WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 3 नीड़ का निर्माण फिर-फिर

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WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 3 Question Answer – नीड़ का निर्माण फिर-फिर

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 : ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 2 : ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ पाठ की सार्थकता स्पष्ट करते हुए सृष्टि के प्रति कवि की भाव्यनाओं को स्पए कीजिए।
अथवा
प्रश्न 3 : ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता के माध्यम से कवि ने क्या संदेश देना चाहा है?
अथवा
प्रश्न 4 : ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता के आधार पर कवि के जीवन-दर्शन को लिखें।
अथवा
प्रश्न 5 : ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता के उदेश्य को लिखें।
अथवा
प्रश्न 6: ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर :
हरिवश राय बच्चन की सम्पूर्ण कविता की रीढ़ उनकी जीवनी-शक्ति है। जीवन के संघर्षों, दु:खों, तथा निराशा का मात देनेवाली है। सर्वथा अजेय, अपराजित तथा अद्भुत होते हुए भी जमीन से जुड़ी हैं, न कि कल्पना से। बच्चन की कववताएँ सघर्षों से जूझते, निराशा के काले बादलों के बीच घिर आए व्यक्ति में प्राण का संचार करती है, उसे जीवन जीन के लिए प्रोत्साहित करती है। यही कारण है कि बच्चन को ‘मस्ती का कवि’ भी कहा जाता है।

काव प्रकृति के माध्यम से कहते है कि एक दिन अचानक आँधी आने से आकाश में अंधेरा छा गया । पूरी धरती धूल सं अट गई : दिन में ही रात का आभास होने लगा । फिर काली रात्रि भी आई और ऐसा लगने लगा मानों अब कभी सवेरा न होगा । टर असल कविता की इन पंक्तियों में कवि ने अपनी पत्नी श्यामा की असमय मृत्यु से जीवन में अचानक घिर आई निराशा का चित्रण किया है।

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रात्रि में होंन वाले उत्पात की कल्पना करके ही लोग भय से सिहर उठे, प्रकृति का कण-कण डर गया। तभी पूरब से ऊषा का मोहिनी मुस्कान से लोगों का भय दूर हो गया उनके दिल खिल उठे। कवि ने यह अनुभव किया कि जिस प्रकार ग्रकृति में हमेशा दिन या रात नहीं होती ठीक वैसे ही हमेशा सुख या दुख नहीं रहता है। इनके आने-जाने का क्रम तो लगा हो रहना है ! अगर एक बार नीड़ उजड़ भी गया तो क्या, हमें स्नेह और प्रेम का सहारा लेकर उसका निर्माण फिर से करने मे जुट जाना चाहिए।

कवि कहते हैं कि अचानक बहने वाली बयार के तेज झोंके से भौम की तरह शरीर धारण करने वाले विशालकाय ग्ड़ भी जड़ से उखड़ कर गिर पड़े। जब बड़े-बड़े वृक्षों का यह हाल हुआ तो न जाने तिनके से बने घोंसलों पर क्या न बीती होगी । इंट और पत्थर के महल भी डगमगाने लगे जब बयार के साथ कंकड़ों की बौछार उन पर होने लगी। कहने का भाव यह है कि जोवन में ऐसे भी क्षण आते हैं जब विभिन्न प्रकार के संघातों, चोटों को सहन करना पड़ता है तथा आशारूपी बंड -बड़े महल भी हिल जाते हैं। लेकिन हमेशा ये स्थिति रहनेवाली नहीं है और अच्छे दिन भी आएंगे।

अभ्य जीवन में चारों ओर निराशा के बादल छाए हुए थे तब न जाने यह आशारूपी पक्षी कहाँ छिपा हुआ था। यही वह पक्षी है जां आकाश की ऊँचाइयों पर गर्व से अपना सीना ताने इस विषम परिस्थिति में खड़ा रहता है। यह आशारूपी पक्षी हौ है जो हमें यह संदेश देता है कि विषम परिस्थितियों से न घबड़ा कर हमें पुन: जीवन को संवारने में लग जाना चाहिए। विषम परिस्थितियों में भी वह आशा ही है जो हमें जोने का संदेश देती है। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कोधित त्राकाश के वज दानों के बीच ऊषा मुस्कुराती ? क्या बादलों के भयंकर गर्जनों के बीच चिड़ियों के कंठ से संगीत फूटने?

इस संसार में जीवन जीने में आशा और आत्मबल की बहुत बड़ी भूमिका है। आशा और आत्मबल के सहारे एक छोटी-सी चिड़िया विनाश के बाद भी चोंच में तिनका दबाकर फिर से नौड़ के निर्माण में लग ज्ञाती है। उराके साहस और उसकी आशा के सामने शक्तिशाली पवन भी नहीं उहर पाता । चिड़िया उसे भी नीचा दिखाती है।

कविता के अंतिम अंश में कवि बच्चन ने हमें यह संदेश देना चाहा है कि नाश में निर्माण के बीज किपे होते हैं इसालिए हमें प्रकृति की विनाश-लीला से घबराना नहीं चाहिए। नाश के दुःख से कभी भी निर्मांग का काम नहीं रूकता। जब विनाश-लीला से प्रकृति स्तब्ध रह जाती है – कहीं कोई आवाज नहीं सुनाई देती – सय अंर निस्तब्यता छा जातो है तो सृष्टि का संगीत प्रारंभ होता है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि बच्चन की कविता ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ प्राणदायिनी कविता है जो निराशा में डूबे व्यक्ति के लिए सजीवनी के समान है।

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
चिड़िया चोंच में क्या लिए हुई थी ?
उत्तर :
चिड़िया चोंच में तिनका लिए हुई थी।

प्रश्न 2.
पेड़ दूटकर गिरने का क्या कारण था ?
उत्तर :
भयंकर तूफान ही पेड़ के टूटकर गिरने का कारण था।

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प्रश्न 3.
सहसा अंधेरा क्यों छा गया ?
उत्तर :
तेज आँधी के आ जाने से सहसा अंधेरा छा गया।

प्रश्न 4.
चिड़िया चोंच में तिनका लेकर क्या सिद्ध करना चाहती है?
उत्तर :
चिड़िया चोंच में तिनका लेकर यह सिद्ध करना चाहती है कि नाश के दुःख को छोड़कर हमें पुन निर्माण के कार्य में लग जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
जब दिन में रात की तरह अँघेरा छा गया तब क्या लग रहा था?
उत्तर :
दिन में रात की तरह अँधेरा छा जाने से ऐसा लग रहा था मानो अब कभी दिन नहीं होगा।

प्रश्न 6.
लोग किसके कारण भयभीत हो गए?
उत्तर :
लोगों को लग रहा था कि अब इस निशा का अंत नहीं होने वाला है तथा रात्रि के अंधेरे में बुरी ताकतों का जो उत्पात होगा, उसकी कल्पना करके ही लोग भयभीत हो गए।

प्रश्न 7.
प्राची (पूरब) से किसकी मोहिनी मुस्कान दिखाई पड़ी?
उत्तर :
प्राची से ऊषा की मोहिनी मुस्कान दिखाई पड़ी।

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प्रश्न 8.
कवि किसका आह्वान बार-बार करना चाहते हैं?
उत्तर :
कवि नेह का आह्लान बार-बार करना चाहते हैं।

प्रश्न 9.
भीम के समान कायावान किसे कहा गया है?
उत्तर :
भीम के समान कायावान बड़े-बड़े वृक्षों को कहा गया है।

प्रश्न 10.
‘भूधर’ किसे कहा गया है?
उत्तर :
भूधर बड़े-बड़े वृक्षों को कहा गया है ।

प्रश्न 11.
आशा को किसके समान बताया गया है?
उत्तर :
आशा को पक्षी के समान बताया गया है।

प्रश्न 12.
कौन अपना सीना गर्व से ऊँचा उठाता?
उत्तर :
आशारूपी पक्षी अपना सीना गर्व से ऊँचा उठाता।

प्रश्न 13.
‘किस जगह पर तू छिपा था’ – तू किसके लिए आया है?
उत्तर :
‘तू’ आशारूपी पक्षी के लिए आया है।

प्रश्न 14.
ऊषा कहाँ मुस्कुराती है?
उत्तर :
कुद्ध नभ के वजदन्तों के बीच ऊषा मुस्कुराती है।

प्रश्न 15.
कौन पवन को नीचा दिखाती है?
उत्तर :
एक छोटी चिड़िया पवन को नीचा दिखाती है।

प्रश्न 16.
किसके दु:ख से निर्माण का सुख कभी नहीं दबता?
उत्तर :
नाश के दुःख से निर्माण का सुख कभी नहीं दबता।

प्रश्न 17.
कवि ने कौन-सा नवगान फिर-फिर गाने को कहा है?
उत्तर :
कवि ने सुष्टि का नवगान फिर-फिर गाने को कहा है।

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प्रश्न 18.
आँधी से किस-किस को नुकसान हुआ?
उत्तर :
आँधी से बड़े-बड़े वृक्षों, इमारतों तथा घोंसलों को नुकसान हुआ।

प्रश्न 19.
क्रुद्ध नभ के दाँत कैसे बताए गए हैं?
उत्तर :
कुद्ध नभ के दाँतों को वज्ञ (बिजली) के समान बताया गया है।

प्रश्न 20.
हवा के झोंकों से कौन काँपने लगे?
उत्तर :
हवा के झोंकों से बड़े-बड़े पेड़ काँपने लगे।

प्रश्न 21.
दिन में रात का-सा दृश्य उपस्थित होने पर लोग क्या सोचने लगे?
उत्तर :
दिन में रात का-सा दृश्य उपस्थित होने पर लोग यह सोचने लगे कि अब यह रात्रि कभी खत्म नहीं होने वाली है।

प्रश्न 22.
कवि किससे छिपने की बात पूछते हैं?
उत्तर :
कवि आशारूपी विहंगम से छिपने की बात पूछते हैं।

प्रश्न 23.
किसकी मोहिनी मुस्कान बार-बार नीड़ का निर्माण करने के लिए प्रोत्साहित करती है?
उत्तर :
ऊषा की मोहिनी मुस्कान बार-बार नीड़ का निर्माण करने के लिए प्रोत्साहित करती है।

प्रश्न 24.
चिड़िया की चोंच में दबा तिनका किसका प्रतीक है?
उत्तर :
चिड़िया की चोंच में दबा तिनका पुरन्नर्माण का प्रतीक है।

प्रश्न 25.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता का संदेश क्या है?
उत्तर :
इस कविता का संदेश है कि हमें विनाश से निराश न होकर फिर से जीवन के निर्माण में लग जाना चाहिए।

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प्रश्न 26.
दुःख के समय मनुष्य क्या सोचता है?
उत्तर :
दु:ख के समय मनुष्य यह सोचता है कि इस दुःख का उसके जीवन से कभी अंत होने वाला नहीं है।

प्रश्न 27.
प्रलय की निस्तब्धता में बार-बार किसका संगीत गूंजता है?
उत्तर :
प्रलय की निस्तब्धता में बार-बार सृष्टि का संगीत (नवगान) गूंजता है।

प्रश्न 28.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता किस काव्य-संकलन से ली गई है?
उत्तर :
‘सतरंगिनी’ नामक काव्य-संकलन से ली गई है।

प्रश्न  29.
‘वज्र दन्तों’ किसे कहा गया है?
उत्तर :
आकाश में चमकने वाली बिजली को ‘वजदन्तो’ कहा गया है।

प्रश्न 30.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता का संदेश क्या है?
उत्तर :
जीवन से निराशा को दूर कर जीवन को नए सिरे से जीने का प्रयत्न करना ही इस कविता का संदेश है।

प्रश्न 31.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ के कवि कौन हैं?
उत्तर :
हरिवंश राय बच्चन।

प्रश्न 32.
‘नीड़ का निर्माण’ का प्रतीकार्थ अथवा संदेश क्या है?
उत्तर :
‘नीड़ का निर्माण’ का प्रतीकार्थ यह है कि हमें जीवन की आपदाओं से निराश न होकर पुन: जीवन जीने के लिए रचनात्मक कार्य में लग जाना चाहिए।

प्रश्न 33.
‘पवन उनचास’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
आंधी।

प्रश्न 34.
‘भीम कायावान घूसर’ किसे कहते हैं ?
उत्तर :
विशाल वृक्षों को।

प्रश्न 35.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है ?
उत्तर :
नाश के भय से निर्माण का कार्य नहीं रोकना चाहिए।

प्रश्न 36.
कवि किसका आह्वान बार-बार करना चाहते हैं ?
उत्तर :
कवि नेह (प्यास) का आह्नान बार-बार करना चाहते हैं।

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प्रश्न 37.
चिड़िया की चोंच में दबा तिनका किसका प्रतीक है?
उत्तर :
चिड़िया की चोंच में दबा तिनका साहस तथा निर्माण का प्रतीक है।

प्रश्न 38.
संघर्ष और निर्माण की क्रियाओं की उपमा कवि ने किससे दी है ?
उत्तर :
नीड़ के निर्माण से उपमा दी है।

प्रश्न 39.
नाश के दु:ख से किस प्रकार का सुख नहीं दबता है ?
उत्तर :
नाश के दु:ख से निर्माण का सुख नहीं दबता है।

प्रश्न 40.
तूफान आने से बड़े-बड़े महलों की क्या दशा हो गई थी ?
उत्तर :
तूफान से बड़े-बड़े महल धराशायी हो गये थे।

प्रश्न 41.
‘वज्ञ दंतों’ किसे कहा गया है ?
उत्तर :
आकाश मे चमकनेवाली बिजली को ‘वज्ज दतों’ कहा गयाहै।

प्रश्न 42.
बादलों के घिरने का भूमि पर क्या असर पड़ा ?
उत्तर :
बादलों के घिरने पर भूमि पर दिन में ही रात की तरह अँधेरा छा गया।

प्रश्न 43.
‘सृष्टि का नवगान फिर-फिर’ का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
विनाश के बाद सृष्टि अर्थात् निर्माण के कार्य में लग जाना ही जीवन है।

प्रश्न 44.
‘भूधर’ किसे कहा गया है ?
उत्तर :
पेड़ों को भूधर कहा गया है।

प्रश्न 45.
प्राची से किसकी मोहिनी मुस्कान दिखायी पड़ी ?
उत्तर :
प्राची (पूरब) से उषा की मोहिनी मुस्कान दिखायी पड़ी।

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प्रश्न 46.
कुद्ध नभ के वज्ञ-दंतों में कौन मुस्काराती है ?
उत्तर :
उषा मुस्कराती है।

प्रश्न 47.
कौन पवन को नीचा दिखाती है ?
उत्तर :
चोंच में तिनका दबाए चिड़िया पवन को नीचा दिखाती है।

प्रश्न 48.
दिन रात की तरह कैसे हो गया?
उत्तर :
धूल भरी आँधी ने पृथ्वी को पूरी तरह ढक लिया, सूर्य का प्रकाश जमीन तक नहीं पहुँच पा रही थी। इसीलिए दिन रात की तरह हो गया।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भंयकर झंझावत और तूफान में भी कौन अडिग रहा है?
(क) बड़े-बड़े वृक्ष
(ख) आशा के बिहंगम
(ग) पथिक
(घ) नीड़
उत्तर :
(ख) आशा के बिहंगम

प्रश्न 2.
आँधी आने से क्या परिवर्तन हुआ ?
(क) सभी दूर भाग गए
(ख) उजाला छा गया
(ग) अँधेरा छा गया
(घ) सूर्य दिखाई देने लगा
उत्तर :
(ग) अंधेरा छा गया

प्रश्न 3.
प्रकृति हमें क्या संदेश देती है ?
(क) विपरीत परिस्थितियों में हताश हो जाओ
(ख) दूसरों की अनुकम्पा प्राप्त करने की कोशिश करो
(ग) भय से कातर क्रंदन करो
(घ) जीवन में हताश एवं निराश न हो
उत्तर :
(घ) जीवन में हताश एवं निराश न हो

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प्रश्न 4.
बच्चन जी भारत सरकार के किस विभाग में हिन्दी विशेषज्ञ थे?
(क) कला एवं संस्कृति विभाग
(ख) राजभाषा विभाग
(ग) विदेश मंत्रालय
(घ) निर्वाचन विभाग
उत्तर :
(ग) विदेश मंत्रालय।

प्रश्न 5.
‘सोवियत लैंड पुरस्कार किस साहित्यकार को मिला हैं?
(क) दिनकर
(ख) बच्चन
(ग) कीर्ति चौधरी
(घ) रघुवीर सहाय
उत्तर :
(ख) बच्चन।

प्रश्न 6.
बच्चन जी का जन्म कब हुआ था?
(क) 26 नवम्बर 1906
(ख) 27 नवम्बर 1907
(ग) 28 नवम्बर 1908
(घ) 29 नवम्बर 1909
उत्तर :
(ख) 27 नवम्बर 1907

प्रश्न 7.
बच्चन जी का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) इलाहाबाद
(ख) बनारस
(ग) छत्तीसगढ़
(घ) उत्तराखंड
उत्तर :
(क) इलाहाबाद।

प्रश्न 8.
बच्चन जी के पिता का नाम क्या था?
(क) प्रतापचन्द्र
(ख) प्रताप बच्चन
(ग) प्रताप नारायण श्रीवास्तव
(घ) बच्चन श्रीवास्तव
उत्तर :
(ग) प्रताप नारायण श्रीवास्तव।

प्रश्न 9.
बाल्यकाल में बच्चन जी को किस नाम से पुकारा जाता था?
(क) संतान
(ख) बच्चन
(ग) श्रीवास्तव
(घ) बच्चा
उत्तर :
(ख) बच्चन।

प्रश्न 10.
बच्चन जी का देहांत कब हुआ?
(क) 18 जनवरी 2003
(ख) 19 जनवरी 2004
(ग) 20 जनवरी 2005
(घ) 21 जनवरी 2006
उत्तर :
(क) 18 जनवरी 2003

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प्रश्न 11.
बच्चन जी को ‘दो चद्टानें’ कृति पर कौन-सा पुरस्कार मिला?
(क) नोबेल पुरस्कार
(ख) मंगला प्रसाद पारितोषिक
(ग) सरस्वती पुरस्कार
(घ) साहित्य अकादमी पुरस्कार
उत्तर :
(घ) साहित्य अकादमी पुरस्कार।

प्रश्न 12.
‘नीड़ का पुननिर्माण’ किसकी रचना है?
(क) राजेश जोशी
(ख) हरिवंश राय बच्चन
(ग) अनामिका
(घ) ॠतुराज
उत्तर :
(ख) हरिवंश राय बच्चन।

प्रश्न 13.
निम्न में से कौन ‘प्रेम और मस्ती का काव्य’ की काव्यधारा का कवि नहीं है?
(क) प्रसाद
(ख) बच्चन
(ग) अंचल
(घ) नेरन्द्र शर्मा
उत्तर :
(क) प्रसाद।

प्रश्न 14.
किस कवि को हिन्दी का ‘बायरन’ माना जाता है?
(क) रघुवीर सहाय
(ख) पंत
(ग) बच्चन
(घ) कैलाश गौतम
उत्तर :
(ग) बच्चन।

प्रश्न 15.
‘मघुशाला’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) बच्चन
(ख) रामनरेश त्रिपाठी
(ग) कीर्ति चौधरी
(घ) अनामिका
उत्तर :
(क) बच्चन।

प्रश्न 16.
‘मधुशाला’ का प्रकाशन-वर्ष क्या है?
(क) 1932 ई०
(ख) 1935 ई०
(ग) 1930 ई०
(घ) 1945 ई०
उत्तर :
(ख) 1935 ई०

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प्रश्न 17.
‘मधुशाला’ किस विधा की रचना है?
(क) काव्य
(ख) कहानी
(ग) नाटक
(घ) उपन्यास
उत्तर :
(क) काव्य।

प्रश्न 18.
‘मिलनयामिनी’ किसकी रचना है?
(क) अंबल
(ख) शकुंतला माथुर
(ग) बच्चन
(घ) दिनकर
उत्तर :
(ग) बच्चन।

प्रश्न 19.
‘निशा-निमंत्रण’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) बच्चन
(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ग) कीर्ति चौधरी
(घ) कन्हैयालाल नंदन
उत्तर :
(क) बच्चन।

प्रश्न 20.
‘गर्जनमय’ में कौन-सा समास है?
(क) तत्पुरूष
(ख) कर्मधारय
(ग) बहुबीहि
(घ) द्विगु
उत्तर :
(क) तत्पुरूष।

प्रश्न 21.
‘मधुकलश’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) अनामिका
(ख) ॠतुराज
(ग) बच्चन
(घ) कीर्ति चौधरी
उत्तर :
(ग) बच्यन।

प्रश्न 22.
‘एकांत संगीत’ किसकी रचना है?
(क) रघुवीर सहाय
(ख) राजेश जोशी
(ग) दिनकर
(घ) बच्चन
उत्तर :
(घ) बच्चन।

प्रश्न 23.
‘सतरंगिनी’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) यतीन्द्र मिश्र
(ख) दिनकर
(ग) बच्चन
(घ) राम कुमार वर्मां
उत्तर :
(ग) बच्चन।

प्रश्न 24.
‘आरती और अंगारे’ के कवि कौन हैं?
(क) बच्चन
(ख) दिनकर
(ग) अनामिका
(घ) कीर्ति चौधरी
उत्तर :
(ग) बच्चन।

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प्रश्न 25.
‘नीड़’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
(क) पानी
(ख) मकान
(ग) छोटा
(घ) घोंसला
उत्तर :
(घ) घोंसला।

प्रश्न 26.
‘प्राची’ का शाष्दिक अर्थ क्या है?
(क) उत्तर
(ख) दक्षिण
(ग) पूरब
(घ) पश्चिम
उत्तर :
(ग) पूरब।

प्रश्न 27.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कब रची गई थी?
(क) सुख के दिनों में
(ख) दु:ख के दिनों में
(ग) पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु के पहले
(घ) तेजी सूरी से विवाह के पश्चात्
उत्तर :
(घ) तेजी सूरी से विवाह के पश्चात्

प्रश्न 28.
बच्चन बार-बार किसका आह्वान करते हैं?
(क) नीड का
(ख) रात्रि का
(ग) भौत जन का
(घ) नेह का
उत्तर :
(घ) नेह का।

प्रश्न 29.
गर्व से निजा वक्ष बार-बार कौन उठाता है?
(क) कवि
(ख) घोंसला
(ग) आशारूपी पक्षी
(घ) दु:ख
उत्तर :
(ग) आशारूपी पक्षी।

प्रश्न 30.
किसके कारण प्रकृति में निस्तब्धता छा गई?
(क) कवि के कारण
(ख) रात्रि के कारण
(ग) कुद्ध नभ के कारण
(घ) प्रलय के कारण
उत्तर :
(घ) प्रलय के कारण।

प्रश्न 31.
किसके कंठ में चिड़िया गाती है?
(क) कवि के
(ख) महल के
(ग) गगन के
(घ) सृष्टि के
उत्तर :
(ग) गगन के।

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प्रश्न 32.
भूमि को किसने घेरा ?
(क) काल
(ख) दु:ख
(ग) रात्रि
(घ) धूलि-धूसर बादल
उत्तर :
(घ) धूलि-धूसर बादल।

प्रश्न 33.
दिन किसके समान हो गया ?
(क) रात
(ख) पहाड़
(ग) राई
(घ) नेह
उत्तर :
(क) रात।

प्रश्न 34.
‘प्राची’ का अर्थ है ?
(क) पुराना
(ख) प्राचीन
(ग) पूरब
(घ) पश्चिम
उत्तर :
(ग) पूरब।

प्रश्न 35.
किसका अह्वान कवि बार-बार करते हैं ?
(क) ईश्वर
(ख) नेह
(ग) सुख
(घ) निराशा
उत्तर :
(ख) नेह।

प्रश्न 36.
आशा को किसके समान बताया गया है ?
(क) विहंगम
(ख) पर्वत
(ग) रात्रि
(घ) गगन
उत्तर :
(कं) विहंगम।

प्रश्न 37.
खग पंक्ति कहाँ गाती है ?
(क) वज दन्तो के बीच
(ख) गगन के बीच
(ग) गगन के कठ में
(घ) नीड़ में
उत्तर :
(ग) गगन के कंठ में।

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प्रश्न 38.
गर्व से निज वक्ष बार-बार कौन उठाता है?
(क) कवि
(ख) घोंसला
(ग) आशारूपी पक्षी
(घ) दु:ख
उत्तर :
(ग) आशारूपी पक्षी।

प्रश्न 39.
नाश के दु;ख से क्या नहीं दबता ?
(क) निर्माण का सुख
(ख) अपराधियों का मनोबल
(ग) कवि के बोल
(घ) धरती
उत्तर :
(क) निर्माण का सुख।

प्रश्न 40.
चोंच में तिनका लिए जा रही चिड़िया किसे नीचा दिखाती है ?
(क) पवन उनतालीस को
(ख) पवन उनसठ को
(ग) पवन उन्नौस को
(घ) पवन उनचास को
उत्तर :
(घ) पवन उनचास को।

प्रश्न 41.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ किस प्रकार की कविता है ?
(क) आशावादी
(ख) निराशावादी
(ग) भाग्यवादी
(घ) भक्ति
उत्तर :
(क) आशावादी।

प्रश्न 42.
पवन उनचास को कौन नीचा दिखा रहा है ?
(क) वायु
(ख) मनुष्य
(ग) चिड़िया
(घ) तिनका
उत्तर :
(ग) चिड़िया।

प्रश्न 43.
निम्न में से कौन-सा शब्द ‘मही’ का अर्थ नहीं है ?
(क) धरती
(ख) पृथ्वी
(ग) पर्वत
(घ) भू
उत्तर :
(ग) पर्वत।

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प्रश्न 44.
‘नीड़ के निर्माण फिर-फिर’ कविता के कवि क्या हैं ?
(क) निराशावादी
(ख) आशावादी
(ग) भाग्यवादी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) आशावादी।

प्रश्न 45.
‘नीड़’ शब्द का अर्थ है ?
(क) मकान
(ख) झाड़ी
(ग) घोंसला
(घ) झोपड़ी
उत्तर :
(ग) घोंसला।

प्रश्न 46.
किसके कंठ में चिड़िया गाती है ?
(क) गगन के
(ख) कवि के
(ग) महल के
(घ) पेड़ के
उत्तर :
(क) गगन के।

प्रश्न 47.
‘फिर-फिर’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वन्द्व
(ख) अव्ययी भाव
(ग) कर्मधारय
(घ) द्विगु
उत्तर :
(क) दून्द्व।

प्रश्न 48.
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता किस संग्रह से ली गई हैं ?
(क) पंच रंगिनी
(ख) मधुशाला
(ग) सतरंगिनी
(घ) नीड़ का पुर्ननिर्माण
उत्तर :
(घ) नीड़ का पुर्ननिर्माण।

प्रश्न 49.
‘उखड़-पुखड़’ सामासिक पद में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययी भाव
(ख) कर्मधारय
(ग) बहुबीहि
(घ) दून्द
उत्तर :
(घ) द्वन्द्द।

प्रश्न 50.
‘धूलि-धूसर’ में कौन-सा समास है?
(क) तत्पुरूष
(ख) कर्मधारय
(ग) द्विगु
(घ) दूंद
उत्तर :
(क) तत्पुरूष।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 3 नीड़ का निर्माण फिर-फिर

प्रश्न 51.
‘भूधर’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद
(ख) द्विगु
(ग) तत्पुरूष
(घ) कर्मधारय
उत्तर :
(ग) तत्पुरूष।

प्रश्न 52.
‘ईंट-पत्थर’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) द्वंद
(ग) तत्पुरूष
(घ) बहुबोहि
उत्तर :
(ख) द्वंद।

प्रश्न 53.
‘नवगान’ में कौन-सा समास है?
(क) तत्पुरूष
(ख) कर्मधारय
(ग) द्विगु
(घ) द्वंद
उत्तर :
(ख) कर्मधारय।

WBBSE Class 10 Hindi नीड़ का निर्माण फिर-फिर Summary

कवि परिचय 

हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर सन् 1907 को इलाहाबाद के निकट प्रतापगढ़ जिले के एक गाँव बाबूपद्टी के एक कायस्थ परिवार में हुआ था । पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। प्रारंभिक शिक्षा कायस्थ पाठशाला में उर्दू-माध्यम से हुई। इन्होंने आगे चलकर म्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहिल्य में एम०ए० तथा फिर कैम्बिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी कवि डब्लू० बी० यीद्स की कविताओं पर शोध-कार्य कर पी-एच० डी० की उपाधि प्राप्त की।
WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 3 नीड़ का निर्माण फिर-फिर 1
पहली पत्नी श्यामा के असमय निधन के बाद सन् 1941 में रंगमंच तथा गायन-क्षेत्र से जुड़ी तेजी सूरी से विवाह किया । यही वह समय है जब उन्होंने ‘नीड़ का निर्माण’ जैसी कविताओं की रचना की । दो पुत्र अमिताभ तथा अजिताभ में से अमिताभ बच्चन फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध अभिनेता हैं।

बच्चन जी ने कुछ समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का भी कार्य किया । ये भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ भी रहे और फिर राज्य सभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। बच्चन छायावाद के लोकप्रिय कवियों में से एक हैं।

बच्चन जी का निघन 18 जनवरी 2003 को मुम्बई में हुआ ।
बच्चन को मस्ती और अल्हड़पन का कवि कहा जाता है । इनकी कविताओं ने हिन्दी कविता का एक नया रूपसंस्कार किया । भाषा सरल, मुहावरेदार के साथ-साथ व्यक्तिगत वेदना से भी युक्त है ।

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बच्चन जी के प्रमुख काव्य-संग्रह निम्नांकित हैं –
मधुशाला, मधुवाला, मधुकलश, सतरंगिणी, मिलन-यामिनी, निशा-निमंत्रण, एकान्त संगीत, प्रणय-पत्रिका, बुद्ध का नाचघर, आरती और अंगारे, आकुल अंतर आदि

सम्मान –

  • काव्य-संग्रह : ‘दो चट्टानें’ के लिए सन् 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार।
  • सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार।
  • एफो एशियाई सम्मेलन में ‘कमल पुरस्कार’।
  • बिड़ला फाउण्डेशन द्वारा आत्मकथा के लिए ‘सरस्वती सम्मान’।
  • सन् 1963 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अवदान के लिए ‘पद्म भूषण पुरस्कार’।

