WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 6 वापसी

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 6 Question Answer – वापसी

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।
– वक्ता कौन है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गणेशी है।
गणेशी रेलवे का एक बतुर्थवर्गीय कर्मचारी है। गजाधर बाबू जब तक रेलवे के क्वार्टर में रहे, गणेशी ने उनकी सुखसुविधा का पूरा-पूरा ध्यान रखा। अब गजाधर बाबू रिटायर होकर अपने घर जा रहे हैं – इस बात से गणेशी काफी दुःखी है कि अब वह उनकी संवा नहीं कर पाएगा। गजाधर बाबू के अच्छे व्यवहार के कारण गणेशी को उनका जाना अच्छा नहीं लग रहा है।

प्रश्न 2.
कभी-कभी हमलोगों की भी खबर लेते रहिएगा।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति उषा प्रियवदा की कहानी ‘वापसी’ से लो गई है।
गजाधर बाबू पैंतीस वर्षों तक रेलवे की नौकरी करने के बाद रिटायर होकर अपने घर जा रहे हैं। इतने वर्षों से गणेशी उनके साथ रहा, उनका हर तरह से ध्यान रखा। अब शायद फिर उसका गजाधर बाबू से मिलना न हों – इसलिए वह उनसं निवेदन करता है कि पत्रों के माध्यम सं ही सही, कभी-कभो गणेशी और उसके परिवार की खोज-खबर लेते रहें। उन्हुं भुला न दे।

प्रश्न 3.
आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। कथन का मूल भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना ‘वापसी’ है तथा इसकी लेखिका उषा प्रियंवदा हैं।
गणणशी की बेटी की शादी जल्द ही होन वाली है। उसे उम्मीद थी कि उनके यहाँ रहने से उसे शादी में काफी सहयोग मिलता, उसका हौसला बना रहता। इसलिए उसे इस बात का दुःख है कि गजाधर बाबू उसकी बेटी की शादी में न रह पाएंगे।

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प्रश्न 4.
पल्नी, बाल-बच्चे के साथ रहने की कल्पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठकर विलीन हो गया।
– पाठ का नाम लिखें। यहाँ किसकी कल्पना के बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
पैंतीस वर्षों तक गणेशी गजाधर बाबू की सेवा करता रहा लेकिन अब वे रिटायर होकर अपने घर जा रहे हैं। गणेशी के विछोंह का उन्हें दु:ख तो है लंकिन जब वे अपनी प्नी और बाल-बच्चे के साथ रहने की कल्पना करते हैं तो उनका दुख वैस ही गायब हा जाता है जैसे जल में उठी हुई दुर्बल लहर खो जाती है।

प्रश्न 5.
गजाघर बाबू खुश थे, बहुत खुश।
– प्रस्तुत वाक्य किस पाठ से लिया गया है ? गजाघर बाबू क्यों खुश थे ?
उत्तर :
प्रस्तुत वाक्य ‘वापसी’ कहानी से लिया गया है।
पैंतौस वर्षों को नौकरी के बाद रिटायर होकर अपने परिवार के साथ अपने ही घर में रहने की कल्पना से हो गजाघर बाबू बहुत खुश हो जाते हैं। लंबे समय से चिर-प्रतिक्षित सपना साकार होने जा रहा है – इसलिए उनका खुश होना स्वाभाविक है।

प्रश्न 6.
इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे।
– पाठ का नाम लिखें। कौन, किसके सहारे अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
गजाधर बाबू ने रेलवे की नौकरी में पैतीस वर्ष इसी उम्मीद में काट दिए थे कि रिटायर होने के बाद वह परिबार के साथ हैसी-खुशी से रह सकेंगे। इसी आशा के सहारे उन्हाँने अपने अभाव के बोझ को भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया

प्रश्न 7.
कवि प्रकृति के न होने पर भी उन्हें पत्नी की स्नेहपूर्ण बातें याद आती रहती।
– कवि प्रकृति का क्या अर्थ है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
कवि-प्रकृति का अर्थ है – कवियों की तरह संवेदनशोल होना।
यद्यपि गजाघर बाबू का दिल कवियों का-सा नहीं था फिर भी उन्हे रह-रहकर पल्नी की स्नेहपूर्ण बाते तथा उसका सलज्ज चेहरा अक्सर याद आता रहता था। वह उन दिनों को याद करते थे जब पल्नो आपह करके बड़े प्यार से खिलातो थीं। पत्नी की छोटी से छोटी बातें वे याद करते रहते थे।

प्रश्न 8.
अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था।
अथवा
प्रश्न 9.
वह फिर उसी स्नेह और आदर के मध्य रहने जा रहे थे।
– पाठ का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
गजाघर बायू के जीवन का सपना पैंतीस वर्षों के बाद पूरा होंने जा रहा था। पैतीस साल तक अंकले नौकरी करते हुए रेलवे क्वार्टर में उन्होंने इस उम्मीद में काट दिए कि रिटायर होने के बाद वे परिवार के लोगों के माथ रह सकेंगे। आज इतने वर्षों के बाद उनके जीवन में यह अवसर आया था कि वे उसी सेहपूर्ण और आदरमय वातावरण में रहने जा रहे थे।

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प्रश्न 10.
उनके मन में थोड़ी-सी खिन्नता उपज आयी।
– रचना और रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू की पत्नी हैं।
गजाधर बाबू के आते ही सारे लोग हँसी-मजाक छोड़कर धीरे-धीरे खिसक गए। पत्नी ने आकर देखा कि वे अकेले ही आँगन में बैठे हैं – उसे यह देखकर बुरा लगा कि बेटे-बेटी तथा बहु को तो इस समय उनके साथ रहना था। गजाधर बाबू को यह बात खटक गई लेकिन टालने के खयाल से उन्होंने पत्नी से कहा कि सब अपने-अपने काम में लग गए हैं आखिर बच्चे ही हैं।

प्रश्न 11.
अपने-अपने काम में लग गए हैं – आखिर बच्चे ही हैं।
– वक्ता कौन है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू की पत्नी हैं।
गज्तर : वक्ता गजा का आते ही सारे लोग हँसी-मजाक छोड़कर धीरे-धीरे खिसक गए। पत्ली ने आकर देखा कि वे अंकेले ही आँगन में बैठे है – उसे यह देखकर बुरा लगा कि बेटे-बेटी तथा बहु को तो इस समय उनके साथ रहना था। गजाधर बायू को यह बात खटक गई लेकिन टालन के खयाल से उन्होंन पल्ली से कहा कि सब अपने-अपने काम मे लग गए हैं आखिर बच्चे ही हैं।

प्रश्न 12.
उन्हें अचानक ही गणेशी की याद आ गयी।
– रचनाकार कौन हैं ? किसे और क्यों अचानक गणेशी की याद आ गई है ?
उत्तर :
रचनाकार उषा प्रियंवदा हैं।
गजाधर बाबू घर लौटकर आए तो सब लोग उन्हे अकेला छोड़कर धीरे-धीरे खिसक गए। वे नाश्ता के लिए पत्ली के इंतजार में बेंठ रहें। तभी उन्हें गणेशी की याद आई जो रोज सुबह पैसंजर आने से पहले उनके नाश्ते के लिए गरमगरम पूड़ियाँ और जलेबी बनाता था। पैसेजर भले ही देर से पहुंचे लंकिन गणेशी के चाय लाने में कभी देरी नही होती थी !

प्रश्न 13.
गजाधर बाबू उस कमरे में, कभी-कभी अनायास ही, इस अस्थायित्व का अनुभव करने लगते।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत प्तक्ति उषा प्रिययंवदा की कहानी ‘वापसी’ से ली गई है।
गजाधर बाबू नौकरी के सिलसिले में पैतीस वर्षो तक घर से बाहर रहे । इस बीच घर में जितने भी कमरे थे, सयंन अपनी-अपनी जरूरत के अनुसार उसे व्यवस्थित कर लिया। किसी ने भी यह नहीं सीचा कि गजाधर बाबू आएं तां वे कहाँ रहेंगे। उनके लिए बैठक में कुर्सियों को दीवार से सटाकर बीच में बची जगह में पतली-सी चारपाई डाल दो गई थी। यह ऐसी व्यवस्था थी जो प्राय: कुछ दिनों के लिए मेहमान के लिए की जाती है। इसी कारण गजाधर बानू को उस कमरं में यह अनुभव होता था कि वे अस्थायी तौर से वहाँ टिके हैं।

प्रश्न 14.
सभी खर्च तो वाजिब-वाजिब हैं, किसका पेट कादूँ ?
अथवा
प्रश्न 15.
यही जोड़गांठ करते-करते बूढ़ी हो गयी, न मन का पहना, न ओढ़ा।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तूत प्तांक्त उषा प्रियंवदा को कहानी ‘वापसी’ से ली गई है।
गजाधर बाबू घर के रवैये तथा अनाप-शनाप खर्च को देख रहे थे। उन्होंने पत्नी से इसपर रोक लगाने की बात कही तो वह अपना ही खटराग लेकर बैठ गई कि सारं खर्च तो जरूरी ही है। इसी खर्चे के जोड़-घटाव मे वह जीवन में कभी अच्छा पहन-आंढ़ नहों सकी। इसी चक्कर में वह अपनन शौक को कभी पूरा न पाई और बूढ़ी हो गई।

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प्रश्न 16.
उनसे अपनी हैसियत छिपी न थी।
– किससे, किसकी हैसियत छिपी नहीं है? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पत्ली से गजाधर बावू की हैसियत छिपी न थी।
जब गजाधर बावृ ने पत्नी से घर का खर्च घटाने की बात कही तो पत्लो ने एसा रुखा-सूखा जबाब दिया जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी । वं यह भी जानते थं कि पल्नी से उनकी खर्च करने की हैंसयत नही हिदी है फिर ‘ी पल्नी का यह व्यवहार उन्हे बहुत खटका।

प्रश्न 17.
गजाधर बाबू को लगा कि पल्ली कुछ और बोलेगी तो उनके कान झनझना उठेंगे।
– रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
रचनाकार उया प्रयवंदा है।
घर खर्च घटाने के नाम पर गजाधर वाबू की पत्नी ने जो कुछ कहा उसमें उनके लिए सहानुर्भूति की एक बूँद तक नहीं थो। इनना ही नही, बहू ने रात में खाना बनाने में सामान की बर्बादी की अलग से। उसपर से पल्ली का यह ताना -जरा-सा टर्गे नही है, कमाने वाला हाड़ तांड़ और यहाँ चीजें लूटें। – सुनकर गजाधर को ऐसा लगा कि अगर पत्नी ने आगे कुछ और कहा तो उनके कान झनझना उठंगे।

प्रश्न 18.
मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता।
– ‘मैं’ से कौन संकेतित है ? वह कैसा खाना नहीं खा सकता ?
उत्तर :
में’ से गजाधर बाबू का बंटा नरंन्द्र संकेतित है।
गजाधर बायृ के कहन पर रात का भाजन उनकी बेटी बसन्तो ने बनाया था। खाना जान-बूझ़ कर खराब बनाया गया था ताकि आगें सं उसं काईं खाना बनाने को न बाले। कहा तो था गजाधर बानू नं इस्सलिए न चाहते हुए भी उन्होंने जैसेनैसं खाना खा लिया लंकिन नरेन्द्र ने यह कहकर थाली खिसका दो कि में एसं खाना नहीं खा सकता।

प्रश्न 19.
उस दिन के बाद बसंती पिता से बची-बची रहने लगी।
– पाठ का नाम लिखें। संदर्भित घटना का उल्लेख करें।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
बसंती अवसर पड़ांस की सहेलो शोला के यहाँ अपनी शाम गुजारती थी। उसके घर में बड़े-बड़े लड़के थे। यह बात गजाधर बाबृ को अच्छी नहों लगी। एक दिन शाम में उन्होंन बसंती को शोला के घर जाने से रोक दिया तथा घर में ही पढ़ने को कहा। बस बसंती को यह बात लग गई और उस दिन से वह गजाधर बाबू से बची-बची रहने लगी।

प्रश्न 20.
हमारे आने के पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी ?
– वक्ता कौन है ? वक्ता के ऐसा कहने का कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू है। एक दिन गजाधर बाबू की पली नताया कि उनका लड़का अमर अलग होना चाह रहा है। यद्धापि गजाघर बाबू के आने के पहले सब उसके साथ छाटे की ही तरह व्यवहार करते थे तथा उसकी पत्नी को भी आए दिन फूहड़पन के लिए ताने सुनने पड़ते थे फिर भी उसने कभी इन सब का विरोध नहीं किया था। गजाधर बाबू को ऐसा लगता है कि शायद उनकी वजह से अमर अलग होना चाहता है इसलिए वह पत्नी से पूछते हैं कि क्या उनके आने के पहले भी इस तरह की बात हुई थी ?

प्रश्न 21.
उन्हें लगा कि वे जिन्दगी द्वारा ठगे गये हैं।
अथवा
प्रश्न 22.
उन्होंने जो कुछ चाहा, उसमें से उन्हें एक बूँद भी न मिली।
– संदर्भित व्यक्ति कौन है ? उसे ऐसा क्यों लगता है ?
उत्तरं :
संदर्भित व्यक्ति गजाधर बाबू हैं।
गजाधर बाबू ने पैतीस वर्ष रेलवे क्वार्टर में इस आशा से काट लिए थे कि रिटायर होने के बाद वे परिवार के साथ खुशी-खुशी रहेंगे। लेकिन रिटायरमेंट के बाद घर लौटने पर अपने ही घर में अपनी ही पत्नी, बेटी तथा बेटे-बहू द्वारा उपेक्षा मिलने पर उन्हें निराशा हुई। उन्हें लगा कि जिन्दगी ने उन्हें ठग लिया है। जो उन्हॉने चाहा था उसकी एक यूँद भी उन्हें नसीब नहीं हुआ।

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प्रश्न 23.
यदि गृहस्वामी के लिए पूरे घर में एक चारपाई की जगह नहीं है, तो यहीं पड़े रहेंगे।
अथवा
प्रश्न 24.
अगर कहीं और डाल दी गयी तो वहाँ चले जाएँगे।
अथवा
प्रश्न 25.
यदि बच्चों कें नीवन में उनके लिए कहीं स्थान नहीं, तो अपने ही घर में परदेशी की तरह रहेंगे।
– संदर्भित व्यक्ति का नामोल्लेख करें। वह ऐसा क्यों सोचता है ?
उत्तर : संदर्भित व्यक्ति गजाधर बाबू हैं।
घर में हर तरह से अपने आप को उपेक्षित पाकर उन्होंने यह तय कर लिया कि यदि अपने ही घर में उनके लिए जगह नही है तो इसकी शिकायत किसी से नहीं करेंगे। वे अपने ही घर में परदेशी की तरह रहेंग। शायद उनकी किस्मत में ऐसे रहना ही बदा है।

प्रश्न 26.
वह मन ही मन कितना भार ढो रहे हैं, इससे वह अनजान ही बनी रहीं।
– ‘वह’ से कौन संकेतित है ? कौन, किसकी किस बात से अनजान है ?
उत्तर :
‘वह’ से गजाधर बाबू संकेतित हैं।
गजाधर बाबू की पत्नी ने भी अपने पति के व्यथा को समझने से इन्कार कर दिया था। ऐसी बात नही थी कि वह पति के दु:ख को नहीं समझ रही थी पर वह जान बूझकर इससे अनजान ही बनी रहीं। उन्हें भी बात-बात में पति का हस्तक्षेप बुरा लगता था क्योंकि सही बात में भी हस्तक्षेप करने से घर की शांति भंग होती थी।

प्रश्न 27.
उन्होंने अनुभव किया कि वह पत्नी व बच्चों के लिए केवल धनोपार्जन के निमित्त मात्र हैं।
– संदिर्भत व्यक्ति का नामोल्लेख करें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
संदर्भि्त व्यक्ति गजाधर बाबू हैं।
अपने ही घर में गजाधर बाबू उपेक्षितों-सा जीवन जी रहे थे। उन्हांने अपना सारा जीवन परिवार के लिए कुर्बान कर दिया लेकिन उनकी कोई कद्र न थी। उन्होंने इस बात को अच्छी तरह से अनुभव कर लिया कि घरवालों कां केवल उनके रुपये से मतलब है, उनसे नहीं।

प्रश्न 28.
गजाधर बाबू उनके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते।
– पाठ तथा रचनाकार का नाम लिखें। गजाधर बाबू किसके जीवन के केंद्र नहीं हो सकते ? क्यों ?
उत्तर :
पाठ ‘वापसी’ है तथा इसकी रचयिता उषा प्रियवदा हैं।
गजाधर बाबू अपनी पत्नी के जीवन के केंद्र नहीं हो सकते क्योंकि अब वे रिटायर हो चुके हैं। उनकी पत्नी ने बेटेबेटी तथा बहू के बीच ही अपनी जिंदगी बना ली है। वही उसकी दुनिया है तथा गजाधर बाबू अब केंद्र की परिधि से भी दूर हो गए हैं।

प्रश्न 29.
उनकी सारी खुशी एक गहरी उदासीनता में डूब गयी।
– ‘उनकी’ से किसकी ओर संकेत किया गया है? कौन-सी खुशी गहरी उदासीनता में डूब गयी?
उत्तर :
‘उनकी’ से गजाधर बाबू की ओर संकेत किया गया है।
गजाधर बाबू अपने ही घर में बेमल चीज की तरह उपक्षित हो गए थे। यहाँ तक कि पत्नी की ओर से भी उन्हे उपेक्षा ही मिली। यही कारण था कि वे अंदर ही अंदर दूट चुके थे। जिस खुशी के सपने को उन्होने पैंतीस वर्षों तक संजोया था उनकी वह खुशी गहरी उदासीनता में डूब गई।

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प्रश्न 30.
कहते हैं, खर्च बहुत है।
– वक्ता कौन है ? उसके ऐसा कहने का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू के बेंटे अमर को पत्नी है।
गजाधर बाबू ने रिटायरमेंट के बाद घर खर्च को नियंत्रित करने के लिए नौकर को जवाब दे दिया था। अमर के नौकर के वारे में पूछनन पर बहु ने जिस लहजे में यह वाक्य कहा उसने गजाधर बाबू के सीने में घाव कर दिया। इतना ही नहीं, अमर तथा बसंती ने घर के दूसरे काम को करने सं भी इंकार कर दिया, जो वे बखूबी कर सकते थे।

प्रश्न 31.
तो मुझसे यह नहीं होगा।
– वक्ता कौन है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू का बेटा अमर है।
गजाधर बाबू द्वारा नौकर हटा देने पर नरेन्द्र ने साफ-साफ शब्दों में माँ को अपना यह निर्णय सुना दिया – अगर बाबूजी यह समझं कि मैं साइकिल पर गहूँ रख आटा पिसाने जाऊँगा, तो यह मुझसे नहीं होगा।

प्रश्न 32.
यह मेरे बस की बात नहीं है।
– पाठ का नाम लिखें। कौन-सी बात किसके बस की नहीं है ? स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ ‘वापसी’ है।
गजाधर के द्वारा घर का खर्च घटाने के लिए नौकर हटा दिए जाने पर सब अपनी- अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। इसी क्रम मे बसंती भी कहती है कि वह कॉलेज भी जाए और फिर वहाँ से लौटकर घर में झाडू भी लगाए, तो यह उसके बस की यान नही है।

प्रश्न 33.
चुपचाप पड़े रहें। हर चीज में दखल क्यों देते हैं ?
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू का छोटा बेटा अमर है।
अमर हो चाहे नरेन्द्र, चाहे बसंती-किसी को भी किसी भी बात में गजाधर बाबू का हस्तक्षेप अच्छा नहीं लगता है। घर से नौकर हटा दिए जाने पर वह पिता पर भुनभुनाता हुआ साफ शब्दों में कह देता है कि वे घर मे चुपचाप पड़े रहें तथा घर की हर चीज में दखल देने की उनकी आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 34.
खाली बैठे रहने से तो चार पैसे घर में आयें, वही अच्छा है।
– वक्ता का नाम लिखें। वह ऐसा क्यों सोचता है ?
उत्तर :
वक्ता ‘वापसी’ कहानी के प्रमुख पात्र गजाधर बाबू हैं।
रिटायरमंट के बाद अपनी ही पत्नी, बेटी तथा बेटे- बहू से उपेक्षित होकर गजाधर बाबू पुनः कोई नौकरी करने की बात साचन हैं। इस सोच के मूल में चार पैंस कमाना नहीं है बल्कि वे इस घर से अपने-आपको दूर रखना चाहते हैं। अगर वे काई नौकरी कर लनन है तो इसी बहाने वे घर सं बाहर रह सकेंगे। उनका अपना ही यह घर अब उन्हें काट खाने को दौड़ता है।

प्रश्न 35.
तुम भी चलोगी ?
– वक्ता और श्रोता का नाम लिखें ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बायू हैं तथा श्रोता उनकी पत्नी है।
घर मे सबसं उप्षेक्षित होकर गजाधर बाबू पुनः सेठ रामजीमल की चीनी मिल में अपने लिए नौकरी तलाश लेते हैं। एक दिन के बाद उन्हे उस मिल की नौकरी पर जाना है इसलिए न चाहते हुए तथा यह जानते हुए भी कि पत्नी का उत्तर नकारात्मक होगा- एक बार वे पत्नी सं भी साथ चलने की बात कहते हैं। लेकिन पत्नी घर, गृहस्थी तथा जवान बेटी का बहाना बनाकर उनके साथ जाने सं इन्कार कर देती है।

प्रश्न 36.
मैंनें तो ऐसे ही कहा था।
– वक्ता और श्रोता का नाम लिखते हुए पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू हैं तथा श्रोता उनकी पत्नी है।
गजाधर बाबू घर के माहौल से उबकर सठठ रामजीमल की चौनी मिल में नौकरी करने का निर्णय लेते हैं। इसी बहाने वे घर से दूर तो रह सकेंगे। वे पत्नी से भो साथ चलने की बात करते हैं लेकिन वह इन्कार कर दंती है। गजाधर बाबू ज्ञानते थे कि उत्तर यही मिलेगा – और उत्तर भी यही मिलता है। हताशा में उनके मुँह से यही निकल पाता है – “ठोक है, तुम यहीं रहो। मैंन तो ऐसे ही कहा था।”

प्रश्न 37.
उसमें चलने तक की जगह नहीं है।
– पाठ का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
जब गजाधर बाबू घर से उपेक्षित होकर सेठ रामजीमल के चौनी मिल में नौकरी के लिए चले जाते हैं तो घर में सब नेन की साँस लते हैं। किसी को भी अपने व्यवहार तथा उनके लिए कोई दु ख नही होता है। और तो और उनकी पत्नी यो नरेन्द से कहती है कि बाबूजो को चारपाई कमरे से निकाल दे क्यांकि उसमें चलने तक की जगह नही है।

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प्रश्न 38.
बझी हुई आग में एक चिनगारी चमक उठी।
– यमंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
मनन्त गांक्त उषा प्रियवदा की कहानी ‘वापसी’ से ली गई है। हो गए। जब उन्होंने सेठ रामजामल क चोनी मिल मे नौकरी करने का निश्चय किसा तो सपने के वुझं हुए भाग में आशा की जो एक चिनगारी शेष थी – वह भी युझ गई, जब पत्नी ने उनके साथ जाने से इन्कार कर दिया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : उषा प्रियंवदा ने ‘वापसी’ कहानी में शहरी जीवन का यधार्थ चित्रण किया है – समीक्षा करें।
प्रश्न – 2 : ‘वापसी’ कहानी परम्परागत मानवीय संबंध के टूटने की कहानी है – अपने विचार लिखें।
प्रश्न – 3 : उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ में छठे और सातवें दशक के शहरी जीवन का संवेदनापूर्ण चित्रण किया गया है – समीक्षा करें।
प्रश्न-4 : ‘वापसी’ कहानी परिवार के टूटने की कहानी है – समीक्षा करें।
प्रश्न-5: ‘वापसी’ कहानी व्यक्ति के अकेलेपन से टूटने-बिखरने की कहानी है – समीक्षा करें।
प्रश्न-6: ‘वापसी’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
प्रश्न – 7 : ‘वापसी’ कहानी के माध्यम से उषा प्रियंवदा ने जो संदेश देना चाहा है उसे अपने शब्दों में त्बिें।
प्रश्न – 8: ‘वापसी’ के शीर्षक की सार्थकता पर अपने विचार लिखें।
उत्तर :
‘वापसी’ कहानी केवल कहानी नहीं, वह हर ऐसे इंसान की कहानी है जो अकेलेपन से दृटकर बिखरने वाला ही है। इस कहानी के गजाधर बालू भी इसी पीड़ा की दश को झेलनेवालों में से एक हैं –

बुझ जाए सरेशाम ही जैसे कोई चिराग़
वुुछ यूँ है शुरूआत मेरी दास्तान की।

गजाधर बाबू रेलवे की नौकरी में 35 वर्षो तक अकेलेपन से जूझते हैं ताकि रिटायर होने के बाद परिवार के साथ बाकी जिंदगी खुशी-खुशी बिता सकें। लेकिन रिटायर होकर घर आते ही उन्हें यह महसूस होता है कि जिंदगी ने उन्हे ठग लिया है। बेटे (अमर-नरेन्द्र) -बहू तथा बेटी (बसती) के उपेक्षापूर्ण रवैये से भीतर ही भीतर दूटने लगते हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि जिन लोगों की जिंदगो को बेहतर बनान के लिए उन्होंने अपनी खुशियों को कुर्बान कर दिया – यह उनकी सबसे बड़ी गलती हों गई। उनके रहने की व्यवस्था भी कुछ इस तरह की गई मानो वे अस्थायी मेहमान हो। रह-रहकर घरवालों द्वारा उनके बारे में जो कुछ कहा जाता है उनसे वे भौतर ही भीतर दूट-से जाते हैं –
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चुपचाप पड़े रहें। हर चीज में दखल क्यों देते हैं ?
अत में घर के उपेक्षापूर्ण रवैये से ऊबकर वे सेठ रामजीमल की चीनी मिल में नौकरी तलाश कर वहाँ जाने की तैयारी करते हैं। उन्हें सबसं बड़ा झटका तब लगता है जब पत्नी भी उनके साथ जाने से इंकार कर देती है – ‘ मैं चलूँगी तो यहाँ का क्या होगा ? इतनी बड़ी गृहस्थी, फिर सयानी लड़की पत्नी की इस बात से वे गहरा मौन धारण कर लेते हैं। यह वही पत्नी है, जिसकी यादों के सहारे उन्होंने अपने पैंतीस वर्ष रेलवे क्वार्टर में काट दिए और आज जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत गजाधर बाबू को है तो वह भी स्वार्थ के वशीभूत उनका साथ देने से इन्कार कर देती है –

तेरे इश्क में हमने दिल को जलाया।
कसम सर की तेरे, मजा कुछ न आया।

गजाधर बापू वापस चीनी मिल की नौकरी पर चले जाते हैं लेकिन हमारे लिए कुछ अनुत्तरित प्रश्न छांड़ जाते हैं –
क्या गजाधर बाबू के साथ घरवालों का यह व्यवहार उचित है ?
क्या माँ-बाबू बूढ़े होने के बाद बेकार की चीज हो जाते हैं ?
उन्होंने परिवार के लिए जीवन भर जो त्याग किया है उसकी कोई कीमत नहीं है ?
अगर हम अपने बड़ों से ऐसा व्यवहार करेंगे तो हमारे बच्चे हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे ?
इस प्रकार हम पातं हैं गजाधर बाबू की सारी पोड़ा, सारा अकेलापन, निराशा तथा जिंदगी द्वारा उगे जाने की सारी पोड़ाइस कहानी के शीर्षक ‘वापसी’ में ही निहित है। आखिर कबतक नई पीढ़ी केबल स्वार्थ और पैसों से ही रिश्ते को आंकतो रहंगी –

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 6 वापसी

दौलत भी आड़े आती है रिश्तों में,
अपनों से अपनों का रिश्ता दूट गया।

निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि उषा प्रियवंदा ने इस कहानी में शहरी जीवन में बढ़ती उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का चित्रण करने में अत्यंत गहरे यथार्थ बोध का परिचय दिया है।
प्रश्न – 9 : ‘वापसी’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
प्रश्न – 10 : ‘वापसी’ कहानी के जिस पात्र ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया हो उसकी चारित्रिक विशेषताओं को लिखें।
प्रश्न – 11: ‘वापसी’ कहानी के गजाधर बाबू का चरत्रि-चित्रण करें।
प्रश्न – 12: उन्हें लगा कि वे जिन्दगी द्वारा ठगे गए हैं। उन्होंने जो कुछ चाहा, उसमें से उन्हें एक बूँद भी न मिली – पंक्ति के आधार पर संदर्भित व्यक्ति का चरित्र-चित्रण करें।

प्रश्न – 13 :
यदि बच्चों के जीवन में उनके लिए कहीं स्थान नहीं, तो अपने ही घर में परदेशी की तरह रहेंगे – पंक्ति के आधार पर गजाधर बाबू का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर :
‘वापसी’ उषा प्रियंवदा की चर्चित कहानियों में से एक है। इस कहानी में वैसे तो अनेक पात्र है लेकिन इन सारे पात्रों में मुझे जिस चरित्र ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है – वह है गजाधर बाबू का चरित्र। बाकी सब चरित्र इनके चरित्र के आस-पास ही चक्कर काटते नज़र आते हैं। दर असल गजाधर बाबू का चरित्र ही समूची कहानी का केन्द्र बिन्दु है। गजाधर बाबू की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नांकित बिंदुओं के अंतर्गत देखा जा सकता है-

(क) सौम्य एवं सरल व्यक्तित्व :- गजाधर बाबू का व्यक्तित्व साधारण होते हुए भी आकर्षक है। वे स्वभाव से स्वय भी स्नही हैं तथा दूसरों से भी स्नंह की आकांक्षा रखते हैं। यही कारण है कि गणेशी बड़े भक्ति-भाव से उनकी सेवा में लगा रहता है तथा सेठ रामजीमल के मिल के भी कई कर्मचारी उन्हें फुरसत के समय में घंरे रहते हैं। रिटायर होकर घर लौटते समय गणेशी तो अपने आँसू भी नही रोक पाता – “‘ अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा ! आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।”

(ख) परिवार से गहरा लगाव रखने वाले :- भले ही गजाधर बाबू ने अपनी नौकरी का अधिकांश समय अकेले ही काटा हो लेकिन वे उस समय की कल्पना करते हैं जब परिवार के साथ रह सकेंगे। जब परिवार और पत्नी उनके साथ थी तो उन दिनों को याद कर उनके जीवन में गहरा सूनापन भर उठता है –

जब आती है तेरी याद कभी शाम के बाद
और भी बढ़ जाती है तड़पन शाम के बाद।

(ग) पत्नी से प्रेम करने वाले :- गजाधर बावू के मन में पत्नी के प्रति बड़ा ही प्रेम है। कवि-प्रकृति के न होने के बावजूद वे उन दिनों को याद करते हैं जब-स्टेशन से वापस आने पर गरम-गरम रोटियाँ सेंकती – उनके खा चुकने और मना करने पर भी थोड़ा-सा कुछ और थाली में परोस देती और बड़े प्यार से आमह करती। जब वह थके-हारे बाहर से आते तो पत्नी दरवाजे पर सलज्ज ऑखों से मुस्कुराते हुए उनका स्वागत करती थीं।

(घ) सांसारिक दृष्टि से सफल :- गजाधर बायू का जीवन सांसारिक दृटि से सफल कहा जा सकता है क्योंक अपनी कमाई से उन्होंन शहर में एक मकान बनवा लिया था, बड़े लड़के अमर और बड़ी लड़की कांति की शादियाँ कर दी थी। छोटा बेटा नरेन्द्र और बेटी बसंतो दोनों कॉलेज में पढ़ रहे थे।

(ङ) अपनी ही संतान से उपेक्षित :- गजाधर बाबू ने अपने जीवन की सारी कमाई परिवार की उन्नात के लिए लगा दी लंकिन रिटायर होकर घर वापस लौटने पर अपने ही बच्चों द्वारा उपक्षित होते हैं। फिर भी वे किसी के सामने शिकायत नहीं करते हैं और सारा दंश मन ही मन स्वय झलतं हैं क्योंकि शिकायत करना उनके स्वभाव में नहीं है। बल्कि वं ये तय कर लते है कि यदि बच्चों के जीवन में उनके लिए काई स्थान नहीं, तो अपन ही यर में परदेशी की तरह रहेंगे –

कभी एहसान का बदला माँगा नहीं करते
जैसे पेड़ साये का किराया माँगा नहीं करते।

ये वही संतान हैं जिन्होने कभी उनकी ऊॅगली पकड़कर चलना सीखा था। लंकिन अब स्थिरित बदल चुकी है है उसकी शर्त की ऊंगली पकड़ वे चलना है फिर उसवे बाद वो रस्ता बताने लगता है ।

(च) पत्नी से भी उपेक्षित :- एसा नहीं हैं कि केवल बच्चे ही गजाधर बाबू की उपक्षा करते हैं बल्कि पत्नी भी समय के साथ अपना रंग बदल लती है। जीवन की शुरू आत में वह गजाधर बाबू को काफी चाहती है, उनका ध्यान रखती है लेकिन आगे चलकर वह भी बेटे-बंटी तथा बहू के साथ मिलकर उनक साथ उपक्षापूर्ण रवैया अपना लेती है –
पत्नी ने बड़े व्यंग्य से कहा, “और कुछ नहीं, तो तुम्हारी बहू को चौके में भेज दिया।”
लेकिन लाईट जलाने पर सामने गजाधर बाबू को लेटे देख वह सिटपिटा जाती है क्योंकि गजाधर बाबू के सामने उसकी पोल खुल चुकी है।

(छ) पुनः वापसी के लिए विवश :- घर के उपक्षापूर्ण रवैये से गजाधर बाबू फिर घर से वापस जाने की सोच लते हैं। वे सेठ रामजीमल की चौनी मिल में नौकरी करना स्वीकार कर लेंत हैं। जब पत्नी से साथ चलन को कहते हैं तो वह भी घर-गृहस्थी संभालने का बहाना बनाकर साथ चलने से मना कर देती है। अंत में गजाधर बाबू अंकेल ही घर से नई नौकरी के लिए रवाना हो जाते हैं –

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चलने को चल रहा हूँ मगर जी उचट गया,
आधा सफर तो खाक उड़ाने में कट गया।

प्रश्न – 14 : गजाधर बाबू की पत्नी की चारित्रिक-विशेषताओं को लिखें।
प्रश्न – 15 : गजाधर बाबू की पत्नी का चरित्र-चित्रण करें।
प्रश्न – 16 : ‘बाबू जी की चारपाई कमरे से निकाल दे। उसमें चलने तक की जगह नहीं है – वक्ता का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर :
‘वापसी’ कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है। गजाधर बाबू के बाद प्रमुख पात्रों में उनकी पल्नी का ही स्थान है। कहानी के प्रारंभ से अंत तक वह किसी न किसी रूप मे उनसे जुड़ी रहती है। गजाधर बाबू की पत्नी की चारित्रिक विशेषताओं को इन शीर्षकों के अंतर्गत देखा जा सकता है –

(क) जीवन के शुरूआत में पति का ध्यान रखनेवाली :- गजाधर बाबू की पत्नी जब उनके साथ जीवन प्रारंभ करती है तो वह अपने व्यवहार से उनका दिल जीत लेती है –
“जब वह थके-हारे बाहर से आते, तो उनकी आहट पा वह रसोई से द्वार पर निकल आती और उसकी सलज्ज आँखें मुस्करा उठती।”

(ख) समय के साथ व्यवहार में परिवर्तन :- समय बीतने के साथ-साथ गजाधर बाबू की पत्नी के व्यवहार में परिवर्तन आता है तथा वह पति की बजाय बेटे की सुख-सुविधा का ध्यान रखती है। इतना ही नहीं, वह गजाधर बाबू की उपेक्षा भी करती है। गजाधर बाबू पत्नी में आए इस परिवर्तन को साफ-साफ महसूस करते हैं-
” यही थी क्या उनकी पत्नी, जिसके हायों के कोमल स्पर्श, जिसकी मुस्कान की याद में उन्होने सम्पूर्ण जीवन काट दिया था ? उन्हें लगा कि वह लावण्यमयी युवती जीवन की राह में कहीं खो गई और उसकी जगह आज जो स्त्री है, वह उनके मन और प्राणों के लिए नितांत अपरिचित है।”

(ग) पुत्रों को पति के खिलाफ भड़कानेवाली :- गजाधर बाबू की पत्नी न केवल पति की उपेक्षा करती है बल्कि पुत्रों को भी उनके विरूद्ध भड़काती है –
” और कुछ नहीं सूझा, तो तुम्हारी बहू को चौके में भेज दिया। वह गयी तो पन्द्रह दिन का राशन पाँच दिन में बनाकर रख दिया।”

(घ) पति का दर्द न समझने वाली :- गजाधर बाबू की पत्नी को अपने पति की आंतरिक पौड़ा से कोई लेनादेना नहीं है या फिर वह जान-वूझकर इससे अनजान बनी रहती है। गजाधर बालू भी उसके इस रवैये को साफ-साफ अनुभव करते हैं कि वे केवल पत्ली और बच्चों के लिए धन कमाने वाले साधन मात्र हैं तथा उनकी पीड़ा से किसी का कोई लना-देना नहीं है –
”जिस व्यक्ति के अस्तित्व से पत्नी माँग में सिन्दूर डालने की अधिकारी है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा है, उनके सामने वह दो वक्त भोजन की थाली रख देने से सारे कर्त्तव्यों से छुट्टी पा जाती है। वह घी और चीनी के डिब्बों में इतनी रमी हुई थी कि अब वही उनकी सम्पूर्ण दुनिया बन गयी है। गजाधर बाबू उनके जीवन के केन्द्र नहीं हो सकते थी।”

(ङ) गाढ़े समय में पति का साथ नहीं देनेवाली :- अपने ही घर के लोगों से उपेक्षित होकर गजाधर बाबू सेठ रामजीमल की चीनी-मिल में नौकरी करने का निश्चय करते हैं ताकि घर के इस विषाक्त माहौल से दूर रह सके। उन्हे लगता है कि पत्नी भी उनके साथ चलेगी लेकिन घर गृहस्थी का बहाना बनाकर पत्नी कन्नी काट जाती है –
“‘में चलूँगी तो यहाँ का क्या होगा? इतनी बड़ी गृहस्थी, फिर सयानी लड़की ……..”
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि गजाधर बाबू के दु:ख का कारण उनके स्वार्थी बच्चे तो हैं ही लेकिन इन सबके मूल में उनकी पल्नी ही है। यदि वह चाहती तो घर का माहौल बिगड़ने से रोक सकती थी तथा गजाधर बाबू को पीड़ा का यह दर्श नहीं झलना पड़ता। इसीलिए संस्कृत में कहा गया है –
“त्रियाचरित्रम, पुरूषस्य भाग्यं दैवो न जानति कुतो मनुष्यः ।”

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे?
– पाठ का नाम लिखें । वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है ।
वक्ता गणेशी और श्रोता गजाधर बाबू हैं।

प्रश्न 2.
अब आप लोग सहारा न देंगे, तो कौन देगा ?
– रचनाकार का नाम लिखें । यह कौन, किससे कह रहा है ?
उत्तर :
रचनाकार उषा प्रियंवदा हैं।
यह गणेशी गजाधर बाबू के कह रहा है ।

प्रश्न 3.
यह विछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठकर विलीन हो गया।
– कौन-सा विछोह दुर्बल लहर की तरह उठकर किसमें विलीन हो गया ?
उत्तर :
गणेशी का विछोह अपने परिवार के साथ रहने की खुशी में दुर्बल लहर की तरह विलीन हो गया।

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प्रश्न 4.
इसी आशा के सहारे वह अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे।
– पाठ का नाम लिखें । कौन, किस आशा के सहारे अपने अभाव का बोझ ढो रहे थे ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
गजाधर बाबू रिटायरमेंट के बाद पत्ली तथा बाल-बच्चों के साथ रहने की आशा के सहारे अपने अभाव का बोझ हो रहे थे ।

प्रश्न 5.
गजाधर बाबू स्वभाव से कैसे व्यक्ति थे ?
उत्तर :
गजाधर बालू ख्वभाव से सेही तथा दूसरों से भी सेह का आकांक्षा रखनेवाले व्यक्ति थे।

प्रश्न 6.
गजाधर बालू को तब हर छोटी बात याद आती और वह उदास हो उठते।
– गजाधर बाबू कौन-सी छोटी बात याद आने पर उदास हो जाते थे ?
उत्तर :
जब गजाधर बानू को अपने पत्नी के स्नेहपूर्ण व्यवहार, गरमा-गरम रोटियाँ खिलाना, आग्रह करके थोड़ा अधिक परोसना तथा आने पर दरवाजे पर सलज्ज आँखों से स्वागत करने की बात याद आती तो वे दुखी हो उठते थे।

प्रश्न 7.
अब कितने वर्षों बाद वह अवसर आया था ?
– किसके जीवन में कितने वर्षों बाद कौन-सा अवसर आया था ?
उत्तर :
गजाधर बाबू के जीवन में पैंतीस वर्षों के बाद अपने परिवार के बीच रहने का अवसर आया था।

प्रश्न 8.
उनके मन में थोड़ी-सी खिन्रता उपज आयी।
– यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है ? उनके मन में खिन्नता क्यों उपज आयी ?
उत्तर :
यहाँ गजाधर बाबू के बारे में कहा जा रहा है । वे जैसे ही घर पहुँचे मनोविनोद का वातावरण शांत हो गया तथा सबने घुप्पी साध ली । जबकि वे भी उनलोगों के मनोविनोद में शामिल होना बाह रहे थे । ऐसा न होने पर उनके मन में खिन्रता उपज आई ।

प्रश्न 9.
अरे आप अकेले बैठे हैं – ये सब कहाँ गए
– पाठ का नाम लिखें । ‘आप’ और ‘ये सब’ से कौन संकेतित हैं ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
‘आप’ से गजाधर बाबू तथा ‘ये सब’ से उनके बेटे-बहू तथा बेटी संकेतित हैं।

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प्रश्न 10.
संसार की दृष्टि से गजाधर बाबू का जीवन कैसे सफल कहा जा सकता था ?
उत्तर:
गजाधर बावू ने रेलवे की नौकरी से शहर में एक मकान बनवा लिया था, बड़े लड़के अमर और कांति की शादी तय कर दी थी तथा नरेन्द्र और बसंती ऊँची कक्षाओं में पढ़ रहे थे । मध्यम वर्ग की यही उपलब्धि बड़ी उपलब्धि होती है इसलिए सांसारिक दृष्टि से गजाधर बाबू का जीवन सफल कहा जा सकता था।

प्रश्न 11.
उन्हें अचानक ही गणेशी की याद आ गई ।
– ‘उन्हें’ शब्द किसके लिए आया है ? उन्हें गणेशी की याद क्यों आ गई ?
उत्तर :
उन्हें’ शब्द गजाधर बाबू के लिए आया है ।
घर पर वे चाय-नाश्ते का इंतजार कर रहे थे। नौकरी के दौरान गणेशी उन्हें सही समय पर चाय-नाश्ता दे दिया करता था जब्बकि यहाँ इतजार करना पड़ रहा था। यही कारण था कि उन्हें अचानक ही गणेशी की याद आ गई।

प्रश्न 12.
क्या मजाल कि कभी उससे कुछ कहना पड़े ?
– पाठ का नाम लिखें । पंक्ति का आशय स्पप्ट करें ।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘वापसी’ है।
गणेशी गजाधर बाबू के सारे काम बिल्कुल सही समय पर कर देता था। उसे याद दिलाने या कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

प्रश्न 13.
कोई जरा हाथ भी नहीं बँटाता ।
– वक्ता कौन है ? कौन किस काम में उसका हाथ नहीं बँटाता है ?
उत्तर :
वक्ता गजाधर वावू की पत्ली है । उसे रसोई का काम अकेले ही देखना पड़ता है। बहू और बेटी भी उसकी सहायता नहीं करती, उसे इसी बात का रोना है।

प्रश्न 14.
मना करूँ तो सुनती नहीं ।
– पाठ और लेखक का नाम लिखें । कौन, किसे, किस बात के लिए मना करने पर नहीं सुनता है ?
उत्तर :
पाठ ‘वापसी’ है तथा इसकी लेखिका उषा प्रियंवदा हैं।
गजाधर बाबू की लड़की बसंती पड़ोसिन तथा सहेली शीला के घर में घुसी रहती है। बड़े-बड़े लड़के भी उस घर में हैं इसलिए गजाधर बावू की पत्नी को यह अच्छा नहीं लगता । जब वह बसंती को मना करती है फिर भी उस पर बातों का असर नहीं होता।

प्रश्न 15.
उन्हें याद हो आती उन रेलगाड़ियों की ।
– किसे और क्यों रेलगाड़ी की याद हो आती है ?
उत्तर :
गजाधर बाबू जब अपने ही घर में अपना अस्थायी ठिकाना देखते हैं तो उन्हें उन रेलगाड़ियों की याद आती है जो कुछ देर स्टेशन पर रुककर अपने लक्ष्य की ओर चली जाती है। गजाधर बाबू की दशा भी इन रेलगाड़ियों की तरह ही है ।

प्रश्न 16.
वह एक दिन चटाई लेकर आ गयीं ।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। चटाई लेकर कौन और क्यों आया ?
उत्तर :
रचना ‘वापसी’ है तथा इसकी रचयिता उषा प्रियंवदा हैं।
चटाई लेकर गजाधर बानू की प्ली बैठठक में आई जहाँ उनकी चारपाई बिछी थी। पत्ली को जब भी घर-गृहस्थी की बाते या किसी की शिकायत करनी होती थी तो वह चटाई लेकर बैठक में आ जाती थीं।

प्रश्न 17.
यही थी क्या उनकी पत्नी ?
– कौन, किसकी पत्ली के बारे में सोच रहा है और क्यों ?
उत्तर :
गजाधर बाबू अपनी पत्ली के बारे में सोच रहे हैं।
गजाधर बाबू ने पाया कि उनकी पत्नी पहले वाली पत्नी नहीं रह गई है। न तो वह कोमल स्पर्श रहा, न वह मुस्कान जिसकी याद में उन्होंने रेलवे की नौकरी में पैतीस वर्ष काट दिए थे।

प्रश्न 18.
मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता ।
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
वक्ता गजाघर बायू का छोटा बेटा नरेन्द्र है। गजाधर बायू के कहने पर बसंती ने नाक-भौं सिकोड़कर खाना बनाया – वह भी ऐसा जो खाने के लायक नहीं था। इसलिए नरेन्द्र ने खाने से इन्कार कर दिया।

प्रश्न 19.
रूठी हुई है।
– कौन रूठी हुई है और क्यों ?
उत्तर :
गजाधर बाबू की बेटी बसंती रूठी हुई है क्योंकि उन्होंने उसे पड़ोस की शीला के घर जाने से मना किया था। शीला के घर में बड़े-बड़े लड़के थे इसालिए उसका वहाँ जाना गजाधर बाबू की पत्नी को भी अच्छा नहीं लगता था।

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प्रश्न 20.
जल्दबाजी की कोई जरूरत नहीं है।
– वक्ता का नाम लिखें। किस बात में किसे जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं की ब्ञात कही जा रही है ?
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू हैं।
अमर तथा उसकी प्नी गजाधर बाबू को घर में रहने तथा छोटी-छोटी बातों में हस्तक्षेप करना पसंद नहीं था। बैठक में गजाधर बाबू का खाट बिन्छ जाने के कारण ही अमर के मित्रों की अड्डुबाजी खत्म हो गयी थी। इन्हीं सब कारणों से वह घर से अलग होना चाहता था। इसपर गजाधर बाबू ने पल्नी से कहा कि उसे कहो कि अभी जल्दीबाजी करने की कोई जरूरत नहीं है ।

प्रश्न 21.
उन्हें लगा कि वे जिन्दगी द्वारा ठगे गए हैं ।
– पाठ और लेखक का नाम लिखें । किसे ऐसा लगता है और क्यों ?
उत्तर :
पाठ ‘वापसी’ है तथा इसकी लेखिका उषा प्रियंवदा हैं।
गजाधर बाबू को ऐसा लगता है कि वे जिंदगी द्वारा ठगे गए हैं क्योंकि पूरी जिंदगी उन्होंने जिस परिवार के लिए अकेलेपन में काट दी, आज उन्हीं के द्वारा वे उपेक्षित हो गए हैं।

प्रश्न 22.
उन्होंने जो कुछ चाहा, उसमें से उन्हें एक बूँद भी न मिली ।
– किसने, किससे क्या चाहा और उन्हें वह क्यों नहीं मिल पाया ?
उत्तर :
गजाधर बाबू ने रिटायर होने के बाद परिवार के साथ बाकी की जिंदगी गुजारनी चाही थी लेकिन बदले में उपेक्षा और प्रताड़ना ही मिली । उन्होंने जितना चाहा था उसका एक बूँद भी उन्हें नहीं मिल पाया। इसके पीछे कारण यह है कि उनके बेटे, बेटी, बहू और यहाँ तक कि उनकी पत्नी भी अपने स्वार्थ तथा मनमानी जिंदगी जीने की इच्छा के सामने उनकी उपेक्षा कर दी ।

प्रश्न 23.
उनकी सारी खुशी एक गहरी उदासीनता में डूब गई ।
– किनकी सारी खुशी गहरी उदासीनता में और क्यों डूब गई ?
उत्तर :
गजाधर बाबू की रिटायरमेंट के बाद पत्नी तथा बाल-बच्चों के साथ रहने की खुशी गहरी उदासीनता में डुब गई । घर में उनकी स्थिति ऐसे पुराने फर्नीचर की तरह हो गई थी कि उसे जहाँ भी रखो बेमेल ही नजर आता है । अपने ही घर में वे उपेक्षितों की तरह जीवन जीने को विवश हो गए थे तथा उन्होंने इस स्थिति की कभी कल्पना भी न की थी।

प्रश्न 24.
उन्होंने तो पहले ही कहा था, मैंने ही मना कर दिया था।
– किसने, किससे क्या कहा था और उन्होंने क्यों मना कर दिया था ?
उत्तर :
बाबू रामजीमल ने गजाधर बाबू से रिटायर होने के बाद अपने चीनी मिल की देखरेख करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया । उनकी सोच यह थी कि रिटायर होने के बाद की जिंदगी अपने भरे-पूरे परिवार के साथ हँसी-खुशी के साथ गुरारेंगे, जिसकी उम्मीद उन्होंने पैंतीस वर्षों से लगा रखी थी।

प्रश्न 25.
मैं चलूँगी तो यहाँ का क्या होगा?
– वक्ता कौन है ? ‘यहाँ का क्या होगा’ का आशय स्पष्ट करें ।
उत्तर :
वक्ता गजाधर बाबू की पत्नी है।
उसके कथन का आशय यह है कि घर में बेटे-बहू, तथा एक जवान बेटी है । यदि वह भी गजाधर बाबू के साथ चली जाएगी तो फिर इस घर तथा यहाँ के लोगों की देखभाल कौन करेगा। दरअसल वह भी अपने पति का साथ देना नहीं चाहती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
उषा प्रियंवदा का जन्म कब हुआ था ?
(क) 24 दिसम्बर सन् 1930
(ख) 20 जनवरी सन् 1925
(ग) 15 फरवरी सन् 1931
(घ) 24 मार्च सन् 1930
उत्तर :
(क) 24 दिसम्बर सन् 1930।

प्रश्न 2.
उषा प्रियंवदा का जन्म कहाँ हुआ था ?
(क) रायपुर
(ख) विलासपुर
(ग) कानपुर
(घ) जमालपुर
उत्तर :
(ग) कानपुर।

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प्रश्न 3.
‘वनवास’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) अरूण कमल
(ख) अज्ञेय
(ग) यशपाल
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(घ) उषा प्रियेंवदा।

प्रश्न 4.
‘कितना बड़ा झूठ’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) दिनकर
(ख) प्रेमचंद
(ग) उषा प्रियंवदा
(घ) अमृता प्रीतम
उत्तर :
(ग) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 5.
‘शून्य’ (कहानी-संग्रह) के रचयिता कौन हैं ?
(क) पाश
(ख) निराला
(ग) कैफी आज़मी
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(घ) उषा प्रियंवदा

प्रश्न 6.
‘जिंदगी और गुलाब के फूल’ (कहानी-संग्रह) के रचयिता कौन हैं ?
(क) उषा प्रियंवदा
(ख) प्रेमचंद
(ग) नागार्जुन
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(क) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 7.
‘एक कोई दूसरो’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) चेख़्रव
(ख) प्रेमचंद्
(ग) उषा प्रियंवदा
(घ) बंग महिला
उत्तर :
(ग) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 8.
मेरी प्रिय कहानियाँ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है ?
(क) उषा प्रियंवदा
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) अमृता प्रीतम
(घ) अरूण कमल
उत्तर :
(क) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 9.
‘संपूर्ण कहानियाँ (कहानी-संग्रह) किसकी कृति है ?
(क) महादेवी वर्मा
(ख) उषा प्रियवंदा
(ग) धर्मवोर भारती
(घ) हरिशंकर परसाई
उत्तर :
(ख) उषा प्रियवंदा।

प्रश्न 10.
‘रूकोगी नहीं राधिका’ (उपन्यास) के उपन्यासकार क्रौन हैं ?
(क) उषा प्रियंवदा
(ख) प्रेमचंद
(ग) शुकदेव प्रसाद
(घ) हरिशंकर परसाई
उत्तर :
(क) उषा प्रियवंदा।

प्रश्न 11.
‘शेष यात्रा’ (उपन्यास) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) अन्तो चेखव
(ख) कुँवर नारायण
(ग) उषा प्रियंवदा
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ग) उषा प्रियंवदा।

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प्रश्न 12.
‘पचपन खंभे लाल दीवारें’ (उपन्यास) के रचयिता कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) उषा प्रियंवदा
(ग) दिनकर
(घ) निराला
उत्तर :
(ख) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 13.
‘अंतर्वेशी’ (उपन्यास) किसकी कृति है ?
(क) निराला
(ख) प्रेमचंद
(ग) प्रसाद
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(घ) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 14.
‘भया कबीर उदास’ (उपन्यास) किसकी रचना है?
(क) चेख्रव
(ख) शुकदेव
(ग) अरूण कमल
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(घ) उषा प्रियंवदा।

