के बारे में तुलसीदास ने भी लिखा है –

“का वरषा जब कृषि सुखाने। समय चूकि पुनि का पछिताने।”

सूक्तिकार ने ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत’ कह कर समय के महत्व को उजागर किया है। समय का सदुपयोग करने का महत्व बताया है। साथ ही सावधान भी किया है कि यदि समय पर कर्म करने से चूक जाओगे, समय का सदुपयोग नहीं कर सकोगे, तो बाद में जीवन एक जीवन्त अभिशाप बन जाएगा। वह रात-दिन की कुढ़न एवं क्रन्दन बन कर अपने आप को ही कचोटता रहेगा। इस बात का हमेशा ध्यान रखो कि इस-आध पल भ्जी देर कर देने वाला समय पर छूट जाने वाली रेलगाड़ी को कभी भी नहीं पकड़ पाता। देखते-ही-देखते ट्रेन तो मीलों आगे निकल जाया करती है और उस पर यात्रा करने का इच्छुक व्यक्ति वहीं प्लेटफार्म पर खड़ा-खड़ा बस सोचता हुआ, अपनी गफलत पर पछताता हुआ खड़ा रह जाता है। तब उसे अगली द्रेन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है और हो सकता है कि तब तक यात्रा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाए।

समय का पंछी एक बार हाथ से छूट जाने पर दुबारा कतई कभी भी पकड़ में नहीं आया करता। समय का हर पलक्षण, प्रत्येक साँस ही जीवन है, समय का साकार-सजीव स्वरूप है। जन्म लेते ही उस (समय) का क्षण आरम्भ हो जाता है। हम देखते और सोचते ही रह जाते हैं कि कब बचपन हाथ से खिक गया। फिर कैशौर्य हिरणों की तरह चौकड़ियाँ भरता यह जा, वह जा’ हो गया और आ गए यौवन के उमंग-उत्साह भरे क्षण। लेकिन अभी चौकन्ने होने को होते ही हैं कि कभी न लौट पाने के लिए यौवन के वे उन्मादक क्षण हाथों से चुपचाप फिसल जाते हैं।

फिर प्रौढ़ता और बुढ़ापे का भी यही हाल होता है। कब मृत्यु आकर सभी कुछ समाप्त करे दती है, व्यक्ति को पता तक नहीं चल पाता। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को समय रहते ही सावधान हो जाना चाहिए। व्यास से व्याकुल होने पर जो व्यक्ति कुआँ खोदना प्रारंभ करता है, वह प्यासा ही मर जाता है। जो विद्यार्थी पढ़ाई के दिनों में तो सोता है लेकिन परीक्षा में पछताता है, उसका पछताना व्यर्थ है क्योंकि बीता हुआ समय लौट कर नहीं आता।

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‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’

यह सूक्ति ‘रामचरितमानस’ जैसी अद्भुत एवं अमर रचना के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास द्वारा कही गई है। इसका आशय यह है कि सत्ता और धन से युक्त सामर्थ्यशाली व्यक्तियों के दोष भी गुण में बदल जाते हैं। इस संसार में घोषित रूप से नैतिकता का दोहरा मानदंड प्रचलित रहा है जिन बातों के लिए निर्धन और अशक्त लोगों की निंदा की जाती है, उन्हीं के लिए सत्तारूढ़ और सम्पत्तिशाली लोगों की प्रशंसा। ऐसा नहीं होना चाहिए। शेक्सपीयर के नाटको में इस बात का बार-बार उल्लेख किया जाता है कि समर्थ लोग किस प्रकार न्याय-व्यवस्था को भी धोखा देने में सफल हो जाता है।

इस युग-युगों के सत्य को एक अन्य मुहावरे या कथन द्वारा भी प्रकट किया जाता है। वह यों कि ‘बड़ी मछली छोटी मछली को निगल कर ही बड़ी बना करती’ है। ये सभी उक्तियाँ और शीर्षक-सूक्ति वास्तव में परम्परागत सामाजिक न्याय-व्यवस्था को रेखांकित कर उस पर तीखा व्यंग्य कसने वाली हैं। जो ससमर्थ है, अपने-आप में दुर्बल है, जिसके हाथ में शक्ति का प्रतीक लाठी नहीं है, जो हीनता का शिकार होकर छोटा है, तो छोटा ही बना रहना चाहता है, अपनी दीन-हीन स्थितियों से उबर पाने के लिए प्रयास नहीं करता, उसे हमेशा से सबलों-समर्थों की इच्छा का शिकार होते आना पड़ा है।

दुनिया झुकती है, बस उसे झुकाने वाला चाहिए। लेकिन झुकाने की शक्ति अर्जित करने का यह तात्पर्य नहीं है कि स्वयं जिन विषम स्थितियों से गुजरें हैं, दूसरों को भी बाधित कर दें कि अब वे हमारा दबाव प्रतिरोध के बिना सहन करें। ऐसा करना तो मात्र प्रतिकार की हिंसक भावना को बढ़ावा देना है। उसे कभी भी समाप्त नहीं होने देना है। भारतीय साहित्य में सत्ता और संपत्ति से युक्त समर्थ व्यक्तियों की स्तुति-वंदना करनेवाले अंश बहुत कम मिलते हैं तथा प्रतिनिधि रचनाओं में सत्ता-विरोध का ही स्वर प्रबल है।

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‘पराधीन सपनेहु सुख नाही’

स्वाधीन यानि स्वतंत्र, अपने अधीन और अपना शासन या अपने जीवन को संयम एवं सुरक्षा तटबंध प्रदान करने वाले अपने नियम-विधान। इस के वपरीत पराधीन यानि पराये या दूसरे के अधीन और परतंत्र अर्थात् पराये और बलपूर्वक थोपे गये नियम-विधान, सभी प्रकार के बन्धनों को मानने के लिए विवश। इस व्याख्या से स्वाधीन और पाराधीन का अंतर पता चल जाता है।

पराधीनता व्यक्ति और समाज से उसकी अपनी इच्छाएँ तक छीन लिया करती है। उसके मुँह पर भी ताला ठोंक दिया करती है। अर्थात् पराधीन व्यक्ति न तो कभी किसी प्रकार की स्वतंत्र इच्छा ही कर सकता है और न अपने स्वतंत्र विचार रख तथा प्रकट ही कर सकता है। उसे दूसरे की आँख से देखना, दूसरे के मुँह से बोलना, दूसरे के लिए ही अपने हाथों से काम करना, यहाँ तक कि अपने पैरों से चलना भी दूसरों के लिए ही पड़ता है। बस, एक ऐसा मिट्टी का लोटा बन कर रह जाना पड़ता है, जिस में प्राण तो होते हैं; पर अपने नहीं, पराये और पर वश।

स्वाधीनता का सुख ही निराला है। स्वाधीन व्यक्ति के दिन, रात, सभी तरह के कार्य-व्यापार, सपनें, भावनाएँ सभी कुछ अपना यानि नितान्त निजी हुआ करता है। वह अपनी इच्छा का मालिक स्वयं आप हुआ करता है। मनमानी राह पर बढ़ सकता है। हर शिखर पर स्वेच्छा और प्रयत्न से चढ़ सकता है। सभी दिशाओं में उछल-कूद कर गा और कुहुक सकता है।

पराधीनता वस्तुतः नरक तुल्य दु:खदायक हुआ करती है। वहाँ अपने पास अपना कहने को कुछ रह ही नहीं जाया करता । हर चीज बिक जाती है। पराई हो जाया करती है। ऐसा न हो, तभी तो स्वतंत्रता-सेनानी प्राणों पर खेल कर भी, लाठी-गोली खा और जेल के सींखचों के पीछे बन्द होकर भी स्वतंत्रता के नारे लगाते रहे। अन्तिम साँस तक लड़ते-संघर्ष करते रहे। स्वतंत्रता छीन कर कोई पराधीन न बना ले, इसी भावना से अनुप्राणित होकर वीर सैनिक तोपों के दहाने पर अड़ कर भी शत्रु को आगे नहीं बढ़ने देते।

सच तो यह है कि पराधीनता से छुटकारा पाने, स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए अपने सुखों का तो क्या सिर का मोल चुकाना पड़ता है । तलबार की धार पर चलना पड़ता है। सर्वस्व बलिदान करना पड़ता है। ऐसा करके ही वह सब पाया जा सकता है कि जो पराधीनता में कभी सुलभ नहीं होता। यही सब सोच कर, स्वतंग्रता का महत्व बताने के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने कहा :

“पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।”

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‘पर-उपदेश कुशल बहुतेरे’

किसी भक्ष्य पदार्थ का वास्तविक स्वाद क्या है, इस तथ्य से भली- भाँति परिचित तभी हुआ जा सकता है, तब से स्वयं खा कर देखा जाए। सु सत्य, जीवन-सत्य, लोक-परलोक का सत्य क्या है; सत्य के शोधकों ने यह सब जानने के लिए अपने प्राणों तक की बाजी लगा दी। का बार रेसा भी एुनेने-नने को भिला कि किसी संधातक, प्राणहारक किय का वास्तविक स्वाद जानने के लिए किसी डॉक्टर ने उसे अपनी ही जिहावा पर रख लिया और अनुभूति का सत्य प्रकट करने से पहले ही प्राण त्याग दिए। सत्य तो यह है क्षित्क को कुण्ण भी अनुभ्ज किया करता है, अनुभूति के उस सत्य को सही रूप में प्रकट कर पाना संभव ही नहीं हुआ करत्ता। उसका घर्णन कर पाना जीभ के वश की बात ही नहीं रह जाती। कबीर के मत में वह तो ‘गूँगे का गुड़’ हुआ करता है:

“कह कबीर पूँगे गुड़ खायी, बिन रसना का करै बड़ाई ? लैकिन आम जगत में आम प्रघलन यह है कि लोग किसी धात का ऊर्य या महल्व स्बयं जानें या न आाने, किसी बात और व्यवहार पर स्वयं आचरण करें वा न करें, दूसरों के सापने उद्ष सम का बखान करते, दूकरों कों उन की कही बातों पर आचरण करने के उपदेश बधारने का शौक अवर्य वर्रातत रहता है। जब ठन से पूछा जाए कि आप ने इस का कब, कहाँ कैसा और क्या अनुभय किया; तो उनका उत्तर होगा कि “अजी इन सष्षातों को छोढ़ो।”

कबीर हो या नामक, गान्धी हो या विनोबा या फिर कोई अय सन्त एवं भहापुकुष; इन सभी ने पहले स्वयं किसी बात का परीक्षण कर के उसके अन्छे-बुरे परिणाम को भोगा, फिर जो उचिस रवं आवश्यक लगा उस पर चलने की बात बड़े ही आत्मविश्वास और नम्र ढंग से कही। लोगों ने उस पर अमल तो किया ही, उसका सुफल भी पाया। तभी तो उनका प्रत्येक कथन, कदम एवं व्यवहार युग-युगों का सत्य, आदर्श और भूले-भटकों का पथ-प्रदर्शन करने वाले स्थिर आलोक स्तम्भ बन गया।

आजकल तो लोगों की बात ही निराली है। वे स्वयं कुछ न कर चाहते हैं कि दूसरे ही सब करें। नेता, अभिनेता, शिक्षक-गुरु सभी उपदेश तो देते हैं, बड़े-बड़े आदर्श वाक्य उछालते फिरते हैं, फिल्मी भाषा-अन्दांज में डॉयलॉग भी मारते हैं और बड़े-बड़े महापुरुषों के नाम भी लेते नहीं थकते; पर आचरण के नाम पर एकदम कोरे साबित होते है। इसी कारण जीवन-समाज पर उनके कथनों का कतई कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन ‘पर-उपदेश कुशलों’ की कृपा और वास्तविक व्यवहार के कारण ही जीवन-समाज का माहौल बद से बदतर होता जा रहा है।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 Question Answer – हिंसा परम धर्मः

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
जामिद इसी श्रेणी के मनुष्यों में था।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें । पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति ‘हिंसा परमो धर्म:’ से संदर्भित है और इसके रचनाकार मुंशी प्रेमचंद हैं।
इस पंक्ति में जामिद की तुलना वैसे व्यक्तियों से की गई है जो किसी के नौकर नहीं होते हुए भी सबके नौकर होते हैं। ये हमेशा दूसरों के काम करने में ही व्यस्त रहते हैं, इन्हें अपनी भी फिक्र नहीं रहती। यह न किसी के दोस्त होते हैं न किसी के दुश्मन। इनके लिए सारे लोग एक जैसे होते हैं और जामिद भी एक ऐसा ही व्यक्ति था।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः

प्रश्न 2.
बेकाम का काम करने में उसे मजा आता था।
– पाठ का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘हिंसा परमो धर्म:’ है।
प्रेमचंद ने जामिद् का चित्रण करते हुए कहा है कि उसे व्यर्थ का काम, जिससे उसका अपना कोई लाभ न भी हो तो भी ऐसे काम को करने में उसे बहुत मजा आता था। उसके ऐसे कामों में प्रमुख था-बीमार की सेवा करना, आधी रात को भी हकीम के घर दौड़ जाना या फिर किसी जड़ी-बूटी की तलाश में दुनिया की खाक छानना।

प्रश्न 3.
इसीलिए लोग उसे बौड़म समझते थे।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। लोग उसे बौड़म क्यों समझते थे?
उत्तर :
रचना का नाम ‘हिंसा परमो धर्म:’ है और इसके रचनाकार मुंशी प्रेमचंद हैं ।
यहाँ जामिद के चरित्र का चित्रण करते हुए यह दिखाया गया है कि उसकी सबसे बड़ी कमंजोरी यह थी कि वह किसी पर अत्याचार होते नहीं देख सकता था। अत्याचार को रोकने के लिए वह अपनी जान भी जोखिम में डालने से नहीं चूकता था। यही कारण; था कि आए दिन पुलिस कांस्टेबिल से भी उसकी किसी न किसी बात को लेकर झड़प होती ही रहती थी। जामिद की इन्हीं सब पदतों की वजह से लोग उसे बौड़म कहते थे।

प्रश्न 4.
दीवाना तो थ, जह और उसका गम दूसरे खाते थे।
– दीवाना किसे कहा गया है? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
जामिद को दोवाना कहा गया है।
जामिद को लोग उसके व्यवहार के कारण दीवाना समझते थे। जामिद के कामों से पूरे गाँव को लाभ होता था लेकिन इसमें उसका अपना भला नहीं होता था। यहाँ तक कि कभी-कभी उसे रोटियों के भी लाले पड़ जाते थे फिर भी वह अपने स्वभाव को नहीं बदलता था। कुछ लोगों को उसकी यह दीवानगी बहुत ही बुरी लगती थी क्योंकि वे संसार की स्वार्थपरता को भली-भांति समझते थे।

प्रश्न 5.
एक दिन उठा और एक तरफ की राह ली।
– यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
यहाँ जामिद के बारे में कहा जा रहा है।
जामिद अभी तक लोगों की मुफ्त सेवा किया करता था – लेकिन वह रोटियों का भी मुहताज था। जब लोगों ने उसे समझाया कि जिस दिन कोई मुसीबत आ पड़ेगी, उस दिन कोई पूछने वाला भी न होगा, यहाँ तक कि लोग सीधे मुँह बातें भी नहीं करेंगे। तब इन सब बातो को सुनकर जामिद की आँखें खुली और उसने मन ही मन एक निर्णय लिया तथा गाँव को छोड़कर शहर की ओर चल पड़ा।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः

प्रश्न 6.
ये लोग कितने ईमान के पक्के, कितने सत्यवादी हैं।
– ‘ये लोग’ से कौन संकेतित हैं? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘ये लोग’ से शहरवाले संकेतित हैं।
व्याख्या : जब जामिद शहर पहुँचा तो उसने वहाँ अपने गाँव से एक अलग ही दुनिया पाई। यहाँ जितनी जनसंख्या थी, लगभग उतनी ही मस्जिद और मंदिर भी थे। जबकि गाँव में कोई मंदिर तथा मस्जिद न थी। शहरों में मंदिर तथा मस्जिदों की संख्या को देखकर उसने अंदाजा लगाया कि ये शहर के लोग कितने ईमान के पक्के, और कितने सत्यवादी हैं।

प्रश्न 7.
यहाँ के सभी प्राणी उसे देवता-तुल्य मालूम होते थे।
अथवा
प्रश्न 8.
वह हर आने-जाने वाले को श्रद्धा की दृष्टि से देखता और उसके सामने विनय से सिर झुकाता था।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से ली गई है।
शहर के लोगों की धर्मपरायणता देखकर जामिद को ऐसा लगा कि यहाँ के लोग मनुष्य नहीं, देवता के समान हैं। निश्चय ही इनकी सत्यवादिता, ईमान, दया, विवेक तथा सहानुभूति आदि के कारण ही ये खुदा के प्यारे हैं। इसलिए वह हर आने-जाने वाले को श्रद्धा की दृष्टि से देखता तथा उसके समाने विनय से सर झुकाता था।

प्रश्न 9.
ठाकुर जी तो सबके ठाकुर जी हैं – क्या हिंदू, क्या मुसलमान।
– वक्ता कौन है ? वक्ता का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता जामिद है।
जामिदी शहर पहुँचकर दिनभर घूमता रहा। शाम में थककर वह एक मंदिर के संगमरमरी चबूतरे पर बैठ गया। मंदिर में जगह-जगह गंदगी फैली हुई थी। उसे गंदगी से चिढ़ थी इसलिए उसने मंदिर की सफाई शुरू कर दी। यह देख कर लोगों में उसके गति उत्सुकता जगी और लोगों ने उससे तरह-तरह के सवाल करने शुरू कर दिए। मुसलमान होकर भी मंदिर की सफाई करते देख एक ने पूछा कि क्या तुम ठाकुर को मानते हो? जामिद की नज़र में तो ईश्वर एक था इसलिए उसने जवाब में कहा कि ठाकुर हिंदू और मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं करते – वे सबके हैं और सब उनके हैं।

प्रश्न 10.
उसका आंदर-सत्कार होने लगा।
– किसका आदर-सत्कार होने लगा ? क्यों ?
उत्तर :
जामिद का आदर-सत्कार होने लगा। जामिद की बातों तथा उसके कायों से प्रभावित होकर लोगों ने उसे मंदिर का पुजारी बना दिया। रहने को हवादार मकान, खाने को बढ़िया भोजन मिलने लगा। जामिद ने नियमपूर्वक भजनकीर्तन करना भी शुरू कर दिया। इससे मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। इन्हीं गुणों के कारण जामिद का काफी आदर-सत्कार होने लगा।

प्रश्न 11.
वह अपने आश्रयदाताओं की उदारता और धर्मनिष्ठा का और भी कायल हो गया।
– ‘वह’ कौन है ? वह कैसे किसका कायल हो गया ?
उत्तर :
‘वह’ जामिद है।
मदिर का कार्य करते हुए जब जामिद का कुछ समय बीत गया तो एक दिन उसके शुद्धिकरण का आयोजन किया गया। उसका सिर मुड़या गया, नए कपड़े पहनाए गए और हवन के बाद उसके हाथों से मिठाई बँटवाई गई। पहले से ही वह आश्रयदाताओं के प्रेम तथा सहानुभूति से प्रभावित था ही – इस शुद्धिकरण के बाद वह अपने आश्रयदाताओं की उदारता तथा धर्मनिष्ठा का और भी कायल हो गया।

प्रश्न 12.
इसी को सच्चा धर्म कहते हैं।
अथवा
प्रश्न 13. जामिद को जीवन में कभी इतना सम्मान न मिला था।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत वाक्य प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्मः से लिया गया है ।
शहर के लोगों ने जामिद को न केवल मंदिर में आश्रय दिया बल्कि उसे भोजन और मकान की सुविधा भी दी। उपयुक्त समय पाकर उनलोगों ने विधिपूर्वक उसका शुद्धिकरण भी समारोहपूर्वक किया। जामिद को अपने जीवन में अब तक ऐसा सम्मान न मिला था। मुसलमान होते हुए भी हिंदुओं ने उसके साथ जो अच्छा व्यवहार किया उससे उसके मन में यह बात बैठ गई कि जो जाति और धर्म के आधार पर लोगों में भेदभाव न करे वही सच्चा धर्म है।

प्रश्न 14.
सीधा सादा जामिद इस सम्मान का रहस्य कुछ न समझता था।
– रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचनाकार प्रेमचंद हैं।
व्याख्या : मंदिर में कुछ समय गुजारने के बाद एक दिन समारोहपूर्वक उसका शुद्धिकरण किया गया। उसके सिर को मुड़ाया गया, नए कपड़े पहनाकर हवन कराया गया और फिर उसके हाथों मिठाई भी बँटवाई गई। जामिद इस सम्मान से काफी प्रभावित था। सीधा-सादा होने के कारण वह इस सम्मान के रहस्य को नहीं जान पा रहा था कि जिसे वह सम्मान समझ रहा है दरअसल वह उसका धर्म-परिवर्तन है।

प्रश्न 15.
उसके लिए यह कोई नयी बात न थी।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से ली गई है।
जामिद अभी तक मंदिर में जो कुछ करता आया था वह तो उसकी प्रकृति में शामिल था। साफ-सफाई करना, भजनकीर्तन आदि तो गाँव में भी करता था – यह सब उसके लिए पुरानी बात थी। लेकिन इन चीजों के लिए शहर के लोगों ने जो सम्मान दिया-यह बात उसके लिए नई थी।

प्रश्न 16.
आखिर वह बेदम होकर गिर पड़ा।
– ‘वह’ से कौन संकेतित है ? वह बेदम होकर क्यों गिर पड़ा ?
उत्तर :
‘वह’ से जामिद संकेतित है।
तिलकधारी युवक के घर में उस मुसलमान बुड्दे की मुर्गी घुस गई थी। बुद्दे का इसमें कोई दोष न था लेकिन युवक उसे ही साजा देने पर उतारु था क्योंकि मुर्गियाँ उसी की थीं। इसी बात पर युवक उस बुद्धु को पीट रहा था। जामिद से यह नहीं देखा गया। उसने पहले तो युवक को समझाने की काफी कोशिश की लेकिन न मानने पर उसने युवक को पटक दिया। यह देखकर सारे हिंदुओं ने मिलकर जामिद को इतना पीटा कि वह बेदम होकर गिर पड़ा।

प्रश्न 17.
कभी म्लेच्छों से भलाई की आशा न रखनी चाहिए। कौआ, कौओं के ही साथ मिलेगा।
– ‘मलेच्छ’ और ‘कौआ’ किसे कहा गया है और क्यों ? आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘मलेच्छ’ और ‘कौआ’ जामिद को कहा गया है।
जामिद अत्याचारी हिंदू युवक से बुद्ये मुसलमान की रक्षा करता है तथा उस युवक को सबक सिखलाता है। यह देखकर लोगों को यह लगता है कि वे लोग जामिद के लिए कितना कुछ्छ भी करें लेकिन वह हुदय से कभी भी हिंदुओं का नहीं हो सकता। उनकी सोच है कि जामिद जैसे व्यक्ति से किसी भलाई की आशा रखना ही व्यर्थ है। हर हाल में वह अपनी कौम का ही साथ देगा।

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प्रश्न 18.
पशु से आदमी बना दिया, फिर भी अपना न हुआ।
– किसे पशु से आदमी बनाने की बात कही गई है ? फिर भी वह अपना क्यों न हआ?
उत्तर :
यहाँ जामिद को पशु से आदमी बनाने की बात कही गई है।
जामिद धर्म के भेद्धाव को नहीं मानता है। ईश्वर-अल्लाह-दोनों ही उसके लिए समान हैं लेकिन उसके आश्रयदाता हिंदुओं की सोच ऐसी नहीं है। आश्रयदाताओं को लगता है कि इतनी भलाई करने, सम्मान देने तथा अपने धर्म में परिवर्तित कर लेने के बाद भी जामिद उनका अपना न हो सका।

प्रश्न 19.
ऐसी यातनाएँ वह कितनी बार भोग चुका था।
– यहाँ किस यातना के बारे में कहा गया है ? उसे बार-बार ऐसी यातनाएँ क्यों भोगनी पड़ती थीं ?
उत्तर :
यहाँ जामिद की उस यातना के बारे में कहा गया है जो उसे सच्चाई का साथ देने तथा अत्याचार का विरोध करने के कारण दी जाती थी।
जामिद स्वभाव से ही भला, सच्चाई का साथ देनेवाला तथा अत्याचार का विरोध करने वाला था। लेकिन उसके इस नेक कार्य के बदले कभी पुरस्कृत नही किया गया बल्कि लोगों द्वारा प्रताड़ित किया गया, उसकी पिटाई की गई। जब अपने आश्रयदाताओं के द्वारा भी उसकी पिटाई होती है तो उसे मार खाने का दुख नहीं होता है क्योंकि ऐसी कितनी ही यातनाएँ वह पहले भी भोग चुका है।

प्रश्न 20.
वह रात भर इसी उलझन में पड़ा रहा।
– ‘वह’ कौन है? वह किस उलझन में पड़ा रहा ?
उत्तर :
‘वह’ जामिद है।
मुसलमान बूढ़े पर अत्याचार करने वाले युवक की पिटाई करने पर उसके आश्रयदाता ही उसे पीटते-पीटते बेदम कर देते हैं। उसे मार खाने का दुःख नहीं है। उसकी उलझन केवल इस बात को लेकर है कि जिन लोगों ने एक दिन उसका इतना सम्मान किया था, आज उन्हीं लोगों ने बिना किसी कारण के उसकी पिटाई क्यों की। उसका तो कोई कुसूर भी नहीं था। उसने तो वही किया जो किसी भी व्यक्ति को करना चाहिए। इन्हीं सब बातों को लेकर जामिद रात भर उलझन में पड़ा रहा।

प्रश्न 21.
तुम-जैसे दीनदारों से इस्लाम का नाम रोशन है।
– ‘तुम-जैसे’ से किसकी ओर संकेत किया गया है? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘तुम जैसे’ से जामिद की ओर संकेत किया गया है।
जामिद के मंदिर में पुजारी बन जाने तथा धर्म-परिवर्तन से काजी साहब को बड़ी तकलीफ पहुँची। जब उन्हें पता चलता है कि जामिद ने मंदिर को छोड़ दिया है तो वे उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि तुम जैसे दीन-दुखिया की मदद करने वालों के कारण ही इस्लाम का नाम आज सारी दुनिया में रोशन है अर्थात् फैला हुआ है।

प्रश्न 22.
सभी उसकी हिम्मत, जोर और मज़हबी जोश की प्रशंसा करते थे।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘हिंसा परमो धर्म:’ है तथा इसके रचनाकार मुंशी प्रेमचंद हैं।
जामिद ने बूढ़े मुसलमान को तिलकधारी युवक से पिटने से बचाया था। इसके लिए उसे भी यातनाएँ सहनी पड़ी थी। इसके बाद वह पुन: मुसलमानों के बीच आ गया था। उसके इसी काम की सभी प्रशंसा कर रहे थे। लोग जामिद की हिम्मत, जोर तथा मजहबी जोश की प्रशंसा करते नहीं थकते थे – सब उसे एक नज़र देखना चाहते थे।

प्रश्न 23.
आराम में खलल पड़ेगा।
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता ताँगेवाला है।
ताँगेवाला स्र्री को उसके पति के पते पर न ले जाकर काजी के मकान ले आता है। जब स्वी को शक होता है तो वह आवाज देकर अपने पति को बुलाने को कहती है। इस पर ताँगेवाला उसे झूठी दिलासा देते हुए कहता है कि जब जानता हूँ कि साहब का मकान यही है तो बेकार चिल्लाने से क्या फायदा ? वे आराम कर रहे होंगे। चिल्लाने से उनके आराम से खलल पड़ेगा।

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प्रश्न 24.
यह विद्या का सागर, यह न्याय का भंडार, यह नीति, धर्म और दर्शन का आगार एक अपरिचित महिला के ऊपर घोर अत्याचार कर रहा है।
अथवा
प्रश्न 25.
यह रहस्य और भी रहस्मय हो गया था।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से ली गई है।
जामिद ने देखा कि स्त्री काजी साहब के दरवाजे से लौटना चाहती है लेकिन काजी ने उसका हाथ पकड़कर अंदर खींच लिया तो एक स्त्री के रात में काजी के पास आने और फिर काजी के इस व्यवहार से जो रहस्य था, वह और भी रहस्यमय हो गया। वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि काजी किसी पराई औरत के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हैं।

प्रश्न 26.
तुम्हें यहाँ किसी बात की तकलीफ न होगी।
अथवा
प्रश्न 27.
बस आराम से जिंदगी के दिन बसर करना।
– वक्ता और श्रोता कौन है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता काजी तथा श्रोता स्वी (इंदिरा) है।
जब काजी अपरिचित स्त्री के साथ जोर दिखकर तथा धमकी देकर भी अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाते हैं तब वे लालच का सहारा लेते हैं। वे स्वी से कहते हैं कि वह जामिद के साथ निकाह करके बाकी जिंदगी आराम से गुजार सकती है। उसे किसी बात की तकलीफ न होगी क्योंकि इस्लाम औरतों के हक़ का जितना लिहाज करता है, उतना और कोई मज़हब नहीं करता।

प्रश्न 28.
मैं आपकी इस नेकी को कभी न भूलूँगी।
– वक्ता और श्रोता का नाम लिखें। ‘नेकी’ का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता स्वी (इन्दिरा) है तथा श्रोता जामिद है।
जामिद मुसलमान होते हुए भी काजी से हिन्दू महिला की रक्षा करता है। इतना ही नहीं वह काजी के डंडे की परवाह न करते हुए उसे उसके पति के घर तक सही-सलामत आदरपूर्वक पहुँचा देता है। जामिद ने उस ख्वी के साथ जो भलाई का काम किया उसके लिए वह उसका शुक्रिया अदा करते हुए कहती है कि वह जामिद के द्वारा किए गए उपकार को कभी नहीं भूलेगी।

प्रश्न 29.
मुझे अब मालूम हुआ कि अच्छे और बुरे सब जगह होते हैं।
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
वक्ता स्त्री इन्दिरा है।
अगर जामिद ने सही समय पर उस अपरिचित ख्वी का साथ देकर काजी के पंजे से नहीं हुड़ाया होता तो वह कहीं की न रहती क्योंकि ख्वी की आबरू ही सबसे बड़ी चीज होती है। उस स्री की रक्षा करके जामिद ने अपने व्यक्तित्व की छाप उस औरत पर छोड़ दी। अब वह इस सच्चाई को जान गई है कि अच्छे और बुरे लोग सब जगह होते हैं।

प्रश्न 30.
तुम्हें इतनी देर कहाँ लगी ?
– पाठ का नाम लिखें। किसे, कहाँ और कैसे इतनी देर लगी ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘हिंसा परमो धर्म:’ है।
इन्दिरा जो अपने पति के घर जाने के लिए स्टेशन से तांगे पर निकली। तांगेवाला उसे धोखा देकर काजी के पास पहुँचा देता है। जामिद उस स्वी को काजी से बचाकर उसके पति पंडित राजकुमार के पास जो अहियागंज में रहते थे वहाँ पहुँचा देता है। इन सारे चक्करों में स्वी को घर पहुँचने में काफी देर हो जाती है तो घर पहुँचते ही उसके पति इतनी देर होने का कारण पूछते हैं। अभी तक जो भी घटना घटी – उससे पंडित राजकुमार बिल्कुल अनभिज़ थे।

प्रश्न 31.
मेरी जबान में इतनी ताकत नहीं कि आपका शुक्रिया अदा कर सकूँ ।
– वक्ता कौन है ? वह किसका और किसलिए शुक्रिया अदा करना चाहता है ?
उत्तर :
वक्ता स्वी के पति पंडित राजकुमार हैं।
जब पंडित राजकुमार को उनकी स्री सारी घटना के बारे में बताती है तो वे सत्र रह जाते हैं। उन्हें जामिद में ईश्वर का रूप दिखाई देता है। वे जानते हैं कि जामिद ने जो उपकार किया है उसे शब्दों में नहीं चुकाया जा सकता, इसलिए वे कहते हैं कि मेरी जबान में इतनी ताकत नहीं कि आपका शुक्रिया अदा कर सकूँ।

प्रश्न 32.
वह जल्द से जल्द शहर से भागकर अपने गाँव पहुँचना चाहता था।
– ‘वह’ से कौन संकेतित है ? वह गाँव क्यों पहुँचना चाहता है ?
उत्तर :
वह से जामिद संकेतित है।
जब जामिद शहर पहुंबा था तो वहाँ मन्दिर तथा मस्जिदों की संख्या देखकर उसे लगा था कि शहर के लोग कितने ईमानदार, सत्यवादी और खुदा के प्यारे बंदे हैं। लेकिन उसका यह भ्रम जल्द ही दूर हो गया। उसने देख लिया कि चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, धर्म के नाम पर गंदगियाँ फैला रहे हैं। अब शहर के वातावरण में उसका दम घुटने लगा था, इसलिए वह जल्द से जल्द गाँव पहुँचना चाहता था जहाँ धर्म के सच्चे स्वरूप के दर्शन होते थे।

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प्रश्न 33.
धर्म और धार्मिक लोगों से उसे घृणा हो गयी थी।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना ‘हिंसा परमो धर्म:’ है तथा इसके रचनाकार मुंशी प्रेमचंद हैं।
जामिद ने शहर में रहकर हिन्दू तथा इस्लाम दोनों ही धर्मों के ठेकेदारों को अच्छी तरह से देख लिया था। अब उसे अच्छी तरह पता चल गया कि दोनों ही धर्मवाले धार्मिक होने का केवल ऊपरी दिखावा करते है। सच्चे धर्म से उनका कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए उसे धर्म तथा धार्मिक लोगों से घृणा हो गई थी। कबीर ने इस सच्चाई को बहुत पहले ही देखसमझ लिया था –
हिंदुन की हिंदुवाई देखी, तुरकन की तुरकाई ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, कौन राह है जाई ।।

प्रश्न 34.
वहाँ मजहब का नाम सहानुभूति, प्रेम और सौहार्द था।
– ‘वहाँ’ शब्द कहाँ के लिए आया है। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘वहाँ’ शब्द जामिद के गाँव के लिए आया है।
जामिद के गाँव में मंदिर-मस्जिद नहीं थे । मुसलमान चबूतरे पर नमाज पढ़ लेते थे और हिंदू एक वृक्ष के नीचे पानी चढ़ा दिया करते थे । वहाँ के लोग धर्म के नाम पर न कोई दिखावा करते थे और न ही धर्म के नाम पर आपस में लड़ते थे। फिर भी लोगों में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति, प्रेम और सौहाद्र था धर्म का वास्तविक स्वरूप भी यही है –
ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद, न काबा कैलाश में ।
मुझको कहाँ बूंढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में ।।

प्रश्न 35.
धर्म और धार्मिक लोगों से उसे घृणा हो गयी थी ।
– पाठ का नाम लिखें । धर्म और धार्मिक लोगों से किसे घृणा हो गयी थी और क्यों ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘हिंसा परमो धर्म:’ है।
जामिद ने शहर में मंदिर-मस्जिद दोनों को तथा दोनों धर्मों को चलानेवाले ठेकेदारों को अच्छी तरह देख लिया था। दरअसल वहाँ धार्मिक होने का दिखावा था, धर्म नहीं क्योंकि इकबाल के शब्दों में –
‘मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना’।
यही कारण था कि जामिद को दोनों ही धर्म तथा धार्मिक लोगों से घृणा हो गई थी।

प्रश्न 36.
जामिद का रक्त खौल उठा।
अथवा
प्रश्न 37.
ऐसे दृश्य देखकर वह शांत न बैठ सकता था।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से ली गई है।
व्याख्या : जामिद की प्रकृति में अन्याय सहन करना नहीं था। इसके लिए वह गाँव में भी पुलिस कांस्टेबिल से भिड़ जाता था और गाँव के लोग इसी कारण से उसे बौड़म कहते थे। शहर में मंदिर के सामने एक बलिष्ठ युवक द्वारा एक बुड्टे को पीटे जाते देखकर यह अन्याय उससे बर्दाश्त नहीं हुआ तथा उसका खून खौल उठा। ऐसे अत्याधार को देखकर वह किसी भी परिणाम की चिंता न कर शांत न बैठ सकता था।

प्रश्न 38.
इस शरारत का बदला किसी गरीब मुसलमान से न लीजिएगा।
अथवा
प्रश्न 39.
मैं आपकी इस नेकी का क्या बदला दे सकता हूँ ?
– वक्ता और श्रोता का नाम लिखें। श्रोता ने क्या नेकी की थी ?
उत्तर :
वक्ता पंडित राजकुमार है तथा श्रोता जामिद है।
जामिद ने पंडित राजकुमार की पत्नी की आबरू की रक्षा करके इतना बड़ा अहसान किया था जिसे चुकाया नहीं जा सकता था। उसने जामिद से यह निवेदन किया कि वह किस प्रकार इस नेकी का बदला चुका सकता है। जामिद ने जो कुछ भी किया था वह कुछ पाने की लालसा से नहीं बल्कि मानव-धर्म का निर्वाह किया था। फिर भी उसने पंडित राजकुमार से यह निवेदन किया कि वे अपने मन में किसी मुसलमान के प्रति कोई विद्वेष न पाले तथा काजी ने जो कुछ किया – उस शरारत का बदला किसी गरीब मुसलमान से न लें।

प्रश्न 40.
आबरु के सामने जान की कोई हकीकत नहीं।
अथवा
प्रश्न 41.
तुम मेरी जान ले सकते हो मगर आबरु नहीं ले सकते।
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता स्वी (पंडित राजकुमार की पत्नी इंदिरा) है।
इंदिरा की आबरू पर जब काजी हाथ डालना चाह रहा था तो इंदिरा ने उसे चेतावनी देते हुए कहा कि वह अपने जीते-जी उसे आबरू (इज्जत) पर हाथ न लगाने देगी। इतिहास साक्षी है कि जब-जब भारतीय स्त्रियों पर ऐसी विपदा आई है उन्होंने जान दे दी लेकिन अपनी आबरू पर आँच न आने दिया। मध्यकाल में प्रचलित जौहर-प्रथा इसका अच्छा उदाहरण है।

प्रश्न 42.
शहर की विषाक्त वायु में सांस लेते हुए उसका दम घुटता था।
– शहर की विषाक्त वायु में किसका दम घुट रहा था ? क्यों ?
उत्तर :
शहर की विषाक्त वायु में जामिद का दम घुट रहा था।
जामिद ने शहर में रहते हुए बहुत करीब से धर्म और धर्म के नाम पर फैले दिखावे को देखा था। लोग केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्म का सहारा ले रहे थे। वास्तव में उनका धर्म से कोई लेना-देना नहीं था। वे लोग धार्मिक नहीं धर्म की खाल ओढ़े भेड़िये थे। इन्हीं कारणों से शहर की विषाक्त वायु में सांस लेते हुए उसका दम घुटता था।

प्रश्न 43.
सबको विश्वास हो गया कि भगवान ने यह शिकार चुन कर भेजा है।
– ‘सबको’ और ‘शिकार’ से कौन संकेतित है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘सबको’ से मंदिर में इकट्ठे लोग तथा ‘शिकार’ से जामिद संकेतित है।
लोगों ने जब जामिद को अपने दामन से मंदिर के चबूतरे को साफ करते देखा तो लोगों ने अपनी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए उससे जाति, धर्म, घर, ठाकुर जी में विश्वास आदि से संबंधित कई सवाल पूछे । संतोषजनक उत्तर पाने पर लोगों को लगा कि भगवान ने ही मंदिर की सेवा करने के लिए यह शिकार चुनकर भेजा है। इसे किसी भी प्रकार हाथ से निकलने नहीं देना चाहिए।

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प्रश्न 44.
हुजूर, मारते-मारते अधमरा कर दिया।
– वक्ता कौन है ? ‘हुजूर’ कहकर किसे संबोधित किया जा रहा है ? उसे किसने और क्यों अधमरा कर दिया ?
उत्तर :
वक्ता मुसलमान बुड्षा है जिसे एक बलिष्ठ युवक पीट रहा था। ‘हुजूर’ कहकर जामिद को संबोधित किया जा रहा है।
उस बूढेे मुसलमान की मुर्गी ने उस युवक के घर को गंदा कर दिया था इसलिए वह युवक मुर्गी की गलती की सजा उस बूढ़े को दे रहा था। उसका दोष केवल इतना ही था कि मुर्गी उसकी थी । इसी छोटी-सी बात पर उस तिलकधारी युवक ने बूढ़े मुसलमान को पीटते-पीटते अधमरा कर दिया।

प्रश्न 45.
गलती यही हुई कि तुमने एक महीने भर तक सब्र नहीं किया।
अथवा
प्रश्न 46.
शादी हो जाने देते, तब्ब मजा आता।
अथवा
प्रश्न 47.
एक नाजनीन साथ लाते और दौलत मुफ्त।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से ली गई है।
जब जामिद की मुलाकात काजी से होती है तो वे उससे मिलकर बहुत खुश होते हैं। उनका कहना था कि यदि जामिद ने थोड़ा सब्न से काम लिया होता तो बहुत मजा आता क्योंकि उसकी शादी किसी सुंदर हिन्दू युवती से हो जाती और दहेज मिलता सो अलग। सबसे बड़ी बात यह होती कि वह एक हिन्दू स्त्री को धर्म-परिवर्तन कराकर उसे इस्लाम धर्म कुबूल करवा लेता।

प्रश्न 48.
क्या तुम्हें खुदा ने यही सिखाया है।
– वक्ता और श्रोता का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता इंदिरा है तथा श्रोता काजी है।
जब काजी इंदिरा की आबरू लेना चाहता है तो इंदिरा उसे फटकारते हुए कहती है कि धर्म की आड़ में वह यह घिनौना खेल क्यों खेल रहा है। क्या उसे उसके खुदा ने यही सीख दी है कि पराई स्त्री की इज्ज़त से खेले, उसकी जिंदगी बर्बांद कर दे।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी का सारांश अपने शब्दो में लिखें।
प्रश्न – 2 : ‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी में व्यक्त लेखक के विचारों को अपने शब्दों में लिखें।
प्रश्न – 3 : ‘हिंसा परमो धर्म:’ के माध्यम से प्रेमचंद ने हमें क्या संदेश देना चाहा है ?
प्रश्न – 4 : ‘हिंसा परमो धर्म:’ हमें मानव-धर्म का पाठ पढ़ाती है – समीक्षा करें।
प्रश्न – 5 : ‘हिंसा परमो धर्म:’ धर्म की आड़ में चल रहे कुत्सित व्यापार, धर्माधता का पोल खोलती है – समीक्षा करें।
प्रश्न – 6 : प्रेमचंद ने हिंसा को परम धर्म क्यों कहा है – अपने विचार व्यक्त करें।
प्रश्न – 7 : धर्म और धार्मिक लोगों से उसे घृणा हो गयी थी – पंक्ति के आधार पर ‘हिंसा परमो धर्म:’ की समीक्षा करें।
उत्तर :
प्रेमचंद अपनी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ को पाठकों के सामने रखनेवाले अपने समय के साहित्यकारों में सबसे आगे हैं। उन्होंने अपनी अनेक रचनाओं में धर्म की आड़ में पंडितों, मौलवियों के भ्रष्टाचारी जीवन का चित्र खींचा है कि धर्म की आड़ में ये किस प्रकार स्त्री समाज को पतित करते हैं। ‘हिंसा परमो धर्म:’ एक ऐसी ही कहानी है।

‘हिंसा परमो धर्म:’ का मुख्य पात्र जामिद है जो अपना सारा समय दूसरों की सेवा करने तथा अत्याचार के विरोध में ही बिताता है। लोगों की नजरों में उसका यह काम बेकाम है क्योंकि इससे दूसरों का तो भला होता है लेकिन उसका खुद का भला नहीं होता। कुछ लोगों को यह नागवार गुजरता था क्योंकि वह अपनी जिंदगी से खिलवाड़ कर रहा था। एक दिन लोगों के समझाने पर वह गाँव छोड़कर शहर की ओर चल पड़ता है।

शहर पहुँच कर जामिद पाता है कि वहाँ मंदिर और मस्जिदों की संख्या मकानों से कम नहीं हैं। वह मन ही मन शहरवासियों की धार्मिकता का कायल हो जाता है। घूमते-घूमते शाम हो जाने पर वह एक मंदिर के चबूतरे पर बैठे जाता है। वहाँ चारों ओर गंदगी ही गंदगी फैली है। वह अपने दामन से वहाँ की गंदगी साफ करने लगता है। भक्तों की नज़र उस पर पड़ती है तथा उससे वे तरह-तरह के सवाल पूछते हैं। अंत में उन्हें लगता है कि भगवान ने ही उनके लिए यह शिकार भेजा है। जामिद को वहीं रहने की सारी सुविधाएँ दी जाती है तथा एक समारोह का आयोजन कर उसका धर्मातरण भी करवा दिया जाता है। जामिद सच्चाई से अनभिज्ञ अपने आश्रयदाताओं के एहसान तले दब जाता है।

एक दिन जामिद जब भक्तों के साथ बैठा पुराण पढ़ रहा था तभी उसने एक युवक को बूढ़े को पीटते देखा। दरअसल उस बूढ़े की मुर्गी युवक के घर में घुस गई थी। यह अत्याचार जामिद से सहन नहीं होता है तथा वह उस युवक को उठाकर पटक देता है। यह देखकर मंदिर के सारे भक्त जामिद की अच्छी तरह धुलाई कर देते हैं। जामिद की समझ में यह बात नहीं आती कि मुसलमान बूढ़े का पक्ष लेने से ही उसकी यह दशा की गई है।

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दूसरे दिन जामिद की मुलाकात उस मुसलमान बूढ़े से होती है। वह उसे काजी जोरावर हुसैन के पास ले जाता है। काजी जामिद की काफी प्रशंसा करता है तथा उसे अपने यहाँ शरण दे देता है।

एक रात जामिद ने देखा कि एक तांगेवाला एक स्त्री (इंदिरा) को बहका कर काजी के कमरे में लाता है। काजी उसकी आबरू लेना चाहता है तथा यह भी चाहता है कि वह इस्लाम धर्म कुबूल कर जामिद से विवाह कर ले। जामिद से यह अत्याचार देखा नहीं जाता तथा वह उसे काजी के पंजे से छुड़ाकर सही-सलामत उसके पति के पास पहुँचा देता है।

अब तक जामिद ने धर्म की आड़ में चलनेवाले सारे व्यापार को अच्छी तरह देख और समझ लिया है। अत: वहाँ के विषाक्त माहौल से निकल कर वह अपने गाँव के लिए चल देता है-

“‘तुम और हमसे प्यार करोगे ? झूठ है लोभी बंजारो
बेचोगे, व्यापार करोगे, तुमसे दूर भले प्यारो !'”

