WBBSE Class 10 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

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WBBSE Class 10 Hindi रचना सामाजिक-सांस्कृतिक निबंध

मँहगाई बहुत बड़ी समस्या

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • महँगाई के कारण
  • महँगाई के कारण आने वाली समस्या
  • महँगाई को दूर करने का उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- भारत की आर्थिक समस्याओं के अन्तर्गत महँगाई सबसे प्रमुख समस्या है। वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि इतनी तेजी से हो रही है कि आज जब किसी वस्तु को पुन: खरीदने जाते हैं तो उस वस्तु का मूल्य पहले से अधिक बढ़ा हुआ होता है ।

महँगाई के कारण :- वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि, अर्थात् महँगाई के अनेक कारण हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :-
(क) जनसंख्या में तेजी से वृद्धि :- भारत में जनसंख्या के विस्फोट ने वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाने की दृष्टि से बहुत अधिक सहयोग दिया है। जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, उतनी तेजी से वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो रहा है, जिससे अधिकांश वस्तुओं के मूल्यों में निरतंतर वृद्धि हो रही है ।
(ख) कृषि उत्पादन-व्यय में वृद्धि :- भारत कृषि-प्रधान देश है । यहाँ की अधिकाश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है । गत अनेक वर्षों से खेती में काम आने वाले उपकरणों, उर्वरकों आदि के मूल्यों में वृद्धि हुई है, फलतः उत्पादित वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश वस्तुओं का मूल्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि-पदार्थों के मूल्यों से संबंधित है। इसी कारण जब कृषि-मूल्यों में वृद्धि होती है तो देश में प्राय: सभी वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं।
(ग) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी :- वस्तुओं का मूल्य माँग और पूर्ति पर आधारित है। बाजार में वस्तुओं की कमी होते ही उनके मूल्य में वृद्धि हो जाती है । अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से भी व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा करके महँगाई बढ़ा देते हैं।

महँगाई के कारण होने वाली समस्याएँ :- महँगाई नागरिकों के लिए अभिशापस्वरूप है । भारत एक गरीब देश है । यहाँ की अधिकांश जनसंख्या के आय के साधन सीमित हैं । इस कारण साधारण नागरिक और कमजोर वर्ग के व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते । बेरोजगारी इस कठिनाई को और भी अधिक जटिल बना देती है ।

महँगाई को दूर करने के उपाय :- यदि महँगाई इसी दर से बढ़ती रही तो देश के आर्थिक विकास में बहुत बड़ी बाधा उपस्थित हो जाएगी। इससे अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयाँ जन्म लेंगी। अतः महँगाई की इस समस्या को अमूल नष्ट करना अति आवश्यक है ।

महँगाई को दूर करने के लिए सरकार को समयबद्ध कार्यक्रम बनाना होगा । किसानों को सस्ते मूल्य पर खाद, बीज और उपकरण उपलब्ध कराने होंगे, ताकि कृषि-उत्पादन का मूल्य कम हो सके । मुद्रा-प्रसार को रोकने के लिए घाटे की व्यवस्था समाप्त करनी होगी तथा घाटे को पूरा करने के लिए नए नोट छापने की प्रणाली बंद करना होगा । जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए निरंतर प्रयास करने होंगे, ताकि वस्तुओं का उचित बँटवारा हो सके ।

उपसंहार :- महँगाई के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। घाटे की अर्थव्यवस्था ने इस समस्या को और अधिक बढ़ा दिया है । यद्यपि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किए जाने वाले प्रयासों द्वारा महँगाई की इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है, तथापि इस दिशा में अभी तक पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी है। यदि समय रहते महँगाई की इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और हमारी प्रगति के सारे रास्ते बंद हो जाएँगे, भुष्टाचार अपनी जड़ें जमा लेगा और नैतिक मूल्य पूर्णतया समाप्त हो जाएँगे।

WBBSE Class 10 Hindi रचना आत्मकथात्मक निबंध

बेरोजगारी

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • बेरोजगारी-एक प्रमुख समस्या
  • बेरोजगारी-एक अभिशाप
  • बेरोजगारी के कारण
  • बेरोजगारी दूर करने के उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय से डिग्री लेकर रोजगार की तलाश में भटकते हुए नवयुवक के चेहरे पर निराशा और चिंता के भाव आजकल देखना सामान्य-सी बात हो गयी है। कभी-कभी रोजगार की तलाश में भटकता हुआ युवक अपनी डिग्रियाँ फाड़ने अथवा जलाने के लिए विवश दिखाई देता है। वह रात को देर तक बैठकर अखबारों के विज्ञापनों को पढ़ता है, आवेदन-पत्र लिखता है। साक्षात्कार देता है और नौकरी न मिलने पर पुनः रोजगार की तलाश में भटकता रहता है। युवक अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी खोजते रहते हैं। घर के लोग उसे निकम्मा समझते हैं, समाज के लोग आवारा कहते हैं, जबकि स्वयं बेचारा निराशा की नींद सोता है और आँसुओं के खारेपन को पीकर समाज को अपनी मौन-व्यथा सुनाता है ।

बेरोजगारी का अर्थ :-बेरोजगारी का अभिप्राय उस स्थिति से है जब कोई योग्य तथा काम करने के लिए इच्छुक व्यक्ति प्रचलित मजदूरी की दरों पर कार्य करने के लिए तैयार हो और उसे काम न मिलता हो। बालक, वृद्ध, रोगी, अक्षम एवं अपग व्यक्तियों को बेरोजगार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता । जो व्यक्ति काम करने के इच्छुक नहीं हैं और परजीवी हैं, वे भी बेरोजगारों की श्रेणी में नहीं आते ।

एक प्रमुख समस्या :- भारत की आर्थिक समस्याओं के अंतर्गत बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या है । वस्तुत: यह एक ऐसी बुराई है, जिसके कारण केवल उत्पादक मानव-शक्ति ही नष्ट नहीं होती वरन देश का भावी आर्थिक विकास ही अवरुद्ध हो जाता है । जो श्रमिक अपने कार्य द्वारा देश के आर्थिक विकास में सक्रिय सहयोग दे सकते थे, वे कार्य के अभाव में बेरोजगार रह जाते हैं। यह स्थिति हमारे विकास में बाधक है ।

एक अभिशाप :- बेरोजगारी किसी भी देश या समाज के लिए अभिशाप है। इससे एक ओर निर्धनता, भुखमरी तथा मानसिक अशांति फैलती है तो, दूसरी ओर युवकों में आक्कोश तथा अनुशासनहीनता बढ़ती है। चोरी, डकैती, हिंसा, अपराध-वृत्ति एवं आत्महत्या आदि समस्याओं के मूल में एक बड़ी सीमा तक बेरोजगारी ही विद्यमान है । बेरोजगारी एक ऐसा भयंकर विष है जो संपूर्ण देश के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को दूषित कर देता है। अतः उसके कारणों को खोजकर उनका निराकरण अत्यधिक आवश्यक है।

बेरोजगारी के कारण :- भारत में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं जिनमें प्रमुख निम्न हैं :-

(क) जनसंख्या में वृद्धि :-बेरोजगारी का प्रमुख कारण है जनसंख्या में तीव्र वृद्धि । विगत कुछ दशकों में भारत में जनसंख्या का विस्फोट हुआ है।
(ख) दोषपूर्ण शिक्षा-प्रणाली :-भारतीय शिक्षा सैद्धांतिक अधिक है, लेकिन व्यावहारिकता में शून्य है । इसमें पुस्तकीय ज्ञान पर ही विशेष ध्यान दिया जाता है ।
(ग) कुटीर उद्योगों की उपेक्षा :-अंग्रेजी सरकार की कुटीर उद्योग विरोधी नीति के कारण देश में कुटीर उद्योगधंधों का पतन हो गया, जिससे अनेक कारीगर बेकार हो गए ।
(घ) औद्योगीकरण की मंद प्रक्रिया :-विगत पंचवर्षीय योजनाओं में देश में औद्योगिक विकासके लिए प्रशंसनीय कदम उठाए गए हैं, किंतु समुचित रूप से देश को औद्योगीकरण नहीं किया जा सका है ।
(ङ) कृषि का पिछड़ापन :- भारत की लगभग 72 % जनता कृषि पर निर्भर है । कृषि के क्षेत्र में अत्यंत पिछड़ी हुई दशा के कारण कृषि बेरोजगारी व्यापक हो गई है।

बेरोजगारी दूर करने के उपाय :-बेरोजगारी दूर करने में निम्नलिखित उपाय सहायक सिद्ध हो सकते हैं –
(क) जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण :-जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि ही बेरोजगारी का मूल कारण है । अत: इस पर निय्यंत्रण बहुत आवश्यक है। जनता को परिवार-नियोजन का महतव समझाते हुए उसमें छोटे परिवार के प्रति चेतना जाग्रत करनी चाहिए।
(ख) शिक्षा-प्रणाली में व्यापक परिवर्तन :-शिक्षा को व्यवसाय-प्रधान बनाकर शारीरिक श्रम को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
(ग) कुटीर उद्योगों का विकास :-सरकार द्वारा कुटीर उद्योगों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
(घ) औद्योगीकरण :- देश में व्यापक स्तर पर औद्योगीकरण किया जाना चाहिए । इसके लिए विशाल उद्योगों की अपेक्षा लघुस्तरीय उद्योगों का अधिक विकास करना चाहिए।
(ङ) सहकारी खेती :- कृषि के क्षेत्र में अधिकाधिक व्यक्तियों को रोजगार देने के लिए सहकारी खेती को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
(च) राष्ट-निर्माण संबंधी विविध कार्य :- देश में बेरोजगारी को दूर करने के लिए राष्ट्र-निर्माण संबंधी विविध कार्यों का विस्तार किया जाना चाहिए, जैसे – सड़कों का निर्माण, रेल-परिवहन का विकास, पुल-निर्माण, बाँध-निर्माण तथा वृक्षारोपण आदि ।

उपसंहार :- भारत सरकार बेरोजगारी के प्रति जागरुक है तथा इस दिशा में महत्त्पपूर्ण कदम भी उठा रही है । परिवार-विनियोजन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, कच्चा माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की सुविधा, कृषि-भूमि की हदबन्दी, नए-नए उद्योगों की स्थापना, अप्रंटिस (शिक्षु) योजना, प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना, आदि अनेकानेक कार्य ऐसे हैं जो बेरोजगारी को दूर करने में एक सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं।

WBBSE Class 10 Hindi रचना आत्मकथात्मक निबंध

सांप्रदायिकता : कारण व समाधान

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • सम्पदायिकता का कारण
  • सांपदायिक संघर्ष के कारण
  • भारत में संप्यदायिकता
  • साप्पदायिक घटनाएँ
  • सांपदायिकता के दुष्षरिणाम
  • सांप्रदायिकता का समाधान
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- भारत एक अरब से भी अधिक आबादी वाला विशाल देश है। यह स्वयं में एक संसार है। इसमें अनेक भाषाओं, अनेक जातियों और अनेक धर्मों के लोग रहते हैं। उनके खान-पान, वेश-भूषा और रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं। यह एक मात्र ऐसा देश है, जहाँ सबसे अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं। यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, किंतु साथ ही मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी आदि सभी यहाँ के समान स्तर के समान अधिकार के नागरिक हैं । सभी धर्मावलंबी यहाँ अपने तौर-तरीके, रीति-रिवाज और परंपराओं का पालन करते हैं। इतनी सब भिन्नताओं के होते हुए भी उनमें एक मूलभूत एकता है और वह यह है कि ये हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई बाद में हैं, पहले भारतीय हैं। कोई भी सम्र्रदाय अथवा धर्म मानव-मानव को लड़ाई की बात नहीं कहता।

उर्दू के प्रसिद्ध शायर इकबाल ने कहा था-

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ।
हिंदी हैं, हमवतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा ।।

सांप्रदायिकता का कारण :- जब कोई सम्रदाय अथवा धर्म स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और अन्य संप्रदायों को निम्न मानने लगता है, तब उसके मन में अपने सम्रदाय के प्रति एक अहंकार की बू आने लगती है। इसी कारण वह दूसरे सम्र्रदाय के प्रति घृणा, विद्वेष और हिंसा का भाव रखने लगता है ।

सांप्रदायिक संघर्ष के कारण :- भारत में संप्रदायिकता की समस्या प्रारंभ से ही धार्मिक की अपेक्षा मुख्यतः: राजनीतिक रही है । कुछ स्वार्थी राजनेता अपने अथवा अपने दल के लाभ हेतु भड़काऊ भाषण देकर आग में घी डाल देते हैं । परिणामस्वरूप संप्रदाय के अंधे लोग अन्य धर्माधों से भिड़ जाते हैं और सारा जनजीवन दूषित कर देते हैं।

भारत में सांप्रदायिकता :- भारत में सांप्रदायिकता का प्रारंभ मुसलमानों के आगमन से हुआ। शासन और शक्ति पाकर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने धर्म को आधार बनाकर हिंदू जन-जीवन को रौंद डाला। हिंदुओं के धार्मिक तीर्थो को तोड़ा, देवी-देवताओं को अपमानित किया, बहू-बेटियों को अपवित्र किया, जान-माल का हरण किया । परिणामस्वरूप, हिंदू जाति के मन में उन पाप-कर्मों के प्रति गहरी घृणा भर गई, जो आज तक भी जीवित है । छोटी-छोटी घटना पर हिंदूमुस्लिम संघर्ष का भड़क उठना उसी घृणा का सूचक है ।

सांप्रदायिक घटनाएँ :- संप्रदायिकता को भड़काने में अंग्रेज शासकों का गहरा घडयंत्र था। आजादी से पूर्व अनेक खूनी-संघर्ष हुए । आजादी के बाद तो विभाजन का जो संघर्ष हुआ, भीषण नर-संहार हुआ । उसे देखकर समूची मानवता बिलख-बिलखकर रो पड़ी थी।

सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम :- सांप्रदायिकता का उन्माद देश में कभी-कभी ऐसी कटुता पैदा कर देती है कि आये दिन हिंदू-मुस्लिम दंगे होते हैं । इसके द्वारा तोड़-फोड़, आगजनी और नर-संहार का ऐसा तांडव होता है कि मानवता का सिर शर्म से झुक जाता है।

सांप्रदायिकता का समाधान :- भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है । हमारे अपने देश में सां्रदायिकता की समस्या का समाधान कठिन अवश्य है, किंतु असंभव नहीं । संपदायिकता का अन्धापन अज्ञान तथा अविवेक से पैदा होता है। इसलिए शिक्षा का प्रसार सर्वोत्तम उपाय है।

देश में कानून का शासन स्थापित किया जाय, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति चाहे हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, समान कानून का पालन करे । कानून का उल्लंघन करने पर द््ड भी समान रूप में दिया जाए । साम्र्रदायिकता फैलाने वाले को दंडित किया जाए । जनसंचार के माध्यमों द्वारा सांपदायिकता विरोधी कार्यक्रम प्रसारित किए जाएं ।

उपसंहार :- प्रत्येक मानव का यह अधिकार है कि वह अपनी इच्छानुसार धर्म का पालन करे। किसी मानव को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने धार्मिक अन्धविश्वास के कारण दूसरों की उन्नति के मार्ग की बाधा बन जाए। यदि कोई सांप्रदायिकता की संकुचित भावना से प्रेरित होकर अपने धर्म का विकास तथा दूसरे धर्म का उपहास करता है तो इससे निश्चय ही राष्ट्र, विश्व तथा संपूर्ण मानवता को क्षति पहुँचेगी । अतः सांपदायिकता के अभिशाप को समाप्त किए बिना मानवता की सुरक्षा संभव नहीं है।

WBBSE Class 10 Hindi रचना आत्मकथात्मक निबंध

राष्ट्रीय एकता

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारत में अनेकता के विविध रूप
  • राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता
  • राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ
  • जातिवाद
  • राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के उपाय-सर्वधर्म समभाव
  • समष्टि-हित की भावना
  • एकता का विश्वास, शिक्षा का प्रसार
  • राजनैतिक वातावरण की स्वच्छता
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- भारत अनेक धर्मों, जातियों और भाषाओं का देश है । धर्म, जाति एवं भाषाओं की दृष्टि से विविधता होते हुए भी भारत में प्राचीनकाल से ही एकता की भावना विद्यमान रही है। जब कभी किसी ने उस एकता को खंडित करने का प्रयास किया है, भारत का एक-एक नागरिक सजग हो उठा है । राष्ट्रीय एकता को खंडित करने वाली शक्तियों के विरुद्ध आंदोलन आरंभ हो जाता है । राष्ट्रीय एकता हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है और जिस व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय गौरव का अभिमान नहीं है, वह नर नहीं, नर-पशु है –

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है ।
वह नर नहीं नर-पशु निरा है और मृतक समान है ।
-मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय :- राष्ट्रीय एकता का अभिपाय है-संपूर्ण भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक एकता । हमारे कर्मकांड, पूजा-पाठ, खान-पान, रहन-सहन और वेश-भूषा में अंतर हो सकता है । इनमें अनेकता भी हो सकती है, किंतु हमारे राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण में एकता है। इस प्रकार अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है ।

भारत में अनेकता के विविध रूप :- भारत जैसे विशाल देश में अनेकता का होना स्वाभाविक ही है । धर्म के क्षेत्र में हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि विविध धर्मावलंबी यहाँ निवास करते हैं । इतनी विविधताओं के होते हुए भी भारत अत्यंत प्राचीनकाल से एकता के सूत्र में बँधा रहा है ।

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता :- राष्ट्र की आंतरिक शक्ति तथा सुव्यवस्था और बाह्य सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता होती है। भारतवासियों में यदि जरा-सी भी फूट पड़ेगी तो अन्य देश हमारी स्वतंज्रता को हड़पने के लिए तैयार बैठे हैं ।

राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधाएँ :- राष्ट्रीय एकता की भावना का अर्थ मात्र यह नहीं है कि हम एक राष्ट्र से संबद्ध हैं । राष्ट्रीय एकता के लिए एक-दूसरे के प्रति भाईचारे की भावना आवश्यक है । आजादी के समय हमने सोचा था कि पारस्परिक भेदभाव समाप्त हो जाएगा किंतु संप्रदायिकता, क्षेत्रीयता, जातीयता, अज्ञानता और भाषागत अनेकता ने अब तक पूरे देश को आक्रांत कर रखा है ।

राष्ट्रीय एकता को छिन्न-भिन्न कर देने वाले कारण निम्न हैं :-

(i) सांप्रदायिकता :- राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा सांपदायिकता की भावना है। संप्रदायिकता एक ऐसी बुराई है जो मानव-मानव में फूट डालती है, समाज को विभाजित करती है। जहाँ भी द्वेष, घृणा और विरोध है, वहाँ धर्म नहीं है । राष्ट्रवादी शायर इकबाल ने कहा है –

“मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ।
हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा ।।”

संप्रदायिक कटुता को दूर करने के लिए हमें परस्पर सभी धर्मों का आदर करना चाहिए।

(ii) भाषागत विवाद :- भारत बहुभाषी राष्ट्र है । विभिन्न प्रांतों की अलग-अलग बोलियाँ और भाषाएँ हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा को श्रेष्ठ और उसके साहित्य को महान मानता है ।
मातृभाषा को सीखने के बाद संविधान में स्वीकृत 18 भाषाओं में से किसी भी भाषा को सीख लें तथा राष्ट्रीय एकता के निर्माण में सहयोग प्रदान करें ।

(iii) प्रांतीयता अथवा प्रादेशिकता की भावना :- प्रांतीयता अथवा प्रादेशिकता की भावना भी राष्ट्रीय एकता के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है । कभी-कभी किसी अंचल विशेष के निवासी अपने लिए पृथक् अस्तित्व की माँग रखते हैं।

(iv) जातिवाद :- भारत में जातिवाद सदैव प्रभावी रहा है । कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था टूटी है और जातिप्रथा कहर रूप से उभरी है । जातिवाद ने भारतीय एकता को बुरी तरह प्रभावित किया है ।

राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के उपाय :- वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं :-

  1. सर्वधर्म समभाव :- सभी धर्मो की आदर्श एवं श्रेष्ठ बातें समान दिखाई देती हैं । सभी धर्मों का समान रूप से आदर होनी चाहिए ।
  2. समष्टि-हित की भावना :- हम अपनी स्वार्थ भावना को भूलकर समष्टि-हित का भाव विकसित कर लें ।
  3. एकता का विश्वास :- भारत की अनेकता में ही एकता का निवास है। सभी नागरिकों को प्रेम और सद्भाव द्वारा एक-दूसरे में अपने प्रति विश्वास पैदा करनी चाहिए ।
  4. राजनीतिक वातावरण की स्वच्छता :- स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजों ने तथा स्वतंत्रता के बाद राजनेताओं ने जातीय विद्वेष तथा हिंसा भड़काये हैं। किसी संप्रदाय विशेष का मसीहा बनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इन स्वार्थी राजनेताओं का बहिष्कार करना चाहिए ।

उपसंहार :- आज विकास के साधन बढ़ रहे हैं, भौगोलिक दूरियाँ कम हो रही हैं, किंतु आदमी और आदमी के बीच दूरी बढ़ती ही जा रही है । हम सभी को मिलकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने पर भारत एक सबल राष्ट्र बन सकेगा ।

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इक्कीसवीं सदी का भारत

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • परिवर्तनशील भारत
  • इक्कीसवीं सदी का भारत
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- लगभग 25-30 वर्ष पूर्व अंग्रेजी साहित्य के एक लेखक ने ‘इक्कीसवीं सदी की दुनिया’ नामक लेख लिखा था, जिसमें यह बताया गया था कि इक्कीसवीं सदी में मानव-समाज औद्योगिकता की अनेक मंजिलें तय करते हुए उस जगह तक जा पहुँचेगा, जहाँ आदमी शून्य होगा और मशीनें सर्वे त्तम । यह चाँद तक पहुँचेगा तथा आकाश पर जगमगाते सितारों की खोज करेगा किंतु मशीनों के माध्यम से । यह वह समय होगा जब मानव की समस्त वौद्धिक शक्तियाँ मशीन के कलपुर्जों को समर्पित कर दी जाएँगी । विकास के अंतिम चरण में मनुष्य स्वनिर्मित मशीनों का दास होकर रह जाएगा ।

इक्कीसवीं सदी का भारत :- कल्पना में जब भी इक्कीसवीं सदी का भारत उभरता है तो उसके दो स्पष्ट छोर दिखाई देते हैं। इनमें से एक आधुनिक और वैज्ञानिक विश्व से जुड़ा है तो, दूसरा काठ के बने गाड़ी के दो पहियों के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने को विवश है ।

भारत में पंचवर्षीय योजनाओं पर अरबों रुपया खर्च हो रहा है । इससे भारत का आधुनिकीकरण तो हो रहा है, किंतु इसका लाभ देश के अधिकांश वर्ग को नहीं मिल रहा है । इससे यह खतरा भी हो सकता है कि भारत का एक बहुत छोटा वर्ग अति-आधुनिक साधनों और सुविधाओं का भोग कर रहा होगा और एक बहुत बड़ा वर्ग अपनी जीविका के लिए ही संघर्ष कर रहा होगा ।

इक्कीसवीं सदी के भारत के रूप में कल्पना कीजिए कि देश का एक ऐसा वर्ग होगा जो केवल अपने हाथ की एक अँगुली से बटन दबाकर रात का खाना अपनी मेज पर मँगवाएगा तथा दूसरा बटन दबाकर जूठे बर्तन भी साफ कराएगा। इस सदी का व्यक्ति राकेटों पर सवार होकर चंद्रमा की यात्रा करेगा तथा घण्टों या मिनटों में ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर वापस अपने घर लौट सकेगा। किसी कार्यालय में बैठे लिपिक को पूरे दिन टाइप करने की आवश्यकता नहीं, अपितु संपूर्ण रिपोर्टिग को कंप्यूटर की मदद से कुछ ही देर में प्रिंटर द्वारा लेखा-जोखा प्रस्तुत कर देगा । दूसरी ओर भारत में एक ऐसा वर्ग भी होगा जो अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और मकान के लिए दर-दर भटक रहा होगा।

इक्कीसवीं सदी और भारत :- संपन्न देशों की नकल करके इक्कीसवीं सदी की बात करने वाले भारत की इसके क्षेत्र में तैयारी बहुत कम है । हमारे देश में 21 वीं सदी की बात के लिए हड़बड़ाहट अधिक है, तैयारी कम है।

अत्यधिक प्रयासों के बाद भी हम अपनी कृषि को पूर्णत: वैज्ञानिक आधार नहीं दे पाए हैं। अभी भी बहुत कम किसान ऐसे हैं जो कृषि के वैज्ञानिक तरीकों और साधनों का प्रयोग कर पाते हैं, किंतु दस वर्ष बाद हम अवश्य इतने समर्थ हो जायेंगे कि अपने देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए खाद्यान्नों का निर्यात भी कर सकें।

हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, कमी है तो सिर्फ उनके समुचित दोहन की। इस शताब्दी में हम इन संसाधनों का भरपूर और समुचित उपयोग कर सकने की स्थिति में होंगे ।

उपसंहार :- हमें विश्वास है कि सन् 2010 ई० तक हम विकास की उस निर्णायक स्थिति में अवश्य पहुँच जायेंगे जहाँ भारत का कोई बालक भूखा नहीं सो सकेगा, कोई ऐसा तन नहीं होगा जिस पर वस्त्र नही होगा तथा कोई ऐसा परिवार न होगा जिसके सिर पर छत न हो, अर्थात् प्रत्येक नागरिक को रोटी, कपड़ा और मकान सुलभ होगा ।

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दूरदर्शन का प्रभाव

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • दूरदर्शन का आविष्कार, उपयोग, प्रभाव
  • दूरदर्शन से लाभ तथा हानियाँ
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- दूरदर्शन अर्थात् टेलीविजन आधुनिक-युग में मनोरंजन के साथ-साथ सूचनाओं की प्राप्ति का भी महत्वपूर्ण साधन है । केवल पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक भारतीय समाज में दूरदर्शन का उपयोग महानगरों के कुछ्छ संपन्न परिवार ही कर पाते थे तथा इस पर सीमित कार्यक्रम ही प्रसारित होते थे, कितु आज स्थिति यह है कि दूरदर्शन देश के प्रत्येक शहर तथा गाँव तक पहुँच चुका है । देश की अधिकांश आबादी तक यह कोठियों से लेकर झुग्गी-झोपड़ी तक अपने पैर पसार चुका है । दूरदर्शन के उपग्रह द्वारा प्रसारण संबंधी सुविधा के कारण आजकल सैकड़ों चैनलों एवम् कार्यक्रमों की भरमार है ।

दूरदर्शन का आविष्कार :- 25 जनवरी, सन् 1926 को इंग्लैण्ड में एक इंजीनियर जान बेयर्ड ने रायल इस्स्टीद्यूट के सदस्यों के सामने टेलीविजन का सर्व्यथम प्रदर्शन किया था । उसने कठपुतली के चेहरे का चित्र रेडियो की तरंगों की सहायता से वैज्ञानिकों के सामने प्रदर्शित किया था । विज्ञान के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी।

दूरदर्शन का उपयोग :- आधुनिक समाज में दूरदर्शन का उपयोग मनोरंजन, शिक्षा, साहित्य, संगीत, सूचना आदि विभिन्न क्षेत्रों के लिए किया जा रहा है । आज यह मनोरंजन का सबसे सस्ता और सुलभ साधन है । अब लोगों को फिल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल तक नहीं जाना पड़ता है। क्रिकेट-मैच को देखने के लिए मैदान पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती । पूरे विश्व के समाचार तथा विभिन्न संस्कृतियों के आधार-व्यवहार आदि का दृश्यावलोकन भी घर बैठे हो जाता है । इसके माध्यम से विभिन्न कक्षाओं के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण भी किया जाता है, जिससे छात्रों को अध्ययन में सुविधा मिलती है । यू. जी. सी. का कंट्रीवाइड क्लास रूम टीचिंग ऐसा ही कार्यक्रम है तथा दूरदर्शन का ज्ञान-दर्शन चैनल शिक्षा प्रदान करने वाला चैनल है जो बहुत उपयोगी है ।

दूरदर्शन का प्रभाव :- दूरदर्शन आज प्रत्येक परिवार का एक आवश्यक अंग बन गया है, जिसका परिवार तथा समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है । व्यक्ति, परिवार तथा समाज पर दूरदर्शन का प्रभाव लाभकारी है या हानिकारक यह प्रश्न विचारणीय है । अतः लाभ-हानि के दृष्टिकोण से दूरदर्शन के प्रभाव का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है:

दूरदर्शन से लाभ – दूरदर्शन समाज के लिए निम्न क्षेत्रों में उपयोगी है-
दूरदर्शन आज के समय में सबसे सस्ता एवं सुलभ मनोरंजन प्रदान करता है । इसमें केवल बिजली का थोड़ा-सा खर्च लगता है । लोग घर पर बैठकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार कार्यक्रम देखते हैं।

दूरदर्शन के पर्दे पर विश्व मानव समुदाय की विभिन्न संस्कृतियों से संबंधित कार्यक्रम आते रहते हैं, जिससे हम उनकी संस्कृति से परिचित हो जाते हैं। जिन स्थानों पर जाना सम्भव नहीं होता उनकी भी जानकारी मिल जाती है।

दूरदर्शन के माध्यम से हम महत्वपूर्ण व्यावसायिक सूचनाएँ एवं शिक्षा संबंधी अनेक तथ्यों की जानकारियाँ अपने घर में ही प्राप्त कर लेते हैं। इसका लाभ हमें शैक्षणिक एवं व्यावसायिक स्तर पर प्राप्त होता है ।

दूरदर्शन के कारण बच्चों की बुद्धि का विकास भी शीघ्रता से संभव हो गया है । आज उन्हे बाघ और सिंह का अंतर बताने के लिए किसी चिड़ियाघर ले जाने की आवश्यकता नहीं है । हवाई जहाज, हेलीकॉट्टर, रॉकेट आदि को टेलीविजन के पर्दे पर देखकर ही पहचान करना सीख जाते हैं ।

दूरदर्शन से हानियाँ :- जहाँ दूरदर्शन से अनेक लाभ हैं, वहीं दूसरी ओर समाज को इससे अनेक हानियाँ भी हैं, उनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं –
(i) समय की हानि :- मनुष्य के लिए मनोरंजन आवश्यक है, मनुष्य असमय एवं अनावश्यक मनोरंजन में समय नष्ट करता है, इससे उसके कार्य करने की क्षमता में कमी आ जाती है ।

(ii) स्वास्थ्य की हानि :- दूरदर्शन से निकलने वाली प्रकाश की किरणें मनुष्य के नेत्र एवं त्वचा पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव डालती हैं, क्योंकि इस प्रकाश की किरणें साधारण प्रकाश की किरणो से भिन्न होती हैं।

(iii) चरित्र का हनन :- दूरदर्शन के कार्यक्रमों से जहाँ एक ओर ज्ञान का विकास होता है, वहीं इसके प्रभाव से समाज का चारित्रिक पतन भी हो रहा है । मनोरंजन के कार्यक्रमों में व्यावसायिकता का बोलबाला है, उनमें नैतिक आदर्शो को छोड़ दिया जाता है । अश्लीन एवं फूहड़ दृश्य, द्विअर्थी गीत-संवाद, हिंसात्मक एवं वीभत्स घटनाओं आदि का प्रसारण मानव-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है । इससे समाज में अपराध तथा अनैतिक कार्य की प्रवृत्ति बढ़ रही है ।

(iv) बच्चों के भविष्य पर कुप्रभाव :- दूरदर्शन का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों के कोमल मस्तष्क पर पड़ता है । बच्चे अल्पायु से ही बंदूक का खेल खेलने लगते हैं। कार्टून फिल्मों को देखने में अपना अमूल्य समय नष्ट करते हैं, जिसका सीधा प्रभाव उनकी पढ़ाई पर, उनके भविष्य पर पड़ता है ।

उपसंहार :- दूरदर्शन मानव जीवन का एक अति-आवश्यक अंग है . किंतु इसका संयमित और नियंत्रित उपयोग ही करना चाहिए ।

WBBSE Class 10 Hindi रचना आत्मकथात्मक निबंध

दहेज-प्रथा ए एक अभिशाप

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • दहेज-प्रथा का प्रारंभ
  • दहेज का अर्थ
  • दहेज प्रथा के विस्तार के कारण
  • दहेज-प्रथा से हानियाँ
  • समस्या का समाधान
  • उपसंहार ।

कहती है नन्हीं-सी बाला, मैं कोई अभिशाप नहीं ।’
लज्जित होना पड़े पिता को, मैं कोई ऐसा पाप नहीं ।”

“’दहेज बुरा रिवाज है, बेहद बुरा । बेहद बुरा । बस चले तो दहेज लेने वालों और देने वालों को ही गोली मार देनी चाहिए, फिर चाहे फाँसी ही क्यों न हो जाए । पूछो, आप लड़के का विवाह करते हैं कि उसे बेचते हैं।’ – मुंशी प्रेमचंद

दहेज-प्रथा वर्तमान समाज का कलंक बन गई है। भारतीय समाज का यह कलंक निरंतर विकृत रूय धारण करता जा रहा है । समय रहते इस रोग का निदान और उपचार आवश्यक है, अन्यथा समाज की नैतिक मान्यताएँ नष्ट हो जाएँगी और मानव-मूल्य समाप्त हो जायेंगे ।

दहेज-प्रथा का प्रारंभ :-महर्षि मनु ने ‘मनुस्मृति’ में अनेक विवाहों का उल्लेख किया है। बह्म-विवाह के अंतर्गन कन्या को वस्त्र और आभूषण देने की बात कही गई है । कन्या के माता-पिता अपनी सामर्थ्य और इच्छानुसार वस्त्र और अलंकार दिया करते थे, कितु उसमें बड़ी मात्रा में दिए जाने वाले दहेज का उल्लेख नहीं है ।

दहेज का अर्थ :-दहेज का तात्पर्य उन संपत्ति और वस्तुओं से है, जिन्हें विवाह के समय वधू-पक्ष की ओर से वरपक्ष को दिया जाता है । मूल रूप से इसमें स्वेच्छा की भावना निहित है, किंतु आज दहेज का अर्थ बिल्कुल अलग हो गया है, अब तो इसका अर्थ उस संपत्ति अथवा मूल्यवान वस्तुओं से है, जिन्हे विवाह की एक शर्त के रूप मे कन्या-पक्ष द्वारा वर पक्ष के प्रति विवाह से पूर्व अथवा बाद में पूरा करना पड़ता है ।

दहेज-प्रथा के विस्तार के कारण :- दहेज प्रथा के विस्तार के प्रमुख कारण निम्न हैं-

(i) धन के प्रति अधिक आकर्षण :- वर्तम ान युग भौतिकवादी युग है । समाज में धन का महत्व बढ़ता जा रहा है । धन सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक प्रतिष्ठा का आधार बन गया है। वर-पक्ष ऐसे परिवार में ही संबंध स्थापित करना चाहृता है, जो धनी हो तथा अधिक से अधिक धन दहेज के रूप में दे सके।
(ii) जीवन-साथी चुनने का सीमित क्षेत्र :- भारतीय समाज अनेक जातियों तथा उपजातियों में विभाजित है । सामान्यतः प्रत्येक माता-पिता अपनी पुत्री का विवाह अपनी ही जाति या उससे उच्च जाति के लड़के के साथ करना चाहते हैं । इसी कारण वर-पक्ष की ओर से दहेज की माँग होती है।
(iii) शिक्षा और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा :- वर्तमान युग में शिक्षा बहुत महँगी है । इसके लिए पिता को कभी-कभी अपने पुत्र की शिक्षा पर अपनी सामर्थ्य से अधिक धन खर्च करना पड़ता है। इस धन की पूर्ति वह पुत्र के विवाह के अवसर पर दहेज प्राप्त करके करना चाहता है ।

दहेज-प्रथा से हानियाँ :- दहेज-प्रथा ने हमारे समाज को पथश्रष्ट और स्वार्थी बना दिया है । समाज में फैला यह रोग इस तरह जड़ जमा चुका है कि कन्या के माता-पिता के रूप में जो लोग दहेज की बुराई करते हैं वे ही अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर मनचाहा दहेज माँगते हैं। इससे समाज में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हो गई हैं तथा अनेक नवीन समस्याएँ विकराल रूप धारण करती जा रही हैं, जैसे –

(क) बेमेल विवाह :- दहेज-प्रथा के कारण निर्धन माता-पिता अपनी पुत्री के लिए उपयुक्त वर प्राप्त नहीं कर पाते और मजबूरी में उन्हें अपनी पुत्री का विवाह अयोग्य लड़के से करना पड़ता है । दहेज देने में असमर्थ माता-पिता को अपनी कम उम्र की लड़कियों का विवाह अधिक अवस्था के पुरुषों से करना पड़ता है ।
(ख) ॠणग्रस्तता :- दहेज-प्रथा के कारण वर-पक्ष की माँग को पूरा करने के लिए कई बार कन्या के माता-पिता को ऋण भी लेना पड़ता है । फलत: वे आमृत्यु ऋण की चक्की में पिसते रहते हैं ।
(ग) कन्याओं का दु:खद वैवाहिक जीवन :- वर-पक्ष की माँग के अनुसार दहेज न देने अथवा उसमें किसी प्रकार की कमी रह जाने के कारण नव वधू को सुसराल में अपमानित होना पड़ता है।
(घ) अविवाहिताओं की संख्या में वृद्धि :- आर्थिक दृष्टि से दुर्बल परिवारों की जागरुक युवतियाँ गुणहीन तथा निम्नस्तरीय युवकों से विवाह करने की अपेक्षा अविवाहित रहना उचित समझती हैं, जिससे अनैतिक संबंधों और यौनकुंठाओं जैसी अनेक सामाजिक विकृतियों को बढ़ावा मिलता है ।

समस्या का समाधान :- दहेज-प्रथा समाज के लिए निश्चित ही एक अभिशाप है । कानून और समाज सुधार कों ने टहेज से मुक्ति के अनेक उपाय सुझाए हैं। प्रमुख उपाय निम्न है-
(क) कानून द्वारा प्रतिबंध :-अनेक लोगों का विचार था कि दहेज के लेन-देन पर कानून द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिगा जाय । इसीलिए 9 मई, 1961 ई० को भारतीय संसद ने ‘दहेज निरोधक अधिनियम’ स्वीकार कर लिया गया।
(ख) अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन :-अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देने से वर का चुनाव करने के क्षेत्र में विस्तार होगा तथा युर्वातयों के लिए योग्य वर खोजने में सुविधा होगी। इससे दहेज की माँग में कमी आएगी।
(ग) युवकों को स्वावलंबी बनाया जाए :-स्वावलम्बी होने पर युवक अपनी इच्छा से लड़की का चयन कर सकेंगे । स्वावलंबी युवकों पर माता-पिता का दबाव कम होने पर दहेज के लेन-देन में स्वत: कमी आएगी।
(घ) लड़कियों की शिक्षा :- जब युवतियाँ भी शिक्षित होकर स्वावलंबी बनेंगी तो वे स्वयं नौकरी करके अपना जीवन-निर्वाह करने में समर्थ हो सकेंगी । विवाह एक विवशता के रूप में भी न होगा, जिसका वर-पक्ष प्राय: अनुचित लाभ उठाता है ।
(ङ) जीवन साथी चुनने का अधिकार :- प्रबुद्ध युवक-युवतियों को अपना जीवन-साथी चुनने के लिए अधिक छुट मिलनी चाहिए ।

उपसंहार :- दहेज-प्रथा एक सामाजिक बुराई है, एक कलंक है, हमारे समाज का कोढ़ है । इसके विरुद्ध स्वस्थ जनमत का निर्माण होना चाहिए । जब तक समाज में चेतना नहीं आएगी, दहेज के दैत्य से मुक्ति पाना असंभव है । गाजनेताओं, समाज-सुधारकों तथा शिक्षित युवक-युवतियों आदि सभी के सहयोग से दहेज-प्रथा का अंत हो सकताहै।

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भारतीय समाज में नारी का स्थान
अथवा,
भारतीय नारी : दशा और दिशा

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारतीय नारी का अतीत
  • मध्यकाल में भारतीय नारी
  • आधुनिक युग में नारी
  • पाश्चात्य प्रभाव
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- मानव-जीवन का रथ सिर्फ एक पहिए से नहीं चल सकता । उसकी समुचित गति के लिए दोनों पहिए होने चाहिए । गृहस्थी की गाड़ी नर और नारी के सहयोग व सद्भावना से प्रगति के पथ पर अविराम गति से बढ़ सकती है । स्त्री केवल पत्नी ही नहीं, अपितु योग्य मित्र, परामर्शदात्री, सचिव, सहायिका, माता के समान उस पर सर्वस्व न्यौछावर करने वाली तथा सेविका की तरह सच्ची सेवा करने वाली है । गृहस्थी का कोई भी कार्य उसकी सम्मति के बिना नहीं हो सकता । कितु भारतीय समाज में नारी की स्थिति सदैव एक समान न रहकर बड़े उतार-चढ़ावों से गुजरी है ।