प्रश्न 15.
‘वापसी’ कहानी के नायक निम्न में से कौन है ?
(क) गणेशी
(ख) गजाधर बाबू.
(ग) अमर
(घ) सेठ रामजीमल
उत्तर :
(ख) गजाधर बाबू।

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प्रश्न 16.
गजाधर बाबू को भेंट के तौर पर गणेशी ने क्या दिया ?
(क) कपड़े
(ख) बेसन के लडु
(ग) सत्तू.
(घ) जलेबी
उत्तर :
(ख) बेसन के लड़े।

प्रश्न 17.
गजाधर बाबू की नौकरी कहाँ थी ?
(क) रेलवे
(ख) बैंक
(ग) कचहरी
(घ) स्कूल
उत्तर :
(क) रेलवे।

प्रश्न 18.
गजाधर बाबू ने कितने वर्षों तक नौकरी की ?
(क) 30 वर्ष
(ख) पैतीस वर्ष
(ग) चालीस वर्ष
(घस) बीस वर्ष
उत्तर :
(ख) पैंतीस वर्ष।

प्रश्न 19.
गजाधर बाबू किस दिन रिटायर होकर घर लौटे ?
(क) सोमवार
(ख) बुधवार
(ग) शुकवार
(घ) इतवार
उत्तर :
(घ) इतवार।

प्रश्न 20.
गजाधर बाबू के बड़े बेटे का नाम क्या है ?
(क) गणेशी
(ख) अमर
(ग) नरेन्द्र
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) अमर।

प्रश्न 21.
गजाधर बाबू के छोटे बेटे का क्या नाम है ?
(क) अमर
(ख) नरेन्द्र
(ग) गणेशी
(घ) इनमें से कौन नहीं
उत्तर :
(ख) नरेन्द्र।

प्रश्न 22.
गजाधर बाबू की शादीशुदा (विवाहिता) बेटी का नाम क्या है ?
(क) बसंती
(ख) शांति
(ग) कांति
(घ) दीज्ति
उत्तर :
(ख) शांति।

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प्रश्न 23.
गजाधर बाबू की कुंवारी बेटी का नाम क्या है ?
(क) शांति
(ख) कांति
(ग) बसंती
(घ) इनमें से कोई नही
उत्तर :
(ग) बसंती।

प्रश्न 24.
गजाधर बाबू के कितने बेटे-बेटियाँ थीं ?
(क) दो बेटे दो बेटी
(ख) एक बेटा दो बेटी
(ग) दो बेटा तीन बेटी
(घ) एक बेटा एक बेटी
उस्तर :
(क) दो बेटे दो बेटी।

प्रश्न 25.
चाय-नाश्ते का इंतजार करते समय गजाधर बाबू को किसकी याद आई ?
(क) हलवाई की
(ख) पत्नी की
(ग) गणेशो की
(घ) बसंती की
उत्तर :
(ग) गणेशी की।

प्रश्न 26.
कोई जरा हाथ भी नहीं बँटाता-वक्ता कौन है ?
(क) गणेशी
(ख) गजाधर बाबू की पल्ली
(ग) बसंती
(घ) वह्
उत्तर :
(ख) गजाधर बाबू की पत्नी।

प्रश्न 27.
गजाधर बाबू किस रेलवे स्टेशन पर कार्यरत् थे?
(क) रानीपुर
(ख) बर्णपुर
(ग) गाजीपुर
(घ) रामपुर
उत्तर :
(क) रानीपुर।

प्रश्न 28.
शाम का खाना बनाने की जिम्मेवारी गजाधर बाबू ने किसे दी ?
(क) बसंती को
(ख) बहू को
(ग) कांति को
(घ) पत्नी को
उत्तर :
(क) बसंती को।

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प्रश्न 29.
गजायर बाबू का खाट घर में कहाँ लगाया गया ?
(क) बैठक में
(ख) बरामदे में
(ग) आँगन में
(घ) छत पर
उत्तर :
(क) बैठक में।

प्रश्न 30.
गजाधर बाबू को अपने कमरे में किसकी याद आती थी ?
(क) रेलगाड़ियों की
(ख) स्टेशन की
(ग) गणेशी की
(घ) पत्ली की
उत्तर :
(क) रेलगाडियों की।

प्रश्न 31.
मैं ऐसा खाना नहीं खा सकता – वक्ता कौन है ?
(क) अमर
(ख) नरेन्द्र
(ग) गजाधर बाबू
(घ) सेठ रामजीलाल
उत्तर :
(ख) नरेन्द्र।

प्रश्न 32.
हमारे आने के पहले भी कभी ऐसी बात हुई थी ? – वक्ता कौन है ?
(क) गजाधर बाबू
(ख) नेरन्द्र
(ग) अमर
(घ) पत्नी
उत्तर :
(क) गजाधर बाबू।

प्रश्न 33.
‘वापसी’ कहानी में किसे लगता है कि वह जिंदगी द्वारा ठगा गया है ?
(क) अमर
(ख) नरेन्द्र
(ग) नौकर
(घ) गजाधर बालू
उत्तर :
(घ) गजाधर बाबू।

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प्रश्न 34.
गजाधर बाबू किसके जीवन के केन्द्र नहीं बन सकते ?
(क) पत्नी
(ख) बेटे
(ग) बेटी
(घ) बहू
उत्तर :
(क) पत्नी।

प्रश्न 35.
किसकी उपस्थिति घर में असंगत लगने लगी थी ?
(क) नरेन्द्र
(ख) अमर
(ग) नौकर
(घ) गजाधर बाबू.
उत्तर :
(घ) गजाधर बाबू।

प्रश्न 36.
गजाधर बाबू को बहू की कौन-सी बात खटक गई ?
(क) बायू जी ने नौकर छुड़ा दिया है।
(ख) कहते हैं खर्च बहुत है।
(ग) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) कहते हैं खर्च बहुत है।

प्रश्न 37.
यह मेरे बस की बात नहीं है – वक्ता कौन है ?
(क) नरेन्द्र
(ख) नौकर
(ग) बसंती
(घ) अमर
उत्तर :
(ग) बसंती।

प्रश्न 38.
खाली बैठे रहने से तो चार पैसे घर में आयें – वक्ता कौन है ?
(क) गजाधर बाबू
(ख) नरेन्द्र
(ग) पत्नी
(घ) बहू
उत्तर :
(क) गजाधर बाबू।

प्रश्न 39.
गजाधर बाबू के लिए चिट्ठी कहाँ से आई थी ?
(क) रेलवे से
(ख) बैंक से
(ग) चीनी मिल से
(घ) तेल मिल से
उत्तर :
(ग) चीनी मिल से।

प्रश्न 40.
मैंने तो ऐसे ही कहा था – वक्ता कौन है ?
(क) नरेन्द्र
(ख) बसंती
(ग) पत्नी
(घ) गजाधर बायू
उत्तर :
(घ) गजाधर बाबू।

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प्रश्न 41.
ठीक है तुम यहीं रहो – वक्ता कौन है ?
(क) गजाधर बाबू
(ख) नरेन्द्र
(ग) अमर
(घ) पत्नी
उत्तर :
(क) गजाधर बाबू।

प्रश्न 42.
तुम भी चलोगी ? — वक्ता कौन है ?
(क) बसंती
(ख) बहू
(ग) अमर
(घ) गजाधर बाबू
उत्तर :
(घ) गजाधर बाबू।

प्रश्न 43.
खैर परसों जाना है — वक्ता कौन है ?
(क) गणेशी
(ख) गजाधर बाबू
(ग) अमर
(घ) कांति
उत्तर :
(ख) गजाधर बाबू।

टिप्पणियाँ

1. रिटायर (अवकाश) :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
सरकारी या अर्द्धसरकारी नौकरी में जिस प्रकार नौकरी पाने के लिए न्यूनतम उम्म 18 साल होती है उसी प्रकार 60 वर्ष उम्र हो जाने के बाद व्यक्ति को नौकरी से रिटायर कर दिया जाता है। रिटायर को हिन्दी में अवकाश माप्त करना भी कहते हैं।

2. रेलवे क्वार्टर :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
भारतीय रेलवे का जाल पूरेरे भारतवर्ष में फेला हुआ है। इसमें काम करनेवालों का ट्रांसफर भी होता रहता है। ऐसे में आवास की व्यवस्था करना एक बड़ी समस्या बन जाती है । इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय रेलवे अपने कर्मचारियों के लिए स्टेशन के आसपास ही उनके रहने की व्यवस्था उनके पद के अनुसार करती है। जिस मकान में उनके रहने की व्यवस्था की जाती है, वह रेलवे क्वार्टर कहलाता है।

3. तुलसी :- प्रत्तुत शब्द उषा पियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
तुलसी एक छोटा-सा औषधि के गुणों से युक्त पौधा होता है । इसे अत्यंत पवि्र माना जाता है तथा हिन्दू इसका व्यवहार पूजा-पाठ में करते हैं। इसका पौधा आँगन में लगाया जाता है। प्रात काल इसमें जल घढ़ाते और सायंकाल इसके नीचे दिया जलाते हैं।
पुराणों की कथा के अनुसार तुलसी का एक नाम वृन्दा है । अपने पतिव्वता धर्म के कारण विष्णु के लिए भी वंदनीय थी। इसी वृन्दा के नाम पर श्रीकृष्ण की लीलाभूमि का नाम वृंदावन पड़ा।

4. फिल्म :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
आज से लगभग सौ साल पहले 3 मई, 1913 ई० को दादा साहब फाल्के ने पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी । तब से अब तक भारतीय सिनेमा ने एक लंबी यात्रा तय की है। मूक फिल्मों से शुरू होकर यह मल्टीप्लैक्स तक पहुँच गया है । विषय-वस्तु तथा टेक्नीक की दृष्टि से आज की फिल्में न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गई है।

5. हैसियत :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
किसी भी व्यक्ति के पास जो चल-अचल संपत्ति तथा आय का सोत होता है वही उस व्यक्ति की हैसियत होती है। अपनी हैसियत से आगे बढ़कर खर्च करना व्यक्ति के दु ख का कारण होता है।

6. परदेशी :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
अपने देश या स्थान को छोड़कर जो दूसरी स्थान पर जाता या बस जाता है, वह परदेशी अर्थात् दूसरे देश का कहलाता है । अपना देश सभी को स्वर्ग से भी ज्यादा प्यारा होता है क्योंकि परदेश में वह स्नेह और आत्मीयतावाला व्यवहार नहीं मिलता जो अपने देश में मिलता है।

7. साइकिल :- प्रस्तुत शब्द उपा प्रियंयदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
दोपहिया वाहन साइकिल का प्रचन 19 वीं शताब्दी में यूरोप में आरंभ हुआ । इस समय पूरे विश्व में लगभग दस करोड़ सायकिलें हैं। चौन और नीदरलैण्ड आदि देशों में साइकिल आवागमन का मुख्य साधन है । संस्कृति तथा उद्योग दोनों पर इसका प्रभाव पड़ा है ।

8. रिक्शा :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंबदा की कहानी ‘वाषसी’ से लिया गया है ।
रिक्शा एक तीन पहिया वाला वाहन आवागमन का सस्ता साधन है, जिसे साइकिल की तरह पैडल मारकर चलाया जाता है । अभी कई देशों में इसपर प्रतिबंध लगाया गया है तथा इसके स्थान पर ऑटो रिक्शा का प्रचलन बढ़ रहा है।

9. परिवार :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
साधारण परिवार का अर्थ होता है जिसमें माँ-बाप और बच्चे हों । संयुक्त परिवार में एक साथ दो या तीन पीढ़ी के लोग रहते हैं। भारतीय परिमेक्ष्य में एकल परिवार का प्रचलन बढ़ रहा है।

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10. पैसेन्जर ट्रेन :- प्रस्तुत शब्द उषा प्रियवंदा की कहानी ‘वापसी’ से लिया गया है।
19वर्वीं शताब्दी में पैसेंजर ट्रेन का अविष्कार हुआ। 19 वीं शताब्दी के मध्य तक पैसेंजर ट्रेन के बॉगी लकड़ी से बने होते थे। पैसेंजर ट्रेन लम्बी दूरी के बजाय कम दूरी तय करते है क्योंकि इन्हें हर हॉल्ट या स्टेशन पर रुकना होता है। इसमें प्राय: वैसे लोग यात्रा करते हैं जो अपनी नौकरी या व्यवसाय के सिलसिले में एक छोटी निश्चित दूरी तक रोज आना-जाना करते हैं।

पाठ्याधारित व्याकरण

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WBBSE Class 9 Hindi वापसी Summary

उषा प्रियंवदा (जन्म 24 दिसम्बर 1930) प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं । कानपुर में जन्मी उषा प्रियंवदा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. तथा पी-एच. डो. की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। इसी समय उन्हें फुलब्राइट स्कालरशिप मिली और वे अमरीका चली गई ।

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अमरीका के ब्लूमिंगटन, इंडियाना में दो वर्ष पोस्ट डाक्टरेट अध्ययन की और 1964 में विस्कांसिन विश्वविद्यालय, मैडिसन में दक्षिण एशियाई विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्य प्रारंभ किया। आजकल वे सेवानिवृत्त होकर लेखन और भ्रमण कर रही हैं । उषा प्रियंवदा के कथा साहित्य में छठे और सातवें दशक के शहरी परिवारों का संवेदनापूर्ण चित्रण मिलता है । उस समय शहरी जीवन में बढ़ती उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का अंकन करने में उन्होंने अत्यंत गहरे यथार्थबोध का परिचय दिया है ।

प्रमुख कृतियाँ :-
कहानी-संग्रह : वनवास, कितना बड़ा झूठ, शून्य, जिन्दगी और गुलाब के फूल, एक कोई दूसरा, मेरी प्रिय कहानियाँ, संपूर्ण कहानियाँ।
उपन्यास : रुकोगी नहीं राधिका, शेष यात्रा, पचपन खंभे लाल दीवारें, अंतर्वेशी, भया कबीर उदास।

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 65

  • खातिर = स्वागत, आदर ।
  • विषाद = दु ख ।
  • सहज = आसान, जहाँ कोई बनावटीपन न हो ।
  • अगहन = अग्रहन, हिंदी का एक महीना ।
  • हौसला = साहस, हिम्मत ।
  • अँगोछे = गमछा ।

पृष्ठ सं० – 66

  • विछोह = वियोग, बिछडड़ना ।
  • दुर्बल = कमजोर ।
  • विलीन = गायब ।
  • रिटायर = सेवानिवृत्त ।
  • स्नेही = प्रेमी ।
  • आकांक्षी = इच्छा रखनेवाले ।
  • मनोविनोद = मनोरंजन ।
  • गहन = गहरा ।
  • कवि-प्रकृति = कवि की तरह स्वभाव ।
  • सेहपूर्ण = प्रेम से भरी ।
  • आग्रह = अनुरोध, विनती ।
  • सलज्जा = लज्जा से भरी।
  • कहकहों = हँसी ।
  • गत = पिछला।
  • दुहरी = लोट-पोट।
  • उन्मुक्त = खुलकर ।

पृष्ठ सं० -67

  • झट = तुरंत ।
  • सिटपिटाकर = सकपकाकर ।
  • खिन्नता = कोध ।
  • लिहाज = सम्मान।
  • अर्ध्य = जल, जो किसी को अर्षण किया जाता है ।
  • स्तुति = मंत्रपाठ।
  • चौके = रसोई घर ।
  • लबालब = पूरा-पूरा भरा हुआ ।
  • मजाल = हिम्मत, गुस्ताखी ।
  • व्याघात = रुकावट ।
  • हाथ बँटाना = सहयोग, मदद करना ।

पृष्ठ सं० – 68

  • जी न लगना = मन न लगना ।
  • फुरसत = छुट्टी, अवकाश ।
  • सुहाता = अच्छा लगता ।
  • अनायास = अचानक
  • मर्तवान = शीशे का बर्तन ।
  • अलगनी = कपड़े फैलाने की रस्सी ।
  • लापरवाही = बिना किसी के परवाह के ।
  • भरसक = कोशिश भर ।
  • कुशन = रवैया = चाल-चलन ।

पृष्ठ सं – 69

  • वाजिब = सही, जायज ।
  • जोड़गांठ = जोड़ घटाव ।
  • मन का = पसंद का ।
  • आहत = दुखी ।
  • विस्मित = आश्चर्यवकित।
  • हैसियत = औकात ।
  • तंगी = अभाव mid
  • आन्तरिक = हदय की ।
  • लावप्यमयी = तोखे नैनन-नक्शवाली, नमकीन ।
  • नितान्त = बिस्कुल ।
  • अपरिचित = बिना जान-पहचान के ।
  • कुरूप = भद्दा ।
  • श्रीहीन = सौदर्य से हीन ।
  • निस्संग = अकेला ।
  • पतीली = एक बर्त्तन जो पीतल का बना होता है, देगची ।
  • हाड़ = हड्डु ।
  • भींच = कस ।
  • तुनककर = चिढ़कर ।
  • शऊर = अक्ल।

पृष्ठ सं – 70

  • मुँह लपेटे = मुँह ढके, मुँह फुलाए ।
  • पिछवाड़े = मकान का पिछला हिस्सा ।
  • रोष = कोध ।
  • बेमौके = बिना मौके के ।

पृष्ठ सं – 71

  • चारपाई = खाट, खटिया ।
  • चिरपरिचित = लंबे समय से पहचाना हुआ ।
  • निधि = खजाना, धरोहर।
  • दायरा = सीमित स्थान ।
  • विविध = अनेक ।
  • झड़प = झगड़ा ।
  • गौरैयों = एक प्रकार की चिड़िया जो घरों में ही अक्सर अपना घोसला बनाती है ।
  • गम = दुख ।
  • लक्ष्य = गोल ।
  • आहत = घायल, दुखी ।
  • धनोपार्जन = धन का उपार्जन (कमाना) ।
  • निमिन्त = साधन ।

पृष्ठ सं – 72

  • वार्तालाप = बातचीत ।
  • टोन = लहजे, स्वर ।
  • खटक = बुरा ।
  • भुनभुनाना = अपने-आप से बालना।
  • सिटपिटायी = झेंप गई मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो।
  • मुख-मुद्रा = चेहरे का भाव।
  • अवकाश = छुट्टी, सेवानिवृत ।

पृष्ठ सं – 73

  • सयानी = जवान ।
  • हताश = निराश ।
  • मौन = चुप्पी ।
  • मठरी = मैदे से बनी नमकीन जो आकार में गोल होती है :

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न 1.
शब्द किसे कहते हैं ?
उत्तरः
ध्वनियों के ऐसे समूह को शब्द कहते हैं जिससे काई अर्थ व्यक्त होता हो। अर्थ ही शंब्द का प्रधान लक्षण है। जिस ध्वान-समूह से कोई अर्थ नहीं निकलता, वह ध्वनि-समूह शब्द नहीं है। उदाहरणतः क, म, ल, ध्वानियाँ हैं जिनका अपने आप में काई अर्थ नहीं है। किन्तु इन तीनों का मिलाकर कमल ध्वनि-समूह बनता है जिसका एक अर्थ होंता है। अत ‘कमल ध्वान-समूह एक शब्द हुआ। पर ‘मकल’ ध्वनि समूह शब्द नहीं हैं, क्योंकि इसका कोई अर्थ नहीं है। अतः सार्थक ध्वनि समूह ही शब्द है।

भाषा की सरलतम, सार्थक और लघुतम इकाई शब्द है। शब्द के अभाव में वाक्य की रचना ही संभव नहीं। भाषा रूपी वृक्ष का मूल शब्द ही है। शब्द किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति, भाव, विचार आदि का प्रतीक है और इस कारण अंकला शब्द भी कभी-कभी हमारा आशय प्रकट कर देता है, जैसे – ‘आओ’, रुको’।

प्रश्न 2.
अर्थ की दृष्टि से शब्दों के कितने भेद हैं ?
उत्तरः
अर्थ की दृष्टि से शब्दों के दो भेद हैं :-
(क) सार्थक शब्द :-जिन शब्दों से किसी अर्थ का बोध होता है, उन्हें सार्थक शब्द कहते हैं। जैसे – वृक्ष, आकाश, पुस्तक, गाड़ी आदि।
(ख) निरर्थक शब्द :-जिन शब्दों से किसी अर्थ का बोध नहीं होता है, उन्हें निरर्थक शब्द कहते हैं। जैसे – चक, फुथ आदि

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

प्रश्न 3.
उत्पत्ति या व्यवहार (प्रयोग) के विचार से हिन्दी के शब्दों को कितने वर्गों में बाँटा गया है?
उत्तरः
दो वर्गों में :-
(क) भारतीय मूल के शब्द या देशज शब्द
(ख) विदेशी मूल के शब्द या विदेशज शब्द

प्रश्न 4.
भारतीय मूल के शब्दों को कितने वर्गों में बाँटा गया है ?
उत्तरः
भारतीय मूल के शब्दों को चार वर्गो में बाँटा गया है –
(क) तत्सम्
(ख) अर्द्धतत्सम्
(ग) तद्भव
(घ) देशज।

प्रश्न 5.
व्युत्पत्ति किसे कहते हैं ?
उत्तरः
किसी शब्द के मूल रूप से अन्य नए शब्द बनाने की प्रक्रिया व्युत्पत्ति कहलाती है।

प्रश्न 6.
व्युत्पत्ति की दृष्टि से शब्द कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तरः
व्युत्पत्ति की दृष्टि से शब्द तीन प्रकार के होंते हैं –
(क) रूढ़ शब्द
(ख) यौगिक शब्द
(ग) योगरूढ़ शब्द

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

प्रश्न 7.
रूपान्तर की दृष्टि से शब्द कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तरः
रूपान्तर की दृष्टि से शब्द दो प्रकार के होते हैं :-
(क) विकारी शब्द,
(ख) अविकारी शब्द

प्रश्न 8.
विकारी शब्द कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तरः
विकारी शब्द चार प्रकार के होंते हैं :-
(क) संज्ञा
(ख) सर्वनाम
(ग) विशेषण
(घ) क्रिया।

प्रश्न 9.
अविकारी शब्द कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तरः
अविकारी शब्द चार प्रकार के हांत हैं :-
(क) क्रिया-विशेषण
(ख) संबंधसृचक
(ग) समुन्चबांधक
(घ) विस्मयादिबांधक

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

प्रश्न 10.
शब्दों का क्या महत्व है ?
उत्तरः
शब्द भाषारूपी भवन के लिए ईंटों का काम करते हैं। शब्दों से ही वाक्य बनते है जो अपन अभीप्ट अर्थ को प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 11.
शब्द-भंडार किसे कहते हैं ?
उत्तरः
किसी भी भाषा में समय के साथ-साथ नए-नए शब्दों का समावश होता जाता है तथा अनुपयांगी शब्ध लुप्त हांते जाते है। जैसं आजकल केप्यूटर, टी वी , दूरदर्शन, इलैक्ग्रानिक मीडिया, चैनल, आदि नए शब्ध जुडतं जा रहं है, जबकि संर, छटाँक जैसे पुरान शब्द अब प्रचलन में नहीं हैं तथा लुप्त होंत जा रहे हैं। भापा में प्रयुक्त शब्ब-समूह का शब्द-भंडार कहते हैं।

प्रश्न 12.
संकर शब्द से आप क्या समझते हैं ?
उत्तरः
दो भिन्न भाषाओं के शब्दों को मिलाकर जो नया शब्द बनता है, उसं ‘संकर शब्द’ कहते हैं। हिन्दो में कुद्ध प्रचलित संकर शब्द निम्नलिखित हैं –
(क) हिन्दी और संस्कृत – वर्षगाँठ, कपडा-उद्यांग, पूँजोर्पति, माँगपत्र।
(ख) हिन्दी और अरबी/फारसी – थानंदार, घडीसाज, कितायघर, बैठकबाज।
(ग) संस्कृत और अंग्रेजी – रोडियोतरंग, रेलयाज्री, याजना-कमीशन।
(घ) अरबी-फारसी और अंग्रेजो – बीमापोंलिसी, पार्टीबाजो, अफसरशाही।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

प्रश्न 13.
निम्नांकित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें :-
(क) तत्सम् शब्द
(ख) अर्द्धतत्सम् शब्द
(ग) परंपरागत तत्सम् शब्द
(घ) तद्भव शब्द
(ङ) देशज शब्द
(च) आगत शब्द
(छ) संकर शब्द
(ज) रूढ़ शब्द
(झ) यौगिक शब्द
(अ) योगरूढ़ शब्द
(त) विकारी शब्द
(थ) अविकारी शब्द।
उत्तरः
तत्सम शब्द : तत्सम (तत् + सम) शब्द का अर्थ है उसके समान। किसी भाषा में जब दूसरी भाषा या भाषाओं के शब्द ज्यों के त्यों अपने शुद्ध रूप में सम्मिलित कर लिए जाते हैं, तब वे तत्सम शब्द कहलांत हैं। इस आधार पर हिन्दी मे प्रयुक्त अन्य भापाओं के शब्द भी अगर मूल रूप में आ गये हैं तो उन्हें तत्सम कहना चाहिए। किन्नु हिन्दी में केवल संस्कृत भाषा के शब्दों को तत्सम’ शब्द कहा जाता है। यही परम्परा है और हिन्दो को संस्कृत को पुन्री: कहा जाता है।

हिन्दी में प्रयुक्त तत्सम शब्दों के कुछ उदाहरण –
अग्न, पुष्ष, कार्य, हस्त, प्रन्थ, यात्रा, काव्य, वत्स, चूर्ण, कृष्ण, अक्ष, अक्षर , कृपा, मयृर, शत्माका पुग्य सत्य, आकाश, रावि, सूर्य, भानु, चन्द्र, शाश, जल, वायु, समीर, जीवन, मरण, मृत्यु, बाल वुद चि प्रातः, उषा, कन्या, पुत्र, सुत, सुता, व्याघ्र, सिंह, काक, पिक, वसन्न, हैमन्त, सुख-दुःख, दिवम गत्र मना पन्न देवता, ईश, ईश्वर आदि।

अर्द्धतत्सम शब्द :- जिन तत्सम शब्दों का स्वरूप किंचित परिवर्तन के साथ हिन्दों मे प्रयुक्त हा रहा है , वे अर्द्ध तत्सम शब्द् कहलाते है. जैसे : कर्म – ‘करम’। कृष्ण – ‘किशुन’
अन्य उदाहरण :-
WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण 1

परम्परागत तत्सम :- ऐसे शब्द संस्कृत साहित्य से लिये गये हैं। आकाश, सूर्य, चन्द्र, लता, मुख आदि अपने वास्तविक रूप में (मूल रूप में) प्रचलित हैं। निर्मित तत्सम शब्द वे शब्द है जो संस्कृत व्याकरण के आधार पर आर्धुनिक विचारों और व्यापारों को व्यक्त करने के लिए गढ़े जाते हैं, जैसे-आकाशवाणी, दूरदर्शन, वायुयान आदि

तद्भव शब्द :- ऐसे शब्द जो संस्कृत और प्राकृत से होते हुए हिन्दी में परिवर्तित रूप मे प्रयुक्त होते हैं, तद्भव कहलाते हैं, जैसे – आँख, बाघ, साँप, रात, मोद, साँझ, गागर, काम, आग, बच्चा आदि।

तत्सम से तदीभव के उदाहरण
WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण 2

देशज (देशी) (मॉडल प्रश्न – 2011) :- देशज शब्दों की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ पता नहीं है। बहुधा ये लोकभाषाओं और बोलियों के शब्द हैं, जो आंचलिक क्षेत्रों में बोली गई बोलियों से हिन्दी में सम्मिलित कर लिये गये हैं।
उदाहरण :-

  • भिखारियों को खिचड़ी खिलाओ।
  • उसने वह डिबिया खो दी।
  • हम कबड्डी खेलेंग।
  • झाड् से कमरे की फर्श झाड़ दो।
  • तुमने खिड़की से क्या देखा ?

उपर्युक्त वाक्यों में प्रयुक्त खिचड़ी, डिबिया, कबड्डी, झाड् और खिड़की के अतिरिक्त तेंदुआ, चिड़िया, कटोरा, चसक, जूता, कलाई, फुनगी, पगड़ी, लोटा, डोंगा आदि शब्द देशज शब्द हैं।

आगत (विदेशी शब्द या प्रतिवेशी शब्द) :- हिन्दी भाषा में विदेशी भाषाओं से आये शब्द विदेशी शब्द’ कहलाते हैं। इनमें फारसी, अरबी, तुर्की, अगरेजी, पुर्तगाली और फ्रांसीसी भाषाएँ मुख्य हैं। हिन्दी में उनका प्रयोग कुछ अपने मूल रूप में और कुछ सामान्य परिवर्तन के साथ किया जाता है।
कुछ विदेशी शब्द प्रस्तुत हैं-
अंग्रेजी शब्द :- टेबुल, स्टेशन, अफसर, अपील, आर्डर, इंजन, इंच, एजेन्सी, कम्पनी, कमिश्नर, कमीशन, कैम्प, क्लास, फोर्स, कोर्ट, क्वार्टर, किकेट, गार्ड, गजट, जेलर, जेल, डायरी, डिप्टी, डिस्ट्रिक्ट, ड्राइवर, टचूशन, टीचर, पेन, टिकट, नोटिस, नर्स, नम्बर, पार्टी, पार्सल, प्लेट, पाउडर, मीटिंग, बोतल, मील, थियेटर, मेम्बर, फेल, पास, चेयरमैन, काउन्सिल, थर्मामीटर, दिसम्बर, पेट्रोल, कलक्टर, फाउन्टेन पेन आदि।
कुछ अधिक परिवर्तन के साथ प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों के उदाहरण
सिलेट, कप्तान, टिकस, लालटेन, अस्पताल, गिलास, थेटर, सिनेमा आदि।

अरबी शब्द :- अक्ल, अखबार, अख्तियार, अजब, अजल, अजान, अजायब, अजीज, अजीब, अजूबा, काफिला, अत्तार, अदद, अदना, अदब, अदा, अदालत, अदालती, अदावत, अफववाह, अबीर, अमन, अमीन, अमीर, अमीराना, अमीरी, अरबी, चिक्कारना, अलगरज़ी।

फारसी शब्द :- अंगूर, अंगूरी, अंजाम, अंजुमन, अंदरूनी, फीता, अंदाज, अंदाज़न, अंदेशा, अंबार, अंजीर, अचार, मेज, अजनबी, अगर-मगर, बगल, अफसोस, अमानत, अमानी, अयाल, अरमान, अर्ज़ी, अस्तबल, अस्तर, लगाम-गज, आईन, आईना, आगोश, आजमाइश, आज़माना, लबादा, आज़ूदा, आज़ाद, आज़ादी, आतिश, आतिशी, शीशा, कारबारी, कारबार, कारनामा, साया।

तुर्की शब्द :- उर्दू, कैंची, कैंचा, कुली, चकमक, तमगा, तलाश, तोप, बेगम, कुरता, काबू, चिक, जाजम, मुगल, मुगलानी, दारोगा, बुलबुल, बेगम, लाख।

पुर्तगाली शब्द :- आलपीन, दुबैको, काज, पैड़ें, मस्तूल, इस्पात, ईस्वी, कमीज, कमरा, बोतल, आलमारी, चाबी, गमला, गोदाम, तौलिया आदि।
लैटिन शब्द :- कैमरा।
चीनी शब्द :- चाय, चीनी, लीची।
फ्रेंच :- कारतूस, कूपन, फ्रांस, ब्रीच आदि।
ड्च शब्द :- तुरुप, बम।
जापानी शब्द :- रिक्शा।

संकर शब्द :- प्रयोग के क्षेत्र में कुछ ऐसे शब्द भी प्रवेश कर गये हैं जो किसी एक भाषा से संबंधित नहीं हैं। जैसे वर्ष तथा गाँठ के मिलने से बना शब्द ‘वर्ष-गाँठ’ हुआ। इसमें ‘वर्ष’ संस्कृत का शब्द है तथा “गाँठ” हिन्दी का। इसी तरह संस्कृत एवं अंग्रेजी शब्दों के योग से बना शब्द योजना-कमीशन है। ऐसे भिन्न भाषाओं के शब्दों के मेल से बने शब्द ‘संकर शब्द’ कहलाते हैं। अन्य उदाहरण-
हिन्दी और संस्कृत :- माँग-पत्र, पूँजीपति, कपड़ा-उद्योग।
हिन्दी और अरबी / फारसी :- किताबघर, थानेदार, बैठकबाज, घड़ीसाज।
संस्कृत और अंग्रेजी :- रेलयात्री, रेडियों-तरंग, स्टेशन-अधीक्षक।
हिन्दी और अंग्रेजी :- टिकट-घर, रेलगाड़ी, सिनेमाघर, मालगोदाम।
अरबी / फारसी और अंग्रेजी :- पार्टीबाजों, बीमा-पॉलिसी, अफसरशाही। इस तरह हिन्दी भाषा में विश्व की विभिन्न भाषाओं के शब्द हैं।

रूढ़ शब्द :- जिन शब्दों का खण्ड करने से उन खण्डों का कोई अर्थ न निकले, उन्हें रूढ़ कहते हैं। ये किसी अन्य शब्द से नहीं बनते। जैसे – कान शब्द का खण्ड इस प्रकार होगा – का + न। जब ये दोनों खण्ड मिलते हैं तभी अर्थ निकलता है।

यौगिक शब्द – जो शब्द दा या अधिक शब्दों या प्रत्यय के योग से बनते हैं और जिनके खण्डों का अर्थ भी होता है, उन्हें यौगिक शब्द कहते हैं। जैसे – विद्यासागर = विद्या + सागर। इसमें ‘विद्या’ और सागर’ दोनों का अर्थ पूर्ण है। इसी प्रकार विद्यालय = विद्या + आलय। घुड़सवार = (घोड़ा और सवार)। हिमालय = हिम + आलय आदि यौगिक शब्दों का अभीष्ट अर्थ खण्डों के योग से ही निकलता है।

योगरूढ़ शब्द :- वे यौगिक शब्द जो साधारण अर्थ को छोड़कर विशेष अर्थ का बोध कराते हैं, उन्हें योगरूढ़ शब्द कहते हैं। जैसे – लम्बोदर। इसका सामान्य अर्थ है लम्बा (बड़ा) पेट, पर इसका अर्थ विशेष रूप में गणेशजी के लिए भी ग्रहण किया जाता है। इसी प्रकार पीताम्बर (श्रीकृष्ण), पकज (कमल), चक्रपाणि (विष्गु), दशानन (रावण), जलद (बादल) आदि विशेष अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। ऐसे शब्द योगरूढ़ कहलाते हैं।

विकारी शब्द – जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक और काल के कारण विकार अर्थात् परिवर्तन होता है, उन्हें विकारी शब्द कहते हैं। जैसे- बच्चा दौड़ता है। बच्चे को रोको। बच्चों ने फल खा लिया। इन तीनों वाक्यों में ‘बच्चा’ शब्द बच्चा, बच्चे और बच्चों के रूप में प्रयुक्त हुआ है। इसमें परिवर्तन भी हुआ है। यही परिवर्तन विकार या रूपान्तर कहलाता है।

अविकारी शब्द :- जिन शब्दों का रूप लिंग, वचन, कारक, पुरुष और काल के आधार पर परिवर्तित नहीं होता, उन्हें अविकारी (अव्यय) शब्द कहते हैं।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण

प्रश्न 14.
तत्सम् से तदभव में रूपांतरित हुए शब्दों की एक सूची प्रस्तुत करें।
WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण 3

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न 1.
व्युत्पत्ति की दृष्टि से शब्द के भेद उदाहरण-सहित लिखें।
उत्तरः
करीब 12 वीं शताब्दी से आधुनिक भाषाओं का काल प्रारंभ होता है। तब से लेकर 60 वर्ष पूर्व तक भारत में विदेशी शासन रहा है। वर्तमान में हिन्दी की कुल शब्द-सम्पदा दो लाख से अधिक है। इनमें से लगभग 85 प्रतिशत शब्द हिन्दी के अपने हैं तथा शेष लगभग 15 प्रतिशत शब्द विदेशी हैं। यह हिन्दी भाषा की जीवंतता और उदारता का प्रमाण है कि उसने विदेशी तथा अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण किए और अपने-आपको सम्पन्न किया। इसका परिणाम यह हुआ कि विदेशी शब्दों तक का हिन्दीकरण हो गया है।

व्युत्पत्ति की दृष्टि से हिन्दी के शब्द-समूह को हम मोटे तौर पर पाँच भागों में बाँट सकते हैं-
(क) तत्सम् शब्द
(ख) तद्भव शब्द
(ग) देशज शब्द
(घ) द्रविड़ परिवार की भाषा के शब्द और
(ङ) विदेशी शब्द।

तत्सम् शब्द :- तत्सम् शब्द का अर्थ है – तत् + सम् अर्थात् उसके समान (संस्कृत के समान)। चूँकि संस्कृत हिन्दी भाषा की जननी है, इसलिए स्वाभाविक रूप से हिन्दी की अधिकांश शब्दावली संस्कृत से ही आई हुई है। लेकिन हिन्दी के इन शब्दों का भी रूप बदल गया है। ऐसे शब्द हैं –
कक्षा, अग्नि, विद्या, कवि, अनंत, अग्रज, कनिष्ठ, काव्य, कृपा, क्रोध, आदि। हिन्दी में राशियों के नाम भी प्राय: तत्सम् रूप में ही प्रचलित है। इसके साथ ही संस्कृत के सभी उपसर्ग हिन्दी में नए शब्दों की रचना करते हैं। ऐसे 22 उपसर्ग हैं।

तद्भव शब्द :- तद्भव शब्द का अर्थ है-तद् + भव, अर्थात् उससे उद्भुत (उत्पन्न)। अपने से का अर्थ संस्कृत से है। इसके अन्तर्गत वे शब्द आते है, जो संस्कृत शब्दों से उत्पन्न होकर विकसित हुए हैं। इनमें वर्तमान में काफी परिवर्तन आ गया है। हिन्दी के आधे से अधिक शब्द इसी वर्ग के हैं। हिन्दी के सभी कियापद और सर्वनाम तद्भव हैं। कुछ तद्भव शब्द उदाहरण के तौर पर यहाँ रखे जा रहे हैं –

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण व्युत्पत्ति के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण 4

देशज शब्द :- इसके अंतर्गत वे शब्द आते हैं, जिनका जन्म संस्कृत में नहीं ढूँढ़ा जा सकता। वस्तुत: ये वे शब्द हैं, जो लोकभाषा में प्रचलित होते हैं और इनकी व्युत्पत्ति का भाषाई सोत नहीं मिलता, ऐसे कुछ शब्द हैं तड़ातड़, धक्का, टक्कर, जगमग, ठनक, झिलमिल, डगमग, झनकार, ढील-ढाल आदि।

इसके अंतर्गत उन शब्दों को भी रखा जा सकता है, जो दो भिन्न भाषाओं के शब्दों से मिलकर बने हैं। उदाहरण के लिए, ‘जेबघड़ी’ शब्द को ले सकते हैं। इसमें ‘जेब’ शब्द फारसी का है तथा ‘घड़ी’ शब्द हिन्दी का। इसी प्रकार के अन्य शब्द हैं — तिमाही (हिन्दी + फारसी), फूलदान (हिन्दी + फारसी) रेलयात्रा (अंग्रेजी + संस्कृत) आदि।

मूलत: द्रविड़ परिवार की भाषाओं से हिंदी में आए शब्दों को भी देशज् शब्द समूह के अतर्गत रखा जाता है, लेकिन यहाँ सुविधा की दृष्टि से उन शब्दों को द्रविड़ परिवार की भाषा के अंतर्गत रखा गया है।

द्रविड़ परिवार की भापाओं के शब्द :-हिन्दी ने अनेक शब्द द्रविड़ परिवार की भाषाओं से लिए हैं। जैसे हिन्दी का ‘काफी’ शब्द तमिल के काप्पी’ का रूपान्तर है। इसी प्रकार ‘चुरुट’ तमिल के शुरुट’ का तथा ‘पिल्ल’ (हिन्दी तथा उर्दू दोनों में) तेलगू के पिल्ला’ से लिया गया शब्द है। इसी प्रकार के अन्य शब्द हैं – अर्क, काक, कानन, कुटिल, कुण्ड कुंडल, कोप, चतुर, चंदन, चूड़ा, तामरस, तूल, दण्ड, नीर, मयूर, माता, मीन, मुकुट, लाला, शव आदि।

विदेशी (विदेशज) शब्द :- हिन्दी में विदेशी शब्दों का प्रयोग 10 वों – 11 वीं शताब्दी में विदेशी आक्रमणकारियों के साथ ही होने लगा था। आधुनिक काल में अंग्रेजी तथा अन्य यूरोपीय शब्द पर्याप्त मात्रा में हिन्दी में गए हैं। हिन्दी ने उन अधिकांश शब्दों को अपनी प्रकृति के अनुकूल ढालकर स्वीकार किया है। हिन्दी में मुख्य रूप से निम्न विदेशी भाषाओं के शब्द आए हैं –

फारसी के शब्द :- हिन्दी में फारसी के करीब 2-3 हजार शब्द हैं। ये शब्द हिन्दी में इतने लंबे समय से प्रयोग में आ रहे हैं कि लगता ही नहीं कि ये शब्द हिन्दी के अपने नहीं होंगे।
कुछ ऐसे शब्द हैं – कमीज़, पायजामा, देहात, शहर, सब्जी, अंगूर, हलवा, जलेबी, कुर्सी, सख्त, मकान, दवा, मरीज़, हकीम, बुखार आदि।
अरबी के शब्द :-अदालत, किताब, कलम, कागज़, शैतान, मुकदमा, फैसला आदि।
तुर्की शब्द :- बहादुर, कैंची, बेगम, बाबा, कुर्ता, गलीचा, चाकू , गनीमत, लाश, सुराग आदि।
पश्तो शब्द :- पठान, गुण्डा, अचार, डेरा, गड़बड़, नगाड़ा, हमजोली, मटरगश्ती आदि।
पुर्तगाली शब्द :- हिन्दी में पुर्तगाली के करीब एक हजार शब्द प्रचलित हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं आलमारी, स्त्री, आया, कनस्तर, गोदाम, चाबी, गमला, तौलिया, परात, पावरोटी, पिस्तौल, बालटी, बिस्कुट, बोतल, तम्बाकू आदि।
अंग्रेजी शब्द :- अंग्रेजों द्वारा लंबे समय तक शासित होने तथा अंग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप अंग्रेजी के शब्दों का जीवन के हर क्षेत्र में प्रभाव पड़ा। वर्तमान में अंग्रेजी के करीब तीन हजार शब्द हिन्दी में घुलमिल गए हैं और उनका बहुलता से प्रयोग होता है ; जैसे – इंजन, मोटर, कैमरा, रेडियो, टेलीविजन, मीटर, फीस, कंपनी, टीम, परेड, प्रेस, अपील, कोर्ट, पाकिट, टाई, टावर, आदि।
फ्रांसीसी – कारतूस, कूपन, बेसिन।
हालैंड – बम, तुरुप।
चीनी – चाय, लीची।
जापानी – रिक्शा।
तिब्बती – डांडी।

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लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

प्रश्न 1.
‘सन्धि’ किसे कहते हैं ?
उत्तरः
दो या दो से अधिक वर्णों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसेस्थि कहते हैं।
इसमें दो शब्द निकट होते हैं। यह विकार कभी एक वर्ण में, कभी दो वर्णों में होता है, कभी-कभी उनके स्थान पर एक तीसरा वर्ण भी आ जाता है । जैसे – सु + आगत = स्वागत ; देव + इन्द्र = देवेन्द्र आदि ।

प्रश्न 2.
सन्धि के कितने प्रकार हैं ?
उत्तरः
सन्धि के तीन प्रकार हैं :-

  • स्वर सन्धि
  • व्यंजन सन्धि और
  • विसर्ग सन्धि ।

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प्रश्न 3.
स्वर सन्धि किसे कहते हैं ? इसके कितने भेद हैं ?
उत्तरः
स्वर वर्ण के साथ स्वर वर्ण के मेल से जो विकार उत्पन्न होता है, उसे स्वर सन्धि कहते हैं।
स्वर सन्धि के भेद :-

  • दीर्घ सन्थि
  • गुण सन्धि
  • वृद्धि सन्धि
  • यण् सन्धि और
  • अयादि सन्धि।

प्रश्न 4.
दीर्घ सन्धि क्या है ? उदाहरण भी दें ।
उत्तरः
दीर्घ सन्धि :- ‘अ, ‘आ’, ‘ई, ‘ई, उ’, ऊ’, ‘ओ, ऊ’ में से कोई भी स्वर वर्ण की अपने सजातीय हैस्व या दीर्घ स्वर, सन्धि होने पर दोनों के बदले वैसा ही दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ऋ) होता है।
जैसे –
(क) अ + अ = आ – राम + अवतार = रामावतार
अ + अ = आ – शब्द + अर्थ = शब्दार्थ
अ + अ = आ – कोण + अर्क = कोणार्क
अ + आ = आ – परम + आत्मा = परमात्मा
अ + आ = आ – स + आश्चर्य = साश्चर्य
आ + अ = आ – विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
आ + आ = आ – माया + अधीन = मायाधीन
आ + अ = आ – लज्जा + अभाव = लज्जाभाव
आ + आ = आ – विद्या + आलय = विद्यालय
आ + आ = आ – प्रभा + आकर = प्रभाकर
आ + आ = आ – महा + आशय = महाशय

(ख) इ + इ = ई – कवि + इन्द्र = कवीन्द्र
इ + इ = ई – कवि + इच्छा = कवीच्छा
इ + इ = ई – गिरि + इन्द्र = गिरीन्द्र
इ + ई = ई – गिरि + ईश = गिरीश
इ + ई = ई – कवि + ईश्वर = कवीश्वर
इ + ई = ई – कवि + ईश = कवीश
ई + इ = ई – मही + इन्द्र = महीन्द्र
ई + इ = ई – नदी + इन्द्र = नदीन्द्र
ई + ई = ई – नदी + ईश = नदीश
ई + ई = ई – मही + ईश = महीश
ई + ई = ई – मही + ईश्वर = महीश्वर

(ग) उ + उ = ऊ – भानु + उदय = भानूदय
उ + उ = ऊ – प्रभु + उदय = प्रभूदय
उ + ऊ = ऊ – लघु + ऊर्मि = लघूर्मि
उ + ऊ = ऊ – मधु + ऊषा = मधूषा
ऊ + उ = ऊ – वधू + उत्सव = वधूत्सव
ऊ + उ = ऊ – भू + उत्सर्ग = भूत्सर्ग
ऊ + ऊ = ऊ – वधू + ऊहन = वधूहन
ऊ + ऊ = ऊ – भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व

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प्रश्न 5.
गुण सन्धि किसे कहते हैं ? इस सन्धि के उदाहरण भी दें ।
उत्तरः
गुण सन्धि :- ‘अ’ या ‘आ’ के साथ ‘इ’ या ‘ई’, ‘उ’ या ‘ऊ’ और ऋ’ के मेल से क्रमशः दीर्घ ए, ‘ओ’ तथा अन्तस्थ ‘र्, हेने हैं । इस विकार को गुण सन्धि कहते हैं । जैसे-

(क) अ + इ = ए – सुर + इन्द्र = सुरेन्द्र
अ + इ = ए – नग + इन्द्र = नगेन्द्र
अ + इ = ए – शुभ + इच्छा = शुभेच्छा

(ख) अ + ई = ए – परम + ईश्वर = परमेश्वर
अ + ई = ए – सुर + ईश = सुरेश
अ + ई = ए – खग + ईश = खगेश

(ग) आ + ई = ए – महा + ईश = महेश
आ + ई = ए – रमा + ईश = रमेश

(घ) अ + उ = औ – प्राम + उद्धार = ग्रामोद्धार
अ + उ = औ – सह + उदर = सहोदर
अ + उ = औ – सूँय + उदय = सूर्योदय

(ङ) अ + ऊ = ओ – सेंमुद्र + ऊर्मि = समुद्रोर्मि
अ + ऊ = ओ – जल + ऊर्मि = जलोर्मि
अ + ऊ = ओ – नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा

(च) आ + उ = ओ – महा + उत्सव = महोत्सव
आ + उ = ओ – गंगा + उदक = गंगोदक

(छ) आ + उ = ओ – गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि
आ + उ = ओ – महा + ऊर्मि = महोर्मि

(ज) अ + ॠ = अर – महा + ॠषि = महर्षि
अ + ॠ = अरशीत + ॠतु = शीतर्तु

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प्रश्न 6.
वृद्धि सन्धि की परिभाषा सोदाहरण लिखें ।
उत्तरः
वृद्धि सन्धि :- ‘अ’ अथवा ‘आ’ के बाद ए’ या ‘ऐ’ रहे तो दोनों मिलकर ‘ऐ’ और ‘ओ’ अथवा ‘औ’ रहे तो दोनों मिलकर ‘औ’ होते हैं । इस विकार को वृद्धि सन्धि कहते हैं । जैसे-

(क) अ + ए = ऐ – एक + एक = एकैक
अ + ए = ऐ – मत + एकता = मतैकता

(ख) अ + ऐ = ऐ – मत + ऐक्य = मतैक्य
अ + ऐ = ऐ – देव + ऐश्वर्य = देवैश्वर्य

(ग) आ + ए = ऐ – सदा + एव = सदैव
आ + ए = ऐ – तदा + एव = तदैव

(घ) अ + ऐ = ऐ – महा + ऐशेवर्य = महैश्वर्य

(ङ) अ + औ = औ – जल + ओध = जलौध

(च) अ + ओ = औ – परम + ओजस्वी = परमौजस्वी
अ + ओ = औ – महा + ओज = महौज

(छ) आ + औ = औ
महा + औदार्य = महौदार्य

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प्रश्न 7.
यण सन्धि किसे कहते हैं? उदाहरण द्वारा समझाएँ ।
उत्तरः
यण सन्धि :- इ’, ई’, उ, ऊ, और ऋ के आगे कोई भी दूसरा स्वर आये तो इनके समकक्ष अन्तस्थ (सघोष) व्यंजन हो जाते हैं, इसे ‘यण सन्धि’ कहते हैं। जैसे-
‘इ’ और ‘ई’ के लिए ‘य्’ ‘उ’ या ‘ऊ’ के बदले ‘व्’ और ‘ॠ’ के बदले ‘र’ हो जाता है-

(क) इ + अ = य – अति + अल्प = अत्यल्प
इ + अ = य – यदि + अपि = यद्यपि
इ + अ = य – रीति + अनुसार = रीत्यानुसार

(ख) इ + आ = या – अति + आचार = अत्याचार
इ + आ = या – इति + आदि = इत्यादि

(ग) इ + उ = यु – अति + उक्ति = अत्युक्ति
इ + उ = यु – प्रति + छंपक्काई = प्रत्युप्यकार
+ उ = यु – प्रति + बचरच = प्रत्युन्तर

(घ) इ + ऊ = यू – नि + ऊंब = स्यून
इ + ऊ = यू – अलि + ऊन = अल्यून

(छ) इ + ए = ये – प्रति + एक्क = प्रत्येक
इ + ऐ = यै – अति + ऐश्वर्य = अत्यैश्वर्य

(च) ई + अ = य – नद्वी + अर्पण = नद्रार्पण
ई + आ = या – सखी + आगमन = सख्यागमन
ई + उ = यु – सखी + उचित = सखंखुषित
ई + ऊ = यू – नदी + ऊर्मि = नद्यूर्मि
ई + औ = यौ – वाणी + औचित्य = वाणयौचित्य

(छ) उ + अ = व – अनु + अर्थ = अन्दर्ष
उ + अ = व – सु + अल्य = स्वल्य
उ + अ = व – अनु + अय्य = अन्वय

(ज) उ + आ = वा – सु + आगत = स्बामा

(घ) उ + इ वि – अनु + इष्ट = अन्विष्ट
उ + इ = वि – अनु + इति = अन्विति

(अ) उ + ए = वे – अनु + एषण = अन्वेषण

(ट) उ + ऐ = वै – बहु + ऐश्वर्य = बहैश्वर्य
ऊ + आ = वा – वधू + ऐश्वर्य = वध्वैश्वर्य
ऊ + औ = वौ – वधू + औदार्ष = वधध्वौदार्य
ॠ + अ = र – पितृ + अनुमति = पित्रनुमति
ऋ + इ = रि – पितृ + इच्छा = पित्रिच्छा
ॠ + ई = री – पितृ + ईहा = पित्रीहा
ॠ + उ = रु – पितृ + उपदेश = पित्रुपदेश
ॠ + ऊ = रू – पितृ + ऊह = पित्रूह
ॠ + ए = रे – पितृ + एषण = पित्रेषण
ॠ + ऐ = रै – पितृ + ऐश्वर्य = पित्रैश्वर्य
ॠ + ओ = रो – पितृ + ओक = पित्रोक
ॠ + औ = रौ – पितृ + औदार्य = पित्रौदार्य

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प्रश्न 8.
अयादि सन्थि को सोदाहरण समझाएँ ।
उत्तरः
अयादि सन्धि :-गुण कोटि के स्वर-ए’, ‘ओ’, तथा वृद्धि कोटि के स्वर गे’, ‘ओ’ अन्य स्वरों के पहले आएँ तो इनके स्थान पर क्रमश: अय्, आय्, आव् होता है । जैसे-
(क) ए + अ = अय – ने + अन = नयन
ए + अ = अय – शे + अन् = शयन

(ख) ऐ + अ = आय – नै + अक = नायक
ऐ + अ = आय – गै + अक = गायक

(ग) + इ = आव – पो + इत्र = पवित्र

(घ) ओ + इ = अव – गो + ईश = गवीश

(ङ) औ + अ = अव – पौ + अक = पावक

(च) औ + ई = आव – नौ + इक = नाविक

(छ) औ + उ = आव – भौ + उक = भावुक

विशेष :- कुछ सन्धियाँ उपर्युक्त नियमों के अन्तर्गत नहीं आतीं, वे अपवाद हैं।
जैसे-कुल + अटा = कुलटा, बिम्बा + ओष्ठ = बिम्बोष्ठ, पर + अक्ष = परोक्ष आदि ।