इस प्रकार हम पाते हैं इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद् ने हमें यह संदेश देना चाहा है कि जो धर्म के मर्म को नहीं समझते – वही धर्म के ठेकेदार बने बैठे हैं तथा घृणा का व्यापार कर रहे हैं। सच्चा धर्म तो मानव धर्म है जिसकी साक्षात जीती-जागती प्रतिमा जामिद है लेकिन वही दोनों ओर से उपेक्षित हो जाता है। कोई भी धर्म हिंसा का पाठ नहीं पढ़ाता लेकिन लोभी दानवों में हिंसा फैलाकर लोगों को धर्म के अलग-अलग खाने में बाँट दिया है।

प्रश्न – 8 : ‘हिंसा परमो थर्म:’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
प्रश्न – 9 : ‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी के किस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है वर्णन करें।
प्रश्न – 10 : मानव-धर्म का सच्या उदाहरण जामिद की चारित्रिक विशेषताओं को लिखें।
प्रश्न – 11 : जामिद का चरत्रि-चित्रण करें।
प्रश्न – 12 : ‘हिसा परमो धर्म:’ कहानी के आधार पर जामिद का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर :
‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी का पात्र जामिद ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है। वह प्रेमचंद की कहानियों के आदर्श पात्रों में से एक है। जामिद धर्म के सच्चे स्वरूप को हमारे सामने रखता है – इसलिए वह प्रिय पात्र है।
जामिद की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नांकित बिंदुओं के अंतर्गत देखा जा सकता है-

(क) भोला-भाला ग्रामीण युवक : जामिद् गाँव का भोला-भाला युवक है जिसके जीवन का उद्देश्य ही परोपकार तथा लोगों का सेवा करना है। दूसरों की मुसीबत के समय वह मदद करने के लिए देवदूत के समान सामने आकार खड़ा हो जाता है।

(ख) अत्याचार-अनाचार का विरोध करने वाला : जामिद के लिए यह असहनीय है कि उसके सामने किसी पर अत्याचार हो और वह चुप बैठा रह जाय। अपने इसी स्वभाव के कारण वह कई बार पुलिस कांस्टेबिल से भी उलझ चुका है। विरोध की इसी प्रवृत्ति के कारण उसे मंदिर से और फिर काजी से भी प्रताड़ित होना पड़ता है –

माँगा मिलन और पाई फ़ीरी
गलियों में घूमे रमता किसी का
बेचैन-बेचैन ख़ामोश-खामोश
ये जो था इक रोज प्यारा किसी का।

(ग) प्रेम तथा मानवता का पाठ पढ़ानेवाला : जामिद के दिल में दूसरों के लिए प्रेम भरा हुआ है तथा दूसरे से भी यही चाहता है क्योंकि मानवता का पाठ यही है। प्रेमचंद ने उसकी इस प्रवृत्ति के बारे में लिखा है – ”जो जरा हँस कर बोला, उसका बेदाम का गुलाम हो गया।”

(घ) ईश्वर तथा अल्लाह को एक मानने वाला : जामिद ईश्वर तथा अल्लाह को एक मानता है, यह बात उसके इस कथन से प्रमाणित हो जाती है – “ठाकुर जी को कौन न मानेगा, साहब ? जिसने पैदा किया, उसे न मानूँगा तो किसे मानूँगा।” उसके लिए ईश्वर या अल्लाह सबके हैं और सब उसके हैं।

(ङ) सुन्दर भजन गायक : जामिद एक सच्चा युवक होने के साथ ही अच्छा भजन गायक भी है। वह रोज मंदिर में कीर्तन करता है तथा उसके सुंदर भजन से आकर्षित होकर कितने ही लोग मंदिर में आने लगे। उसके भजन से मंदिर के रौनक में चार चाँद लग जाते हैं।

(च) स्त्रियों की इज्ज़त करने वाला : जामिद के मन में स्त्रियों के लिए बहुत इज्ज़त है। यही कारण है कि वह अपरिचित हिंदू स्री इंदिरा की आबरू को बचाने के लिए काजी से भी भिड़ जाता है तथा उसे सही-सलामत उसके पति पंडित राजकुमार के पास पहुँचाता है। जहाँ काजी स्त्री को मात्र खिलौना समझकर उससे खेलना चाहता है वहीं जामिद उसे सम्मान की वस्तु समझता है।

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(छ) बदले की भावना से कोसों दूर : लोग भले ही जामिद के साथ बुरा व्यवहार करते हैं लेकिन उसके मन में किसी के लिए बदले की कोई भावना नहीं है। इतना ही नहीं, जब पंडित राजकुमार उससे नेकी का बदला देने की बात करते हैं तो वह कहता है –
“इस शरारत का बदला किसी गरीब मुसलमान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरखास्त है।”

(ज) दोनों ही धर्म के लोगों से प्रताड़ित : जामिद सच्चा धार्मिक है, वह धर्म के आधार पर किसी में कोई भेदभाव नहीं करता। फिर भी अपने सच्चे व्यवहार के कारण क्या हिन्दू और क्या मुसलमान – दोनों से ही उसे प्रताड़ित होना पड़ता है और अंतत: निराश होकर गाँव लौटने के लिए विवश हो जाता है –
हर कोई देखके जाल बिछाए, हर कोई उठके वार करे, बस्तियाँ-करिये (गाँव) घूम चुके हम, कोई न हमसे प्यार करे।

(ग) प्रेम तथा मानवता का पाठ पढ़ानेवाला : जामिद के दिल में दूसरों के लिए प्रेम भरा हुआ है तथा दूसरे से भी यही चाहता है क्योंकि मानवता का पाठ यही है। प्रेमचंद ने उसकी इस प्रवृत्ति के बारे में लिखा है – “जो जरा हँस कर बोला, उसका बेदाम का गुलाम हो गया।”

(घ) ईश्वर तथा अल्लाह को एक मानने वाला : जामिद ईश्वर तथा अल्लाह को एक मानता है, यह बात उसके इस कथन से प्रमाणित हो जाती है – ”ठाकुर जी को कौन न मानेगा, साहब ? जिसने पैदा किया, उसे न मानूँगा तो किसे मानूँगा।’ उसके लिए ईश्वर या अल्लाह सबके हैं और सब उसके हैं।

(ङ) सुन्दर भजन गायक : जामिद एक सच्चा युवक होने के साथ ही अच्छा भजन गायक भी है। वह रोज मंदिर में कीर्तन करता है तथा उसके सुंदर भजन से आकर्षित होकर कितने ही लोग मंदिर में आने लगे। उसके भजन से मंदिर के रौनक में चार चाँद लग जाते हैं।

(च) स्त्रियों की इज्ज़त करने वाला : जामिद के मन में स्वियों के लिए बहुत इज्जात है। यही कारण है कि वह अपरिचित हिंदू स्वी इंदिरा की आबरू को बचाने के लिए काजी से भी भिड़ जाता है तथा उसे सही-सलामत उसके पति पंडित राजकुमार के पास पहुँचाता है। जहाँ काजी स्त्री को मात्र खिलौना समझकर उससे खेलना चाहता है वहीं जामिद उसे सम्मान की वस्तु समझता है।

(छ) बदले की भावना से कोसों दूर : लोग भले ही जामिद के साथ बुरा व्यवहार करते हैं लेकिन उसके मन में किसी के लिए बदले की कोई भावना नहीं है। इतना ही नहीं, जब पंडित राजकुमार उससे नेकी का बदला देने की बात करते हैं तो वह कहता है –
“इस शरारत का बदला किसी गरीब मुसलमान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरखास्त है।”

(ज) दोनों ही धर्म के लोगों से प्रताड़ित : जामिद सच्चा धार्मिक है, वह धर्म के आधार पर किसी में कोई भेदभाव नहीं करता। फिर भी अपने सच्चे व्यवहार के कारण क्या हिन्दू और क्या मुसलमान – दोनों से ही उसे प्रताड़ित होना पड़ता है और अंतत: निराश होकर गाँव लौटने के लिए विवश हो जाता है –

हर कोई देखके जाल बिछाए, हर कोई उठके वार करे,
बस्तियाँ-करिये (गाँव) घूम चुके हम, कोई न हमसे प्यार करे।

निष्कर्ष: हम यह कह सकते हैं कि जामिद सच्चा मानब है, मानव-धर्म का देवदूत है तथा अपनी इन्हीं चारित्रिक विशेषताओं के कारण वह मुझे सबसे अधिक प्रभावित करता है। जामिद एक आदर्श चरित्र है तथा उसका चरित्र धर्म के ठेकेदारों के गालो पर करारा तमाचा है।

प्रश्न – 13: ‘हिंसा परमो धर्मः’ कहानी के काज़ी का चरित्र-चित्रण करें।
प्रश्न – 14: ‘हिंसा परमो धर्म:’ के जोरावर हुसैन का चरित्र-चित्रण करें।
प्रश्न – 15 : काजी (जोरावर हुसैन) के चरित्र के माध्यम से प्रेपचंद ने हमें क्या संदेश देना चाहा है ?
प्रश्न – 16 : जोरावर हुसैन का चरित्र थर्म की आड़ में पलने वाला दरिदे का चरित्र है – समीक्षा करें।
उत्तर :
जहाँ प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में एक-से बढ़कर एक आदर्श चरित्रों की सृष्टि की है वहीं अनेक पात्र ऐसे भी हैं जो खलनायक बनकर आए हैं। काजी भी ऐसे ही पात्रों में से एक है तथा ‘हिंसा परमो धर्म:’ कहानी में हमारे सामने वह खलनायक के रूप में सामने आता है। काज़ी के चरित्र का विश्लेषण हम निम्नांकित शीर्षकों के अंतर्गत कर सकते हैं –

(क) छली तथा धूर्त्त : काज़ी उर्फ जोरावर हुसैन एक नंबर का छलिया तथा धूर्त है। जब जामिद उससे पहली बार मिलता है तो वह अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से उसे अपने जाल में फंसा लेता है –
“‘वल्लाह ! तुम्हें आँखें बूँढ़ रही थी। तुमने अकेले इतने काफिरों के दाँत खट्टे कर दिए ! क्यों न हो मोमिन का खून है ! …….. तुम-जैसे दीनदारों से ही इस्लाम का नाम रोशन है।”

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(ख) बदले की भावना से भरा हुआ : काजी में बदले की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। जामिद के साथ मंदिर के भक्तों ने जो किया वह उसे बदले से चुकाना चाहता था ताकि हिंदुओं को उससे सबक मिल सके । वह जामिद से कहता है – ”गलती यही हुई कि तुमने एक महीने भर सब्न नहीं किया। शादी हो जाने देते, तब मज़ा आता। एक नाजनीन साथ लाते और दौलत मुफ्त।”

(ग) औरतों की आबरू से खेलने वाला : काजी कहने को धर्म का नुमाइदा है लेकिन वह स्तियों की आबरू से खेलनेवाला दरिदा है। अपने इस धिनौने शौक को पूरा करने के लिए उसने ताँगेवाले जैसे लोग भी पाल रखा है जो स्त्रियों को बहला कर, धोखा देकर उसके पास ले आते हैं। वह इंदिरा की आबरू के साथ भी खेलना चाहता है लेकिन जामिद के हस्तक्षेप के कारण अपने मंसूबे में सफल नहीं हो पाता है।

(घ) इस्लाम को बदनाम करनेवाला : काजीी अपनी ऐग्याशी के लिए इस्लाम धर्म का सहारा लेकर उसे भी बदनाम करता है जब वह यह कहता है – “हाँ”, खुदा का यही हुक्म है कि काफिरों को जिस तरह मुमकिन हो, इस्लाम के रास्ते पर लाया जाय। अगर खुशी से न आयें तो जब्न से ।’

(ङ) औरतों को बहका-धमका कर धर्म-परिवर्तन के लिए विवश करनेवाला : काजी एक न० का शैतान है तथा अपने मंसूबो को सफल करने के लिए वह हर प्रकार के हथकंडे अपनाता है। वह इंदिरा को भी बहकाने की कोशिश करते हुए कहता है – ‘मुसलमान मर्द तो अपनी औरतों पर जान देता है। मेरा यह नौजवान दोस्त (जामिद) तुम्हारे सामने खड़ा है, इसी के साथ तुम्हारा निकाह कर दिया जाएगा। बस, आराम से जिदगी के दिन बसर करना।”
इस पर भी जब इंदिरा उसकी बात नहीं मानती है तो वह धमकी देने से भी बाज नहीं आता –
” अगर तुमने जबान खोली, तो तुम्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा ! बस, इतना समझ लो।”
ऐसे ही दरिंदों के कारण न जाने कितनी स्त्रियों का जीवन बर्बाद होता आया है –

“‘शहर का काज़ी फतवे छापे, गली-गली फैलाए
मोड़-मोड़ पर दुखिया गोरी याद के दीप जलाए
सोच रही है इतने दिन में कितने पाप कमाए
किसको गिनती आए।”

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि काजी का चरित्र उन कठमुल्लों का प्रतीक है जो धर्म की आड़ में लोगों के जीवन से खिलवाड़ करते हैं तथा धर्म का नाम बदनाम करते है।

अति लघूतरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जामिद किस श्रेणी के मनुष्यों में से था ?
उत्तरं :
जामिद उस श्रेणी के मनुष्यो में से था, जो किसी का नौकर न होते हुए भी सबके नौकर होते हैं, जिन्हें अपना कोई काम न होते हुए भी सिर उठाने की फुर्सत नहीं होती है।

प्रश्न 2.
बेकाम का काम करने में किसे मजा आता था ?
उत्तर :
बेकाम का काम करने में जामिद को मजा आता था।

प्रश्न 3.
कौन-से सैकड़ों मौके जामिद के सामने आ चुके थे ?
उत्तर :
किसी पर अत्याचार होते देख जामिद उसका प्रतिकार (विरोध) करता था और इसका परिणाम भी उसे भुगतना पड़ता था – यही सैकड़ो मौके जामिद के सामने आ चुके थे।

प्रश्न 4.
जामिद के कार्यों से उसे क्या लाभ होता था ?
उत्तर :
जामिद को अपने द्वारा किए गए कार्यों से खुद को कोई लाभ नहीं होता था। हाँ, दूसरों को इससे लाभ जरूर पहुँचता था।

प्रश्न 5.
जामिद की आँखें कब खुलीं ?
उत्तर :
जब गाँव के लोगों ने जामिद को धिक्कारते हुए यह कहा कि तुम जिसके लिए अपना जीवन नष्ट कर रहे हो, बौमा पड़ जाने पर कोई चुल्लू भर पानी भी न देगें। जिस दिन मुसीबत आ पड़ेगी उस दिन कोई सीधे मुँह बात भी न करेगा। यह सुनकर जामिद की आखें खुलीं।

प्रश्न 6.
जामिद जिस शहर में पहुँचा, वहाँ का दृश्य कैसा था ?
उत्तर :
जामिद जिस शहर में पहुँचा वहाँ के महल आसमान से बातें करने वाले, सड़कें चौड़ी और साफ, बाजार गुलजार तथा मस्जिदों और मंदिरों की संख्या मकानों से कम न थी।

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प्रश्न 7.
जामिद के गाँव के लोग धार्मिक क्रिया-कलाप कैसे संपन्न करते थे ?
उत्तर :
जामिद के गाँव में कोई मन्दिर-मस्जिद न थी । मुसलमान एक चबूतरे पर नमाज पढ़ लिया करते थे तथा हिन्दू एक वृक्ष के नीचे पानी चढ़ा दिया करते थे।

प्रश्न 8.
जामिद की दृष्टि में किसका सम्मान सबसे बड़ा था ?
उत्तर :
जामिद की दृष्टि में मजहब का सम्मान सबसे बड़ा था।

प्रश्न 9.
जामिद ने शहर के लोगों को देखकर, क्या सोचा ?
उत्तर :
जामिद ने शहर के लोगों को देखकर यह सोचा कि शहर के लोग कितने ईमान के पक्के, सत्यवादी, दयावान, विवेकशील तथा खुदा के प्यारे बंदे हैं।

प्रश्न 10.
जामिद का शहरवालों के प्रति कैसा व्यवहार था ?
उत्तर :
जामिद की दृष्टि में शहरवालों का स्थान काफी ऊँचा था तथा वह हर आने-जाने वाले को श्रद्धा की दृष्टि से देखता और विनय से सर झुकाता था।

प्रश्न 11.
कहाँ के प्राणी जामिद को देवता-तुल्य मालूम होते थे ?
उत्तर :
शहर के प्राणी जामिद को देवता-तुल्य मालूम होते थे।

प्रश्न 12.
जामिद जिस मंदिर में पहुँचा, वहाँ की दशा कैसी थी?
उत्तर :
जामिद जिस मंदिर में पहुँचा वहाँ की दशा बहुत ही बुरी थी। मंदिर के आँगन में जगह-जगह गोबर और कूड़ा-कचड़ा पड़ा हुआ था। चारों ओर गंदगी ही गंदगी फैली हुई थी।

प्रश्न 13.
‘जिसने पैदा किया, उसे न मानूँगा तो किसे मानूँगा ?
वक्ता कौन है ? वह किसे मानने की बात कर रहा है ?
उत्तर :
वक्ता जामिद है। वह हिन्दुओं के ठाकुर (ईश्वर) को मानने की बात कर रहा है।

प्रश्न 14.
जामिद को मंदिर में क्या-क्या सुविधाएँ मिलीं ?
उत्तर :
जामिद को मंदिर में रहने के लिए एक हवादार मकान, खाने में उत्तम पदार्थ की सुविधा मिली।

प्रश्न 15.
जामिद के बारे में भक्तों ने आपस में क्या सलाह की ?
उत्तर :
जामिद के बारे में भक्तों ने आपस में यह सलाह की कि यह देहाती है, इसे फाँस लेना चाहिए, जाने न पाए।

प्रश्न 16.
एक दिन मंदिर में बहुत से लोग क्यों जमा हुए ?
उत्तर :
उस दिन जामिद के शुद्धिकरण का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर जामिद का सिर मुड़ाया गया, उसे नये कपड़े पहनाए गए, हवन हुआ तथा उसके हाथों मिठाई बँटवाई गई। इसी आयोजन के कारण एक दिन मंदिर में बहुत-से लोग जमा हुए।

प्रश्न 17.
‘मुझ जैसे फटेहाल परदेशी की इतनी खातिर’ – फटेहाल परदेशी कौन है ? उसकी क्या खातिर हुई?
उत्तर :
फटेहाल परदेशी जामिद है। धर्म-परिवर्तन तथा शुद्धिकरण के नाम पर उसे जो नए कपड़े पहनाए गए, हवन कराया गया तथा मिठाई बँटवाई गई – उसे ही वह अपनी खातिर समझ्श रहा था।

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प्रश्न 18.
जामिद के कीर्तन का लोगों पर क्या असर पड़ा ?
उत्तर :
जामिद् के कीर्तन से लोग बहुत ही प्रभावित हुए। कितने लोग तो संगीत के लोभ से ही मंदिर आने लगे।

प्रश्न 19.
जामिद भक्तों का सिरमौर क्यों बना हुआ था ?
उत्तर :
जामिद ने मुसलमान होते हुए भी मंदिर में ठाकुर जी की सेवा तथा कीर्तन करना स्वीकार कर लिया। इतना ही नहीं, उसका शुद्धिकरण कर उसे हिन्दू धर्म में परिवर्तित कर दिया – इन्हीं कारणों से जामिद भक्तों का सिरमौर बना हुआ था।

प्रश्न 20.
किसकी प्रकांड विद्वूता की कितनी ही कथाएँ प्रचलित हो गयीं ?
उत्तर :
जामिद की प्रकांड विद्वता की कितनी ही कथाएँ प्रचलित हो गयीं थीं।

प्रश्न 21.
किसके लिए कौन-सी बात नयी नहीं थी ?
उत्तर :
जामिद के लिए नित्य पूजा-पाठ करना तथा भजन गाना नई बात नहीं थी व्योंक वह गाँव में यह सब करता था।

प्रश्न 22.
एक दिन पुराण पढ़ते समय जामिद ने क्या देखा ?
उत्तर : एक दिन पुराण पढ़ते समय जामिद ने देखा कि सामने सड़क पर एक तगड़ा, तिलकधारी युवक, जनेऊ पहने, एक बूढ़े दुर्बल व्यक्ति को मार रहा है।

प्रश्न 23.
‘तो क्या इसने मुर्गी को सिखा दिया था कि तुम्हारा घर गंदा कर आए’ – वक्ता और श्रोता कौन है?
उत्तर :
वक्ता जामिद है तथा श्रोता वह बलिष्ठ युवक है जो दुर्बल बूढ़े को पीट रहा था।

प्रश्न 24.
दोनों में मलयुद्ध होने लगा – दोनों कौन थे ?
उत्तर :
दोनों में से एक जामिद था तथा दूसरा वह युवक था जो बूढ़े को पीट रहा था।

प्रश्न 25.
‘दगा दे गया’ – कौन, किसको, क्यों दगा दे गया ?
उत्तर :
भक्तों के अनुसार जामिद हिंदुओं को दगा दे गया क्योंकि उसने बूढ़े मुसलमान का पक्ष लिया था।

प्रश्न 26.
कौआ कौओं ही के साथ्य मिलेगा – कौआ किसे कहा गया है, क्यों ?
उत्तर :
कौआ जामिद को कहा गया है क्योंकि उसने धर्म-परिवर्तन के बाद भी हिंदु युवक का पक्ष न लेकर मुसलमान बूढ़े का पक्ष लिया था।

प्रश्न 27.
पशु से आदमी बना दिया – किसने, किसे पशु से आदमी बना दिया ?
उत्तर :
भक्तों ने जामिद को पशु से आदमी बना दिया।

प्रश्न 28.
इनके धर्म का तो मूल ही यही है – वक्ता कौन है ? वह किसके घर्म के बारे में कह रहा है
उत्तर :
वक्ता मंदिर में आनेवाले भक्त हैं तथा वे जामिद के धर्म के बारे में कह रहे हैं।

प्रश्न 29.
जामिद को दु:ख और आश्चर्य किस बात का था ?
उत्तर :
जामिद को दुःख इस बात का था कि जिन लोगों ने एक दिन उसका सम्मान किया था उन्हीं लोगों ने बिना कारण के उसकी दुर्गति की। उसे आश्चर्य इस बात का था कि उनकी सज्जनता आज कहाँ गई ?

प्रश्न 30.
देवता क्यों राक्षस बन गए – वक्ता कौन है ? देवता किसे कहा गया है ?
उत्तर :
वक्ता जामिद है तथा देवता मंदिर में आनेवाले भक्तों को कहा गया है ?

प्रश्न 31.
जामिद को लेकर बुद्धा मुसलमान किसके पास गया ?
उत्तर :
बुद्धा मुसलमान जामिद को लेकर काजी के पास गया।

प्रश्न 32.
काजी का नाम क्या था ?
उत्तर :
काजी का नाम जोरावर हुसैन था।

प्रश्न 33.
काफिरों की हकीकत क्या – काफिर किसे कहा गया है ?
उत्तर :
काफिर हिन्दुओं को कहा गया है।

प्रश्न 34.
गलती यही हुई – किससे क्या गलती हुई ?
उत्तर :
काजी के अनुसार जामिद से गलती हुई कि उसने एक महीने तक सब्र नहीं किया।

प्रश्न 35.
तब मजा आता – यह कौन कह रहा है ? किसे, क्या मज़ा आता ?
उत्तर :
यह काजी कह रहा है। उसके अनुसार यदि जामिद ने एक महीना तक सब किया होता तो उसकी शादी किसी सुंदर हिन्दू युवती से होती, दहेज मिलता सो अलग- तब जामिद को मजा आ जाता।

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प्रश्न 36.
काजी साहब के पास अक्सर कौन आया करता था ?
उत्तर :
काजी साहब के पास अव्सर उसके मुरीद (चाहनेवाले) आया करते थे।

प्रश्न 37.
तुम-जैसे दीनदारों से इस्लाम का नाम रोशन है – ‘तुम-जैसे’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
तुम-जैसे से जामिद संकेतित है।

प्रश्न 38.
औरत को आते देख काजी साहब ने क्या किया ?
उत्तर :
काजी साहब ने औरत को ज्योंहि आते देखा, उन्होंने कमरे की खिड़कियाँ चारों तरफ से बंद करके खूँटी पर लटकती तलवार उतार ली और दरवाजे पर आकर खड़े हो गए।

प्रश्न 39.
काजी साहब को क्या-क्या बताया गया है ?
उत्तर :
काजी साहब को विद्या का सागर, न्याय का भंडार, नीति, धर्म तथा दर्शंन का आगार बताया गया है।

प्रश्न 40.
तुम तो मुझे कोई मौलवी मालूम होते हो – यह कौन, किससे कह रहा है ?
उत्तर :
यह इंदिरा, जोरावर हुसैन (काजी) से कह रही है।

प्रश्न 41.
काजी के अनुसार खुदा का क्या हुक्म है ?
उत्तर :
काजी के अनुसार खुदा का हुक्म यही है कि काफिरों को जिस तरह मुमकिन हो, इस्लाम के रास्ते पर लाया जाय। अगर खुशी से न आयें तो जबरदस्ती।

प्रश्न 42.
जैसा तुम हमारे साथ करोगे वैसा ही हम तुम्हारे साथ करेंगे – ‘तुम’ और ‘हम’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
‘तुम’ से हिन्दू तथा ‘हम’ से मुसलमान संकेतित हैं।

प्रश्न 43.
इस्लाम कबूल करने से आबरू बढ़ती है, घटती नहीं है – पाठ का नाम लिखें। वक्ता कौन है ?
उत्तर :
पाठ का नाम है – हिंसा परमो धर्म: तथा वक्ता काजी (जोरावर हुसैन) है।

प्रश्न 44.
मगर तुम इतना घबराती क्यों हों – वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता जोरावर हुसैन (काजी) है तथा श्रोता इंदिरा है।

प्रश्न 45.
‘मैं अभी शोर मचा दूँगी’ – वक्ता कौन है? वह शोर मचाने की बात क्यों कर रही है ?
उत्तर :
वक्ता इदिरा है। काजो उसकी आबरू लूटने के लिए बेचैन है इसलिए वह शोर मचाने की बात कर रही है।

प्रश्न 46.
मुझे अब मालूम हुआ कि अच्छे और बुरे सब जगह होते हैं – वक्ता कौन है ? ‘अच्छे और बुरे’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
वक्ता इंदिरा है। ‘अच्छे’ से जामिद तथा ‘बुरे’ से तांगेवाला और काजी संकेतित हैं।

प्रश्न 47.
अहियागंज में कौन रहता था ?
उत्तर :
अहियागंज में इंदिरा के पति पंडित राजकुमार रहते थे।

प्रश्न 48.
तुम्हें इतनी देर कहाँ लगी ? – वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता पंडित राजकुमार तथा श्रोता उसकी पत्नी इंदिरा है।

प्रश्न 49.
भाई साहब, शायद आप बनावट समझें – वक्ता कौन है ? वह श्रोता को भाई साहब क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
वक्ता पंडित राजकुमार है। वह श्रोता अर्थात जामिद् को भाई साहब इसलिए कह रहा है क्योंकि उसने इंदिरा की आबरू बचाकर भाई के समान ही कार्य किया है।

प्रश्न 50.
कहाँ की वायु में साँस लेते हुए किसका दम घुटता था ?
उत्तर :
शहर की विषाक्त वायु में सांस लेते हुए जामिद का दम घुटता था।

प्रश्न 51.
गाँव में मजहब का नाम क्या था ?
उत्तर :
गाँव में मजहब का नाम सहानुभूति, प्रेम और सौहार्द था।

प्रश्न 52.
जामिद कौन था ? उसे किससे घृणा हो गई थी ?
उत्तर :
जामिद गाँव का एक भोला-भाला युवक था। उसे बनावटी धर्म तथा धार्मिक लोगों से घृणा हो गयी थी।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रेमचंद का वास्तविक नाम क्या था ?
(क) प्रेम प्रकाश
(ख) धनपतराय
(ग) नबाब राय
(घ) मुंशीराय
उत्तर :
(ख) धनपतराय ।

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प्रश्न 2.
प्रेमचंद का जन्म कब हुआ था ?
(क) सन् 1880 में
(ख) सन् 1882 में
(ग) सन् 1884 में
(घ) सन् 1886 में
उत्तर :
(क) सन् 1880 में ।

प्रश्न 3.
प्रेमचंद् ने किस वर्ष शिक्षा विभाग से त्यागपत्र दे दिया ?
(क) सन् 1890 में
(ख) सन् 1895 में
(ग) सन् 1920 में
(घ) सन् 1930 में
उत्तर :
(ग) सन् 1920 में ।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से किस पत्र का संपादन प्रेमचंद ने किया था ?
(क) माधुरी
(ख) प्रदीप
(ग) कादम्बिनी
(घ) भारतेंदु पत्रिका
उत्तर :
(क) माधुरी ।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से किस पत्र का संपादन प्रेमचंद ने किया था ?
(क) कादम्बिनी
(ख) मर्यादा
(ग) धर्मयुग
(घ) हिन्दुस्तान
उत्तर :
(ख) मर्यादा ।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किस पत्रिका का प्रकाशन प्रेमचंद ने किया ?
(क) हंस
(ख) मर्यादा
(ग) धर्मयुग
(घ) माधुरी
उत्तर :
(क) हंस ।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित में से किस पत्रिका का प्रकाशन प्रेमचंद ने किया ?
(क) मर्यादा
(ख) माधुरी
(ग) जागरण
(घ) धर्मयुग
उत्तर :
(ग) जागरण ।

प्रश्न 8.
‘रूठी रानी’ उपन्यास के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) अरूण कमल
(ग) दिनकर
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(क) प्रेमचंद।

प्रश्न 9.
‘प्रेमा’ उपन्यास के लेखक कौन हैं ?
(क) पाश
(ख) चंद्रकांत देवताले
(ग) प्रेमचंद
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 10.
‘वरदान’ उपन्यास किसकी रचना है ?
(क) दिनकर की
(ख) पाश की
(ग) कुँवर नारायण की
(घ) प्रेमचंद की
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद की।

प्रश्न 11.
‘सेवासदन’ उपन्यास किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद की
(ख) कैफ़ी आज़मी की
(ग) चखेव की
(घ) हरिशंकर परसाई की
उत्तर :
(क) प्रेमचंद की।

प्रश्न 12.
‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास के रचनाकार कौन हैं ?
(क) पाशा
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) प्रेमचंद
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद।

प्रश्न 13.
‘रंगभूमि’ उपन्यास किसके द्वारा रचित है ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) प्रेमचंद्य
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) शुकदेव प्रसाद
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद ।

प्रश्न 14.
‘कायाकल्प’ उपन्यास के रचनाकार कौन हैं ?
(क) द्विवेदी
(ख) पंत
(ग) निराला
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद।

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प्रश्न 15.
‘निर्मला’ उपन्यास के लेखक कौन हैं ?
(क) कुँवर नारायण
(ख) अरूण कमल
(ग) प्रेमचंद
(घ) दिनकर
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 16.
‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास के रचनाकार कौन हैं ?
(क) हरिशेंकर परसाई
(ख) उषा प्रियंवदा
(ग) दिनकर
(घ) प्रेमघंद
उत्तर :
(घ) प्रेमघंद ।

प्रश्न 17.
‘गबन’ उपन्यास किसकी रचना है ?
(क) सर्वेश्वर की
(ख) प्रेमचंद की
(ग) अरूण कमल की
(घ) महादेवी वर्मा की
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद की।

प्रश्न 18.
‘कर्मभूमि’ उपन्यास के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) चेखव
(ग) कैफी आज्रमी
(घ) पाश
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 19.
‘गोदान’ उपन्यास किसकी कृति है ?
(क) शुकदेव प्रसाद की
(ख) चेखव की
(ग) प्रेमचंद की
(घ) महादेवी वर्मा की
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद की।

प्रश्न 20.
‘मंगलसूत्र’ उपन्यास किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद की
(ख) सर्वेश्वर की
(ग) अरूप कमल की
(घ) हरिशंकर परसाई की
उत्तर :
(क) प्रेमचंद की।

प्रश्न 21.
निम्न में से कौन प्रेमचंद का अधूरा उपन्यास है ?
(क) निर्मला
(ख) गोदान
(ग) मंगलसूत्र
(घ) प्रतिज्ञा
उत्तर :
(ग) मंगलसूत्र ।

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प्रश्न 22.
‘सप्तसरोज’ कहानी-संग्रह किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद की
(ख) अरूण कमल की
(ग) दिनकर की
(घ) महादेवी वर्मा की
उत्तर :
(क) प्रेमचंद की।

प्रश्न 23.
‘नवनिधि’ कहानी-संग्रह किसकी रचना है ?
(क) पाश की
(ख) चंद्रकांत देवताले की
(ग) प्रेमचंद की
(घ) धर्मवीर भारती की
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद की ।

प्रश्न 24.
‘प्रेमपूर्णिमा’ कहानी-संग्रह के रचनाकार कौन हैं ?
(क) दिनकर
(ख) पाश
(ग) कुँवर नारायण
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद ।

प्रश्न 25.
‘प्रेमपचीसी’ कहानी-संग्रह के रचयिता कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) कैफ़ी आज़मी
(ग) चखेव
(घ) हरिशंकर परसाई
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 26.
‘प्रेमप्रसून’ कहानी-संग्रह किसके द्वारा लिखा गया है ?
(क) पाश
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) प्रेमचंद
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 27.
‘प्रेमप्रतिमा’ कहानी-संग्रह के रचनाकार कौन हैं ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) प्रेमचंद
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) शुकदेव प्रसाद
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद ।

प्रश्न 28.
‘प्रेम द्वादशी’ कहानी-संग्रह किसकी रचना है ?
(क) द्विवेदी की
(ख) पंत की
(ग) निराला की
(घ) प्रेमचंद की
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद की।

प्रश्न 29.
‘अग्नि समाधि’ कहानी-संग्रह के रचनाकार कौन हैं ?
(क) कुँवर नारायण
(ख) अरूण कमल
(ग) प्रेमचंद
(घ) दिनकर
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 30.
‘सप्तसुमन’ कहानी-संग्रह किसकी रचना है?
(क) हरिशंकर परसाई की
(ख) उषा प्रियंवदा की
(ग) दिनकर की
(घ) प्रेमचंद की
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद की।

प्रश्न 31.
‘समर यात्रा’ कहानी-संग्रह के रचनाकार कौन हैं ?
(क) सर्वेश्वर
(ख) प्रेमचंद्
(ग) अरूण कमल
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद ।

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प्रश्न 32.
‘प्रेम सरोवर’ कहानी-संग्रह के लेखक कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) चेखव
(ग) कैफ़ी आजमी
(घ) पाश
उत्तर :
(क) प्रेमचंद् ।

प्रश्न 33.
‘प्रेरणा’ कहानी-संग्रह के रचयिता कौन हैं ?
(क) शुकदेव प्रसाद
(ख) चेखव
(ग) प्रेमचंद
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 34.
‘नवजीवन’ कहानी-संग्रह के लेखक कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद्न
(ख) सर्वेश्वर
(ग) अरूण कमल
(घ) हरिशांकर परसाई
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 35.
‘मानसरोवर’ कहानी-संग्रह किसकी कृति है ?
(क) प्रेमचंद की
(ख) अरूण कमल की
(ग) दिनकर की
(घ) धर्मवीर भारती की
उत्तर :
(क) प्रेमचंद की।

प्रश्न 36.
शहर में क्या देखकर जामिद को बड़ा कौतूहल और आनंद हुआ ?
(क) धर्म का माहात्म्य
(ख) ज्ञान का महात्म्य
(ग) रुपये का माहात्म्य
(घ) भजन का महात्म्य
उत्तर :
(क) धर्म का महात्म्य ।

प्रश्न 37.
‘कुत्ते की कहानी’ कहानी-संग्रह के लेखक कौन हैं ?
(क) दिनकर
(ख) पाश
(ग) कुँवर नारायण
(घ) प्रेमचंद्
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद ।

प्रश्न 38.
‘कफ़न’ किसकी कहानी है?
(क) प्रेमचंद की
(ख) कैफी आज़मी की
(ग) चखेव की
(घ) हरशिंकर परसाई की
उत्तर :
(क) प्रेमचंद् की ।

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प्रश्न 39.
‘जंगल की कहानियाँ’ कहानी-संग्रह के रचनाकार कौन हैं ?
(क) पाश
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) प्रेमचंद्
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद् ।

प्रश्न 40.
‘कर्बला’ नाटक के रचनाकार कौन हैं ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) प्रेमचंद
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) शुकदेव प्रसाद
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद ।

प्रश्न 41.
‘संग्राम’ नाटक के लेखक कौन हैं ?
(क) द्विवेदी
(ख) पंत
(ग) निराला
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद ।

प्रश्न 42.
‘प्रेम की वेदी’ नाटक किसके द्वारा लिखा गया है?
(क) कुँवर नारायण
(ख) अरूण कमल
(ग) प्रेमचंद
(घ) दिनकर
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 43.
‘स्वराज के फायदे’ निबंध-संग्रह किसकी रचना है ?
(क) हरिशंकर परसाई की
(ख) उषा प्रियंवदा की
(ग) दिनकर की
(घ) प्रेमचंद की
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद की ।

प्रश्न 44.
‘कुछ विचार’ निबंध-संग्रह के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) चेखव
(ग) कैफ़ी आज़मी
(घ) पाश
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 45.
‘साहित्य का उद्देश्य’ निबंध-संग्रह किसकी रचना है ?
(क) सर्वेश्वर की
(ख) प्रेमघंद की
(ग) अरूण कमल की
(घ) महादेवी वर्मा की
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद की।

प्रश्न 46.
‘महात्मा शेखसादी’ जीवनी के रचनाकार कौन हैं ?
(क) शुकदेव प्रसाद
(ख) चेखव
(ग) प्रेमचंद
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 47.
‘राम चर्चा’ जीवनी किसकी रचना है ?
(क) दिनकर की
(ख) पाश की
(ग) कुँवर नारायण की
(घ) प्रेमघंद की
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद की ।

प्रश्न 48.
‘कलम’ जीवनी किसकी कृति है ?
(क) पाश की
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) प्रेमचंद की
(घ) उषा प्रियंवदा की
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद की ।

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प्रश्न 49.
‘तलवार और त्याग’ जीवनी के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमघंद
(ख) चेखव
(ग) कैफ़ी आज़मी
(घ) पाश
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 50.
‘दुर्गादास’ जीवनी के लेखक कौन हैं ?
(क) द्विवेदी
(ख) पंत
(ग) निराला
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद ।

प्रश्न 51.
‘मनमोदक’ के संपादक कौन हैं ?
(क) सर्वेश्वर
(ख) प्रेमचंद
(ग) अरूण कमल
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद ।

प्रश्न 52.
‘गल्पसमुच्च’ के संपादक कौन हैं ?
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) उषा प्रियंवदा
(ग) दिनकर
(घ) प्रेमचंद
इत्तर :
(घ) प्रेमचंद ।

प्रश्न 53.
‘गल्परत्न’ के संपादक कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) अरूण कमल
(ग) दिनकर
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 54.
निम्नलिखित में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनूदित है ?
(क) कुछ विचार
(ख) आजाद क्या
(ग) प्रेरणा
(घ) मानसरोवर
उत्तर :
(ख) आजाद क्या ।

प्रश्न 55.
निम्न में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनूदित है ?
(क) दुर्गादास
(ख) चाँदी की डिबिया
(ग) कलम
(घ) कर्बला
उत्तर :
(ख) चाँद की डिबिया।

प्रश्न 56.
निम्न में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनूदित है ?
(क) अहंकार
(ख) कुछ विचार
(ग) कफन
(घ) रंगभूमि
उत्तर :
(क) अहंकार।

प्रश्न 57.
निम्न में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनूदित है ?
(क) समरयात्रा
(ख) प्रेमाश्रय
(ग) हड़ताल
(घ) संग्राम
उत्तर :
(ग) हड़ताल ।

प्रश्न 58.
निम्न में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनुदित है ?
(क) सृष्टि का आरंभ
(ख) सेवासदन
(ग) कलम
(घ) गबन
उत्तर :
(क) सृष्टि का आरंभ ।

प्रश्न 59.
निम्न में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनूदित है ?
(क) सुखदास
(ख) प्रेरणा
(ग) वरदान
(घ) कायाकल्प
उत्तर :
(क) सुखदास ।

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प्रश्न 60.
निम्न में से कौन-सी रचना प्रेमचंद द्वारा अनूदित है ?
(क) दुर्गादास
(ख) सप्तसरोज
(ग) पिता के पत्र पुत्री के नाम
(घ) कफ़न
उत्तर :
(ग) पिता के पत्र पुत्री के नाम ।

प्रश्न 61.
‘हिंसा परमो धर्म:’ किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद की
(ख) हरिशंकर परसाई की
(ग) धर्मवीर भारती की
(घ) अरूण कमल
उत्तर :
(क) प्रेमचंद की।

प्रश्न 62.
‘हिसा परमो धर्म:’ का अर्थ है ?
(क) हिंसा धर्म नहीं है
(ख) हिंसा धर्म दूसरे के लिए है
(ग) हिंसा परम धर्म है
(घ) हिंसा धर्म का नाम है
उत्तर :
(ग) हिंसा परम धर्म है।

प्रश्न 63.
‘हिंसा परमो धर्म:’ का नायक कौन है ?
(क) आबिद
(ख) हामिद
(ग) जामिद
(घ) वाहिद
उत्तर :
(ग) जामिद

प्रश्न 64.
जामिद को किस काम में मजा आता था ?
(क) आम चुराने में
(ख) बेकाम का काम करने में
(ग) अत्याचार करने में
(घ) स्वियों की रक्षा करने में
उत्तर :
(ख) बेकाम का काम करने में।

प्रश्न 65.
लोग किसे बौड़म समझते थे ?
(क) हामिद् को
(ख) वाहिद को
(ग) काजी को
(घ) जामिद् को
उत्तर :
(घ) जामिद को ।

प्रश्न 66.
जामिद की आए दिन किससे छेड़छाड़ होती रहती थी ?
(क) पंडितों से
(क) मौलवियों से
(ग) स्व्रियों से
(घ) कांस्टेबिल से
उत्तर :
(घ) कांस्टेबिल से ।

प्रश्न 67.
रोटियों के लिए कौन मुहताज था ?
(क) पंडित
(ख) काजी
(ग) जामिद
(घ) लेखक
उत्तर :
(ग) जामिद।

प्रश्न 68.
‘दीवाना’ कौन है ?
(क) हामिद
(ख) जामिद्न
(ग) पंडित
(घ) लेखक
उत्तर :
(ख) जामिद ।

प्रश्न 69.
जामिद को ‘देवता-तुल्य’ कौन मालूम होते थे ?
(क) गाँव के लोग
(ख) नगर के लोग
(ग) पंडित
(घ) काजी
उत्तर :
(ख) नगर के लोग ।

प्रश्न 70.
जामिद को क्या खूब याद था ?
(क) गीत
(ख) कविता
(ग) भजन
(घ) कहानी
उत्तर :
(ग) भुजन ।

प्रश्न 71.
लोगों पर जामिद की किस बात का बड़ा असर पड़ा ?
(क) उसके कद् का
(ख) उसके कीर्तन का
(ग) उसकी भक्ति का
(घ) उसकी सफाई का
उत्तर :
(ख) उसके कीर्तन का।

प्रश्न 72.
जामिद किसकी उदारता और धर्मनिष्ठा का कायल हो गया ?
(क) नगर के लोगों का
(ख) मंदिर के पुजारी का
(ग) काज़ी साहब का
(घ) अपने आश्रयदाताओं का
उत्तर :
(घ) अपने आश्रयदाताओं का ।

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प्रश्न 73.
‘सैलानी युवक’ कौन है ?
(क) हामिद
(ख) जामिद
(ग) पंडित
(घ) काजी
उन्नर :
(ख) जामिद ।

प्रश्न 74.
कौन भक्तों का सिरमौर बना हुआ था ?
(क) जामिद्ध
(ख) काजी
(ग) आश्रयदाता
(घ) लेखक
उत्तर :
(क) जामिद ।

प्रश्न 75.
एक दिन जामिद क्या पढ़ रहा था ?
(क) गीता
(ख) कुरान
(ग) पुराण
(घ) वेद्
उत्तर :
(ग) पुराण ।

प्रश्न 76.
‘रक्त खौलना’ का अर्थ क्या है ?
(क) तेज बुखार होना
(ख) रक्तचाप बढ़ना
(ग) खून गर्म होना
(घ) काफी गुस्सा आना
उत्तर :
(घ) काफी गुस्सा आना।

प्रश्न 77.
किसे अपनी ताकत का नशा था ?
(क) काजी को
(ख) तांगेवाले को
(ग) जामिद् को
(घ) बलिष्ठ युवक को
उत्तर :
(घ) बलिष्ठ युवक को ।

प्रश्न 78.
दोनों में मलयुद्ध होने लगा – ‘दोनों’ कौन हैं ?
(क) बलिष्ठ युवक और बुद्धुा
(ख) बलिष्ठ युवक और जामिद
(ग) ताँगेवाला और जामिद
(घ) काज़ी और जामिद
उत्तर :
(ख) बलिष्ठ युवक और जामिद ।

प्रश्न 79.
आखिर वह बेदम होकर गिर पड़ा – ‘वह’ कौन है ?
(क) जामिद्र
(ख) काजी
(ग) बलिष्ठ युवक
(घ) बुड्डा
उत्तर :
(क) जामिद् ।

प्रश्न 80.
इनकी वह सज्जनता आज कहाँ गई ‘इनकी’ से कौन संकेतित है ?
(क) जामिद
(ख) काजी
(ग) आश्रयदाता
(घ) बलिष्ठ युवक
उत्तर :
(ग) आश्रयदाता ।

प्रश्न 81.
कल हम दोनों अकेले पड़ गए थे – वक्ता कौन है ?
(क) काज़ी
(ख) बलिष्ठ युवक
(ग) बुड्डा
(घ) जामिद
उत्तर :
(ग) बुद्धा ।

प्रश्न 82.
‘आटे-दाल का भाव मालूम होना’ का अर्थ क्या है ?
(क) आटा और चावल की कीमत जानना
(ख) आटे-दाल के बारे में जानना
(ग) असलियत का पता चलना
(घ) आटा-दाल खरीदना
उत्तर :
(ग) असलियत का पता चलना ।

प्रश्न 83.
काजी का नाम क्या है?
(क) अख्तर हुसैन
(ख) मुश्ताक हुसैन
(ग) काजी हुसैन
(घ) जोरावर हुसैन
उत्तर :
(घ) जोरावर हुसैन ।

प्रश्न 84.
शादी हो जाने देते, तब मजा आता – वक्ता कौन है ?
(क) लेखक
(ख) बलिष्ठ युवक
(ग) काजी
(घ) लोग
उत्तर :
(ग) काजी ।

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प्रश्न 85.
सभी उसकी हिम्मत, जोर और मज़हबी जोश की प्रशंसा करते थे – ‘उसकी’ से कौन संकेतित है ?
(क) काजी
(ख) जामिद
(ग) बलिष्ठ युवक
(घ) बुड्दा
उत्तर :
(ख) जामिद्व ।

प्रश्न 86.
महिला के पति का नाम क्या है ?
(क) सुन्दरलाल
(ख) जामिद
(ग) पंडित राजकुमार
(घ) पंडित शेखर
उत्तर :
(ग) पंडित राजकुमार ।

प्रश्न 87.
‘विद्या का सागर’ किसे कहा गया है ?
(क) जामिद को
(ख) तांगेवाले को
(ग) लोगों को
(घ) काजी को
उत्तर :
(घ) काजी को।

प्रश्न 88.
‘न्याय का भंडार’ किसे कहा मया है ?
(क) काजीी को
(ख) जामिद्द को
(ग) पुजारी को
(घ) लेखक को
उत्तर :
(क) काज़ी को।

प्रश्न 89.
‘नीति, धर्म और दर्शन का आगर’ किसे कहा गया है ?
(क) प्रेमचंद को
(ख) जामिद को
(ग) काजी को
(घ) नगरवासी को
उत्तर :
(ग) काज़ी को।

प्रश्न 90.
हम कमजोर हैं – ‘हम’ का प्रयोग किसके लिए किया गया है ?
(क) हिन्दू
(ख) मुसलमान
(ग) सिख
(घ) ईसाई
उत्तर :
(ख) मुसलमान

प्रश्न 91.
तुम कुत्ते हो – किसे कुत्ते कहा गया है ?
(क) तांगवाले को
(ख) जामिद को
(ग) काजी को
(घ) पंडित राजकुमार को
उत्तर :
(ग) काजी को ।

प्रश्न 92.
औरत के पति का घर किस मुहल्ले में था ?
(क) दारागंज
(ख) सुल्तानगंज
(ग) अहिवागंज
(घ) नूरगंज
उत्तर :
(ग) अहियागंज ।

प्रश्न 93.
जामिद पर किसने लदु चलाया ?
(क) बलिष्ठ युवक ने
(ख) बुड्धा ने
(ग) काज़ी ने
(घ) तांगेवाले ने
उत्तर :
(ग) काज़ी ने ।

प्रश्न 94.
स्त्री-पात्र का नाम क्या है ?
(क) सुमित्रा
(ख) इंदिरा
(ग) लक्ष्मी
(घ) सीता
उत्तर :
(ख) इंदिरा ।

प्रश्न 95.
वहाँ मजहब का नाम सहानुभूति, प्रेम और सौहार्द था – ‘वहाँ’ से कौन-सा स्थान संकेतित है ?
(क) गाँव
(ख) शहर
(ग) मंदिर
(घ) मस्जिद
उत्तेर :
(क) गाँव ।

प्रश्न 96.
वह हिमायत करने से बाज न आता था – ‘वह’ कौन है ?
(क) लेखक
(ख) काजी
(ग) जामिद
(घ) तांगेवाला
उत्तर :
(ग) जामिद ।

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प्रश्न 97.
लोगों ने किसे बहुत धिक्कारा ?
(क) जामिद को
(ख) काज़ी को
(ग) तांगेवाले को
(घ) लेखक को
उत्तर :
(क) जामिद को ।

प्रश्न 98.
‘आँखें खुली’ का अर्थ है ?
(क) सोकर उठा
(ख) आँखें सूज गई
(ग) आँखे बंद थी
(घ) ज्ञान हुआ
उत्तर :
(घ) ज्ञान हुआ ।

प्रश्न 99.
‘सीधे मुँह बात न करना’ का अर्थ है ?
(क) मुँह टेढ़ा होना
(ख) रूठना
(ग) मनाना
(घ) उपेक्षा करना
उत्तर :
(घ) उपेक्षा करना।

प्रश्न 100.
जामिद के गाँव में क्या नहीं था ?
(क) मंदिर-मस्जिद
(ख) मंदिर-गुरूद्वारा
(ग) मस्जिद-चर्च
(घ) मस्जिद-गुरूद्वारा
उत्तर :
(क) मंदिर-मस्जिद ।

प्रश्न 101. जामिद की दृष्टि में किसका सम्मान था ?
(क) धन का
(ख) ज्ञान का
(ग) मजहब का
(घ) भजन का
उत्तर :
(ग) मजहब का ।

प्रश्न 102.
‘ईमान के पक्के, सत्यवादी’ – किसे कहा गया है ?
(क) गाँव के लोगों को
(ख) मंदिर के लोगों को
(ग) शहर के लोगों को
(घ) मस्जिद् के लोगों को
उत्तर :
(ग) शहर के लोगों को ।

प्रश्न 103.
प्रेमचंद के जन्म स्थान का नाम क्या था?
(क) सोरों
(ख) लमही
(ग) विसपी
(घ) छतरपुर
उत्तर :
(ख) लमही।

प्रश्न 104.
प्रेमचंद के प्यार का नाम क्या था?
(क) नबाबराय
(ख) राम
(ग) धनपतराय
(घ) अजबराय
उत्तर :
(क) नबाबराय ।

प्रश्न 105.
प्रेमचंद के पिता का नाम क्या था?
(क) शिवचंद्रराय
(ख) अजायब राय
(ग) सुंधनीसाहू
(घ) श्रीरामचंद्र
उत्तर :
(ख) अजायब राय ।

प्रश्न 106.
प्रेमचंद् की माता का नाम क्या था?
(क) आनंदी देवी
(ख) लक्ष्मी देवी
(ग) राधा देवी
(घ) मंगला देवी
उत्तर :
(क) आनंदी देवी ।

प्रश्न107.
प्रेमचंद हिंदी से पूर्व किस भाषा में लिखते थे?
(क) बंगला
(ख) अवधी
(ग) पंजाबी
(घ) उर्दू
उत्तर :
(घ) उर्दू।

प्रश्न 108.
प्रेमचंद ने हिंदी में कब से लिखना शुरु किया?
(क) सन् 1914
(ख) सन् 1915
(ग) सन् 1916
(घ) सन् 1917
उत्तर :
(घ) सन् 1917 ।

प्रश्न 109.
निम्नलिखित में से कौन-सा कहानी-संग्रह प्रेमचंद का नहीं है।
(क) सप्तसरोज
(ख) विपथगा
(ग) प्रेमसरोवर
(घ) मानसरोवर
उत्तर :
(ख) विपथगा ।

प्रश्न 110.
प्रेमचंद ने कितनी कहानियाँ लिखीं?
(क) लगभग दो सौ
(ख) लगभग तीन सौ
(ग) लगभग चार सौ
(घ) लगभग पाँच सौ
उत्तर :
(ख) लगभग तीन सौ ।

प्रश्न 111.
‘ठाकुर का कुआँ’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) प्रेमचंद्र
(ख) अजेय
(ग) सुदर्शन
(घ) प्रसाद
उत्तर :
(क) प्रेमचंद्र

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प्रश्न 112.
निम्नलिखित में से कौन-सी कहानी प्रेमचंद की नहीं है?
(क) आत्माराम
(ख) ईश्वरीय न्याय
(ग) रानी सारंधा
(घ) खेल
उत्तर :
(घ) खेल ।

प्रश्न 113.
निम्नलिखित में से कौन-सी कहानी प्रेमचंद की है?
(क) सज्जनता का दंड
(ख) बाणवधू
(ग) चाकलेट
(घ) हत्या
उत्तर :
(क) सज्जनता का दंड ।

प्रश्न 114.
‘बड़े घर की बेटी’ तथा ‘पंच-परमेश्वर’ किसकी रचना है?
(क) जैनेन्द्र
(ख) अजेय
(ग) भारतेंदु
(घ) प्रेमघंद
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद ।

प्रश्न 115.
‘बूढ़ी काकी’ तथा ‘ईदगाह’ के रचनाकार हैं ।
(क) प्रेमचंद
(ख) अजेय
(ग) भारतेंदु
(घ) जैनेन्द्र
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 116.
निम्नलिखित में से कौन-सा उपन्यास प्रेमचंद का नहीं है?
(क) सेवासदन
(ख) परीक्षागुरु
(ग) निर्मला
(घ) गबन
उत्तर :
(ख) परीक्षागुरु ।

प्रश्न 117.
प्रेमचंद किस संघ के अध्यक्ष थे?
(क) मजदूर संघ
(ख) श्रमिक संघ
(ग) बेरोजगार संघ
(घ) प्रगतिशील लेखक संघ
उत्तर :
(घ) प्रगतिशील लेखक संघ।

प्रश्न 118.
निम्नलिखित में से कौन-सा उपन्यास प्रेमचंद का नहीं है?
(क) प्रेमा
(ख) वरदान
(ग) प्रेमाश्रम
(घ) कंकाल
उत्तर :
(घ) कंकाल।

प्रश्न 119.
‘प्रेमचंद युग’ का नामकरण किस विधा पर आधारित है?
(क) उपन्यास
(ख) नाटक
(ग) एकांकी
(घ) कविता
उत्तर :
(क) उपन्यास ।

प्रश्न 120.
‘उपन्यास-सम्राट’ की उपाधि किस उपन्यासकार को मिली?
(क) प्रसाद
(ख) प्रेमचंद्
(ग) सुदर्शन
(घ) अमृतलाल नागर
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद।

प्रश्न 121.
प्रेमचंद का पहला उपन्यास कौन-सा है?
(क) प्रेमा
(ख) गबन
(ग) गोदान
(घ) निर्मला
उत्तर :
(क) प्रेमा ।

प्रश्न 122.
प्रेमचंद द्वारा हिंदी में लिखित प्रथम मौलिक उपन्यास का नाम लिखें।
(क) प्रेमाश्रम
(ख) कायाकल्प
(ग) सेवासदन
(घ) प्रेमा
उत्तर :
(ख) कायाकल्प ।

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प्रश्न 123.
प्रेमचंद का नामकरण ‘प्रेमचंद’ किसने किया?
(क) जैनेन्द्र ने
(ख) उपेन्द्रनाथ अश्क ने
(ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी ने
(घ) दयानारायण निगम ने
उत्तर :
(घ) दयानारायण निगम ने ।

प्रश्न 124.
प्रेमचंद को ‘पूँजीवाद यथार्थवाद’ का रचनाकार किसने कहा?
(क) रामविलास शर्मा ने
(ख) शिवदान सिंह चौहान ने
(ग) नंद दुलारे वाजपेयी ने
(घ) डॉ. नगेन्द्र ने
उत्तर :
(ख) शिवदान सिंह चौहान ने ।

प्रश्न 125.
प्रेमचंद का सबसे प्रसिद्ध और अंतिम उपन्यास कौन-सा है ?
(क) गबन
(ख) रंगभूमि
(ग) गोदान
(घ) कर्मभूमि
उत्तर :
(ग) गोदान ।

प्रश्न 126.
प्रेमचंद का कौन-सा उपन्यास ‘ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का महाकाव्य’ कहलाता है?
(क) गोदान
(ख) गबन
(ग) रंगभूमि
(घ) निर्मला
उत्तर :
(क) गोदान