भारतीय नारी का अतीत :- प्राचीनकाल में स्त्रियों को आदर और सम्मान से देखा जाता था। लोगों की मान्यता थी कि जिस घर में स्त्रियों का सम्मान होता है; वह घर सुखी तथा स्वर्ग बन जाता है । कहा गया है – ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता ।’ भारत का इतिहास पृष्ठ नारी की गौरव-गरिमा से मंडित है।

वेद तथा उपनिषद् काल में नारी को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त थी । उन्हें समाज में सामाजिक अधिकार प्राप्त थे । याज्ञवल्क्य और गार्गी का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है । मैत्रेयी विख्यात बह्यवादिनी थीं। मंडन मिश्र की धर्मपत्नी भारत में अपने काल की विख़्यात विदुषी महिला थीं। स्त्रियाँ अपने पति के साथ युद्ध-क्षेत्र में भी जाती थीं ।

मध्यकाल में भारतीय नारी :- मध्यकाल में स्त्रियों की स्थिति बदतर हो गयी थी । स्त्रियों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा । मुसलमानों के आक्रमण से हिंदू समाज का ढाँचा चरमरा गया । मुसलमानों के लिए नारी भोग-विलास तथा वासना-पूर्ति मात्र की वस्तु थी । इसी कारण नारी का कार्य-क्षेत्र घर की चहारदीरी के भीतर सिमट कर रह गया, जिससे समाज में अशिक्षा, बाल-विवाह प्रथा, सती-प्रथा, परदा-प्रथा का प्रचलन बढ़ा।

आधुनिक युग में नारी :- धीरे-धीरे विचारकों तथा नेताओं ने नारी की स्थिति पर ध्यान दिया। राजा राममोहन राय ने ‘सती-प्रथा’ का अंत कराया। महर्षि दयानंद ने महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने की आवाज उठाई । गाँधीजी ने जीवन भर महिला उत्थान का कार्य किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नारी वर्ग में चेतना का विशेष विकास हुआ। स्तियाँ समाज में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलने को तैयार हुई । भारतीय संविधान में भी यह घोषणा की गई कि “राज्य, धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग आदि के आधार पर किसी भी नागरिक में विभेद नहीं होगा।”

आज भारतीय नारियाँ जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं । चिकित्सा, मनोविज्ञान, कानून, फिल्म-निर्माण, वायुयान की पायलट, ट्रक-ड्राइवर, खेल का मैदान आदि क्षेत्रों में महिलाएँ पुरुषों से पीछे नहीं हैं। ये ललित कलाओं, जैसे–संगीत, नृत्य, चित्रकला, छायांकन (फोटोग्राफी) में विशेष दक्षता प्राप्त कर रही हैं । वाणिज्य तथा विज्ञान के क्षेत्र में भी स्त्रियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं । स्त्रियों की सामाजिक चेतना जाग उठी है। वे समाज की दुर्दशा के प्रति सजग व सावधान हैं । वे समाज–सुधार के कार्यक्रम में व्यस्त हैं। भारत की वर्तमान समस्याओं-भुखमरी, महँगाई, बेकारी, देहज-प्रथा आदि को सुलझाने के लिए भी वे प्रयत्नशील हैं।

श्रीमती इंदिरा गाँधी, श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्रीमती सुचेता कृपलानी, श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित, लता मंगेशकर, श्रामती किरण बेदी, मेधा पाटकर, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम आदि ऐसी भारतीय नारियाँ हैं जिन पर भारतवर्ष को सदैव गर्व रहेगा ।

पाश्चात्य-प्रभाव :- आजकल अधिकांश स्त्रियाँ पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता से अधिक प्रभावित हैं । वे फैशन व आडंबर को जीवन का सार समझकर भोगवाद की ओर अग्रसर हो रही हैं। वे सादमी से विमुख होकर पैसा कमाने की होड़ में अनैतिकता की ओर उन्मुख हो रही हैं । इस प्रकार वे स्वयं गुड़िया बनकर पुरुषों के हाथों में खेल रही हैं ।

उपसंहार :-नारी को अपने गौरवपूर्ण अतीत को ध्यान में रखकर त्याग, समर्पण, स्नेह, सरलता आदि गुणों को नहीं भूलना है । यूरोपीय संस्कृति के व्यामोह में न फँसकर भारतीयता को बनाये रखना चाहिए । इससे समाज का और उनका दोनों का हित हो सकेगा । नारी के इस चिरकल्याणमय रूप को लक्ष्य कर कवि जयशंकर प्रसाद ने नारी का अत्यंत सजीव चित्रण किया है –

“नारी ! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग-पग-तल में,
पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में ।”

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नारी-शिक्षा का महत्व

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • नारी शिक्षा की आवश्यकता
  • उपसंहार।

नारी सेह और सौजन्य की देवी है। वह पशु के समान आचरण करने वाले व्यक्ति को भी मनुष्य बनाती है। मधुर वाणी से वह जीवन को मधुमय बनाती है। मानवीय सदगुणों के पूर्ण विकास, परिवार तथा समाज की शांति, बच्चों के चरित्रनिर्माण और देश के निर्माण में खी की अहम भूमिका है। अत: नारी शिक्षा का महत्व स्वयंसिद्ध है। एक पुरुष की शिक्षा का अर्थ केवल एक व्यक्ति की शिक्षा है, जबकि एक नारी की शिक्षा का अर्थ सम्पूर्ण परिवार की शिक्षा है।

भारतेंदु जी ने स्री शिक्षा के विषय में कहा था, “स्त्री अगर शिक्षित होगी तो वह अपने बच्चों को शिर्षित कर सकती है। अनपढ़ माता की संतान अपना विकास उस तरह नहीं कर सकती, जिस तरह एक शिक्षित माता की संतान कर सकती है। देश के विकास में भी स्त्री शिक्षा सहायक होगी, स्त्री शिक्षित होगी तो देश दोनों हाथों से काम करेगा। देश की उन्नति में कोई संदेह नहीं रहेगा।”

नारी-जीवन मुख्यतः पत्ली, माता, बहन और बेटी में बँटा होता है। शिक्षित पत्ली परिवार को सुंदर ढंग से जीने की कला सिखलाती है। नारी सेह, सुख, शांति और श्री की वृद्धि करती है। परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों में समन्वय, सामंजस्य स्थापित करने में सफल होती है।

शिक्षित नारी अपने अस्तित्व और शक्ति को पहचानने में समर्थ होती है, तब वह शोषण का शिकार कम होती है। अशिक्षित नारी अपने अधिकार तथा शक्ति से अर्नभिज होती है। अशिक्षित नारी स्वभावत: दुर्बल होती है। वह प्राय: जादू-टोना, भूत-प्रेत में विश्वास करती है। प्रगतिशील कदम उठाने में असमर्थ होती है। वह कुरीतियों और कुसंस्कारों की लक्ष्मण रेखा पार करते हुए हिचकती है। इसलिये निरक्षर नारी के जीवन में अंधकार होता है। पुत्री के रूप में वह माता-पिता के लिये बोझ होती है। पत्नी के रूप में उसका पृथक् अस्तित्व नहीं होता। पुत्र के बड़े होने पर वह उसके आश्रय में परमुखापेक्षी जीवन में जीती है।

शिक्षित नारी में आत्मविश्वास जागृत होता है। वह रुढ़ परम्पराओं और कुसंस्कारों को त्याग कर, अपने पैरो पर खड़ी होती है और अपने सम्मान तथा अस्तित्व की रक्षा करती है।

शिक्षित नारी में सभी परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति होती है। स्वियाँ रोजगार कर सकती है और अपने घर की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बना सकती है। अत: नारी के लिये पूर्णतः सुशिक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। राष्ट्रनिर्माण के लिए नारी-शिक्षा एक अनिवार्य शर्त है।

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राष्ट्र-निर्माण में नारी का योगदान

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • समाज निर्माण तथा
  • राष्ट्र निर्माण में सहयोग
  • उपसंहार।

राष्ट्रनिर्माण में सहयोग देना हर देशवासी का कर्त्तव्य है। राष्ट्र-निर्माण की प्रकिया आदिकाल से लेकर आज तक नारियों ने पुरुषों का साथ देकर, उसकी जीवन यात्रा को सफल बनाया है और उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर अपने नैसर्गिक वरदानों से राप्ट्रीय जीवन में अक्षय शाक्ति का संचार किया है।

अपने-अपने राष्ट्रों के निर्माण में विश्वप्रसिद्ध महिला प्रधानमंत्रियों का योगदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। इस सन्दर्भ में भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, श्रीलंका की सिरीमावो भंडारनायके, वर्तमान राष्प्पति चाद्रका कुमारतुंगे, इजरायल की भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती गोल्डामायर और ग्रेट बिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती मागरेट थैचर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

नारी न हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राष्ष्र के उत्थान में सक्रिय सहयोग दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षिका बन उसने भारत को शिक्षित किया, साथ ही राजनीति के क्षेत्र में प्रधानमंत्री, विधायक, सांसद और मंत्री बन कर ख्याति पाई। न्याय के क्षेत्र में भी उसका योगदान कम नहीं है। हर न्यायालय में महिला वकील पाई जाती है। महिला न्यायाधीशों ने तो अपने जोखिम भरे, साहसपूर्ण और अद्भुत निर्णयों द्वारा समग्र राष्ट्र को चमत्कृत किया है।

कार्यरत् महिलाओं में प्रथम महिला वायु-सुरक्षा अधिकारी प्रेमा माथुर, पहली महिला छाताधारी सैनिक गीता घोष, पहली वायुयान पायलेट रूबी बनर्जी, अत्याधुनिक वायुयान की कमाण्डर सौदामिनी देशमुख, सुख्खा जादव और पहली ट्रेन ड्राइवर मुमताज काटावाला का नाम स्मरणीय है।

पहली भारतीय महिला आई०पी०एस० अधिकारी किरण बेदी ने अपने कार्यकाल में जेल में सुधार लायी, उसके लिये उन्हें मैंगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भारत की प्रथम महिला डॉं. प्रेमा मुखर्जी और हदययरोग विशेषज्ञा डॉ. पद्मावती तथा दीन-दुखियों की सेविका मदर टेरेसा का नाम कभी भुलाया नहीं जा सकता।

आदिकाल से ही हम देखते हैं कि स्रियों ने देश के निर्माण में निरतर योगदान किया है और भविष्य में भी करती रहेंगी। घर समाज सभी जगह उन्होंने अपनी छवि को आलोकित किया है। शिक्षा का क्षेत्र हो अथवा वाणिज्य का, खेल का हो या संगीत का, ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहाँ ख्रियों ने अपनी विशिश्टता का परिचय न दिया हो। अत: हम कह सकते हैं कि राष्ट्र-निर्माण में नारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और रहेगा। महिलाओं का यह योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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धर्म और साम्रदायिकता

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • भारत में विविध धर्म
  • विविध सम्पदाय
  • उपसंहार ।

जावन को सुचारु रूप से संचालित करने वाले श्रेष्ठ सिद्धान्तो का समूह धर्म कहलाता है। समस्त मानवीय व्यवहारों का श्रेयस्कर पक्ष ही धर्म है। धर्म व्यक्ति का सहज स्वभाव है, कर्त्तव्य है। अत: धर्म का क्षेत्र व्यापक है।

अपने धर्म के प्रति अटूट आस्था, विश्वास तथा श्रद्धा समर्पित करना साम्प्रदायिकता नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों के प्रात असहिष्णुता का भाव ही साम्पदायिकता है। सत्य पर सभी धर्मो का समान अधिकार है, लेकिन जब एक धर्म सत्य पर केवल अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहता है तो वह सम्पदायिकता का रूप ले लेता है।

भारत में साम्प्रदायिकता की नई परिभाषा दी जा रही है। धर्म ने सम्पदाय का रूप ले लिया है। धार्मिक साम्प्रदायिकता का अर्थ है, सर्वधर्म-समभाव का त्याग एवं अन्य धर्मों के प्रति अनुदारता एवं असहिष्णुता का प्रदर्शन।

हिन्दुओं का एक सिख सम्प्रदाय भारत में शांत भाव से जीवन-यापन कर रहा था। मगर राजनीतिक कारणों ने सिखों को उग्र बना दिया। पंजाब में निर्दोष हिन्दुओं की हत्या और आतंक के कारण वहाँ मरघट-सी शांति छा जाती थी। पराजित उग्रवादियों ने प्रधानमंत्री इदिरा गांधो तक की हत्या कर दी।

विश्व में मुस्लिम राष्ट्र धनाढ्य हैं, क्योंकि तेल-स्रोत पर यवनों का अधिकार है। वे अरबां रुपया हर वर्ष धर्म के नाम पर खर्च करते हैं।

दूसरा विश्व धर्म ईसाई है। ये सामूहिक धर्म-परिवर्तन में विश्वास करते हैं। हिन्दू जब जाप्रत हुए तो इस धर्म-परिवर्तन के विरोध में विद्रोह उठ खड़ा हुआ। जाति-उपजाति की साम्पदायिकता ने शूद्र और पिछड़ी जातियों मे संघर्ष और सवर्णों में आपस के संघर्ष को जन्म दिया। पिछड़ी जतियों को हर क्षेत्र में प्राथमिकता देकर वर्ग-संघर्ष की भावना को अंकुरित किया गया, जिसने साम्पदायिकता का रूप ले लिया। सवर्णों के परस्पर संघर्ष ने मिथ्या स्वाभिमान तथा झूठे अहम्को जन्म दिया। साम्पदायिकता की भावना इस युग में खूब फल-फूल रही है। कोई भी धर्म संकीर्णता और अनुदारता की वकालत नहीं करता, किन्तु कोई भी धर्मावलम्बी दूसरों के प्रति घृणा, अविश्वास और असहिष्णुता की भावना से मुक्त नहीं हैं।

साम्र्रायायक दंगों का कारण यही है। कहते सभी हैं-‘मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना’ मगर वैर-भावना से कोई मुक्त नहीं है।

नैतिकता का पतन साम्पदायिकता की वृद्धि में सहायक हुआ है। साम्र्रदायिकता से बचना है तो मानवता के महामंत्र का प्रचार होना चाहिए ।
एक कवि कहता है –
“मैं न बँधा हूँ देश-काल की जंग लगी जंजीर में । मैं न खड़ा हूँ जाति-पाँति की ऊँची-नीची भीड़ में । मेरा तो आराध्य आदमी, देवालय हर द्वार है । कोई नहीं पराया मेरा, घर सारा संसार है ।”

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बढ़ती जनसंख्या – एक अभिशाप

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारत की जनसंख्या
  • जनसंख्या वृद्धि के कारण
  • जनसंख्या वृद्धि के दुष्घारणणाम
  • समाधान के उपाय
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- भारत की अनेक समस्याओं में जनसंख्या की समस्या सबसे अधिक विकराल है। आजादी के बाद केवल इसी समस्या के कारण भारतवर्ष में गरीबी, बेरोजगारी तथा अन्य समस्याएँ आज तक सुलझ नहीं पाई हैं। भारत की जनसंख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । यहाँ प्रत्येक मिनट सैंतालीस बच्चे पैदा होते हैं।

भारत की जनसंख्या :- आज विश्व का हर छठा नागरिक भारतीय है । चीन के बाद भारत की आबादी विश्व में सर्वाधिक है । एक अरब भारतीयों के धरती, खनिज और अन्य साधन वही हैं, जो आज से पाँच दशक पूर्व थे । लोगों के पास भूमि कम, आय कम और समस्याएँ अधिक बढ़ती जा रही हैं । बेरोजगारों, अशिक्षितों की संख्या बढ़ती जा रही है । बेरोजगारों की संख्या 6 करोड़ से अधिक हो गई है ।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण :- जनसंख्या वृद्धि के अनेक कारण हैं। भारत की अधिकांश जनता प्रामों में निवास करती है । यहाँ लड़कियों को कम ही पढ़ाया जाता है । बेचारी कन्याएँ $14-15$ वर्ष की आयु में ही मातृत्व के बोझ से दब जानी हैं। गरीब लोग बच्चों को आय का स्रोत मानकर अधिक बच्चे पैदा करते हैं। इसीलिए देश की आबादी बढ़ती जाती है ।

जनसंख्या-वृद्धि के दुष्परिणाम :- जनसंख्या के बढ़ने से अनेक बुराइयों का जन्म होता है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी ग्रामीण जनता में अंधविश्वासों का बोलबाला है । भारत में अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, रोग, भ्रष्टाचार, अनाचार आदि की समस्याएँ दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं । देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करता है । चारों ओर आलस्य, दरिद्रता, कलह, रोग, अनाचार, सांपदायिकता, भ्रष्टाचार, महंगाई, चोरी, डकैतियाँ, लूटपाट तथा अन्य असामाजिक एवम् आर्थिक बुराइयों का बोलबाला है ।

जनसंख्या-वृद्धि के कारण भारत की सारी योजनाएँ विफल हो जाती हैं। देश का उचित विकास नहीं हो पा रहा है। खुशहाली की जगह लाचारी बढ़ रही है । रोजगारी से पेरशान लोग हिंसा, उपद्रव और चोरी-डकैती करने लगते हैं । देश में अपराध बढ़ने लगते हैं तथा नैतिकता का पतन होता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाती है तथा राष्ट्रीय चरित्र की क्षति होती है। अधिक संतान उत्पन्न करने से माँ तथा बच्चे का स्वास्थ्य बिगड़ता है और देश की कार्य-क्षमता एवं राष्ट्रीय आय में कमी आती है ।

समाधान के उपाय :- जनसंख्या-वृद्धि रोकना सबसे आवश्यक कदम है । प्रत्येक नागरिक अपने परिवार को नियोजित करे । केवल एक या दो बच्चे ही पैदा करे । लड़का-लड़की को समान दृष्टि से देखा जाए तो भी जनसंख्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है । जन-संचार माध्यमों तथा समाज-सेवी संस्थाओं के माध्यम से परिवार-नियोजन का व्यापक प्रचार किया जा रहा है । लड़के-लड़की की विवाह की आयु बढ़ाकर क्रमश: 21 वर्ष तथा 18 वर्ष कर दी गई है । इस कानून के बाद भी अनेक स्थानों पर बाल-विवाह हो रहे हैं । परिवार-नियोजन के साधनों के उचित उपयोग से जन्म-दर को मनचाहे समय तक रोका जा सकता है।

भारत में परिवार-कल्याण का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है । हर्ष का विषय है कि भारतीय अब इसका महत्व समझने लगे हैं ।

उपसंहार :- परिवार-नियोजन के महत्व को अच्छी प्रकार समझ लेने पर ही देश की प्रगति सम्भव है । परिवारकल्याण के साथ ही देश-कल्याण भी जुड़ा है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह जनसंख्या वृद्धि की समस्या के प्रति सावधान हो तथा राष्ट्र-हित में परिवार-नियोजन को अपनाए । जनसंख्या की समस्या कानून द्वारा नहीं, अपितु जनजागरण तथा शिक्षा द्वारा हल करना संभव है ।

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भ्रष्टाचार

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भषष्टाचार की पृष्ठभूमि
  • भष्टाचार के विविध रूप
  • भष्टाचार के कारण
  • भष्टाचार दूर करने के उपाय
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- भारत में स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से ही भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया है। इस भ्रष्टाचाररूपी दानव ने सपूर्ण भारत को अपनी चपें में ले रखा है । भ्रष्टाचार आज केवल भारत की नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व की समस्या है। इस दानव से छुटकारा पाना ही आज संपूर्ण मानव समाज की समस्या बन चुकी है ।

भ्रष्टाचार का अर्थ :- भ्रष्टाचार का अर्थ है – भ्रष्ट आचरण । भ्रष्टाचार किसी की हत्या, मार-काट, लूट-पाट, हंरा-फेरी कुछ भी करा सकता है । भ्रष्टाचार ने अपने देश, जाति और समाज को अवनति के गड्ढे में ढकेल दिया है।

भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि :- भ्रष्टाचार का मूल रूप में उदय कहाँ से हुआ यह तथ्य तो स्पष्ट नहीं है, किन्तु यह स्पष्ट है कि स्वार्थ-लिप्सा इसकी जननी तथा भौतिक ऐश्वर्य की चाह इसका पिता है। पुरातन युग में दक्षिणा, मध्यकाल में भेंट तथा आधुनिक काल में उपहार आदि सभी भ्रष्टाचार के विभिन्न रूप हैं।

भ्रष्टाचार के विविध रूप :- आज भारतीय जीवन का कोई क्षेत्र, सरकारी अथवा गैर-सरकारी, सार्वजनिक या निजी ऐसा नहीं जो भ्रष्टाचार से अछूता रहा हो । किंतु फिर भी हम इसे तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त कर रहे हैं ।

(i) राजनैतिक भ्षष्टाचार :- यह भ्रष्टाचार का प्रमुख रूप है । भ्रष्टाचार के सारे रूप इसके ही संरक्षण में पनपते है । इसके अंतर्गत लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव जीतने के लिए अपनाया गया भ्रष्ट आचरण आता है ।
(ii) प्रशासनिक भ्रष्टाचार :- इसके अंतर्गत उच्च पदों पर आसीन सचिव, अधिकारी, कार्यालय अधीक्षक, अधिशासी अभययन्ता, पुलिस अधिकारी, बाबू, चपरासी सभी आते हैं। कितना भी कठिन कार्य हो पैसा हाजिर तो कार्य भी फटाफट हो जाता है ।
(iii) व्यावसयिक भ्रष्टाचार :- इसके अंतर्गत खाद्य पदार्थो में मिलावट, घटिया व नकली औषधियाँ-निर्माण, जमाखोरी, चोरी तथा अन्यान्य भ्रष्ट तरीके देश तथा समाज को कमजोर बनाने के लिए अपनाए जाते हैं। मसालों में मिलावट, दाल-चावलों में पत्थर, घी में चर्बी, सरसों के तेल में अर्जीमोन की मिलावट, पैट्रोल में कैरोसीन की मिलावट आदि व्यावसायिक भ्रष्टाचार के अंतर्गत ही आते हैं ।

भ्रष्टाचार के कारण :- भ्रष्टाचार के इतने अधिक फैलने के कारण हैं-यथा राजा तथा प्रजा। जब आज के नेता तथा प्रशासक सभी भ्रष्ट हैं तो अधीनस्थ कर्मचारी भी जी भर कर भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं। पैसा सभी को प्रिय होता है। बहती गंगा में सभी हाथ धो रहे हैं।

भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय :- भ्रष्टाचार दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं :-
(i) भारतीय संस्कृति की ओर ध्यान आकृष्ट करना :- संस्कृत और देशी भाषाओं का शिक्षण अनिवार्य करना आवश्यक है । इससे जीवन के मूल्य दृढ़ तथा पोषक बनेंगे । लोग धर्म-भीरु बनेंगे तथा दुराचार से घृणा करेंगे । टी.वी. पर भारतीय संस्कृति का प्रचार होना चाहिए ।
(ii) चुनाव -प्रक्रिया को बदलना :-भ्रष्टाचार को हटाने के लिए वर्तमान चुनाव-पद्धति में परिवर्तन आवश्यक है । जनता ईमानदार प्रत्याशियों को विजयी बनाए । चुनाव आयोग तथा राजनीतिक दलों को मिलकर ऐसे नियम बनाने चाहिए कि स्वच्छ छवि वाले तथा शिक्षित लोग ही चुनाव लड़ सकें तथा उनके चुनाव का पूरा खर्च सरकार को वहन करना चाहिए । इससे चुनावी भ्रष्टाचार मिट सकता है । राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले धन पर पाबन्दी लगनी चाहिए ।
(iii) कर-प्रणाली में सुधार :-सरकार अनेक प्रकार के करों को समाप्त कर तीन या चार आवश्यक करें ही जनता पर लगाए और कर-प्रणाली को इतनी सरल बना दे कि सामान्य तथा अशिक्षित लोग भी वांछित कर आसानी से अदा कर सकें।
(iv) शासन -व्यय में कटौती :- शासन-व्यय में कटौती करके सबके सामने सादगी का आदर्श रखा जाए । भारतीय जीवन-पद्धति की यह विशेषता है कि वह हमेशा त्यागोन्मुखी रही है, इसलिए तड़क-भड़क तथा अनावश्यक व्यय में कटौती की जानी चाहिए।
(v) देश-भक्ति की भावना पैदा करना :- प्रत्येक नागरिक राष्ट्र को महान समझकर सदैव उसके गौरव को बनाए रखने के लिए तत्पर रहे ।
(vi) स्वदेश चिंतन अपनाना :- प्रत्येक भारतवासी को स्वदेशी वस्तुओं को ही क्रय करना है-ऐसी भावना प्रत्येक नागरिक में आनी चाहिए । इससे देश का धन देश में ही रहेगा तथा देश की समृद्धि बढ़ेगी ।
(vii) कठोर कानून बनाना :- कानून को इतना कठोर बना दिया जाए कि हर अपराधी को उसके अपराध की उचीत सजा मिल सके ।
(viii) सामाजिक बहिष्कार :- भ्रष्ट व्यक्ति का समाज से बहिष्कार किया जाए, उनके साथ रोटी-रोजी आदि किसी प्रकार का व्यवहार न किया जाए।

उपसंहार :- सदाचार रामबाण औषधि और परम धन है । आज हमारे देश में भ्रष्टाचार मिटाना है तो सदाचारी, सरल, सादगी-प्रिय लोगों का सादर अभिनंदन किया जाना चाहिए । इससे दुराचार मिटेगा तथा सदाचार की पुनः प्रतिष्ठा हो सकेगी । देश भी विकास के मार्ग पर प्रगति करता हुआ अग्रसर होगा।

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भारतीय जीवन पर पाश्चात्य प्रभाव

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पश्चिमी प्रभाव
  • परिणाम
  • उपसंहार ।

जब दो भिन्न सभ्यता-संस्कृतियाँ आमने-सामने अर्थात् सम्पर्क में आया करती हैं, तब वे दोनों सामान्य स्तर पर एकदूसरे का कुछ-न-कुछ प्रभाव भी अवश्य ही ग्रहण किया करते हैं । यह अलग बात है कि उनमें से जो दुर्बल और पराजित सभ्यता-संस्कृति हुआ करती है, वह सबल और विजेता संस्कृति का कुछ अधिक ही प्रभाव ग्रहण करती है। लेकिन जहाँ तक भारतीय जीवन, समाज और सभ्यता – संस्कृति का प्रश्न है ; इसमें तो पाश्चात्य प्रभाव ग्रहण करने में कमाल ही कर दिया है ।

भारतीय जन-समाज का ऐसा एक भी क्षेत्र अपनी सभ्यता-संस्कृति के तत्वों के लिए सुरक्षित रह पाया हो, ऐसा कहीं भूल से भी दिखाई नहीं देता । हमारी भाषा, हमारी वेश-भूषा, हमारा रहन-सहन, खान-पान और आम व्यवहार सभी कुछ इस सीमा तक पश्चिमी हो चुका है कि उसमें यदि कहीं कभी कुछ भारतीय दीख भी जाता है, तो वह बदरंग एवं बदरूप-सा, अजीब एवं अजनबी-सा प्रतीत होता है । उस सब में पहुँच कर लगने लगता है, जैसे हम अपने देश या घर में होकर कहीं विदेश में किसी पराए घर में आ गए हैं।

आज हम पश्चिम ही का खा-पी, पहन, ओढ़ और सभी कुछ कर रहे हैं। यहाँ तक कि हमारी संस्कृति की पहचान तक गायब हो गई है । उसमें पश्चिम के अपतत्त्वों का सम्मिश्रण इस सीमा तक हो चुका है कि खोजने की चेष्टा करने पर भी अपना कुछ नहीं मिल पाता । अपनी भाषाएँ तो अपनी रही ही नहीं, उनमें लिखे जा रहे साहित्य ने व्यक्त हो रहे भावविचार और वर्णित पर्यावरण तक उधार के लगते हैं। कला के अन्य किसी भी रूप में भारतीयता नहीं रह गई, बल्कि उसका भीतर-बाहर का सभी कुछ पश्चिमी रंग में रंग चुका है ।

पश्चिम ने भारत को जो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान दिया है, एक राष्ट्रीयता एवं एक जातीयता की भावना दी है, उस सब के कारण हमें उस का आभारी भी होना चाहिए। आधुनिक प्रौद्योगिकी, तकनीक आदि देकर भी पश्चिम ने निश्चय ही हमें बहुत उपकृत किया है । काम के समय काम, विश्राम के समय विश्राम, आनन्द-मौज के समय आनन्द-मौज, अनेक तरह की अन्ध धारणाओं के प्रति अस्वीकार, राष्ट्रीय चरित्र और व्यवहार जैसा और भी कुछ अच्छा है पश्चिम में । लेकिन सखेद स्वीकार करना पड़ता है कि हम भारतीय उस अच्छे को अपनाने की तरफ ध्यान नहीं दे सके ।

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भारतीय नारी पर पाश्चात्य प्रभाव

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पश्चिमी अनुकरण
  • उपभोक्ता सामग्री
  • उपसंहार ।

पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति ने यों तो भारतीय जीवन और समाज के किसी भी अंग को अछूता नहीं रहने दिया ; पर लगता है कि भारतीय नारी-समाज, उसका प्रत्येक अंग उससे सर्वाधिक प्रभावित हुआ है । इसी कारण वह आज सर्वाधिक प्रताड़ित एवं प्रपीड़ित भी है । पाश्चात्य नारी समाज और उसकी सभ्यता-संस्कृति, पाश्चात्य शिक्षा और रीति नीतियों के प्रभाव से आज की नारी ने स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली है, पर सखेद स्वीकार करना पड़ता है कि उसने न तो स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ ही समझा है और न अनुशासन ही सीखा है ।

शिक्षा, स्वावलम्बन, आर्थिक स्वतंत्रता, घर से बाहर निकल कर जीवन-समाज को नेतृत्व दे पाने की क्षमता, घर की चार-दीवारी और चूल्हे-चौके तक ही अपने को सीमित न रख जीवन के किसी भी उद्योग-धंधे या व्यवसाय में अपनी दक्षता का परिचय देना जैसी अनके बातें भारतीय नारी ने पश्चिम से सीखी हैं। उन सभी बातों को शुभ परिणामदायक कहा जा सकता है । इस से भारतीय नारी के जीवन में नया आत्मविश्वास जागा है। उसे नये क्षितिजों के उद्घाटन करने में काफी सफलता प्राप्त हुई है ।

यह भी पश्चिम का ही प्रभाव है कि आज भारतीय नारी घूँघट के भीतर सिकुड़ी छुई मुई बनी रहने वाली नहीं रह गई, न ही वह कल की तरह पुरुषों को देख कर लज्जा से सिकुड़ कुमड़े की बेल-सी ही बनी रह गई हैं। आज वह धड़ल्ले से हर विषय पर, हर किसी के साथ बातचीत कर सकती है । वह पुरुषों की तरह एवरेस्ट की चोटी पर तो अपने पाँव रख ही आई है, चन्द्रलोक की यात्रा भी कर आई है। इन सभी बातों को भारतीय नारी-जीवन के लिए अच्छा एवं सुखद कहा जा सकता है ।

इन अच्छाइयों के साथ-साथ भारतीय नारी ने पश्चिम से कुछ ऐसी बातें भी सीखीं या ऐसे प्रभाव भी ग्रहण किए हैं, जिन्हें भारतीय सभ्यता-संस्कृति की दृष्टि से उचित एवं अच्छा नहीं माना या कहा जा सकता । उस तरह के पाश्चात्य प्रभावों ने नारी को एक प्रकार का चलता-फिरता मॉडल इशितहार या पोस्टर या फिर उपभोक्ता सामग्री बना कर रख दिया है । परम्परागत शब्दों में कहा जाए, तो एक बार फिर वह भोग्या मात्र बन कर रह गई है।

फैशन में अंधी आज की नारी ने आज अपना अंग-प्रत्यंग तक सभी कुछ उधाड़ कर रख दिया है । इस सीमा तक वह उघड़ने लगी है कि उस का सौन्दर्य भदेस, सुकुमारता माँस का लजीीज टुकड़ा और तन-बदन नग्न होकर अश्लीलता का प्रतिरूप-सा प्रतीत होता है । वह किसी भी तरह से अपने उपयोग करने देने के लिए तैयार हो जाती है कि जब उसे कड़क नोटों की खड़क या चमकीले सिक्कों की खनक सुन पड़ती है ।

कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि अभी तक तो भारतीय नारी न तो पूर्णतया पाश्चात्य ही बन पाई है और न अपने भारतीय स्वरूपाकार को ही निखार पाई है । वह एक ऐसे दोराहे पर पहुँच चुकी है, जहाँ से आगे किधर अच्छा या बुरा है ; वह न तो अभी तक समझ पा रही है और न निर्णय ही कर पा रही है ।

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बाल-मज़दूर समस्या
अथवा,
बाल श्रमिक समस्या

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • मानवता के नाम पर कलंक
  • दयनीय जीवन
  • उपसंहार।

इब्ने इंशा की एक कविता का अंश –

यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पे तनहा बैठा है
ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके पास खिलौनों में
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है, कोई झूला है ।

आज परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन गई और बन रही हैं कि ऐसे बच्चे हर कहीं शहर हो या ग्राम, बाजार हो या मुहल्ला सब जगह देखने को मिल जाते हैं जिनके हाथ-पैर रात-दिन की कठिन मेहनत-मज़दूरी के लिए विवश होकर धूलधूसरित तो हो चुके होते हैं, अक्सर कठोर एवं छलनी भी हो चुके होते हैं। चेहरों पर बालसुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखाएँ स्थायी डेरा डाल चुकी होती हैं।

फूल की तरह ताजा गन्ध से महकते रहने योग्य फेफड़ों में धूल, धुआँ, रोएँ-रेशे भरकर उसे अस्वस्थ एवं दुर्गन्धित कर चुके होते है । गरीबीजन्य बाल-मज़ूरी करने की विवशता ही इसका एकमात्र कारण मानी जाती है । ऐसे बाल मज़दूर कई बार तो डर, भय, बलात् कार्य करने जैसी विवशता के बोझातले दबे-घुटे प्रतीत हुआ करते हैं और कई बार बड़े बूढ़ों की तरह दायित्व-बोध से दबे हुए भी। कारण कुछ भी हो, बाल-मज़दूरी न केवल किसी एक स्वतंत्र राष्ट्र बल्कि समूची मानवता के माथे पर कलंक है ।

छोटे-छोटे बालक मज़दूरी करते हुए घरों, ढाबों चायघरों, छोटे होटलों आदि में तो अक्सर मिल ही जाते हैं, छोटीबड़ी फैक्टरियों के अस्वस्थ वातावरण में भी मज़दूरी का बोझ ढोते हुए दीख जाया करते हैं। कश्मीर का कालीन-उद्योग, दक्षिण भारत का माचिस एवं पटाखे बनाने वाला उद्योग ; महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल की बीड़ी-उद्योग तो पूरी तरह से टिका ही बाल-मज़दूरों के श्रम पर हुआ है ।

बाल-मज़दूरों का एक अन्य वर्ग भी है। कन्धे पर झोला लादे इस वर्ग के मजदूर इधर-उधर फिके हुए गन्दे, फटे, तुड़ेमुड़े कागज बीनते दिखाई दे जाते हैं या फिर पोलिथीन के लिफाफे तथा पुराने प्लास्टिक के टुकड़े एवं टूटी-चप्पलें-जूते आदि । कई बार गन्दगी के ढेरों को कुरेद कर उनमें से टिन, प्लास्टिक, लोहे आदि की वस्तुएँ चुनते, राख में कोयले के टुकड़े बीनते हुए भी इन्हें देखा जा सकता है । ये सब चुन कर कबाड़खानों पर जा कर बेचने पर इन्हे बहुत कम दाम मिल पाता है जबकि ऐसे कबाड़ खरीदने वाले लखपति-करोड़पति बन जाया करते हैं । बाल-मज़दूरों के इस तरह के और वर्ग भी हो सकते हैं।

आखिर में बाल-मजदूर आते कहाँ से हैं ? सीधा-सा उत्तर है कि एक तो गरीबी की मान्य रेखा से भी नीचे रहने वाले घर-परिवारों से आया करते हैं । फिर चाहे ऐसे घर-परिवार ग्रामीण हों या नगरीय झुग्गी-झोंपड़ पट्टियों के निवासी, दूसरे अपने घर-परिवार से गुमराह होकर आए बालक । पहले वर्ग की विवशता तो समझ में आती है कि वे लोग मज़दूरी करके अपने घर-परिवार के अभावों की खाई पाटना चाहते हैं । दूसरे उन्हें पढ़ने-लिखने के अवसर एवं सुविधायें ही नहीं मिल पाती ।

लेकिन दूसरे गुमराह होकर मज़ूरी करने वाले बाल-वर्ग के साथ कई प्रकार की कहानियाँ एवं समस्याएँ जुड़ी रहा करती हैं । जैसे पढ़ाई में मन न लगने या पनुतीर्ण हो जाने पर मार के डर से घर-परिवार से दूर भाग आना ; सौतेली माँ यामाता-पिता के सौतले एवं कठोर व्यवहार से पीड़ित होकर घर त्याग देना, बुरी आदतों और बुरे लोगों की संगत के कारण घरों में न रह पाना या फिर कामचोर होना आदि कारणों से घरों से भाग कर और नगरों में पहुँच कई बार अच्छे घर-परिवार के बालकों को भी विषम परिस्थितियों में मज़दूरी करने के लिए विवश हो जाना पड़ता है। और भी कई वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं।

देश का भविष्य कहे-माने जाने वाले बच्चों-बालकों को किसी भी कारण से मज़दूरी करनी पड़े, इसे मानवीय नहीं कहा जा सकता । एक तो घरों में बालकों के रह सकने योग्य सुविधाएँ-परिस्थितियाँ पैदा करना आवश्यक है, दूसरे स्वयं राज्य को आगे बढ़कर बालकों के पालन की व्यवस्था सम्हालनी चाहिए । सभी समस्या का समाधान सभ्वव हो सकता है ।

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भिखारी-समस्या
अथवा,
भिक्षावृत्ति

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • कारण
  • उपसंहार ।

भारत में, भारत की राजधानी दिल्ली में भी भीख माँगना कानूनी दृष्टि से अपराध है। स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्ष बाद ही इस प्रकार के कानून का प्रावधान किया गया था कि जिस के अन्तर्गत भीख माँगना या मँगवाना दोनों को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया था । इस घोषणा के बाद ऐसे भिखारी-निरोधक घर भी बनाए गये थे कि जहाँ भीख माँगने वाले शरण पा सकें । वहाँ रह कर अपनी योग्यतानुसार कोई काम-धन्धा सीख कर बाहर आएँ और काम कर के अपना जीवन-यापन सम्मानपूर्वक कर सकें। लेकिन इस भारी कानून व्यवस्था का प्रावधान एवं कानून का प्रभाव बहुत ही कम समय तक रहा । धीरे-धीरे फिर उसी प्रकार, बल्कि पहले से भी कहीं अधिक, प्रत्येक स्थान पर भिखारियों की भीड़ बढ़ने लगी ।

ये भिखारी कहाँ से आते हैं, और इन के विरुद्ध कानून के रक्षक एवं ठेकेदार पुलिस वाले कोई कार्यवाही क्यों नहीं करते, ‘नवभारत टाइम्स’ को प्रकाशित रिपोर्ट में अच्छा प्रकाश डाला गया है। उसके अनुसार – ‘बच्चों को अगवा कर के, अनाथ बच्चों, बेसहारा औरतों, अपाहिजों को डरा-धमका कर भीख माँगने के लिए मजबूर करने वाले माफिया गैंग दिन-प्रतिदिन फल-फूल रहे हैं और इसके पोषण में पुलिस की भागीदारी भी समान रूप से है । दिल्ली के विभिन्न इलाकों में पुलिस का भिखारियों या इस व्यवसाय के माफिया गिरहों से हफ्ता तक बन्धा हुआ है।’ बहुत पहले स्व० श्रीमती महादेवी वर्मा ने एक चीनी भाई के संस्मरण में भी इस प्रकार के भीख मंगवानेवाले माफिया गिरोह का सजीव वर्णन किया है ।

दिल्ली-समेत प्रायः समस्त नगरों-महानगरों में ऐसे इलाके अवस्थित हैं कि जहाँ भीख माँगने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है । प्रशिक्षण के दौरान भिखारी जैसे रूप बनाना, विशेष दयनीय स्वर निकालना, हाथ-पैर हिलाकर करुणा उभार भीख देने को विवश कर देना आदि सभी कुछ सिखाया जाता है । अच्छे-भले लोगों और स्वस्थ बच्चों तक को अपाहिज बना कर भीख मंगवाई जाती है । बूढ़े-बूढ़ी अपनी असमर्थता जता कर, बच्चे वाली औरतें बच्चों के अनाथ होने और पालन का दायित्व निभाने जैसी बातें कह कर ऐसे हाव-भाव प्रदर्शित करती है, अनके तो हाथ धोकर पीछे ही पड़ जाती हैं कि कुछ देकर ही पीछा छुड़ाना संभव हो पाता है ।