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प्रश्न 9.
व्यंजन सन्धि क्या है ? व्यंजन सन्थि के प्रमुख नियमों को उदाहरण सहित समझाएँ ।
उत्तरः
व्यंजन के साथ व्यंजन या स्वर के मेल से जब व्यंजन में विकार उत्पन्न होता है, वहाँ व्यंजन सन्धि’ होती है। व्यंजन सन्धि के प्रमुख नियम इस प्रकार हैं –

‘क्, च्, ‘द्, त्, प्’ के आगे कोई स्वर अथवा घोष व्यंजन हो (अनुनासिक को छोड़कर) तो क्रमशः ‘ग्, ‘ज्’, ‘ड्’, द्, ‘व् होता है । जैसे-

वाक् + ईश = वागीश
वाक् + जल = वाग्जल
अच् + अन्त = अजन्त
षट् + अंग = षडंग
षट् + दर्शन = षड्दर्शन
सत् + आचार = सदाचार
सुप् + अन्त = सुवन्त

‘क्, ‘च्, ‘द्, ‘त्, ‘प्’ के आगे कोई अनुनासिक व्यंजन हो तो इनका क्रमश: ड, ज, ण, न्, म्, होता है। (वर्ण का पंचम वर्ण)
जैसे-

वाक् + मय = वाङ्मय
षद् + मास = षण्मास
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
अप् + मय = अम्मय

‘त्, या ‘द्’, के बाद ‘श’ हो तो ‘त् के स्थान में ‘च्’ और ‘श्’ के स्थान में ‘छ्’ होता है । जैसे-

उत् + श्वास = उच्छ्वास
उत् + श्रृंखल = उच्छृखल

स्वरों तथा ‘ग्, ‘घ्’, ‘द्, ‘ध्’, ‘ब्, ‘भ्’, य्’, र्, ल्, ‘व्, से पहले आने पर ‘त्’ का ‘द्’ होता है । जैसे-

सत् + आचार = सदाचार
जगत् + ईश = जगदीश
बृहत् + ग्रन्थ = बृहद्यन्थ
सत् + धर्म = सद्धर्म
तत् + रूप = तद्रूप
उत् + घाटन = उद्घाटन
भगवत् + भक्ति = भगवद्भक्ति
भगवत् + गीता = भगवद्गीता

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संधि

‘त् और ‘द् यदि ‘च् और ‘छ् से पहले आए तो ‘च्’ ज् ‘झ्’ द्् और ‘ह् से पहले आए तो ‘द् ‘ड्’ और ‘द्’ से पहले आए तो ‘ड्’ तथा ल’ से पहले आए तो ‘ल्’ में परिवर्तित होते हैं । जैसे-

सत् + चिदानन्द = सच्चिदानन्द
उत् + चारण = उच्चारण
महत् + छत्र = महच्छत्र
सत् + जन = सज्जन
विपद् + जन्य = विपज्जन्य
सत् + टीका = सट्टीका
तत् + लीन = तल्लीन

‘त्’ और ‘द्’ के आगे श्’ हो तो ‘त्’ और ‘द्’, च्’ तथा ‘श् का ‘छ’ होता है । त्’ और ‘द्’ के साथ पर ‘द्’ तथा ह’ के स्थान पर ‘ध’ होता है । जैसे-

सत् + शासन = सच्छासन
तत् + हित = तद्धित
शरद् + शशि = शरच्छशि
उत् + हार = उद्धार

‘छ’ के पूर्व स्वर हो तो ‘छ’ के बदले ‘च्छ’ होता है । जैसे-

छत्र + छाया = छत्रच्छाया
आ + छादन = आच्छादन
परि + छेद = परिच्छेद

त वर्ग को छोड़कर शेष सभी वर्गों के पहले दो व्यंजनों से पूर्व आने पर ‘स’ के स्थान पर ‘श्’ और च्’ होता है। जैसे-

दुस् + काल = दुष्काल
दुस् + चरित्र = दुश्चरित्र
निस् + पक्ष = निष्पक्ष
निस् + फल = निष्फल

सभी वर्गों के अन्तिम तीन व्यंजनों में से किसी के स्थान के पहले आने पर स् के बदले र् होता है । जैसे-

निस् + गुण = निर्गुण
दुस् + दशा = दुर्दशा
दुस् + जन = दुर्जन
दुस् + नाम = दुर्नाम
दुस् + बल = दुर्बल
दुस् + भाग्य = दुर्भाग्य
निस् + मल = निर्मल

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अन्तस्थ व्यंजनों से पूर्व आने पर ‘स्’ ‘र्’ में बदल जाता है । जैसे-

दुस् + यश = दुर्यश
निस् + रोचक = निरोचक
दुस् + लक्ष्य = दुर्लक्ष्य
दुस् + वचन = दुव्वचन

‘श’ के पहले स्’ हो तो वह भी ‘श हो जाता है । जैसे-

दुस् + शील = दुश्शील

‘च् और ‘ज्’ के बाद न् रहने से न्’ के स्थान में ज’ होता है । जैसे-

याच् + ना = याच्ञा
राङ् + नौ = रांजी

ष्’ के बाद त्त् या ‘थ्’ रहने से त्’ की जगह ‘द्’ और ‘थ्’ की जगह ‘ठ्’ होता है । जैसे-

शिष् + त = शिष्ट
पृष् + थ

‘न् या ‘म्’ के बाद अगर वर्गों का कोई वर्ण रहे तो न्र और म् के स्थान में दूसरे पद के प्रथम वर्ण के वर्ग का पंचम वर्ण होता है या ‘न’ अथवा ‘म’ को अनुस्वार (‘) भी कर दिया जाता है । जैसे-

सम् + कट = संकट।
शम् + कर = शंकर।

पद के अन्त में स्थित ‘म्’ के बाद अन्तस्थ या ऊष्मवर्ण रहे तो स्’ में अनुस्वार (‘ ) होता है। जैसे-

सम् + सार = संसार
सम् + यम = संयम

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‘सम्’ और परिं उपसर्ग के बाद ‘कृ धातु रहने से कृ’ के पहले स् या ष् जुट जाता है। जैसे-

सम् + कृत = संस्कृत
सम् + कार = संस्कार
परि + कृत = परिष्कृत

‘अ अथवा ‘आ’ के अतिरिक्त कोई भिन्न स्वर हो और उसके बाद ‘स’ हो तो ‘स’ के स्थान में ब’ हो जाता है। जैसे-

वि + सम् = विषम
अभि + सेक = अभिषेक
नि + सेध = निषेध

यदि ‘झ्, र् या ‘ब्’ के बाद न’ आये और बीच में चाहे स्वर, कवर्ग, पवर्ग, अनुस्वार या ‘य, व’, हह’ रहे तो ‘न’ के बाद ण’ हो जाता है। जैसे-

राम + अयन = रामायण
नार + अयन = नारायण
भूष + अन = भूषण

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प्रश्न 10.
विसर्ग सन्धि की परिभाषा लिखते हुए इससे सम्बन्थित प्रमुख नियमों को सोदाहरण समझाएँ।
उत्तरः
स्वर और व्यंजन वर्ण के मेल से विसर्ग में जो विकार उत्पन्न होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं। विसर्ग सन्धि के प्रमुख नियम इस प्रकार हैं –

विसर्ग के पहले यदि ‘अ’ और आगे घोष व्यंजन हो और आगे भी ‘अ’ हो, तो पहले वाला ‘अं विसर्ग के साथ ‘ओ में बदल जाता है तथा बाद वाले ‘अ’ का लोप हो जाता है । जैसे-
मन: + हर = मनोहर
मन: + रथ = मनोरथ
मन: + भाव = मनोभाव
मन: + योग = मनोयोग
वय: + वृद्ध = वयोवृद्ध

विसर्ग के पहले यदि ‘अ’ हो, आगे ‘अ’ के अलावा कोई अन्य स्वर हो तो विसर्ग का लोप होता है। जैसे-

अतः + एव = अतएव
यश: + इच्छा = यशइच्छा

यदि किसी विसर्ग के पहले ‘अ ‘आ’ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा विसर्ग के आगे कोई स्वर या घोष व्यंजन हो तो विसर्ग के बदले र् होता है, यदि विसर्ग से बने ‘र’ के आगे भी ‘ T ‘ का लोप होता है तो इसका पूर्ववर्ती हस्व दीर्घ हो जाता है। जैसे-

नि: + अर्थ = निरर्थ
नि: + आकार = निराकार
दु: + आचार = दुराचार
दु: + उपयोग = दुरुपयोग
नि: + गुण = निर्मुण
नि: + धन = निर्धन
नि: + रस = नीरस
नि: + रोग = नीरोग
नि: + अर्थ = निरर्थ
नि: + आकार = निराकार
दु: + आचार = दुराचार
दु: + उपयोग = दुरुपयोग
नि: + गुण = निर्गुण
नि: + धन = निर्धन
नि: + रस = नीरस
नि: + रोग = नीरोग

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संधि

छछ और ‘व’ से पहले आने पर विसर्ग का ‘श्, द् और ‘द्य से पहले \% ‘ तथा ‘त और ‘थ’ से पहले ‘स’ होता है। जैसे-

नि: + चल = निश्चल
नि: + छल = निश्छल
धनु: + टंकार = धनुष्टकार
मन: + ताप = मनस्ताप

यदि विसर्ग के पूर्व ‘इ’ या ‘उ’ हो तथा विसर्ग के आगे ‘क’, ‘ख’ या ‘प’, फ’ हो तो विसर्ग के स्थान पर ष्’ होता है । जैसे-

नि: + कपट = निष्कपट
दु: + कर्म = दुष्कर्म
नि: + पाप = निष्याप
नि: + फल = निकल

विसर्ग के बाद ‘श’, ष’, ‘स’ होने पर या तो विसर्ग ही रह जाता है या विसर्ग का भी क्रमशः ‘श्’, ष’, ‘स्’ हो जाता है। जैसे-

दु: + शासन = दु:शासन, दुश्शासन
नि: + सार = नि:सार, निस्सार

नमः, पुरः, सिर: के विसर्ग के बाद कृ धातु का प्रयोग किया जाय तो विसर्ग के स्थान पर ‘स्’ होता है । जैसे-

नम: + कार = नमस्कार
पुर: + कार = पुरस्कार
तिर: + कार = तिरस्कार

यदि विसर्ग के पूर्व ‘अ’ हो और उसके बाद ‘क’, ख’, प’ अथवा फ’ हो तो विसर्ग में विकार नहीं होता। जैसे-

उप: + काल = उष:काल
अध: + पतन = अध:पतन
अपवाद – पर: + पर = परस्पर
वृहत् + पति = वृहस्सति
वन: + पति = वनस्सति

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संधि

यदि विसर्ग के आगे-पीछे ‘अ’ हो तो विसर्ग और पहले वाला अ’ मिलकर ‘ओ हो जाता है और बाद के अ’ का लोप हो जाता है और उसके स्थान पर ‘ओ हो जाता है । जैसे-

प्रथम: + अध्याय = प्रथमोध्याय

जब ‘अ’ के अलावा दूसरा स्वर बाद में आये तो यह नियम नहीं लागू होता, केवल विसर्ग का लोप हो जाता है। जैसे-

अत: + एव = अतएव
यथ: + इच्छा = यथाइच्छा

प्रश्न 11.
निम्नलिखित शब्दों के सन्धि-विच्छेद के भेदों के नाम लिखिए :-
उत्तरः
WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संधि 1

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 5 भोलाराम का जीव

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions Chapter 5 भोलाराम का जीव to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 5 Question Answer – भोलाराम का जीव

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
महाराज वह भी लापता है।
– पाठ का नाम लिखें। अंश काभाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘भोलाराम का जीव’ है।
जो यमदूत भोलाराम की आत्मा को लेकर आ रहा था – उसका भी कोई अता-पता नहीं था। भोलाराम के जीव के साथ-साथ वह भी गायब था। दोनों ही मृत्युलोक से समलोक के लिए चले थे लेकिन दोनों ही बीच से ही लापता हो गए थे।

प्रश्न 2.
अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन – वक्ता और श्रोता कौन हैं ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता धर्मराज तथा श्रोता यमदूत है।
यमदूत पाँच दिन पहले भोलाराम के जीव को लाने गया था। चार दिनों तक दोनों में से किसी का कोई अता-पता नहीं था। पाँचवें दिन यमदूत आया लेकिन भोलाराम का जीव उसके साथ नही था। इसलिए जब इतने दिन बाद धर्मराज ने यमदूत को देखा तो उनका क्रोध फूट पड़ा।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 5 भोलाराम का जीव

प्रश्न 3.
मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके – वक्ता कौन हैं। अंश में निहित आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता यमूदत है। धरती के प्राणियों में वकील दूसरों को चकका देने में विख्यात हैं। वे अपनी चालाकी से सच का झूठ और को सच में बदल देते है। वकील ऐसा प्राणी हे जो किसी की भी आँखों में धूल झोंक सकता है। यमदूत के अभ्यस्त हाथा से कभी ऐसे वकील भी नहीं दूर सके, फिर भोलराम के जीव को औकात ही क्या थी !

प्रश्न 4.
वह समस्या तो कब की हल हो गई। – रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। यहाँ कौन किस समस्या के हल के बारे में बातें कर रहा है ?
उत्तर :
रचना ‘भोलाराम का जीव’ है तथा इसके रचनाकार सुपसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई हैं।
धर्मराज को चिंतित देखकर नारदजी ने सोचा कि शायद नरक में निवास-स्थान की समस्या को लेकर धर्मराज चिंतित हैं। लेकिन धर्मराज ने उन्हें बताया कि नरक में गुणी कारीगर, बड़े-बड़े इंजीनियर, ठेकेदार तथा ओवरसीयर के आ जाने से वह समस्या तो कब की हल हो चुकी है।

प्रश्न 5.
एक बड़ी विकट उलझन आ गई है। – पाठ का नाम लिखें। पंक्ति में निहित आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम ‘भोलाराम का जीव’ है।
धर्मराज ने नारद जी को यह बताया कि भोलाराम नामक व्यक्ति के जीव के गायब हो जाने से बहुत बड़ी समस्या सामने आ गई है। अगर आत्मा ऐसे ही यमदूत को चकमा देकर भागने लगी तो बड़ी विकट स्थिति या आएगी और पाप-पुण्य का अंतर ही मिट जाएगा।

प्रश्न 6.
हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।
– वक्ता कौन है ? उन लोगों से किसके बारे में और क्या कहा गया है?
उत्तर :
वक्ता नारद मुनि हैं
‘उनलोगो’ से तात्पर्य इनकमटैक्स वालों से है। इनका पृथ्वी पर इतना आतंक है कि जब तक कोई अपना टैक्स न चुका दे – उसको आत्मा भी शरीर नहीं छांड़ सकती।

प्रश्न 7.
मैं पृथ्वी पर जाता हूँ। – वक्ता कौन है ? वह पृथ्वी पर क्यों जाना चाहता है ?
उत्तर :
वक्ता नारद जी हैं।
जब नारद ने भालाराम के जीव के गायब होने की कहानी धर्मराज से सुनी तो उन्हें यह मामला बड़ा दिलचस्प लगा और उन्होंन उसका पता लगाने के लिए स्वयं पृथ्वी पर जाने का निर्णय लिया

प्रश्न 8.
चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है।
– वक्ता और श्रोता का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता नारद मुनन हैं और श्रोता भोलाराम का जीव है।
जब पेशन की फाईल में से भोलाराम के जीव की आवाज आती है तो नारद उसे कहते हैं कि तुम मेरे साथ चलो क्यांकि स्वर्ग में तुम्हारा इतजार हो रहा है। लेकिन भोलाराम का जीव अपनी फाइल को छोड़कर नहीं जाना चाहता है क्यांकि उसका मन वहीं लग गया है

प्रश्न 9.
ऐसा कभी नहीं हुआ था …
अथवा
प्रश्न 10.
इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्याण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : धर्मराज लाखों वर्षों से व्यक्ति को उसके कर्म या सिफारिशों के आधार पर स्वर्ग या नरक में जगह दे रहे थे लैकन यह पहली बार हुआ था कि कोई जीव दंह छाड़ने के बाद पाँच दिनों तक यमलोक नहीं आया हो। यमदूत ने भी सारा बहाड छान मारा था लेकिन भोलाराम का जीव था जो कि पकड़ में ही नहीं आ रहा था। जिन हाथो से अच्छे- अच्छे वकील भी नही छूट पाए – उन्ही को चकमा देकर भोलाराम का जीव गायब हो गया था। धर्मराज के अब तक के समय में ऐसी घटना कभी नहीं घटी थी। इसलिए वे भी हैरान-परेशान थे।

प्रश्न 11.
आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चल रहा है।
उत्तर :
संद्र : प्रस्तुत पक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : जब दूत ने धर्मराज को यह सफाई दी कि उसने भोलाराम के जीव को लाने में कोई असावधानी नहीं कि फिर भी वह गायब हों गया। कहीं किसी ने काई इन्द्रजाल तो नहीं कर दिया। चित्रगुप्त ने दूत की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि आजकल पृथ्वी पर एसा हों जाना आश्चर्य की बात नहीं है। उदाहरण के लिए रेलवेवाले फल तथा होजरी के पार्सल गायब कर देते हैं। कभी-कभी तो मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे माल रास्ते से ही गायब हो जाते हैं। इतना ही नहीं राजनैतिक दलों के नता तो विरोधो नेता को भी उडाकर गायब कर देते हैं। कहीं भोलाराम के किसी विरोधी ने तो ऐसा कोई काम नहीं किया!

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 5 भोलाराम का जीव

प्रश्न 12.
क्या बताऊँ ? गरीबी की बीमारी थी।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : नारद जी के द्रारा भोलाराम की पत्नी से यह पूछने पर कि भोलाराम को क्या बीमारी थी-पत्नी ने बताया कि उसंगरोबी की बीमारी थी। रिटायर होने के पाँच वर्षों बाद भी पेंशन न मिलने से घर के जेवर तथा बर्तन भी खाने के पीछे बिक गए। जब बेचन को कोई सामान नहीं बचा तो चिता तथा भूख से भालाराम की मौत हो गयी। यहाँ परसाई जी ने उस मरकारी तत्र पर प्रहार किया है जिसमें वर्षो तक सरकार की सेवा करने के बाद भी पेंशन के अभाव में कर्मचारियों को भूखों मरना पड़ता है।
यहाँ परसाई जी ने यह कहना चाहा है कि राजनीति, समाज, प्रशासन, न्याय आदि सभी संस्थाएँ भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं अन्यधा रिटायर होने के पाँच वर्ष बाद भी पेंशन न मिलने का क्या कारण हो सकता है।

प्रश्न 13.
आप हैं वैरागी, दफ्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते।
अथवा
प्रश्न 14.
भई, यह भी एक मंदिर है।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : जब नारद जी बगैर अनुमति लिए तथा बिना विजिटिंग कार्ड भिजवाएं बड़े साहब के कमरे में घुस गए तो बंड़ साहब को काफी गुस्सा आया। आने का कारण जानने पर उन्होने नारद जी को यह समझाया कि यह भी एक प्रकार का सरकारी मंदिर है, यहाँ भी भेंट चढ़ाकर दान-पुण्य किया जाता है।

जिस प्रकार अपना काम निकालने के लिए मंदिरों में चढ़ावा चद्वाना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार यहाँ भी काम करवाने के लिए दरख्यास्तो पर वज़न रखना पड़ता है। बिना वज़न (रिश्वत) के यहाँ काई काम नहीं होता है। काम निकालना है तो फिर यहाँ के रीति-रिवाज के अनुसार चलना पड़ेगा। दर असल हमारी सारी व्यवस्था ही प्रष्ट है। यह तंत्र इतना संवेदनशून्य हो चुका है कि उसे यह साचने की भी फुर्सत भी नहीं कि जिनकी मौत भूख से हुई – वह घूस के पैसे कहाँ से लाएगा?

प्रश्न 15.
लड़की जल्दी संगीत सीख गयी, तो उसकी शादी हो जाएगी।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : जब पेंशन-दफ्तर के बड़े बाबू ने यह भली प्रकार देख-समझ लिया कि नारद जी से वज़न मिलना संभव नहीं है तो उन्होंन वज़न के तौर पर उन्हे अपनी वीणा ही देने को कहा। वीणा मांगने के पीछे दो कारण थ -पहला कारण था कि नारद जी से उन्हें रुपये मिलने की उम्मीद नहीं थी तथा दूसरा यह कि वीणा उनकी लड़की के काम आएगी, जो अभी वोणा बजाना सीख ही रही थी। बड़े बाबू को लगा कि साधुओं की वीणा से तो स्वर और भी अच्छे निकलते हैं। यदि उनकी लड़की इससे वोणा बजाना जल्दी सीख जाएगी तो उसकी शादी भी जल्द हो जाएगी।

प्रश्न 16.
मैं तो पेन्शन की दरख्वास्तों में अटका हूँ।
अधवा
प्रश्न 17.
यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : भोलाराम की पेंशन की फाईल मंगवाने पर जब बड़े साहब ने आश्वस्त होने के लिए नाम पूछा तो नारद जी ने जोर से कहा – भॉलाराम । बस यह कहते ही फाईल में से आवाज आई – कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है क्या? पेशन का ऑर्डर आ गया।’ – नारद जी सारा माजरा समझ गए। उन्होंने कहा – ‘मैं नारद हूँ। मैं तुम्हे लेने आया हूँ। चलो, स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है।’ इस पर भोलाराम के जीव की फाईल में से आवाज आई – ‘मुझे नहीं जाना। मैं तो पंशन की दरखास्तो में अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्ते छोड़कर नही जा सकता।’

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प्रश्न 18.
तुम साधु हो, कोई लुच्चे-लफंगे नहीं हो।
अथवा
प्रश्न 19.
जिंदगी-भर उन्होंने किसी दूसरी खी को आँख उठाकर भी नहीं देखा।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : भारतीय खियों की एक बड़ी खासियत है कि वह अपने पति को नैतिकता तथा आदर्श का पुतला समझ बैठती है। अगर जीते-जो नहीं तो मरने के बाद अवश्य ही क्योंकि पति ‘परमेश्वर’ होता है। यही कारण है कि भोलाराम के बारे में किसी अन्य खी या प्रेम-प्रसंग के बारे में पूछे जाने पर पत्नी एकदम से भड़क उठती है – ‘बको मत, महाराज। तुम साधु हो, कोई लुच्चे-लफंगे नहीं हो। जिन्दगी भर उन्होंने किसी दूसरी ख्री को आँख उठाकर भी नहीं देखा।’
भोलाराम की पत्ली के इस कथन पर नारद जी के माध्यम से परसाई जी ने बड़ी अच्छी टिपणी की है – ‘यही भ्रम हर अच्छी गृहस्थी का आधार है।’

प्रश्न 20.
क्या नर्क में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : नारद जी ने आने के साथ ही जब धर्मराज को चिंतित देखा तो उन्हें लगा कि शायदे नर्क में निवास-स्थान की समस्या को लेकर वे चिंतित हैं। इस पर धर्मराज ने कहा कि यह उनकी चिंता का कारण नहीं है क्योंकि पिछले कुछ सालों में नर्क में गुणी कारीगर, रद्दी इमारतें बनाने वाले ठेकेदार, पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा तथा रिश्वतख़्रोर इंजीनियर तथा हाजिरी बनाकर पैसा खानेवाले ओवसियरों के आ जाने से कई इमारतों का निर्माण हो चुका है।
कहने का भाव यह है कि भवन-निर्माण से लेकर राष्ट्र-निर्माण करने वाली एक-एक ईंट भष्टाचार में डूबी हुई है। यदि पौराणिक कथा की मानें तो इन भश्धाचियों को भी एक दिन नर्क में जाना ही पड़ेगा।

प्रश्न 21.
अच्छा, मुझे उसका नाम पता तो बतलाओ।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
नारद जी ने धर्मराज, चित्रगुप्त तथा दूत की परेशानी को देखते हुए उनकी मदद करने के लिए भोलाराम का पता पूछा ताकि वे उसके जीव को खोजकर ला सकें। चित्रगुप्त ने नारद जी को रजिस्टर देखकर बताया कि सरकारी कर्मचारी भॉलाराम अपनी पत्नी, दो लड़के और एक लड़की के साथ जबलपुर के घमापुर मुहल्ले में रहता था।

यह पूरा परिवार नाले के किनारे मात्र डेढ़ी कमरे में रहता था। भोलाराम पाँच साल पहले रिटायर हो चुका था। पिछले एक साल से उसने मकान-किराया भी नहीं दिया था। अगर मकान-मालिक वास्तविक होगा तो उसने भोलाराम के मरने के बाद ही उसके परिवार को घर से बाहर कर दिया होगा। ऐसे में भोलाराम के परिवार का अता-पता ढूढना एक कठिन काम होगा। इस पवित के माध्यम से परसाई जी ने सरकारी तथा सामाजिक विसगगतियों के प्रति एक साथ अपना क्षोभ प्रकट किया है।

प्रश्न 22.
उन्हें खुश कर लिया तो अभी काम हो जाएगा।
उत्तर :
संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति हरिशंकर परसाई की कहानी ‘भोलाराम का जीव’ से ली गई है।
व्याख्या : पेंशन-दफ्तर का चपरासी काफी देर से नारद जी को परेशान होते देख रहा था। हर बाबू उन्हें दूसरे बाबू के पास भेज देता था। इस तरह उन्होंने पच्चीस-तीस सरकारी बाबुओं और अफसरों के दर्शन का लाभ उठाया। यह सब देखकर चपरासी से नहीं रहा गया। क्योंकि उसे पता था कि इस तरह नारद जी का काम तो होने से रहा।

अंत में उसने नारद जी का समझाया – ‘अगर आप साल-भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया तो अभी काम हो जाएगा।’ प्रस्तुत्रसंग सरकारी दफ्तर के बाबुओं तथा उनके काम-काज के तरीके की पोल खोलता है। यही जनतंत्र है – अर्थात् यहाँ जनता का तंत्र नहीं, जनता के लिए तंत्र की व्यवस्था की गई है और इस व्यवस्था की कीमत भी चुकानी पड़ती है।

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प्रश्न 23.
ऐसा कभी नहीं हुआ था।
अथवा
प्रश्न 24.
पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना भोलाराम का जोव’ है तथा इसके रचनाकार हरशिकर परसाई हैं।
ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी की मृत्यु के बाद उसका जीव यमदूत के चगुल से बचकर निकल भागा हो तथा उसका पता नहीं चल पाया हो। लेकिन इस बार भोलाराम के जीव ने यमदूत को चकमा दे दिया था तथा उसका कहीं कोई अता-पता नहीं था।

प्रश्न 25.
गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी।
– पाठ का नाम लिखें। कौन-सी गलती पकड़ में नहीं आ रही थी ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘भोलाराम का जीव’ है।
चित्रगुप्त लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों का हिसाब रख रहे थे। भोलाराम के बारे में भी उनके रजिस्टर में सारी जानकारी सही-सही दर्ज थी। फिर भी उसका जीव कहाँ गायब हो गया – यह गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी।

प्रश्न 26.
महाराज, वह भी लापता है।
– वक्ता कौन है? यहाँ ‘भी’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
वक्ता चित्रगुप्त है ।
धर्मराज ने सोचा था कि केवल भोलाराम का जीव ही गायब है लेकिन बात ऐसी नहीं थी। उसके साथ वह यमदूत भी गायब था जो भोलाराम के जीव को लाने गया था। इसलिए जब धर्मराज ने यमदूत के बारे में पूछा तो चित्रुप्त ने कहा कि महाराज, उसका भी कुछ पता नहीं है।

प्रश्न 27.
उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था।
– यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है ? उसका चेहरा ऐसा क्यों हो गया था ?
उत्तर :
यहाँ उस यमदूत के बारे में कहा जा रहा है जो भोलाराम के जीव को लाने गया था।
भोलाराम के जौव के गायब हो जाने पर यमदूत उसे लगातार पाँच दिनों तक पूरे ब्रह्माड में ढूंढ़ता रहा। इसीलिए इस मुसीबत के कारण उसका मौलिक चेहरा कुरूप हो गया था।

प्रश्न 28.
मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके।
– वक्ता कौन है ? वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता यमदूत है।
वक्ता के कथन का आशय है कि वकील नाम का जीव पृथ्वी पर सबसे चालाक होता है। वह सच को झूठ तथा यूठ को सच बना देता है तथा अच्छे-अच्छे की आँखों में धूल झोंक सकता है। ऐसेवकील भी यमदूत के हाथों से नहीं छूट सके, फिर यह भोलाराम तो एक सीधा-साधा गरीब क्लर्क था।

प्रश्न 29.
महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है।
– वक्ता कौन है? वह किस प्रकार के व्यापार की बातें कर रहा है ?
उत्तर :
वक्ता चित्रगुप्त हैं।
भोलाराम के जीव के गायब होने के संबध में चित्रुप्त धर्मराज को समझाते हैं कि ऐसा व्यापार आजकल पृथ्वी पर आम हो गया है। रेलवे से पार्सल के सामान का गायब हो जाना, विरोधी नेता को उड़ाकर कहीं बंद कर देना तो साधारण-सी बात हो गई है। हो सकता है कि भोलाराम के जोव को भी किसी ने गायब कर दिया हो।

प्रश्न 30.
वह समस्या तो कब की हल हो गई।
– रचना का नाम लिखें। कौन-सी समस्या कैसे हल हो गई ?
उत्तर :
रचना ‘भोलाराम का जीव’ है।
नरक में निवास-स्थान की समस्या हो गई थी। अपने युरे कर्मों के कारण नरक में पृथ्वी से अनेक कारीगर, इंजीनियर, ठेकेदार तथा ओवरसियर आ गए थे। इन लोगों ने देखते ही देखते नरक में आवास की समस्या को हल कर दिया था।

प्रश्न 31.
हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।
– वक्ता और श्रोता के नाम लिखें। कथन का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता नारद मुनि हैं तथा श्रोता धर्मराज हैं।
नारद ने भोलाराम के जीव के गायब होने के बारे में यह संभावना व्यक्त की कि कहीं इनकम टैक्स वालों ने तो उसे नहीं रोक लिया। पृथ्वी पर क्या मजाल है कि कोई इनकम टैक्स चुकाए बिना नगर छोड़ सके, लोक को छोड़ना तो दूर की बात है।

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प्रश्न 32.
अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है, तो उसने भोलाराम के मरते ही, उसके परिवार को निकाल दिया होगा।
– वक्ता और श्रोता कौन हैं ? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता चित्रगुप्त हैं तथा श्रोता नारद मुनि हैं।
यहाँ चित्रगुप्त ने पृथ्वी पर के उन मकान-मालिको की प्रकृति के बारे में कहा है जो अपना मकान किराये पर देते हैं। भोलाराम ने एक साल से किराया नहीं दिया था, इसलिए चित्रगुप्त संभावना व्यक्त करते हुए कहते हैं कि यदि वह सच्चा मकान-मालिक होगा तो भोलाराम की मृत्यु होने के साथ ही उसने भोलाराम के परिवार को अपने मकान से निकाल बाहर किया होगा।

प्रश्न 33.
गरीबी की बीमारी थी।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। वक्ता कौन है तथा वह ऐसा क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
रचना ‘भोलाराम का जीव’ है तथा इसके रचनाकार हरिशंकर परसाई हैं।
नारद जी को ऐसा लगा कि भोलाराम की मृत्यु किसी बीमारी से हुई होगी इसलिए उन्होंने उसकी पत्नी से पूछा – ‘माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी ?’ पत्नी ने बताया कि भोलाराम को गरीबो की बीमारी थी। पाँच साल पहले रिटायर हुए लेकिन अभी तक पेशन नही मिली। घर के गहने-बरतन सब बिक गए। चिता में घुलकर भूख से उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 34.
तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो।
– वक्ता तथा श्रोता के नाम लिखें। वक्ता उसे ऐसा क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
वक्ता भोलाराम की पत्नो तथा श्रोंता नारद मुनि हैं।
नारद जो सांच रहे थे कि किसी के प्रति विशेष आसक्ति के कारण ही भोलाराम का जीव गायब हों गया है। उन्होंने उसकी पत्नी से पूछा कि पारिवारिक जीवन से बाहर किसी स्त्री के प्रति उनकी कोई आसक्ति तो नहीं थी तो भोलाराम की पत्नी ने उन्हे डाँटते हुए कहा कि तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। ऐसी बाते करते तुम्हें शर्म नहीं आती।

प्रश्न 35.
यही हर अच्छी गृहस्थी का आथार है।
– वक्ता कौन है ? वह किसे हर अच्छी गृहस्थी का आधार बता रहा है ?
उत्तर :
वक्ता नारद मुनि हैं।
भालाराम की पल्ली ने किसी अन्य स्त्री के प्रति अपन पति की बात को एक सिरे से नकार दिया। बल्कि उसन यह कहा कि उसके पति ने जीवन भर किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा। इस पर नारद जी ने उस पर व्यग्य करते हुए कहा कि पति के प्रति यही विश्वास हर अच्छी गृहस्थी का आधार है।

प्रश्न 36.
पर उन पर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होगी।
– वक्ता कौन है ? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता पेंशन-कार्यालय के पहले कमरे में बैठा बाबू है ।
आज हर सरकारी कार्यालय की यह रीति है कि बिना रिश्वत के काई काम नहीं होता। जिस काम के लिए ‘पंपरवंट’ नहीं रखा जाता, उस फाईल के कागजात यूँ ही उड़ते रहते है। हो सकता है कि पेपरवें न रखने के कारण ही भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ गई होगी।

प्रश्न 37.
आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती।
– वक्ता और श्रोता कौन हैं ? यहाँ दुनियादारी का आशय क्या है ?
उत्तर :
वक्ता पेंशन-कार्यालय का बाबू है तथा श्रोता नारद मुनि हैं।
नारद जो को ‘पेपरवेट’ का अर्थ समझ में नहीं आया था इसलिए बाबू ने उनसे कहा कि साधु होने के कारण आपको दुनियादारी की बातें समझ नहीं आती। पेपरवंट का मतलब रिश्वत की उस राशि से है जो किसी को काम करने के लिए दिया जाता है।

प्रश्न 38.
उन्हें खुश कर दिया, तो अभी काम हो जाएगा।
– पाठ का नाम लिखें। किसे खुश करने से कौन-सा काम हो जाएगा ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘भोलाराम का जीव’ है।
नारद जी पेशन-कार्यालय के पच्यीस-तीस बाबुओं से मिल चुके थे – लेकिन कुछ काम होता नजर नही आ रहा था। उनकी इस परेशानी तथा भागम- भाग को एक चपरासी देख रहा था। उसने सहानुरूति दिखाते हुए नारद जी को समझाया कि अगर सालों भर ऐसे चवकर लगाते रहे तो भी काम नहीं होगा। यदि बड़े साहब को आपने खुश कर दिया ता आपके भोलाराम के पेंशन का रूका हुआ काम तुरंत हो जाएगा।

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प्रश्न 39.
इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं।
– किसे, किसी ने क्यों नहीं छेड़ा ?
उत्तर :
नारद जी को पेशन-कार्यालय के बड़े साहब के कमरे में घुसने के दौरान किसी ने नहीं छेड़ा। कारण यह था कि कमरे के दरवाजे पर जिस चपरासी की ड्यूटी थी, वह बैठा-बैठा ऊंध रहा था फिर उन्हें कमरे के अंदर जाने से कौन रोकता?

प्रश्न 40.
यह भी एक मंदिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है।
– पाठ का नाम लिखें। ‘मंदिर’ तथा ‘दान-पुण्य’ का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम है – “भोलाराम का जीव’।
प्रस्तुत अंश में ‘मंदिर’ का आशय सरकारी कार्यालय तथा ‘दान-पुण्य’ का आशय रिश्वत से है। जैसे भक्तजन किसी माददर मे जाने पर वहाँ आवश्यक रूप से दान-पुण्य करते हैं वैसे ही सरकारी कार्यालयों रूपी मंदिर में चपरासी से लंकर बड़े बाबू तक को रिश्वत देना ही दान-पुण्य है। बिना चढ़ावे के तो भगवान भी खुश नहीं होते फिर एक साधारण मनुष्य तां बंचारा कमजोंरियों का पुतला है।

प्रश्न 41.
इसका भी वजन भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है।
अथवा
प्रश्न 42.
मेरी लड़की गाना-बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा।
– वक्ता कौन है ? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता पेंशन कार्यालय के बड़े साहब हैं।
जब बड़े साहब ने देख लिया कि इस साधु से कोई रकम हासिल होनवाली नहीं है तो उन्होने रिश्वत के तौर पर नारद से उनकी वीणा ही माँग ली। वीणा लेन के बारे में उसने तर्क देते हुए कहा कि मेरी लड़की गाना-बजाना सीखती है। यदि उसे साधु-संतों की वीणा मिल जाएगी तो वह जल्द ही सीख जाएगी।

प्रश्न 43.
कौन पुकार रहा है मुझे।
– किसने, कब और क्यों कहा ?
उत्तर :
नारद जी से रिश्वत के रूप में वीणा ले लेने पर बड़े साहब ने भोलाराम की फाईल मंगवाई। नाम निश्चित करने के लिए उसनेन नारद जी से पेशन पानेवाले का नाम पूछा। नारद जी ने यह सांचकर कि साहब ऊँचा सुनते हैं – जार से कहा – भोलाराम। तभी पेशन की फाईल में से आवाज आई – “‘कौन पुकार रहा है मुझे ? पोस्टमैन है क्या? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?”

प्रश्न 44.
पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए।
– कौन किस ब्वात को दूसरे ही क्षण समझ गए ?
उत्तर :
जब भोलाराम के पेशन की फाईल से यह आवाज आई कि कौन पुकार रहा है मुझे ? पोस्टमैन है क्या ? क्या पेशन का आर्डर आ गया – तो एक क्षण के लिए नारद जी को यह समझ में नहीं आया कि यह आवाज कहाँ से आई। लेकिन दूसरे ही क्षण वे समझ गए कि इसी पेंशन की फाइल में से आवाज आ रही है तथा भोलाराम का जीव भो इसी फाईल मे छिपा है।

प्रश्न 45.
चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है।
– वक्ता कौन है ? किसका इंतजार स्वर्ग में क्यों हो रहा है ?
उत्तर :
वक्ता नारद मुनि हैं।
भोलाराम के जीव का इतजार स्वर्ग में हो रहा है क्योंकि उसने अपने जीवन में ऐसा कोई पाप नही किया जिसके कारण उसे नरक में जाना पड़े। अगर भोलाराम भी अन्य क्लको की तरह रिश्वतखोर होता तो उसे पेशन मिलन में देर नहीं होती और न ही उसे पेशन के कारण भूखों मरना पड़ता।

प्रश्न 46.
मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्यास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता भोलाराम का जीव है।
भोलाराम ने रिटायर होने के बाद पाँच वर्षों तक पेंशन मिलने का इंतजार किया। पेंशन न मिलने से उसके घर के गहने-बरतन सब बिक गए। जब बेचने को घर में कुछ भी न बचा तो फाके की नौबत आई और भूख के कारण भोलाराम की मौत हो गई। भोलाराम की मृत्यु के बाद उसका बचा-खुचा पेंशन ही उसके परिवार का एकमात्र सहारा था, इसलिए उसकी आत्मा पेंशन की फाईल से ही बस गई थी।

प्रश्न 47.
अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा।
– वक्ता कौन है ? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता चपरासी है।
चपरासी ने नारद जी को एक-बाबू से दूसरे बाबू और इस तरह पच्यीस-तीस बाबुओं के पास भटकते देखा। वह ऑफिस के रीति-रिवाज से भली-भांति परिचित था – वह जानता था कि नारद जी का काम कैसे हो सकता है। इसलिए उसन नारद जी को समझाया कि उनका काम एक टेबल से दूसरे टेबल तक भटकने से नहीं होगा। अगरवे बड़े साहब को खुश कर दे तो उनका काम तुरंत हो जाएगा। और नारद जी को चपरासी की यह बात पसंद भी आई।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 5 भोलाराम का जीव

प्रश्न 48.
दरख्वास्तें ‘पेपरवेट’ से नहीं दबतीं।
– वक्ता कौन है ? वह क्या समझाना चाहता है ?
उत्तर :
वक्ता पेंशन-कार्यालय के बाबू हैं।
जब बाबू ने नारद जी को पेंशन के काम के लिए ‘पेपरवेट’ रखने की बात कही तो नारद जी ने वहाँ टेबल पर रखे पेपरवेंट की और इशारा किया कि इन पेपरवेटो को भी तो उस पर रखा जा सकता है। बाबू को नारद जी के भोलेपन पर हंसी आई। उन्होने समझाया कि ऐसे काम इन पेपरवेटों से नहीं होते। उसका इशारा था कि जबतक आप रिश्वत नहीं देंगे. आपका काम नहीं हो पाएगा।

प्रश्न 49.
मेरा मतलब है, किसी स्त्री।
– पाठ का लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम है – ‘भोलाराम का जीव’।
जब नारद जी ने भोलाराम की पत्नी पूछा कि कहीं भोलाराम का किसी के साथ विशेष प्रेम तो नहीं था तो यह बात उसकी पत्नी को समझ में नहीं आई। तब नारद जी ने खुलासा किया कि कहीं वे किसी अन्य स्र्री के प्रेम में नहीं पड़े थे। नारद जी की इस बात का भोलाराम की पत्नी बुरा मान गई।

प्रश्न 50.
साधुओं की बात कौन मानता है।
– यह कौन, किससे और क्यों कह रहा है ?
उत्तर :
यह कथन नारद जी भोलाराम की पत्नी से कह रहे हैं क्योंकि उसने नारद जी से यह आग्रह किया था कि आप तो सिद्ध पुरूष हैं। क्या आप कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रूकी हुई पेंशन चालू हो जाय ताकि मेरे बच्यों का पेट तो कुछ दिन तक भर सके।

प्रश्न 51.
यह लीजिए।
– कौन, किसे, क्या दे रहा है और क्यों ?
उत्तर :
नारद जी पेंशन-कार्यालय के बड़े साहब को ‘पेपरवेट’ अर्थात् रिश्वत के तौर पर अपनी वीणा दे रहे हैं। उन्हें अपनी प्रिय वीणा इसलिए देनी पड़ रही है क्योंकि वे इस बात को अच्छी तरह समझ गए थे कि बिना रिश्वत के भोलाराम की पेंशन मिलने वाली नहीं है।

प्रश्न 52.
क्या करोगी माँ ?
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘भोलाराम का जीव’ है तथा इसके रचनाकार हरिशंकर परसाई जी हैं।
नारद जी जब भालाराम की पत्नी से मिले तो उसका दुख कम करने के लिए उन्होंन सहानुभूति के तौर पर यह कहा – “क्या करोगी माँ? उनकी इतनी ही उम्न थी।” – नारद जी की इस बात का विरोंध करते हुए भोलाराम की पत्नी ने कहा कि उनकी उम्म तो अभी काफी थी लंकिन पेशन न मिलने से चिता तथा भुखमरो के कारण असमय हो उनकी मृत्यु हो गयी।

प्रश्न 53.
तुप्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गई।
– वक्ता और श्रोता कौन हैं? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता धर्मराज है तथा श्रॉता चित्रगुप्त हैं।
जब पृथ्वो पर चल रह व्यापार के बारं में बतांत हुए चित्रगुप्त ने भोलाराम के बारे में यह आशंका प्रकट की कि कहीं भालाराम के जीव का भी तो किसी विरोधो ने मरने के बाद खराबी करने के लिए ता नहीं उड़ा दिया – तो यह बात सुनकर धर्मराज न व व्यंग्य करते हुए चित्रगुप्त से कहा कि तुम्हारो भी रिटायर होन की उम्र आ गई है क्योंकि भालाराम एक नगण्य और दीन-हीन आदमी था। वैसे भुखमर व्यक्ति का किसी से क्या लेना-देना ?

प्रश्न 54.
इनकम होती तो टैक्स होता। भुखमरा था।
– पाठ का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम है – ‘भालाराम का जोव’।
भालाराम के गायब जीव के बारे मे नारद जी ने चित्रगुप्त से यह पूछ्छा कि कहीं इनकम टैक्स वालों ने तो उसे नही रोंक लिया। इसपर चित्रगुप्त ने कहा कि यदि उसके पास इनकम होता तो टैक्स होंता। भोलाराम जैसे भुखमरं इसान से इनकम टैक्स वालों का तों दूर-दूर तक काई नाता नहीं होता।

प्रश्न 55.
अब कुछ नहीं बचा था ?
– ‘कुछ’ से क्या तात्पर्य है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘कुछ’ का तात्पर्य उन चीजों से है जिसे बंचकर पेट की आग बुझाई जा सकती।
पाँच वर्षो तक पशन मिलन के इतजार में भौलाराम ने पहाड़ के समान दिन काटे। पहले घर के जंवर, बर्तन आदि बिंके जब कुछ भी बिकने के लायक चीज न बची ता अंत में फांक को नौबत आई और इसी फांक तथा परिवार के भरणपोषण की चिता में घुलं-घुलते भोलाराम चल बसा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘भोलाराम का जीव’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
प्रश्न – 2: ‘भोलाराम का जीव’ कहानी की मूल संवेदना पर विचार करें।
प्रश्न – 3 : ‘भोलाराम का जीव’ कहानी में व्यंग्य की तीखी मार स्पष्ट झलकती है – विवेचना करें।
प्रश्न – 4 : ‘भोलाराम का जीव’ में निहित व्यंग्य पर प्रकाश डालें।
प्रश्न – 5 : ‘भोलाराम का जीव’ पाठ में व्यक्त लेखक के विचारों को लिखें।
प्रश्न – 6 : ‘भोलाराम का जीव’ वर्तमान भारत के सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार का पोल खोलती है – लिखें ।
प्रश्न – 7 : ‘भोलाराम का जीव’ पाठ में निहित संदेश को लिखें।
प्रश्न – 8: ‘भोलाराम का जीव’ पाठ में निहित परसाई जी के उद्देश्य को लिखें।
उत्तर :
‘भालाराम का जीव’ हरिशंकर परसाई की एक ऐसी कहानी है जिसमें सामाजिक विसंगतयां के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त भ्रष्धान को केन्द्र में रखा गया है। भोलाराम का जीव धर्मराज के दरबार में इसलिए नहीं प्रस्तुत हो पाता है चूंक वह पेंशन की फाइलो में अटका पड़ा है।

लंकिन चितगुप्त को यह आशंका है कि इस तरह गायब करनेकराने का व्यापार धरती पर बहुत तेजी से चल रहा है। लोगो के द्वारा भंजे गए फल, होजरी के सामान रेलवे से रास्ते में ही गायब हो जाते हैं। कभी-कभी ता मालगाड़ी के डब्बे के डब्ब रास्त में ही कट जाते है। इतना ही नहीं, राजनैतिक दलों के नेता विरांधी नेता को उड़ाकर कहीं बंद कर देते हैं। कहीं भालाराम के साथ भी ता एसा नहीं हुआ?

अंतत: नारद जी चित्रगुप्त से भोलाराम का पता लगाने पृथ्वी पर जाते हैं। उन्हें भोलाराम की पत्नी से मिलकर पता चलता है कि अगर उन्हें पेशन मिल जाती तो उनको मृत्यु नहीं होती। उनकी मृत्यु भूख से हुई।

अंत में उसके पेंशन का पता लगाने नारद जो सरकारी दफ्तर जाते हैं। कई बाबुओं के पास चक्कर काटने पर भी कुछ पता वहीं चलता। आखिर एक चपरासी की सलाह पर वे सीधे बड़ साहब सं मिलत हैं। बड़े साहब ‘वज़न’ के तौर पर वीणा लेकर भोलाराम की पेशन को फाईल, निकलवाते हैं। तभी नाम पूछे जाने पर जब नारद जार से ‘भालाराम’ कहतं हैं तो फाईल में से आवाज आती है – ‘कौन पुकार रहा है मुझे? पोस्टमैन है क्या? पंशन का ऑर्डर आ गया।’

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नारद जी को यह बात समझ आ जाती है कि यह भोलाराम के जीव की आवाज है। वे कहते हैं कि मै तुम्हे लेन आया हूँ। चलो, स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है। लेकिन भोलाराम का जीव स्पष्ट कह देता है – ‘मुझे नहीं जाना। मैं तो पंशन की दरखास्तों में अटका हृं। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्ते छोंड़कर नहीं जा सकता।’

यही यह कहानी का चरम बिन्दु है जिसमें परसाई जी ने दिखाना घाहा है कि आज हमारी सारी व्यवस्था ही भ्रष्ट हो चुकी है। चाहे वह राजनीति, समाज, शिक्षा, प्रशासन या न्याय का क्षेत्र हो – सभी की सभी संस्थाएँ ही भष्टाचार की गिरफ्त में आ चुकी हैं। हमारी व्यवस्था का तंग्र इतना निर्मम, अमानवीय और संवेदनशून्य हो चुका है कि उसं यह सोचने की फुर्सत नहीं कि जो आदमी जिन्दगी-भर ‘भुखमरा’ रहा और ‘गरीबी की बीमारी’ के कारण जिसकी जान गई, वह वज़न अर्थात् घूस के लिए पैसे कहाँ से लाएगा।

परसाई जी अपन मूल रूप में व्यंग्यकार हैं। जो सामाजिक विसंगतियां के प्रात गहरा सरोकार रखता है, वही लेखक सच्चा व्यंग्यकार हो सकता है। ‘भालाराम का जीव’ में स्थितियों, व्यक्तियों तथा प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करके वे सामाजिक विसर्गतयों के प्रति अपना क्षोभ ता प्रकट करते हो है, सामाजिक सरांकारों के बीच एक नैतिक हस्तक्षेप भी करते हैं। परसाई जो की रचनाओं की यह एक अन्यतम विशेषता है कि विसंगतियों के प्रति सारी कटुता के बावजूद आम आदमी के प्रति उनकी गहरी संवेदना प्रकट होती है।

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
चित्रगुप्त को कौन-सी गलती पकड़ में नहीं आ रही थी?
उत्तर :
चित्रगुप्त लाखों सालों से व्यक्ति को मरने के बाद उसके कर्म या सिफारिश के आधार पर स्वर्ग या नर्क में निवास-स्थान ‘अलाट’ करते आ रहे थे। लेकिन एसा कभी नहीं हुआ था कि कोई जीव देह त्यागने के बाद दृत के साथ पाँच दिनों तक गायब रहा हो। ऐसा आखिर किस प्रकार हुआ – यही गलती चिन्रगुप्त को पकड़ में नहीं आ रही थी।

प्रश्न 2.
दूत ने भोलाराम के जीव को लाने की सावधानी के बारे में क्या कहा?
उत्तर :
दूत ने अपनी सावधानी के बारे में धर्मराज से कहा कि मेंरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे से अच्छे वकील भी नहीं छूट सके लंकिन लगता है कि इस ब्बार तो कोई इन्द्रजाल (जादू) ही हो गया।

प्रश्न 3.
चित्रगुप्त ने रेलवे में चल रहे किस व्यापार के बारे में धर्मराज को बताया?
उत्तर :
चित्रगुप्त ने रेलवे में चल रहे व्यापार के बारं में बताते हुए धर्मराज से कहा कि अगर लोग रेलवे से अपने दास्तों को फल भजजे हैं तो उसे रेलवे वाले ही उड़ा लंते हैं। पार्सल मे भेज गए होजरी के मोजे रेलवे के अफसर पहनते है। कभीकभी तो मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे ही रास्ते में कट जाते है।

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प्रश्न 4.
चित्रगुप्त ने नारद जी से ऐसा क्यों कहा कि भोलाराम के परिवार की तलाश में आपको काफी घूमना पड़ेगा?
उत्तर :
भोलाराम ने मरने से पहले मकान का किराया एक साल से नहीं दिया था और मकान-मालिक उसं मकान से निकालना चाह रहा था। अगर वह वास्तविक मकान मालिक है नो निश्चित तौर पर उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को मकान से निकाल बाहर किया होगा । यही कारण था कि चित्रगुप्त ने नारद से यह कहा कि भोलाराम के परिवार की तलाश में आपको काफी घूमना पड़ेगा।

प्रश्न 5.
भोलाराम की पत्नी ने नारद जी से उसकी किस बीमारी के बारे में बताया?
उत्तर :
भोलाराम की पत्मी ने नारद जी से भोलाराम की गरोबी की बीमारी के बारे में बताया। रिटायर होने केबाद पाँच वर्षो में भोलाराम की पत्ली के सारे गहने बिक गए, फिर बर्तन भी बिके। अब उनके पास कुछ नहीं बचा था जिसे बेचकर पेट की भूख भिटाई जाय। अंत में चिंता में घुलते-घुलते तथा भूख के कारण भोलाराम ने दम तोड़ दिया

प्रश्न 6.
भोलाराम की पत्नी ने नारद को लुच्चा-लफंगा क्यों कहा?
उत्तर :
नारद जी ने भोलाराम की पत्नी से यह पूछा था कि क्या भोलाराम का किसी से कोई विशेष प्रेम था जिसमें उसकी जी लगा हो। नारद के कहने का तात्पर्य किसी दूसरी खी के साथ प्रेम-प्रसंग से था। यह समझकर ही भोलाराम की पत्वी ने नारद को लुच्चा-लफंगा कहा क्योंकि कोई साधु तो ऐसी बात कर नहीं सकता।

प्रश्न 7.
सरकारी दफ्तर के बाबू ने भोलाराम के दरख्वास्त के बारे में नारद जी को क्या बताया?
उत्तर :
सरकारी दफ्तर के बाबू नारद जी को भोलाराम के दरख्यास्त के बारे में यह बताया कि दरख्वास्त तो भेजीं धीं पर उनपर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गयी होंगी।

प्रश्न 8.
दफ्तर के चपरासी ने नारद जी को क्या सलाह दी?
उत्तर :
दफ्तर के चपरासी ने नारद जी को यह सलाह दी – ” अगर आप साल-भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नही होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया तो अभी काम हो जाएगा।

प्रश्न 9.
बड़े साहब नारद जी से क्यों नाराज़ हुए?
उत्तर :
बड़े साहब का चपरासी दरवाजे पर ऊंघ रहा था इसलिए नारद जी उसे बिना बताएं दफ्तर में प्रवेश कर गए। नारद जी ने अपना विजिटिंग कार्ड भी नहीं भिजवाया था – इन्हीं कारणों से बड़े साहब नारद जी से नाराज हुए।

प्रश्न 10.
बड़े साहब ने नारद जी को दफ्तर के रीति-रिवाज के बारे में क्या बताया?
उत्तर :
बड़े साहब ने नारद जी को दफ्तर के रीति-रिवाज के बारे में बताते हुए कहा कि, ” भई, यह भी एक मंदिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है, भेंट-चढ़ानी पड़ती है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख्वास्ते उड़ रही है, उन पर वजन रखिए।’

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प्रश्न 11.
बड़े साहब ने नारद जी को ‘वज़न’ के बारे में क्या समझाया?
उत्तर :
बड़े साहब ने नारद जो को ‘वज़न’ के बारे में समझाते हुए कहा – ‘भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेशन का केस बीसों दप्तर में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतनी कीमत की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ जल्दो भी हो सकती है, मगर वज़न चाहिए। आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वजन भोलाराम की दरखास्त पर रखा जा सकता हैं।

प्रश्न 12.
भोलाराम के जीव को स्वर्ग ले चलने की बात कहने पर भोलाराम के जीव ने क्या कहा?
उत्तर :
जब नारद जी ने भोलाराम के जीव से जब यह कहा कि ‘मैं नारद हूँ। मैं तुम्हें लेने आया हूँ। चलो, स्वर्ग में तुम्हारा इतजार हो रहा है।” – इस पर भोलाराम के जीव ने कहा कि “मुझे नही जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों में अटका हूं। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्यास्ते छोड़कर नहीं जा सकता ।”

प्रश्न 13.
भोलाराम कौन था ?
उत्तर :
भोलाराम एक गरीब क्लर्क था जिसके रिटायर हो जाने के बाद भी रिश्वत के अभाव में उसकी पेशन की फाईल अटकी पड़ी थी।

प्रश्न 14.
धर्मराज यमदूत पर क्रोधित क्यों थे ?
उत्तर :
धर्मराज को ऐसा लगा कि यमदूत की लापरवाही के कारण ही भोलाराम का जीव चकमा देकर भाग गया। इसलिए वे यमदूत पर कोधित थे।

प्रश्न 15.
गलती पकड़ने के लिए चित्रगुप्त क्या कर रहे थे ?
उत्तर :
गलती पकड़ने के लिए चित्रगुप्त चश्मा पोंछ कर बार-बार थूक। से पन्ने पलट रजिस्टर पर रजिस्टर देखे जा रहे थे।

प्रश्न 16.
किसका चेहारा विकृत हो गया था और क्यों ?
उत्तर :
यमदूत का चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण विकृत हो गया था।

प्रश्न 17.
धर्मराज ने किसके रिटायर होने की बात कही, क्यों ?
उत्तर :
धर्मराज ने चित्रगुप्त के रिटायर होने की बात कही क्योंकि उसने भोलाराम के जीव के गायब होने के जितने भी कारण बताए, वह भोलाराम पर लागू नहीं होता था।

प्रश्न 18.
चित्रगुप्त ने रजिस्टर देखकर भोलाराम के बारे में क्या बताया ?
उत्तर :
चित्रगुप्त ने राजस्टर देखकर भोलाराम के बताया कि वह जबलपुर शहर में धमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डढढ़ कमरे के दूटे-फूटे मकान में सपरिवार रहता था। उसकी एक स्ती, दो लड़के तथा एक लड़की थी। सरकारी नौकरी से वह पाँच साल रिटायर हो चुका था।

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प्रश्न 19.
नारद जी ने भोलाराम के दरवाजे पर पहुँचकर उसकी बेटी से क्या कहा ?
उत्तर :
नारद जी ने भोलाराम के दरवाजे पर पहुँचकर उसकी बेटी से कहा कि उन्हें भिक्षा नहीं चाहिए केवल भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है।

प्रश्न 20.
भोलाराम की स्त्री ने भोलाराम की बीमारी के बारे में नारद को क्या बताया ?
उत्तर :
भोलाराम की स्त्री ने उसकी बीमारी के बारे में नारद जो को यह बताया कि रिटायर होने के पाँच साल बाद भी पेंशन नहीं मिली। हरेक दस-पंद्रह दिन पर दरखवास्त देने पर एक ही जवाब आता था – तुम्हारे पेंशन के मामले में विचार हों रहा है।

प्रश्न 21.
भोलाराम की स्त्री ने भोलाराम की मृत्यु का क्या कारण बताया ?
उत्तर :
भोलाराम की स्त्री ने भोलाराम की मृत्यु का कारण पेंशन न मिलने को बताया। पहले घर के गहने बिके, फिर बरतन और कुछ न बचने पर चिता में घुलते-घुलते उन्होंने दम तोड़ दिया।

प्रश्न 22.
नारद जी ने हर अच्छी गृहस्थी का आधार किसे बताया ?
उत्तर :
स्वी का अपने पति पर आँखें मूँदकर विश्वास करने को नारद जी ने हर अच्छी गृहस्थी का आधार बताया।

प्रश्न 23.
भोलाराम की स्त्री में नारद जी से क्या विनती की ?
उत्तर :
भोलराम की स्वी ने नारद जी से यह विनती की – ”महाराज, आप तो साधु है, सिद्ध पुरूष है। कुछ ऐसा नहीं कर सकने कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाए। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए।”

प्रश्न 24.
सरकारी दफ्तर के चपरासी ने नारद जी को क्या सलाह दी ?
उत्तर :
सरकारी दफ्तर के चपरासी ने नारद जी को यह सलाह दी – “महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए। अगर आप यहाँ साल भर चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा।

प्रश्न 25.
बड़े साहब नारद से क्यों बड़े नाराज हुए ?
उत्तर :
नारद जी बड़े साहब के दफ्तर में बिना किसी अनुमात के, बिना चपरासी को भेजे या अंदर जाने के पहले न तो विर्जिटिंग कार्ड भंज – धड़धड़ाते चले आए। नारद की इसी हरकत से बड़े साहब काफी नाराज़ हुए।

प्रश्न 26.
साहब ने रौब के साथ नारद जी से क्या पूछा ?
उत्तर :
साहब ने रौब के साथ नारद जी से यह पूछा, “इसे कोई मंदिर-वदिर समझ लिया है क्या ? धड़धड़ाते चले आए ! चिट क्यों नहीं भेजी ? क्या काम है ?’.