वस्तुनिष्ठ सह व्याख्यामूलक प्रश्नोत्तर

1. नीड़ का निर्माण फिर-फिर
नेह का आह्बान फिर-फिर
बह उठी आँधी की नभ में
छा गया सहसा अँधेरा
धूलि-थूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा
रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आयी और काली
लरा रहा था अव न होगा
इस निशा का फिर सवेरा

शब्दार्थ :

  • नीड़ = घोंसला
  • नेह = प्रेम
  • आह्वान = पुकार ।
  • नभ = आकाश ।
  • सहसा = अचानक
  • धूलि-धूसर = धूल से भरा हुआ ।
  • निशा = राiरि ।
  • सवेरा = सुबह ।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत अंश किस पाठ का है ? इसके रचनाकार कौन है ?
उत्तर :
प्रस्तुत अंश ‘नौड़ का निर्माण फिर-फिर’ नामक पाठ का है । इसके रचनाकार हरिवंश राय बच्चन हैं।

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प्रश्न 2.
भूमि को किसने घेरा ?
उत्तर :
भूमि को धूल से भरा हुआ बादलों ने घेरा।

प्रश्न 3.
प्रस्तुत पद्यांश की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर :
‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ का रचनाकाल वह काल है जब कवि की पल्नी की असामयिक मृत्यु हो चुकी थी। जीवन में चारों और निराशा घिर आई थी । ऐसे समय में बच्चन के जीवन में तेजी सूरी का प्रवेश हुआ जो स्वय भी बहुमुखी प्रतिभा की धनी थी । तेजी के आने से कवि को यह स्वोकारना पड़ा कि जीवन में ध्वंश और निर्माण की प्रक्रिया तो चलती ही रहती है। इससे न घबड़ा कर सृजन में लगे रहना चाहिए।

कवि प्रकृति के माध्यम से कहते हैं कि एक दिन अचानक आँधी आने से आकाश में अंधेरा छा गया ।पूरी धरती धूल से अट गई । दिन में ही रात का आभास होने लगा। फिर काली रात्रि भी आई और ऐसा लगने लगा मानों अब की सवेरा न होगा । दरअसल कविता की इन पंक्तियों में कवि ने पत्नी श्यामा की असमय मृत्यु से जीवन में अचानक धिर आई निराशा का चिन्रण किया है।

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है ।
2. आँधी, अँधेरा, धूलि-धूसर बादल और निशा जीवन में घिर आई निराशा के प्रतीक हैं।
3. ‘आँधी अंधेरा’, ‘धूलि-धूसर’ में अनुप्रास अलंकार है ।
4. ‘फिर-फिर’ में छेकानुप्रास अलंकार है ।
5. कविता प्रतीकात्मक है ।
6. भाषा सहज-सरल है ।

2. रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कणा-कण,
किन्तु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर
नीड़ का निर्माण फिर-फिर
नेह का आद्वान फिर-फिर

शब्दार्थ :

  • उत्पात-भय = शैतानी के भय से ।
  • भौत = डरे हुए ।
  • प्राची = पूरब ।
  • उषा = वह समय जब रात्रि तथा प्रात:काल का मिलन होता है ।
  • मोहिनी = मन को मोहने वाली ।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत अंश किस कविता से उद्धुत है ?
उत्तर :
प्रस्तुत अंश ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता से उद्धत है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश का भावार्थ लिखें।
उत्तर :
कविता के इस अंश में कवि कहते हैं कि रात्रि में होने वाले उत्पात की कल्पना करके ही लोग भय से सिहर उठे, प्रकृति का कण-कण डर गया। तभी पूरब से ऊषा की मोहिनी मुस्कान से लोगों का भय दूर हो गया, उनके दिल खिल उठे। कवि ने यह अनुभव किया कि जिस प्रकार प्रकृति में हमेशा दिन या रात नहीं होती ठीक वैसे ही हमेशा सुख या दुख नहीं रहता है। इनके आने-जाने का क्रम तो लगा ही रहता है। अगर एक बार नीड़ उजड़ भी गया तो क्या, हमें स्नेह और प्रेम का सहारा लेकर उसका निर्माण फिर से करने में जुट जाना चाहिए।

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है ।
2. ‘रात’ जीवन के निराशा भरे क्षण को प्रतिबिंबित करती है।
3. ‘ऊषा’ कवि के जीवन में आयी आशा का सूचक है।
4. ‘मोहिनी मुस्कान’ में अनुप्रास तथा ‘फिर-फिर’ में छेकानुप्रास अलंकार है।
5. कविता प्रतीकात्मक है।
6. भाषा सहज-सरल है ।

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3. बह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूथर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़ कर,
गिर पड़े, टूटे विटप वर,
हाय तिनकों से विनिर्मित
घोंसलों पर क्या न बीती,
डगमगाये जबकि कंकड़
ईंट-पत्थर के महल पर

शब्दार्थ :

  • भीम कायावान = भीम की तरह शरीर वाला, सुदृढ़।
  • भूधर = भू (धरती) को धारण करने वाला।
  • विटप = पेड़।
  • विनिर्मित = अच्छी तरह बने हुए।

प्रश्न 1.
रचना तथा रचनाकर का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ तथा रचनाकार हरिवंश राय बच्चन हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश का भावार्थ लिखें।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में कवि कहते हैं कि अचानक बहने वाली बयार के तेज झोंके से भीम की तरह शरीर धारण करने वाले विशालकाय पेड़ भी जड़ से उखड़ कर गिर पड़े। जब बड़े-बड़े वृक्षों का यह हाल हुआ तो न जाने तिनके से बने घोंसलों पर क्या न बीती होगी।

इंट और पत्थर के महल भी डगमगाने लगे जब बयार के साथ कंकड़ों की बौछार उन पर होने लगी। कहने का भाव यह है कि जीवन में ऐसे भी क्षण आते हैं जब विभिन्न प्रकार के संघातों, चोटो को सहन करना पड़ता है तथा आशारूपी बड़े-बड़े महल भी हिल जाते हैं। लेकिन हमेशा ये स्थिति रहनेवाली नहीं है और अच्छे दिन भी आएंगे। क्योंकि इस संसार में सुख और दुख का आना-जाना तो लगा ही रहता है।

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है ।
2. प्रकृति की विनाशलीला तथा घोंसले मानव जीवन में आने वाली विपदाओं के प्रतीक हैं।
3. ‘विटप वर’ में अनुप्रास अलंकार है।
4. कविता प्रतीकात्मक है।
5. भाषा सहज-सरल है।

4. बोल, आशा के विहंगम
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज वक्ष फिर-फिर।

शब्दार्थ :

  • डगमगाए = हिल गए।
  • विहंगम = पक्षी ।
  • गगन = आकाश।
  • निज = अपना।
  • वक्ष = छाती।

प्रश्न 1.
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश के रचनाकार श्री हरिवंश राय बच्चन हैं।

प्रश्न 2:
पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट करें।
उत्तर :
कविता के प्रस्तुत अंश में कवि कहते हैं जब जीवन में चारों ओर निराशा के बादल छाए हुए थे तब न जाने यह आशारूपी पक्षी कहाँ छिपा हुआ था। यही वह पक्षी है जो आकाश की ऊँचाइयों पर गर्व से अपना सीना ताने इस विषम परिस्थिति में खड़ा रहता है। यह आशारूपी पक्षी ही है जो हमें यह संदेश देता है कि विषम परिस्थितियों से न घबड़ा कर हमें पुन: जीवन को संवारने में लग जाना चाहिए और इस जीवनरूपी नीड़ का निर्माण केवल और केवल स्नेह के तिनके से ही किया जा सकता है।

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है ।
2. आशा को विहंगम बताया गया है अत: रूपक अलंकार है।
3. ‘फिर-फिर’ में अनुप्रास अलंकार है।
4. वह आशारूपी पक्षी ही है जो जीवन की विषम परिस्थितियों में भी नए उत्साह का संचार करता है।
5. कविता प्रतीकात्मक है ।
6. भाषा सहज-सरल है।

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5. नीड़ का निर्माण फिर-फिर
नेह का आह्वान फिर-फिर
क्रुद्ध नभ के वज्ञ दन्तों
में उषा है मुस्कराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती।

शब्दार्थ :

  • कुद्ध = गुस्से में।
  • वज दन्तों = पत्थर के समान दाँत।
  • गर्जनमय = गर्जन (बादलों का शोर) से भरा हुआ।
  • खग = पक्षी।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पद्यांश कहाँ से लिया गया है?
उत्तर :
प्रस्तुत पद्यांश हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ कविता से लिया गया है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में कवि हरिवंश राय बच्चन प्रकृति के माध्यम से हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि विषम परिस्थितियों में भी वह आशा ही है जो हमें जीने का संदेश देती है। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या क्रोधित आकाश के वज दाँतों के बीच ऊषा मुस्कुराती ? क्या बादलों के भयंकर गर्जनों के बीच चिड़ियों के कंठ से संगीत फूटते?

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में क्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है ।
2. प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
3. उषा और खग आशा के प्रतीक हैं।
4. ‘गर्जनमय गगन’ में अनुप्रास अलंकार है।
5. कविता प्रतीकात्मक है।
6. भाषा सहज-सरल है ।

6. एक चिड़िया चोंच में तिनका लिये जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उनचास को नीचा दिखाती !

शब्दार्थ :

  • सहज = स्वभाविक रूप में।
  • पवन = वायु।
  • उनचास = प्रचंड वेग से चलने वाला वायु।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत अंश के कवि का नाम लिखें।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश के कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश में निहित भावों को स्पष्ट करें।
उत्तर :
कविता के इस अंश में बच्चन जी ने हमें यह संदेश देना चाहा है कि इस संसार में जीवन जीने में आशा और आत्मबल की बहुत बड़ी भूमिका है। आशा और आत्मबल के सहारे एक छोटी-सी चिड़िया विनाश के बाद भी चोंच में तिनका दबाकर फिर से नीड़ के निर्माण में लग जाती है। उसके साहस और उसकी आशा के सामने शक्तिशाली पवन भी नहीं ठहर पाता। चिड़िया उसे भी नीचा दिखाती है।

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है।
2. चिड़िया बलवती इच्छा का प्रतिरूप है।
3. ‘चिड़िया चोंच’ तथा ‘जो जा’ में अनुप्रास अलंकार है।
4. चिड़िया के माध्यम से कवि ने सृजन का संदेश देना चाहा है।
5. कविता प्रतीकात्मक है।
6. भाषा सहज-सरल है।

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7. नाश के दु:ख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सूष्टि का नवगान फिर-फिर!
नीड़ का निर्माण फिर-फिर
नेह का आहान फिर-फिर

शब्दार्थ :

  • प्रलय = विनाश।
  • निस्तक्षता = शांत वातावरण।
  • सृष्टि = प्रकृति ।
  • नवगान = नए गीत।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से अवतरित हैं?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर’ से अवतरित है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
कविता के इस अंतिम अंश में कवि बच्चन ने हमें यह संदेश देना चाहा है कि नाश में निर्माण के बीज छिपे होते है, इसलिए हमें प्रकृति को विनाश-लीला से घबराना नहीं चाहिए। नाश के दुःख से कभी भी निर्माण का काम नहीं रूकता। जब विनाश-लीला से प्रकृति स्तब्ध रह जाती है – कहीं कोई आवाज नहीं सुनाई देती – सब ओर निस्तब्धता छा जाती है तो सृष्टि का संगीत प्रारंभ होता है। इसलिए हमें प्रकृति से सीख लेकर नवनिर्माण में लग जाना चाहिए और प्रेम के आह्धान को दुहराते रहना चाहिए।

विशेष :

1. प्रस्तुत अंश में प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने जीवन में घिर आई निराशा का चित्रण किया है ।
2. विनाश में ही सृष्टि के बीज छिपे होते हैं।
3. ‘फिर-फिर’ में छेकानुप्रास अलंकार है।
4. कविता प्रतीकात्मक है ।
5. भाषा सहज-सरल है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 2 आत्मत्राण

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions Poem 2 आत्मत्राण to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 2 Question Answer – आत्मत्राण

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 : ‘आत्मत्राण’ कविता का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 2 : ‘आत्मत्राण’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 3 : ‘आत्मत्राण’ कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 4 : ‘आत्मत्राण’ कविता के उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
प्रश्न 5 : ‘आत्मत्राण’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा
प्रश्न 6 : ‘आत्मत्राण’ के कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना करते हैं?
अथवा
प्रश्न 7 : ‘आत्मत्राण’ कविता में निहित कवि के विचारों को लिखें।
उत्तर :
कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर में बौद्धिक प्रतिभा के साथ-साथ आध्यात्मिक विचारों की एक गहरी धारा उनके भीतर प्रवाहित हो रही थी। उन्हें यह प्रकाश की धारा किस प्रकार मिली उसके बारे में उन्होंने लिखा है –
”सूर्य देवता सामने के वृक्षों से झाँक रहे थे। वृक्षों पर सूर्य की किरणें पड़ रही थीं। इस अपूर्व दृश्य का वर्णन मानवी शक्ति के परे है। सूर्य की किरणें हर्ष और सौंन्दर्य से उत्फुल्ल प्रतीत होने लगीं। इस समय एकाएक दिव्य प्रकाश मिल गया।”

कविगुरू ईश्वर से यह निवेदन करते हैं कि उन्हें विपदाओं (मुसीबतों) से न बचाएं। वे उसपर इतनी कृपा करें कि जीवन में जब कभी भी विपदा आए तो उन्हें भय न हो।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 2 आत्मत्राण

यदि आप मेरे दुख-ताप से भरे ह्द्यय को ढाढ़स न भी दें तो कोई बात नहीं, लेकिन इतनी करुणा अवश्य करें कि मैं अपने दु:खों पर विजय प्राप्त कर सकूँ। यदि दु:ख के दिनों में मुझे कोई सहायता करने वाला न भी मिले तो भी मेरा आत्मबल कम न हो। अपने आत्मबल के सहारे ही मैं अपने दुःख-ताप को पार कर जाऊँगा क्योंकि इस संसार में आत्मबल ही सबसे बड़ा बल है।

हो सकता है कि इस संसार में मुझे हानि ही उठानी पड़े, लाभ मेरे लिए मात्र एक धोखा हो। फिर भी मैं इसे अपनी हानि नहीं मानू। इन सारी चीजों से तुम मुझे प्रतिदिन मुक्ति दो – मैं ऐसा भी नहीं चाहता। मैं तुमसे त्राण पाने की प्रार्थना नहीं करता। तुम तो मेरे ऊपर केवल इतनी कृपा करो कि मुझमें इन मुसीबतों से त्राण पाने की स्वस्थ शक्ति हो।

अगर आप मेरे भार को कम न कर सकें, मुझे मुसीबत के दिनों में ढाढ़स भी न बंधा सकें तो भी मेरे ऊपर इतनी कृपा रखेंगे कि मैं अपने दु:ख को निर्भय होकर सहन कर सकूँ। अपने सुख के दिनों में भी मैं नत सिर होकर प्रत्येक क्षण आपको स्मरण कर सकूँ।

कवि कहते हैं कि जब दु:खरूपी रात्रि में यह सारा संसार भी मुझे धोखा दे तब आपकी मेरे ऊपर कुछ ऐसी कृपा हो कि मैं आप पर संदेह न कर सकूँ। कहने का भाव यह है कि जब मेरा विश्वास इस दुनिया से उठ जाये तो भी मेरा विश्वास आपके ऊपर टिका रहे।

प्रस्तुत कविता की सबसे बड़ी विशेषता इस उद्देश्य में निहित है कि उन्होंने मानवतावाद को ईश्वरवाद के साथ जोड़कर देखा है। मनुष्य की सत्ता ईश्वर से अलग नहीं है। इसीलिए तो वे कहते हैं-

सुन हे मानुष भाई
सवार ऊपरे मानुष सत्य
ताहार ऊपरे नाई।

प्रश्न 8 : पठित पाठ के आधार पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भक्ति-भावना पर प्रकाश डालें।
अथवा
प्रश्न 9 : संकलित पाठ के आधार पर बताएं कि रवीन्द्रनाथ ईश्वरवादी के साथ ही साथ मानवतावादी भी थे।
अथवा
प्रश्न 10 : पठित पाठ के आधार पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की आस्थावादी विचार पर प्रकाश डालें। अथवा
प्रश्न 11 : ‘आत्मत्राण’ कविता के आधार पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालें।
अथवा
प्रश्न 12 : ‘आत्मत्राण’ कविता में निहित संदेश को अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ की प्रतिभा में अनेक विशेषताओं का समावेश है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में एक ही साथ वेदान्त, वैष्णववाद, बौद्धदर्शन, सूफी मत, बाऊल सम्पदाय, ईसाई धर्म सभी का समन्वय मिलता है। रवीन्द्रनाथ की भक्ति-भावना की विशेषता है कि उन्होंने मानव को ईश्वर का अंश माना है। मानव और ईश्वर दोनों में एक अनंत सेतु है। और वह सेतु है – प्रेम का सेतु।

यह बात सही है कि हमारे जीवन में ईश्वर की कृपा का होना आवश्यक है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम कर्म करना ही छोड़ दें। हमारे जीवन की सार्थकता कर्म करने में ही है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 2 आत्मत्राण

संसार का तुच्छ से तुच्छ प्राणी भी अपने कर्म में लगा रहता है। वृक्ष अपने बल-बूते सारी आपदाओं को झेलते हुए संसार को हरियाली, फल-फूल और प्राणवायु भी देते रहते हैं। केवल प्राणी ही क्यों, सूर्य, चंद्रमा, सागर, नदी, वायु और पृथ्वी सभी अपने-अपने कर्म में लगे रहते हैं। नदी का कर्म है – रास्ते में आने वाले स्थानों को सींचते, हरियाली बाँटते हुए निरंतर बहते रहना। जीवन और प्रकृति के इन रूपों, नियमों और रहस्यों को समझ कर ही कवि ने यह संदेश चाहा है कि हमें भी ईश्वर में आस्था रखते हुए, आपदाओं को झेलते हुए अपने कर्म में लगे रहना चाहिए-

दु:ख – ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे करूणामय
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले
तो अपना बल पौरूष न हिले।

दु:ख और सुख तो मानव-जीवन के आरंभ से ही लगा हुआ है, आगे भी लगा रहेगा। यह जीवन की निश्चित सच्चाई है, परीक्षित सत्य है। सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा लक्ष्य को हासिल करने की गहरी इच्छा-शक्ति से आती है।

रवीन्द्रनाथ ने अपने आध्यात्मिक विचारों को अपने सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ “The Religion of Man’ में विस्तारपूर्वक लिखा है। उन्होंने इसमें माना है कि मनुष्य ईश्वर का विरोध करके नहीं, उसमें आस्था व्यक्त करके ही जीवन में सफल हो सकता है। प्रस्तुत कविता का मूल संदेश भी यही है।

अति लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
कवि विपदा के समय प्रभु से क्या चाहते हैं?
उत्तर :
कवि विपदा के समय प्रभु से यह चाहता है कि वह भय नहीं पाए।

प्रश्न 2.
हमें ईश्वर को कहाँ खोजना चाहिए ?
उत्तर :
अपने हदय में खोजना चाहिए ।

प्रश्न 3.
दु:ख पर विजय पाने के लिए कौन प्रार्थना करता है ?
उत्तर :
कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ।

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प्रश्न 4.
कवि कब ईश्वर पर संशय न होने की प्रार्थना करता है ?
उत्तर :
जब पूरा संसार दु:ख के दिनों में उसकी उपेक्षा कर दे तब कवि यह कामना करता है।

प्रश्न 5.
दुख के समय किसी सहायक के न मिलने की स्थिति में कवि ईश्वर से क्या कामना करते हैं?
उत्तर :
दुख के समय किसी सहायक के न मिलने की स्थिति में कवि ईश्वर से यह कामना करते हैं कि उनका बलपौरूष न हिले।

प्रश्न 6.
कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ‘सुख के दिन’ में परमात्मा के प्रति कैसा भाव रखते हैं ?
उत्तर :
कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ‘सुख के दिन’ में परमात्मा को याद रखने का भाव रखते हैं क्योंकि अक्सर लोग सुख के दिनों में परमात्मा को भूल जाते हैं।

प्रश्न 7.
कवि रवीन्द्रनाथ ईश्वर से सहायता क्यों नहीं लेना चाहते हैं ?
उत्तर :
कवि अन्य लोगों के तरह संसार के दुःखों और कष्टों का अनुभव करना चाहता है इसलिए यह नहीं चाहता कि प्रभु उसे संकट से बचा ले । वह तो वस इन कष्टों को सहन करने की शक्ति चाहता है ।

प्रश्न 8.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर के माता-पिता का नाम लिखें।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पिता का नाम श्री देवेन्द्रनाथ ठाकुर तथा माता का नाम शारदा देवी था।

प्रश्न 9.
लंदन विश्वविद्यालय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने किसके अधीन शिक्षा प्राप्त की?
उत्तर :
प्रो० हेनरी मोर्ले के अधीन।

प्रश्न 10.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु कब हुई?
उत्तर :
सन् 1941 ई० में।

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प्रश्न 11.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं पर किसका प्रभाव दिखाई देता है?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताओं पर एक ही साथ वेदान्त, वैष्णववाद, वौद्धदर्शन, सूफी मत, ईसाई धर्म तथा बाऊल सम्पदाय का प्रभाव दिखाई देता है।

प्रश्न 12.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कितनी कविताएँ तथा गीत लिखे हैं?
उत्तर :
रवीन्द्रनाध ठाकुर ने लगभग एक हजार कविताएँ तथा दो हजार गीत लिखे हैं।

प्रश्न 13.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर को उनकी किस कृति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला?
उत्तर :
‘गौताजंलि’।

प्रश्न 14.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रमुख कहानी का नाम लिखें।
उत्तर :
काबुलीवाला।

प्रश्न 15.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रमुख काव्य कृत्तियों के नाम लिखें।
उत्तर :
नैवेद्य, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र तथा सांध्यगीत।

प्रश्न 16.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित उपन्यासों के नाम लिखें।
उत्तर :
गोरा, घरे-बाइरे।

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प्रश्न 17.
‘आत्पत्राण’ मूल कविता किस भाषा में लिखी गयी?
उत्तर :
बंगला भाषा में।

प्रश्न 18.
‘आत्मत्राण’ कविता का हिन्दी अनुवाद किसने किया?
उत्तर :
हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार श्रदेड आचार्य हजारी प्रसाद्व द्विवेदी ने।

प्रश्न 19.
‘आत्मत्राण’ कविता किस कोटि की कविता है?
उत्तर :
प्रार्थना गीत।

प्रश्न 20.
‘आत्मत्राण’ कविता में कवि का क्या मानना है?
उत्तर :
‘आत्मश्राण’ कविता में कवि का यह मानना है कि प्रभु में सबकुछ कर देने का सामर्थ्य है, फिर भी वे यह नहीं चाहते हैं कि वही सबकुछ कर दें।

प्रश्न 21.
‘आत्मत्राण’ कविता के कवि की कामना क्या है?
उत्तर :
‘आत्मग्राण’ कविता के कवि की कामना यह है कि किसी भी आपद-विपद में, किसी भी द्वंद्ध में सफल होने के लिए संघर्ष वह स्वयं करें, प्रभु को कुछ न करना पड़े।

प्रश्न 22.
‘आत्मत्राण’ कविता में कवि अपने प्रभु से क्या चाहता है?
उत्तर :
‘आत्मप्राण’ कविता में कवि अपने प्रभु से यह चाहते है कि वे उसे दु:ख के क्षणों में आत्मबल प्रदान करें ताकि वे दु:ख को पार कर सके।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 2 आत्मत्राण

प्रश्न 23.
कवि प्रभु से क्या प्रार्थना नहीं करते हैं।
उत्तर :
कवि प्रभु से यह प्रार्थना नहीं करता है कि वे उसे विपदाओं से बचाएँ।

प्रश्न 25.
कवि कब ईश्वर पर संशय न होने की प्रार्थना करता है?
उत्तर :
जब पूरा संसार दुःख के दिनों में उसकी उपेक्षा कर दे तब कवि यह कामना करता है।

प्रश्न 26.
किस कवि को ‘कविगुरू’ की उपाधि दी गई है?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ ठाकुर को ‘कविगुरू’ की उपाधि दी गई है।

प्रश्न 27.
‘आत्मत्राण’ कविता में कौन, किससे प्रार्थना करता है?
उत्तर :
आत्मत्राण कविता में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।

प्रश्न 28.
कवि किस बात का क्षय (हानि) अपने मन में नहीं मानने की प्रार्थना ईश्वर से करता है?
उत्तर :
अगर कवि को इस संसार में हानि उठानी पड़े, उसे धोखा मिले फिर भी वह इस बात का क्षय अपने मन में नहीं मानने की प्रार्थना ईश्वर से करते हैं।

प्रश्न 29.
‘आत्मत्राण’ कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 30.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर :
कलकत्ता (कोलकाता) के जोड़ासाँको स्थित ‘प्रासादोपम भवन’ में हुआ था।

प्रश्न 31.
कवि ईश्वर से दु:ख के समय सांत्वना के स्थान पर क्या चाहता है ?
उत्तर :
दु:ख पर विजय करना चाहता है।

प्रश्न 32.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म कब हुआ था?
उत्तर :
7 मई, सन् 1861 ई० को।

प्रश्न 33.
कवि रवीन्द्र दुःख भरी रात की संभाव्यता पर ईश्वर से क्या प्रार्थना करते हैं ?
उत्तर :
वे ईश्वर पर संशय (संदेह) न करें।

प्रश्न 34.
कवि किससे बचने की प्रार्थना नहीं करता ?
उत्तर :
कवि विपदाओं से बचने की प्रार्थना नहीं करता।

प्रश्न 35.
‘आत्मत्राण’ कविता में कविता किस पर विजय करने के लिए कहता है?
उत्तर :
विपदाओं पर विजय करने के लिए कहता है।

प्रश्न 36.
‘तुम पर करुं नहीं कुछ संशय’ – पद्यांश के माध्यम से कवि क्या प्रार्थना करते हैं ?
उत्तर :
दुःख रूपी रात्रि में भी वे ईश्वर पर संशय न करें।

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प्रश्न 37.
कवि किससे और क्यों प्रार्थना कर रहा है ?
उत्तर :
कवि ईश्वर से दु:ख पर विजय पाने की प्रार्थना कर रहा है।

प्रश्न 38.
‘तो भी मन में न मानू क्षय’ – आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
अगर कवि को इस संसार में हानि उठानी पड़े, धोखा मिले तो भी वह इस बात के लिए दु:ख न माने कि ईश्वर ने उसकी सहायता नहीं की।

प्रश्न 39.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्राथमिक शिक्षा कहाँ हुई थी?
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्राथमिक शिक्षा घर पर ही हुई थी।

प्रश्न 40.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर बैरिस्ट्री पढ़ने के लिए कहाँ गए थे?
उत्तर :
लंदन।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
करुणामय से किस ओर संकेत हो रहा है ?
(क) देवता
(ख) दानव
(ग) ईश्वर
(घ) मानव
उत्तर :
(ग) ईश्वर

प्रश्न 2.
‘आत्मत्राण’ किस विधा की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) कविता
(ग) उपन्यास
(घ) निबंध
उत्तर :
(ख) कविता

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प्रश्न 3.
‘आत्मत्राण’ कविता का हिन्दी अनुवाद किसने किया?
(क) राजेश जोशी
(ख) दिनकर
(ग) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
(घ) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर :
(ग) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।

प्रश्न 4.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म कब हुआ था?
(क) 7 मई 1861
(ख) 7 मई 1862
(ग) 8 मई 1863
(घ) 9 मई 1864
उत्तर :
(क) 7 मई 1861

प्रश्न 5.
‘नोबेल पुरस्कार’ पाने वाले पहले भारतीय कौन हैं?
(क) सत्येन्द्र सत्यार्थी
(ख) अमर्र्य सेन
(ग) डॉ० हरगोविंद खुराना
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 6.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) महिषादल
(ख) जोड़ासाँकू
(ग) रवीन्द्र सदन
(घ) रवीन्द्र सरणी
उत्तर :
(ख) जोड़ासाँकू

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प्रश्न 7.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम से संगीत की कौन-सी धारा प्रावाहित हुई?
(क) लोक संगीत
(ख) रवीन्द्र संगीत
(ग) सुगम संगीत
(घ) बंगला संगीत
उत्तर :
(ख) रवीन्द्र संगीत।

प्रश्न 8.
रवीन्द्रनाथ की रचनाओं में किसका स्वर प्रमुख रूप से मुखरित होता है?
(क) बंगला साहित्य
(ख) इतिहास
(ग) विश्व-संस्कृति
(घ) लोक-संस्कृति
उत्तर :
(घ) लोक-संस्कृति।

प्रश्न 9.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कितनी कविताएँ लिखी हैं?
(क) लगभग दो हजार
(ख) लगभग एक हजार
(ग) लगभग तीन हजार
(घ) लगभग पाँच सौ।
उत्तर :
(ख) लगभग एक हजार ।

प्रश्न 10.
रवीन्द्रनाय ठाकुर ने किस संस्था की स्थापना की?
(क) शांति निकेतन
(ख) संगीत निकेतन
(ग) नृत्य निकेतन
(घ) बाऊल निकेतन
उत्तर :
(क) शांति निकेतन ।

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प्रश्न 11.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कितने गीत लिखे हैं?
(क) लगभग दो हजार
(ख) लगभग डेढ़ हजार
(ग) लगभग पाँच सौ
(घ) लगभग एक हजार
उत्तर :
(क) लगभग दो हजार।

प्रश्न 12.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर को उनकी किस रचना के लिए नोबेल पुरस्कार मिला?
(क) गोरा
(ख) घरे-बाइरे
(ग) गीतांजलि
(घ) सांध्यगीत
उत्तर :
(ग) गीतांजलि।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से कौन-सा उपन्यास रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित है?
(क) गोरा
(ख) मैला आँचल
(ग) वाणभद्ट की आत्मकथा
(घ) वीरांगना
उत्तर :
(क) गोरा।

प्रश्न 14.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य-संग्रह रवीन्द्रनाथ ठाकुर का नहीं है?
(क) पल्लव
(ख) नैवेद्य
(ग) पूरबी
(घ) बलाका
उत्तर :
(क) पल्लव।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में से कौन-सा काव्य-संग्रह रवीन्द्रनाथ ठाकुर का नहीं है?
(क) क्षणिका
(ख) चिन्न
(ग) सांध्यगीत
(घ) मिलन
उत्तर :
(घ) मिलन ।