प्रश्न 127.
प्रेमचंद की हिंदी की पहली कहानी कौन-सी है?
(क) पंच परमेश्वर
(ख) बलिदान
(ग) बड़े घर की बेटी
(घ) सौत
उत्तर :
(घ) सौत

प्रश्न 128.
‘सौत’ कहानी किस वर्ष प्रकाशित हुई?
(क) सन् 1915
(ख) सन् 1916
(ग) सन् 1917
(घ) सन् 1918
उत्तर :
(ग) सन् 1917

प्रश्न 129.
प्रेमचंद की अंतिम कहानी कौन-सी है?
(क) नशा
(ख) बड़े भाई साहब
(ग) कफ़न
(घ) ईंदगाह
उत्तर :
(ग) कफ़न ।

प्रश्न 130.
प्रेमचंद को ‘कबीर के बाद हिन्दी का सबसे बड़ा व्यंग्यकार’ किसने माना है?
(क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने
(ख) रामविलास शर्मा ने
(ग) नगेन्द्र ने
(घ) निराला ने
उत्तर :
(क) आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने।

प्रश्न 131.
प्रेमचंद की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ किस प्रकार की रचना है?
(क) आंचलिक
(ख) ऐतिहासिक
(ग) सामाजिक
(घ) धार्मिक
उत्तर :
(ख) ऐतिहासिक ।

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प्रश्न 132.
‘हिंदी गल्पकला का विकास’ निबंध के निबंधकार हैं?
(क) प्रसाद
(ख) प्रेमचंद
(ग) जैनेन्द्र
(घ) निराला
उत्तर :
(ख) प्रेमचंद ।

प्रश्न 133.
प्रेमचंद् की पत्नी का नाम क्या था?
(क) शारदा
(ख) मालती
(ग) शिवरानी
(घ) हेमरानी
उत्तर :
(ग) शिवरानी ।

प्रश्न 134.
‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की?
(क) प्रेमचंद
(ख) रामचंद्र शुक्ल
(ग) अज्ञेय
(घ) निराला
उत्तर :
(क) प्रेमचंद ।

प्रश्न 135.
‘साहित्य का उद्देश्य’ किसकी रचना है?
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ख) नगेन्द्र
(ग) प्रेमचंद
(घ) आचार्य शुक्ल
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 136.
‘कलम का सिपाही’ नाम से कौन-सा लेखक प्रसिद्ध है?
(क) यशापाल
(ख) प्रसाद
(ग) प्रेमचंद
(घ) अजेय
उत्तर :
(ग) प्रेमचंद ।

प्रश्न 137.
प्रेमचंद किस कोटि के रचनाकार थे?
(क) राजनीतिक
(ख) सांस्कृतिक
(ग) आदर्शोन्मुख यथार्थवादी
(घ) सामाजिक
उत्तर :
(ग) आदर्शोन्मुख यथार्थवादी।

प्रश्न 138.
प्रेमचंद किस युग के रचनाकार थे?
(क) द्विवेदी युग
(ख) भारतेंदु युग
(ग) छायावादी
(घ) रीति युग
उत्तर :
(क) द्विवेदी युग ।

प्रश्न 139.
प्रेमचंद्ध की कहानियों में किसका जीवंत-चित्रण मिलता है?
(क) शहरी – जीवन
(ख) सैनिक-जीवन
(ग) ग्राम्य-जीवन
(घ) वन्य जीवन
उत्तर :
(ग) ग्राम्य-जीवन।

प्रश्न 140.
निम्नलिखित में से कौन-सा नाटक प्रेमचंद का नहीं है?
(क) संग्राम
(ख) कर्बला
(ग) रुठी रानी
(घ) आवाढ़ का एक दिन
उत्तर :
(घ) आषाढ़ का एक दिन ।

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प्रश्न 141.
निम्नलिखित में से कौन-सा नाटक प्रेमचंद् का है?
(क) हल्लाबोल
(ख) प्रेम की वेदी
(ग) चरणदास चोर
(घ) अंधेर नगरी
उत्तर :
(ख) प्रेम की वेदी।

प्रश्न 142.
प्रेमचंद ने उर्दू में कब से लिखना शुरु किया?
(क) सन् 1907
(ख) सन् 1908
(ग) सन् 1909
(घ) सन् 1910
उत्तर :
(क) सन् 1907 ।

प्रश्न 143.
प्रेमचंद ने किस साहित्यकार की कहानियों का अनुवाद हिंदी में किया था?
(क) हबीब तनवीर
(ख) रसखान
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) अश्क
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर ।

प्रश्न 144.
प्रेमचंद् की कौन-सी पुस्तक अंग्रेज सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी?
(क) सोजे वतन
(ख) निर्मला
(ग) गबन
(घ) मानसरोवर
उत्तर :
(क) सोजे वतन

प्रश्न 145.
प्रेमचंद का पहला हिंदी उपन्यास कौन-सा था ?
(क) सेवासदन
(ख) निर्मला
(ग) गबन
(घ) कायाकल्प
उत्तर :
(घ) कायाकल्प ।

प्रश्न 146.
‘प्रेमचंद घर में’ (जीवनी) के रचनाकार कौन हैं?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) सुभद्रा कुमारी चौहान
(ग) शिवरानी देवी
(घ) राधिका देवी
उत्तर :
(ग) शिवरानी देवी ।

प्रश्न 147.
‘टॉलस्टाय की कहानियाँ’ के रचनाकार हैं?
(क) टालस्टाय
(ख) प्रेमचंद
(ग) निर्मल वर्मा
(घ) सुरेन्द्र वर्मा
उत्तर :
प्रेमचंद्।

प्रश्न 148.
प्रेमचंद की तुलना निम्नलिखित में से किस साहित्यकार से की जाती है?
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ख) मौविसम गोर्की
(ग) शेक्सपियर
(घ) टॉलस्टाय
उत्तर :
(ख) मौक्सिम गोर्की।

प्रश्न 149.
प्रेमचंद अंत तक किस पत्रिका से जुड़े रहे?
(क) हंस
(ख) आजकल
(ग) कादम्बिनी
(घ) जागरण
उत्तर :
(क) हंस ।

प्रश्न 150.
‘बेटों वाली विधवा’ तथा ‘बूढ़ी काकी’ किसकी रचना है?
(क) निराला
(ख) महादेवी
(ग) प्रसाद
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(घ) प्रेमघंद ।

टिप्पणियाँ

नमाज : प्रस्तुत शब्द्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
नमाज मुसलमानों की ईश्वर-प्रार्थना है जो पाँच वक्त होती है। इसमें 42 रक्अत नमाज़ पढ़ी जाती है। एक रक्अत एक बार खड़े होकर बैठने तक की होती है।

निकाह : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
निकाह मुसलमानों के विवाह को कहते हैं। निकाह से संबंधित सारी शर्ते निकाहनामा में लिखी रहती है। शादी-शुदा औरत को निकाही कहते हैं।

काफिर : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
जो व्यक्ति सच्चाई पर परदा डालने वाला होता है तथा अल्लाह की नेमत के लिए उसका शुक्रिया अदा नहीं करता है, वह ‘काफिर’ कहलाता है।

काज़ी : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
काज़ी साधारणत: निकाह पढ़ानेवाले को कहते हैं लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल न्यायकर्ता तथा मुंसिफ के लिए भी होता है।

इस्लाम : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।

साधारणतः इस्लाम का अर्थ एक धर्म-विशेष है जिसे हजरत पैगे्बर ने चलाया था। इस्लाम के अन्य दो अर्थ भी लिए जाते है – ‘शांति चाहना’ तथा ‘अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाना’।

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शोहदे : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
शोहदे मनचलों के लिए व्यवहार किया जाता है जो सामाजिक नियमों को अनदेखा कर अपनी मनमानी करते हैं।

खुदा : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
खुदा उर्दू का शब्द है। इसे अल्लाह, परमात्मा या ईश्वर के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस्लाम के अनुसार इस दुनिया को बनाने वाला खुदा है और सारे मुसलमान खुदा के बंदे हैं।

देवंता : प्रस्तुत शब्द प्रेमचंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
प्रारंभ में देवताओं को तीन वर्ग में रखा गया था — पृथ्वी स्थानीय देवता, अंतरिक्ष स्थानीय देवता और भूस्थानीय देवता। ये क्रमशः अग्नि, वायु और सूर्य थे। फिर इन्हीं तीन से 33 और आगे चलकर 33 करोड़ देवता कल्पित कर लिए गए।

राक्षस : प्रस्तुत शब्द प्रेमंद की कहानी ‘हिंसा परमो धर्म:’ से लिया गया है।
राक्षस को असुर भी कहा जाता है। एक मान्यता के अनुसार पहले आर्य ‘सुर’ और ‘असुर’ दोनों देवों की पूजा करते थे। बाद में असुर पूजक ईरान की ओर चले गए, सुर को पूजने वाले भारत में ही रह गए। कहीं-कहीं भिन्न धार्मिक विश्वास और रीति-रिवाजवालों को भी राक्षस कहा गया है।

पाठ्याधारित व्याकरण

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः 9

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः 11
WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः 12

WBBSE Class 9 Hindi हिंसा परम धर्मः Summary

लेखक परिचय

प्रेमचन्द् का वास्तविक नाम धनपत राय था और उन्हे नवाब राय भी कहा जाता था। उनका जन्म काशी के निकट लमही नामक ग्राम में श्रावण कृष्ण पक्ष 10 , शनिवार सं० 1937 वि० (31 जुलाई सन् 1880 ई०) को हुआ था। वे एक साधारण कायस्थ परिवार के बालक थे और उनके पिता का नाम अजायबराय तथा माता का नाम आनन्दी देवी था। बहुत ही छोटी आयु में इन्हें मातृ-स्नेह से वंचित हो जाना पड़ा।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 2 हिंसा परम धर्मः 13

हाईस्कूल की परीक्षा पास कर अध्यापक की नौकरी कर ली। अथ्यापन कार्य में रहते हुए भी प्रेमचंद ने अपना अध्ययन जारी रखा और घर पर ही पढ़कर इण्टर एवं बी० ए० की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। उन्नति करते हुए वे सरकारी शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इस्पेक्टर हो गये – सन् 1920 के राजनीतिक आन्दोलनों से प्रभाबित होकर सरकारी नौकरी से स्यागपत्र दे दिया । इसके पश्चात् वे कानपुर के मारवाड़ी विद्यालय में प्रधानाध्यापक हो गये लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही वहाँ से भी त्यागपत्र देकर उन्होंने मर्यादा पत्र का सम्पादन किया और लखनक आकर माधुरी मासिक पत्रिका का सम्पादकत्व भी संभाला।

इसके बाद वह काशी चले गये और स्वतंत्र रूप से हंस तथा जागरण का प्रकाशन करते रहे। काशी में उन्होंने सरस्वती प्रेस की भी स्थापना की। उन्हीं दिनों बम्बई की एक फिल्म कम्पनी ने भी उन्हें अपने यहाँ कार्य करने के लिए आमंत्रित किया पर वह अधिक दिनों तक वहाँ न रह सके और काशी लौट आये। 16 जून सन् 1936 को बीमार पड़े किन्तु चिकित्सा से उन्हें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा और अक्टूबर सन् 1936 (सं० 1993) के प्रात: काल उनकी मृत्यु हो गयी।

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कृतियाँ – प्रेमचंद ने हिन्दी-साहित्य को समुन्नत करने में अपना महत्वपूर्ण योग दिया है और उनकी रचनाओं को हम कई रूपों में पाते हैं –

  • उपन्यास – रूठी रानी, प्रेमा, वरदान, सेवासदन, प्रेमाश्रय, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण)।
  • कहानी-संग्रह – सप्तसरोज, नवनिधि, प्रेम पूर्णिमा, प्रेम पचीसी, प्रेम-प्रसून। प्रेम प्रतिमा, प्रेम द्वादशी, अग्नि समाधि, सप्तसुमन, समर यात्रा, प्रेम सरोवर, प्रेरणा, नवजीवन, मानसरोवर (आठ भाग), कुत्ते की कहानी, कफन, जंगल की कहानियाँ।
  • नाटक – कर्बला, संग्राम और प्रेम की वेदी।
  • निबन्ध-संग्रह – स्वराज्य के फायदे, कुछ विचार, साहित्य का उद्देश्य।
  • जीवनियाँ – महात्मा शेखवादी, राम चर्चा, कलम, तलवार और त्याग, दुर्गादास।
  • सम्पादित – मनमोदक, गल्पसमुच्चय, गल्परत्न।
  • अनूदित – अहंकार सृष्टि का आरम्भ आजाद-क्या, सुखदास, चाँदी की डिबिया, हड़ताल, न्याय, पिता के पत्र पुत्री के नाम।

पृष्ठ सं० – 37

  • बेफिक्र = बिना फिक्र (चिंता) के ।
  • बेदाम = बिना कीमत के ।
  • बेकाम = व्यर्थ का काम।
  • हकीम = चिकित्सक।
  • हाजिर = उपस्थित।
  • हिमायत = तरफदारी, पक्ष लेना।
  • बाज न आना = नहीं चूकना।
  • बौड़म = बेवकूफ।
  • उपकार = भलाई।
  • मुहताज = आश्रित।
  • गम = चिढ़।
  • धिक्कारा = भला-बुरा कहा।
  • खैरात = दान।
  • गुलजार = रौनक, हलचल से भरा हुआ।
  • माहात्म्य = महिमा।
  • मजहब = धर्म।
  • सत्यवादी = सत्य बोलने वाला।
  • देवता-तुल्य = देवता के समान।

पृष्ठ सं० – 38

  • सुनहला = सोने के रंग का ।
  • देवालय = मंदिर ।
  • निगाह = नज़र ।
  • दामन = आँचल, धोती का छोर।
  • मेहतर = सफाई करने वाला।
  • भेदिया = जासूस।
  • मुरीद = शिष्य, चेला।
  • परदेशी = दूसरे देश (स्थान) का।
  • स्वरलालिस्य = अच्छी आवाज।
  • फर्श = जमीन की सतह ।
  • जाजिम = जमीन पर बिछाया जानेवाला सफेद चादर ।

पृष्ठ सं० – 39

  • कायल = प्रभावित।
  • फटेहाल = बुरा हाल।
  • खातिर = सम्मान।
  • सैलानी = इधर-उधर घूमते रहने वाला।
  • धर्मपरायण = धर्म का पालन करने वाला ।
  • सहृदय = दयालु ।
  • नित्य = रोज।
  • कदर = इज्ज़त, महत्व।
  • बलिष्ठ = ताकतवर ।
  • दुर्बल = कमज़ोर।
  • कसूर = गलती।
  • खुदाबंद = खुदा के बंदे ।
  • खाँचे= बड़ी टोकरी।
  • गफलत = भूल।
  • अधमरा = आधा मरा हुआ।
  • मलयुद्ध = कुश्ती।
  • करारा = तगड़ा।

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पृष्ठ सं० – 40

  • बेदम = निर्जीव।
  • यातनाएँ = दुःख।
  • अकारण = बिना किसी कारण के।
  • दुर्गति = बुरी दशा।
  • जालिमों = अत्याचारियों, जुल्म करने वाले।
  • बेकरार = बेचैन।
  • तलाश = खोज।
  • लठैत = लाठी चलाने वाले।
  • तीन कोड़ी = साठ।
  • वजू = नमाज पढ़ने के पहले हाथ-पैर-चेहरा आदि धोना।
  • काफिरों = धर्म को नहीं माननेवाले।
  • मोमिन = हकीकत = सच्चाई।
  • मनसूबे = मन की इच्छा।
  • खादिमों = दीनदारों = गरीब-दुखियों की मदद करने वाला।
  • सब्न = संतोष।
  • नाजनीन = सुदंर युवती।

पृष्ठ सं० – 41

  • ताँता = कतार।
  • मजहबी = धार्मिक।
  • आमदरफ्त = आना-जाना।
  • असबाब = सामान।
  • तब्दील = बदल।
  • नाहक = बेकार।
  • खलल = निसाखातिर = निश्चित ।
  • गुमसुम = चुपचाप ।
  • जीना = सीढ़ी।
  • विस्मित = आश्चर्यचकित।

पृष्ठ सं० – 42

  • अपरिचित = अनजान।
  • आबरु = इज्ज़त।
  • मुमकिन = संभव।
  • बे आबरु = बेइज्जत।
  • कबूल = स्वीकार ।
  • कौम = जाति।
  • बीड़ा उठाना = संकल्प लेना।
  • मुल्क = देश।
  • जब = जबरदस्ती।
  • शरारत = शैतानी।
  • शोहदे = मनचले।
  • इमकान भर = ताकत भर।
  • तालीम = शिक्षा।
  • तहजीब = सभ्यता।

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पृष्ठ सं० – 43

  • हक = अधिकार।
  • निकाह = विवाह।
  • दिन बसर करना = दिन गुज़ारना।
  • खैरियत = भलाई, अच्छाई।
  • नेकी = भलाई।

पृष्ठ सं० – 44

  • शौहर = पति।
  • लट्ठ = लाठी।
  • दम = चैन ।
  • इजाजत = अनुमति ।
  • दरखास्त = विनती, प्रार्थना।
  • विषाक्त = जहरीला।
  • घुणा = नफरत।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

दशहरा / विजयादशमी

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • दशहरा मनाने का कारण
  • रामलीला आयोजन की परम्परा
  • उपसंहार।

विजयादशमी इस देश में मनाये जानेवाले अनेक त्योहारों में से एक प्रमुख त्योहार है। इसे आम बोलचाल के शब्दों में दशहरा भी कहा जाता है। भारतीय उत्सव एवं त्योहार देशी तिथियों के हिसाब से मनाये जाते हैं। इस दृष्टि से विजयादशमी का त्योहार आश्विन मास की शुक्ल पक्ष के दशमी को मनाया जाता है। अंग्रेजी महीनों के हिसाब से सितम्बर या अक्टूबर में ही दशहरा मनाया जाता है।

विजयादशमी का त्योहार महिषासुरमर्दिनी शक्ति के अवतार और सिंहवाहिनी देवी दुर्गा की विजय गाथा के साथ भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, महिषासुर नामक दुर्दान्त असुर से देव-जाति को बचाने के लिये देवी दुर्गा ने उसके साथ लगातार नौ दिनों तक घमासान युद्ध किया था। दसवें दिन यानी दशमी तिथि को कहीं जाकर उसका वध किया था। उसी विजय की स्मृति में नौ दिनों तक स्त्रियाँ तथा भक्तजन व्रतोपवास रख देवी की पूजा-उपासना करते हैं। दसवें दिन बालिकाओं को खिला-पिलाकर अपने व्रत का उपारण करती हैं। राम कथा के समान यह कथा भी आसुरी शक्तियों पर दैवी शक्तियों की विजय गाथा ही है।

विजयादशमी शक्ति की साधना का प्रतीक है। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा नवरात्र में करने के बाद आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी को इसका समापन दस शीशधारी रावण के वध के साथ होता है। अत: इसे दशहरा भी कहा जाता है।

दसानन रावण का संहार राम ने शक्ति की साधना करके किया था। दशमी की विजय यात्रा दुर्गा के जिन नौ रूपों की आराधना के पश्चात् आयोजित की जाती है, उनमें घोर से घोर कष्ट को दूर करने की दैवी क्षमता होती है।

विजयादशमी के दिन माना जाता है कि देवराज इन्द्र ने महादानव वृत्रासुर पर विजय प्राप्त की थी। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने लंका-नरेश रावण पर विजय प्राप्त की थी। इसी दिन पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास की अवधि समाप्त कर द्रौपदी का वरण किया था। महाभारत का युद्ध भी इसी दिन प्रारम्भ हुआ था।

उत्तर भारत में विजयादशमी नौरते टाँगने का पर्व भी है। बहिनें अपने भाइयों को टीका लगा कानों पर नौरते टाँगती हैं। इसमें नंवरात्र पूजन की सफलता और कृषि की श्रीवृद्धि का भाव समाहित रहता है। बहने नवरात्र पूजा विधि-विधान से करके अपने भाइयों को बधाई देने के लिए नवरात्र में बोये जौ (अन्र) के अंकुरित रूप नौरते को उनके कानों पर टाँगती है।

विजयादशमी के दिन शक्ति के प्रतीक शस्रों का शास्रीय विधि से पूजन किया जाता है। प्राचीन काल में, वर्षा काल में युद्ध निपेध था। परिणामस्वरूप वर्षा के चतुर्मास में शस्त्रों को सुरक्षित रख दिया जाता था। विजया दशमी के दिन उन शस्स्वों को निकाल कर उनकी पूजा की जाती थी।

हिन्दी भाषी समाज में नवरात्र के दिनों में रामलीला का मंचन किया जाता है। आश्विन शुक्ल प्रतिपद से मंचन आरम्भ कर दशमी के दिन रावणवध किया जाता है और रावण का पुतला जलाया जाता है।

विजयादशमी धार्मिक दृष्टि से आत्मशुद्धि का पर्व है। पूजा-अर्चना कर शक्ति की याचना की जाती है तथा असत्य पर सत्य की विजय की कामना की जाती है। विजया दशमी के दिन ही सन् 1925 ई० में भारत के राष्रीय पुनर्निर्माण के लिये डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ की स्थापना की थी। यह संगठन राष्र्रीय एकता, सामाजिक समरसता और समर्पण का संस्कार देकर देश की स्वाधीनता के सजग प्रहरियों का सृजन करने का प्रयास करता है। अत: राष्ट्रीय दृष्टि से भी यह सैन्य शक्ति सम्बर्द्धन का दिन है।

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दीपावली

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • दीपावली का पौराणिक महत्व
  • वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व
  • व्यावसायिक महत्व
  • दार्शनिक महत्व
  • दीपावली से लाभ-हानियाँ
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या के दिन हिंदू सुमाज मे दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। आलोक-पर्व दीपावली भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय तथा उल्लासपूर्ण त्योहार है। दीपावली शब्द का अर्थ है दीपों की अवली अथवा पंक्ति। दीपों की माला जलाकर अमावस्या की रात को पूर्णिमा की जगमगाहट से भर देने के कारण इसे दीपावली कहते हैं। इस दिन घर को दीपों से सजाया जाता है। एक साथ असंख्य दीपों की जगमगातो लड़ियों से संपूर्ण वातावरण प्रकाशित हो उठता है। घर-घर में लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा की जाती है। लोग इस दिन आपसी द्वेष को भूलकर एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं। बच्चों के लिए यह दिन विशेष खुशी का होता है। वे नये कपड़े पहनकर, रात्रि में जी भर कर पटाखे जलाते हैं, घूमते हैं। पूरा शहर रोशनी में स्नान करता नजर आता है। लोग अपने घर, दुकान तथा कारखानों की सफाई कराते हैं, रंग-रोगन कराकर उन्हें सजाते हैं। दीपावली एक राष्ट्रीय पर्व है।

दीपावली का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व :- दीपावली का अपना पौराणिक महत्व है। इसका संबंध पुराणों में वर्णित भारतीय समाज के प्राचीन इतिहास से जुड़ा है। इसी दिन कालीमाता ने रक्तबीज नामक उस दुष्ट राक्षस का संहार किया था, जिसके अत्याचार से संपूर्ण समाज ग्रस्त था। उस दुष्ट के संहार के बाद लोगों ने अपने घर में घी के दिए जलाए थे। इस मंगलकारी घटना की याद में ही प्रतिवर्ष दीपावली मनायी जाती है।

लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो इसी दिन उनका राजतिलक किया गया था। संपूर्ण देश में इस उपलष्ष्य में दीपक जलाकर खुशियाँ मनाई गई थीं। कुछ लोग दीपावली का प्रारंभ इसी दिनं से मानते हैं, जबकि अनेक विद्वानों के अनुसार दीपावली का त्यौहार इससे भी अधिक प्राचीनकाल से मनाया जा रहा है।

वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व :- दीपावली का पौराणिक एवम् ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व भी है। वर्षा \#तु में कीड़ो-मकोड़ों, जल में घास-फूस एवं गंदगी के सड़ने से उत्पन्न विषैली गैसों तथा घर-मकान में व्याप्त सीलन को दूर करने में दीपावली के त्योहार की महत्वपूर्ण भूमिका है।

व्यावसायिक महत्व :- दींपावली के दिन व्यवसायी लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा करते हैं। इस दिन से किसी व्यावसायिक कार्य का आरंभ शुभ समझा जाता है। इसके पीछे भी कुछ वैज्ञानिक कारण रहे हैं।

दार्शनिक महत्व :- दीपानती को प्रकाश-पर्व भी कहा जाता है। यह अंधेरे पर प्रकाश की तथा असत्य पर सत्य की विजय का प्रनीक है। यह इस दार्शीच चाण्य को अभिव्यक्त करता है कि अन्धेरा कितना भी घना हो, ज्ञान और कर्त्तंव्य का सामूहिक दीप उस्य अंधेरे को प्रकाश में बदल देता है।

दीपावली से लाभ :- दीपावली के वल त्यौहार ही नहीं है, अपितु इससे अनेक लाभ हैं। घर-मुहल्लों की सफाई, वातावरण की शुद्धि, अपसी़ सद्धाव की भावना का विकास तथा नए कार्य एवम् नई योजनाओं को प्रारंभ करने की प्रेरणा के साथ-साथ दीपावली हमें अंघेरे से, अज्ञानता से तथा असत्यता से लड़ने का भी संदेश देती है।

दीपावली से हानि :- दोपावली के दिन जुआ खेलने, शराब पीने और अशिष्ट आचरण से विनाश को आमंत्रित करने वालों की भी आज कमी नहीं है।ऐसे लोगों के लिए दीपावली का त्योहार लाभ के बदले हानि ही आमंग्रित करता है। देश में अरबों रुपये का बारूद एूँक दिया जाता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था तो प्रभावित होती ही है, वातावरण भी प्रदूषित होता है। अनेक लोग पटाखों के कारण होने वाली दुर्घटना से प्रसित होकर अपनी जिंदगी को नरक बना लेते हैं।

उपसंहार :- किसी भी त्योहार को मनाने के समय हमें उसमें निहित कल्याणकारी अर्थ को समझना चाहिए। दीपावली के त्योहार में भी यहा दृष्टिकोण अपनाना उचित होगा, तभी हम इसका आनंद प्राप्त कर सकते हैं। दीपावली का दीपक हमें प्रेरणा देता है-

जलते दीएक के प्रकाश में, अपना जीवन-तिमिर हटाएँ
उसकी ज्योधिर्मय किरणों से, अपने मन की जज्योति’ जगाएँ।

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ईद

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • त्योहोरों का संबंध
  • रमजान का महीना
  • ईद का दिन
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- त्योहारो का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। त्योहारों के मनाने से सामाजिक जीवन में आपसी भाईचारा बढ़ता है। संप्रदायिक सौहार्द बढ़ता है। जीवन में ताजगी बनाए रखने के लिए पर्व एवम्य्योहारों का चक बनाया गया है। इससे सामाजिक जीजन मे विशेष चहल-पहल आ जाती है तथा सभी संपदाय के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों की जानकारी मिलती है।

त्योहारोों का संबंध :- ध्यारं अधिकांश त्योहारों का संबंध धर्म से जुड़ा हुआ है। हिंदुओं में होली, दीपावली, दशहरा आदि पा विशेग्य महतब है तो ईसाइयों में क्रिसमस का मुख्य स्थान है। मुसलमानों में जो त्योहार मनाए जाते हैं उनमें ईंद का सर्वीधिक महल है। यहत जोंहार सभी मुसलमानों को परोपकार एवम् भाईचारे का संदेश देता है। ईद इस्लाम धर्म का प्रमुख आनंदद्दायक त्योहार है। ईद् वर्ष में दो बार मनाई जाती है। एक को ईद-उल-फितर तथा दूसरी को ईद-उज-जोहा कहते हैं।

ईद से पूर्व रमजान का पविश्र महीना होता है। मुसलमान इस पूरे महीने भर रोजा रखते हैं। वे उपवास (रोजा) रखकर अपना सारा वक्त खुदा की इबादत (आराधना) में बिताते हैं और कोई अनैतिक कार्य न करने का प्रयास करते हैं। पूरे मास वे शरीर और मन पर बड़ा अंकुश रखते हैं। दिन में खाना-पीना तो दूर पानी पीना तक वर्जित होता है। पाँच वक्त नमाज़ पढ़े जाते हैं।

रोजा खत्म होने के बाद आता है ईद का शुम दिन। ईद’ शब्द का अर्थ है -लौटन और ‘फितर’ का अर्थ है-खाना-पीना। ईद-उल-फितत के दिन लोग खाना-पीना शुरू करते हैं। मुसलमान भाई एक मास तक रोजा (वत्) रखने के बाद ईद के दिन मीठी सेवइयाँ बनाते हैं और उन्हें प्रसन्नतापूर्वक आपस में बाँटा जाता है। इसी कारण इसे भीठी ईद भी कहते हैं। इस दिन के दो महीने और नौ दिन बाद चाँद की दस तारीख को एक और ईद मनाई जाती है। यह ईंद-उज-जोहा अथवा ‘बकर-ईद कहलाती है। इस दिन बकरे काटे जाते हैं और उनका मांस इष्ट-मित्रों में बाँटा जाता है

ईद के दिन मुसलमान सूरज निकलने के बाद नमाज़ पढ़ने जाते हैं, जिसमें वे खुंदा (ईश्वर को) धन्यवाद देते हैं कि उसकी कृपा से वे रमजान का व्रत रखने में सफल हो गए और इन दिनों में उनसे जाने-अन्जाने में कोई अपराध हो गया हो तो क्षमा करें। इस दिन वे गरीबों को खूब दान देते हैं। ईद के दिन संसार की सभी मस्जिदों में खूब भीड़ होती है। उस दिन की सामूहिक नमाज का दृश्य देखने योग्य होता है।

उपसंहार :- ईद्रेम और सद्भाव का त्योहार है। यह सभी के लिए खुशी का संदेश लाता है। यह त्योहार प्रेम, एकता और समानता की शिक्षा देता है। सभी समुदायों के लोगों को आपस में मिल-जुलकर यह त्योहार मनाना चाहिए। इससे सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ता है और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत होती है।

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वर्षा-ॠतु

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • वर्षा ॠतु से पूर्व की स्थिति
  • वर्षा का आगमन
  • वर्षा के विविध दृश्य
  • वर्षा का उम्र रूप
  • स.हित्य में वर्षा का वर्णन
  • वर्षा से लाभ व हानियाँ
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत में प्रकृति का अक्षय भंडार है। यहाँ का ऋतु परिवर्तन संसार के अन्य देशों से सुंदर तथा मनोहारी है। दूसरे देशो मे गायः तीन ऋतुएँ होती हैं-वसंत, ग्रीष्म और शरद, किंतु भारत में छः ॠतुओं का एक सुंदर चक है-वसंत, म्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत तथा शिशिर। इन छ: ॠतुओं की प्राकृतिक शोभा सदैव नवीन रूप में विकसित होती है। इन छ: ऋतुओं में वर्षा, म्रीष्म तथा शरद ऋतु प्रुख हैं। वर्षा ॠतु इनमें अपना विशेष महत्व रखती है। हमारा देश सामाजिक तथा आर्थिक रूप से वर्षा पर आश्रित है।

वर्षा ऋतु से पूर्व की स्थिति :- जेठ मास धरती को आग का गोला बना देता है। भयंकर धूप तथा लू से मानव जींवन तप रहा होता है। नदी-नाले सूख जाते हैं। सूरज अपनी गर्म किरणों से पृथ्वीवासियों पर तीक्ष्ष्रहार करता है। वृक्षों के नीचे छाया भी कठिनाई से मिलती है।

धरती का प्रत्येक प्राणी वर्षा के आगमन की प्रतीक्षा करता है। व्याकुल किसान को विश्वास रहता है कि बादल आवश्य आएँगे तथा उनके सूखे हुए खेत को हरा-भरा बना देंगे तथा धरती की प्यास को बुझा देंगे।

वर्षा का आगमन :- सूर्य की गर्मी से तालाबों, झीलों और सागरों का पानी भाप बनकर ऊपर उठता है। यह भाप घनी होकर वादलों का रूप धारण कर लेती है। ये वायु की गति से विभिन्न स्थानों पर पुनः पानी के रूप में बरस पड़ते हैं। इसी को हम वर्षा कहते हैं। शीतल बूँदों का स्पर्श पाकर वनस्पति और पेड़-पौधे झूमने लगते हैं, पशु-पक्षी मस्त हो जाते हैं। मानव का मन हर्ष से नाचने लगता है।

वर्षा के विविध दृश्य :- वर्षा का अपना सौदर्य होता है। धूल-धूसरित पत्ते धुलकर निर्मल हो जाते हैं। चारों ओर हरियाली छा जाती है, आकाश में काली घटाएँ छा जाती हैं। बादल गरजते हैं, बिंजली चमकती है। शीतल पवन मन में उल्लास भर देती है। चारों ओर मेढ़कों की टर्र-टर्र सुनाई पढ़ती है। काले मेघों को देखकर मयूर प्रसन्न होकर नाचने लगते हैं। कोयल का पंचम स्वर कानों में मधुरता का संचार करने लगता है।

वर्षा का उग्र रूप :-वर्षा जहाँ एक ओर सुहावने तथा मोहक वातावरण को जन्म देती है, वहीं दूसरी ओर उप्रता और भयानकता से हुदय को दहला देती है। वर्षा ॠतु की काली-काली रातें झींगुरों की झंकार, मेढ़कों की टर्र-टर्र मिलकर वातावरण को भयानक बना देते हैं। इंझावात जब प्रचंड रूप धारण कर लेता है तो जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। नदियों में बाढ़ आ जाती है। कभी-कभी नदियाँ अपने साथ गाँवों तक को बहाकर ले जाती हैं।

साहित्य में वर्षा वर्णन :- कवियों तथा साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं में वर्षा ऋतु के सौददर्य और उसके भयंकर रूप दोनों का सजीव चित्रण किया है। इंर्रधनुप की झलक, मेघों की कड़क और बिजली की चमक कवियों के दद्यय में नई-नई कल्पनाएँ जगाने लगती हैं।

वर्षा से लाभ :- वर्षा की जीवनदायिनी महिमा है। भारत कृषि-प्रधान देश है। यहाँ की संपन्नता तथा निर्धनता कृषि पर निर्भर करती है। वर्षा के बिना कृषि संभव नहीं है। सिंचाई के कृत्रिम साधन वर्षा की कमी को पूरा नहीं कर सकते। यह जल पूरे वर्ष हमारे खेतों की सिंचाई करता है। बड़ी-बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर, वर्षा के जल को रोकने का प्रयास किया गया है, ताकि उनमें से नहरें निकाली जा सकें और जल-विद्युत का उत्पादन हो सके। वर्षा ॠतु के जल से हरीहरी घासें उगती हैं जो पशुओं के चारे के काम आती है।

वर्षा से हानियाँ :- जहाँ वर्षा ॠतु कोमल-स्वरूपा है, वहीं कठोर भी है। यह अनेक प्रकार से कष्टदायक और हानिकारक भी है। वर्षा से मार्गों व सड़कों पर पानी भर जाता है, वहाँ कीचड़ हो जाने से आवागमन और यातायात में भारी कठिनाई उठानी पड़ती है। वर्षा के कारण कच्चे तथा पुराने मकान गिर जाने से जन-धन की भारी क्षति होती है। अधिक वर्षा से नदियों में बाढ़ आ जाती है जिससे फसल नष्ट हो जाती है, गाँव बह जाते हैं। भारत में प्रतिवर्ष बाढ़ से बहुत हानि होती है।

उपसंहार :- अनेक हानियाँ होने पर भी भारतीय जन-जीवन में वर्षा का अत्यंत महत्व है। इसे जन-जीवन की वरदायिनी देवी माना जाता है। वर्षा हमारे जीवन का आधार है। वह हमें जीवनप्रदायक जल प्रदान करती है। यदि समय से वर्षा न हो तो चारों ओर हाहाकार मच जाता है तथा पीने के पानी का अकाल हो जाता है। इसीलिए हमारा तरसता हुआ मन वर्षा के बादलों के आगमन की प्रतीक्षा करता है।

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शरद्-ऋतु

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • शरद्- ऋतु, ऋतुओं की रानी के रूप में
  • प्रकृति नवीनता के रूप में
  • उपसंहार।

भारत में ऋतु-चक्र के अनुसार छ: ऋतुओं का आना-जाना हुआ करता है। ग्रीष्म-ऋतु के बाद वर्षा और वर्षा के पश्चात् भारत में सुहावनी शरद्- ॠतु का आगमन होता है। सुन्दरता व सुहावनेपन के कारण शरद् को भारतीय मनीषियों ने ऋतुओं की रानी कहा है। निराला जी के शब्दों में – आ गई शरद्, ऋतुओं की रानी। देशी महीनों के हिसाब से आश्विन-कार्तिक मास और अंग्रेजी महीनों के हिसाब से अक्टूबर-नवम्बर मास शरद-ऋतु के लिए माने गये हैं। हम सभी जानते और अनुभव करते हैं कि इन महीनों में वर्षा का प्रकोप समाप्त होकर वातावरण धीरे-धीरे धुल कर साफ हो जाता है। वर्षा-ऋतु की उमस का अन्त होकर इस ऋतु में वातावरण गुलाबी ठण्डक से भर उठता है। दिन का ताप अवश्य कुछ अखरता है, पर सुबह-शाम और राते क्रमश: ठण्डी से ठण्डी होती जाती हैं।

शरद्-ऋतु में वर्षाकालीन कीचड़ सूख कर स्वच्छ हो जाता है। सम्पूर्ण वातावरण स्वच्छ और निर्गध हो जाता है। प्रसादजी के शब्दों में –

वह विवर्ण मुखा त्रस्त प्रवृरति का
आज लगा हँसने पिर से।
वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में
शरद्-विकास नयो सिर से।।

प्रकृति का नवोन्मेष होते ही वायुमण्डल मधुर, भीनी और रसीली सुंगध से भरकर महक उठता है। एकाएक शीतलमंद-सुगन्ध बयार चलकर एहसास दिला जाती है कि ऋतुओं की रानी शरद् का आगमन हो गया है। फल-फूलों से लदे वृक्षों की घनी डालियों पर मदमाते स्वरों में चहककर विहग-गण भी अचानक ॠतु परिवर्तन का आभास देने लगते हैं।

शरद्-ऋतु की चाँदनी का क्या कहना। प्राय: हर भाषा के महान् कवियों, लेखकों ने उस चाँदनी का खुलकर गुणगान किया है। उसे अमृत वर्षा करने वाली बताया है। लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि शरद् पूर्णिमा की रात में खीर पकाकर छतों पर खुले में रात-भर के लिये रख देते हैं, फिर सुबह उठकर यह मानकर खाते हैं कि वह अमृतमयी हो गयी है।

भारत में शरद्- ऋतु का आध्यात्मिक महत्व भी है। इस ऋतु के दौरान लोग कार्तिक मास में प्रति सुबह उठकर समीपस्थ नदियों, सरोवरों आदि में स्नान करते हैं। फिर मंदिर या किसी धार्मिक स्थान पर जाकर भजन-कीर्तन करते हैं। बहुत से लोग महीना भर व्रत-उपवास एवं फलाहार करने के नियम का पालन भी करते हैं। शरद् पूर्णिमा का स्नान करने के लिये लोग गंगासागर, हरिद्वार, गढ़गंगा आदि तीर्थों में जाते हैं या जहाँ कहीं भी जिस रूप में गंगा उपलब्ध है, उसमें स्नान करके अपने आप को धन्य मानते हैं। विशेषकर कार्तिक मास में दान-पुण्य करने का भी बड़ा महत्व माना गया है। इस प्रकार यह ॠतु पवित्र और आध्यात्मिक सिद्धि भी देने वाली है।

इन सारे विवेचनों से स्पष्ट है कि प्राकृतिक, सौन्दर्य वैभव एवं आध्यात्मिक महत्त्व को दृष्ट से शरद्-ॠतु को ऋतुओं की रानी उचित ही कहा गया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से शरत् का बहुत महत्व है। वर्षा के बाद घर की साफ-सफाई, रंगाई शुरू हो जाती है। साल भर का कूड़ा-करकट निकाल दिया जाता है। घर चमकने लगते हैं। शरद्-कतु आने पर विवाह का मौसम भो आ जाता है। शरद्- ऋतु ऐसी ऋतु है जिसमें जीवन जीने का पूरा आनंद मिल जाता है।

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बसंत पंचमी :

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • बसंत ॠतु का प्रमुख त्योहार
  • विद्यः की दंवी सुखवंत।
  • उपसंहार।

बसन्त पंचमी जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है बसन्त ॠतु का प्रमुख त्योहार है। चह भी सट्ट है कि यं बरन्त-ॠतु के दौरान माघ महीना की शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पंचमी तिथि के दिन मनाया जाता है। तिधि वार के अनुसार त्योहार मनाने एकदम स्पष्ट है। देशी महीनों के हिसाब से माघ और फाल्गुन मास बसन्त-ॠतु के मास माने गये हैं। अंग्रेजी महीनों के हिसाब से बसन्त पंचमी का दिन प्राय: फरवरी मास में ही आया करता है।

ऋतुओं का राजा वसंत है। चैत और बैशाख को मधुमास कहा जाता है, किन्तु बसत पंच्चमी से ही इसका आगमन हो जाता है। जेठ और बैशाख की तपती दोपहर के बाद वर्षा का आगमन होता है। तत्पश्चात् शरद्- ॠतु असे उत्साह के साथ आती है। शरद के बाद शिशिर, फिर हेमन्त और बाद में बसंत का आगमन होता है। धरती के चारों तरफ हर्षोल्लास और खेतों में हरियाली का मौसम आ जाता है। प्रकृति अपने अल्हड़ रूप में धरती का शृंगार करने लगाती है। समक्त वातावरण में मानो मादकता फैलने लगती है, हवा में खुशबू आ जाती है। नयी फसल उगने लगती है। वृद्ध नये फूलों से भरकर झूमने लगते हैं।

ॠतुराज बसंत सबको चंचल कर देता है। प्रकृति अपने कोमल किसलय के आँचल से चँतर डुलानी, नौदर्य-सुधा के साथ वैराग्य का अंत कर देती है।

वृक्ष और लता आदि वनस्पतियाँ खिल जाती हैं। सरसों बसंतो रंग के फूलों से लद कर पनोरम लगने लगती है। हिन्दी कवियों की दृष्टि में बसंत धरती के कण-कण में अपना उल्लास बिखेर देता है। जड़-चेतन में स्यंदन कर देता है। बसंत के सौंदर्य को हर कवि ने अलग-अलग ढंग से चित्रित किया है। बसंत के प्रकृति यौवन पर ‘निराला’ गाते हैं-

किसलय बसना नववय लतिका।
मिली मधुर प्रिय उर तरु पतिका।
मधुप वृन्द-वृन्दी पिक स्वर नभ सरसाय।।।
सखि वसन्त आया।

बसंत को केदारनाथ जी ने दुलहिन के रूप में देखा –

विकराल वनखण्डी
लाजवन्ती दुलहिन बन गई।
फूलों के आभूषण पहन आकर्षक बन गई।

एक कवि ने बसंत को मदन महीप का बालक कहा है। बसंत अमोदिनी वृत्ति की संलीन है। इसलिये वसन्तोत्सव को मदनोत्सव भी कहा जाता है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे मादक उत्सवों का काल मानते हैं। उनका कहना है कि कभी अशोक दोहर के रूप में, कभी मदन व देवता की पूजा के रूप में, कभी आप्र-तरू और माधवी लता के रूप में, कीी दोली के रूप में बसंत नाच, गान और काव्यालाप से मुखर हो उठता है।

बसंत पंचमी विद्या की देवी सरस्वती का दिन भी है। इस दिन सरस्वती पूजा का विधान है। वीणावादिनी माँ शारदा की देन है कि वे जीवन के रहस्यों को समझने की सूक्ष्म दृष्टि प्रदान कर ज्ञानालोक से सम्पूर्ण किश्न्त को आलोकित करती हैं। प्राचीन काल में वेद-मंत्रों का पाठ श्रावणी पूर्णिमा से आरम्भ होकर पंचम तिथि को सवाप्त होता भा :

‘निराला’ ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘वर दे वीणावादिनि वर दे’ में जगमग जग कर दे का आग्रह किया है। बसंत पंचमी के दिन पोले वस्र पहनकर हृदय का उल्लास प्रकट किया जाता है।
इस दिन बसंती हलुवा, पीले चावल तथा केसरिया खीर का आनंद लिया जाता है।
बसंत मादक-उमंगों और कामदेव की क्रीड़ा का ही पर्व नहीं, वीरता का त्योहार भी है। फाँसी पर चढ़ने वाले आजादी के मतवाले वीरों ने मेरा रंग दे बसंती चोला की कामना की तो सुभद्रा कुमारी चौहान देश-भक्तों से पूछ बैठी –

वीरों का कैसा हो बसंत?
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग।

बसंत स्वास्थ्यप्रद ऋतु है। इसमें बहने वाली शीतल-मंद-सुगंध वायु मनुष्य को नीरोग कर देती हैं।
अत: हम कह सकते हैं कि बसंत हर दृष्टि से हर्षोल्लास और उत्साह से भर देने वाली ऋतु है।

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ग्रीष्म ॠतु

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • प्रभाव
  • गर्मी से बचने का उपाय
  • उपसंहार।

बसंत के पश्चात् ग्रीष्म का आगमन होता है। ज्येष्ठ और आषाढ़ ग्रीष्म के महीने हैं। गर्मी आते ही हरियाली गायब हो जाती है और लू चलने लगती है। स्फूर्ति की जगह आलस्य और निष्क्रियता ले लेती है।

गर्मी में दिन लम्बे और रातें छोटी हो जाती हैं। सूर्य उद्य होते ही गर्मी का प्रचण्ड प्रकोप जन-जीवन को झुलसा देता है। गर्मी में लोगों का घर से निकलने का मन नहीं करता।

प्रसाद के शब्दों में ग्रीष्म-छतु सूर्य भगवान की अविश्राम तपती किरणों, सर्राटे भरती हुई लू की लपटों और तेज-पूरित उष्ग निदाघ की ऋतु है। वनस्पतियाँ मुरझा जाती हैं और नदियों के प्रवाह मंद हो जाते हैं। कुल मिलाकर ग्रीष्म ॠतु धरणीतल की अविरल शून्यता है।

किरण नहीं, ये पावक वेन कण
जगती धारती पर गिरते हैं।

‘निराला’ जी कहते हैं –

ग्रीष्म तापमय लू की लपटों की दोपहरी।
झुलसाती विरणें वरों की आ ठहरी।।

ग्रीष्म का ताप प्राणियों को इतना व्याकुल कर देता है कि उन्हें अपनी सुध ही नहीं रहती। प्राणी पारस्परिक राग-द्वेष भूल जाते हैं। प्यास और पसीना गर्मी के अभिशाप हैं। बार-बार पानी पीने पर भी गला सूखा ही रहता है। पसीने से शरीर लथपथ हो जाता है। मैथिलीशरण गुप्त गर्मी से संतप्त ‘यशोधरा’ के माध्यम से प्राणी का चित्रण करते हैं –

सूखा कण्ठ, पसीना छूटा, मृद तृष्णा की माया।
झुलसी दृष्टि, अंधेरा दीखा, दूर गई वह छाया।।

सरोवर सूख गये, नदियों में जल की कमी हो गई, प्रकृति भी प्यासी है। ग्रीष्म की दोपहर में सचमुच जीवन की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है। सड़के सुनसान हो जाती हैं। लोग विवशतावश गर्मी से बचने के साधन साथ लेकर बाहर निकलते हैं।

गर्मी की दोपहर प्राणियों के लिये ही नहीं, प्रकृति के लिये भी पीड़ादायिनी है। गर्मी में खेत-खलिहान मुरझा जाते हैं। घासे सूख जाती हैं। वृक्ष दोपहर की ताप न सह कर कुम्हला जाते हैं।

धूप की तेजी अन्न और फसलों को पका देती है। खरबूजा, आम, तरबूज, ककड़ी, खीरा आदि शीतल पदार्थ खाने से आनन्द मिलता है।

गर्मी से बचने के लिये लोगों ने तरह-तरह के उपाय खोज लिये हैं। साधारण आदमी तो बिजली के पंखों का प्रयोग करते हैं, जबकि अमीरों के घर में वातानुकूलित यंत्र लगे रहते हैं। कुछ लोग गर्मी से बचने के लिये पहाड़ी स्थानों या शोतल प्रदेशों में जाकर वहाँ की ठंडी हवा का आनंद लेते हैं।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

रक्षा-बंधन :

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • भाई-बहन के प्रेम का साक्षी
  • ऐतिहासिक घटनाओं से सम्बद्ध
  • उपसंहार।

रक्षा-बंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम का साक्षी है और हिन्दू जाति और धर्मावलम्बियों के घरों में ही मनाया जाता है। यद्यापि अन्य जातियों के व्यक्तियों को भी राखी बाँधते-बँधवाते पूर्व काल में तो देखा ही गया है, आजकल भी अक्सर दिखाई देता है। कई बार हिन्दू बहनें किसी मुस्लिम भाई को भी राखी बाँधती दिखाई दे जाती हैं। इसी प्रकार हिन्दू भाई अन्य जाति की बहनों से आग्रहपूर्वक पवित्र राखी के धागे कलाई पर बँधवाकर उनके प्रेम और सुरक्षा का दायित्व अपनेआप पर लेते हुए देखे जाते हैं। इस प्रकार प्रमुख रूप से यह बहन-भाई के पवित्र प्रेम और अटूट रिश्ते-नाते को रूपायित करनेवाला त्योहार है।

रक्षा-बंधन हमारा राप्र्यापी पारिवारिक पर्व है। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन पड़ने के कारण इसे श्रावणी भी कहा जाता है। प्राचीन काल में स्वाध्याय के लिये यज्ञ और तर्पण करने के कारण इसका ॠषि-तर्पण, उपाकर्म नाम भी पड़ा। यज्ञ के पश्चात्रक्षासूत्र बाँधने के कारण रक्षाबंधन नाम प्रसिद्ध हुआ।

रक्षा-बंन का प्रारम्भ कब और कैसे हुआ, यह निश्चित् नहीं कहा जा सकता। इस सम्बन्ध में कई किववदन्तियाँ हैं। एक बार देवताओं और दानवों के बीच युद्ध शुरू हुआ। घोर संघर्ष के बाद भी विजय न मिलने पर देवता परेशान थे। एक दिन इन्द्र की पल्नी शची ने अपने पति की विजय एवं मंगल कामना से प्रेरित हो रक्षा-सूत्र बाँधा। जिसके प्रभाव से इन्द्र युद्ध में विजयी हुए। इसी दिन से रक्षा-बंधन का महत्व माना जाने लगा।

श्रावण मास की पूर्णिमा में फषिगण अपनी-अपनी वैदिक शाखा में अध्ययन आरम्भ करवाते थे। शिप्यगण गुरू, शास्ख और ज्ञान में अपनी श्रद्धा दृढ़ करते थे, शिक्षा के नये सत्र में उतरते थे। गुरू आशीर्वाद के रूप में उन्हें रक्षासूत्र देते थे।

मुस्लिम शासनकाल में यही रक्षा-सूत्र रक्षी अर्थात् राखी बन गया। यह रक्षी वीरन अर्थात् वीरों के लिये थी। स्वतंत्रता की लड़ाई के समय स्तियाँ देश भक्त वीरों को रेशम का धागा बाँध उनके लिए मंगल और विजय की कामना करती थी। मेवाड़ की वीरांगना कर्मवती ने अपनी रक्षा हेतु हुमायूँ को राखी भेजी थी।

रक्षा-बन्धन बहिनों के लिये अमूल्य पर्व है। महीनों पहले से वे इस पर्व की तैयारी शुरू कर देती हैं। बाजार में तरहतरह की राखियाँ मिलनी शुरू हो जाती हैं।

भारतीय संस्कृति का यह विलक्षण त्यौहार है। यह पर्व बहुत ही सुख-शांति से मनाया जाता है। कहीं-कहीं लड़कियाँ अपने मायके में जाती हैं, तो कहीं-कहीं भाई अपनी बहिन के घर जाकर राखी बँधवाता है। प्रेम और मिलन का यह बहुत ही सुंदर पर्व है। गोपाल सिंह ‘नेपाली’ ने लिखा है –

भाई एक लहर बन आया,
बहन नदी की धारा है।
संगम है, गंगा उमड़ी है,
डूबा वूल-किनारा है।
यह उन्माद बहन को अपना
भाई एक सहारा है।
यह अलमस्ती एक बहन ही
भाई का ध्रुव-तारा है।

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महँगाई

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • महँगाई के कारण
  • महँगाई के कारण आने वाली समस्या
  • महँगाई को दूर करने का उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :-भारत की आर्थिक समस्याओं के अन्तर्गत महँगाई सबसे प्रमुख समस्या है। वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि इतनी तेजी से हो रही है कि आज जब किसी वस्तु को पुन: खरीदने जाते हैं तो उस वस्तु का मूल्य पहले से अधिक बढ़ा हुआ होता है।

महँगाई के कारण :-वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि, अर्थात् महँगाई के अनेक कारण हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :-
(क) जनसंख्या में तेजी से वृद्धि :-भारत में जनसंख्या के विस्फोट ने वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाने की दृष्टि से बहुत अधिक सहयोग दिया है। जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उतनी तेजी से वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो रहा है, जिससे अधिकांश वस्तुओं के मूल्यों में निरंतर वृद्धि हो रही है।

(ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि :-भारत कृषि-प्रधान देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। गत अनेक वर्षों से खेती में काम आने वाले उपकरणों, उर्वरकों आदि के मूल्यों में वृद्धि हुई है, फलतः उत्पादित वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश वस्तुओं का मूल्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि-पदार्थों के मूल्यों से संबंधित है। इसी कारण जब कृषि-मूल्यों में वृद्धि होती है तो देश में प्राय: सभी वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं।

(ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी :-वस्तुओं का मूल्य माँग और पूर्ति पर आधारित है। बाजार में वस्तुओं की कमी होते ही उनके मूल्य में वृद्धि हो जाती है। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से भी व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा करके महँगाई बढ़ा देते हैं।

महँगाई के कारण होने वाली समस्याएँ :-महँगाई नागरिकों के लिए अभिशाप स्वरूप है। भारत एक गरीब देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या के आय के साधन सीमित हैं। इस कारण साधारण नागरिक और कमजोर वर्ग के व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। बेरोजगारी इस कठिनाई को और भी अधिक जटिल बना देती है।

महँगाई को दूर करने के उपाय :-यदि महँगाई इसी दर से बढ़ती रही तो देश के आर्थिक विकास में बहुत बड़ी बाधा उपस्थित हो जाएगी। इससे अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ जन्म लेंगी। अत: महँगाई की इस समस्या को अमूल नष्ट करना अति आवश्यक है।

महँगाई को दूर करने के लिए सरकार को समयबद्ध कार्यक्रम बनाना होगा। किसानों को सस्ते मूल्य पर खाद, बीज और उपकरण उपलब्ध कराने होंगे, ताकि कृषि-उत्पादन का मूल्य कम हो सके। मुद्रा-प्रसार को रोकने के लिए घाटे की व्यवस्था समाप्त करनी होगी तथा घाटे को पूरा करने के लिए नए नोट छापने की प्रणाली बंद करना होगा। जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे, ताकि वस्तुओं का उचित बँटवारा हो सके।

उपसंहार :- महँगाई के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। घाटे की अर्थव्यवस्था ने इस समस्या को और अधिक बढ़ा दिया है। यद्यपि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किए जाने वाले प्रयासों द्वारा महँगाई की इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है, तथापि इस दिशा में अभी तक पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी है। यदि समय रहते महँगाई की इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और हमारी प्रगति के सारे रास्ते बंद हो जाएँगे, भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा लेगा और नैतिक मूल्य पूर्णतया समाप्त हो जाएँगे।

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बेरोजगारी

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • बेरोजगारी-एक प्रमुख समस्या
  • बेरोजगारी-एक अभिशाप
  • बेरोजगारी के कारण
  • बंरोजगारी दूर करने के उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय से डिप्री लेकर रोजगार की तलाश में भटकते हुए नवयुवक के चेहरे पर निराशा और चिंता के भाव आजकल देखना सामान्य-सी बात हो गयी है। कभी-कभी रोजगार की तलाश में भटकता हुआ युवक अपनी डिग्रियाँ फाड़ने अथवा जलाने के लिए विवश दिखाई देता है। वह रात को देर तक बैठकर अखबारों के विज्ञापनों को पढ़ता है, आवेदन-पत्र लिखता है। साक्षात्कार देता है और नौकरी न मिलने पर पुन: रोजगार की तलाश में भटकता रहता है। युवक अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी खोजते रहते हैं। घर के लोग उसे निकम्मा समझते हैं, समाज के लोग आवारा कहते हैं, जबकि स्वयं बेचारा निराशा की नींद सोता है और आँसुओं के खारेपन को पीकर समाज को अपनी मौन-व्यथा सुनाता है।

बेरोजगारी का अर्थ :- बेरोजगारी का अभिग्राय उस स्थिति से है जब कोई योग्य तथा काम करने के लिए इच्छुक व्यक्ति प्रचलित मजदूरी की दरों पर कार्य करने के लिए तैयार हो और उसे काम न मिलता हो। बालक, वृद्ध, रोगी, अक्षम एवं अपंग व्यक्तियों को बेरोजगार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जो व्यक्ति काम करने के इच्छुक नहीं हैं और परजीवी हैं, वे भी बेरोजगारों की श्रेणी में नहीं आते। .