प्रश्न 27.
बड़े साहब ने नारदजी को क्या समझाया ?
उत्तर :
बड़े साहब ने नारदजी को यह समझाया कि, “ आप हैं बैरागी। दफ्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते।. भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भौ दान-पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलराम की दरख्वास्ते उड़ रही हैं। उन पर वजन रखिए।”

प्रश्न 28.
बड़े साहब ने नारदजी को सरकारी काम के तरीके के बारे में क्या समझाया ?
उत्तर :
बड़े साहब ने नारदजी को सरकारी काम के तरीके के बारे में यह समझाया – “भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ्तर में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतने ही स्टेशनरी लग जाती है।”

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प्रश्न 29.
बड़े साहब ने भोलाराम की फाईल के वजन के बारे में नारद जी को क्या कहा ?
उत्तर :
बड़े साहब ने भोलराम की फाईल के वजन के बारे में नारदजी को कहा – “जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वजन भोलाराम की दरख्यास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लड़की गाना-बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूगा। ${ }^{\prime \prime}$

प्रश्न 30.
कौन पुकार रहा है मुझे ? – वक्ता कौन है ? इस अंश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता भोलराम का जोव है।
जब बड़े साहब के नाम पूछने पर नारद जी ने जोर से भोलाराम का नाम लिया तो सहसा फाईल में से भोलाराम के जीव ने कहा — ” कौन पुकार है मुझे ? पोस्टमैन है ! क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?

प्रश्न 31.
धर्मराज किस आधार पर लोगों को स्वर्ग या नरक में निवस-स्थान ‘अलॉट’ करते आ रहे थे?
उत्तर :
लॉगो को उनके कर्मो (पाप-पुण्य) के आधार पर धर्मराज स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान ‘अलॉट’ करते आ रहे थे ।

प्रश्न 32.
ऐसा कभी न हुआ था – क्या कभी न हुआ था ?
उत्तर :
एसा कभी न हुआ था कि किसी की आत्मा यमलोक के लिए चली हो और रास्ते से ही गायब हो गई हो।

प्रश्न 33.
धर्मराज के पास बदहवास कौन आया ? उसके बदहवास होने का पता कैसे चल रहा था ?
उत्तर :
धर्मराज के पास बदहवास हाल में यमदूत आया। उसके बदहवास होने का पता उसके चेहरे से लग रहा था जो परिश्रम, भय और परेशानी के कारण विकृत हो गया था।

प्रश्न 34.
“अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन ?” – वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता धर्मराज है तथा श्रांता यमदूत है।

प्रश्न 35.
किसने सारा ब्रहांड छान मारा और किसका पता नहीं चला ?
उत्तर :
यमदूत ने सारा ब्रहांड छान मारा लेकिन भोलाराम के जीव का पता नहीं चला।

प्रश्न 36.
‘इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया’ – वक्ता कौन है ? इन्द्रजाल होने का क्या अर्थ है?
उत्तर :
वक्ता यमदूत है। इन्द्रजाल होने का अर्थ है भोलाराम के जीव का अचानक गायब हो जाना।

प्रश्न 37.
आजकल पृथ्वी पर किस प्रकार का व्यापार बहुत चल रहा है ?
उत्तर :
रेलवे के पार्सल से चीजों का गायब हो जाना तथा विरोंधी नेता को उड़ाकर बंद कर देने जैसा व्यापार आजकल पृथ्वी पर बहुत चल रहा है।

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प्रश्न 38.
‘तुम्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गई’
– कौन, किसके रिटायर होने की बात कह रहा है ?
उत्तर :
धर्मराज चित्रगुप्त के रिटायर होने की बात कह रहे हैं।

प्रश्न 39.
‘वह समस्या तो कब की हल हो गई’
– कौन-सी समस्या कब की हल हो गई ?
उत्तर :
नरक में निवास-स्थान की समस्या कब की हल हो गयी।

प्रश्न 40.
नरक के आवास की समस्या किस प्रकार हल हो गई ?
उत्तर :
नरक में गुणी कारीगर, बड़े-बड़े इंजीनियर, ठेंकेदार, तथा भुष्ट ठेकेदार के आ जाने से नरक के आवास की समस्या हल हो गई।

प्रश्न 41.
‘इनकम होती तो टैक्स होता’ – यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है ?
उत्तर :
यहाँ भोलाराम के बारे में कहा जा रहा है।

प्रश्न 42.
धर्मराज ने नारद मुनि को विकट उलझन के बारे में क्या बताया ?
उत्तर :
धर्मराज ने नारद मुनि को विकट उलझन के बारे में यह बताया कि भोलाराम नामक व्यक्ति का जोव पाँच दिन पहले ही यमदूत को चकमा देकर रास्ते से भाग गया। यमदूत के पूरा ब्यांड छान लेने के बावजूद भी वह कहीं नहीं मिला।

प्रश्न 43.
‘मामला बड़ा दिलचस्प है’ – वक्ता कौन है? उसे कौन-सा मामला दिचलस्प लगा ?
उत्तर :
वक्ता नारद मुनि हैं। भोलाराम के जीव के बीच रास्ते से ही यमदूत को चकमा देकर भाग जाने का मामला उन्हं बड़ा दिलचस्प लगा।

प्रश्न 44.
चित्रगुप्त ने नारद मुनि को भोलाराम के बारे में क्या बताया ?
उत्तर :
चित्रगुप्त ने नारद मुनि को भोलाराम के बारे में यह बताया कि भोलाराम जबलपुर के घमापुर मुहल्ले में स्त्री, दो लड़के तथा एक लड़की के साथ दृटे-फूटे मकान में रहता था। वह सरकारी नौकर था तथा पाँच दिन पहले उसकी मृत्यु हो गैयी।

प्रश्न 45.
नारद मुनि भोलाराम का मकान कैसे पहचान गए ?
उत्तर :
माँ-बटटी के सम्मिलित रोने की आवाज से ही नारद मुनि भोलाराम का मकान पहचान गए।

प्रश्न 46.
नारद मुनि ने भोलाराम की बेटी से क्या कहा ?
उत्तर :
नारद मुनि ने भोलाराम की बेटी से यह कहा – ‘मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी माँ को जरा बाहर भेजो, बेटी।”

प्रश्न 47.
भोलाराम की पल्नी ने नारद जी को भोलाराम के बारे में क्या बताया ?
उत्तर :
भोलाराम की पत्नी ने नारद जी को भोलाराम के बारे में बताते हुए कहा कि रिटायर होने के पाँच सालों बाद भी पेशन नहीं मिली। दरख्वास्त भेजने पर एक ही जवाब आता था कि पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। पहले गहने फिर बरतन बिके और फिर भूखे रहने से उनकी मौत हो गई।

प्रश्न 48.
भोलाराम की मृत्यु किस बीमारी से हुई ?
उत्तर :
भोलाराम की मृत्यु गरीबी की बीमारी से हुई।

प्रश्न 49.
नारद जी ने अच्छी गृहस्थी का आधार किसे बताया ?
उत्तर :
पति पर आँखे मूँदकर विश्वास करने को ही नारद जी ने अच्छी गृहस्थी का आधार बताया।

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प्रश्न 50.
नारद जी ने क्या कहकर भोलाराम की स्त्री को आश्वासन दिया ?
उत्तर :
नारद जी ने भोलाराम की स्त्री को यह कहकर आश्वासन दिया – ‘साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ ता है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूँगा।

प्रश्न 51.
नारद मुनि से ऐसा क्यों कहा कि साधुओं की बात कौन मानता है ?
उत्तर :
आज के जमान में सरकारी अधकारी भी या तो मंत्रियो की बात मानते हैं या फिर वैसं किसी व्यक्ति की जिसका राजनीति में दबदबा हो। इसीलिए नारद जी ने साधुओं की बात न मानने की बात कही।

प्रश्न 52.
नारद जी को भोलाराम की पत्नी की किस बात से दया आ गई ?
उत्तर :
जब भोलाराम की पत्नी ने यह कहा कि, “महाराज आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं। कुछ ऐसा नही कर सकते कि उनकी रूकी हुई पेंशन मिल जाए। इन बच्चों का पेट कुछ्छ दिन भर जाए’ — तो यह सुनकर नारद जी को दया आ गई।

प्रश्न 53.
दरख्वास्तें ‘पेपरवेट’ से नहीं दबतीं – यह किसने, किससे कहा ?
उत्तर :
यह सरकारी दफ्तर के पहले बाबू ने नारदजी ने कहा।

प्रश्न 54.
आप क्यों झंझट में पड़ गए – वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
इस कथन का क्क्ता सरकारी दफ्तर का चपरासी तथा श्रोता नारद मुनि हैं।

प्रश्न 55.
“अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे तो भी काम नहीं होगा” – वक्ता और श्रोता कौन हैं?
उत्तर :
वक्ता सरकारी दफ्तर का चपरासी तथा श्रोता नारद मुनि हैं।

प्रश्न 56.
उन्हें खुशश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा – ‘उन्हें’ से कौन संकेतित है। उनके खुश होने से कौन सा काम हो जाएगा ?
उत्तर :
‘उन्हे’ से सरकारी दफ्तर के बड़े साहब संकेतित हैं। उनके खुश होने से भोलाराम के पेंशन का काम हो जाएगा।

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प्रश्न 57.
आप हैं बैरागी – वक्ता कौन है ? वह किसे बैरागी कह रहा है और क्यों ?
उत्तर :
वक्ता सरकारी दफ्तर के बड़े साहब हैं। वे नारदजी को बैरागी कह रहे हैं क्योंकि उन्हें दफ्तर के रीतिरिवाजों का पता नहीं कि दफ्तर में काम निकालने का तरीका क्या है?

प्रश्न 58.
असल में भोलाराम ने गलती की – भोलाराम ने कौन-सी गलती की ?
उत्तर :
अपना पेंशन चालू करवाने के लिए भोलाराम ने दफ्तर के साहब को रिश्वत नहीं दिया – उसने यही बड़ी गलती की।

प्रश्न 59.
बड़े साहब ने नारद जी को सरकारी दफ्तर के रीति-रिवाज के बारे में क्या समझाया ?
उत्तर :
बड़े साहब ने नारद जी को सरकारी दफ्तर के रीति-रिवाज के बारे में यह समझाया – ‘ भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है। … भोलाराम की दरख्नास्तें उड़ रही हैं । उन पर वज़न रखिए।

प्रश्न 60.
बड़े साहब ने नारद जी को वज़न (पेपरवेट) के बारे में क्या सलाह दी ?
उत्तर :
बड़े साहब ने नारद जी को वजन के बारे में यह सलाह दी कि आपकी सुन्दर वीणा को भी भोलाराम की दरख्वास्त पर पेपरवेट की जगह रखा जा सकता है।

प्रश्न 61.
सरकारी दफ्तर के बड़े साहब की कौन-सी बात सुनकर नारद जी घबराए ?
उत्तर :
जब सरकारी दफ्तर के बड़े साहब ने भोलाराम के पेंशन का काम कर देने के बदले में पेपरवेट (रिश्वत) के तौर पर वीणा रखने को कहा तो नारद जी घबड़ा गए क्योंकि उन्हें अपनी वीणा काफी प्रिय थी।

प्रश्न 62.
बड़े साहब ने रिश्वत के तौर पर नारद जी की वीणा क्यों लेनी चाही ?
उत्तर :
बड़े साहब की बेटी संगीत सीखती थी इसलिए उन्नोने नारद जी की वीणा रिश्वत के तौर पर लेनी चाही।

प्रश्न 63.
नारद जी के भोलाराम कहने पर पेंशन की फाईल में से कौन-सी आवाज आई ?
उत्तर :
पेंशन की फाईल से यह आवाज आई – ‘कौन पुकार रहा है मुझ़े ? पोस्टमैन है ? क्या पेशन का आर्डर आ गया?

प्रश्न 64.
नारद चौंके – नारद क्या सुनकर चौंके ?
उत्तर :
जब भोलाराम की फाईल में से यह सुनाई दिया कि ” कौन पुकार रहा है मुझे ? पोस्टमैन है? क्या पेशन का ऑर्डर आ गया?’ – तो यह सुनकर नारद जी चौक पड़े।

प्रश्न 65.
नारद जी ने भोलाराम के जीव से क्या कहा ?
उत्तर :
नारद जी ने भोलाराम के जीव से यह कहा – “मैं नारद हूँ। तुम्हे लेने आया हूँ। चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है।”

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प्रश्न 66.
नारद जी द्वारा भोलाराम की आत्मा को स्वर्ग ले चलने की बात सुनकर उसके जीव ने क्या कहा ?
उत्तर :
नारद की स्वर्ग ले चलने की बात सुनकर भोलाराम के जीव ने कहा कि, “मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्यास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा हैं। मैं अपनी दरखास्ते छोड़कर नहीं जा सकता।’

प्रश्न 67.
मुझे नहीं जाना – वक्ता कौन है ? वह कहाँ नहीं जाना चाहता है ?
उत्तर :

प्रश्न 68.
‘भोलाराम का जीव’ कहानी में किस पर व्यंग्य किया गया है ?
उत्तर :
‘भोलाराम का जीव’ कहानी में सरकारी दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार तथा रिश्वतखोरी पर व्यंग्य किया गया है।

प्रश्न 69.
महाराज, रिकार्ड सब ठीक है – वक्ता कौन है ? कौन-सा रिकार्ड ठीक है ?
उत्तर :
वक्ता चित्रगुप्त है। उन्होने भोलाराम के बारे में जो विवरण लिखा था – वह रिकाई ठीक था।

प्रश्न 70.
भोलाराम का जीव कहाँ है – यह कौन, किससे पूछता है ?
उत्तर :
यह धर्मराज यमदूत से पूछते हैं।

प्रश्न 71.
चित्रगुप्त ने धर्मराज से राजनीतिक दलों के नेता के बारे में क्या कहा ?
उत्तर :
चिन्रगुप्त ने धर्मराज से राजनीतिक दलों के नेता के बारे में कहा कि वे विरोधी नेता को उड़ाकर बंद कर देते हैं।

प्रश्न 72.
धर्मराज ने किसे नगण्य और दीन कहा है ? क्यों ?
उत्तर :
धर्मराज ने भोलाराम को नगण्य और दीन कहा है क्योंकि उस जैसे भुखमरे व्यक्ति की औकात कुछ्छ भी नहीं थी।

प्रश्न 73.
भोलाराम की पत्नी ने भोलाराम की बीमारी के बारे में नारद जी को क्या बताया ?
उत्तर :
भोलाराम की पत्नी ने उसकी बीमारी के बारे में नारद जी को यह बताया कि उन्हें गरीबी की बीमारी थी।

प्रश्न 74.
तुम साधु हो, उच्चके नहीं हो – किसने, किससे और क्यों कहा ?
उत्तर :
यह भोलाराम की पत्ली ने नारद जी से इसलिए कहा क्योंकि उन्होंने भोलाराम के किसी संभावित प्रेम-प्रसंग के बारे में पूछ लिया था।

प्रश्न 75.
यह भी एक मंदिर है – यहाँ किस मंदिर के बारे में कहा जा रहा है और वक्ता कौन है ?
उत्तर :
यहाँ सरकारी दफ्तर रूपी मंदिर के बारे में कहा जा रहा है। इस कथन का वक्ता दफ्तर के बड़े साहब है।

प्रश्न 76.
मगर वज़न चाहिए – वक्ता कौन हैं ? वजन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता पेंशन कार्यालय के बड़े साहब हैं। वज़न का आशय है कि यदि भोलाराम की रूकी हुई पेंशन चालू करवानी है तो रिश्वत देनी पड़ेगी।

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प्रश्न 77.
यहीं मेरा मन लगा है – वक्ता कौन है ? उसका मन कहाँ और क्यों लगा है?
उत्तर :
वक्ता भोलाराम का जीव है। उसका मन अपनी पेंशन की फाईल में लगा है क्योंकि पेंशन न मिलने से ही उसकी मृत्यु हुई।

प्रश्न 78.
‘मेरा मतलब है किसी स्त्री’ – वक्ता कौन है ? किसी स्त्री से क्या आशय है?
उत्तर :
वक्ता नारद मुनि हैं। किसी स्त्री से आशय किसी अन्य स्त्री से है, जिसके साथ भोलाराम का काई प्रेम-प्रसंग हो।

प्रश्न 79.
‘हाँ जल्दी भी हो सकती है मगर’ – वक्ता और श्रोता कौन हैं? वक्ता का उ.शय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता पेशन-कार्यालय के बड़े साहब तथा श्रोता नारद मुनि हैं। वक्ता के कहने का आशय यह है कि यदि नारद जी चाहें तो धोलाराम के पेंशन का काम जल्दी हो सकता है लेकिन इसके लिए उन्हें रिश्वत देनी होगी।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हरिशंकर परसाई का जन्म कब हुआ था ?
(क) 21 अगस्त सन् 1923
(ख) 22 अगस्त सन् 1924
(ग) 23 अगस्त सन् 1925
(घ) 24 अगस्त सन् 1926
उत्तर :
(ख) 22 अगस्त सन् 1924 ।

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प्रश्न 2.
परसाई जी का जन्म कहाँ हुआ था ?
(क) होशंगाबाद
(ख) औरंगाबाद
(ग) जहानाबाद
(घ) हजारीबाग
उत्तर :
(क) होशंगाबाद ।

प्रश्न 3.
परसाई जी की ख्याति किस रूप में है ?
(क) इतिहासकार
(ख) राजनीतिज्ञ
(ग) व्यंग्य निबधकार
(घ) उपन्यासकार
उत्तर :
(ग) व्यंग्य निबंधकार ।

प्रश्न 4.
परसाई जी की समग्र रचना किस पुस्तक में संकलित है ?
(क) कवितावली
(ख) दोहावली
(ग) परसाई रचनावली
(घ) परसाई समग्र
उत्तर :
(ग) परसाई रचनावली ।

प्रश्न 5.
‘भूत के पाँव पीछ’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) नागार्जुन
(ख) श्रोलाल शुक्ल
(ग) परसाई
(घ) आचार्य शुक्ल
उत्तर :
(ग) परसाई ।

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प्रश्न 6.
‘जैसे उनके दिन फिरे’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) मुक्तिबोध
(ख) परसाई
(ग) यशापाल
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(ख) परसाई ।

प्रश्न 7.
‘रानी नागफनी की कहानी’ किस विधा की रचना है ?
(क) नाटक
(ख) कहानी
(ग) उपन्यास
(घ) कविता
उत्तर :
(ग) उपन्यास ।

प्रश्न 8.
‘हँसते हैं रोते हैं’ – के रचनाकार हैं –
(क) गुलाब राय
(ख) रामकुमार वर्मा
(ग) जैनेन्द्र
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई।

प्रश्न 9.
‘सदाचार का ताबीज’ तथा ‘बेइमानी की परत’ किसकी कृति है ?
(क) राही मासूम रजा
(ख) यशपाल
(ग) परसाई
(घ) इलाचंद्र जोशी
उत्तर :
(ग) परसाई

प्रश्न 10.
‘तब की के T और थी’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) अज्ञेय
(ग) परसाई
(घ) भगवानदीन
उत्तर :
(ग) परसाई ।

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प्रश्न 11.
निम्नलिखित में कौन-सा निबंध-संग्रह परसाई जी की नहीं है ?
(क) शिकायत मुझे भी है
(ख) निठल्ले की डायरी
(ग) और अंत में
(घ) पर्दा उठाओ-पर्दा गिराओ
उत्तर :
(घ) पर्दा उठाओ-पर्दा गिराओ।

प्रश्न 12.
‘तट की खोज’ किसका उपन्यास है ?
(क) परसाई
(ख) अश्क
(ग) कमल जोशी
(घ) कमलेश्वर
उत्तर :
(क) परसाई ।

प्रश्न 13.
‘वैष्णव की फिसलन’ किसका व्यंग्य-संग्रह है ?
(क) कमलेश्वर
(ख) निर्मल वर्मा
(ग) परसाई
(घ) रेणु
उत्तर :
(ग) परसाई।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से कौन-सा व्यंग्य-संग्रह परसाई जी का नहीं है ?
(क) जार्ज पंचम की नाक
(ख) तिरछी रेखाएँ
(ग) ठिठुरता हुआ गणतंत्र
(घ) विकलांग श्रद्धा का दौर
उत्तर :
(क) जार्ज पंचम की नाक।

प्रश्न 15.
‘भोलाराम का जीव’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) कमलेश्वर
(ख) निर्मल वर्मा
(ग) परसाई
(घ) मोहन राकेश
उत्तर :
(ग) परसाई ।

प्रश्न 16.
‘तीसरे दर्जे का श्रद्धेय’ के रचयिता का नाम क्या है ?
(क) मोहन राकेश
(ख) भगवानदीन
(ग) मणिमधुकर
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई ।

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प्रश्न 17.
‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ किसकी रचना है ?
(क) विष्णु प्रभाकर
(ख) राही मासूम रजा
(ग) हरिशंकर परसाई
(घ) श्रौलाल शुक्ल
उत्तर :
(ग) हरिशंकर परसाई।

प्रश्न 18.
‘मुर्गा दिन में सबसे पहले क्रांति का आद्वान करता है’ — किसकी पंक्ति है ?
(क) हारिशंकर परसाई
(ख) कमलेश्वर
(ग) निर्मल वर्मा
(घ) श्रीलाल शुक्ल
उत्तर :
(क) हरिशंकर परसाई।

प्रश्न 19.
हरिशंकर परसाई की मृत्यु कब हुई ?
(क) सन 1994
(ख) सन् 1995
(ग) सन् 1996
(घ) सन् 1997
उत्तर :
(ख) सन् 1995।

प्रश्न 20.
‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ किसकी रचना है ?
(क) श्रीलाल शुक्ल
(ख) हरिशंकर परसाई
(ग) कमलेश्वर
(घ) उषा प्रियंवदा
उत्तर :
(ख) हरिशंकर परसाई।

प्रश्न 21.
परसाई जी ने निम्न में से किस पत्रिका का संपादन किया था ?
(क) वसुधा
(ख) कादम्बिनी
(ग) हंस
(घ) आजकल
उत्तर :
(क) वसुधा।

प्रश्न 22.
किस विश्वविद्यालय ने परसाई जी को डी. लिट. की उपाधि प्रदान की ?
(क) भागलपुर विश्वविद्यालय
(ख) दिल्लो विश्वविद्यालय
(ग) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
(ग) जबलपुर विश्वविद्यालय
उत्तर :
(घ) जबलपुर विश्वविद्यालय।

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प्रश्न 23.
परसाई जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार कब मिला ?
(क) सन् 1980
(ख) सन् 1981
(ग) सन् 1982
(घ) सन् 1983
उत्तर :
(ग) सन् 1982।

प्रश्न 24.
‘लिटरेचर ने मारा तुम्हें’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) मोहन राकेश
(ख) निराला
(ग) परसाई
(घ) रमेश बख़ी
उत्तर :
(ग) परसाई ।

प्रश्न 25.
परसाई जी का ‘ज्वाला और जल’ किस विधा की रचना है ?
(क) कविता
(ख) नाटक
(ग) उपन्यास
(घ) कहानी
उत्तर :
(ग) उपन्यास।

प्रश्न 26.
‘तट की खोज’ किस कोटि की रचना है ?
(क) लम्बी कथा
(ख) छोटी कहानी
(ग) व्यंग्या
(घ) कविता
उत्तर :
(क) लम्बी कथा।

प्रश्न 27.
‘सुदामा के चावल’ किसकी रचना है ?
(क) सुदर्शन
(ख) अज्ञेय
(ग) भुवनेश्वर
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई ।

प्रश्न 28.
‘त्रिशंकु बेचारा’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) भुवनंश्वर
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) उग्म
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई ।

प्रश्न 29.
‘मन्नू भैया की बारात’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) परसाई
(ख) पंत
(ग) यशापाल
(घ) अश्क
उत्तर :
(क) परसाई ।

प्रश्न 30.
परसाई जी की रचना ‘हनुमान की रेलयात्रा’ किस विधा की है ?
(क) व्यंग्य निबंध
(ख) कहानी
(ग) कविता
(घ) उपन्यास
उत्तर :
(क) व्यंग्य निबंध ।

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प्रश्न 31.
‘इस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रसाद
(ख) विनोद रस्तोगी
(ग) परसाई
(घ) राजपूत मलिक
उत्तर :
(ग) परसाई ।

प्रश्न 32.
‘देशभक्ति का पॉलिश’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) रांगेय राघव
(ख) जैनेन्द्र
(ग) बच्चन
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई ।

प्रश्न 33.
‘गाँधीजी का ओवरकोट’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) परसाई
(ख) उदयशंकर भट्ट
(ग) रामकुमार वर्मा
(घ) उप्र
उत्तर :
(क) परसाई ।

प्रश्न 34.
‘चमचे की दिल्ली-यात्रा’ किसकी रचना है ?
(क) अशोक वाजपेयी
(ख) दिनकर
(ग) परसाई
(घ) अझेय
उत्तर :
(ग) परसाई ।

प्रश्न 35.
‘बेचारा कॉमन मैन’ (परसाई) किस विधा की रचना है ?
(क) व्यंग्य-निबंध
(ख) उपन्यास
(ग) कहानी
(घ) संस्मरण
उत्तर :
(क) व्यंग्य-निबंध ।

प्रश्न 36.
‘प्रेमचंद के फटे जूते’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) उग्र
(ग) अशक
(घ) जयनाथ मलिन
उत्तर :
(क) हरिशंकर परसाई।

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प्रश्न 37.
‘अपनी-अपनी बीमारी’ किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद
(ख) पंत
(ग) इलाचंद्र जोशी
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई ।

प्रश्न 38.
‘माटी कहे कुम्हार से’ के रचियता हैं ?
(क) भवानी प्रसाद
(ख) निर्मल वर्मा
(ग) निराला
(घ) परसाई
उत्तर :
(घ) परसाई ।

प्रश्न 39.
‘काग भगोड़ा’ तथा ‘आवारा भीड़ के खतरे’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) पत
(ख) नेमिचंद्र जैन
(ग) परसाई
(घ) अज्ञेय
उत्तर :
(ग) परसाई ।

प्रश्न 40.
निम्नांकित में से कौन-सी रचना परसाई जी की नहीं है ?
(क) एसा भी सोचा जाता है
(ख) पगडण्डयों का जमाना
(ग) शिकायत मुझे भी है
(घ) जहाज का पंछी
उत्तर :
(घ) जहाज का पंछी ।

प्रश्न 41.
‘तुलसीदास चंदन घिसे’ के रचयिता कौन हैं ?
(क) भारतंदु
(ख) निराला
(ग) परसाई
(घ) कुबेरनाथ राय
उत्तर :
(ग) परसाई ।

प्रश्न 42.
परसाई जी को उनकी किस रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला ?
(क) काग भगोड़ा
(ख) वैष्गव की फिसलन
(ग) विकलाग श्रद्धा का दौर
(घ) प्रेमचंद के फटे जूते
उत्तर :
(ग) विकलांग श्रद्धा का दौर ।

प्रश्न 43.
‘और अंत में’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) अज्ञेय
(ख) जैनेन्द्र
(ग) परसाई
(घ) नेमीचंद्र जैन
उत्तर :
(ग) परसाई ।

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प्रश्न 44.
‘हम एक उप्र से वाकिफ हैं’ – किसकी रचना है ?
(क) परसाई
(ख) निर्मल वर्मा
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) कृष्मांदर
उत्तर :
(क) परसाई ।

प्रश्न 45.
मध्यप्रदेश सरकार की ओर से परसाई जी को कौन-सा पुरस्कार दिया गया ?
(क) शिक्षा-सम्मान
(ख) साहित्य अकादमी पुरस्कार
(ग) मंगला प्रसाद पुरस्कार
(घ) ज्ञानपौठ पुरस्कार
उत्तर :
(क) शिक्षा-सम्मान ।

प्रश्न 46.
थर्मराज किस आधार पर लोगों को स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान ‘अलॉट’ करते थे ?
(क) जाति के आधार पर
(ख) कर्म के आधार पर
(ग) धर्म के आधार पर
(घ) रंग के आधार पर
उत्तर :
(ख) कर्म के आधार पर।

प्रश्न 47.
चित्रगुप्त बार-बार क्या देख रहे थे ?
(क) रजिस्टर
(ख) यमदूत
(ग) धर्मराज
(घ) भोलाराम का जीव
उत्तर :
(क) रजिस्टर।

प्रश्न 48.
भोलाराम के जीव ने गायब होने के कितने दिन पहले देह त्यागा था ?
(क) चार दिन
(ख) पाँच दिन
(ग) छ: दिन
(घ) सात दिन
उत्तर :
(ख) पाँच दिन।

प्रश्न 49.
कौन बदहवास धर्मराज के पास आया ?
(क) चित्रगुप्त
(ख) भोलाराम का जीव
(ग) यमदूत
(घद) नारद
उत्तर :
(ग) यमदूत।

प्रश्न 50.
यमदूत के हाथों से अच्छे-अच्छे कौन नहीं छूट सके ?
(क) डॉक्टर
(ख) इनकम टैक्स वाले
(ग) शिक्षक
(घ) वकील
उत्तर :
(घ) वकील ।

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प्रश्न 51.
तुम्हारी भी रिटायर होने की उप्र आ गई – किसे कहा जा रहा है ?
(क) चपरासी को
(ख) बड़े बाबू को
(ग) चिद्रगुप्त को
(घ) यमदूत को
उत्तर :
(ग) चित्रगुप्त को।

प्रश्न 52.
नरक की कौन-सी समस्या हल हो गई थी ?
(क) आवास की
(ख) ठेकेदारों की
(ग) इंजीनियरों की
(घ) गुणो कारीगरों की
उत्तर :
(क) आवास की।

प्रश्न 53.
मामला बड़ा दिलचस्प है – वक्ता कौन है ?
(क) धर्मराज
(ख) चित्रगुप्त
(ग) नारद
(घ) यमदूत
उत्तर :
(ग) नारद।

प्रश्न 54.
भोलाराम जबलपुर के किस मुहल्ले में रहता था ?
(क) धौलापुर
(ख) धमापुर
(ग) माधपुर
(घ) बेलापुर
उत्तर :
(ख) धमापुर।

प्रश्न 55.
भोलारम की उप्र कितनी थी ?
(क) 55 वर्ष
(ख) 60 वर्ष
(ग) 65 वर्ष
(घ) 70 वर्ष
उत्तर :
(ग) 65 वर्ष।

प्रश्न 56.
भोलाराम के परिवार में कौन-कौन थे ?
(क) पत्नी और पुत्री
(ख) पत्ली, एक पुत्री और दो पुत्र
(ग) पत्नी, बूढ़ी माँ
(घ) पत्नी और बूढ़़ पिताजी
उत्तर :
(ख) पत्नी, एक पुत्री और दो पुत्र।

प्रश्न 57.
नारद भोलाराम का मकान कैसे पहचान गए ?
(क) चित्र से
(ख) मकान-मालिक से
(ग) माँ बेटी के क्रंदन से
(घ) भोलाराम के शव से
उत्तर :
(ग) माँ बेटी के कंदन से।

प्रश्न 58.
भोलाराम को रिटायर हुए कितने साल हो गए थे ?
(क) दो साल
(ख) तीन साल
(ग) चार साल
(घ) पाँच साल
उत्तर :
(घ) पाँच साल।

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प्रश्न 59.
भोलाराम की पत्नी ने भोलाराम की किस बीमारी के बारे में बाताया ?
(क) गले की
(ख) पेट की
(ग) गरीबी की
(घ) अमीरी की
उत्तर :
(ग) गरीबी की।

प्रश्न 60.
भोलाराम को कितने रुपये महीने पेंशन के मिलते ?
(क) पचास-साठ
(ख) सत्तर-अस्सी
(ग) अस्सी-नव्ये
(घ) नब्बे-सौ
उत्तर :
(क) पचास-साठ।

प्रश्न 61.
भोलाराम की पत्नी ने ‘उचक्के’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया ?
(क) बड़े साहब
(ख) चपरासी
(ग) मकान-मालिक
(घ) नारद जी
उत्तर :
(घ) नारद जी ।

प्रश्न 62.
नारद जी अंत में किसके पास पहुँचे ?
(क) चित्रगुप्त
(ख) बड़े साहब
(ग) भालाराम की पत्नी
(घ) धर्मराज
उत्तर :
(ख) बड़े साहब।

प्रश्न 63.
क्या काम है ? – किसने पूछा ?
(क) नारद ने
(ख) चित्रगुप्त ने
(ग) बड़े साहब ने
(घ) चपरासी ने
उत्तर :
(ग) बड़े साहब ने।

प्रश्न 64.
सरकारी पैसे का मामला है – किसने कहा ?
(क) बड़े साहब ने
(ख) नारद ने
(ग) धर्मराज ने
(घ) चपरासी ने
उत्तर :
(क) बड़े साहब ने।

प्रश्न 65.
किसकी लड़की गाना-बजाना सीखती है ?
(क) नारद की
(ख) बड़े साहब की
(ग) चपरासी की
(घ) भोलाराम की
उत्तर :
(ख) बड़े साहब की।

प्रश्न 66.
मुझे नहीं जाना – किससे कहा ?
(क) भोलाराम के जीव ने
(ख) भोलाराम ने
(ग) भोलाराम की बेटी ने
(घ) भोलाराम की पत्नी ने
उत्तर :
(क) भोलाराम के जीव ने।

टिप्पणियाँ

धर्मराज : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रबना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है। धर्मराज मृत्यु के देवता का नाम है। इनका रंग हरा है, लाल वस्व धारण करते हैं, भैंस पर सवार होते हैं। इनके मुंशी चित्रगुप्त सब प्राणियों का लेखा-जोखा रखते हैं। ये यमपुरी में अपने कालित्री नामक राजमहल में निवास करते हैं। यमों की संख्या 14 बताई गई है।

चित्रगुप्त : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
पुराणों में चित्रगुप्त का उल्सेख यमराज के यहाँ मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखनेवाले लिपिक के रूप में मिलता है। वर्तमान कायस्थ जाति के लोंग इन्हें अपना पूर्व पुरूष मानते हैं और यम द्वितीया को इनकी पूजा करते हैं। भीष्म पितामह को चित्रगुप्त की अराधना से ही इच्छा-मृत्यु का वरदान मिला था।

नरक : प्रस्तुत शब्द हरिशेंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
हिंदू धर्म शाख्वो के अनुसार नरक एसा लोक है जहाँ पाप करनेवालो की आत्मा को दंड भोगने के लिए भंजा जाता है। ऐसे नरकों की संख्या कहीं 21 और कही-कही 27 बताई गई है।

पाप : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जोव’ से लिया गया है।
पाप का संबंध मन से होता है। सामान्यत समाज तथा धर्म के नियमों के विरूद्ध काम करना ही पाप कहलाता है। गौतम बुद्ध के अनुसार जो करने योग्य है उसे न करना तथा जो नहीं करने योग्य है उसे करना ही पाप कहलाता है। श्रुति, स्मृति आदि ने जिस कार्यों को करने से मना किया है उन्हें पाप कहा गया है।

नारायण : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
नारायण एक देवता थे। कृष्ण को इन्हीं का अवतार माना जाता है। देव और दानवों को समुद्रमंथन के लिए नारायण ने ही प्रेरित किया था। इन्होंने ही मोहिनी रूप धारण करके देवताओं को अमृत पिलाया।

नारद : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
नारद एक वैदिक द्रष्टा और यज्ञवेना थे जो ब्रह्या के मानस पुत्र और विष्णु के तीसरे अवतार थे। नारद त्रिकालदर्शी और वंद-वेदाग में पारंगत थे। इन्हे ॠग्वेद के कुछ सूक्तो का द्रष्टा भी बताया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार पहल ये गंधर्व थें।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 5 भोलाराम का जीव

स्वर्ग : प्रस्तुत शब्द हरिशकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
पुराणों से सात लोकों की कल्पना की गई है। ये सूर्यलोक से लेकर धुवलोक तक फेले हुए हैं। इन्हीं में सं एक स्वर्गलोक भी है। यह मुख्य रूप से देवताओ का निवास-स्थान माना जाता है। इस संसार में जो व्यक्ति पुण्य और अच्छे कर्म करता है, उसकी आत्मा मृत्यु के बाद इसी लोक में निवास करती है। पुण्य की अवधि समाप्त होने पर वह कर्मों के अनुसार फिर शरीर धारण करता है।

पुण्य : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
समाज तथा धर्म के नियमों का पालन करना ही पुण्य कहलाता है। पुण्य अर्थात् अच्छे कर्म करनेवालों को मृत्यु के बाद स्वर्ग की प्राप्ति होती है – एसा विश्वास किया जाता है।

सिद्ध पुरूष : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
भागवत में आठ सिद्धियों का उल्लेख किया गया है – अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईश्वरत्व और वशित्व। जिस साधक को इनमें से किसी भी सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है वह सिद्ध पुरूष कहलाता है।

इन्द्रजाल : प्रस्तुत शब्द हरिशकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
जादू को ही इन्द्रजाल के नाम से जाना जाता है। जादू के द्वारा जादूगर ऐसे-एसे करतब दिखाते है जिन्हे देखकर विश्वास न होते हुए भी विश्वास करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

वकील : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
वे लोग जो कानून के ज्ञाता होते हैं तथा न्यायालय में अपने मुवक्किल की ओर से मुकदमे लड़ते हैं, वकील कहलाते हैं। वकीलों का कार्य पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलवाना है। न्यायालय में वकीलों के लिए एक निर्धारित वेश – सफेद फुलपैंट, सफेज कमीज तथा काला कोट है।

वीणा : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘ भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
वीणा अत्यंत ही प्राचीन वाद्य है। तार से बजने के कारण इसका एक नाम तंत्री भी है। वीणा अपनी बनावट तथा आवाज की विभिन्रता के कारण कई प्रकार की होती है।

पेंशन : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
सरकारी नौकरों को उनकी सेवा-समाप्ति (रिटायरमेंट) के बाद सरकार की ओर से प्रत्येक महीने जो राशि दी जाती है, उसे पेंशन कहते हैं। यदि पेंशनधारी की मृत्यु हो जाती है तो उसकी पत्नी यदि जीवित है तो उसे आधा पेंशन मिलता है। एक शायर ने पेंशन के बारे में लिखा है –

मेरे अहबाब (मित्र) क्या कारे नुमांया (चमत्कार) कर गए
बी.ए. हुए, नौकर हुए, पेंशन मिली और मर गए।

साधु : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
माया-मोह से दूर तथा दूसरों के उपकार में लगा रहने वाला व्यक्ति ही साधु कहलाता है। कबीर ने साधु के लक्षण बतातं हुए कहा है कि जो आवश्यकतानुसार ही भोजन-वस्त्र धारण करे तथा आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करे वही सच्चे अर्थों में साधु है।

पोस्टमैन : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
पहले जब मोबाइल का प्रचलन नहीं था, पत्र का ही प्रचलन था । डाकघर का जो कर्मचारी पत्रों को घर तक पहुँचने का काम करता था, वह डाकिया या पोस्टमैन कहलाता था।

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पेपरवेट : प्रस्तुत शब्द हरिशंकर परसाई की रचना ‘भोलाराम का जीव’ से लिया गया है।
जैसा कि नाम से ही यह जाहिर होता है कि पेपरवेट कागज पर रखा जाने वाला वजन है। पहले काँच के बने पेपरवेट का प्रचलन था लेकि अब अनेक प्रकार के पेपरवेट बनने लगे हैं। इसका उपयोग मुख्यत: कार्यालयों में कागज को हवा से उड़ने से बचाने में होता है।

पाठ्याधारित व्याकरण

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WBBSE Class 9 Hindi भोलाराम का जीव Summary

हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्रो हरिशंकर परसाई का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में 22 अगस्त, सन् 1924 को हुआ था।

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परसाई जी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनकी रचनाओं में कल्पना की आतिशबाजी नहीं, जीवन की मिट्टी से जुड़ाव है। वे अपने आस-पास के जीवन से जुड़कर चलते दिखाई देते हैं। ‘मौलाना का लड़का’, ‘राग-विराग’, ‘सदाचार का ताबीज’, ‘भोलाराम का जीव’, ‘मुंडन’, ‘एक तृप्त आदमी की कहानी’, ‘मैं हूं तोता प्रेम का मारा’, ‘वैष्णगव की फिसलन’ और ‘सत्य साधक मंडल’ इनकी चर्चित कहानियाँ हैं, जिनमें परसाई जी की सामाजिक दृष्टि की व्यापकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

परसाई जी की रचनाओं को देखने-परखने के बाद यह कहा जा सकता है कि सामाजिक विसंगतियों के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला लेखक ही सच्चा व्यंग्यकार हो सकता है। सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करके वह अपना क्षोभ तो प्रकट करता ही है, अपने लेखन से वह समाज में एक नैतिक हस्तक्षेप भी करता है। परसाई जी के व्यंग्य में गहरी आस्था दिखाई देती है क्योंकि इसमें मनुष्य की बेहतरी की प्रबल आकांक्षा होती है। हम ऐसा कह सकते हैं कि परसाई जी के व्यंग्य में उनका लक्ष्य केवल हास्य पैदा करना नहीं होता, बल्कि इसके मूल में करुणा छिपी होती है। परसाई जी की रचनाएँ इसका प्रमाण हैं। व्यंग्य-विधा की इस अप्रतिम प्रतिभा का निधन 10 अगस्त, सन् 1995 ई。को जबलपुर में हुआ।

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परसाई जी का रचना-संसार इस प्रकार है –
कहानी-संग्रह : हँसते हैं, रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे।
व्यंग्य-संग्रह : वैष्णव की फिसलन, तिरछी रेखाएँ, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर, परसाई रचनावली (छ: भागों में) ।

निबंध-संग्रह : तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, पगडंडियों का जमाना, सदाचार का ताबीज, बेइमानी की परत, शिकायत मुझे भी है, निठल्ले की डायरी, और अंत में।
उपन्यास : रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज।

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 59

  • धर्मराज = यमराज ।
  • असंख्य = जिनकी निश्चित संख्या न हो ।
  • सिफारिश = अनुसंशा।
  • अलॉट = तय ।
  • खीझ = गुस्सा ।
  • खाना = चला, प्रस्थान ।
  • लापता = गायब ।
  • द्वार = दरवाजा।
  • बदहवास = बुरे हाल में मौलिक = असली।
  • कुरूप = बदसूरत ।
  • विकृत = भयंकर ।
  • जीव = आत्मा ।
  • दयानिधान = दया के निधि, सागर ।

पृष्ठ सं० – 60

  • चकमा = धोखा ।
  • त्यागा = छोड़ा ।
  • तीव्र = तेज ।
  • चंगुल = पकड़ ।
  • कसर = कमी ।
  • अभ्यस्त = अच्छी तरह अभ्यास किए हुए ।
  • इन्द्रजाल = जादू ।
  • व्यापार = काम ।
  • होजरी = गंजी, जांघिये, मोजे आदि ।
  • रिटायर = अवकाश लेने का समय ।
  • नगण्य = बिल्कुल मामूली, जो गिनती करने योग्य न हो।
  • दीन = दुखी ।
  • गुमसुम = चुपचाप।
  • गुणी = कुशल ।
  • कारीगर = मिप्र्री ।
  • रद्दी = बेकार ।
  • हड़पा = खा गये ।
  • विकट = भयंकर ।
  • भेद = अंतर ।
  • इनकम टैक्स = आयकर,
  • आमदनी पर लगने वःग्गा कर । बकाया = बाको ।
  • भुखमरा = भूखों मरनेवाला ।
  • दिलचस्प = आकर्षक।

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पृष्ठ सं० – 61

  • समेत = सहित, साध ।
  • तलाश = खोज ।
  • सम्मिलित = मिला हुआ ।
  • क्रंदन = रोना भिक्षा = भीख ।
  • दरखास्त = आवेदन पत्र ।
  • फुरसत = खाली समय ।
  • मुद्दे = मामले ।
  • जी = दिल ।

पृष्ठ सं० – 62

  • गुर्रा कर = गुस्से से उचक्के = लफंगे ।
  • मठ = मंदिर ।
  • दुनियादारी = दुनिया के तौर – तरीकी ।

पृष्ठ सं० – 63

  • धड़धड़ाते = बिना किसी रोक-टोक के ।
  • बैरागी = संसार से विरक्त ।
  • आत्मीय = अपने लांग।
  • स्टेशनरी = कागजकलम-फाईल आदि ।
  • सहसा = अचानक ।
  • पोस्टमैन = डाकिया।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 Question Answer – ठेले पर हिमालय

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ‘ठेले पर हिमालय’।
– उक्त कथन किस रचनाकार के किस पाठ से लिया गया है ? उक्त कथन द्वारा लेखक क्या कहना चाहते हैं ?
उत्तर :
उक्त कथन धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ सं. लिया गया है।
एक दिन लंखक अपने उपन्यासकार मित्र के साथ पान की दुकान पर खड़े थे कि तभी एक बर्फवाला ठेले पर बर्फ की सिल्लियाँ लादे आया। उस बर्फ से भाप उड़ रही थी। मित्र ने बर्फ से उड़ते भाप के सौंदर्य के प्रभावित होकर कहा – यही बर्फ तो हिमालय की शोंभा है। बस फिर क्या था। लेखक को अपने ताजी रचना के लिए तुरंत बैठे बिठाए एक शीर्षक मिल गया – ‘ठेले पर हिमालय’।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

प्रश्न 2.
ओ नये कवियों ! ठेले पर लादो । पान की दुकानों पर बिको।
– वक्ता कौन है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता लंखक धर्मवीर भारती हैं।
लंखक ने अपनन उपन्यासकार मित्र के कथन पर अपनी रचना के लिए तत्काल शीर्षक बना डाला – ‘ठंले पर हिमालय’। यह शीर्षक उन्हें इतना अच्छा लगा कि उन्होंने नए कवियों को भी सलाह दे डाली कि यदि उन्हें भी यह शीर्षक पसंद आया हों तो वे भी हिमालय को अपनी रचना से निकाल कर ठेले और पान की दुकानों तक ले आए ताकि वह सामान्य पाठक के लिए भी माह्म हो सके। साधारण लोग भी उसका आनंद उठा सकें।

प्रश्न 3.
मैं जानता हूँ, क्योंकि वह बर्फ मैंने भी देखी है।
– वक्ता कौन है ? अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता धर्मवौर भारती हैं।
लखक ने ‘ठेले पर हिमालय’ वाली बात अपने उपन्यासकार मित्र को बताई तो उनके हाव-भाव से यह लगा कि यह बात उनके मन को खरोंब गई है। मित्र की एसी प्रतिक्किया स्वभाविक थी क्योंक जिसने भी एक बार हिमालय के सौंदर्य को देख लिया है उसके मन पर वह एक ऐसी खरों छोड़ जाती है, जिसे याद कर दुख ही होता है। लेखक को भी यही अनुर्भुति थी क्यांक उन्हांने भी हिमालय के उस असौम सौंदर्य को देखा है, गहराई से महसूस किया है।

प्रश्न 4.
कितना कष्टप्रद, कितना सूखा और कितना कुरूप है वह रास्ता।
– यहाँ किस रास्ते के बारे में कहा गया है ? रास्ते का वर्णन करें ?
उत्तर :
यहाँ उस रास्ते के बारे में कहा गया है जो कोसी से कौसानी को ओर जाता है। उस रास्ते में पानी का कहीं नामो-निशान नहीं है, पहाड़ भी हरियाली के अभाव में सूखे और भूरे नजर आते है। कुल मिलाकर वह रास्ता कष्टप्रद, सुखा और कुरूप दिखाई देता है।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

प्रश्न 5.
शुक्ल जी जैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है।
– शुक्ल जी कौन हैं ? उनके बारे में ऐसा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :
शुक्ल जी लंखक के मिम्र हैं।
शुक्ल जी के द्वारा प्रात्साहित किए जाने पर ही लेखक अपने मित्र तथा पत्नी के साथ कौसानी के लिए रवाना हुए थे। इतना ही नहीं, शुक्ल जी ने पूरे सफर के लिए उनका गाइड बनना भी स्वीकार कर लिया था तथा अपने दिए गए समय के अनुसार वे लेखक के सामने उपस्थित भी हो गए। शुक्ल जी की इसी व्यवहार कुशलता के कारण यह कहा गया है कि उनके जैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है।