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प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सी कहानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर की है?
(क) काबुलीवाला
(ख) नमक
(ग) उसने कहा था
(घ) सहपाठी
उत्तर :
(क) काबुलीवाला।

प्रश्न 17.
‘घरे-बाइरे’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
(ख) सत्यजित राय
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) शिवमूर्ति
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 18.
‘पोस्टमास्टर’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) गुलेरी
(ख) प्रसाद
(ग) प्रेमचंद
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 19.
‘मुन्ने की वापसी’ के लेखक कौन हैं ?
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ख) प्रसाद
(ग) पंत
(घ) निराला
उत्तर :
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

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प्रश्न 20.
‘मालादान’ के कहानीकार कौन हैं?
(क) प्रेमचद
(ख) प्रसाद
(ग) निराला
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 21.
‘दृष्टिदान’ किसकी रचना है ?
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ख) मोहन राकेश
(ग) ममता कालिया
(घ) रेणु
उत्तर :
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 22.
‘देशभक्त’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रसाद
(ख) प्रेमचंद्
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 23.
‘दुराशा’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) रवीन्द्रनाध ठाकुर
(ख) संजीव
(ग) कृष्णा सोबती
(घ) शिवमूर्त्रि
उत्तर :
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 24
‘श्रद्धांजलि’ किसकी रचना है ?
(क) शिवमूर्ति
(ख) ग्रेजिया डेलेडा
(ग) संजीव
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 25.
‘कंचन’ किसकी रचना है ?
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ख) सत्यजित राय
(ग) संजीव
(घ) प्रेमचद
उत्तर :
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

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प्रश्न 26.
‘धन का मोह’ के लेखक कौन हैं ?
(क) गुलेरी
(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ग) अनामिका
(घ) कैलाश गौतम
उत्तर :
(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 27.
‘मण्राह’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) केलाश गौतम
(ख) रघुवीर सहाय
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) कन्हैया लाल नंदन
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाध ठाकुर।

प्रश्न28.
‘अनाथ की दीदी’ कहानी किसने लिखा ?
(क) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ख) प्रेमचंद
(ग) ॠतुराज
(घ) यतीन्द्र मिश्र
उत्तर :
(क) रवीन्द्रनाध ठाकुर।

प्रश्न 29.
‘सुभाषिणी’ किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचद
(ख) प्रसाद
(ग) अनामिका
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 30.
‘वंशज-दान’ कहानी किसने लिखा।
(क) यतौनछू मिध्र
(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(ग) राम दरश मिथ्र
(घ) यतोन्द्र मिश्र
उत्तर :
(ख) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 31.
‘नए ज़माने की हवा’ किसकी रचना है ?
(क) प्रेमचंद
(ख) गुलेरी
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) यतीन्द्र मिश्र
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

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प्रश्न 32.
‘छुद्यियें’ का इंतजार’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) राजेश जोशी
(ख) रवीन्द्र कालिया
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) प्रेमचट
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 33.
‘हेमू’ कहानी के कहानीकार कौन हैं ?
(क) निराला
(ख) प्रसाद
(ग) प्रेमचंद
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
उत्तर :
(घ) रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

प्रश्न 34.
‘आत्मत्राण’ मूल कविता किस भाषा में लिखी गई?
(क) हिन्दी
(ख) बंगला
(ग) संस्कृत
(घ) मराठो
उत्तर :
(ख) बंगला।

प्रश्न 35.
‘आत्मत्राण’ में किससे प्रार्थना की गई है?
(क) स्वयं से
(ख) कवि से
(ग) इश्वर से
(घ) राजा से
उत्तर :
(ग) ईश्वर से ।

प्रश्न 36.
कवि किस पर जय पाने की कामना करते हैं?
(क) शत्रु पर
(ख) स्वयं पर
(ग) दुःख पर
(घ) सुख पर
उत्तर :
(ग) दु:ख पर।

प्रश्न 37.
कविगुरू की प्रार्थना है कि –
(क) प्रभु कुछ भी कर सकते हैं
(ख) प्रभु सबकुछ कर दे
(ग) प्रभु अपनी कृपा बनाए रखें
(घ) प्रभु कवि के लिए संघर्ई करे
उत्तर :
(ग) प्रभु अपनी कृपा बनाए रखें।

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प्रश्न 38.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपने प्रभु से क्या चाहते हैं?
(क) उनपर ईश्वर की कृपा बनी रहे
(ख) प्रभु उनके लिए सबकुछ कर दे
(ग) प्रभु उनके लिए कुछ न करें
(घ) प्रभु उन्हे लाभ पहुँचायें
उत्तर :
(क) उनपर ईश्वर की कृपा बनी रहे ।

प्रश्न 39.
कवि किस पर संशय न करने की प्रार्थना करते हैं?
(क) स्वयं पर
(ख) दुख पर
(ग) ईश्वर पर
(घ) निखिल मही पर
उत्तर :
(ग) ईश्वर पर ।

प्रश्न 40.
कवि किसके त्राण की बात करते हैं?
(क) स्वयं की
(ख) विश्व की
(ग) दु:ख की
(घ) रात्रिकी
उत्तर :
(घ) स्वयं की।

प्रश्न 41.
‘आत्मत्राण’ कविता में दु:ख की तुलना किससे की गई है?
(क) दिन से
(ख) रात्रि से
(ग) वंचना से
(घ) लाभ से
उत्तर :
(ख) रात्रि से।

प्रश्न 42.
‘आत्मत्राण’ कविता में कवि किस पर जय करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं ?
(क) निखिल मही पर
(ख) भार पर
(ग) दुखरूपी रात्रि पर
(घ) अपने-आप पर
उत्तर :
(ग) दुखरूपी रात्रि पर।

प्रश्न 43.
कवि किससे बचाने की प्रार्थना करते हैं ?
(क) विपदा
(ख) आपदा
(ग) भय
(घ) लोभ
उत्तर :
(क) विपदा।

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प्रश्न 44.
कवि किसे जय करने की ज्ञात करते हैं ?
(क) सहायक
(ख) बल
(ग) पौरुष
(घ) दु:ख
उत्तर :
(घ) दु:ख।

प्रश्न 45.
कवि ने दु:ख की तुलना किससे की है ?
(क) पर्वत
(ख) त्राण
(ग) रात्रि
(घ) वंचना
उत्तर :
(ग) रात्रि।

प्रश्न 46.
‘आत्मत्राण’ शीर्षक कविता मूलतः किस भाषा में रचित है?
(क) भोजपुरी
(ख) अवधी
(ग) ब्रजभाषा
(घ) बंग्ला
उत्तर :
(घ) बंग्ला।

प्रश्न 47.
‘आत्मत्राण’ कविता में कवि किससे कभी भय नहीं पाना चाहता है ?
(क) कोध से
(ख) लोभ से
(ग) छल से
(घ) विपदा से
उत्तर :
(घ) विपदा से।

प्रश्न 48.
‘आत्मत्राण’ कविता के कवि कौन हैं?
(क) कबीर
(ख) पंत
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर
(घ) रघुवीर सहाय
उत्तर :
(ग) रवीन्द्रनाथ ठाकुर ।

WBBSE Class 10 Hindi आत्मत्राण Summary

कवि परिचय 

यदि हम कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में स्थान दे तो अतिशयोकित न होगी। 7 मई, 1861 ई०, दिन सोमवार को महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के जोड़ासाँको (कलकत्ता) के ‘प्रासादोपम’ भवन में उनके कनिष्ठ (छोटे) पुत्र रवीन्द्रनाथ का जन्म हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई।
WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 2 आत्मत्राण 1
इन्हे बैरिस्ट्री की पढ़ाई के लिए 17 वर्ष की उस में लंदन भेजा गया लेकिन पढ़ाई पूरी किए लिना ही लौट आए। रवीन्द्रनाथ ने 7 वर्ष की उम्म से ही कविता लिखना प्रारंभ किया। इनकी अनुपम काव्यकृति ‘गीताजंलि’ के लिए इन्हें विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं में मानवतावाद को सबसे ऊपर स्थान दिया गया है ‘

‘सुन हे मानुष भाई
सबार ऊपरे मानुष सत्य
ताहार ऊपरे नाई।”

उनका हद्य मन्दिर, मस्जिद, मूर्ति और बाह्याडम्बर से दूर था। इन्होंने शांतिनिकेतन की स्थापना बोलपुर (पं बंगाल) में की जो आज ‘विश्वभारती’ के नाम से जाना जाता है। चित्रकला, संगीत तथा भावनृत्य के प्रति इनका विशेष अनुराग (प्रेम) था। इनकी संगीत-शैली तो आज विश्वभर में ‘रवीन्द्र संगीत’ के नाम से प्रसिद्ध है।

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सन् 1941 में यह ‘भारत-रवि’ अस्त हो गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं –
नोबेल पुरस्कार प्राप्त काव्य – गीताजलि।
नैवेध, पूरबी, बलाका, क्षणिका, चित्र, संध्यगीत।
कहानियाँ – काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, मुत्ने की वापसी, मालादान, दृष्टिदान, देशभक्त, दुराशा, श्रद्धांजलि, कंचन, धन का मोह, मणिहार, अनाथ की दीदी, सुभाषिणी, वंशाज-दान, नए जमाने की हवा, छुट्टियों का इंतजार, हेमु आदि।
उपन्यास – गोरा, घरे-बाइरे ।
निबंध – रवीन्द्र के निबंध, रिलीजन ऑफ मैन ।

वस्तुनिष्ठ सह व्याख्यामूलक प्रश्नोत्तर 

1. विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो करूणामय
कभी न विपदा में पाऊँ भय।

शब्दार्थ :

  • विपदाओं = विपत्तियों, आपदाओं।
  • करूणामय = करूणा करने वाले, दया करने वाले, ईश्वर।

प्रश्न 1.
रचना का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘आत्मत्राण’ है।

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प्रश्न 2.
प्रस्तुत पंक्तियों का भावार्थ लिखें।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में कविगुरू ईश्वर से यह निवेदन करते हैं कि उन्हें विपदाओं (मुसीबतों) से न बचाएं। वे उसपर इतनी कृपा करें कि जीवन में जब कभी भी विपदा आए तो उन्हें भय न हो। वे जीवन की विपदाओं का सामना विना भय के सहज भाव से कर सकें।

काव्यगत सौंदर्य :-

1. प्रस्तुत अंश में कविगुरू की यह भावना दिखाई देती है कि मानव और ईश्वर दोनों के बीच एक अनंत सेतु है।
2. ईश्वर और मानव का संबंध रवीन्न्र-काव्य में एक अपूर्व रूप ले लेता है।
3. जीवन की विपदाओं को कविगुरू अपने बल पर झेलना चाहते हैं।
4. रस शांत है।
5. भाषा की सहजता में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अनुवाद-प्रतिभा के दर्शन होते हैं।

2. दुःख – ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे करूणामय
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।
कोई कहीं सहायक न मिले
तो अपना बल पौरूष न हिले।

शब्दार्थ :

  • ताप =व्यथा, कष्ट।
  • व्यथित = दुखी।
  • चित्त = हृदय।
  • सांत्वना = सहानुभूति।
  • जय = विजय।
  • सहायक = सहायता करने वाला।
  • बल = शक्ति।
  • पौरूष = पुरूषार्थ।

प्रश्न 1.
कवि का नाम लिखें।
उत्तर :
कवि बंगला के प्रख्यात कवि रवीद्रनाथ ठाकुर हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि हे ईश्वर, यदि आप मेरे दुख-ताप से भरे दददय को ढाढ़स न भी दें तो कोई बात नहीं, लेकिन इतनी करूणा अवश्य करें कि मैं अपने दु:खों पर विजय प्राप्त कर सकूँ। यदि दुःख के दिनों में मुझे कोई सहायता करने वाला न भी मिले तो भी मेरा आत्मबल कम न हो। अपने आत्मबल के सहारे ही मैं अपने दु:ख-ताप को पार कर जाऊँगा क्योंकि इस संसार में आत्मबल ही सबसे बड़ा बल है।

काव्यगत सौंदर्य :-

1. प्रस्तुत अंश में कविगुरू की यह भावना दिखाई देती है कि मानव और ईश्वर दोनों के बीच एक अनंत सेतु है।
2. ईश्वर और मानव का संबंध रवीन्द्र-काव्य में एक अपूर्व रूप ले लेता है।
3. जीवन की विपदाओं को कविगुरू अपने बल पर झेलना चाहते हैं।
4. रस शांत है।
5. भाषा की सहजता में आवार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अनुवाद-प्रतिभा के दर्शन होते हैं।

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3. हानि उठानी पड़े जगत् में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानू क्षय।
मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना
बस इतना होवे करूणामय
तरने की हो शक्ति अनामय।

शब्दार्थ :

  • हानि = नुकसान।
  • जगत्= दुनिया।
  • वंचना = धोखा।
  • क्षय = नुकसान।
  • त्राण = रक्षा, मुक्ति।
  • अनुदिन = प्रत्येक दिन तरने = पार होने, निकल जाने।
  • अनामय = स्वस्थ्य।

प्रश्न 1.
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें। ‘वंचना’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
रचना ‘आत्मत्राण’ है तथा रचनाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। ‘वंचना’ का अर्थ धोखा।

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प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश का भावार्थ लिखें।
उत्तर :
कविता के इस अंश में कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि हो सकता है इस संसार में मुझे हानि ही उठानी पड़े, लाभ मेरे लिए मात्र एक धोखा हो। फिर भी मैं इसे अपनी हानि नहीं मानूं। इन सारी चीजों से तुम मुझे प्रतिदिन मुक्ति दो – मैं ऐसा भी नहीं चाहता। मैं तुमसे त्राण पाने कीप्रार्थना नहीं करता। तुम तो मेरे ऊपर केवल इतनी कृपा करो कि मुझमें इन मुसीबतों से त्राण पाने की स्वस्थ शक्ति हो।

काव्यगत सौंदर्य :-

1. प्रस्तुत अंश में कविगुरू की यह भावना दिखाई देती है कि मानव और ईश्वर दोनों के बीच एक अनंत सेतु है।
2. ईश्वर और मानव का संबंध रवीन्द्र-काव्य में एक अपूर्व रूप ले लेता है।
3. जीवन की विपदाओं को कविगुरू अपने बल पर झेलना चाहते हैं।
4. रस शांत है।
5. भाषा की सहजता में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अनुवाद-प्रतिभा के दर्शन होते हैं।

4. मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय –
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत सिर होकर सुख के दिन में
तब मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

शब्दार्थ :

  • भार = बोझ।
  • लघु = छोटा ।
  • सांत्वना = ढाढ़स ।
  • अनुनय = विनती, प्रार्थना।
  • नत = झुका हुआ।
  • छिन-छिन = क्षण-क्षण।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत अंश किस कविता से लिया गया है?
उत्तर :
प्रस्तुत अंश ‘आत्मत्राण’ कविता से लिया गया है।

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प्रश्न 2.
प्रस्तुत अंश का भावार्थ लिखें।
उत्तर :
कविता के इस अंश में कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि हे ईश्वर अगर आप मेरे भार को कम न कर सकें, मुझे मुसीबत के दिनों में ढाढ़स भी न बंधा सके तो भी मेरे ऊपर इतनी कृपा रखेंगे कि मैं अपने दुःख को निर्भय होकर सहन कर सकू। अपने सुख के दिनों में भी मैं नत सिर होकर प्रत्येक क्षण आपको स्मरण कर सकूँ। कहने का भाव यह है कि सुख या दु:ख, दोनों ही दशा में कवि अपने साथ ईश्वर का केवल सानिध्य चाहते हैं।

काव्यगत सौंदर्य :-

1. प्रस्तुत अंश में कविगुरू की यह भावना दिखाई देती है कि मानव और ईश्वर दोनों के बीच एक अनंत सेतु है।
2. ईश्वर और मानव का संबंध रवीन्द्र-काव्य में एक अपूर्व रूप ले लेता है।
3. जीवन की विपदाओं को कविगुरू अपने बल पर झेलना चाहते हैं।
4. रस शांत है।
5. भाषा की सहजता में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अनुवाद-प्रतिभा के दर्शन होते हैं।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

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WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 Question Answer – रैदास के पद

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : पाठचक्रम में संकलित पद के आधार पर संत रैदास की भक्ति-भावना का परिचय दें ।
प्रश्न – 2 : रैदास किस प्रकार की भक्ति करते थे ? पाठ के आथार पर स्पप्प कीजिए ।
प्रश्न – 3 : पठित पाठ के आधार पर ‘रैदास के पद’ का सारांश लिखें ।
प्रश्न – 4 : ‘रैदास के पद’ में निहित संदेश को लिखें ।
प्रश्न – 5 : भक्त कवि के रूप में संत रैदास का परिचय दें।
उत्तर :
संत रैदास उस जाति तथा समाज में पले-बढ़े थे जो हिन्दू होते हुए भी हिंदुओं द्वारा आदर न पाता था। वह कुल-परंपरा से विद्या प्राप्त करने के अयोग्य माना जाता था। शास्व-ज्ञान प्राप्त करने का दरवाजा उसके लिए बंद हो गया था। ये गरीबी में जनमते थे, गरीबी में ही पलते थे और उसी में मर जाया करते थे। ऐसे समाज तथा वातावरण में पैदा हुए व्यक्ति के लिए धर्म के आडंबर पर चोट करना जीवन-मरण का प्रश्न था । संत रैदास इसी समाज के रल थे । कबीर की तरह संत रैदास की भाषा सीधे चोट नहीं करती, वह तो मीठी छूरी की तरह वार करती है ।

जहाँ तक संत रैदास की भकित-भावना की बात है उनकी भक्ति दास्य भाव की है । रैदास ईश्वर के प्रति अपनी भावना प्रकट करते हुए कहते हैं कि आप चंदन की तरह सुगंध-युक्त हैं तथा मैं पानी की तरह हूँ जिसमें कोई सुगध नहीं होती। आपकी सुंगध मेरे अंग-अंग में समायी हुई है। आप मेरे लिए वैसे ही हैं जैसे चकोर के लिए चंद्रमा । प्रभु आप तो दीपक तथा मैं बाती के समान हूँ।

वे कहते हैं कि मेरी बुद्धि चंचल है और इस चंचल बुद्धि से आपकी भवित भला कैसे की जा सकती है । ईश्वर का वास तो प्रत्येक के हूदय में है लेकिन मैं अज्ञानतावश उसे नहीं देख पाया । आपके गुण तो अपार हैं और मैं गुणहीन हूँ। आपने जो उपकार मेरे ऊपर किए हैं मैने उसे भी नहीं माना, भुला दिया । में अपनी-पराये के भेद्भाव में पड़ा रहा और इससे भला में कैसे मोक्ष पा सकता हूँ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

अविगत ईश्वर के चरण पाताल में तथा सिर आसमान को छूते हैं – भला जिनका विस्तार इतना विशाल है, जिसे शिव, सनक आदि भी न जान सके, जिसे खोजते-खोजते स्वय व्रहा ने भी अपने जन्म को गंवा दिया – वे भला मंदिर में कैसे समा सकते हैं। जिनके पैरों के नख से गंगा प्रवाहित होती हो, जिनकी रोमावली से ही अठ्ठारह पुराणों का जन्म हुआ हो तथा चारों वेद जिनकी साँसों में बसा हो – उस असीम, निर्गुण, निराकार ईश्वर की उपासना ही रैदास करते हैं।

काम, क्रोध, मोह, मद और माया ये पाँचों मिलकर मनुष्य को लूट लेते हैं। अर्धात् ईश्वर से विभुख कर देते हैं। पढ़लिखकर भी मनुष्य को तब तक सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती जब तक कि वह अनासक्त भाव से ईश्वर की भक्ति न करे । ठीक वैसे ही जैसे बिना पारस के स्पर्श के लोहा सोने में नहीं बदल सकता।

जो मित्र, शब्तु तथा जाति-अजाति के बंधन से मुक्त हैं, जिनके हुदय में सबके लिए हित की भावना हो – वही तीनों लोकों में यश की प्राप्ति कर पाते है – इसे वे लोग कहाँ जान पाते हैं जिनके हुदय में ईश्वर-भवित नहीं हैं। हे कृष्ण, आपने ही घड़ियाल के मुख से गज की रक्षा की तथा अजामिल एवं गणिका जैसे तुच्छ प्राणियों को मोक्ष प्रदान किया । जब आपने ऐसों-ऐसों का उद्धार किया तो फिर रैदास का उद्धार क्यों नहीं करते ?

इस प्रकार संत रैदास ने अपने पदों के द्वारा यह संदेश देना चाहा है कि श्रेष्ठ वही है जो धर्म, संप्रदाय, जाति, कुल और शास्ब्र की रूढ़ियों से नहीं बंधा हुआ है । धर्म के नाम पर दिखावा करना तथा संस्कारों की विचारहीन गुलामी रैदास को पसंद् नहीं थी तथा इन्हीं बेड़ियों को तोड़ने का संदेश उनके पदों में छिपा है । रैदास के लिए ईश्वर-प्रेम ही सबकुछ है । यह प्रेम, धर्म तथा समाज की बनाई रूढ़ियों से बहुत ऊपर है –

मित्र सत्रु अजाति सबते, अंतरि लावै हेत रे ।
लोग बाकी कहा जानैं, तीनि लोक पवित रे ।

वस्तुनिष्ठ सह व्याख्यामूलक प्रश्नोत्तर

1. प्रभु जी तुम चंदन हम पानी जाकी अंग-अंग बास समानी 
प्रभु ती तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत घंद चकोरा ||

प्रश्न – 1.
प्रस्तुत अंश के कवि का नाम लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश के कवि संत रैदास हैं।

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प्रश्न – 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में रैदास ईश्वर की आराधना करते हुए कहते हैं कि आप चंदन की तरह सुंगधयुक्त हैं और मैं पानी की तरह गंधरहित हूँ । आपकी सुगंध मेरे अंग में समायी हुई है । आप तो उस काले बादल के समान है जिसे देखकर मेरा मनरूपी मयूर नाच उठता है ।

2. प्रभु जी तुम दीपक हम बाती । जाकी जोति बरे दिन राती ।
प्रयु जी तुम मोती हम धागा । जैसे सोनहि मिलत सोहागा ।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा । ऐसी भक्ति करे रैदासा ।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पद्यांश किस कविता से उद्धुत है ?
उत्तर :
प्रस्तुत पद्यांश ‘रैदास के पद्’ से उद्दृत है ।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पद्यांश में संत रैदास ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति-भावना प्रकट करते हुए कहते हैं कि आप मेरे लिए वैसे ही हैं जैसे चाँद के लिए चकोर। आप दीपक तथा मैं बाती हूँ। आपके बिना मैं अधूरा हूँ। आपका ही प्रकाश इस संसार में फैला हुआ है । प्रभु, आप मोती तथा मैं धागा हूँ । मैने अपने-आपको आपकी भक्ति में वैसे ही विलीन कर दिया है जैसे सोने में सुहागा विलीन हो जाता है । हे प्रभु, आप मेरे स्वामी हैं तथा मैं आपका सेवक हूँ । इसी सेवक के भाव से मै आपकी भक्ति करता हूँ।

3. नहररिचंचल मति मोरी
कैसे भगति करों मैं तोरी ||

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पंक्तियों के रचनाकार का नाम लिखिए।
उत्तर :
रचनाकार संत कवि रैदास हैं।

प्रश्न 2.
अंश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए ।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में संत रैदास अपने मन की स्थिति का वर्णन करते हुए ईश्वर से कहते हैं कि मेरी मति तो चंचल है और इस चंचल मति के सहारे भला आपकी भक्ति कैसे की जा सकती है। कहने का भाव यह है कि जब तक मन एकाग्र नहीं होता तब तक उसे प्रभु-भक्ति में नहीं लगाया जा सकता ।

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4. तू योहि देख, हाँ तोहि देख पीति परस्पर होई ।
तू मोहि देख, हैं तोहि न देखे, इहि मति सक किष खोई

प्रश्न 1.
प्रस्तुत अंश किस कविता से लिया गया है ?
उत्तर :
प्रस्तुत अंश ‘रैदास के पद’ से लिया गया है ।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
संत रैदास कहते हैं कि हे ईश्वर जब तक हम एक-दूसरे को परस्पर नहीं देखते हैं तो भला प्रेम कैसे हो सकता है। आप तो मुझे देखते हैं पर मैं आपको नहीं देखता । अपनी इसी बुद्धि के कारण मैं अपनी सुध खो बैठा हूँ।

5. सब घट अंतरि रमसि निरतंरि, मे देखत हैं जहीं जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औरुन, कित उपकार न माना ।

प्रश्न 1.
रचना के कवि का नाम लिखें ।
उत्तर :
इस रचना के कवि संत रैदास हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में संत रैदास कहते हैं कि ईश्वर का वास तो प्रत्येक व्यक्ति के हूदय में है लेकिन मैं अज्ञानतावश आपको नहीं देख पाया । आप तो गुणों की खान हैं और मैं गुणहीन हूँ, इसलिए मैंने आपके द्वारा किए गए उपकार को नहीं माना ।

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6. मे तैं तोरि योरि असमझ सों, केसे करि निसतारा ।
कहे ‘रैदास’ कृस्न करुणां में, जे जे जगत अधारा

प्रश्न 1.
कविता का नाम लिखें ।
उत्तर :
कविता का नाम ‘रैदास के पद’ है ।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत अंश में संत रैदास कहते हैं कि मैं इस संसार में अपने-पराये के भेद-भाव में पड़ा रहा । इस बुद्धि के रहते भला मुझे मोक्ष की प्राप्ति कैसे हो सकती है । मेरे कृष्ण तो करूणामयी हैं, वही इस जगत के आधार हैं। ऐसे करूणामयी कृष्ण की मैं जय-जयकार करता हूँ।

प्रश्न 3.
प्रस्तुत पंक्ति का प्रसंग सहित आश स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
प्रस्तुत पद में रैदास ने राम-नाम की महत्ता का गुणगान करते हुए कहते हैं कि बिना राम (ईश्वर) का नाम लिए मनुष्य संशय से नहीं छूट सकता है। काम, क्रोध, मोह, मद और माया ये पाँचों मिलकर मनुष्य को लूट लेते हैं। अर्थात् ईश्वर-नाम से विमुख कर देते हैं।

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12. हम बड़ कवि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संन्यासी |
र्दांनी गुनीं सूर हम दाता, बहु मति कदे न नासी ||

प्रश्न 1.
रचनाकार का नाम लिखें ।
उत्तर :
रचनाकार भक्तिकालीन संत कवि रैदास हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पद्यांश में संत रैदास कहते हैं कि मन का यह भाव कि मैं बड़ा कवि हूँ, कुलीन हूँ, पंडित हूँ, योगीसन्यासी हूँ. गुणी-ज्ञानी तथा दाता हूँ – कभी नष्ट नहीं होता । जब तक मन का यह भाव नष्ट नहीं होता तब तक भला ईश्वर की भक्ति कैसे की जा सकती है।

13. पढ़ें गुनें कहु समझि न परई, जौ लौ अनभै भाव न दरसै ।
लोहा हर न होड हूं कैसे, जो पारस नहीं परसे ||

प्रश्न 1.
रचनाकार तथा रचना का नाम लिखें ।
उत्तर :
रचनाकार भक्तिकाल के संत कवि रैदास हैं तथा रचना का नाम ‘रैदास के पद’ है।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पंक्तियों का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियों में संत रैदास कहते हैं कि इस संसार में केवल पढ़ने-लिखने से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, सच्चा ज्ञान तो अनुभव से ही प्राप्त किया जा सकता है। अनुभव के बिना मनुष्य ज्ञानी नहीं बन सकता है ठीक वैसे ही जैसे पारस के स्पर्श के बिना लोहा सोने में नहीं बदल सकता।

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14. कहै रैदास और असमझसि, भूमि परे क्रम भोरे ।
एक अधार नाम नरहरि कौ, जीवनि प्रान घन मोरे।

प्रश्न 1.
रचना का नाम लिखें ।
उत्तर :
रचना का नाम ‘रैदास के पद’ है ।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पद्यांश में संत रैदास कहते हैं कि मनुष्य अज्ञानतावश भ्रम के बंधन में पड़ा रहता है । इस संसार में एकमात्र आधार राम-नाम ही है और वही राम-नाम मेरा प्राणरूपी धन है ।

15. दे चित चेति कहि अचेत काहे, बालमीकाहै देख ?
जाति थैं कोई पदि न पहुच्या, राम भगाति बिसेषरे ||

प्रश्न 1.
रचनाकार का नाम लिखें
उत्तर :
रचनाकार भक्तिकाल के संत कवि रैदास हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर : रैदास कहते हैं कि मेरे मन तू चेतता क्यों नहीं है ? सावधान क्यों नहीं हो जाता । उदाहरण के लिए वाल्मीकि को देखो । वे जाति के कारण विशेष पद को प्राप्त नहीं कर सके । ईश्वर की भक्ति से ही वे विशेष पद को पा सके । इसलिए चेतकर अपना सारा ध्यान ईश्वर-भक्ति में लगा।

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16. बटकम सहित जे विप्र होते, हरि भगति चित द्रिढ़ जांहि रे।
हरिकथा सुहाय नांहीं, सुपच तुले तांहि रे ||

प्रश्न 1.
इस रचना के कवि कौन हैं?
उत्तर :
इस रचना के कवि रैदास हैं।

प्रश्न 2.
प्रस्तुत पंक्ति का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
संत रैदास कहते हैं कि कोई ब्राह्मण छ: कर्मों से युक्त होकर भी अपने हुदय को दृढ़त्तूपर्वक ईश्वर-भक्ति में नहीं लगाता है तथा उसे हरिकथा नहीं सुहाती है तो उसके जैसा अधम कोई नहीं है ।

17. मिश्र सत्रु अजानि सब के, अंतर लावै हैतर ।
लोरि बाकी कहा जानें, तीनि लॉक पवित है ||

प्रश्न – 1.
कवि का नाम लिखें ।
उत्तर : कवि का नाम रैदास है ।

प्रश्न 2.
पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
संत रैदास कहते हैं कि जो मित्र-शत्रु, जाति-अजाति सबके लिए अपने हृदय में हित की भावना रखता है वही तीनों लोकों में यश पाता है । यह बाकी लोग कहाँ जान पाते हैं जिनके हृदय में यह भावना नहीं है।