एक प्रमुख समस्या :- भारत की आर्थिक समस्याओं के अंतर्गत बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या है। वस्तुत: यह एक ऐसी बुराई है, जिसके कारण केवल उत्पादक मानव-शक्ति ही नष्ट नहीं होती वरन देश का भावी आर्थिक विकास ही अवरुद्ध हो जाता है। जो श्रमिक अपने कार्य द्वारा देश के आर्थिक विकास में सक्रिय सहयोग दे सकते थे, वे कार्य के अभाव में बेरोजगार रह जाते हैं। यह स्थिति हमारे विकास में बाधक है।

एक अभिशाप :- बेरोजगारी किसी भी देश या समाज के लिए अभिशाप है। इससे एक ओर निर्धनता, भुखमरी तथा मानसिक अशांति फैलती है तो, दूसरी ओर युवकों में आक्रोश तथा अनुशासनहीनता बढ़ती है। चोरी, डकैती, हिंसा, अपराध-वृत्ति एवं आत्महत्या आदि समस्याओं के मूल में एक बड़ी सीमा तक बेरोजगारी ही विद्यमान है। बेरोजगारी एक ऐसा भयंकर विष है जो संपूर्ण देश के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दूषित कर देता है। अत: उसके कारणों को खोजकर उनका निराकरण अत्यधिक आवश्यक है।

बेरोजगारी के कारण :- भारत में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं जिनमें प्रमुख निम्न हैं :-

(क) जनसंख्या में वृद्धि :- बेरोजगारी का प्रमुख कारण है जनसंख्या में तीव्र वृद्धि। विगत कुछ दशको में भारत में जनसंख्या का विस्फोट हुआ है।

(ख) दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली :- भारतीय शिक्षा सैद्धांतिक अधिक है, लेकिन व्यावहारिकता में शून्य है। इसमें पुस्तकीय ज्ञान पर ही विशेष ध्यान दिया जाता है।

(ग) कुटीर उद्योगों की उपेक्षा :- अंग्रेजी सरकार की कुटीर उद्योग विरोधी नीति के कारण देश में कुटीर उद्योगधंधों का पतन हो गया, जिससे अनेक कारीगर बेकार हो गए।

(घ) औद्योगीकरण की मंद प्रक्रिया :- विगत पंचवर्षीय योजनाओं में देश में औद्योगिक विकास के लिए प्रशंसनीय कदम उठाए गए हैं, किंतु समुचित रूप से देश को औद्योगीकरण नहीं किया जा सका है।

(ङ) कृषि का पिछड़ापन :- भारत की लगभग 72 % जनता कृषि पर निर्भर है। कृषि के क्षेत्र में अत्यंत पिछड़ी हुई दशा के कारण कृषि बेरोजगारी व्यापक हो गई है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय :- बेरोजगारी दूर करने में निम्नलिखित उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं –

(क) जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण :- जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि ही बेरोजगारी का मूल कारण है। अतः इस पर नियंत्रण बहुत आवश्यक है। जनता को परिवार-नियोजन का महतव समझाते हुए उसमें छोटे परिवार के प्रति चेतना जाप्रत करनी चाहिए।

(ख) शिक्षा-प्रणाली में व्यापक परिवर्तन :- शिक्षा को व्यवसाय-प्रधान बनाकर शारीरिक श्रम को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

(ग) कुटीर उद्योगों का विकास :- सरकार द्वारा कुटीर उद्योगों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

(घ) औद्योगीकरण :- देश में व्यापक स्तर पर औद्योगीकरण किया जाना चाहिए। इसके लिए विशाल उद्योगों की अपेक्षा लघुस्तरीय उद्योगों का अधिक विकास करना चाहिए।

(ङ) सहकारी खेती :- कृषि के क्षेत्र में अधिकाधिक व्यक्तियों को रोजगार देने के लिए सहकारी खेती को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

(च) राष्ट्र निर्माण संबंधी विविध कार्य :-देश में बेरोजगारी को दूर करने के लिए राष्ट्र-निर्माण संबंधी विविध कार्यों का विस्तार किया जाना चाहिए, जैसे-सड़कों का निर्माण, रेल-परिवहन का विकास, पुल-निर्माण, बाँध-निर्माण तथा वृक्षारोपण आदि।

उपसंहार :- भारत सरकार बेरोजगारी के प्रति जागरुक है तथा इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम भी उठा रही है। परिवार-विनियोजन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कच्चा माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की सुविधा, कृषि-भूमि की हदबन्दी, नए-नए उद्योगों की स्थापना, अप्रंटिस (प्रशिक्षु) योजना, प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना, आदि अनेकानेक कार्य ऐसे हैं जो बेरोजगारी को दूर करने में एक सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं।

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सांप्रदायिकता : कारण व समाधान

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • साप्रदायिकता का कारण
  • संप्रदायिक संघर्ष के कारण
  • भारत में संप्रदायिकता
  • सांजदायिक घटनाएँ
  • सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम
  • सांप्रदायिकता का समाधान
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत एक अरब से भी अधिक आबादी वाला विशाल देश है। यह स्वयं में एक संसार है। इसमें अनेक भाषाओं, अनेक जातियों और अनेक धर्मो के लोग रहते हैं। उनके खान-पान, वेश-भूषा और रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं। यह एक मात्र ऐसा देश है, जहाँ सबसे अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं। यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, किंतु साथ ही मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी आदि सभी यहाँ के समान स्तर के समान अधिकार के नागरिक हैं। सभी धर्मावलंबी यहाँ अपने तौर-तरीके, रीति-रिवाज और परंपराओं का पालन करते हैं। इतनी सब भिन्नताओं के होते हुए भी उनमें एक मूलभूत एकता है और वह यह है कि ये हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई बाद में हैं, पहले भारतीय हैं। कोई भी सम्प्रदाय अथवा धर्म मानव-मानव को लड़ाई की बात नहीं कहता।

उर्दू के प्रसिद्ध शायर इकबाल ने कहा था –

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिंदी हैं, हमवतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा।।

सांप्रदायिकता का कारण :-जब कोई सम्र्रदाय अथवा धर्म स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और अन्य संप्रदायों को निम्न मानने लगता है, तब उसके मन में अपने सम्प्रदाय के प्रति एक अहंकार की बू आने लगती है। इसी कारण वह दूसरे सम्रदाय के प्रति घृणा, विद्वेष और हिंसा का भाव रखने लगता है।

सांप्रदायिक संघर्ष के कारण :-भारत में साप्रदायिकता की समस्या प्रारंभ से ही धार्मिक की अपेक्षा मुख्यत: राजनीतिक रही है। कुछ स्वार्थी राजनेता अपने अथवा अपने दल के लाभ हेतु भड़काऊ भाषण देकर आग में घी डाल देते हैं। परिणामस्वरूप संप्रदाय के अंधे लोग अन्य धर्मांधों से भिड़ जाते हैं और सारा जनजीवन दूषित कर देते हैं।

भारत में सांप्रदायिकता :- भारत में सांप्रदायिकता का प्रारंभ मुसलमानों के आगमन से हुआ। शासन और शक्ति पाकर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने धर्म को आधार बनाकर हिंदू जन-जीवन को रौंद डाला। हिंदुओं के धार्मिक तीर्थों को तोड़ा, देवी-देवताओं को अपमानित किया, बहू-बेटियों को अपवित्र किया, जान-माल का हरण किया। परिणामस्वरूप, हिंदू जाति के मन में उन पाप-कर्मों के प्रति गहरी घृणा भर गई, जो आज तक भी जीवित है। छोटी-छोटी घटना पर हिंदूमुस्लिम संघर्ष का भड़क उठना उसी घृणा का सूचक है।

सांप्रदायिक घटनाएँ :- सांप्रदायिकता को भड़काने में अंग्रेज शासकों का गहरा षड़यंत्र था। आजादी से पूर्व अनेक खूनी-संघर्ष हुए। आजादी के बाद तो विभाजन का जो संघर्ष हुआ, भीषण नर -संहार हुआ। उसे देखकर समूची मानवता बिलख-बिलखकर रो पड़ी थी।

सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम :- सांप्रदायिकता का उन्माद देश में कभी-कभी ऐसी कटुता पैदा कर देती है कि आये दिन हिंदू-मुस्लिम दंगे होते हैं। इसके द्वारा तोड़-फोड़, आगजनी और नर-संहार का ऐसा तांडव होता है कि मानवता का सिर शर्म से झुक जाता है।

सांप्रदायिकता का समाधान :- भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है। हमारे अपने देश में सांप्रदायिकता की समस्या का समाधान कठिन अवश्य है, किंतु असंभव नहीं। सांप्रदायिकता का अन्धापन अज्ञान तथा अविवेक से पैदा होता है। इसलिए शिक्षा का प्रसार सर्वोत्तम उपाय है।

देश में कानून का शासन स्थापित किया जाय, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति चाहे हिंदू हो या मुसलमांन, सिख हो या ईसाई, समान कानून का पालन करे। कानून का उल्लंघन करने पर दण्ड भी समान रूप में दिया जाए। साम्प्रदायिकता फैलाने वाले को दंडित किया जाए। जनसंचार के माध्यमों द्वारा साप्रदायिकता विरोधी कार्यक्रम प्रसारित किए जाएं।

उपसंहार :- प्रत्येक मानव का यह अधिकार है कि वह अपनी इच्छानुसार धर्म का पालन करे। किसी मानव को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने धार्मिक अन्धविश्वास के कारण दूसरों की उन्नति के मार्ग की बाधा बन जाए। यदि कोई संप्रदायिकता की संकुचित भावना से प्रेरित होकर अपने धर्म का विकास तथा दूसरे धर्म का उपहास करता है तो इससे निश्चय ही राष्ट्र, विश्व तथा संपूर्ण मानवता को क्षति पहुँचेगी। अतः संप्रदायिकता के अभिशाप को समाप्त किए बिना मानवता की सुरक्षा संभव नहीं है।

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राष्ट्रीय एकता (मॉडल प्रश्न – 2007)

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारत में अनेकता के विविध रूप
  • राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता
  • राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ
  • जातिवाद
  • राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के उपाय-सर्वधर्म समभाव
  • समष्टि-हित की भावना
  • एकता का विश्वास, शिक्षा का प्रसार
  • राजनैतिक वातावरण की स्वच्छता
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत अनेक धर्मों, जातियों और भाषाओं का देश है। धर्म, जाति एवं भाषाओं की दृष्टि सं विविधता होते हुए भी भारत में प्राचीनकाल से ही एकता की भावना विद्यमान रही है। जब कभी किसी ने उस एकता को खंडित करने का प्रयास किया है, भारत का एक-एक नागरिक सजग हो उठा है। राष्ट्रीय एकता को खंडतत करने वाली शक्तियों के विरुद्ध आंदोलन आरंभ हो जाता है। राष्ट्रीय एकता हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है और जिस व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय गौरव का अभिमान नहीं है, वह नर नहीं, नर-पशु है-
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।

वह नर नहीं नर-पशु निरा है और मृतक समान है। -मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय :- राष्ट्रीय एकता का अभिप्राय है-संपूर्ण भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक़ एकता। हमारे कर्मकांड, पूजा-पाठ, खान-पान, रहन-सहन और वेश-भूषा में अंतर हो सकता है। इनमें अनेकता भी हो सकती है, किंतु हमारे राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण में एकता है। इस प्रकार अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है।

भारत में अनेकता के विविध रूप :- भारत जैसे विशाल देश में अनेकता का होना स्वाभाविक ही है। धर्म के क्षेत्र में हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि विविध धर्मावलंबी यहाँ निवास करते हैं। इतनी विविधताओं के होते हुए भी भारत अत्यंत प्राचीनकाल से एकता के सूत्र में बँधा रहा है।

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता :- राष्ट्र की आंतरिक शक्ति तथा सुव्यवस्था और बाह्य सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता होती है। भारतवासियों में यदि जरासी भी फूट पड़ेगी तो अन्य देश हमारी स्वतंत्रता को हड़पने के लिए तैयार बैठे हैं।

राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ :- राष्ट्रीय एकता की भावना का अर्थ मात्र यह नहीं है कि हम एक राष्ट्र से संबद्ध हैं। राष्ट्रीय एकता के लिए एक-दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना आवश्यक है। आजादी के समय हमने सोचा था कि पारस्परिक भेदभाव समाप्त हो जाएगा कितु संप्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता, अज्ञानता और भाषागत अनेकता ने अब तक पूरे देश को आक्रांत कर रखा है।

राष्ट्रीय एकता को छिन्न-भिन्न कर देने वाले कारण निम्न हैं :-

सांप्रदायिकता :- राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा सांप्रदायिकता की भावना है। सांप्रदायिकता एक ऐसी बुराई है जो मानव-मानव में फूट डालती है, समाज को विभाजित करती है। जहाँ भी द्वेष, घूणा और विरोध है, वहाँ धर्म नहीं है। राष्ट्रवादी शायर इकबाल ने कहा है –

“मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।
हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा।।”

सांप्रदायिक कटुता को दूर करने के लिए हमें परस्पर सभी धर्मों का आदर करना चाहिए।

भाषागत विवाद :-भारत बहुभाषी राष्ट्र है। विभिन्न प्रांतों की अलग-अलग बोलियाँ और भाषाएँ हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा को श्रेष्ठ और उसके साहित्य को महान मानता है।
मातृभाषा को सीखने के बाद संविधान में स्वीकृत 18 भाषाओं में से किसी भी भाषा को सीख लें तथा राष्ट्रीय एकता के निर्माण में सहयोग प्रदान करें।

प्रांतीयता अथवा प्रादेशिकता की भावना :-प्रांतीयता अथवा प्रादेशिकता की भावना भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है। कभी-कभी किसी अंचल विशेष के निवासी अपने लिए पृथक् अस्तित्व की माँग रखते हैं।

जातिवाद :-भारत में जातिवाद सदैव प्रभावी रहा है। कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था टूटी है और जाति-प्रथा कहर रूप से उभरी है। जातिवाद ने भारतीय एकता को बुरी तरह प्रभावित किया है।

राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के उपाय :- वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुद्ध़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं :-

सर्वधर्म समभाव :-सभी धर्मो की आदर्श एवं श्रेष्ठ बातें समान दिखाई देती हैं। सभी धर्मो का समान रूप से आदर होनी चाहिए।
समष्टि-हित की भावना :- हम अपनी स्वार्थ भावना को भूलकर समष्टि-हित का भाव विकसित कर लें।
एकता का विश्वास :- भारत की अनेकता में ही एकता का निवास है। सभी नागरिको को प्रेम और सद्भाव द्वारा एक-दूसरे में अपने प्रति विश्वास पैदा करनी चाहिए।
राजनीतिक वातावरण की स्वच्छता :- स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजों ने तथा स्वतंत्रता के बाद राजनेताओं ने जातीय विद्वेष तथा हिंसा भड़काये हैं। किसी संप्रदाय विशेष का मसीहा बनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इन स्वार्थी राजनेताओं का बहिष्कार करना चाहिए।

उपसंहार :- आज विकास के साधन बढ़ रहे हैं, भौगोलिक दूरियाँ कम हो रही हैं, कितु आदमी और आदमी के बीच दूरो बढ़ती ही जा रही है। हम सभी को मिलकर राष्ट्रीय एकता को सुद्ढ़ बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने पर भारत एक सबल राष्ट्र बन सकेगा।

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इक्कीसवीं सदी का भारत

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • परिवर्तनशील भारत
  • इक्कीसवीं सदी का भारत
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- लगभग 25-30 वर्ष पूर्व अंग्रेजी साहित्य के एक लेखक ने ‘इक्कीसवीं सदी की दुनिया’ नामक लेख लिखा था, जिसमें यह बताया गया था कि इक्कीसवीं सदी में मानव-समाज औद्योगिकता की अनेक मंजिलें तय करते हुए उस जगह तक जा पहुँचेगा, जहाँ आदमी शून्य होगा और मशीनें सर्वोत्तम। यह चाँद तक पहुँचेगा तथा आकाश पर जगमगाते सितारों की खोज करेगा किंतु मशीनों के माध्यम से। यह वह समय होगा जब मानव की समस्त वौद्धिक शक्तियाँ मशीन के कलपुर्जों को समर्पित कर दी जाएँगी। विकास के अंतिम चरण में मनुष्य स्वरिम्मित मशीनों का दास होकर रह जाएगा।

इक्कीसवीं सदी का भारत : कल्पना में जब भी इक्कीसवीं सदी का भारत उभरता है तो उसके दो स्पष्ट छोर दिखाई देते हैं। इनमें से एक आधुनिक और वैज्ञानिक विश्व से जुड़ा है तो, दूसरा काठ के बने गाड़ी के दो पहियों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने को विवश है।

भारते में पंचवर्षीय योजनाओं पर अरबों रुपया खर्च हो रहा है। इससे भारत का आधुनिकीकरण तो हो रहा है, कितु इसका लाभ देश के अधिकांश वर्ग को नहीं मिल रहा है। इससे यह खतरा भी हो सकता है कि भारत का एक बहुत छोटा वर्ग अति-आधुनिक साधनों और सुविधाओं का भोग कर रहा होगा और एक बहुत बड़ा वर्ग अपनी जीविका के लिए ही संघर्ष कर रहा होगा।

इक्कीसवीं सदी के भारत के रूप में कल्पना कीजिए कि देश का एक ऐसा वर्ग होगा जो केवल अपने हाथ की एक अँगुली से बटन दबाकर रात का खाना अपनी मेज पर मँगवाएगा तथा दूसरा बटन दबाकर जूठे बर्तनु भी साफ कराएगा। इस सदी का व्यक्ति राकेटों पर सवार होकर चंद्रमा की यात्रा करेगा तथा घण्टों या मिनटों में ब्रह्यांड का चक्कर लगाकर वापस अपने घर लौट सकेगा। किसी कार्यालय में बैठे लिपिक को पूरे दिन टाइप करने की आवश्यकता नहीं, अपितु संपूर्ण रिपोर्टिंग को कंप्यूटर की मदद से कुछ ही देर में प्रिंटर द्वारा लेखा-जोखा प्रस्तुत कर देगा। दूसरी ओर भारत में एक ऐसा वर्ग भी होगा जो अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और मकान के लिए दर-दर भटक रहा होगा।

इक्कीसवीं सदी और भारत :-संपन्न देशों की नकल करके इक्कीसवीं सदी की बात करने वाले भारत की इसके क्षेत्र में तैयारी बहुत कम है। हमारे देश में 21 वीं सदी की बात के लिए हड़बड़ाहट अधिक है, तैयारी कम है। अत्यधिक प्रयासों के बाद भी हम अपनी कृषि को पूर्णत: वैज्ञानिक आधार नहीं दे पाए हैं। अभी भी बहुत कम किसान ऐसे हैं जो कृषि के वैज्ञानिक तरीकों और साधनों का प्रयोग कर पाते हैं, कितु दस वर्ष बाद हम अवश्य इतने समर्थ हो जायेंगे कि अपने देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए खाद्यान्नों का निर्यात भी कर सकें।

हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, कमी है तो सिर्फ उनके समुचित दोहन की। इस शताब्दी में हम इन संसाधनों का भरपूर और समुचित उपयोग कर सकने की स्थिति में होंगे।

उपसंकार :- हमें विश्वास है कि सन् 2010 ई० तक हम विकास की उस निर्णायक स्थिति में अवश्य पहुँच जायेंगे जहाँ भारत का कोई बालक भूखा नहीं सो सकेगा, कोई ऐसा तन नहीं होगा जिस पर वस्त्र नही होगा तथा कोई ऐसा परिवार न होगा जिसके सिर पर छत न हो, अर्थात् प्रत्येक नागरिक को रोटी, कपड़ा और मकान सुलभ होगा।

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दूरदर्शन का प्रभाव

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • दूरदर्शन का आविष्कार, उपयोग, प्रभाव
  • दूरदर्शन से लाभ तथा हानियाँ
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- दूरदर्शन अर्थात् टेलीविजन आधुनिक-युग में मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाओं की प्राप्ति का भी महत्वपूर्ण साधन है। केवल पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक भारतीय समाज में दूरदर्शन का उपयोग महानगरों के कुछ संपन्न परिवार ही कर पाते थे तथा इस पर सीमित कार्यक्रम ही प्रसारित होते थे, कितु आज स्थिति यह है कि दूरदर्शन देश के प्रत्येक शहर तथा गाँव तक पहुँच चुका है। देश की अधिकांश आबादी तक यह कोठियों से लेकर झुग्गी-झोंपड़ी तक अपने पैर पसार चुका है। दूरदर्शन के उपग्रह द्वारा प्रसारण संबंधी सुविधा के कारण आजकल सैकड़ों चैनलों एवम् कार्यक्रमों की भरमार है।

दूरदर्शन का आविष्कार :- 25 जनवरी, सन् 1926 को इंग्लैण्ड में एक इंजीनियर जान बेयर्ड ने रायल इन्स्टीट्यूट के सदस्यों के सामने टेलीविजन का सर्वप्रथम प्रदर्शन किया था। उसने कठपुतली के चेहेर का चित्र रेडियो की तरंगों की सहायता से वैज्ञानिकों के सामने प्रदर्शित किया था। विज्ञान के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी।

दूरदर्शन का उपयोग :-आधुनिक समाज में दूरदर्शन का उपयोग मनोरंजन, शिक्षा, साहित्य, संगीत, सूचना आदि विभिन्न क्षेत्रों के लिए किया जा रहा है। आज यह मनोरंजन का सबसे सस्ता और सुलभ साधन है। अब लोगों को फिल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल तक नहीं जाना पड़ता है। क्रिकेट-मैच को देखने के लिए मैदान पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। पूरे विश्व के समाचार तथा विभिन्न संस्कृतियों के आधार-व्यवहार आदि का दृश्यावलोकन भी घर बैठे हो जाता है। इसके माध्यम से विभिन्न कक्षाओं के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण भी किया जाता है, जिससे छात्रों को अध्ययन में सुविधा मिलती है। यू. जी. सी का कंट्रीवाइड क्लास रूम टीचिग ऐसा ही कार्यक्रम है तथा दूरदर्शन का ज्ञान-दर्शन चैनल शिक्षा प्रदान करने वाला चैनल है जो बहुत उपयोगी है।

दूरदर्शन का प्रभाव :- दूरदर्शन आज प्रत्येक परिवार का एक आवश्यक अंग बन गया है, जिसका परिवार तथा समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति, परिवार तथा समाज पर दूरदर्शन का प्रभाव लाभकारी है या हानिकारक यह प्रश्न विचारणीय है। अत: लाभ-हानि के दृष्टिकोण से दूरदर्शन के प्रभाव का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है :-

दूरदर्शन से लाभ – दूरदर्शन समाज के लिए निम्न क्षेत्रों में उपयोगी है-
दूरदर्शन आज के समय में सबसे सस्ता एवं सुलभ मनोरंजन प्रदान करता है। इसमें केवल बिजली का थोड़ा-सा खर्च लगता है। लोग घर पर बैठकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार कार्यक्रम देखते हैं।

दूरदर्शन के पर्दे पर विश्व मानव समुदाय की विभिन्न संस्कृतियों से संबंधित कार्यक्रम आते रहते हैं, जिससे हम उनकी संस्कृति से परिचित हो जाते हैं। जिन स्थानों पर जाना सम्भव नहीं होता उनकी भी जानकारी मिल जाती है।

दूरदर्शन के माध्यम से हम महत्वपूर्ण व्यावसायिक सूचनाएँ एवं शिक्षा संबंधी अनेक तथ्यों की जानकारियाँ अपने घर में ही प्राप्त कर लेते हैं। इसका लाभ हमें शैक्षणिक एवं व्यावसायिक स्तर पर प्राप्त होता है।

दूरदर्शन के कारण बच्चों की बुद्धि का विकास भी शीघ्रता से संभव हो गया है। आज उन्हें बाघ और सिंह का अंतर बताने के लिए किसी चिड़ियाघर ले जाने की आवश्यकता नहीं है। हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर, रॉकेट आदि को टेलीविजन के पर्दे पर देखकर ही पहचान करना सीख जाते हैं।

दूरदर्शन से हानियाँ :- जहाँ दूरदर्शन से अनेक लाभ हैं, वहीं दूसरी ओर समाज को इससे अनेक हानियाँ भी हैं, उनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-

समय की हानि :- मनुष्य के लिए मनोरंजन आवश्यक है, मनुष्य असमय एवं अनावश्यक मनोरंजन में समय नष्ट करता है, इससे उसके कार्य करने की क्षमता में कमी आ जाती है।

स्वास्थ्य की हानि :- दूरदर्शन से निकलने वाली प्रकाश की किरणें मनुष्य के नेत्र एवं त्वचा पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव डालती हैं, क्योंकि इस प्रकाश की किरणें साधारण प्रकाश की किरणों से भिन्न होती हैं।

चरित्र का हनन :- दूरदर्शन के कार्यक्रमों से जहाँ एक ओर ज्ञान का विकास होता है, वहीं इसके प्रभाव से समाज का चारित्रिक पतन भी हो रहा है। मनोरंजन के कार्यक्रमों में व्यावसायिकता का बोलबाला है, उनमें नैतिक आदर्शों को छोड़ दिया जाता है। अश्लीन एवं फूहड़ दृश्य, द्विअर्थी गीत-संवाद, हिससात्मक एवं वीभत्स घटनाओं आदि का प्रसारण मानव-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है। इससे समाज में अपराध तथा अनैतिक कार्य की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

बच्चों के भविष्य पर कुप्रभाव :- दूरदर्शन का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर पड़ता है। बच्चे अल्पायु से ही बंदूक का खेल खेलने लगते हैं। कार्दून फिल्मों को देखने में अपना अमूल्य समय नष्ट करते हैं, जिसका सीधा प्रभाव उनकी पढ़ाई पर, उनके भविष्य पर पड़ता है।

उपसंहार :- दूरदर्शन मानव जीवन का एक अति-आवश्यक अंग है, किंतु इसका संयमित और नियंत्रित उपयोग ही करना चाहिए।

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दहेज-प्रथा : एक अभिशाप

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • दहेज-प्रथा का प्रारंभ
  • दहेज का अर्थ
  • दहेज प्रथा के विस्तार के कारण
  • दहेज-प्रथा से हानियाँ
  • समस्या का समाधान
  • उपसंहार।

‘कहती है नन्हीं-सी बाला, मैं कोई अभिशाप नहीं।’
लज्जित होना पड़े पिता को, मैं कोई ऐसा पाप नहीं।”

“’दहेज बुरा रिवाज है, बेहद बुरा। बेहद बुरा। बस चले तो दहेज लेने वालों और देने वालों को ही गोली मार देनी चाहिए, फिर चाहे फाँसी ही क्यों न हो जाए। पूछो, आप लड़के का विवाह करते हैं कि उसे बेचते हैं।।’
– मुंशी प्रेमचंद

दहेज-प्रथा वर्तमान समाज का कलंक बन गई है। भारतीय समाज का यह कलंक निरंतर विकृत रूप धारण करता जा रहा है। समय रहते इस रोग का निदान और उपचार आवश्यक है, अन्यथा समाज की नैतिक मान्यताएँ नष्ट हो जाएँगी और मानव-मूल्य समाप्त हो जायेंगे।

दहेंज-प्रथा का प्रारंभ :- महर्षि मनु ने ‘मनुस्मृति’ में अनेक विवाहों का उल्लेख किया है। ब्रह्म-विवाह के अंतर्गत कन्या को वस्त्र और आभूषण देने की बात कही गई है। कन्या के माता-पिता अपनी सामर्थ्य और इच्छानुसार वस्त्र और अलंकार दिया करते थे, किंतु उसमें बड़ी मात्रा में दिए जाने वाले दहेज का उल्लेख नहीं है।

दहेज का अर्थ :- दहेज का तात्पर्य उन संपत्ति और वस्तुओं से है, जिन्हें विवाह के समय वधू-पक्ष की ओर से वरपक्ष को दिया जाता है। मूल रूप से इसमें स्वेच्छा की भावना निहित है, कितु आज दहेज का अर्थ बिल्कुल अलग हो गया है, अब तो इसका अर्थ उस संपत्ति अथवा मूल्यवान वस्तुओं से है, जिन्हें विवाह की एक शर्त के रूप में कन्या-पक्ष द्वारा वर पक्ष के प्रति विवाह से पूर्व अथवा बाद में पूरा करना पड़ता है।

दहेज-प्रथा के विस्तार के कारण :- दहेज प्रथा के विस्तार के प्रमुख कारण निम्न हैं –

धन के प्रति अधिक आकर्षण :- वर्तम नन युग भौतिकवादी युग है। समाज में धन का महत्व बढ़ता जा रहा है। धन सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक प्रतिष्ठा का आधार बन गया है। वर-पक्ष ऐसे परिवार में ही संबंध स्थापित करना चाहता है, जो धनी हो तथा अधिक से अधिक धन दहेज के रूप में दे सके।

जीवन-साथी चुनने का सीमित क्षेत्र :- भारतीय समाज अनेक जातियों तथा उपजातियों में विभाजित है। सामान्यत : प्रत्येक माता-पिता अपनी पुत्री का विवाह अपनी ही जाति या उससे उच्च जाति के लड़के के साथ करना चाहते हैं। इसी कारण वर-पक्ष की ओर से दहेज की माँग होती है।

शिक्षा और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा :- वर्तमान युग में शिक्षा बहुत महँगी है। इसके लिए पिता को कभी-कभी अपने पुत्र की शिक्षा पर अपनी सामर्थ्य से अधिक धन खर्च करना पड़ता है। इस धन की पूर्ति वह पुत्र के विवाह के अवसर पर दहेज प्राप्त करके करना चाहता है।

दहेज-प्रथा से हानियाँ :- दहेज-प्रथा ने हमारे समाज को पथभ्रष्ट और स्वार्थी बना दिया है। समाज में फैला यह रोग इस तरह जड़ जमा चुका है कि कन्या के माता-पिता के रूप में जो लोग दहेज की बुराई करते हैं वे ही अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर मनचाहा दहेज माँगते हैं। इससे समाज में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हो गई हैं तथा अनेक नवीन समस्याएँ विकराल रूप धारण करती जा रही हैं, जैसे –
(क) बेमेल विवाह :- दहेज-प्रथा के कारण निर्धन माता-पिता अपनी पुत्री के लिए उपयुक्त वर प्राप्त नहीं कर पाते और मजबूरी में उन्हें अपनी पुत्री का विवाह अयोग्य लड़के से करना पड़ता है। दहेज देने में असमर्थ माता-पिता को अपनी कम उम्र की लड़कियों का विवाह अधिक अवस्था के पुरुषों से करना पड़ता है।

(ख) ऋणग्रस्तता :- दहेज-प्रथा के कारण वर-पक्ष की माँग को पूरा करने के लिए कई बार कन्या के माता-पिता को ऋण भी लेना पड़ता है। फलतः वे आमृत्यु ऋण की चक्की में पिसते रहते है।

(ग) कन्याओं का दु:खद वैवाहिक जीवन :-वर-पक्ष की माँग के अनुसार दहेज न देने अथवा उसमें किसी प्रकार की कमी रह जाने के कारण नव वधू को सुसराल में अपमानित होना पड़ता है।

(घ) अविवाहिताओं की संख्या में वृद्धि :- आर्थिक दृष्टि से दुर्बल परिवारों की जागरुक युवतियाँ गुणहीन तथा निम्नस्तरीय युवकों से विवाह करने की अपेक्षा अविवाहित रहना उचित समझती हैं, जिससे अनैतिक संबंधों और यौनकुंठाओं जैसी अनेक सामाजिक विकृतियों को बढ़ावा मिलता है।

समस्या का समाधान :- दहेज-प्रथा समाज के लिए निश्चित ही एक अभिशाप है। कानून और समाज-सुधारकों ने दहेज से मुक्ति के अनेक उपाय सुझाए हैं। प्रमुख उपाय निम्न हैं-

(क) कानून द्वारा प्रतिबंध :- अनेक लोगों का विचार था कि दहेज के लेन-देन पर कानून द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिया जाय। इसीलिए 9 मई, 1961 ई० को भारतीय संसद ने ‘दहेज निरोधक अधिनियम’ स्वीकार कर लिया गया।

(ख) अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन :- अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देने से वर का चुनाव करने के क्षेत्र में विस्तार होगा तथा युवतियों के लिए योग्य वर खोजने में सुविधा होगी। इससे दहेज की माँग में कमी आएगी।

(ग) युवकों को स्वावलंबी बनाया जाए :- स्वावलम्बी होने पर युवक अपनी इच्छा से लड़की का चयन कर सकेंगे 1 स्वावलंबी युवकों पर माता-पिता का दबाव कम होने पर दहेज के लेन-देन में स्वत: कमी आएगी।

(घ) लड़कियों की शिक्षा :- जब युवतियाँ भी शिक्षित होकर स्वावलंबी बनेंगी तो वे स्वयं नौकरी करके अपना जीवन-निर्वाह करने में समर्थ हो सकेंगी। विवाह एक विवशता के रूप में भी न होगा, जिसका वर-पक्ष प्रायः अनुचित लाभ उठाता है।

(ङ) जीवन साथी चुनने का अधिकार :- प्रबुद्ध युवक-युवतियों को अपना जीवन-साथी चुनने के लिए अधिक छूट मिलनी चाहिए।

उपसंहार :- दहेज-प्रथा एक सामाजिक बुराई है, एक कलंक है, हमारे समाज का कोढ़ है। इसके विरुद्ध स्वस्थ जनमत का निर्माण होना चाहिए। जब तक समाज में चेतना नहीं आएगी, दहेज के दैत्य से मुक्ति पाना असंभव है। राजनेताओं, समाज-सुधारकों तथा शिक्षित युवक-युवतियों आदि सभी के सहयोग से दहेज-प्रथा का अंत हो सकता है।

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भारतीय समाज में नारी का स्थान
अथवा, भारतीय नारी : दशा और दिशा

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारतीय नारी का अतीत
  • मध्यकाल में भारतीय नारी
  • आधुनिक युग में नारी
  • पाश्चात्य प्रभाव
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- मानव-जीवन का रथ सिर्फ एक पहिए से नहीं चल सकता। उसकी समुचित गति के लिए दोनों पहिए होने चाहिए। गृहस्थी की गाड़ी नर और नारी के सहयोग व सद्भावना से प्रगति के पथ पर अविराम गति से बढ़ सकती है। स्री केवल पत्नी ही नहीं, अपितु योग्य मित्र, परामर्शदात्री, संिव, सहायिका, माता के समान उस पर सर्वस्व न्यौछावर करने वाली तथा सेविका की तरह सच्ची सेवा करने वाली है। गृहस्थी का कोई भी कार्य उसकी सम्मति के बिना नहीं हो सकता। किंतु भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदैव एक समान न रहकर बड़े उतार-चढ़ावों से गुजरी है।

भारतीय नारी का अतीत :-प्राचीनकाल में स्त्रियों को आदर और सम्मान से देखा जाता था। लोगों की मान्यता थी कि जिस घर में स्त्रियों का सम्मान होता है; वह घर सुखी तथा स्वर्ग बन जाता है। कहा गया है _ ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।’ भारत का इतिहास पृष्ठ नारी की गौरव-गरिमा से मंडित है।

वेद तथा उपनिषद् काल में नारी को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी। उन्हें समाज में सामाजिक अधिकार प्राप्त थे। याज्ञवल्क्य और गार्गी का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है। मैत्रेयी विख्यात बह्मवादिनी थीं। मंडन मिश्र की धर्मपत्नी भारत में अपने काल की विख्यात विदुषी महिला थीं। स्त्रियाँ अपने पति के साथ युद्ध-क्षेत्र में भी जाती थीं।

मध्यकाल में भारतीय नारी :-मध्यकाल में स्त्रियों की स्थिति बदतर हो गयी थी। स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। मुसलमानों के आक्रमण से हिंदू समाज का ढाँचा चरमरा गया। मुसलमानों के लिए नारी भोग-विलास तथा वासनापूर्ति मात्र की वस्तु थी। इसी कारण नारी का कार्य-क्षेत्र घर की चहारदीारी के भीतर सिमट कर रह गया, जिससे समाज में अशिक्षा, बाल-विवाह प्रथा, सती-प्रथा, परदा-प्रथा का प्रचलन बढ़ा।

आधुनिक युग में नारी :- धीरे-धीरे विचारकों तथा नेताओं ने नारी की स्थिति पर ध्यान दिया। राजा राममोहन राय ने ‘सती-प्रथा’ का अंत कराया। महर्षि दयानंद ने महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने की आवाज उठाई। गाँधीजी ने जीवन भर महिला उत्थान का कार्य किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नारी वर्ग में चेतना का विशेष विकास हुआ। स्रियाँ समाज में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलने को तैयार हुई। भारतीय संविधान में भी यह घोषणा की गई कि “राज्य, धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के आधार पर किसी भी नागरिक में विभेद नहीं होगा।”

आज भारतीय नारियाँ जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। चिकित्सा, मनोविज्ञान, कानून, फिल्म-निर्माण, वायुयान की पायलट, ट्रक-ड्राइवर, खेल का मैदान आदि क्षेत्रों में महिलाएँ पुरुषों से पीछे नहीं हैं। ये ललित कलाओं, जैसे–संगीत, नृत्य, चित्रकला, छायांकन (फोटोग्राफी) में विशेष दक्षता प्राप्त कर रही हैं। वाणिज्य तथा विज्ञान के क्षेत्र में भी स्त्रियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। स्त्रियों की सामाजिक चेतना जाग उठी है। वे समाज की दुर्दशा के प्रति सजग व सावधान हैं। वे समाज–सुधार के कार्यक्कम में व्यस्त हैं। भारत की वर्तमान समस्याओं-भुखमरी, महँगाई, बकारी, देहेज-प्रथा आदि को सुलझाने के लिए भी वे प्रयत्नशील हैं।

श्रीमती इंदिरा गाँधी, श्रीमती सरोजिनी नायड्डू, श्रीमती सुचेता कृपलानी, श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित, लता मंगेशकर, श्रीमती किरण बेदी, मेधा पाटकर, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम आदि ऐसी भारतीय नारियाँ हैं जिन पर भारतवर्ष को सदैव गर्व रहेगा।

पाश्चात्य-प्रभाव :- आजकल अधिकांश स्त्रियाँ पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता से अधिक प्रभावित हैं। वे फैशन व आडंबर को जीवन का सार समझकर भोगवाद की ओर अग्रसर हो रही हैं। वे सादगी से विमुख होकर पैसा कमाने की होड़ में अनैतिकता की ओर उन्मुख हो रही हैं। इस प्रकार वे स्वय गुड़िया बनकर पुरुषों के हाथों में खेल रही हैं।

उपसंहार :- नारी को अपने गौरवपूर्ण अतीत को ध्यान में रखकर त्याग, समर्पण, स्नेह, सरलता आदि गुणों को नहीं भूलना है। यूरोपीय संस्कृति के व्यामोह में न फँसकर भारतीयता को बनाये रखना चाहिए। इससे समाज का और उनका दोनों का हित हो सकेगा। नारी के इस चिरकल्याणमय रूप को लक्ष्य कर कवि जयशंकर प्रसाद ने नारी का अत्यंत सजीव चित्रण किया है –

“नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग-पग-तल में,
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।”

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नारी-शिक्षा का महत्व

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • नारी शिक्षा की आवश्यकता
  • उपसंहार।

नारी स्नेह और सौजन्य की देवी है। वह पशु के समान आचरण करने वाले व्यक्ति को भी मनुष्य बनाती है। मधुर वाणी से वह जीवन को मधुमय बनाती है। मानवीय सदगुणों के पूर्ण विकास, परिवार तथा समाज की शांति, बच्चों के चरित्रनिर्माण और देश के निर्माण में खी की अहम भूमिका है। अत: नारी शिक्षा का महत्व स्वयंसदद्ध है। एक पुरुष की शिक्षा का अर्थ केवल एक व्यक्ति की शिक्षा है, जबकि एक नारी की शिक्षा का अर्थ सम्पूर्ण परिवार की शिक्षा है।

भारतेंदु जी ने ख्री शिक्षा के विषय में कहा था, ‘स्त्री अगर शिक्षित होगी तो वह अपने बच्चों को शिक्षित कर सकती है। अनपढ़ माता की संतान अपना विकास उस तरह नहीं कर सकती, जिस तरह एक शिक्षित माता की संतान कर सकती है। देश के विकास में भी स्री शिक्षा सहायक होगी, स्री शिक्षित होगी तो देश दोनों हाथों से काम करेगा। देश की उन्नति में कोई संदेह नहीं रहेगा।”

नारी-जीवन मुख्यत: पत्नी, माता, बहन और बेटी में बँटा होता है। शिक्षित पत्नी परिवार को सुंदर ढंग से जीने की कला सिखलाती है। नारी स्नेह, सुख, शांति और श्री की वृद्धि करती है। परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों में समन्वय, सामंजस्य स्थापित करने में सफल होती है।

शिक्षित नारी अपने अस्तित्व और शक्ति को पहचानने में समर्थ होती है, तब वह शोषण का शिकार कम होती है। अशिक्षित नारी अपने अधिकार तथा शक्ति से अनभिज्ञ होती है। अशिक्षित नारी स्वभावतः दुर्बल होती है। वह प्राय: जादू-टोना, भूत-प्रेत में विश्वास करती है। प्रगतिशील कदम उठाने में असमर्थ होती है। वह कुरीतियों और कुसंस्कारों की लक्ष्मण रेखा पार करते हुए हिचकती है। इसलिये निरक्षर नारी के जीवन में अंधकार होता है। पुत्री के रूप में वह माता-पिता के लिये बोझ होती है। पत्नी के रूप में उसका पृथक् अस्तित्व नहीं होता। पुत्र के बड़े होने पर वह उसके आश्रय में परमुखापेक्षी जीवन में जीती है।

शिक्षित नारी में आत्मविश्वास जागृत होता है। वह रुढ़ परम्पराओं और कुसंस्कारों को त्याग कर, अपने पैरों पर खड़ी होती है और अपने सम्मान तथा अस्तित्व की रक्षा करती है।

शिक्षित नारी में सभी परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति होती है। स्रियाँ रोजगार कर सकती है और अपने घर की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बना सकती है। अत: नारी के लिये पूर्णत: सुशिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। राष्ट्रनिर्माण के लिए नारी-शिक्षा एक अनिवार्य शर्त है।

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राष्ट्र-निर्माण में नारी का योगदान

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • समाज निर्माण तथा
  • राष्ट्र निर्माण में सहयोग
  • उपसंहार।

राष्ट्र-निर्माण में सहयोग देना हर देशवासी का कर्त्तव्य है। राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया आदिकाल से लेकर आज तक नारियों ने पुरुषों का साथ देकर, उसकी जीवन यात्रा को सफल बनाया है और उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर अपने नैसर्गिक वरदानों से राष्ट्रीय जीवन में अक्षय शक्ति का संचार किया है।

अपने-अपन राष्ट्रों के निर्माण में विश्व प्रसिद्ध महिला प्रधानमंत्रियों का योगदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। इस सन्दर्भ में भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, श्रीलंका की सिरीमावो बंडारनायके, वर्तमान राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगे, इजरायल की भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती गोल्डामायर और ग्रेट बिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री त्रोमती मागरिट थैचर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनोय है।

नारी ने हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्र के उत्थान में सक्रिय सहयोग दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षिका बन उसने भारत को शिक्षित किया, साथ ही राजनीति के क्षेत्र में प्रधानमंत्री, विधायक, सांसद और मंत्री बन कर ख्याति पाई। न्याय के क्षेत्र में भी उसका योगदान कम नहीं है। हर न्यायालय में महिला वकील पाई जाती है। महिला न्यायाधीशों ने तो अपने जोखिम भरे, साहसपूर्ण और अद्भुत निर्णयों द्वारा समग्र राष्ट्र को चमत्कृत किया है।

कार्यरत् महिलाओं में प्रथम महिला वायु-सुरक्षा अधिकारी प्रेमा माथुर, पहली महिला छाताधारी सैनिक गीता घोष, पहली वायुयान पायलेट रूबी बनर्जी, अत्याधुनिक वायुयान की कमाण्डर सौदामिनी देशमुख, सुर्खा जादव और पहली ट्रेन ड्राइवर मुमताज काटावाला का नाम सररणीय है।

पहली भारतीय महिला आई०पी०एस० अधिकारी किरण बेदी ने अपने कार्यकाल में जेल में सुधार लायी, उसके लिये उन्हें मैंगससे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भारत की प्रथम महिला डॉं。 प्रेमा मुखर्जी और हृदयरोग विशेषज्ञा डॉ. पद्मावती तथा दीन-दुखियों की सेविका मदर टेरेसा का नाम कभी भुलाया नहीं जा सकता।

आदिकाल से ही हम देखते हैं कि ख्रियों ने देश के निर्माण में निरंतर योगदान किया है और भविष्य में भी करती रहेंगी। घरसमाज सभी जगह उन्होंने अपनी छवि को आलोकित किया है। शिक्षा का क्षेत्र हो अथवा वाणिज्य का, खेल का हो या संगीत का, ऐसा काई भी क्षेत्र नहीं है जहाँ खियों ने अपनी विशिष्टता का परिचय न दिया हो। अत: हम कह सकते हैं कि राष्ट्र-निर्माण में नारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और रहेगा। महिलाओं का यह योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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धर्म और साम्र्रदायिकता

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • भारत में विविध धर्म
  • विविध सम्पदाय
  • उपसंहार।

जीवन को सुचारु रूप से संचालित करने वाले श्रेष्ठ सिद्धान्तों का समूह धर्म कहलाता है। समस्त मानवीय व्यवहारों का श्रेयस्कर पक्ष ही धर्म है। धर्म व्यक्ति का सहज स्वभाव है, कर्त्तव्य है। अतः धर्म का क्षेत्र व्यापक है।

अपने धर्म के प्रति अदूट आस्था, विश्वास तथा श्रद्धा समर्पित करना साम्पदायिकता नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों के प्रति असहिष्णुता का भाव ही साम्प्रदायिकता है। सत्य पर सभी धर्मों का समान अधिकार है, लेकिन जब एक धर्म सत्य पर केवल अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहता है तो वह सम्पदायिकता का रूप ले लेता है।

भारत में साम्पदायिकता की नई परिभाषा दी जा रही है। धर्म ने सम्पदाय का रूप ले लिया है। धार्मिक साम्प्रदायिकता का अर्थ है. सर्वधर्म-समभाव का त्याग एवं अन्य धर्मो के प्रति अनुदारता एवं असहिष्णुता का प्रदर्शन।

हिन्दुओं का एक सिख सम्पदाय भारत में शांत भाव से जीवन-यापन कर रहा था। मगर राजनीतिक कारणों ने सिखों को उग्र बना दिया। पंजाब में निर्दोष हिन्दुओं की हत्या और आतंक के कारण वहाँ मरघट-सी शांति छा जाती थी। पराजित उग्रवादियों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक की हत्या कर दी।