देवी-देवताओं-विशेषकर शनि-मंगल और माता के नाम पर भी भीख माँगी जाती है। शनि-मंगल के चित्र लेकर और माता के भजन गाकर बच्चों-औरतों को चौराहों पर, बसों में भीख मांगते हुए अक्सर देखा जा सकता है, इस प्रकार भीख मांगने के अनेक तरीके हैं। भिखारी समस्या के अनेक रूप हैं ; क्योंकि अब लोग इन हथकण्डों को अक्सर समझने लगे है, इस कारण जो वास्तव में अपाहिज एवं बेसहारा होने के कारण भीख पाने के अधिकारी हैं, कई बार उन्हें भी वंचित रह जाना पड़ता है । यों किसी भी हालत में भीख मांगना अच्छा नहीं होता है ।

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आधुनिक जीवन और कंप्यूटर
अयवा,
आधुनिक यंत्र-पुरुष-कंप्यूटर

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • कंप्यूटर की परिभाषा
  • कंप्यूटर के उपयोग
  • कंप्यूटर और मानव-मस्तिष्क
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- गत कुछ वर्षो से कंप्यूटर की चर्चा जोर-शोर से सारे विश्व में हो रही है । देश को कंप्यूटरकृत करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अनेक उद्योग-धंधों और संस्थानों में कंप्यूटर का प्रयोग होने लगा है । कंप्यूटरों के उन्मुक्त आयात के लिए देश के द्वार खोल दिए गए हैं ।

कंप्यूटर क्या है ? :- हमारे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन पर छा जाने वाला कंप्यूटर एक ऐसा यांत्रिक मस्तिष्क है, जिसमें विभिन्न गणित संबंधी सूत्रों और तथ्यों के संचालन का कार्यक्रम पहले ही समायोजित कर दिया जाता है । इसके आधार पर कंप्यूटर न्यूनतम समय में गणना कर तथ्यों को प्रस्तुत कर देता है । कंप्यूटर का हिंदी नाम ‘संगणक’ है ।

चार्ल्स वेबेज पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में पहला कंप्यूटर बनाया था । वह कंप्यूटर लम्बी गणनाएँ कर सकता था और उनके परिणामों को मुद्रित कर देता था । कंप्यूटर स्वयं ही गणना करके जटिल-से-जटिल समस्याओं के हल मिनटों और सेकेण्डों में निकाल सकता है ।

कम्य्यूटर के उपयोगों को इन शीर्षकों में बाँटकर देखा जा सकता है –
बैंकिंग के क्षेत्र में :- भारतीय बैंक में खातों के संचालन और उनका हिसाब-किताब रखने के लिए कंप्यूटर का प्रयोग आरम्भ हो चुका है। प्राय: सभी राष्ट्रीयकृत बैंको ने चुंबकीय संख्याओं वाली पास बुक जारी की है ।

प्रकाशन के क्षेत्र में :- समाचार-पत्रों तथा पुस्तकों के प्रकाशन में कंप्यूटर का विशेष योगदान है। अब तो कंप्यूटर से संचालित फोटो कम्पोजिंग मशीन के माध्यम से छपने वाली समग्री को टंकित किया जा सकता है । कंप्यूटर में संचित होने के बाद सारी सामग्री एक छोटी चुंबकीय डिस्क पर अंकित हो जाती है । फोटो कंपोजिंग मशीन इस डिस्क के अंकीय संकेतों को अक्षरीय संकेतों में बदल देती है जिससे उनका मुद्रण हो सके ।

सूचना और समाचार-प्रेषण के क्षेत्र में :- दूरसंचार की दृष्टि से भी कंप्यूटर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । अब तो ‘कंप्यूटर नेटवर्क’ के माध्यम से देश के प्रमुख नगरों को एक-दूसरे से जोड़ने की व्यवस्था की जा रही है ।

डिजायनिंग के क्षेत्र में :- प्राय: ऐसा माना जाता है कि कंप्यूटर अंको और अक्षरों को ही प्रकट कर सकते हैं । आधुनिक कंप्यूटर के माध्यम से भवनों, मोटर-गाड़यों, हवाई जहाजों आदि के डिजाइन तैयार करने में कंप्यूटर ग्राफिक का प्रयोग हो रहा है ।

कला के क्षेत्र में :- कंप्यूटर अब कलाकार या चित्रकार की भूमिका भी निभा रहे हैं। अब कलाकार को न तो कैनवास की आवश्यकता है न रंग की, न बुशों की । कप्यूटर के सामने बैठा कलाकार अपने ‘नियोजित प्रोप्राम’ के अनुसार स्कीन पर चित्र बनाता है और स्कीन पर निर्मित यह चित्र प्रिंट की ‘कुँजी’ (Key) दबाते ही प्रिंटर द्वारा कागज पर अपने उन्हीं वास्तविक रंगों के साथ प्रिंट हो जाता है ।

रेलवे के क्षेत्र में :- कंप्यूटर द्वारा रेलवे संपूर्ण देश के संपर्क में रहता है । कंप्यूटर से आप कहीं से कहीं तक का भी आरक्षण करा सकते हैं, उस आरक्षण को कहीं पर भी रद्द करा सकते हैं।

वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में :- कंप्यूटरों से वैज्ञानिक अनुसंधान का स्वरूप ही बदलता जा रहा है । अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कंप्यूटर ने क्रान्ति पैदा कर दी है । उसके माध्यम से अंतरिक्ष के व्यापक चित्र उतारे जा रहे हैं तथा इन चित्रों का विश्लेषण भी कंप्यूटर के माध्यम से हो रहा है। आधुनिक वेधशालाओं के लिए कंप्यूटर सर्वाधिक आवश्यक हो गए हैं।

औद्योगिक क्षेत्र में :- विशाल कारखानों में मशीनों के संचालन का कार्य अब कंप्यूटर द्वारा किया जा रहा है। कंप्यूटरों से जुड़कर रोबोट ऐसी मशीनों का नियंग्रण कर रहे हैं, जिनका संचालन मानव के लिए अत्यधिक कठिन था। भयंकर शीत और जला देनेवाली गर्मी भी उन पर कोई प्रभाव नहीं डालती ।

युद्ध क्षेत्र में :- वस्तुत: कंप्यूटर का अविष्कार युद्ध के एक साधन के रूप में ही हुआ था। अमेरिका में जो पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर बना था, उसका उपयोग एटम-बम से संबंधित गणनाओं के लिए ही हुआ था। जर्मन सेना के गुप्त संदेशों को जानने के लिए अंग्रेजों ने कोलोसस’ नामक कंघ्यूटर का प्रयोग किया था । अमेरिका की स्टार-वार्स योजना कंप्यूटरों के नियन्त्रण पर ही आधारित हैं।

कंप्यूटर और मानव-मस्तिष्क :- प्राय: मन में यह प्रश्न उठता है कि कंप्यूटर और मानव-मस्तिष्क में श्रेष्ठ कौन है ? मानव-मस्तिष्क की अपेक्षा कंप्यूटर समस्याओं को बहुत कम समय में हल कर सकता है, किंतु वह मानवीय संवेदनाओं, अभिरुचियों और चिन्तन से रहित यंत्र-पुरुष है। कंप्यूटर केवल वही कार्य कर सकता है जिसके लिए उसे निर्देशित (Programmed) किया गया हो ।

उपसंहार :- भारत तीव्र गति से कंप्यूटर-युग की ओर बढ़ रहा है । हम अपना जीवन कंप्यूटर के हवाले करते जा रहे हैं । कंप्यूटर द्वारा विदेशों में बैठे मित्रों से पत्र-व्यवहार हो रहा है, परीक्षा-परिणामों की जानकारी ले रहे हैं। कंप्यूटर हमें बोलना, व्यवहार करना, जीवन को जीने का ढंग, मित्रों से मिलना, उनके विषय में ज्ञान प्राप्त करना आदि सब कुछ बताएगा । कुल मिलाकर कह सकते हैं कि कंप्यूटर द्वारा हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग दिया जा रहा है । अब कंप्यूटर हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग बन चुका है ।

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वृक्षारोपण
अथवा,
वृक्षारोपण : सांस्कृतिक दायित्व

रूपरेखा :

  • पस्तावना
  • वृक्षों का महत्व
  • वृक्षों के प्रति मानव की निर्दयया
  • सांस्कृतिक दायित्व
  • उपसंहार।

वृक्षारोपण का सामान्य अर्थ है – वृक्ष लगाना। प्रयोजन है – वन-सम्पदा के रूप में प्रकृति से हमें जो कुछ भी प्राप्त होता आ रहा है, वह नियमपूर्वक हमेशा आगे भी प्राप्त होता रहे ; ताकि हमारे जीवन-समाज का सन्तुलन, हमारे पर्यावरण की पवित्रता और सन्तुलन नियमित बने रह सकें। वृक्षारोपण करना एक प्रकार का सहज सांस्कृतिक दायित्व स्वीकार किया गया है ।

वृक्षारोपण मानव-समाज का सांस्कृतिक दायित्व है, इसे अन्य दृष्टि से भी देखा और प्रमाणित किया जा सकता है । मानव सभ्यता का उदय और आरम्भिक आश्रय प्रकृति यानि वन-वृक्ष ही रहे हैं। उसकी सभ्यता-संस्कृति के आरम्भिक विकास का पहला चरण भी वन-वृक्षों की सघन छाया में ही उठाया गया। यहाँ तक कि उसकी समृद्धतम साहित्य-कला का सृजन और विकास ही वनालियों की सघन छाया और प्रकृति की गोद में ही सम्भव हो सका, यह एक पुरातत्व्व एवं इतिहास-सिद्ध बात है ।

प्राचीन काल में हरे वृक्ष को काटना पाप समझा जाता था, सूखे वृक्ष भले ही घरेलू उपयोग के लिए काटे जाते थे । कदम्ब वृक्ष को भगवान कृष्ण का प्रिय समझकर श्रद्धा दी जाती थी। अशोक का वृक्ष शुभ और मंगलदायक माना जाता था। तभी तो सीता ने अशोक वृक्ष से प्रार्थना की थी – “तस अशोक मम करहु अशोका।” यह था प्राचीन भारत में वन संम्पदा का महत्व। आरम्भ में ग्रन्थ लिखने के लिए कागज के समान जिस सामग्री का प्रयेा किया गया, वे भूर्ज या भोजपत्र भी तो विशेष वृक्षों के पत्ते ही थे। संस्कृति की धरोहर माने जाने वाले कई ग्रन्यों की भोजपत्रों पर लिखी गई पाण्डुलिपियाँ आज भी कहीं-कहीं उपलब्ध हैं। सांस्कृतिक भाव धारा की बुनियाद ही जब वन-वृक्षों की छाया में रखी गई और विकास कर पाई, तब यदि वृक्षारोपण को एक सांस्कृतिक दायित्व कहा-माना जाता है, तो यह उचित ही है ।

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ होने से पहले तक देश में आरक्षित-अनारक्षित सभी तरह के वृहद वनों की भरमार रही परन्तु बीसवीं शती के स्वार्थान्ध मानव ने वनों का दोहन कर के धन कमाने का मार्ग तो अपना लिया, पर नए वृक्षारोपण के दायित्व को कतई भुला दिया। इसी कारण आज मानव-सभ्यता को पर्यावरण-सम्मन्धी कई तरह की समस्याओं से दोचार होना पड़ रहा है।

जो हो, अभी भी बहुत देर नहीं हुई है । अब भी निरन्तर वृक्षारोपण और उनके रक्षण के सांस्कृतिक दायित्व का निर्वाह कर सृष्टि को अकाल भावी-विनाश से बचाया जा सकता है । व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर इस ओर प्राथमिक स्तर पर ध्यान दिया जाना परम आवश्यक है।

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प्रदूषण : समस्या और समाधान
अथवा,
प्रदूषण से मुक्ति के उपाय

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • प्रदूषण का अर्थ
  • प्रदूषण के प्रकार
  • प्रदूषण पर नियंत्रण
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- प्राचीनकाल से ही गंगाजल हमारी आस्था और हमारे विश्वास का प्रतीक इसी कारण से रहा है क्योंकि वह सभी प्रकार के प्रदूषणों से मुक्त था, किंतु आज अनियन्नित औद्योगिक वृद्धि के कारण अन्य नदियों की तरह गंगा भी प्रदूषित हो रही है । यदि प्रदूषण इसी प्रकार बढ़ता रहा तो गंगा तेरा पानी अमृत’ वाला मुहावरा निरर्थक हो जाएगा ।

प्रदूषण का अर्थ :- विकास और व्यवस्थित जीवन-क्रम के लिए जीवधारियों को संतुलित वातावरण की आवश्यकता होती है । संतुलित वातावरण में प्रत्येक घटक एक निश्चित मात्रा में उपस्थित रहता है। कभी-कभी वातावरण में एक अथवा अनेक घटकों की मात्रा कम अथवा अधिक हो जाया करती है अथवा वातावरण में अनेक हानिकारक घटकों क प्रवेश हो जाता है। फलत: वातावरण दूषित हो जाता है, जो जीवधारियों के लिए किसी-न-किसी रूप में हानिकारक सिद्ध होता है । इसे ही प्रदूषण कहते हैं ।

प्रदूषण के प्रकार :- प्रदूषण की समस्या का जन्म जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ हुआ है। विकासशील देशों में औद्योगिक एवं रासायनिक कचरों ने जल, वायु तथा पृथ्वी को भी प्रदूषित किया है।

विकसित एवं विकासशील सभी देशों में निम्न प्रकार के प्रदूषण विद्यमान हैं :-
वायु-प्रदूछण :- वायुमंडल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक विशेष अनुपात में विद्यमान हैं, अपनी क्रियाओं द्वारा जीवधारी वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन-डाई-आक्साइड छोड़ते रहते हैं । प्रकाश की उपस्थिति में हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण क्रिया द्वारा कार्बन-डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं । इस प्रकार ऑक्सीजन और कार्बन-डाई-ऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड, सल्फर-डाई-ऑक्साइड तथा सिलिकॉनटेट्राफ्लोराइड मुख्य हैं।

जल-प्रदूषण :- सभी जीवधारियों के लिए जल अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। पौधे अपना भोजन जल में घुली हुई अवस्था में ही प्राप्त करते हैं। जल में अनेक प्रकार के खनिज तत्व, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ तथा गैसें घुली रहती हैं । यदि जल में ये पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाते हैं, तो जल प्रदूषित होकर हानिकारक हो जाता है।

ध्वनि प्रदूषण :- अनेक प्रकार के वाहनों, जैसे-कार, स्कूटर, मोटर, जेट विमान, ट्रैक्टर आदि तथा लाउडस्पीकर, बाजे, कारखानों के सायरन और मशीनों से भी ध्वनि-प्रदूषण होता है । अधिक तेज ध्वनि से मनुष्य की सुनने की शक्ति भी कम हो जाती है तथा उसे ठीक प्रकार से नींद नहीं आती, यहाँ तक कि कभी-कभी पागलपन का रोग भी उत्पन्न हो जाता है ।

रासायनिक प्रदूषण :- प्राय: कृषक अधिक पैदावार के लिए कीटनाशक और रोगनाशक दवाइयों तथा रसायनों का प्रयोग करते हैं। इनका स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है । जब ये रसायन वर्षा के जल के साथ बहकर नदियों द्वारा सागर में पहुँच जाते हैं तो, ये वहाँ रहने वाले जीवों पर घातक प्रभाव डालते हैं । इतना ही नहीं मानव-देह पर भी इसका प्रभाव पड़ता है ।

रेडियोधर्मी प्रदूषण :- परमाणु शक्ति उत्पादन केंद्रों तथा परमाणविक परीक्षण से भी जल, वायु तथा पृथ्वी का प्रदूषण होता है, जो देश की वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भावी पीढ़ी के लिए भी खतरनाक है । परमाणु विस्फोट के स्थान पर तापक्रम इतना अधिक बढ़ जाता है कि धातु भी पिघल जाती है । पोखरण में परमाणु परीक्षण के समय भारत में भी ऐसा ही हुआ था ।

प्रदूषण पर नियंत्रण :- पर्यावरण में होने वाले प्रदूषण को रोकने तथा उसकी रक्षा के लिए गत वर्षों में सारे विश्व में एक चेतना पैदा हुई है । भारत सरकार ने 1947 ई० में ‘जल-प्रदूषण निवारण एवम् नियंत्रण अधिनियम’ लागू किया था । इसी के अंतर्गत एक केंद्रीय बोर्ड’ तथा सभी प्रदेशों में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गठित किए गए हैं । इन बोर्डों ने प्रदूषणनियंत्रण की योजनाएँ तैयार की हैं।

उपसंहार :- सरकार प्रदूषण की रोकथाम हेतु निरन्तर प्रयास कर रही है । पर्यावरण के प्रति जागरुकता से ही हम भविष्य में और अधिक अच्छा स्वास्थ्य तथा जीवन जी सकेंगे तथा भविष्य में आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण के अभिशाप से मुक्ति दिला सकेंगे ।

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एड्सः एक चुनौती

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • एड्स की जानकारी
  • एड्स के कारण
  • एड्स से बचाव के उपाय
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- H.I.V. (एच. आई. वी.) अर्थात् एड्स (Aids) भारत और पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती बन चुका है । भारत में आज करोड़ों लोग एच.आई. वी. से संकमित हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों से पता चलता है कि दुनिया में 3 करोड़ 80 लाख वयस्क और करीब 15 लाख बच्चे एच. आई वी. की चपेट में आ चुके हैं । सन् 1991 में इसकी संख्या आधी थी । भारत में H.I.V. संक्कमित लोगों की अनुमानित संख्या 3.85 मिलियन है । महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र-प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर तथा नागालैंड में एक प्रतिशत से अधिक लोग H.I.V. संक्रमित हैं । इसने गत वर्ष विश्व में लगभग 30 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिए । आज विश्व का प्रत्येक देश एड्स की चपेट में है।

एड्स का अर्थ :- ‘एड्स’ का पूरा अर्थ है –

  • A-Acquired-एक्वायर्ड-प्राप्त किया हुआ ।
  • I-Immuno (इम्युनो)-शरीर के रोगों से लड़ने की क्षमता ।
  • D-Deficiency (डेफिसिएंसी)-कमी ।
  • S-Syndrome (सिंड्रोम)-लक्षणों का समूह।

एड्स की जानकारी :- एड्स एक ऐसी भयंकर बीमारी है जो एच आई वी. (H.I.V.) नामक वायरस विषाणु के द्वारा फैलती है । ये वायरस अत्यंत सूक्ष्म तथा बीमारी पैदा करने वाले जीव हैं। इन्हें केवल अत्यंत शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से ही देखा जा सकता है ।H.I.V. वायरस के शरीर में प्रवेश करने के बाद मरीज की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होने लगती है । इस प्रकार रोगी साधारण रोगों से मुकाबला नहीं कर पाता है । एच आई. वी. संक्रमण और एड्स के अंतर को आम व्यक्ति नहीं समझ पाता है। एच. आई. वी. संक्रमण उसे कहते हैं जब वायरस शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है । तब वह व्यक्ति एच आई. वी. सक्रमित व्यक्ति कहलाता है तथा ऐसे व्यक्ति को 7 से लेकर 10 वर्षों तक कोई बीमारी नहीं होती । वह दूसरे लोगों की तरह सामान्य नज़र आता है । इसके बाद वह संक्रमित व्यक्ति एड्स की बीमारी से घिर जाता है । एक बार शरीर में वायरस प्रवेश कर जाए तो फिर इस बीमारी से मुक्ति सम्भव नहीं है ।

एड्स के कारण :- एड्स रोग मूल रूप से एक यौन रोग है । इसके प्रमुख कारण हैं –

(अ) एच.आई. वी. ग्रस्त व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध रखने से । यौन संबंधों से यह रोग संक्रमिक पुरुष से महिला को, संक्रमित महिला से पुरुष को तथा संक्रमित पुरुष से पुरुष को हो सकता है ।
(ब) डॉक्टरों द्वारा प्रदूषित सुइयों का प्रयोग करने से, मादक पदार्थों का सेवन करने वालों द्वारा दूषित सुइयों के प्रयोग से, शरीर पर गुदाई करने वालों द्वारा अस्वच्छ औजारों का प्रयोग करने से तथा संक्रमित व्यक्ति के रेजर से बाल अथवा दाढ़ी बनाने से ।

एड्स से बचाव के उपाय :- सरकार विभिन्न संचार माध्यमों के द्वारा जनता को एड्स की जानकारी दे रही है । एड्स के सामान्य लक्षणों की जानकारी सभी को होनी चाहिए । एड्स के रोग से प्रस्त रोगी का वजन निरंतर कम होता जाता है । उसकी गर्दन, बगल अथवा जांघों की ग्रंथियों में सूजन आ जाती है । उसे लगातार बुखार भी रहता है। मुँह तथा जीभ पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, लेकिन इन लक्षणों का अर्थ यह नहीं है कि ऐसे लक्षणों वाले सभी व्यक्तियों को एड्स ही है ।

तपेदिक रोग में भी ऐसे लक्षण हो सकते हैं । एड्स रोग का निदान एलिसा टेस्ट(Elisa Test) तथा वेस्टर्न ब्लॉट (Western Blot) नामक रक्त जाँच से किया जाता है । लाल रिबन एड्स का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है। प्रतिवर्ष एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है । इस दिन सभी लोग एड्स का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न पहनकर एड्स के विरुद्ध अपनी मुहिम चलाते हैं। एक दिसम्बर (विश्व एड्स दिवस) विश्व के सभी देशों के बीच आपसी विश्वास, करुणा, समझ और एकजुटता विकसित करने का संदेश देता है। एड्स के विरुद्ध विश्वव्यापी अभियान का प्रारंभ 1977 ई० से हुआ है । सभी देशों की यही धारणा है कि विश्व के लोग इस बीमारी की गंभीरता को समझें। संयुक्त राष्ट्र संग ने एक दिसंबर को ‘विश्व एड्स दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की है ।

उपसंहार :- याद रहे अभी तक इसका कोई इलाज नहीं है, कोई दवा नहीं है । अत: इससे बचाव हेतु इसकी पूर्ण जानकारी जनता को होनी चाहिए । एड्स की जानकारी में ही बचाव है । व्यक्ति को रक्त चढ़वाते समय, इंजेक्शन लगवाते समय, नाई से बाल कटवाते समय नई सुई तथा ब्लेड का प्रयोग करना चाहिए। ऐसी जानकारी जनता को हो तथा वह शारीरिक संबंधों में सतर्कता रखें तो एड्स नहीं फैलेगा तथा सभी भारतवासी अथवा विश्व के लोग दुश्चिन्ताओं से मुक्तर रहेंगे ।

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इण्टरनेट और विश्व गाँव की संकल्पना
(गलोबलाइजेशन)

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • कम्प्यूटर के माध्यम से समय विश्व और गाँव को जोड़ने का प्रयास।
  • इण्टरनेट की लोकपियता
  • उपसंहार।

भौगोलिक सीमाओं से आबद्ध व्यक्ति सूचना प्रौद्योगिकी और संचार प्रौद्योगिकी के सदुपयोगी संगम से एक सुगम व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है । यह व्यवस्था अपने विस्तृत आलिंगन से समूचे वसुधा को समेट रही है । वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी विकास के इस परिर्रेक्ष्य में इस पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति दूर-दराज के क्षेत्र में स्थित दूसरे व्यक्तियों से बौद्धिक सम्पर्क स्थापित कर रहा है। सप्ट्त: मानवीय सम्बन्ध एक आशाजनक उज्जवल परिवर्तन की स्थिति से गुजर रहा है। कम्प्यूटर के माध्यम से सूचना के राजमार्ग इण्टरनेट पर चलकर समस्त मानव-जाति एकीकरण के लिए प्रयत्नशील है ।

मानव-जीवन की सभी गतिविधियां यथा – राजनीतिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक आदि इलेक्ट्रॉनिक सुविधाओं से लाभान्वित हो रही हैं। नेटवर्क के इस विशाल पर्यावरण में कोई सीमा नहीं। कोई सरहद नहीं, कोई बंधन नहीं। विचारकों का उन्मुक्त संचालन-प्रसारण विश्व ग्राम योजना का प्रमुख चरित्र है और इण्टरनेट इसकी सम्पूर्ण व्यवस्था है। इण्टरनेट व्यवस्था के अन्तर्गत लाखों-करोड़ों कम्यूटरों का संजाल बनता जा रहा है, जो सूचनाओं के आवागमन को सुलभ करता है ।

इसकी संरचना वस्तुतः प्रजातांत्रिक है, जो सूचना शक्ति को विकेन्द्रित करती है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी व्यक्ति अपने कम्यूटर को इण्टरनेट से जोड़कर सूचना समाद् बन सकता है । इण्टेरनेट से जुड़ा कम्पूटर होस्ट कहलाता है। इस साम्राज्य में राजा व रंक सभी अपने होस्ट कम्प्यूटर से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इण्टरनेट का जन्म शीत-युद्ध के गर्भ से अमेरिका में हुआ है।

1960 ई० में सोवियत संघ के परमाणु आक्रमण से चिंतित अमेरिकी सरकार ने एक ऐसी व्यवस्था की संरचना चाही, जिसमें अमेरिकी शक्ति किसी एक जगह पर केन्द्रित न रहे । विकेन्द्रित सत्ता वाले नेटवर्क से यह आशा थी कि शक्ति के बिखरे स्वरूप से उसे आक्रमण का शिकार होने से बचाया जा सकेगा । इस नेटवर्क में कम्यूटर शक्ति से सम्बन्धित समस्त सूचनाओं को संग्रहीत रखा जा सकेगा। इस प्रकार, कुछ कम्यूटरों के नष्ट हो जाने के बावजूद भी कुछ कम्पूटर, शेष कम्यूटर रक्षात्मक कदमों के लिए संग्रहीत सूचनाओं के साथ मार्गदर्शन करेंगे।

सत्तर के दशक में अमेरिका की रक्षा उन्नत अनुसंधान परियोजना एजेंसी ने अपने प्रयत्न में सफलता प्राप्त की और इस नेटवर्क का उदय हुआ । जो कम्पूटरों के बीच संयोजित पैकेट संजालों में सूचनाओं का आदान-प्रदान कराने लगा। ये अंतर-नैटिंग परियोजना परिक्कृत होकर इण्टरनेट के नाम से विख्यात हुई । अनुसंधान से विकसित प्रोटोकोल को नियंत्रण प्रोटोकोल (टी.सी. पी.) और इण्टरनेट प्रोटोकोल (आई.बी.) कहा गया । इण्टरनेट से सम्बन्धित दस्तावेजों के प्रकाशन और प्रोटोकल संचालन के लिए इण्टरनेट कारवाई बोर्ड होता है जो प्रयोक्ताओं को इण्टरनेट रजिस्ट्री डोमेन नेम और उसके द्वारा डाटाबेस का आबंटन और वितरण करता है ।

विश्व समाज प्रौद्योगिकी सुविधाओं का सदुपयोग सभी पारम्परिक दूरियाँ खत्म करने के लिए कर रहा है। व्यक्तिगत लाभ से लेकर जनकल्याण तक की दृष्टि से इण्टरनेट एक उपयोगी उपलब्धि के रूप में प्रकट हो रहा है । भविष्य में इण्टरनेट से जुड़ा विश्व समुदाय एक प्रजातांत्रिक वैज्ञानिक व्यवस्था में सूचना शक्ति का बराबर हकदार होगा। लेकिन कठिनाई उन विकासशील देशों के लिए होगी, जहाँ आधारभूत संरचना का अभाव है।

भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी बिजली, पानी, टिकाऊ आवास, साक्षरता, स्वास्थ्य सुविधा, पोषक भोजन आदि की समस्या है, इलेक्ट्रॉनिक जीवन स्वपातीत हैं। गाँवों में सामुदायिक कम्यूटर के लिए भी निर्बाध बिजली की आवश्यकता होगी। ई-गवर्नेंस के लिए भी उचित वातावरण चाहिए । यह आवश्यक है कि सूचना क्रान्ति के इस लाभदायक क्षण में लाभान्वित हो रहा धनाद्य वर्ग अपने सामाजिक कर्त्त्यों का निर्वाह करे।

सष्ट है कि इण्टरनेट विश्व में सभी समुदायों से सम्बद्ध मामलों पर विचार-विमर्श के रूप में पूरी दुनिया में सूचना का कारगर प्रसारण बन सकता है। हम इण्टरनेट पर दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले अपने मित्र से बातचीत कर सकते हैं। विभिन्न दुकानों में बिकने वाली वस्तुओं को देख सकते हैं और ऑर्डर दे सकते हैं। मण्डियों और शेयर बाजार पर नजर रख सकते हैं। अपने उत्पादन और सेवाओं का विज्ञापन कर सकते हैं।

इण्टरनेट पर हम न केवल अखबार पढ़ सकते हैं, बल्कि पुस्तकालयों से जरूरी सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं। दुनिया से हम सलाह मांग सकते हैं, और अपना विचार दुनिया के सामने रख सकते हैं। जिस प्रकार गाँव के अन्दर सूचना का आदान-प्रदान बड़ी तेजी से होता है, ठीक उसी प्रकार इण्टरनेट के द्वारा पूरे विश्व में कहीं से किसी कोने में सूचना तीव्र गति से दिया और लिया जा सकता है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि इण्टरनेट विश्व गाँव की संकल्पना को साकार कर सकता है।

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इंटरनेट – वरदान या अभिशाप

भौगोलिक सीमाओं से आबद्ध व्यक्ति सूचना प्रौद्योगिकी और संचार प्रौद्योगिकी के सदुपयोगी संगम से एक सुगम व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है । यह व्यवस्था अपने विस्तृत आलिंगन से समूचे वसुधा को समेट रही है। वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी विकास के इस परिप्रेक्ष्य में इस पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति दूर-दराज के क्षेत्र में स्थित दूसरे व्यक्तियों से बौद्धिक सम्पर्क स्थापित कर रहा है। स्पष्टत: मानवीय सम्बन्ध एक आशाजनक उज्ज्वल परिवर्तन की स्थिति से गुजर रहा है । कम्यूटर के माध्यम से सूचना के राजमार्ग इण्टरनेट पर चलकर समस्त मानव-जाति एकीकरण के लिए प्रयत्नशील है ।

मानव-जीवन की सभी गतिविधियां यथा – राजनीतिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक आदि इलेक्ट्रॉनिक सुविधाओं से लाभान्वित हो रही हैं । नेटवर्क के इस विशाल पर्यावरण में कोई सीमा नहीं । कोई सरहद नहीं, कोई बंधन नहीं । विचारों का उन्मुक्त संचालन-प्रसारण विश्व ग्राम योजना का प्रमुख चरित्र है और इण्टरनेट इसकी सम्पूर्ण व्यवस्था है। इण्टरनेट व्यवस्था के अन्तर्गत लाखो-करोड़ों कम्यूटरों का संजाल बनता जा रहा है, जो सूचनाओं के आवागमन को सुलभ करता है ।

इसकी संरचना वस्तुतः प्रजातांत्रिक है, जो सूचना शक्ति को विकेन्द्रित करती है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी व्यक्ति अपने कम्प्यूटर को इण्टरनेट से जोड़कर सूचना सम्राट बन सकता है । इण्टेरनेट से जुड़ा कम्प्यूटर होस्ट कहलाता है। इस साम्राज्य में राजा व रंक सभी अपने होस्ट कम्यूटर से सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं । इण्टरनेट का जन्म शीत-युद्ध के गर्भ से अमेरिका में हुआ है । विश्व समाज प्रौद्योगिकी सुविधाओं का सदुपयोग सभी पारम्परिक दूरियाँ खत्म करने के लिए कर रहा है। व्यक्तिगत लाभ से लेकर जनकल्याण तक की दृष्टि से इण्टरनेट एक उपयोगी उपलब्धि के रूप में प्रकट हो रहा है ।

भविष्य में इण्टरनेट से जुड़ा विश्व समुदाय एक प्रजातांत्रिक वैज्ञानिक व्यवस्था में सूचना शक्ति का बराबर हकदार होगा । लेकिन कठिनाई उन विकासशील देशों के लिए होगी, जहाँ आधारभूत संरचना का अभाव है । भारत जैसे देश में जहाँ अभी भी बिजली, पानी, टिकाऊ आवास, साक्षरता, स्वास्थ्य सुविधा, पोषक भोजन आदि की समस्या है, इलेक्ट्रॉनिक जीवन स्वप्नातीत हैं । गाँवों में सामुदायिक कम्यूटर के लिए भी निर्बाध बिजली की आवश्यकता होगी । ई-गवर्नेंस के लिए भी उचित वातावरण चाहिए। यह आवश्यक है कि सूचना क्रान्ति के इस लाभदायक क्षण में लाभान्वित हो रहा धनाद्य वर्ग अपने सामाजिक कर्तव्यों का निर्वाह करे।

स्पष्ट है कि इण्टरनेट विश्व में सभी समुदायों से सम्बद्ध मामलों पर विचार-विमर्श के रूप में पूरी दुनिया में सूचना का कारगर प्रसारण बन सकता है। हम इण्टरनेट पर दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले अपने मित्र से बातचीत कर सकते हैं । विभित्र दुकानों में बिकने वाली वस्तुओं को देख सकते हैं और ऑर्डर दे सकते हैं । मण्डियों और शेयर बाजार पर नजर रख सकते हैं । अपने उत्पाद और सेवाओं का विज्ञापन कर सकते हैं । इण्टरनेट पर हम न केवल अखबार पढ़ सकते हैं, बल्कि पुस्तकालयों से जरूरी सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं ।

दुनिया से हम सलाह मांग सकते हैं, और अपना विचार दुनिया के सामने रख सकते हैं। जिस प्रकार गाँव के अन्दर सूचना का आदान-प्रदान बड़ी तेजी से होता है, ठीक उसी प्रकार इण्टरनेट के द्वारा पूरे विश्व में कहीं से किसी कोने में सूचना तीव्र गति से दिया और लिया जा सकता है । इंटरनेट मनोरंजन का भी साधन है । इस पर विश्व की सारी गतिविधियाँ उपलब्ध हैं। अनेक खेल उपलब्ध हैं । मनचाही फिल्में, मनचाहे गाने, चैटिंग और तरह-तरह के सामान इसे लोकप्रिय बनाए हुए हैं। इंटरनेट व्यापार, बैंकिग, आजीविका, टिकटखरीद, होटल बुकिंग, खरीददारी आदि आवश्वक क्षेत्रों में भी हस्तक्षेप रखता है। वास्तव में इंटरनेट की भूमिका आज बहुमुखी हो गई है।

इंटरनेट केवल स्वर्ग के ही द्वार नहीं खोलता, इसकी परेशानियाँ भी अनंत हैं। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि यह समय-खाऊ यंत्र है । यह उस भटकाऊ चौराहे की तरह है, जिसपर खड़े होकर आदमी अपना रास्ता भूलकर अन्य आकर्षक रास्तों को निहारने में खो जाता है। इंटरनेट से एक सूचना लेनी हो तो हजारों सूचनाएँ आकर हमें भूलभुलैया में डाल देती हैं। बड़ी मुस्किल से हम वांछित सूचना ले पाते हैं । इस कारण हमारा समय बहुत व्यर्थ चला जाता है ।

इंटरनेट की दूसरी बड़ी कमी यह है कि यह छोटे-बड़े का ख्याल रखे बगैर सारी खबरें, सारी सूचनाएँ, सारे दृश्य लोगों के सामने खोल देता है । अनेक अश्लील और नंगे दृश्य इस पर हमेशा उपलब्ध रहते हैं । इससे विश्व की अनेक मंस्कृतियों में खलल पड़ गया है। अपने बच्चों को हम कुमार्ग से बचाने के लिए जी-जान लगाया करते थे, इंटरनेट उसे हमारे घर में आकर ही परोस देता है। यह घर बैठे-बैठे रष्ट होने का साधन बन गया है।

इंटरनेट का एक बड़ा खतरा यह है कि इसके माध्यम से अनेक चोरियाँ होने लगी हैं। हमारे पते, बैंक-खाते, क्रेडिट कार्ड नंबर चोरी होने लगे हैं, जिसके कारण हमारे खातें से पैसे चोरी हो जाते हैं। एक बड़ा खतरा यह है कि हमारे मेल पर हजारों अवांछित संदेश आते हैं और वे हमारी दिनचर्चा में खलल डालते हैं। कभी-कभी ऐसा वायरस आ जाता है कि हमारी सारी सूचनाएँ नष्ट हो जाती हैं । इंटरनेट के खतरों से बचा जा सकता है। इसके लाभ इतने अधिक हैं कि आज इसके वरदानों से वंचित नहीं हुआ जा सकता।

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दूरदर्शन (टेलिविज़न)

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • अविष्कार
  • कार्य-पणाली
  • उपयोगिता
  • उपसंहार ।

दूरदर्शन आधुनिक विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण विधा है मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देने, जानकारी बढ़ाने, प्रचार और प्रसार का भी एक महत्वपूर्ण सशक्त माध्यम है । इस माध्यम में जैसे रेडियो और सिनेमा की श्रव्य-दृश्य विधियाँ मिल कर एक हो गई हैं। इसे बेतार-संवाद प्रेषण का अभी तक का सर्वोत्तम उपलब्ध वैज्ञानिक साधन माना जाता है । टेलफोन और रेडियो के आविष्कार के पहले तक जैसे आम आदमी ने कभी कल्पना तक नहीं की थी कि कभी वह दूर-दूराज़ स्थित लोगों की आवाज़ सुन कर उन्हें अपने समीप अनुभव कर सकेगा, उसी प्रकार बोलने वाले को कभी देख भी सकेगा, यह सोचना भी कल्पना से परे था। लेकिन दूरदर्शन के आविष्कार ने असम्भव या कल्पनातीत समझी जाने वाली उन सभी बातों को आज साकार एवं सम्भव कर दिखाया है ।

इस वैज्ञानिक चमत्कार यानि दूरदर्शन का आविष्कार सन् 1926 ई० में सम्भव हो पाया था। इस का आविष्कारकर्ता का नाम है जॉन एल० बेयर्ड। भारत में इस चमत्कारी दृश्य श्रव्य प्रसारण विधा का आगमन सन् 1964 ई० के बाद ही सम्भव हो पाया। भारत में पहले दूरदर्शन-प्रसारण केन्द्र की स्थापना सन् 1965 में ही हो पाई । धीरे-धीरे इसका प्रचलन और प्रसारण इस सीमा तक बड़ा कि आज दूर-पास सर्वन्त इसे देखा-सुना जा सकता है । राजभवन से लेकर झोंपड़ी तक में यह पहुँन चुका है। पहले इस का श्वेत-श्याम स्वरूप ही प्राप्त था, जबकि आज भारत-समेत सारे विश्व में दूरदर्शन रंगीन दुनिया में प्रवेश कर चुका है ।

आजकल भारत में उपग्रह की सहायता से दूरदर्शन के कार्यक्रम देश के प्रत्येक कोने में सरलता से पहुँचने लगे हैं। अब तक डेढ़-दो दर्जन तक प्रसारन केन्द्र तथा सैंकड़ों रिले केन्द्र स्थापित हो चुके हैं। दूरदर्शन-ट्राँसमिशन की संख्या भी दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ती ही जा रही है। आधुनिक विज्ञान ने टेलिविजन का प्रयोग भिन्न-भिन्न दिशाओं में सम्भव बना दिया है । दूरदर्शन अन्तरिक्ष-विज्ञान की भी कई तरह से सहायता कर रहा है। सुदूर ग्रहों की जानकारी इस के कैमरे सहज ही प्राप्त कर लेते हैं। कृत्रिम उपग्रह अन्तरिक्ष में भेजने और वहाँ उन पर नियंत्रण रखने के कार्य में भी दूरदर्शन बड़ा सहायक सिद्ध हो रहा है ।

दूरदर्शन तरह-तरह के मनोरंजन का एक सर्वसुलभ घरेलू साधन है ही, इससे, शिक्षा के प्रचार-प्रसार, निरक्षरता हटाने जैसे कायों में भी पर्याप्त सहायता ली गई और ली जा रही है । विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को शिक्षा के साथ-साथ किसानों को कृषि कायों को शिक्षा के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है । इसी प्रकार दूरदर्शन प्रचार-प्रसार का भी अच्छा माध्यम है। सो स्वास्थ्य-सुधार, जनसंख्या-नियंत्रण, शिशु-संवर्द्धन-रक्षा जैसे कार्य भी यह कर रहा है । और भी कई प्रकार के घरेलू तथा व्यावसायिक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए इस का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। देश-विदेश के समाचारों की दृश्य-श्रव्य योजना, समाचार-समीक्षा, गोष्ठियाँ, वार्ताएँ, कवि-सम्मेलन-मुशायरे, प्रदर्शानियाँ और तरह-तरह के उत्पादों के विज्ञापन जैसे अनेक कार्य इस से लिए जा रहे हैं।