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18. अजामिल गज गनिका तरी, काटी कुजर की पासि रे।
से दुखति मुकती किये, तो क्येँ तिर्दैस ? ।

प्रश्न 1.
रचना का नाम लिखें ।
उत्तर :
रचना का नाम ‘रैदास के पद’ है ।

प्रश्न 2.
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें
उत्तर :
संत रैदास कहते हैं कि हे ईश्वर, आपने अजामिल गज, तथा गणिका को मोक्ष दिया। संकट में पड़े गज के बंधन को काटा । जब आप ऐसे दुरमतिवालों को मोक्ष देते हैं तो भला रैदास को मोक्ष की प्राप्ति क्यों नहीं हो सकती ? केवल आपकी कृपा-दृष्टि चाहिए।

अति लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रैदास का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1388 में ।

प्रश्न 2.
रैदास का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
काशी में ।

प्रश्न 3.
रैदास के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर :
रघु ।

प्रश्न4.
रैदास की माता का नाम क्या था ?
उत्तर :
घुरविनिया।

प्रश्न 5.
रैदास किस जाति के थे ?
उत्तर :
चर्मकार।

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प्रश्न 6.
रैदास का पैतृक व्यवसाय क्या था ?
उत्तर :
जूते बनाना ।

प्रश्न 7.
रैदास किसके समकालीन थे ?
उत्तर :
कबीर के ।

प्रश्न 8.
रैदास के गुरु कौन थे ?
उत्तर :
रामानंद।

प्रश्न 9.
रैदास के गुरुभाई का नाम लिखें ।
उत्तर :
कबीर ।

प्रश्न 10.
रैदास किसकी शिष्य मण्डली के महत्वपूर्ण सदस्य थे ?
उत्तर :
रामानंद।

प्रश्न 11.
रैदास के स्वभाव की क्या विशेषताएँ थी ?
उत्तर :
परोपकारी, द्यालु तथा दूसरों की सहायता करना।

प्रश्न 12.
रैदास के माता-पिता उनसे क्यों नाराज़ रहते थे ?
उत्तर :
उनकी दानशीलता तथा परोपकारिता के कारण।

प्रश्न 13.
रैदास ने व्यावहारिक ज्ञान किससे प्राप्त किया था ?
उत्तर :
साधु-संतों की संगति से ।

प्रश्न 14.
रैदास किस काल के कवि थे ?
उत्तर :
भक्तिकाल के।

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प्रश्न 15.
रैदास किस धारा के कवि थे ?
उत्तर :
ज्ञानाश्रयी शाखा के ।

प्रश्न 16.
रैदास ने किसे सारहीन तथा निरर्थक बताया है ?
उत्तर :
ऊँब-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किए जानेवाले विवाद को ।

प्रश्न 17.
रैदास के समय में कौन काशी के सबसे प्रसिद्ध प्रतिष्ठित संत थे ?
उत्तर :
रामानंद ।

प्रश्न 18.
रैदास की भक्ति किस भाव की है ?
उत्तर :
दास्यभाव की।

प्रश्न 19.
रैदास के अनुसार ईश्वर का वास कहाँ है ?
उत्तर :
हुदय में ।

प्रश्न 20.
रैदास ने जगत का आधार किसे बताया है ?
उत्तर :
ईश्वर को ।

प्रश्न 21.
रैदास ने किसकी मति को चंचल बताया है ?
उत्तर :
अपनी मति को ।

प्रश्न 22.
किसके चरण पाताल तथा सिर आसमान को छूते हैं ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार ईश्वर के

प्रश्न 23.
कौन निर्गुण-निराकार ईश्वर का अंत (रहस्य) न पा सके ?
उत्तर :
शिव और सनक आदि ।

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प्रश्न 24.
ब्रहा ने किसकी खोज में अपना जन्म गंवा दिया ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार ईश्वर की खोज में ।

प्रश्न 25.
किसके नाखून के पसीने से गंगा प्रवाहित हुई है ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार ईश्वर के ।

प्रश्न 26.
किसकी रोमावली से अठ्ठारह पुराणों का जन्म हुआ है ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार ईश्वर की रोमावली से ।

प्रश्न 27.
चारों वेद किसकी सांसों में बसा है ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार ईश्वर की सांसों में ।

प्रश्न 28.
किसके बिना संशय की गांठ नहीं छूट सकती है ?
उत्तर :
राम (ईश्वर) की भक्ति।

प्रश्न 29.
‘इन पंचन’ से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
काम, क्रोध, मोह, मद तथा माया।

प्रश्न 30.
‘घटकम’ कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान तथा प्रतिग्रह ।

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प्रश्न 31.
‘ऐसे दुरमति’ का प्रयोग किसके लिए किया गया है ?
उत्तर :
अजामिल तथा गणिका के लिए।

प्रश्न 32.
रैदास ने जीवन का आधार किसे माना है ?
उत्तर :
ईश्वर के नाम-स्मरण को ।

प्रश्न 33.
रैदास ने अपना जीवन-प्राण किसे माना है ?
उत्तर :
नरहरि को ।

प्रश्न 34.
कोई मनुष्य उच्च पद को कैसे प्राप्त करता है ?
उत्तर :
ईश्वर-भक्ति के द्वारा।

प्रश्न 35.
‘तुम चंदन हम पानी’ में चंदन और पानी कौन है ?
उत्तर :
घंदन ईश्वर हैं तथा पानी रैदास ।

प्रश्न 36.
‘घन’ और ‘मोर’ से किसे संकेतित किया गया है ?
उत्तर :
घन से ‘ईश्वर’ को तथा ‘मोर’ से रैदास ने अपने-आप को संकेतित किया है ।

प्रश्न 37.
किसकी ज्योति दिन-रात जलती रहती है ?
उत्तर :
ईश्वररूपी दीपक की।

प्रश्न 38.
‘मोती’ और ‘धागे’ से कौन संकेतित हैं ?
उत्तर :
ईश्वर तथा रैदास ।

प्रश्न 39.
‘स्वामी’ और ‘दासा’ कौन हैं ?
उत्तर :
‘स्वामी’ ईश्वर तथा ‘दासा’ रैदास हैं।

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प्रश्न 40.
रैदास के राम कौन हैं ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार बह्म।

प्रश्न 41.
रैदास ईश्वर से क्या इच्छा प्रकट करते हैं ?
उत्तर :
वे उन्हें भी मोक्ष प्रदान करें ।

प्रश्न 42.
किसका सिर आसमान को छूता है ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार बह्न के ।

प्रश्न 43.
रैदास की भाषा क्या है ?
उत्तर :
ब्रजभाषा।

प्रश्न 44.
रैदास ने किसे सहर्ष अपनाया ?
उत्तर :
अपने पैतृक व्यवसाय को।

प्रश्न 45.
रैदास के अनुसार भक्ति-मार्ग की सबसे बड़ी बाथा क्या है ?
उत्तर :
अज्ञानता तथा अहंकार।

प्रश्न 46.
लोहा किसके स्पर्श से सोने में बदल जाता है ?
उत्तर :
पारस के स्पर्श से ।

संक्षिप्त प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
रैदास जी ने भक्ति मार्ग को सबसे बड़ी बाधा किसे माना है?
उत्तर :
रैदास जी ने मन की चंचलता को भक्ति-मार्ग की सबसे बड़ी बाधा माना है ।

प्रश्न 2.
पाँच विकार कौन-कौन हैं ?
उत्तर :
पाँच विकार इस प्रकार हैं – काम, क्रोध, मोह, मद, माया।

प्रश्न 3.
ईश्वर का निवास स्थान कहाँ है ?
उत्तर :
संत रैदास जी के अनुसार ईश्वर का निवास-प्रत्येक घट अर्थात् शरीर है। कण-कण में भी है।

प्रश्न 4.
रैदास के प्रभु के चरण और शीश कहाँ तक हैं ?
उत्तर :
रैदास के प्रभु के चरण पाताल तक और शीश आसमान तक हैं।

प्रश्न 5.
रैदास के अनुसार ईश्वर का वास कहाँ है ?
उत्तर :
हद्दय में ।

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प्रश्न 6.
रैदास ने किसे सारहीन तथा निरर्थक बताया है ?
उत्तर :
ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किए जानेवाले विवाद को।

प्रश्न 7.
मानव को कौन पाँच मिलकर लूटते हैं ?
उत्तर :
मानव को काम, क्रोध, मोह, मद तथा माया – ये पाँच मिलकर लूटते हैं।

प्रश्न 8.
रैदास के अनुसार सच्चे ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है ?
उत्तर :
रैदास के अनुसार अनुभव से ही सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है ।

प्रश्न 9.
ईश्वर की कृपा से कौन-कौन तर गए/मोक्ष पा गए ?
उत्तर :
ईश्वर की कृपा से अजामिल, गज तथा गणिका मोक्ष पा गए।

प्रश्न 10.
रैदास ईश्वर से क्या विनती करते हैं ?
उत्तर :
रेदास ईश्वर से यह विनती करते हैं कि उन्होंने अजामिल, गज तथा गणिका जैसे अधम को मोक्ष प्रदान किया तो उन्हे क्यों नहीं मोक्ष देते हैं।

प्रश्न 11.
रैदास के अनुसार किसे हरिकथा नहीं सुहाती है ?
उत्तर :
रैदास के अनुसार उन्हें हरिकथा नहीं सुहाती है जो जीविका हेतु षटकर्म तो करते हैं लेकिन हदयय में ईश्वर के प्रति दृढ़ भक्ति नहीं हैं।

प्रश्न 12.
अजामिल कौन था ?
उत्तर :
अजामिल कन्नौज का व्वाह्मण था। एक वेश्या के प्रेम में पड़कर उसने पल्नी का त्याग कर दिया तथा उसे घर ले आया। वेश्या के चक्कर में उसने अपना सब कुछ गंवा दिया। वेश्या से उत्पन्न सबसे छोटे बेटे का नाम उसने नारायण रखा। मृत्यु के समय नारायण का नाम लेने पर यमदूत भाग खड़े हुए तथा ईश्वर के दूत आकर उसे स्वर्ग ले गए।

प्रश्न 13.
‘रैदास के पद’ में उल्लिखित गज-कथा को संक्षेप में लिखें ।
उत्तर :
‘भागवत पुराण’ की कथा के अनुसार दक्षिण का पांड्यवंशी राजा अगस्य मुनि के शाप से हाथी की योनि में जन्म लिया। एक दिन य्यास बुझाने सरोवर में गया तो एक ग्राह ने उसे पकड़ लिया । ग्राह से मुक्ति के लिए उसने विष्यु से पार्थना की। विष्णु ने ग्राह से गज को मुक्त कराया।

प्रश्न 14.
‘रैदास के पद’ में उल्लेखित गणिका से संबंधित कथा को संक्षेप में लिखें ।
उत्तर :
जोवंती नामक वेश्या अपने तोते को बहुत प्यार करती थी। एक दिन भिक्षा माँगने आए एक साधु ने उसे तोते को राम नाम पढ़ाने को कहा । तोते को सिखाने के क्रम में उसकी जीभ इतनी अभ्यस्त हो गई कि मृत्यु के समय भी अनायस उसके मुख से राम-राम निकला और उसे मोक्ष प्राप्त हो गया।

प्रश्न 15.
कौन-सी मति कभी नष्ट नहीं होती है ?
उत्तर :
यह मति कि हम बड़े कवि हैं, पंडित हैं, योगी-सन्यासी हैं, दानी हैं – कभी नष्ट नहीं होती है।

प्रश्न16.
वाल्मीकि कैसे ऊँचे पद को प्राप्त हुए ?
उत्तर :
संस्कृत भाषा के आदि कवि और आदि काव्य ‘रामायण’ के रचयिता के रूप में वाल्मीकि की प्रसिद्धि है। तमसा नदी के तट पर व्याध द्वारा क्रोंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डालने पर वाल्मीकि के मुंह से व्याध के लिए शाप के जो उद्गार निकले वे लौकिक छंद के एक श्लोक के रूप में थे। इसी छंद में उन्होंने नारद से सुनी राम-कथा के आधार पर रामायण की रचना की और वे ऊँचे पद को प्राप्त हुए।

प्रश्न 17.
रैदास चित्त को किसे देखने को कहते हैं?
उत्तर :
ईश्वर (कृष्णा) को देखने को कहते हैं।

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प्रश्न 18.
भक्ति के मार्ग को सबसे बड़ी बाधा क्या है ?
उत्तर :
भक्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानव का चंचल चित्त है ।

प्रश्न 19.
रैदास जी कबीर के गुरू भाई कैसे थे ?
उत्तर :
दोनों एक ही गुरू रामानंद के शिष्य होने के कारण गुरूभाई थे।

प्रश्न 20.
‘अविगत नाथ’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
अविगत नाय का अर्थ है – वह ईश्वर जिसे आज तक कोई समम्र रूप में नहीं जान सका।

प्रश्न 21.
रैदास ने किसकी मति को चंचल बताया है।
उत्तर :
रैदास ने अपनी मति को चंचल बताया है।

प्रश्न 22.
रैदास के ईश्वर का स्वरूप कैसा है ?
उत्तर :
रैदास के ईश्वर निर्गुण, निराकार, असीम, अविगत तथा अविनासी है ।

प्रश्न 23.
रैदास ने किसे सारहीन तथा निरर्थक बताया है ?
उत्तर :
रैदास ने अहंकार के भाव को सारहीन तथा निरर्थक बताया है।

प्रश्न 24.
राम के बिना संसै की गाँठ क्यों नहीं खुलती है ?
उत्तर :
राम की कृपा के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती और न ही मनुष्य काम, कोध, मोह, मद, माया के बंधन से नहीं छूट सकता है – इसलिए संसै की गाँठ नहीं खुलती है।

प्रश्न 25.
संत कवि रैदास को अपने तरने का दृढ़ विश्वास क्यों है ?
उत्तर :
रैदास के कृष्ण ने अजामिल, गज, गणिका, कुजर जैसो को तारा इसलिए उन्हें अपने तरने का दृढ़ विश्वास है।

प्रश्न 26.
आदिकवि किसे कहा गया है ?
उत्तर :
वाल्मीकि को आदिकवि कहा गया है।

प्रश्न 27.
रैदास क्या थे ?
उत्तर :
रैदास संतकवि थे।

प्रश्न 28.
किसके चरण पाताल, सिर आसमान को छूते हैं ?
उत्तर :
निर्गुण-निराकार ईश्वर के चरण पाताल तथा सिर आसमान को छूते हैं।

प्रश्न 29.
रैदास के ईश्वर का स्वरूप कैसा है ?
उत्तर :
रैदास के ईश्वर का स्वरूप निर्गुण॰निराकार है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

प्रश्न 30.
संत रैदास ने किसे मोती और किसे धागा कहा है ?
उत्तर :
संत रैदास ने ईश्वर को मोती और स्वंय को धागा कहा है।

प्रश्न 31.
पंच विकार क्या करते हैं?
उत्तर :
पंच विकार मिल कर मनुष्य का सर्वस्त लूट लेते हैं।

प्रश्न 32.
रैदास ने अपने-आप को किस-किस के समान बताया है ?
उत्तर :
रैदास ने अपने आपको पानी, मोर, बाती, चकोर, धागा तथा दास के समान बताया है।

प्रश्न 33.
रैदास की भक्ति किस प्रकार की है ?
उत्तर :
रैदास की भक्ति दास्य भाव की है जिसमें भक्त ईश्वर को स्वामी तथा अपने को दास के समान मानता है।

प्रश्न 34.
‘गुन अब तोर मोर सब सौगुन, क्रित उपकार न माना’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति का अर्थ है कि सारे गुण आपके हैं तथा सारे अवगुण मेरे हैं क्योंकि मैंने आपके किए हुए उपकार को नहीं माना ।

प्रश्न 35.
रैदास ने ईश्वर की तुलना किस-किस से की है ?
उत्तर :
रैदास ने ईश्वर की तुलना चंदन, घन, दीपक, चंद्रमा, मोती तथा स्वामी से की है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘रोमावली अठारह’ का क्या अर्थ है?
(क) अट्नारह रोमावती
(ख) अद्ठारह भक्त
(ग) अद्ठारह गुण
(घ) अट्ठारह पुराण
उत्तर :
(घ) अद्ठारह पुराण

प्रश्न 2.
मोर किसे देखकर नाचता है ?
(क) सूर्य
(ख) चन्द्रमा
(ग) बादल
(घ) व्यक्ति
उत्तर :
(ग) बादल

प्रश्न 3.
रैदासजी के अनुसार ईश्वर का निवास है ?
(क) घर में
(ख) मस्जिद में
(ग) घट-घट में
(घ) मंदिर में
उत्तर :
(ग) घट-घट में ।

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प्रश्न 4.
रैदास के पिता का नाम क्या था ?
(क) रघुवीर दास
(ख) रग्यु
(ग) जग्गू
(घ) रामदास
उत्तर :
(ख) रग्यु ।

प्रश्न 5.
रैदास की माता का नाम क्या था ?
(क) हुलसी
(ख) तुलसी
(ग) मीरा
(घ) घुरविनिया
उत्तर :
(घ) घुरविनिया।

प्रश्न 6.
रैदास का जन्म कब हुआ था ?
(क) सन् 1388 में
(ख) सन् 1288 में
(ग) सन् 1188 में
(ब) सन् 1488 में
उत्तर :
(क) सन् 1388 में।

प्रश्न 7.
रैदास किसके शिष्य थे ?
(क) रामानंद के
(ख) रामानुजाचार्य के
(ग) भगवान राम के
(घ) मीरा के
उत्तर :
(क) रामानंद के।

प्रश्न 8.
रैदास की साहत्यिक भाषा क्या है ?
(क) खड़ी बोली
(ख) अरबी
(ग) अवधी
(घ) ब्रजभाषा
उत्तर :
(घ) ब्रजभाषा ।

प्रश्न 9.
रैदास का पैतृक व्यवसाय क्या था ?
(क) बढ़ईगिरी
(ख) चर्मकार
(ग) लुहार का
(घ) कृषि
उत्तर :
(ख) चर्मकार (जूते बनाना)।

प्रश्न 10.
रैदास किसके भक्त थे ?
(क) कृष्ण के
(ख) मीरा के
(ग) राम के
(घ) हनुमान के
उत्तर :
(क) कृष्ण के ।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौन वेद नहीं है ?
(क) ॠ्वेद
(ख) सामवेद
(ग) अथर्ववेद
(घ) रामायण
उत्तर :
(घ) रामायण

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन वेद नहीं है?
(क) मग्वेद
(ख) अथर्ववेद
(ग) यजुर्वेद
(घ) महाभारत
उत्तर :
(घ) महाभारत ।

प्रश्न 13.
रैदास किस शाखा के कवि थे ?
(क) प्रेमाश्रयी
(ख) ज्ञानात्रयी
(ग) रीतिबद्ध
(घ) रीतिसिद्ध
उत्तर :
(ख) ज्ञानाश्रयी ।

प्रश्न 14.
रैदास समर्थक थे –
(क) मूर्तिपूजा के
(ख) मंदिर जाने के
(ग) इस्लाम के
(घ) निर्गुण-निराकार ब्रह्म के
उत्तर :
(घ) निर्गुण-निराकार ब्रह्म के ।

प्रश्न 15.
रैदास से कौन अप्रसन्न रहते थे ?
(क) माता-पिता
(ख) कबीर
(ग) रामानंद
(घ) लोग
उत्तर :
(क) माता-पिता ।

प्रश्न 16.
रैदास किस काल के कवि थे ?
(क) रीतिकाल
(ख) आदिकाल
(ग) भक्तिकाल
(घ) आधुनिककाल
उत्तर :
(ग) भक्तिकाल ।

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प्रश्न 17.
रैदास की भाषा क्या है ?
(क) ब्रजभाषा
(ख) अवधी
(ग) सधुक्कड़ी
(घ) खड़ी बोली
उत्तर :
(क) ब्रजभाषा।

प्रश्न 18.
रैदास जी का अधिकार समय व्यतीत होता था ?
(क) चित्रकारी में
(ख) पर्यटन में
(ग) ईश्वर भजन एवं सत्संग में
(घ) लेखन में
उत्तर :
(ग) ईश्वर भजन एवं सत्संग में।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से रैदास ने ईश्वर को किसके समान नहीं बताया है ?
(क) मोती
(ख) सागर
(ग) चंदन
(घ) दीपक
उत्तर :
(ख) सागर ।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में से रैदास ने किसके समान अपने को नहीं बताया है ?
(क) धागा
(ख) सोहागा
(ग) बाती
(घ) चंदन
उत्तर :
(घ) चंदन ।

प्रश्न 21.
रैदास किसकी भक्ति करना चाहते हैं ?
(क) राम की
(ख) कृष्ष की
(ग) विष्णु की
(घ) गणेश की
उत्तर :
(क) राम की।

प्रश्न 22.
प्रत्येक व्यक्ति के अंदर किसका निवास है ?
(क) ईश्वर का
(ख) कृष्ण का
(ग) रैदास का
(घ) तुलसीदास का
उत्तर :
(क) ईश्वर का।

प्रश्न 23.
रैदास ने किसे ‘करुणामैं’ कहा है ?
(क) स्वयं को
(ख) कृष्ण को
(ग) राम को
(घ) ईश्वर को
उत्तर :
(ख) कृष्ण को ।

प्रश्न 24.
‘अविगत’ कौन है ?
(क) रैदास
(ख) कृष्ण
(ग) ईश्वर
(घ) आत्मा
उत्तर :
(ग) ईश्वर ।

प्रश्न 25.
रैदास ने इस जगत का आधार किसे बताया है ?
(क) कृष्ण को
(ख) राम को
(ग) शेष नाग को
(घ) विष्यु को
उत्तर :
(क) कृष्ण को।

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प्रश्न 26.
रैदास ने हरि-सेवा का कौन-सा मार्ग बताया है ?
(क) ज्ञान
(ख) प्रेम
(ग) सहज समाधि
(घ) बाह्याडंबर
उत्तर :
(ग) सहज समाधि ।

प्रश्न 27.
‘सुरसरि’ का अर्थ है ?
(क) नदी
(ख) गंगा
(ग) सागर
(घ) सुरसा
उत्तर :
(ख) गंगा ।

प्रश्न 28.
किसके बिना संशय की गांठ नहीं छूटती ?
(क) राम
(ख) ज्ञान
(ग) प्रेम
(घ) भक्ति
उत्तर :
(क) राम ।

प्रश्न 29.
किसके नाखून के पसीने से गंगा प्रवाहित हुई है ?
(क) राम
(ख) कृष्ण
(ग) ईश्वर
(घ) रैदास
उत्तर :
(ग) ईश्वर ।

प्रश्न 30.
शिव, सनक मुनि आदि किसका अंत नहीं पा सके ?
(क) निर्गुण-निराकार ईश्वर
(ख) राम
(ग) कृष्ण
(घ) पृथ्वी
उत्तर :
(क) निर्गुण-निराकार ईश्वर।

प्रश्न 31.
चारों वेद किसका गुणगान करते हैं ?
(क) राम का
(ख) कृष्ण का
(ग) रैदास का
(घ) निर्गुण, निराकार ईश्वर का
उत्तर :
(घ) निर्गुण, निराकार ईश्वर का ।

प्रश्न 32.
‘अनभैभाव’ का अर्थ है –
(क) अनुभवहीन
(ख) अनुभव का भाव
(ग) अनगढ़
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) अनुभव का भाव ।

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प्रश्न 33.
लोहा किसके स्पर्श से सोने में बदल जाता है ?
(क) पारा
(ख) तांबा
(ग) पारस
(घ) संगमरमर
उत्तर :
(ग) पारस ।

प्रश्न 34.
रैदास ने ‘प्राणधन’ किसे कहा है ?
(क) राम को
(ख) कृष्ण को
(ग) ईश्वर के नाम को
(घ) साँस को
उत्तर :
(ग) ईश्वर के नाम को।

प्रश्न 35.
निम्नलिखित में से कृष्ण ने किसका उद्धार नहीं किया ?
(क) रावण का
(ख) अजामिल का
(ग) गज का
(घ) गणिका का
उत्तर :
(क) रावण का ।

प्रश्न 36.
रैदास ने ईश्वर और अपनी तुलना निम्न में से किससे नहीं की है ?
(क) फूल-काँटा
(ख) चंदन-पानी
(ग) दीपक-बाती
(घ) मोती-धागा
उत्तर :
(क) फूल-काँटा।

प्रश्न 37.
किसने ईश्वर को खोजते-खोजते अपना जन्म गंवा दिया ?
(क) शिव
(ख) सनक
(ग) अजामिल
(घ) बह्या
उत्तर :
(घ) बह्या।

प्रश्न 38.
वेदों की संख्या कितनी है ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर :
(ग) चार।

प्रश्न 39.
रैदास किसे चेत जाने को कहते हैं ?
(क) कवियों को
(ख) भक्तों को
(ग) मन को
(घ) प्राणियों को
उत्तर :
(ग) मन को ।

प्रश्न 40.
‘घटक्रम’ का अर्थ है।
(क) छ: क्रमांक
(ख) छ: क्रम
(ग) छ: का
(घ) छ: कर्म
उत्तर :
(घ) छ: कर्म ।

प्रश्न 41.
‘सुरसरि’ का अर्थ है ?
(क) यमुना
(ख) गंगा
(ग) सरस्वती
(घ) नर्मदा
उत्तर :
(ख) गंगा।

प्रश्न 42.
रैदास के राम कौन हैं ?
(क) दशरथ के पुत्र
(ख) अयोध्या के राजा
(ग) निर्गुण-निराकार ईश्वर
(घ) वनवासी राम
उत्तर :
(ग) निर्गुण-निराकार ईश्वर ।

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प्रश्न 43.
पुराणों की संख्या कितनी है ?
(क) पंद्रह
(ख) सोलह
(ग) सव्रह
(घ) अठारह
उत्तर :
(घ) अठारह ।

प्रश्न 44.
रैदास ने प्रभु को किसके समान बताया है ?
(क) धागा
(ख) दास
(ग) घन
(घ) मोर
उत्तर :
(ग) घन।

प्रश्न 45.
रैदास ने प्रभु को निम्न में से किसके समान बताया है ?
(क) धागा
(ख) सोना
(ग) मोर
(घ) घन
उत्तर :
(घ) घन।

प्रश्न 46.
‘तुम मोती हम धागा’ में मोती कौन है ?
(क) चंदन
(ख) मोर
(ग) चकोर
(घ) प्रभु
उत्तर :
(घ) प्रभु।

प्रश्न 47.
किसकी बास अंग-अंग में समा जाती है?
(क) चंदन
(ख) प्रभु
(ग) सोहागा
(घ) सोना
उत्तर :
(क) चंदन।

प्रश्न 48.
किसकी मति चंचल है ?
(क) प्रभु
(ख) रैदास
(ग) नरहरि
(घ) चकोर
उत्तर :
(ख) रैदास।

प्रश्न 49.
प्रत्येक घट के अंदर किसका वास है ?
(क) पानी
(ख) प्रभु
(ग) रैदास
(घ) सोना
उत्तर :
(ख) प्रभु।

प्रश्न 50.
गुन सब तोर – में ‘तोर’ किसके लिए आया है?
(क) प्रभु
(ख) रैदास
(ग) घट
(घ) प्रीति
उत्तर :
(क) प्रभु।

प्रश्न 51.
‘अविगत’ से क्या तात्पर्य है ?
(क) जो विगत नहीं है
(ख) ईश्वर
(ग) रैदास
(घ) भक्ति
उत्तर :
(ख) ईश्वर।

प्रश्न 52.
रैदास के लिए एकमात्र आधार क्या है ?
(क) पृथ्वी
(ख) आकाश
(ग) भक्ति
(घ) नरहरि
उत्तर :
(घ) नरहारि।

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प्रश्न 53.
प्रभु ने निम्न में से किसको मोक्ष नहीं दिया ?
(क) अजामिल
(ख) गज
(ग) रैदास
(घ) गणिका
उत्तर :
(ग) रैदास।

प्रश्न 54.
रैदास कैसी भक्ति करते हैं ?
(क) गुरू-शिष्य की
(ख) स्र्री-पुरुष की
(ग) स्वामी-दास की
(घ) नर-नारी की
उत्तर :
(ग) स्वामी-दास की।

प्रश्न 55.
कवि रैदास ने प्रभुजी को चंदन एवं अपने को माना है?
(क) हवा
(ख) पानी
(ग) पर्वत
(घ) बर्फ
उत्तर :
(ख) पानी।

प्रश्न 56.
‘प्रभुजी तुम चंदन हम पानी’ में पानी किसे कहा गया है ?
(क) सेवक
(ख) भक्त
(ग) ईश्वर
(घ) दीया
उत्तर :
(ख) भक्त।

प्रश्न 57.
रैदास किसकी भक्ति करना चाहते हैं ?
(क) राम
(ख) कृष्ण
(ग) विष्यु
(घ) गणेश
उत्तर :
(ख) कृष्ण।

प्रश्न 58.
रैदास ने अपने-आपको किसके समान बताया है ?
(क) पानी
(ख) चंदन
(ग) दीपक
(घ) सोहागा
उत्तर :
(क) पानी।

प्रश्न 59.
रैदास किसके गुरुभाई थे ?
(क) रहीम के
(ख) कबीर के
(ग) बिहारी के
(घ) वृंद के
उत्तर :
(ख) कबीर के।

WBBSE Class 10 Hindi रैदास के पद Summary

कवि परिचय 

संत कवि रैदास का जन्म सन् 1388 में काशी (वाराणसी) में हुआ था । पिता का नाम रघु तथा माता का नाम घुरविनिया था। रैदास भक्तिकाल के उन कवियों में से हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से साभाजिक कुरीतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया । इनकी लोकवाणी आज भी जनजन के हृदय में गुंजती है । हलांकि ये ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि थे फिर भी इनका काव्य ज्ञानाश्रयी तथा प्रेमाश्रयी शाखा के बीच सेतु (पुल) का काम करता है । रैदास संत कबीरदास के गुरूभाई थे क्योंकि इनके गुरु भी स्वामी रामानंद ही थे ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद 1

संत रैदास जाति से चर्मकार थे तथा इनका पैतृक व्यवसाय जूते बनाना था। उन्होंने भी इस व्यवसाय को ही अपनाया। प्राय: जरूरतमंदों तथा गरीबों को ये बिना मूल्य लिए ही जूते भेंट कर दिया करते थे । इसी से उनके परोपकारी तथा दयालु स्वभाव का पता चलता है। उनकी इस दानशीलता तथा परोपकारिता के कारण माता-पिता अप्रसन्न रहते थे ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

रैदास ने कबीर की ही तरह ईश्वर-भक्ति के नाम पर बाह्याडबर को बुरा बताया तथा लोगों को आपस में प्रेमपूर्वक मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया। उनका ऐसा मानना था कि सदाचार, परहित की भावना तथा सद्व्यवहार से ही ईश्वर को पाया जा सकता है । उल्लेखनीय है कि भक्तिकाल की सुपसिद्ध कवयित्री मीराबाई ने भी रैदास को ही अपना गुरु बनाया था ।

संत रैदास की भाषा सरल, सहज, मर्मस्पर्शी तथा व्यावहारिक ब्रज़ाषा है। इनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली तथा अरबी-फारसी के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है ।

भावार्थ

पद सं० -1

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी ।
जाकी अंग-अंग बास समानी ।
प्रभु जी तुम घन बन हुम मोरा।
जैसे धितवत चंद चकोरा |
म्रभु जी तुम दीपक हम बाती ।
जाकी जोति बरे दिन राती ।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा ।
जैसे सोनहि मिलत सोहागा ।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा ।
ऐसी भक्ति करे रैदासा

शब्दार्थ :

  • जाकी = जिसकी
  • बास = सुग्ध ।
  • समानी = समावा हुआ ।
  • घन = बादल ।
  • मोरा = मयूर ।
  • चितवत = उदय में बसा हुआ ।
  • चकोरा = बकोर (पथीं)
  • जोति = ज्योति ।
  • बरे = जलता है।
  • दिन राती = दिन – रात ।
  • सोनहिं = सौना ।
  • सोहागा = एक म्रकार का रसायन ।
  • दासा = दास ।

प्रश्न 1.
प्रसुत काव्यांश किस पाठ से उड्यात है ?
उत्तर :
घस्तुत काव्यांश ‘रैदास के पद’ से उद्दुत है।

प्रश्न 2.
इस पध्यांश के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
इस पद्यांश के र्वनाकार भाकाकाल के संत काव रैदास है।

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प्रश्न 3.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्ष लिखें।
उत्तर :
प्रसुत्र पद में रैदास ईंश्वर के पाति अपनी भावना प्रकट करते तुए कहते है कि आप बंदन की तरह सुग्षयुक्त हैं तथा मे पानी की तरह हूं जिसमें कोई सुग्य नहीं होती। आपकी युगध मेरे आग-अंग में समायी हुई है। आप तो उस काले बादस के समान है जिसे देधकर मेरा मनरूपी मवूर नाब उठता है । आप मेरे लिए वैसे ही है जैसे बकोर के लिए चंद्रमा। प्रपु आप तो दोपक तथा में बाती के समान हूं। आपके बिना में अभूरा है तथा आपका ही एकाश दिन-रात कैला रहता है। प्यु, आण मोती तथा मै थागे के समान हैं । मेंने अपने-आपको आपकी माक्त में बैसे ही बिलीन कर दिया

काव्यगत सौदर्य :

1. मस्तुत पद में रैदास की ईश्वर के पति दार्य-भावना प्रकट हुई है।
2. प्रस्तुत्त पद के ‘चितबन, चद, बकोरा’, ‘जाकी जोति’ में अनुपास तथा ‘अंग-अंग’ में चेकानुमास अलंकार है ।
3. रैदास ने ईश्वर को सर्वगुण संपन्न तथा अपने को गुणरहित बताया है ।
4. रस शांत है ।
5. भाषा सरल बजभाषा है।

पद सं० 2.