विश्व में मुस्लिम राष्ट्र धनाढ्य हैं, क्योंक तेल स्रोत पर यवनो का अधिकार है। वे अरबों रुपया हर वर्ष धर्म के नाम पर खर्च करते हैं।

दूसरा विश्व धर्म ईसाई है। ये सामूहिक धर्म परिवर्तन में विश्वास करते हैं। हिन्दू जब जाग्रत हुए तो इस धर्म-परिवर्तन के विरोध में विद्रोह उठ खड़ा हुआ। जाति-उपजाति की साम्प्रदायिकता ने शूद्र और पिछड़ी जातियों में संघर्ष और सवर्णों में आपस के संघर्ष को जन्म दिया। पिछड़ी जतियों को हर क्षेत्र में प्राथमिकता देकर वर्ग-संघर्ष की भावना को अंकुरित किया गया, जिसने साम्पदायिकता का रूप ले लिया। सवर्णों के परस्पर संघर्ष ने मिथ्या स्वाभिमान तथा झूठे अहम्को जन्म दिया।

साम्पदायिकता की भावना इस युग में खूब फल-फूल रही है। कोई भी धर्म संकीर्णता और अनुदारता को वकालत नहीं करता, किन्तु कोई भी धर्मावलम्बी दूसरों के प्रति घृणा, अविश्वास और असहिष्युता की भावना सं मुक्त नहीं हैं। साम्प्रदागिन्क टंगों का कारण यही है। कहते सभी हैं- ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना” मगर वैर-भावना से कोई मुक्त नहीं है।

नैतिकता का पतन रदायिकता की वृद्धि में सहायक हुआ है। साम्पदायिकता से बचना है तो मानवता के महामंत्र का प्रचार होना चाहिए।
एक कवि कहता है –
“‘मैं न बँधा हूँ देश-काल की जंग लगी जंजीर में। मैं न खड़ा हूँ जाति-पाँति की ऊँची-नीची भीड़ में। मेरा तो आराध्य आदमी, देवालय हर द्वार है। कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है।”

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

बढ़ती जनसंख्या – एक अभिशाप

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारत की जनसंख्या
  • जनसंख्या वृद्धि के कारण
  • जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम
  • समाधान के उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत की अनेक समस्याओं में जनसंख्या की समस्या सबसे अधिक विकराल है। आजादी के बाद केवल इसी समस्या के कारण भारतवर्ष में गरीबी, बेरोजगारी तथा अन्य समस्याएँ आज तक सुलझ नहीं पाई हैं। भारत की जनसंख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यहाँ प्रत्येक मिनट सैंतालीस बच्चे पैदा होते हैं।

भारत की जनसंख्या :- आज विश्व का हर छठा नागरिक भारतीय है। चीन के बाद भारत की आबादी विश्व में सर्वाधिक है। एक अरब भारतीयों के धरती, खनिज और अन्य साधन वही हैं, जो आज से पाँच दशक पूर्व थे। लोगों के पास भूमि कम, आय कम और समस्याएँ अधिक बढ़ती जा रही हैं। बेरोजगारों, अशिक्षितों की संख्या बढ़ती जा रही है। बेरोजगारों की संख्या 6 करोड़ से अधिक हो गई है।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण :- जनसंख्या वृद्धि के अनेक कारण हैं। भारत की अधिकांश जनता ग्रामों में निवास करती है। यहाँ लड़कियों को कम ही पढ़ाया जाता है। बेचारी कन्याएँ 14-15 वर्ष की आयु में ही मातृत्व के बोझ से दब जाती हैं। गरीब लोग बच्चों को आय का सोत मानकर अधिक बच्चे पैदा करते हैं। इसीलिए देश की आबादी बढ़ती जाती है।

जनसंख्या-वृद्धि के दुष्परिणाम :- जनसंख्या के बढ़ने से अनेक बुराइयों का जन्म होता है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी ग्रामीण जनता में अंधविश्वासो का बोलबाला है। भारत में अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, रोग, भषष्टाचार, अनाचार आदि की समस्याएँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करता है। चारों ओर आलस्य, दरिद्रता, कलह, रोग, अनाचार, साप्रदायिकता, भ्षष्टाचार, महँगाई, चोरी, डकैतियाँ, लूटपाट तथा अन्य असामाजिक एवम् आर्थिक बुराइयों का बोलबाला है।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण भारत की सारी योजनाएँ विफल हो जाती हैं। देश का उचित विकास नहीं हो पा रहा है। खुशहाली की जगह लाचारी बढ़ रही है। रोजगारी से पेरशान लोग हिंसा, उपद्रव और चोरी-डकैती करने लगते हैं। देश में अपराध बढ़ने लगते हैं तथा नैतिकता का पतन होता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाती है तथा राष्ट्रीय चरित्र की क्षति होती है। अधिक संतान उत्पन्न करने से माँ तथा बच्चे का स्वास्थ्य बिगड़ता है और देश की कार्य-क्षमता एवं राष्ट्रीय आय में कमी आती है।

समाधान के उपाय :- जनसंख्या-वृद्धि रोकना सबसे आवश्यक कदम है। प्रत्येक नागरिक अपने परिवार को नियोजित करें। केवल एक या दो बच्चे ही पैदा करे। लड़का-लड़की को समान दृष्टि से देखा जाए तो भी जनसंख्या पर नियत्रण पाया जा सकता है। जन-संचार माध्यमों तथा समाज-सेवी संस्थाओं के माध्यम से परिवार-नियोजन का व्यापक प्रचार किया जा रहा है। लड़के-लड़की की विवाह की आयु बढ़ाकर क्रमश: 21 वर्ष तथा 18 वर्ष कर दी गई है। इस कानून के बाद भी अनेक स्थानों पर बाल-विवाह हो रहे हैं। परिवार-नियोजन के साधनों के उचित उपयोग से जन्म-दर को मनचाहे समय तक रोका जा सकता है।

भारत में परिवार-कल्याण का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। हर्ष का विषय है कि भारतीय अब इसका महत्व समझने लगे हैं।

उपसंहार :- परिवार-नियोजन के महत्व को अच्छी प्रकार समझ लेने पर ही देश की प्रगति सम्भव है। परिवारकल्याण के साथ ही देश-कल्याण भी जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह जनसंख्या वृद्धि की समस्या के प्रति सावधान हो तथा राष्ट्र-हित में परिवार-नियोजन को अपनाए। जनसंख्या की समस्या कानून द्वारा नहीं, अपितु जनजागरण तथा शिक्षा द्वारा हल करना संभव है।

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भ्रष्टाचार

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भष्टाचार की पृष्ठभूमि
  • भ्रष्टाचार के विविध रूप
  • भ्रष्टाचार के कारण
  • भष्टाचार दूर करने के उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत में स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से ही भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। इस भ्रष्टाचार रूपी दानव ने संपूर्ण भारत को अपनी चपेट में ले रखा है। भ्रष्टाचार आज केवल भारत की नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व की समस्या है। इस दानव से छुटकारा पाना ही आज संपूर्ण मानव समाज की समस्या बन चुकी है।

भ्रष्टाचार का अर्थ :- भ्रष्टाचार का अर्थ है – भषष्ट आचरण। भ्षष्टाचार किसी की हत्या, मार-काट, लूट-पाट, हेरा-फेरी कुछ भी करा सकता है। भ्रष्टाचार ने अपने देश, जाति और समाज को अवनति के गड्ढे में ढकेल दिया है।

भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि :- भषष्टाचार का मूल रूप में उदय कहाँ से हुआ यह तथ्य तो सष्ट नहीं है, किन्तु यह स्पष्ट है कि स्वार्थ-लिप्सा इसकी जननी तथा भौतिक ऐश्वर्य की चाह इसका पिता है। पुरातन युग में दक्षिणा, मध्यकाल में भेंट तथा आर्धुनिक काल में उपहार आदि सभी भ्रष्टाचार के विभिन्न रूप हैं।

भ्रष्टाचार के विविध रूप :- आज भारतीय जीवन का कोई क्षेत्र, सरकारी अथवा गैर-सरकारी, सार्वजनिक या निजी ऐसा नही जा भ्रष्टाचार से अछूता रहा हो। कितु फिर भी हम इसे तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त कर रहे हैं।

राजनैतिक भ्रष्टाचार :- यह भ्रष्टाचार का प्रमुख रूप है। भ्रष्टाचार के सारे रूप इसके ही संरक्षण में पनपते हैं। इसके अंतर्गत लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव जीतने के लिए अपनाया गया भ्रष्ट आचरण आता है।

प्रशासनिक भ्रष्टाचार :- इसके अंतर्गत उच्च पदों पर आसीन सचिव, अधिकारी, कार्यालय अधीक्षक, अधिशासी अभियन्ता, पुलिस अधिकारी, बाबू, चपरासी सभी आते हैं। कितना भी कठिन कार्य हो पैसा हाजिर तो कार्य भी फटाफट हों जाता है।

व्यावसायिक भ्रष्टाचार :- इसके अंतर्गत खाद्य पदार्थों में मिलावट, घटिया व नकली औषधियाँ निर्माण, जमाखोरी, चोरी तथा अन्यान्य भषष्ट तरीके देश तथा समाज को कमजोर बनाने के लिए अपनाए जाते हैं। मसालों में मिलावट, दाल-चावलों में पत्थर, घी में चर्बी, सरसां के तेल में अर्जीमोन की मिलावट, पैट्रोल में कैरोसीन की मिलावट आदि व्यावसायिक श्रष्टाचार के अंतर्गत ही आते हैं।

भ्षष्टाचार के कारण :- भषष्टाचार के इतने अधिक फैलने के कारण हैं – ‘यथा राजा तथा प्रजा।’ जब आज के नता तथा प्रशासक सभी भ्रष्ट हैं तो अधीनस्थ कर्मचारी भी जी भर कर भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं। पैसा सभी को प्रिय होता है। बहती गंगा में सभी हाथ धो रहे हैं।

भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय :- भ्रष्टाचार दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं :-

भारतीय संस्कृति की ओर ध्यान आकृष्ट करना :- संस्कृत और देशी भापाओं का शिक्षण अनिवार्य करना आवश्यक है। इससे जीवन के मूल्य दृढ़ तथा पोषक बनेंगे। लोग धर्म-भीरु इनेंगे तथा दुगचार से घृणा करेंगे। टी. वी. पर भारतीय संस्कृति का प्रचार होना चाहिए।

चुनाव -प्रक्रिया को बदलना :- भ्रष्टाचार को हटाने के लिए वर्तमान चुनाव-पद्धति में परिवर्तन आवश्यक है। जनता ईमानदार प्रत्याशियों को विजयी बनाए। चुनाव आयोग तथा राजनीतिक दलों को मिलकर ऐसे नियम बनाने चाहिए कि स्वच्छ छवि वाले तथा शिक्षित लोग ही चुनाव लड़ सकें तथा उनके चुनाव का पूरा खर्च सरकार को वहन करना चाहिए। इससे चुनावी भ्रष्टाचार मिट सकता है। राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले धन पर पाबन्दी लगनी चाहिए।

कर-प्रणाली में सुधार :-सरकार अनेक प्रकार के करों को समाप्त कर तीन या चार आवश्यक करें ही जनता पर लगाए और कर-प्रणाली को इतनी सरल बना दे कि सामान्य तथा अशिक्षित लोग भी वांछित कर आसानी से अदा कर सकें।

शासन -व्यय में कटौती :-शासन-व्यय में कटौती करके सबके सामने सादगी का आदर्श रखा जाए। भारतीय जीवन-पद्धति की यह विशेषता है कि वह हमेशा त्यागोन्मुखी रही है, इसलिए तड़क-भड़क तथा अनावश्यक व्यय में कटौती की जानी चाहिए।

देश-भक्ति की भावना पैदा करना :-प्रत्येक नागरिक राष्ट्र को महान समझकर सदैव उसके गौरव को बनाए रखने के लिए तत्पर रहे।

स्वदेश चिंतन अपनाना :-प्रत्येक भारतवासी को स्वदेशी वस्तुओं को ही क्रय करना है-ऐसी भावना प्रत्येक नागरिक में आनी चाहिए। इससे देश का धन देश में ही रहेगा तथा देश की समृद्धि बढ़ेगी।

कठोर कानून बनाना :- कानून को इतना कठोर बना दिया जाए कि हर अपराधी को उसके अपराध की उचीत सजा मिल सके।

सामाजिक बहिष्कार :- भ्रष्ट व्यक्ति का समाज से बहिष्कार किया जाए, उनके साथ रोटी-रोजी आदि किसी प्रकार का व्यवहार न किया जाए।

उपसंहार :- सदाचार रामबाण औषधि और परम धन है। आज हमारे देश में भ्रष्टाचार मिटाना है तो सदाचारी, सरल, सादगी-प्रिय लोगों का सादर अभिनंदन किया जाना चाहिए। इससे दुराचार मिटेगा तथा सदाचार की पुन : प्रतिष्ठा हो सकेगी। देश भी विकास के मार्ग पर प्रगति करता हुआ अग्रसर होगा।

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भारतीय जीवन पर पाश्चात्य प्रभाव

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पश्चिमी प्रभाव
  • परिणाम
  • उपसंहार।

जब दो भिन्न सभ्यता – संस्कृतियाँ आमने-सामने अर्थात् सम्पर्क में आया करतो हैं, तब दे दोनों सामान्य स्तर पर एकदूसरे का कुछ-न-कुछ प्रभाव भी अवश्य ही ग्रहण किया करते हैं। यह अलग बात है कि उनमे से जो दुर्बल और पराजित सभ्यता-संस्कृति हुआ करती है, वह सबल और विजेता संस्कृति का कुछ अधिक ही प्रभाव ग्रहण करती है। लंकिन जहाँ तक भारतीय जीवन, समाज और सभ्यता – संस्कृति का प्रश्न है ; इसमें तो पाश्चात्य प्रभाव ग्रहण करने में कमाल ही कर दिया है।

भारतीय जन – समाज का ऐसा एक भी क्षेत्र अपनी सभ्यता-संस्कृति के तत्त्वों के लिए सुरक्षित रह पाया हो, ऐसा कहीं भूल से भी दिखाई नहीं देता। हमारी भाषा, हमारी वेश-भूषा, हमारा रहन-सहन, खान-पान और आम व्यवहार सभी कुछ इस सीमा तक पश्चिमी हो चुका है कि उसमें यदि कहीं कभी कुछ भारतीय दीख भी जाता है, तो वह बदरंग एवं बदरूप-सा, अजीब एवं अजनबी-सा प्रतीत होता है। उस सब में पहुँच कर लगने लगता है, जैसे हम अपने देश या घर में होकर कहीं विदेश में किसी पराए घर में आ गए हैं।

आज हम पश्चिम ही का खा-पी, पहन, ओढ़ और सभी कुछ कर रहे हैं। यहाँ तक कि हमारी संस्कृति की पहचान तक गायब हो गई है। उसमें पश्चिम के अपतत्वों का सम्मिश्रण इस सीमा तक हो चुका है कि खोजने की चेष्टा करने पर भी अपना कुछ नहीं मिल पाता। अपनी भाषाएँ तो अपनी रही ही नहीं, उनमें लिखे जा रहे साहित्य ने व्यक्त हो रहे भावविचार और वर्णित पर्यावरण तक उधार के लगते हैं। कला के अन्य किसी भी रूप में भारतीयता नहीं रह गई, बल्कि उसका भीतर – बाहर का सभी कुछ पश्चिमी रंग में रंग चुका है।

पश्चिम ने भारत को जो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान दिया है, एक राष्र्रीयता एवं एक जातीयता की भावना दी है, उस सब के कारण हमें उस का आभारी भी होना चाहिए। आधुनिक प्रौद्योगिकी, तकनीक आदि देकर भी पश्चिम ने निश्चय ही हमें बहुत उपकृत किया है। काम के समय काम, विश्राम के समय विश्राम, आनन्द-मौज के समय आनन्द-मौज, अनेक तरह को अन्ध धारणाओं के प्रति अस्वीकार, राष्ट्रीय चरित्र और व्यवहार जैसा और भी कुछ अच्छा है पश्चिम में। लेकिन सखेद स्वीकार करना पड़ता है कि हम भारतीय उस अच्छे को अपनाने की तरफ ध्यान नहीं दे सके।

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भारतीय नारी पर पाश्चात्य प्रभाव

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पश्चिमी अनुकरण
  • उपभोक्ता सामग्री
  • उपसंहार।

पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति ने यों तो भारतीय जीवन और समाज के किसी भी अंग को अछूता नहीं रहने दिया ; पर लगता है कि भारतीय नारी-समाज, उसका प्रत्येक अंग उससे सर्वाधिक प्रभावित हुआ है। इसी कारण वह आज सर्वाधिक प्रताड़त एवं प्रपीड़ित भी है। पाश्चात्य नारी समाज और उसकी सभ्यता-संस्कृति, पाश्चात्य शिक्षा और रीति नीतियों के प्रभाव से आज की नारी ने स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली है, पर सखेद स्वीकार करना पड़ता है कि उसने न तो स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ ही समझा है और न अनुशासन ही सीखा है।

शिक्षा, स्वावलम्बन, आर्थिक स्वतंत्रता, घर से बाहर निकल कर जीवन-समाज को नेतृत्व दे पाने की क्षमता, घर की चार-दीवारी और चूल्हे-चौके तक ही अपने को सीमित न रख जीवन के किसी भी उद्योग-धंधे या व्यवसाय में अपनी दक्षता का परिचय देना जैसी अनके बातें भारतीय नारी ने पश्चिम से सीखी हैं। उन सभी बातों को शुभ परिणामदायक कहा जा सकता है। इस से भारतीय नारी के जीवन में नया आत्मविश्वास जागा है।

उसे नये क्षितिजों के उद्घाटन करने में काफी सफलता प्राप्त हुई है। यह भी पश्चिम का ही प्रभाव है कि आज भारतीय नारी घूँघट के भीतर सिकुड़ी छुई मुई बनी रहने वाली नहीं रह गई, न ही वह कल की तरह पुरुषों को देख कर लज्जा से सिकुड़ कुमड़े की बेल-सी ही बनी रह गई हैं। आज वह धड़ल्ले से हर विषय पर, हर किसी के साथ बातचीत कर सकती है। वह पुरुषों की तरह एवरेस्ट की चोटी पर तो अपने पाँव रख ही आई है, चन्द्रलोक की यात्रा भी कर आई है। इन सभी बातो को भारतीय नारी-जीवन के लिए अच्छा एवं सुखद कहा जा सकता है।

इन अच्छाइयों के साथ-साथ भारतीय नारी ने पश्चिम से कुछ ऐसी बातें भी सीखीं या ऐसे प्रभाव भी ग्रहण किए हैं, जिन्हें भारतीय सभ्यता-संस्कृति की दृष्टि से उचित एवं अच्छा नहीं माना या कहा जा सकता। उस तरह के पाश्चात्य प्रभावों ने नारी को एक प्रकार का चलता- फिरता मॉडल इश्तिहार या पोस्टर या फिर उपभोक्ता सामग्री बना कर रख दिया है। परम्परागत शब्दों में कहा जाए, तो एक बार फिर वह भोग्या मात्र बन कर रह गई है।

फैशन में अंधी आज की नारी ने आज अपना अंग-प्रत्यंग तक सभी कुछ उधाड़ कर रख दिया है। इस सीमा तक वह उघड़ने लगी है कि उस का सौन्दर्य भदेस, सुकुमारता माँस का लजीीज़ टुकड़ा और तन-बदन नग्न होकर अश्लीलता का प्रतिरूप-सा प्रतीत होता है। वह किसी भी तरह से अपने उपयोग करने देने के लिए तैयार हो जाती है कि जब उसे कड़क नोटों की खड़क या चमकीले सिक्को की खनक सुन पड़ती है।

कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि अभी तक तो भारतीय नारी न तो पूर्णतया पाश्चात्य ही बन पाई है और न अपने भारतीय स्वरूपाकार को ही निखार पाई है। वह एक ऐसे दोराहे पर पहुँच चुकी है, जहाँ से आगे किधर अच्छाया बुरा है ; वह न तो अभी तक समझ पा रही है और न निर्णय ही कर पा रही है।

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बाल-मज़दूर समस्या
अथवा, बाल श्रमिक समस्या

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • मानवता के नाम पर कलंक
  • दयनीय जीवन
  • उपसंहार।

इब्ने इशा की एक कविता का अंश –

यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पे तनहा बैठा है
ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपडा है
ना इसके पास खिलौनों में
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है, कोई झूला है।

आज परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन गईं और बन रही हैं कि ऐसे बच्चे हर कहीं शडर हो या ग्राम, बाजार हो या मुहल्ला सब जगह देखने को मिल जाते हैं जिनके हाथ-पैर रात-दिन की कठिन मेहनत-मजदूरी के लिए विवश होकर धूलधूसरित तो हो चुके होते हैं, अक्सर कठोर एवं छलनी भी हो चुके होते हैं। चेहरों पर बालसुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखाएँ स्थायी डेरा डाल चुकी होती हैं।

फूल की तरह ताजा गन्ध से महकते रहने योग्य फेफड़ों में धूल, धुआँ, रोएँ-रेशे भरकर उसे अस्वस्थ एवं दुर्गन्धित कर चुके होते है। गरीबीजन्य बाल-मजदूरी करने की विवशता ही इसका एकमात्र कारण मानी जाती है। ऐसे बाल मज़दूर कई बार तो डर, भय, बलात् कार्य करने जैसी विवशता के बोझतले दबे- घुटे प्रतीत हुआ करते हैं और कई बार बड़े बूढ़ों की तरह दायित्व-बोध से दबे हुए भी। कारण कुछ भी हो, बाल-मज़दूरी न केवल किसी एक स्वतंत्र राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के माथे पर कलंक है।

छोटे – छोटे बालक मज़दूरी करते हुए घरों, ढाबों चायघरों, छोटे होटलों आदि में तो अक्सर मिल ही जाते हैं, छोटीबड़ी फैक्टरियों के अस्वस्थ वातावरण में भी मज़दूरी का बोझ ढोते हुए दीख जाया करते हैं। काश्मीर का कालीन-उद्योग, दक्षिण भारत का माचिस एवं पटाखे बनाने वाला उद्योग ; महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल की बीड़ी-उद्योग तो पूरी तरह से टिका ही बाल-मजदूरों के श्रम पर हुआ है।

बाल-मज़ूरों का एक अन्य वर्ग भी है। कन्धे पर झोला लादे इस वर्ग के मजदूर इधर-उधर फिके हुए गन्दे, फटे, तुड़ेमुड़े कागज बीनते दिखाई दे जाते हैं या फिर पोलिथीन के लिफाफे तथा पुराने प्लास्टिक के टुकड़े एवं दूटी-चप्पलें-जूते आदि। कई बार गन्दगी के ढेरों को कुरेद कर उनमें से टिन, प्लास्टिक, लोहे आदि की वस्तुएँ चुनते, राख में कोयले के टुकड़े बीनते हुए भी इन्हें देखा जा सकता है। ये सब चुन कर कबाड़खानों पर जा कर बेचने पर इन्हें बहुत कम दाम मिल पाता है जबकि ऐसे कबाड़ खरीदने वाले लखपति-करोड़पति बन जाया करते हैं। बाल-मज़ूरों के इस तरह के और वर्ग भी हो सकते हैं।

आखिर में बाल-मजदूर आते कहाँ से हैं ? सीधा-सा उत्तर है कि एक तो गरीबी की मान्य रेखा से भी नीचे रहने वाले घर-परिवारों से आयाा करते हैं। फिर चाहे ऐसे घर-परिवार ग्रामीण हों या नगरीय झुग्गी-झोंपड़ पट्टियों के निवासी, दूसरे अपने घर-परिवार से गुमराह होकर आए बालक। पहले वर्ग की विवशता तो समझ में आती है कि वे लोग मजदूरी करके अपने घर-परिवार के अभावों की खाई पाटना चाहते हैं। दूसरे उन्हें पढ़ने-लिखने के अवसर एवं सुविधायें ही नहीं मिल पाती।

लेकिन दूसरं गुमराह होकर मज़ूरी करने वाले बाल-वर्ग के साथ कई प्रकार की कहानियाँ एवं समस्याएँ जुड़ी रहा करती हैं। जैसे पढ़ाई में मन न लगने या पनुतीर्ण हो जाने पर मार के डर से घर-परिवार से दूर भाग आना ; सौतेली माँ यामाता-पिता के सौतले एवं कठोर व्यवहार से पीड़ित होकर घर त्याग देना, बुरी आदतों और बुरे लोगों की संगत के कारण घरों में न रह पाना या फिर कामचोर होना आदि कारणों से घरों से भाग कर और नगरों में पहुॅच कई बार अच्छे घर-परिवार के बालकों को भी विषम परिस्थितियों में मजदूरी करने के लिए विवश हो जाना पड़ता है। और भी कई वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं।

देश का भविष्य कहे-माने जाने वाले बच्चों-बालकों को किसी भी कारण से मज़दूरी करनी पड़े, इसे मानवीय नहीं कहा जा सकता। एक तो घरों में बालकों के रह सकने योग्य सुविधाएँ-परिस्थितियाँ पैदा करना आवश्यक है, दूसरे स्वयं राज्य को आगे बढ़कर बालकों के पालन की व्यवस्था सम्हालनी चाहिए। सभी समस्या का समाधान सभ्वव हो सकता है।

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भिखारी-समस्या
अथवा, भिक्षावृत्ति

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • कारण
  • उपसंहार।

भारत में, भारत की राजधानी दिल्ली में भी भीख माँगना कानूनी दृष्टि से अपराध है। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्ष बाद ही इस प्रकार के कानून का प्रावधान किया गया था कि जिस के अन्तर्गत भीख माँगना या मँगवाना दोनों को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया था। इस घोषणा के बाद ऐसे भिखारी-निरोधक घर भी बनाए गये थे कि जहाँ भीख माँगने वाले शरण पा सके। वहाँ रह कर अपनी योग्यतानुसार कोई काम-धन्धा सीख कर बाहर आएँ और काम कर के अपना जीवन-यापन सम्मानपूर्वक कर सकें। लेकिन इस भारी कानून व्यवस्था का प्रावधान एवं कानून का प्रभाव बहुत ही कम समय तक रहा। धीरेधीरे फिर उसी प्रकार, बल्कि पहले से भी कहीं अधिक, प्रत्येक स्थान पर भिखारियों की भीड़ बढ़ने लगी।

ये भिखारी कहाँ से आते हैं, और इन के विरुद्ध कानून के रक्षक एवं ठेकेदार पुलिस वाले कोई कार्यवाही क्यों नहीं करते, ‘नवभारत टाइम्स’ को प्रकाशित रिपोर्ट में अच्छा प्रकाश डाला गया है। उसके अनुसार – “बच्चों को अगवा कर के, अनाथ बच्चों, बेसहारा औरतों, अपाहिजों को डरा-धमका कर भीख माँगने के लिए मजबूर करने वाले माफिया गैंग दिन-प्रतिदिन फल-फूल रहे हैं और इसके पोषण में पुलिस की भागीदारी भी समान रूप से है। दिल्ली के विभिन्न इलाकों में पुलिस का भिखारियों या इस व्यवसाय के माफिया गिरहों से हफ्ता तक बन्धा हुआ है।’ बहुत पहले स्व० श्रीमती महादेवी वर्मा ने एक चीनी भाई के संस्मरण में भी इस प्रकार के भीख मंगवानेवाले माफिया गिरोह का सजीव वर्णन किया है।

दिल्ली-समेत प्राय: समस्त नगरों-महानगरों में ऐसे इलाके अवस्थित हैं कि जहाँ भीख माँगने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान भिखारी जैसे रूप बनाना, विशेष दयनीय स्वर निकालना, हाथ-पैर हिलाकर करुणा उभार भीख देने को विवश कर देना आदि सभी कुछ सिखाया जाता है। अनकेशः अच्छे भले लोगों और स्वस्थ बच्चों तक को अपाहिज बना कर भीख मंगवाई जाती है। बूढ़े-बूढ़ी अपनी असमर्थता जता कर, बच्चे वाली औरतें बच्चों के अनाथ होने और पालन का दायित्व निभाने जैसी बातें कह कर ऐसे हाव-भाव प्रदर्शित करती है, अनके तो हाथ धोकर पीछे ही पड़ जाती हैं कि कुछ देकर ही पीछा छुड़ाना संभव हो पाता है।

देवी-देवताओं-विशेषकर शनि-मंगल और माता के नाम पर भी भीख माँगी जाती है। शनि-मंगल के चित्र लेकर और माता के भजन गाकर बच्चों-औरतों को चौराहों पर, बसों में भीख मांगते हुए अक्सर देखा जा सकता है, इस प्रकार भीख मांगने के अनेक तरीके हैं। भिखारी समस्या के अनेक रूप हैं ; क्योंकि अब लोग इन हत्थकण्डों को अक्सर समझने लगे हैं, इस कारण जो वास्तव में अपाहिज एवं बेसहारा होने के कारण भीख पाने के अधिकारी हैं, कई बार उन्हें भी वंचित रह जाना पड़ता है। यों किसी भी हालत में भीख मांगना अच्छा नहीं होता है।

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वृक्षारोपण
अथवा, वृक्षारोपण : सांस्कृतिक दायित्व

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • वृक्षों का महत्व
  • वृक्षों के प्रति मानव की निर्दयता
  • सांस्कृतिक दायित्व
  • उपसंहार।

वृक्षारोपण का सामान्य अर्थ है – वृक्ष लगाना। प्रयोजन है – वन-सम्पदा के रूप में प्रकृति से हमें जो कुछ भी प्राप्त होता आ रहा है, वह नियमपूर्वक हमेशा आगे भी प्राप्त होता रहे ; ताकि हमारे जीवन-समाज का सन्तुलन, हमारे पर्यावरण की पवित्रता और सन्तुलन नियमित बने रह सकें। वृक्षारोपण करना एक प्रकार का सहज सांस्कृतिक दायित्व स्वीकार किया गया है।

वृक्षारांपण मानव-समाज का सांस्कृतिक दायित्व है, इसे अन्य दृष्टि से भी देखा और प्रमाणित किया जा सकता है। मानव सभ्यता का उदय और आरम्भिक आश्रय प्रकृति यानि वन-वृक्ष ही रहे हैं। उसकी सभ्यता-संस्कृति के आरम्भिक विकास का पहला चरण भी वन-वृक्षों की सघन छाया में ही उठाया गया। यहाँ तक कि उसकी समृद्धतम साहित्य-कला का सृजन और विकास ही वनालियों की सघन छाया और प्रकृति की गोद में ही सम्भव हो सका, यह एक पुरातत्त्व एवं इतिहास-सिद्ध बात है।

प्राचीन काल में हरे वृक्ष को काटना पाप समझा जाता था, सूखे वृक्ष भले ही घरेलू उपयोग के लिए काटे जाते थे। कदम्ब वृक्ष को भगवान कृष्ण का प्रिय समझकर श्रद्धा दी जाती थी। अशोक का वृक्ष शुभ और मंगलदायक माना जाता था। तभी तो सीता ने अशोक वृक्ष से प्रार्थना की थी – “तस अशोक मम करहु अशोका।” यह था प्राचीन भारत में वन संम्पदा का महत्व। आरम्भ मे ग्रन्थ लिखने के लिए कागज के समान जिस सामग्री का प्रयोग किया गया, वे भूर्ज या भोजपत्र भी तो विशेष वृक्षों के पत्ते ही थे।

संस्कृति की धरोहर माने जाने वाले कई ग्रन्थो की भाजपत्रों पर लिखो गई पाण्डुलिपियाँ आज भी कहीं-कहीं उपलब्ध हैं। सांस्कृतिक भाव धारा की बुनियाद ही जब वन-वृक्षों की छाया में रखी गई और विकास कर पाई, तब यदि वृक्षारोपण को एक सांस्कृतिक दायित्व कहा-माना जाता है, तो यह उचित ही है।

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ होने से पहले तक देश में आरक्षित-अनारक्षित सभी तरह के वृहद वनों की भरमार रही। परन्तु बीसवीं शती के स्वार्थान्ध मानव ने वनों का दोहन कर के धन कमाने का मार्ग तो अपना लिया, पर नए वृक्षारोपण के दायित्व को कतई भुला दिया। इसी कारण आज मानव-सभ्यता को पर्यावरण-सम्मन्धी कई तरह की समस्याओं से दोचार होना पड़ रहा है।

जो हो, अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। अब भी निरन्तर वृक्षारोपण और उनके रक्षण के सास्कृतिक दायित्व का निर्वाह कर सृष्टि को अकाल भावी-विनाश से बचाया जा सकता है। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर इस और प्राथमिक स्तर पर ध्यान दिया जाना परम आवश्यक है।

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आधुनिक जीवन और कंप्यूटर (माध्यमिक परीक्षा – 2011)
आधुनिक यंत्र-पुरुष-कंप्यूटर (मॉडल प्रश्न – 2007)

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • कंप्यूटर की परिभाषा
  • कंप्यूटर के उपयोग
  • कंप्यूटर और मानव-मस्तिष्क
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- गत कुछ वर्षों से कंप्यूटर की चर्चा जोर-शोर से सारे विश्व में हो रही है। देश को कंप्यूटरकृत करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अनेक उद्योग-धंधों और संस्थानों में कंप्यूटर का प्रयोग होने लगा है। कंप्यूटरों के उन्मुक्त आयात के लिए देश के द्वार खोल दिए गए हैं।

कंप्यूटर क्या है ? :- हमारे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन पर छा जाने वाला कंप्यूटर एक ऐसा यांत्रिक मस्तिष्क है, जिसमें विभिन्न गणित संबंधी सूत्रों और तथ्यों के संचालन का कार्यक्रम पहले ही समायोजित कर दिया जाता है। इसके आधार पर कंष्यूटर न्यूनतम समय में गणना कर तथ्यों को प्रस्तुत कर देता है। कप्यूटर का हिंदो नाम संगणक है।

चार्ल्स वेबेज पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में पहला कंप्यूटर बनाया था। वह कप्यूटर लम्बी गणनाएँ कर सकता था और उनके परिणामों को मुद्रित कर देता था। कप्यूटर स्वयं ही गणना करके जटिल-से-जटिल समस्याओं के हल मिनटों और सेकेण्डों में निकाल सकता है।

कम्यूटर के उपयोगों को इन शीर्षकों में बाँटकर देखा जा सकता है –

बैंकिंग के क्षेत्र में :- भारतीय बैंक में खातों के संचालन और उनका हिसाब-किताब रखने के लिए कंप्युटर का प्रयोग आरम्भ हो चुका है। प्राय: सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों ने चुंबकीय संख्याओं वाली पास बुक जारी की है।

प्रकाशन के क्षेत्र में :- समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों के प्रकाशन में कंप्यूटर का विशेष योगदान है। अब तो कंप्यूटर से संचालित फोटो कम्पोजिंग मशीन के माध्यम से छपने वाली समग्री को टंकित किया जा सकता है। कंप्यूटर में संचित होने के बाद सारी सामग्री एक छोटी चुंबकीय डिस्क पर अंकित हो जाती है। फोटो कंपोजिंग मशीन इस डिस्क के अंकींय संकेतों को अक्षरीय संकेतों में बदल देती है जिससे उनका मुद्रण हो सके।

सूचना और समाचार-प्रेषण के क्षेत्र में :- दूरसंचार की दृष्टि से भी कंप्यूटर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अब तो ‘कंप्यूटर नेटवर्क’ के माध्यम से देश के प्रमुख नगरों को एक-दूसरे से जोड़ने की व्यवस्था की जा रही है।

डिजायनिंग के क्षेत्र में :- प्राय: ऐसा माना जाता है कि कंप्यूटर अंकों और अक्षरों को ही प्रकट कर सकते हैं। आधुनिक कप्यूटर के माध्यम से भवनों, मोटर-गाड़यों, हवाई जहाजों आदि के डिजाइन तैयार करने में कंप्यूटर ग्राफिक का प्रयोग हो रहा है।

कला के क्षेत्र में :- कंप्यूटर अब कलाकार या चित्रकार की भूमिका भी निभा रहे हैं। अब कलाकार को न तो कैनवास की आवश्यकता है न रंग की, न बुशों की। कंप्यूटर के सामने बैठा कलाकार अपने ‘नियोजित प्रोग्राम’ के अनुसार स्कीन पर चित्र बनाता है और स्कीन पर निर्मित यह चित्र प्रिंट की ‘कुँजी’ (Key) दबाते ही प्रिटर द्वारा काग़ज पर अपने उन्हीं वास्तविक रंगों के साथ प्रिंट हो जाता है।

रेलवे के क्षेत्र में :- कंप्यूटर द्वारा रेलवे संपूर्ण देश के संपर्क में रहता है। कंप्यूटर से आप कहीं से कहीं तक का भी आरक्षण करा सकते हैं, उस आरक्षण को कहीं पर भी रद्द करा सकते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में :- कंप्यूटरों से वैज्ञानिक अनुसंधान का स्वरूप ही बदलता जा रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कंप्यूटर ने कान्ति पैदा कर दी है। उसके माध्यम से अंतरिक्ष के व्यापक चित्र उतारे जा रहे हैं तथा इन चित्रों का विश्लेषण भी कंप्यूटर के माध्यम से हो रहा है। आधुनिक वेधशालाओं के लिए कव्यूटर सर्वाधिक आवश्यक हो गए हैं।

औद्योगिक क्षेत्र में :- विशाल कारखानों में मशीनों के संचालन का कार्य अब कंप्यूटर द्वारा किया जा रहा है। कंप्यूटरों से जुड़कर रोबोट ऐसी मशीनों का नियंत्रण कर रहे हैं, जिनका संचालन मानव के लिए अत्यधिक कठिन था। भयकर शीत और जला देनेवाली गर्मी भी उन पर कोई प्रभाव नहीं डालती।

युद्ध क्षेत्र में :- वस्तुतः कंप्यूटर का अविष्कार युद्ध के एक साधन के रूप में ही हुआ था। अमेरिका में जो पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर बना था, उसका उपयोग एटम-बम से संबंधित गणनाओं के लिए ही हुआ था। जर्मन सेना के गुप्त संदेशों को जानने के लिए अंग्रेजों ने ‘कोलोसस’ नामक कंप्यूटर का प्रयोग किया था। अमेरिका की ‘स्टार-वार्स’ योजना कंप्यूटरों के नियन्त्रण पर ही आधारित हैं।

कंप्यूटर और मानव-मस्तिष्क :- प्राय : मन में यह प्रश्न उठता है कि कंप्यूटर और मानव-मस्तिष्क में श्रेष्ठ कौन है ? मानव-मस्तिष्क की अपेक्षा कंप्यूटर समस्याओं को बहुत कम समय में हल कर सकता है, कितु वह मानवीय संवेदनाओं, अभिरुचियों और चिन्तन से रहित यंत्र-पुरुष है। कंप्यूटर केवल वही कार्य कर सकता है जिसके लिए उसे निर्देशित (Programmed) किया गया हो।

उपसंहार :- भारत तीव्र गति से कंप्यूटर-युग की ओर बढ़ रहा है। हम अपना जीवन कंप्यूटर के हवाले करते जा रहे हैं। कंप्यूटर द्वारा विदेशों में बैठे मित्रों से पत्र-व्यवहार हो रहा है, परीक्षा-परिणामों की जानकारी ले रहे हैं। कंप्यूटर हमें बोलना, व्यवहार करना, जीवन को जीने का ढंग, मित्रों से मिलना, उनके विषय में ज्ञान प्राप्त करना आदि सब कुछ बताएगा। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि कंप्यूटर द्वारा हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया जा रहा है। अब कंप्यूटर हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग बन चुका है।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

प्रदूषण : समस्या और समाधान (मॉडल प्रश्न – 2007)
अथवा, प्रदूषण से मुक्ति के उपाय (माध्यमिक परीक्षा – 2010)

रूपरेखा :

(1) प्रस्तावना
(2) प्रदूषण का अर्थ
(3) प्रदूषण के प्रकार
(4) प्रदूषण पर नियंत्रण
(5) उपसंहार।

प्रस्तावना :- प्राचीनकाल से ही गंगाजल हमारी आस्था और हमारे विश्वास का प्रतीक इसी कारण से रहा है क्योंकि वह सभी प्रकार के प्रदूषणों से मुक्त था, किंतु आज अनियन्त्रित औद्योगिक वृद्धि के कारण अन्य नदियों की तरह गंगा भी प्रदूषित हो रही है। यदि प्रदूषण इसी प्रकार बढ़ता रहा तो ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ वाला मुहावरा निरर्थक हो जाएगा।

प्रदूषण का अर्थ :- विकास और व्यवस्थित जीवन-क्रम के लिए जीवधारियों को संतुलित वातावरण की आवश्यकता होती है। संतुलित वातावरण में प्रत्येक घटक एक निश्चित मात्रा में उप्थित रहता है। कभी-कभी वातावरण में एक अथवा अनेक घटकों की मात्रा कम अथवा अधिक हो जाया करती है अथवा वातावरण में अनेक हानिकारक घटकों का प्रवेश हो जाता है। फलत: वातावरण दूषित हो जाता है, जो जीवधारियों के लिए किसी-न-किसी रूप में हानिकारक सिद्ध होता है। इसे ही प्रदूषण कहते हैं।

प्रदूषण के प्रकार :- प्रदूषण की समस्या का जन्म जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ हुआ है। विकासशील देशों में औद्योगिक एवं रासायनिक कचरों ने जल, वायु तथा पृथ्वी को भी प्रदूषित किया है।

विकसित एवं विकासशील सभी देशों में निम्न प्रकार के प्रदूषण विद्यमान हैं :-

वायु-प्रदूषण :- वायुमंडल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक विशेष अनुपात में विद्यमान हैं, अपनी क्रियाओं द्वारा जीवधारी वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन-डाई-आक्साइड छोड़ते रहते हैं। प्रकाश की उपस्थिति में हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण क्रिया द्वारा कार्बन-डाई-ऑक्साइड को ग्महण करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस प्रकार ऑवसीजन और कार्बन-डाई-ऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड, सल्फर-डाई-ऑक्साइड तथा सिलिकॉनटेट्राफ्लोराइड मुख्य हैं।

जल-प्रदूषण :- सभी जीवधारियों के लिए जल अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। पौधे अपना भाजन जल में घुली हुई अवस्था में ही प्राप्त करते हैं। जल में अनेक प्रकार के खानिज तत्व, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ तथा गैसें घुली रहती हैं। यदि जल में ये पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं, तो जल प्रदूषित होकर हानिकारक हो जाता है।

ध्वनि प्रदूषण :- अनेक प्रकार के वाहनों, जैसे-कार, स्कूटर, मोटर, जेट विमान, ट्रैक्टर आदि तथा लाउडस्पीकर, बाजे, कारखानों के सायरन और मशीनों से भी ध्वनि-प्रदूषण होता है। अधिक तेज ध्वनि से मनुष्य की सुनने की शक्ति भी कम हो जाती है तथा उसे ठीक प्रकार से नींद नहीं आती, यहाँ तक कि कभी-कभी पागलपन का रोग भी उत्पन्न हो जाता है।

रासायनिक प्रदूषण :- प्रायः कृषक अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक और रोगनाशक दवाइयों तथा रसायनों का प्रयोग करते हैं। इनका स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। जब ये रसायन वर्षा के जल के साथ बहकर नदियों द्वारा सागर में पहुँच जाते हैं तो, ये वहाँ रहने वाले जीवों पर घातक प्रभाव डालते हैं। इतना ही नहीं मानव-देह पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण :- परमाणु शक्ति उत्पादन केंद्रों तथा परमाणविक परीक्षण से भी जल, वायु तथा पृथ्वी का प्रदूषण होता है, जो देश की वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिए भी खतरनाक है। परमाणु विस्फोट के स्थान पर तापक्रम इतना अधिक बढ़ जाता है कि धातु भी पिघल जाती है। पोखराण में परमाणु परीक्षण के समय भारत में भी ऐसा ही हुआ था।

प्रदूषण पर नियंत्रण :- पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को रोकने तथा उसकी रक्षा के लिए गत वर्षों में सारे विश्व में एक चेतना पैदा हुई है। भारत सरकार ने 1947 ई० में ‘जल-प्रदूषण निवारण एवम् नियंत्रण अधिनियम’ लागू किया था। इसी के अंतर्गत एक केंद्रीय बोर्ड’ तथा सभी प्रदेशों में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गठित किए गए हैं। इन बोर्डों ने प्रदूषणनियंत्रण की योजनाएँ तैयार की हैं।

उपसंहार :- सरकार प्रदूष्षण की रोकथाम हेतु निरन्तर प्रयास कर रही है। पर्यावरण के प्रति जागरुकता से ही हम भाविष्य में और अधिक अच्छा स्वास्थ्य तथा जीवन जी सकेंगे तथा भविष्य में आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण के अभिशाप से मुक्ति दिला सकेंगे।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

एड्सः एक चुनौती

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • एडस की जानकारी
  • एड्स के कारण
  • एड्स से बचाव के उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- H.I.V. (एच. आई. वी.) अर्थात् एड्स (Aids) भारत और पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती बन चुका है। भारत में आज करोड़ो लोग एच आई. वी. से सक्रमित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों से पता चलता है कि दुनिया में 3 करोड़ 80 लाख वयस्क और करीब 15 लाख बच्चे एच.आई. वी. की चपेट में आ चुके हैं। सन् 1991 में इसकी संख्या आधी थी। भारत में H.I.V. संकमित लोगों की अनुमानित संख्या 3.85 मिलियन है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध-प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर तथा नागालैंड में एक प्रतिशत से अधिक लोग H.I.V. संक्रमित हैं। इसने गत वर्ष विश्व में लगभग 30 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिए। आज विश्व का प्रत्येक देश एइस की चपेट में है।

एड्स का अर्थ :- एड्स’ का पूरा अर्थ है-

  • A – Acquired-एक्वायर्ड-प्राप्त किया हुआ।
  • I – Immuno (इम्युनो)-शरीर के रोगों से लड़ने की क्षमता।
  • D – Deficiency (डेफिसिएंसी)-कमी।
  • S – Syndrome (सिंड्रोम)-लक्षणों का समूह।

एड्स की जानकारी :-एड्स एक ऐसी भयंकर बीमारी है जो एच. आई. वी. (H.I.V.) नामक वायरस विषाणु के द्वारा फैलती है। ये वायरस अत्यंत सूक्ष्म तथा बीमारी पैदा करने वाले जीव हैं। इन्हें केवल अत्यंत शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से ही देखा जा सकता है। I.I.V. वायरस के शरीर में प्रवेश करने के बाद मरीज की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होने लगती है।

इस प्रकार रोगी साधारण रोगों से मुकाबला नहीं कर पाता है। एच आई. वी. संक्रमण और एडस के अंतर को आम व्यक्ति नहीं समझ पाता है। एच आई. वी. संक्रमण उसे कहते हैं जब वायरस शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है। तब वह व्यक्ति एच आई. वी. सक्रमित व्यक्ति कहलाता है तथा ऐसे व्यक्ति को 7 से लेकर 10 वर्षो तक कोई बीमारी नहीं होती। वह दूसरे लोगों की तरह सामान्य नज़र आता है। इसके बाद वह संकमित व्यक्ति एइस की बीमारी से घिर जाता है। एक बार शरीर में वायरस प्रवेश कर जाए तो फिर इस बीमारी से मुक्ति सम्भव नहीं है।

एड्स के कारण :- एडस रोग मूल रूप से एक यौन रोग है। इसके प्रमुख कारण हैं-

(अ) एच आई. वी. ग्रस्त व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध रखने से। यौन संबंधों से यह रोग संक्रमिक पुरुष से महिला को, संक्रमित महिला से पुरुष को तथा संक्रमित पुरुष से पुरुष को हो सकता है।
(ब) डॉक्टरों द्वारा प्रदूषित सुइयों का प्रयोग करने से, मादक पदार्थों का सेवन करने वालों द्वारा दूषित सुइयों के प्रयोग से, शरीर पर गुदाई करने वालों द्वारा अख्वच्छ औजारों का प्रयोग करने से तथा संक्रमित व्यक्ति के रेजर से बाल अथवा दाढ़ी बनाने से।

एड्स से बचाव के उपाय :- सरकार विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा जनता को एइस की जानकारी दे रही है। एइस के सामान्य लक्षणों की जानकारी सभी को होनी चाहिए। एइस के रोग से ग्रस्त रोगी का वजन निरंतर कम होता जाता है। उसकी गर्दन, बगल अथवा जांघों की ग्यंथियों में सूजन आ जाती है। उसे लगातार बुखार भी रहता है। मुंह तथा जीभ पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, लेकिन इन लक्षणों का अर्थ यह नहीं है कि ऐसे लक्षणों वाले सभी व्यक्तियों को एड्स ही है। तपेदिक रोग में भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं।

एड्स रोग का निदान एलिसा टेस्ट (Elisa Test) तथा वेस्टर्न ब्लॉट (Western Blot) नामक रक्त जाँच से किया जाता है। लाल रिबन एड्स का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है। प्रतिवर्ष एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। इस दिन सभी लोग एड्स का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न पहनकरे एडस के विरुद्ध अपनी मुहिम चलाते हैं। एक दिसम्बर (विश्व एड्स दिवस) विश्व के सभी देशों के बीच आपसी विश्वास, करुणा, समझ और एकजुटता विकसित करने का संदेश देता है। एड्स के विरुद्ध विश्वव्यापी अभियान का प्रारंभ 1977 ई० से हुआ है। सभी देशों की यही धारणा है कि विश्व के लोग इस बीमारी की गंभीरता को समझें। संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक दिसंबर को ‘विश्व एड्स दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की है।

उपसंहार :- याद रहे अभी तक इसका कोई इलाज नहीं है, कोई दवा नहीं है। अत: इससे बचाव हेतु इसकी पूर्ण जानकारी जनता को होनी चाहिए। एड्स की जानकारी में ही बचाव है। व्यक्ति को रक्त चढ़व्राते समय, इंजेक्शन लगवाते समय, नाई से बाल कटवाते समय नई सुई तथा ब्लेड का प्रयोग करना चाहिए। ऐसी जानकारी जनता को हो तथा वह शारीरिक संबंधों में सतर्कता रखें तो एड्स नहीं फैलेगा तथा सभी भारतवासी अथवा विश्व के लोग दुश्चिन्ताओं से मुक्त रहेंगे।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

इण्टरनेट और विश्व गाँव की संकल्पना
(गलोबलाइजेशन)

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • कम्यूटर के माध्यम से समग्र विश्व और गाँव को जोड़ने का प्रयास।
  • इण्टरनेट की लोकप्रियता
  • उपसंहार।

भौगोलिक सीमाओं से आबद्ध व्यक्ति सूचना प्रौद्योगिकी और संचार प्रौद्योगिकी के सदुपयोगी संगम से एक सुगम व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है। यह व्यवस्था अपने विस्तृत आलिंगन से समूचे वसुधा को समेट रही है। वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी विकास के इस परिप्रेक्ष्य में इस पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति दूर-दराज के क्षेत्र में स्थित दूसरे व्यक्तियों से बौद्धिक सम्पर्क स्थापित कर रहा है। स्पष्टत: मानवीय सम्बन्ध एक आशाजनक उज्जवल परिवर्तन की स्थिति से गुजर रहा है। कम्य्यूटर के माध्यम से सूचना के राजमार्ग इण्टरनेट पर चलकर समस्त मानव-जाति एकीकरण के लिए प्रयत्नशील है।

मानव-जीवन की सभी गतिविधियां यथा – राजनीतिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक आदि इलेक्ट्रॉनिक सुविधाओं से लाभान्वित हो रही हैं। नेटवर्क के इस विशाल पर्यावरण में कोई सीमा नहीं। कोई सरहद नहीं, कोई बंधन नहीं। विचारकों का उन्मुक्त संचालन-प्रसारण विश्व ग्राम योजना का प्रमुख चरित्र है और इण्टरनेट इसकी सम्पूर्ण व्यवस्था है। इण्टरनेट व्यवस्था के अन्तर्गत लाखों-करोड़ों कम्यूटरों का संजाल बनता जा रहा है, जो सूचनाओं के आवागमन को सुलभ करता है।