प्रश्न 6.
उन्हें देखते ही हमारी भी सारी थकान काफूर हो जाया करती थी।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘ठेले पर हिमालय’ तथा रचनाकार धर्मवीर भारती हैं।
शुक्ल जी लेखक के मित्र हैं। वे अपनी बात तथा धुन के पक्के हैं। सबसे बड़ी खूबी उनकी व्यवहार कुशलता तथा खुशामजाजी है। इन्हीं गुणों के कारण लेखक जब भी शुक्ल जी को देखते हैं तो उनकी सारी थकान दूर हो जाती है ।

प्रश्न 7.
और खासी अटपटी चाल थी बाबू साहब की ।
– यहाँ किसके बारे में कहा गया है। उसकी चाल को अटपटा क्यों कहा गया है ?
उत्तर :
शुक्ल जी अपने साथ अपने एक और मित्र को लेकर आए थे। लेखक ने उस मित्र का वर्णन इस प्रकार किया है – ” लम्बा-दुबला शरीर, पतला-साँवला चेहरा, एमिल जोला-सी दाढ़ी, ढीला-ढाला पतलून, कधे पर पड़ी हुई ऊनी जार्कन, बगल में लटकता हुआ जाने थर्मस या कैमरा या बाइनाकुलर।” – इन सारी चीजों को मिलाकर लेखक को उनकी चाल काफी अटपटी मालूम हो रही थी।

प्रश्न 8.
कोसी से बस चली तो सारा दृश्य बदल गया ।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत कथन धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
मझकाली से कोसी तक का सफर आँखों को बड़ा ही थका देने वाला था। कहीं कोई हरियाली नहीं, पानी का तो नामो-निशान भी नहीं। लेकिन बस ज्योहि कोसी से चली तो प्राकृतिक सौंदर्य ही बदल गया – कल-कल करती कोसी नदी, छोटे-छोटे सुन्दर गाँव, मखमली खेत, पहाड़ी डाकखाने और नदी-नाले पर बने हुए पुल- ये सब मिलकर एक जादुई वातावरण की सृष्टि कर रहे थे।

प्रश्न 9.
पर ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ रही थी, त्यों-त्यों हमारे मन में एक अजीब-सी निराशा छायी जा रही थी।
– आगे कौन बढ़ रही थी ? किसके मन में निराशा छायी जा रही थी और क्यों ?
उत्तर :
बस आगे बढ़ रही थी।
लेखक सांच रहं थे कि उनकी बस ज्यों-ज्यों कौसानी के निकट आती जाएगी दृश्य और भी सुंदर होता जाएगा लेकिन बात उल्टी हो गई। कौसानी से करीब छ: किलोमोटर दूर रहने पर भी कौसानी के उस सौददर्य का कहों नामो-निशान न था। यह देखकर ही लेखक के मन में निराशा छायी जा रही थी।

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प्रश्न 10.
बिल्कुल ठगे गए हम लोग। कितना खिन्र था मैं।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से ली गयी है।
जब लेखक अपने मित्रों के साथ कौसानी के बस-अह्डु पर उतरे तों पहली नज़र में उन्हे केवल एक छोटा-सा, बिल्कुल उजडाा-सा गाँव नजर आया। बर्फ का तो कहीं नामो-निशान न था। यह देखकर उन्हें लगा कि वे यहाँ आकर उगे गए हैं और यही सोचकर उनका मन खिन्न हो आया।

प्रश्न 11.
अकस्मात् हम एक-दूसरे लोक में चले आए थे।
– रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘ठेले पर हिमालय’ तथा रचनाकार धर्मवौर भारती हैं।
बस से उतरने पर जब लेखक की नजर सामने घाटी की ओर गई तो वे वहाँ का दृश्य देखकर बिल्कुल ठगे-से रह गए। घाटी में प्रकृति का अपार सौंदर्य बिखरा पड़ा था। यह सब देखकर लेखक तथा उनके मित्रों को ऐसा लगा कि वे अचानक एक दूसरे ही लोक में घले आए हैं।

प्रश्न 12.
गाँधी जी ने यहीं अनासक्ति योग लिखा था।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से ली गई है।
गाँधी जी ने भी अपना कुछ समय कौसानी में बिताया था। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण ऐसा है जो हमें सांसारिकता सं अलग करके आध्यात्मिकता से जोड़ देता है। यही कारण है कि ‘अनासक्ति योग’ नामक पुस्तक की रचना गाँधी जी ने यहीं की थी।

प्रश्न 13.
खिड़की से झाँक रहा है, कहीं गिर न पड़े।
– पाठ का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ का नाम है – ‘ठेले पर हिमालय’।
कौसानी पहुँचने पर एक क्षण के लिए लेखक को एक हिम शिखर के दर्शन हुए लेकिन फिर वह बादलों के पीछे तुरंत लुप्त हो गया। इस मनोरम दृश्य को लेखक के अतिरिक्त उनके साथ आए सभी ने देखा। उस हिम शिखर के बारे में
लेखक कल्पना करते हैं मानो उसे बाल शिखर जान किसी ने भीतर खोंच लिया क्योंकि वह कहीं आकाशरूपी खिड़की से कहीं नीचे न गिर पड़े।

प्रश्न 14.
सारी खिन्नता, निराशा, थकावट – सब छू-मन्तर हो गयी। हम सब आकुल हो उठे।
– उद्धुत कथन के वक्ता कौन हैं ? वक्ता के ऐसा कहने का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
उद्धृत कथन के वक्ता लेखक धर्मवीर भारती हैं।
लेखक तथा उनके साथ के सोगों ने हिम शिखर के दर्शन मात्र कुछ ही समय के लिए किए थे लेकिन उसी दर्शन ने उनलोगों की सारी खिन्रता, निराशा तथा थकावट को छू-मन्तर कर दिया था। एक बार पुनः उसी सौदर्य के दर्शन के लिए वे सब आकुल हो उठे।

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प्रश्न 15.
निरावृत…. असीम सौंदर्य-राशि हमारे सामने अभी-अभी अपना घूँघट धीरे से खिसका देगी और ….. और तब ?
– प्रस्तुत पंक्ति कहाँ से ली गई है ? पंक्ति का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पक्ति ‘ठेले पर हिमालय’ पाठ से ली गई है।
लेखक एक क्षण के लिए हिम शिखर के दर्शन कर पाए थे और फिर वह बादलों में छिप गया। वे अब उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे – जब बादलरूपी घूँघट हट जाएंगे और हिमालय की निरावृत ….. असीम सौंदर्य राशि उनके सामने होगी – तब वे जी भर कर उस सौंदर्य को अपनी आँखों से देख पाएंगे।

प्रश्न 16.
सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था।
– रचना का नाम लिखें। किसका दिल बुरी तरह क्यों धड़क रहा था ?
उत्तर :
रचना का नाम है – ‘ठले पर हिमालय’।
लेखक उस समय की कल्पना कर रहे थे जब हिमालय का निरावृत अपार सौंदर्य उनके सामने होगा। उस सौंदर्य को अपनी आँखों से दंखना और उसकी सुंदरता का पान करने की कल्पना मात्र से ही लेखक का दिल वुरी तरह धड़क रहा था।

प्रश्न 17.
अब समझे यहाँ का जादू।
– उक्त कथन किस रचनाकार के किस पाठ से लिया गया है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
उक्त कथन धर्मवीर भारती के यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
जब तक लेखक ने कौसानी की कत्यूर घाटी तथा हिम शिखर के सौंदर्य के दर्शन नहीं किए थे तब तक उनका मन खिन्न था लेकिन अब उनकी सारी खित्रता दूर हो गयी थी। शुक्ल जी लेखक में आए इसी बदलाव को देखक मुस्कुरा रहे थे मानो कह रहे हों – “इतने अधीर थे, कौसानी आयी भी नहीं और मुँह लटका लिया। अब समझे यहाँ का जादू।”

प्रश्न 18.
और फिर सब खुल गया।
– वक्ता कौन है ? अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता लेखक धर्मवीर भारती हैं।
लेखक तथा उनके साथ आए सभी लोग डाक बंगले के बरामदे में बैठकर हिम शिखर के सौंदर्य को निहार रहे थे। हिम शिखरों पर छाए बादल धीरे-धीरे नीचे की ओर सरक रहे थे तथा एक-एक करके नये-नये शिखरों की हिम रेखाएँ, उनका सौदर्य खुलता जा रहा था। और फिर सारे बादलो के हट जाने से पूरे हिम शिखरों का सौंदर्य एकबारगी आँखों के सामने आ गया।

प्रश्न 19.
हिम्मत है ? ऊँचे उठोगे ?
– उक्त कथन किस रचनाकार के किस पाठ से लिया गया है ? यह कौन, किससे कह रहा है ?
उत्तर :
उक्त कथन धर्मवीर भारती के ‘ठेले पर हिमालय’ पाठ से लिया गया है।
लेखक को ऐसा लगता है कि वह हिमालय की ऊँचाई के सामने छोटे भाई की तरह है। लेखक को नीचे कुण्ठित तथा लज्जित भाव से खड़ा हुआ देखकर मानो हिमालय उसे उत्साहित करते हुए बड़े भाई की तरह उसे चुनौती दे रहा हो “हिम्मत है? ऊँचे उठोगे ?”

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

प्रश्न 20.
हम हर पर्सपेक्टिव हिमालय देखूँगा।
– व्रक्ता कौन है ? अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता शुक्ल जी के साथ आया चित्रकार सेन हैं ।
चित्रकार सेन अचानक ही बातें करते-करते सिर के बल खड़ा होकर हिमालय को देखने लगे – ‘हम हर पर्सपक्टिव (क्षैतिज) हिमालय देखूँगा।’ उसके इस कथन में उन चित्रकारों तथा चित्र शैलियों के प्रति विक्षोभ है जोकिसी चीज को सीधे न देखकर उसे विभिन्न कोणों से देखते हैं तथा वह आम आदमी की समझ से बाहर हो जाता है।

प्रश्न 21.
आज भी उसकी याद आती है, तो मन पिरा उठता है।
अथवा
प्रश्न 22.
उस दर्द को समझता हूँ।
– उपर्युक्त कथन के वक्ता कौन हैं ? कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
उपर्युक्त कथन के वक्ता धर्मवीर भारती हैं।
लेखक को जब भी कौसानी तथा वहाँ से हिम शिखरों के सौंदर्य की याद आती है तो वहाँ से अलग होने का भाव उनके मन को दुःख देता है। पहले उन्होंने अपने उपन्यासकार मित्र के दुःख को नहीं समझा था लेकिन जब से उन्होने स्वयं उस सौंदर्य को देखा है – वे अपने मित्र के उस दर्द को समझ सकते हैं।

प्रश्न 23.
किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था- ‘कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो’
– पाठ और रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाठ ‘ठेले पर हिमालय’ तथा इसके रचनाकार धर्मवीर भारती हैं।
लेखक की इच्छा थी कि वे हमेशा उसी हिम शिखरों के सौंदर्य के बीच रहें लंकिन यह संभव नही है। कुछ ऐसी ही भावनाओं के वशीभूत तुलसीदास ने भी यह कहा होगा कि आखिर मैं कब तक इस दशा में पड़ा रहूँगा, कब आपके (श्री राम) दर्शन होंगे।

प्रश्न 24.
वहीं मन रमता है, मैं करूँ तो क्या करूँ ?
– वक्ता कौन है ? वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता धर्मवीर भारती हैं।
लेखक भले ही कौसानी से लौट आए हैं लेकिन हिमालय का, वहाँ की घाटियों का वह सौंदर्य आज भी उनको आँखों के सामने नाय रहा है। वे बार-बार वहाँ जाना चाहते हैं। उनके मन में यह भाव आता है कि अपने आने का संदेशा हिमालय को भेज दे क्यांकि उनका मन तो वहीं रम गया है और मन है कि उनका कहना नहीं मानता, कहीं और वास करना नहीं चाहता।

प्रश्न 25.
मन में बेसाख् यही आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लूँ, आँखों से लगा लूँ।
– वक्ता कौन है ? वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता धर्मवीर भारती हैं।
जब लेखक ने कत्यूर घाटी के सौदर्य को देखा तो वे उसके सौदर्य में बँधकर रह गए। हरे मखमली खेत, रास्त के किनारे सफेद पत्थरों के कतार और इधर-उधर से आकर आपस में मिल जानेवाली नदियाँ ऐसी लगती थी मानो फूलों की लड़ियाँ हों। यह सौंदर्य देखकर लेखक के मन में यह ख्याल आता है कि इन लड़यों को उठाकर वे कलाई में लपंट ले या फिर इन्हें अपनी आँखो से लगाकर उसकी शीतलता, उसके सुगंध को अनुभव करें।

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प्रश्न 26.
आप लोग खुशकिस्मत हैं साहब।
अथवा
प्रश्न 27.
आज तो आपके आते ही आसार खुलने के हो रहे हैं।
– वक्ता और श्रोता कौन हैं ? वक्ता के ऐसा कहने का कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
वक्ता कौसानी डाक बँगले का खानसामा है तथा श्रोता लेखक तथा उनकी मित्र-मंडली हैं।
लेखक के आने के चौदह दिनों पहल से ही कई दूरिस्ट हिमालय के दर्शन के लिए रूके थे लंकिन वे हिमालय के हिम-शिखरों को नहों देख पाए। लेखक और उनके मित्र को पहले ही दिन हिम शिखरों के सौदद्य के दर्शन हो गए इसलिए खानसामा उन्हें खुर्शकिस्मत बता रहा है। इतना ही नहों, उनलोगों के आते हो बादल भी छँटने लगे थे। मौसम खुलने लगा था।

प्रश्न 28.
यह पहली बार मेरी समझा में आ रहा था।
– किसकी समझ में पहली बार क्या आ रहा था ?
उत्तर :
कौसानी से हिमालय के दर्शन से लेखक को ऐसा लगा मानो उसके सारे संघर्ष, अन्तर्द्धन्द्ध तथा ताप नप्ट हो रहे हैं । अब लखक के समझ में यह बात आई कि क्यों प्राचीन साधक अपन दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों से मुक्ति पाने के लिए हिमालय की ही शरण मे ज्ञात थे।

प्रश्न 29.
पर सब चुपचाप थे।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत प्रक्त धर्मवोर भारती के गात्रा-वृतांत ‘ठले पर हिमालय’ से लो गई है।
कौसानी में जब सूरज डुबने लगा तो उसकी लालिमा से ग्लेशियरों के जल भी पिघले हुए केसर के समान लगने लगे सफंद कमल का रंग लाल हो गया तथा धाटियों का रंग गहरा नीला प्रतीत होने लगा। सौदर्य के इस बदलतं रूप को सब अपनी आँखों सं चुपचाप निहार रहे चं मानों सबकी वाणी मूक हो गई हो। वह सौदर्य केवल अनुभव करने की चीज़ थी।

प्रश्न 30.
यह मेरा मन इतना कल्पनाहीन क्यों हो गया है ?
– वक्ता का नाम लिखें। वह ऐसा क्यों कहता है ?
उत्तर :
वक्ता धर्मवीर भारती है।
रात में चाँद के निकलन के बाद लेखक डाक बँगले के बरामदे में एक आराम कुर्सी लेकर र बसे अलग-थलग बैठकर यह सांचने लगं – आज तक हिमालय के सौंदर्य का देखकर न जाने कितने कवियों ने कितनी ही रचनाएँ की है। और एक वे हैं कि कावता लिखना तो दुर उनके मन में इस सौंदर्य का वर्णन करने वाला एक शब्द भी नहीी जग रहा है। आखिर उनके साथ ऐसा क्यों हों गहा है ? उनका मन इतना कल्पनाविहीन क्यों हो गया है ?

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प्रश्न 31.
भगवान का क्या-क्या करतूत इस हिमालय में होता है।
– वक्ता का नाम लिखें। कथन का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर :
वक्ता चित्रकार संन हैं।
कौसानो तथा हिमालय के सौंदर्य ने सबको अभिभूत किया था लेकिन इस सौंदर्य से सबसे ज्यादा खुश चित्रकार सेन था। वह प्रकृति के क्षण-प्रति-क्षण बदलते रूप को देखकर आश्चर्यचकततथा। अपने इसी भाव को व्यक्त करने के लिए वह कह उठना है कि न जाने भगवान का क्या-क्या करतूत इस हिमालय में होता है।

प्रश्न 32.
कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को कहा है – चिरन्तन हिम।
– रचना तथ्रा रचनाकार का नाम लिखें। अंश का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर :
गचना ‘ठेले पर हिमालय’ तथा रचानाकार धर्मवीर भारती हैं।
हिमालय के शिखर आदिकाल से हो बर्फ सं ढके है। इसके शिखर करी भी हिमविहीन नहीं होंते सालों भर इनपर बर्फ जमा ही रहता है। हिमालय की इसी विशेषता से प्रभावित होकर कुछ विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम कहा हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘ठेले पर हिमालय’ का सारांश अपने शब्दों में लिखें ।
प्रश्न – 2: ‘ठेले पर हिमालय’ में वर्णित लेखक की कौसानी-यात्रा का वर्णन करें ।
प्रश्न – 3 : यात्रा वृतांत की दृष्टि से ‘ठेले पर हिमालय’ की समीक्षा करें।
प्रश्न – 4 : ‘ठेले पर हिमालय’ के आधार पर लेखक की यात्रा का वर्णन करें।
प्रश्न – 5 : कौन-सी घटना थी जिसने लेखक को कौसानी-यात्रा के लिए प्रेरित किया? ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक रचना के आधार पर वर्णन करें।
प्रश्न – 6 : ‘ठेले पर हिमालय’ में वर्णित लेखक के विभिन्न अनुभवों के बारे में लिखें ।
प्रश्न – 7: ‘ठेले पर हिमालय’ के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करें ।
उत्तर : किसी भी यात्रा-वृतांत की सबसे बड़ी विशेषता उसका कौतूहल होता है । अगर पाठक मे यात्रा-वृतांत से कौतूहल न पैदा हो तो वह सफल यात्रा-वृतांत नहीं हो सकता । इस दृष्षि से धर्मवीर का यात्रा-वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ को श्रेष्ठ यात्रा-वृतांत कहा जा सकता है क्यांकि इसका शीर्षक ही मन में कौतूहल पैदा करता है ।

लेखक एकबार पान की दुकान पर अपने एक उपन्यासकार मित्र के साथ खड़े थे कि तभी ठेले पर बर्फ लांद हुए बर्फ वाला आया । उसमें से भाप उड़ रही थी । उपन्यासकार मित्र अल्मोड़ा के थे । वे उस बर्फ के सौदर्य में खो गए और कहा – ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।’ बस क्या था लेखक को अपनी रचना के लिए बना-बनाया तत्काल एक शीर्षक मिल गया – ‘ठेले पर हिमालय’।

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उस घटना से प्रेरित होकर हिमालय पर जमे बर्फ के सौंदर्य को देखन के लिए लेखक ने अपने मित्रों के साथ कौसानी की यात्रा तय कर ली । कौसानी में आगे के मार्गदर्शन के लिए जब उन्हांन बस से शुक्लजो को देखा तो अब तक की यात्रा की सारी थकान गायब हो गयी । शुक्ल जी के साथ उनके शहर के मशहूर चित्रकार सनन भी थे जिनकी वेशभूषा तथा व्यक्तित्व बड़ा अटपटा-सा था ।

जबतक लेखक और उनके मित्र सोमेश्वर घाटी नहीं पहुँचे, वे रास्ते के सौदर्य सं निराश थे। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उन्हें यह आभास हो गया कि कौसानी की तुलना स्विटजरलेण्ड से क्यां की गई है –
” इइतना सुकुमार, इतना सुंदर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक कि लगा इस धरती पर तो जूते उतारकर, पॉँव पोंछकर आगे बढ़ना चाहिए ।”

डाकबंगले पर पहुंनते ही उनलोगों को एक क्षण के लिए बर्फ से ढके हिमालय के दर्शन हुए और फिर वह बादलों के बीच छिप गया । इस क्ष के दर्शन से ही लेखक को जो सुखद अनुभूति हुई उससे वे समझ गए कि प्राचीन काल में साधक अपने दैहिक, दैविक तथः मौतिक ताप को नष्ट करने के लिए हिमालय क्यों जाते थे ।

उस यात्रा को काफी समय के बाद भो जब लेखक हिमालय के उस सौददर्य को याद करते हैं तो उन्हें अपने मित्र तथा उनके दर्द की याद करते हैं । लेकिन बार-बार उस सौदर्य के दर्शन कर पाना संभव नही है। न जान फिर वह अवसर जीवन में कब आ पाएगा । तुलसी ने भी इसी भावना के वश में होकर कहा होगा –
‘कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो’

फिर भी लेखक निराश नहीं हैं। वह अवसर उनके जीवन मे कभी न कभी फिर अवश्य आएगा।
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि लेखक की कौसानी-यात्रा का वर्णन हमे प्रारंभ से लेकर अंत तक बाँधे रखती है तथा लेखक जिन अनुभूतियों से गुजरते हैं – वह अनुभूति पाठक की हो जाती है। सफल यात्रा-वृतांत का यही सबसे बड़ा गुण है तथा इस आधार पर इसका शीर्षक ‘ठले पर हिमालय’ भी सर्वथा उपयुक्त है ।

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है – यह किसने क्या देखकर कहा ?
उत्तर :
लेखक के उपन्यासकार मित्र ने ठले पर रखे बर्फ से उठती भाप की सुंदरता का देखकर कहा।

प्रश्न 2.
लेखक को अपने यात्रा-वृतांत का शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ की प्रेरणा किसकी बात से मिल्नी ?
उत्तर :
लेखक को अपने यात्रा-वृतांत के शीर्षक की प्रेरणा अपने उपन्यासकार मित्र की बात से मिलो।

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प्रश्न 3.
अपने शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ के बारे में लेखक ने नए कवियों से क्या कहा है ?
उत्तर :
अपने शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ के बारे में लेखक ने नए कवियों से कहा है – “इसे ले जायँ और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ बैडोल-बेतुकी लिख डालें ।”

प्रश्न 4.
नये कवियों की पंक्तियों को लेखक ने ‘बेडोल-बेतुकी’ क्यों कहा है ?
उत्तर :
नये कवियों की कविता न तो मन को छूती है और न ही छंद के नियमों का पालन करती है. इसलिए उनकी पंक्तियों को लेखक ने बैडोल-बेतुकी कहा है ।

प्रश्न 5.
सुललित गीतकारों से लेखक ने बर्फ को क्या कहकर डाँटने को कहा है ?
उत्तर :
सुललित गीतकारों से लेखक ने बर्फ को यह कहकर डाँटने को कहा है – “उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो ?’

प्रश्न 6.
लेखक ने जब अपने मन की अनुभूति को उपन्यासकार मित्र को बताया तो उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर :
लेखक ने जब अपने मन की अनुभूति को उपन्यासकार मित्र को बताया तो उनक मित्र को प्रतिक्रिया से ऐसा लगा मानो वह बर्फ उनके मन को कहीं खराँच गई है ।

प्रश्न 7.
किसके मन पर हिमालय की बर्फ एक ऐसी खरोंच छोड़ जाती है, जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है ?
उत्तर :
जिसने एक बार भी हिमालय के सौदर्य को देख लया है उसके मन पर हिमालय की बर्फ एक ऐसी खरोंच छोड़ जाती है, जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है ।

प्रश्न 8.
कितना कहप्रद, कितना सूखा और कितना कुरूप है – यह किसके बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
गह उस रास्ते के बारे में कहा गया है जो रास्ता कोसी से कौसानी की ओर जाता है।

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प्रश्न 9.
‘बिल्कुल शैतान की आँत मालूम पड़ता है’ – प्रस्तुत वाक्य किसके लिए कहा गया है?
उत्तर :
प्रस्तुन वाक्य कासी से कौसानी की आर जाने वाले सूखे, भूरे, ढाल को काटकर बनाए गए रास्ते के बारे में कहा गया है ।

प्रश्न 10.
हमलोगों की जान में जान आयी – किनलोगों की जान में जान आई और क्यों ?
उत्तर :
जब लंखक और उनके मित्र ने लॉरीी (बस) से शुक्लजी को उतरते देखा तो उनकी जान में जान आई क्योंकि आगे के सफर के मार्गदर्शक वही थे ।

प्रश्न 11.
पर शुक्लजी के साथ यह नई मूर्ति कौन है – यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है ?
उत्तर :
यहाँ शुक्लजी के चित्र्रकार मित्र संन के बारे में कहा जा रहा है।

प्रश्न 12.
उमी रुपये से घूपकर छुद्वियाँ बिता रहे हैं – कौन, किस रुपये से घूमकर छुद्वियाँ बिता रहा है?
उन्तर :
शुक्लजी के वित्रकार मित्र संन को उनके कुछ चित्रों पर अकादमी की और से पुरस्कार स्वरूप रुपये मिले थे। वे उन्हों रुपयों सं अपनी खुद्टियाँ बिता रहे थे।

प्रश्न 13.
आते समय लेखक के सहयोगी ने कौसानी के बारे में क्या कहा था ?
उत्तर :
लखक के एक सहययागी ने कौसानी आते समय उनसे यह कहा था कि कश्मीर के मुकाबले उन्हे कौसानी ने अधिक मांह है, गाँधीजी ने अनासक्ति-यांग यहीं लिखा था और यं भी कहा था कि स्विटजरलेण्ड का आभास कौसानी में हो होता है ।

प्रश्न 14.
गाँधीजी ने अनासक्ति योग कहाँ लिखा था ?
उत्तर :
गाँधी जी नं अनासक्तियोग कौसानी में लिखा था।

प्रश्न 15.
कौसानी कहाँ बसा हुआ है ?
उत्तर :
सांमश्वर की घाटी के उत्तर में ऊँची पर्वतमाला के शिखर पर कौसानी बसा हुआ है।

प्रश्न 16.
कौसानी के बस अड्डे पर पहुँचकर लेखक को क्या लगा ?
उत्तर :
कौसानी के बस अड्डे पर पहुँचकर लेखक की कह लगा कि वे ठगे गए हैं क्योंकि वहाँ एक उजड़ा-सा गाँव था और वर्फ का नों कहीं नामो-निशान न था।

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प्रश्न 17.
लेखक ने किन्नर और यक्ष के कहाँ वास करने का अंदाजा लगाया ? क्यों ?
उत्तर :
कॉसानी पर्वतमाला की कत्यृर घाटी में किन्नर और यक्ष के वास करने का अंदाजा लेखक ने लगाया क्यांकि वहाँ का सौंदर्य अनुपम है।

प्रश्न 18.
आपस में उलझ जानेवाली बेलों की लड़ियों-सी नदियों को देखकर लेखक के मन में क्या खयाल आया ?
उत्तर :
बेलों की लड़यों सी उलझी नदियों कां देखकर लेखक के मन में यह खयाल आया कि इन लड़ियों को उठाकर वे कलाई में लपेट लें, आँखों से लगा लें ।

प्रश्न 19.
इतना सुकुमार, इतना सुन्दर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक-किसे कहा गया है?
उत्तर :
कत्यूर की रग-बिरगी घाटी का इतना सुकुमार, इतना सुन्दर, इतना सजा हुआ और निष्कलक कहा गया है।

प्रश्न 20.
खिड़की से झाँक रहा है, कहीं गिर न पड़े – किसके बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
यह बर्फ से ढंक बाल-हिमाशिखर जो बादलों के पीछे छिप गया था, के बारं में कहा गया है ।

प्रश्न 21.
किसकी सारी खिन्नता, निराशा, थकावट सब छू-मन्तर हो गई ? क्यों ?
उत्तर :
लंखक को सारी खिन्नता, निराशा, थकावट – सब छू-मंतर हो गई क्योंकि उसने एक क्षण के लिए ही सही पर हिमाशिखर के दर्शन कर लिए थे।

प्रश्न 22.
निरावृत…असीम सौंदर्य राशि हमारे सामने अभी-अभी अपना घूँघट धीरे से खिसका देगी किसके बारे में कहा जा रहा है ?
उत्तर :
यहाँ हिमालय के सौंदर्य के बार में कहा जा रहा है ।

प्रश्न 23.
‘अब समझे यहाँ का जादू’ – कौन, किससे कह रहा है ?
उत्तर :
यह लेखक के मित्र शुक्लजी लंखक से कह रहे हैं।

प्रश्न 24.
आप लोग खुशकिस्मत हैं साहब – वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता कौसानी डाकबंगले का खानसामा तथा श्रोता लेखक व उनके मित्र हैं।

प्रश्न 25.
और फिर सब खुल गया – सब खुल गया का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
‘सब खुल गया’ का अर्थ हिमालय के शिखरों का बादलों के परदे से निकल आना है ।

प्रश्न 26.
यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था ? किसकी समझा में पहली बार क्या आ रहा था ?
उत्तर :
लेखक को हिमालय का सौंदर्य देखकर पहली बार यह समझ में आ रहा था कि प्राचीन काल में साधक अपनी दैहिक, दैविक तथा भौनिक ताप को कम करने के लिए हिमालय क्यो जाते थे।

प्रश्न 27.
विदेशियों ने हिमालय के बर्फ को क्या कहा है ?
उत्तर :
विद्देशियों ने हिमालय के बर्फ को ‘चिरतन हिम’ कहा है ।

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प्रश्न 28.
लेखक हिमालय को किसकी तरह कहते हैं ?
उत्तर :
लेखक हिमालय को अपने बड़े भाई की तरह कहते हैं।

प्रश्न 29.
‘बाद में मालूम हुआ’ – किसे क्या बाद में मालूम हुआ ?
उत्तर :
लेखक को यह बाद मे मालूम हुआ कि चित्रकार सेन बम्बई की अत्याधुनिक चित्रशैली से थोड़ा नाराज है ।

प्रश्न 30.
‘आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है’ – किसकी याद आने पर किसका मन पिरा उठता है ?
उत्तर :
हिमालय और उसके सौंदर्य की याद आने पर आज भी लेखक का मन पिरा उठता है।

प्रश्न 31.
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो – किसने कहा था ?
उत्तर :
यह तुलसीदास ने कहा था ।

प्रश्न 32.
लेखक का मन कहाँ रमता है ?
उत्तर :
लंखक का मन हिमालय-शिखरों पर रमता है ।

प्रश्न 33.
उन्हीं डँचाइयों पर तो मेरा आवास है – किन उँचाइयों पर किसका आवास है ?
उत्तर :
हिमालय को उँचाइयों पर लेखक के मन का आवास है।

प्रश्न 34.
रबीन्द्र की पंक्ति कौन गा उठा ?
उत्तर :
रवोन्द्र की पक्ति चित्रकार सेन गा उठा।

प्रश्न 35.
ज्यों-ज्यों कौसानी निकट आने लगा – उसका क्या प्रभाव लेखक पर दिखने लगा?
उत्तर :
कौसानी के निकट आते- आते अधैर्य, असतोष तथा क्षोभ का भाव लेखक पर दिखने लगा।

प्रश्न 36.
अकस्मात् वह शीर्षासन करने लगा – कौन शीर्षासन करने लगा ?
उत्तर :
अकस्मात् चित्रकार सेन शीर्षासन करने लगा ।

प्रश्न 37.
लेखक क्या देखकर पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया ?
उत्तर :
जब लेखक कौसानी बस अड्डे पर उतरे तो सामने की घाटी का आपार सौदर्य देखकर पत्थर की मूर्चि-से स्तख्ध रह गए

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प्रश्न 38.
सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था – किसके दिल क्यों बुरी तरह धड़क रहा था?
उत्तर :
लेखक का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि क्या होगा जब हिमालय उसके सामने ससौददर्य और अनावृत होगा।

प्रश्न 39.
लेखक के साथ कौन-कौन कौसानी गए थे ?
उत्तर :
लंखक के साथ उनकी पत्नी, चित्रकार सेन, शुक्ल जी तथा एक मित्र कौसानी गए थे।

प्रश्न 40.
नगाधिराज, पर्वत सम्राट किसे कहा गया है ?
उत्तर :
हिमालय को नगाधिराज, पर्वत समाट कहा गया है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
घर्मवीर भारती का जन्म कब हुआ था ?
(क) 25 दिसंबर सन् 1926
(ख) 24 दिसंबर सन् 1925
(ग) 26 दिसंबर सन् 1927
(घ) 28 दिसंबर सन् 1931
उत्तर :
(क) 25 दिसंबर सन् 1926

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प्रश्न 2.
भारती जी ने निम्नलिखित में से किन दो साप्ताहिक पत्रों का संपादन किया था ?
(क) ‘दिनमान’ और ‘संगम’
(ख) ‘संगम’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’
(ग) ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’
(घ) ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’.
उत्तर :
(ग) ‘संगम’ और ‘धर्मयुग’।

प्रश्न 3.
भारती जी को निम्न में से किस उपाधि से अलंकृत किया गया ?
(क) पद्माश्री
(ख) साहित्य अकादमी
(ग) भारती सम्मान
(घ) साहित्य भूषण
उत्तर :
(क) पड्शश्री।

प्रश्न 4.
धर्मवीर भारती ने निम्न में से किस विधा में नहीं लिखा ?
(क) कविता
(ख) कथा
(ग) नाटक
(घ) व्यंग्य
उत्तर :
(घ) व्यंग्य ।

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प्रश्न 5.
‘गुनाहों का देवता’ (उपन्यास) किसकी रचना है ?
(क) प्रिमचंद की
(ख) जैनेनेन्र की
(ग) धर्मवीर भारती की
(घ) यशपाल की
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती की।

प्रश्न 6.
‘सूरज का सातवां घोड़ा’ (उपन्यास) के लेखक कौन हैं ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) उषा प्रियवदा
(घ) दिनकर
उत्तर :
(ख) धर्मवौर भारती।

प्रश्न 7.
‘कनुप्रिया’ (काव्य) के कवि कौन हैं ?
(क) धर्मवीर भारती
(ख) पंत
(ग) प्रसाद
(घ) निराला
उत्तर :
(क) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 8.
‘ठण्डा लोहा’ (काव्य) के कवि कौन हैं ?
(क) महादेवी
(ख) प्रसाद
(ग) बिहारी
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती।

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प्रश्न 9.
‘अन्धायुग’ (काव्य-नाटक) किसकी रचना है ?
(क) दिनकर की
(ख) धर्मवोर भारती की
(ग) मैथिलीशरण गुप्त की
(घ) तुलसी की
उत्तर :
(ख) धर्मवौर भारती की।

प्रश्न 10.
‘सात गीतवर्ष’ (कविता) के रचयिता कौन हैं ?
(क) प्रसाद
(ख) पंत
(ग) निराला
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 11.
‘मानस-मूल्य’ के लेखक कौन हैं ?
(क) जैनेन्द्र
(ख) अरुण कमल
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) यशपाल
उत्तर :
(ग) धर्मवौर भारती।

प्रश्न 12.
‘साहित्य’ किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद्य की
(ख) नगेन्द्र की
(ग) रामचंद्र शुक्ल की
(घ) धर्मवीर भारती की
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती की।

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प्रश्न 13.
‘नदी प्यासी थी’ के रचनाकार कौन है ?
(क) महादेवी
(ख) प्रियंवदा
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) सर्वेश्वर
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 14.
‘कही-अनकही’ (निबंध-संग्रह) के निबंधकार कौन हैं ?
(क) हरिशंकर परसाई
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) प्रेमचंद
(घ) महावीर प्रसाद द्विवेदी
उत्तर :
(ख) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 15.
‘ठेले पर हिमालय’ किसकी रचना है ?
(क) धर्मवीर भारती की
(ख) अरुण कमल की
(ग) दिनकर की
(घ) द्विवेदी की
उत्तर :
(क) धर्मवीर भारती की।

प्रश्न 16.
‘पश्यन्ती’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) रामचंद्र शुक्ल
(ख) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 17.
‘ठेले पर हिमालय’ किस विधा की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) नाटक
(ग) उपन्यास
(घ) यात्रा-वृतांत
उत्तर :
(घ) यात्रा-वृतांत ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

प्रश्न 18.
‘ठेले पर हिमालय’ में कहाँ से कहाँ तक की यात्रा का विवरण है ?
(क) नेनीताल के कौसानी तक
(ख) राजगीर से कौसानी तक
(ग) नौनीताल से कोसी तक
(घ) कोसी से कत्यूर तक
उत्तर :
(क) नैनीताल के कौसानी तक ।

प्रश्न 19.
विश्व की प्रसिद्ध भाषाओं की कविताओं का अनुवाद भारती जी ने किस नाम से किया है ?
(क) मतान्तर
(ख) देशान्तर
(ग) दिशान्तर
(घ) लिप्यान्तर
उत्तर :
(ख) देशान्तर ।

प्रश्न 20.
‘सपना अभी भी’ (काव्य) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) मोहन राकेश
(ख) रेणु
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) अश्क
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 21.
‘आद्यन्त’ (काव्य) किसकी रचना है ?
(क) धर्मवीर भारती की
(ख) निराला की
(ग) नागार्जुन की
(घ) अजेय की
उत्तर :
(क) धर्मवौर भारती की।

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प्रश्न 22.
‘मुर्दों का गाँव’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है ?
(क) अज्ञेय की
(ख) कमलेश्वर की
(ग) धर्मवीर भारती की
(घ) राजेन्र्र यादव की
उत्तर :
(ग) धर्मवौर भारती की।

प्रश्न 23.
‘बन्द गली का आखिरी मकान’ किसकी कृति है ?
(क) मन्नू भंडारी की
(ख) राजेन्द्र यादव की
(ग) यशपाल की
(घ) धर्मवीर भारती की
उत्तर :
(घ) धर्मवोर भारती की ।

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प्रश्न 24.
‘साँस की कलम से’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) कमलेश्वर
(ख) प्रेमचंद
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) निर्मल वर्मा
उत्तर :
(ग) धर्मवोर भारती ।

प्रश्न 25.
‘ग्यारह सपनों का देश’ के उपन्यासकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) इंशाअल्ला खाँ
(ग) भारतेन्दु
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवौर भारती।

प्रश्न 26.
‘कुछ चेहरे, कुछ चिन्तन’ के निबंधकार कौन हैं ?
(क) हरिशकर परसाई
(ख) मंजुल भगत
(ग) भौष्म साहनी
(घ) धर्मवीर भारती
उत्तर :
(घ) धर्मवीर भारती ।

प्रश्न 27.
‘स्वर्ग और पृथ्वी’ के उपन्यासकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचद
(ख) पाश
(ग) धर्मवीर भारती
(घ) निर्मल वर्मा
उत्तर :
(ग) धर्मवोर भारती।

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प्रश्न 28.
‘मुक्त क्षेत्र : युद्ध क्षेत्रे’ रिपोतार्ज किसने लिखा है ?
(क) ज्ञान प्रकाश
(ख) धर्मवौर भारती
(ग) रेणु
(घ) निराला
उत्तर :
(ख) धर्मबीर भारती ।

प्रश्न 29.
‘युद्ध-यात्रा’ रिपोतार्ज के रचनाकार कौन हैं ?
(क) निराला
(ख) ज्ञानरंजन
(ग) धर्मवोर भारती
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ग) धर्मवीर भारती।

प्रश्न 30.
‘यात्रा-चक्र’ यात्रा-वृतांत के लेखक कौन हैं ?
(क) धर्मवीर भारती
(ख) प्रेमचंद
(ग) अरुण कमल
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(क) धर्मवौर भारती ।

प्रश्न 31.
लेखक के मित्र का जन्म-स्थान कहाँ है ?
(क) अल्मोड़ा
(ख) कौसानी
(ग) नैनीताल
(घ) दिल्ली
उत्तर :
(क) अल्मोड़ा

प्रश्न 32. लेखक के मित्र पेशे से क्या हैं ?
(क) शिक्षक
(ख) शिक्षक एवं उपन्यासकार
(ग) दुकानदार
(घ) डॉक्टर
उत्तर :
(ख) शिक्षक एवं उपन्यासकार ।

प्रश्न 33.
लेखक कौसानी क्यों गए थे ?
(क) बर्फ देखने
(ख) गाँव देखने
(ग) घाटी देखने
(घ) पूजा-पाठ करने
उत्तर :
(क) बर्फ देखने ।

प्रश्न 34.
कोसी से कौसानी जानेवाली सड़क कैसी लगती है ?
(क) सीधी
(ख) शैतान की आँत
(ग) सॉप की आँत
(घ) उवड़-खाबड़
उत्तर :
(ख) शैतान की आंत ।

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प्रश्न 35.
कौसानी में लेखक किसका इंतजार कर रहे थे ?
(क) बस का
(ख) रेल का
(ग) शुक्ल जी का
(घ) सेन का
उत्तर :
(ग) शुक्ल जी का ।

प्रश्न 36.
मुसाफिरों के चेहरे पीले क्यों पड़ गए थे ?
(क) भय से
(ख) बीमारी से
(ग) लापरवाह ड्राइवर के कारण
(घ) रंग पड़ जाने से
उत्तर :
(ग) लापरवाह ड्राइवर के कारण ।

प्रश्न 37.
कैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से मिलता है ?
(क) सेन जैसा
(ख) खानसामा जैसा
(ग) शुक्लजी जैसा
(घ) लेखक जैसा
उत्तर :
(ग) शुक्लजी जैसा।

प्रश्न 38.
किसने लेखक को कौसानी आने का उत्साह दिलाया था ?
(क) शुक्ल जी ने
(ख) सेन ने
(ग) रवीन्द्र ने
(घ) पत्नी ने
उत्तर :
(ख) शुक्ल जी ने ।

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प्रश्न 39.
शुक्ल जी के साथ नई मूर्त्ति कौन थे ?
(क) खानसामा
(ख) ड्राइवर
(ग) चित्रकार सेन
(घ) गणेश
उत्तर :
(ग) चित्रकार सेन ।

प्रश्न 40.
शुक्लजी के साथ आए व्यक्ति का नाम क्या था ?
(क) सेन
(ख) गुप्ता जी
(ग) रवीन्द्र
(घ) राजेन्द्र
उत्तर :
(क) सेन ।

प्रश्न 41.
अकादमी से किसकी कृतियों पर पुरस्कार मिला था ?
(क) लेखक
(ख) खानसामा
(ग) सेन
(घ) रवीन्द्र
उत्तंर :
(ग) सेन ।

प्रश्न 42.
शुक्लजी के मित्र सेन पेशे से क्या थे ?
(क) चित्रकार
(ख) फोटोग्राफर
(ग) डॉकटर
(घ) शिक्षक
उत्तर :
(क) चित्रकार ।

प्रश्न 43.
कोसी के पहला पड़ाव कौन-सा आया ?
(क) सोमेश्वर की घाटी
(घ) कौसानी
(ग) कश्मीर घाटी
(घ) कत्यूर
उत्तर :
(क) सोमेश्वर की घाटी।

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प्रश्न 44.
कोसी से कौसानी की दूरी कितनी है ?
(क) 20 कि०मी०
(ख) 24 कि०मी०
(ग) 30 कि॰मी०
(घ) 50 कि०मी०
उत्तर :
(ख) 24 कि॰मी० ।

प्रश्न 45.
स्विटजरलैण्ड का आभास कहाँ होता है ?
(क) कौसानी में
(ख) कश्मीर में
(ग) नैनौताल में
(घ) दार्जीलिंग में
उत्तर :
(क) कौसानी में।

प्रश्न 46.
गाँधी जी ने ‘अनासक्तियोग’ कहाँ लिखा था ?
(क) गुजरात में
(ख) अहमदाबाद में
(ग) कौसानौ में
(घ) दक्षिण अफ्रीका में
उत्तर :
(ग) कौसानी में।

प्रश्न 47.
सोमेश्वर की घाटी के उत्तर में क्या है ?
(क) ऊँची पर्वतमाला
(ख) कल-कारखाने
(ग) सेव के बाग
(घ) स्विट जरलैण्ड
उत्तर :
(क) ऊँची पर्वतमाला ।

प्रश्न 48.
कल्यूर घाटी कहाँ स्थित है ?
(क) कौसानी में
(ख) कशमीर में
(ग) दार्जीलिंग में
(घ) देहरादून में
उत्तर :
(क) कौसानी में ।

प्रश्न 49.
कित्रर कौन हैं ?
(क) देवज्ञाति
(ख) सुर
(ग) असुर
(घ) राक्षस
उत्तर :
(क) देवजाति।

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प्रश्न 50.
यक्ष कौन हैं ?
(क) रक्षक
(ख) भक्षक
(ग) दानव
(घ) डाकू
उत्तर :
(क) रक्षक

प्रश्न 51.
आपलोग खुशकिस्मत हैं साहब – वक्ता कौन है ?
(क) लेखक
(ख) सेन
(ग) खानसामा
(घ) चित्रकार
उत्तर :
(ग) खानसामा ।

प्रश्न 52.
निम्न में से कौन ताप की श्रेणी में नहीं आता है ?
(क) दैहिक
(ख) दैविक
(ग) आध्यात्मिक
(घ) भौतिक
उत्तर :
(ग) आध्यात्मिक।

प्रश्न 53.
सब चुपचाप थे – सब कौन हैं ?
(क) घाटी
(ख) बस के यात्री
(ग) लेखक के साथवाले लोग
(घ) खानसामे
उत्तर :
(ग) लेखक के साथवाले लोग ।

प्रश्न 54.
सेन किसकी पंक्ति गा उठा ?
(क) मुकेश की
(ख) रवीन्द्र की
(ग) कबीर की
(घ) निराला की
उत्तर :
(ख) रवीन्द्र की।

प्रश्न 55.
हिमालय का सौंदर्य देखकर लेखक की टोली में सबसे अधिक खुश कौन था ?
(क) लेखक
(ख) शुक्ल जी
(ग) सेन
(घ) पत्नी
उत्तर :
(ग) सेन ।

प्रश्न 56.
किसकी याद आने से लेखक का मन पिरा उठता है ?
(क) पत्नी की
(ख) मित्र की
(ग) हिमालय की
(घ) यात्रा की
उत्तर :
(ग) हिमालय की।

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प्रश्न 57.
लेखक को कौन बार-बार बुलाती हैं ?
(क) पत्नी
(ख) सुन्दरता
(ग) हिमशिखरों की उँचाइयाँ
(घ) घाटी
उत्तर :
(ग) हिमशिखरों की ऊँचाइयाँ ।

प्रश्न 58.
नहीं बन्धु…… आऊँगा । बंधु कौन है ?
(क) लेखक
(ख) मित्र
(ग) सेन
(घ) हिमालय
उत्तर :
(घ) हिमालय ।

प्रश्न 59.
मैं करूँ तो क्या करूँ-वक्ता कौन है ?
(क) सेन
(ख) शुक्लजी
(ग) मित्र
(घ) लेखक
उत्तर :
(घ) लेखक ।

प्रश्न 60.
कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो – किसका कथन है ?
(क) कबीर का
(ख) लेखक का
(ग) सूरदास का
(घ) तुलसीदास का
उत्तर :
(घ) तुलसीदास का।

टिप्पणियाँ

किन्नर :- प्रस्तुत शब्द् धर्मवोर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
महाभारत और पुराणों में हिमालय क्षेत्र में बसनेवाली इस जाति का उल्लेख है। किनररों को देवताओं का गायक और भक्त कहा गया है। किन्नरों के दाढ़ी-मूँछ नहीं के बराबर निकलती है और कभी-कभी चेहरा देखकर तुरंत स्त्री-पुरुष में अंतर नहीं मालूम होता है।

यक्ष :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
यक्ष देवयानन की एक जाति थी। इसे महाभारत में शूद्रदेवता कहा गया है। ये लोग कुबेर के उपासक थे और उसकी सपन्ति की रक्षा करते थे। कुबेर का यक्ष का राजा कहा गया है।

तुलसी (तुलसीदास) :- प्रस्तुत शब्द धर्मवोर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
‘रामचरितमानस’ के रचयिता संत तुलसीदास के जन्म स्थान के बारे में विवाद है। तुलसीदास द्वारा राित काव्य भारतीय समाज के लिए प्रेरणादायक, जोवन को मर्यादित करनेवाली तथा उपयोगी है। तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों में रामचरितमानस, कवितावली, विनय पत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

गोमती :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
गोमती नदी का उल्लेख ‘ऋग्वेद’ तथा ‘महाभारत’ मे हुआ है। ॠग्वेद में इस सिंधु की सहायक नदी बताया गया है। कुछ मंथों में यह वैदिक सभ्यता का केन्द्र स्थल है और कुरूक्षेत्र में बहती है। वर्तमान गोमती उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले सं नकलकर नंमिषारण्य और लखनऊ होती हुई जौनपुर के निकट गंगा में मिलती है।

कोसी :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारतो के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
गंगा की यह सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह एवरेस्ट और कंचनजंघा के बीच से प्रवाहित होकर जयनगर नामक स्थान पर मैदान में उतरती है। इसकी धारा बड़ी भयानक है तथा यह तेजी से अपना मार्ग बदलती है। 200 वर्ष पहले यह बिहार में पूर्णिया के निकट बहती थी लंकिन अब लगभग 70 मील पश्चिम में खिसक गई है। इसे बिहार की ‘शोक नदी’ भी कहतं हैं।

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कश्मीर :- प्रस्तुत शब्द धर्मवौर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
कश्मीर का पूरा नाम ‘जम्मृ और कश्मीर’ है। यह देश के धुर उत्तर में स्थित एक सीमांत प्रदेश है। इसकी सीमायें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और तिब्बत से मिलती है। यह प्रदेश अपनी प्राकृतिक शोभा के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी इसका बड़ा महत्व है।

ताप :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।हमार प्राचीन साहित्य में ताप (कष्ट) तीन प्रकार के बताए गए हैं – दैहिक, दैविक तथा भौतिक। दैहिक का अर्थ देह से जुड़ी, दैविक का अर्थ देवताओं से जुड़ी तथा भौतिक अर्थ सासारिक कष्टों से जुड़ा है। इन कष्टों को दूर करने के लिए ग्राचौन साधक हिमालय जाते थे।

चाँद (चंद्रमा) :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
चंद्रमा पृथ्वी का अकेला छोटा उपप्रह है। चंदमा के निर्माण के बारे में कई मत हैं। एक के अनुसार यह पृथ्वी के दूटने से बना है। अन्य मत के अनुसार यह सौरमंडल में कहीं और से भटक कर आया और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में बँध गया।

शैतान :- प्रस्तुत शब्द धर्मवोर भारतो के यात्रा वृतांत ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
शैतान एक फरिश्ता था जिसने ईश्वर को आज्ञा का उल्लंधन किया और स्वर्ग से निकाला गया। तब से वह मनुष्यों को पाप की आर उन्मुख करता है। शैतान शब्द का प्रयोग वैसे मनुष्य के लिए भी किया जाता है जो दूसरों का बुरा चाहता है।

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बाइनाकुलर (दूरबीन) :- प्रस्तुत शब्द धर्मवीर भारती के यात्रा वृतात ‘ठेले पर हिमालय’ से लिया गया है।
बाइनाकुलर लंबी नलीनुमा एक यंत्र होता है जिसमें लेंस लगा होता है। इससे हमें दूर की वस्तु भी निकट तथा साफसाफ दिखाई देती है। अभी बड़े-बड़े शक्तिशाली बाइनाकुलर से तारों का भी अध्ययन किया जाता है अब तो ऐसे बाइनाकुलर भो हैं जिनसे रात के अंधेरे में भी देखा जा सकता है।

पाठ्याधारित व्याकरण :

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डॉं० धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर सन् 1926 को इलाहाबाद (प्रयाग) के अतरसुइया मुहल्ले में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री चिरंजीव लाल वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती चंदा देवी था । धर्मवीर भारती पाँच भाइयों में से एक थे ।

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बालक धर्मवीर बचपन में एक-दो वर्ष पिता के साथ आज़मगढ़ और मऊनाथ भंजन में रहे। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई । इलाहाबाद के डी० ए० वी० हाई स्कूल में पहली बार चौथी क्लास में नाम लिखाया गया। आठवीं कक्षा में थे तभी पिता का देहांत हो गया । उसके बाद बहुत गरीबी में दिन बीते। प्रयाग में बसे मामा श्री अभयकृष्ण जौहरी के परिवार के साथ रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त की। कायस्थ पाठशाला इंटर कॉलेज से सन् 1942 में इंटरमीडियट पास किया ।

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बयालीस के आंदोलन में भाग लिया और पढ़ाई एक बरस रुक गयी । सन् 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से बी० ए० की डिग्री प्राप्त की व हिन्दी में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर चिंतामणि घोष मैडल के हकदार बने । सन् 1947 में वही से प्रथम श्रेणी में एम० ए० करने के बाद डॉ० धीरेन्द्र वर्मा के निर्देशन में सिद्ध साहित्य पर शोध प्रबंध लिखकर पी-एच० डी० की डिग्री प्राप्त की।

इन्हें छात्र जीवन से ही द्यूशनें कर आत्मनिर्भर होना पड़ा । एम० ए० की पढ़ाई का खर्च ‘अभ्युदय’ (सम्पादक : श्री पद्यकांत मालवीय) में पार्ट टाइम काम करके निकाला । 1948 में ‘संगम’ (सम्पादक : श्री इलाचंद्र जोशी) में सहकारी संपादक नियुक्त हुए । दो वर्ष वहाँ काम करने के बाद हिंदुस्तानी अकादमी में उपसचिव का कार्य किया । तदुपरांत प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापक नियुक्त हुए । सन् 1960 तक वहाँ कार्य किया ।

प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान ‘हिंदी साहित्य कोश’ के सम्पादन में सहयोग दिया। ‘निकष’ पत्रिका निकाली तथा ‘आलोचना’ का सम्पादन भी किया । उसके बाद ‘धर्मयुग’ में प्रधान सम्पादक पद पर बम्बई आ गये । ‘धर्मयुग’ हिंदी के सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक के रूप में स्थापित हुआ । 1987 में डॉ० भारती ने अवकाश ग्रहण किया । 1989 में हृदय रोग से गंभीर रूप से बीमार हो गये । गहन चिकित्सा के बाद प्राण तो बच गये किन्तु स्वास्थ्य पूरी तरह कभी सुधरा नहीं और 4 सितंबर 1997 को देहावसान हो गया। नींद में ही मृत्यु ने वरण कर लिया ।

यात्राएँ : सन् 1961 में कामनवेल्थ रिलेशन्स कमेटी के आमंत्रण पर प्रथम विदेश यात्रा पर इंगलैंड तथा यूरोप भ्रमण । पश्चिम जर्मन सरकार के आमंत्रण पर 1964 में जर्मनी यात्रा तथा 1966 में भारतीय दूतावास के निमंत्रण पर इंडोनेशिया तथा थाइलैंड की यात्राएँ की । सितंबर 1971 में मुक्तिवाहिनी के साथ बांग्ला देश की गुप्त