नरहरि चंथल मति मोरी
कैसे भगति करौं मैं तोरी ।
तू मोहि देखी, हाँ तोहि देखी, प्रीति परस्पर होई ।
वृ मोहि देखे, हों तोहि न देखं, इहि मति सब बुधि खोई |
सब घट अंतरि रमसि निरतारि, मैं देखत हैँ नहीं जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, क्रित उपकार न माना ।
मैं तैं तोरि मोरि असमझ सों, वैसे करि निसतारा ।
कहै ‘रैदास’ वृस्न करुणां मैं, जै जै जगत अधारा

शब्दार्थ :

  • नरहरि = ईश्वर ।
  • चंचल = अस्थिर ।
  • मति = बुद्धि ।
  • मोरी = मेरी ।
  • भर्गति = भक्ति ।
  • तोरी = तुम्हारी ।
  • मोहि = मुझे ।
  • तोहि = तुझे ।
  • इहि = इसी ।
  • बुधि = बुद्धि
  • खोई = खो दिया ।
  • घट = शरीर ।
  • अंतरि = अंदर ।
  • रमसि = रमा रहता है ।
  • निरतंरि = लगातार ।
  • गुन = गुण ।
  • तोर मोर = तुम्हारा – मेरा ।
  • औगुन = अवगुण ।
  • क्रित = किए गए।
  • उपकार = भलाई ।
  • असमझ = अविवेक।
  • सों = से ।
  • कैसे करि = कैसे किया जाय ।
  • निसतारा = समाधान ।
  • कृस्न = कृष्ण।
  • करूणांमें = करूणामय ।
  • जै जै = जय-जय ।
  • अधारा = आधार ।

प्रश्न – 1.
प्रस्तुत काव्यांश किस पाठ से उद्धुत है ?
उत्तर :
प्रस्तुत काव्यांश ‘रैदास के पद’ से उद्दृत है ।

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प्रश्न – 2.
इस पद्यांश के रचनाकार का नाम लिखें ।
उत्तर :
इस पद्यांश के रबनाकार भक्तिकाल के संत कवि रैदास हैं।

प्रश्न – 3.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पद में रैदास ने अपनी भक्ति के मार्ग में आनेवाली बाधाओं का उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि मेरी बुद्धि चंचल है और इस चंचल बुद्धि से आपकी भक्ति भला कैसे की जा सकती है। जब तक हम दोनों एक-दूसरे को देख नहीं पाएंगे तो फिर पेम कैसे उपजेगा । न आप मुझे देखते हैं और न मैं आपको । मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ।

ईश्वर का वास तो प्रत्येक के ब़दय में है लेकिन में अज्ञानतावश उसे नहीं देख पाया। आपके गुण तो अपार हैं और मैं गुणहीन हूँ । आपने जो उपकार मेरे ऊपर किए हैं मैने उसे भी नहीं माना, भुला दिया। मैं अपनी-पराये के भेदभाव में पड़ा रहा और इससे भला मैं कैसे मोक्ष पा सकता हूँ। कृष्ण तो करूणामयी हैं, वही इस संपूर्ण जगत के आधार हैं। ऐसे करूणामयी कृष्ण की मैं जय-जयकार करता हूँ ।

काव्यगत सौंदर्य :

1. पस्तुत पद में रैदास ने कृष्ण के पति अपनी भक्ति-भावना प्रकट की है ।
2. रैदास अपनी अज्ञानता तथा अवगुणों को ही ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में बाधक मानते हैं।
3. प्रस्तुत पद के ‘मति मोरी’, ‘प्रीति परस्पर’, ‘कैसे करि’ तथा ‘कृस्न करूणां में में अनुपास अलंकार है ।
4. ‘जे-जै’ में छेकानुपास अलंकार है।
5. रस शांत है ।
6. भाषा सरल ब्रजभाषा है।

पद सं० – 3

अविगत नाथ निरंजन देवा ।
मैं का जानूं तुम्हरि सेवा ||

बांधू न बंधन छांऊँ न छाया, तुमही सेऊँ निरंजन राया ।
चरन पताल सीस असमाना, सो ठाकुर कैसे संपटि समाना ॥

सिव सनकादिक अंत न पाया, खोजत ब्रह्वा जनम गंवाया ।
तोड्डू न पाती पूर्जौं न देवा, सहज समाधि करौं हरि सेवा ||

नख प्रसेद जाके सुरसुरी धारा, रोमावली अठारह धारा ।
चारि बेद जाकै सुमृत सासा, भगति हेत गावै रैदासा ।।

शब्दार्थ :

  • अविगत = जिसे जाना न जा सके ।
  • नाथ = स्वामी ।
  • निरंजन = ईश्वर ।
  • देवा = देवता
  • का = क्या।
  • छाऊँ = छवाना ।
  • तुमही = तुम्हें ही ।
  • सेऊँ = सेवा करूँ ।
  • राया = । चरन = वरण ।
  • पताल = पाताल ।
  • सीस = सिर ।
  • असमाना = आसमान ।
  • सो = वह ।
  • ठाकुर = ईश्वर ।
  • संपटि = नेत्र, आँख ।
  • समाना = समा सकता है ।
  • सिव = शिव ।
  • सनकादिक = सनक मुनि आदि
  • गंवाया = बिता दिया, खो दिया।
  • पाती = परंपरा ।
  • पूजौं = पूजा करूँ ।
  • सहज = आसानी ।
  • प्रसेद = पसीना ।
  • जाके = जिसकी ।
  • सुरसरि = गंगा ।
  • चारि बेद = चारों वेद ।
  • सुमृत = । सासा = ।
  • भगति = भक्ति ।
  • हेत = के लिए ।
  • गावे = गाते हैं ।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत काव्यांश किस पाठ से उद्धुत है ?
उत्तर :
प्रस्तुत काव्यांश ‘रैदास के पद’ से उद्धृत है ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

प्रश्न 2.
इस पद्यांश के रचनाकार का नाम लिखें ।
उत्तर :
इस पद्यांश के रचनाकार भक्तिकाल के संत कवि रैदास हैं।

प्रश्न 3.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
प्रस्तुत पद में रैदास कहते हैं कि ईश्वर तो अविगत हैं और उनको किस सेवा के द्वारा प्रसन्न किया जाय-यह मैं नहीं जानता । उस अविगत ईश्वर के चरण पाताल में तथा सिर आसमान को छूते हैं- भला जिनका विस्तार इतना विशाल है, जिसे शिव, सनक आदि भी न जान सके, जिसे खोजते-खोजते स्वय बहा ने भी अपने जन्म को गंवा दिया वे भला मंदिर में कैसे समा सकते हैं ।

न तो में उन पर पूजन-सामग्री चढ़ाता हूँ, न अन्य लोगों की तरह उनकी पूजा ही करता हूँ । मैं तो अपनी सहज समाधि के द्वारा ही उनकी अराधना करता हूँ । जिनके पैरों के नख से गंगा प्रवाहित होती हो, जिनकी रोमावली से ही अठ्ठारह पुराणों का जन्म हुआ हो तथा चारों वेद जिनकी सांसों में बसा हो – उस असीम, निर्गुण, निराकार ईश्वर की उपासना ही रैदास करते हैं।

काव्यगत सौंदर्य :

1. यहाँ रैदास ने कबोर की ही भांति निर्गुण-निराकार ब्रह्म की उपासना की है।
2. इस ईश्वर को केवल सहज समाधि के द्वारा ही पाया जा सकता है, किसी बाह्याडंबर से नहीं।
3. प्रस्तुत पद के ‘नाथ निरंजन’, ‘संपटि समाना’, ‘सिवन सनकादिक’, ‘पाती पूजाँ’, ‘सहज समाधि’ तथा ‘सुमृत सासा’ में अनुभास अलंकार है ।
4. रस शांत है ।
5. भाषा सहज-सरल ब्रजभाषा है।

पद सं० – 4

राम बिन संसै गाँठि न छूटै ।
काम क्रोध मोह मद माया, इन पंचन मिलि लूटै ।।
हम बड़ कवि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संन्यासी।
ग्यांनी गुनीं सूर हम दाता, यहु मति कदे न नासी ||
पढ़ें गुनें कछु समझ़ न परई, जौ लौ अनभै भाव न दरसै ।
लोहा हर न होइ धाँ वैदसें, जो पारस नही परसै ||
कहै रैदास और असमझासि, भूमि परै खम भोरे ।
एक अधार नाम नरहारि कौ, जीवनि प्रान धन मोरै ||

शब्दार्थ :

  • बिन = बिना ।
  • संसै = संशय ।
  • गाँठि = गाँठ, बंधन (जन्म और मृत्यु का बंधन) ।
  • काम = इच्छा ।
  • मोह = लालच
  • मद = मिलकर ।
  • लूटै = लूटते हैं।
  • बड़ = बड़े ।
  • कुलीन = बड़े कुल (खानदान, वंश) का ।
  • जोगी = योगी।
  • ग्यांनी = ज्ञानी ।
  • गुनीं = गुणवान, गुणी ।
  • दाता = देने वाला।
  • यहु = यह ।
  • मति = बुद्धि ।
  • कदे न = कभी नहीं ।
  • नासी = नाश होता है ।
  • पढ़े-गुनें = पढ़ना और समझना ।
  • कछु = कुछ भी ।
  • समझि न परई = समझ में नहीं आता है ।
  • जौ लौ = जब तक ।
  • दरसै = दिखायी देता है ।
  • हर = हीरा ।
  • न होइ = नहीं हो सकता है ।
  • पारस = एक प्रकार का पत्थर जिसके
  • सर्श से लोहा सोने में बदल जाता है।
  • परसै = स्पर्श ।
  • असमझ़ास = असमझ्श के कारण ।
  • भूाल परं = भूल में पड़कर ।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत काव्यांश किस पाठ से उद्दृत है ?
उत्तर:
पस्तुत काव्यांश रैदास के पद’ से उद्धृत है ।

प्रश्न 2.
इस पद्यांश के रचनाकार का नाम लिखें ।
उत्तर :
इस पद्यांश के रचनाकार भक्तिकाल के संत कवि रैदास हैं ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

प्रश्न 3.
पंच विकार क्या करते हैं?
उत्तर :
पंच विकार मनुष्य का सबकुछ लूट लेते हैं अर्थात् उसे ईश्वर-नाम से विमुख कर टेते हैं, ईश्वर की भवित से दूर कर देते हैं।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत पंक्ति का प्रसंग सहित आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
प्रस्तुत पद में रैदास ने राम-नाम की महत्ता का गुणगान करते हुए कहते हैं कि बिना राम (ईश्वर) का नाम लिए मनुष्य संशय से नहीं छूट सकता है। काम, क्रोध, मोह, मद और माया ये पाँचों मिलकर मनुष्य को लूट लेते हैं। अर्थात् ईश्वर-नाम से विमुख कर देते हैं। मनुष्य का यह भाव कि हम बड़े कवि हैं, हम कुलीन हैं, हम पंडित हैं, हम योगीसन्यासी हैं, ज्ञानी-गुनी और महान दाता है|

नष्ट नहीं हो पाता पदी-लिखकर भी मनुष्य को तब तक सच्चे ज्ञान को प्राप्ति नहीं होती जब तक कि वह अनासक्त भाव से ईश्वर की भक्ति न करे। ठीक वैसे ही जैसे बिना पारस के स्पर्श के लोहा सोने में नहीं बदल सकता । मनुष्य अपनी असमझ तथा भम के कारण ही ईश्वर से विमुख हो जाता है । रैदास कहते हैं कि उनके जोवन का प्राणधन तथा एकमात्र आधार तो ईश्वर का नाम-स्मरण ही है ।

काव्यगत सौंदर्य :

1. प्रस्तुत पद में रैदास ने ज्ञान तथा अनुभव के द्वारा ईश्वर को जानने-पाने की बात कही है ।
2. काम, क्रोध, मोह, मद और माया से बचकर ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।
3. सच्चा ज्ञान पुस्तकों से नहीं, अनुभव से ही पाया जा सकता है।
4. अनासक्त भाव के बिना ईश्वर की प्राप्ति वैसे ही नहीं हो सकती जैसे बिना पारस के स्यर्श के लोहा सोने में नहीं बढल सकता ।
5. प्रस्तुत पद के ‘काम क्रोध’, ‘मोह मद माया’, ‘कवि कुलोन’, ‘ज्ञानी-गुनी’, भ्रम भोरे’ में अनुप्रास अलंकार है।
6. रस शांत है ।
7. भाषा सहज ब्रज भाषा है ।

पद सं० – 5

रे चित चेति कहिं अचेत काहे, बालमीकहिं देखि रे ।
ज्ञाति थैं कोई पदि न पहुच्या, राम भगति बिसेषरे ||
षटक्कम सहित जे विप्र होते, हरि भगति चित द्रिद्ध नांहि रे 
हरिकथा सुहाया नांहीं, सुपच तुलै तांहि रे ||
मित्र सत्रु अजाति सब ते, अंतरि लावे हेत रे ।
लोग बाखी कहा जानें, तीनि लोक पवित रे
अजामिल गज गनिका तारी, काटी कुंजर की पासि रे ।
ऐसे दुरमति मुकती किये, तो क्यूँ न तिरै रैदासरे ।

शब्दार्थ :

  • चित = चित्त, हुदय ।
  • चेति = चेत जाओ, सावधान हो जाओ ।
  • अचेत = बिना चंतना के ।
  • बालमीकहिं = वाल्मीकि (मुनि) को ।
  • देखि रे = देखो रे ।
  • थैं = से ।
  • पदि = पद ।
  • पहुच्या = पहुँचा ।
  • बिसेषरे = विशेष है ।
  • घटक्रम = छ: कर्म ।
  • विप्र = गरीब ।
  • द्रिढ़ = दृढ़ ।
  • सुहाय = सुहाना, अच्छा लगना ।
  • तांहि = उसे ।
  • सत्रु = शत्रु ।
  • अंतरि = हददय से ।
  • हेत = हित ।
  • कहा = कहाँ ।
  • तीनि = तीनों ।
  • पवित = पवित्र ।
  • गज = हाथी ।
  • गनिका = वेश्या ।
  • तारी = तार दिया, मोक्ष दिया ।
  • कुंजर = हाथी
  • पासि = बंधन ।
  • दुरमति = बुरी मति, बुरी बुद्धि ।
  • मुकती = मुक्त, मोक्ष ।
  • तिरै = तर जाते हैं, मोक्ष पा जाते हैं।

प्रश्न 1.
प्रस्तुत काव्यांश किस पाठ से उद्धुत है ?
उत्तर :
प्रस्तुत काव्यांश ‘रैदास के पद’ से उद्धृत है ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Poem 1 रैदास के पद

प्रश्न 2.
इस पद्यांश के रचनाकार का नाम लिखें ।
उत्तर :
इस पद्यांश के रचनाकार भक्तिकाल के संत कवि रैदास हैं।

प्रश्न – 3.
प्रस्तुत पद्यांश का भावार्थ लिखें ।
उत्तर :
पद की इन पंक्तियों में भक्त कवि रैदास ने ईश्वर-भक्ति की महत्ता को दर्शाया है। वे कहते हैं कि हे मन, अब भी चेत जा । ऐ मन, वाल्मीकि को उदाहरण के रूप में देखो। उन्होंने जाति के आधार पर इतना ऊँचा पद नहीं प्राप्त किया बल्कि राम की भक्ति से प्राप्त किया । जिस ब्राह्मण को ईश्वर की कथा में कोई रूचि नहीं है, वह अपने छ: कर्मों – अध्ययन, अध्यापन, यजन (यज्ञ करना), याजन (यज्ञ कराना), दान और प्रतिग्रह के होते हुए भी उनका मन चंचल रहता है।

जो मित्र, शत्रु तथा जाति-अजाति के बंधन से मुक्त हैं, जिनके हादय में सबके लिए हित की भावना हो – वही तीनों लोकों में यश की प्राप्ति कर पाते हैं – इसे वे लोग कहाँ जान पाते हैं जिनके हुदय में ईश्वर-भक्ति नहीं हैं । हे कृष्ण, आपने ही घड़ियाल के मुख से गज की रक्षा की तथा अजामिल एवं गणिका जैसे तुच्छ प्राणियों को मोक्ष प्रदान किया । जब आपने ऐसों-ऐसों का उद्धार किया तो फिर रैदास का उद्धार क्यों नहीं करते ?

काव्यगत सौदर्य:

1. प्रस्तुत पद में रैदास ने कहना चाहा है ईश्वर की अनन्य भक्ति से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
2. ईश्वर-भक्ति से बड़े से बड़े अधम को भी मोक्ष की प्राप्ति हुई।
3. ईश्वर को कृपालु बताने के लिए पौराणिक कथा को उद्दुत किया गया है ।
4. पस्तुत पद के ‘चित चेति’, ‘षटक्रम सहित’, ‘गज गनिका’, ‘काटी कुंजर’ में अनुप्रास अलंकार है ।
5. रस शांत है ।
6. भाषा बजभाषा है ।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and व्याकरण सर्वनाम to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न 1.
सर्वनाम की परिभाषा सोदाहरण लिखें।
उत्तरः
‘सर्वनाम’-सर्व + नाम से मिलकर बना है जिसका अर्थ है सब या सबके नाम। अर्थात् कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो सब संज्ञाओं (नामों) के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

परिभाषा :- संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे- मैं, तू, वह, आप आदि। सर्वनाम सब प्रकार के नामों, अर्थात् संज्ञाओं के स्थान पर उनके प्रतिनिधि के रूप में आते हैं। जैसे -तरुण सो गया था, इसलिखह विद्यालय नहीं जा सका। इस वाक्य में ‘वह’ शब्द का प्रयोग तरूण संज्ञा के स्थान पर हुआ है, इसलिए ‘वह’ सर्वनाम है।

प्रश्न 2.
सर्वनामों के प्रयोग क्यों और कहाँ किए जाते हैं ?
उत्तरः
सर्वनामों का प्रयोग सुन्दरता, सरलता तथा संक्षिप्तता के लिए किया जाता है। सर्वनाम के अभाव में वाक्य में बार-बार संज्ञाओं (नामों) के प्रयोग से भाषा अटपटी लगती है जैसे-
‘विनय ने विनय की माताजी से कहा कि विनय पिताजी के साथ आगरा नहीं जा सकेगा।’
सर्वनाम के प्रयोग से यह वाक्य इस प्रकार भी बन सकता है-
विनय ने अपनी माताजी से कहा कि वह पिताजी के साथ आगरा नहीं जा सकेगा।’
सर्वनाम सभी संज्ञाओं के नाम हैं। ये किसी भी संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त किए जा सकते हैं, इसलिए प्रत्येक भाषा में इनकी संख्या सीमित होती है।
सर्वनाम का प्रयोग संज्ञा के स्थान पर होता है। इसलिए संज्ञा के समान ही कारक के कारण इनमें विकार या परिवर्तन होता है। जैसे – हमने, हमको, हमसे, मैने, मुझको, मुझसे। इसे भी संज्ञा की तरह एकवचन या बहुवचन में प्रयुक्त कर सकते हैं। विशेषण के आधार पर सर्वनाम का रूप परिवर्तित हो जाता है, जैसे- मेरा परिवार, तुम्हारा घर, उसकी कलम, मेरी किताब, तुम्हारी कक्षा, मेरा स्कूल आदि। संज्ञा की तरह सर्वनाम के साथ संबोधन का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 3.
सर्वनाम के भेदों का नामोल्लेख करें।
उत्तरः
सर्वनाम के छ: भेद हैं –

  • पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal Pronoun)
  • निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative Pronoun)
  • अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite Pronoun)
  • प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun)
  • संबंधवाचक सर्वनाम (Relative Pronoun)
  • निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun)

प्रश्न 4.
हिन्दी में सर्वनाम कितने हैं ?
उत्तरः
हिन्दी में सर्वनाम पन्द्रह हैं – मैं, हम, तू, तुम, आप, वह, ये, वह, वे, सो, जो, कौन, क्या, इस, उस। पर वैयाकरण केवल ग्यारह मानते हैं – मैं, तू, आप, यह, वह, सो, जो, कोई, कुछ, कौन, क्या।

प्रश्न 5.
पुरुषवाचक सर्वनाम किसे कहते हैं ?
उत्तरः
पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal Pronoun) :- किसी भी वार्ता के प्रसंग में तीन प्रकार के पुरुष (व्यक्ति) आते हैं-

  • वक्ता (बोलने वाला) (First Person)
  • श्रोता (सुनने वाला) (Second Person)
  • अन्य (जिसके बारे में कहा जाता है) (Third Person)

कहने वाले, लिखने वाले, सुनने वाले, पढ़ने वाले या किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होने वाले सर्वनामों को पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।

सामान्यत: पुरुषवाचक (नर तथा नारी) के लिए प्रयुक्त होने के कारण ये पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाते हैं।इस संदूक को उठाकर देखो वह कितना भारी है।

प्रश्न 6.
पुरुषवाचक सर्वनाम के अंगों (भेदों) का उल्लेख करें।
उत्तरः
पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं-
(क) उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम (First Person) :- बोलने वाला या लिखने वाला (वक्ता अथवा लेखक) या अपने से संबंध रखने वालों के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग करता है, वे उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे-मैं, मेरा, हम, हमारा, हमें, मुझको, हमको, मैंने, हमने, मुझे आदि।
(ख) मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम (Second Person) :- वक्ता अथवा लेखक सुनने अथवा पढ़ने वाले के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग करता है, उन्हें मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-तू, तुम, तेरा, तुम्हारा, आपने, आपको, तुझको, तुमको, तुझे, तुम्हें आदि।
(ग) अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम (Third Person) :- वक्ता या लेखक अपने आप सुनने-पढ़ने वालों के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए जिन सर्वनामों का प्रयोग करता है, उन्हें अन्य पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-वे, वह, उसे, उनका, उन्हें आदि।
-हिन्दी में ‘आप’ का प्रयोग निजवाचक के रूप में (स्वयं के लिए) अथवा आदरार्थक मध्यम पुरुष के लिए होता है। जैसे-
आइए, आप भोजन कीजिए।
आदरार्थक अन्य पुरुष हेतु प्रयोग देखिए –
‘अटल जी सच्चे स्वतंत्रता सेनानी हैं। आपका जन्म 25 दिसम्बर, सन् 1925 ई० को हुआ।’ यह ‘आप’ का विशिष्ट प्रयोग है।
‘तू’ सर्वनाम का प्रयोग समीपता, आत्मीयता, प्यार तथा दुलार प्रकट करने हेतु करते है, कभी-कभी निरादर अथवा हीनता दिखाने के लिए भी तू का प्रयोग किया जाता है-

  • हे प्रभु। तेरी कृपा कब होगी ?
  • अरे नालायक ! तू अब तक कहाँ था ?
  • माँ! तू क्या कर रही है ?

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प्रश्न 7.
निश्चयवाचक सर्वनाम की परिभाषा सोदाहरण लिखें।
उत्तरः
निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative Pronoun) :- जिन सर्वनामों से किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा घटना आदि का निश्चित बोध होता है, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।

निश्चयवाचक सर्वनामों से दूर या समीप के पदार्थों अथवा व्यक्तियों का निश्चयात्मक बोध होता है। यथा-यह, वह। निकट की वस्तुओं के लिए-यह, ये।
दूर की वस्तुओं के लिए-वह, वे।
उदाहरणार्थ :
तुम्हारा घर यह नहीं, वह है।
विश्वास नहीं हो तो, यह तुम ही पढ़ लो।
इस कलम को देखो, यह कितनी उपयोगी है।

प्रश्न 8.
अनिश्चयवाचक सर्वनाम किसे कहते हैं ?
उत्तरः
अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite Pronoun) :- जिन सर्वनामों से किसी निश्चित पदार्थ अथवा व्यक्ति का ज्ञान नहीं होता, उन्हें अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। यथा-कोई, किसी, कुछ आदि।

किसी अनिश्चित वस्तु, घटना, व्यापार के लिए अनिश्चयवाचक सर्वनाम प्रयुक्त किए जाते हैं। प्राणियों के लिए कोई’, ‘किसी’ सर्वनाम का प्रयोग करते हैं तथा पदार्थों के लिए ‘कुछ’ का प्रयोग किया जाता है। जैसे-
स्कूल में कुछ खा लेना।
संभवत: कोई आया है।
हम किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

प्रश्न 9.
प्रश्नवाचक सर्वनाम की परिभाषा सोदाहरण लिखें।
उत्तरः
प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun) :-जिन सर्वनामों से किसी व्यक्ति अथवा पदार्थ के विषय में प्रश्न का बोध हो, उन्हे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-कौन, क्या, किसे, किसने, कब आदि। प्राणिवाचक संज्ञाओं के लिए कौन, किसे, किसने, का प्रयोग करते हैं तथा अर्पाणिवाचक संज्ञाओं के लिए क्या का प्रयोग होता है। जैसे-
तुम विद्यालय कब जाओगे ?
आज तुम्हें क्या चाहिए ?
कल तुम किससे बात कर रही थीं ?
ऊपर छत पर कौन दौड़ रहा है ?
यह पुस्तक तुम्हें किसने दी ?