इसकी संरचना वस्तुतः प्रजातांत्रिक है, जो सूचना शक्ति को विकेन्द्रित करती है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी व्यक्ति अपने कम्यूटर को इण्टरनेट से जोड़कर सूचना सम्माद बन सकता है। इण्टेरनेट से जुड़ा कम्यूटर होस्ट कहलाता है। इस सामाज्य में राजा व रंक सभी अपने होस्ट कम्प्यूटर से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इण्टरनेट का जन्म शीत-युद्ध के गर्भ से अमेरिका में हुआ है।

1960 ई० में सोवियत संघ के परमाणु आक्रमण से चिंतित अमेरिकी सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था की संरचना चाही, जिसमें अमेरिकी शक्ति किसी एक जगह पर केन्द्रित न रहे। विकेन्द्रित सत्ता वाले नेटवर्क से यह आशा थी कि शक्ति के बिखरे स्वरूप से उसे आक्रमण का शिकार होने से बचाया जा सकेगा। इस नेटवर्क में कम्यूटर शक्ति से सम्बन्धित समस्त सूचनाओं को संग्रहीत रखा जा सकेगा। इस प्रकार, कुछ कम्प्यूटरों के नष्ट हो जाने के बावजूद भी कुछ कम्यूटर, शेष कम्य्यूटर रक्षात्मक कदमों के लिए संग्रहीत सूचनाओं के साथ मार्गदर्शन करेंगे।

सत्तर के दशक में अमेरिका की रक्षा उन्नत अनुसंधान परियोजना एजेंसी ने अपने प्रयत्न में सफलता प्राप्त की और इस नेटवर्क का उदय हुआ। जो कम्प्यूटरों के बीच संयोजित पैकेट संजालों में सूचनाओं का आदान-प्रदान कराने लगा। ये अंतर-नैटिंग परियोजना परिष्कृत होकर इण्टरनेट के नाम से विख्यात हुई। अनुसंधान से विकसित प्रोटोकोल को नियंत्रण प्रोटोकोल (टी.सी.पी.) और इण्टरनेट प्रोटोकोल (आई. बी.) कहा गया। इण्टरनेट से सम्बन्धित दस्तावेजों के प्रकाशन और प्राटोकल संचालन के लिए इण्टरनेट कारवाई बोर्ड होता है जो प्रयोक्ताओं को इण्टरनेट रजिस्ट्री डोमेन नेम और उसके द्वारा डाटाबेस का आबटन और वितरण करता है।

विश्व समाज प्रौद्योगिकी सुविधाओं का सदुपयोग सभी पारम्परिक दूरियाँ खत्म करने के लिए कर गहा है। व्यक्तिगत लाभ से लेकर जनकल्याण तक की दृष्टि से इण्टरनेट एक उपयोगी उपलब्धि के रूप में प्रकट हों रहा है। भविष्य में इण्टरनेट से जुड़ा विश्व समुदाय एक प्रजातांत्रिक वैज्ञानिक व्यवस्था में सूचना शक्ति का बराबर हकदार होगा। लेकिन कठिनाई उन विकासशील देशों के लिए होगी, जहाँ आधारभूत संरचना का अभाव है।

भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी बिजली, पानी, टिकाऊ आवास, साक्षरता, स्वास्थ्य सुविधा, पोषक भोजन आदि की समस्या है, इलक्ट्रोनक जीवन स्वप्नातीत हैं। गाँवों में सामुदायिक कम्यूटर के लिए भी निर्बाध बिजली की आवश्यकता होगी।-ई-गर्वेंस के लिए भी उचित वातावरण चाहिए। यह आवश्यक है कि सूचना क्रान्ति के इस लाभदायक क्षण में लाभान्वित हो रहा धनाद्य वर्ग अपन सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह करे। स्पष्ट है कि इण्टरनेट विश्व में सभी समुदायों से सम्बद्ध मामलों पर विचार-विमर्श के रूप में पूरी दुनिया में सूचना का कारगर प्रसारण बन सकता है।

हम इण्टरनेट पर दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले अपने मित्र से बातचीत कर सकते हैं। विभिन्न दुकानों में बिकने वाली वस्तुओं को देख सकते हैं और ऑर्डर दे सकते हैं। मण्डियों और शेयर बाजार पर नजर रख सकते हैं। अपने उत्पादन और सेवाओं का विज्ञापन कर सकते हैं। इण्टरनेट पर हम न केवल अखबार पढ़ सकते हैं, बल्कि पुस्तकालयों से जरूरी सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं। दुनिया से हम सलाह मांग सकते हैं, और अपना विचार दुनिया के सामने रख सकते हैं। जिस प्रकार गाँव के अन्दर सूचना का आदान-प्रदान बड़ी तेजी से होता है, ठीक उसी प्रकार इण्टरनेट के द्वारा पूरे विश्व में कहीं से किसी कोने में सूचना तीव्र गति से दिया और लिया जा सकता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इण्टरनेट विश्व गाँव की संकल्पना को साकार कर सकता है।

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दूरदर्शन (टेलिविज़न)

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • अविष्कार
  • कार्य-प्रणाली
  • उपयोगिता
  • उपसंहार।

दूरदर्शन आधुनिक विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण विधा है मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देने, जानकारी बढ़ाने, प्रचार और प्रसार का भी एक महत्त्वपूर्ण सशक्त माध्यम है। इस माध्यम में जैसे रोडियो और सिनेमा की श्रव्य-दृश्य विधियाँ मिल कर एक हो गई हैं। इसे बेतार-संवाद प्रेषण का अभी तक का सर्वोत्तम उपलव्ध वैज्ञानिक साधन माना जाता है। टेलिफोन और रेडियां के आविष्कार के पहले तक जैसे आम आदमी ने कभी कल्पना तक नहीं की थी कि कभी वह दूर-दूराज़ स्थित लोगों की आवाज़ सुन कर उन्हें अपने समीप अनुभव कर सकेगा, उसी प्रकार बोलने वाले को कभी देख भी सकेगा, यह सोचना भी कल्पना से परे था। लेकिन दूरदर्शन के आविष्कार ने असम्भव या कल्पनातीत समझी जाने वाली उन सभी बातों को आज साकार एवं सम्भव कर दिखाया है।

इस वैज्ञानिक चमत्कार यानि दूरदर्शन का आविष्कार सन् 1926 ई० में सम्भव हो पाया था। इस का आविष्कारकर्ता का नाम है जॉन एल० बेयर्ड। भारत में इस चमत्कारी दृश्य श्रव्य प्रसारण विधा का आगमन सन् 1964 ई० के बाद ही सम्भव हों पाया। भारत में पहले दूरदर्शन-प्रसारण केन्द्र की स्थापना सन् 1965 में ही हो पाई। धीरे-धीरे इसका प्रचलन और प्रसारण इस सीमा तक बड़ा कि आज दूर-पास सर्वन्र इसे देखा-सुना जा सकता है। राजभवन से लेकर झोंपड़ी तक में यह पहुँच चुका है। पहले इस का श्वेत-श्याम स्वरूप ही प्राप्त था, जबकि आज भारत-समेत सारे विश्व में दूरदर्शन रंगीन दुनिया में प्रवेश कर चुका है।

आजकल भारत में उपग्रह की सहायता से दूरदर्शन के कार्यक्रम देश के प्रत्येक कोने में सरलता से पहुँचने लगे हैं। अब तक डेढ़-दो दर्जन तक प्रसारन केन्द्र तथा सैंकड़ों रिले केन्द्र स्थापित हो चुके हैं। दूरदर्शन-ट्राँसमिशन की संख्या भी दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ती ही जा रही है। आधुनिक विज्ञान ने टेलिविजन का प्रयोग भिन्न-भिन्न दिशाओं में सम्भव बना दिया है। दूरदर्शन अन्तरिक्ष-विज्ञान की भी कई तरह से सहायता कर रहा है। सुदूर ग्रहों की जानकारी इस के कैमरे सहज ही प्राप्त कर लेते हैं। कृत्रिम उपग्रह अन्तरिक्ष में भेजने और वहाँ उन पर नियंत्रण रखने के कार्य में भी दूरदर्शन बड़ा सहायक सिद्ध हो रहा है।

दूरदर्शन तरह-तरह के मनोरंजन का एक सर्वसुलभ घरेलू साधन है ही, इससे, शिक्षा के प्रचार-प्रसार, निरक्षरता हटाने जैसे कार्यों में भी पर्याप्त सहायता ली गई और ली जा रही है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को शिक्षा के साथ-साथ किसानों को कृषि कार्यों को शिक्षा के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार दूरदर्शन प्रचार-प्रसार का भी अच्छा माध्यम है। सो स्वास्थ्य-सुधार, जनसंख्या-नियंत्रण, शिशु-संवर्द्धन-रक्षा जैसे कार्य भी यह कर रहा है। और भी कई प्रकार के घरेलू तथा व्यावसायिक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए इस का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। देश-विदेश के समाचारों की दृश्य-श्रव्य योजना, समाचार-समीक्षा, गोष्ठियाँ, वार्त्ताएँ, कवि-सम्मेलन-मुशायरे, प्रदर्शनियाँ और तरह-तरह के उत्पादों के विज्ञापन जैसे अनेक कार्य इस से लिए जा रहे हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि आज दूरदर्शन हमारे व्यापक जीवन का एक व्यापक एवं व्यावहारिक अंग बन चुका है। हाँ, अपसंस्कृति के प्रचार का माध्यम बनने से इसे रोकना आवश्यक है, नहीं तो देश-काल के अनुरूप इस की वास्तविक उपयोगिता व्यर्थ हो कर रह जाएगी।

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कम्प्यूटर : मशीनी मस्तिष्क

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • कम्यूटूर-प्रणाली
  • उपयोगिता
  • उपसंहार।

आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने किस सीमा तक प्रगति एवं विकास कर लिया है, किस तरह वह एक-के बाद-एक नए आविष्कार कर के मानव की सभी तरह की कार्य-शक्तियों के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है ; कम्प्यूटर का आविष्कार इसका एक नवीनतम उदाहरण है।

कम्प्यूटर को आज प्रत्येक क्षेत्र की प्रगति एवं द्रुत विकास के लिए आवश्यक माना जाने लगा है। शिक्षा, व्यवसाय, शास्त्र-प्रशासन सभी में आज कम्प्यूटर-प्रणाली की न केवल महती आवश्यकता ही अनुभव की जा रही है ; बल्कि यथासम्भव अपनाया भी जा रहा है। यहीं तक नहीं, देश की सुरक्षा-प्रणाली की दृढ़ता के लिए भी आज कम्प्यूटर एक तरह की अनिवार्यता है। मानव-मस्तिष्क से भी बढ़ कर तीव्र गति से कार्य करने वाला कम्य्यूटर वास्तव में अंक-गणितपद्धति के विकास की एक महत्त्वपूर्ण आधुनिक देन है। ईसा से लगभग चार हजार वर्ष पहले गणक-पटल नामक अंक गणित की जिस विद्या का विकास हुआ था, जिसके द्वारा तारों में मोती जैसे डालकर आज भी बच्चों को गिनती सिखाई जाती है, उसका विकसित एवं यंत्रीकृत परिवर्द्धित रूप है कम्यूटर।

यह कम्यूटर-प्रणाली मुख्यत पाँच भागों में विभाजित रहा करती है – (1) स्मरणयंत्र, इसमें सभी तरह की सूचनाएँ भर दी जाती हैं। इन्हीं के आधार बनाकर कम्यूटरी-गिनती हुआ करती है। (2) नियंत्रणकक्ष, इसी से गिनती के गुण-दोष अर्थात् ठीक-गलत का पता चल पाता है।(3) अंक गणित भाग, इसमें यह भाग गिनती की सारी क्रियाप्रक्रिया को सम्पन्न किया करता है।(4) आन्तरिक यन्त्र भाग, इसमें सभी प्रकार के संकेत, निर्देश और जानकारियाँ संकलित एवं संचित रहा करती हैं। (5) बाह्य यंत्र भाग, उपर्युक्त अंगों के क्रियाकलापों से प्राप्त निर्देशों-सूचनाओं का विवेचन-विश्लेषण का परिणाम बताने का कार्य यह भाग सम्पन्न किया करता है।

कम्प्यूटर की अपनी एक अलग भाषा है। उसी में सभी तरह के संकेत, सूचनाएँ आदि उसमें भरे जाते हैं। कम्प्यूटर की तकनीकी भाषा में उन्हे क्रमश: आफ, आन, शून्य, एक या फिर द्विचर संख्या कहा जाता है। इन्हीं के द्वारा ही भाषा को अंकों में बद्ल दिया जाता है इन्हें ‘बिद्स’ भी कहा गया है। ये बिट्स छ: होते हैं, जिन का प्रयोग करके ही किसी बात का अन्तिम परिणाम प्राप्त किया जाता है। इन सब की तकनीक सर्वथा भिन्न प्रकार की है।

आज सरकारी-गैरसरकारी प्रत्येक क्षेत्र में बड़े व्यापक स्तर पर कम्यूटर का प्रयोग किया जाने लगा है। प्रत्येक गणितीय हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, अनुभव, परीक्षण आदि योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने, उनकी परिणति का फलाफल जानने के लिए कम्यूटर का प्रयोग अनिवार्यत: किया जाने लगा है। इतना ही नहीं, सामान्य जमा-तफरीक, गुणा या भाग, यहाँ तक कि अन्तरिक्ष और मौसम-विज्ञान की भविष्यवाणियाँ भी इसी के माध्यम से की जाने लगी हैं।

चिकित्सा-प्रणालियों और ऑपरेशनों में भी इसकी सहायता ली जाती है। समाचारपप्रों के प्रकाशन और समूचे क्रियाकलापों का आधार तो कम्यूटर बन ही चुका है, पुस्तक-प्रकाशन व्यवसाय भी धीरे-धीरे सम्पूर्णतः इसी पर आश्रित होता जा रहा है।

आज कई प्रकार के अनुसन्धान कार्य भी कम्यूटर से किए जा रहे हैं। टेलिफोन, बिजली-विभाग, बैंक आदि भी बिल बनाने तथा अन्य लेन-देन के कार्यों में इस का प्रयोग करने लगे हैं। इस प्रकार आज कम्प्यूटर-प्रयोग व्यापक होता जा रहा है। इसके साथ कई तरह के खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। मानव-मस्तिष्क का व्यर्य और बेकार हो जाना पहला खतरा है। इसी तरह के और भी कई खतरे हैं। तो चाहे कुछ भी हो जाए, यह मशीनी मस्तिष्क वास्तविक मानव-मस्तिष्क जैसा तो कतई नहीं बन सकता।

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धर्म और विज्ञान

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • धर्म और विज्ञान का पारस्परिक संबंध
  • दोनों में सामंज्यस
  • उपसंहार।

जीवन को सत्य का पालन करने का आधार, आदर्श व्यवहार के प्रति आस्था और विश्वास जैसे सात्विक एवं उदात गुणों को धारण करने की प्रेरणा एवं शक्ति जिससे प्राप्त हुआ करती है, उसे धर्म कहते हैं।

धर्म के विपरीत विज्ञान का मूल आधार भी विशेष प्रकार का ज्ञान ही हुआ करता है। विज्ञान भी मूल रूप से सत्य का अनवरत अन्वेषक होता है। लेकिन उस का आधार ठोस, नापे-तोले जा सकने वाले भौतिक पदार्थ हुआ करते हैं। वह धर्म की तरह अनैतिक आत्म तत्त्व का चिन्तक एवं विवेचक न होकर भौतिक तथ्यों का अन्वेषण किसी अन्य लोक में उद्धार पाने के लिए नहीं किया करता ; बल्कि इस दृश्य और पंचभौतिक संसार की सुख-समृद्धि पाने के लिए ही किया करता है।

धर्म और विज्ञान का प्रेरणा-स्रोत एक ही है। लक्षित उद्देश्य भी एक ही है और वह मानव-जीवन की सुख-समृद्धि की कामना और उस कामना को पूर्ण करने की वेश्ष। मानव-कल्याण की लक्ष्य-साधना एक समान दोनों में विद्यमान दोनों यानी धर्म और विज्ञान जब अपने मूल लक्ष्य की साधना की राह से भटक जाया करते हैं, तो स्वयं अपने लिए और पूरे जीवन-समाज के लिए तरह-तरह के व्यवधानों, संकटों, अपकृत्यों अैर अपरूपों की सृष्टि का कारण बन जाया करते हैं। इतना अन्तर अवश्य रहता है कि धर्म लक्ष्य से भष्ट हो या अधर्म बनकर लोक-परलोक दोनों के नाश का कारण बन जाया करता है ; जबकि विज्ञान राह से भटक कर मुख्यत: भौतिक या इहलौकिक विनाश का कारण ही उपस्थित किया करता है।

मानव-समाज की सर्वागीण उन्नति तभी हो सकती है जब धर्म और विज्ञान में सामंज्यस हो। जिस प्रकार अकेलाविज्ञान संसार को शांति नहीं प्रदान कर सकता उसी प्रकार अकेला धर्म भी संसार को समृद्ध नहीं बना सकता। दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। आवश्यकता इस बात का है कि धर्म और विज्ञान – दोनों का एक-दूसरे पर अंकुश रहे।

इससे स्सष्ट है कि यदि मानव विवेक से काम ले, अपने आचरण-व्यवहार से विवेक को हाथ से न निकलने दे, तो धर्म और विज्ञान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

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शिक्षा और विज्ञान

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पारस्परिक संबंध
  • लक्ष्य-हित साधन
  • उपसंहार।

शिक्षा का चरम लक्ष्य मानव-जाति और समाज को हर प्रकार से विवेक सम्मत राह पर चलाना ही हुआ करता है। इस प्रकार विज्ञान का कार्य भी व्यक्ति और समाज के जीवन को विकास के नये-नये आयाम प्रदान कर उसे एक सुखसुविधापूर्ण सन्तुलन प्रदान करना ही है। इसी प्रकार उसकी दृष्टि को व्यापक बनाना, मन-मस्तिष्क के बन्द पड़े या संकीर्ण द्वारों में खुलापन लाना भी विज्ञान का ही एक कार्य है।

अब देखना यह है कि शिक्षा और विज्ञान में क्या कोई सीधा सम्बन्ध स्थापित भी किया जा सकता है ? इन प्रश्नों पर दो तरह से विचार करना सम्भव हो सकता है।

पहली दृष्टि यानि कि समूची शिक्षा, उसके सभी विषयों को बाद में देकर केवल विज्ञान-सम्बन्धी शिक्षा को ही लागू कियाजजाए ; यह उचित प्रतीत नहीं होता। जीवन में कोमलता, कोमल पक्षों और स्नेह-सम्बन्धों से पले रिश्ते-नातों का महत्त्व समाप्त हो जाएगा। दूसरे केवल विज्ञान पढ़ एवं सीख लेने से जीवन का काम भी नहीं चल सकता। जीवन और उसके व्यवहारों-व्यापारों को चलाने के लिए अन्याय विषयों की शिक्षा एवं जानकारी उतनी ही आवश्यक है कि जितनी वैज्ञानिक विषयों की। सभी की शिक्षा को उचित एवं व्यावहारिक सन्तुलन देने से ही उसका अपना और जीवन का वास्तविक महत्त्व बना रहा सकता है।

अब दूसरी दृष्टि पर विचार करें। वह यह है कि समूची शिक्षा-पद्धाति एवं पढ़ाए जाने विषयों को पढ़ाते समय वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि अपनायी जाए। हमारे अपने विचार में भी यह दृष्टि और धारणा उचित प्रतीत होती है। आज हम जिस युगजीवन में जी रहे हैं, उसमें वैज्ञानिक दृष्टि अपनाए बिना ठीक ढंग से जी पाना कतई संम्भव नहीं। ऐसा होने पर ही एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति स्वयं जीवन के जीवन्त सन्दर्भों के साथ जुड़ कर जीवन को उचित दृष्टि से देख सकेगा।

विज्ञान हो या शिक्षा, दोनों को सहयोगी बना कर या मान कर इन दोनों की सफलता-सार्थकता तभी प्रमाणित की जा सकती है, जब ये आत्यान्तिक तौर पर मानव-कल्याण करें। प्रोफेसर अल्बर्ट आइन्स्टीन का यह कथन यथार्थ है “‘हमारे इस जड़वादी युग में केवल जिज्ञासु वैज्ञानिक अन्वेषकों में ही गहरी धार्मिकता है।’ कुछ इसी प्रकार की बात स्वामी विवेकानंद ने भी कही थी – ” आधुनिक विज्ञान सच्ची धार्मिक भावना का ही प्रकटीकरण है क्योंकि उसमें सत्य को सच्ची लगन से समझने की कोशिश है।”

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राष्ट्र की प्रगति में विज्ञान की भूमिका (माध्यमिक परीक्षा – 2009)
अथवा, भारत में विज्ञान के बढ़ते चरण

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • अणुशक्ति
  • विशेष शक्ति
  • उपलब्धियाँ
  • उपसंहार।

स्वतंग्रता – प्राप्ति से पहले तक आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत की अपनी गति- दिशा शून्य थी। सूई से लेकर हवाई जहाज़, रेलवे इंजिन, यहाँ तक कि रेल के डिब्बे भी आयात किये जाते थे। उस आयात किए वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से ही इस देश का परिचय आधुनिक विज्ञान के साथ संभव हो पाया था। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद आज स्थिति यह है कि छोटे-बड़े प्रत्येक सामान, यंत्र, उपकरण आदि का निर्माण भारत में होने लगा है। इतना ही नहीं, आज भारत कई तरह की मशीनरी, यंत्रों एवं वैज्ञानिक उपकरणों का वैज्ञानिक तकनीक का भी आस-पास के अनेक छोटे-बड़े देशों को निर्यात भी करने लगा है।

सर्वप्रथम भारत में सन् 1948 में एक अणुशक्ति आयोग स्थापित किया गया। सन् 1955 ई० में पहले परमाणु रिएक्टर का निर्माण किया। बिजली का उत्पादन अणुर्शक्ति से करने के लिए तारापुर पर माणु बिजली घर स्थापित किया। सन् 1974 में राजस्थान के पोखरण नामक स्थान पर प्रथम भूमिगत अणु-विस्फोट कर भारत ने सारे संसार को चकितविस्मित कर दिया। इसके बाद भारतीय विज्ञान ने उपग्रह-निर्माण एवं उड़ान क्षेत्र में प्रवेश किया। सन् 1975 में ‘आर्यभट्ट’ नामक उपग्रह का प्रक्षेपण कर भारतीय विज्ञान ने संसार की आँखें खोल दीं। यह प्रमाणित कर दिया कि भारत इस क्षेत्र में भी निरन्तर आगे बढ़ते जाने की नीयत से कार्य कर रहा है। यह बात विशेष ध्यातव्य है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने परमाणु शक्ति अर्जित कर ली है।

अन्तरिक्ष – अनुसन्धान के वैज्ञानिक क्षेत्र में भी भारत आज एक विशेष शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया है। सन् 1975 में ‘आर्यभट्ट’ का और 1979 में ‘भास्कर’ का सफल प्रक्षेपण करने के बाद जब भारतीय रॉकेटों के माध्यम से ‘रोहिणी’ नामक उपग्रह कक्षा में स्थापित किया, तो विश्व ने एक बार फिर चौंक कर भारत की तरफ देखा। सन् 1984 में उपग्रह ‘रोहिणी डी-2’ छोड़ कर अपने अन्तरिक्ष-विज्ञान के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इसके बाद एपल, भास्कर-द्वितीय, इन्सेट प्रथम-ए, इन्सेट प्रथम-बी, एस० एल० वी- 2 तथा 3 , इन्सेट एफ-डी आदि अनेक उपग्रह अन्तरिक्ष में भेज चुका है और भी भेजने की कई तरह की योजनाओं पर भारतीय वैज्ञानिक नित नए प्रयत्न और प्रयोग कर रहे हैं। इस से भविष्य को परम उज्ज्वल कहा जा सकता है।

बिजली, तार, दूर, संचार, टेलिविजन, सिनेमा और अब कम्प्यूटर आदि के निर्माण में भी भारत अन्य किसी देश से पोछे नहीं है। रेलवं इंजिन, डिब्बे, बस, ट्रक, कार सभी चीजों का निर्माण करके आज भारत अपनी हर प्रकार की आवश्यकताएँ पूरी कर रहा है। अन्य देशों से भी उसे ऐसी सब वस्तुओं के निर्माण के आर्डर लगातार प्राप्त होते रहते हैं। हर दिशा और क्षेत्र में भारत ने यथेष्ठ प्रगति और विकास किया है।

यों भारत के पास अपनी प्राचीन परम्परागत वैज्ञानिक पद्धदियाँ भी अपने संस्कृत साहित्य में सुरक्षित हैं। लेकिन सखेद कहना पड़ता है कि आज भाषा की मारामारी के अभाव और विदेशी भाषा की मानसिकता बन जाने के कारण हम सब से लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं रह गए। जो हो, भारतीय वैज्ञानिकों ने आधुनिक विज्ञान और तकनीक के विकास में सी संसार को बहुत कुछ दिया और दे सकता है।

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पेड़-पौधे और पर्यावरण

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • उपयोगिता
  • वन-कटाई के दुष्परिणाम
  • उपसंहार।

पेड़-पौधे प्रकृति की सुकुमार, सुन्दर, सुखदायक सन्तानें मानी जा सकती हैं। इन के माध्यम से प्रकृति अपने अन्य पुत्रों, मनुष्यों तथा अन्य सभी तरह के जीवों पर अपनी ममता के खज़ाने न्योछावर कर अनन्त उपकार तो किया ही करते हैं। उनके सभी तरह के अभावों को भरने, दूर करने के अक्षय साधन भी हैं। पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ हमें फल-फूल, और्षधियाँ, छाया एवं अनन्त विश्राम तो प्रदान किया ही करते हैं, वे उस प्राण-वायु (ऑक्सीजन) का अक्षय भण्डार भी हैं कि जिस के अभाव में किसी प्राणी का एक पल के लिए जीवित रह पाना भी नितान्त असंभव है।

पेड़-पौधे हमारी ईधन की समस्या का भी समाधान करते हैं। उनके अपने आप झड़ कर इधर-उधर बिखर जाने वाले पत्ते घास-फूँस, हरियाली और अपनी छाया में अपने पनपने वाली नई वनस्पतियों को मुफ्त की खाद भी प्रदान किया करते हैं। उनमें हमें इमारती और फर्नीचर बनाने के लिए कई प्रकार की लकड़ी तो प्राप्त होती ही है, कागज आदि बनाने के लिए कच्ची सामग्री भी उपलब्ध हुआ करती है। इसी प्रकार पेड़-पौधे हमारे पर्यावरण के भी बहुत बड़े संरक्षक हैं.। यों सूर्य-किरणें भी नदियों और सागर से जल-कणों का शोषण कर वर्षा का कारण बना करती हैं ; पर उस से भी अधिक यह कार्य पेड़-पौधे किया करते हैं। सभी जानते हैं कि पर्यावरण की सुरक्षा, हरियाली वर्षा का होना कितना आवश्यक हुआ करता है।

पेड़-पौधे वर्षा का कारण बन कर के तो पर्यावरण की रक्षा करते ही हैं, इनमें कार्बन डाई-ऑक्साइड जैसी विषैली, स्वास्थ्य-विरोधी और घातक कही जाने वाली प्राकृतिक गैसों का चोषण और शोषण करने की भी बहुत अधिक शक्ति रहा करती है। स्पष्प है कि ऐसा करने पर भी वे हमारी धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सहायता ही पहुँचाया करते हैं। पेड़-पौधे वर्षा के कारण होने वाली पहाड़ी चट्टानों के कारण, नदियों के तहों और माटी भरने से तलों की भी रक्षा करते हैं। आज नदियों का पानी जो उथला या कम गहरा होकर गन्दा तथा प्रदूषित होता जा रहा है, उसका एक बहुत बड़ा कारण उनके तटों, निकास-स्थलों और पहाड़ों पर से पेड़-पौधों की अन्धा-धुन्ध कटाई ही है। इस कारण जल स्रोत तो प्रदूषित हो ही रहे हैं, पर्यावरण भी प्रदूषित होकर जान-लेवा बनता जा रहा है।

धरती पर विनाश का यह ताण्डव कभी उपस्थित न होने पाए, इसी कारण प्राचीन भारत के वनों में आश्रम और तपोवनों, सुरक्षित अरण्यों की संस्कृति को बढ़ावा मिला। तब पेड़-पौधे उगाना भी एक प्रकार का सांस्कृतिक कार्य माना गया। सन्तान पालन की तरह उन का पोषण और रक्षा की जाती थी। इसके विपरीत आज हम, कांक्रीट के जंगल उगाने यानि बस्तियाँ बसाने, उद्योग-धन्धे लगाने के लिए पेड़-पौधौं को, आरक्षित वनों को अन्धा-धुन्ध काटते तो जाते हैं पर उन्हें उगाने, नए पेड़-पौधे लगा कर उन की रक्षा और संस्कृति करने की तरफ कतई कोई ध्यान नहीं दे रही।

यदि हम चाहते है कि हमारी यह धरती, इस पर निवास करने वाला प्राणी जगत् बना रहे है, तो हमें पेड़-पौधों की रक्षा और उन के नव-रोपण आदि की ओर प्राथमिक स्तर पर ध्यान देना चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि धरती हरी भरी रहे, नदियाँ अमृत जल-धारा बहाती रहें और सब से बढ़ कर मानवता की रक्ष संभव हो सके, तो हमें पेड़-पौधे उगाने, संर्द्धित और संरक्षित करने चाहिए ; अन्य कोई उपाय नहीं।

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वन-संरक्षण की आवश्यकता

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पौराणिक महत्व
  • वर्तमान स्थिति
  • उठाए गए कदम
  • उपसंहार।

प्राचीन भारतीय संस्कृति में वृक्षों को देवता के समान स्थान दिया गया था तथा देवताओं की भांति उनको पूजा की जाती थी। वृक्षों के सूख-दुख का ध्यान रखा जाता था तथा उनके साथ आत्मीयता का संबंध रखा जाता था। मौसम के प्रकोप से उन्हें उसी प्रकार बचाया जाता था, जिस प्रकार माँ-बाप अपने बच्चे को बचाते हैं। इतना ही नहीं, 19 वों तथा 20 वीं शताब्दी के मध्य नुक्ष काटना दण्डनीय अपराध था।

मानव का जन्म, उ. की सभ्यता-संस्कृति का विकास वनों में पल-पुसकर ही हुआ था। उस की खाघ्य, आवास आदि सभी समस्याओं का समाधनन करने वाले तो वन थे ही, उसकी रक्षा भी वन ही किया करते थे। वेदों, उपनिषदों की रचना तो वनों में हुई ही, आरण्यक जैसे ज्ञान-विज्ञान के भण्डार माने जाने वाले महान् ग्रन्थ भी अरण्यों यानि वनों में लिखे जाने के कारण ही ‘आरण्यक कहलाए। यहाँ तक कि संसार का आदि महाकाव्य माना जाने वाला, आदि महाकवि वाल्मीकि द्वारा रचा गया ‘रामायण’ नामक महाकाव्य भी एक तपोवन में ही लिखा गया।

आज जिस प्रकार की नवीन परिस्थितियाँ बन गई हैं, जिस तेज़ी से नए-नए कल-कारखानों, उद्योग-धन्धां की स्थापना हो रही है, नए-नए रसायन, गैसें, अणु, उद्जन, कोबॉल्ट आदि बम्बों का निर्माण और निरन्तर परीक्षण जारी है, जैविक शस्तास्त्र बनाए जा रहे हैं ; इन सभी ने धुएँ, गैसों और कचरे आदि के निरन्तर निसरण से मानव तां क्या सभी तरह के जीव-जन्तुओं का पर्यावरणण अत्यधिक प्रदूषित हो गया है।

केवल बम ही है, जो इस सारे वैषैले और मारक प्रभाव से प्राणी जगत् की रक्षा कर सकते हैं। उन्हीं के रहते समय पर उचित मात्रा में वर्षा होकर धरती की हरियाली बनी रह सकती है। हमारी सिंचाई और पेय जल की समस्या का समाधान भी वन-संरक्षण से ही सम्भव हो सकता है। वन हैं तो नदियाँ भी अपने भीतर जल की अमृतधारा संजो कर प्रवाहित कर रही हैं। जिस दिन वन नहीं रह जाएँगे, सारे प्राणी-प्रजातियों, अनेक वनसतियाँ एवं अन्य खनिज तत्व्व अतीत की भूली-बिसरी कहानी बन चुके है, यदि आग की तरह ही निहित स्वार्थों की पूर्ति, अपनी शानो-शौकत दिखाने के लिए वनों का कटाव होता रहा, तो धीरे-धीरेर अन्य सभी का भी सुनिश्चित अन्त हो जाएगा।

वन-संरक्षण जैसा महत्तपपूर्ण कार्य वर्ष में वृक्षारोपण जैसे सप्ताह मना लेने से संभव नहीं हो सकता।इसके लिए वास्तव में आवश्यक योजनाएँ बनाकर कार्य करने की जरूरत है। वह भी एक-दो सप्ताह या मास-वर्ष भर नहीं ; बल्कि वर्षों तक सजग रहकर प्रयत् करने की आवश्यकता है।

जिस प्रकार बच्चे को मात्र जन्म देना ही काफी नहीं हुआ करता ; बल्कि उसके पालन-पोषण और देख-रेख की उचित व्यवस्था करना-व भी दो-चार वर्षों तक नहीं, बल्कि उसके पालन-पोषण और देख-रेख की उचित व्यवस्था करना-वह भी दो-चार वर्षों तक नहीं ; बल्कि उनके बालिग होने तक आवश्यक हुआ करती है ; उसी प्रकार की व्यवस्था, सतर्कता और सावधान वन उगाने, उनका संरक्षण करने के लिए भी किया जाना आवश्यक है। तभी धरती और उसके पर्यावरण की, जीवन एवं हरियाली की रक्षा संभव हो सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वृक्षों से हमारे देश की नैतिक, सामाजिक और आर्थिक समृद्धि भी होती है क्योंकि –

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।
परमारथ वे कारने साधुन धरा शरीर।।

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भारतीय स्वतन्त्रता के अड़सठ वर्ष

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • स्वतन्न्रता के लिये संघर्ष
  • संविधान का गठन
  • स्वतंत्रता का महत्व
  • उपसंहार।

15 अगस्त, 1947 ई० के दिन एक लम्बे संघर्ष के बाद भारत ने अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता फिर से प्राप्त की। तब से लेकर आज तक लगभग साठ वर्ष बीत चुके हैं, लगता है, तब का बहुत कुछ बदल गया है। इस बदलाव के परिणाम स्वरूप बहुत कुछ अच्छा हुआ है। भारत ने प्रगति और विकास की राह पर कई मील के पत्थर तोड़े भी हैं, कई नये स्थापित भी किए हैं। खोया भी कम नहीं है। क्या खोया है और क्या पाया है, उसका लेखा-जोखा संक्षेप में कर लेना उचित होगा।

अपना संविधान बनाना स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद की पहली उपलब्धि है। तटस्थ विदेश-नीति बनाकर, उस पर आज तक डँटे रहना दूसरी महत्वपूर्ण उपल्धि कही जा सकती है। देश के विकास के लिये योजनाओं को एक के बाद एक लागू कर उसका निर्वाह कर लेना भी उपलब्धि से कम नहीं है। अनेक तरह के भ्रष्टाचारों, विडम्बनाओं और लांछनप्रतिलांछनों के रहते हुए भी लोकतंत्र की नित्यप्रति जर्जरित हो रही नैय्या को भँवरों से पार ले जाने की प्रवृत्ति भी सभी देशी-विदेशियों की दृष्टि में एक आश्चर्यजनक उपलब्धि है।

शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी, उद्योग-धन्धे, कलकारखाने सभी का स्वतंत्र भारत में असीम विस्तार हुआ है और आज भी निरन्तर हो रहा है। रेल, बस, वायुयान तथा अन्य सभी तरह के यानों का उपयोग कर, यातायात के साधनों में भी देश ने बहुत तरक्की की है। मनोरंजन के सभी नवीनतम् साधन भी यहाँ प्रचुरता से बनने लगे हैं। तकनीक और मशीनों का, बढ़िया और सिले-सिलाए कपड़ों, जूतों आदि का निर्यात भी किया जा रहा है। जनसंख्या तो बढ़ी ही है, खाद्य-पदार्थों की भी कमी नहीं – वे बहुत महँंगे मिलते हैं, इस कारण आम आदमी के जीने के लिये नाको चने चबाने पड़ते हैं – अर्थात् जीवन जीने के लिये संघर्ष करना पड़ता है।

आज का युग अणु-र्तिक्त का युग है। अन्त: क्षेत्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अणु-शक्तियों के विस्तार का है, और इस दिशा में भी भारत किसी से पीछे नहीं है। उसने अन्तर्राष्ट्रीय मिसाइलों का निर्माण तो कर ही लिया है, अन्तरिक्ष ज्ञानविज्ञान और उपग्रह-विज्ञान में भी पीछे नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले जहाँ सूई से लेकर वायुयान तक सभी कुछ दूसरे देशों से आता था, अब वह सब उससे भी कहीं बढ़कर, उन्नत भारत में बनने लगा है। भारत हर चीज का निर्यांत भी कर रहा है। भारत में चिकित्सा-विज्ञान की प्रगति के कारण ही बाल-मृत्यु दर कम, औसत आयु-दर बढ़ गयी है। सभी संघातक बीमारियों के इलाज-उपचार यथा सम्भव होने लगे हैं। इस प्रकार प्रगति के पथ पर बढ़ता भारत इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है।

भारत न जो खोया है, उसकी भरपाई कत्तई सम्भव नहीं है। उसने अपना राष्ट्रीय चरित्र खोकर अनेक प्रकार के अनाचार-भ्रष्टाचार का अभिवर्द्धन किया है। धर्म, आध्यात्मिकता, समाज, राजनीति आदि प्रत्येक क्षेत्र को भ्रष्टाचार एवं मूल्य-विहीनता से भर दिया है। चरित्र के साथ-साथ, घर-परिवार और सभी तरह के उदात्त मानवीय मूल्यों का भी विघटन हुआ है। आज का सबसे बड़ा संकट आस्था-विहीनता है, जो कई तरह से पतन का कारण बन गयी है। लगता है कि आज हमारा स्थितियों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। लगता है आचार-विचार, सदाचार, आदर्श एवं मानवीयता की नॉव बीच मँझधार में फँसकर डूब जायेगी। कम से कम इस समय तो उसे पार ले जाने की सामर्ध्य किसी में दिखाई नहीं दे रही है।

हम यह मानते हैं कि – हम स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं। किन्तु यह सिर्फ भ्रम है – हम शारीरिक रूप से स्वतंत्र तथा आत्मा से परतन्त्र हैं। इस निरीहता भरी स्वतंत्रता से वह घुटती हुई गुलामी ही अच्छी थी, जिसमें कम से कम अपनों के लिये प्रेम की भावना तो थी। हर रिश्ते-नाते को उचित मर्यादा तो मिलती थी। वह गुलामी अंग्रेजों की गुलामी थी, और यह आजाद गुलामो भारतीय अंग्रेजों की है, जिसमें खुलकर साँस लेना भी अपराध है।
इस प्रकार हम देखते हैं प्राय: हर वर्ष हम आजादो की वर्षगाँठ मनाते हैं, लेकिन सही अर्थों में उस पर अमल नहीं करते हैं।

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महिला आरक्षण बिल्न

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • समाज में नारी-पुरुष की समानता
  • नारी की दुर्दशा
  • नारी की उपादेयता
  • बिल को मंजूरी
  • उपसंहार।

हमारे देश में प्राचीनकाल से ही नारी को समाज में उच्च स्थान प्राप्त है। उस समय नारी के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा माना जाता था। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी कहा गया है कि – जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ नारी का निरादर होता है, वहाँ तरह-तरह की परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। देश में विदेशी आक्रमणों के कारण नारी का रूप बदल गया, उसे चहारदीवारी में बन्द होना पड़ा। इस कारण उसे अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ा। लेकिन स्वतन्र्रता प्राप्ति के बाद फिर उसका पुराना समय लौटा। आज नारी का समाज में वही स्थान है जो पुरुष का है।

भारतीय इतिहास नारियों के महान् कर्तव्यों, क्षमताओं तथा वीरता के कर्मों से भरा पड़ा है। नारी भारतीय समाज में हमेशा आदर व सम्मान का पात्र रही है। नारी ममता, प्रेम, वात्सल्य, पवित्रता तथा द्या की मूर्ति है। उसने अनन्त कठिनाइयाँ सहते हुए परिवार तथा समाज एवं राष्ट्र की सेवा की है। दु:ख का विषय यह है कि समाज में नारी को अबला व ‘बेचारी’ जैसे सम्बोधनों से पुकारा जाता है। उसकी इस हालत के लिये हमारा समाज जिम्मेदार है, जिसमें सामाजिक कुरीतियाँ और परम्परागत रूढढ़वादिता आज भी विद्यमान है।

कुछ राजनीतिक दलों का तर्क है कि दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को विशेष आरक्षण दिया जाना चाहिये। ऐसा कहकर ये आरक्षण में भी आरक्षण की बात कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि महिला आरक्षण विधेयक के किसी भी स्वरूप पर आम सहमति नहीं हो पा रही है। सच्चाई तो यह है कि आम सहमति कायम करने के लिये अब तक कोई ठोस प्रयास भी नहीं किया गया। मार्च, 2003 के लोकसभा में किसी भी राजनीतिक दल ने इस बात के लिये प्रयास नहीं किया कि महिला आरक्षण विषय पर गम्भीर चर्चा हो सके।

ऐसा लगता है कि सभी को, यहाँ तक कि महिला आरक्षण विधेयक पेश करने वालों को भी इस बात का इंतजार था कि इस विधेयक को लेकर हंगामा हो और इसी दहाने विधेयक को आगे के लिये टाल दिया जाये। लेकिन काफी राजनीतिक उठा-पटक के बाद आखिरकार संसद के सन् 2010 के बसंतकालीन सत्र में महिला आरक्षण विधेयक को बहुमत से पारित कर दिया गया। निश्चय ही भारत के संसद में इसे क्रांतिकारी कदम के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि इसके पहले तक महिला-हित की बाते करने वाले नेता भी विधेयक पारित करने के नाम पर बगलें झांकने लगते थे।

महिला विधेयक का प्रारित होना इस बात को दर्शाता है कि नारी के प्रति परम्परागत धारणाओं में भी काफी परिवर्तन आया है, फिर भी अभी तक स्थितियाँ ऐसी नहीं बन पाई हैं कि आज की नारी अपनी हर प्रकार की क्षमता का परिचय खुलकर दे सके।

हमें यह भी न भूलना चाहिए कि अगर महिला आरक्षण विधेयक पारित करने का उद्देश्य केवल महिलाओं के सब्जबाग दिखाना है तो फिर इस विधेयक के पारित होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उल्लेखनीय है कि महिला आरक्षण विधेयक इस मान्यता पर आधारित है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित होने से देश की महिलाओं का कल्याण होगा। दुर्भाग्य से यह मान्यता सही नहीं है। इस सन्दर्भ में इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लिये आरक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद उनकी स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आ सका है, फिर भी महिला-आरक्षण बिल एक क्रांतिकारी कदम अवश्य है।

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भारत और प्रजातन्त्र

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • प्रजातंत्र की विशेषता
  • प्रजातन्न्र: चरित्र-निर्माण तथा नैतिकता का आधार
  • प्रजातंत्र : राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका
  • उपसंहार।

संसार में शासन चलाने की जो अनेक प्रणालियाँ प्रचलित हैं, उनमें से लोकतंत्र को जनहित की दृष्टि से श्रेष्ठ प्रणाली माना गया है। इसे प्रजातंत्र और गणतंत्र भी कहा जाता है। इस शासन-प्रणाली की प्रमुख विशेषता इसकी परिभाषा के अनुसार यह मानी जाती है कि इसमें लोक या जन (जनता) के द्वारा चुनी गई सरकार द्वारा जनता के हित-साधन के लिये शासनतंत्र को चलाया जाता है। जन या लोक यदि पाता है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि भ्रष्ट या अयोग्य हैं, शासन की व्यवस्था को चला पाने में समर्थ नहीं हैं तो पाँच वर्षो के बाद मतदान के माध्यम से जनता उन्हें बदल सकती है।

लोकतंत्र या प्रजातंत्र में प्रत्येक बालिग को वोट (मत) देकर अपना प्रतिनिधि चुनने का संवैधानिक अधिकार रहा करता है। प्रत्येक व्यक्ति चुनाव लड़ने का अधिकार रखता है। यह अधिकार वह किसी दल विशेष का सदस्य होने के कारण भी पाता है और स्वतंत्र या निर्दलीय रूप से भी रखता है। मुख्यतया इन्हीं कारणों से राजतंत्र, एकतंत्र या तानाशाही, साम्यवादो समाजतंत्र आदि की तुलना में लोकतंत्र या प्रजातंत्र शासन-प्रणाली को सर्वे त्तम माना गया है।

सन् 1947 ई० में 15 अगस्त के दिन जब भारत स्वतन्त्र हुआ था तब तक यहाँ राजतन्त्र के अन्तर्गत विदेशी सत्ता का शासन चल रहा था। स्वतन्र्रता-प्राप्ति के बाद इस लोकतन्र्रीय व्यवस्था को सबसे अच्छा और जनहितकारी मानकर ही यहाँ इस शासन व्यवस्था को लागू कर भारत को एक गणतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया गया। हमारें विचार से ऐसा करते समय जिन दो बुनियादी बातों की आवश्यकता थी, उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया।

जनतंत्रीय शासन-व्यवस्था में जनता में अनुशासन और राष्ट्रीय चरित्र का नैतिक आधार रहना परम आवश्यक हुआ करता है। पर भारत के स्वतन्न्र होने के बाद न तो राष्ट्रीय चरित्र-निर्माण की तरफ किसी प्रकार का ध्यान दिया गया, न जनता को अनुशासन सिखाया गया और न कोई नैतिक आधार ही प्रदान किया गया। यहाँ तक कि स्वतन्न्रता का वास्तविक अर्थ और आधार क्या होता है, स्वतन्त्र राष्ट्र के नागरिकों को किस प्रकार के नियम, अनुशासन में रहने की आवश्यकता हुआ करती है आदि बातें भी नहीं सिखाई गयीं।

सिर्फ पश्चिम की अंधा-धुंध नकल करते हुए, औद्योगीकरण का डंका पीटा गया, किन्तु जनतंत्र के अपेक्षित मानसिक एवं नैतिक धरातल के उन्नयन के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया गया। स्वतन्त्रता की नींव रखने वाली पीढ़ी के परिदृश्य से ओझल होते ही चारों तरफ आपाधापी और लूट-पाट शुरू हो गई। फलस्वरूप लोकतंत्र और उसका बुनियादी भाव दोनों ही सार्थक तो हुआ ही नहीं, उल्टे एक प्रकार का मजाक बनकर रह गये हैं।

भारत की लांकतन्त्रीय शासन-व्यवस्था देखकर वास्तव में नाटककार बर्नार्ड शा का यह कथन सार्थक प्रतीत होता है कि, “इस व्यवस्था में घोड़ा, गाड़ी के आगे नहीं बल्कि गाड़ी, घोड़े के आगे जोती जाती है।” अर्थात् जो होना चाहिये, वह न होकर सभी कुछ उलट-पुलट हुआ करता है। फलस्वरूप अच्छा कार्य भी सफल एवं लाभदायक न होकर आम जनता पर एक प्रकार का बोझ बन जाया करता है।

अब जरा भारतीय लोकतंत्र के अब तक के क्रिया-कलापों पर दृष्टिपात कीजिए – उच्च और समर्थ लोगों की दृष्टि से नहीं बल्कि सामान्य वर्ग दृष्टि से देखिए – जिसके हित-साधन के लिये लोकतन्त्र की अवधारणा अस्तित्व में आई थी, यह तो एकदम स्पष्ट हो जायेगा कि यह शासन-प्रणाली अर्थहीन होकर अपने लक्ष्य से बहुत पीछे रह गयी है। भारत में लोकहित की भावना से जितनी भी योजनाएँ बनीं या कार्य किये गये, उन सब का वास्तविक लाभ या तो सरकारी तंत्र डकार गया या उन कार्यों से सम्बन्धित, ठेकेदार, इन्जीनियर या उसे सप्लाई करने वाला उच्च वर्ग हजम कर गया। ऐसी स्थिति में भारत में लोकतंत्र को कैसे और क्सि प्रकार सार्थक एवं सफल कहा जा सकता है ?