यात्रा की तथा क्रांति का पहला आँखों देखा प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया । भारत-पाक युद्ध 1971 के दौरान भारतीय स्थल सेना के साथ वास्तविक युद्ध स्थल पर निरंतर उपस्थित रहकर युद्ध के वास्तविक मोर्चे के रोमांचक अनुभवों को लिपिबद्ध किया । इसके पहले ऐसा काम कभी किसी पत्रकार ने नहीं किया। भारतीय मूल की मारिशसीय जनता की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए जून 1974 में मारिशस की यात्रा की ।

फिर ऐफ्रो-एशियाई कान्क्रेंस में भाग लेने के लिए पुन: मारिशस गये । 1978 में चीन की सिनुआ संवाद समिति के आमंत्रण पर भारत सरकार के डेलीगेशन के सदस्य के रूप में चीन की यात्रा पर गये। 1991 में परिवार के साथ अमरीका यात्रा पर गये और अपने भारत देश के तो हर प्रांत में बार-बार अनेक यात्राएँ कीं । यात्राएँ डॉ० भारती को बहुत सुख देती थीं।

अलंकरण तथा पुरस्कार : 1972 में पद्म श्री से अलंकृत हुए । 1997 में महाराष्ट्र रांज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ रचना को प्रतिवर्ष 51,000 रु० का पुरस्कार देने की घोषणा की । पुरस्कार का नाम है – “धर्मवीर भारती महाराष्ट्र सारस्वत सम्मान”। 1999 में युवा कहानीकार उदाय प्रकाश के निर्देशन में साहित्य अकादमी दिल्ली के लिए डॉ० भारती पर वृत्त चित्र का निर्माण हुआ।

अनेक पुरस्कारों में से कुछ इस प्रकार है –

  • 1997 – संगीत नाटक अकादमी के मनोनीत सदस्य
  • 1984 – हल्दी घाटी श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार (महाराणा मेवाड़ फाउडेशन)
  • 1985 – साहित्य अकादमी रल्न सदस्यता सम्मान
  • 1986 – संस्था सम्मान – उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
  • 1988 – सर्वश्रेष्ठ नाटककार पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी, दिल्ली
  • 1989 – डॉ० राजेन्द्रपसाद शिखर सम्मान, बिहार सरकार
  • 1989 – गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
  • 1989 – भारत भारती पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
  • 1990 – महाराष्ट्र गौरव – महाराष्ट्र सरकार
  • 1991 – साधना सम्मान, केडिया स्मृति न्यास
  • 1992 – महाराष्ट्राच्या सुपुत्रांचे अभिनंदन सम्मान, वसंत राव नाईक प्रतिष्ठान
  • 1994 – व्यास सम्मान, के० के० बिड़ला फाउंडेशन
  • 1996 – शासन सम्मान, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
  • 1997 – उत्तर प्रदेश गौरव, अभियान सम्मान संस्थान

साहित्य-परिचय :-

कहानी-संग्रह :

  • मुर्दों का गाँव – 1946
  • स्वर्ग और पृथ्वी – 1946
  • चाँद और दूटे हुए लोग – 1955
  • बंद गली का आखिरी मकान – 1969
  • साँस की कलम से (समस्त कहानियाँ एक साथ) – 2000

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कविता :

  • ठंडा लोहा – 1952
  • अंधायुग – 1954
  • सात गीत वर्ष – 1959
  • कनुप्रिया – 1959
  • सपना अभी भी – 1993
  • आद्यन्त – 1999

उपन्यास :

  • गुनाहों का देवता – 1949
  • सूरज का सातवां घोड़ा – 1952
  • ग्यारह सपनों का देश (प्रारंभ व समापन) – 1960

निबंध :

  • ठेले पर हिमालय – 1958
  • पश्यंती – 1969
  • कही अनकहनी -1970
  • कुछ चेहरे कुछ चिंतन -1995
  • शब्दिता – 1997

रिपोर्टिंग

  • युद्ध-यात्रा -1992
  • मुक्त क्षेत्र : युद्ध क्षेत्रे – 1973

आलोचना :

  • प्रग्गतिवाद-एक समीक्षा – 1949
  • मानव-मूल्य और साहित्य – 1960

एकांकी-संग्रह :

  • नदी प्यासी थी – 1954

अनुवाद :

  • ऑस्कर वाइल्ड की कहानियाँ – 1946
  • देशांतर (इक्कीस देशों की आधुनिक कविताएँ) – 1960

शोध प्रबंध :

  • सिद्ध साहित्य – 1968

यात्रा-विवरण :

  • यात्रा चक्र – 1968

पत्र-संकलन :

  • अक्षर अक्षर यज्ञ -1999

साक्षात्कार :

  • धर्मवीर भारती से साक्षात्कार – 1999

ग्रंथावली :

  • धर्मवीर भारती ग्रंथावली (9 खंडों में) -1998

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 52

  • दिलचस्प = आकर्षक
  • यकीन = विश्वास
  • सिलें = बड़े दुकड़े
  • तत्काल = तुरंत
  • कौंध = चमक।
  • बैडौल = अनगढ़
  • बेतुकी = बिना तुक के
  • सुललित = अच्छे

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पृष्ठ सं० – 53

  • तमाम = बहुत सारी पिरा = दु:ख ।
  • कष्टप्रद = कष्ट देने वाला ।
  • कुरूप = असुंदर
  • एकरस = एक जैसा ।
  • नौसिखिया = नया-नया सीखा हुआ
  • लापरवाह = परवाह नहीं करनेवाला
  • उमस = गर्मी
  • लारीं = बस ।
  • प्रसन्नवदन = खुशी से खिले हुए ।
  • सफर = यात्रा ।
  • काफूर = गायब।
  • जर्किन = जैकेट
  • बाइनाकुलर = दूरबीन
  • अटपटी = अजीब।
  • सोंकिया = सींक के जैसा ।
  • ताड़कर = समझकर ।
  • मशहूर = प्रसिद्ध ।
  • कृतियों = रचना, चित्र।
  • करतब = करिश्मा
  • सुडौल = गोल-मटोल ।

पृष्ठ सं० – 54

  • कल-कल = पानी की आवाज ।
  • निर्जन = जहाँ कोई जन (व्यक्ति) न हो ।
  • कंकड़ीली = कंकड़ (छोटे – छाटे पत्थर के टुकड़े) से भरी ।
  • सुहावना = अच्छा ।
  • तन्द्रालस = नींद से बोझिल।
  • अतुलित = जिसकी तुलनां न की जा सके ।
  • माह = आकर्षित ।
  • आभास = अनुभव ।
  • संशय = शक, संदेह ।
  • क्षोभ = गुस्सा ।
  • खिन्न = चिढ़ा हुआ ।
  • अनखाते = झुंझलाते।
  • अपार = जिसका पार (सीमा ) न हो ।
  • किन्नर = देवताओं की एक जाति ।
  • शिलाएँ = पत्थर ।
  • बेलों = फूलों।
  • लड़ियों = मालाओं ।
  • लोक = दुनिया।
  • सुकुमार = कोमल ।
  • निष्कलंक = बिना कलंक के ।
  • कोहरे = कुहासे ।
  • अकस्मात् = अचानक।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

पृष्ठ सं० – 55

  • अटल = नहीं टलने वाला ।
  • रूपहला = चाँदी के रंग का ।
  • नगाधिराज = हिमालय।
  • हर्षातिरेक = खुशी के कारण।
  • लुप्त = गायब ।
  • छू-मन्तर = गायब ।
  • आकुल = बेचैन ।
  • निरावृत = बिना किसी आवरण के, नंगा ।
  • असीम = जिसकी सीमा न हो ।
  • अभिप्राय = मतलब ।
  • अधीर = व्याकुल ।
  • खानसामे = खाना बनानेवाला ।
  • आसार = उम्मीद ।
  • रहस्यमयी = रहस्य से भरी ।
  • पीर = दर्द ।
  • संवेदन = भाव ।
  • अन्तर्द्वन्द्व = अंदर का द्वंद्व (असमंजस) ।
  • दैहिक = देह से जुड़ी हुई।
  • दैविक = देवताओं से जुड़ी हुई ।

पृष्ठ सं० – 56

  • भौतिक = सांसारिक ।
  • उदित = उगा, प्रकट हुआ ।
  • शाश्वत = लागातार, निरंतर ।
  • अविनाशी = कभी नहीं नाश होने वाला ।
  • सुदूर = बहुत दूर ।
  • दर्रों = दो पर्वतों के बीच की संकरा रास्ता।
  • ग्लेशियर = बर्फ का पहाड़ ।
  • अन्धड़ = तूफान ।
  • आत्मलीन = आत्मा में लीन।
  • सम्राट = महाराज।
  • समक्ष = सामने।
  • चेष्टा = कोशिश ।
  • सहसा = अचानक ।
  • तन्द्रा = नींद ।
  • सक्रिय = क्रियाशील।
  • अदम्य = जिसका दमन (दबाया) नहीं किया जा सके ।
  • वण्डरस्ट्रक = आश्चर्यच्चकि।
  • करतूत = करिश्मा ।
  • अकस्मात् = अचानक ।
  • शीर्षासन = सिर के बल किया जाने वाला एक योगासन।
  • अत्याधुनिक = अत्यंत आर्धुनिक ।
  • उज्ज्वल = सफेद ।
  • भेंट = मिला ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 4 ठेले पर हिमालय

पृष्ठ सं० – 57

  • पिरा = दुःख ।
  • स्मृतियों = यादों ।
  • कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो = कबतक इस दशा में रहूँगा ।
  • हिमशिखर = बर्फ
  • से ढकी शिखर । सन्देशा = संदेश ।
  • बंधु = भाई ।
  • आवास = घर ।
  • मन रमता है = मन लगता है ।

WBBSE Class 9 Hindi रचना सार-लेखन

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना सार-लेखन to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi रचना सार-लेखन

‘सार-लेखन’ का अर्थ है किसी रचना को संक्षिप्त रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि उस गद्यांश का कोई महत्तपूर्ण विचार छूटना नहीं चाहिए। इसमें से ऐसा अंश निकाल दिया जाए जिससे उस गद्यांश के मूल भाव पर कोई प्रभाव न पड़े।

‘सार’ का अर्थ है ‘मूल तत्व’ अथवा ‘निचोड़’। किसी अनुच्छेद का सार दो वाक्यों में भी दिया जा सकता है कितु सार-लेखन का एक अन्य प्रकार है – संक्षेपण। संक्षेपण में दिए गए ग्यांश को उसके मूल तत्वों को सुरक्षित रखते हुए एक-तिहाई शब्दों तक संक्षिप्त करना होता है। सार-लेखन के दो प्रमुख सोपान हैं –

(अ) सभी मूल विचारों को सीमित रखना।
(ब) एक-तिहाई शब्दों में सीमित रखना।

किसी भी लम्बी-चौड़ी बात को संक्षेप में प्रस्तुत करना एक कला है परन्तु किसी गद्य-पद्य रचना को काट-छाँटकर एक निश्चित परिमाण में प्रस्तुत करना एक कठिन और अभ्यास-जन्य कौशल है। लगातार अभ्यास से संक्षेपीकरण अथवा सार-लेखन की कुशलता विकसित होती है। इससे लेखन में गठन, गुंफन और सामासिकता आती है। सार अथवा सारांश-लेखन पद्यान्मक और गद्यात्मक दोनों ही प्रकार की रचनाओं का संभव है।

सार-लेखन का महत्व : जीवन में कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक बात कहने का महत्त्व सबसे अधिक है। प्रार्थना-पत्र में, आवेदन-पत्र में, विवरण में, अभिव्यक्ति में, अपनी बात समझने में, साक्षात्कार में, लेखन में, समाचार-पत्रों में, दूरदर्शन अथवा रेडियो में सभी क्षेत्रों में यह आवश्यकता होती है जिससे कम से कम समय खर्च करके अधिक से अधिक समय तक बात की जा सके। इसके लिए छात्रों को भाषा की समाहार-शक्ति, विचारों को सघन बनाने के कला, व्यर्थ तथा अव्यर्थ (सार) को समझने की क्षमता का विकास करना चाहिए। दूसरे की बात को अपने शब्दों में प्रवाहपूर्ण ढंग से रखने की कला भी सार-लेखन के लिए आवश्यक है।

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सार-लेखन की प्रक्रिया अथवा विधि :

जिस गद्यांश/निबंध का सार लिखना हो उसे ध्यानपूर्वक एक से अधिकार बार पढ़ना चाहिए। उसे तब तक पढ़ना चाहिए जब तक उसका अर्थ स्पष्ट न हो। कुछ ही देर में केन्द्रीय भाव समझ में आ जाएगा।
विषय के केंद्रीय भाव को रेखांकित कीजिए। इसी में अनुच्छेद का शीर्षक छिपा होता है।
सार-लेखन में ‘उपयुक्त शीर्षक’ का महत्वपूर्ण स्थान है, इसलिए पाठक को अपने मन में दा-तीन शीर्षकों पर विचार करके अंतिम शीर्षक का चुनाव कर लेना चाहिए।
सार-लेखन दिए गए गद्यांश का लगभग एक-तिहाई होता है।
सार-लेखन में वाक्य संक्षिप्त, सरल और स्पष्ट होने चाहिए। उनमें गागर में सागर भरने की शक्ति होनी चाहिए।
मूल अनुच्छेद के शब्द, वाक्य, मुहावरे तथा लोकोक्तियों का प्रयोग सार-लेखन में नहीं करना चाहिए। अलंकारों, उदाहरणों तथा उद्धरणों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
अंत में सार-लेखन को पुन: पढ़ना चाहिए और देखना चाहिए कि मूल अनुच्छेद की कोई बात छूटी न हो तथा किसी बात की पुनरावृत्ति न हो गई हो, यदि ऐसा हो तो जो भी भूल हो गई हो उसे तुरंत सुधार लेना चाहिए।
यदि शब्द तिहाई से अधिक हों शब्द-संकोचन कला का प्रयोग करना चाहिए। इसमें अनेक शब्दों के लिए एक शब्द का प्रयोग किया जाता है जैसे –
धर्म का उपदेश देना वाला – धर्मोपदेशक।

यदि वाक्य अधिक हों तो दो-तीन सरल वाक्यों को मिलाकर संयुक्त अथवा मिश्र वाक्य में बदल लेना चाहिए।
दिवअर्थक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा विरामदि चिह्नों का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
शीर्षक-सार लिखन के बाद उस कोई शीर्षक भी देना चाहिए। मूल पाठ को पढ़ने से शीर्षक समझ में आ जाता है। मूल की अवधारणा का समझ लन क बाद उसे निकटतम शीर्षक दे देना चाहिए। शीर्षक से विषय का बोध होना चाहिए। उससं वर्ण्य-विषय की झलक मिलनी चाहिए। शीर्षक अनेक बार मूल के प्रारम्भ अथवा अन्त में स्वतः ही होता है। उसं चुन लनना चाहिए अन्यथा संपूर्णता को ध्यान में रखकर अपनी ओर से शीर्षक बनाना चाहिए। शीर्षक संक्षिप्त होना चाहिए।

शीर्षक का चयन : सार-लेखन में शीर्षक का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अच्छे शीर्षक में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

1. अनुच्छेट का कंद्रीय भाव्र या मूल विचार ही शीर्षक में व्यक्त होना चाहिए।
2. शीर्षक अनुच्छेद के कंद्रीय भाव का सही-सही प्रतिनिधि होना चाहिए। अर्थात् उसमें केन्द्रीय भाव से हटकर कोई अर्थ ध्वनित नहीं हांना चानिए और न उसमें केन्द्रीय भाव के किसी अंश की कमी होनी चाहिए।
3. शीर्षक सक्षप्त, स्पष, आकष्षक, अर्थपूर्ण, स्वयं बोलता हुआ-सा होना चाहिए। उसका आकार एक शब्द से एक पदबंध तक हो सकता है कभी-कभी संक्षिप्त सूक्ति भी शीर्षक का स्थान ले सकती है। अच्छा शीर्षक वही है जो पदबंध तक सौमित हों जस -.

अनुशासन/अनुशासन का गित्ज, परिश्रम का महत्त्व, साहस ही जिंदगी, हिम्मत और जिंदगी, श्रद्धा और भक्ति, श्रद्धा और ज्ञानोपल्धि, श्रद्धा से ज्ञान मिलता है आदि।

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उदाहरण 1.
मेरा यह मान्लब्र कदापि नहीं कि विदेशी भाषाएँ सीखनी ही नहीं चाहिए। आवश्यकता, अनुकूलता, अवसर और अवकाश हान पर प्ं त्क नही अनेक भाषाएँ सीखकर ज्ञानार्जन करना चाहिए। द्वेष किसी भाषा से नहीं करना चाहिए। ज्ञान कही भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु अपनी भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देनी चाहिए। क्यांक अपना, अपने टश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नात सं हो सकता है। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और राजनीति की भाषा सदैव लोकभाषा हो होनी चाहिए। अतएव अपनी भाषा के साहित्य की संवा और आभवृद्धि करना, सभी दृष्टियों से हमारा परम धर्म है। (लगभग 110 शब्द)

सार-लेखन-प्रक्रिया : इस अनुच्करंद के महत्त्वपूर्ण विचार-बिंदु निम्नलिखित हैं –

  • ज्ञानार्जन के लिए विदेशी भाषः सीखने में कोई हानि नहीं।
  • किसी भाषा से द्वेष करनन पर उसमें चर्चित ज्ञान से वंचित रह जायेंगे।
  • अपनी भाषा और उसंक साहित्य की उपेक्षा नहीं करती चाहिए।
  • किसी जाति का कल्याण अपनी भाषा से ही होता है।
  • ज्ञान-विज्ञान का वर्णन अपनी भाषा में ही करना चाहिए।
  • अपने साहित्य की सेवा हमारा कर्त्तव्य है।

यं विचार-बिंदु इस प्रकार की अव्यर्वस्थित भाषा में लिखने आवश्यक नहीं, इनका संग्रह-मात्र पर्याप्त है।
शीर्षक-अपनी भाषा का महत्त्व :

सार : लेखक विदेशी भाषा का विरोधी नहीं। उसके अनुसार सभी भाषाओं से ज्ञान-संग्रह उपयोगी है। परंतु किसी राष्ट्र का कल्याण उसकी अपनो भाषा से ही संभव है, अतः अपनी भाषा में साहित्य और ज्ञान की समृद्धि का यत्न करते गहना चाहिए। (लगभग 40 शब्द)

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उदाहरण 2.
लेखक का काम बहुत अंशों में मधु-मक्खियों के काम से मिलता-जुलता है। मधु-मक्खियाँ मकरंद संग्रह करने के लिए कोसों के चक्कर लगाती हैं और अच्छे-अच्छे फूलों पर बैठकर उनका रस लेती हैं। तभी तो उनके मधु में संसार की सर्वश्रेष्ठ मुधरता रहती है। यदि आप अच्छे लेखक बनना चाहते हैं तो आपको भी यह वृत्ति-ग्रहण करनी चाहिए। अच्छे-अच्छे ग्रंथों का खूब अध्ययन कीजिए और उनकी बातों का मनन कीजिए, फिर आपकी रचनाओं में मधु का-सा माधुर्य आने लगेगा। कोई अच्छी उक्ति, कोई अच्छा विचार भले ही दूसरों से ग्रहण किया गया हो, पर यथेष्ट मनन करके आप उसे अपनी रचना में स्थान देंगे तो वह आपका ही हो जाएगा। मनपूर्वक लिखी हुई चीज के संबंध में जल्दी या किसी को यह कहने का साहस ही न होगा कि अमुक स्थान से ली गई है या उच्छिष्ट है। जो बात आप अच्छी तरह आत्मसात् कर लेंगे, तब वह आपकी ही हो जाएगी।

(लगभग 180 शब्द)

मुख्य विचार-बिंदु :

  • लेखक अ, -ग भिम्रियाँ समान होते हैं।
  • अच्छा लेखक ने के लिए मधुमक्खी-वृत्ति अपनानी आवश्यक है।
  • अच्छे ग्रंथ पढ़क नके विचारों का संग्रह कीजिए तथा उनका मनन और चिंतन कीजिए।
  • भली प्रकार चिं न के बाद उन्हें अपनी रचनाओं में प्रयुक्त कीजिए।
  • आत्मसात् कर लेने से वह आपकी बात हो जाएगी।

शीर्षक : अच्छा लेखक कैसे ?

सारांश : अच्छे लेखक मधुमक्खियों की तरह संग्राहक होते हैं। तभी तो उनके ग्रंथों में संसार के श्रेष्ठ ग्रंथों का विचार-मधु मिलता है। अच्छा लेखक बनने के लिए श्रेष्ठ ग्रंथों का अध्ययन कर उत्तम विचारों का संग्रह कीजिए। फिर भली प्रकार उन्हें अपने लेखन में अपना लीजिए। ऐसा करने से वे दूसरों के न रहकर आपके ही प्रतीत होंगे। (लगभग 60 शब्द)

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उदाहरण 3. आधुनिक युग में समाज और राष्ट्र के जीवन में समाचार-पत्रों का बहुत ही विशिष्ट और ऊँचा स्थान है। समाचार-पत्र मानो अपने देश की सभ्यता, संस्कृति और शक्ति के मानदंड बन गए हैं। जिस देश में जितने अच्छे और जितने अधिक समाचार-पत्र होते हैं, वह देश उतना ही उम्नत और प्रभावशाली समझा जाता है। बहुत से क्षेत्रों में जो काम समाचार-पत्र कर जाते हैं, वे बड़ी-बड़ी सेनाएँ और बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ भी नहीं कर पाते। समाचार-पत्र एक ओर तो जनता का मत सरकार और संसद पर प्रकट करते हैं दूसरी ओर देश में सुदृढ़ और संपुष्ट लोकमत तैयार करते हैं। देश को सब प्रकार से जागृत और सजीव रखने में जितनी अधिक सहायता समाचार-पत्रों में मिलती है, उतनी शायद किसी और चीज़ से नहीं। इसलिए आजकल समाचार-पत्र का बहुत महत्त्व है। (लगभग 130 शब्द)

शीर्षक : समाचार पत्रों का महत्त्व।

सारांश : समाचार-पत्र राष्ट्र की संस्कृति एवं शक्ति के परिचायक होते हैं। कई क्षेत्रों में वे बड़ी-बड़ी सेनाओं एवं राजनीतिजों को भी मात कर देते हैं। इनकी श्रेष्ठता तथा संख्या से देश की उन्नति का पता चलता है। जनता का अभिमत सरकार तक पहुँचाने, दृढ़ लोकमत तैयार करने और देश को जागृत करने में उनका पूर्ण योगदान है। (लगभग50 शब्द)

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उदाहरण 4. परिश्रम और निरंतर अभ्यास से कठिन समझे जाने वाले कार्य भी सुगम हो जाया करते हैं। ज्ञान, भाव और कर्म से संबंधित सभी क्षेत्रों में इसका चमत्कार देखा जा सकता है। नियमित अभ्यास वज्र से वज्र मूर्ख को भी चतुर बना देता है। प्यार की अधिकता और नि:स्वार्थता भयंकर से भयंकर और दुष्ट और दुष्ट व्यक्ति को भी अपना बना लेती है। पापी से पापी भी ईश्वर की कृपा का भागीदार बन जाता है। बट्टे की रगड़ से पत्थर की सिल भी चिकनी हो जाती है। (84 शब्द)

शीर्षक : सफलता का राज : निरंतर अभ्यास।

सार : निरतंतर परिश्रिम से कठिनतम कार्य सुगम हो सकते हैं। कठोर साधना से मूर्ख ‘चतुर’, भयंकर दुष्ट ‘आत्मीय’, पापी ‘ईश्वर-अनुग्रही’ तथा पत्थर ‘चिकने’ बन जाते हैं।

उदाहरण 5.
सफल और असफल मनुष्यों में क्या अंतर है ? यह कि एक ने कम काम किया और दूसरे ने अधिक। क्या यही दोनों के परिश्रम के विभिन्न परिणामों का कारण है ? नहीं, बात कुछ और ही है। सफल व्यक्ति ने काम बुद्धिमत्ता से किया, एकाग्रता से किया, उसने अपना दिमाग लगाया। असफल व्यक्ति ने बोझ ढोया। ऐसे लोग काम तो बहुत करते हैं, लेकिन वे अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करते, उनके श्रम और फल को देखकर दया आती है। वे परिस्थितियों को पकड़े रहते हैं। वे यह नहीं जानते कि अवसर से किस प्रकार लाभ उठाना चाहिए। उनमें वह योग्यता नहीं होती, जिससे वे असफलता को सफलता में बदल लें।

शीर्षक : सफलता का रहस्य।

सार : जो लोग अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करते और लगन से काम नहीं करते वे असफल हो जाते हैं ; उनका श्रम बेकार जाता है। ऐसे लोग मात्र परिस्थितियों के दास होते हैं। वे अवसर से लाभ उठाना नहीं जानते।

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उदाहरण 6.
कहा जाता है कि मन बड़ा चंचल होता है। इस पर नियंत्रण दुष्कर है। व्यक्ति कभी-कभी जिस पर से मन को हटाना चाहता है, मन बार-बार उसी की ओर अभिमुख होता है। दूसरी ओर मन की अपार शक्ति का भी बड़ा विशद् वर्णन किया गया है। कहा है ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ यदि मन में दृढ़ संकल्प हो तो असाध्य भी साध्य हो सकता है। योगियों और सिद्धोंने मन पर नियंत्रण कर सर्व-शक्तिमान ईश्वर को पा लिया है। गीता में कहा गया है कि दृढ़तापूर्वक एवं बलपूर्वक ही मन पर नियंत्रण संभव है। इसीलिए दृढ़ निश्चय एवं दृढ़-संकल्प का सर्वोपरि महत्त्व है।

शीर्षक : ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’

सार : अत्यधिक चंचल मन पर नियंत्रण पाना कठिन है। अपार शक्तिशाली मन पर दृढ़ संकल्प तथा दृढ़ निश्चय द्वारा नियंत्रण पाकर ही असाध्य भी साध्य हो जाता है तथा ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है।

उदाहरण 7.
निंदा का उद्ग्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निंदा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को मिटकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्मक्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

शीर्षक – निंदा की जननी : हीनता।

सार : निंदा अपनी हीनता से जन्मती है। परनिन्दक दूसरों को नीचा तथा स्वयं को ऊँचा समझाकर अहंतुष्टि करते हैं। कर्महीनता तथा पर-निंदा वृत्ति साथ-साथ बढ़ती है।

उदाहरण 8.
माता का स्थान संसार के सारे संबंधों में सर्वोपरि है। शिशु की शरीर-रचना माँ की रक्त-मज्जा से ही होती है। गर्भावस्था में शिशु की रक्षा माता ही करती है। प्रसव-पीड़ा को संसार की सबसे बड़ी पीड़ा माना गया है तथा शिशु को जन्म देने के बाद माता के दुग्ध-पान और अत्यंत सतर्क-सजग अहर्निश देख-भाल से ही संतान के जीवन का विकास होता है। केवल दुग्ध-पान देकर गाय भी गो-माता कहलाती है तथा हम उसकी पूजा करते हैं। धरती हमें अन्र और आश्रय देती है। इसीलिए उसे हम धरती-माता कहते हैं। माँ की महिमा अपार है। इसीलिए कहा गया है, ‘जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’

शीर्षक : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

सार : माता का स्थान संसार के सभी संबंधों में सर्वोपरि है। गर्भावस्था में शिशु की रक्षा करके, उमे जन्म देकर माँ ही उसका लालन-पालन करती है। धरती तथा गौ को भी माता कहा गया है। जननी तथा जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है।

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उदाहरण 9.
सच्चा मित्र एक शिक्षक की भाँति होता है। जिस प्रकार शिक्षक अपने छात्र कों सन्मार्ग की ओर ही अग्रसर करता है, उसी प्रकार एक सच्चा मित्र अपने मित्र को पाप के गर्त में गिरने से बचाता है। मानव-जीवन अधिक रहस्यपूर्ण है। कभी-कभी जीवन में ऐसे अवसर उर्पस्थित हो जाते हैं जब मनुष्य की धर्मबबद्ध न न हो जाती है और उसका मन द्रुतगति से पाप की ओर दौड़ता है। ऐसे समय में मित्र का ही उपदेश अधिक कल्याणकारी सिद्ध होंता है। मित्र के उपदेश का जितना प्रभाव हृदय पर पड़ता है, उतना और किसी का नहीं पड़ता है।

शीर्षक : सच्चा मित्र।

सार : सच्चा मित्र अपने मित्र को पाप के गर्त से बचाकर सन्मार्ग की ओर अग्रसर करता है। धर्मबुद्धि के नष्ट होने पर पाप की ओर दौड़ते मन पर मित्र के उपदेश का ही अधिक प्रभाव होता है।

उदाहरण 10.
हमें सदैव परोपकार करते रहना चाहिए। यदि हम यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना सौभाग्य की बात है, तो परोपकार करने की इच्छा हमारी सर्वोत्कृष्ट प्रेरणा होगी। ऊँचे आयन पर खड़े होका और अपने हाथ में दो पैसे लेकर यह न कहो – “ऐ भिखारी, ले यह मैं तुझे देता हूँ।” वास्तव में तुम्हे इस बात के लिए कृतज्ञ होना चाहिए कि तुम्हें वह निर्धन व्यक्ति मिला, जिसे दान देकर तुमने स्वयं अपना उपकार किया। धन्य पाने वाला नहीं होता, देने वाला होता है। यह कम महत्त्व की बात नहीं है कि इस संसार में तुम्हें अपनी दयालुता प्रकट करने और इस प्रकार पवित्र एवं पूर्ण होने का अवसर प्राप्त हुआ।

शीर्षक – परोपकार की उचित विधि।

सार : परोपकार करते समय हमें मन में यह विचार लाना चाहिए कि निर्धनों की सहायता करना हमाँे सौभाग्य की बात है। हमें गर्व से नहीं, नम्रता से दूसरों की सहायता करनी चाहिए।

उदाहरण 11.
आज अंग्रेजी का अधकचरा ज्ञान रखने वाले शिक्षार्थियों ने ऐसी दूषित प्रवृत्ति का प्रचार किया है कि जिसे देखो वह अपने अंग्रेजी ज्ञान का प्रमाण दो-चार टूटे-फूटे वाक्य बोलकर देना चाहता है। विदेशों में इस प्रवृत्ति के कारण हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो क्षति समय-समय पर पहुँचती रहती है, उससे सभी परिचित हैं अंग्रेजी के इस प्रयोग से विदेशियों को लगता है कि भारत स्वतंत्र तो हुआ, किंतु मानसिक दृष्टि से अभी वह गुलाम है :

शीर्षक : अंग्रेजी का मोह।

सार : अंग्रेजी के अधकचरे ज्ञान को दिखाने की दुष्पवृत्ति के कारण राष्ट्रॉय-गौरव को क्षात पहुँचतो है। इस दुष्मवृत्ति के परिणामस्वरूप विदेशियों को लगता है, भारत अब भी मानसिक दृष्टि से गुलाम है।

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उदाहरण 12.
हम एक ओर तो प्रकृति के उपकरणों की बंदी बना रहे हैं और दूसरी और स्वयं उनके दास बनते जा रहे हैं। अत: इनसे बचने के लिए प्राकृतिक और मानव-निर्मित वातावरण में एक ऐसा तालमंल पैदा होना चाहिए जो प्रकृति के सुंदर स्वरूप को भी खंडित न करे और मानव-विकास की गुंजाइश भी बनी रें। मशीन हमारी स्वामिनी न बनकर सेविका का ही काम करे।हमें वन, पर्वत और नदियों का भरपूर लाभ मिलता रहे, वे मनोरम और उपयोगी रहें। शहरों में आवश्यकता से अधिक जमघट होने का अर्थ होगा ग्रामीण का विनाश, अत: उसे रोकना होगा।

शीर्षक : मानव और प्रकृति।

सार : प्रकृति और मानव-निर्मित वातावरण में सामंजस्य अत्यंत आवश्यक है जिससे प्रकृति की सुंदरता बनी रहे तथा भौतिक उन्नति के लिए वैज्ञानिक साधनों का प्रयोग भी किया जा सके। मशीनें सेविका के रूप में रहं तथा शहरों में होने वाला जमघट रुके।

उदाहरण 13.
वर्तमान काल विज्ञापन का युग माना जाता है। समाचार-पत्रों के अतिरिक्त रेडियो तथा टेलीविजन भी विज्ञापन के सफल साधन हैं। विज्ञापन का मूल उद्देश्य उत्पादक तथा उपभोक्ता में सीधा संपर्क स्थापित करना होता है। जितना अधिक विज्ञापन किसी पदार्थ का होगा उतनी ही अधिक लोकप्रियता बढ़ेगी। इन विज्ञापनों पर धन तो अधिक व्यय होता है, पर इससे बिक्री बढ़ जाती है। ग्राहक जब इन आकर्षक विज्ञापनों को देखता है तो वह उस वस्तु-विशेष के प्रति आकृष्ट होकर उसे खरीदने के लिए बाध्य हो जाता है।

शीर्षक : विज्ञापन का युग।

सार : समाचार-पत्रों, रेडियो तथा टेलीविजन द्वारा उत्पादक और उपभोक्ता से संपर्क स्थापित होता है। विज्ञापन से वस्तु विशेष की लोकप्रियता, बिक्री बढ़ती है और ग्राहक का वस्तु के प्रति आकर्षण भी बढ़ता है।

उदाहरण : मनुष्य स्वयं भाग्य का निर्माता है। पर कायर मनुष्य नहीं, सबल ही भाग्य निर्माण की सामर्थ्य रखता है। कायर तो दैव ही दैव पुकारता है। साहसी व्यक्ति को अपने मानसिक बल पर अभिमान होता है, उसकी भुजाओं में कार्य करने की शक्ति होती है, वह नियति के हाथ का क्रीड़ा कंदुक बनकर नहीं रहता, कठपुतली की तरह किसी की अँगुलियों पर नहीं नाचता। सिंह नदी को अपने वक्ष के बल पर चीर कर उस पार पहुँचता है, तो साहसी भाग्य को झूठा प्रमाणित कर उसे स्वयं निर्मित करता है। मनुष्य संसार के जितने भी कार्य करता है, उसकी सफलता-असफलता मन पर आधारित है, उसे भाग्य के माथे मढ़ देना मूखों का काम है।

शीर्षक : भाग्य तथा पुरुषार्थ।

सार : साहसी मनुष्य भाग्य के हाथ कठपुतली नहीं बनता अपितु स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करता है क्योंकि उसे अपनी शक्ति पर विश्वास होता है। मानव के समस्त कार्यों की सफलता-असफलता भाग्य पर नहीं, उसके मन पर आधारित है।

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उदाहरण 15.
लोकतांत्रिक अवस्था केवल केंद्र तथा राज्य स्तर पर क्रमशः लोकसभा तथा विधानसभाओं के निर्माण का नाम नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप है – एक विशिष्ट जीवन-पद्धति। जब सामान्य जन को प्रशासन के निम्नतर स्तर पर यह अनुभव होता है कि शासन तंत्र उसके हित एवं कल्याण के लिए सक्रिय है तथा न्याय-व्यवस्था निष्पक्ष और स्वतंत्र है, तभी लोकतन्त्र में उसकी आस्था में निरंतर अभिवृद्धि होती है। ग्राम पंचायतों का विकास भारतीय जनता में इन मूल्यों का विकास-विस्तार नहीं कर पाया, क्योंकि राज्य सरकारों ने इनकी व्यवस्था और आयोजन को अधिकारियों के संरक्षण में रखा जो अपने को जनता के प्रति उत्तरदायी न मानकर सरकार के मुखापेक्षी बने रहने में अपना कल्याण समझते हैं। व्यवस्था के इस दोष को दूर करके ही लोकतंत्र को सफल बनाया जा सकता है।

शीर्षक : लोकतंत्र की सफलता।

सार : लोकतांत्रिक व्यवस्था, केन्द्र तथा राज्य-स्तर पर लोकसभा तथा विधानसभाओं के निर्माण तक सीमित न होकर एक विशिष्ट जीवन-पद्धति है। निम्नतम स्तर पर कल्याणकारी कार्य तथा स्वतंत्र-निष्पक्ष न्याय व्यवस्था से लोकतंत्र की आस्था में वृद्धि होती है। पंचायत व्यवस्था के दोषों को दूर करके हमें लोकतंत्र को सफल बनाना चाहिए।

उदाहरण 16.
किसी भी देश और जाति की सांस्कृतिक चेतना का स्पष्ट चित्र उसकी अपनी भाषा के साहित्य में दिखलाई पड़ता है, क्योंकि समाज और साहित्य एक-दूसरे से अभिन्न है। एक के बिना दूसरे की कल्पना भी संभव नहीं है। रामायण, महाभारत, रामचरितमानस, साकेत, कामायनी और गोदान आदि इसके ज्वलंत प्रमाण हैं। साहित्यकार अपने युग का चितेरा होता है। उसके साहित्य में अपने समाज का जीवन-स्पंदन विद्यमान रहता है। इसी अर्थ में वह उसका दर्पण होता है।

शीर्षक : साहित्य समाज का दर्पण है।

सार : किसी भी देश और जाति की सांस्कृतिक चेतना उसकी भाषा के साहित्य से प्रकट होती है। इस प्रकार समाज और साहित्य परस्पर पूरक हैं। इसीलिए साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है।

उदाहरण 17.
ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ पर्यटन द्वारा हमें सरस और रुचिपूर्ण मनोरंजन भी प्राप्त होता है। विभिन्न स्थानों, वनों, नदी-तालाबों और सागर की उत्ताल तरंगों का अवलोकन कर मन झूम उठता है। पर्यटन हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हितकर है। जलवायु-परिवर्तन से चित्त में सरसता और उत्साह का संचार होता है, जिससे हम प्रसन्न मन:स्थिति में रहते हैं, जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य की अनिवाय शर्त है। देशाटन के दौरान हमें अनेक सुविधाओं और कष्टों का भी सामना करना पड़ता है। इन्हें सहन करके तथा इनका समाधान ढूँढ़ लेने पर हमें अद्भुत खुशी का अनुभव होता है।

शीर्षक : देशाटन।

सार : देशाटन से ज्ञानवर्धन और स्वास्थ्य लाभ होता है। जलवायु-परिवर्तन से मन प्रसन्न रहता है। प्राकृतिक दृश्यों को देखने से मनोरंजन होता है, मन खुशी से नाच उठता है। मन की खुशी ही स्वास्थ्य लाभ की कुंजी है।

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उदाहरण 18.
किसी से कुछ पाने की इच्छा रखना ही मनुष्य के दुख का कारण है। जब तक पाने की इच्छा मनुष्य में विद्यमान है तब तक उसे सच्चे सुख की प्राप्ति होना असंभव है। वस्तुत: सच्चा सुख किसी से कुछ पाने में नहीं वरन् देने में है। जिस प्रकार अंगूर की सार्थकता अपने तमाम रस को निचोड़कर दूसरों के लिए देने में है, उसी प्रकार मनुष्य जीवन की सार्थकता अपनी संपूर्ण क्षमताओं और समृद्धि को दूसरों के लिए अर्पित कर देने में है।

शीर्षक : सच्चा सुख अथवा वास्तविक सुख।

सार : सच्चा सुख परोपकार की भावना में है। किसी से कुछ पाने की इच्छा ही दुख का मूल कारण है। मनुष्य जीवन की सार्थकता अपनी योग्यता, शक्ति और समृद्धि को दूसरों को अर्पित कर देने में है।

उदाहरण 19.
नारी नर की शक्ति है। वह माता, बहन, पत्नी और पुत्री आदि रूपों में पुरुष में कर्तव्य की भावना जगाती है। वह ममतामयी है अत: पुष्प के समान कोमल है, किन्तु चोट खाकर वह अत्याचार के विरुद्ध सन्नद्ध होती है, तो वज्र से भी कठोर हो जाती है। तब वह न माता रहती है, न प्रिया ; उसका एक ही रूप होता है और वह है दुर्गा का। वास्तव में नारी सृष्टि का ही रूप है, जिसमें सभी शक्तियाँ समाहित हैं।

शीर्षक : नारी एक : रूप अनेक/नारी के विभिन्न रूप।

सार : नारी पुरुष की शक्ति है जिसके अनेक रूप हैं। नारी कोमल, कठोर तथा ममतामयी – तीनों रूप धारण करती है। वह सृष्टि का रूप है, जिसमें सभी शक्तियों का समावेश है।

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उदाहरण 20.
धर्म को लोगों ने धोखे की दुकान बना रखा है। वे उसकी आड़ में स्वार्थसिद्धि करते हैं। बात यह है कि लोग धर्म को छोड़कर संप्रदाय के जाल में फँस जाते हैं। संप्रदाय वाक्य कृत्यों पर जोर देते हैं। वे चिह्नों को अपनाकर धर्म के सारतत्व को मसल देते हैं। धर्म मनुष्य की अंतर्मुखी बनाता है, उसके हृद्य के किवाड़ों को खोलता है। उसकी आत्मा को विशाल, मन को उदार तथा चरित्र को उन्नत बनाता है। संमताय संकीर्णता सिखाते हैं। ज्ञात-पाँत, रूप-रंग तथा ऊँच-नीच के भेद-भावों से ऊपर नहीं उठने देते।

शीर्षक : धर्म और संप्रदाय।

सार : धर्म मनुष्य की आत्मा को विशाल, मन को उदार, चरित्र को उन्नत बनाकर उसे अंतर्मुखी बनाता है। संप्रदाय, जात-पाँत, ऊँच-नीच की संकीर्णता सिखाते हैं। अत: मनुष्यों को संप्रदाय के जाल से बचना चाहिए।

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हमें जीवन में नित्य ही नयी घटनाओं एवं अनुभूतियों से रू-ब-रू होना पड़ता है। इन्हीं घटनाओं और अनुभवों का लिखित रूप ‘कहानी’ कहलाती है और इस विधा को कहानी-लेखन कहते हैं। कुछ कहानियों के लिखने का आधार बचपन में दादी-नानी द्वारा सुनायी गयी कहानियाँ भी होती हैं। अत: हमारे अन्दर की संवेदनाओं की आकर्षक प्रस्तुति ही कहानी-लेखन है।
कहानियाँ मुख्यतः कल्पना, सच्ची घटना, चित्र या शब्द-संकेतों के आधार पर लिखी जाती हैं।
कहानी-लेखन के लिए आवश्यक निर्देश –

  1. सर्वप्रथम कहानी का प्रारूप मन में बना लें।
  2. फिर शब्दों से भरकर साकार रूप दें।
  3. कहानी का उचित एवं आकर्षक शीर्षक दें।
  4. कहानी लिखने में अपने विचारों को न थोपें।
  5. स्पष्ट, सहज एवं शुद्ध भाषा का प्रयोग करें।
  6. कहानी के अन्त में नैतिक या वैज्ञानिक सीख अवश्य दें।

यहाँ शब्द-संकेतों के आधार पर कहानी-लेखन के कुछ उदाहरण दिये जा रहे है –
संकेत (1) : एक नदी – साधु का स्नान – पानी में बिच्छू – साधु द्वारा बचाने का प्रयास – बिच्छू द्वारा डंक मारना – साधु द्वारा फिर उठाना – बिन्छू द्वारा फिर से डंक मारना – साधु का उसे पानो से निकालना – बिच्छू को जान बचना।
कहानी :

प्राणी का स्वभाव

एक दिन एक साधु नदी में स्नान कर रहे थे। अचानक उन्हें पानी में एक बिच्छू दिखायी पड़ा जो अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था। साधु दयालु थे। उन्होंने उसे अपने हाथ में उठा लिया। पर, दुप्प बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। साधु का हाथ हिल जाने से वह फिर से पानी में गिर गया। साधु ने फिर से उसे उठाया, परन्तु उसने फिर उनके हाथ पर डक मार दिया। ऐसा कई बार हुआ। अंतत: साधु ने बिच्छू को नदी के बाहर लाकर जमीन पर छोड़ दिया जिससे वह मरने से बच गया।
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक प्राणी अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करता है और उसी में उसे आनंद का अनुभव होता है।

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संकेत (2) : एक बाह्मण – एक बूढ़ा बाघ-उसके हाथ में सोने का कंगन – वाघ द्वारा बाह्मण को लालन देना लालच में आकर ब्राह्मण का कीचड़ में फँस जाना – बाघ द्वारा उसे खा जाना।
कहानी :

लालच का फल

एक बाह्हण ने एक बूढ़े बाघ के हाथ में सोने का कंगन देखा। बाघ ने उसे पुकारा तो वह उसके नजदीक डरते हुए पहुँचा। बाघ ने कहा कि वह जवानी में किये गये पापों का प्रायश्चित करने के लिए यह सोने का कगन दान करनेवाला है। यह सुनकर बाहाण के मन में लालच आ गया और उसने उस कंगन को प्राप्त करना चाहा। बाय ने कहा कि उसे सामने के पोखरे से स्नान करके आना होगा, तभी उसे वह कंगन मिलेगा। ब्राह्माण जैसे ही पोखरे के नजदीक गया, वह दलदल में फंस गया और मदद के लिए चिल्लाने लगा। बाघ धीरे – धीरे उसके नजदीक पहुँचा और उसे मारकर खा गया।

यह कहानी हमें बताती है कि लालच का फल सदा ही हानिकारक और अनिप्टकारी होता है।

संकेत (3) : सर्दी की रात – भूखा, काँपता पथिक – पेड़ का सोचना – रूखी-सूखी टहनियाँ, पथिक की मीठी नींद।
कहानी :

परोपकारी पेड़

एक रात की बात है, सर्दियों की बरफानी हवा चल रही थी और सर्दी इतनी अधिक थी कि शरीर सुन्र होता जाता था। ऐसे समय में एक थका-माँदा, काँपता-ठिठुरता, भूखा-प्यासा पथिक एक पेड़ के नीचे आया और आराम करने की कोई जगह देखने लगा। पेड़ समझ गया कि यह सर्दी का सताया हुआ है। यदि इसे तापने को जाग न मिली तो यह सर्दी से अकड़कर मर जाएगा। मेरा यह कर्तव्य बनता है कि मुझसे इस मुसाफिर के लिए जो भी बन पड़े मै करूँ।

उस बूढ़े पेड़ के पास अब किसी को देने के लिए भला और बचा ही क्या था ? केवल कुछ रूखी -सूखी टहनियाँ ही दिखाई दे रही थीं। पेड़ ने अपनी वे सूखी टहनियाँ भी उस पथिक के लिए गिरा दी, जिन्हें जलाकर पथिक ने सारी रात आग तापी। आग की गर्मी से उसकी कँपकपी मिट गई, थकान जाती रही और वह आग के उसी ढेर के किनारे रात भर मीठी नींद सोया।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धन्य हैं वे जिनका शरीर आखिरी समय तक दूसरों के उपकार के काम आता है।

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संकेत (4) : मुन्ना – चीजें जगह पर न रखना – कलम, पेंसिल, किताब का न मिलना – पेपर खराब – माँ की सीख।
कहानी :

मुत्रा की कहानी

एक था मुन्ना। उसको शिकायत थी कि उसकी चीजें सही जगह और समय पर नहीं मिलती। एक दिन उसकी परीक्षा थी। स्कूल जाने के समय जब वह ढूंढ़ने लगा तो उसे पेंसिल, कलम, किताब कुछ भी जगह पर न मिली। इन सब चीजों को ढुंढ़ने के बाद जब वह स्कूल पहुँचा तो परीक्षा समाप्त हो चुकी थी।

दूसरे दिन भी वह इसी तरह परीक्षा में काफी देर से पहुँचा और उसकी परीक्षा खराब गई। मुत्रा अपनी इस लापरवाही से खुद भी परेशान था। घरवाले तो परेशान थे ही। तब माँ ने उसे समझाया – “‘बेटा, हर चीज को ठीक जगह पर रखा करो। कपड़े कपड़ों की अलमारी में टाँगा करो। किताबें अपने वस्ते में या अपनी मेज पर सजाकर रखा करो। जूते भी सही जगह पर उतारा करो। फिर सब चीजें सही जगह और सही समय पर मिल जाया करेंगी।

मुन्ना ने माँ की बात मानकर वैसा ही करना शुरु किया और उसकी परेशानी खत्म हो गयी। हमें भी मुन्ना की तरह हमेशा बड़ों की सीख माननी चाहिए।

संकेत (5) : एक ट्रक – सुंदर नहीं – काम सुंदर – खेतों में कूड़े डालना – फसल अच्छी होना – पुरस्कार।
कहानी :

कूड़ेवाला ट्रक

एक ट्रक था। शक्ल-सूरत में वह सुंदर नहीं था। लेकिन वह शहर को साफ-सुथरा और सुन्दर बनाने में सबसे अधिक मदद करता था। फिर भी लोग उसे देखकर नाक-भौं सिकोड़ते और उससे दूर भागते। लोगों के रुखे व्यवहार के बावजूद वह अपना कर्त्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाता था।

किसान ट्रक का कूड़ा अपने खेतों में डलवाते थे। कूड़े से खाद बना और उसका एक-एक कण सोने से भी कीमती बनकर गेहूँ, चावल और मक्का की शक्ल में प्रकट हुआ। जिसे गंदगी कहकर लोग नाक-भौं सिकोड़ते थे, वही गंदगी अमृत बनकर फसल के हरे-हरे पत्तों में पहुँची। पत्तियों को गाय-भैंस ने खाया तो फिर से ज्यादा दूध देने लगों। कूड़े के खाद की ताकत से ईख की फसल भी अच्छी हुई। फिर धड़ाधड़ गुड़ भी बना, चीनी भी बनी और बच्चों के लिए मिठाइयाँ भी बनीं।

कुछ दिनों के बाद ट्रकों की एक प्रतियोगिता हुई। अनेक रंग-बिरंगे चमचमाते ट्रकों के बीच कूड़ेवाले ट्रक को पहला पुरस्कार मिला।पुरस्कार देनेवाले अधिकारी ने घोषणा की –
” जो मुसीबत में काम आता है वही सच्चा मित्र होता है। कूड़े वाला ट्रक देखने में भले ही सुंदर न हो लेकिन उसके द्वारा किए गए काम ने खेतों को उजड़ने से बचाया, इसलिए उसी की सेवा सबसे अधिक कीमती है।”
सच ही है – कोई अपने अपने सुन्दर रंग-रूप से सुन्दर नहीं होता। सुन्दर वही है जो सुन्दर काम करता है।

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संकेत (6) : राजा का शिकार पर जाना – एक साधु को देखना – मदद की इच्छा – साधु का इन्कार करना – सोने के पर्वत बनाने की बात कहना – राजा का साधु का शिष्य बनना – राजा को ज्ञान होना – सोना पाने से इन्कार करना।
कहानी :

स्वर्ण रसायन

एक बार एक राजा घोड़े पर चढ़कर शिकार को जा रहा था। जाड़े का समय था। थोड़ी-थोड़ी वर्षा भी हो रही थी। उसने देखा कि एक साधु जंगल में अकेला बैठा है। न तो उसके पास खाने का सामान है, न पहनने के लिए कोई कपड़ा है, न रहने के लिए झोपड़ी आदि ही है। राजा को उसकी दशा पर दया आई।

राजा ने साधु की सहायता करनी चाही लेकिन साधु ने कहा – हम कंगाल नहीं हैं। हम रसायन बनाना जानते हैं। यदि हम चाहें तो सोने के पर्वत बना लें। राजा ने सोचा यदि उसके पास ढ़ेर सारा सोना होता तो वह एक-दो राज्य को जीत लेता। उसने साधु से कहा, “भगवन मुझे रसायन बनाना सिखला दीजिए।”

साधु ने कहा कि सोना बनाना एक दिन में नहीं सीखा जा सकता। तुम रोज आया करों, सीख जाओगे।
राजा ने साधु के पास जाना शुरू कर दिया। साधु के उपदेश से एक वर्ष में ही राजा बड़ा ही धर्मात्मा और ज्ञानी हो गया। वह ईश्वर-प्रेम में इतना मग्न हो गया कि सारे संसार के राज्यों को ईश्वर-प्रेम के आगे तुच्छ समझने लगा। एक दिन साधु ने राजा से हँसी-हँसी में कहा कि तुम बहुत-सा ताँबा लाओ, हम सोना बना दें।

राजा ने उत्तर दिया कि महाराज, जिस ताँबे को सोना बनाने की आवश्यकता थी वह सोना बन गया, अब मुझे सांसारिक सोने की कोई आवश्यकता नही रही।
सच ही है कि जो व्यक्ति स्वयं धर्म का आचरण करते हैं वे दूसरों को भी अपने रंग में रंग लेते हैं।

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संकेत (7) : किसान का खेत को सींचना – एक व्यक्ति का जल के सोत के बारे मे पूछना – किसान द्वारा जल के विभिन्न स्रोत तथा सबका स्रोत हिमालय को बताना – ईश्वर एक है का संदेश देना।
कहानी :

ईश्वर एक है

एक किसान अपने खेत को नहर की नाली से सींच रहा था। यह देखकर एक व्यक्ति ने पूछा कि आजकल तो वर्षाऋतु नहीं है फिर यह जल कहाँ से आता है ?
किसान ने उत्तर दिया, “यह जल इस छोटे-से बम्बे में से होकर आता है।”
व्यक्ति ने फिर पूछा, ” इस बम्बे में जल कहाँ से आया ?”
किसान ने कहा, “भाई! यह जल बड़े बम्बे में से आता है।”
व्यक्ति ने फिर पूछा, “इसमें जल कहाँ से आता है ?”
किसान ने कहा, “नहर से।”

  • और नहर में जल कहाँ से आता है ?
  • गंगा नदी से।
  • गंगा में जल कहाँ से आता है ?
  • हिमालय पर्वत से।

उस व्यक्ति ने अंत में कहा, ‘”तुमने पहले ही क्यों न बता दिया कि यह जल हिमालय से आता है।
जिस प्रकार सभी नदी-नालों में हिमालय से जल जाता है और केन्द्र एक है, ठीक उसी प्रकार संसार में जितने मतमतान्तर फैले हुए हैं, सभी एक हैं और उनका निवास-स्थान वेद ही है।

इसका दूसरा भाव यह है कि व्यक्ति चाहे जिस देश, जिस धर्म का हो लेकिन जगत्-पिता एक है। इसलिए आपस में हमें भेद-भाव नहीं रखना चाहिए।

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किसी दिए गये गद्यांश अथवा पद्यांश के अवतरण को समझना तथा उसके अन्दर छिपे हुए मुख्य भाव को संक्षेप में लिखना भावार्थ-लेखन कहलाता है। इसे लिखते समय न तो हर शब्द का अर्थ लिखना पड़ता है और न ही लच्छेदार साहित्यिक भाषा की जरूरत पड़ती है।

भावार्थ-लेखन हेतु आवश्यक निर्देश –

  1. दिए गये अवतरण को ध्यान से पढ़ें और उसमें छिपे भाव को समझने की कोशिश करें।
  2. फिर उस भाव का अति संक्षिप्त रूप अपने शब्दों में लिख जाएँ।
  3. इसमें अनावश्यक शब्दों या बातों का प्रयोग न करें।
  4. इसकी भाषा अलंकारहित, स्पष्ट एवं सरल रखें।
  5. इसमें लंबी-चौड़ी भूमिका की कोई आवश्यकता नहीं होती है।
  6. भावार्थ को मूल अवरतण से छोटा रखें।
  7. ध्यान रहे, इसमें मूल भाव का कोई भी अंश छूटने न पाये।

भावार्थ-लेखन के कुछ उदाहरण –

अवतरण 1.
आज की कॉन्वेन्टी शिक्षा-पद्धति में बच्चों को तीन वर्ष की उप्र से स्कूल भेजा जाता है। क्या यह कदम उचित और विकासोन्मुख है ? उन्हें सुबह-सुबह तैयार कर बड़े से थैले के साथ विद्यालय भेज दिया जाता है। जिस उग्र में उन्हें स्नेहपूर्ण व्यवहार की आशा रहती है, उसमें उन्हें कुछ निर्दय शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं से पाला पड़ जाता है। ये बच्चे पढ़ेंगे क्या, उन्हें तो ठीक से चड्डी पहनने का भी होश नहीं रहता है। तर्क यह है कि बच्चे कच्ची उप्र से ही शिक्षा का महत्व समझने लगेंगे। पर क्या, उनका मानसिक स्तर ऐसी बातों को समझने लायक होता है ?