इस प्रकार सषष्टै कि आज दूरदर्शन हमारे व्यापक जीवन का एक व्यापक एवं व्यावहारिक अंग बन चुका है। हाँ, अपसंस्कृति के प्रचार का माध्यम बनने से इसे रोकना आवश्यक है, नहीं तो देश-काल के अनुरूप इस की वास्तविक उपयोगिता व्यर्थ हो कर रह जाएगी ।

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कम्प्यूटर : मशीनी मस्तिष्क

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • कम्यूटर-प्रणाली
  • उपयोगिता
  • उपसंहार ।

आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने किस सीमा तक प्रगति एवं विकास कर लिया है, किस तरह वह एक-के बाद-एक नए आविष्कार कर के मानव की सभी तरह की कार्य-शक्तियों के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है ; कम्यूटर का आविष्कार इसका एक नवीनतम उदाहरण है।

कम्पूटर को आज प्रत्येक क्षेत्र की प्रगति एवं दुत विकास के लिए आवश्यक माना जाने लगा है। शिक्षा, व्यवसाय, शास्त्र-प्रशासन सभी में आज कम्यूटर-प्रणाली की न केवल महती आवश्यकता ही अनुभव की जा रही है ; बल्कि यथासम्भव अपनाया भी जा रहा है। यहीं तक नहीं, देश की सुरक्षा-प्रणाली की दृढ़ता के लिए भी आज कम्यूटर एक तरह की अनिवार्यता है। मानव-मस्तिष्क से भी बढ़ कर तीव्र गति से कार्य करने वाला कम्यूटर वास्तव में अंक-गणितपद्धति के विकास की एक महत्त्वपूर्ण आधुनिक देन है ।

ईसा से लगभग चार हजार वर्ष पहले गणक-पटल नामक अंक गणित की जिस विद्या का विकास हुआ था, जिसके द्वारा तारों में मोती जैसे डालकर आज भी बच्चों को गिनती सिखाई जाती है, उसका विकसित एवं यंत्रीकृत परिवर्द्धित रूप है कम्यूटर । यह कम्यूटर-प्रणाली मुख्यत पाँच भागों में विभाजित रहा करती है –

  • स्मरणयंत्र, इसमें सभी तरह की सूचनाएँ भर दी जाती हैं। इन्हीं के आधार बनाकर कम्यूटरी-गिनती हुआ करती है।
  • नियंत्रणकक्ष, इसी से गिनती के गुण-दोष अर्थात् ठीक-गलत का पता चल पाता है।
  • अक गणित भाग, इसमें यह भाग गिनती की सारी क्रियाप्रक्रिया को सम्पन्न किया करता है ।
  • आन्तरिक यन्त्र भाग, इसमें सभी प्रकार के संकेत, निर्देश और जानकारियाँ संकलित एवं संचित रहा करती हैं।
  • बाह्हा यंत्र भाग, उपर्युक्त अंगों के क्रियाकलापों से प्राप्त निर्देशों-सूचनाओं का विवेचन-विश्लेषण का परिणाम बताने का कार्य यह भाग सम्पन्न किया करता है ।

कम्यूटर की अपनी एक अलग भाषा है। उसी में सभी तरह के संकेत, सूचनाएँ आदि उसमें भरे जाते हैं। कम्प्यूटर की तकनीकी भाषा में उन्हे क्रमशः आफ, आन, शून्य, एक या फिर द्विचर संख्या कहा जाता है। इन्हीं के द्वारा हीं भाषा को अंकों में बदल दिया जाता है इन्हें ‘बिट्स’ भी कहा गया है । ये बिट्स छ: होते हैं, जिन का प्रयोग करके ही किसी बात का अन्तिम परिणाम प्राप्त किया जाता है । इन सब की तकनीक सर्वथा भिन्न प्रकार की है।

आज सरकारी-गैरसरकारी प्रत्येक क्षेत्र में बड़े व्यापक स्तर पर कम्यूटर का प्रयोग किया जाने लगा है। प्रत्येक गणितीय हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, अनुभव, परीक्षण आदि योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने, उनकी परिणात का फलाफल जानने के लिए कम्यूटर का प्रयोग अनिवार्यत: किया जाने लगा है। इतना ही नहीं, सामान्य जमा-तफरीक. गुणा या भाग, यहाँ तक कि अन्तरिक्ष और मौसम-विज्ञान की भविष्यवाणियाँ भी इसी के माध्यम से की जाने लगी है चिकित्सा-प्रणालियों और ऑपरेशनों में भी इसकी सहायता ली जाती है । समाचारपत्रों के प्रकाशन और समूचे क्रियाकलापों का आधार तो कम्पूटर बन ही चुका है, पुस्तक-प्रकाशन व्यवसाय भी धीरे-धीरे सम्पूर्णत: इसी पर आश्रित होता जा रहा है ।

आज कई प्रकार के अनुसन्धान कार्य भी कम्यूटर से किए जा रहे हैं। टेलिफोन, बिजली-विभाग, बैंक आदि भी बिल बनाने तथा अन्य लेन-देन के कार्यो में इस का प्रयोग करने लगे हैं । इस प्रकार आज कम्यूटर-प्रयोग व्यापक होता जा रहा है । इसके साथ कई तरह के खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। मानव-मस्तिष्क का व्यर्थ और बेकार हो जाना पहला खतरा है। इसी तरह के और भी कई खतरे हैं । तो चाहे कुछ भी हो जाए, यह मशीनी मस्तिष्क वास्तविक मानव-मस्तिष्क जैसा तो कतई नहीं बन सकता ।

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धर्म और विज्ञान

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • धर्म और विज्ञान का पारस्परिक संबंध
  • दोनों में सामंज्यस
  • उपसंहार।

जीवन को सत्य का पालन करने का आधार, आदर्श व्यवहार के प्रति आस्था और विश्वास जैसे सात्विक एवं उदात गुणों को धारण करने की प्रेरणा एवं शक्ति जिससे प्राप्त हुआ करती है, उसे धर्म कहते हैं।

धर्म के विपरीत विज्ञान का मूल आधार भी विशेष प्रकार का ज्ञान ही हुआ करता है। विज्ञान भी मूल रूप से सत्य का अनवरत अन्वेषक होता है । लेकिन उस का आधार ठोस, नापे-तोले जा सकने वाले भौतिक पदार्थ हुआ करते हैं। वह धर्म की तरह अनैतिक आत्म तत्त्व का चिन्तक एवं विवेचक न होकर भौतिक तथ्यों का अन्वेषण किसी अन्य लोक में उद्धार पाने के लिए नहीं किया करता; बल्कि इस दृश्य और पंचभौतिक संसार की सुख-समृद्धि पाने के लिए ही किया करता है । धर्म और विज्ञान का प्रेरणा-स्रोत एक ही है ।

लक्षित उद्देश्य भी एक ही है और वह मानव-जीवन की सुख-समृद्धि की कामना और उस कामना को पूर्ण करने की चेष्टा। मानव-कल्याण की लक्ष्य-साधना एक समान दोनों में विद्यमान दोनों यानी धर्म और विज्ञान जब अपने मूल लक्ष्य की साधना की राह से भटक जाया करते हैं, तो स्वयं अपने लिए और पूरे जीवन-समाज के लिए तरह-तरह के व्यवधानों, संकटों, अपकृत्यों अैर अपरूपों की सृष्टि का कारण बन जाया करते हैं। इतना अन्तर अवश्य रहता है कि धर्म लक्ष्य से भ्रष्ट हो या अधर्म बनकर लोक-परलोक दोनों के नाश का कारण बन जाया करता है ; जबकि विज्ञान राह से भटक कर मुख्यत: भौतिक या इहलौकिक विनाश का कारण ही उपस्थित किया करता है ।

मानव-समाज की सर्वागीण उन्नात तभी हो सकती है जब धर्म और विज्ञान में सामंज्यस हो । जिस प्रकार अकेलाविज्ञान संसार को शांति नहीं ग्रदान कर सकता उसी प्रकार अकेला धर्म भी संसार को समृद्ध नहीं बना सकता । दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। आवश्यकता इस बात का है कि धर्म और विज्ञान – दोनों का एक-दूसरे पर अंकुश रहे ।

इससे स्पष्ट है कि यदि मानव विवेक से काम ले, अपने आचरण-व्यवहार से विवेक को हाथ से न निकलने दे, तो धर्म और विज्ञान दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

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शिक्षाऔर विज्ञान

रूपरेखा :

  • पस्तावना
  • पारस्परिक संबंध
  • लक्ष्य-हित साधन
  • उपसंहार ।

शिक्षा का चरम लक्ष्य मानव-जाति और समाज को हर प्रकार से विवेक सम्मत राह पर चलाना ही हुआ करता है। इस प्रकार विज्ञान का कार्य भी व्यक्ति और समाज के जीवन को विकास के नये-नये. आयाम प्रदान कर उसे एक सुखसुविधापूर्ण सन्तुलन प्रदान करना ही है । इसी प्रकार उसकी दृष्टि को व्यापक बनाना, मन-मस्तिष्क के बन्द पड़े या संकीर्ण द्वारों में खुलापन लाना भी विज्ञान का ही एक कार्य है ।

अब देखना यह है कि शिक्षा और विज्ञान में क्या कोई सीधा सम्बन्ध स्थापित भी किया जा सकता है ? इन प्रश्नों पर दो तरह से विचार करना सम्भव हो सकता है ।

पहली दृष्टि यानि कि समूची शिक्षा, उसके सभी विषयों को बाद में देकर केवल विज्ञान-सम्बन्धी शिक्षा को ही लागू किया जाए ; यह उचित प्रतीत नहीं होता । जीवन में कोमलता, कोमल पक्षों और स्नेह-सम्बन्धों से पले रिश्ते-नातों का महत्त्व समाप्त हो जाएगा । दूसरे केवल विज्ञान पढ़ एवं सीख लेने से जीवन का काम भी नहीं चल सकता । जीवन और उसके व्यवहारों-व्यापारों को चलाने के लिए अन्याय विषयों की शिक्षा एवं जानकारी उतनी ही आवश्यक है कि जितनी वैज्ञानिक विषयों की । सभी की शिक्षा को उचित एवं व्यावहारिक सन्तुलन देने से ही उसका अपना और जीवन का वास्तविक महत्त्व बना रहा सकता है।

अब दूसरी दृष्टि पर विचार करें । वह यह है कि समूची शिक्षा-पद्धति एवं पढ़ाए जाने विषयों को पढ़ाते समय वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि अपनायी जाए। हमारे अपने विचार में भी यह दृष्टि और धारणा उचित प्रतीत होती है। आज हम जिस युगजीवन में जी रहे हैं, उसमें वैज्ञानिक दृष्टि अपनाए बिना ठीक ढंग से जी पाना कतई संम्भव नहीं। ऐसा होने पर ही एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति स्वयं जीवन के जीवन्त सन्दर्भों के साथ जुड़ कर जीवन को उचित दृष्टि से देख सकेगा।

विज्ञान हो या शिक्षा, दोनों को सहयोगी बना कर या मान कर इन दोनों की सफलता-सार्थकता तभी प्रमाणित की जा सकती है, जब ये आत्यान्तिक तौर पर मानव-कल्याण करें। प्रोफेसर अल्बर्ट आइस्टीन का यह कथन यथार्थ है “हमारे इस जड़वादी युग में केवल जिज्ञासु वैज्ञानिक अन्वेषकों में ही गहरी धार्मिकता है।” कुछ इसी प्रकार की बात स्वामी विवेकानंद ने भी कही थी – ” आधुनिक विज्ञान सच्ची धार्मिक भावना का ही प्रकटीकरण है क्योंकि उसमें सत्य को सच्ची लगन से समझने की कोशिश है ।”

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राष्ट्र की प्रगति में विज्ञान की भूमिका
अथवा,
भारत में विज्ञान के बढ़ते चरण

रूपरेखा :

  • पस्तावना
  • अणुशक्ति
  • विशेष शक्ति
  • उपलब्धियाँ
  • उपसंहार ।

स्वतंग्रता-प्राप्ति से पहले तक आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में भारत की अपनी गति-दिशा शून्य थी। सूई से लेकर हवाई जहाज़, रेलवे इंजिन, यहाँ तक कि रेल के डिब्बे भी आयात किये जाते थे। उस आयात किए वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से ही इस देश का परिचय आधुनिक विज्ञान के साथ संभव हो पाया था। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद आज स्थिति यह है कि छोटे-बड़े प्रत्येक सामान, यंत्र, उपकरण आदि का निर्माण भारत में होने लगा है। इतना ही नहीं, आज भारत कई तरह की मशीनरी, यंत्रों एवं वैज्ञानिक उपकरणों का वैज्ञानिक तकनीक का भी आस-पास के अनेक छोटे-बड़े देशों को निर्यां भी करने लगा है।

सर्वप्रथम भारत में सन् 1948 में एक अणुशक्ति आयोग स्थापित किया गया । सन् 1955 ई० में पहले परमाणु रिएक्टर का निर्माण किया। बिजली का उत्पादन अणुर्शिक्ति से करने के लिए तारापुर परमाणु बिजली घर स्थापित किया। सन् 1974 में राजस्थान के पोखरण नामक स्थान पर प्रथम भूमिगत अणु-विस्फोट कर भारत ने सारे संसार को चकितविस्मित कर दिया । इसके बाद भारतीय विज्ञान ने उपग्रह-निर्माण एवं उड़ान क्षेत्र में प्रवेश किया । सन् 1975 में ‘आर्यभट्ट’ नामक उप्रह का प्रक्षेपण कर भारतीय विज्ञान ने संसार की आँखें खोल दीं। यह प्रमाणित कर दिया कि भारत इस क्षेत्र में भी निरन्तर आगे बढ़ते जाने की नीयत से कार्य कर रहा है। यह बात विशेष ध्यातव्य है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने परमाणु शक्ति अर्जित कर ली है।

अन्तरिक्ष-अनुसन्धान के वैज्ञानिक क्षेत्र में भी भारत आज एक विशेष शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया है। सन् 1975 में ‘आर्यभ््ट’ का और 1979 में ‘भास्कर’ का सफल प्षक्षेपण करने के बाद जब भारतीय रॉकेटों के माध्यम से ‘रोहिणी’ नामक उपग्रह कक्षा में स्थापित किया, तो विश्व ने एक बार फिर चौंक कर भारत की तरफ देखा। सन् 1984 में उपग्रह ‘रोहिणी डी-2’ छोड़ कर अपने अन्तरिक्ष-विज्ञान के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। इसके बाद एपल, भास्कर-द्वितीय, इस्सेट प्रथम-ए, इन्सेट प्रथम-बी, एस० एल० वी-2 तथा 3 , इस्सेट एफ-डी आदि अनेक उपग्रह अन्तरिक्ष में भेज चुका है और भी भेजने की कई तरह की योजनाओं पर भारतीय वैज्ञानिक नित नए प्रयत्न और प्रयोग कर रहे हैं। इस से भविष्य को परम उज्ज्वल कहा जा सकता है ।

बिजली, तार, दूर, संचार, टेलिविजन, सिनेमा और अब कम्प्यूटर आदि के निर्माण में भी भारत अन्य किसी देश से पीछे नहीं है । रेलवे इंजिन, डिब्बे, बस, ट्रक, कार सभी चीजों का निर्माण करके आज भारत अपनी हर प्रकार की आवश्यकताएँ पूरी कर रहा है । अन्य देशों से भी उसे ऐसी सब वस्तुओं के निर्माण के आर्डर लगातार प्राप्त होते रहते हैं । हर दिशा और क्षेत्र में भारत ने यथेष्ठ प्रगति और विकास किया है ।

यों भारत के पास अपनी प्राचीन परम्परागत वैज्ञानिक पद्धदियाँ भी अपने संस्कृत साहित्य में सुरक्षित हैं । लेकिन सखेद कहना पड़ता है कि आज भाषा की मारामारी के अभाव और विदेशी भाषा की मानसिकता बन जाने के कारण हम सब से लाभ उठा पाने की स्थिति में नहीं रह गए । जो हो, भारतीय वैज्ञानिकों ने आधुनिक विज्ञान और तकनीक के विकास में सी संसार को बहुत कुछ दिया और दे सकता है ।

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पेड़-पौधे और पर्यावरण

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • उपयोगिता
  • वन-कटाई के दुष्परिणाम
  • उपसंहार ।

पेड़-पौधे प्रकृति की सुकुमार, सुन्दर, सुखदायक सन्ताने मानी जा सकती हैं । इन के माध्यम से प्रकृति अपने अन्य पुत्रों, मनुष्यों तथा अन्य सभी तरह के जीवों पर अपनी ममता के खज़ाने न्योछावर कर अनन्त उपकार तो किया ही करते हैं। उनके सभी तरह के अभावों को भरने, दूर करने के अक्षय साधन भी हैं। पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ हमें फल-फूल, औषधियाँ, छाया एवं अनन्त विश्राम तो प्रदान किया ही करते हैं, वे उस प्राण-वायु (ऑक्सीजन) का अक्षय भण्डार भी हैं कि जिस के अभाव में किसी प्राणी का एक पल के लिए जीवित रह पाना भी नितान्त असंभव है।

पेड़-पौधे हमारी ईंधन की समस्या का भी समाधान करते हैं । उनके अपने आप झड़ कर इधर-उधर बिखर जाने वाले पत्ते घास-फूँस, हरियाली और अपनी छाया में अपने पनपने वाली नई वनस्पतियों को मुफ्त की खाद भी प्रदान किया करते हैं। उनमें हमें इमारती और फर्नीचर बनाने के लिए कई प्रकार की लकड़ी तो प्राप्त होती ही है, कागज आदि बनाने के लिए कच्ची सामग्री भी उपलब्ध हुआ करती है । इसी प्रकार पेड़-पौधे हमारे पर्यावरण के भी बहुत बड़े संरक्षक हैं। यों सूर्य-किरणें भी नदियों और सागर से जल-कणों का शोषण कर वर्षा का कारण बना करती हैं ; पर उस से भी अधिक यह कार्य पेड़-पौधे किया करते हैं। सभी जानते हैं कि पर्यावरण की सुरक्षा, हरियाली वर्षा का होना कितना आवश्यक हुआ करता है ।

पेड़-पौधे वर्षा का कारण बन कर के तो पर्यावरण की रक्षा करते ही हैं, इनमें कार्बन डाई-ऑक्साइड जैसी विषैली, स्वास्थ्य-विरोधी और घातक कही जाने वाली प्राकृतिक गैसों का चोषण और शोषण करने की भी बहुत अधिक शक्ति रहा करती है । स्पष्ट है कि ऐसा करने पर भी वे हमारी धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सहायता ही पहुँचाया करते हैं । पेड़-पौधे वर्षा के कारण होने वाली पहाड़ी चट्टानों के कारण, नदियों के तहों और माटी भरने से तलों की भी रक्षा करते हैं । आज नदियों का पानी जो उथला या कम गहरा होकर गन्दा तथा प्रदूषित होता जा रहा है, उसका एक बहुत बड़ा कारण उनके तटों, निकास-स्थलों और पहाड़ों पर से पेड़-पौधों की अन्धा-धुन्ध कटाई ही है । इस कारण जल स्रोत तो प्रदूषित हो ही रहे हैं, पर्यावरण भी प्रदूषित होकर जानलेवा बनता जा रहा है ।

धरती पर विनाश का यह ताण्डव कभी उपस्थित न होने पाए, इसी कारण प्राचीन भारत के वनों में आश्रम और तपोवनों, सुरक्षित अरण्यों की संस्कृति को बढ़ावा मिला। तब पेड़-पौधे उगाना भी एक प्रकार का सांस्कृतिक कार्य माना गया । सन्तान पालन की तरह उन का पोषण और रक्षा की जाती थी । इसके विपरीत आज हम, कांक्रीट के जंगल उगाने यानि बस्तियाँ बसाने, उद्योग-धन्धे लगाने के लिए पेड़-पौधौं को, आरक्षित वनों को अन्धा-धुन्ध काटते तो जाते हैं पर उन्हें उगाने, नए पेड़-पौधे लगा कर उन की रक्षा और संस्कृति करने की तरफ कतई कोई ध्यान नहीं दे रही ।

यदि हम चाहते हैं कि हमारी यह धरती, इस पर निवास करने वाला प्राणी जगत् बना रहे है, तो हमें पेड़-पौधों की रक्षा और उन के नव-रोपण आदि की ओर प्राथमिक स्तर पर ध्यान देना चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि धरती हरी- भरी रहे, नदियाँ अमृत जल-धारा बहाती रहें और सब से बढ़ कर मानवता की रक्ष संभव हो सके, तो हमें पेड़-पौधे उगाने, संवर्द्धित और संरक्षित करने चाहिए ; अन्य कोई उपाय नहीं ।

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वन-संरक्षण की आवश्यकता

रूपरेखा :

  • पस्तावना
  • पौराणिक महत्व
  • वर्तमान स्थिति
  • उठाए गए कदम
  • उपसंहार ।

प्राचीन भारतीय संस्कृति में वृक्षों को देवता के समान स्थान दिया गया था तथा देवताओं की भांति उनकी पूजा की जाती थी। वृक्षों के सूख-दुख का ध्यान रखा जाता था तथा उनके साथ आत्मीयता का संबंध रखा जाता था। मौसम के प्रकोप से उन्हें उसी प्रकार बचाया जाता था, जिस प्रकार माँ-बाप अपने बच्चे को बचाते हैं । इतना ही नहीं, 19 वीं तथा 20 वीं शताब्दी के मध्य वृक्ष काटना दण्डनीय अपराध था ।

मानव का जन्म, उस की सभ्यता-संस्कृति का विकास वनों में पल-पुसकर ही हुआ था । उस की खाद्य, आवास आदि सभी समस्याओं का समाधान करने वाले तो वन थे ही, उसकी रक्षा भी वन ही किया करते थे। वेदों, उपनिषदों की रचना तो वनों में हुई ही, आरण्यक जैसे ज्ञान-विज्ञान के भण्डार माने जाने वाले महान् ग्रन्थ भी अरण्यों यानि वनों में लिखे जाने के कारण ही ‘आरण्यक कहलाए। यहाँ तक कि संसार का आदि महाकाव्य माना जाने वाला, आदि महाकवि वाल्मीकि द्वारा रचा गया ‘रामायण’ नामक महाकाव्य भी एक तपोवन में ही लिखा गया।

आज जिस प्रकार की नवीन परिस्थितियाँ बन गई हैं, जिस तेज़ी से नए-नए कल-कारखानों, उद्योग-धन्धों की स्थापना हो रही है, नए-नए रसायन, गैसें, अणु, उद्जन, कोबॉल्ट आदि बम्बों का निर्माण और निरन्तर परीक्षण जारी है, जैविक शस्तास्त्र बनाए जा रहे हैं ; इन सभी ने धुएँ, गैसों और कचरे आदि के निरन्तर निसरण से मानव तो क्या सभी तरह के जीव-जन्तुओं का पर्यावरण अत्यधिक प्रदूषित हो गया है । केवल बम ही है, जो इस सारे विषैले और मारक प्रभाव से प्राणी जगत् की रक्षा कर सकते हैं। उन्हीं के रहते समय पर उचित मात्रा में वर्षा होकर धरती की हरियाली बनी रह सकती है ।

हमारी सिंचाई और पेय जल की समस्या का समाधान भी वन-संरक्षण से ही सम्भव हो सकता है। वन हैं तो नदियाँ भी अपने भीतर जल की अमृतधारा संजो कर प्रवाहित कर रही हैं। जिस दिन वन नहीं रह जाएँगे, सारे प्राणी-प्रजातियों, अनेक वनस्पतियाँ एवं अन्य खनिज तत्त्व अतीत की भूली-बिसरी कहानी बन चुके हैं, यदि आग की तरह ही निहित स्वार्थों की पूर्ति, अपनी शानो-शौकत दिखाने के लिए वनों का कटाव होता रहा, तो धीरे-धीरे अन्य सभी का भी सुनिश्चित अन्त हो जाएगा ।

वन-सरकक्षण जैसा महत्त्वपूर्ण कार्य वर्ष में वृक्षारोपण जैसे सप्ताह मना लेने से संभव नहीं हो सकता। इसके लिए वास्तव में आवश्यक योजनाएँ बनाकर कार्य करने की जरूरत है। वह भी एक-दो सप्ताह या मास-वर्ष भर नहीं ; बल्कि वर्षों तक सजग रहकर प्रयत् करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार बच्चे को मात्र जन्म देना ही काफी नहीं हुआ करता ; बल्कि उसके पालन-पोषण और देख-रेख की उचित व्यवस्था करना-व भी दो-चार वर्षों तक नहीं, बल्कि उसके पालन-पोषण और देख-रेख की उचित व्यवस्था करना-वह भी दो-चार वर्षों तक नहीं ; बल्कि उनके बालिग होने तक आवश्यक हुआ करती है ; उसी प्रकार की व्यवस्था, सतर्कता और सावधान वन उगाने, उनका संरक्षण करने के लिए भी किया जाना आवश्यक है । तभी धरती और उसके पर्यावरण की, जीवन एवं हरियाली की रक्षा संभव हो सकती है । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वृक्षों से हमारे देश की नैतिक, सामाजिक और आर्थिक समृद्धि भी होती है क्योंकि-

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर ।
परमारथ वे कारने साधुन धरा शरीर ।।

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महिला आरक्षण बिल्न

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • समाज में नारी-पुरुष की समानता
  • नारी की दुर्दशा
  • नारी की उपादेयता
  • बिल को मंजूरी
  • उपसंहार ।

हमारे देश में प्राचीनकाल से ही नारी को समाज में उच्च स्थान प्राप्त है। उस समय नारी के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा माना जाता था । हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी कहा गया है कि – जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ नारी का निरादर होता है, वहाँ तरह-तरह की परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। देश में विदेशी आक्रमणों के कारण नारी का रूप बदल गया, उसे चहारदीवारी में बन्द होना पड़ा। इस कारण उसे अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ा। लेकिन स्वतन्रता प्राप्ति के बाद फिर उसका पुराना समय लौटा। आज नारी का समाज में वही स्थान है जो पुरुष का है ।

भारतीय इतिहास नारियों के महान् कर्तव्यों, क्षमताओं तथा वीरता के कर्मों से भरा पड़ा है। नारी भारतीय समाज में हमेशा आदर व सम्मान का पात्र रही है । नारी ममता, प्रेम, वात्सल्य, पवित्रता तथा दया की मूर्ति है । उसने अनन्त कठिनाइयाँ सहते हुए परिवार तथा समाज एवं राष्ट्र की सेवा की है। दु:ख का विषय यह है कि समाज में नारी को अबला व बेचारी जैसे सम्बोधनों से पुकारा जाता है। उसकी इस हालत के लिये हमारा समाज जिम्मेदार है, जिसमें सामाजिक कुरीतियाँ और परम्परागत रूढ़िवादिता आज भी विद्यमान है ।

कुछ राजनीतिक दलों का तर्क है कि दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को विशेष आरक्षण दिया जाना चाहिये । ऐसा कहकर ये आरक्षण में भी आरक्षण की बात कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि महिला आरक्षण विधेयक के किसी भी स्वरूप पर आम सहमति नहीं हो पा रही है । सच्चाई तो यह है कि आम सहमति कायम करने के लिये अब तक कोई ठोस प्रयास भी नहीं किया गया। मार्च, 2003 के लोकसभा में किसी भी राजनीतिक दल ने इस बात के लिये प्रयास नहीं किया कि महिला आरक्षण विषय पर गम्भीर चर्चा हो सके।

ऐसा लगता है कि सभी को, यहाँ तक कि महिला आरक्षण विधेयक पेश करने वालों को भी इस बात का इंतजार था कि इस विधेयक को लेकर हंगामा हो और इसी बहाने विधेयक को आगे के लिये टाल दिया जाये । लेकिन काफी राजनीतिक उठा-पटक के बाद आखिरकार संसद के सन् 2010 के बसंतकालीन सत्र में महिला आरक्षण विधेयक को बहुमत से पारित कर दिया गया । निश्चय ही भारत के संसद में इसे क्रांतिकारी कदम के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि इसके पहले तक महिला-हित की बातें करने वाले नेता भी विधेयक पारित करने के नाम पर बगलें झांकने लगते थे ।

महिला विधेयक का प्रारित होना इस बात को दर्शाता है कि नारी के प्रति परम्परागत धारणाओं में भी काफी परिवर्तन आया है, फिर भी अभी तक स्थितियाँ ऐसी नहीं बन पाई हैं कि आज की नारी अपनी हर प्रकार की क्षमता का परिचय खुलकर दे सके ।

हमें यह भी न भूलना चाहिए कि अगर महिला आरक्षण विधेयक पारित करने का उद्देश्य केवल महिलाओं के सब्जबाग दिखाना है तो फिर इस विधेयक के पारित होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उल्लेखनीय है कि महिला आरक्षण विधेयक इस मान्यता पर आधारित है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित होने से देश की महिलाओं का कल्याण होगा। दुर्भाग्य से यह मान्यता सही नहीं है। इस सन्दर्भ में इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लिये आरक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद उनकी स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आ सका है, फिर भी महिला-आरक्षण बिल एक क्रांतिकारी कदम अवश्य है ।

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आतंकवाद और भारत
अथवा
आतंकवाद : एक चुनौती

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • आतंकवाद एक जटिल समस्या के रूप में
  • आतंकवाद से मुक्ति के लिये उचित कदम
  • उपसंहार ।

आतंकवाद का इतिहास सम्भवतः उतनी ही पुरानी है, जितना पुरानी हमारी सभ्यता का इतिहास है । पूँजीवादी, लोकतान्त्रिक और साम्यवादी शासन व्यवस्थाओं के उदय के पूर्व समाज में उन्हीं का वर्चस्व रहता था जो वास्तव में बाहुबली होते थे। ऐसे लोगों में अधिकांश स्वेच्छाचारी होते थे। उनकी सत्ता को चुनौती देने वाली कोई ताकत कहीं सिर उठाने का साहस न कर बैठे, इसलिये वे हमेशा आतंकवाद का सहारा लेते थे । दहशत और आतंक प्रसारित करने के लिये वे लोग समय-समय पर निरीह जनपदों में हत्या, अपहरण, लूटपाट, आगजनी और विनाश का भैरव राग अलापते रहते थे ।

19वीं शताब्दी के मध्य तक आतंकवाद को संरक्षण देने वाले अक्सर वे लोग होते थे, जिनके हाथों में सत्ता की नकेल होती थी, पर बीसवीं शताब्दी में आतंकवाद के केन्द्र में बदलाव दिखाई पड़ने लगा। बीसवीं शताब्दी में साम्प्दायिकता, जातीय वैमनस्य, क्षेत्रीयता और आर्थिक वैषम्य से उत्पन्न वर्ग-संघर्ष की भावना से बुरी तरह ग्रस्त, बिकी हुई निष्ठा वाले अपने ही देश के कुछ लोग आतंकवादी संस्थाओं का गठन कर अपने ही राष्ट्र को खंडित करने का प्रयास करने लगे।

विदेशी शासन से मुक्ति की कामना करने वाले राष्ट्र के देशभक्त नवयुवक भी आतंकवाद का प्रयोग एक कारगर हथियार के रूप में करते थे । यद्यपि सभ्य संसार द्वारा अभी तक आतंकवाद की कोई सर्वमान्य परिभाषा तैयार नहीं की गई है, पर मोटे तौर पर इसकी परिसीमा में सभी अवैधानिक और हिंसापरक गतिविधियाँ आती हैं।

भारत में आतंकवादी आन्दोलन की शुरुआत सन् 1965 ई० के बाद हुई है । पूर्वी पाकिस्तान के बंगलादेश में परिवर्तित हो जाने के बाद पाकिस्तान के मन में यह बात आ गई कि युद्धभूमि में भारत का कुछ बिगाड़ सकने में वह सक्षम नहीं है । यही कारण है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद का सहारा लिया ।

पूर्व प्रधानमन्न्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को पंजाब के आतंकवादी आन्दोलन के कारण अपनी जान गँवानी पड़ी । आतंकवादियों की दृष्टि में मानवता का कोई मूल्य नहीं है। आतंकवाद की आड़ में आज कई अपराधी-गिरोह सक्रिय होकर देश के लोगों की जान-माल को हानि पहुँचा रहे हैं । सरकारी शक्तियाँ अनेक प्रकार के प्रयास करके भी उन्हें काबू नहीं कर पायी हैं।

अभी भी देश के हर कोने में आतंकवाद का जाल फैला हुआ है, जिसके कारण अपहरण, हत्या और लूट-पाट आदि जैसी संगीन अपराध नित्य हुआ करते हैं । इस विषैली बेल का विनाश करना अति आवश्यक है। आतंकवादी संगठनों में जैशे-मुहम्मद, लश्करे-तोयबा और हिजबुल-मुज़ाहिदीन मुख्य रूप से सकिय हैं।।

कश्मीरी आतंकवाद का साहस इस सीमा तक बढ़ चुका है कि उसने प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ-यात्रा को तो बाधित करने का प्रयास किया ही है, वैष्गो देवी की यात्रा पर भी अपनी कुदृष्टि लगा रखी है । पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी की शह और सहायता से ही तस्करी, माफिया के जाने-माने लोग मुम्बई में विस्फोट करवाकर ढ़ाई-तीन सौ लोगों की जानें लेने के साथ-साथ करोड़ों की सम्पत्ति भी स्वाहा कर चुके हैं ।

उनके लिए राष्ट्रीयता एवं मानवता का कोई भी मूल्य एवं महत्व नहीं है । देश के महत्त्वपूर्ण स्थलों, यहाँ तक कि राजधानी में भी उनके द्वारा विस्फोट किए जाने और कराए जाने की योजनाएँ अक्सर सामने आती रहती हैं । यद्यपि कश्मीरी जनता को अब वास्तविकता समझ में आने लगी है । यह भी पता चल चुका है कि उन्हें स्वतंत्रता के सुनहरे सपने दिखाने के नाम पर आतंकवादी किस प्रकार उनकी रोटियों, बेटियों पर भी अपनी बदनीयती के दाँत गड़ाये हुए हैं ।

यद्यपि आतंकवाद कुछ दबता हुआ प्रतीत हो रहा है, पर यह अब समाप्त ही हो जायेगा, ऐसा कह पाना बहुत कठिन है । कारण स्पष्ट है कि इसकी आड़ में पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध अघोषित युद्ध जो छेड़ रखा है। अत: जब तक भारत भी उसके लिये युद्ध जैसा वातावरण पस्तुत नहीं करता, इसे खत्म कर पाने की कल्पना करना सपनों की दुनिया में रहने और अपने आप को धोखा देने जैसा ही है ।

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भारत के गौरव : स्वामी विवेकानन्द

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • जन्म
  • वंश-परिचय तथा शैक्षणिक जीवन
  • रामकृष्ण परमहंस देव का सान्निध्य
  • परिवाजक विवेकानन्द
  • शिकागो विश्वधर्म सभा में विवेकानन्द
  • साहित्य कृति
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- दंड-कमंडलु हाथ में लिए एक युवा सन्यासी भारत भ्रमण के लिए निकले हैं। उनका अभीष्ट है भारत की आत्मा के यथार्थ स्वरूप की खोज । पर यह कौन-सा भारतवर्ष देख रहे हैं ? कहाँ गया भारत का वह गौरवमय अतीत? किस अन्धकार के गर्त में डूब गया भारत का उज्ज्वल मानव प्रेम का आदर्श ? भारत में सर्वंर दारिद्रता, पराधीनता, अंधानुकरण प्रवृत्ति, दाससुलभ दुर्बलता और छूआछूत का कलंक देखकर युवा सन्यासी की आत्मा रो उठी। कौन है यह सन्यासी, जिसने दरिद्रे में ही नारायण (ईश्वर) के अस्तित्व का अनुभव किया ? कौन है यह महासाधक, जिसने देशवासियों को बताया – “भूलना मत, नीच, मूर्ख, दरिद्र, भंगी, चमार आदि तुम्हारे ही अपने भाई हैं ।”

जन्म, वंश-परिचय तथा शैक्षणिक जीवन :- उत्तर कलकत्ता के सिमलापाड़ा के विख्यात दत्त परिवार में सन् 1863 में विवेकानन्द का जन्म हुआ । पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के नामी एटर्नी थे। माता थीं धर्मम्राण भुवनेश्वरी देवी। विवेकानन्द का बचपन का नाम था वीरेश्वर । बालक वीरेश्वर शुरू से ही बहुत साहसी था। अत्यन्त मेधावी था वह। बड़ा होने पर ईश्वर चन्द्र विद्यासागर द्वारा प्रतिष्ठित मेट्रोपालीटन स्कूल में भर्ती हुआ। यहाँ उसका नाम था नरेन्द्रनाथ ।

प्रथम श्रेणी में प्रवेशिका (एन्ट्रेन्स) परीक्षा पास करके प्रेसीडेन्सी कॉलेज में दाखिल हुए। बाद में उसे छोड़कर जनरल एसेम्बली कॉलेज (स्कॉटिश चर्च कॉलेज) से एफ०ए० पास किया और दर्शनशास्त लेकर पढ़ने लगे थे। बड़े मधुर कंठ के अधिकारी थे तरुण नरेन्द्रनाथ । संगीत, खेलकूद, वाद-विवाद प्रतियोगिता और व्यायाम में बहुत रुचि थी उनकी।

रामकृष्ण परमहंस का सान्निध्य :- नरेन्द्रनाथ के घर के पास ही रहते थे सुरेन्द्रनाथ मिश्र । एक दिन रामकृष्ण परमहंस वहाँ आये । भजन गाने के लिए नरेन्द्रनाथ को बुलाया गया। प्रथम दर्शन में ही विस्मय विमुर्ध हो गये ठाकुर रामकृष्ण। नरेन्द्रनाथ भी अभिभूतत हुए परमहंस देव को देखकर । नरेन्द्रनाथ को दक्षिणेश्वर आने का आमंत्रण दिया ठाकुर ने । नरेन्द्रनाथ के मन में तब भगवान के विषय में तरह-तरह के प्रश्न उठ रहे थे और संशय भी जगा था। तभी ठाकुर रामकृष्ण के दिव्य सान्निध्य का लाभ हुआ ।

दक्षिणेशे्वर का आकर्षण तीव्र हो उठा उनके लिए । उसी समय उनके पिता की अकस्मात् मृत्यु हो गयी। घोर अर्थ-संकट में पड़ गये। दक्षिणेश्वर मन्दिर में माँ काली से अर्थ माँगने जाकर भी उन्होंने श्रद्धा और भक्ति की याचना की । नरेन्द्रनाथ तब आधे संन्यासी बन्नुके थे ।

परिव्राजक विवेकानन्द :- परमहंस देव का शिष्यत्व ग्रहण करके सन्यासी बन गये नरेन्द्रनाथ। नाम हुआ ‘विवेकानन्द’ । सन् 1886 में श्री रामकृष्ण परमहंस देव ने महम्पस्थान किया । भारत पर्यटन के लिए निकल पड़े परिव्राजक विवेकानन्द । हिमालय से कन्याकुमारी तक पूरे देश में घूमे। हिन्दू, मुसलमान, अछूत, दरिद्र, निरक्षर सबसे मिलकर निपीड़ित और पददलित लोगों की हृदय-पीड़ा को समझा । सोया भारत जाग उठा। भविष्य के भारत के स्वपद्रष्टा, विवेकानन्द ने देश वासियों को नवजीवन का जागरण मंत्र सुनाया।

शिकागो विश्वधर्म सभा में विवेकानन्द :- इसके बाद सन् 1893 का वह स्मरणीय दिन । अमेरिका के शिकागो शहर में विश्वधर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ । विवेकानन्द के पास भी इस सम्मेलन की खबर पहुँची। पर वे अनाहूत थे वहाँ । कुछ भक्तों और प्रशंसकों के विशेष अनुरोध से अमेरिका चल पड़े। उनका उद्देश्य था वेदान्त धर्म का प्रचार । भगवा वस्त्र और पगड़ी पहने सन्यासी के वेश में वे शिकागो जा पहुँचे । लेकिन सम्मेलन में भाग लेने की अनुमतिपत्र नहीं था उनके पास । अन्त में कुछ सहृदय अमेरिकावासियों की सहायता से केवल पाँच मिनट के लिए भाषण देने की अनुमति लेकर विवेकानन्द ने सम्मेलन में प्रवेश किया ।

इसके बाद बड़ी आत्मीयता से उन्होंने श्रोताओं को इस प्रकार सम्बोधन किया, ‘अमेरिकावासी भाइयों और बहनों इस सम्बोधन को सुनकर श्रोताओं ने करतल ध्वनि से अभिनंदित किया प्राच्य के इस संन्यासी को । उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘ईसाइयों को हिन्दू या बौद्ध बनने की आवश्यकता नहीं, हिन्दुओं और बौद्धों को भी ईसाई बनने की जरूरत नहीं ।……….. आध्यात्मिकता, पवित्रता और उदारता पर केवल किसी विशेष एक धर्म का एकाधिकार नहीं है ।