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

आतंकवाद और भारत
अथवा आतंकवाद : एक चूनौती

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • आतंकवाद एक जटिल समस्या के रूप में
  • आतंकवाद से मुक्ति के लिये उचित कदम
  • उपसंहार।

आतंकवाद का इतिहास सम्भवतः उतनी ही पुरानी है, जितना पुरानी हमारी सभ्यता का इतिहास है। पूँजीवादी, लोकतान्त्रिक और साम्यवादी शासन व्यवस्थाओं के उदय के पूर्व समाज में उन्हीं का वर्चस्व रहता था जो वास्तव में बाहुबली होते थे। ऐसे लोगों में अधिकांश स्वेन्छाचारी होते थे। उनकी सत्ता को चुनौती देने वाली कोई ताकत कहीं सिर उठाने का साहस न कर बैठे, इसलिये वे हमेशा आतंकवाद का सहारा लेते थे। दहशत और आतंक प्रसारित करने के लिये वे लोग समय-समय पर निरीह जनपदों में हत्या, अपहरण, लूटपाट, आगजनी और विनाश का भैरव राग अलापते रहते थे।

19 वीं शताब्दी के मध्य तक आतंकवाद को संरक्षण देने वाले अक्सर वे लोग होते थे, जिनके हाथों में सत्ता की नकेल होती थी, पर बीसवीं शताब्दी में आतंकवाद के केन्द्र में बदलाव दिखाई पड़ने लगा। बीसवीं शताब्दी में साम्प्रदायिकता, जातीय वैमनस्य, क्षेत्रीयता और आर्थिक वैषम्य से उत्पन्न वर्ग-संघर्ष की भावना से बुरी तरह ग्रस्त, बिकी हुई निष्ठा वाले अपने ही देश के कुछ लोग आतंकवादी संस्थाओं का गठन कर अपने ही राष्ट्र को खंडित करने का प्रयास करने लगे।

विदेशी शासन से मुक्ति की कामना करने वाले राष्ट्र के देशभक्त नवयुवक भी आतंकवाद का प्रयोग एक कारगर हथियार के रूप में करते थे। यद्यापि सभ्य संसार द्वारा अभी तक आतंकवाद की कोई सर्वमान्य परिभाषा तैयार नहीं की गई है, पर मोटे तौर पर इसकी परिसीमा में सभी अवैधानिक और हिंसापरक गतिविधियाँ आती हैं

भारत में आतकवादी आन्दोलन की शुरुआत सन् 1965 ई० के बाद हुई है। पूर्वी पाकिस्तान के बंगलादेश में परिवर्तित हो जाने के बाद पाकिस्तान के मन में यह बात आ गई कि युद्धभूमि में भारत का कुछ बिगाड़ सकने में वह सक्षम नहीं है। यही कारण है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद का सहारा लिया।

पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को पंजाब के आतंकवादी आन्दोलन के कारण अपनी जान गँवानी पड़ी। आतंकवादियों की दृष्टि में मानवता का कोई मूल्य नहीं है। आतंकवाद की आड़ में आज कई अपराधी-गिरोह सक्रिय होकर देश के लोगों की जान-माल को हानि पहुँचा रहे हैं। सरकारी शक्तियाँ अनेक प्रकार के प्रयास करके भी उन्हें काबू नहीं कर पायी हैं।

अभी भी देश के हर कोने में आतंकवाद का जाल फैला हुआ है, जिसके कारण अपहरण, हत्या और लूट-पाट आदि जैसी संगीन अपराध नित्य हुआ करते हैं। इस विषैली बेल का विनाश करना अति आवश्यक है। आतंकवादी संगठनों में जैशे-मुहम्मद, लश्करे-तोयबा और हिजबुल-मुजाहिदीन मुख्य रूप से सकिय हैं।

कश्मीरी आतंकवाद का साहस इस सीमा तक बढ़ चुका है कि उसने प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ-यात्रा को तो बाधित करने का प्रयास किया ही है, वैष्णो देवी की यात्रा पर भी अपनी कुदृष्टि लगा रखी है। पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी की शह और सहायता से ही तस्करो, माफिया के जाने-माने लोग मुम्बई में विस्फोट करवाकर अढ़ाई-तीन सौ लोगों की जानें लेने के साथ-साथ करोड़ों की सम्पत्ति भी स्वाहा कर चुके हैं। उनके लिए राष्ट्रीयता एवं मानवता का कोई भी मूल्य एवं महत्व नहीं है। देश के महत्त्वपूर्ण स्थलों, यहाँ तक कि राजधानी में भी उनके द्वारा विस्फोट किए जाने और कराए जाने की योजनाएँ अक्सर सामने आती रहती हैं।

यद्यपि काश्मीरी जनता को अब वास्तविकता समझ में आने लगी है। यह भी पता चल चुका है कि उन्हें स्वतंत्रता के सुनहरे सपने दिखाने के नाम पर आतंकवादी किस प्रकार उनकी रोटियों, बेटियों पर भी अपनी बदनीयती के दाँत गड़ाये हुए हैं। यद्यपि आतंकवाद कुछ दबता हुआ प्रतीत हो रहा है, पर यह अब समाप्त ही हो जायेगा, ऐसा कह पाना बहुत कठिन है। कारण स्पष्ट है कि इसकी आड़ में पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध अघोषित युद्ध जो छेड़ रखा है। अत: जब तक भारत भी उसके लिये युद्ध जैसा वातावरण प्रस्तुत नहीं करता, इसे खत्म कर पाने की कल्पना करना सपनों की दुनिया में रहने और अपने आप को धोखा देने जैसा ही है।

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विश्व-शान्ति और भारत

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • सम्पूर्ण विश्व आतंक के घेरे में
  • आतंक को जड़ से समाप्त करने की पहल
  • उपसंहार।

अपने मूल स्वभाव में भारत एक अध्यात्मवादी और शान्तिप्रिय देश रहा है। यह अलग बात है कि आज का भारतीय अधिकाधिक भौतिक साधनों को पाने के लिए आतुर होकर अपनी मूल अध्यात्म चेतना से भटकता जा रहा है, उससे हर दिन दूर होता जा रहा है। पर जहाँ तक शान्तिप्रियता का प्रश्न है, वह आज भी बेकार के लड़ाई-झगड़ों में न पड़कर, सहज शान्ति से ही जीवन जीना चाहता है। यही कारण है कि अपने आरम्भ काल से ही भारत शान्तिवादी रहा है और निरन्तर शान्ति बनाये रखने का आदी रहा है।

इसका यह तात्पर्य नहीं कि भारत ने हर प्रकार के अन्याय और अत्याचार को हमेशा निर्विरोध सहन किया है। यह भी नहीं कि उसने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ नहीं किया। नहीं, ऐसी बात नहीं है, शान्ति का अर्थ अन्याय और अत्याचार को चुपचाप सह लेना नहीं है। शान्ति का अर्थ निष्कियता भी नहीं है। शान्ति का अर्थ है-किसी की कोई हानि नं करना-किसी को कोई कष्ट न देना।

जब हम कोई ऐसा कार्य ही नहीं करेंगे जो किसी को हानि पहुंचाने अथवा उद्विग्न करने वाला हो, तो भला शान्ति भंग होगी ही क्यों ? हाँ, जब भी कभी किसी ने अन्याय और अत्याचार का आश्रय लेकर, हमारी शान्ति भंग करने का प्रयास किया है और हम पर अकारण युद्ध थोपा है, तो हमने उसका मुँहतोड़ उत्तर दिया है और अहिंसा या शान्ति-रक्षा के नाम पर अपने शख्रों को जंग लगने या थोथा नहीं होने दिया है। कभी अपनी राष्ट्रीय सीमाओं का अतिक्रमण कर, दूसरों के राज्यों को हथियाने का प्रयास भी हमने नहीं किया है, इतिहास इस बात का गवाह है। आज स्वतंत्र भारत की तटस्थता की नीति, विदेश-नीति भी उपर्युक्त तथ्यों पर ही अधारित हैं।

भारत की सेनाएँ जब भी कभी अपनी सीमाओं से बाहर गई हैं, या तो आक्रमणकारी को सबक सिखाने के लिए गई हैं अन्यथा फिर किन्हीं युद्धग्तस्त देशों में शान्ति स्थापनार्थ ही गई हैं, चाहे उन्हें इसका कितना भी खामियाजा क्यों न भुगतना पड़ा हो। स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल बाद, युद्धग्रस्त कोरिया में बन्दी सैनिकों के आदान-प्रदान के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेश एवं नेतृत्व में हमारी सेना को वहाँ जाना पड़ा था। उस समय हमारे सैनिक वहाँ शान्ति-सैनिक कहलाये थे और अपनी कार्य क्षमता के कारण, हर प्रकार से यशस्वी बन, वहाँ के दोनों पक्षों और संयुक्त राष्ट्र संघ का भी विश्चास अर्जित करके लौटे थे।

उसके बाद भी हमारी सैन्य-युकड़ियाँ शान्ति कार्यों के लिए अनेक देशों में जाती रहीं हैं। आज भी सोमालिया, रवाण्डा आदि देशों में वे विद्युमान हैं। हालाँकि वहाँ के आतंकवादियों के हाथों कई भारतीय सैनिक और डॉक्टर मारे भी जा चुके हैं, फिर भी भारतीय सेना का मनोबल ज्यों का त्यों बना हुआ है। श्रीलंका के राष्ट्रपति के आग्रह पर, वहाँ श्रान्ति-सेना भेजने के बदले भारत अपना एक युवक प्रधानमन्त्री तक की जान गँवा चुका है, फिर भी विश्व में शांति की रक्षा और शान्ति-क्षेत्रों का विस्तार करने की अपनी बुनियादी नीति-रीति से भारत पूर्णतया प्रतिबद्ध है।

यों तो भारत की विदेश नीति का आधार गुट-निरपेक्षता या तटस्थता है, पर उस तटस्थता का अर्थ निष्कियता नहीं है, यह ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है। तटस्थ नीति अपनाते हुए भी भारत इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि विश्व में शान्ति-रक्षा के लिए जहाँ भी आवश्यकता होगी, वहाँ वह उपस्थित रहेगा। अब तक भारत अपने अनुभव एवं व्यवहार के द्वारा शान्ति की रक्षा और स्थापना के लिए विश्व को बहुत कुछ दे चुका है। सत्य, अहिंसा, प्रेम और परस्पर भाईचारा आदि भारत द्वारा दिखाए गए ऐसे ही रास्ते हैं।

यदि विश्व के सभी देश इन रास्तों पर चलना आरम्भ कर दें तो युद्धों की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी। कवि नीरज ने पूर्ण विश्वास के साथ कहा है ‘“शान्ति-शहीदों का पड़ाव हर मंजिल पर, अब युद्ध नहीं होगा-अब युद्ध नहीं होगा।” विश्व में शान्ति की स्थापना की दिशा में भारत ने संसार के लिये एक अन्य मार्ग भी प्रशस्त किया है। वह है परस्पर संवाद का मार्ग। यदि कहीं शान्ति भंग हो जाने का कोई कारण उपस्थित भी हो जाता है, तो शस्र बल से नहीं, बातचीत की मेज पर बैठ कर, चाय की चुस्कियाँ लेते हुए उस का समाधान खोजा जा सकता है।

आज विश्व निश्धय ही बारूद के ढेर पर खड़ा है। कोई सिरफिरा राष्ट्र नेता कभी भी बारूद के उस ढेर को पलीता लगाने की मूर्खता कर सकता है। सदियों के अनुसंधानों और परिश्रम से बनाई गई हमारी दुनिया का नाश देखते-हीदेखते हमारी आँखों के सामने ही हो सकती है। उस विनाश से बचने के सर्वथा उपयुक्त वही मार्ग हो सकते हैं जिन पर भारत आरम्भ से ही चलता आ रहा है। वे सिद्धांत हैं, अहिंसा और विश्व-बन्धुत्व के भाव का। सत्य, प्रेम, अहिंसा, भाईजारे और पारस्परिक सहयोग के मार्ग पर चलना ही विश्व-शान्ति का मार्ग है। भारत द्वारा सुझाये और अपनाये गए इन्हीं रास्तों पर चलकर विश्व-शान्ति की रक्षा हो सकती है और विश्व-मानव को संत्रास की पोड़ा से मुक्त किया जा सकता है।

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नक्सलवाद

1960 में नक्सलवाद बंगाल के दार्जिलिंग जिले में किसान आन्दोलन के रूप में प्रारम्भ हुअ।1967 में इसे नक्सली आन्दोलन कहा गया। 1969 में सी०पी०आई० की स्थापना हुई।

नक्सलवादी आन्दोलन के तीन घोषित उद्देश्य थे –

  • खेत जोतने वाले को खेत का हक मिले।
  • विदेशी पूँजी की ताकत समाप्त की जाये।
  • वर्ग और जाति के विरुद्ध संघर्ष प्रारम्भ किया।

1960-70 के दशक में मूल नक्सली आन्दोलन के कुचलने के बाद इसमें बिखराव हुआ।
प्रमुख नक्सली संगठन तथा उनके संस्थापन

संगठन संस्थापन/नेता स्थान
1. पीपुल्स वार, ग्रुप सीता रमैया आन्ध प्रदेश
2. माओवादी कम्युनिस्ट सेन्टर कन्हाई चटर्जी बंगाल
3. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) मुथ्याला लक्ष्मण बिहार
4. रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट उर्फ गणपति यू०पी०, पंजाब उत्तरांचल

प्रभावित राज्य – आन्ध प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार।
कुल मौतें – नक्सली हिंसा से 2005 में 669 मौतें।

नक्सली हिंसा से निपटने के लिए सरकार की रणनीति –

नक्सलियों और आधारभूत ढाँचे व सहायक प्रणाली के विरुद्ध एक समन्वित प्रभावी पुलिस कार्यवाही को प्रभावी बनाने के लिये सम्मुन्नत सूचना संग्रहण और साझा तन्त्र का निर्माण करना।
नक्सली हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने सहित त्वरित सामाजिक, आर्थिक विकास के उद्देश्य से जन शिकायतों के प्रभावी निराकरण व समुन्नत वितरण तन्र्र सुनिश्चित करने के लिये प्रशासनिक मशीनरी का सुदृढ़ीकरण करना तथा उसे अधिक पारदर्शी उत्तरदायी व संवेदनशील बनाना और स्थानीय समूहों को प्रोत्साहित करना जैसे – छत्तीसगढ़ का सल्वा जुड़म अभियान।
प्रभावित राज्यो द्वारा नक्सली गुटों के साथ शांति वार्ता करना यदि हिंसा का रास्ता छोड़ने और हथियार त्यागने के लिये तैयार हों।

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पंचायती राज

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • स्वरूप
  • पंचायतों के अधिकार और कर्त्तव्य
  • महत्व
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत के राष्ट्रपिता, महात्मा गाँधी ने हम भारतवासियों को सिखाया है कि – “केन्द्र में बैठे केवल बीस व्यक्ति सच्चे लोकतंत्र को नहीं चला सकते। इसको चलाने के लिए निचले स्तर पर प्रत्येक गाँव के लोगों को शामिल करना पड़ेगा।” भारत में भारत की जनता का शासन है, किसी राजा का नहीं। यहाँ के लोग ही उन थोड़े से लोगों का चुनाव करते हैं जो देश के शासन को चलाते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली है और हमारी सरकार का मुख्य कार्यालय भी दिल्ली है। सारा देश, प्रान्तों, जिलों और गाँवों में बँ है।

प्रान्तों की जनता अपने-अपने प्रान्त के लिये भी उन लोगों का चुनाव करती है जो प्रान्त का शासन चलाते हैं। दिल्ली की सरकार को केन्द्रीय सरकार और प्रान्तों की सरकार को प्रान्तीय या राज्य सरकार कहते हैं। शासन का सारा कार्य इन दोनों सरकारों के बीच बँटा हुआ है। इसी तरह प्रत्येक जिले और प्रत्येक गाँव में भी वहाँ की जनता द्वारा चुने हुए लोग उस जिले और गाँव के शासन कायों-को केन्द्र और प्रान्त की सरकारों की सहायता से चलाते हैं। गाँव के लोगों की पंचायत होती है जो गाँव की देखभाल करती है और उसकी उन्नति के लिये आवश्यक कदम उठाती है। जिस देश में ऐसा होता है, उस देश का शसन ही “पंचायती राज” कहलाता है।

स्वरूप :- पंचायती राज में प्रत्येक गाँव की अपनी पंचायत होती है। पंचायत के सदस्यों, अर्थात् पंचों का चुनाव गाँव की जनता करती है। यह चुनाव एक निश्चित अवधि के लिये, सामान्यतः पाँच वर्षों के लिये होता है। इसके सदस्यों में सभी वर्ग के लोग होते हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं तथा अन्य अल्पसंख्यकों को अपने-अपने सदस्य चुनने का अधिकार दिये जाने की चेष्टा की जा रही है। ऐसा होने पर ही पंचायत सभी लोगों की समस्याओं को समझ सकेगी और उनका उचित समाधान निकाल सकेगी।

18 वर्ष की आयु का कोई भी व्यक्ति, जो उस गाँव का स्थायी निवासी है, ग्राम-पंचायत का सदस्य बन सकता है। पंचायत अपने बीच से एक सभापति, उप-सभापति तथा सचिव का चुनाव करती है। इनके अतिरिक्त, पंचायत के अधीन काम करने वाले कुछ छोटे-छोटे कर्मचारी होते हैं जिन्हें वेतन दिया जाता है। पंचायत के सदस्यों को कोई वेतन नहीं दिया जाता है। उन्हें सर कार और समाज की ओर से कार्य करने के सभी अधिकार तथा सुविधाएँ दी जाती हैं। पंचायत के सदस्यों की संख्या 15 से 30 तक होती है।

पंचायतों के अधिकार और कर्त्तव्य :- पंचायतों को इस बात का पूर्ण अधिकार होता है कि वे स्वतन्र्र होकर अपनी इच्छानुसार अपने क्षेत्र के बहुमुखी विकास कार्य को जारी रख सकें। किसी गाँव या क्षेत्र की विशेषताओं, अभावों तथा आवश्यकताओं से उस गाँव के निवासी ही अच्छी तरह परिचित होते हैं। इसलिए उन्हें ही यह अधिकार दिया जाना चाहिये कि वे अपने गाँव की सुरक्षा और उन्नति के लिये योजना बनायें और उसे पूरा करें।

अपनी योजनाओं की पूर्ति के लिये वे सरकार का सहयोग प्राप्त कर सकते हैं और केन्द्र तथा राज्य सरकारों का भी यह कर्त्तव्य होता है कि वे उनकी यथासंभव सहायता करें। ब्लाक, तहसील, जिला तथा प्रान्तीय स्तरों पर उनकी सहायता के लिये कई विभाग एवं कर्मचारी हैं, जिनसे ग्राम पंचायतें आवश्यक सलाह और सहयोग ले सकती हैं। ग्रामोन्नि के लिये वेष्टा करने के साथसाथ पंघायतों को यह भी अधिकार है कि वे दोषी व्यक्ति को अर्थ-दण्ड दे सकती हैं, किन्तु दण्ड की राशि 50 रुपये से अधिक नहीं होगी।

पंचायत के फैसले की अपील अदालतों में की जा सकती है। अपने गाँव के कल्याण हेतु पंचायत कुछ नियम-कानून भी बना सकती है, किन्तु ये कानून भारतीय संविधान को भंग करने वाले नहीं हो सकते। कई पंचायतों को मिलाकर न्याय-पंचायत का निर्माण किया जाता है जो फौजदारी, दीवानी और नागरिक के साधारण मुकदमों का फैसला करती है।

पंचायती राज का महत्व :- पंचायती राज एक ऐसी कान्ति है जो हमारे लोकतन्र्र को करोड़ो देशवासियों तक पहुँचा देगी। इस कान्ति के सफल होने पर देश के करोड़ों दलित, शोषित गरीब वर्ग के लोग, अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोग शासन कार्यों में स्वतन्र होकर भाग ले सकेंगे और अपने हाथों अपने भाग्य का निर्माण कर सकेंगे। इस क्रान्ति के द्वारा भारत की महिलाओं को भी औरों की भाँति देश के प्रशासन एवं सामाजिक विकास के कार्यों में बेरोकटोक भाग लेने की सुविधा प्राप्त होगी। गाँधीजी ने कहा है-“सच्चा स्वराज्य केवल चन्द लोगों के सत्ता में आ जाने से नहीं, बल्कि इसके लिये सभी में क्षमता आने से आयेगा।”

उपसंहार :- हमारे देश में आज भी पंचायती राज की स्थापना पूर्णत: नहीं हो पायी है। गाँधी और नेहरू केस्वराज्य का स्वप आज भी अधूरा है। यद्याप पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र जैसे कुछ प्रान्तों में, वहाँ की सरकारों े पेंायती राज की स्थापना की है, तथापि देश के बहुत बड़े हिस्से में पंचायतों का गठन नहीं हो पाया है। आवश्यकता है कि देश के प्रत्येक क्षेत्र में पंचायतों की स्थापना की जाय तथा उन्हें आवश्यक अधिकार और उत्तरदायित्व सौपे जायें। इससे लोगों में राष्ट्र के प्रति दायित्व एवं कर्त्तव्य की भावना का विकास होगा और भारत एक शक्ति सम्पन्न, सुखी तथा उन्नतशील राष्ट्र बन सकेगा।

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वर्तमान शिक्षा-प्रणाली

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • दोष
  • परिणाम
  • सुधार की आवश्यकता
  • उपसंहार।

कोई भी शिक्षा-प्रणाली तभी अच्छी, सफल एवं सार्थक कही जाती है, जब वह शिक्षा-पाने वालों का वास्तविक हितसाधन कर सके। जहाँ तक भारतीय शिक्षा-बोर्डों और विश्वविद्यालयों में चल रही वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का प्रश्न है ; वह आज के सन्दर्भो से सर्वथा कही हुई, पुरानी और इस सीमा तक घिस-पिट चुकी है कि आज उसका इसके सिवा और कोई मूल्य एवं महत्त्व नहीं रह गया है कि वह पढ़ने वालों को कुछ विषयों के नाम रटा उनकी जानकारी करा दे या फिर अधिक-से-अधिक यही कि साक्षर बना दे – बस! इससे अधिक और कुछ नहीं।

वर्तमान शिक्षा-प्रणाली ने हमें अपने जीवन, अपनी सभ्यता-संस्कृति और उस के मूल्यों-मानों से तो तोड़ कर अलग कर ही दिया है ; सामान्य एवं व्यावहारिक जीवन से भी सम्बन्धित नहीं रहने दिया। यहाँ तक कि पढ़ने वाले से उसका अपनापन भी छीन लिया है। बदले में दिया है उसे शिक्षित होने का कोरा दम्भ, अहंकार और आडम्बर। वर्तमान शिक्षा के साथ हमारे जीवन का निविड़ मिलन होने की कोई स्वाभाविक संभावना नहीं है।

दोनों के बीच एक व्यवधान है। हमारी शिक्षा जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाती। जहाँ हमारे जीवन वृक्ष की जड़े हैं, वहाँ से सौ गज दूर हमारी शिक्षा की वर्षा होती है। लार्ड मैकाले द्वारा चलाई इस शिक्षा-पद्धति ने उससे यानि पढ़ने वाले से भारतीयता ही नहीं छीनी, उससे उसकी ऊर्जा, श्रम करके आगे बढ़ पाने की मानसिकता तक छीन ली है। उसे मात्र नौकरी से प्राप्त होने वाली कुर्सी पाने की इच्छा का गुलाम बना दिया है, फिर चाहे वह कुर्सी एक क्लर्क या चपरासी की ही क्यों न हो।

इसे वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का ही परिणाम एवं ताल-लय-हीनता कहा जाएगा कि आज का युवक जीवन के प्रन्द्रहसोलह वर्ष गँवा कर, हाथों में डिग्री-डिप्लोमा के नाम पर एक मोटा कागज लेकर विद्यालय-विश्वविद्यालय से बाहर आता है, तो अपने-आप को नितान्त अकेला, असहाय एवं निराश पाता है। उसके पास भावी का निश्चित कार्यक्रम तो क्या गति-दिशा का ज्ञान तक नहीं रहता। धीरे-धीरे कई तरह की कुण्ठाएँ आकर उसे घेरने लगती हैं। तब वे सभी तरह की अराजकताएँ और बुराइयाँ जन्म लेती हैं कि जिन के कारण आज पढ़े-लिखो की दुनिया में चारों तरफ हाहाकार मच रहा है। नशाखोरी, जुआ, शराब, सिगरेट, रिश्वत, चोरी-चकारी का बाजार गर्म हो रहा है चारों तरफ। इस का मूल कारण मात्र सपने बेचने वाली यह शिक्षा-प्रणाली ही है, जो व्यक्ति को इच्छाओं-उच्छृंखलताओं का गुलाम बना रही है।

स्वतंत्र भारत के लिए किस तरह की शिक्षा-प्रणाली की आवश्यकता है, कैसी शिक्षा समय के अनुसार लोक-हित साधन कर सकती है, इस की तरफ कतई कोई ध्यान नहीं दिया गया। अत: आज सब से पहली आवश्यकता वर्तमान ढाँचे को बदल, उसे समय एवं उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने की है। शिक्षा को बुनियादी तौर पर व्यवसायोन्मुख बनाना भी आवश्यक है। उसे सस्ती, नैतिक उत्थान करने तथा अपनापन प्रदान कर पाने में समर्थ बनाना भी बहुत आवश्यक है। स्वतंत्रता प्राप्त किए आधी शती हो या खो चुकी है बेकार के ऊहापोहों में। यदि अब भी वर्तमान महँगी, ऊबाऊ और परीक्षणों से खरी न उतर सकने वाली शिक्षा-पद्धति को न बदला गया तो भगवान् ही रक्षक है इस देश का।

शिक्षा किस प्रकार राष्ट्रीय एकता के दृढ़ीकरण और देश की सर्वतोन्मुखी उन्नति में सहायक हो, यह हमारे सामने ज्वलंत प्रश्न है। अपनी तमाम खामियों के बावजूद हमारी इस शिक्षा-प्रणाली ने हमें अनेक लाभ पहुँचाए हैं, अतः इसके प्रति हमारा दृष्टिकोण रचनात्मक होना चाहिए, विध्वंसात्मक नहीं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में हम यह आशा कर सकते हैं कि “हमारे प्रयास जीवन के साथ-साथ बढ़ते चलेंगे। इनमें संशोधन होगा। इनका विस्तार होगा। बाधाओं के बीच से गुजरकर ये प्रबल होंगे, संकोच के बीच ही विकसित होंगे तथा भ्रम से उत्तीर्ण होकर ही उनका सत्य सार्थक हो उठेगा।”

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वर्तमान परीक्षा-प्रणाली

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • प्रचलित परीक्षा-प्रणाली
  • दोष
  • उपसंहार।

जिस प्रकार वर्तमान शिक्षा-प्रणाली गुलाम भारत पर शासन करने वाले ब्रिटिश राज की देन है, उसी ग्रकार वर्तमान परीक्षा-प्रणाली भी तभी से प्रचलित चली आ रही है। हमें विचार इस बात पर करना है कि क्या यह परीक्षा-प्रणाली पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की वास्तविक योग्यता की परीक्षा या जाँच परख करने के लिए समर्थ और उपयुक्त भी है कि नहीं। वर्तमान में स्वतंत्र भारत की जो आवश्यकताएँ हैं, पढ़ने वाले युवकों की वास्तविक योग्यता की जाँच जिस प्रकार से होनी चाहिए, क्या वर्तमान परीक्षा-प्रणाली उन सारी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं के अनुरूप है? यदि अनुभव, यथार्थ और व्यावहारिक दृष्टि से देखा और कहा जाए, तो एक वाक्य में यही कहना युक्तिसंगत एवं उचित प्रतीत होता है कि वर्तमान परीक्षा-प्रणाली इस सीमा तक घिस-पिट एवं छिद्रपूर्ण हो चुकी है कि इसे पढ़ने-लिखने वाले छात्रों की योग्यता की सही जाँच-परख कर पाने में समर्थ कतई और किसी भी तरह नहीं कहा जा सकता। इस मान्यता के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कई कारण हैं, उन पर दृष्टिपात कर लेना आवश्यक है।

सब से पहली बात और कारण तो वही लेते है कि जो आजकल प्रतिवर्ष का परीक्षाओं के समय का एक आवश्यक एवं निरन्तर चलने वाला फीचर बन गया है। वह है – परीक्षाओं से प्रश्नपत्रों का लीक हो जाना। जिस दिन किसी विषय की परीक्षा होनी होती है, उससे दो-चार दिन या चौबीस घण्टे पहले उस प्रश्नपत्र की प्रतियाँ सैंकड़ों, हजारों रुपयों के बदले खुले बाजार में उपलब्ध कराई जाने लगती हैं। इस सारे कार्य व्यापार में कहीं-न-कहीं पढ़ाने और परीक्षा लेने वाले भी संलिप्त रहा करते हैं।

सो इस तरह की परीक्षा की सार्थकता क्या रह जाती है ? निश्चय ही कुछ नहीं। दूसरे, परीक्षाओं में प्रश्न पूछने का ढंग और भाषा तो अत्यधिक घिस-पिट चुके ही हैं, पूछे जाने वाले प्रश्न भी वही पुराने और घिसे-पिटे ही पूछे जाते हैं। फलस्वरूप कोई भी छात्र विगत दस वर्षों में पूछे गये प्रश्न ही तैयार कर के योग्यता का प्रमाणपत्र पा सकता है। यहाँ तक कि आजकल अधिकतर अध्यापक-प्राध्यापक कक्षाओं में दस साल के प्रश्न रटने की स्पष्ट घोषणा और सिफारिश करते ही हैं, स्वयं भी वही बारम्बार पूछे गए प्रश्न भर करा देते हैं।

तीसरे आज का विद्यार्थी उपस्थितियाँ पूरी करने के लिए चाहे कक्षा में जाना आवश्यक समझता हो ; पर अध्यापकवर्ग क्या पढ़ा-लिखा रहे हैं, उसे पढ़ना-सुनना या नोट्स लेना वह बेकार मानता है। उसे पता है कि बाजार में कुँजियों-गाइडों के रूप में पका-पकाया तैयार माल उपलब्ध है। परीक्षा से कुछ पहले उनमें दिए अत्यावश्यक मार्क वाले प्रश्न रट-रटा कर परीक्षा की वैतरणी पार कर लेगा।

इसी तरह आज कल मिल-मिला या डरा-धमका कर सामूहिक एवं व्यक्तिगत स्तर पर नकल करने की प्रवृत्ति ने भी इस परीक्षा-प्रणाली को एकदम नाकारा एवं व्यर्थ बना दिया है। इस प्रणाली में अक्सर यह होते देखा गया है कि साल भर मन लगा कर मेहनत करने वाले छात्र तो प्राय: पिछड़ जाते हैं, कई बार अनुत्तर्ण तक घोषित कर दिए जाते हैं ; जबकि कुंजी-गाइड मास्टर एवं नकलची प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण घोषित कर दिये जाते हैं। किसी परीक्षा-प्रणाली की इस से बड़ी त्रासद व्यर्थता और क्या हो सकती है ?

स्पष्ट है कि वर्तमान परीक्षा-प्रणाली पढ़ने वाले युवा छात्र-छात्रा की सही योग्यता जाँच पाने में असमर्थ है। जब तक शिक्षा और परीक्षा दोनों वर्तमान प्रणालियों को पूर्णतया बदल कर योग्यता नापने और शिक्षा देने का कोई अन्य कारगर मार्ग नहीं अपनाया जाता, शिक्षा और शिक्षार्थी दोनों का वास्तावक हित-साधन संभव नहीं हो सकता।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

भारत के गौरव : स्वामी विवेकानन्द

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • जन्म
  • वंश-परिचय तथा शैक्षणिक जीवन
  • रामकृष्ण परमहंस देव का सान्निध्य
  • परिवाजक विवेकानन्द
  • शिकागो विश्वधर्म सभा में विवेकानन्द
  • साहित्य कृति
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- दंड-कमंडलु हाथ में लिए एक युवा सन्यासी भारत भ्रमण के लिए निकले हैं। उनका अभीष्ट है भारत की आत्मा के यथार्थ स्वरूप की खोज। पर यह कौन-सा भारतवर्ष देख रहे हैं ? कहाँ गया भारत का वह गौरवमय अतीत? किस अन्धकार के गर्त में डूब गया भारत का उज्ज्वल मानव प्रेम का आदर्श ? भारत में सर्वत्र दारिद्रता, पराधीनता, अंधानुकरण प्रवृत्ति, दाससुलभ दुर्बलता और छूआछूत का कलंक देखकर युवा सन्यासी की आत्मा रो उठी। कौन है यह सन्यासी, जिसने दरिद्र में ही नारायण (ईश्वर) के अस्तित्व का अनुभव किया ? कौन है यह महासाधक, जिसने देशवासियों को बताया – “भूलना मत, नीच, मूर्ख, दरिद्र, भंगी, चमार आदि तुम्हारे ही अपने भाई हैं।”

जन्म, वंश-परिचय तथा शैक्षणिक जीवन :-उत्तर कलकत्ता के सिमलापाड़ा के विख्यात दत्त परिवार में सन् 1863 में विवेकानन्द का जन्म हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के नामी एटर्नीं थे। माता थीं धर्मप्राण भुवनेश्वरी देवी। विवेकानन्द का बचपन का नाम था वीरेश्वर। बालक वीरेश्वर शुरू से ही बहुत साहसी था। अत्यन्त मेधावी था वह। बड़ा होने पर ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा प्रतिष्ठित मेट्रोपालीटन स्कूल में भर्ती हुआ।

यहाँ उसका नाम था नरेन्द्रनाथ। प्रथम श्रेणी में प्रवेशिका (एन्ट्रेन्स) परीक्षा पास करके प्रेसीडेन्सी कॉलेज में दाखिल हुए। बाद में उसे छोड़कर जनरल एसेम्बली कॉलेज (स्कॉटिश चर्च कॉलेज) से एफ०ए० पास किया और दर्शनशास्त्र लेकर पढ़ने लगे थे। बड़े मधुर कंठ के अधिकारी थे तरुण नरेन्द्रनाथ। संगीत, खेलकूद, वाद-विवाद प्रतियोगिता और व्यायाम में बहुत रुचि थी उनकी।

रामकृष्ण परमहंस का सान्निध्य :- नरेन्द्रनाथ के घर के पास ही रहते थे सुरेन्द्रनाथ मिश्र। एक दिन रामकृष्ण परमहंस वहाँ आये। भजन गाने के लिए नरेन्द्रनाथ को बुलाया गया। प्रथम दर्शन में ही विस्मय विमुग्ध हो गये ठाकुर रामकृष्ण। नरेन्द्रनाथ भी अभिभूत हुए परमहंस देव को देखकर। नरेन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर आने का आमंत्रण दिया ठाकुर ने।

नरेन्द्रनाथ के मन में तब भगवान के विषय में तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे थे और संशय भी जगा था। तभी ठाकुर रामकृष्ण के दिव्य सान्निध्य का लाभ हुआ। दक्षिणेश्वर का आकर्षण तीव्र हो उठा उनके लिए। उसी समय उनके पिता की अकस्मात् मृत्यु हो गयी। घोर अर्थ-संकट में पड़ गये। दक्षिणेश्वर मन्दिर में माँ काली से अर्थ माँगने जाकर भी उन्होंने श्रद्धा और भक्ति की याचना की। नरेन्द्रनाथ तब आधे संन्यासी बन चकु थे।

परिव्राजक विवेकानन्द :- परमहंस देव का शिष्यत्व ग्रहण करके सन्यासी बन गये नरेन्द्रनाथ। नाम हुआ ‘विवेकानन्द’। सन् 1886 में श्री रामकृष्ण परमहंस देव ने महाप्रस्थान किया। भारत पर्यटन के लिए निकल पड़े परिव्वाजक विवेकानन्द। हिमालय से कन्याकुमारी तक पूरे देश में घूमे। हिन्दू, मूसलमान, अछूत, दरिद्र, निरक्षर सबसे मिलकर निपीड़ित और पददलित लोगों की हुदय-पीड़ा को समझा। सोया भारत जाग उठा। भविष्य के भारत के स्वपद्रष्ठा, विवेकानन्द ने देशवासियों को नवजीवन का जागरण मंत्र सुनाया।

शिकागो विश्वधर्म सभा में विवेकानन्द :- इसके बाद सन् 1893 का वह स्मरणीय दिन। अमेरिका के शिकागो शहर में विश्वधर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ। विवेकानन्द के पास भी इस सम्मेलन की खबर पहुँची। पर वे अनाहूत थे वहाँ। कुछ भक्तों और प्रशंसकों के विशेष अनुरोध से अमेरिका चल पड़े। उनका उद्देश्य था वेदान्त धर्म का प्रचार। भगवा वस्त्र और पगड़ी पहने सन्यासी के वेश में वे शिकागो जा पहुँचे। लेकिन सम्मेलन में भाग लेने की अनुमतिपत्र नहीं था उनके पास। अन्त में कुछ सहृदय अमेरिकावासियों की सहायता से केवल पाँच मिनट के लिए भाषण देने की अनुमति लेकर विवेकानन्द ने सम्मेलन में प्रवेश किया।

इसके बाद बड़ी आत्मीयता से उन्होंने श्रोताओं को इस प्रकार सम्बोधन किया, ‘अमेरिकावासी भाइयों और बहनें ! इस सम्बोधन को सुनकर श्रोताओं ने करतल ध्वनि से अभिनंदित किया प्राच्य के इस संन्यासी को। उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘ईसाइयों को हिन्दू या बौद्ध बनने की आवश्यकता नहीं, हिन्दुओं और बौद्धों को भी ईसाई बनने की जरूरत नहीं।………..आध्यात्मिकता, पवित्रता और उदारता पर केवल किसी विशेष एक धर्म का एकाधिकार नहीं है।

प्रत्येक धर्म की पताका पर लिखना पड़ेगा, युद्ध नहीं सहयोग, ध्वंस नहीं आत्मीयकरण, भेद-द्वंद नहीं सामञ्ञस्य और शान्ति।’ धर्मसभा में उन्होंने दृढ़ विश्वास के साथ भविष्य में संसार के लोगों के महामिलन की घोषणा की। सुनकर अभिभूत हो गये श्रोतागण। संसार भर में उनकी शोहरत फैल गयी और चारों ओर से उन पर प्रशंसा की वर्षा होने लगी। शिष्या के रूप में उन्हें मिस मार्गरेट नोकल मिलीं जो बाद में भारत की भूमि पर ‘भगिनी निवेदिता’ बनीं।सन् 1896 में विवेकानन्द भारत लैटे।

साहित्यकृति :- केवल कर्मक्षेत्र में ही नहीं, वैचारिक क्षेत्र में भी इनका अवदान महतवपूर्ण था। उनकी परिवाजक, ‘विचारणीय बातें, प्राच्य और पाश्चात्य’, वर्तमान भारत’ आदि रचनायें उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा उनके बहुत से लेख और विभिन्न समय में विभिन्न व्यक्तियों को लिखे अनेक पत्रों का संकलन भी प्रकाशित हुए हैं।

उपसंहार :- आधुनिक भारत के भागीरथ थे स्वामी विवेकानन्द। दुर्बल और हीनता की ग्रन्थि से प्रस्त लोगों को मानव जाति के कल्याण मंच में दीक्षित करना ही उनके जीवन का लष्ष्य था। उन्होंने धर्मान्ध देशवासियों को स्पष्ट स्वर में कहा था, दरिद्र, निपीड़ित, आर्त्त मनुष्यों की सेवा ही ईश्वर-साधना है। असहाय मनुष्य ही हमारे भगवान हैं १ फिर, उन्होंने आदर्शहीन भारतीयों को स्मरण कराया था, ‘आज से पचास साल तक तुम्हारे उपास्य और कोई देवदेवी नहीं हैं, उपास्य है केवल जननी-जन्मभूमि यह भारतवर्ष।’

WBBSE Class 9 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

डॉ. अबुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलामं (डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम)

रूपरेखा :

  • परिचय
  • कर्म ही पूजा है -जीवन का मूल-मंत्र
  • शिक्षा-दीक्षा
  • वैज्ञानिक रूप में कार्य
  • इसरो (ISRO) की स्थापना
  • एस. एल वी. के प्रबंधक के रूप में
  • भारत-रत्न की उपाधि से अलंकृत
  • राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना
  • उपसंहार।

परिचय :- 25 जुलाई, 2002 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले डॉ॰ए. पी.जे अब्दुल कलाम भारत के बारहवें राष्ट्रपति थे। वे भारत के ऐसे प्रथम राष्ट्रपति थे, जो इस पद पर आने से पूर्व ही भारत-रल से अलंकृत हो चुके थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रपति थे, जो जीवन-भर राजनीति से दूर रहकर देश के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन हुए थे।

डॉ. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्तूबर, सन् 1931 में रामेश्वरम् (तमिलनाडु) में हुआ। उनका बचपन मतापिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रामेश्वरम् की मस्जिद गली स्थित अपने घर में ही बीता। उनके माता-पिता के विचार अत्यंत उच्च कोटि के थे तथा उनका परिवार मध्यमवर्गीय था। उनकी माता को लोग अन्नपूर्णा कहते थे, क्योंक उनके यहाँ अतिथियों को उचित मान-सम्मान मिलता था। इनकी शिक्षा वहीं की एक प्रारंभिक पाठशाला में हुईं।

‘कर्म ही पूजा है’ :-यह गुरुमंत्र कलाम को अपने पिता से विरासत में मिला था, जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों हेतु प्रातः चार बजे से ही अपनी दैनिक चर्या प्रारंभ करते थे। डॉ० कलाम ने अपनी आत्मकथा ‘विंग्स ऑफ फायर’ में लिखा है कि ”मुझे विरासत में पिता से ईमानदारी और आत्मानुशासन तथा माता से भलाई में विश्वास तथा गहरी उदारता मिली है। मैं अपनी सुजनशीलता का श्रेय बिना किसी झिझक के बचपन में मिली उनकी संगति को देता हूँ।’

शिक्षा-दीक्षा :-हाई स्कूल की शिक्षा पूरी करते हुए कलाम ने पिता की इच्छा के अनुरूप विज्ञान विषय लेकर तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में प्रवेश लिया। छात्रावास में रहते हुए उन्होंने अंग्रेजी साहित्य तथा भौतिक विज्ञान में विशेष रुचि दिखाई। बी एस.सी. की डिमी के बाद कलाम ने इंजीनियर बनने का मन बना लिया था। उस समय मद्रास (चेन्नई) स्थित मद्रास इंस्टिद्यूट ऑफ टेक्नालॉजी को दक्षिण भारत में तकनीकी शिक्षा का’मुकुट मणि’ माना जाता था।

कॉलेज में प्रतिभा के बल पर प्रवेश तो मिला, किंतु शुल्क के लिए उस समय एक हजार रुपए चाहिए थे जिसके लिए उनकी वहन जोहरा को अपने जेवर गिरवी रखने पड़े। इसी कारण कलाम साहब आज भी परिश्रिमी तथा मितव्ययी हैं। इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में उन्होंने विमानिकी इंजीनियरिंग को चुना। प्रो. श्री निवासन् की इच्छा पर केवल तीन दिन के अंदर उन्होंने एक प्रोजेक्ट बनाकर पूर्ण किया था।

वैज्ञानिक रूप में कार्य :- छात्र-जीवन से ही कलाम व्यस्त रहने के अभ्यस्त हो गए थे। इसी कारण सजने-संवरने का उनके पास न तो समय था और न ही ऐसे विचार थे। जब वे रक्षा प्रयोगशाला, डी.आर. डी. एल. हैदराबाद में निदेशक थे तो अपने एक कमरे के आवास से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित अपने कार्यालय पैदल ही जाते थे। साधारण कमीज़, खाकी हॉफ पेंट और चपल पहनकर वे मिसाईल संबंधी चर्चा करने किसी भी वैज्ञानिक के पास पहुँच जाते थे. एम. आई.टी. से शिक्षा ग्रहण कर कलाम एक प्रशिक्षु के रूप में एच ए. एल बंगलौर (हिंदुस्तान एअरोनॉटिक्स लिमिटेड) पहुँचे। उनके अनुसार निपुणता तभी मिलती है जब हम व्यावहारिक धरातल पर कार्य सम्पन्न करते हैं।

इसरो (ISRO) की स्थापना :- सन् 1958 में वे रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय (वायु) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर नियुक्त हुए। तीन वर्ष बाद बंगलौर में एअरोनॉटिकल डिवलेपमेंट इस्टैब्लिशमेंट (ए.डी.ई.) की स्थापना हुई और इनका इस प्रयोगशाला में तबादला हो गया। ए.डी.ई. में उन्हें तीन वर्ष के अंदर ‘हॉवरक्राफ्ट’ विकसित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया जिसे कलाम साहब की टीम ने.समय से पहले ही पूरा कर दिया।

इसी समय भारत में Indian Space Research Organisation (ISRO) (भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन) की स्थापना हुई। इस संगठन हेतु थुंबा में सेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर बनाया गया। दिसम्बर, 1971 में डॉ. साराभाई के निधन के बाद प्रोफेसर सतीश धवन इसरो के अध्यक्ष बने तथा अंतरिक्ष अनुसंधान संबंधी अनेक इकाइयों को मिलाकर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र की स्थापना की गई। इस केंद्र के प्रथम निदेशक के रूप में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ० बह्म प्रकाश की नियुक्ति हुई।

एस. एल. वी. के प्रबंधक के रूप में :- प्रोफेसर धवन और डॉ॰ कलाम को उपप्रह प्रक्षेपण यान (सैटेलाइट लांच वीहिकल-एस. एल.वी.) विकसित करने संबंधी परियोजना के प्रबंधक के पद पर नियुक्त कर दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य एक मानक एस एल .वी. प्रणाली का डिजाईन, विकास और संचालन करना था। डॉ. कलाम के नेतृत्व में तैयार एस. एल. वी- 3 की प्रथम परीक्षण उड़ान 10 अगस्त, 1979 को थी।

तेईस मीटर लंबा तथा सत्रह टन वजन वाला SLV-रॉंकेट उस दिन प्रात: 7 बजकर 58 मिनट पर प्रमोचित (लांच) किया गया। नियंत्रण-व्यवस्था में खराबी आने के कारण यह नियत मार्ग से भटक कर बंगाल की खाड़ी में गिर गया। दूसरा परीक्षण 18 जुलाई, 1980 को प्रातः 8.03 बजे श्रीहरिकोटा के थार केंद्र से प्रमोचित भारत का एस. एल वी-3 रॉकेट रोहिणी’ उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सफल हुआ।

संपूर्ण राष्ट्र ने भारतीय वैज्ञानिक की सफलता पर गर्व महसूस किया तथा भारत ‘विश्व अन्तरिक्ष क्लब’ का सम्मानित सदस्य बन गया।

भारत-रल की उपाधि से अलंकृत :- डॉ॰ कलाम की यात्रा जारी रही तथा भारत सरकार ने सन् 1998 में उन्हें राष्ट्र के सर्वोच्च नागरिक अलंकर ‘भारत-रत् से सम्मानित किया। डॉ० कलाम को भारत सरकार ने सन् 1981 में पद्मभूषण, सन् 1990 में पद्मविभूषण और सन् 1998 में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। अनेक विश्वविद्यालय रांकेट तथा मिसाइल कार्यक्रम की सफलता हेतु उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस तथा अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित कर चुके हैं।

उपसंहार :- डॉ० कलाम ऐसे आदर्श है जो युवा पीढ़ी के मस्तिष्क में राष्ट्र निर्माण की चिंगारी पैदा करने हेतु आतुर हैं। उनके अनुसार उच्च स्तर का चिंतन करो फिर उसकी पूर्ति हेतु कठिन परिश्रम करो। वे अपने वेतन का कुछ हिस्सा सामाजिक संस्थाओं को भी देते हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं – अग्नि की उड़ान, तेजस्वी मन, Wing of Fire, India 2020-A vision for the new millennium आदि। डॉ० कलाम यह मानते हैं कि जो हो रहा है अच्छे के लिए हो रहा है जो होगा वह भी अच्छा होगा। यही उनके जीवन दर्शन का आधार है।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 1 स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions Chapter 1 स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 1 Question Answer – स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ निबंध का मूल भाब अपने शब्दों में लिखें।
प्रश्न – 2 : ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ निबंध में द्विवेदी जी के व्यक्त विचारों को लिखें ।
प्रश्न – 3 : ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ निबंध के माध्वम से दिवेदी जी ने हमें क्या संदेश देना चाहा है ?
प्रश्न – 4 : ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ शीर्षक निबंध में किन कुतर्कों का खंडन किया गया है – समझाकर लिखें ।
प्रश्न – 5 : ‘स्ती-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ की मूल संवेदना को लिखें।
उत्तर :
भारत का नवजागरणकाल वह काल था जिसमें चिंतकों तथा समाज सुधारकों ने समाज में जनतांत्रिक एवं वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए काफी प्रयास किया। द्विवेदी जी ने भी साहित्य तथा ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से स्वीशिक्षा के बारे में समाज को जागरुक करने का प्रयास किया । प्रस्तुत निबंध ‘स्र्री-शिक्षा के विरांधी कुतको का खडन’ पहली बार ‘सरस्वती’ पत्रिका में छपी थी । इस निबध का उद्देश्य उन लोगों तक अपनी बात पहुँचानो है जो स्त्री-शिक्षा को समाज के लिए अनर्थकारी समझंत हैं

निबंध के प्रारंभ में द्विवेदीजी ने लोगों को उस मानसिकता पर दु ख व्यक्त किया है कि स्त्री-शिक्षा गृह-सुख के नाश का कारण है । ऐसे लोग अपने पक्ष में निम्नलिखित नर्क देते हैं –

  • प्राचीन संस्कृत-कवियों ने अपं साहित्य में कुलीन स्वियों से भी अपढ़ों की भाषा में बातचीत करवाई है।
  • शंकुतला ने दुष्यंत को जो कड़वं वाक्य कहे वह स्त्री-शिक्षा का ही बुरा परिणाम था।
  • अनपढ़ और गंवारो की भाषा भी स्त्रियों को पढ़ाना उन्हें बरबाद करना है ।

लेकिन ऐसे तर्क देनेवाले यह भूल जाते हैं कि संस्कृत में बातें न करना मूर्खता की निशानी नहीं है। क्या आज जो लोग अंग्रेजी में अपनी भावना को व्यक्त नहीं कर सकते, क्या उन्हें अनपढ़ और गवारों की श्रेणी में रखा जा सकता है ? उस समय भी संस्कृत सर्वसाधारण की भाषा नहीं थी। आम लोग प्राकृत में ही बातें किया करते थे।

अगर लोगों का यह मानना है कि स्त्री-शिक्षा से अनर्थ होता है तो इतिहास साक्षी है कि पुरुषों से ज्यादा अनर्थ स्त्रयों ने कभी नहीं किया । संसार में जितने भी अपराध होते हैं उनमें पुरुषों की भागीदारी के सामन स्त्रियों की संख्या नगण्य है। अगर इस अनर्थ के लिए भी शिक्षा ही देषी है तो दुनिया के सारे स्कूल, कॉलेज को बंद कर देना चाहिए।

जो लोग शकुतला के कटु वचन के लिए उसकी शिक्षा को दोष दंते हैं वे भूल जाते हैं कि उसी क्राव ने राम द्वारा सीता को महल से निकाले जाने पर सीता से क्या कहलवाया है –
“‘लक्ष्मण ! ज़रा उस राजा से कह देना कि मैंने तो तुम्हारी आँखों के सामने ही आग में कूदकर अपनी विशुद्धता साबित कर दी थी । इस पर भी तुमने केवल लोगों की झूठी बातों पर विश्वास कर मुझे छोड़ दिया । क्या यह बात तुम्हारे कुल, तुम्हारी विद्वता या महत्ता के अनुरूप है ?”