प्रश्न 10.
संबंधवाचक सर्वनाम किसे कहते हैं ?
उत्तरः
संबंधवाचक सर्वनाम (Relative Pronoun) :- जिस सर्वनाम से व्यक्ति, वस्तु या घटना आदि का किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु या घटना से संबंध ज्ञात हो, उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं।

जिन सर्वनाम शब्दों से दो अलग-अलग बातों का संबंध प्रकट होता है अथवा जो प्रधान वाक्य से आश्रित वाक्यों का संबंध जोड़ते हैं, उन्हें संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-जो-सो, जिसे-उसे, जिसे-वही, वह-जो, जिसकीउसकी, तेते-जेती, जैसी-वैसी, जिसने-उसने आदि संबंधवाचक सर्वनाम हैं। इनका प्रयोग युग्म-रूप में होता है। जैसे-
जिसकी लाठी, उसकी भैंस।
जैसा करोगे, वैसा भरोगे।
जिसने बच्चे को डूबने से बचाया है, उसे इनाम मिलेगा।
तेते पाँव पसारिए, जेती लाँबी सौर।
जैसी करनी, वैसी भरनी।

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प्रश्न 11.
निजवाचक सर्वनाम की सोदाहरण परिभाषा लिखें। (माध्यमिक परीक्षा – 2010)
उत्तरः
निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun) :- जो सर्वनाम शब्द निज के लिए (स्वयं अपने लिए) प्रयुक्त होता है , उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-आप, अपने-आप, स्वयं, खुद, निज, स्वतः आदि।
हमें अपना काम स्वयं करना चाहिए।
हमें अपना काम अपने आप करना चाहिए।
हमें अपना काम खुद करना चाहिए।
कवि ने स्वयं कविता सुनाई।
आप स्वयं चलकर देख लें।
हम खुद ही तुम्हारा ध्यान रखते हैं।
निजवाचक सर्वनाम वस्तुत: पुरुषवाचक सर्वनाम का ही एक भेद है, कितु कुछ विद्वान इसे अलग मानते हैं। सर्वनाम के उपर्युक्त भेद-विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनकी संख्या बहुत कम है। यदि रूपान्तरों को छोड़ दें तो इनकी गणना इस प्रकार होगी।

  • पुरुषवाचक सर्वनाम-मैं, तू, वह, आप।
  • निश्चयवाचक सर्वनाम-यह, वह।
  • अनिश्चयवाचक सर्वनाम-कोई, कुछ।
  • प्रश्नवाचक सर्वनाम-क्या, कौन।
  • संबंधवाचक सर्वनाम-जो, सो (वह), जैसा-वैसा।

प्रश्न 12.
संरचना की दृष्टि से सर्वनाम के कितने भेद हैं ? विवेचना करें।
उत्तरः
संरचना की दृष्टि से सर्वनाम के दो भेद हैं – (क) सामान्य सर्वनाम और (ख) संयुक्त सर्वनाम।
(क) सामान्य सर्वनाम :- सामान्य सर्वनामों के अर्थ की दृष्टि से निम्नलिखित भेद हैं –

  • पुरुषवाचक – मैं, हम, तू, तुम, आप, वह, वे, यह, ये।
  • निर्देशवाचक – वह, वे, यह, ये, ऐसा, वैसा, इतना, उतना।
  • प्रश्नवाचक – कौन, क्या, कैसा, कौन-सा, कितना।
  • स्वामित्ववाचक – मेरा, तेरा, हमारा, तुम्हारा, अपना।
  • निजवाचक – आप, स्वयं।
  • सम्बन्धवाचक – जो, जैसा, जितना।
  • निश्चयवाचक – आप, स्वयं, खुद, हर, प्रति, सब, सारा, समूचा, आदि।
  • अनिश्चयवाचक – कोई, कुछ, कई, अनेक, चंद, बाज आदि।

(ख) संयुक्त सर्वनाम – जिन सर्वनामों की रचना दो या दो से अधिक शब्दों से होती है, उन्हें संयुक्त सर्वनाम कहते हैं। जैसे-

  • जो कोई, हर कोई, सब कोई, और कोई, जो कुछ, सब कुछ, और कुछ, कुछ और आदि।
  • कोई एक, कोई भी, एक कोई, कुछ भी, कुछ एक आदि।
  • कोई न कोई, कुछ न कुछ।
  • कुछ-कुछ, कोई-कोई।
  • प्रत्येक, हर एक।

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प्रश्न 13.
संरचना की दृष्टि को छोड़कर सर्वनाम के अन्य भेदों को लिखें।
उत्तरः
संरचना की दृष्टि को छोड़कर सर्वनाम के कुछ अन्य भेद निम्नांकित हैं –

  • साकल्पवाचक सर्वनाम :- जिस सर्वनाम में समूह या साकल्प का बोध होता है, उसे साकल्पवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे – सब कुछ, सकल आदि।
  • यौगिक सर्वनाम :- मूल सर्वनाम में प्रत्यय जोड़कर बनाये गए सर्वनाम यौगिक सर्वनाम कहलाते हैं। जैसे ऐसा, वैसा, कैसा, जैसा, तैसा आदि।
  • संयुक्त सर्वनाम :- जो सर्वनाम एक से अधिक सर्वनामों (शब्दों) के योग से बनते हैं, उन्हें संयुक्त सर्वनाम कहते हैं। जैसे-कोई एक, जोई सोई, सब कोई इत्यादि।
  • परस्परताबोधक सर्वनाम – वे सर्वनाम जो परस्परता या आपसी मेल का बोध कराते है, उन्हें परस्परताबोधक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-आपस आदि।

प्रश्न 14.
‘मैं’ सर्वनाम का प्रयोग किन-किन अवस्थाओं में होता है ?
उत्तरः
मैं’ का प्रयोग (वक्ता के लिए)
1. मैं’ का प्रयोग ‘उत्तम पुरुष’, एकवचन, पुल्लिंग और स्रीलिंग दोनों में होता है :- पुल्लिंग – मैं जाता हूँ। स्वीलिंग – मैं जाती हूँ।
2. कभी-कभी अभिमान या प्रभुता को दिखाने के लिए भी मैं का प्रयोग होता है। जैसे – मैं तुम्हारा दर्प चूर्ण करूँगा।

प्रश्न 15.
‘हम’ सर्वनाम के प्रयोग की अवस्थाओं को लिखें।
उत्तरः
हम का प्रयोग व्याकरण की दृष्टि से बहुवचन में करना चाहिए और किया भी जाता है। आजकल इसका प्रयोग अधिकतर एकवचन अर्थात् ‘मैं के रूप में भी किया जाने लगा है। जैसे :-

  • अधिकार और प्रभुता दिखाने के लिए – हम आज्ञा देते हैं कि उसे उपस्थित किया जाये।
  • लेखक और सम्पादक अपने लिए ‘हम’ का प्रयोग करते हैं। जैसे – हम यहाँ कब तक रहेंगे? हमें जाना चाहिए।
  • ‘हम’ का प्रयोग ‘मैं’ के अर्थ में कहनेवाले का संकेत है। जैसे-आपके मित्र और स्वागत करें हम ?
  • ‘हम’ का प्रयोग वक्ता या उसके समेत अन्य लोगों के समूह के लिए होता है। जैसे-हम यहाँ अधिक देर तक नहीं ठहर सकते।

प्रश्न 16.
‘तू’ सर्वनाम का प्रयोग किन-किन अवस्थाओं में होता है ?
उत्तरः
तू’ का प्रयोग एकवचन, मध्यम पुरुष में उस व्यक्ति के लिए किया जाता है, जिसे सम्बोधित करके कुछ कहा जाता है। इस सर्वनाम का प्रयोग देवी-देवता, ईश्वर, घनिष्ठ मित्रादि और छोटे बच्चे या अपने से छोटे के लिए किया जाता है। जैसे-
(क) अरे दुष्ट ! यहाँ तू क्या करता है ?
(ख) लगता है, तू पागल हो गया है।
(ग) तू कितना निर्दयी है।
(घ) तू तो जहरीला साँप निकला।
कभी-कभी कोध दिखाते समय तू का प्रयोग दूसरे की अक्षमता और असमर्थता के लिए किया जाता है। जैसे तूने अपने को क्या समझ रखा है ?

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प्रश्न 17.
‘तुम’ सर्वनाम का प्रयोग किन अवस्थाओं में होता है ?
उत्तरः
तुम’ का प्रयोग मध्यम पुरुष, बहुवचन में अधिक होता है। वह ‘संबोधन’ के रूप में आता है। इसका प्रयोग एक या एक से अधिक व्यक्तियों, दोस्तों, रिश्तेदारों, साथियों तथा अपने बराबर या अपने से छोटे लोगों के लिए किया जाता है। जैसे-
(क) तुम’ लेखक हो।
(ख) कादिर ‘तुम’ यहाँ बैठो।
(ग) ‘तुम’ क्यों रो रहे हो ?
(घ) क्या ‘तुम’ यह उठा सकते हो ?

प्रश्न 18.
‘आप’ सर्वनाम के प्रयोग के नियमों को लिखें।
उत्तरः
‘आप’ का प्रयोग मध्यम पुरुष में आदरसूचक संबोधन के लिए किया जाता है। इसके साथ अन्यपुरुष की क्रिया आती है। जैसे-
(क) ‘आप’ जा सकते हैं।
(ख) ‘आप’ चेष्टा करेंगे तो कार्य सिद्ध हो जायेगा।
(ग) आप मेरे भाई हैं।
(घ) ‘निराला जी’ महान् कवि थे। ‘आप’ ने कई उपन्यास भी लिखे हैं।
अधिक आदर दिखाने के लिए ‘आप’ का प्रयोग किया जाता है। जैसे-
(क) आप कब पधारे ?
(ख) इसके संबंध में ‘आप’ क्या कहते हैं ?
निजवाचक सर्वनाम के रूप में ‘आप’ का प्रयोग होता है। जैसे-
मैं यह काम आप ही कर लूँगा।

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प्रश्न 19.
‘वह’ सर्वनाम का प्रयोग किन अवस्थाओं में होता है ?
उत्तरः
वह’ सर्वनाम का प्रयोग अनुपस्थित या दूर के व्यक्तियों को इंगित करने के लिए बहुवचन, अन्य पुरुष में किया जाता है। जैसे-कुछ क्षण उपरान्त वह यहाँ आ पहुँचा।
‘वह’ का प्रयोग बहुवचन में भी होता है। जैसे-
(क) ‘वह’ भला आदमी है।
(ख) ‘वह’ कवि है।
‘वह’ का विशेषण रूप में भी प्रयोग होता है। जैसे – वह’ पुस्तक फट गई।

प्रश्न 20.
‘क्या’ प्रश्नवाचक सर्वनाम के प्रयोग से संम्बन्धित नियमों को लिखें।
उत्तरः

  • ‘क्या प्रश्नवाचक सर्वनाम अप्राणिवाचक वस्तुओं और जन्तुओं आदि को इंगित करने के लिए प्रयोग में आता है। जैसे – वह क्या है ? वह एक मकान है।
  • विशेषण के रूप में ‘क्या’ का प्रयोग होता है। जैसे – यह ‘क्या’ आदमी है ?
  • कभी-कभी ‘क्या’ का प्रयोग समुच्चयबोधक के रूप में होता है। जैसे-क्या’ आज, ‘क्या कल, वह अवश्य सुनेंगे।
  • किया-विशेषण के रूप में ‘क्या’ का प्रयोग होता है। जैसे – क्या’ अजीब प्रश्न है।
  • नकारात्मक की तीव्रता दिखाने के लिए क्या’ का प्रयोग होता है। जैसे-मैंने ‘क्या’ किया है ?

प्रश्न 21.
कोई’ प्रश्नवाचक सर्वनाम के प्रयोग से सम्बन्धित नियमों को लिखें।
उत्तरः

  • अनिश्चयवाचक सर्वनाम ‘कोई’ किसी अपरिचित व्यक्ति को इंगित करता है। जैसे – पानी में कोई’ तैर रहा है।
  • ‘कोई’ के साथ ‘सब’ जोड़ देने से ‘सब लोग’ के अर्थ में प्रयुक्त होता हैं। जैसे- सब कोई इस घटना को जान गए हैं।
  • ‘कोई’ के साथ हर’ शब्द को जोड़ देने से प्रत्येक’ के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे-हर कोई यह काम नहीं कर सकता।
  • ‘कोई’ के साथ एक’ जोड़ देने से अनिश्चयता का बोध होता है। जैसे – कोई एक सज्जन लग रहा था।
  • ‘कोई’ के साथ ‘और या ‘दूसरा’ शब्द जोड़ने से उसका अर्थ कोई अन्य’ होता है। जैसे – यदि कोई और होता तो मै बात न करता।

कुछ अन्य उदाहरण :-

  • कोई न कोई आपका सहायक होगा।
  • वहाँ कोई न कोई आप से मिलेगा।
  • विशेषण के रूप में ‘कोई’ का प्रयोग – ‘कोई’ लड़का जा रहा है।
  • समुच्चयबोधक के रूप में कोईं का प्रयोग – कोई गाता है कोई हैसता है।
  • निश्चय बताने के लिए कोई’ का प्रयोग – कोई न कोई सहायता करेगा ही।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 22.
कुछ’ सर्वनाम के प्रयोग से संबंधित नियमों को लिखें।
उत्तरः

  • कुछ का प्रयोग अनिश्चयवाचक सर्वनाम के रूप में तथा समुदाय के रूप में किया जाता है। जैसे – कुछ आए और गए।
  • किसी अपरिचित वस्तु के लिए ‘कुछ’ का प्रयोग होता है। जैसे-दाल में कुछ है। उसे कुछ दीजिए।
  • विशेषण के रूप में कुछ’ का प्रयोग होता है। जैसे – कुछ लड़के खेल रहे हैं। कुछ तरकारी खरीद लाओ।
  • क्रिया-विशेषण के रूप में कुछ’ का प्रयोग होता है। जैसे – कुछ अच्छी बातें कहो।
  • समुच्चयबोधक के रूप में ‘कुछ’ का प्रयोग होता है। जैसे – कुछ तुम करो कुछ हम करें।

प्रश्न 23.
‘जो’ सर्वनाम का प्रयोग किन अवस्थाओं में होता है ?
उत्तरः
‘जो’ के साथ ‘सो’ प्रायः प्रयोग में आता है। जैसे – तुम जो करोगे सो पाओगे।
कभी-कभी जो’ का प्रयोग एक वाक्य के लिए किया जाता है। जैसे-आपने उसकी बात न मानी ‘जो’ अच्छी बात नहीं है।
कभी-कभी जो’ के साथ कुछ या कोई का प्रयोग होता है। जैसे-
(क) ‘जो’ कुछ मैं कहूँ ध्यान से सुनिए।
(ख) जो कोई यह कर सकता है।
कभी-कभी वाक्य में ‘जो’ लुप्त रहता है, पर ‘सो’ आता है। जैसे – तुम चाहो सो करो।
जो’ के साथ ‘सो के स्थान पर वही’ का प्रयोग होता है। जैसे-जो’ भी अच्छा कार्य करेगा, ‘वही’ प्रशंसा पायेगा।
समुच्चयबोधक के रूप में जो’ का प्रयोग होता है। जैसे – जो’ कहेंगे तो कर दूँगा।

प्रश्न 24.
‘कौन’ सर्वनाम के प्रयोग से संबंधित नियमों को लिखें।
उत्तरः
1. कौन का प्रयोग प्राय: व्यक्ति को सूचित करने के लिए किया जाता है। यह निश्चित व्यक्ति के लिए प्रयोग में आता है। जैसे –
(क) ‘कौन’ आ रहा है ?
(ख) वहाँ ‘कौन’ सोया है ?
2. अनेक एक-सी वस्तुओं में से किसी एक को इंगित करने के लिए ‘कौन’ का प्रयोग होता है। जैसे-
(क) यह ‘कौन’ – सी पुस्तक है ?
(ख) आज ‘कौन’ सी तारीख है ?
3. ‘कौन’ का प्रयोग विशेषण के रूप में होता है। जैसे तुमने कौन’ पाप किया है ?
4. ‘कौन’ का प्रयोग क्रियाविशेषण के रूप में होता है। जैसे – यह ‘कौन’ बड़ी गायिका है ?
5. विस्मयादिबोधक के रूप में ‘कौन’ का प्रयोग होता है। जैसे – कौन’ ! कौन’ ! शंकर ?
6. समुच्चयबोध के रूप में ‘कौन का प्रयोग होता है। जैसे – ‘कौन’ सोया कौन जागा ?
7. सम्मान दिखाने के लिए भी ‘कौन’ का प्रयोग किया जाता है। जैसे – वहाँ ‘कौन’ खड़े हैं ?
8. निरादर दिखाने के लिए भी ‘कौन’ का प्रयोग किया जाता है। जैसे-
(क) वहाँ ‘कौन’ खड़ा है ?
(ख) तुम कौन’ होते हो ?

9. संख्या की अधिकता को व्यक्त करने के लिए कौन’ की आवृत्ति (दो बार) की जाती है। जैसे – वहाँ कौनकौन आ रहे हैं ?

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 25.
‘ये’ सर्वनाम के प्रयोग से संबंधित नियमों को लिखें।
उत्तरः

  • ये’ का प्रयोग बहुवचन में निश्चयवाचक सर्वनाम के रूप में होता है। जैसे – ये हमारे भाई हैं।
  • ‘ये’ का प्रयोग सम्मान दिखाने के लिए, एक व्यक्ति को संबोधित करने के लिए किया जाता है। जैसे – इनसे मिलिए, ‘ये’ हमारे मित्र हैं।
  • ‘ये’ का प्रयोग बहुवचन में विशेषण के रूप में होता है। जैसे – ‘ये’ बच्चे शैतान हो गए हैं।
    विशेष :- ‘ये’ का प्रयोग यह’ की तरह होता है। ‘ये’ बहुवचन में आता है।

प्रश्न 26.
‘यह’ सर्वनाम के प्रयोग से संबंधित अवस्थाओं के बारे में लिखें।
उत्तरः

  • यह’ का प्रयोग निकट के व्यक्ति को सम्बोधित करने के लिए एकवचन, अन्य पुरुष में होता है। जैसे ‘यह’ मुझे अच्छी तरह जानता है।
  • ‘यह’ का प्रयोग सम्मान दिखाने के लिए, एक व्यक्ति को सूचित करने के लिए ‘बहुवचन’ में किया जाता है। जैसे – ‘यह’ वर्षो से यहाँ रह रहे हैं।
  • विशेषण के रूप में ‘यह’ का प्रयोग एकवचन में होता है। जैसे – यह लड़का रोता ही रहता है।
  • निश्चयवाचक सर्वनाम के रूप में ‘यह’ का प्रयोग एकवचन में होता है। जैसे – यह कितना सुहावना है।
  • कियाविशेषण के रूप में ‘यह’ का प्रयोग होता है। जैसे – लो, ‘यह’ मैं चला।

प्रश्न 27.
‘वे’ सर्वनाम का प्रयोग किन अवस्थाओं में होता है ?
उत्तरः
वे का प्रयोग निम्नलिखित अवस्थाओं में होता है। जैसे-
1. बहुवचन के रूप में प्रयोग –
(क) ‘वे’ आ गए।
(ख) वे तुम्हारे कौन लगते हैं ?

2. सम्मान दिखाने हेतु किसी व्यक्ति के लिए भी ‘वे’ का प्रयोग किया जाता है। जैसे-
(क) वे’ धनी व्यक्ति हैं।
(ख) गुरुदेव महान् साहित्यकार थे। ‘वे’ अच्छे चित्रकार भी थे।

3. ‘वे’ का प्रयोग निश्चयवाचक सर्वनाम के रूप में बहुवचन में होता है। जैसे-
(क) वे खेल रहे हैं।
(ख) ‘वे’ आप को कैसे जानते हैं ?

4. ‘वे’ का प्रयोग बहुवचन में विशेषण के रूप में होता है। जैसे-
वे शोर मचा रहे हैं।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 28.
सर्वनाम में कितने वचन और कितने कारक होते हैं ?
उत्तरः
सर्वनाम में दो वचन और सात कारक (संबोधन कारक को छोड़कर) होते हैं।

प्रश्न 29.
उत्तम पुरुष ‘मैं’ की कारक-रचना सातों कारकों एवं दोनों वचनों में करें।
उत्तरः
उत्तम पुरुष (First Person) मैंग

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 1

प्रश्न 30.
मध्यम पुरुष ‘आप’ की कारक-रचना दोनों वचनों तथा सातों कारकों में करें।
उत्तरः
मध्यम पुरुष (Second Person) ‘आप’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 2

प्रश्न 31.
मध्यम पुरुष ‘तू’ की कारक-रचना सातों कारकों तथा दोनों वचनों में करें।
उत्तरः
मध्यम पुरुष (Second Person) ‘तू’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 3

प्रश्न 32.
सम्बन्धवाचक ‘जो’ की कारक-रचना दोनों वचनों तथा सातों कारकों में करें।
उत्तरः
सम्बन्धवाचक (Relative) ‘जो’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 4

प्रश्न 33.
प्रश्नवाचक ‘कौन’ की कारक-रचना दोनों वचनों तथा सातों कारकों में करें।
उत्तरः
प्रश्नवाचक (Interrogative) ‘कौन’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 5

प्रश्न 34.
अनिश्चयवाचक ‘कोई’ की कारक-रचना दोनों वचनों तथा सातों कारकों में करें।
उत्तरः
अनिश्चयवाचक (Indefinite) ‘कोई’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 6

प्रश्न 35.
अन्यपुरुष ‘वह’ की कारक-रचना दोनों वचनों तथा सातों कारकों में करें।
उत्तरः
अन्य पुरुष (Third Person) ‘वह’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 7

विशेष :- यह’ का रूप ‘वह’ की ही तरह चलता है। ‘यह’ का ‘इस’ एकवचन में और बहुवचन में ये’ का ‘इन’ हो जाता है।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 36.
आदरसूचक ‘आप’ की कारक-रचना दोनों वचनों तथा सातों कारकों में करें।
उत्तरः
आदर सूचक “आप’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम 8

(‘आप’ सर्वनाम के बहुवचन रूप एकवचन के समान ही रहते हैं।)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न 1.
सर्वनाम किसे कहते हैं ? इसके भेदों की परिभाषा उदाहरण सहित लिखें।
उत्तरः
संज्ञा के बदले जिन शब्दों का प्रयोग होता है, उन्हें सर्वनाम कहते हैं। जैसे-वह, उसे, उसने, मैं, मेरा, मेरे, वे, हम, हमलोग आदि।
सर्वनाम के छः भेद हैं :-

  • पुरुषवाचक (Personal Pronoun)
  • निजवाचक (Reflexive Pronoun)
  • निश्चयवाचक (Definite Pronoun)
  • अनिश्चयवाचक (Indefinite Pronoun)
  • सम्बन्धवाचक (Relative Pronoun)
  • प्रश्नवाचक (Intterogative Pronoun)

पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal Pronoun) :-जिस सर्वनाम शब्द से बोलनेवाले, सुननेवाले और जिसके विषय में कहा जाय उसका बोध हो, उसे पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे –

  • मैं जाता हूं (बोलने वाला)
  • तुम जाते हो (सुननेवाला) और
  • वह जाता है (जिसके विषय में कहा गया है)।

पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद हैं – (क) उत्तम पुरुष (First Person), (ख) मध्यम पुरुष (Second Person) और (ग) अन्य पुरुष (Third Person)।

(क) उत्तम पुरुष (First Person) :- जिस सर्वनाम से बोलने वाले का बोध होता है, उसे उत्तम पुरुष कहते हैं। जैसे-मैं, हम। मैं जाता हूँ। मैं – एकवचन में और हम बहुवचन में आता है।
(ख) मध्यम पुरुष (Second Person) :- जिस सर्वनाम शब्द से सुनने वाले का बोध होता है, उसे मध्यम पुरुष कहते हैं। जैसे तू, तुम, आप। तू जाता है। तुम जाते हो। आप जाते हैं। आप का प्रयोग आदर या सम्मान दिखाने के लिए किया जाता है।
(ग) अन्य पुरुष (Third Person) :- जिस सर्वनाम शब्द से जिसके विषय में कहा जाय, उसका बोध हो, उसे अन्य पुरुष कहते हैं। जैसे – वह’, वे, यह’, ये। वह जाता है। वे जाते हैं। यह आता है। ये आते हैं। इसमें वह’ और ‘यह’ एक वचन में तथा ‘वे’ और ‘ये’ बहुवचन में आते हैं।

निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun) :- जो सर्वनाम कर्त्ता के साथ अपनापन या निजत्व बताता है, उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे – आप, निज, अपना। आप ही चला जाऊँगा। यह निज का मकान है। तुम अपना समाचार सुनाओ। यहाँ आप, निज और अपना निजवाचक सर्वनाम हैं।

निश्चयवाचक सर्वनाम (Definite Pronoun) :- जिस सर्वनाम से किसी निश्चित वस्तु आदि का बोध होता है, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।जैसे- वह, यह। यह सभ्य लड़का है। वह तेज दौड़ता है। यहाँ वह’ और ‘यह’ दोनों निश्चय का बोध कराते हैं। ‘यह’ का प्रयोग निकटतम के लिए और वह का प्रयोग दूर के लिए होता है।

अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite Pronoun) :- जिस सर्वनाम शब्द से किसी अनिश्चित वस्तु का बोध होता है, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- कोई, कुछ। कोई आ रहा है। वह कुछ ला रहा है। यहाँ ‘कोई’ और कुछ अनिश्चयवाचक सर्वनाम हैं।

सम्बन्धवाचक सर्वनाम (Relative Pronoun) :- जिस सर्वनाम से किसी संज्ञा का सम्बन्ध जाना जाता है, उसे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-जो, सो। जो पढ़ेगा सो उत्तीर्ण होगा। जो करोगे सो पाओगे। जों और ‘सो’ सम्बन्धवाचक सर्वनाम हैं।

प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun) :- जिस सर्वनाम से प्रश्न का बोध होता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे-कौन, क्या। कौन आया था ? क्या लाया है ? यहाँ ‘कौन’ और ‘क्या’ प्रश्नवाचक हैं।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 2.
सर्वनाम की रूप-रचना से संबंधित नियम कौन-कौन से हैं ? सोदाहरण समझाएँ।
उत्तरः
सर्वनाम की रूप-रचना से संबंधित नियम निम्नलिखित हैं :-
सर्वनाम की विभक्तियाँ शब्दों से मिलाकर लिखी जाती हैं। यथा-मैने, मुझसे, मुझको, उसने, हमको, उस पर, हम पर, हमने आदि।

संज्ञा की भौति सर्वनाम लिंग के अनुसार परिवर्तित नहीं होते। सर्वनाम वाले वाक्यों में लिंग का पता किया के रूप से लगता है। यथा-

बालक खेल रहा था, वह गिर गया।
बालिका खेल रही थी, वह गिर गई।

अनिश्चयवाचक सर्वनाम ‘कुछ’ (एकवचन) परिमाण तथा संख्या दोनो का बोध कराता है। जैसे-
आपके खेत में इतना अनाज पैदा हुआ है, कुछ हमारे घर भेज देना। (परिमाणवाची)
आपके पास व्याकरण की इतनी पुस्तकें हैं, कुछ मुझे दे दीजिए।

‘तुम’ सर्वनाम के बहुवचन के रूप में ‘तुम सब’ का प्रचलन हो गया है।
राम ! तुम यहाँ बैठो। (संख्यावाचक)
अरे बच्चों ! तुम सब यहाँ बैठो।

आदरार्थक संज्ञा शब्दों के लिए सर्वनाम भी आदरार्थक बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं। जैसे-
सुषमा जी सभा में आई तो थीं, पर वे बोली नहीं।
मेरी माताजी पूजा करने गई है, वे आती ही होंगी।

जहाँ ‘मैं’ की जगह ‘हम’ का प्रयोग होने लगा है, वहाँ हम लोग’ अथवा ‘हम सब’ का प्रयोग प्रचलन में आ गया है। यथा-
हम लोग मैच देखने जा रहे हैं।
हम सब तुम्हारे घर खाना खाने आ रहे हैं।

‘मैं, हमम’ और तुम’ के साथ ‘का’, के, की’ की जगह रा’, रे, ‘री’ प्रयुक्त होते हैं। जैसे-मेरा, मेरे, मेरी, तुम्हारा, तुम्हारे, तुम्हारी, हमारा, हमारे, हमारी।

अधिकार अथवा अभिमान प्रकट करने के लिए आजकल ‘तू’ के स्थान पर हम’ का प्रयोग किया जाने लगा है, यद्यपि व्याकरण की दृष्टि से यह अशुद्ध है।
अध्यापक के नाते हमारा भी कुछ अधिकार है।

मुझ, हम, तुझ, इस, इन, उस, उन, किस, किन में निश्यचयार्थी ई’ (ही) के योग से मुझी, हमीं, तुझी, तुम्हीं, इसी, इन्हीं, उसी, उन्हीं, किसी, किन्हीं आदि निश्चयार्थी रूप बनते हैं।

‘कोई’ और ‘कुछ’ का बहुवचन ‘किन्हीं तथा ‘कुछ’ होता है। ‘कोई’ और ‘किन्हीं’ का प्रयोग सजीव प्राणियों के लिए होता है और कुछ का प्रयोग निर्जीव प्राणियों के लिए होता है। कीड़े-मकोड़े आदि के लिएकुछ का प्रयोग होता है।

क्या’ का रूप सदैव एक-सा रहता है। जैसे –

  • क्या पढ़ रहे हो ?
  • क्या खा रही थीं वे सब ?
  • तुम क्या बोलोगे ?