भावार्थ :- कच्ची उम्न में बच्चों को परिवार के स्नेह की जरूरत होती है, न कि पुस्तकों से भरे थैले के साथ विद्यालय जाकर माथा-पच्ची करने की। कम उम्र में विद्यालय भेजा जाना, बच्चों की विकास प्रक्रिया में बाधक भी हो सकता है।

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अवतरण 2.
कोई प्रदेश कितना विकसित हो सकता है, इसे आँकने के लिए वहाँ की प्राकृतिक बनावट, जलवायु और पर्यावरण पर ध्यान देना होता है। विकास के लिए वहाँ के उपलब्ध कच्चे माल, श्रमशक्ति एवं शक्ति के साधनों का पूरा-पूरा उपयोग करना आवश्यक होता है। यदि निर्मित माल की खपत के लिए बाजार नजदीक हो, तो यह सोने में सुहागा वाली कहावत को चरितार्थ करता है। अच्छी सड़कें एवं समुचित यातायात-व्यवस्था भी विकास की आवश्यक शर्ते हैं।

भावार्थ :- औद्यांगिक विकास के लिए भौगोलिक परिस्थितियों के साथ कच्चे माल, शक्ति, श्रम और यातायात के साधनों का समुचित उपयोग आवश्यक है।

अवतरण 3.
एक ही समाज में रहनेवाले लोग मानसिक-स्तर पर भिन्न-भित्र होते हैं। इस स्तर का प्रत्यक्ष संबंध होता है – संगति से। व्यक्ति जिस प्रकार की संगति में जीता है, पलता है और बड़ा होता है, उसके अन्दर वैसे ही गुण पनपते हैं। साधुओं के साथ उठने-बैठनेवाला व्यक्ति सद्भाव से अवश्य ही ओत-प्रोत हो जाता है जबकि चोर-उचक्कों की संगति में रहनेवाला निश्चित तौर पर समाज के लिए कलंक ही साबित होता है।

भावार्थ :- संगति के कारण ही एक ही समाज में तरह-तरह के लोग होते हैं। साधुओं की संगति में बैठने वाला साधु प्रकृति का तथा दुष्टों की संगति मे बैठने वाला समाज के लिए कलंक होता है।

अवतरण 4.
भारतवर्ष की शस्य-श्यामला-भूमि अपनी विशेष उर्वरता के कारण कृषि-कार्य के लिए व्ररदान है। तभी तो कृषि-कार्य में यहाँ की कुल आबादी का लगभग 70% संलग्न है। कृषि को सर्वप्रमुख उद्योग का दर्जा प्राप्त होना चाहिए क्योंक यही कुल राष्ट्रीय आय की रीढ़ है। आधुनिक तकनीकी प्रयोग ने कृषि-कार्य का सम्मान और भी बढ़ा दिया है। यह राष्ट्रीय आय के साथ ही विदेशी मुद्रा के अर्जन का भी मुख्य साधन बन गया है। फिर भी सरकार इसे उस रूप में ध्यान नहीं देती जिस रूप में उसे देना चाहिए।

भावार्थ :- भारत में कृषि को सर्वपमुख उद्योग का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि यहाँ की 70 % राष्ट्रीय आय का स्रोत कृषि ही है। फिर भी सरकार कृषि तथा कृषक की ओर समुचित ध्यान नहीं देती।

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अवतरण 5.
अनुशासन मानव-जीवन के अपरिहार्य तत्व है। यह प्रगति और खुशहाली की सीढ़ी है। यह ऐसी सीढ़ी है जिस पर चढ़े बिना कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में उन्नति नहीं कर सकता। विश्व के सभी महापुरूषों में अन्य गुणों के अतिरिक्त अनुशासनरूपी गुण हमेशा पाया गया है। यहाँ तक कि प्रकृति भी अनुशासन की डोर से बंधी रहती है। अगर प्रकृति इसे छोड़ दे, तो प्रलय को कौन रोक सकता है? इसके महत्व को समझनेवाला व्यक्ति ही सफलता का स्वाद चखता है।

भावार्थ :- अनुशासन जीवन का अनिवार्य तत्व है। दुनिया के प्रत्येक महापुरूषों ने अपने जीवन में अनुशासन को महत्व दिया है। अनुशासन के महत्व को समझनेवाला ही सफलता का स्वद चखता है।

अवतरण 6.
वह तोड़ती पत्थर।
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि मैंने पत्थर तोड़ने वाली युवती को इलाहाबाद के पथ पर देखा। जिस पेड़ के नीचे बैठकर उसने पत्थर नोड़ना स्वीकार किया, वह पेड़ भी छायादार नहीं था।

अवतरण 7.
चढ़ रही धूप; गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप, उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगी छा गई
प्राय: हुई दुपहर-वह तोड़ती पत्थर।

भावार्थ :- दिन चढ़ने के साथ-साथ हर क्षण धूप तेज होती जा रही थी। गर्मी के दिन थे। दिन अपने तमतमाते रूप में था। तभी शरीर को झुलसा देनेवाला लू भी चलने लगी। सूर्य की प्रचण्ड ताप से धरती भी रूई के समान जल रही थी! चारों ओर छा गए धूल के कण भी चिनगारी के समान छा गए थे और इन्हीं के बीच वह युवती पत्थर तोड़ रही थी।

अवतरण 8.
नव गति, नव लय, ताल छन्द नव,
नवल कण्ठ, नव जल्द-मन्द्र रव;
नव नभ के नव विहग-वृन्द को;
नव पर नव स्वर दे।

भावार्थ :- हे सरस्वती, तुम मेरे जीवन में नयी, गति, नई आवाज, नए ताल छंद और नए स्वर भर दो, जो बादल के गंभीर गर्जन के समान हो। नए आकाश के नए पक्षियों को मुक्त उड़ान भरने के लिए नए पंख और नए स्वर दो।

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अवतरण 9.
मैं अकेला;
देखता हूँ, आ रही
मेरे दिवस की सांध्य बेला।
पके आधे बाल मेरे
हुए निष्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मन्द होती आ रही,
हट रहा मेला।

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि मैं अकेला पड़ गया हूँ। मैं देख रहा हूँ कि मेरे जीवन की संध्या बेला आ चुकी है। मेरे बाल आधे पक चुके हैं, गालों को लालिमा खत्म होकर झुर्रियाँ भर रही हैं, मेरे पैरों में भी पहलेवाली शक्ति नहीं रही। मेरे आसपास से अब लोगों का मेला भी हटने लगा है।

अवतरण 10.
सिंही की गोद से
छीनती रे शिशु कौन?
मौन भी क्या रहती वह
रहते प्राण? रे अजान।
एक मेषमाता ही
रहती है निर्निमेष
दुर्बल वह –

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि सिंहनी की गोद से कोई उसका शिशु नहीं छीन सकता। और अपने प्राण रहते वह ऐसा होने भी नहीं देगी। केवल भेड़ की माता ही अपने शिशु को छीन लिए जाने पर भी केवल आँसू बहाकर रह जाती है क्योंकि वह दुर्बल है।

अवतरण 11.
भीष्म हों अथवा युधिष्ठिर या कि हों भगवान,
बुद्ध हों कि अशोक, गाँधी हों कि ईसु महान,
सिर झुका सबको, सभी को श्रेष्ठ निज से मान
मात्र वाचिक ही उन्हें देता हुआ सम्मान।

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि इस संसार में चाहे भीष्म पितामह हों, युधिष्ठिर हों, कृष्ण हों, बुद्ध हों, अशोक हों, महात्मा गाँधी हों या फिर ईसा मसीह हों सबने अपने से इन्हें श्रेष्ठ माना। लेकिन केवल मौखिक स्तर पर ही। उनके वचनों को अपने जीवन में नहीं उतारा।

अवतरण 12.
यह मनुज ज्ञानी, श्रृंगालों, कुक्करों से हीन
हो, किया करता अनेकों क्रूर कम्र मलीन।
देह ही लड़ती नहीं, है जूझते मन-प्राण,
साथ होते ध्वंस में इसके कला-विज्ञान

भावार्थ :- यह ज्ञानी मनुष्य सियारों और कुत्तों से भी गया-गुजरा और नीच बनकर बहुत से गंदे और निर्दयी काम करता है। जब वह युद्ध करता है तो केवल इसका शरीर ही युद्ध में हिस्सा नहीं लेता बल्कि इसके विनाशकारी कार्यों में इसका साथ कला और विज्ञान भी देते हैं।

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अवतरण 13.
साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे ?)
तब कैसे सीखा डंसना
विष कहाँ पाया।

भावार्थ :- कवि नगरवासियों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि साँप! तुम तो सभ्य नहीं हुए, न तो तुम्हें नगर में बसना ही आया। क्या मेरी एक बात का उत्तर दोगे ? तब तुमने डंसना कैसे सीखा। विष कहाँ से पाया?

अवतरण 14.
मनमोहिनी प्रकृति की जो गोद में बसा है।
सुख स्वर्ग सा जहाँ है, वह देश कौन-सा है।।
जिसके चरण निरन्तर रत्नेश धो रहा है।
जिसका मुकुट हिमालय, वह देश कौन-सा है।

भावार्थ :- कवि भारत के बारे में कहते हैं कि जो मन को मोहनेवाली प्रकृति की गोद में बसा है, जहाँ का सुख स्वर्ग के समान है, जिसके चरणों को सागर धोता है तथा जिसका मुकुट हिमालय है- वह देश कौन-सा है?

अवतरण 15.
“यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
सुख-दु:ख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।
पथ में रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता।
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।
चलना ही चलना है, जीवन चलता ही रहता है।
मर जाना ही रुक जाना है, नर्झर यह झरकर कहता है।”

भावार्थ :- कवि कहता है कि मानव के जीवन में झरने के जल की तरह मस्ती, उल्लास और आनन्द है। जिस तरह झरना का जल रास्ते में दोनों तटों पर कभी पत्थर से तो कभी बन से टकराता हुआ मस्ती में प्रवाहित होता है, उसी तरह मनुष्य भी अपने जीवन में सुखों-दुःखों के बीच जीवन व्यतीत करता है। मानव को झरना संदेश देता है कि जीवन में रुकना मृत्यु का सूचक है अत: जीवन में निरन्तर गतिशील बने रहो।

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अवतरण 16.
सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही।
संघर्ष से हटकर जिए, तो क्या जिए हम या कि तुम।
जो नत हुआ, वह मृत हुआ, ज्यों वृन्त से झरकर कुसुम। (मॉडल प्रश्न – 2007)

भावार्थ :- जीवन का नाम ही संघर्ष है। संघर्ष के बिना मानव-जीवन का कोई महत्त्व नहीं है। जो व्यक्ति जीवन में हार मान लिया वह झेरे हुए फूल की तरह मृतक के समान है।

अवतरण 17.
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखत न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।

भावार्थ :- उद्धृत अंश में गरीबों, सुविधाहीन वर्ग की स्थिति को रूपायित किया गया है। यह वर्ग सभी की और आशापूर्ण नेत्रों से देखता है लेकिन इन पर कोई दया दृष्टि नहीं डालता, जो लोग इन पर दया दृष्टि डालते हैं वे लोग दीनबंधु (गरीबों के मित्र या भगवान) की तरह सम्माननीय हो जाते हैं।

अवतरण 18.
जे गरीब पर हित करें, ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्णा मिताई जोग।।

भावार्थ : यहाँ मध्यकालीन भक्त रहीम दोहे के माध्यम से बताते हैं कि गरीबों पर स्नह लुटाने वाला उनसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करने वाला ही वास्तविक अर्थ में बड़ा होता है। इसी कथन को उन्होंने कृष्ण भगवान और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देकर दिखाया है।

अवतरण 19.
दूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।

भावार्थ :- इस दोहे में रहीम अच्छे लोगों (सज्जनों) के रूठ जाने पर भी हर प्रयत्न करके उन्हे मना लेने को कहते हैं, क्योंकि सज्जन व्यक्ति हमारे शुभेच्छु होते हैं, उनके प्रत्येक आचरण में हमारा कल्याण छिपा रहता है।

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अवतरण 20.
विद्याधन उद्यम बिना, कहो जु पावै कौन।
बिना डुलाए ना मिले, ज्यों पंखा को पौन।।

भावार्थ :- इस दोहं में श्रम की महत्ता को व्यंजित किया गया है। बिना परिश्रम के सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, अतः मनुष्य को सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम करना चाहिए। इसी भाव को ध्यान में रखकर दोहे में कहा गया है कि-विद्या तथा धन (या विद्यारूपी धन) बिना परिश्रम के काई नहीं पा सकता, जैसे पंखा को बिना हिलाए हवा नहीं मिल सकती।

अवतरण 21.
कारज धीरे होतु है, काहे होत अधीर।
समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचो नीर।।

भावार्थ :- मनुष्य का स्वभाव अत्यन्त चंचल है, वह किसी भी कार्य का त्वरित परिणाम चाहता है, जबकि यथार्थ में ऐसा नहीं होता है। त्वरित परिणाम वाले कार्य की पूर्णता में सन्देह बना रहता है साथ ही वे हमारे लिए हानिकारक भी होते हैं। प्रस्तुत दोहे में यही भाव व्यंजित है कि-किसी कार्य में विलम्ब होने पर अधीर नहीं होना चाहिए। समय पर ही पेड़ पर फल लगेंगे चाहे हम उसे कितना ही सींचें।

अवतरण 22.
लोग यों ही झिझकते सोचते,
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।
किंतु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें,
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।।

भावार्थ :- इस संसार का नियम है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, कुछ पकड़ने के लिए कुछ छोड़ना पड़ता है। इस पाने-खोने या पकड़ने-छोड़ने की प्रतिक्रिया में ही मनुष्य की प्रगति का रहस्य छुपा हुआ है। इसी प्रसंग में उक्त अंश उद्धत है, जिसका अर्थ है-अक्सर लोग घर को छोड़ने में झझझके हैं। लेकन जिसने भी महान् लक्ष्य के लिए घर छोड़ा, वे स्वाति नक्षत्र की बूँद की तरह मोती में बदल जाते हैं।

WBBSE Class 9 Hindi रचना भावार्थ

अवतरण 23.
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है, और मृतक समान है।

भावार्थ :- संसार के प्रत्येक देश क निवासियो में अपने देश के लिए स्वाभाविक प्रेम होता है, उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता का गर्व होता है। ऐसा होना भी स्वाभाविक है। जिस मनुष्य में अपने देश या संस्कृति के प्रति सम्मान या गौरव की भावना नहीं पायी जाती, वह मनुष्य विवेकशून्य होता है। जिस व्यक्ति को अपन तथा अपने देश पर अभभमान नहीं है, वह मनुष्य नहीं, मनुष्य के रूप में पशु तथा मृतक के समान है।

अवतरण 24.
देखो कृषक शोणित सुखाकर, हल तथापि चला रहे
किस लोभ में इस आँच में वे, जिन शरीर जला रहे।

भावार्थ :- कृषक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। वे समस्त देश में खाद्य उत्पादन को बनाये रखते हैं। कृषकों का स्वयं का जीवन अत्यन्त दुरूह तथा कष्टकर होता है, लेकिन फिर भी धरतीपुत्र होने के कारण, नि:स्वार्थ भाव से वे अपने कर्म में लगे रहते हैं। इस कार्य में उनके घर के अन्य प्राणी भी सहयोग करते हैं। किसान कड़ी धूप में अपना खून जलाकर भी हल चला रहे हैं। पता नहीं, इस धूपरूपी आँच में किस लोभवश वे अपना शरीर जला रहे हैं ?

अवतरण 25.
मध्याह्न है उनकी स्त्रियाँ, ले रोटियाँ पहुँची वहीं,
हैं रोटियाँ रूखी, है खबर शाक को उनकी नहीं।
संतोष से खाकर उन्हें फिर, काम में वे लग गए,
भरपेट भोजन पा गए तो, भाग्य मानो जग गए।

भावार्थ :- उद्धृत अंश में किसानों के निस्वार्थ कर्म, सरल स्वभाव तथा कठिन जीवन- परिस्थितियों की ओर संकेत किया गया है। किसान पूरे देश में खाद्यपूर्ति करते हैं, लेकिन स्वयं आधा-अधूरा भोजन भी भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करते हैं और फिर अपने कर्म में लग जाते हैं
। दोपहर में किसानों की पत्नी रूखी रोटियाँ लेकर खेत में आती हैं। रोटियाँ बिना शाक की हैं। वही रूखी रोटियाँ खाकर किसान संतोषपूर्वक अपने काम में लग जाता है। भरपेट रोटियाँ मिल जाय, यही उनका सौभाग्य है।

WBBSE Class 9 Hindi रचना भावार्थ

अवतरण 26.
वह्लि, बाढ़, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर ?
निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भंगुर जीवित जन,
मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन।

भावार्थ :- मनुष्य को जीवन संघर्ष में बचे रहने या विजयी बनने के लिए प्रकृति के कोप (आग, बाढ़, तूफानों इत्यादि) से बचने के लिए उचित संसाधनों की खोज करनी चाहिए-अन्यथा वह इस संघर्ष में नष्ट हो जायेगा। आग, बाढ़, बिजली तथा तूफानों की विभीषिका के बीच भला कोमल मनुष्य कैसे रह सकता है ? प्रकृति निष्ठुर है और मानव क्षणभंगुर। प्रकृति के कोप से बचने के लिए उचित साधनों का होना मनुष्य के लिए आवश्यक है।

अवतरण 27.
जीवन की क्षण-धूलि रह सके, जहाँ सुरक्षित
रक्त मांस की इच्छाएँ जन को हों पूरित !
मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें – मानव ईश्वर !
और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर ?

भावार्थ :- इस संसार में सामंजस्यपूर्ण स्थिति पैदा करके इस धरती को ही स्वर्ग के रूप में बदला जा सकता है। मनुष्य स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा करता है। यदि सभी लोग एक-दूसरे की इच्छाओं का सम्मान करते हुए प्रेमपूर्ण ढंग से आपस में आचरण करें, तो इस धरती को ही स्वर्ग के रूप में बदल दिया जा सकेगा। जहाँ मानव के क्षणभंगुर जीवन की सुरक्षा हो, जहाँ उसकी इच्छाएँ पूरी हो तथा आपस में प्रेम से रह सके, तो इससे अलग कौन-सा स्वर्ग धरती पर हो सकता है ?

WBBSE Class 9 Hindi रचना भावार्थ

अवतरण 28.
पक्षी और बादल,
ये भगवान के डाकिए हैं,
जो एक महादेश से
दूसरे महादेश को जाते हैं,
हम तो समझ नहीं पाते हैं,
मगर उनकी लायी चिट्वियाँ
पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।

भावार्थ :- इस संसार में जितने भी प्राणी हैं उन सभी के सन्दनों की भाषा प्रकृति समझती है। एक देश का मनुष्य दूसरे देश या क्षेत्र की या पशु-पक्षियों की भाषा नहीं समझ पाता। इस धरती पर सभी सजीव प्रकृति की संतान हैं, अत: प्रकृति उनकी भाषा समझ लेती है और वैसा ही आचरण करती है। पक्षी और बादल केवल प्रकृति के अंग नहीं, बल्कि भगवान के संदेशवाहक हैं। ये भगवान का संदेश लेकर एक महादेश से दूसरे महादेश जाते हैं। इनके द्वारा लाए संदेशों को हम भले न बाँच पाएँ लेकिन पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ इन संदेशों को बाँचकर हम तक पहुँचाते हैं।

अवतरण 29.
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ;
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

भावार्थ :- मनुष्य अत्यन्त महत्वाकांक्षी होता है। वह केवल कल्पनाएँ करना ही नहीं जानता है, बल्कि उन कल्पनाओं को विधिन्न उपादानों के द्वारा साकार करना भी जानता है। आज मनुष्य की प्रर्गति इसी कहानी को सुना रही है। यह मनुष्य साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि उस मनु का पुत्र है। जो केवल कल्पना या विचारों की दुनिया में नहीं जीता। वह अपने स्वप्न को साकार करने का भी सामर्थ्य रखता है।

अवतरण 30.
स्वर्ग के सप्राट को जाकर खबर कर दे,
“रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने, इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं।”

भावार्थ :- इस अंश में मनुष्य की सतत्रप्रगति तथा उसकी महत्वाकांक्षा की ओर संकेत किया गया है। मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ नित नवीन रूप धारण करती हैं, जिन्हें वह पूरा करने का प्रयास करता है। कवि इन्द्र को सावधान करते हुए कहता है कि मनुष्य ने असीम लालसा और बुद्धि का उपयोग कर केवल धरती ही नहीं, आकाश पर भी अपना अधिपत्य जमा लिया है। यदि इन्हें रोका नहीं गया, तो एकदिन ये स्वर्ग पर भी अधिकार जमा लेंगे।

WBBSE Class 9 Hindi रचना भावार्थ

अवतरण 31.
है अनिश्चित, किस जगह पर
बाग, वन सुन्दर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा खतम हो
जायेगी, यह भी अनिश्चित,
अनिश्चित कल सुमन, कब
कंटकों के शर मिलेंगे,
कौन सहसा छूट जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा
तू न, ऐसी आन कर ले।

भावार्थ :- कवि जीवन-पथ पर चलने के संदर्भ में यह कह रहा है कि जीवनरूपी यात्रा में कब सुन्दर बाग-वन मिलेंगे और कब यात्रा खत्म हो जायेगी, यह अनिश्चित है। कभी फूल तो कभी काँटे की तीखी धार भी मिलेगी। हो सकता है कि कोई साथी सहसा हमसे छूट जाय या नये साथी मिल जाएँ। चाहे कुछ भी हो, हमें यह प्रण कर लेना है कि हम अपने कदम को रुकने न देंगे।

अवतरण 32.
जो धर्मो के अखाड़े हैं
उन्हें लड़वा दिया जाये।
जरूरत क्या कि हिन्दुस्तान पर
हमला किया जाये !!

भावार्थ :- किसी देश को कमजोर बनाने का सबसे सरल तरीका है वहाँ के निवासियों को कमजोर बना देना। निवासियों को कमजोर बनाने का तरीका है उनमें आपस में फूट डाल देना और उनमें फूट धर्म के माध्यम से ही डाली जा सकती है। हमारे शत्रुओं की यह साजिश है कि धर्म के नाम पर भारत के लोगों को आपस में लड़ा दिया जाय। इससे जो नुकसान होगा वह किसी हमले से कई गुणा बड़ा होगा, फिर हिन्दुस्तान पर हमला कंरने की जरूरत ही क्या है !

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अवतरण 33.
ये मुल्क इतना बड़ा है
यह भी बाहर के
हमले से,
न सर होगा !
जो सर होगा तो बस
अन्दर के फितने से।

भावार्थ :- कोई भी देश या व्यक्ति बाहरी आघातों या आक्रमणों से कमजोर या नष्ट नहीं होता है। देश या व्यक्ति को नष्ट होने में आन्तरिक कारक ही मुख्य भूमिका निभाते हैं। यदि देश या व्यक्ति आन्तरिक रूप से मजबूत रहे, तो उसे नष्ट करने की शक्ति किसी में नहीं है। भारत इतना विशाल है कि बाहरी हमले इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। यदि यह नष्ट होगा तो केवल आंतरिक कलह से – कवि का ऐसा कहना है।

अवतरण 34.
वो टक्कर हो कि सब कुछ
युद्ध का मैदान
बन जाए !
कभी जैसा नहीं था, वैसा
हिन्दुस्तान बन जाए।

भावार्थ :- किसी देश की प्रगति से ईर्ष्याभाव रखनेवाली शक्तियाँ चाहती हैं कि यह देश इतनी गिरी हुई हालत में चला जाए, जितना अतीत में न हुआ हो। इस अंश में भी यही भाव भारत. देश के सन्दर्भ में व्यंजित हुआ है। यहाँ कवि आतंकवादियों एवं शत्रु देशों की मंशा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि भारत में कुछ धार्मिक, राजनैतिक, भाषाई तथा प्रांतीयता के झगड़े बो दिए जायं। ऐसा करने से शांति और अहिंसा का यह हिन्दुस्तान युद्ध-क्षेत्र में बदल जायेगा।

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अवतरण 35.
लेकिन उनसे कौन कहे –
प्रगति, पिछलग्गूपन नहीं है
और जीवन, आगे बढ़ने के लिए
दूसरों का मुँह नहीं ताकता !

भावार्थ :- जो लोग यह समझते हैं कि किसी के विचारों से प्रभावित होकर उसके पीछे चलना ही प्रगतिशीलता है, तो यह गलत है। प्रगतिशील होने का अर्थ पिछलग्गू होना नहीं, बल्कि स्वयं को आगे बढ़ाना है और इसके लिये किसी का मुँह ताकने की आवश्यकता नहीं है।

अवतरण 36.
हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर, पार्थिव पूजन ?
जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन !
संग-सौध में हो श्वृंगार मरण का शोभन
नग्न, क्षुधातुर वास विहीन रहें जीवित जन।

भावार्थ :- कवि कहते हैं कि हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर और अपार्थिव पूजन हो रहा है। कैसा आश्चर्य है कि मनुष्य तो बेचारा नगा, भूख से आकुल-व्याकुल और आवास-विहीन रहे और मृतक का संगमरमर के वैभवपूर्ण भवन में भृंगार होता रहे।

अवतरण 37.
भले बुरे सब एक सौं, जौ लौ बोलत नाहिं।
जानि परतु है काक-पिक, ॠतु बसंत के माहिं।।

भावार्थ :- मौन गंभीर पुरुषों का आभूषण है। जो व्यक्ति जितना ही धैर्यवान और गंभीर होगा, वह उतना ही मितभाषी होगा। ऐसे पुरुषों के वचन अत्यन्त मृदु और स्नेहयुक्त होते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह हमेशा “सत्य वद् प्रियंवद्” सिद्धान्त पर अमल करे। प्रिय या मधुर बोलने वाला व्यक्ति सभी का प्रिय पात्र होता है। यही बात प्रस्तुत दोहे के माध्यम से कही गई है कि-जब तक व्यक्ति बोलता नहीं, उसके भले -बुरे की पहचान नहीं होती, जिस प्रकार कौए और कोयल की पहचान बसंत ऋतु में ही होती है।

WBBSE Class 9 Hindi रचना भावार्थ

अवतरण 38.
सबै सहायक सबल के, कोड न निबल सहाय।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय।।

भावार्थ :- इस संसार का नियम है कि सभी लोग बलवानों की ही सहायता करते हैं, क्योंकि उनसे लोगो को भय होता है। इसी तथ्य को गोस्वामी जी ने ‘रामचरितमानस’ में भी कहा है ‘भय बिनु होय न प्रीति’। इसी भावना को यह दोहा भी व्यक्त करता है कि-सब सबल की ही सहायता करते हैं, निर्बल की सहायता कोई नहीं करता। जिस प्रकार पवन दीपक को बुझा देता है, लेकिन आग को और भी बढ़ा देता है।

अवतरण 39.
अपनी पहुँच बिचारि के, करतब करिए दौर।
तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर।।

भावार्थ :- मनुष्य को अपनी हैसियत (स्थिति) का अन्दाजा लगाकर ही कोई कार्य करना चाहिए, अन्यथा मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। जो व्यक्ति विवेकवान् हैं, वे समय के पलड़े में अपने और अपनी परिस्थित्यो को तौलकर ही कोई कार्य करते हैं। प्रस्तुत दोहे का निष्कर्ष भी यही है कि-मनुष्य को अपनी सामर्थ्य का विचार करके ही कोई कार्य करना चाहिए। उसे उतना ही पैर फैलाने चाहिए, जितनी लम्बी चादर हो।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या? to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 Question Answer – संस्कृति है क्या?

ससंदर्भ आलोचनात्मक व्याख्या

प्रश्न 1.
संस्कृति ऐसी चीज है, जिसे लक्षणों से तो हम जान सकते हैं, किन्तु उसकी परिभाषा नहीं दे सकते।
– लेखक का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लेखक का नाम रामधारी सिंह ‘दिनकर’ है।
दिनकर के अनुसार संस्कृति हमारे लक्षणों से प्रकट होती है। लेकिन उसकी कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती। एक कहावत भी है, ‘संस्कृति हमारे अंदर का गुण है, लेकिन सभ्यता वह चीज है, जो हमारे पास है।’ संस्कृति हमारे प्रत्येक के व्यवहार से प्रकट होती है और सभ्यता की पहचान हमारी सुख-सुविधा की चीजों से प्रकट होती है।

प्रश्न 2. हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत ही होता है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 3.
यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर सुसंस्कृत आदमी सभ्य ही होता है।
– ससंदर्भ पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के सांस्कृतिक निबंध ‘संस्कृति है क्या’ निबंध से ली गई है।
दिनकर के अनुसार सुसभ्य और सुसंस्कृत होना दो अलग बातें हैं। हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत नहीं हो सकता और हर सुसंस्कृत आदमी सुसभ्य नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए सुसभ्य आदमी भी तबीयत से नंगा हो सकता है और सुसंस्कृत व्यक्ति भी सुख-सुविधा की चीजों के अभाव में सभ्य नहीं दिख सकता है।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

प्रश्न 4.
उसे सुसंस्कृत समझने में कोई उज्र नहीं होना चाहिए।
– रचनाकार कौन हैं ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचनाकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।
प्रस्तुत पंक्ति में छोटानागपुर के आदिवासियों के बारे में कहा गया है। उनके पास सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण या साधन नहीं हैं । इसलिए उन्हें पूर्ण रूप से सभ्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। लेकिन उनमें मानवीय गुणों जैसे दयामाया, सच्चाई और सदाचार आदि की कमी नहीं है। इसलिए उन्हें सुसंस्कृत मान लेने में कोई परेशानी नहीं है।

प्रश्न 5. ये लक्षण आज की यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जाते हैं।

प्रश्न 6. वे जाति की संस्कृति का निर्माण करते थे।

प्रश्न 7.
सभ्यता और संस्कृति में एक मौलिक भेद है।
– ‘वे’ से किसकी ओर संकेत किया गया है ? पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
‘वे’ से हमारे ॠषिगण संकेतित हैं।
प्रचीन भारत में ऋषि-मुनि जंगलों में सदाधारपूर्ण एवं सादा जीवन व्यतीत करते थे। फूस की झोपड़ियों में रहना, प्रकृति एवं उसके समस्त प्राणियों से प्यार करना, अपना सारा कार्य स्वयं करना, मिट्टी के बरतनों में खाना बनाना, प्ततों में खाना तथा शिक्षा दान करते हुए राष्ट्र की उन्नति के बारे में सोचना ही उनकी जिंदगी थी। रहन-सहन के आधार पर उन्हें यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्य नहीं कह सकते। लेकिन, वे संस्कृति के निर्माणकर्त्ता चे।

प्रश्न 8.
उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है।
– पाठ का नाम लिखें। यहाँ किसकी संस्कृति के बारे में कहा गया है ?
उत्तर :
पाठ का नाम ‘संस्कृति है क्या ?’ है।
यहाँ उन लोगों की संस्कृति के बारे में कहा गया है, जो लोग दुर्गुणों के गुलाम न रहकर उन्हें ही अपना गुलाम बनाना चाहते हैं। लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग, द्वेष, काम, वासना आदि पर मनुष्य की जो जाति जितनी ही विजयी होती है, उसकी संस्कृति उतनी ही श्रेष्ठ समझी जाती है।

प्रश्न 9.
संस्कृति, सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के निबंध ‘संस्कृति है क्या ?’ से ली गई है।
सभ्यता के साधन, सुख-सुविधा के साधन होते हैं। इसलिए उन्हें देखा जा सकता है। संस्कृति व्यक्ति के अंदर निहित होती है। इसलिए उसे देखा नहीं जा सकता है। संस्कृति, सभ्यता के अंदर उसी तरह छिपी रहती है, जैसे फूलों में सुगंध। फूल, सभ्यता का प्रतीक है, उसे देखा जा सकता है। सुगंध, संस्कृति का प्रतीक है, उसे अनुभव से ही जान सकते हैं।

प्रश्न 10.
‘अपस्टार्ट’ को लोग बुरा समझते हैं।
– प्रस्तुत पंक्ति किस पाठ की है ? पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति ‘संस्कृति है क्या ?’ पाठ से ली गई है।
जो लोग अचानक पैसे वाले हो जाते हैं अथवा किसी को ऊँचा पद प्राप्त हो जाता है, तो उसे चिढ़ाने के लिए अंग्रेजी शब्द ‘अपस्टार्ट’ का प्रयोग किया जाता है। इस शब्द के मूल में यह भाव छिपा है, कि अघानक पद या पैसा प्राप्त हो जाने से कोई व्यक्ति उसके अनुरूप व्यवहार नहीं प्राप्त कर सकता है। इसमें समय लगता है।

प्रश्न 11. हम जो कुछ करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है।

प्रश्न 12.
जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति दिनकर के निबंध ‘संस्कृति है क्या ?’ से ली गई है।
सारे भारतीय धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करते है। ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल भोगने के लिए मनुष्य में जन्म लेता है। गीता में श्रीकृष्ण से लेकर बुद्ध और महावीर ने इस बात को स्वीकारा है। किसी के अच्छे संस्कार को देख कर या प्रतिभा को देख कर लोग उसका संबंध पूर्व जन्म से जोड़ते हैं। पूर्व जन्म का संस्कार जन्मजन्मांतरों तक चलता रहता है।

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प्रश्न 13.आदान-प्रदान की प्रक्रिया संस्कृति की जान है।

प्रश्न 14. संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।

प्रश्न 15. जो जाति केवल देना ही जानती है, लेना कुछ नहीं, उसकी संस्कृति का एक न एक दिन दिवाला निकल जाता है।

प्रश्न 16. कूपमंडूकता और दुनिया से रूठकर अलग बैठने का भाव संस्कृति को ले डूबता है।

प्रश्न 17.पहले एक भाषा में ‘शेली’ और ‘कीट्स’ पैदा होते हैं तब दूसरी भाषा में रवींद्र उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 18. सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार पर भी पड़ता है।

प्रश्न 19.
एक देश में जो धर्म खड़ा होता है, वह दूसरे देशों में धर्मों को भी बहुत-कुछ बदल देता है।
– ससंदर्भ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
उपर्युक्त पंक्ति ‘संस्कृति है क्या ?’ निबंध से ली गई है।
संस्कृति के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि इसका विकास एकांगी नहीं होता है। संसार की जितनी भी विकसित संस्कृतियाँ हैं, उन्होंने दूसरी संस्कृतियों से बहुत कुछ लिया है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति की संगति का अन्छा या वुरा असर पड़ता है, ठीक वैसे ही एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति प्रभावित होती है । यह बात केवल आचार-विचार या पहनावेओढ़ावे में ही नहीं है। संस्कृति साहित्य को भी प्रभावित करती है।

उदाहरण के लिए भारत के कवि गुरू कहे जाने वाले रवांद्रनाथ ठाकुर का साहित्य अंग्रेजी के ‘शेली’ और ‘कीट्स’ से प्रभावित है। ईसा मसीह के सिद्धांत भी बुद्ध से प्रभावित है। अगर भारत का संपर्क यूरोप से नहीं हुआ होता, तो भारत में नवजागरण नहीं हुआ होता। और न ही राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद जैसे विचारक या समाज-सुधारक पैदा हुए होते। इस प्रकार निष्कर्ष के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि परस्पर आदान-प्रदान की प्रकिया ही संस्कृति के प्राण हैं।

प्रश्न 20.
भारत देश और भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है।
– रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें। पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘संस्कृति है क्या ?’ है और इसके रघनाकार रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।
भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता ने अनेक सभ्यता एवं संस्कृति को प्रहण किया है। कला, साहित्य, संस्कृति तथा विज्ञान का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जिसमें दूसरी संस्कृति की झलक नहीं मिलती हो।

इसका सष्ट रूप से प्रभावहमें वास्तु-कला एवं संगोत-कला पर दिखाई देता है। येप्रभाव भारतीय संस्कृति में इस प्रकार घुलमिल गए हैं, कि उन्हें अलग करके देख पाना संभव नहीं है। इसलिए भारत और भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान हैं।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : ‘संस्कृति है क्या ?’ पाठ का सारोश अपने शब्दों में लिखें।
प्रश्न – 2 : संस्कृति है क्या ?’ पाठ का मूल भाव लिखें।
प्रश्न – 3 : ‘संस्कृति है क्या $?’ निबंध के माध्यम से ‘दिनकर’ में हमें क्या संदेश देना चाहा है ?
प्रश्न – 4 : संस्कृति है क्या ? पाठ में व्यक्त ‘दिनकर’ के विचारों पेर प्रकाश डालें।
प्रश्न – 5 : ‘संस्कृति है क्या ?’ पाठ के उद्देश्य पर प्रकाश उालें।
उत्तर : ‘संस्कृति है क्या ?’ दिनकर का सांस्कृतिक निबंध है, जिसमें उन्होंने संस्कृति, सभ्यता, इसके उपकरण तथा दोनों का एक-दूसरे पर प्रभाव की चर्चा करते हुए यह संदेश देना चाहा है कि विभिन्न संस्कृतियों के मेल से ही बनी संस्कृति का स्थान सबसे ऊँचा होता है।

दिनकर के अनुसार संस्कृति को परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता, वह केवल लक्षणों से प्रकट होती है। हमारे खानेपीने, रहन-सहन, सोच-विचार यहाँ तक कि हमारे रोने-हँसने तक से हमारी संस्कृति प्रकट होती है। जिन चीजों का हम दैनिक जीवन में व्यवहार या निर्माण करते हैं उनसे हमारी सभ्यता प्रकट होती है जैसे – सड़क से लेकर हवाई जहाज तक निर्माण या फिर चाहे वह घर का ही निर्माण क्यों न हो। दिनकर का ऐसा कहना है कि हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत हो यह जरूरी नहीं क्योंकि सुसंस्कृत व्यक्ति भी तबीयत से नंगा हो सकता है।

यूरोपीय परिभाषा के अनुसार हम छोटानागपुर के आदिवासियों को सभ्य नहीं कह सकते क्योंकि सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण उनके पास नहीं हैं। फिर भी उनमें दया-माया, सदाचार, परोपकार तथा सदाधार जैसे गुण हैं इसलिए इन्हें सुसंसकृत माना जा सकता है।

प्रावीन काल के हमारे ऋषि भी महलों में नहीं, फूस की झोपड़ियों में रहते थे, मिद्टी के बर्तनों में भोजन पकाते तथा पत्तों पर खाना खाते थे; वे जंगलों के जीवों से प्यार करते तथा अपने सारे कार्य स्वयं ही किया करते थे। इन्हीं गुणों के कारण वे न केवल सुसंस्कृत थे बल्कि संस्कृति का निर्माण करने वाले थे।

दिनकर ने संस्कृति और प्रकृति में भी अंतर स्पष्ट किया है तथा यह कहा है कि क्रोध मनुष्य की प्रकृति तथा लोभ में पड़ना उसका स्वभाव है। बहुत सारे दुर्गुण प्रकृतिदत्त हैं और जो इनपर विजय प्राप्त कर लेते हैं उनकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची मानी जाती है।

सभ्यता की अपेक्षा संस्कृति अधिक टिकाऊ होती है क्योंकि सभ्यता की साप्मगियाँ तो तुरंत नष्ट हो सकती हैंलेकिन संस्कृति नहीं। संस्कृति का निर्माण भी अचानक नहीं हो जाता है बल्कि उसके निर्माण में सैकड़ों वर्ष लगते हैं।

संस्कृति के बारे में दिनकर ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही- वह यह है कि संस्कृति का विकास आदान-प्रदान से होता है। जो जाति या देश अपने-आपको दूसरी संस्कृतियों से काटकर रखती है एक न एक दिन उसका पतन हो जाता है। संस्कृति का विकास एक दूसरे के संपर्क से होता है। उदाहरण के लिए यदि हमारा सपर्क, यूरोप से नहीं होता तो भारत में नवजागरण नहीं आता और न ही राजा राममोहन राय, दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद तथा गाँधी जैसे समाज सुधारक पैदा होते।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions Chapter 3 संस्कृति है क्या?

दिनकर ने इस निबंध के माध्यम से हमें यह संदेश देना चाहा है कि भारत देश तथा भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है क्योकि यहाँ की संस्कृति में अनेक संस्कृतियों का मिश्रण है।
अंत में इस निबंध के उद्देश्य को दिनकर के शब्दों में ही व्यक्त कर सकते हैं –
“‘उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, देश में जहाँ जो हिन्दू बसते हैं, उनकी संस्कृति एक है एवं भारत की प्रत्येक क्षेत्रीय विशेषता हमारी इसी सामासिक संस्कृति की विशेषता है। तब हिन्दू और मुसलमान हैं जो देखने में अब भी दो लगते हैं, किन्तु उनके बीच भी सांस्कृतिक एकता विद्यमान है, जो उनकी भिन्नता को कम करती है। दुर्भाग्य की बात है कि हम इस एकता को पूर्ण रूप से समझने में असमर्थ रहे हैं।”

प्रश्न 6 : संस्किति है क्या ? निब्ध के आध्थार पर संस्किति आर सम्या सें अंदर स्पष्ट करें

प्रश्न-7 : दिनकर के विचार के अनुसार संस्कृति और सभ्यता में क्या अंतर है?

प्रश्न – 8 : पतित पाठ के आघार पर सस्कृति तथा सध्यता में अंतर लिखें।
उत्तर :
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति है क्या?’ निबंध में संस्कृति और सभ्यता पर विचार करते हुए इन दोनो के बीच अंतर स्पष्ट किया है। साधारणतः लोग संस्कृति और सभ्यता को एक-दूसरे का पर्याय मान लेते हैं लेकिन वास्तव में दोनों में बहुत ही सूक्ष्म अंतर है।
दिनकर के अनुसार संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है लेकिन सभ्यता वह चीज है जो हमारे पास है।

संस्कृति की पहचान लक्षणों से होती है जबकि सभ्यता की पहचान सुख-सुविधा तथा ठाट-बाट के साधनों से होती है। इस दृष्टि से छोटानागपुर के आदिवासी पूर्ण रूप से सभ्य नहीं कहे जा सकते क्योंकि सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण उनके पास नहीं है।
सभ्यता के भीतर संस्कृति उसी तरह छिपी रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूल में सुगंध।

सभ्यता के निर्माण तथा नष्ट होने में संस्कृति की अपेक्षा काफी समय लगता है। संस्कृति को आसानी से नष्ट नहीं किया जा सकता।
आदिकालीन साहित्यकार, चित्रकार, मूर्तिकार आदि हमारी संस्कृति के रचनेवाले हैं। संस्कृति तथा सभ्यता दोनों का ही विकास परस्पर आदान-प्रदान से होता है। संसार का कोई भी राष्ट्र या जाति यह दावा नहीं कर सकती कि वह दूसरे की संस्कृति-सभ्यता से प्रभावित नहीं है।

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प्रत्येक देश या जाति सभ्यता के उपकरण के मामले में दूसरों का कितना ही नकल कर ले लेकिन सभी अपनी संस्कृति को, परंपरा को यथावत बनाएं रखना चाहते हैं क्योंकि –

वह न तो हिंदू है, न मुस्लिम है,
न द्रविड़ है, न आर्य है,
न परंपरा का हर प्रहरी
पुरी का शंकराचार्य है।

अति लघूत्तरीय/लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
संस्कृति क्या है ?
उत्तर :
संस्कृति ऐसी चीज है जिसे लक्षणों से तो जान सकते हैं लेकिन उसकी परिभाषा नहीं दी जा सकती।

प्रश्न 2.
अंग्रेजी में संस्कृति के बारे में क्या कहावत है ?
उत्तर :
अंग्रेजी में संस्कृति के बारे में यह कहा गया है कि संस्कृति वह गुण है जो हममें व्याप्त है।

प्रश्न 3.
अंग्रेजी में सभ्यता के बारे में क्या कहावत है ?
उत्तर :
अंग्मेजी में सभ्यता के बारे में कहावत है कि सभ्यता वह चीज़ है जो हमारे पास है।

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प्रश्न 4.
ऐसा क्यों नहीं कहा जा सकता कि हर सुसंस्कृत आदमी सभ्य ही होता है ?
उत्तर :
ऐसा इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि सभ्यता की पहचान सुख-सुविधा और ठाठ-बाट है।

प्रश्न 5.
छोटानागपुर की आदिवासी जनता पूर्ण रूप से सभ्य क्यों नहीं कही जा सकती ?
उत्तर :
छोटानागपुर की आदिवासी जनता को पूर्ण रूप से सभ्य इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके पास सभ्यता के बड़े-बड़े उपकरण नहीं हैं।

प्रश्न 6.
छोटानागपुर के आदिवासियों में कौन कौन-से गुण हैं ?
उत्तर :
छोटानागपुर के आदिवासियों में दया-माया, सच्चाई और सदाचार के गुण हैं।

प्रश्न 7.
प्राचीन भारत के ऋषियों का रहन-सहन कैसा था ?
उत्तर : प्राघीन भारत के ऋषि फूस की झोपड़ियों में रहते थे, वह जंगलों के जीवों से दोस्ती तथा प्यार करने में हिचकिचाते नहीं थे, मिट्टी के बर्त्तनों में रसोई पकाते तथा पत्तों पर खाना खाते थे।

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प्रश्न 8.
हमारी भारतीय संस्कृति का निर्माण करनेवाले कौन थे ?
उत्तर :
हमारी भारतीय संस्कृति का निर्माण करनेवाले जंगलों में सादा तथा सदाचारपूर्ण जीवन बिताने वाले ॠषिगण थे।

प्रश्न 9.
संस्कृति और सभ्यता के बारे में साधारण नियम क्या है ?
उत्तर :
सस्कृति और सभ्यता के बारे में साधारण नियम यह है कि दोनों का विकास एक साथ होता है और दोनों ही एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 10.
घर बनाना स्थूल रूप से किसका कार्य होता है ?
उत्तर :
घर बनाना स्थूल रूप से सभ्यता का कार्य होता है।

प्रश्न 11.
मनुष्य की प्रकृति, स्वभाव तथा प्रकृतिदत्त गुण क्या हैं ?
उत्तर :
गुस्सा करना मनुष्य की प्रकृति, लोभ में पड़ना उसका स्वभाव तथा ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष तथा कामवासना आदि उसके प्रकृतिदत्त गुण हैं।

प्रश्न 12.
आदमी और जानवर में कब कोई भेद नहीं रह जाएगा ?
उत्तर :
जब प्रकृतिदत्त गुणों जैसे ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष, काम-वासना आदि पर नियंत्रण न रखा जाये तो आदमी और जानवर में कोई भेद्न नहीं रह जाएगा।

प्रश्न 13.
मनुष्य की कोशिश क्या होती है ?
उत्तर :
मनुष्य की कोशिश यह होती है कि वह कोध के वश में नहीं रहे कोध ही उसके वश में रहे।

प्रश्न 14.
किसकी संस्कृति ऊँची समझी जाती है ?
उत्तर :
जिस जाति का व्यक्ति अपने दुर्गुणों पर जितना ही ज्यादा विजयी होता है उसकी संस्कृति उतनी ही ऊँची समझी जाती है।

प्रश्न 15.
सभ्यता संस्कृति के भीतर किस रूप में रहती है ?
उत्तर :
सभ्यता के भीतर संस्कृति वैसे ही रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूल में सुगंध।

प्रश्न 16.
सभ्यता और संस्कृति में से ज्यादा कौन टिकाऊ है और क्यों ?
उत्तर :
सभ्यता और संस्कृति में से ज्यादा टिकाऊ संस्कृति है क्योंकि सभ्यता की सामत्रियाँ नष्ट हो सकती हैं लेकिन संस्कृति नहीं।

प्रश्न 17.
‘अपस्टार्ट’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता है ?
उत्तर :
जो व्यक्ति अचानक धनी हो जाता है या उसे कोई ऊँचा पद प्राप्त हो जाता है उसके लिए ‘अपस्टार्ट’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 18.
संस्कृति की झलक किसमें दिखाई पड़ती है ?
उत्तर :
खाने-पीने, रहन-सहन, सोचने-समझने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने आदि जो कुछ भी हम करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 19.
असल में संस्कृति क्या है ?
उत्तर :
असल में संस्कृति जिंदगी जीने का तरीका है जिसकी छाप सदियों से जमा होकर समाज में छायी रहती है।

प्रश्न 20.
संस्कृति हमारा पीछा कब तक करती है ?
उत्तर :
संस्कृति हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती है।

प्रश्न 21.
अपने यहाँ संस्कार के बारे में कौन-सा एक साधारण कहावत है ?
उत्तर :
अपने यहाँ साधारण कहावत है कि जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है।

प्रश्न 22.
हमारी संस्कृति का प्रभाव कब तक चलता रहता है ?
उत्तर :
हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।

प्रश्न 23.
हमारी संस्कृति के रचयिता कौन हैं ?
उत्तर :
जो आदिकाल से हमारे लिए काव्य और दर्शन की रचना करते आए हैं, चित्र और मूर्ति बनाते आए हैं वे ही हमारी संस्कृति के रचयिता हैं।

प्रश्न 24.
संस्कृति का क्या स्वभाव है ?
उत्तर :
संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।

प्रश्न 25.
कौन-सा भाव संस्कृति को ले डूबता है ?
उत्तर :
कूपमंडूकता तथा दुनिया से रूठकर अलग बैठने का भाव संस्कृति को ले डूबता है।

प्रश्न 26.
‘शेली’ तथा ‘कीट्स’ कौन हैं ?
उत्तर :
शेली तथा कीट्स दोनों ही अंग्रेजी भाषा के विश्वप्यसिद्ध कवि हैं।

प्रश्न 27.
उर्दूभाषा तथा मुगल-कलम की चित्रकारी भारत को किसकी देन है ?
उत्तर :
उद्दूभाषा तथा मुगल-कलम की चित्रकारी दोनों ही मुसलमानों की देन हैं।

प्रश्न 28.
अगर यूरोप से भारत का संपर्क नहीं हुआ होता तो क्या होता ?
उत्तर :
अगर यूरोप से भारत का संपर्क नहीं होता तो राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद तथा गाँधी जैसे सुधारकों का जन्म नहीं हुआ होता।

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प्रश्न 29.
दो जातियों के परस्पर मिलने से क्या होता है ?
उत्तर :
दो जातियों के परसर मिलने से जिंदगी की एक नयी धारा फूटती है जिसका प्रभाव दोनों जातियों पर पड़ता है।

प्रश्न 30.
सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव हमारे रहन-सहन तथा कला के अलावे किस पर पड़ता है ?
उत्तर :
सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव हमारे रहन-सहन तथा कला के अलावे दर्शन और विचार पर भी पड़ता है।

प्रश्न 31.
सांस्कृतिक दृष्टि से कौन-सा देश या जाति अधिक शक्तिशाली माना जाता है ?
उत्तर :
जिस देश या जाति में अंधिक से अधिक सांस्कृतिक सम्मिश्रण तथा सामंजस्य हो वह अधिक शक्तिशाली माना जाता है।

प्रश्न 32.
ऐसा क्यों नहीं कहा जा सकता कि हर सुसभ्य आदमी सुसंस्कृत ही होता है
उत्तर :
सुसभ्य आदमी भी तबीयत से मनचला तथा नंगा हो सकता है, इसलिए हर सुसभ्य आदमी को सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 33.
कौन-से लक्षण यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जा सकते ?
उत्तर :
हमारे खषियों के रहन-सहन के लक्षणों को यूरोपीय परिभाषा के अनुसार सभ्यता के लक्षण नहीं माने जा सकते।

प्रश्न 34.
घर का नक्शा पसंद करने के पीछे कौन-सी रूचि काम करती है ?
उत्तर :
घर का नवशा पसंद करने के पीछे हमारी सांस्कृतिक रूचि काम करती है।

प्रश्न 35.
कौन-से प्रभाव का क्रम निरंतर चलता ही रहता है ?
उत्तर :
सभ्यता का प्रभाव संस्कृति पर तथा संस्कृति का प्रभाव सभ्यता पर पड़ने का क्रम निरंतर चलता ही रहता है।