प्रत्येक धर्म की पताका पर लिखना पड़ेगा, युद्ध नहीं सहयोग, ध्वंस नहीं आत्मीयकरण, भेद-द्वंद नहीं सामञ्ञस्य और शान्ति।’ धर्मसभा में उन्होंने दृढ़ विश्वास के साथ भविष्य में संसार के लोगों के महामिलन की घोषणा की । सुनकर अभिभूत हो गये श्रोतागण। संसार भर में उनकी शोहरत फैल गयी और चारों और से उन पर प्रशंसा की वर्षा होने लगी । शिष्या के रूप में उन्हें मिस मागरिट नोकल मिलीं जो बाद में भारत की भूमि पर ‘भगिनी निवेदिता’ बनीं । सन् 1896 में विवेकानन्द भारत लौटे ।

साहित्य-कृति :-केवल कर्मक्षेत्र में ही नहीं, वैचारिक क्षेत्र में भी इनका अवदान महतवपूर्ण था। उनकी परिव्राजक’, ‘विचारणीय बातें’, प्राच्य और पाश्चात्य’, ‘वर्तमान भारत’ आदि रचनायें उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा उनके बहुत से लेख और विभिन्न समय में विभिन्न व्यक्तियों को लिखे अनेक पत्रों का संकलन भी प्रकाशित हुए हैं।

उपसंहार: :-आधुनिक भारत के भागीरथ थे स्वामी विवेकानन्द । दुर्बल और हीनता की ग्रन्थि से प्रस्त लोगों को मानव-जाति के कल्याण मंच में दीक्षित करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था। उन्होंने धर्मान्ध देशवासियों को स्पष्ट स्वर में कहा था, दरिद्र, निपीड़ित, आर्त्त मनुष्यों की सेवा ही ईश्वर-साधना है । असहाय मनुष्य ही हमारे भगवान हैं $P$ फिर, उन्होंने आदर्शहीन भारतीयों को स्मरण कराया था, ‘आज से पचास साल तक तुम्हारे उपास्य और कोई देवदेवी नहीं हैं, उपास्य है केवल जननी-जन्मभूमि यह भारतवर्ष ।’

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डॉ. अबुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम
(डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम)

रूपरेखा :

  • परिचय
  • कर्म ही पूजा है -जीवन का मूल-मंत्र
  • शिक्षा-दीक्षा
  • वैज्ञानिक रूप में कार्य
  • इसरो (ISRO) की स्थापना
  • एस.एल वी. के प्रबंधक के रूप में
  • भारत-रत्न की उपाधि से अलंकृत
  • राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना
  • उपसंहार ।

परिचय :- 25 जुलाई, 2002 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने वाले डॉ०ए.पी.जे अब्दुल कलाम भारत के बारहवें राष्ट्रपति थे। वे भारत के ऐसे प्रथम राष्ट्रपति थे, जो इस पद पर आने से पूर्व ही भारत-रत् से अलंकृत हो चुके थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रपति थे, जो जीवन-भर राजनीति से दूर रहकर देश के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन हुए थे ।

डॉ. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्तूबर, सन् 1931 में रामेश्वरम् (तमिलनाडु) में हुआ । उनका बचपन मातापिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रामेश्वरम् की मस्जिद गली स्थित अपने घर में ही बीता । उनके माता-पिता के विचार अत्यंत उच्च कोटि के थे तथा उनका परिवार मध्यमवर्गीय था । उनकी माता को लोग अन्नपूर्णा कहते थे, क्योंकि उनके यहाँ अतिथियों को उचित मान-सम्मान मिलता था। इनकी शिक्षा वहीं की एक प्रारंभिक पाठशाला में हुई।

‘कर्म ही पूजा है’ :- यह गुरुमंत्र कलाम को अपने पिता से विरासत में मिला था, जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों हेतु प्रात: चार बजे से ही अपनी दैनिकचर्या प्रारंभ करते थे । डॉ० कलाम ने अपनी आत्मकथा ‘विंग्स ऑफ फायर’ में लिखा है कि ”मुझे विरासत में पिता से ईमानदारी और आत्मानुशासन तथा माता से भलाई में विश्वास तथा गहरी उदारता मिली है । मैं अपनी सृजनशीलता का श्रेय बिना किसी झिझक के बचपन में मिली उनकी संगति को देता हूँ ।’

शिक्षा-दीक्षा :- हाई स्कूल की शिक्षा पूरी करते हुए कलाम ने पिता की इच्छा के अनुरूप विज्ञान विषय लेकर तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में प्रवेश लिया। छात्रावास में रहते हुए उन्होने अंग्रेजी साहित्य तथा भौतिक विज्ञान में विशेष रुचि दिखाई । बी. एस.सी. की डिग्री के बाद कलाम ने इंजीनियर बनने का मन बना लिया था । उस समय मद्रास (चेन्नई) स्थित मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी को दक्षिण भारत में तकनीकी शिक्षा का’मुकुट मणि’ माना जाता था। कॉलेज में प्रतिभा के बल पर प्रवेश तो मिला, कितु शुल्क के लिए उस समय एक हजार रुपए चाहिए थे जिसके लिए उनकी वहन जोहरा को अपने जेवर गिरवी रखने पड़े । इसी कारण कलाम साहब आज भी परिश्रमी तथा मितव्ययी हैं। इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में उन्होंने ‘विमानिकी इंजीनियरिंग’ को चुना । प्रो. श्री निवासन् की इच्छा पर केवल तीन दिन के अंदर उन्होंने एक प्रोजेक्ट बनाकर पूर्ण किया था।

वैज्ञानिक रूप में कार्य :- छात्र-जीवन से ही कलाम व्यस्त रहने के अभ्यस्त हो गए थे । इसी कारण सजने-संवरने का उनके पास न तो समय था और न ही ऐसे विचार थे । जब वे रक्षा प्रयोगशाला, डी.आर.डी.एल. हैदराबाद में निदेशक थे तो अपने एक कमरे के आवास से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित अपने कार्यालय पैदल ही जाते थे । साधारण कमीज़, खाकी हॉफ पेंट और चपल पहनकर वे मिसाईल संबंधी चर्चा करने किसी भी वैज्ञानिक के पास पहुँच जाते थे । एम.आई.टी. से शिक्षा ग्रहण कर कलाम एक प्रशिक्षु के रूप में एच. ए. एल बंगलौर (हिंदुस्तान एअरोनॉटिक्स लिमिटेड) पहुँचे । उनके अनुसार निपुणता तभी मिलती है जब हम व्यावहारिक धरातल पर कार्य सम्पन्न करते हैं ।

इसरो (ISRO) की स्थापना :- सन् 1958 में वे रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय (वायु) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर नियुक्त हुए । तीन वर्ष बाद बंगलौर में एअरोनॉटिकल डिवलेपमेंट इस्टेब्लिशमेंट (ए.डी.ई.) की स्थापना हुई और इनका इस प्रयोगशाला में तबादला हो गया । ए.डी.ई. में उन्हे तीन वर्ष के अंदर हॉॉवरक्राफ्ट’ विकसित करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया जिसे कलाम साहब की टीम ने समय से पहले ही पूरा कर दिया ।

इसी समय भारत में Indian Space Research Organisation (ISRO) (भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन) की स्थापना हुई । इस संगठन हेतु थुंबा में स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर बनाया गया । दिसम्बर, 1971 में डॉ. साराभाई के निधन के बाद प्रोफेसर सतीश धवन इसरो के अध्यक्ष बने तथा अंतरिक्ष अनुसंधान संबंधी अनेक इकाइयों को मिलाकर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र’ की स्थापना की गई । इस केंद्र के प्रथम निदेशक के रूप में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ० ब्रहाप्रकाश की नियुक्ति हुई।

एस. एल. वी. के प्रबंधक के रूप में :- प्रोफेसर धवन और डॉ० कलाम को उपग्रह प्रक्षेपण यान (सैटेलाइट लांच वीहिकल-एस.एल.वी.) विकसित करने संबंधी परियोजना के प्रबंधक के पद पर नियुक्त कर दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य एक मानक एस एल वी. प्रणाली का डिजाईन, विकास और संचालन करना था । डॉ. कलाम के नेतृत्व में तैयार एस एल वी- 3 की प्रथम परीक्षण उड़ान 10 अगस्त, 1979 को थी ।

तेईस मीटर लंबा तथा सत्रह टन वजन वाला SLV-रॉंकेट उस दिन प्रात: 7 बज़कर 58 मिनट पर प्रमोचित (लांच) किया गया । नियंत्रण-व्यवस्था में खराबी आने के कारण यह नियत मार्ग से भटक कर बंगाल की खाड़ी में गिर गया । दूसरा परीक्षण 18 जुलाई, 1980 को प्रात: 8.03 बजे श्रीहरिकोटा के थार केंद्र से प्रमोचित भारत का एस. एल वी- 3 रॉकेट ‘रोहिणी उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने में सफल हुआ ।

संपूर्ण राष्ट्र ने भारतीय वैज्ञानिक की सफलता पर गर्व महसूस किया तथा भारत ‘विश्व अन्तरिक्ष क्लब’ का सम्मानित सदस्य बन गया ।

भारत-रत्न की उपाधि से अलंकृत :- डॉ० कलाम की यात्रा जारी रही तथा भारत सरकार ने सन् 1998 में उन्हें राष्ट्र के सर्वोच्च नागरिक अलंकर ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित किया । डॉ० कलाम को भारत सरकार ने सन् 1981 में पद्मभूषण, सन् 1990 में पद्मविभूषण और सन् 1998 में ‘भारत रत’ से सम्मानित किया। अनेक विश्वविद्यालय रॉकेट तथा मिसाइल कार्यक्रम की सफलता हेतु उन्हे ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ तथा अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित कर चुके हैं।

उपसंहार :- डॉ० कलाम ऐसे आदर्श हैं जो युवा पीढ़ी के मस्तिष्क में राष्ट्र निर्माण की चिंगारी पैदा करने हेतु आतुर हैं । उनके अनुसार उच्च स्तर का चिंतन करो फिर उसकी पूर्ति हेतु कठिन परिश्रम करो । वे अपने वेतन का कुछ हिस्सा सामाजिक संस्थाओं को भी देते हैं । उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं – अग्नि की उड़ान, तेजस्वी मन, Wing of Fire, India 2020-A vision for the new millennium आदि । डों० कलाम यह मानते हैं कि जो हो रहा है अच्छे के लिए हो रहा है जो होगा वह भी अच्छा होगा । यही उनके जीवन दर्शन का आधार है ।

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जीवन में स्वच्छता का महत्व्व

कुछ साल पहले इण्टरनेशनल हाइजीन काउंसिल ने अपने एक सर्वे में कहा था कि औसत भारतीय घर बेहद गंदे और अस्वास्थ्यकर होते हैं । उसके द्वारा जारी गन्दे देशों की सूची में पहला स्थान मलेशिया और दूसरा स्थान भारत को मिला था । हद तो तब हो गई जब हमारे ही देश के एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने यहाँ तक कह दिया कि यदि गंदगी के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाता तो वह निश्चित तौर पर भारत को ही मिलता । यह कितने शर्म की बात है कि पूरी दुनिया में भारत की छवि एक गंदे देश के रूप में है।

इस बात के उल्लेख से यह साफ पता चल जाता है कि स्वच्छता के मामले में हम कितने लापरवाह हैं। स्वच्छता का मतलब केवल शारीरिक या पोशाक की स्वच्छता से नहीं है । स्वच्छता का संबंध जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से है। आज पर्यावरण की समस्या हमारी स्वच्छता के प्रति लापरवाही से ही है । गंदगी के कारण हर प्रकार का प्रदूषण होता है । चाहे घर हो, सड़क हो, पिकनिक स्थल हो, स्टेशन हो, बस स्टैण्ड हो, स्कूल-कॉलेज हो चारों और गंदगी का अंबार नज़र आता है ।

स्वच्छता की शिक्षा यदि हम घर से ही शुरू करें तो बच्चे जीवन में स्वच्छता के महत्व को अच्छी तरह समझ पाएंगे। अस्वच्छता या गंदगी के कारण अनेक प्रकार की बीमारियाँ भी फैलती हैं । यही कारण है कि भारत में निजी अस्पताल तथा औषधालयों के धंधे खूब फल-फूल रहे हैं। स्वच्छता के महत्व का अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि यह कहा भी गया है – “एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है”।

साफ-सफाई को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बहुत गंभीर हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए2 अक्टूबर 2014 को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की । उनकी इच्छा स्वच्छ भारत अभियान को एक जन आंदोलन बनाकर देशवासियों को इससे जोड़ने की है । उन्होंने भारत की जनता से अपील की –

‘गाँधी जी ने आज़ादी से पहले नारा दिया था – ‘क्विट इण्डिया, क्लीन इण्डिया’, आजादी की लड़ाई में साथ देकर देशवासियों ने ‘क्विट इण्डिया’ के सपने को तो साकार कर दिया, लेकिन अभी उनका ‘क्लीन इण्डिया’ का सपना अधूरा ही है।”

प्रधानमंत्री जी ने पाँच साल में देश को साफ-सुथरा बनाने के लिए लोगों को शपथ दिलाई कि न मैं गंदगी करूँगा और न ही गन्दगी करने दुँगा । उन्होंने यह भी कहा कि “स्वच्छता का दायित्व सिर्फ सफाई-कर्मियों का नहीं, सभी 125 करोड़ भारतीयों का है ।”

इन सारी बातों का असर अभी भी आंशिक रूप से ही दिख रहा है तथा ये बातें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि इतने प्रयास के बावजूद हम भारतीय साफ-सफाई के मामले में आज भी पिछड़े हुए क्यों है ? हम जीवन में स्वच्छता के महत्व को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं ?

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वर्तमान भारत की समस्याएँ

रुपरेखा : पूर्व समस्याओं का विकराल रूप – बढ़ती जनसंख्या – आर्थिक समस्या – राजनीतिक समस्या – सामाजिक समस्याएँ – उपसंहार।

पूर्व समस्याओं का विकराल रूप : वर्तमान भारत की समस्याएँ उसकी पूर्व समस्याओं का विकराल रूप हैं और समाधान की दिशा में उठाए गए विवेकहीन और असंगत उपायों का दुष्परिणाम है । स्वार्थ और दलहित से प्रेरित आत्मघाती दृष्टिकोण का अभिशाप है। आर्थिक समस्याएँ राष्ट्र की समृद्धि के मार्ग में बाधक बनी हुई हैं। सामाजिक समस्याओं ने समाज का जीना मुश्किल कर रखा है। उग्रवाद, आतंकवाद और साम्पदायिकता भारत में नागरिकों से जीवन जीने का अधिकार छीन रही है । उद्योगों के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता और स्वराज्य को विदेशी सहयोग की बैसाखी की जरूरत पड़ गई है । जनसंख्या का प्रतिदिन बढ़ना देश की समस्या बनती जा रही है।

बढ़ती जनसंख्या : बढ़ती जनसंख्या भारत की पमुख समस्या है। इसने देश के विकास कार्यो को बौना, जीवनयापन को अत्यन्त कठिन तथा जीवन-शैली को अस्तव्यस्त और कुरूप बना दिया है। इसका परिणाम है, आज भारत की ६० प्रतिशत जनता गरीबी की सीमा-रेखा से नीचे जीवनयाएन करने को विवश हो चुके है। वह भूखे पेट को शांत करने के लिए असामाजिक कार्य करने लगे है। भारत के उद्योगों को आत्मनिर्भर बनाने, अपने पैरों पर खड़ा करने की भी समस्या है। कारण, विदेशी पूँजी और टेक्नीक भारतीय उद्योग को परतन्नतता के लौह-पाश में जकड़ती जा रही हैं। आज विदेशी पूँजी और तकनीकी ने भारत में विदेशी बहुउद्देशीय कंपनियों का साम्राज्य स्थापित कर दिया है। भारत का कुटीर-उद्योग और लघु-उद्योग मर रहे हैं और औद्योगिक समूहों की आर्थिक स्थिति डगमगा रही है।

आर्थिक समस्या : आर्थिक समस्या आज प्रजा को अधिक परेशानी दे रही है। महँगाई हर दिन बढ़ रही है, जिसने मध्यवर्ग का जीना दुभर कर रखा है। देश का धनीवर्ग विदेशों में अपना धन रखकर भारत की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने पर लगा हुआ है। बड़े-बड़े आर्थिक घोटालों ने देश की अर्थ-नींव को हिला दिया है। काले धन के वर्चस्व ने देश की प्रतिष्ठा को ही काला कर रखा है ।सर कारी क्षेत्र के उद्योग निरतंतर करोड़ों रुपए का घाटा देकर आर्थिक स्थिति को जटिल बनाने पर तुले हैं। दूसरी ओर भारत की ६० प्रतिशत जनता गरीबी की सीमा-रेखा से नीचे जीवन जीने को विवश हो चुके है।

राजनीतिक समस्या : राजनीतिक समस्याओं ने देश के चित्र और चरित्र पर सवाल उठा दिया है। अपराधियों के राजनीतिकरण ने देश में ‘ ररित्र’ की व्याख्या ही बदल दी है। संविधान में जाति, सम्पदाय, वर्ग-विशेष, प्रांत-विशेष के विशिष्ट अधिकार तथा संरक्षणवाद ने बिभाजन और विभेद का राक्षस खड़ा कर रखा है। नेतागण लोकतंत्र की दुहाई देते पर कार्य किसी तानाशाह से कम का नहीं करते। भ्रष्ट और देश-द्रोही तत्त्व राजनीतिक आँचल में सुरक्षा पा रहे हैं। इसीलिए आज देश में राजनितिक समस्या का कोई समाधान नहीं निकल रहा है। आम जनता किस राजनितिक दल पर यकीन करें वे उन्हें समझ नहीं आ रहा।

सामाजिक समस्याएँ : आज देश में अनेक सामाजिक समस्याएँ भी बढ़ती जा रही हैं दहेज ने विवाह पूर्व और विवाहोपरांत जीवन में केंसर पैदा कर दिया है। ऊँच-नीच के भेद-भाव ने समस्त समाज को ही दुर्बल बना दिया है। नारी के शोषण, उत्पीडन और बलात्कार ने देश को लांछित कर दिया है। समाज से अपनत्व की भावना समाप्त होती जा रही है। पुत्र में बैयक्तिक सुखोप-भोग की वृत्ति बढ रही है ; इसलिए वह माता-पिता से विद्रोह पर उतर आया है। व्यक्तिगत अहं ने पारिवारिक जीवन को नष्ट कर दिया है। समाज में संवेदना ही समस्या बन गई है। आज का युवक मादक पदार्थों के सेवन में आत्मविस्तृत हो रहा है। वह अपने शरीर पर अत्याचार कर रहे है। युवा पीढ़ी को इस आत्महत्या से बचाने की समस्या विराद् और विनाशकारी की और ढकेल रही है। युवा पीढ़ी की यह बरबादी राष्ट्र को ही तबाह करने पर तुली है।

उपसंहार : आज भारत अनेक समस्याओं का घर बन गया है। वह समस्याओं से आहत है, पीड़ति है और घिरा हुआ है। इनका कारन है, समस्या की सही पहचान न होना और उस पर पकड़ न होना तथा सत्ता-पक्ष और राजनीतिजों की गलत इरादे । आज भारत में समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है यही कारन है आज देश के नागरिक अपने ही देश में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे। हर रोज एक नयी समस्या उनके दरवाजे पे आ कर खड़ी हो जाती है। जो उनको दुर्बल बनाई जा रही है।

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मेरे जीवन का स्मरणीय क्षण या घटना

पिछले वर्ष हर वर्ष की भाँति हमारे विद्यालय में बाल दिवस का समारोह धूम-धाम से मनाया गया। इस अवसर पर विद्यालय में एक चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था । यह जिला स्तर की प्रतियोगिता थी। इसमें जिले भर के विभिन्न छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया था । मैंने भी प्रतिभागियों में अपना नाम लिखवाया था।

दोपहर के 3 बजे प्रतियोगिता आरंभ हुई । लगभग पचास प्रतियोगी थे । हमें प्रधानाचार्य महोदय ने कोई प्राकृतिक दृश्य बनाने के लिए कहा । डेढ़ घंटे की समय निश्चित की गई थी । सभी प्रतियोगियों को कागज, ब्रुश और रंग दिए गए । सभी ध्यान से अपने-अपने चित्र बनाने में जुट गए । मैंने सूर्योदयकालीन दृश्य का चित्रण करना आरंभ किया । मैने उसमें बाल अरुण, पत्ती, आसमान, सुनहरे बादल, झील, पेड़ आदि दिखाए। इधर चित्र बना तो उधर समय भी व्यतीत हो चुका था। निर्धारित समय पर सभी प्रतिभागियों ने अध्यापक महोदय को अपने-अपने चित्र सौंप दिए।

अब परिणाम की बारी थी । विभिन्न विद्यालयों के तीन कला शिक्षकों की एक जूरी बैठी थी । लगभग एक घंटे बाद जूरी ने अपना निर्णय सुनाया । मुझे चित्रकला में प्रथम पुरस्कार मिला । अपने नाम की घोषणा सुनकर मैं फूला न समा रहा था। पिताजी ने मुझे हदय से लगा लिया । प्राचार्य महोदय ने मुझे शाबाशी दी। अध्यापकों ने मेरी पीठ थपथपाई । यह मेरे जीवन का एक यादगार क्षण बन गया ।

मेरी सफलता पर विद्यालय के सभी शिक्षक एवं छात्र गर्व का अनुभव कर रहे थे । जिले भर की प्रतियोगिता में प्रथम आना मेरे लिए भी गर्व की बात थी। मेरे अभिभावक भी बहुत खुश हो रहे थे । उन्हें मेरी योग्यता पर अब किसी प्रकार का संदेह नहीं रह गया था। संध्याकाल में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए । जिले के डी. एम. को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था । उनके सम्मान में लाल कालीन बिछाई गई थी। सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य, संगीत, एकांकी, कविता पाठ, चुटकुले आदि प्रस्तुत किए गए । मैंने एकांकी ‘अशोक का शस्त्र त्याग’ में सम्राट अशोक की भूमिका निभाई थी। मेरे अभिनय की भी सराहना हुई । मंच के सामने बैठे अतिथि महोदय, शिक्षक, छात्र एवं अभिभावक कार्यक्रम का भरपूर आनंद उठा रहे थे ।

समारोह की समाप्ति पर प्राचार्य महोदय तथा अतिथि महोदय का अभिभाषण हुआ । फिर पुरस्कारों की घोषणा की गई। सम्नाट अशोक के जानदार अभिनय के लिए पुरस्कार सूची में मेरा नाम भी पढ़ा गया। मेरी खुशी दुगुनी हो गई ।

डी. एम. साहब ने मुझे पहले चित्रकला प्रतियोगिता का मैडल प्रदान किया, फिर अभिनय के लिए पुरस्कार दिया। पुरस्कार स्वरूप मुझे मैडल, प्रशस्तिपत्र और नेहरू जी की मूर्ति मिली । विद्यालय की ओर से मुझे पाँच सौ रुपये का नकद पुरस्कार भी मिला । मुख्य अतिथि ने मेरी सराहना की । उन्होंने मुझे जीवन में इसी तरह सफल होने तथा आगे बढ़ते रहने का आशीर्वाद दिया । प्राचार्य महोदय ने भी मंच से मेरी प्रशंसा में कुछ वाक्य कहे ।

उस दिन का प्रत्येक क्षण मेरे जीवन का सबसे यादगार क्षण था । मैं उस दिन को याद करता हूँ तो मुझे चित्रकला और अभिनय के क्षेत्र में और भी अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है । मैं चाहता हूँ कि लोग अच्छे कार्यों के लिए मुझे याद करें। मेरा मानना है कि चित्रकला, अभिनय, खेल-कूद भ्रमण आदि शिक्षा के ही अंग हैं । छात्र की जिस क्षेत्र मे प्रतिभा हो, उसी में उसे ध्यान लगाना चाहिए । उसे हर काम उत्साह से करना चाहिए। ऐसा करने पर ही जीवन में कई यादगार क्षण आ सकते हैं।

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उन्नत समाज-निर्माण में समाचार पत्र की भूमिका

मीडिया अर्थात् जनसंचार के माध्यम (रेडियो, टेलिविजन, समाचार-पत्र इत्यादि) किसी भी समाज अथवा राष्ट्र की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रतिबिम्ब होते हैं।

जनसंचार के सभी माध्यमों में समाचार-पत्र समाज निर्माण में अपेक्षाकृत अधिक सशक्त भूमिका का निर्वहन करते हैं। समाचार-पत्रों का प्रचलन आरम्भ होने के बाद से ही वे मानव के दृष्टिकोण एवं विचारों को प्रभावित करते रहे हैं ।

विभिन्न देशों में सम्पन्न होने वाली सामाजिक एवं राजनीतिक क्रांतियों में समाचार-पत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है । समाचार-पत्रों की इसी महत्वपूर्ण एवं सशक्त भूमिका को दृष्टिगत रखते हुए इसे “लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ” का अलंकरण प्रदान किया गया है।

समाचार-पत्रों के प्रचलन के समय से लेकर वर्तमान समय तक परिस्थितियों में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है और आज समाचार-पत्रों की जन-साधारण तक पहुंच सरल हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप समाचार-पत्र समाज के प्रत्येक वर्ग की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने हेतु सक्षम हो गए हैं।

आज समाचार-पत्र हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बन गए हैं। आधुनिक समाचार-पत्रों द्वारा सरकारों के निर्माण एवं विघटन, विविध विषयों पर जनमत का निर्माण करने तथा पाठकों की मनोस्थिति को प्रभावित करने जैसी व्यापक भूमिकाओं का निर्वहन कर रहे हैं।

समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं में सामाजिक जीवन के समस्त पक्ष सम्मिलित होते हैं, जैसे: स्थानीय समाचार, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार, खेल स्पर्द्धाएं, व्यापार एवं अर्थशास्त्र, फैशन शो, बच्चों एवं युवाओं पर लेख, शिक्षा एवं रोजगार के अवसर, सिनेमा इत्यादि ।

इसके अतिरिक्त समाचार-पत्र देश की राजनीतिक गतिविधियों के संचालन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समाचार-पत्र सरकार एवं साधारण जनता के मध्य एक पुल का कार्य करते हैं। वे जनता की अपेक्षाएं सरकार तक तथा सरकार की बात एवं नीतियों इत्यादि को जनता तक पहुंचाते हैं। इस प्रकार वर्तमान समय में समाचार-पत्रों ने लोकतंत्र के एक सजग प्रहरी का स्थान ग्रहण कर लिया है ।

भारत के स्वाधीनता संघर्ष में भी समाचार-पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन् किया । भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय सहित अन्य समाज सुधारकों ने भी अपने धार्मिक एवं सामाजिक सुधार कार्यक्रमों को विस्तार प्रदान करने तथा उन्हें जन-जन तक पहुंचाने हेतु समाचार-पत्रों का ही सहारा लिया । इनके माध्यम से ही देशभक्ति की भावना का संचार अखिल भारतीय स्तर पर हुआ, जिसके कारण देशभक्तों ने स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए हंसते-हंसते कुर्बानी दे दी ।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (मराठा, केसरी), सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (बंगाली), भारतेंदु हरिश्वंद्र (संवाद कौमुदी), लाला लाजपत राय (न्यू इंडिया), अरविंद घोष (वंदे मातरम), महात्मा गांधी (यंग इंडिया, इण्डियन ओपीनियन हरिजन), आदि महान नेताओं एवं राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के संचालकों ने विभिन्न भाषाई समाचार-पत्रों के माध्यम से बिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों एवं कार्यों को उजागर करके जन-सामान्य तक पहुंचाया।

इन समाचार-पत्रों से संपूर्ण विश्च में अत्याचारपूर्ण ब्रिटिश शासन का प्रचार होता था । समाचार-पत्रों की इस बहुआयामी भूमिका के कारण ही ब्रिटिश शासन द्वारा प्रेस पर कठोर प्रतिबंध आरोपित किये गये तथा समाचार-पत्रों एवं उनके संचालकों को अराजक घोषित कर दिया गया ।

कितु समाचार-पत्रों द्वारा उत्पन्न किये गये जन-उभार ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने में बहुमूल्य योगदान दिया । समाचार-पत्र एक ओर जहां देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थितियों एवं गतिविधियों की जानकारी प्रदान करते हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों से भी जन-साधारण को अवगत कराते हैं ।

समाचार-पत्रों के अभाव में लोकतंत्र सर्वथा अकल्पनीय है । समाचार-पत्रों को जनता की तीसरी आंख भी कहा जाता है । समय एवं स्थितियों में परिवर्तन करने के साथ-साथ समाचार-पत्रों के कार्यक्षेत्र का दायरा भी अत्यधिक बढद गया है

एक सभ्य समाज में उनकी भूमिका बहु-आयामी है तथा वर्तमान समय में राजनीति के अपराधीकरण एवं भ्रष्टाचार के वातावरण में समाचार-पत्रों के उत्तरदायित्वों में अत्यधिक वृद्धि हुई है । भष्टारार में संलिप्त नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों का पर्दाफाश करने तथा असामाजिक तत्वों को सजा दिलाने में वे अपनी भूमिका का आदर्श निर्वहन् करते हैं।

समाचार-पत्रों द्वारा अपने विश्लेषणों के माध्यम से व्यापक स्तर पर जनमत तैयार किया जाता है। वर्तमान समय में साधारण जनता कार्यपालिका तथा/अथवा व्यवस्थापिका से अधिक विश्वास समाचार-पत्रो एवं न्यायपालिका पर करती है।

एक शक्तिशाली समाज के निर्माण में समाचार-पत्र अपना अमूल्य योगदान देते हैं । साथ ही वे इस तथ्य का भी सदैव ध्यान रखते हैं कि उनके द्वारा दी गई सूचनाओं से राष्ट्र की अस्मिता एवं अखण्डता पर कोई आंच न आए।

तथ्यों एवं सत्य को पूर्ण रूप से जनता के समक्ष रखने के लिए समाचार-पत्रों को पर्याप्त स्वतंग्रता की आवश्यकता होती है और यह स्वतंत्रता उन्हें संविधान द्वारा अनुच्छेद-19(1) (क) के माध्यम से प्रदान की गई है

कहा जाता है कि कलम की ताकत तलवार से अधिक होती है, जो कि सत्य भी है क्योंकि तलवार के वार से तो मात्र एक ही व्यक्ति घायल होता है कितु कलम द्वारा लिखे गए एक कटु वाक्य मात्र से ही लाखों-करोड़ों लोगों के हुदय घायल हो सकते हैं। कलम की अपरिमित शक्ति के कारण ही प्रसिद्ध तानाशाह नेपोलियन बोनापार्ट शत्रु से अधिक विरोधी समाचार-पत्रों से डरता था।

समाचार-पत्र जन-मानस को एक ऐसी निष्यक्ष दृष्टि प्रदान करते हैं, जिससे जनता स्वयं सत्य एवं असत्य, सही और गलत में भेद कर सके । मीडिया के लिए सभी राजनीतिक दल एवं नेतागण एक समान होते हैं, आदर्श पत्रकारिता के भीतर पक्षपात के लिए कोई स्थान नहीं है।

समाचार-पत्रों के अभाव में स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती । सरकार द्वारा बनाई जाने वाली लोक कल्याणकारी योजनाओं एवं नीतियों को जनता तक पहुंचाने का कार्य समाचार-पत्रों द्वारा ही किया जाता है। विश्व की कोई भी क्रांति एवं आंदोलन समाचार-पत्रों के सहयोग के बिना नहीं हो सका है ।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समाज के अभाव में मनुष्य का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है । समाचार-पत्रों से हमारा समाज व्यापक रूप से प्रभावित होता है। अत: यह ठीक ही कहा गया है कि, “यदि किसी समय के समाज की स्थिति जाननी हो तो उस समय के समाचार-पत्रों को देखो।”

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 3 जाँच अभी जारी है

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions सहायक पाठ Chapter 3 जाँच अभी जारी है to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Chapter 3 Question Answer – जाँच अभी जारी है

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: जाँच अभी जारी हैं कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 2 : ‘जाँच अभी जारी है’ कहानी के उदेश्य को लिखें।
अथवा
प्रश्न 3 : ‘जाँच अभी जारी है’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करें।
अथवा
प्रश्न 4 : ‘जाँच अभी जारी है’ कहानी में उठाई गई समस्या पर अपने विचार व्यक्त करें।
अथवा
प्रश्न 5 : ‘जाँच अभी जारी है’ पाठ के आधार पर बताइए कि समाज को किस प्रकार पृणित रूप दिया ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘जाच अभी जारी है’ – कहानी की लेखिका हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध कहानीकार ममता कालिया हैं। इस कहानी में उन्होंने बैंक में कार्यरत अर्पणा के संघर्ष के बारे में लिखा है कि किस प्रकार एक ईमानदार, लगन से काम करने वाली तथा परिश्रमी युवती को इसके बदले में क्या पुरस्कार मिलता है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 3 जाँच अभी जारी है

अर्पणा को एक दिन आश्चर्य होता है कि उसके बैंक के मैनेजर खन्ना साहब ने अपने बेटे के जन्मदिन के बहाने उसे पार्टी में बुलाया जो कि बैंक में ही रखी गयी ची। उसे आश्चर्य हुआ कि वहाँ खुले आम निस्की की बोतल भी रखी गई थी। वह पार्टो से लौट गई। राष्ट्रीयकृत बैंकों के कार्यालयों का यह इस्तेमाल अर्पणा के लिए एक धक्का था।

एक बार अर्पणा ने माता-पिता के साथ कुल्तू-मनाली घूमने के लिए छुट्दियाँ ली। लैकिन पिता की तबौयत अचानक बिगड़ जाने से सारी छुट्टी इसी बीमारी में निकल गई। अर्पणा ने अपने अधिकारी को इस बात की सूचना भी दे दी थी।

दस दिनों के बाद बैंक जाने पर उसे आश्चर्य हुआ कि क्षेत्रीय कार्यालय से उसके नाम एक पत्र आया था जिसमें लिखा था-
“आपने एल. टी. सी. का झूठा बिल पेश कर बैंक के साथ धोखाधड़ी और धन के दुरुपयोग की चेष्टा की है। इस संबंध में अपना स्पष्टीकरण तत्काल दें अन्यथा आपके विरद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने को हम बाध्य होंगे।” वह समझ गई कि यह सारा खत्रा साहब का ही किया-कराया है।

उसके बाद क्षेत्रीय कार्यालय में जो चक्कर शुरू किया तो उसका अंत ही होने में न आता था। बैंक के सहकर्मो भी उससे कन्री काटने लगे। यहाँ तक कि बैंक का चपरासी भी उसकी उपेक्षा करने लगा। जाँच के दौरान भी उससे ऐसे-ऐसे सवाल पूछेछे जाते जो उसे कई-कई दिनों तक विचलित कर जाते। लम्बे समय बीत जाने के बावजूद भी उसकी जाँच की आग उण्डी नहीं हुई । उसे लगता था कि न जाने कब उसे इस जाँच से छुटकारा मिलेगा।

इस प्रकार इस कहानी में इस समस्या को उठाया गया है कि आज भी महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र में कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। तरह-तरह से उनके शोषण का प्रयास किया जाता है। जिन अधिकारियों को कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना का दायित्व सौंपा गया है वही उनका शोषण करते हैं।

जाँच पूरा न होने से कहानी का अंत भी अधूरा ही रह जाता है। इस प्रकार इस कहानी का शीर्षक ‘जाँच अभी जारी है’ – बिल्कुल उपयुक्त एवं सार्थक है।

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प्रश्न 6.
शाम को अपर्पा मिस्टर सिन्हा के जाल में कैसे फँस गई ?’ स्यष्ट करते हुए मिस्टर सिन्हा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर :
एक दिन अपर्णा बैक में काम कर रही थी कि मिस्टर सिन्हा ने उससे शाम में बैक में थोड़ी देर रूकने का आग्रह किया। कारण पूछने पर मिस्टर सिन्हा ने उससे यह कहा कि “मेरे बेटे का जन्मदिन है आज …. मेरा बेटा अपनी अम्मी के साथ बनारस गया हुआ है। सुबह से ही उसकी बड़ी याद आ रही थी, इसलिए कुछ लोगों को यहीं बुला लिया।’

अपर्णा ने असमंजस में रुकना स्वीकार कर लिया। लेकिन बाद् में उसने पाया कि जन्मदिन तो एक बहाना था। दरअसल बैंक के कुछ लोग बैंक को ऑफिस का काम खत्म होने के बाद एक बार की तरह इस्तेमाल करते थे। अपर्णा ने सपने में भी न सोचा था कि किसी बैंक में ऐसा भी हो सकता है। अब अपर्णा को ऐसा लगने लगा कि वह मिस्टर सिन्हा के बिछाए जाल में फंस चुकी है। खैर उसने किसी तरह अपने को वहा से निकाला। घर के लिए रिक्शे में बैठने के बाद ही उसकी जान में जान आई।

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘जाँच अभी जारी है’ कहानी की लेखिका कौन है ?
उत्तर :
ममता कालिया।

प्रश्न 2.
अपर्णा किस कहानी की पात्र है?
उत्तर :
अपर्णा ‘जाँच अभी जारी हैं कहानी की पात्र है ।

प्रश्न 3.
ममता कालिया का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर :
ममता कालिया का जन्म 2 नबम्बर सन् 1940 को उत्तर प्रदेश के मथुरा में हुआ था।

प्रश्न 4.
ममता कीलया किस विभाग के निदेशक पद पर कार्य कर चुकी हैं?
उत्तर :
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के निदेशक पद पर।

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प्रश्न 5.
ममता कालिया के किन्हीं दो कहानी-संग्रह के नाम लिखें।
उत्तर :
हुटकारा, सीट नंबर छह (अन्य संम्रह – उनका यौवन, प्रतिदिन, जाँच अभी जारी है, पच्चीस साल की लड़की)

प्रश्न 6.
ममता कालिया द्वारा लिखित किन्हीं दो उपन्यासों के नाम लिखें।
उत्तर :
बेषर, नरक दर नरक (अन्य – दौड़, अंधेरे का ताला)

प्रश्न 7.
ममता कालिया के कविता-संग्रह के नाम लिखें।
उत्तर :
‘खांटी घरेलू औरत।’

प्रश्न 8.
‘जाँच अभी जारी है’ – की नायिका का नाम लिखें।
उत्तर :
अर्पणा।

प्रश्न 9.
अर्पणा को नौकरी कहाँ मिली?
उत्तर :
एक सम्मानित राष्ट्रीयकृत बैंक में।

प्रश्न 10.
विद्यार्थी जीवन में अर्पणा को कौन-सी नौकरी आकृष्ट करती थी?
उत्तर :
बैंक की नौकरी।

प्रश्न 11.
बैंक की नौकरी के बारे में अर्पणा के क्या विचार थे?
उत्तर :
अर्पणा की बैंक की नौकरी में ये विचार थे कि जितनी शक्ति, सच्चाई और नैतिकता जैसे मूल्यों का अहसास हो सकता है – वह किसी अन्य नौकरी में नहीं।

प्रश्न 12.
अर्पणा के अनुसार बैंक में काम करनेवालों की अर्निपरीक्षा क्या होती होगी?
उत्तर :
हाथ नोटों से भरे हों फिर भी दिमाग विचलित न हों।

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प्रश्न 13.
छ: महीने पहले अर्पणा की नियुक्ति कहाँ हुई थी?
उत्तर :
विश्वकर्मा डिप्री कॉलेज में लेक्चररशिप में।

प्रश्न 14.
अर्पणा को शिक्षक, प्राध्यापक कैसे लगते थे?
उत्तर :
बासी और निरीह।

प्रश्न 15.
बैंक में अर्पणा की ड्यूटी कहाँ लगी थी?
उत्तर :
मुख्य हॉल में।

प्रश्न 16.
अर्पणा के बैंक के मुख्य हॉल में कुल कितनी मेजें थी?
उत्तर :
पच्चीस मेजें।

प्रश्न 17.
बैंक में क्या देखकर अर्पणा को गर्व और संतोष हुआ?
उत्तर :
बैंक में अपनी एक निश्चित जगह और अलग मेज देखकर अर्षणा को गर्व और संतोष हुआ।

प्रश्न 18.
बैंक में नियुक्ति के बाद अर्पणा ने घर जाकर माँ और पिताजी से क्या कहा?
उत्तर :
“जितनी बड़ी घर में चारपाई है, उतनी बड़ी तो मेरी मेज है, वहाँ। रोज लाखों रुपयों का टर्नओवर होता है, इतना बड़ा बैंक है।”

प्रश्न 19.
अर्पणा के माता-पिता ने उसकी उपलब्धियों के बारे में क्या कहा?
उत्तर :
“हमारी बेटी ने अपनी लियाकत (काबिलियत) के बूते (बल पर) यह जगह पायी है। हजारों ने इम्तिहान दिया, पर पास तो बिरले ही हुए।

प्रश्न20.
अर्पणा में अपने काम के बारे में कौन-से दो गुण थे?
उत्तर :
मेहनत और एकाग्रता।

प्रश्न 21.
अर्पणा के लिए कौन-सी बात करिश्मे से कम नहीं थी?
उत्तर :
अर्पणा के लिए यह बात करिश्मे से कम नहीं थी कि इतने काउण्टरों पर, मेजों पर इतनी तरह से पैसों का लेन-देन हो और अंत में हिसाब एक कॉस वर्ड पहेली की तरह फिट बैठ जाए।

प्रश्न 22.
शुरू-शुरू में अर्पणा को बैंक की किस बात से बड़ी हँसी आती थी?
उत्तर :
शुरू-शुरू में अर्पणा को बैंक की इस बात से बड़ी हँसी आती थी कि अगर दस पैसे का हिसाब गड़बड़ है तो उसके लिए इतना हाय-तौबा मचाने की जरूरत क्या है? अगर कम है तो अपने पास से डाल दो, ज्यादा हैं तो दराज में डाल दो।

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प्रश्न 23.
अर्पणा के सहयोगियों ने उसे बैंकिग के बारे में क्या बताया?
उत्तर :
अर्पणा के सहयोगियों ने उसे बैंकिंग के बारे में यह समझाया कि भूल-चूक वाला मुहावरा बैंकिग के किसी काम का नहीं है। यह तो बैंकिंग के सिद्धान्त का शत्रु है।

प्रश्न 24.
अर्पणा जिस बैंक में कार्यरत् थी वहाँ के शाखा-प्रबंधक कौन थे?
उत्तर :
अर्पणा जिस बैंक में कार्यरत् थी वहाँ के शाखा-प्रबंधक एक नाटे मोटे-चश्मेवाले मिस्टर खन्ना थे।

प्रश्न 25.
शाखा-प्रबंधक मिस्टर खन्ना दिन भर क्या करते देखे जाते थे?
उत्तर :
हस्ताक्षर।

प्रश्न 26.
राष्ट्रीयकृत बैंक कहाँ स्थित था?
उत्तर :
शहर के हृंदय में (बोचों-बीच) स्थित था।

प्रश्न 27.
अर्पणा जिस बैंक में थी वहाँ खातों की भरमार क्यों थी?
उत्तर :
अर्पणा जिस बैंक मे थी वह शहर के बीचों बीच स्थित था इसलिए वहाँ व्यापारियों -व्यवसायियों के छोटे-बड़े खातों की भरमार थी।

प्रश्न 28.
बैंक के ग्राहकों के बारे में क्या अंदाज लगाना मुश्किल था?
उत्तर :
बैंक के प्राहकों के बारे में यह अंदाज लगाना मुश्किल था कि उनकी हैसियत कितनी है।

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प्रश्न 29.
जब लाला अपनी चोर जेबों में नोट भर के काउण्टर पर खड़ा होते तो अर्पणा का मन उनसे क्या कहने का होता था?
उत्तर :
सेठ जी, थोड़ा-सा पैसा खर्च कर कपड़े किसी पावर पैक्ड साबुन से धुलवा लीजिए, सारे बैंक में पसीने की गंध उड़ रही है।

प्रश्न 30.
अर्पणा को बैंक यूटोपिया (आश्चर्यलोक) की तरह क्यों लगता था?
उत्तर :
बैंक में वहाँ के कर्मी जिस प्रकार अपने काम में इतने मुस्तैद, इतने चौकस रहते हैं कि अर्पणा को बैंक यूटोपिया की तरह लगता था।

प्रश्न 31.
अर्पणा के बैंक में जगह-जगह लिखे कौन-से नारे अच्छे लगते थे?
उत्तर :
पराश्रिम ही देश को महान बनाता है।’ ‘अनुशासन आज की जरूरत है।’ कड़ी मेहनत, पक्का इरादा, दूर दृष्टि।

प्रश्न 32.
अर्पणा को सपने में क्या दिखता था?
उत्तर :
अर्पणा को सपने में यह दिखता था कि वह अपनी ही शाखा में एक सहयोगी की पत्ली बन चुकी है। रोज सुबह साढ़े नौ बजे अपना-अपना लंच बॉक्स लेकर एक साथ स्कूटर से रवाना होते है। दोनों का एक ज्वायंट एकाउण्ट है और घर में दोनों की ही मर्जी से काम होता है।

प्रश्न 33.
अर्पणा के सपने कैसे पूरे हो सकते थे?
उत्तर :
अगर अर्पणा के हॉल में एक भी आदमी अविवाहित और नौजवान होता तो उसके सपने पूरे हो सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं था। सबके-सब विवाहित थे।

प्रश्न 34.
मिसेज श्रीवास्तव कौन थी? वह अर्पणा को क्या हिदायत देती थी?
उत्तर :
मिसेज श्रोवास्तब बैंक में अर्षणा की सहकर्मी थी। वह अर्पणा को हिदायत देती कि, “सँभलकर रहना अर्पणा, ये शादीशुदा मर्द बड़े खतरनाक होते हैं। पहले आतुर बनेंगे, फिर कातर, एकदम पन्नालाल हैं सब के सब।’

प्रश्न 35.
बैंक का हर छोटा-बड़ा अधिकारी धीरे-थीरे अर्पणा से कौन-सा सवाल पूछ चुका था?
उत्तर :
“आज शाम आप क्या कर रही है?”.