सर्वनाम का रूप परिवर्तन केवल दो कारणों से होता है-वचन और संबंध कारक।

सर्वनाम शब्दों का संबोधन रूप नहीं बनता है, क्योंकि सर्वनाम शब्द द्वारा किसी को पुकारा नहीं जाता। सर्वनाम में दो वचन और सात कारक होते हैं।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण सर्वनाम

प्रश्न 3.
सर्वनामों के पुनरुक्ति रूप से आप क्या समझते हैं। उदाहरण देते हुए समझाएँ।
सर्वनामों के पुनरुक्ति रूप :- कुछ सर्वनाम शब्द पुनरुक्ति रूप में प्रयोग किए जाते हैं। इसमें एक ही शब्द को पुन: दोहराया जाता है। ऐसे प्रयोगों से अर्थ में विशिष्टता आ जाती है।
अपना-अपना :- अपना-अपना सामान उठाओ और चलते बनो।
आप-आप :- घरवाले आप-आप खाए जा रहे थे, बारातियों को पूछने वाला कोई नहीं था।
कहाँ-कहाँ : श्री राम ने सीता जी को कहाँ-कहाँ नहीं खोजा ?
कुछ-कुछ : मैं बुढ़ापे में कुछ-कुछ भूलने लगा हूँ।
किस-किस : किस-किस को कविता याद है ?
कौन-कौन : कौन-कौन गृह-कार्य करके लाया है ?
जो-जो : जो-जो नकल करेगा वह फेल कर दिया जाएगा।
कोई-कोई : कोई-कोई बच्चा बिना बात के रो रहा था।
क्या-क्या : मेरे भाग्य में और क्या-क्या लिखा है ?
कुछ सर्वनाम संयुक्त रूप में प्रयुक्त होते हैं। जैसे –
कुछ-न-कुछ : ठहरो, कुछ-न-कुछ व्यवस्था कर दी जाएगी।
कोई-न-कोई : सुबह कोई-न-कोई गाड़ी तो अवश्य दिल्ली जाती होगी।
जो-कोई : जो कोई बोलेगा, वही पिटेगा।
जो-कुछ : लुटेरों को जो-कुछ मिला, लेकर भाग गए।
कहीं-कोई : आजकल बिना सिफारिश के कहीं-कोई नहीं पूछता।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions and व्याकरण संज्ञा to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

संज्ञा शब्द ‘सम्’ और ‘ज्ञा’ के योग से बना है जिसका अर्थ है ‘सम्यक् ज्ञान्’ या पूर्ण और सही परिचय (सम + ज्ञा = संज्ञा, अर्थात् सम्यक् ज्ञान कराने वाला)। संज्ञा का दूसरा पर्याय है – नाम। व्यक्ति, वस्तु या स्थान आदि के सम्यक् ज्ञान, पूर्ण परिचय के लिए भाषा में उन्हें कुछ नाम दे दिए गए हैं। ये नाम ही संज्ञा है।

परिभाषा – किसी भी वस्तु, व्यक्ति, गुण, भाव, स्थिति का परिचय कराने वाले शब्द को ‘संज्ञा’ कहते हैं।
अथवा, किसी भी प्राणी, व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।

उदाहरण –

  • सौरभ दिल्ली में निवास करता है।
  • नारियाँ स्वभाव से कोमल होती हैं।
  • मानव प्रेम सुंदरता-असुंदरता को नहीं देखता।
  • गाय एक उपयोगी पशु है।
  • बुढ़ापा दुखों का घर है और यौवन आनंद का।
  • आगरा यमुना के किनारे बसा हुआ है।

उपर्युक्त काले शब्द संज्ञा शब्द हैं। संज्ञा शब्दों का इसलिए भी विशेष महत्व है कि संज्ञा शब्दों के बिना भाषा बन ही नहीं सकती। हम जब भी कोई बात कहते हैं, पूछते हैं, करते हैं तो अनायास ही संज्ञा शब्दों का प्रयोग करते हैं। व्याकरण में जो शब्द किसी के नाम को बताता है संज्ञा शब्द कहलाते हैं। किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, स्थिति, गुण अथवा भाव के नाम का बोध करानेवाले शब्दों को संज्ञा कहते हैं।
संज्ञा के भेद (Kinds of Nouns)
संज्ञा शब्दों से प्रायः किसी व्यक्ति, जाति अथवा भाव के नाम का बोध होता है। इसलिए संज्ञा के तीन प्रमुख भेद बताए गए हैं –

  • व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun)
  • जातिवाचक संज्ञा (Common Noun)
  • भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun)

व्यक्तिवाचक संज्ञा : जो शब्द किसी विशेष व्यक्ति, विशेष वस्तु, विशेष स्थान अथवा विशेष प्राणी के नाम का बोध कराते हैं, उन्हें व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे –

महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस, सीता, राधा, राम, कृष्ण, कुसुम, रेखा, पूनम, सौरभ, सचेत, अपर्णा, अपराजिता – व्यक्तियों के नाम
कपिला (गाय), गौरा (गाय), सोना (हिरनी), ऐरावत (हाथी) – प्राणियों के नाम
दिल्ली, कानपुर, आगरा, अलीगढ़, बरेली, मद्रास, देहरादून, शिमला, बिजौली, अंबाला, गुड़गाँव, जापान स्थानों के नाम
रामचरितमानस, रामायण, गीता, कुरान, कावेरी, नीलगिरि, गांडीव, हल्दी, नमक, चीनी – वस्तुओं के नाम

जातिवाचक संज्ञा : जो शब्द किसी प्राणी, पदार्थ या समुदाय की पूरी जाति का बोध कराते हैं, वे जातिवाचक संज्ञा कहलाते हैं। उदाहरणार्थ – हाथी, कुत्ता, फल, गाय, विद्यार्थी तथा अध्यापक आदि।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

ये शब्द संपूर्ण जाति के परिचायक हैं किसी एक मनुष्य, एक नर या एक प्रांत के नहीं। जातिवाचक संज्ञा के दो उपभेद हैं-

(क) द्रव्यवाचक संज्ञा (ख) समूहवाचक संज्ञा। अंग्रेजी व्याकरण के अनुसार संज्ञा के पाँच भेद स्वीकार किए गए हैं। उसी आधार पर हिंदी के कुछ विद्वान भी संज्ञा के पाँच भेद मानते हैं। वैसे, द्रव्यवाचक संज्ञा तथा समूहवाचक संज्ञाएँ भी एक प्रकार से जाति का बोध कराती हैं। अत: इन्हें जातिवाचक संज्ञा के उपभेदों के रूप में ही स्वीकार किया गया है।
(क) द्रव्यवाचक संज्ञा – किसी पदार्थ अथवा द्रव्य का बों कराने वाले शब्दों को द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे- स्टोल, पीतल, लोहा (फर्नीचर के लिए), सोना-चाँदो (आभूषण के लिए)।
द्रव्यवाची संज्ञा शब्दों का प्रयोग प्राय: एकवचन में ही किया जाता है क्योंकि ये शब्द गणनीय नहीं हैं।

(ख) समूहवाचक संज्ञा – जो संज्ञा शब्द किसी समुदाय या समूह का बोध कराते हैं वे समूहवाचक संज्ञा शब्द कहलाते हैं। जहाँ भी समूह होगा वहाँ एक से अधिक सदस्यों की संभावना होगी, जैसे – सेना, कक्षा, झुंड, भीड़, जुलूस, दरबार, दल सभी समूहवाचक शब्द हैं।

इन शब्दों का प्रयोग एकवचन में ही होता है क्योंकि ये एक ही जाति के सदस्यों के समूह को एक इकाई के रूप में व्यक्त करते हैं। गौरा, सोना, ऐरावत, कामधेनु जानवर हैं, कुसुम, रेखा, पूनम, सौरभ मनुष्य हैं, गंगा, यमुना, गोमती, कावेरी नदियाँ हैं। इस प्रकार ‘नगर’, ‘जानवर’, ‘मनुष्य’, ‘नदी’ आदि शब्द किसी जाति विशेष का बोध कराते हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जो शब्द किसी जाति, पदार्थ, प्राणी, समूह आदि का बोध कराते हैं, ‘जातिवाचक संज्ञा’ शब्द कहलाते हैं।
तुलना देखिए –

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 1

भावाचक संज्ञा

जिन संज्ञा शब्दों से किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के गुण-धर्म, दोष, शील, स्वभाव, भाव, संकल्पना आदि का बोध होता है, वे ‘भाववाचक संज्ञा शब्द’ कहे जाते हैं। जैसे –
गुण-दोष-लंबाई, चौड़ाई, सुंदरता, कुरूपता, चतुरता, ऊँचाई, नीचाई
दशा – बचपन, बुढ़ापा, यौवन, भूख, प्यास
भाव – आशा, निराशा, कोध, वैर, युद्ध, शान्ति, मित्रता, शत्रुता, भय, प्रेम
कार्य – सहायता, निंदा, प्रशंसा, सलाह
एक संज्ञापद का दूसरे संज्ञापद के रूप में प्रयोग – कभी-कभी जातिवाचक और व्यक्तिवाचक संज्ञापद का एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग जातिवाचक के रूप में कर दिया जाता है।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

व्यक्तिवाचक संज्ञा का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग – कुछ व्यक्तियों के जीवन में प्राय: अन्य लोगों के जीवन से भिन्न कोई ऐसी विशेषता, गुण अथवा अवगुण होता है जिसके कारण उनका नाम उस गुण या अवगुण का प्रतिनिधित्व करने लगता है। ऐसी स्थिति में वह नाम व्यक्ति-विशेष का नाम होकर जातिवाचक शब्द बन जाता है। जैसे भीष्म पितामह का नाम दृढ़ प्रतिज्ञा के लिए प्रसिद्ध है। जैसे –

  • आज कौन हरिश्चंद्र हो सकता है।
  • भारत तो सीता-सावित्री का देश है।
  • विभीषणों से बचो।
  • इन्हीं जयचंदों के कारण देश गुलाम हुआ।
  • देश में जयचंदों की कमी नहीं है ।
  • तुम तो एकलव्य हो जो गुरु के लिए कुछ्छ भी कर सकते हो।

यहाँ हरिश्चंद्र ‘सच्चाई’ का, सीता-सावित्री ‘पवित्रता’ का, विभीषण ‘विश्वासघात’ का, जयचंद ‘गद्दार’ का, एकलव्य ‘गुरुभक्ति’ का प्रतीक है।

जातिवाचक संज्ञा का व्यक्तिचावक संज्ञा के रूप में प्रयोग – कभी-कभी कुछ जातिवाचक शब्द किसी व्यक्ति-विशेष या स्थान विशेष के अर्थ में रूढ़ हो जाते हैं तब वे जाति का बोध न कराकर केवल एक ‘व्यक्ति या स्थानविशेष’ का बोध कराते हैं। जैसे –

महात्मा जी ने भारत को आजाद् कराया
– महात्मा गाँधी

स्वतंत्रता के बाद सरदार ने रियासतें समाप्त की
– सरदार पटेल

पंडित जी देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे
– पं० जवाहरलाल नेहरू

शास्त्री जी भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री थे।
– लाल बहादुर शास्त्री

पुरी की पवित्रता सर्वविदित है
– जगन्नाथपुरी

भाववाचक संज्ञा शब्दों का जातिवाचक संज्ञा के रूप में पयोग – भाववाचक संज्ञा शब्दों का प्रयोग एकवचन में होता है, किन्तु जब कभी कुछ भाववाचक संज्ञा शब्द बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं तब वे जातिवाचक संज्ञा कहलाते हैं। जैसे –
बुराई से बुराइयाँ – हम सभी में अनेक बुराइयाँ व्याप्त हैं।
पढ़ाई से पढ़ाइयाँ – निर्धन व्यक्ति की बच्चों की पढ़ाइयाँ मार देती हैं।
दूरी से दूरियाँ – कभी-कभी दूरियाँ ही अपनेपन का आभास कराती हैं।
प्रार्थना से प्रार्थनाएँ – गरीबों की प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं जातीं।
ऊँचाई से ऊँचाइयाँ – ऊँचाइयाँ नापनी हैं तो हिमालय का भ्रमण करो।
हिंदी के भाववाचक संज्ञा शब्दों में मूल शब्द तथा यौगिक शब्द दोनों ही मिलते हैं।

मूल भाववाचक संज्ञा शब्द-यौगिक भाववाचक संज्ञा शब्दों की रचना सभी प्रकार के शब्दों से हो सकती है। ये प्राय: पाँच प्रकार के शब्दों से बनती है –

  • जातिवाचक संज्ञाओं से
  • सर्वनामों से
  • विशेषणों से
  • क्रियाओं से
  • अव्ययों से

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

(हिंदी के भाववाचक संज्ञा शब्दों के मूल शब्द तथा यौगिक शब्दों को भाववाचक संज्ञाएँ रूढ़ तथा निर्मित भी कहा जाता है)
जातिवाचक संज्ञा से –

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 2

सर्वनामों से –

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 3

विशेषण से –

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 4

क्रिया पद से (क्रियाओं से)

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 5

अव्ययों से (अविकारी शब्दों से) –

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 6

संज्ञा शब्दों की रूप-रचना
हिंदी से संज्ञा शब्द वाक्य के अंतर्गत कभी अपने मूल रूप में तथा कभी परिवर्तित रूप में प्रयुक्त होते हैं, जैसे –
लड़का खेल रहा है।
लड़के खेल रहे है ।
लड़कों को बुलाकर लाओ।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

पहले वाक्य में ‘लड़का’ शब्द मूल रूप में प्रयोग हुआ है जबकि दूसरे व तीसरे वाक्य त्रमश: ‘लड़के’ तथा ‘लड़कों’ – शब्दों का प्रयोग ‘लड़का’ शब्द का ही परिवर्तित रूप है।

रूप रचना से यह ज्ञात होता है कि प्रयुक्त शब्दों में क्या परिवर्तन आया है ? यह परिवर्तन क्यों और कैसे आया है ? परिवर्तन आने से शब्द के जो रूप बनते हैं उनको दर्शाना अथवा अंकित करना ही रूप-रचना कहलाती है। संज्ञा शब्दो का रूप-परिवर्तन लिंग, वचन और परसर्ग (विभक्ति) के कारण होता है। यही संज्ञा की रूप-रचना कहलाती है।
संज्ञा शब्दों में वचन का प्रभाव
हिंदी में ‘लिंग’ संज्ञा शब्दों की प्रमुख विशेषता है। शब्दों के बहुवचन रूप बनाने के लिए और वाक्य में इनका सही प्रयोग करने हेतु शब्दों के सही लिंग की पहचान अति आवश्यक हो जाती है। हिंदी में पुलिंग तथा स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन बनाने के नियम अलग-अलग हैं।
शब्दों को पुलिंग और स्त्रीलिंग दों वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-
पुलिंग शब्द – बेटा, बच्चा, कवि, पानी, कमरा, धोबी, नौकर, सेवक , लड़का, छाता, पाठक, मित्र, घर, घोड़ा, भालू, शेर, हाथी।

स्त्रीलिंग शब्द – बेटी, लड़की, गायिका, वस्तु, वधू, बहन, मोरनी, माला, रानी, बुढ़िया, बछिया, विधि, गति, गली, कुर्सी, आँख, मेज, किलाब, शेरनी।

हिंदी के संज्ञा शब्दों की रूप-रचना और परसर्ग (विभक्ति) के अनुसार होती है।
परसर्ग (विभक्ति) रहित शब्द को मूल शब्द कहते हैं। जैसे – बालक-बालिका।

परसर्ग (विभक्ति) सहित शब्द को तिर्यक् शब्दो के बहुवचन रूप में ‘याँ’, ‘ओं’, नहीं ‘या’ तथा ‘ओ’ परसर्ग लगता है। हिंदी के संज्ञा शब्द रूप-रचना की दृष्टि से चार वर्गों में विभक्त किए जा सकते हैं –

1. आकारांत पुलिंग शब्द – जैसे-बेटा, बच्चा, कमरा, लड़का, घोड़ा, लाला आदि । इस वर्ग में कुछ अपवाद भी मिलते है – कुछ संज्ञा शब्द ऐसे है जो ‘आकारांत’ होते हुए भी इस रूप-रचना अथवा रूपावली के अंतर्गत नहीं आते। जैसे – (क) संस्कृत शब्द – महात्मा, योद्धा, नेता, पिता, राजा, दाता आदि।
(ख) संबंध सूचक शब्द – चाचा, जीजा, मामा, दादा, नाना, बाबा आदि।
(ग) तद्भव शब्द – अगुआ, मुखिया आदि।
2. “आकारांत”‘से भिन्न पुलिंग शब्द। जैसे – कवि, रवि, पति, मुनि, माली, गुरु, घर, बालक, डाकू, साधु आदि।
3. “इ/ई” अथवा ” इया” प्रत्यांत स्त्रीलिंग शब्द, जैसे- चिड़िया, कुटिया, बुढ़िया, कोठरी, बेटी, नदी, विधि, रीति आदि।
4. “इ/ई” अथवा “इया’ प्रत्यांत से भिन्न स्त्रोलिंग शब्द, जैसे – माता, गीता, वधू, बालू, बहन, वस्तु, गौ आदि। संज्ञा शब्दों (लड़का, लड़कें, लड़कियों) में होने वाले परिवर्तन से संबंधित कुछ नियम इस प्रकार हैं –

1. अकारांत शब्दों (जैसे घर) में विभिक्ति-प्रत्यय मात्रा के रूप में लगते हैं। जैसे – घरों।
2. आकारांत पुलिंग शब्दों में भी विभिक्ति प्रत्यय मात्रा के रूप में लगत हैं। जैसे –
लड़का-लड़कें-लड़कों, घोड़ा-घोड़ें-घोड़ों।
जिन स्र्रीलिंग शब्दों के अंत में इया प्रत्यय आता है उनमें भी यही नियम लागू होता हैं जैसे – बुढ़िया-बुढ़ियाँ-बुढ़ियों
3. आकारांत स्त्रीलिंग शब्दों के बाद में एँ तथा ओं लगाकर नए शब्द बनते हैं जैसे – माता-माताएँ-माताओ।
4. अकारांत अथवा आकारांत प्रत्ययों से भिन्न शब्दों के साथ विभक्ति प्रत्यय उनके मूल रूपों में एँ तथा ओं लगाकर बनते हैं। जैसे –
गुरु-गुरुओं, वस्तु-वस्तुएँ-वस्तुओं
इकारांत/ईकारांत शब्दों के बाद प्रत्ययों से पहले ‘य’ का आगम भी होता है। जैसे –
साली-सालियों, नदी-नदियों
5. संबोधन बहुवचन में ‘ओं’ नहीं, ‘ओ’ प्रयुक्त होता है। जैसे –
हे छात्रों ! अरे लड़कों-लड़कियों !
कुछ अपवदों को छोड़कर आकारांत पुलिंग शब्दों जैसे – बेटा, लड़का, घोड़ा, बच्चा आदि के रूप निम्न प्रकार हो सकते हैं।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

आकारांत पुलिंग शब्द-बच्चा

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 7

बेटा

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 8

इसमें बेटा, बेटे, बेटो और बेटों – ये चार रूप बनते हैं।
अपवाद – राजा, पिता, योद्धा, दाता, महात्मा, नेता, वह्मा, नाना, बाबा, मामा, चाचा, दादा, जोजा, मुखिया, अगआ आदि।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 9

“आकारांत” से भिन्न पुलिंग शब्द

माली

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 10

अकारांत ‘बालक’ के रूप

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 11

इकारान्त पुलिंग ‘मुनि’ के रूप

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 12

(रावि, कवि, पति, क्रसषि आदि पुलिंग शब्दों के रूप भी इसी प्रकार बनते हैं, ईकारांत पुलिंग धोबी, माली, ऊकारांत शब्द डाकू, गुरु के रूप में इसी प्रकार बनते हैं।)

लड़की

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 13

“’इया प्रत्यांत’” स्र्रीलिंग शब्द-कुटिया

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 14

(निर्जीव संज्ञाओं के साथ संबोधन कारक का प्रयोग नहीं किया जाता है।)
इकारांत/ईकारांत अथवा ”इया” प्रत्यांत से भिन्न स्त्रीलिंग शब्द

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 15

औकारांत स्त्रीलिंग ‘गौ’

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा 16

अन्य कारकों में भी रूप इसी प्रकार होंगे, किंतु चिह्न उन कारकों के अनुसार लगंगे। ‘गो’ जैसे अन्य औकारांत स्त्रीलिंग शब्दों के रूप भी इसी प्रकार बनेंगे।

WBBSE Class 9 Hindi व्याकरण संज्ञा

रूप-रचना हेतु विशेष निर्देश

1. सभी “आकारांत” (स्व्वीलिग/पुलिंग), “आकारांत” पुलिंग तथा “इया प्रत्यांत” शब्दों में विभिक्ति प्रत्यय मात्रा रूप में लगते हैं। जैसे -लड़के, लड़कों, बहनें, बहनों, बालक, बालकों आदि।
2. “अकारांत” और ‘आकारांत’ से भिन्न शब्दों में विभक्ति-प्रत्यय अपने मूलरूप (एँ, ओं) में लगते हैं। जैसेवस्तु-वस्तुएँ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 13 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions सहायक पाठ Chapter 13 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 13 Question Answer – मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : संकलित पाठ के आधार पर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के व्यक्तित्व की विशेषताओं का उल्लेख करें ।
प्रश्न – 2 : मौलाना आज़ाद के अनुसार हमें अपनी स्वतंत्रता का उपयोग कैसे करना चाहिए – पठित पाठ के आधार पर लिखें ।
प्रश्न – 3 : मौलाना आज़ाद के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं को लिखें, जिन्हें हमें अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है ।
प्रशश्न – 4 : महान व्यक्तित्व, भव्य उपस्थिति, अदम्य साहस और भय-मुक्त आचरण का व्यक्ति किसे कहा गया है ? उनकी विशेषताओं का उल्लेख करें ।
उत्तर :
मौलाना अबुल कलाम का व्यक्तित्व साहस, ईमानदारी, निडरता तथा स्वंतत्रता-प्रेमी का व्यक्तित्व था। सन् 1920 में कांग्रेस में शामिल होने से पहले ये क्रांतिकारी थे । अपने अनेनानेक गुणों के कारण इन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया । यह एक ऐसा पद था जिसे उन्होंने अनेक वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में भी संभाले रखा।

मौलाना आजाद यद्यपि मुसलमान थे फिर भी हिन्दू, मुसलमान, सिख एवं ईसाई में उनके लिए कोई भेद-भाव नहीं था। राष्ट्रीय भावना उनके जीवन की प्रेरणा-शक्ति थी। वे राष्ट्रीय एकता तथा सामुदायिक सद्भावना के प्रतीक थे । इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यदि किसी ने उनका व्यक्तिगत अपमान किया तो उसे वे आसानी से भुला सकते थे लेकिन राष्ट्रीय अपमान को नहीं । उन्होंने हमेशा सच्चाई तथा ईमानदारी का साथ दिया।

आज़ादी मिलने के बाद मौलाना ने सबसे पहले इस बात पर जोर दिया कि इस आज़ादी का उपयोग सामाजिक कल्याण में, देश से बीमारी गंदगी तथा निरक्षरता दूर करने में किया जाय । वे स्वयं खुले दिल-दिमाग के थे तथा चाहते थे कि आज़ाद भारत भी जातिगत, भाषागत, प्रांतगत तथा बोलीगत संकीर्ण पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय एकता के आदर्शों, प्रशासन में ईमानदारी तथा आर्थिक प्रगति के लिए ही उनका प्रत्येक कदम था।

किताबें मौलाना आज़ाद की हर समय की साथी थीं। उन्होंने कुरान पर एक प्रसिद्ध रचना की। इसके अलावे उन्होंने पूर्वी तथा पाश्चात्य दर्शनशास्त्र की भूमिका पर भी एक किताब लिखी जो अपने-आप में अन्यतम है। इस पुस्तक में ब्रह्यांड की तुलना एक ऐसी प्राचीन पांडुलिपि से कि गई है जिसका पहला और अंतिम पृष्ठ कहीं खो गया हो ।

मौलाना आज़ाद की सबसे बड़ी सीख जो हमें आज भी याद रखने की जरूरत है – वह यह है कि देश में आज भी विभाजित करने वाली शक्तियाँ प्रभावी हैं । यदि हम राष्ट्रीय एकता के बारे में सोचते हैं तो हमें उन शक्तियों से सावधान रहने की जरूरत है । दूसरी जो उनकी सीख है कि कोई व्यक्ति तब तक सच्चा नेता नहीं हो सकता जब तक वह अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करके अपनी लोकप्रियता को जोखिम में नहीं डालता । सच तो यही है कि जो सब को प्रसन्न करना चाहते हैं वे अंत तक किसी को भी प्रसन्न नहीं कर पाते ।

WBBSE Class 9 Hindi मौलाना अबुल कलाम आज़ाद Summary

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 13 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद 2

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 72

  • निडर = नहीं डरने वाला ।
  • दायित्व = कर्म ।
  • जोखिम = खतरे ।
  • कमियों = कमी ।
  • पराधीन = गुलाम।
  • सद्भावना = अच्छी भावना ।
  • भेद-भाव = अंतर ।

पृष्ठ सं० – 73

  • भाषागत = भाषा से जुड़ी ।
  • प्रांतगत = प्रांत या राज्य से जुड़ी ।
  • सुविदित = अच्छी तरह जानी हुई।
  • तथापि = फिर भी ।
  • टस से मस न होना = अड्गि रहना, अपनी बात पर बने रहना ।
  • समुचित = पूरी।
  • अवहेलना = न मानना ।
  • आघात = चोट ।
  • हामी = पक्षधर, पक्ष लेने वाले ।
  • समीचीन = समय के अनुकूल ।
  • सबक = पाठ, शिक्षा, सीख ।

पृष्ठ सं० – 74

  • पांडुलिपि = लिखावट ।
  • भय-मुक्त = डर से मुक्त ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 12 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 12 Question Answer – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : संकलित पाठ के आधार पर डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का परिंचय दें ।
प्रश्न – 2 : डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान में भारत के लिए जो आदर्श रखे उनका वर्णन करें।
प्रश्न – 3 : डॉ० राजेन्द्र प्रसाद महात्मा गाँधी के निष्ठावान शिष्य थे – पठित पाठ के आधार पर लिखें।
प्रश्न – 4 : डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के विश्व-शांति तथा परमाणु निरस्त्रीकरण के बारे में विचार लिखें ।
प्रश्न – 5 : डॉ० राजेन्द्र प्रसाद सच्चा प्रजातंत्र किसे मानते थे ? विवेचना करें ।
प्रश्न – 6 : डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के व्यक्तित्व तथा कार्यों का उल्लेख करें ।
उत्तर :
है राजेन्द्र प्रसाद वह नाम आदर जिसे इतिहास देता है,
बढ़कर जिसके पद-चिह्नों को अंकित दिल पर कर देता है ।

अपनी सादगी तथा सरलता के कारण किसान जैसा व्यक्तित्व पाकर भी पहले राष्प्रपति बनने का गौरव पाने वाले डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर सन् 1884 ई० के दिन बिहार राज्य के सरना जिले के एक मान्य एवं सभान्त कायस्थ परिवार में हुआ था । इन्होंने बारह वर्षों से भी अधिक समय तक देश को भविष्य का मार्ग दिखाया।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 12 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

आरंभ में राजेन्द्र बाबू राष्ट्रीय नेता गोपाल कृष्ण गोखले से, पर बाद में महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सबसे अधिक प्रभावित रहे । दोनों का प्रभाव इनके जीवन पर स्सष्ट रूप से दिखाई देता था । जाँधी जी के सच्चे शिष्य के रूप में उन्होंने हमेशा निम्नलिखित बातों पर बल दिया –

  • हम सभी प्रकार की हिंसा से बचें ।
  • सभी राष्ट्रों के बीच शांति और मित्रता स्थापित करने के लिए संघर्ष करें ।
  • एकपक्षीय परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए प्रस्ताव पारित एवं स्वीकृत किए जायं।
  • हमें उन कारणों को भी समाप्त करना होगा जो युद्धों का कारण बनते हैं।
  • यदि हम विश्व में एक शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में जीवित रहना चाहते हैं तो परस्पर भय, अविश्वास, वैरभाव तथा असुरक्षा के कारणों को दूर करना होगा ।
  • मनुष्य को यह अनुभव करना चाहिए कि समस्त मानवता एक है, भले ही उसमें जातिगत, संप्रदायगत और वर्गभेद हैं ।
  • सभी राष्ट्रों को अपनी सोच का क्षितिज व्यापक बनाना होगा, ज्ञान में वृद्धि करनी होगी, सभ्य जीवन जीना होगा और यह अनुभव करना होगा कि जब विश्व का कोई व्यक्ति या देश कष्ट उठाता है तो सभी कष्ट उठाते हैं।
  • हम एक-दूसरे से घृणा करना, शत्रुता छोड़ दें तथा प्रेमपूर्वक एक-दूसरे को समझने की कोशिश करें ।

निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि राजेन्द्र प्रसाद गाँधी जी के निष्ठावान शिष्य थे। प्रजातंत्र में उनका पूरापूरा विश्वास था और उनका यह मानना था कि जब तक यह पूरे संसार में व्याप्त न हो जाय, संसार के सभी समुदायों को प्रसन्नता न प्रदान करे तब तक वह सच्चा प्रजातंत्र नहीं है।

WBBSE Class 9 Hindi डॉ. राजेन्द्र प्रसाद Summary

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 12 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1
शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 69

  • सर्वोत्कृष्ट = सबसे अच्छा ।
  • शिखर वर्ष = अच्छे साल ।
  • बल = जोर ।
  • निरस्त्रीकरण = हथियारों पर रोक लगाना।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 12 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

पृष्ठ सं० – 70

  • वैरभाव = दुश्मनी का भाव ।
  • भ्रातृत्व = भाईचारे की भावना ।
  • हासिल = प्राप्त ।
  • उतावलेपन = जल्दीबाजी।
  • अंततोगत्वा = अंत में जाकर ।

पृष्ठ सं० – 70

  • श्रोताओं = सुननेवाले ।
  • संतोषजनक = संतोष को जन्म देने वाला ।
  • निरंतर = लगातार ।
  • व्यापक = फैला ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 11 सरदार वल्लभ भाई पटेल

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 11 Question Answer – सरदार वल्लभ भाई पटेल

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर 

प्रश्न – 1 : संकलित पाठ के आधार पर सरदार वल्लभ भाई पटेल का संक्षिप्त परिचय दें।
प्रश्न – 2 : सरदार वल्लभ भाई पटेल के व्यक्तित्व तथा कृतित्व का परिचय दें ।
प्रश्न – 3 : पटेल भारतीय एकता के संस्थापक थे – पठित पाठ के आधार पर लिखें ।
प्रश्न – 4 : सरदार को उनके जिन गुणों के आधार पर उन्हें ‘लौह पुरुष’ कहा गया – उनकी विवेचना करें ।
प्रश्न – 5 : एक गुहमंत्री के तौर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की उपलब्धियों का वर्णन करें।
प्रश्न – 6 : सरदार पटेल का जीवन हमें आधुनिक भारत के महान निर्माताओं के आत्मत्याग की याद दिलाता है – विवेचना करें ।
प्रश्न – 7 : सरदार पटेल के रूप में हमारे पास एक साहसी क्रांतिकारी, विद्वान राजनेता और आदर्श प्रशासक था-अपने विचार लिखें ।
उत्तर :
संयम, सादगी, सहिष्णुता, सत्यवादी तथा दृढ़ता के प्रतीक सरदार का जन्म 31 अक्टूबर, सन् 1875 को गुजरात में हुआ था । 22 वर्ष की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा पास कर वकालत के पेशे में आ गए। सन् 1908 में विलायत की अंतरिम परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर बैरिस्टर बन गए। फौजदारी वकालत में उन्होंने खूब यश कमाया।

जनसेवा तथा त्याग-भावना के कारण ही पटेल अहमदाबाद नगरपालिका के चेयरमैन चुने गए । बोरसद सत्याग्रह, नागपुर का झण्डा सत्याग्रह, बारडोली ताल्लुका सत्याग्रह तथा गुजरात की बाढ़ के समय पटेल ने जो अपना योगदान दिया वह हमेशा याद रखा जाएगा ।

सरदार पटेल उद्देश्य के प्रति स्थिर लक्ष्य, संगठन कार्य में अप्रतिम तथा अपने आदर्शों के प्रति अटल थे । उनके चट्टानी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हे ‘लौह पुरुष’ कहा । उनकी तुलना महान राजनीतिज मैकियावेली तथा बिस्मार्क से की जाती है।