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 1 स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन

सीता का यह वाक्य कटु नहीं है ? अगर किसी स्त्री पर उसके ही पति द्वारा अत्याचार होता है तो उसका यह कहना शत-प्रतिशत सही है। शिक्षा से ही गलत-सही भेद करने की, गलत का विरोध करने की श््कि आती है। इसलिए स्त्रिया को अवश्य ही पढ़ाया जाना चाहिए। स्त्रियों को निरक्षर रखना केवल परिवार, समाज के लिए ही नहीं राप्र्र के लिए भी अहितकर है क्योंकि स्त्रियों से ही भावी पीढ़ी, उन्नत समाज व राष्ट का निर्माण होता है।

निबंध के अंत में द्विवेदो जो ने यह सुझाव दिया है कि यदि कोई शिक्षा-प्रणाली स्त्रियों के लिए उपयुक्त नहीं है तो उसमें संशोधन करने की आवश्यकता है न कि शिक्षा ही बंद कर दननी चाहिए । सच तो यह है कि अशिक्षा ही सारे अनर्थ तथा गृह-सुख के नाश का कारण है ।

सच तो यह है कि पुरुषों ने नारी से डर कर उसे सांस्कृतिक, शैक्षणिक और पारिवारिक बंधनों में जकड़ रखा है । समाज की संरचना में स्त्री और पुरुष एक-दृसरे के पूरक हैं। उन्मुक्त वातावरण में नारियों का विकास ही हमारी प्रगति का मार्ग खोल सकता है । नारी के विकास में ही देश, समाज और हम सबका विकास हो सकता है। इसीलिए ग्रसाद जी ने लिखा है –
नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत पग-पग तल में । पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में ।।

प्रश्न – 6 : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की निबंध-शैली की विशेषताओं को लिखें।
प्रश्न – 7 : एक निबंधकार के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का परिचय दें ।
प्रश्न – 8 : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंधों की भाषागत विशेषताओं को लिखें।
उत्तर :
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य के युग-निर्माता के रूप में सम्मानित हैं । अपने निबंधों तथा समालोचनाओं के माध्यम से ये अपने युग के साहित्यकारों को निरतर प्रेरणा देते रहे । कठिन से कठिन विषय को भी सरलता से व्यक्त कर देना इनकी विशेंषता थी। अपने निबंधों में इन्होंने व्यास-शैली का प्रयोग किया है। द्विवेदीजी के अधिकांश निबंध विचारात्मक हैं। ‘रसज़-रंजन’ तथा ‘साहित्य-सीकर’ इनके प्रसिद्ध निबंध-ग्रंथ हैं ।

इनके निबंधों के बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि – “द्विवेदी जी के लेख अधिकतर बातों के संग्रह के ही रूप में हैं । स्थायी निबंधों की श्रेणी में दो ही चार लेख जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं।” फिर भी हमें तो यह मानने को विवश होना ही पड़ेगा कि द्विवेदी जी ने जो कुछ लिखा है तथा हिन्दी भाषा और साहित्य के लिए जो काम किया है, वह महत्वपूर्ण और प्रशंसनीय है ।

द्रिवेदी जी के निबंधों में एक शिक्षक का रूप मिलता है। अपनी शैली में ये प्रत्येक विषय को समझा-समझाकर लिखते थे । भाषा को व्याकरण-सम्मत बनाने के ये पूर्ण पक्षपाती थे, इसलिए अपने सहयोगियों को भी इन्होंने ऐसी भाषा लिखने के लिए प्रंरित व प्रोत्साहित किया।

जब ये गंभीर विषयों का वर्णन करते हैं तो इनकी शैली गंभीर हो जाती है । उसमें संस्कृत के शब्द भी आ जातेहैं फिर भी भाव को आसानी से समझा जा सकता है । भाषा-प्रयोग के बारे में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने स्वयं लिखा है –
“बोलचाल से मतलब उस भाषा से है जिसे खास और आम सब बोलते हैं । जो मुहावरा सर्वसम्मत हो वही प्रयोग करना चाहिए । हिन्दी और उर्दू में कुछ शब्द अन्य भाषाओं के भी आ गए हैं । वे यदि बोलचाल के हैं तो उनका प्रयोग दोष नहीं माना जा सकता ।”

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 1 स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सन् 1903 में द्विवेजी के सम्पादक के रूप में ‘सरस्वती’ का कार्य-भार संभालने से हिन्दी भाषा और साहित्य में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का युग आरंभ हुआ । जिस प्रकार भरतेंदु तथा उनके दल के अन्य साहित्य-सेवियों ने वर्तमान हिन्दी की सेवा उसके शैशव-काल में की, उसी लगन के साथ द्विवेदीजी तथा उनके सहयोगियों ने हिन्दी (भाषा) और उसकी आत्भा (विचार-भाव) को अधिक पुष्ट एवं शक्तिशाली बनाया। इनकी असाधारण साहित्य-सेवा और विद्वता पर मुग्ध होकर काशी की नागरी-प्रचारिणी-सभा ने इन्हें ‘आचार्य’ की पदवी दी।

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

1. बड़े शोक की बात है ।

प्रश्न :
पंक्ति किस पाठ से ली गई है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें ।
उत्तर :
पांक्ति ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ नामक पाठ से ली गई है ।
द्विवेदीजी ने इस बात पर शोक व्यक्त किया है कि जब देश में चारों ओर पुनर्जागरण का दौर चल रहा हो तो ऐसे में कुछ लोगो का स्त्री-शिक्षा का विरोंध करना बहुत ही बुरा है । संसार परिवर्तनशील है। इसी प्रकार स्त्रियों की स्थिति में र्पारवर्तन आया। समाज में घृणित विचारधारा ने उन्हें पुरुषों की बराबरी के पद से हटा दिया। उनको परदे में रहने के लिए विवश किया तथा शिक्षा का अधिक्रार भी छीन लिया । यहाँ तक कि तुलसीदास जैसे कवि ने भी कहा – “जिमि स्वतंत्र होहिं बिगरहिं नारी” । लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है, अतः लोगों को भी अपनी मानसिकता में बदलाव लाना चाहिए।

2. पुराने संस्कृत-कवियों के नाटकों में कुलीन स्त्रियों से अपढ़ों की भाषा में बातें कराई गई हैं ।
अथवा
3. इससे प्रमाणित है कि इस देश में स्त्रियों को पढ़ाने की चाल न थी ।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें । पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
रचना ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतको का खंडन’ है तथा इसके रचनाकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं। जिस प्रकार आज अंग्रेजी विशेष लोगों की तथा हिन्दी सर्वसाधारण की भाषा है, उसी प्रकार प्राचीन काल में संस्कृत विशिष्ट लोंगों की भाषा थी तथा जनसाधारण का काम आम बोलचाल की भाषा – प्राकृत में चलता था। इसका यह अर्थ नहीं कि संस्कृत नहीं जानने वालों को अनपढ़ मान लिया जाय। क्या आज अंग्रेजी न जाननेवालों को हम अपढ़ की श्रेणी में रख सकते है? कदापि नहीं। केवल इसी कुतर्क के आधार पर यह मान लेना कि इस देश में स्त्रियों को पढ़ाने की चाल न थी – बिलकुल भ्रामक तथा मिथ्या बात है ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 1 स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खण्डन

4. स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं ।

प्रश्न : कथन किसका है ? कथन का आशय स्पष्ट करें ।
उत्तर :
यह कथन उन लोगों का है जो स्त्री-शिक्षा के विरोधी हैं।
प्रस्तुत वाक्य उन लोगों का तर्क है जो स्वी-शिक्षा के विरोधी हैं । पर सच्चाई यह नहीं है। सच्चाई तो यह है कि प्राचीन काल में स्तियों को भी पुरुषों के समान शिक्षा मिलती थी, उन्हे पुरुषो के समान अधिकार प्राप्त थे । स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं ऐसा कहनेवाले यह क्यों भूल जाते हैं कि संसार में जितने भी महापुरुष हुए चाहे वो जिस किसी क्षेत्र के हो – उनक्को जन्म देने वाली स्वी ही थी । माँ ही बच्चे की पहली पाठशाला भी होती है ।

5. नाटकों में स्त्रियों का प्राकृत बोलना उनके अपढ़ होने का प्रमाण नहीं ।
अथवा
6. प्राकृत बोलना और लिखना अपढ़ और अशिक्षित होने का चिह्न नहीं ।

प्रश्न :
पाठ का नाम लिखें । पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
पाठ का नाम है ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’
जिस प्रकार आज हरेक स्त्री अंग्रेजी में बोल या अपने भाव व्यक्त नहीं कर सकती हैं ठीक वैसे ही प्राचीन काल में संस्कृत थी । केवल इस आधार पर हम स्वियों को अपढ़ की श्रेणी में नहीं रख सकते। अगर ऐसा है तो आज अंग्रेजी को छोड़कर प्रादेशि:क भाषा या हिन्दी में बात करने वालों चाहे वो स्ती हो या पुरुष – उन्हें अनपढ़ों की श्रेणी में रखना पड़ेगा।

7. यह सारा दुर्चार स्त्रियों को पढ़ाने का ही कुफल है ।
अथवा
8. यह सब पापी पढ़ने का अपराध है ।

प्रश्न :
यह किसका कथन है ? ‘यह सब’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
यह कथन स्त्री-शिक्षा के विरोधियों का है ।
द्विवेदीजो ने शिक्षित स्वियों का उदाहरण देते हुए कहा है कि आत्रि की पत्नी ने पत्नी – धर्म पर घंटों अपना विचार व्यक्त किया था, गार्गी ने बड़े-बड़े बह्पवादियों को अपने ज्ञान से पराजित किया था, मंडन मिश्र की पत्नी ने शंकराचार्य को बुरी तरह पराजित किया था । यदि उनकी इस शिक्षा को पाप तथा दुराचार की श्रेणी में रखा जाय तो इस भारतवर्ष का भाग्य भगवान के ही हाथों है ।

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9. स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट ।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें । पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
रचना ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ है तथा इसके रचनाकार आचार्य महाबौर प्रसाद द्विवेदी हैं। पुरुष का अहंकार स्त्रियों से ऊँचा होता है । यदि कोई स्त्री पुरुष को अपने ज्ञान से पराजित कर दे तो यह उसके लिए असह्य हो जाता है । ऐसे में वह शिक्षा जो पुरुषों के लिए अमृत के समान है, स्त्रियों के लिए विष के समान हो जाता है। अपनी पराजय का सारा दोष वह स्वी-शिक्षा को दे डालता है ।

10. उसके प्राकृत में होने का उल्लेख भागवत में तो नहीं ।

प्रश्न :
यहाँ किसके बारे में कहा गया है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
यहाँ उस पत्र के बारे में कहा गया है जो रुक्मिणी ने श्रीकृष्ग को लिखा था।
रुक्मिणी ने जो पत्र कृष्ण को भेजा था वह ग्राकृत में न होकर संस्कृत में था । भागवत में भी इसका उल्लेख कहीं नहीं है कि वह पत्र प्राकृत में लिखा गया था । इस प्रकार यह कैसे कहा जा सकता है कि प्राचीन काल में स्त्रियाँ अपढ़ हुआ करती थीं तथा उन्हें संस्कृत भाषा का कोई ज्ञान न था – ऐसा कहना सरासर गलत होगा।

11. सीता का यह संदेश कटु नहीं तो क्या मीठा है ?

प्रश्न :
सीता ने कौन-सा संदेश किसे दिया था और क्यों ?
उत्तर :
सीता ने यह संदेश राम को दिया था – “‘लक्ष्मण ! जरा उस राजा से कह देना कि मैंने तो तुम्हारी आँखों के सामने ही आग में कूदकर अपनी विशुद्धता साबित कर दी थी। तिस पर भी, लोगों के मुख से निकला मिथ्यावाद सुनकर ही तुमने मुझे छोड़ दिया । क्या यह बात तुम्हारे कुल के अनुरूप है ?’
राम ने लोगों की झूठी बातों में आकर सीता को राजभवन से निकाल दिया जबकि सीता अपनी सत्यता की अग्निपरीक्षा पहले ही दे चुकी थी । जब लक्ष्मण सीता को जंगल में छोड़कर जाने लगते हैं तो सीता उसी के द्वारा यह संदेश राम को भेजती है ।

12. अनर्थ का बीज उसमें हरगिज नहीं
अथवा
13.पढ़ने-लिखने में स्वयं कोई बात ऐसी नहीं जिससे अनर्थ हो सके ।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ? पंक्ति में किसके बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
वक्ता महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं।
सारे अनर्थो की जड़ स्त्री-शिक्षा को बताना हैसी की बात है। आदर्श गृहिणी के लिए सबसे पहले शिक्षा की आवश्यकता है । शास्वों में गृहिणी के कई रूप बताए गए हैं। वह विपत्ति के समय मित्र का कर्तव्य-पालन करती है, माता के समान बिना स्वार्थ के सेवा करती है, सुख के समय पति को सुख्ख पहुँचाती है तथा गुरू की तरह पति तथा बच्चों को बुरे मार्ग पर चलने से रोकती है । अतः स्वियों के लिए तो शिक्षा को सबसे अधिक आवश्यकता है।

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14. अनर्थ पुरुषों से भी होते हैं।

प्रश्न :
रचना का नाम लिखें । पंक्ति में निहित आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम है – ‘स्त्रो-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ ।
द्विवेदीजी की ऐसी मान्यता है कि यदि शिक्षा के कारण ही स्त्रियाँ अनर्थ करती हैं तो संसार में सबसे ज्यादा अनर्थ तो पुरुषों के द्वारा ही किए जाते हैं। रिश्वत लेना, डाके डालना, हत्या करना, आतंक फैलाना – कौन-से ऐसे अनर्थ नहीं हैं जो पुरुषों के द्वारा नहीं किए जाते हैं । ऐसे में स्तियों की अपेक्षा पुरुषो की शिक्षा तो ज्यादा अनर्थकारी प्रतीत होती है।

15. स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है – समाज की उन्रति में बाधा डालना है ।

प्रश्न :
रचनाकार कौन हैं ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
रचनाकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं।
द्विवेदी जो ने कहना चाहा है कि जो लोग स्वी-शिक्षा के विरोधी हैं, वे यह भूल जाते हैं कि माचीन काल में नारियों का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से सुरक्षित था । उनमें इतनी योग्यता थी कि वे अपना हानि-लाभ समझ सकें । अपनी योग्यता और विवेक-पूर्ण बुद्धि से द्रोपदी की तरह अपने पतियों को भी सही सलाह एवं शिक्षा देने को प्रस्तुत रहती थीं। गृहस्थाश्रम का संपूर्ण अस्तित्व नारी के कंधों पर ही आधारित था । न उन्हें आर्थिक परतंत्रता थी, न दासता। बिना गृहिणी के घर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

16. ‘शिक्षा’ बहुत व्यापक शब्द है ।

प्रश्न :
पंक्ति किस पाठ से ली गई है ? ‘शिक्षा’ शब्द को व्यापक क्यों कहा गया है ?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ पाठ से ली गई है।
द्विवेदी जी ने स्र्री-शिक्षा के बारे में यह कहा है कि शिक्षा का तात्पर्य केवल स्कूली शिक्षा से नहीं है । शिक्षा के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें नारियों को अपनी स्वतंत्र पहचान मिल सकती है। उदाहरण के लिए पाकशास्व, गृह-विज्ञान, शरीरविज्ञान, स्वास्थ्य-रक्षा, गृह-परिचर्या आदि ऐसे ही विषय हैं। आज की स्त्रियाँ घर के सीमित क्षेत्र को छोड़कर समाज-सेवा की ओर बढ़ रही हैं।

17. ऐसा कहना सोलहों आना मिथ्या है ।

प्रश्न :
पाठ का नाम लिखें । कैसा कहना सोलहों आना मिथ्या है ?
उत्तर :
पाठ का नाम है – ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतको का खंडन’ ।
स्तियों के बारे में ऐसा कहना कि स्वियों की शिक्षा अनर्थकारी तथा गृह-सुख का नाश करनेवाला है – सोलहों आने झूठ है । ऐसा कहनेवाले ये भूल जाते हैं कि भारत में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनके जीवन पर उनकी माताओं के उज्ज्वल चरित्र की छाप अंकित हुई है। छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई ने घर की प्राथमिक पाठशाला में जो शिक्षा उन्हें दे दी वही जीवन के अंतिम क्षणों तक सबल बनकर उनके साथ रही । इस प्रकार के एक-दो नहीं, असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं।

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18. लड़कों की ही शिक्षा-प्रणाली कौन-सी बड़ी अच्छी है ।

प्रश्न :
लेखक का नाम लिखें । लड़कों की शिक्षा-प्रणाली की तुलना किससे की गई है?
उत्तर :
लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं।
द्विवेदीजी की ऐसी मान्यता है कि यदि हम स्त्रियों के पतन के लिए उनकी शिक्षा को दाषी मानत है तो लड़कों के निरंतर पतन के लिए उनकी शिक्षा-प्रणाली को दोष क्यों नहीं दिया जा सकता है । आज के विद्यालय तथा महाविद्यालयों की शिक्षा तो उन्हें जीवन के अयोग्य बना रही है। उनमें धर्माचरण और सदाचरण के स्थान पर पापाचरण घर करता जा रहा है ।

19. समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दंडनीय हैं।

प्रश्न :
वक्ता कौन हैं ? कैसे लोग दंडनीय हैं ?
उत्तर :
वक्ता महावीर प्रसाद द्विवेदी है ।
जो लोग स्त्री-शिक्षा के विरोध में प्राचीन काल की शिक्षा-व्यवस्था का झूठा उदाहरण पेश करते हैं, वास्तब में ऐसे लोगो को दंड दिया जाना चाहिए । वे जान-बूझकर इन तथ्यों पर परदा डालना चाहते है कि प्राबीनकाल में नारियों को उच्च स्थान प्राप्त था । पुरुषों के समान ही उन्हें सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक कृत्यों मे भाग लेने का अधिकार था ‘मनुस्मृति’ में स्त्रियों का विवेचन करते हुए स्पष्ट लिखा हुआ है कि जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते है – “यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता: 1 ”

20. क्या यह बात तुम्हारे कुल के अनुरूप है ?

प्रश्न :
वक्ता कौन है ? वह ऐसा किससे और क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
वक्ता सीता है।
सीता ने हरेक बुरे समय में राम का साथ दिया था । उसने राम के साथ वनवास के कष्ष भी भोगे। आगर वह वन न जाती तो रावण उसका अपहरण भी न कर पाता । इन सबके बावजूद सीता ने अपने सतीत्व का परिचय भी अग्न-परीक्षा से दिया । फिर भी राम ने उसकी बात न मानकर उसे राजमहल से परित्यक्त कर दिया । इसलिए सीता राम के इस व्यवहार से क्षुव्ध होकर पूछती है कि उसने सीता के साथ जो कुछ किया, वह क्या राम के कुल के अनुरूप है?

21. शकुंतला ने दुष्यंत को कटु वाक्य कहकर कौन-सी अस्वाभाविकता दिखाई ?

प्रश्न : पाठ का नाम लिखें । पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
पाठ का नाम है – ‘स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’।
‘महाभारत’ के अनुसार दुष्यंत एक बार शिकार खेलते हुए कण्व ॠषि के आश्रम में पहुँचे। वहाँ वे मेनका की पुत्री शकुंतला पर मुग्ध हो गए। दोनों ने गांधर्व विवाह कर लिया। कण्व ₹षि के आने पर जब गर्भवतो शकुतला दुप्यंत के पास पहुँची तो लोक-लाज वश राजा ने उसे स्वीकार नहीं किया। अगर ऐसे में शंकुतला ने दुष्यंत को कहु वाक्य कहे तो यह बिलकुल स्वाभाविक था।

22. वह उसके अपढ़ और अल्पज्ञ होने अथवा गँँवारपन का सूचक नही ।

प्रश्न :
‘वह’ से कौन संकेतित है ? भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
‘वह’ से स्वी-जाति संकेतित है।
द्विवेदीजी का ऐसा मानना है कि अगर प्राचीन काल में स्तियाँ अपने भाव को संस्कृत में व्यक्त न करके प्राकृत में व्यक्त करतो थी तो इस आधार पर उसे अपढ़ और अल्पज्ञ या गववार साबित नहीं किया जा सकता । आज भी पूरे भारतवर्ष में स्त्रियाँ ही क्यों पुरुष भी रोजाना के काम-काज के लिए प्रादेशिक भाषा का ही सहारा लेंत हैं।

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23.पर अब तो है ।

प्रश्न :
यह पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
यह पंक्ति ‘स्री-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ पाठ से उदृत है।
द्विवेदीजी का ऐसा कहना है कि यदि थोड़ी देर के लिए हम यह मान भी लें कि प्राचीन काल में स्वी-शिक्षा का अभाव था तो हो सकता है उस समय उनकी शिक्षा की आवश्यकता को महसूस न किया गया होगा । लेकिन आज बगैर शिक्षित हुए नारी का काम नहीं चल सकता। जिसके कंधे पर पूरे घर का दायित्व हो तथा वही अशिक्षित हो तो फिर कैसे काम चल सकता है ?

24. शकुंतला ने जो कदु वाक्य दुष्यंत को कहे, वह इस पढ़ाई का ही दुष्परिणाम था ।

प्रश्न :
शंकुतला कौन थी ? उसने दुष्यंत को कदु वाक्य क्यों कहे ?
उत्तर :
शंकुतला मेनका और विश्वामिन्र की पुत्री थी ।
एक बार राजा दुष्यंत जंगल में कण्व ॠषि के आश्रम पहुँचे तो शकुतला कों देखकर उस पर मुगध हो गए । दोनों ने आपस में गांधर्व विवाह कर लिया । कण्व ₹षि के आने पर जब वह दुष्यंत के महल पहुँची तो दुष्यंत ने उससेविवाह की बात तो दूर पहचान ने से भी इन्कार कर दिया । ऐसे में शंकुतला का दुष्यंत को कदु वाक्य कहना उसकी पढ़ाई का दुष्षरिणाम नहीं कहा जा सकता । शंकुतला के स्थान पर कोई भी युवती दुष्यंत से यही व्यवहार करती ।

25. इस तरह की दलीलों का सबसे अधिक प्रभावशाली उत्तर उपेक्षा ही है ।

प्रश्न : दलील से क्या तात्पर्य है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें ।
उत्तर :
यहाँ दलोल का तात्पर्य उन कुतकों से है, जो स्त्री-शिक्षा के विरोध में कहे जाते हैं।
द्विवेदी जी ने उन कुतकों को प्रस्तुत किया है जो स्ती-शिक्षा विरोधी लोगो के द्वारा दिए जाते हैं। ये ऐसे कुतर्क है, जिनका जवाब देना वे आवश्यक नहीं समझते । इन कुतर्को का एक ही जवाब हो सकता है कि इनकी उपेक्षा कर दी जाय। एसे लोगों को समझाना केवल अपनी उर्जा तथा समय की बर्बादी ही है।

प्रश्न 26.
हमारे पुराणों में स्त्री-शिक्षा का उल्लेख क्यों नहीं मिलता है ?
उत्तर :
हमारे पुराणों में स्त्री-शिक्षा का उल्लेख निम्नलिखित दो कारणों से नहीं मिलता है –

  • प्राचीनकाल में स्तियों के लिए अलग विश्वविद्यालय नहीं थे ।
  • अगर शिक्षा का कोई प्रमाण रहा भी होगा तो वे नष्ट हो चुके होंगे ।

प्रश्न 27.
हमारा कौन-सा व्यवहार वेद-विरोधी है ?
उत्तर :
स्री-शिक्षा का विरोध करना हमारा वेद-विरोधी व्यवहार है क्योकि वेद के अनेक मंत्रों की रचना स्वियों ने की है।

प्रश्न 28.
वेदों का विरोध ईश्वर का विरोध कैसे है ?
उत्तर :
वेदों की रचना ईश्वर ने की थी इसलिए वेदों का विरोध ईश्वर का विरोध है।

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प्रश्न 29.
प्राचीन नारियों ने किस प्रकार अपने ज्ञान की धाक जमाई थी ?
उत्तर :
प्राचीन नारियों में जैसे ऋषि की पत्नी, गार्गी, मंडन मिश्र की पत्नी आदि ने अपने ज्ञान, तर्क, दर्शन तथा उपदेश से धाक जमाई थी ।

प्रश्न 30.
द्विवेजी ने ऐसा क्यों कहा है कि सारी शिक्षण-संस्थाएँ बंद हो जानी चाहिए ?
उत्तर :
आज के पुरुष वर्ग तथा पढ़े-लिखे लोग ही तरह-तरह के अपराध तथा व्यभिचार में लिप्त हैं। यदि यह उनकी पढ़ाई का ही परिणाम है तो सारी शिक्षण-संस्थाएँ बंद कर देनी चाहिए ।

प्रश्न 31.
शंकुतला के किस कटु वाक्य को स्वाभाविक कहा गया है ?
उत्तर :
अपने प्रेमी तथा पति दुष्यंत द्वारा भुला दिए जाने पर शकुंतला ने जो कुछ भी दुष्यंत से कहा उसे स्वाभाविक कहा गया है ।

प्रश्न 32.
द्विवेदी जी ने पुरुषों के किस व्यवहार पर चिंता प्रकट की है ?
उत्तर :
जो पुरुष शिक्षित होकर भी तरह-तरह के अपराध में लिप्त रहते हैं, एसे पुरुषों के व्यवहार पर द्विवेदी जी ने चिंता प्रकट की है।

प्रश्न 33.
वाल्मीकि ने राम पर कोध क्यों प्रकट किया ?
उत्तर :
सीता ने अपनी सत्यता का प्रमाण अग्नि-परीक्षा देकर दिया फिर भी लोगों के आक्षेपों के कारण राम ने निरपराध सीता को राजमहल से निष्काषित कर दिया। राम के इसी व्यवहार पर वाल्मीकि ने अपना क्रांध प्रकट किया।

प्रश्न 34.
‘अनर्थ का बीज’ किसे कहा गया है ? वह किसमें नहीं है ?
उत्तर :
‘अनर्थ का बीज’ स्त्री-शिक्षा को कहा गया है । जहाँ तक अनर्थ करने की बात है वह सुशिक्षित पुरुष भी करते हैं इसलिए वह केवल स्त्रियों में नहीं है ।

प्रश्न 35.
समाज की दृष्टि में कैसे लोगों को दंडनीय कहा गया है ?
उत्तर :
समाज की दृष्टि में वैसे लोगों को दंडनीय कहा गया है जो स्वी-शिक्षा का विरोध कर स्वियों को अनपढ़ रखने की बातें करते हैं तथा समाज की उत्रति में बाधा पहुँचाते हैं।

प्रश्न 36.
शिक्षा के बारे में द्विवेदी जी का मत क्या है ?
उत्तर :
शिक्षा के बारे में द्विवेदी जी का मानना है कि पुरुषों के समान स्त्रियों को भी शिक्षित होना चाहिए । अगर स्वी सुशिक्षित होगी तो आनेवाली पीढ़ी भी सुशिक्षित होगी।

प्रश्न 37.
किस बात को सोलहों आने मिथ्या कहा गया है ?
उत्तर :
स्त्री-शिक्षा को गृह-सुख का नाश करने वाली, अभिमान पैदा करने का दोषी मानना आदि बातों को सोलहों आने मिथ्या कहा गया है।

प्रश्न 38:
द्विवेदी जी ने किन तर्कों के द्वारा स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया है ?
उत्तर :
द्विवेदी जी ने निम्नलिखित तर्कों के द्वारा स्र्री-शिक्षा का समर्थन किया है –

  • संस्कृत नाटकों में स्त्रियों का प्राकृत बोलना उनके अनपढ़ होने का प्रमाण नहीं है क्योंकि उस समय प्राकृत आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी।
  • प्रमाणों के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि प्राचीन काल में स्त्री-शिक्षा नहीं थी।
  • प्राचीन भारत में अनेक नारियों ने अपने ज्ञान का लोहा मनवाया है अतः उन्हें शिक्षा से वंचित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 39.
प्राचीन ग्रंथों में कुमारिकाओं के लिए किस-किस शिक्षा का प्रबंध किया गया था ?
उत्तर :
प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों के लिए चित्र बनाने, नाचने, गाने, बजाने, फूल गूंथने तथा पैर मलने की विद्या सिखाई जाती थी । अगर इन विद्याओं का प्रचलन था तो उनके लिए शिक्षा का भी प्रबंध अवश्य ही रहा होगा।

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प्रश्न 40.
‘स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट’ – ‘कालकूट’ और ‘पीयूष का घूँट’ का अर्थ स्पष्ट करें ।
उत्तर :
‘कालकूट’ का अर्थ है – प्राणघातक विष तथा ‘पीयूष का घूँट’ का अर्थ है जीवन प्रदान करनेवाली अमृत।

प्रश्न 41.
शिक्षण-प्रणाली में संशोधन की बात क्यों कही गई है ?
उत्तर :
यदि किसी को ऐसा लगता है कि वर्तमान शिक्षण-प्रणाली का बुरा असर स्त्रियों पर पड़ रहा है तो निश्चय ही उसमें संशोधन किया जाना चाहिये ताकि वह स्त्रियों के अनुकूल हो सके ।

प्रश्न 42.
‘शिक्षा’ बहुत व्यापक शब्द है – आशय स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ाई-लिखाई ही नहीं है । इसके अन्तर्गत सारी कलाएँ भी आ जाती है, जैसे चित्रकला, पाककला, बुनाई-कढ़ाई, नृत्य आदि । सच कहा जाय तो प्राचीन ग्रंथों में वर्णित चौंसठ कलाओं का समावेश इसी एक शब्द ‘शिक्षा’ में हो जाता है।

प्रश्न 43.
कुछ लोग स्त्रियों को अनपढ़ रखकर भारतवर्ष का गौरव बढ़ाना चाहते हैं – में कौन-सा व्यंग्य छिपा है ?
उत्तर :
इस वाक्य में यह व्यंग्य छिपा है कि स्वी-शिक्षा का विरोध करना, इसके लिए कुतकों का सहारा लेना आदि भारतवर्ष को कलंकित करना है । स्री-शिक्षा का विरोध करके, उन्हें अनपढ़ रखकर भारतवर्ष का गौरव नहीं बढ़ाया जा सकता।

प्रश्न 44.
स्त्रियों को ककहरा पढ़ाने का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
स्त्रियों को ककहरा पढ़ाने का अर्थ है – स्त्रियों को अक्षर-ज्ञान देना ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘द्विवेदी युग’ का नामकरण किस साहित्यकार के नाम पर हुआ ?
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ख) प्रभाकर द्विवेदी
(ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(घ) सोहनलाल द्विवेदी
उत्तर :
(ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी।

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प्रश्न 2.
‘सरस्वती’ पत्रिका का प्रकाशन किस वर्ष प्रारंभ हुआ ?
(क) 1903 ई० में
(ख) 1893 ई० में
(ग) 1901 ई० में
(घ) 1900 ई० में
उत्तर :
(घ) 1900 ई० में।

प्रश्न 3.
‘सरस्वती’ पत्रिका का प्रकाशन कहाँ से होता था ?
(क) इलाहाबाद
(ख) काशी
(ग) कानपुर
(घ) कलकत्ता
उत्तर :
(ख) काशी

प्रश्न 4.
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक का कार्यभार किस वर्ष संभाला?
(क) 1903 ई० में
(ख) 1900 ई० में
(ग) 1902 ई० में
(घ) 1905 ई० में
उत्तर :
(क) 1903 ई० में ।

प्रश्न 5.
‘सरस्वती’ पत्रिका के प्रकाशक कौन थे ?
(क) चिंतामणि घोष
(ख) रामचंद्र शुक्ल
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) निराला
उत्तर :
(क) चिंतामणि घोष ।

प्रश्न 6.
‘संपत्ति शास्त्र’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) रामचंद्र शुक्ल
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(ग) श्यामसुंदर दास
(घ) नगेन्द्र
उत्तर :
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी।

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प्रश्न 7.
महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब हुआ था ?
(क) सन् 1861 में
(ख) सन् 1862 में
(ग) सन् 1863 में
(घ) सन् 1864 में
उत्तर :
(घ) सन् 1864 में ।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन-सा द्विवेदी जी का निबंध-संग्रह नहीं है ?
(क) रसज़ रंजन
(ख) साहित्य-सीकर
(ग) साहित्य-संदर्थ
(घ) आध्यात्मिकी
उत्तर :
(घ) आध्यात्मिकी ।

प्रश्न 9.
‘संपत्ति शास्त्र’ द्विवेदीजी की किस विषय से संबंधित पुस्तक है ?
(क) अर्थशास्त्र
(ख) राजनीति शास्त्र
(ग) दर्शनशास्त्व
(घ) इतिहास
उत्तर :
(क) अर्थशास्त्र ।

प्रश्न 10.
द्विवेदी जी ने महिलाउपयोगी कौन-सी पुस्तक लिखी ?
(क) इंकार
(ख) सेवासदन
(ग) महिला मोद
(घ) नीरजा
उत्तर :
(ग) महिला मोद ।

प्रश्न 11.
द्विवेदी जी की दर्शन से संबंधित कौन-सी पुस्तक है ?
(क) भारतीय-दर्शन
(ख) आध्यात्मिकता
(ग) आलाप
(घ) रसझ-रंजन
उत्तर :
(ख) आध्यात्मिकता।

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प्रश्न 12.
‘अद्भुत आलाप’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी
(घ) नगेन्द्र
उत्तर :
(ग) महावीर प्रसाद द्विवेदी ।

प्रश्न 13.
संस्कृत नाटकों में स्त्रियों से किस भाषा में बात करायी गई है ?
(क) संस्कृत
(ख) प्राकृत
(ग) पाली
(घ) बज
उत्तर :
(ख) प्राकृत।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रंथ संस्कृत में नहीं है ?
(क) गाथा सप्तशती
(ख) सेतुबंध
(ग) कुमार पाल चरित
(घ) त्रिपिटक
उत्तर :
(घ) त्रिपिटक

प्रश्न 15.
निम्न में से कौन-सी भाषा प्राचीन काल की नहीं है ?
(क) शौरसेनी
(ख) मगधी
(ग) बाँग्ला
(घ) पाली
उत्तर :
(ग) बाँग्ला।

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प्रश्न 16.
कुछ लोग प्राचीन भारत की स्त्रियों को क्या बताते हैं ?
(क) सुंदर
(ख) अपढ़
(ग) कुरूप
(घ) अभिमानी
उत्तर :
(ख) अपढ़ ।

प्रश्न 17.
वाल्मीकि ने अपना क्रोध निम्न में से किस पर प्रकट किया है ?
(क) राम
(ख) सीता
(ग) लक्ष्मण
(घ) रावण
उत्तर :
(क) राम ।

प्रश्न 18.
निम्न में से किसे द्विवेदी जी ने सामाजिक अपराध माना है ?
(क) स्वियों को पढ़ाना
(ख) स्त्रियों को निरक्षर रखना
(ग) स्त्रियों को सम्मान देना
(घ) स्वियों को बराबरी का स्थान देना
उत्तर :
(ख) स्त्रियों को निरक्षर रखना ।

प्रश्न 19.
निम्न में से किसका उल्लेख द्विवेदी जी के निबंध में नहीं है ?
(क) शकुंतला
(ख) शीला
(ग) द्रौपदी
(घ) रुक्मिणी
उत्तर :
(ग) द्रौपदी ।

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प्रश्न 20.
क्या कहना सोलहों आने मिश्या है ?
(क) स्व्री-शिक्षा अनर्थकर है
(ख) शिक्षा बहुत व्यापक शब्द है
(ग) स्त्रियों को पढ़ाना चाहिए
(घ) संस्कृत
उत्तर :
(क) स्त्री-शिक्षा अनर्थकर है।

प्रश्न 21.
शकुंतला ने किस भाषा में श्लोक लिखी थी ?
(क) हिन्दी
(ख) संस्कृत
(ग) मगधी
(घ) प्राकृत
उत्तर :
(घ) प्राकृत ।

प्रश्न 22.
कालिदास-भवभूति के जमाने में लोग किस भाषा में बातें किया करते थे ?
(क) मगधी
(ख) पाली
(ग) प्राकृत
(घ) संस्कृत
उत्तर :
(ग) प्राकृत ।

प्रश्न 23.
रुक्मिणी ने किस भाषा में श्रीकृष्ण को पत्र लिखा था ?
(क) संस्कृत
(ख) प्राकृत
(ग) पाली
(घ) ब्रज
उत्तर :
(क) संस्कृत

प्रश्न 24.
बौद्धों का ‘त्रिपिटक’ किस भाषा में लिखा गया है ?
(क) शौरसेनी
(ख) प्राकृत
(ग) महाराष्टी
(घ) पाली
उत्तर :
(ख) माकृत ।

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प्रश्न 25.
‘गाथा-सप्तशती’ की भाषा क्या है ?
(क) शौरसेनी
(ख) महाराष्ट्री
(ग) संस्कृत
(घ) प्राकृत
उत्तर :
(घ) प्राकृत ।

प्रश्न 26.
सेतुबंध-महाकाव्य की भाषा क्या है ?
(क) शौरसेनी
(ख) संस्कृत
(ग) प्राकृत
(घ) पाली
उत्तर :
(ग) प्राकृत ।

प्रश्न 27.
‘कुमारपाल चरित’ की भाषा क्या है ?
(क) प्राकृत
(ख) संस्कृत
(ग) शौरसेनी
(घ) पाली
उत्तर :
(क) प्राकृत।

प्रश्न 28.
वेदों की रचना किसने की ?
(क) ईश्वर ने
(ख) मुनियों ने
(ग) वाल्मीकिने
(घ) तुलसीदास ने
उत्तर :
(क) ईश्वर ने ।

प्रश्न 28.
‘थेरीगाथा’ किस ग्रंथ का अंश है ?
(क) रामायण
(ख) त्रिपिटक
(ग) गाथा-सप्तशती
(घ) कुमारपाल चरित
उत्तर :
(ख) त्रिपिटक।

प्रश्न 29.
शंकराचार्य के छक्के किसने छुड़ाए ?
(क) मंडन मिश्र की पत्नी ने
(ख) शीला ने
(ग) विज्जा ने
(घ) शकुंतला ने
उत्तर :
(क) मंडन मिश्र की पत्नी ने ।

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प्रश्न 30.
स्त्री-शिक्षा विरोधी स्त्री-शिक्षा को क्या मानते हैं ?
(क) पीयूष-घूँट
(ख) कालकूट
(ग) विद्वता
(घ) मूर्खता
उत्तर :
(ख) कालकूट ।

प्रश्न 31.
व्रह्यवादियों को किसने पराजित किया था ?
(क) शकुंतला ने
(ख) सीता ने
(ग) दुष्यंत ने
(घ) गार्गी ने
उत्तर :
(घ) गार्गी ने ।

प्रश्न 32.
महावीर प्रसाद द्विवेदी का संपूर्ण साहित्य किसमें संगृहीत है ?
(क) साहित्य-सीकर में
(ख) साहित्य-संदर्भ में
(ग) संपत्तिशास्त्र में
(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली में
उत्तर :
(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली में ।

प्रश्न 33.
हिन्दी में पहली बार समालोचना को स्थापित करने का श्रेय किसे जाता है ?
(क) प्रेमचंद को
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी को
(ग) दिनकर को
(घ) महादेवी वर्मा को
उत्तर :
(ख) महावीर प्रसाद द्विवेदी को ।

प्रश्न 34.
निम्न में से द्विवेदी जी ने किस विधा में रचना नहीं की ?
(क) भाषा विज्ञान
(ख) उपन्यास
(ग) इतिहास
(घ) अर्थशास्त्र
उत्तर :
(ख) उपन्यास ।

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प्रश्न 35.
‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ पहले किस शीर्षक से प्रकाशित हुआ था?
(क) पढ़े-लिखों का पांडित्य
(ख) पांडित्य पढ़े-लिखों का
(ग) स्त्री-शिक्षा का विरोध
(घ) स्त्री-शिक्षा के विरोध का खंडन
उत्तर :
(क) पढ़े-लिखों का पांडित्य ।

टिप्पणियाँ

1. शकुंतला :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतको का खंडन’ से लिया गया है।
शंकुतला मेनका नामक अप्सरा तथा ऋषि विश्वामित्र की कन्या थी । इसका लालन-पालन कण्व नामक ऋषि के आश्रम में हुआ क्योंकि मेनका इसे जन्म देते ही वन मे छोड़कर चली गई थी । शकुन नामक पक्षियों ने इसकी रक्षा की, इसीलिए यह शकुंतला कहलाई ।

2. दुष्यंत :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्री-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है। दुष्यंत चंद्रवंशी राजा थे। इनके माता-पिता के बारे में भिन्न-भिन्न मत हैं। ‘भागवत’ के अनुसार रैम, ‘हरिवेश’ के अनुसार संतु को, ‘महाभारत’ में ऐति को तथा ‘वायुपुराण’ में मल्लि को इनका पिता बताया गया है । इसी प्रकार कहीं पर माँ का नाम उपदानवी मिलता है और कहीं पर स्तनतरी।

3. प्राकृत :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतरों का खंडन’ से लिया गया है ।
प्राकृत भारतीय आर्यभाषा का एक प्राचीन रूप है । इसके प्रयोग का समय 500 ई० पू॰ से 1000 ई० सन् तक माना जाता है। धार्मिक कारणों से जब संस्कृत का महत्व कम होने लगा तो प्राकृत भाषा का प्रयोग अधिक होने लगा। संस्कृत के प्राचीन नाटकों में भी स्त्री पात्रों तथा सर्व-साधारण के बोलचाल के लिए प्राकृत भाषा का ही प्रयोग हुआ है।

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4. भवभूति :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्री-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है।
भवभूति आठवीं शताब्दी के आरंभ में संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध नाटककार थे । इनका वास्तविक नाम श्रीकंठ था पर रचनाएँ भवभूति के नाम से की है । इनके तीन प्रसिद्ध नाटक हैं – ‘मालती माधव’, ‘महावीर-चरित’ तथा ‘उत्तर रामचरित’।

5. उत्तर रामचरित :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ से लिया गया है ।
‘उत्तर रामचरित’ संस्कृत नाटककार भवभूति के द्वारा लिखा गया । इसमें राम के राज्याभिषेक के बाद के उनके शेष जीवन का वर्णन किया गया है । अपने इस नाटक में भवभूति ने राम और सीता का पुनर्मिलन दिखाकर पूरी कथा को सुखांत बना दिया है।

6. भारतवर्ष :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ से लिया गया है। प्राचीन साहित्य के अनुसार जंबूद्वीप के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ भूमि का नाम ‘भारतवर्ष’ ॠषभ के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा। इसका क्षेत्रफल 9000 योजन बताया गया है। पहले इसका नाम अजनाभ था।

7. मंडन मिश्र :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ से लिया गया है।
पूर्व मीमांसा दर्शन के आचार्य मंडन मिश्र अद्वैत वेदांत के भी विद्वान थे । इनकी पत्ली भारती भी इन्हीं के समान विदुपुरी थीं। कुमारिल भट्ट इनके गुरू थे । शास्वार्थ में शंकराचार्य से पराजित होने के बाद मंडन मिश्र और उनके शिष्य सन्यासी हो गए। इन्होंने सन्यास लेंने के पहले और उसके बाद भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।

8. पुराण :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘ख्वी-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है। धार्मिक संस्कृत साहित्य में पुराणों का बड़ा महत्व है । कुल पुराण 18 हैं – यह्न, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, भविष्य, वह्ववैवर्त, लिंग, वराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरूड़ और ब्रहांड। इनमें सृष्टि, मनुष्य, देवों, दानवों, राजाओं, ॠषियों तथा मुनियों के वृतांत अंकित हैं।

9. गार्गी :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ से लिया गया है।
गार्गी उपनिषदकाल की एक विदुषी महिला थी । गर्ग अषि के गोर्र में उत्पन्न होने के कारण उसका नाम गार्गी पड़ा।

10. वेद-मंत्र :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ से लिया गया है।
वेद विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं । वेद चार हैं – ॠगेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेद के द्रष्टां ने जो भी शृचा, छंद या स्तुति में कहा वह सब मंत्र है । बाहाण ग्रंथों में अंकित गद्य-पद्य सब मंत्र कहलाते हैं।

11. त्रिपिटक :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ से लिया गया है।
भगवान बुद्ध के उपदेश जो तीन खंडों है ‘त्रिपिटक’ कहलाते हैं। ये तीन खण्ड हैं – विनयपिटक, सुत्तपिटट और अभिधम्मपिटक । त्रिपिटक में बुद्दे के उपदेश, भिणुओं के आचरण, नैतिक धर्म तथा निर्वाण का उल्लेख है। त्रिपिटक बैद्धधर्म का मुख ग्रंथ है ।

12. सीता :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है।
सीता विदेह देश के राजा सीरध्धज जनक की पुत्री और श्रीराम की पत्नी थी । ‘वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार यह भूमि के अंदर से जनक को उस समय मिली जब राजा यज्ञ-भूमि तैयार करने के लिए हल चला रहे थे।

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13. राम :- प्रस्तुत शब्द महावीर पसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है।
राम अयोध्या नरेश दशरथ तथा कौशल्या के पुर्र थे । वशिष्ठ मुनि ने उन्हें शिक्षा दी । जनकपुर जाकर सीता के स्वयंवर में धनुष भंग करके सीता से विवाह किया । पिता की आज्ञा मानकर 14 वर्षों तक वनवास किया। वनवास की इस अवधि में सीता का हरण हुआ और राम-रावण युद्ध में राम की विजय हुई । वनवास की अवधि पूरी होने पर उन्होंने राजपाट संभाला और एक आदर्श राजा के रूप में शासन किया।

14. लक्ष्मण :- प्रस्तुत शब्द महावार प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन’ से लिया गया है।
लक्ष्मण अयोध्या नरेश दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र थे । इनके सहोदर भाई का नाम शजुछ्ध था। लक्ष्मण बड़े भाई राम के बड़े भक्त थे । ये राम के साथ सीता-स्वयंवर में गए और राम के विवाह के साथ ही उसी मंडप में इनका विवाह राजा जनक की पुर्री उर्मिला से हुआ। कैकेयी द्वारा राम के राज्याभिषेक में बाधा डालने पर ये इतने कुद्ध हुए कि अपने पिता और कैकेयी को बंदी बनाने के लिए तैयार हो गए थे ।

15. राजा जनक :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ से लिया गया है।
मिथिला नरेश जनक सीता के पिता थे । वे ‘विदेह’ और ‘सीरध्वज’ नाम से भी प्रसिद्ध हैं। सांसारिक जीवन से अनासक्त और जीवन-मुक्त दार्शनिक होने के कारण ये ‘विदेह’ कहलाए। याज्ञवल्क्य जैसे दार्शनिक राजा जनक के दरबार की शोभा बढ़ाते थे ।

16. वाल्मीकि :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है।
संस्कृत भाषा के आदि कवि और ‘रामायण’ के रचयिता के रूप में वाल्मीकि प्रसिद्ध हैं। एक बार ध्यान में बैठे हुए इनके शरीर को दीमकों ने अपना दूह बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब ये दीमक-दूह से (जिसे वाल्मीकि कहते हैं) बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे।

17. रुक्मिणी :- पस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवदी के निबंध ‘स्वी-शिक्षा के विरोधी कुत्तको का खंडन’ से लिया गया है। रुक्मिणी विदर्भ नरेश भौस्मक की पुरी थी। वयस्क होने पर एकबार इसने नारद से कृष्ण के रूप तथा गुण का वर्णन सुना। तभी उसने कृष्ण से विवाह करने का निश्चय कर लिया। रुविमणी के भाई रुकिम ने उसका विवाह शिश्रुपाल के साथ तय कर दिया। विवाह के एक दिन पहले श्रीकृण ने उसका हरण कर लिया और द्वारका पहुँचकर उसके साष विजाह कर लिया।

18. अत्रि :- प्रस्तुत शब्द महावीर प्रसाद द्विवेदो के निबध स्वी-शिक्षा के विरोषी कुतकों का खंडन’ से लिया गया है।
कहा जाता है कि कषि अत्रि का जन्म क्रहा के नेत्रों से हुआ था। अभि का विवाह दक्ष प्रजापति की कन्या अनुसूया से हुआ धा। वनवास काल में राम, सौता और लक्ष्मण धिक्कूट में इनके आश्रम में मिले धे। ‘अनुसूया’ नांम से प्रासद्ध यह स्थान आज भी तीर्थ माना जाता है।

पाठ्याधारित व्याकरण :

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लेखक परिचय

महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1864 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर नामक ग्राम में हुआ था । इनके पिता इस्ट इंडिया कंपनी, बम्बई में नौकरी करते थे । वहीं इन्होंने संस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी सीखी । इनके पड़ोस में अनेक रेलवे क्लर्के रहते थे । उनकी देखा-देखी इन्होंने भी रेलवे में नौकरी कर ली । अपनी योग्यता, ईमानदारी तथा मेहनत के बल पर ये स्टेशन मास्टर के पद तक पहुँच गए । एक बार अंग्रेज अधिकारी के व्यवहार से इनके स्वाभिमान को ठैस लगी तथा 150 रु० मासिक की नौकरी को लात मारकर कानपुर आ गए। सन् 1903 में इन्होंने प्रसिद्ध हिंदी मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का संपादन शुरु किया तथा सन् 1920 तक उसके संपादन से जुड़े रहे ।

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महावीर प्रसाद द्विवेदी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । वे एक साथ प्रतिभावान संपादक, भाषा वैज्ञानिक, इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्र्री, वैज्ञानिक चिंतन एवं लेखन के संस्पापक, समालोचक, समाज सुधारक तथा सफल अनुवादक थे।

एक संपादक के रूप में जब इन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन शुरु किया तो हिन्दी भाषा और इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का युग प्रारंभ हुआ । हिन्दी भाषा को मानक रूप देनेवालों में द्विवेदी जी का स्थान महत्वपूर्ण है । भारतेंदु के समान ही ये भी युग-निर्माता के रूप में सम्मानित हैं। निबंधों, समालोचनाओं द्वारा ये साहित्यकारों को ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से निरंतर प्रेरणा देते रहे । ये कठिन से कठिन विषय को सरल बनाने में सिद्धहस्त थे । द्विवेदी जी सफल निबंधकार थे । इनके अधिकांश निबंध विचारात्मक हैं। द्विवेदीजी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं –

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निबंध-ग्रंथ : रसज्ञ रंजन, साहित्य-सीकर ।
काव्य-ग्रंथ : काव्य मंजूषा-सुमन ।
अनुवादित ग्रंथ : स्नेहमाला, विहार-वाटिका, कुमार-संभव, गंगा लहरी, विचार-रत्नावली, रघुवंश, मेघदूत, किरातार्जुनीय आदि ।आलोचना : नैषधचरित चर्चा, कालिदास की समालोचना, नाटक-शास्त्र, साहित्य-संदर्भ, सुकविकीर्तन, वक्तृत्व-कला।
अर्थशास्त्र : संपत्ति शास्त्र ।
महिलापयोगी रचना : महिला मोद ।
दर्शन : आध्यात्मिकी ।

संकलित निबंध ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी’, ‘कुतर्को का खंडन’, सर्वप्रथम सितंबर 1914 के ‘सरस्वती’ के अंक में ‘पढ़े-लिखों का पांडित्य’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था । बाद में ‘महिला मोद’ नामक पुस्तक में संकलित करते समय द्विवेदी ने इसका शीर्षक ‘स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतकों का खंडन’ कर दिया था। 21 दिसंबर सन् 1938 में द्विवेदी जी का देहावसान हो गया ।

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 31

  • कुतर्कों = बुरे तर्को (बहस) ।
  • खंडन = किसी बात को न मानना ।
  • विद्यमान = मौजूद ।
  • सुशिक्षित = अच्छी तरह शिक्षित ।
  • पेशा = व्यवसाय ।
  • कुमार्गगामियों = बुरे रास्ते पर चलनेवाले ।
  • सुमार्गगामी = अच्छे रास्ते पर चलने वाले ।
  • अधार्मिक = धर्म को नहीं माननेवाले ।
  • दलीलें = तर्क।
  • कुलीन = अच्छे कुल (वंश) वाले ।
  • अपढ़ों = निरक्षरों, अनपढ़ ।
  • चाल = परंपरा ।
  • प्रणाली = तरीका, व्यवस्था ।
  • अनर्थ = बुरा ।
  • श्लोक = दोहा (दो पंक्तियों की संस्कृत कविता)।
  • कटु = कड़वा।
  • दुष्परिणाम = बुरा परिणाम।
  • प्राकृत = एक भाषा जो संस्कृत के समकक्ष आम आदमी की भाषा थी।
  • वेदांतवादिनी = वेदांत की बातें करनेवाली ।
  • समुदाय = वर्ग ।

पृष्ठ सं० – 32

  • प्रचलित = चालू ।
  • धर्मोपदेश = धर्म का उपदेश ।
  • सर्वसाधारण = आम आदमी ।
  • नियमबद्ध = नियम में बंधा हुआ।
  • शास्त्र = पुस्तक ।
  • द्वीपांतरों = एक द्वीप से दूसरे द्वीप ।
  • हवाले = वर्णन।
  • प्रगल्भ = निपुण।
  • नामोल्लेख = नाम का उल्लेख ।
  • तत्कालीन = उस समय ।
  • तर्कशास्त्जता = तर्कशास्त्र को जानना ।
  • ईश्वर-कृत = ईश्वर के द्वारा किया गया ।
  • ककहरा = अक्षर-ज्ञान ।

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पृष्ठ सं० – 33

  • आदृत = आदर पाई हुई ।
  • पद्य = काव्य ।
  • कुमारिकाओ = कुंवारियो, जिनकी शादी न हुई हो।
  • विज्ञ = विद्वान ।
  • पांडित्व = पंडित, विद्वान होने का प्रमाण ।
  • ब्रह्मवादियों = जो यह विश्वास करते हैं कि ईे्वर सत्य है, संसार मिथ्या है
  • सहधर्मचारिणी = साथ रहकर धर्म का पालन करनेवाली अर्थात् पत्नी।
  • दुराचार = बुरा व्यवहार ।
  • कुफल = बुरा फल
  • कालकूट = विष, जहर।
  • पीयूष = अमृत ।
  • दलीलों = बहसो ।
  • दृष्टांतों = उदाहरणों ।
  • अतएव = इसलिए ।

पृष्ठ सं० – 34

  • विप्षि्षियों = विरोधियों ।
  • हवाले = प्रमाण, सुबूत, उदाहरण ।
  • एकांत = जहाँ कोई न हो ।
  • अल्पज्ञ = कम जाननेवाला।
  • प्राक्कालीन = उस समय की ।
  • पुराणकार = पुराण की रचना करने वाले ।
  • नरहत्या = आदमी की हत्या करना ।
  • विक्षिप्तों = पागलों ।
  • ग्रहग्रस्तों = बुरे ग्रह से ग्रस्त ।
  • मुकर जाना = अपनी बात से बदल जाना ।
  • सदाचार = अच्छा व्यवहार ।
  • किंचित = थोड़ा ।
  • दुर्वाक्य = बुरे वाक्य।
  • परित्यक्त = घर से निकाला जाना ।
  • मिथ्यावाद = झूठी बात।
  • अनुरूप = अनुसार ।
  • महत्ता = महानता।

पृष्ठ सं० – 35

  • मन्वादि = मन्व (एक ॠषि) आदि ।
  • नीतिज्ञ = नीति को जाननेवाला ।
  • हरगिज = बिलकुल ।
  • मुमानियत = मनाही, रोक ।
  • अभिज्ञता = जानना ।
  • निरक्षर = जिसे अक्षर का ज्ञान न हो।
  • दंडनीय = दंड पाने के योग्य ।
  • अपकार = बुराई।
  • व्यापक = विस्तृत ।
  • समावेश = शामिल ।
  • संशांधन = सुधार।
  • अनर्थकर = अनर्थ करनेवाला ।
  • अभिमान = घमंड।
  • उत्पादक = पैदा करने वाला ।
  • गृह-सुख = घर का सुख ।
  • सोलहों आने मिथ्या = सौ प्रतिशत झूठ ।