प्रश्न 36.
संस्कृति के निर्माण में कितना समय लगता है ?
उत्तर :
संस्कृति के निर्माण में सैकड़ों वर्षों का समय लगता है।

प्रश्न 37.
हमारे पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला, सिनेमागृह आदि किसके उपकरण हैं?
उत्तर :
हमारे पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला तथा सिनेमागृह आदि हमारी संस्कृति के उपकरण हैं।

प्रश्न 38.
संसार का कोई भी देश क्या दावा नहीं कर सकता ?
उत्तर :
संसार का कोई भी देश यह दावा नहीं कर सकता कि उसपर किसी अन्य देश की संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ा है।

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प्रश्न 39.
भारत की विचारधारा पर विज्ञान का प्रभाव किसके कारण पड़ा ?
उत्तर :
यूरोप से संपर्क के कारण भारत की विचारधारा पर विज्ञान का प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 40.
संस्कृति की जान किसे कहा गया है ?
उत्तर :
आदान-प्रदान की प्रक्रिया को संस्कृति की जान कहा गया है।

प्रश्न 41.
भारत देश तथा भारतीय संस्कृति किस दृष्टि से संसार में सबसे महान है ?
उत्तर :
भारत की सामासिक संस्कृति में अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियाँ पची हुई हैं, इसलिए भारत तथा भारतीय संस्कृति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘दिनकर’ किस कवि का उपनाम है?
(क) बालकृष्ण शर्मा का
(ख) रामनरेश त्रिपाठी का
(ग) रामधारी सिंह का
(घ) जयशंकर प्रसाद का
उत्तर :
(ग) रामधारी सिंह का।

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प्रश्न 2.
दिनकर का जन्म कब हुआ था?
(क) 23 दिसम्बर, 1908 को
(ख) 23 जनवरी, 1908 को
(ग) 23 फरवरी, 1908 को
(घ) 23 जुलाई, 1908 को
उत्तर :
(क) 23 दिसम्बर, 1908 को ।

प्रश्न 3.
दिनकर कैसे कवि के रूप में अधिक प्रतिष्ठित हैं?
(क) रीतिबद्ध कवि
(ख) भक्त कवि
(ग) युग-चारण कवि
(घ) चारण-कवि
उत्तर :
(ग) युग-चारण कवि।

प्रश्न 4.
‘कुरूक्षेत्र’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) पंत
(ख) नागार्जुन
(ग) गुप्तजी
(घ) दिनकर
उत्तर :
(घ) दिनकर।

प्रश्न 5.
‘कुरूक्षेत्र’ काव्य की पृष्ठभूमि क्या है?
(क) राम वन गमन
(ख) महाभारत
(ग) प्रथम विश्वयुद्ध
(घ) द्वितीय विश्वयुद्ध
उत्तर :
(घ) द्वितीय विश्वयुद्ध।

प्रश्न 6.
दिनकर ने महाभारत के कर्ण के चरित्र पर आधारित कौन-सा काव्य लिखा?
(क) कुरूक्षेत्र
(ख) रश्मिरथी
(ग) रेणुका
(घ) हुँकार
उत्तर :
(ख) रश्मिरथी।

प्रश्न 7.
दिनकर का कामाध्यात्म संबंधी महाकाव्य कौन-सा है?
(क) रशिमरथी
(ख) उर्वशी
(ग) नील कुसुम
(घ) रेणुका
उत्तर :
(ख) उर्वशी।

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प्रश्न 8.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है?
(क) रेणुका
(ख) हुँकार
(ग) कुकुरमुत्ता
(घ) द्वन्द्वगीत
उत्तर :
(ग) कुकुरमुत्ता।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है?
(क) रसवंती
(ख) सामधेनी
(ग) कुरूक्षेत्र
(घ) नीरजा
उत्तर :
(घ) नीरजा।

प्रश्न 10.
‘मिट्टी की ओर’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) कुँवर नारायण
(ख) धर्मवीर भारती
(ग) दिनकर
(घ) अज्ञेय
उत्तर :
(ग) दिनकर।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है?
(क) बापू
(ख) गीतर्व
(ग) धूप और धुआं
(घ) रश्मिरथी
उत्तर :
(ख) गीतपर्व।

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है ?
(क) नील कुसुम
(ख) नये सुभाषित
(ग) नीलांबरा
(घ) परशुराम की प्रतीक्षा
उत्तर :
(ग) नीलांबरा।

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प्रश्न 13.
निम्न में से कौन-सा काव्य दिनकर का नहीं है ?
(क) हारे को हरिनाम
(ख) संचयिता
(ग) परिक्रमा
(घ) रश्मिलोक
उत्तर :
(ग) परिक्रमा।

प्रश्न 14.
‘अर्द्धनारीश्वर’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) पंत
(ख) दिनकर
(ग) शमशेर
(घ) अज्षेय
उत्तर :
(ख) दिनकर।

प्रश्न 15.
‘भारतीय संस्कृति के चार अध्याय’ किसकी रचना है?
(क) दिनकर की
(ख) मुक्तिवोध की
(ग) निराला की
(घ) पंत की
उत्तर :
(क) दिनकर की ।

प्रश्न 16.
‘शुद्ध कविता की खोज’ के लेखक कौन हैं?
(क) धूमिल
(ख) दिनकर
(ग) रामदरश मित्र
(घ) नरेश मेहता
उत्तर :
(ख) दिनकर।

प्रश्न 17.
‘रेती के फूल’ और ‘उजली आग’ के रचियता कौन हैं?
(क) दिनकर
(ख) रघुवीर सहाय
(ग) अज्ञेय
(घ) निराला
उत्चर :
(क) दिनकर।

प्रश्न 18.
‘हे राम’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) सर्वेश्वर
(ग) अज़ेय
(घ) दिनकर
उत्तर :
(घ) दिनकर।

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प्रश्न 19.
निम्न में से कौन-सी रचना दिनकर की नहीं है?
(क) सप्तपर्णा
(ख) लोकदेव नेहरू
(ग) प्रसाद, पंत् और मैथिली शरण गुप्त
(घ) काव्य की भूमिका
उत्तर :
(क) सप्तपर्णा।

प्रश्न 20.
दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किस विधा की रचना है?
(क) संस्मरण
(ख) संस्कृति का इतिहास
(ग) रेखाचित्र
(घ) एकांकी
उत्तर :
(ख) संस्कृति का इतिहास ।

प्रश्न 21.
दिनकर का ‘अर्द्धनारीश्वर’ किस विधा की रचना है?
(क) निबंध
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) कहानी
उत्तर :
(क) निबंध।

प्रश्न 22.
‘उर्वशी’ प्रबंध-काव्य के रचियता कौन हैं?
(क) प्रसाद
(ख) पंत
(ग) दिनकर
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ग) दिनकर।

प्रश्न 23.
कामाध्यात्म की भावभूमि पर आधारित ग्रंध है –
(क) कामायनी
(ख) उर्वशी
(ग) एकलव्य
(घ) आकाशगंगा
उत्तर :
(ख) उर्वशी।

प्रश्न 24.
‘प्रसाद, पंत और मैथिलीशरण’ के लेखक हैं –
(क) दिनकर
(ख) अझेय
(ग) नगेंद्र
(घ) यशपाल
उत्तर :
(क) दिनकर।

प्रश्न 25.
‘लोकदेव नेहरू’ के रचयिता हैं?
(क) प्रसाद
(ख) दिनकर
(ग) अमृतराय
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ख) दिनकर।

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प्रश्न 26.
दिनकर की रचना में किन शब्दों की बहुलता है?
(क) तत्सम्
(ख) तद्भव
(ग) देशज
(घ) विदेशज
उत्तर :
(क) तत्सम्।

प्रश्न 27.
दिनकर ने भारत-पाकिस्तान के युद्ध की पृष्ठभूमि पर किस काव्य की रचना की?
(क) उजली आग
(ख) परशुराम की प्रतीक्षा
(ग) हारे को हरिनाम
(घ) कुरूक्षेत्र
उत्तर :
(ख) परशुराम की प्रतीक्षा

प्रश्न 28.
महाभारत की कथा पर आधारित दिनकर का कौन-सा काव्य है?
(क) रश्मिरथी
(ख) हुँकार
(ग) कुरूक्षेत्र
(घ) है राम
उत्तर :
(ग) कुरूक्षेत्र।

प्रश्न 29.
सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार के अलावे पड़ता है ?
(क) पोशाक पर
(ख) सड़क पर
(ग) हवाई जहाज पर
(घ) मोटर बनाने पर
उत्तर :
(क) पोशाक पर ।

प्रश्न 30.
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दंतहीन, विघहीन, विनीत, सरल हो ।। — किसके द्वारा रचित है?
(क) प्रसाद
(ख) पंत
(ग) माखनलाल चतुर्वेदी
(घ) दिनकर
उत्तर :
(घ) दिनकर।

प्रश्न 31.
भारतीय संस्कृति पर आधारित दिनकर का कौन-सा ग्रंध है ?
(क) लोकदेव नेहरू
(ख) अर्द्धनारीश्वर
(ग) भारतीय संस्कृति के चार अध्याय
(घ) रेती के फूल
उत्तर :
(ग) भारतीय संस्कृति के चार अध्याय।

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प्रश्न 32.
दिनकर का देहांत कब हुआ?
(क) 24 अप्रैल 1974
(ख) 25 अप्रेल 1975
(ग) 25 अप्रैल 1976
(घ) 25 अप्पैल 1977
उत्तर :
(क) 24 अप्रैल 1974 ।

प्रश्न 33.
दिनकर की साहित्यिक सेवाओं के लिए किस विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की मानद उपाधि दी?
(क) दिल्ली विश्वविद्यालय
(ख) विश्व भारती
(ग) भागलपुर विश्वविद्यालय
(घ) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
उत्तर :
(ग) भागलपुर विश्वविद्यालय।

प्रश्न 34.
निम्नलिखित में से दिनकर की अंतिम काव्य-रचना कौन-सी है?
(क) प्रणभंग
(ख) सीपी और शंख
(ग) हारे को हरिनाम
(घ) दिल्ली
उत्तर :
(ग) हारे को हरिनाम।

प्रश्न 35.
संस्कृति क्या है ?
(क) अच्छे गुण
(ख) सभ्यता के सामान
(ग) अच्छी पोशान
(घ) अच्छी मकान
उत्तर :
(क) अच्छे गुण।

प्रश्न 36.
तबीयत से नंगा होना किसके खिलाफ है ?
(क) सभ्यता के
(ख) संस्कृति के
(ग) कानून के
(घ) सभ्य के
उत्तर :
(ख) संस्कृति के।

प्रश्न 37.
सभ्यता की पहचान है ?
(क) सुख-सुविधा
(ख) दुःख-सुख
(ग) सच-झूठ
(घ) लिखना-पढ़ना
उत्तर :
(क) सुख-सुविधा ।

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प्रश्न 38.
उसे सुसंस्कृत समझाने में कोई उज्ञ (हर्ज) नहीं होना चाहिए – ‘उसे’ से कौन संकेतित है?
(क) लेखक
(ख) आदिवासी
(ग) नगरवासी
(घ) ग्रामवासी
उत्तर :
(ख) आदिवासी।

प्रश्न 39.
प्राचीन भारत में ॠषिगण रहते थे ?
(क) महलों में
(ख) कोठे पर
(ग) जंगलों में
(घ) गाँवों में
उत्तर :
(ग) जंगलों में।

प्रश्न 40.
ॠषिगणण किसका निर्माण करते थे ?
(क) झोपडियों का
(ख) संस्कृति का
(ग) तीर-धनुष का
(घ) बर्त्तनों का
उत्तर :
(ख) संस्कृति का।

प्रश्न 41.
सभ्यता और संस्कृति की प्रगति होती है –
(क) एक साथ
(ख) अलग-अलग
(ग) आगे-पीछे
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) एक साथ ।

प्रश्न 42.
हम घर का निर्माण करते हैं –
(क) सभ्यता की प्रेरणा से
(ख) संस्कृति की प्रेरणा से
(ग) इंजीनियर की प्रेरणा से
(घ) माता-पिता की प्रेरणा से
उत्तर :
(ख) संस्कृति की प्रेरणा से।

प्रश्न 43.
गुस्सा करना मानव की
(क) घृणा
(ख) प्रकृति
(ग) लोभ
(घ) ईर्ष्या
उत्तर :
(ख) प्रकृति ।

प्रश्न 44.
मनुष्य कोशिश करता है कि –
(क) गुस्सा के वश में रहे
(ख) गुस्सा उसके वश में रहे
(ग) लोभ के वश में रहे
(घ) द्वेष के वश में रहे
उत्तर :
(ख) गुस्सा उसके वश में रहे ।

प्रश्न 45.
संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा –
(क) मोटी है
(ख) लंबी है
(ग) महीन है
(घ) खुरदुरी है
उत्तर :
(ग) महीन है ।

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प्रश्न 46.
सभ्यता की अपेक्षा कौन अधिक टिकाऊ है ?
(क) लोभ
(ख) ईष्ष्या
(ग) संस्कृति
(घ) गुस्सा
उत्तर :
(ग) संस्कृति ।

प्रश्न 47.
किसका विनाश आसानी से नहीं किया जा सकता ?
(क) कोध का
(ख) लोभ का
(ग) मोह का
(घ) संस्कृति का
उत्तर :
(घ) संस्कृति का।

प्रश्न 48.
अचानक धनी बन गए व्यक्ति के लिए अंग्रेजी में कौन-सा शब्द है ?
(क) रिच
(ख) जेन्टल
(ग) अपस्टार्ट
(घ) डाउन स्टार्ट
उत्तर :
(ग) अपस्टार्ट ।

प्रश्न 49.
किसकी संस्कृति तुरंत नहीं सीखी जा सकती ?
(क) धनी तथा ऊँचे ओहदे वाले की
(ख) धनी की
(ग) ऊँचे ओहदे वाले की
(घ) इनमें से किसी की नहीं
उत्तर :
(क) धनी तथा ऊँचे ओहदे वाले की।

प्रश्न 50.
निम्न में से हमारी संस्कृति की झलक किसमें होती है ?
(क) पूजा-पाठ
(ख) भजन-कीर्तन
(ग) पढ़ना-लिखना
(घ) पहनने-ओढ़ने
उत्तर :
(घ) पहनने-ओढ़ने।

प्रश्न 51.
निम्नलिखित में से कौन हमारी संस्कृति का उपकरण नहीं है ?
(क) पुस्तकालय
(ख) संप्रहालय
(ग) हवाईअड्डा
(घ) नाटकशाला
उत्तर :
(ग) हवाईअड्डा।

प्रश्न 52.
संस्कृति का स्वभाव है कि वह –
(क) कूपमंडूकता से बढ़ती है
(ख) आदान-प्रदान से बढ़ती है
(ग) बात करने से
(घ) हाथ मिलाने से
उत्तर :
(ख) आदान-प्रदान से बढ़ती है ।

प्रश्न 53.
कौन-सा भाव संस्कृति को ले डूबता है ?
(क) दुनिया से रूठकर अलग बैठना
(ख) नाटक करना
(ग) संम्रहालयों को देखना
(घ) सिनेमागृह जाना
उत्तर :
(क) दुनिया से रूठकर अलग बैठना।

प्रश्न 54.
‘शेली’ किस भाषा के कवि हैं ?
(क) हिन्दी
(ख) अंग्रेजी
(ग) चीनी
(घ) जापानी
उत्तर :
(ख) अंग्रेजी।

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प्रश्न 55.
‘कीदस’ किस भाषा के कवि हैं ?
(क) अंगेजी
(ख) जर्मन
(ग) फ्रेंच
(घ) चीनी
उत्तर :
(क) अंग्रेजी ।

प्रश्न 56.
रवीन्द्रनार्थ ठाकुर किस भाषा के कवि हैं ?
(क) हिन्दी
(ख) संस्कृत
(ग) बंग्ला
(घ) अंग्रेजी
उत्तर :
(ग) बंग्ला ।

प्रश्न 57.
अगर मुसलमान इस देश में नहीं आए होते तो –
(क) भारत आज़ाद नहीं होता
(ख) उर्दू भाषा का जन्म नहीं होता
(ग) लोग गरीब रह जाते
(घ) संगीत लुप्त हो जाता
उत्तर :
(ख) उर्दू भाषा का जन्म नहीं होता।

प्रश्न 58.
भारतीय जाति संसार में सबसे महान है क्योंकि –
(क) यहाँ की संस्कृति में अनेक जातियों की संस्कृतियाँ पची हैं
(ख) यह सबसे अलग-थलग है
(ग) ये अच्छी जाति है
(घ) संसार की अकेली जाति है
उत्तर :
(क) यहाँ की संस्कृति में अनेक जातियों की संस्कृतियाँ पची हैं।

प्रश्न 59.
एक जाति का रिवाज दूसरी जाति का बन जाता है ?
(क) बोझ
(ख) ताकत
(ग) रिवाज
(घ) झगड़े का कारण
उत्तर :
(ग) रिवाज।

प्रश्न 60.
कौन-सी प्रक्रिया संस्कृति की जान है ?
(क) बात-चीत की प्रक्रिया
(ख) अकेले रहने की प्रकिया
(ग) कूपमंड्कुता
(घ) आदान-प्रदान की प्रक्रिया
उत्तर :
(घ) आदान-प्रक्रिया की प्रकिया।

प्रश्न 61.
संस्कृति की रचना में समय लगता है ?
(क) पचास वर्ष
(ख) सौ वर्ष
(ग) सैकड़ों वर्ष
(घ) लाखों वर्ष
उत्तर :
(ग) सैकड़ों वर्ष ।

प्रश्न 62.
कौन-सी संस्कृति ऊँची समझी जाती है ?
(क) जो दुर्गुणों पर विजयी होती है
(ख) जो लोभ का गुलाम होती है
(ग) जो कामवासना के अधीन है
(घ) जो गुस्से के वश में हो
उत्तर :
(क) जो दुर्गुणों पर विजयी होती है।

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प्रश्न 63.
गुस्सा करना मनुष्य की है ?
(क) आदत
(ख) प्रकृति
(ग) स्वभाव
(घ) प्रकृतिदत्त गुण
उत्तर :
(ख) प्रकृति ।

प्रश्न 64.
मनुष्य कोशिश करता है कि –
(क) वह लोभ-मोह के वश में रहे
(ख) कामवासना के अधीन रहे
(ग) गुस्सा उसके वश में रहे
(घ) वह गुस्से के वश में रहे
उत्तर :
(ग) गुस्सा उसके वश में रहे।

प्रश्न 65.
निम्नलिखित में से कौन संस्कृति का अंग है?
(क) संगीत
(ख) कड़क
(ग) पोशाक
(घ) अच्छा भोजन
उत्तर :
(क) संगीत ।

प्रश्न 66.
जीवन जीने की कला है ?
(क) संस्कृति
(ख) सभ्यता
(ग) स्वभाव
(घ) प्रकृतिदत्त गुण
उत्तर :
(क) संस्कृति ।

प्रश्न 67.
संस्कृति को हम निम्न से किसकी मदद से जान सकते हैं ?
(क) सभ्यता
(ख) स्वभाव
(ग) लक्षणों
(घ) प्रकृति
उत्तर :
(ग) लक्षणों ।

प्रश्न 68.
संस्कृति की क्या नहीं दी जा सकती ?
(क) परिभाषा
(ख) लक्षण
(ग) जानकरी
(घ) भेद
उत्तर :
(क) परिभाषा।

प्रश्न 69.
लोभ में पड़ना किसका स्वभाव है ?
(क) क्रषियों का
(ख) मनुष्य का
(ग) सुसभ्य का
(घ) सुसंस्कृत का
उत्तर :
(ख) म्नुष्य का।

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प्रश्न 70.
असल में संस्कृति जिंदगी क्या है ?
(क) तरीका
(ख) छल
(ग) लोभ
(घ) कामवासना
उत्तर :
(क) तरीका।

प्रश्न 71.
जिंदगो की नई धारा किससे फूट निकलती है ?
(क) संस्कृति से
(ख) सभ्यता से
(ग) दो जातियों के , लने से
(घ) दो लोगों के मिलने से
उत्तर :
(ग) दो जातिधो के मिलने से ।

प्रश्न 72.
प्राचीन भारत में वषिगणों की जिंदगी का हिस्सा इनमें से नहीं था ?
(क) पत्तों में खाना
(ख) महलों में रहना
(ग) हिचाकिचाहट नहीं दिखाना
(घ) झोषड़ी में वास करना
उत्तर :
(ख) महलों में रहना।

प्रश्न 73.
निम्नलिखित में से कौन प्रकृति का आवेग नहीं है ?
(क) ईष्य्या
(ख) मोह
(ग) राग
(घ) महलो में रहना
उत्तर :
(घ) महलों में रहना।

प्रश्न 74.
निम्नलिखित में से कौन हमारा पीछा जन्म-जन्मांतर तक करती है ?
(क) संस्कार
(ख) संस्कृति
(ग) सभ्य
(घ) सभ्यता
उत्तर :
(ख) संस्कृति ।

प्रश्न 75.
जिसका जैसा संस्कार है उसका वैसा ही –
(क) स्वभाव होता है
(ख) व्यवहार होता है
(ग) पुनर्जन्म होता है
(घ) विचार होता है
उत्तर :
(ग) पुनर्जन्म होता है।

प्रश्न 76.
संस्कार या संस्कृति असल में शरीर का नहीं बल्कि –
(क) पुनर्जन्म का गुण है
(ख) आत्मा का गुण है
(ग) परमात्मा का गुण है
(घ) रूप का गुण है
उत्तर :
(ख) आत्मा का गुण है।

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प्रश्न 77.
हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ कब तक चलता रहता है ?
(क) सौ वर्षो तक
(ख) पाँच वर्षों तक
(ग) जन्म-जन्मांतर तक
(घ) केवल इसी जन्म तक
उत्तर :
(ग) जन्म-जन्मांतर तक ।

प्रश्न 78.
निम्नलिखित में से कौन हमारी संस्कृति का अंश नहीं है ?
(क) त्योहार मनाना
(ख) कपड़े पहनना
(ग) दोस्ती-दुश्मनी का सुलूक करना
(घ) महलों में रहना
उत्तर :
(घ) महलों में रहना।

पाठ्याधारित व्याकरण :

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WBBSE Class 9 Hindi संस्कृति है क्या? Summary

लेखक परिचय

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि, चिंतक, आलोचक, सफल प्रभावी वक्ता एवं लेखक श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म सन् 1908 में मुंगेर (बेगूसराय) जिले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था। सन् 1932 में इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद इन्होंने जीविका के लिए रजिस्ट्रारी और अध्यापन का कार्य भी किया।

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कई वर्षो तक ये मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष-पद को सुशोभित करते रहे। आगे चलकर ये भागलपुर विश्वविद्यालय के उप-कुलपति पद पर भी रहे। स्वतंत्र भारत में राधाकृष्णन तथा नेहरू की छत्रछाया में ये पार्लियामेंट के सदस्य रहे। इसके साथ ही ये हिन्दी उत्थान और प्रचार-कार्य में भारत सरकार को हार्दिक सहयोग देते रहे।

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दिनकर की रचनाओं का विवरण इस प्रकार हैं –
काव्य-संग्रह : रेणुका, रसवंती, द्वन्द्वगीत, धूप-छाँह, सामधेनी, बापू, इतिहास के आँसू, चक्रवाल, ‘नील-कुसुम’।प्रमुख काव्य : कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, हुंकार, परशुराम की प्रतीक्षा, चक्रव्यूह, आत्मजयी, वाजश्रवा के बहाने।
आलोचना : मिट्टी की ओर।
संस्कृति का इतिहास : संस्कृति के चार अध्याय ।

पृष्ठ सं० – 46

  • लक्षणों = गुणों।
  • अंशों = भागों।
  • भिन्न = अलग।
  • व्याप्त = मौजूद, वर्तमान ।
  • अर्जित = प्राप्त ।

पृष्ठ सं० – 47

  • विनय = नम्रता।
  • सदाचार = अच्छा अचारण।
  • उपकरण = साधन, वस्तु।
  • उज = हर्ज।
  • वास करना = रहना।
  • हिचकिचाहट = शर्म, लज्जा।
  • प्रभाव = असर ।
  • स्थूल रूप = मोटे तौर ।
  • निरंतर = लगातार ।
  • राग = प्रेम।
  • द्वेष = जलन।
  • कामवासना = प्रकृतिदत्त = प्रकृति के द्वारा दिया गया।

पृष्ठ सं० – 49

  • सुलूक = व्यवहार।
  • आदान-प्रदान = लेन-देन।
  • दिवाला = । जलाशय = तालाब।
  • कूपमंडूकता = कुएँ का मेढक बने रहना, अपनी दुनिया को ही पूरी दुनिया समझ लेना।
  • अद्भुत = आश्चर्यजनक।
  • उत्स = स्रोत।
  • सुधारक = सुधार करने वाले।

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पृष्ठ सं० – 50

  • रिवाज = रीति, नियम।
  • जज्ब = आत्मसात करना, पचाना।
  • समन्वय = सामंजस्य, ताल-मेल।

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Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and रचना भाव विस्तार to reinforce their learning.

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प्रश्न : भाव-पल्लवन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
किसी उक्ति, विचार अथवा वाक्य के मूलभाव को विस्तार के साथ समझाकर लिखना भाव-पल्लवन कहलाता है । कभी-कभी थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह दिया जाता है । इसी को ‘गागर में सागर’ भरना कहते हैं। इसी प्रकार की संक्षिप्त सटीक अभिव्यक्ति को विस्तार से प्रस्तुत करना ही भाव-पल्लवन है । मूलभाव को समझाने के लिए किसी उदाहरण, सहायक भाव, धारणा आदि का खण्डन या मण्डन करने के लिए भाव-पल्लवन का उपयोग करते हैं । इसमें मूलभाव की संदर्भगत संगति तथा निहितार्थ का विवेचन करने से भाव-पल्लवन की रचना का शिक्षण होता है। अन्त में सम्पूर्ण विचार में स्थित निहितार्थ या प्रेरणा संदेश लिखा जाता है। भाव-पल्लवन में भाषा, वाक्य गठन और शैलो का विशेष महत्व है। “होनहार बिरवान के होत चीकने पात”-जैसे गम्भीर अर्थ भरे कथनों का भाव-पल्लवन करा कर, शिक्षार्थियों को संक्षेप में कहीं गई किसी गम्भीर उक्ति या विचार को परत-दर-परत खोलना सिखाना भाव-पल्लवन शिक्षण कहलाता है ।

प्रश्न : भाव-पल्लवन के लिए किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
भाव-पल्लवन एक कला है । इसके लिए भाषा-ज्ञान की अपेक्षा होती है। विश्लेषण, तर्क-वितर्क और उचित निर्णय के बिना भाव-पल्लवन या भाव-विस्तार नहीं आ सकता। इसमें प्रारम्भ से ही अपनी बात खोलकर कहनी पड़ती है । प्रत्येक अंश को समझा-समझाकर कहना पड़ता है। नीर-क्षीर विवेक का प्रदर्शन करना पड़ता है और गुम्फित वाक्यों को तोड़कर सरल शब्दावली प्रस्तुत करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में छात्रों के लिए उपर्युक्त बातों पर ध्यान देना आवश्यक है ।

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प्रश्न : निम्नांकित पंक्तियों में निहित भाव का भाव-पल्लवन करें ।

1. ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ ।
(माध्यमिक परीक्षा – 2010)
उत्तर :
आधी भरी गगरी छलकती जाती है, परन्तु पूर्ण भरी गगरी नहीं छलकती है। तात्पर्य यह है कि अपूर्ण या कम ज्ञान बड़ा ही अस्थिर होता है, परन्तु विद्वान व्यक्ति में कभी अस्थिरता नहीं होती। समुद्र में कभी बाढ़ नहीं आती, परन्तु छांटी-छोटी नदियाँ तनिक भी वर्षा में उफनने लगती हैं। अल्प ज्ञान वाला व्यक्ति बना बनाया काम भी नाकामयाब कर देता है, परन्तु धैर्यवान, गम्भीर एवं विद्वान व्यक्ति सहज ही सफल हो जाते हैं। इसलिए अंग्रेजी में कहावत भी है कि कम ज्ञान सदा खतरनाक होता है । जीवन की पूर्णता अधूरा ज्ञान अर्जन में नहीं है, बल्कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में है। दिखावा या अपनेआप को प्रदर्शित करने से व्यक्ति हल्का हो जाता है, इसलिए ही तो कहा गया है कि अधजल गगरी छलकत जाय।

2. चोर की दाढ़ी में तिनका
(माध्यमिक परीक्षा – 2009)
उत्तर :
जो लोग दोषी होते हैं, वे क्षुब्ध और सशंकित होते हैं । इसलिए समय और परिस्थिति के साथ उनका मानसिक और स्वाभाविक संतुलन नहीं हो पाता है और वे पहचान लिए जाते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति का मुखमंडल उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दर्पण होता है, जिसमें उसके सम्पूर्ण जीवन प्रक्रियाएँ छाया के रूप में दिखाई पड़ती हैं। उसकी आत्मिक अशांति के कारण ही उसका चित्त अस्त-व्यस्त हो जाता है जिससे वह इतना अधिक प्रभावित हो जाता है कि अपने दुर्गुणों को स्वयं व्यक्त कर देता है।

3. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
(माध्यमिक परीक्षा – 2008)
उत्तर :
मनुष्य की मानसिक शक्ति वास्तव में उसकी इच्छा-शक्ति पर निर्भर करती है । मन के हारने पर ही मनुष्य हार जाता है तथा मन के जीतने पर मनुष्य जीत जाता है । मनुष्य की हार-जीत वास्तव में मन के अंदर ही निहित होती है। प्रबल इच्छा शक्ति के द्वारा मनुष्य एक बार मृत्यु को भी टाल सकता है । बुद्धिमान व्यक्ति हमेशा आशा का दामन पकड़े रहता है तथा मन को हारने नहीं देता। विषम परिस्थितियों में भी अपना कार्य करते रहना तथा दृढताापूर्वक हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करना ही मनुष्य को महान बनती है ।

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4. अधिकार खोकर बैठ रहना यह महादुष्कर्म है
(मॉडल प्रश्न – 2007)
उत्तर :
मानव-जोवन में अधिकार एवं कर्त्तव्य दोनों साथ-साथ जीते व मरते हैं। अधिकार विरत होकर जीना, कोई जीना नहीं है। अधिकार का समानार्थी शब्द स्वाभिमान और आत्मशक्ति है। जहाँ अधिकार बोध है, वहीं स्वाभिमान भी है। अपन अधिकारों से वंचित रहना आत्म-गौरवहीनता का सूचक है। अतएव हमें अपने अधिकारों के रक्षार्थ जान तक की भी बाजी लगा देनी चाहिए । अधिकारों के प्रति सजग न रहने पर स्वेच्छारिता, निरकुशता तथा अन्याय की प्रवृक्ति सशक्त होती है । त्याग, तप और शान्ति के नाम पर अधिकार खोकर जीवित रहना, मृत्यु वरण करने के समान है। दिनकर के शब्दों में – छीनता है, स्वप्न कोई और तू, त्याग तप से काम ले, यह पाप है।

5. मानव का परिचय मानवपन
(मॉडल प्रश्न – 2007)
अथवा,
मनुष्य मात्र बन्धु है, यही बड़ा विवेक है
(माध्यमिक परीक्षा – 2013)
उत्तर :
इस संसार में अनेक प्रकार के जीवन हैं। सभी जीवों में मानव अपने बुद्धि के बल पर श्रेष्ठ माना जाता है सामान्य रूप से जो मनुष्य योनि में जन्म लेता है उसे मानव कहा जाता है । लेकिन वास्तव में वही मनुष्य मानव कहलाने का अधिकारी है जिनमें मानवता की भावना निहित होती है। अतः हमें अपने प्रेमभाव को और आत्मीयता को सभी मानव के बोच बॉंटना चाहिए। मानव समाज में सहयोग, परोपकार और सौहार्द्ध के भावना से देवतुल्य बन जाता है। मानव का परिचय उसकी जाति, धन और कुटुम्ब नहीं होता बल्कि उसका मानवपन ही होता है।

6. मनुष्य बन, मनुष्य के गले-गले मिले चलो ।
उत्तर :
मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। वह चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ है । मनुष्यता उसका आभूषण है। मानव योनि में जन्म लेकर भी अगर वह मानवीय गुणों से युक्त नहीं है, तो वह मानव कहलाने का अधिकारी नहीं होता। दया, धर्म, क्षमा, परोपकार, पर दुःख कातरता, श्रद्धा, सहानुभूति, सेवाभाव, कृतज्ञता, ममता, पारस्परिक प्रेम आदि गुणों को धारण करने के कारण ही वह श्रेष्ठ माना जाता है। मानव का यह पुनीत कर्म और धर्म है कि वह मानवीय गुणों से अपने को युक्त कर सच्चा मानव बनने का प्रयत्न करे। सदुगुणों को धारण कर मानव-मानव के बीच पारस्परिक प्रेम की गंगा बहाकर, एक-दूसरे को पेम की डोर में इस प्रकार बाँधने का कार्य करें कि ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, ऊँच-नीच, अमीरगरीब आदि का भेदभाव संसार में उत्पन्न ही न होने पाये। सभी लोग एक ही परमपपिता की संतान हैं। अतः विश्चिन्धुत्व वसुधैव कुटुम्बकम् की अविरल धारा सबके हुदय में समानरूप से प्रवाहित हो, इसके लिए सचेष्ट रहे । एकता, अखंडता, भाईचारे की यह भावना ही इस संसार को स्वर्ग का पर्याय बना सकती है।

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7. “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।”
अथवा,
“रहिमन यह तन सूप है लीजै जगत् पछोर”
उत्तर :
सज्जन व्यक्ति ज्ञानी की भाँति गुणग्राही (तत्व ग्राही) होता है । जिस प्रकार सूप हल्के तत्त्व-हीन छिछले एवं गन्दगी को दूर उड़ा देता है, और गुणकारी पदार्थ अपने पास रख लेता है, ठीक उसी प्रकार संत लोग (सज्जन-व्यक्ति) गुणों एवं अवगुणों से भरे हुए इस संसार से गुणों को ग्रहण कर अवगुणों को छोड़ देते हैं । संत लोग हंस की तरह नीरक्षीर विवेकी होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यदि हंस के सामने जल मिश्रित दूध रख दिया जाय तो वह दूध को ग्रहण कर लेता है, और जल को छोड़ देता है ।
तुलसीदास जी ने लिखा है ।

जड़-चेतन गुण-दोष मय, विश्व कीन्ह करतार ।
संत-हंस गुण गहहिं पय, परिहरि वारि विकार ।।

8. “मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे” ”
अथवा,
“अपने सुख को विस्तृत कर लो जग को सुखी बनाओ”
(माध्यमिक परीक्षा – 2011)
अथवा,
“परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर”
उत्तर :
संसार में मनुष्य के सम्मुख सुख-दुःख, लाभ-हानि इत्यादि स्थितियाँ सदैव आती रहती हैं। इन स्थितियों का सामना करते वक्त अनेक बार उसे दूसरों से सहायता की आवश्यकता पड़ती है, ऐसे समय में जो दूसरों को सुख देकर उसका भला करता है, तो इससे बढ़कर धर्म का कार्य और कुछ नहीं है । इसके विपरीत अनेक बार व्यक्ति दूसरों को अनायास ही कष्ट देकर उसे और दु:खी बनाता है, अथवी कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो दूसरों को कष्ट देकर स्वयं आनन्दित होते हैं। ऐसा करना सबसे बड़ा पाप है ।

अतः ठीक ही कहा गया है कि यदि मनुष्य दूसंरौ की भहलाई मे बलारद्धता है, वद्वी वास्तव में आस्तिक है । ईश्वर उसी की सहायता करते है, जो दूसरों की सहायता करते हैं ऐऐसे लोगों को सांसारिक सुख भी सहजता से उपलष्ध हो जाते हैं, इसके विपरीत दूसरों को सताने वाला स्वयं अनेक विपसियों को निमेंत्रण देता है । क्योंकि मनुष्य सदैव अपने कर्म का फल स्वयं भुगतता है। कहा भी गया है –
कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि से तस फल धाखा ।
इसीलिए मनुष्य को सदैव दूसरो का छपकार करना याधिए।

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9. हम बढ़े छधर कि जिधर सूस्ष्र बौ यु्रार ।
उत्तर :
जिस देश की भूमि पर हम घन्म लिए हैं और जिसकी रज में लोट-लोट कर हम बड़े हुए हैं अथवा जिसके । राष्प्र के संकाट के समब्ब राष्ट्र की रक्ष के सिए यदि हम अनने अस को यैस्धाषर नहीं करते हैं, तो हमारा जीवन जौना धिक्कार है तथा हम अपने देश के लिए भार स्वस्रूप हैं। इस संघ्य मे गोषाल प्रसाद ‘घ्यास’ जो कहते है कि-
वह खून कहो किस मवलन का, जिसमें छबखा्ल का भाम नहीं ।
वह खून कहो किस मतलब क्वा, आा सके देश के काम नहीं ।।

10. निज भाषा उन्नवि अहै, सब छन्नति को मूल ।
उत्तर :
कविवर भारतेन्दुजी की यह ठक्ति सर्षमान्य्य है कि अपनी मातृभापा की उन्नति एवं प्रगति में ही हमारे चतुर्दिक विकास का मूल मन्त्र क्षिपा हुआ है। अपनी मातृभाषा के साथ हमारा अत्यधिक गहरा लगाव है। यही भाषा हमारी संस्कृति परम्परा, जातीय इतिहास और अप्नी परिवेश की ठवज मानी जाती है । अपनी ही भाषा में हमारी संस्कृति बोलती है । परम्मा सांस लेती है और जातीय गौरव छंसता रहता है ।

यही भाषा हमारे मन एवं मस्तिष्क, द्वृय तथा चेतना को अनुकूल तथा स्वाभाविक खुराक देकर हमें सही उन्नति का मार्गदर्शन कराती है और हमारे ऊपर ऐतेहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, पारिवारिक तथा सामाजिक संस्कार का सही छाप छोड़ती है। इसी से हमारी अभिर्यक्ति स्वाभाविक स्वरूप पाती है। इसी से हमारे मन और प्राण को स्वाभाविक खुराक मिलती है। इसके विपरीत विदेशी भाषा व संस्कृति का अनुकूल प्रभाव हमारे मन पर कभी पड़ ही नहीं सकता । क्योंकि उसमें दूसरे देश की इतिहास और परम्परा होती है । इसलिए उसमें आत्मीयता का अभाव होता है । अत: हमें अपनी मातृभाषा से ही उन्नति का मार्ग प्राप्त हो सकता है।

11. करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान
उत्तर :
लगातार परिश्रम करते रहने से व्यक्ति को अवश्य सफलता मिलती है । इसीलिए केवल दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। यदि हम संकल्प कर लेते है कि हमें यह कार्य करना है तो हमारा वह कार्य अवश्य पूरा होगा, क्योंकि दृढ़ संकल्प के पश्चात् ही व्यक्ति सफल होने के लिए लगातार परिश्रम करेगा। लगातार कोई भी काम करते रहने से मनुष्य अवश्य सफल होता है । अतः सफल होने के लिए परिश्रिम करना अत्यंत आवश्यक होता है । कहा जाता है –

यदि व्यक्ति दृढ़ प्रतिज होकर कोई कार्य आरंभ करता है, तो माना जाता है कि उसका आधा काम पूरा हो गया और आधा काम परिश्रम के बल पर पूरा हो जाता है । इसके विपरीत दो नाव पर सवार व्यक्ति कभी पार नहीं पहुँच सकता है। इसी प्रकार अव्यर्वस्थित चित्त वाले मनुष्य की सफलता में सदा संदेह रहता है ।

अत: सब ‘तज हरि भज’ का अनुसरण करके सफलता प्राप्ति के हेतु व्यक्ति को लगातार परिश्रम करते हुए कार्य में संलग्न होना चाहिए। सफलता उसके चरण चूमेगी ।
आभरण निज देह का बस ज्ञान का भंडार है ।
हार को हीरा कहे उस बुद्धि को धिक्कार है ।

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12. अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत
अथवा,
का बरषा जब कृषि सुखाने
उत्तर :
मनुष्य-जीवन मे यदा-कदा ऐसे क्षण आया-जाया करते हैं, जिसका सदुपयोग न कर पाने की कसक जीवन भर पीड़ित बनाया करती है । बीता हुआ क्षण पुन: लौट कर नहीं आता है । सुनहरे अवसर बार-बार नहीं मिलते । अत: चतुर एवं कर्मठ व्यक्ति ऐसे अवसरों को हाथ से नही जाने देना चाहते । उसकी आहट के लिये वे हर समय सतर्क एवं सजग रहते हैं और अवसर के आते ही वे उसका लाभ उठाने से नहीं चूकते । सच कहा गया है – ‘ का वर्षा जब कृषि सुखाने’ — फसल के सूख जाने पर यदि वृष्टि होती है तो उससे कोई लाभ नहीं होता। पष्योयों ने पकी फसल के दाने चुन डाले और उसके बाद किसान सुरका के उपाय करल है तो उससे बुगे हुए दाने वापस नहों भिलने । फसल की सुरक्षा के उपाय पहले से ही करने पड़ते हैं। जीवन में सफलता प्राप्ति का सरलतम उपाय यही है कि अवसर को पहचान कर उसका सदुपयोग किया जाय ।

13. निन्दक निबरे राखिये, आँगन कुटी ह्वाव
उत्तर :
मनुष्य स्वभाष से आत्म-प्रशासा-प्रिय होता है । अपने सम्बन्ध में औरों के द्वारा की गई प्रशंसा उसे आनन्द और उल्लास ग्रदान करती है । यह मानवीय कमजोरी है कि अपनी निन्दा भी नहीं सुताती, कह अरशः सत्य ही क्यों न हो । दूसरी और प्रशंसा चाहे कैसी भी क्यों न हो उसे इतनी अच्छी लगती है कि कह अनहित को हित और शत्रु को भो मित्र समझने लगता है । मिथ्या प्रशंसा से अभिदूतत हो उठने वाले की विवेक शक्कि कुज्ठित हो जाती है और वह भलेबुरे की पहचान खो वैठता है। ऐसे लोगों के परतन रव विनाश का मार्ग सहज ही हुल आता है।

मिथ्या प्रशंसा सुन-सुन कर व्यक्ति अपनी मानसिक तथा चारित्रिक कमओरिवो की और ध्यान नहीं दे पाता और वही प्रवृष्ति धातक सिद्ध होती है। अतः निन्दको की उपेक्षा न करके उनकी बातों पर गम्भीरता से विचार करना ही वुद्धिभानी है । यदि उनमें सच्चाई हो तो उनका स्वागत करना चाहिए और जिन बुराइयों की और निन्दक ने संकेत किया हो उन्हें दूर कर अपने व्यक्तित्व को शुद्ध एवं स्वस्थ बनाना चाहिए ।

निन्दकों की कृपा से ही हम अपनी त्रुटियों को जान पाते हैं । इसलिए कबीर जैसे सन्त पुरुष ने सलाह दो है कि निन्दक को अपने ही निकट शरण देनी चाहिए, ताकि बिना साबुन और पानी के ही आचरण शुद्ध हो सके। प्रशंसा के अहितकर प्रभाव से स्वयं को बचाकर निन्दा के कल्याणकारी पक्ष का स्वागत ही व्यक्ति के चरित्र को विकास की सही दिशा प्रदान कर सकता है।

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14. जहाँ चाह, वहाँ राह
उत्तर :
इच्छा-शक्ति मनुष्य के लिए दैवी वरदान है, जो मानव-स्वभाव का अभिन्न अंग है । मनुष्य आशाआकांक्षाओं की प्रेरणा से ही जीवन को गति प्रदान करता है । यदि मन में सच्ची लगन पैदा हो जाती है तो सफलता की प्राप्ति में कोई सन्देह नहीं रह जाता । जहाँ चाह होती है वहाँ राह अपने-आय उभर जाती है । आकाश झुक जाता है, पर्वतों में दरारें पड़ जाती हैं तथा सागर की छाती सूखने लगती है । प्रबल इच्छा-शक्ति का वेग आँधी-तूफान के वेग को भी शान्त और शिथिल बना देता है। प्रत्येक परिश्रमी, कर्मठ तथा कांतिकारी व्यक्तित्व प्रबल इच्छा की ही देन है। स्वर्ग से धरती पर गंगा को उतारने वाले भगीरथ हों, समुद्र की उफनती लहरों पर सेतु रचना करने वाले राम हों अथवा हँसते हुए सूली पर चढ़ जान वाले ईसा मसीह हों, सबमें अद्भुत इच्छा शक्ति थी।

15. दैव-दैव आलसी पुकारा
उत्तर :
आलस्य मानव-स्वभाव की ऐसी निकृष्ट विकृति है जो उसे सर्वथा अकर्मण्य बना देती है। आलसी व्यक्ति सदैव परमुखापेक्षी तथा दूसरों की कृपा-करुणा का आकांक्षी बना रहता है । उसके विकास के सारे मार्ग अवरुद्ध होते है तथा वह निरन्तर मानसिक ग्रंथियों एवं कुण्ठाओं से ग्रस्त रहता है । जीवन के वास्तविक उल्लास से वंचित होकर वह जीवित होते हुए भी मृतक के समान बन जाता है । आलस्य के दुष्मभाव को ध्यान में रखकर संस्कृत की एक सूक्ति में आलस्य को मनुष्य का परम शत्रु कहा गया है – “आलस्यं हि मनुष्यानां शरीरस्थो महान रिपु :”।

आलस्य की प्रवृत्ति व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के लिए एक समान घातक है, यह व्यक्ति की सम्पूर्ण कार्यक्षमता को जहरीली नागिन की तरह डँस लेती है । आलसी व्यक्ति की बुद्धि एवं विवेक शक्ति मन्द हो जाती है, उसका पौरुष-पराक्रम नष्ट हो जाता है तथा उसकी समस्त इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं, वह एक मद्धप की भाँत निष्किय बन जाता है । साधारणतः ऐसे व्यक्ति भाग्य और भगवान के भरोसे संत मलूक दास की पंक्तियाँ दुहराते रहते हैं-

“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम ।
दास मलूका कह गये सबके दाता राम ।।”

16. बड़े न हूजे गुनन बिन विरद बड़ाई पाय
उत्तर :
बड़पन के अभाव में कोई बड़ा नहीं बन सकता । चादुकारों की प्रशंसा अथवा निष्ठा प्रदर्शन से किसी व्यक्ति को बड़ाई मिल सकती है, बड़पन नहीं । खून लगाकर शहीद बनने वाले तथा भस्म लगाकर साधु बनने वाले ढोंगी कदमकदम पर मिल जाते हैं, किन्तु सच्चा शहीद अथवा सच्चा साधु तो लाखों में कोई एक होता है। भारत के राष्ट्रापिता गांधी के शरीर पर साधारण खादी की मोटी धोती थी तथा वे कोई धनवान अथवा उच्च पदासीन राजकीय अधिकारी न थे, किन्तु उन्हें विश्व के महान् पुरुषों में गिना जाता है। इसका एकमात्र कारण है आचार-विचार की पवित्रता तथा उच्चता । परोपकार, अहिंसा, करुणा, प्राणिमात्र के प्रति स्नेह, क्षमशीलता, स्वार्थत्याग, विनम्मता आदि एसं महान् गुण हैं, जिन्हें अपनाकर ही मनुष्य महान् बन सकता है । महानता गुणों की होती है, नाम की नहीं । मनुष्य के कार्य उसे महान् बनाते हैं, बातें नहीं ।

17. अधजल गगरी छलकत जाय ।
उत्तर :
आधी भरी गगरी छलकती जाती है, परन्तु पूर्ण भरी गगरी नहीं छलकती है । तात्पर्य यह है कि अपूर्ण या कम ज्ञान बड़ा ही अस्थिर होता है, परन्तु विद्वान व्यक्ति में कभी अस्थरता नहीं होती। समुद्र में कभी बढढ़ नहीं आती, परन्तु छोटी-छोटी नदियाँ तनिक भी वर्षा में उफनने लगती हैं। अल्प ज्ञान वाला व्यक्ति बना बनाया काम भी नाकामयाब्ब कर देता है, परन्तु धैर्यवान, गम्भीर एवं विद्वान व्यक्ति सहज ही सफल हो जाते हैं। इसलिए अंग्रेजी में कहावत भी है कि कम ज्ञान सदा खतरनाक होता है । जीवन की पूर्णता अधूरा ज्ञान अर्जन में नहीं है, बल्कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में है । दिखावा या अपने-आप को प्रदर्शित करने से व्यक्ति हल्का हो जाता है, इसलिए ही तो कहा गया है कि अधजल गगरी छलकत जाय।

18. जितेन्द्रियता चरित्र बल की कुंजी है ।
उत्तर :
‘जितेन्द्रिय’ का अर्थ है ‘अपनी इन्द्रियों को वश में रखना’ और इन्द्रियों को वश में रखकर ही चरित्र बल को उत्तम बनाया जा सकता है । चरित्र-बल मानव जीवन का प्रमुख अंग है। शारीरिक बल के नष्ट हो जाने पर उसे फिर से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन चरित्र बल नष्ट हो जाने पर उसे कभी भी जीवन में प्राप्त नही किया जा सकता है । चरित्रहीन व्यक्ति को समाज में कभी भी सम्मान प्राप्त नहीं होता । अतः प्रत्येक मनुष्य को अपने इन्द्रियों को वश में रखकर अपने चरित्र को उत्तम बनाना चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में व्यक्तियों में सद्गुणों का आना असंभव है। अत: यह सष्ट है कि जितेन्द्रियता ही चरित्र बल की कुंजी है ।

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19. नर हो, न निराश करो मन को ।
उत्तर :
कवि मनुष्यों से यह कहना चाहते हैं कि आप मनुष्य होने के कारण वीर-साहसी, बुद्धिमान एवं कर्मशील भी हैं । आप निराश न होकर अपने कर्मपथ पर चलते रहिए । सदियों पुराने इतिहास में यह बताया गया है कि निराशा को त्यागकर मनुष्य ने जब जो कुछ चाहा वह उसे अवश्य मिला है । इसलिए यदि किसी कारणवश आप सफल नहीं हो रहे हैं, तो काई बात नहों, अभी भी निराशा को छोड़कर कर्त्तव्यपथ पर डटे रहिए सफलता अवश्य मिलेगी । सच ही कहा गया है कि –
प्रयत्नेन कार्य सुसिद्धिर्जनानाम्, प्रयत्नेन सद्बुद्धि वृद्धिर्जनानाम् ।
प्रयत्नेन युद्धेजयः स्याज्यनानाम्, प्रयत्नेन विधेयः प्रयत्नेनविधेय ।

20. “जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान ।”
(माध्यमिक परीक्षा – 2012)
उत्तर :
असताष के कारण आज कई सामाजिक कुरीतियाँ और दुराचरण मानव-समाज में घर कर गए हैं। इच्छाओं का दास बनकर नारी अपना तन, पुरूष अपना स्वाभिमान और ईमान बेच रहे हैं। बेटे बेचे जाते हैं, बहुएँ जलाई जाती हैं। मनुष्य और अधिक पाने की लालसा में भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूब गया है । धर्म हो या राजनीति हर क्षेत्र में भष्टाचार है । इसलिए ज्ञानियों, विद्वानों तथा सज्जनों का यह कथन ठीक ही प्रतीत होता है कि ‘जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरि समान’। अर्थात् सन्तुष्ट व्यक्ति के लिए सभी तरह के धन धूल-माटी के समान व्यर्थ होकर रह जाया करते हैं। जो व्यक्ति अपने को नाना प्रकार को बुराइयों से बचाकर रखना चाहता है, उसे केवल संतोष रूपी धन ही अर्जित करना चाहिए ।

21. “दे मन का उपहार सभी को, ले चल मन का भार अकेले ।”
(मॉडल प्रश्न – 2011)
उत्तर :
संसार में मनुष्य के सम्मुख सुख-दु:ख, लाभ-हानि इत्यादि स्थितियाँ सदैव आती रहती हैं । इन स्थितियों का सामना करते वक्त अनेक बार उसे दूसरों से सहायता की आवश्यकता पड़ती है, ऐसे समय में जो दूसरों को सुख देकर उसका भला करता है, तो इससे बढ़कर धर्म का कार्य और कुछ नहीं है । इसके विपरीत अनेक बार व्यक्ति दूसरों को अनायास ही कष्ट टेकर उसे और दुःखी बनाता है, अथवा कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो दूसरो को कष्ट देकर स्वयं आनन्दित होते हैं। ऐसा करना सबसे बड़ा पाप है ।

अत: ठीक ही कहा गया है कि यदि मनुष्य दूसरों की भलाई में लगा रहता है, वही वास्तव में आस्तिक है। ईश्वर उसी की सहायता करतं हैं, जो दूसरों की सहायता करते हैं। ऐसे लोगों को सांसारिक सुख भी सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं, इसके विपरीत दूसरों को सताने वाला स्वय अनेक विर्पत्तियों को निमंत्रण देता है। क्योंकि मनुष्य सदैव अपने कर्म का फल स्वयं भुगतता है । कहा भी गया है – ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।’ इसीलिए मनुष्य को सदैव दूसरों का उपकार करना चाहिए।

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22. ‘गतिशीलता ही जीवन है ।’
(मॉडल प्रश्न – 2011)
उत्तर :
इस क्षणभंगुर संसार की प्रत्येक वस्तु, चाये वह जड़ हो, या चेतन, परिवर्तनशील है। परिवर्तन या गतिशीलता का ही दूसरा नाम संसार है । यदि संसार में गति न हो तो मानव ऊब उठे। सुख-दुःख की धूप एवं छाया में संसार उठताबैठता है । परिवर्तन की महिमा का कहाँ तक वर्णन किया जाय । एक दिन भारत विश्वगुरु था, इसे ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। परतु आज भारत न सोने की चिड़िया है न विश्वगरु । इसी का नाम तो गतिशीलता है । यह परिवर्तन का क्रम सृष्टि में अनवरत रूप से चलता रहता है । कवि पंत ने संसार की इस गतिशीलता पर कहा है –
” आह रे, निष्ठुर परिवर्तन !
एक सौ वर्ष, नगर उपवन, एक सौ वर्ष विजन-वन
यही तो है संसार असार, सुजन, सिंचन, संहार !’’