सितंबर, 1946 में जब नेहरु जी की अस्थायी सरकार बनी तो सरदार पटेल को गृहमंत्री नियुक्त किया गया । गृहमंत्री के तौर पर उन्होंने देशवासियों से कहा कि यदि हम अपने देश को प्रथम वर्ग की शक्ति बनाना चाहत हैं तो हमें कुछ अधिक करने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें अपने मतभेदों को भुलाकर देश में पूर्ण संगठन और एकता लानी होगी । जब देश में राज्यों के एकीकरण करने की बात आई तो इस समस्या को पटेल ने बिना खून-खराबी के बड़ी खूबी से हल किया।

देशी राज्यों में राजकोट, जूनागढ़, बहावलपुर, बड़ौदा, कश्मीर, हैदराबाद को भारतीय महासंघ में सम्मिलित करने में सरदार को कई पेचीदगियों का सामना करना पड़ा फिर भी उन्होंने इसे हल किया।

निष्कर्ष तौर पर यह कहा जा सकता है कि महात्मा गाँधी ने कांग्रेस में प्राणों का संचार किया तो नेहरु ने उस कल्पना और दृष्टिकोण को विस्तृत आयाम दिया । डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद से उसको आचरण मिला था और सरोजिनी नायडू ने कांग्रेस को आभार प्रदान की थी लेकिन इसके साथ ही जो शक्ति और सम्पूर्णता कांग्रेस को प्राप्त हुई वह सरदार पटेल की कार्यक्षमता का ही परिणाम था 1 15 दिसंबर, 1950 को प्रातःकाल 9 बजकर 37 मिनट पर 76 वर्ष की आयु में इस महापुरुष का निधन हो गया लेकिन उनकी राष्ष्र के प्रति की गई सेवाओं का भारतीय जन-मानस पर अमिट प्रभाव है ।

WBBSE Class 9 Hindi सरदार वल्लभ भाई पटेल Summary

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 11 सरदार वल्लभ भाई पटेल 1

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 64

  • पूर्व = पहले ।
  • अनुकूल = अनुसार ।
  • राय = विचार, सलाह ।
  • परे = अलग ।
  • सर्वोपरि = सबसे ऊपर ।
  • स्पष्टवादिता = स्पष्ट बोलने की आदत ।
  • दूरदर्शिता = भविष्य को देखने की गुण ।
  • शेष = बाकी ।
  • दक्षता = कुशलता।
  • चातुर्य = चतुरता ।
  • सबल = मजबूत ।
  • परिवर्तित = बदलना ।
  • एकीकरण = एक करने का प्रयास ।
  • प्रांतों = राज्यों।

पृष्ठ सं० – 65

  • कम्भा, रेड्डी, लिंगायत, वोकलीगर, कायस्थ, राजपूत = जातियों के नाम हैं।
  • नितांत = बिल्कुल।
  • गौण = एकदम साधारण ।
  • निजी = व्यक्तिगत ।
  • दूषित = गंदा ।
  • दैनिक = रोज निकलने वाला समाचार-पत्र ।
  • संगठन-क्षमता = लोगों को एकत्र करने की क्षमता।

पृष्ठ सं० – 66

  • अंश = भाग, हिस्सा ।
  • प्रण = संकल्प ।
  • चहुँमुखी = चारों ओर से ।
  • गबन = घपला ।
  • अपव्यय = गलत तरीके से खर्च करना’ ।
  • उजागर = प्रकट ।
  • मूल = मुख्य ।
  • उत्थान = विकास ।
  • संपदा = धन ।
  • अपनत्व = अपनापन ।

पृष्ठ सं० – 67

  • नैतिक आचरण = व्यक्तिगत व्यवहार ।
  • अंतराल = अंतर, दूरी ।
  • आंतरिक = भीतरी ।
  • अनंत = जिसका अंत न हो ।
  • सर्वोपरिसत्ता = ईश्वर ।
  • गहनतम = अत्यंत गहरा ।
  • प्रकृति = स्वभाव ।
  • सुचारु = अच्छे तरीके से ।

पृष्ठ सं० – 68

  • परे = अलग ।
  • कार्यान्वित = कार्य रूप देना, कार्य करना ।
  • दंभी = घमंडी, अहंकारी ।
  • पूर्वाग्रह = पहले की बातों के प्रति आग्रह ।
  • अटूट = नहीं टूटने वाला ।
  • प्रबल = शक्तिशाली ।
  • सराहना = प्रशंसा।
  • पदचिह्न = पैरों के चिह्न।
  • धूमिल = गंदा ।
  • परास्त = पराजित ।
  • कामियों = कमी ।
  • निराकरण = हल, समाधान ।
  • आकांक्षाओं = इच्छाओं ।
  • आशंका = भय से भरा संदेह ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 10 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions सहायक पाठ Chapter 10 रवीन्द्रनाथ ठाकुर to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 10 Question Answer – रवीन्द्रनाथ ठाकुर

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : रवीन्द्रनाथ ठाकुर सर्वतोमुखी प्रतिभासंपन्न , साहित्यकार, कलाकार, शिक्षक, कवि, गीतकार और अभिनेता थे – पठित पाठ के आधार पर लिखें ।
प्रश्न – 2 : बहुमुखी साहित्यकार के रूप में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का मूल्यांकन करें ।
प्रश्न – 3 : संकलित पाठ के आधार पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर का साहित्यिक परिचय दें ।
उत्तर :
अगर हम ऐसा कहें कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि थे तो ऐसा कहना अतिशयोक्ति न होगी। इनका जन्म 7 मई, सन् 1861 को सोमवार के दिन जोड़ासाँकू (कलकत्ता) में हुआ था।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक ही साथ कवि, कलाकार, शिक्षक, कवि, संत, विचारक और मानवता के सच्चे पुजारी थे। साहित्य की कोई ऐसी विधा नहीं थी, जिसमें उन्होंने न लिखा हो – कहानी, उपन्यास, नाटक, प्रहसन, गीत, गीतिका, कीर्त्तन, आलोचना आदि उन्होंने सब लिखा।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 10 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

विषय की बात करें तो उन्होने धर्म, शिक्षा, समाज, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्व, विज्ञान, संगीत आदि सभी विषयों पर लिखा । यह भी लिए गर्व की बात है कि किसी भी भारतीय साहित्यकार की रचनाओं का अनुवाद उतनी भाषाओं में नहीं हुआ जितनन रवीन्द्धनाथ ठाकुर की रचनाओं का । संसार की अनेक भाषाओं में इनके ग्रंध आ चुके हैं। श्री ठाकुर का दर्शन-ज्ञान भी अपूर्व था। भारतीय दर्शन पर उनके व्याख्यान को सुनकर यूरोप और अमेरिकावाले भी दंग रह जाते थे । इनकी कविताओं की पंक्ति-पंक्ति में संगीत भरा है । कंठ भी सुंदर था । जब ये गाने लगते तो ऐसा प्रतीत होता मानो संगीत पंख लगाकर चारों और मंडराते हुए उड़ रहे हों ।

सत्तर वर्ष की आयु में इन्होंने चित्रकला प्रारंभ की । टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों से रंगों का समन्वय कुछ ऐसा किया कि संसार के चित्रकला-मर्मझ भी विस्मय-विमुग्ध रह गए। संसार की बड़ी-बड़ी आर्ट-गैलरियों में इनके चित्र रखे गए। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर केवल साहित्यिक या कवि ही नहीं थे, उनका व्यक्तित्व भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में ऊँचा स्थान प्राप्त कर चुका था।

वास्तव में रवीन्द्र की प्रतिभा में भारतीय संस्कृति के विविध अंगों का समावेश और समन्वय की सामर्श्य प्रचुरता से पायी जाती है । इसलिए उनकी काव्यधारा में एक साथ ही वेदान्त, वैष्णववाद, यौद्धदर्शन, सूफी मत, बाऊल सम्पदाय, ईसाई धर्म सभी का एक अभूतपूर्व समन्वय माप्त होता है । सन् 1941 में यह ‘भारत-रवि’ अस्त हो गया।

प्रश्न – 4 : संकलित पाठ के आधार पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के ईश्वर-संबंधी विचारों को लिखें।
प्रश्न – 5 : रवीन्द्रनाथ का धर्म उनकी दृष्टि और अनुभव पर आधारित है, न कि ज्ञान पर – विवेचना करें।
प्रश्न – 6 : टैगोर के लिए ईश्वर, मानव और प्रकृति एक में ही समाविष्ट है – पठित पाठ के आधार पर टैगोर के थर्म-संबंधी विचारों को लिखें ।

प्रश्न – 7 :
धर्म को आचरण के आडा्बर या समारोहपूर्वक पूजा-पाठ मानकर भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए प्रस्तुत पंक्ति के आलोक में रवीन्दनाथ ठाकुर के धर्म तथा ईश्वर-संबंधी विचारों को लिखें।
उत्तर :
रवीन्द्रनाथ धार्मिक, ईश्वरवादी के साथ-साथ मानवतावादी भी थे । यह उनके दर्शन की विशिश्रता है कि भारतीय वेदान्तिक परम्परा से प्रेरणा लेते हुए मानव को ईश्वर का ही अंश माना । ईश्वर और मानव का संबंध रबीन्द्रकाव्य में एक अपूर्व रूप ले लेता है । असीम ईश्वर और ससीम (जिसकी सीमा हो) मानव में कोई भेद नहीं है । मानव और ईश्वर दोनों में एक सेतु (पुल) है – प्रेम का सेतु । संत रविदास ने भी ईश्वर को नरहरि कहकर संबोधित किया है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का ईश्वर संबंधी दर्शन भक्तकवि चण्डीदास से प्रभावित था –

“सुन हे मानुष भाई
सबार ऊपरे मानुष सत्य
ताहार ऊपरे नाई ।”

हैगोर के लिए यह संसार विविध, सुन्दर और नवीन है । उनके अनुसार मानव तो प्रेम और प्रेम पाने के लिए ही पैदा हुआ है । इस प्रेम को पाने के लिए आत्मिक शुद्धि बहुत आवश्यक है। इसलिए मनुष्य को धर्म के नाम पर आडम्बर या समरोहपूर्वक पूजा-पाठ न मना कर भ्रम से दूर ही रहना चाहिए। अहंकार के लोप से ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 10 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

टैगोर के लिए सामाजिक उद्देश्य और आध्यात्मिक जीवन में कोई टकराहट नही है। रवान्द्रनाथ के लिए आत्मसंयम ही तपस्या है और वह सांसारिक कर्मों से पलायन नहीं है। यही वह बिन्दु है उन्हें मानवधर्म या मानवतावाद की ओर ले जाता है। रवौन्द्रनाथ अंधविश्वासों से रहित, मानव स्वतंगता की सर्जनात्मकता तथा विवेक की सार्थक्ता को ही ईश्वर-दर्शन मानते थे । उनका यह कहना था कि प्राचीन अंधविश्वास हमारे दिल-दिमाग को नहीं कृते – उन्हें बंदलना होगा।

टैगोर ने अपने मानवतावादी — ईश्वरवाद का प्रतिपादन अपने सर्व श्रेष्ठ ग्रंथ, जो धर्म-दर्शन पर है – “The Religion of Man” में विस्तृत रूप से किया है । उनके धर्म-दर्शन का साराश यह है कि ईश्वर मानव की आत्मा में ही निवास करता है । मानव से प्रेम करना ही ईश्वर से प्रेम करना है ।

प्रश्न – 8 : भारतीय स्वाथीनता-संग्राम में रवीन्र्रनाथ ठाकुर के योगदान का उल्लेख करें ।
प्रश्न – 9 : “जब बुराई पनपने लगे तो यह हमारे लिए जरूरी हो जाता है कि हम आवाज उठाएँ” प्रस्तुत पंक्ति के आलोक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के राजनीतिक जीवन का उल्लेख करें।
प्रश्न – 10 : रवीन्द्रनाथ ठाकुर केवल कवि – साहित्यकार ही नहीं महान क्रांतिकारी भी थे संकलित पाठ के आधार पर लिखें ।
उत्तर :
रबीन्द्ननाथ ठाकुर मूलतः साहित्यिक कलाकार थे लेकिन जब भी देश में अन्याय हुआ तो उन्होंने उसका विरोध किया। उनका यह विचार था कि जब भी वुराई पनपने लगे तो हमारा यह दायित्व बनता है कि विरोध करें। सन् 1995 में जब राजद्रोह विधेयक पास हुआ और तिलक को गिरफ्तार कर लिया, टैगोर ने ऐसे समय में सरकार की दमन-नीति के विरुद्ध आवाज उठाई और उनके बचाव के लिए धन इकट्टा करने में अपना योगदान दिया। जन सन् 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ तो इसने टैगोर को विचलित कर दिया। उस समय उन्होने देशप्रेम से भरे गीतों की रचना करके लोगो में चेतना जगाने की कोशिश की।

जब जालियांवाला बाग में हजारों निर्दोष मारे गए तो उन्होने अंग्रेजी सरकार को अपना ‘नाइटहुड’ का खिताब लौटा दिया। इतना ही नहीं विरोध व्यक्त करने के लिए उन्हांने वायसराय चेम्सफोर्ड को पत्र लिखा। इस पत्र का अंतिम अंश था –
“अब समय आ गबा है जब सम्मान के तमगे विशिप्टता के उस विसंगत संदर्भ में, जिसमें मेरे देशवासी अपनी तथाकथित हीनता के कारण वह अपमान सह रहे हैं, जो मानवोचित नहीं है – हमारी शर्म को और उजागर करते हैं ।'”

अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति के विरोध में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जहाँ-जहाँ अलगाव की भावना सर्वोपरि है वहाँ-वहाँ अंधकार का राज्य है। वे राजनीति में हिंसा के विरोधी थे। उनका कहना था – सभ्यता हिंसा में जीवित नहीं रह सकती। केवल आध्यात्मिक मूल्यों को पुन: अपनाकर ही मानवता को विनास से बचाया जा सकता है । उनके मन में किसी भी जाति या सम्पदाय के लिए घृणा का भाय न था –

“‘इन मुसलमानों का जिन्होंने प्राचीनकाल से और अनेक पीढ़ियों से अपने जन्म और मरण से इस मिद्वी को अपना कहा है, उसका भी भारत के इतिहास में स्थान है ।.यहाँ तक कि अंग्रेज भी हमारे इतिहास के अंग हैं ।”

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 10 रवीन्द्रनाथ ठाकुर

राजनीति में मानव-मात्र से प्रेम का उदाहरण सी०एफ०एण्डुज को लिखे पत्र में उनके इस कथन में मिलता है –
“बिटेन राप्प्र से अपनी सभी शिकायतों के बावजूद मैं आपके देश को प्रेम करने के लिए विवश हूँ. जिन्होंने मुझे अनेक परम प्रिय मित्र दिए हैं । मैं इस सच्चाई के कारण अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि धृणा करना एक घृणित कार्य है । सत्य बह है कि सभी देशों के सबसे अच्छे लोग आपस में प्रेम करते हैं ।”

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WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 10 रवीन्द्रनाथ ठाकुर 1

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 45

  • सर्वतोमुखी = बहुमुखी ।
  • अभिनेता = अभिनय करनेवाले ।
  • उदार = खुले दिल का ।
  • मान्यताएँ = विचार ।
  • आलोक = प्रकाश ।
  • सौहाद्र = प्रेम ।
  • साकार = आकार के साथ ।
  • शाश्वत = जो हमेशा से है ।
  • जीवन्त = जिंदा।
  • उद्दाम = साहस।
  • मिश्रित = मिला हुआ ।
  • कौतूहल = जानने की उत्सुकता ।
  • हिमायत = पैरवी ।
  • क्रूर = कठोर ।
  • संक्रमण = बीमारियों से ग्रस्त होना ।
  • परिधानों = वस्त्रों ।
  • दुराग्रहों = बुरे चीजों के लिए आग्रह, जिद्न ।
  • जड़ता = मूखर्खता ।

पृष्ठ सं० – 46

  • पुनर्नवीकरण = पुन: नया करना ।
  • पुनसर्मपण = फिर से सर्मपण ।
  • सार = तत्व ।
  • असीम = जिसकी सीमा न हो।
  • राग = प्रेम ।
  • व्यक्त = प्रकट ।
  • परिष्कृत = अच्छा ।
  • एकांतसेवी = एकांत में रहनेवाले।
  • पूर्वानुभूति = पहले से होनेवाली अनुभूति ।
  • भावी = होनेवाला ।
  • पूर्वपीठिका = भूमिका ।
  • नीड़ = घोंसला।
  • अवास्तविकता = जो वास्तविक नहीं है ।

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पृष्ठ सं० – 47

  • स्मारक = स्मृति का स्थान ।
  • कामना = इच्छा ।
  • सामंज्यस = तालमेल ।
  • प्रशांत = विशाल ।
  • सहकार = सहयोग करने वाले ।
  • परिवेश = वातावरण ।
  • अतृप्त = जो तृप्त न हो ।
  • द्वंद्व = युद्ध ।
  • अपयशकारी = कलंक लगाने वाली ।
  • आचरण = व्यवहार ।
  • तपोवन = वह वन जहाँ ॠषि तप किया करते थे ।

पृष्ठ सं० – 48

  • नगण्य = नहीं गिनने योग्य ।
  • उपरान्त = बाद ।
  • कतिपय = कुछ ।
  • प्रवासी = जो दूसरे देश में वास करता हो ।
  • एकत्व = एक होने की भावना ।
  • विखण्डत्व = अलगाव ।

पृष्ठ सं० – 49

  • प्रज्ञा = विवेक, ज्ञान ।
  • दार्शनिक = विचारक ।
  • प्रखर = तेज ।
  • बौद्विक = बुद्धि से जुड़ा हुआ ।
  • आभास = अनुभव।
  • दृष्टिगोचर = दृष्टि से दिखाई देने वाली ।
  • स्पर्श = छूने ।
  • अपितु = बल्कि ।
  • अन्तरिक्ष = शून्य ।
  • यन्त्रवत् = मशीन की तरह।
  • अन्धाधुन्ध = बिना सोचे-समझे ।
  • नकारने = नहीं मानना ।

पृष्ठ सं० – 50

  • मुक्ति = आज़ादी ।
  • सुदूर = बहुत दूर ।
  • छोर = सिरे ।
  • तान = धुन ।
  • धरातल = धरती का तल, सतह ।
  • अन्यतम = जिसके समान अन्य न हो ।
  • गहन = घना।
  • अज्ञान = नहीं जानना ।
  • ज्ञान = जानना।

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पृष्ठ सं० =51

  • सघन = बहुत घना ।
  • बोध = ज्ञान ।
  • कोहरा = धुंध ।
  • आन्तरिक = अंदर का ।
  • आलोक = प्रकाश।
  • निरर्थक = जिसका कोई अर्थ न हो ।
  • एकाकार = एक में सिमटना ।
  • दीप्तिमान = उज्ज्चल ।
  • वर्णनातीत = वर्णन से परे, अलग।
  • परम सत्य = सबसे बड़ा सत्य
  • अमर = नहीं मरनेवाला ।
  • रीति = विधि, तरीका ।
  • अनन्त = जिसका अंत न हो ।
  • नितांत = बिलकुल ।
  • निजी = अपना ।
  • मुख = चेहरा, मुँह ।
  • स्मरण = याद ।
  • कृपापात्र = कृपा पाने का अधिकारी ।

पृष्ठ सं० – 52

  • परे = अलग ।
  • अभिव्यक्ति = अपने विचारों को प्रकट करना ।
  • आत्म-प्रकटीकरण = अपने भावों को प्रकट करना।
  • संज्ञाहीन = जिसका कोई नाम न हो ।
  • पालनहार = पालन करनेवाला ।
  • समाविष्ट = समाये हुए ।
  • कटु = कड़वा ।

पृष्ठ सं० – 53

  • अन्यथा = वरना ।
  • अस्तित्व = होना ।
  • आडम्बर = दिखावा ।
  • भम = जो वस्तु जो नहीं है उसे वही मना लेना, जैसे – रस्सी को साँप या साँप को रस्सी मान लेना ।
  • पुननिर्माण = फिर से निर्माण ।
  • अहम् = अहंकार।
  • लोप = गायब।
  • अर्पण = अर्पित करना, न्योछावर करना, बलिदान करना

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पृष्ठ सं० – 54

  • बिम्ब = चित्र ।
  • एकाकार = मिलकर एक हो जाना ।
  • बन्धुवत् = मित्र की तरह ।
  • स्कुलिंग = चिनगारी।
  • इंगित = ईशारा ।
  • अवहेलना = उपेक्षा ।
  • अन्धविश्वास = अंधे की तरह विश्वास करना ।
  • वंचित = जिसे प्राप्त न हुआ हो ।
  • स्वप्नद्रष्टा = सपने देखने वाला ।
  • भविष्यवक्ता = भविष्य के बारे में बोलने वाला ।
  • निरंतर = लगातार ।
  • संतरी = रक्षक ।

पृष्ठ सं० – 55

  • आत्मसंयम = अपने पर संयम रखना ।
  • आशय = भाव ।
  • सृजन = सृष्टि ।

पृष्ठ सं० – 56

  • निष्क्रिय = क्रियाहीन ।
  • अनुसरण = पीछे चलना ।
  • शिवम् = कल्याण ।
  • पूर्ण संयोग = पूरी तरह मिलना ।
  • कर्मच्युत = कर्म से भागना ।
  • समक्ष = सामने ।
  • विस्तृत = फैला हुआ ।
  • शिखर = चोटी ।
  • आकृष्छ = आकार्षि ।

पृष्ठ सं० – 57

  • चिरयौवन = हमेशा युवा ।
  • तरुणाई = युवावस्था ।
  • कालखण्ड = समय का टुकड़ा ।
  • अभिपाय = मतलब ।
  • तरुण = जवान ।
  • सचेत = सावधान ।

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पृष्ठ सं० – 58

  • स्वर्ण = सोना ।
  • संकोच = लज्जा ।
  • सर्जक = सृष्टि करने वाला, सृजन करनेवाला ।
  • परे = अलग।
  • संयोग = मिलना।
  • वियोग = बिद्धुरना ।
  • अपरिहार्य = जरूरी, आवश्यक ।
  • परिवेश = वातावरण ।

पृष्ठ सं० =59

  • विकासवाद = वह विचारधारा जो यह विश्वास करती है कि मनुष्य क्रमश: विकास करता हुआ इस अवस्था तक पहुँचा है ।
  • फ्रायड = एक मनोविज्ञानी ।
  • अचेतन = जहाँ चेतना न हो ।
  • प्रतिवर्ती = एक-दूसरे से जुड़ी ।
  • योगदान = सहायता ।
  • रहित = बिना ।
  • अपशकुन = बुरा, अमंगल का सूचक ।
  • बाधित = बाधा पहुँचाना ।
  • तानाशाह = मनमानी करने वाला ।
  • उन्नायक = विकास कराने वाला ।
  • हनन = दबाना ।
  • अमूल्य = जिसका मूल्य न हो सके।
  • अर्जित = इकट्ठा।
  • धरोहर = याती, पूर्वजों द्वारा दी गई संपत्ति ।

पृष्ठ सं० -60

  • अम्बार = ढ़ेर ।
  • अशक्तता = कमज़ोरी ।

पृष्ठ सं० – 61

  • खिताब = सम्मान ।
  • विसंगत = विशेष संगत ।
  • हीनता = बुरीस्थिति ।
  • मानवोचित = मानव के लिए उचित ।
  • घातक = घात करनेवाला, चोट पहुँचानेवाला ।
  • दायित्व = जिम्मेवारी ।
  • आकृष्ट = आकर्षित।

पृष्ठ सं० – 62

  • विचलित = व्याकुल, चिंतित ।
  • बर्बरता = जंगलीपन ।
  • उबार = निकाल ।
  • विध्वंसक = विध्वंश करने वाला ।
  • विलगाव = अलगाव ।
  • गरिमा = सम्मान ।

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पृष्ठ सं० – 63

  • पुनरूत्थान = फिर से उत्थान ।
  • पथप्रदर्शक = रास्ता दिखानेवाला ।
  • प्रवक्ता = उपदेशक ।
  • वसीयत = अंतिम इच्छा।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 9 लाला लाजपत राय

Students should regularly practice West Bengal Board Class 9 Hindi Book Solutions सहायक पाठ Chapter 9 लाला लाजपत राय to reinforce their learning.

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 9 Question Answer – लाला लाजपत राय

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न – 1 : “लाला लाजपत राय जैसे व्यक्ति तब तक नहीं मर सकते जब तक भारतीय आकाश में सूर्य चमक रहा है” – संकलित पाठ के आधार पर लिखें ।
प्रश्न – 2 : लाला लाजपत राय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालें ।
प्रश्न – 3 : लाला लाजपत राय को उनकी किन विशेषताओं के आधार पर ‘पंजाब केसरी’ नाम से जाना जाता है – लिखें ।
प्रश्न – 4 : संकलित पाठ के आधार पर लाला लाजपत राय का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत करें ।
उत्तर :
पंजाब की उर्वर भूमि, जुझारु एवं कर्मठ व्यक्तित्व को जन्म देती रही है । इसी प्रांत के लुधियाना जिले के घुड़ी गाँव में 28 जनवरी, 1865 को एक बालक का जन्म हुआ जो आगे चलकर पंजाब केसरी लाला लाजपत राय्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इनके पिता श्री राधाशरण अग्रवाल शिक्षक थे तथा माँ गुलाब देवी भी विदुषी महिला थी । लाहौर से कानून की पढ़ाई पूरी कर ये हिसार की जिला अदालत में वकालत का काम करने लगे ।

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 9 लाला लाजपत राय

आगे चलकर ये आर्य समाजी बनकर शिक्षा, धर्म, मानव-सेवा और साहित्य सभी क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी तथा वकालत छोड़कर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने ‘भारत सुधा’ तथा ‘पंजाबी’ पत्र के माध्यम से भी लोगों को जगाने का प्रयास किया । उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व एवं स्वाधीनता-संग्राम में उनकी सक्रियता देखकर अंग्रेजी सरकार सतर्क हुई तथा इन्हें भारत से निर्वासित कर माण्डले जेल भेज दिया गया । उनपर विद्रोह भड़काने तथा अंग्रेजी राज मिटाने का आरोप भी लगाया गया। उनके निर्बासन की खबर पूरे देश में फैल गई तथा चारों ओर से अंग्रेजी सरकार पर दबाब बढ़ने लगा । परिणाम यह हुआ कि 11 नवंबर, 1907 को 6 महीने के भीतर ही उन्हें मुक्त कर लाहौर पहुँचाया गया । इसी एक घटना से उनकी लोकप्रियता का अदांजा लगाया जा सकता है।

लाला लाजपत राय महान मानवतावादी थे । वे दलितों, पीड़ितों, अनाथों, विधवाओं, असहायों के सच्चे सेवक थे। अछूतों की दुर्दशा के प्रति कट्टर हिन्दूवादियों का ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से 1912-13 में उन्होंने काशी, प्रयाग, बरेली तथा मुरादाबाद की यात्रा की तथा अपने ओजस्वी भाषणों द्वारा हिन्दुओं से इस कलंक को मिटाने की भी अपील की थी । सन् 1913 ई० में गुरुकुल कांगड़ी में उनकी अध्यक्षता में एक अछूत सम्मेलन भी हुआ था । उन्होंने अकाल, महामारी एवं भूकम्प पीड़ितों की भी तन-मन-धन से सेवा की । उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा, देश-भाषा तथा देश की सभ्यता पर विशेष जोर दिया ।

भारत में शासन-सुधार कैसा हो ? इसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए बिटिश सरकार ने साइमन कमीशन को भारत भेजा । इसके सभी सदस्यों के अंग्रेज होने के कारण भारतीय ने इसका उटकर विरोध किया। 30 अक्टूबर, 1928 को इसके लाहौर पहुँचने पर, लाला लाजपत राय ने विरोध करनेवाले जुलूस का नेतृत्व किया।

पंजाब केसरी के ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारे से आकाश गूंज उठा । क्रूर अंग्रेज सैनिक एवं निष्ठुर पुलिस प्रमुख साण्डर्स ने देशभक्तों की आवाज को दबाने का पूरा प्रयास किया और भारत माँ के इस वीर सपूत को लाठियों से लहूलुहान कर दिया। “मेरे शरीर पर पड़ी हर एक लाठी की चोट बिटिश सरकार के कफ़न में कील साबित होगी” का सिंहनाद करता हुआ भारतमाता का यह सपूत 17 नवंबर, 1928 को भारत माँ की गोद में सदा-सदा के लिए सो गया ।

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इस देशभक्त के बारे में राष्ट्रपिता गाँधी ने जो कहा था वे शत-प्रतिशत सही थे –
“‘उन्हें पंजाब केसरी की उपाधि यों ही नहीं मिली थी । जब तक भारतीय क्षितिज में सूर्य चमकता रहेगा, तबतक देशवासी उन्हें विस्मृत नहीं कर सकते ।”

WBBSE Class 9 Hindi लाला लाजपत राय Summary

WBBSE Class 9 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 9 लाला लाजपत राय 1

शब्दार्थ

पृष्ठ सं० – 42

  • केसरी = सिंह ।
  • निर्वासन = निकाल देना, देशानकाला ।
  • ख्याति = प्रसिद्धि ।
  • अर्जित = पाना ।
  • पीड़ित = दु:खी ।
  • कटृरता = कठोरता ।
  • दासता = गुलामी ।
  • अस्त्र = हथियार ।
  • कृतज्ज = किए गए उपकार को माननेवाला ।

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पृष्ठ सं० – 43

  • पारित = पास, स्वीकृत ।
  • अतिनाटकीयता = बहुत ज्यादा अभिनय (over acting) ।
  • अतिसंवेदन नीीलता = बहुत
  • अधिक भावुक होना ।
  • शतकों = सैकड़ों वर्षों ।
  • पैगम्बर = देवदूत ।
  • स्वप्नद्रष्ट = स्वप्न देखनेवाला ।
  • दूरदर्शी = दूर तक
  • देखने वाले, भविष्यद्रष्टा ।
  • संगीन = तलवार ।
  • यातना = दु:ख ।

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पृष्ठ सं० – 44

  • धैर्य = साहस ।
  • भरसक = शक्ति- भर ।
  • प्रमाणों = सबूतों ।
  • सबक = शिक्षा ।
  • जोखिम = खतरा ।
  • शहादत = बलिदान।