प्रश्न 36.
अर्पणा के लिए कौन-से बहाने उसके रक्षा कवच थे?
उत्तर :
माँ की बीमारी तथा पिता का प्रवास।

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प्रश्न 37.
राष्ट्रीयकृत बैंकों का कौन-सा इस्तेमाल अर्पणा के लिए एक थक्का था?
उत्तर :
वैंक का कार्यकाल खत्म होने के बाद वहाँ शराब की पार्टी के लिए ऑफिस का इस्तेमाल करना-अर्पणा के लिए एक धक्का था।

प्रश्न 38.
अर्पणा ने कहाँ जाने के लिए अपनी छुट्टी मंजूर करवाई थी?
उत्तर :
जगन्नाधपुरी।

प्रश्न 39.
यात्रा वाले दिन अर्पणा के साथ कौन-सी घटना घटी?
उत्तर :
यात्रा वाले दिन अचानक उसके पिताजी को सीने में दर्द उठा तथा उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती करखाना पड़ा। यात्रा टल गई।

प्रश्न 40.
अर्पणा ने बैंक में फोन करके अपने अधिकारी को क्या सूचना दी?
उत्तर :
अर्पणा ने बैंक में फोन करके अधिकारी को यह सूचना दी कि वह पिता की बीमारी के कारण बुट्टी में घूमने नहीं जा सकी है।

प्रश्न 41.
अर्पणा पिता की बीमारी के कितने दिनों बाद बैंक गई?
उत्तर :
दस दिनों के बाद।

प्रश्न 42.
अर्पणा जब कभी शाम में बैंक की बिजली जली देखा तो उसने क्या सोचा?
उत्तर :
अर्पणा ने यह सोबा कि यहाँ के अधिकारी कितने मन लगाकर अपना काम पूरा करते हैं?

प्रश्न 43.
अर्पणा ने यात्रा के लिए ली गई एडवांस (अग्रिम) के बारे में क्या सोचा?
उत्तर :
उसने यह सोचा कि वह हुट्टी के बाद जब दफ्तर जाएगी, एडवांस वापस कर देगी।

प्रश्न 44.
छुद्टी के बाद बैंक जाने पर चपरासी ने अर्पणा को क्या दिया? उसमें क्या लिखा था?
उत्तर :
बुट्टी के बाद बैंक जाने पर चपरासी ने अर्पणा को एक रजिस्टई लिफाफा दिया जो बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय से आया था। उसमें लिखा था – “अपने एल. टी. सी. का झ्रूठा बिल पेश कर बैंक के साथ धोखाधड़ी और बन के दुरुपयोग की वेष्टा की है। इस संबंध में अपना सष्टीकरण तत्काल दें अन्यथा आपके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्खाई करने को हम बाध्य होंगे।”

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प्रश्न 45.
शाखा प्रबंधक से क्षेत्रीय कार्यालय से आए पत्र के बारे में शिकायत करने पर उसने क्या कहा?
उन्तर :
शाखा प्रबंधक ने अर्पणा को घूरते हुए कहा, ” मुझे आपका कोई फोन नहीं मिला। आपको जो भी कहना है, लिखित में कहें।”

प्रश्न 46.
अर्पणा के बारे में खन्ना और सिन्हा ने मिलकर क्या तय किया?
उत्तर :
अर्पणा के बारे में खन्ना तथा सिन्हा के मिलकर यह तय किया कि ये जो नए अपरिपक्व, अनुशासनहीन अधिकारी हैं, उन्हें सबक सिखाया जाय और उनकी लीपापोती कतई मंजूर न की जाए।

प्रश्न 47.
क्षेत्रीय कार्यालय जाते समय अर्पणा को उसके पिता पूरे रास्ते क्या समझाते रहे?
उत्तर :
अर्पणा के पिता ने उसे समझाया कि वह बिल्कुल न डरे। सच्चाई में आज भी बड़ी ताकत है। मैने इतनी उम्र में कभी झूठ का सहारा न लिया और कभी नुकसान में न रहा।

प्रश्न 48.
क्षेत्रीय कार्यालय कहाँ था और कैसा था?
उत्तर :
क्षेत्रीय कार्यालय कानपुर की एक व्यस्त तथा स्वच्छ सड़क के किनारे था। इमारत भव्य थी तथा भारी सुरक्षाव्यवस्था तथा ताम-झाम से भरा हुआ।

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प्रश्न 49.
कनिप्ठ अधिकारी ने अर्पणा के साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर :
कनिष्ठ अधिकारी ने अर्पणा के साथ उपेक्षा भरा व्यवहार किया। उसने अर्पणा पर ध्यान न देकर फोन से बातचीत करने में ही लगा रहा।

प्रश्न 50.
अर्पणा ने कनिष्ठ अधिकारी से क्या निवेदन किया ?
उत्तर :
अर्पणा ने कनिष्ठ अधिकारी से यह निवेदन किया कि उसके स्पष्टीकरण पर ध्यान दिया जाय तथा उसकी विश्वसनीयता पर संदेह न किया जाय।

प्रश्न 51.
क्षेत्रीय कार्यालय के कनिष्ठ अधिकारी ने अर्पणा के निवेदन का क्या उत्तर दिया?
उत्तर :
क्षेत्रीय कार्यालय के कनिष्ठ अधिकारी ने अर्पणा के निवेदन को नामंजूर करते हुए कहा कि, ‘” आपके विरुद्ध जाँच की कार्रवाई तो करनी ही पड़ेगी …….. आपके पास अपनी भेजी गई सूचना का कोई लिखित सबूत नहीं है। फिर हम कैसे मानें कि आप संदेह से परे हैं।”

प्रश्न 52.
‘क्या मैं आपको एक बेईमान लड़की मालूम देती हूं’ के जबाब में कनिष्ठ अधिकारी ने अर्पणा से क्या कहा?
उत्तर :
कनिष्ठ अधिकारी ने अर्पणा से कहा कि, “व्यक्तिगत प्रतिक्रिया का दप्तर के रूटीन मे कोई अर्थ नहीं होता। फिर हमारे यहाँ नये आए जूनियर्स में इतने अजीब तत्व घुस गए हैं कि इनकी पड़ताल होनी जरूरी है। आप जा सकती हैं।’

प्रश्न 53.
क्षेत्रीय कार्यालय के डीलिंग क्लर्क ने अर्पणा के बारे में क्या सोचा?
उत्तर :
डीलिंग क्लर्क ने सोचा कि लड़की (अर्पणा) यदि उससे ठीक से मुलाकात करेगी, शू प्रॉपर चैनल अंदर जाएगी और आगे से इस मनहूस बूढ़े को साथ न लाएगी तो वह मामला दबवा देगा। लेकिन इसके मिजाज तो सातवें आसमान पर अटके हुए हैं।

प्रश्न 54.
अर्पणा के चले जाने के बाद डीलिंग क्लर्क ने चपरासी से क्या कहा?
उत्तर :
डीलिंग क्लर्क ने चपरासी से कहा कि “इसी तरह यह अपने पिताजी के साथ आती रहेगी तो दसियों साल इन्व्वायरी चलवाऊंगा, रो न दे तो कहना।”

प्रश्न 55.
अर्पणा ने जाँच जल्दी पूरा करवाने के लिए क्या किया?
उत्तर :
जाँच जल्द से जल्द पूरी हो जाए इसके लिए अर्पणा को जिसने, जिस किसी ने भी किसी मददगार का नाम बताया वह वहाँ चली जाती। लखनऊ और कानपुर जैसे शाहर के उसे इतने चक्कर लगाने पड़े मानो अपने शहर के मुहल्ले के चक्कर लगा रही हो।

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प्रश्न 56.
अर्पणा के विरुद्ध जाँच समिति में कौन लोग शामिल थे?
उत्तर :
अर्पणा के विरुद्ध जाँच समिति में क्षेत्रीय कार्यालय के एक अधिकारी प्रीतम सिंह, यूनियन के एक प्रतिनिधि समीर सक्सेना और एक अन्य अधिकारी शामिल थे।

प्रश्न 57.
अर्पणा के विरुद्ध जाँच का आतंक कैसा था?
उत्तर :
अर्पणा के विरुद्ध जाँच का आतंक ऐसा था कि दफ्तर के चपरासी तक ने अर्पणा को सलाम करना बंद कर दिया। कोई भी इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहता था।

प्रश्न 58.
शाखा प्रबंधक खन्ना के बारे में पूछने पर अर्पणा ने सक्सेना जी को क्या बताया?
उत्तर :
अर्पणा ने खन्ना के बारे में सक्सेना जी को बताते हुए कहा कि वह महाधूर्त है। इतना ही नहीं, दफ्तर में खन्रा और सिन्हा साहब का व्यवहार महिला कर्मचारियों से उचित नहीं है।

प्रश्न 59.
शाखा प्रबंधक खन्ना तथा सिन्हा साहब के बारे में शिकायत सुनकर सक्सेना जी ने अर्पणा से क्या कहा?
उत्तर :
शिकायत सुनने के बाद सक्सेना जी ने अर्पणा से यह कहा कि जब-जब महिला वर्करों की योग्यता पर सवाल उठाएजाते हैं, वे पुरुषों के चरित्र की बात बीच में ले आती हैं।

प्रश्न 60.
अपने विरुद्ध जाँच के रवैये से परेशान अर्पणा के मन में क्या आता था?
उत्तर :
जाँच के रवैये से परेशान कभी-कभी अर्पणा के मन में आता था कि वह खन्ना को पीटे, बैंक की असलियत सबको चीख-चीख कर बताए कि इस राष्ट्रीयकृत बैंक में कैसे घपले और सौदेबाजी होती है।

प्रश्न 61.
जाँच अधिकारी अर्पणा को क्या कहकर ढाढ़स बँंधाते थे?
उत्तर :
जाँच अधिकारी अर्पणा को यह कहकर ढाढ़स बँधाते थे कि – “तुम बिल्कुल बेफिक रहो। इस मामले को निपटाकर हम तुम्हारा तबादला और पोस्टिंग ऐसी बांच में करवा देंगे, जहाँ किसी को इस मामले की खबर ही न होगी। तुम नए सिरे से जीवन शुरू कर सकोगी।”

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प्रश्न 62.
निर्दोष साबित होने की पूरी संभावना के बावजूद अर्पणा को क्या लग रहा था?
उत्तर :
निर्दोष साबित होने की पूरी संभावना के बावजूद अर्षणा को यह लग रहा था कि असली सजा तो वह पा चुकी है। उसकी जाँच की आँब कभी ठण्डी नहीं होगी। इस जाँच से निकलने की कोशिश में और भी उलझती जाएगी।

प्रश्न 63.
जाँच से गुजरते-गुजरते अर्पणा की हालत क्या हो गई थी?
उत्तर :
जाँच से गुजरते-गुजरते अर्पणा की हालत बुरी हो चली थी। फाइल ढोते-ढोते बेजान हो चली थी। खून की कमी से सारा शरीर सफेद पड़ता जा रहा था। वह एक ऐसे कुचक्र मे फंस गई थी जिससे निकलना असंभव जान पड़ता था।

प्रश्न 64.
जाँच की खबर फैल जाने पर अर्पणा को क्या-क्या झेलना पड़ रहा था?
उत्तर :
जाँच की खबर फैल जाने से सब, यहाँ के परिचित भी अर्पणा को अजीब नज़रों से देखने लगे थे। उनकी नज़रों से ऐसा लगता मानो वह बेहद मक्कार और बेईमान लड़की है। वे खुद काफी साथ-सुथरे और पवित्र हैं।

प्रश्न 65.
अर्पणा के लिए कौन-सा अनुभव भयंकर अनुभव रहा था?
उत्तर :
दुनिया की नज़रों में गुनाहगार की हैसियत से जीना अर्पणा के लिए एक भयंकर अनुभव रहा था।

प्रश्न 66.
अर्पणा ने सोचकर भी वित्तमंत्री को पत्र क्यों नहीं लिखा?
उत्तर :
अर्पणा ने कई बार सोचा कि वह वित्तमंत्री को पत्र लिखे पर वह यह सोचकर रूक गई कि पत्र का नतोजा यही निकलेगा कि एक जाँच और बैठा दी जाएगी। उसकी जाँच की फाईल और भी पेचीदा होती जाएगी।

प्रश्न 67.
अर्पणा के विरुद्ध कितने रुपये के लिए जाँच बिठायी गई थी और इसके पीछे उसके कितने खर्च हो चुके थे?
उत्तर :
अर्पणा के विरुद्ध अठारह सौ रुपये के लिए जाँच बिठायी गई थी और इसके पीछे अबतक उसके अट्ठाईस हजार रुपये खर्च हो चुके थे।

प्रश्न 68.
फरीदा कौन थी? उसने अपना कौन-सा दुखड़ा अर्पणा को सुनाया था?
उत्तर :
फरीदा अर्पणा के साथ ही बैंक में काम करती थी तथा उससे जूनियर थी। उसने अपना दुखड़ा रोते हुए अर्पणा को बताया था कि उसे लगातार चार दिन अपनी दराज में गन्दे शे’र लिखे कागज मिले।

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प्रश्न 69.
जब अर्पणा ने फरीदा को जाँच में साथ देने को कहा तो उसने क्या कहा?
उत्तर :
जब अर्पणा ने फरीदा से जाँच में साथ देने को कहा तो उसने दो दूक लहजे में मना करते हुए कहा, ‘नना बाबा, मैं इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहती। कितनी फजीहत होगी। मेरे अब्या तो मुझे जान से मार डालेंगे।”

प्रश्न 70.
जाँच बिठाये जाने के बाद अर्पणा बैंक में जाने पर कैसा अनुभव करती थी?
उत्तर :
जाँच बिठाये जाने के बाद अर्पणा अधिकारी की बजाय एक अभियुक्त की तरह आती थी। वह शाखा प्रबंधक के कमरे के बाहर पड़ी कुर्सी पर फाईल को गोद में रखे बैठी रहती और तो और अब दफ्तर के चपरासी तक ने अर्पणा को सलाम करना बंद कर दिया था।

प्रश्न 71.
जाँच के दौरान अर्पणा से अक्सर कैसे सवाल पूछे जाते थे?
उत्तर :
जाँच के दौरान अर्पणा से अक्सर ऐसे सवाल पूछे जाते जिनका उत्तर ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में देना असंभव था।

प्रश्न 72.
अर्पणा के लिए किससे मिलना आसान नहीं था? क्यों?
उत्तर :
अर्पणा के लिए समीर सक्सेना से मिलना आसान नहीं था क्योंकि अक्सर उनके होटल में उनके कमरे में ताला ही पड़ा रहता। अगर वे कभी लौटते तो इतने लोग वहाँ जमा रहते कि अर्पणा के लिए मुलाकात करना संभव नहीं हो पाता था। भीड़ से निपटते ही चपरासी उनके दरवाजे पर ‘डू नॉट डिस्टर्व’ की तख्ती लटका देता था।

प्रश्न 73.
मिसेज श्रीवास्तव अर्पणा की किस बात पर एक तजुर्बेदार हँसी हँस देती थी?
उत्तर :
जब मिसेज श्रीवास्तव अर्पणा को आंफिस के मर्दों से सावधान रहने को कहती तो अर्पणा यह कहती थी कि “म क्षे तो सब बड़े सीधे नजर आते हैं। लगता ही नहीं कि मद्दों के बीच बैठे हैं” – यह सुनकर मिसेज श्रीवास्तव एक तजुर्बेदार हैसी हैस देती थी।

प्रश्न 74.
अर्पणा के लिए शाखा-प्रबंधक का कौन-सा आरोप निराधार तथा बचकाना था?
उत्तर :
शाखा प्रबंधक का यह आरोप – ‘मुके आपका कोई फोन नहीं मिला। आपको जो भी कहना है, लिखित में कहें” – अर्पणा के लिए निराधार तथा बचकाना था।

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प्रश्न 75.
अर्पणा अपने विरुद्ध लगाए गए आरोप से क्यों नहीं घबराई?
उत्तर :
अर्षणा अपने विरुद्ध लगे आरोप से इसलिए नहीं डरी क्योंकि उसे लगा कि सच्चाई उसके साथ है, उसकी नियत में कोई खोट नहीं है फिर वह क्यों घबड़ाए।

प्रश्न 76.
अर्पणा ने अपने विरुद्ध आरोप के बारे में माता-पिता को संक्षेप में क्यों समझाया?
उत्तर :
अर्पणा ने अपने विरुद्ध लगे आरोप के बारे मे माता-पिता को संक्षेप में इसलिए बताया ताकि उनके कलेजे पर बोझ न पड़े।

प्रश्न 77.
कौन अर्पणा को अपने चश्मे से बड़े गौर से देख रहा था?
उत्तर :
क्षेत्रीय कार्यालय का डीलिंग क्लर्क अर्पणा को अपने चश्मे से बड़े गौर से देख रहा था।

प्रश्न 78.
अधिकतर संबंधित व्यक्ति से अर्पणा की मुलाकात क्यों नहीं हो पाती थी?
उत्तर :
अधिकतर संबंधित व्यक्ति से अर्पणा की मुलाकात इसलिए नहीं हो पाती थी क्योंकि वह अपनी व्यस्तता बताकर दो दिन के बाद आने का समय देता था।

प्रश्न 79.
मिस्टर सक्सेना होटल में लौटने के बाद क्या किया करते थे?
उत्तर :
मिस्टर सक्सेना होटल आने के बाद लोगों की समस्याओं का समाधान निकालते और उनके प्रार्थना पत्र प्राप्त करते थे।

प्रश्न 80.
अर्पणा मिस्टर सक्सेना के सामने लगी भीड़ के बीच अपना मामला खोलना क्यों नहीं चाहती थी?
उत्तर :
अर्पणा मिस्टर सक्सेना के सामने लगी भीड़ के बीच अपना मामला इसलिए नहीं खोलना चाहती थी क्योंक सिर्फ उसका तमाशा ही बन सकता था, कोई समाधान मिलने वाला नहीं था।

प्रश्न 81.
बैंक में नौकरी से पहले अपर्णा की नियुक्ति कहाँ हो चुकी थी ?
उत्तर :
विश्वकर्मा डिग्री कॉलेज में।

प्रश्न 82.
सिर पर पाँच-पाँच लाख के नकद नोटों की गह्डी लेकर चलनेवाले कुली की कुल मजदूरी क्या होती है ?
उत्तर :
दस रुपये रोज।

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प्रश्न 83.
अपर्णा ने सीधे किसे पत्र लिखने के बारे में सोचा ?
उत्तर :
वित्त मंश्री को।

प्रश्न 84.
अपर्णा के लिए क्या धक्का था ?
उत्तर :
राष्रीयकृत बैंकों का गलत इस्तेमाल अपर्णा के लिए धक्का था।

प्रश्न 85.
अपर्णा के कौन-से रूप ने निहायत मुमकिन किस्म के सपने थे ?
उत्तर :
वे सपने जिन्हें वह रात में देखती थी।

प्रश्न 86.
किसकी शक्ल हर समय रुआँसी रहने लगी थी ?
उत्तर :
अपर्णा की शक्ल ।

प्रश्न 87.
बैंक के किस अधिकारी से मिलना आसान नहीं था ?
उत्तर :
समीर सक्सेना से ।

प्रश्न 88.
अपर्णा खन्रा के बारे में क्या सोचती थी ?
उत्तर :
एक दिन खन्ना के केबिन में घुसकर उसे ताबड़-तोड़ मारना है ।

प्रश्न 89.
बैंक में अर्पणा का समय दो बजे तक पलक झपकते क्यों बीत जाता था?
उत्तर :
दो बजे तक का समय पब्लिक डीलिंग का था इसलिए अर्पणा का वह समय पलक झपकते ही बीत ज्ञाता था।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
अपर्णा किस बैंक में काम करती थी ?
(क) बैंक ऑफ अमेरिका में
(ख) राह्ट्रीयकृत बैंक में
(ग) कोआपरेटिव बैंक में
(घ) प्राइवेट बैंक में
उत्तर :
(ख) राध्रीयकृत बैंक में

प्रश्न 2.
‘जाँच अभी जारी है’ के रचनाकार हैं :
(क) ममता कालिया
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) शेखर जोशी
(घ) अमरकांत
उत्तर :
(क) ममता कालिया।

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प्रश्न 3.
‘सीट नंबर छह’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार हैं :
(क) शेखर जोशी
(ख) ममता कालिया
(ग) अमरकांत
(घ) रेणु
उत्तर :
(ख) ममता कालिया।

प्रश्न 4.
‘उनका यौवन’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है?
(क) ममता कालिया
(ख) रेणु
(ग) अमरकांत
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) ममता कालिया।

प्रश्न 5.
‘प्रतिदिन’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार हैं :
(क) अमरकांत
(ख) प्रेमचंद
(ग) ममता कालिया
(घ) जयशंकर प्रसाद
उत्तर :
(ग) ममता कालिया।

प्रश्न 6.
‘पचचीस साल की लड़की’ (कहानी-संप्रह) किसकी रचना है?
(क) निराला
(ख) मोहन राकेश
(ग) रेणु
(घ) ममता कालिया
उत्तर :
(घ) ममता कालिया।

प्रश्न 7.
‘बेघर( (उपन्यास) किसकी रचना है?
(क) प्रेमचंद
(ख) ममता कालिया
(ग) गुलेरी
(घ) अमरकांत
उत्तर :
(ख) ममता कालिया।

प्रश्न 8.
‘नरक दर नरक’ (उपन्यास) किसकी रचना है?
(क) ममता कालिया
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) उषा प्रियंवदा
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(क) ममता कालिया।

प्रश्न 9.
‘दौड़’ (उपन्यास) के रचनाकार कौन हैं?
(क) संजीव
(ख) अमरकांत
(ग) ममता कालिया
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ग) ममता कालिया।

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प्रश्न 10.
‘अंधेरे का ताला’ (उपन्यास) के रचनाकार कौन हैं?
(क) प्रेमचंद
(ख) बंग महिला
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) ममता कालिया
उत्तर :
(घ) ममता कालिया।

प्रश्न 11.
‘खांटी घरेलू औरत’ (काव्य-संग्रह) किसकी रचना है?
(क) ममता कालिया
(ख) प्रेमचंद
(ग) धूमिल
(घ) अजेय
उत्तर :
(क) ममता कालिया।

प्रश्न 12.
अर्पणा क्या पाकर फूली न समाई?
(क) बैंक में नियुक्ति
(ख) आरोप-पत्र
(ग) वेतन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) बैंक में नियुक्ति।

प्रश्न 13.
अर्पणा की नियुक्ति पहले कहाँ हुई थी?
(क) बैंक में
(ख) विश्वकर्मा डिग्री कॉलेज में
(ग) रेलवे में
(घ) स्कूल में
उत्तर :
(ख) विश्वकर्मा डिमी कॉलेज में।

प्रश्न 14.
अर्पणा की दूसरी नियुक्ति कहाँ हुई?
(क) राप्ट्रीयकृत बैंक में
(ख) स्कूल में
(ग) जीवन बीमा निगम में
(घ) विश्वकर्मा डिम्री कॉलेज में
उत्तर :
(क) राष्ट्रीयकृत बैंक में।

प्रश्न 15.
अर्पणा ने बैंक के लिए कौन-सी नौकरी छोड़ दी?
(क) डियी कॉलेज की नौकरी
(ख) स्कूल की नौकरी
(ग) जोवन बीमा निगम की नौकरी
(घ) अस्पताल की नौकरी
उत्तर :
(क) डिप्री कॉलेज की नौकरी।

प्रश्न 16.
शिक्षक, अध्यापक अर्पणा को क्या लगते थे?
(क) बेवकूफ
(ख) बुद्धिमान
(ग) बासी और निरीह
(घ) आलसी
उत्तर :
(ग) बासी और निरीहा

प्रश्न 17.
बैंक में अर्पणा की उ्यूटी कहाँ थी?
(क) काठन्टर पर
(ख) गेट पर
(ग) ऑफिस में
(घ) मुख्य हॉंल में
उत्तर :
(घ) मुख्य हॉल में।

प्रश्न 18.
अर्पणा के बैंक के मुख्य हॉल में कितनी मेजें थीं?
(क) बीस
(ख) पचीस
(ग) तीस
(घ) पैंतीस
उत्तर :
(ख) पचीस।

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प्रश्न 19.
बैंक में क्या देखकर अर्पणा को गर्व और संतोष हुआ?
(क) अलग मेज
(ख) अलग ऑफिस
(ग) अलग काउंटर
(घ) वेतन
उत्तर :
(क) अलग मेज।

प्रश्न 20.
कौन-से दो गुण अर्पणा में थे?
(क) ईमानदारी और पढ़ाई
(ख) पढ़ाई-लिखाई
(ग) समय की पाबंदी और ईमानदारी
(घ) मेहनत और एकाम्यता
उत्तर :
(घ) मेहनत और एकाग्रता।

प्रश्न 21.
दो बजे के बाद बैंक का गार्ड क्या बंद कर देता था?
(क) शटर
(ख) काउंटर
(ग) फाटक
(घ) ऑफिस
उत्तर :
(क) शटर।

प्रश्न 22.
बैंक में दो बजे तक किसका समय होता?
(क) भोजन
(ख) नाश्ते
(ग) पब्लिक डीलिंग
(घ) पैसे-पैसे का हिसाब मिलाना
उत्तर :
(ग) पब्लिक डीलिंग।

प्रश्न 23.
बैंक में किसी-किसी दिन हिसाब में बल पड़ जाता तो?
(क) शाखा-प्रबंधक सबको डाँटता
(ख) चाय का दौर चलता
(ग) कर्मचारी और अधिकारी फुर्सत में आ जाते
(घ) सारे कागजात नए सिरे से जाँचे जाते
उत्तर :
(घ) सारे कागजात नए सिरे से जाँचे जाते।

प्रश्न 24.
हिसाब मिला लिया जाने के बाद ही .
(क) स्टॉफ फारिग होते
(ख) पब्लिक डीलिंग का समय होता
(ग) गप शुरू होता
(घ) चाय का दौर चलता
उत्तर :
(क) स्टॉफ फारिग होते।

प्रश्न 25.
कौन-सा मुहावरा बैंकिंग सिद्धांत का शब्रु है?
(क) आज नकद कल उधार
(ख) अनुशान ही देश को महान बनाता है
(ग) भूल-चूक लेनी-देनी
(घ) आमदनी अठ्ठनी खर्चा रुपैया
उत्तर :
(ग) भूल-चूक लेनी-देनी।

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प्रश्न 26.
बैंक के शाखा-प्रबंधक थे?
(क) मिस्टर खन्ना
(ख) मिस्टर सिन्हा
(ग) मिस्टर सक्सेना
(घ) मिस्टर सिंध
उत्तर :
(क) मिस्टर खन्ना।

प्रश्न 27.
यह राष्ट्रीयकृत बैंक स्थित था :
(क) गाँव में
(ख) बाजार में
(ग) शहर के हृद्य में (बीच में)
(घ) मैदान में
उत्तर :
(ग) शहर के हृदय में (बीच में)

प्रश्न 28.
पुराने किस्म के लाला बैंक में क्या पहनकर आते थे?
(क) कुरता-पाजामा
(ख) कोट पैंट
(ग) शेरवानी
(घ) धोती-कुर्ता
उत्तर :
(घ) धोती-कुर्ता।

प्रश्न 29.
अपर्णा को किस पर हैरानी होती थी?
(क) सहयोगियों और खुद पर
(ख) खुद पर और शाखा-प्रबंधक पर
(ग) सहयोगियों और लाला पर
(घ) स्कूटर पर आने वाले पर
उत्तर :
(क) सहयोगियों और खुद पर।

प्रश्न 30.
बैंक में क्या सबके हाथों से अमानत की तरह गुजरता ?
(क) चाय का कप
(ख) बही
(ग) रुपये
(घ) आमंत्रण-पत्र
उत्तर :
(ग) रुपये।

प्रश्न 31.
”हम होते तो नोट लेकर भाग जाते”-गद्यांश किस पाठ से उद्धत है?
(क) तीसरी कसम
(ख) जाँच अभी जारी है
(ग) उसने कहा था
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) जाँच अभी जारी है।

प्रश्न 32.
‘जब सिर पर जिम्मेदारी पड़ती है तो ईश्वर अपने-आप शक्ति देता है”‘ – वक्ता कौन हैं?
(क) अर्पणा
(ख) फरीदा जमाल
(ग) अर्पणा की माँ
(घ) मिसेज श्रीवास्तव
उत्तर :
(क) अर्पणा।

प्रश्न 33.
“मैं इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहती” – वक्ता कौन है?
(क) मिसेज श्रीवास्तव
(ख) फरीदा जमाल
(ग) अर्पणा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) फरीदा जमाल।

प्रश्न 34.
“मैं मोर्चा नहीं बनना चाहती” – वक्ता कौन है?
(क) अर्पणा
(ख) मिसेज श्रीवास्तव
(ग) फरीदा जमाल
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) फरीदा जमाल।

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प्रश्न 35.
किसके तेवर बदलते देख अर्पणा चुप हो गई?
(क) फरीदा जमाल
(ख) शाखा प्रबंधक
(ग) मिस्टर सिन्हा
(घ) मिस्टर सक्सेना
उत्तर :
(क) फरीदा जमाल।

प्रश्न 36.
“आपकी फाईल भी मैं अच्छी तरह देखूँगा” – वक्ता कौन है?
(क) प्रीतम सिंह
(ख) मिस्टर सिन्हा
(ग) मिस्टर सक्सेना
(घ) डीलिंग क्ल्लक
उत्तर :
(ग) मिस्टर सक्सेना।

प्रश्न 37.
सहृद्य से दिखने वाले अधिकारी का नाम था?
(क) प्रीतम सिंह
(ख) मिस्टर सक्सेना
(ग) मिस्टर सिंह
(घ) मिस्टर सिन्हा
उत्तर :
(क) मिस्टर सिंह।

प्रश्न 38.
‘यह तो दस से पाँच तक जेल की तरह है’ – वक्ता कौन है?
(क) मिसेज श्रीवास्तव
(ख) अर्पणा
(ग) अर्पणा की सहेलियाँ
(घ) मिस्टर सिन्हा
उत्तर :
(ग) अर्पणा की सहेलियाँ।

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प्रश्न 39.
निम्न में से कौन-सा नारा बैंक में नहीं लिखा था?
(क) परिश्रम ही देश को महान बनाता है
(ख) अनुशासन आज की जरूरत है
(ग) कड़ी मेहनत, पक्का इरादा, दूर दृष्टि
(घ) स्वच्छ भारत, स्वस्थ्य भारत
उत्तर :
(घ) स्वच्छ भारत, स्वस्थ्य भारत।

प्रश्न 40.
सपने में उसे दिखता कि .?
(क) एक सहयोगी से झगड़ा हो गया है
(ख) एक सहयोगी की पत्नी बन वुकी है
(ग) वह रुपये लेकर भाग गई है
(घ) जाँच खत्म हो गई है
उत्तर :
(ख) एक सहयोगी की पत्नी बन चुकी है।

प्रश्न 41.
बैंक का हर छोटा-बड़ा अधिकारी अर्पणा से कौन-सा सवाल पूछ चुका था?
(क) आपका नाम क्या है ?
(ख) आप कहाँ रहती है?
(ग) आज़ शाम आप क्या कर रही हैं?
(घ) आपने काँलेज की नौकरी क्यों छोड़ी?
उत्तर :
(ग) आज शाम आप क्या कर रही हैं?

प्रश्न 42.
“आप सिर्फ बीस मिनट मुझे दे दें” – वक्ता और श्रोता कौन हैं?
(क) मिस्टर सिन्हा और मिसेज श्रीवास्तव
(ख) मिस्टर सक्सेना और फरीदा जमाल
(ग) मिस्टर खन्ना और मिसेज श्रीवास्तव
(घ) मिस्टर सिन्हा और अर्पणा
उत्तर :
(घ) मिस्टर सिन्हा और अर्पणा।

प्रश्न 43.
राष्ट्रीयकृत बैंकों का कौन-सा इस्तेमाल अर्पणा के लिए एक धक्का था?
(क) रुपये का लेन-देन
(ख) रिश्वत लेना
(ग) दफ्तर में शराब पीना-पिलाना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) दफ्तर में शराब पीना-पिलाना।

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प्रश्न 44.
रिक्शा स्टैंड तक अर्पणा को क्या खतरा महसूस होता रहा?
(क) कहीं सिन्हा उसके पीछे न आए
(ख) कहीं चोर-उचक्के पीछे न हों
(ग) कहीं शाखा-प्रबंधक उसके पीछे न आए
(घ) कहीं बिजली न चली जाए
उत्तर :
(क) कहीं सिन्हा उसके पीछे न आए।

प्रश्न 45.
अर्पणा कहाँ छुद्वियाँ मनाने के सपने देख रही थी?
(क) दार्जिंलिंग
(ख) दिल्ली
(ग) कुल्लू-मनाली
(घ) कानपुर
उत्तर :
(ग) कुल्लू-मनाली।

प्रश्न 46.
देखते-देखते वे तीनों स्टेशन के बाजय अस्पताल पहुँच गए – तीनो कौन हैं?
(क) लहना सिंह, सूबेदार हजारा सिंह, बोधा सिंह
(ख) अर्पणा, मिसेज श्रीवास्तव, फरीदा जमाल
(ग) अर्पणा, मिस्टर सिन्हा, मिस्टर सक्सेना
(घ) अर्पणा तथा उसके माता-पिता
उत्तर :
(घ) अर्पणा तथा उसके माता-पिता।

प्रश्न 47.
अर्पणा छुट्टी लेने के कितने दिनों बाद दफ्तर गई?
(क) पाँच
(ख) दस
(ग) पंद्रह
(घ) बौस
उत्तर :
(ख) दस।

प्रश्न 48.
“मैं चलूँगा तेरे साथ क्षेत्रीय दफ्तर” – वक्ता कौन है?
(क) मिस्टर सिन्हा
(ख) मिस्टर सक्सेना
(ग) अर्पणा के पिता
(घ) मिस्टर खत्ना
उत्तर :
(ग) अपर्णा के पिता।

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प्रश्न 49.
‘एक बार में खाली एक जन जाएगा” – वक्ता कौन है?
(क) सूबेदार हजारा सिंह
(ख) लहना सिंह
(ग) सफ़िया का भाई
(घ) चपरासी
उत्तर :
(घ) चपरासी।

प्रश्न 50.
“यह सरासर अन्याय है”‘ – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) नमक
(ख) नन्हा संगीतकार
(ग) जाँच अभी जारी है
(घ) चपल
उत्तर :
(ग) जाँच अभी जारी है।

प्रश्न 51.
“इनकी पड़ताल होनी जरूरी है” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) नमक
(ख) चष्पल
(ग) जाँच अभी जारी है
(घ) तौसरी कसम
उत्तर :
(ग) जाँच अभी जारी है।

प्रश्न 52.
“इनकी पड़ताल होनी जरूरी है” – वक्ता कौन है?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) कनिष्ठ अधिकारी
(ग) मिस्टर सक्सेना
(घ) प्रीतम सिंध
उत्तर :
(ख) कनिष्ठ अधिकारी।

प्रश्न 53.
“आप अपना समय बर्बाद कर रही हैं” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) नमक
(ख) तीसरी कसम
(ग) नन्हा संगीतकार
(घ) जाँच अभी जारी है
उत्तर :
(घ) जाँच अभी जारी है।

प्रश्न 54.
क्षेत्रीय शाखा के डीलिंग क्लर्क का नाम क्या है?
(क) सिन्हा
(ख) श्रीवास्तव
(ग) गुप्ता
(घ) दास
उत्तर :
(ख) श्रीवास्तव।

प्रश्न 55.
निम्नलिखित में से कौन जाँच समिति में शामिल थे?
(क) प्रौतम सिंह
(ख) कनिष्ठ अधिकारी
(ग) मिस्टर सिन्हा
(घ) मिस्टर खत्ना
उत्तर :
(क) प्रीतम सिंह।

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प्रश्न 56.
रक्तहीन चेहरे पर न पहले -सा नूर था, न ?
(क) गरमी
(ख) सरदी
(ग) नरमी
(घ) गरूर
उत्तर :
(ग) नरमी।

प्रश्न 57.
तुम बिल्कुल बेफिक रहो – ‘तुम’ से कौन संकेतित है?
(क) जाँच अधिकारी
(ख) अर्पणा
(ग) वित्त मंत्री
(घ) शाखा-प्रबंधक
उत्तर :
(ख) अर्पणा।

प्रश्न 58.
सब इस जाँच की बलि चढ़ चुके थे – ‘सब’ किसके लिए आया है?
(क) मान-प्रतिष्ठा
(ख) रुपये-पैसे
(ग) शनिवार-रविवार
(घ) माता-पिता
उत्तर :
(ग) शनिवार-रविवार।

प्रश्न 59.
असली सजा तो वह पा चुकी है – ‘वह’ कौन है?
(क) सफिया
(ख) हीराबाई
(ग) फरीदा जमाल
(घ) अर्पणा
उत्तर :
(घ) अर्पणा।

प्रश्न 60.
अब तक शहर में कौन-सी खबर फैल चुकी थी?
(क) अर्षणा के ऊपर लगाए आरोप की
(ख) मिस्टर खन्ना के करतूतों की
(ग) बैंक में कोई कर्ज बिना कमीशन के मंजूर नही होता
(घ) ऊपर से नीचे तक सब का परसेण्टेज बंधा है
उत्तर :
(क) अर्पणा के ऊपर लगाए आरोप की।

प्रश्न 61.
अपर्णा ने सीधे किसे पत्र लिखने के बारे में सोचा ?
(क) बित्त मंत्री
(ख) शाखा प्रबंधक
(ग) जाँच अधिकारी
(घ) गृहमंत्री
उत्तर :
(क) बित्त मंत्री।

प्रश्न 62.
अपर्णा कहाँ नौकरी करना चाहती थी ?
(क) कॉलेज में
(ख) बैंक में
(ग) रेलवे में
(घ) बीमा कंपनी में
उत्तर :
(ख) बैंक में।

प्रश्न 63.
विद्यार्थी जीवन से ही किसे बैंक की नौकरी आकृष्ट करती थी ?
(क) मि० खन्ना
(ख) अपर्णा
(ग) मि० श्रीवास्तव
(घ) मि० सिन्हा
उत्तर :
(ख) अपर्णा।

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प्रश्न 64.
“जाँच अभी जारी है” – कहानी का मूल उद्देश्य/संदेश है –
(क) नारी उत्पौड़न की समस्या
(ख) महिला कर्मचारियों को महत्व न देना
(ग) कामकाजी महिलाओं के संघर्ष को दर्शाना
(घ) पुरुष-मानसिकता को स्पष्ट करना
उत्तर :
(क) नारी उत्पौड़न की समस्या।

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प्रश्न 65.
‘छुटकारा’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है?
(क) शेखर जोशी
(ख) फणीश्वरनाथ रेणु
(ग) शिव प्रसाद सिंह
(घ) ममता कालिया
उत्तर :
(घ) ममता कालिया।

WBBSE Class 10 Hindi जाँच अभी जारी है Summary

लेखक – परिचय

ममता कालिया का जन्म 2 नवंबर, 1940 को मथुरा (उ०प्र०) में हुआ था । इनकी शिक्षा – एम०ए० (अंग्रेजी साहित्य) में हुई थी । दिल्नी व मुंबई में अंग्रेजी का अध्यापन किया । इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज के प्राचार्या पद से सेवानिवृत हुई । भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के निदेशक पद पर कार्य कर चुकी हैं । वर्तमान में महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘हिन्दी’ के सम्पादन का कार्य कर रही हैं ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 3 जाँच अभी जारी है 1

प्रमुख कृतियाँ – ‘छुटकारा’, ‘सीट नबंर छह’, ‘उनका यौवन’, ‘प्रतिदिन’ ‘जाँच अभी जारी है’, ‘पच्चीस साल की लड़की’ (कहानी-संग्रह), ‘बेघर’, ‘नरक दर नरक’, ‘दौड़’, ‘अंधेरे का ताला’ (उपन्यास), ‘खांटी घरेलू औरत’ (कविता) आदि हैं। 9 महत्वपूर्ण पुस्तकों का सम्पादन किया है। नारीविमर्श एवं पत्रकारिता के विभिन्न पक्षों पर उन्होंने प्रामाणिक लेखन किया है । उन्हें 15 से अधिक महत्वपूर्ण साहित्यिक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए हैं ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 2 कर्मनाशा की हार

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions सहायक पाठ Chapter 2 कर्मनाशा की हार to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Chapter 2 Question Answer – कर्मनाशा की हार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 : ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी में किन समस्याओं को उजागर किया गया है ?
अथवा
प्रश्न 2 : ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें ।
अथवा
प्रश्न 3 : ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के माध्यम से कहानीकार ने हमें क्या संदेश देना चाहा है ? यह कहानी आज के समय में कितनी उपयुक्त सिद्ध होती है ?
अथवा
प्रश्न 4 : ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के उदेश्य को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
प्रश्न 5 : ‘कर्मनाशा की हार’ एक सामाजिक अंधविश्वास पर आधारित कहानी है कैसे ? स्पप्ट कीजिए।
अथवा
प्रश्न 6 : ‘कर्मनाशा की हार’ पाठ के आधार पर बताइए कि कर्मनाशा क्या है ? कहाँ स्थित है ? पाठ के मुख्य नायक कौन ? उन्होंने समाज को क्या सीख दी ? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
‘कर्मनाशा की हार’ शिव प्रसाद सिंह की एक चर्चित कहानी है। इस कहानी में लेखक ने सामाजिक अंधविश्वास तथा कुरीतियों पर चोट करते हुए मानवतावाद की स्थापना करना चाहा है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 2 कर्मनाशा की हार

‘कर्मनाशा की हार’ में एक निम्न जाति की लड़की फुलमती और बाह्मण युवक कुलदीप के प्रेम की कहानी है। कुलदीप के बड़े भाई भैरो पाण्डे ने कुलदीप को अपने पुत्र की तरह पाला है। वे इन दोनो के प्रेम संबंधों के बारे में जानकर मन ही मन कुढ़ते रहते हैं लेकिन पितृवत प्रेम के कारण खुलकर कुछ कह नही पाते।

गाँव भी इस संबंध में फुसफुसाता है, ग्रामीण औरतों की जुबान पर भी इस प्रेम-संबंध की चर्चा है। एक तरफ गाँव वालों का विरोध है तथा दूसरी और उच्च वर्ण की मार्यादा तथा तीसरी ओर भाई के प्रति प्रेम – भैरो इस त्रिकोण में फस कर कुछ निर्णय नहीं ले पाते। फुलमती जब अविवाहिता की स्थिति में कुलदीप के बच्चे को जन्म देती है तो सारा गाँव विरोध में उठ खड़ा होता है।

कर्मनाशा नदी में आई प्रलयकारी बाढ़ तथा इससे होनेवाले गाँव के नुकसान के लिए सभी फुलमती को ही दोषी उहराते हैं। गाँववाले यह निर्णय लेते हैं कि फुलमती के नवजात शिशु को कर्मनाशा की बलि दे दिया जाय। ऐसा करके ही कर्मनाशा के कोप से बचा जा सकता है। तभी भैरो पाण्डे आगे बढ़कर पूरे गाँव तथा मुखिया का विरोध करते हुए फुलमती और उसके बच्चे को अपना लेते है –

‘”मैं आपके समाज को कर्मनाशा से कम नहीं समझता। किन्तु, मैं एक-एक पाप गिनाने लगूँ तो यहाँ खड़े सारे लोगों को परिवार समेत कर्मनाशा के पेट में जाना पड़ेगा है कोई तैयार जाने को

इस पूरी कहानी में सामाजिक परिवेश के चित्रण के साथ-साथ विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति की प्रधानता दिखाई गई है। इसमें जीवन तथा मानवीयता के सौंदर्य की झलक है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने मानव-मात्र के प्रति करुणा और प्रेम का संदेश देना चाहा है तथा अंधविश्वास से भैरो पाण्डे का अस्वीकार करना कहानी को आधुनिक बनाता है।

प्रश्न 7 : ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण करें ।
अथवा
प्रश्न 8 : ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के भैरो पाण्डे की चारित्रिक विशेषताओ को लिखें ।
अथवा
प्रश्न 9 :
‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के भैरो पाणड्डे की चरित्र-चित्रण करें ।
उत्तर :
‘कर्मनाशा की हार’ डॉ॰ शिव प्रसाद सिंह की बहुचर्चित कहानी है । भैरो पाण्डे इस कहानी का प्रमुख पात्र है तथा इसने मुझे काफी प्रभावित किया है। भैरो पाण्डे की चारित्रिक विशेषताओं को इन शीषकों के अंतर्गत देखा जा सकता है –

(क) आदर्श भाई – छोटे भाई कुलदीप के जन्म के कुछ समय बाद ही माता-पिता इस दुनिया से चल बसे। दो साल के कुलदीप का लालन-पालन भैरो पाण्डे ने पिता की तरह किया । भैरो पाण्डे फुलमतिया के साथ कुलदीप के प्रेम-प्रसंग से मन ही मन नाराज हैं लेकिन पितृवत स्नेह के कारण कुछ कह नहीं पाते ।

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(ख) स्नेह, संस्कार, सामाजिक वर्जना तथा कर्त्तव्य के बीच दूंद्व – एक तरफ भाई के प्रति स्नेह का अपार संचार, दूसरी तरफ संस्कार तथा सामाजिक वर्जनाएँ- भैरों पाण्डे लगातार इस द्नन्द्ध से गुजरते रहते हैं तथा कुछ निर्णय नहीं ले पाते हैं।

(ग) अंधविश्वास के विरोधी एवं साहसी – सारा गाँब फुलमतिया के गर्भ से पैदा होने वाले नवजात शिशु को कर्मनाशा की बलि देना चाहता है । उनका ऐसा विश्वास है कि ऐसा करने से बाढ़ से रक्षा होगी । ऐसे समय भैरो पाण्डे अंधविश्वास को नकारते हुए फुलमतिया और उसके बच्चे को आगे बढ़कर साहस के साथ स्वीकार कर लेते हैं।

(घ) मानव-धर्म तथा आधुनिकता का पुजारी – भैरो पाण्डे में मानव-मात्र के प्रति करुणा है । अंविश्वास का विरोध करना ही भैरो पाण्डे को आधुनिक बनाता है तथा इस कहानी को भी।

इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि भैरो पाण्डे का चरित्र एक आदर्श चरित्र है । उसका चरित्र उस आम आदमी का चरित्र है जो अंधविश्वास, उपेक्षा, विवशता आदि के नीचे पिसता हुआ भी अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत हित के लिए लड़ता है तथा संघर्ष के बाद विजयी भी होता है।

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘यह चुड़ैल मेरा घर खा गई’ में ‘चुड़ैल’ का प्रयोग किसके लिए हुआ है ?
उत्तर :
फूलमती।

प्रश्न 2.
‘कर्मनाशा की हार’ के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 3.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
उत्तर :
सन् 1929 में वाराणसी में।

प्रश्न 4.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह ने उच्च शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?
उत्तर :
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से।

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प्रश्न 5.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह किस विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष थे?
उत्तर :
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के।

प्रश्न 6.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह की प्रथम कहानी का नाम लिखें।
उत्तर :
‘दादी माँ’।

प्रश्न 7.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह की पहली रचना कब और किसमें प्रकाशित हुई थी ?
उत्तर :
सन् 1951 में ‘प्रतीक’ में।

प्रश्न 8.
‘इनें भी इंतजार है’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
डॉ० शिवमसाद सिंह।

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प्रश्न 9.
‘राग गूजरी’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 10.
‘भेदिए’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
डॉं० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 11.
‘अलग-अलग वैतरणी’ (उपन्यास) के लेखक का नाम लिखें।
उत्तर :
डॉ० शिवपसाद सिंह।

प्रश्न 12.
‘गली आगे मुड़ती है’ (उपन्यास) के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
डॉ० शिवपसाद सिंह।

प्रश्न 13.
‘नीला चाँद’ (उपन्यास) के लेखक कौन हैं ?
उत्तर :
डॉं० शियप्रसाद सिंह।

प्रश्न 14.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह को उनके किस उपन्यास पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ?
उत्तर :
‘नीला चाँद।’

प्रश्न 15.
डॉ० शिव प्रसाद सिंह के लोकप्रिय नाटक का नाम लिखें।
उत्तर :
‘घाटियाँ गूंजती हैं।’

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प्रश्न 16.
‘शिखरों के सेतु’ (निबंध-संग्रह) के निबंधकार कौन हैं ?
उत्तर :
डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 17.
‘कस्तूरी मृग’ (निबंध-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
डॉ० शिवपसाद सिंह।

प्रश्न 18.
‘चतुर्दिक’ (निबंध-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर :
डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 19.
‘विद्यापति’ (आलोचनात्मक लेख) के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
डॉ० शिवम्रसाद सिंह।

प्रश्न 20.
‘आधुनिक परिवेश और नवलेखन’ (आलोचनात्मक लेख) के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर :
डॉं० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 21.
‘आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद’ (आलोचनात्मक लेख) के लेखक कौन हैं ?
उत्तर :
डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 22.
‘उत्तरयोगी श्री अरविंद’ (जीवनी) के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
डॉं० शिवप्रसाद सिंह।

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प्रश्न 23.
कर्मनाशा किसका नाम है?
उत्तर :
नदी का।

प्रश्न 24.
कर्मनाशा के बारे में लोगों का क्या विश्वास प्रचलित था ?
उत्तर :
यदि एक बार कर्मनाशा बढ़ आए तो बिना मनुष्य की बलि लिए लौटती नहीं।

प्रश्न 25.
नई डीहवालों को किसका खौफ नहीं था, क्यों?
उत्तर :
नई डीहवालों को कर्मनाशा नदी का खौफ नहीं था क्योंक वे थोड़ी ऊँचाई पर बसे हुए थे।

प्रश्न 26.
कर्मनाशा में बाढ़ आने पर नई डीहवाले क्या करते थे ?
उत्तर :
मुखिया जी के दरवाजे पर इकट्रा होकर कजली सावन की ताल पर दोलकों पर थाप देते।

प्रश्न 27.
क्या देखकर नई डीहवालों में होलदिली (घबड़ाहट) छा गई ?
उत्तर :
ऊँचे बसे गाँव के किनारे पर कर्मनाशा धारा लगातार टक्कर मार रही थी, बड़े-बड़े पेड़ जड़-मूल के साथ नदी के पेट में समा रहे थे। यह प्रलय का संदेश था।

प्रश्न 28.
किस गाँव के लोग चूहेदानी में फँसे चूहों की तरह भय से दौड़-धूप कर रहे थे ?
उत्तर :
नईडीह गाँव के लोग।

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प्रश्न 29.
किस गाँव के लोगों के चेहरे पर मुर्दानी छा गई थी ?
उत्तर :
नईडीह गाँव के लोगों के चेहरे पर।

प्रश्न 30.
दीनापुर के सोखा (भगत) ने क्या भविष्यवाणी की थी ?
उत्तर :
इतना पानी गिरेगा कि तोन घड़े भर जाएँगे, आदमी-मवेशी की क्षय (नुकसान) होगी, चारों और हाहाकर मच जाएगा।

प्रश्न 31.
कुएँ की जगत से बाल्टी सहित घबड़ाकर कौन नीचे कूद पड़ा?
उत्तर :
जागेसर पाण्डे।

प्रश्न 32.
“परलय न होगी, तो क्या बरक्कत होगी?” – वक्ता कौन है?
उत्तर :
धनेसरा चाची।

प्रश्न 33.
उसकी माई कैसी सतवन्ती बनती थी – ‘डसकी माई’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
फुलमतिया की माई (माँ)।

प्रश्न 34.
लोगों को परलय (प्रलय) की सूचना किसने दी ?
उत्तर :
धनेसरा चाची ने।

प्रश्न 35.
विचित्र दृश्य है – वक्ता कौन है?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 36.
भैरो पाण्डे के दादा कौन थे ?
उत्तर :
भैरी पाण्डे के दादा गाँव के नामी पंडित थे। उनका ऐसा प्रभाव था कि कोई किसी को सताने की हिम्मत नहीं करता था।

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प्रश्न 37.
मुद्ठी में बंद जुगनू हाथ के बाहर निकल गया – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
उत्तर :
कर्मनाशा की हार से।

प्रश्न 38.
नईडीह गाँव का कौन-सा व्यक्ति पैर से पंगु है ?
उत्तर:
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 39.
भैरो पाणडे की दिनचर्चा क्या थी?
उत्तर :
भैरो पाण्डे दिन-भर बरामदे में बैठकर रूई से बिनौले (बीज) निकालते, तूमते (घुनते), सूत तैयार करते और अपनी तकलो नचा-नचाकर जनेऊ बनाते, जजमानी चलाते, पत्रा देखते एवं सत्यनारायण की कथा बाँच देते।

प्रश्न 40.
फुलमतिया के तुलसी-चौरे पर सिर रखकर प्रार्थना करते देख भैरो पाण्डे को किसकी याद आती है?
उत्तर :
अपनी माँ की याद आती है।

प्रश्न 41.
किसके रूख से फुलमतिया सशंकित हो गई थी?
उत्तर:
भैरो पाण्डे के रूख से।

प्रश्न 42.
कुलच्छनी अब क्या चाहती है – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
उत्तर:
कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 43.
फुलमतिया किसकी बेटी है ?
उत्तर :
टीमल मल्लाह की।

प्रश्न 44.
यह कबूतर की तरह मुँह फुलाए बैठा रहता है – ‘यह’ कौन है ?
उत्तर :
भैरो पाण्डे का छोटा भाई कुलदीप।

प्रश्न 45.
मुखिया जी की बेटी की शादी में कहाँ की बाई नाचने आई थी ?
उत्तर :
बनारस की।

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प्रश्न 47.
मुखिया की बेटी की शादी के दिन गाँववालों में किसकी होड़ लग गई ?
उत्तर :
बनने-सँवरने की।

प्रश्न 48.
मुखिया की बेटी की शादी में आई बाई ने कौन-सा गीत गया?
उत्तर :
नीच ऊँच कुछ बूझत नाहीं, मैं हारी समझाय ये दोनों नैना बड़े बेदरदी दिल में गड़ि गए हाय।

प्रश्न 49.
आशय स्पष्ट करें –
नीच ऊँच कुछ बूझत नाहीं, मैं हारी समझाय।
बे दोनों नैना बड़े बेदरदी दिल में गड़ि गए हाय।
उत्तर :
मेरे ये दोनों नैना बड़े बेदर्द हैं। मैं इन्हें समझा कर हार गई लेकिन ये नीच-ऊँच की बातें कुछ समझते ही नहीं, मेरे दिल में गड़ गए हैं।

प्रश्न 50.
“झूठे, पेट में दर्द था कि आँख में” – वक्ता और श्रोता का नाम लिखें।
उत्तर :
वक्ता भैरो पाण्डे हैं तथा श्रोता कुलदीप है।

प्रश्न 51.
अच्छे घर में जन्म लेने से कोई बहुत बड़ा नहीं हो जाता – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
उत्तर :
कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 52.
‘आँसुओं में जो पश्चाताप उमड़ता है, वह दिल की कलौंज (कलिमा) को मांज (चमका) डालता है” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से उद्धत है ?
उत्तर :
कर्मनाशा की हार।

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प्रश्न 53.
“तुम मुझे मंझधार में लाकर छोड़ तो नहीं दोगे” – वक्ता का नाम लिखें।
उत्तर :
टीमल मल्लाह की बेटी फुलमतिया।

प्रश्न 54.
“तुम गलत रास्ते पर पाँव रख रहे हो बेटा” – वक्ता कौन है ?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 55.
“काश, फुलमत अपनी ही जाति की होती” – वक्ता कौन है ?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 56.
“कितना अच्छा होता, वह विधवा न होती” – किसके बारे में कौन कह रहा है?
उत्तर :
भैरो पाण्डे फुलमतिया के बारे में कह रहे हैं।

प्रश्न 57.
‘तू मेरी हत्या करने पर ही तुल गया है” – वक्ता कौन है?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 58.
‘इतने निर्लज्ज हो तुम दोनों’ – दोनों से कौन संकेतित हैं ?
उत्तर :
भैरो पाण्डे का भाई कुलदीप और टीमल मल्लाह की बेटी फुलमतिया।

प्रश्न 59.
“मोहे जोगिनी बनाके कहाँ गइले रे जोगिया” – किस पाठ से लिया गया है?
उत्तर :
कर्मनाशा की हार।

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प्रश्न 60.
“डसने पाप किया है” – ‘उसने’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
फुलमति।

प्रश्न 61.
“बोतल की टीप खुल गई थी” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
उत्तर :
कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 62.
“वह बहू-बच्चे को छोड़कर भाग सकता है” – ‘वह’ कौन है?
उत्तर :
कुलदीप।

प्रश्न 63.
‘वह बहू-बच्चे को छोड़कर भाग सकता है”‘ – वक्ता कौन है ?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 64.
“मैं आपके समाज को कर्मनाशा से कम नहीं समझता” – वक्ता कौन है?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 65.
“यहाँ खड़े सारे लोगों को परिवार समेत कर्मनाशा के पेट में जाना पड़ेगा” – वक्ता कौन है ?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

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प्रश्न 66.
पत्थर की विशाल मूर्च्चि की तरह उन्नत प्रशस्त, अटल’ – किसके बारे में कहा गया है?
उत्तर :
भैरो पाण्डे के बारे में।

प्रश्न 67.
“किन्तु मैं कायर नहीं हूँ” – वक्ता कौन है?
उत्तर :
भैरो पाण्डे।

प्रश्न 68.
“किंतु मैं कायर नहीं हूँ” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
उत्तर :
‘कर्मनाशा की हार’ से।

प्रश्न 69.
“एक के पाप के लिए सारे गाँव को मौत के मुँह में नहीं झोंक सकते’ – वक्ता कौन है?
उत्तर :
नईडीह गाँव का मुखिया।

प्रश्न 70.
“उसकी माँ का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है” – किस पाठ से उद्धत है तथा वक्ता कौन है ?
उत्तर :
‘कर्मनाशा की हार’ पाठ से उद्दुत है तथा वक्ता भैरो पाण्डे हैं।

प्रश्न 71.
‘बढ़ी नदी का हौसला कम न हुआ'” – किस नदी का हौसला कम नहीं हुआ?
उत्तर :
कर्मनाशा नदी।

प्रश्न 72.
किसके गीतों की कड़ियाँ मुरझाकर होठों से पपड़ी की तरह छा गई?
उत्तर :
नईडीह गाँव के लोगो की।

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प्रश्न 73.
कौन लोग कर्मनाशा के उग्र रूप से काँप उठे?
उत्तर :
नईडीह गाँव के लोग।

प्रश्न 74.
पिछले साल कर्मनाशा को लोगों ने कैसे शांत किया था ?
उत्तर :
पूजा-पाठ कराकर।

प्रश्न 75.
नईडीह गाँव कहाँ बसा हुआ था?
उत्तर :
ऊँचे अरार (भूमि) पर।

प्रश्न 76.
नईडीह गाँव के लोगों के चेहरे पर मुर्दानी क्यों छा गई थीं?
उत्तर :
कर्मनाशा नदी का प्रलयंकारी रूप देखकर।

प्रश्न 77.
”कल दीनापुर में कड़ाह चढ़ा था पाण्डे जी”‘ – वक्ता कौन है?
उत्तर :
ईसुर भगत।

प्रश्न 78.
ईसुर भगत ने अपनी बात का विश्वास दिलाने के लिए किसकी सरन (कसम) खाई ?
उत्तर :
काशीनाथ की।

प्रश्न 79.
“कुतिया ने पाप किया, गाँव के सिर बीता” – वक्ता कौन है?
उत्तर :
धनेसरा चाची।

प्रश्न 80.
‘मौत का ऐसा भयंकर स्वप्न भी शायद ही किसी ने देखा था” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
उत्तर :
कर्मनाशा की हार।

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प्रश्न 81.
भौंरे पाण्डे के माध्यम से लेखक ने किस अंधविश्वास को तोड़ा है?
उत्चर :
इस अंधविश्वास को तोड़ा है कि कर्मनाशा बलि चाहती है।

प्रश्न 82.
‘कर्मनाशा की हार’ किस कोटि की कहानी है?
उत्तर :
‘कर्मनाशा की हार’ भारतीय ग्रामीण परिवेश की मर्मस्पर्शी कहानी है।

प्रश्न 83.
डॉ० शिवप्रसाद सिंह की अधिकाश कहानियों का उद्देश्य क्या रहा है?
उत्तर :
सामाजिक विसंगतियों तथा अंधविश्वासों पर प्रहार करना।

प्रश्न 84.
डॉ० शिवप्रसाद सिंह की बहुचर्चित कहानी का नाम लिखें।
उत्तर :
कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 85.
गाँव का सारा आतंक, भय, पाप किसके पीछे कुत्ते की तरह दुम दबाए चले जा रहे थे ?
उत्तर :
धनेसरा चाची के पीछे।

प्रश्न 86.
कर्मनाशा को बलि क्यों चढ़ाई जाती थी ?
उत्तर :
कर्मनाशा के प्रकोप से बचने के लिए ।

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प्रश्न 87.
कर्मनाशा की हार’ कहानी में किस गाँव का उल्लेख हुआ है ?
उत्तर :
नईडीह गाँव का।

प्रश्न 88.
‘कर्मनाशा की हार’ में कर्मनाशा क्या है ?
उत्तर :
एक नदी।

प्रश्न 89.
‘कर्मनाशा की हार’ कहानी किस विषय पर आथारित है ?
उत्तर :
लोगों के अंधविश्वास पर आधारित है ।

प्रश्न 90.
भैरो पाण्डे बैशाखी के सहारे अपनी बखरी के दरवाजे पर खड़े क्या देख रहे थे ?
उत्तर :
बाढ़ के पानी का जोर देख रहे थे ।

प्रश्न 91.
भैरो पाण्डे दिन भर बरामदे में बैठकर क्या करते थे ?
उत्तर :
रूई से बिनौले निकालते, तूँमते, सूत तैयार करते, तकली चलाकर जनेऊ बनाते, जजमानी चलाते, पत्रा देखते थे ।

प्रश्न 92.
‘कर्मनाशा की हार’ कहानी में लेखक ने किस पर चोट किया है ?
उत्तर :
अंधविश्वास पर चोट किया है।

प्रश्न 93.
‘आर-पार की माला’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
डों० शिवम्रसाद सिंह।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“पेट में दर्द था” – प्रस्तुत वाक्य किसने किससे कहा था ?
(क) कुलदीप ने भैरों पाण्डे से
(ख) भैरों पाण्डे ने कुलदीप से
(ग) मुखिया जी ने भैरों पाण्डे से
(घ) जगेसर ने ओझा से
उत्तर :
(क) कुलदीप ने भैरों पाण्डे से

प्रश्न 2.
‘कर्मनाशा की हार’ के लेखक हैं :
(क) फणीश्वर नाथ रेणु
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) शेखर जोशी
(घ) डॉ॰ शिव प्रसाद सिंह
उत्तर :
(घ) डों० शिव प्रसाद सिंह।

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प्रश्न 3.
डॉ० शिवप्रसाद सिंह की पहली कहानी है?
(क) आर-पार की माला
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) दादी माँ
(घ) भेदिए
उत्तर :
(ग) दादी माँ।

प्रश्न 4.
डॉ० शिवप्रसाद सिंह की पहली कहानी किसमें प्रकाशित हुई?
(क) प्रतीक में
(ख) चंदा मामा में
(ग) सारिका में
(घ) धर्मयुग में
उत्तर :
(क) प्रतीक में।

प्रश्न 5.
‘आर-पार की माला’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार हैं :
(क) शेखर जोशी
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) प्रेमचंद
(घ) डॉ० शिव प्रसाद सिंह
उत्तर :
(घ) डॉं० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 6.
‘राग गूजरी’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार हैं :
(क) डॉ० शिवप्रसाद सिंह
(ख) अमरकांत
(ग) ममता कालिया
(घ) मन्नू भंडारी
उत्तर :
(क) डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

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प्रश्न 7.
‘भेदिए’ (कहानी-संग्रह) के लेखक हैं :
(क) ममता कालिया
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) अमरकांत
(घ) डॉं० शिवप्रसाद सिंह
उत्तर :
(घ) डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 8.
‘अलग-अगल वैतरणी’ (उपन्यास) किसकी रचना है?
(क) अमरकांत की
(ख) डाँ० शिवप्रसाद सिंह की
(ग) ममता कालिया की
(घ) निराला की
उत्तर :
(ख) डॉ० शिवग्रसाद सिंह की।

प्रश्न 9.
‘गली आगे मुड़ती है’ (उपन्यास) के लेखक हैं?
(क) नागार्जुन
(ख) मोहन राकेश
(ग) डॉ० शिव प्रसाद सिंह
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) डॉ॰ शिवप्रसाद सिहे।

प्रश्न 10.
‘नीला-चाँद’ (उपन्यास) किसकी रचना है?
(क) नागार्जुन की
(ख) प्रसाद की
(ग) मोहन राकेश की
(घ) डॉ० शिव प्रसाद सिंह की
उत्तर :
(घ) डॉं० शिवप्रसाद सिंह की।

प्रश्न 11.
निम्न में से शिव प्रसाद सिंह का लोकप्रिय नाटक कौन-सा है?
(क) आधे-अधूरे
(ख) घाटियाँ गूंजती हैं
(ग) परदा गिराओ परदा उठाओ
(घ) लहरों के राजहंस
उत्तर :
(ख) घाटियाँ गूंजती हैं।

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प्रश्न 12.
‘शिखरों के सेतु’ के निबंधकार हैं :
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ख) रामचंद्र शुक्ल
(ग) डॉ० शिवप्रसाद सिंद्ध
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(ग) डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 13.
‘कस्तूरी मृग’ के निबधकार हैं :
(क) डॉ० शिवप्रसाद सिंह
(ख) ममता कालिया
(ग) मन्नू भंडारी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) डॉ० शिवपसाद सिंह।

प्रश्न 14.
‘चतुर्दिक’ के निबंधकार कौन हैं?
(क) मन्नू भंडारी
(ख) निराला
(ग) पंत
(घ) डों शिवप्रसाद सिंह
उत्तर :
(घ) डॉ० शिवप्रसाद सिंह।

प्रश्न 15.
डॉ० शिवप्रसाद सिंह द्वारा लिखित जीवनी का नाम है :
(क) कर्मयोगी
(ख) उत्तरयोगी श्री अरविंद
(ग) महात्मा कबीर
(घ) महात्मा शेखसादी
उत्तर :
(ख) उत्तरयोगी श्री अरविंद।

प्रश्न 16.
‘आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद’ (आलोचनात्मक लेख) किसकी रचना है?
(क) डों० नगेन्द्र की
(ख) पंत की
(ग) डॉ० शिवप्रसाद सिंह की
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) डॉ० शिवग्रसाद सिंह की।

प्रश्न 17.
‘आधुनिक परिवेश और नवलेखन’
(आलोचनात्मक लेख) के लेखक हैं?
(क) प्रेमचंद
(ख) डॉ० शिवप्रसाद सिंह
(ग) निराला
(घ) नागार्जुन
उत्तर :
(ख) डॉ० शिवपसाद सिंह।

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प्रश्न 18.
डॉ० शिवप्रसाद सिंह की कौन-सी कहानी चरित्र-प्रधान कहानी है?
(क) कर्मनाशा की हार
(ख) आर-पार की माला
(ग) भेदिए
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 19.
नईडीह वालों को किसका खौफ नहीं था?
(क) मुख्यिया का
(ख) भैरो पाण्डे का
(ग) कर्मनाशा का
(घ) ईसुर भगत का
उत्तर :
(ग) कर्मनाशा का।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में कौन ‘कर्मनाशा की हार’ का पात्र नहीं है?
(क) हिरामन
(ख) ईसुर भगत
(ग) मुखिया
(घ) कुलदीप
उत्तर :
(क) हिरामन।

प्रश्न 21.
‘कर्मनाशा की हार’ में नईडीह के अलावे अन्य किस गाँव का नाम आया है?
(क) फारबिसगंज
(ख) ननकपुर
(ग) छत्तरपुर
(घ) दीनापुर
उत्तर :
(घ) दीनापुर।

प्रश्न 22.
धनेसरा चाची किस कहानी की पात्र है?
(क) तीसरी कसम
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) नमक
(घ) त्रिशांकु
उत्तर :
(ख) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 23.
‘दाल में काला होना’ का अर्थ है?
(क) संदेह होना
(ख) विश्वास होना
(ग) दाल सड़ जाना
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) संदेह होना।

प्रश्न 24.
“कुछ साफ भी कहोगी भौजी” – वक्ता कौन है?
(क) भैरो पाण्डे
(ख) कुलदीय
(ग) जागेसर पाण्डे
(घ) धनेसरा
उत्तर :
(ग) जागेसर पाण्डे।

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प्रश्न 25.
‘कर्मनाशा की हार’ में चाची का नाम क्या है?
(क) परलतिया चाची
(ख) मनखेरी चाची
(ग) धनेसरा चाची
(घ) रामप्यारी चाची
उत्तर :
(ग) धनेसरा चाची।

प्रश्न 26.
नईडीह वालों को प्रलय की सूचना किसने दी?
(क) जागेसर पाण्डे
(ख) धनसेरा चाची
(ग) ईसुर भगत
(घ) कुलदीप
उत्तर :
(ख) धनसेरा चाची।

प्रश्न 27.
जब माँ-बाप की मृत्यु हुई तो कुलदीप की उप्र कितनी थी?
(क) चार साल
(ख) दो साल
(ग) साठ साल
(घ) छ: साल
उत्तर :
(ख) दो साल।

प्रश्न 28.
पैर से पंगु कौन है ?
(क) लहना सिंह
(ख) जागेसर पाण्डे
(ग) भैरो पाण्डे
(घ) ईसुर भगत
उत्तर :
(ग) भैरो पाण्डे।

प्रश्न 29.
“भाग का लेख कौन टारे” – का अर्थ है?
(क) भाग्य से ही लिखा जा सकता है
(ख) भागने पर कौन लिख सकता है
(ग) भाग्य का लिखा कोन टाल सकता है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) भाग्य का लिखा कौन टाल सकता है ?

प्रश्न 30.
कौन देस-दिहात के नामी-गिरामी पंडित थे?
(क) ईसुर भगत
(ख) जागेसर पाण्डे
(ग) भैरों पाण्डे
(घ) पाण्डे दादा
उत्तर :
(घ) पाण्डे दादा।

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प्रश्न 31.
“अब यह भी न बचेगी” – ‘यह’ कौन है?
(क) फुलमतिया
(ख) बखरी
(ग) कर्मनाशा
(घ) धनसेरा
उत्तर :
(क) फुलमतिया।

प्रश्न 32.
किसे धन के नाम पर बाप का कर्ज मिला?
(क) जागेसर पाण्डे को
(ख) ईसुर भगत को
(ग) कुलदीप को
(घ) भैरो पाण्डे को
उत्तर :
(घ) भैरो पाण्डे को।

प्रश्न 33.
‘कर्मनाशा की हार’ में मिर्च की तरह तीखी आवाज किसकी है?
(क) भैरो पाण्डे की
(ख) मुखिया की
(ग) धनेसरा चाची की
(घ) ईसुर भगत की
उत्तर :
(ग) धनेसरा चाची की।

प्रश्न 34.
भैरो पाण्डे निम्नलिखित में से कौन-सा काम नहीं करते?
(क) रूई से बिनौले निकालना
(ख) तकली से जनेऊ बनाना
(ग) कपड़े बुनना
(घ) पत्रा देखना
उत्तर :
(ग) कपड़े बुनना।

प्रश्न 35.
कौन गाँव के इस छोर से उस छोर तक चक्कर लगा रही थी?
(क) फुलमतिया
(ख) धनेसरा चाची
(ग) सनसनाती हवा
(घ) फुलमतिया की माँ
उत्तर :
(ग) सनसनाती हवा।

प्रश्न 36.
“सब कुछ गया” – वक्ता कौन है?
(क) लहना सिंद
(ख) भैरो पाण्डे
(ग) जेन
(घ) सफ़िया
उत्तर :
(ख) भैरो पाण्डे।

प्रश्न 37.
“तेरी आँख में सौ कुण्ड बालू” – वक्ता कौन है?
(क) भैरो पाण्डे
(ख) जागेसर पाण्डे
(ग) कुलदीप
(घ) धनेसरा चाची
उत्तर :
(क) भैरो पाण्डे।

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प्रश्न 38.
“तेरी आँख में सौ कुण्ड बालू” – ‘तेरी’ से कौन संकेतित है?
(क) फुलमतिया
(ख) कुलदीप
(ग) मुखिया
(घ) ईसुर भगत
उत्तर :
(ग) मुखिया।

प्रश्न 39.
‘लड़के ने उन्हें किसी ओर का नहीं रखा” – ‘उन्हें’ से कौन संकेतित है?
(क) मुखिया
(ख) ईसुर भगत
(ग) जागेसर पाण्डे
(घ) भैरो पाण्डे
उत्तर :
(घ) भैरो पाण्डे।

प्रश्न 40.
”मरे, हम क्या करें” – वक्ता कौन है?
(क) जेन
(ख) लहना सिंह
(ग) भैरो पाण्डे
(घ) टीमल मल्लाह
उत्तर :
(ग) भैरो पाण्डे।

प्रश्न 41.
भैरो पाण्डे ने किसे क्षणिक खिलवाड़ माना था?
(क) कर्मनाशा की बाढ़ को
(ख) वर्षा को
(ग) कुलदीप और फुलमतिया के प्रेम को
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) कुलदीप और फुलमतिया के प्रेम को।

प्रश्न 42.
“कुलच्छनी अब क्या चाहती है” – ‘कुलच्छनी’ किसे कहा जा रहा है?
(क) कर्मनाशा को
(ख) फुलमतिया को
(ग) धनेसरा चाची को
(घ) कोसी को
उत्तर :
(ख) फुलमतिया को।

प्रश्न 43.
“यह चुड़ैल मेरा घर खा गई” – ‘चुड़ैल’ किसे कहा गया है?
(क) गंडक को
(ख) कोशी को
(ग) कर्मनाशा को
(घ) फुलमतिया को
उत्तर :
(घ) फुलमतिया को।

प्रश्न 44.
अब जाने क्या करेगी – पंक्ति किस पाठ से उदृत है?
(क) कर्मनाशा की हार
(ख) जाँच अभी जारी है
(ग) तीसरी कसम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 45.
मुखिया की लड़की की शादी किस महीने में थी?
(क) आश्विन
(ख) कार्तिक
(ग) फाल्गुन
(घ) भादो
उत्तर :
(ग) फाल्गुन।

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प्रश्न 46.
‘ननीच ऊँच कुछ बूझत नाहीं, मैं हारी समझाय'” – पद्यांश किस पाठ से उद्धतत है?
(क) रैदास के पद
(ख) तीसरी कसम
(ग) कर्मनाशा की हार
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 47.
“यदि कोई देख ले तो” – गद्यांश किस पाठ से उद्दुत है?
(क) उसने कहा था
(ख) नमक
(ग) चपल
(घ) कर्मनाशा की हार
उत्तर :
(घ) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 48.
पाण्डे ने सोचा था कि ?
(क) कुलदीप अब ठीक रास्ते पर आ जाएगा
(ख) फुलमतिया गाँव से चली जाएगी
(ग) वह फुलमतिया की बलि दे देगा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) कुलदीप अब ठीक रास्ते पर आ जाएगा।

प्रश्न 49.
“मैं अपने प्राण दे सकता हूँ” – वक्ता कौन है?
(क) लहना सिंह
(ख) रंगय्या
(ग) कुलदीप
(घ) भैरो पाण्डे
उत्तर :
(ग) कुलदीप।

प्रश्न 50.
एक क्षण के लिए भैरो पाण्डे ने सोचा :
(क) वह कुलदीप को गाँव से बाहर कर देगा
(ख) काश, फुलमत अपनी ही जाति की होतो
(ग) तुम्हारा गला घोंटते मुझे देर न लगेगी
(घ) तुमने भैरो को प्यार देखा है कोध नहीं
उत्तर :
(ख) काश, फुलमत अपनी ही जाति की होती।

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प्रश्न 51.
“अब वह कभी नहीं लौटेगा” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) तौसरी कसम
(ख) चप्मल
(ग) नमक
(घ) कर्मनाशा की हार
उत्तर :
(घ) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 52.
‘अब वह कभी नहीं लौटेगा’ – ‘वह’ कौन है?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) रमण
(ग) कुलदीप
(घ) लहना सिंह
उत्तर :
(ग) कुलदीप।

प्रश्न 53.
“मैंने तो कई बार मना किया” – गद्यांश किस पाठ से उद्धत है?
(क) तीसरी कसम
(ख) नमक
(ग) कर्मनाशा की हार
(घ) चमल
उत्तर :
(ग) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 54.
“मैने तो कई बार मना किया” – वक्ता कौन है?
(क) सफ़िया का भाई
(ख) रंगय्या
(ग) भैरो पाण्डे
(घ) कुलदीप
उत्तर :
(घ) कुलदीप।

प्रश्न 55.
‘मोहे जोगिनी बनाके कहाँ गइले रे जोगिया” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है ?
(क) तीसरी कसम
(ख) उसने कहा था
(ग) कर्मनाशा की हार
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 56.
“फुलमत को नदी में फेंक रहे हैं” – वक्ता कौन है?
(क) मुखिया
(ख) ईसुर भगत
(ग) धनेसरा चाची
(घ) छबीला
उत्तर :
(घ) छबीला।

प्रश्न 57.
‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी का अर्थ है –
(क) बाँस के बिना बाँसुरी नहीं बनेगी
(ख) कारण नहीं होने से कार्य नहीं होगा
(ग) बाँसुरी बाँस से ही बन सकती है
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) कारण नहीं होने से कार्य नहीं होगा।

प्रश्न 58.
उसकी बूढ़ी माँ जार-बेजार रो रही थी – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) नन्हा संगीतकार
(ख) धावक
(ग) तीसरी कसम
(घ) कर्मनाशा की हार
उत्तर :
(घ) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 59.
‘पता नहीं, किस बैर का बदला ले रहा है बेचारी से’ – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से उद्धत है ?
(क) धावक
(ख) नन्हा संगीतकार
(ग) कर्मनाशा की हार
(घव) तीसरी कसम
उत्तर :
(ग) कर्मनाशा की हार।

प्रश्न 60.
नईडीह के लोग अवाक् किसकी ओर देख रहे थे?
(क) मुखिया
(ख) धनेसरा चाची
(ग) पाण्डे
(घ) कर्मनाशा नदी
उत्तर :
(ग) पाण्डे।

प्रश्न 61. ‘कर्मनाशा की हार’ में किसकी जीत होती है?
(क) मानवता की
(ख) मुखिया की
(ग) भैंरो पाण्डे की
(घ) कुलदीप की
उत्तर :
(क) मानवता की।

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प्रश्न 62.
फूलमती भैंरो पाण्डे के घर माँगने आई थी :
(क) लोटा
(ख) बाल्टी
(ग) रस्सी
(घ) सूत
उत्तर :
(ख) बाल्टी।

प्रश्न 63.
“कह सीता माँ विधि प्रतिकूला” – के रचनाकार हैं?
(क) डॉ० शिव प्रसाद सिंह
(ख) कबीर
(ग) तुलसीदास
(घ) सूरदास
उत्तर :
(ग) तुलसीदास।

प्रश्न 64.
‘कह सीता माँ विधि प्रतिकूला’ – पद्यांश किस पाठ से उद्दुत है ?
(क) चपल
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) तौसरी कसम
(घ) धावक
उत्तर :
(ख) कर्मनाशा की हार

प्रश्न 65.
”यह कबूतर की तरह मुँह फुलाए बैठा रहता है’ – ‘कबूतर’ किसे कहा गया है?
(क) जागेसर पाण्डे को
(ख) लहना सिंह को
(ग) जेन्को को
(घ) कुलदीप को
उत्तर :
(घ) कुलदीप को।

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प्रश्न 66.
फुलमति के बच्चे को किसने अपनी गोद में ले लिया?
(क) मुखिया ने
(ख) कुलदीप ने
(ग) भैरो पाण्डे ने
(घ) फुलमतिया की माँ ने
उत्तर :
(ग) भैरो पाण्डे ने।

प्रश्न 67.
फुलमतिया और उसके बचचे की बलि देने का निर्णय किसका था?
(क) भैरो पाण्डे का
(ख) मुखिया का
(ग) कुलदीप का
(घ) जोगेसर पाण्डे का
उत्तर :
(ख) मुखिया का।

प्रश्न 68.
भैरो पाण्डे ने अपने समाज की तुलना किससे की?
(क) त्रिशांकु से
(ख) जंगल से
(ग) कोशी से
(घ) कर्मनाशा से
उत्तर :
(घ) कर्मनाशा से।

प्रश्न 69.
प्रचलित विश्वास के अनुसार कर्मनाशा किसकी बलि लिए बिना नहीं लौटती है ?
(क) पशु की बलि
(ख) मानुस की बलि
(ग) पेड़ की बलि
(घ) पक्षी की बलि
उत्तर :
(ख) मानुस की बलि।

प्रश्न 70.
‘चुड़ैल मेरा घर खा गई’ – यह कथन किसका है ?
(क) भैरो पाण्डे
(ख) फुलमति के पिता
(ग) धनेसरा चाची
(घ) कुल दीपक
उत्तर :
(क) भैरो पाण्डे।

प्रश्न 71.
किसका पानी एक पौधे को छू ले, तो वह हरा नहीं हो सकता –
(क) गंगा
(ख) यमुना
(ग) सतलज
(घ) कर्मनाशा
उत्तर :
(घ) कर्मनाशा।

प्रश्न 72.
‘कुलदीप, जरा भीतर से बाल्टी दे देना’ – वक्ता कौन है ?
(क) भैरो पाण्डे
(ख) जागेसर पाण्डे
(ग) फुलमति
(घ) चाची
उत्तर :
(ख) भैरो पाण्डे।

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प्रश्न 73.
“तुम मझधार में लाकर छोड़ तो नहीं दोगे'” – यह उक्ति किसकी है ?
(क) फुलमतिया की
(ख) पतुरिया की
(ग) भैरो पाण्डे की
(घ) इनमें से किसी की नहीं
उत्तर :
(क) फुलमतिया की।

प्रश्न 74.
कर्मनाशा से किसकी कथा जुड़ी है –
(क) राज सुख की
(ख) भगीरथ की
(ग) त्रिशंकु की
(घ) विक्रमादित्य की
उत्तर :
(ग) त्रिशंकु की।

प्रश्न 75.
‘इ बाढ़ी नदिया जिया ले के माने’ गीत कौन गाते थे ?
(क) नईडीहवाले
(ख) नौटकीवाले
(ग) भैरो पाण्डे
(घ) नवयुवक
उत्तर :
(क) नईडीहवाले।

प्रश्न 76.
‘अब यह भी न बचेगी’ – ‘यह’ किसके लिए आया है ?
(क) फुलमति के लिए
(ख) कर्मनाशा के लिए
(ग) घर की दीवारों के लिए
(घ) गाय के लिए
उत्तर :
(ग) घर की दीवारों के लिए।

प्रश्न 77.
‘भगवान कसम तेरा गला घोंट दूँगा’ – वक्ता कौन है ?
(क) कुलदीप
(ख) मुखिया
(ग) भैरो पाण्डे
(घ) ईसुर भगत
उत्तर :
(ग) भैरो पाण्डे ।

प्रश्न 78.
‘भूखा बैठा होगा कहीं’ – किसके लिए कहा गया है ?
(क) हिरामन
(ख) कुलदीप
(ग) जेन्को
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(ख) कुलदीप।

प्रश्न 79.
‘न पढ़ता है, न लिखता है’ – किसके बारे में कहा गया है ?
(क) जेन्को
(ख) अमीरूद्दीन
(ग) कुलदीप
(घ) जेन
उत्तर :
(ग) कुलदीप।

प्रश्न 80.
“भाग, नहीं तो तेरा गला घोंटकर इसी पानी में फेंक दुँगा” – वक्ता कौन है ?
(क) कुलदीप
(ख) भंबल दा
(ग) अशोक दा
(घ) भैरो पाण्डे
उत्तर :
(घ) भैरो पाण्डे।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 2 कर्मनाशा की हार

प्रश्न 81.
‘इन्हें भी इंतजार है’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार हैं :
(क) ममता कालिया
(ख) डॉ० शिवप्रसाद सिंह
(ग) रेणु
(घ) अमरकांत
उत्तर :
(ख) डॉ० शिवम्रसाद सिंह।

WBBSE Class 10 Hindi कर्मनाशा की हार Summary

लेखक – परिचय

डॉं० शिवप्रसाद सिंह का जन्म सन् 1929 में वाराणसी के एक जमींदार परिवार में हुआ था । शिक्षा वाराणसी में ही हुई । आगे चलकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष के पद पर आसीन हुए । इनकी पहली कहानी ‘दादी माँ’ सन् 1951 में ‘प्रतीक’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी । गाँव के प्रति इनके मन में जो लगाव है वह इनकी कहानियों में देखा जा सकता है ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 2 कर्मनाशा की हार 1

डॉ० शिव प्रसाद सिह की रचनाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –

कहानी-संग्रह – कर्मनाशा ही हार, आर-पार की माला, इन्हें भी इंतजार है, राग गूजरी, भेदिए ।
उपन्यास – अलग-अलग वैतरणी, गली आगे मुड़ती है, नीला चाँद ।
नाटक – घाटियाँ गूँजती हैं।
निबंध-संग्रह – शिखरों के सेतु, कस्तूरी मृग, चतुर्दिक ।
चर्चित कहानियाँ – दादी माँ, आर-पार की माला, पापजीवी, नन्हों, कर्मनाशा की हार, इन्हें भी इंतजार है तथा बिंदा महाराज ।

 

 

 

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Chapter 1 Question Answer – तीसरी कसम

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 : ‘तीसरी कसम’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 2 : ‘तीसरी कसम’ कहानी के शीर्षक पर विचार करें।
उत्तर :
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानियाँ हमें एक ऐसे हिंदुस्तान की यात्रा पर ले जाती है जो अभाव, अज्ञानता, अंधविश्वास, मजबूरी और बेबसी से घिरा है लेकिन इन सबके बावजूद बल्कि साथ-साथ जिसमें भरपूर रासरंग और फड़क के साथ जीने की ललक है। ‘तीसरी कसम’ फणीश्वरनाथ रेणु की एक ऐसी ही कहानी है।

कहानी का प्रारंभ वहाँ से होता है जब हीरामन नौटंकी कंपनी की हीराबाई को अपनी बेलगाड़ी से लालबाग के मेले में ले जा रहा है। बैलगाड़ी के हिचकोले खाने से रह-रहकर उसकी पीठ का स्पर्श हीराबाई के शरीर से होता है। यह सर्श उसके शरीर में रह-रहकर एक फुरफुरी-सी जगा देता है। यात्रा के क्रम में दोनों हिल मिल जाते हैं तथा हिरामन उसे महुआ घटवारिन की कथा गीत के माध्यम से सुनाता है।

उसके गीत से प्रभावित होकर अब हीरामन हीराबाई के लिए बैलगाड़ी का गाड़ीवान न रहकर मीता (मित्र) बन जाता है। मेले में पहुँचकर हीराबाई उसे ‘वेटर’ (थियेटर) में आने का पास देती है। धीरे-धीरे हीरामन हीराबाई से मन ही मन प्रेम करने लगता है। कई-कई सपने उसके मन में अंगड़ाई लेने लगते हैं लेकिन अचानक उसके जाने की खबर से वह सन्न रह जाता है। स्टेशन से गाड़ी खुलने पर उसके बैल भी जाती हुई रेलगाड़ी को टकटकी लगाकर देखते रहते हैं –
‘”सजनवा बैरी हो गये हमार। सजनवा ………….

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम

हीरामन आज अपनी जिंदगी की तीसरी कसम खाता है – कंपनी की औरत की लदनी नहीं करेगा।
पहली कसम थी कि चोरी का माल नहीं लादेगा, दूसरी कसम थी कि बाँस की लदनी नहीं करेगा।
कहानी का अंत यह दर्शाता है कि रेणु ने बहुत निकट से मनुष्य की पीड़ा, मजबूरी और गरीबी को पहचाना था वे अपने साथ अनुभव की पूरी संपदा लाए थे। ये अनुभव उनकी रचनाओं में इतने ताजे जान पड़ते हैं कि मानो अभी-अभी उन्होंने धरती से निकालकर अपनी कथाओं में पिरोया है।

प्रश्न 3 : ‘तीसरी कसम’ के जिस पात्र ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया है उसका चरित्रचित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 4 : ‘तीसरी कसम’ के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को लिखें ।
अथवा
प्रश्न 5 : ‘तीसरी कसम’ के हीराबाई का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 6 : ‘तीसरी कसम’ कहानी में आपको कौन-सा चरित्र सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों? सोदाहरण उत्तर दीजिए ।
उत्तर :
‘तीसरी कसम’ कहानी की हीराबाई ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया है क्योंकि हिरामन के चरित्र में जो गंवईपन है वह उसके वातावरण की देन है। लेकिन हीराबाई जैसी कलाकार के साथ उसके रग-ढंग, रुचि तथा उसके संगीत में ढल जाना उसके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है।

हिरामन भी हीराबाई को पहले-पहल देखकर शक करता है – ‘कहीं डाकिन-पिशाचिन तो नहीं ?’
लेकिन धीरे-धीरे वह हीराबाई के प्रेम भरे व्यवहार से खुलता चला जाता है, केवल व्यवहार ही नहीं उसकी मुस्कुराहट में भी खुशबू है|

हीराबाई नौटंकी में काम करती है और उसकी प्रसिद्धि भी चारों ओर छायी हुई है। फिर भी वह हिरामन के अंदर के कलाकार को इज्जत देती है, सराहती है । जब हीरा बाई उससे गाँव की भाषा में कोई गीत सुनाने का आग्रह करती है तो हिरामन को सुखद् आश्चर्य होता है –
“…. इस्स! इतना शौख गांव का गीत सुनने का है आपको !”
हिरामन ने कंपनी की पतुरिया के बारे में सुना था लेकिन हीराबाई को देखकर उसे आश्चर्य हो रहा है –
” हिरामन का जी जुड़ गया । हीराबाई ने अपने हाथ से उसका पत्तल बिछा दिया, पानी छींट दिया, चूड़ा निकालकर दिया । इस्स ! धन्न है, धन्न है ! हिरामन ने देखा, भगवती मैया भोग लगा रही है । लाल दोनों पर गोरस का पारस। पहाड़ी तोते को दूध-भात खाते देखा है ?'”

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इसी तरह अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों के बीच वह दिन भी आ जाता है जब हीराबाई नौटकी से वापस लौट रही है। वह हिरामन से कहती है – “हिरामन इधर आओ, अंदर ! मैं फिर लौटकर जा रही हूँ मथुरामोहन कंपनी में, अपने देश की कंपनी है….बनौली मेला में आओगे, न ?” हिरामन को ऐसा लगता है मानो उसकी दुनिया उजड़ गयी हो ”

उलटकर अपने खाली टपर की ओर देखने की हिम्मत नहीं होती । पीठ में आज भी गुदगुदी लगती है। ….वह तीसरी कसम खा रहा है….कम्पनी की औरत की लदनी नहीं करेगा ।” हिरामन ही क्यों पाठक भी कुछ देर के लिए ऐसा महसूस करते हैं मानो उनके जिंदगी की कोई कीमती चीज खो गई हो । इन्हीं सारे कारणों से ‘तीसरी कसम’ की हीराबाई ने मुझे ज्यादा प्रभावित किया है ।

प्रश्न 7 :
‘तीसरी कसम’ कहानी के हिरामन का चरित्र-चित्रण करें ।
उत्तर :
हिरामन ‘तीसरी कसम’ कहानी का प्रमुख प्रात्र है । हम उसे कहानी का नायक भी कह सकते हैं । हिरामन का चरित्र गाँव की मिट्टी से रचा-बसा है । उसके चरित्र की विशेषताओं को हम निम्नलिखित शीर्षको के अंतर्गत देख सकते हैं –
(क) भोला-भाला ग्रामीण गाड़ीवान – हिरामन का जैसा नाम है वैसा ही वह होरा भी है । वह अत्यंत ही भोला-भाला है । उसके जैसा कुशल गाड़ीवान उस इलाके में कोई दूसरा नहीं है। फारबिसगंज का हर चोर व्यापारी उसको पक्का गाड़ीवान मानता है।

(ख) ईमानदार – हिरामन इमानदार है लेकिन अनजाने में उसने कालाबाजारी का माल ढोया है । पुलिस और कोर्ट कचहरी के चक्कर में वह नहीं पड़ना चाहता है । इसलिए नमक की कालाबाजारी में जब उसकी बैलगाड़ी भी पकड़ी जाती है तो वह गाड़ी छोड़कर बैलों के साथ नौ-दो ग्यारह हो जाता है ।

(ग) लोकगीतों का बेजोड़ गायक-पूर्णिया तथा इसके आसपास की लोककथा तथा लोकगीतों की उसे पूरीपूरी जानकारी है । जब वह हीराबाई को –
‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ – सुनाता है तो हीराबाई को भी उसकी प्रशंसा करनी पड़ती है । रास्ते में महुवा घटवारिन से जुड़ी लोककथा को जब हिरामन गाकर सुनाता है तो हीराबाई उसे अपना गुरु मान लेती है।

(घ) छोकरा नाच का शौकीन – हिरामन जवानी के दिनों में छोकरा नाच का बड़ा शौकीन था। उसके कारण उसने भाभी ने न जाने कितनी बार डाँट खाया है। इतना ही नहीं, भाई ने उसे घर से निकल जाने को कहा था । हिरामन आज भी उस छोकरा-नाच वाले जमाने को याद करता है।

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(ङ) प्रेमी हुदय – हिरामन के पत्नी की मृत्यु बालपन में गौने से पहले ही हो गई थी । दूसरी शादी के लिए उसके मन में कोई इच्छा शेष नहीं रह गई है क्योंकि वह चालीस का हो चुका है । हीराबाई के साथ बैलगाड़ी में बिताए दो दिनों में उसके हृदय का प्रेम जग जाता है। वह मन ही मन हीराबाई से प्रेम करने लगता है। वह मेले की अपनी सारी कमाई को भी हीराबाई को ही रखने को देता है।

(च) निराश प्रेमी – जब हीराबाई हिरामन की अमानत उसे सौप कर चली जाती है तो हिरामन का दिल टूट जाता है । हीराबाई को लेकर ना जाने उसने कितने सपने सजाए थे । प्रेम में निराश होने के बाद वह अपनी जिंदगी की तीसरी कसम खाता है – कंपनी की औरत की लदनी नहीं करेगा। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हिरामन ‘तीसरी कसम’ का आदर्श पात्र है जिसका चरित्र आंचलिकता के तानेबाने से खुना गया है – मिद्टी की सौंधी महक के साथ।

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हीराबाई को किस बात का शौक थ्रा ?
उत्तर :
कथा-कहानी सुनने का शौक था।

प्रश्न 2.
रेणु किस कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर :
आंलिक कथाकार के रूप में

प्रश्न 3.
रेणु की कौन-सी रचना कालजयी रचना मानी जाती है?
उत्तर :
‘मैला आँचल’ (आंचलिक उपन्यास)।

प्रश्न 4.
रेणु द्वारा रचित उपन्यासों के नाम लिखें।
उत्तर :
मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कितने चौराहे, पल्टू बाबू रोड।

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प्रश्न 5.
रेणु की पहली कहानी का नाम लिखें।
उत्तर :
बटबाबा (यह सन् 1945 में कलकत्ता के ‘दैनिक विश्वामित्र’ में छपी थी।)

प्रश्न 6.
रेणु को हिंदी साहित्य की किस धारा का प्रवर्त्तक माना जाता है?
उत्तर :
आंचलिक साहित्य का प्रवर्त्तक।

प्रश्न 7.
‘तीसरी कसम’ फिल्म किस कथा पर आधारित है ?
उत्तर :
‘मारे गए गुलफाम’ कथा पर आधारित है ।

प्रश्न 8.
हिरामन कितने साल से गाड़ी हाँकता है?
उत्तर :
बीस साल से।

प्रश्न 9.
हिरामन कहाँ से धान और लकड़ी ढो चुका है ?
उत्तर :
नेपाल से।

प्रश्न 10.
हिरामन किस जमाने को कभी नहीं भूल सकता?
उत्तर :
कंट्रोल के जमाने को।

प्रश्न 11.
कौन हिरामन को पक्का गाड़ीवान मानता था?
उत्तर :
हर चोर-व्यापारी।

प्रश्न 12.
हिरामन के बैलों की बड़ाई कौन करते थे?
उत्तर :
बड़ी गद्दी के बड़े सेठ जी।

प्रश्न 13.
सीमा के पार तराई में हिरामन की गाड़ी कितनी बार पकड़ी गई ?
उत्तर :
पाँच बार।

प्रश्न 14.
चोरबत्ती किसे कहा गया है?
उत्तर :
टार्च को।

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प्रश्न 15.
मुनीम दारोगा को कितना रिश्वत दे रहा था?
उत्तर :
पाँच हजार।

प्रश्न 16.
दारोगा ने किसकी आँखों पर रोशनी डाल दी?
उत्तर :
मुनीम की आँखों पर।

प्रश्न 17.
गाड़ीवान और गाड़ियों पर कितने बंदूकवाले सिपाहियों का पहरा था?
उत्तर :
पाँच-पाँच बन्दूकवाले सिपाहियों का।

प्रश्न 18.
गाठों के बीच चुक्की-भुक्की लगाकर कौन छिपा था?
उत्तर :
मुनीम।

प्रश्न 19.
किसकी पीठ में गुदगुदी लग रही थी?
उत्तर :
हिरामन की पीठ में।

प्रश्न 20.
हिरामन ने क्या फैसला कर लिया?
उत्तर् :
अपने बैलों को लेकर भाग जाने का फैसला।

प्रश्न 21.
हिरगणन ने गाड़ी पर भैठे-बैठे किसे जुड़वाँ बाँध दिया ?
उत्ञर :
वैलों को।

प्रश्न 22.
कौन तीनों जन रात भर भागते रहे शे?
उत्तर :
हिरामन और उसके दो बैल।

प्रश्न 23.
घार पहुँच कर कितने दिन तक हिरामन सुध पड़ा रहा?
उत्तर :
दो दिन।

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प्रश्न 24.
होश में आते ही हिरामन ने क्या किया?
उत्तर :
कान पकड़कर कसम खाई – अव कभी ऐसी चीजों की लदनी नहीं लादेंगे।

प्रश्न 25.
हिरामन ने कौन-सी दो कसमें खाई हैं ?
उत्तर :
पहली-चोरबाजारो का माल नहीं लादेंगे। दूसरी – बाँस नहीं लादेंगे।

प्रश्न 26.
हिराभन ने किस शहर की लदनी छोड़ दी थी?
उत्तर :
खर्षैहिया शहरह की।

प्रश्न 27.
आघीदारी का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
आधा भाड़ा गाड़ीवाले का और आधा बैलवाले का।

प्रश्न 28.
सभी गाड़ीवानों की लाज किसने रख ली?
उत्तर :
हिरामन के बैलों ने।

प्रश्न 29.
हिरामन की गाड़ी में रह-रहकर क्या महक उठता है ?
उचस :
जंपा का फृल ।

प्रश्न 30.
हिसामन को दो वर्ष से क्या लगता है?
उत्ता :
चंपानगर मेले की भगवती मैया उस पर प्रसन्न हैं।

प्रश्न 31.
विछले साल हिरामन ने सरकस कंपनी का क्या बोया था?
उत्तर :
बाघगाही।

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प्रश्न 32.
किसकी आवाज ने हिरामन को अचरज में डाल दिया?
उत्तर :
अनदेखी औरत (होराबाई) की आवाज ने।

प्रश्न 33.
हीराबाई की बोली कैसी है?
उत्तर :
बच्चों की बोली जैसी महीन, फेनूगिलासी (मामोफोन) बोली।

प्रश्न 34.
‘फेनूगिलासी बोली’ का क्या अर्थ है?
उत्तर :
ग्रामोफोन से निकलनेवाली आवाज।

प्रश्न 35.
हीराबाई किस नौटंकी कंपनी में काम करती है?
उतर :
मधुरामांहृन नौटंकी कंपनी में।

प्रश्न 36.
गथ्युरामोहन नौटंकी कंपनी में हीराबाई किसका रोल करती है?
उतर :
लैला का।

प्रश्न 37.
हिरामन की कौन-सी बात निराली है?
उत्तर :
उसने आजतक नौटंकी-धियेटर या बाइस्कोप-सिनेमा नहीं देखा।

प्रश्न 38.
हिरामन की सवारी की नाक पर क्या जगमगा उठा?
उत्तर :
जुगनू।

प्रश्न 39.
व्या सुनकर हिरामन के रोम-रोम बज उठे?
उत्तर :
गैया, तुम्न्नारा नाम क्या है?

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प्रश्न 40.
हिरामन को क्या परतीत (विश्वास) नहीं होता?
उत्तर :
मर्द और औरत के नाम में फर्क होता है।

प्रश्न 41.
हिरामन टि-टि-टि-टि की आवाज कैसे निकालता है?
उत्तर :
जीभ को तालू से सटाकर।

प्रश्न 42.
‘अहां’ का क्या अर्थ है?
उत्तर :
आप।

प्रश्न 43.
हिरामन के सामने कौन-सा सवाल उपस्थित हुआ ?
उत्तर :
वह हीराबाई से क्या कहकर गप करे – तोहे (तुम) या अहा (आप)।

प्रश्न 44.
‘कचराही बोली’ का क्या अर्थ है?
उत्तर :
खिचड़ी बोली।

प्रश्न 45.
हिरामन के अनुसार दिलखोल गप किसी से किस बोली में की जा सकती है?
उत्तर :
गाँव की बोली में।

प्रश्न 46.
हिरामन को किससे पुरानी चिढ़ है?
उत्तर :
आसिन-कातिक की भोर में छा जाने वाले कुहासे से।

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प्रश्न 47.
पर्व-पावन के दिन गाँव में कैसी गंध फैली रहती है?
उत्तर :
धान के पौधों की गंध।

प्रश्न 48.
हीराबाई ने क्या परख लिया?
उत्तर :
हिरामन सचमुच हीरा है।

प्रश्न 49.
हिरामन दिखने में कैसा है?
उत्तर :
हट्टा-कट्टा, काला-कलूटा, देहाती नौजवान।

प्रश्न 50.
हिरामन की उम्र कितनी है?
उत्तर :
चालीस साल।

प्रश्न 51.
हिरामन की सारी दिलचस्पी किसमें है?
उत्तर :
अपने बैलों में।

प्रश्न 52.
हिरामन के घर में कौन-कौन हैं?
उत्तर :
बड़ा भाई, भाभी और उसके बच्चे।

प्रश्न 53.
हिरामन भाई से भी बढ़कर किसकी इज्जत करता है?
उत्तर :
भाभी की।

प्रश्न 54.
हिरामन घर में किससे डरता है?
उत्तर :
भाभी से।

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प्रश्न 55.
हिरामन की शादी कब हुई थी ?
उत्तर :
बचपन मे।

प्रश्न 56.
हिरामन की दुलहिन कब मरी?
उत्तर :
गौना से पहले।

प्रश्न 57.
हिरामन की भाभी की जिद क्या है?
उत्तर :
कुमारी लडकी से ही हिरामन की शादी करवाएगी।

प्रश्न 58.
हिरामन की भाभी के अनुसार ‘कुमारी’ का क्या अर्थ है?
उत्तर :
पाँच-सात साल की लड़की।

प्रश्न 59.
हिरामन ने क्या तय कर लिया है?
उत्तर :
शादी नहीं करेगा।

प्रश्न 60.
हिरामन शादी को क्या समझता है?
उत्तर :
बलाय यानी मुसीबत।

प्रश्न 61.
हिरामन क्या नहीं छोड़ सकता?
उत्तर :
गाड़ीवानी (बैलगाड़ी चलाना)।

प्रश्न 62.
क्या सुनकर हिरामन की हैसी छूटी?
उत्तर :
कानपुर।

प्रश्न 63.
हीराबाई से क्या सुनकर हिरामन हँसते-हैँसते दुहरा हो गया?
उत्तर :
नाकपुर भी है।

प्रश्न 64.
हिरामन ने किसका नाम कभी नहीं सुना?
उत्तर :
हौराबाई का।

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प्रश्न 65.
हीराबाई के दाँत हिरामन को कैसे लगते हैं ?
उत्तर :
नन्हीं-नन्हीं कौड़ययों की पांत (पंक्ति) के समान।

प्रश्न 66.
तेगछिया (तीन गाछ) के तीन पेड़ कौन-से हैं?
उत्तर :
दो जटामासी वट तथा एक चम्पा।

प्रश्न 67.
टप्पर किसे कहते हैं?
उत्तर :
छतरी वाली बैलगाड़ी।

प्रश्न 68.
किसकी गंध दो कोस दूर तक जाती है?
उत्तर :
चमा की।

प्रश्न 69.
हिरामन ने क्या कहकर बात को चाशनी में डाल दिया?
उत्तर :
‘जा रे जमाना’।

प्रश्न 70.
हिरामन किसका भेद जानता है?
उत्तर :
गप रसाने (गषें मारने) का।

प्रश्न 71.
हीराबाई हिरामन की किस बात पर दिल खोलकर हँसी?
उत्तर :
हिरामन द्वारा लाटनी की नकल उतारने समय डैम-फैट-फैट करने पर।

प्रश्न 72.
पटपटांग’ का क्या अर्थ है?
उत्तर :
धन-दौलत, माल-मवेशी सब साफ।

प्रश्न 73.
हिरामन बिदेसिया नाच का कौन-सी बंदना गीत गाता है?
उत्तर :
जे मैया सरोसती, अरजी करत बानी ; हमरा पर होखू सहाई हे मैया ; हमरा पर होखू सहाई !

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प्रश्न 74.
घोड़लदे बनियों से हिरामन ने क्या पूछा?
उत्तर :
“क्या भाव पटु आ खरीदते हैं, महाजन?”

प्रश्न 75.
हिरामन से बनिये ने क्या पूछा?
उत्तर :
मेला का क्या हाल-चाल है, भाई? कौन नौटंकी कंपनी का खेल हो रहा है, रौता कंपनी या मधुरा मोहन ?

प्रश्न 76.
हीराबाई के हाथ में कागज के टुकड़े को देखकर हिरामन को किसकी याद आती है?
उत्तर :
तरह-तरह के लोक गीतों की याद आती है?

प्रश्न 77.
हिरामन को छोकरा-नाच के किस गीत की याद आई?
उत्तर :
सजनवा बैरी हो गये हमार! सजनवा ……!

प्रश्न 78.
छोकरा-नाच के मनुआं-नदुवा का मुँह कैसा था?
उत्तर :
हीराबाई की तरह।

प्रश्न 79.
हिरामन ने किसके कारण अपनी भाभी की कितनी बोली-ठोली (डाँट) सुनी थी?
उत्तर :
छोकरा नाच देखने के कारण।

प्रश्न 80.
हिरामन के भाई ने उसे घर से क्यों निकल जाने को कहा था?
उत्तर :
छोकरा-नाच देखने के कारण।

प्रश्न 81.
कहाँ पे हमेशा गाड़ी और गाड़ीवानों की भीड़ लगी रहती है?
उत्तर :
तेगछिया में।

प्रश्न 82.
हीराबाई की कौन-सी बात सुनकर हिरामन का मुँह लाल हो गया?
उत्तर :
“वाह, कितना बढ़िया गाते हो तुम!”

प्रश्न 83.
हिरान किसकी नज़रों से हीराबाई को बचाकर रखना चाहता है?
उत्तर :
दुनिया भर की नजरों से।

प्रश्न 84.
हिरामन पास के गाँव से हीराबाई के लिए क्या लाता है?
उत्तर :
घूड़ा-दही-पानी।

प्रश्न 85.
हिरामन ने हीराबाई से कहाँ चाय मिलने की बात कही?
उत्चर :
फारबिसगंज में।

प्रश्न 86.
हीराबाई को खाते देख हिरामन को कैसा लगता है?
उत्तर :
मानो पहाड़ी तोता दूध-भात खा रहा हो।

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प्रश्न 87.
गाँव के बच्चे परदेवाली गाड़ी देखकर कौन-सी पंक्तियाँ दुहराने लगे?
उत्तर :
लाली-लाली डोलिया में, लाली रे दुलहिनिया।

प्रश्न 88.
हिरामन ने कौन-सा सपना देखा है?
उत्तर :
वह भी अपनी दुलहिन को लेकर इसी तरह लौटे।

प्रश्न 89.
हीराबाई किस बोली में गीत सुनना चाहती है?
उत्तर :
ग़ाँव की बोली में।

प्रश्न 90.
हीराबाई को कहाँ पहुँचने की जल्दी नहीं है?
उत्तर :
फारबिसगंज।

प्रश्न 91.
हीराबाई को क्या सुनने का शौक है?
उत्तर :
गीत और कथा (कहानी)।

प्रश्न 92.
हिरामन हीराबाई को गीत और कथा वाली कौन-सा गीत सुनाता है?
उत्तर :
महुवा घटवारिन का गीत।

प्रश्न 93.
महुवा घटवारिन कहाँ रहती थी?
उत्तर :
परमान नदी के किनारे।

प्रश्न 94.
महुवा घटवारिन की सौतेली माँ कैसी थी?
उत्तर :
राक्षसी अर्थात् कठोर स्वभाव की।

प्रश्न 95.
सौदागर ने किसका पूरा दाम चुका दिया था?
उत्तर :
महुवा घटवारिन का।

प्रश्न 96.
हिरामन को कौन-सा गीत बहुत प्रिय है?
उत्तर :
महुवा घटवारिन का गीत।

प्रश्न 97.
महुवा घटवारिन का गीत गाते समय हिरामन को कैसा लगता है?
उत्तर :
मानो वह खुद उस सौदागर का नौकर है। वह नौकर जो महुवा घटवारिन को बचाने नदी में कूदा था।

प्रश्न 98.
हीराबाई की निकटता से हिरामन को कैसा लगता है?
उत्तर :
मानो खुद महुवा घटवारिन ने उसे अपने-आप को पकड़ा दिया है।

प्रश्न 99.
महुवा घटवारिन के गीतों का हिरामन के बैलों पर क्या असर होता है?
उत्तर :
उनकी चाल धीमी हो जाती है मानो सौ मन बोझ्ल लाद दिया हो किसी ने।

प्रश्न 100.
हिरामन को सूरज डूबने से पहले ही कौन-सा गाँव पहुँचना है?
उत्तर :
ननकपुर गाँव।

प्रश्न 101.
ननकपुर से फारबिसगंज की दूरी कितनी है?
उत्तर :
तीन कोस।

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प्रश्न 102.
ननकपुर के हाट में आजकल क्या बिकने लगी है?
उत्तर :
चाय।

प्रश्न 103.
कौन-सी जगह हिरामन का घर-दुआर है?
उत्तर :
फारविसगंज।

प्रश्न 104.
हिरामन को ननकपुर में अपने गाँव के कौन-से गाड़ीवान मिलते हैं?
उत्तर :
लालमोहर, पलटदास, धुन्नीराम वगैरह।

प्रश्न 105.
हिरामन ने लालमोहर को डाँटते हुए क्या कहा?
उत्तर :
“बेसी भचर-भचर मत करो’ (अर्थात् ज्यादा बक-बक मत करो)।

प्रश्न 106.
हिरामन ने हीराबाई के पास किसे रहने को कहा?
उत्तर :
पलटदास को।

प्रश्न 107.
हिरापन की देह से किसकी खुशबू निकलती है?
उत्तर :
अतर (इञ्) गुलाब की खुशबू ।

प्रश्न 108.
गाड़ीवानों के बासा (रहने की जगह) का मीर (मालिक) का नाम क्या है?
उत्तर :
मियां जानू।

प्रश्न 109.
लहसनवां किस कहानी का पात्र है ?
उत्तर :
तीसरी कसम।

प्रश्न 110.
लहसनवां कौन है?
उत्तर :
लालमोहर का नौकर-गाड़ीवान है।

प्रश्न 111.
हीराबाई को देखकर पलटदास के मन में क्या होने लगा?
उत्तर :
सीता माता की जय-जयकार करने की इच्छा।

प्रश्न 112.
हीराबाई किस कंपनी में इस बार आई है?
उत्तर :
दि रौता संगीत कंपनी में।

प्रश्न 113.
हीराबाई का विज्ञापन सुनकर मेले के हर आदमी का दिल क्या हो गया है?
उत्तर :
नगाड़ा।

प्रश्न 114.
हिरामन का कौन-सा सवाल सुनकर कंपनी के आदमी की आँखें लाल हो गयी?
उत्तर :
“हीरा देवी किधर रहती हैं, बता सकते हैं ?”

प्रश्न 115.
नेपाली दरबान ने कंपनी के काले कोट वाले से जाकर क्या कहा?
उत्तर :
“हीराबाई का आदमी है। नहीं रोकने बोला।”

प्रश्न 116.
हीराबाई ने हिरामन को कंपनी के कितने पास दिए ?
उत्तर :
पॉँच पास।

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प्रश्न 117.
हिरामन ने संगी-साथी को किस बात के लिए गुरु-कसम खाने की बात कही ?
उत्तर :
ताकि नौटंकी देखने की बात गाँव-घर में किसी को पता न चले।

प्रश्न 118.
हिरामन ने अपने पैसे की थैली किसके पास रखी?
उत्तर :
हीराबाई के पास।

प्रश्न 119.
हिरामन के मन का मान-अभिमान कब दूर हो गया?
उत्तर :
हीराबाई के द्वारा हिरामन के पैसे के बटुए को अपने चमड़े के बक्से में रखने से हिरामन के मन का मानअभिमान दूर हो गया।

प्रश्न 120.
हिरामन के बुद्धि की तारीफ किसने की?
उत्तर :
लालमोहर और धुन्नीराम ने हिरामन के बुद्धि की तारीफ की।

प्रश्न 121.
हिरामन के भाग्य को किसने सराहा ?
उत्तर :
लालमोहर और धुन्नीराम ने।

प्रश्न 122.
नौटंकी शुरू होने के दो घंटे पहले ही क्या बजना शुरू जो जाता है?
उत्तर :
नगाड़ा।

प्रश्न 123.
हिरामन को किस गीत की आधी कड़ी हाथ लगी है?
उत्तर :
मारे गए गुलफाम ..

प्रश्न 124.
दूसरे दिन मेले में कौन-सी बात फैल गई ?
उत्तर :
गथुरामोहन कंपनी से भागकर आई है हीराबाई।

प्रश्न 125.
पलटदास किससे दोस्ती करना चाहता है?
उत्तर :
कंपनी के जोकर से।

प्रश्न 126.
नौटंकी कंपनी के मैनेजर से लेकर परदा खींचने वाले तक सब किसको पहचानते हैं ?
उत्तर :
हिरामन को।

प्रश्न 127.
ननकपुर के मेले से लौटकर हीराबाई किस मेले में जाती है?
उत्तर :
बनैली मेला में।

प्रश्न 128.
हिरामन कौन-सी तीसरी कसम खाता है?
उत्तर :
कंपनी की औरत की लदनी नहीं करेगा।

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प्रश्न 129.
हीराबाई को विदा करने के बाद हिरामन क्या गुनगुनाते हुए गाँव लौटता है?
उत्तर :
“अजी हाँ, मारे गए गुलफाम.

प्रश्न 130.
हिरामन की भाषा में बड़ों को क्या कहकर संबोधित किया जाता है ?
उत्तर :
अहां।

प्रश्न 131.
चोर बाजारी का माल नहीं लादने की कसम कान पकड़कर किसने खाई ?
उत्तर :
हिरामन ने ।

प्रश्न 132.
हीराबाई का नाम सुनते ही दरबान ने किन तीनों को छोड़ दिया ?
उत्तर :
हिरामन, पलटदास और लालमोहर को ।

प्रश्न 133.
पूलिसवाले को देखकर हिरामन ने क्या किया ?
उत्तर :
नौ-दो-गयारह हो गया ?

प्रश्न 134.
रेणु ने किस सरकार-विरोधी आंदोलन में भाग लिया था ?
उत्तर :
जयपकाश नारायण के नेतृत्व में बले आंदोलन- ‘छात्र आंदोलन’ में।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तीसरी कसम कहानी के लेखक हैं –
(क) राम वृक्ष बेनीपुरी
(ख) दिनकर
(ग) फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
(घ) प्रेमचन्द्
उत्तर :
(ग) फणीश्वरनाथ ‘रेणु’

प्रश्न 2.
फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म किस राज्य में हुआ था?
(क) बिहार
(ख) बंगाल
(ग) मध्यु्रदेश
(घ) झारखंड
उत्तर :
(क) बिहार।

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प्रश्न 3.
‘मैला आँचल’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) फणीश्वर नाथ रेणु
(ख) शेखर जोशी
(ग) ममता कालिया
(घ) मन्नू भंडारी
उत्तर :
(क) फणीश्वर नाथ रेणु।

प्रश्न 4.
‘परती परिकथा’ किस विधा की रचना है?
(क) कविता
(ख) कहानी
(ग) उपन्यास
(घ) डायरी
उत्तर :
(ग) उपन्यास।

प्रश्न 5.
‘परती परिकथा’ किसकी रचना है?
(क) ममता कालिया
(ख) फणीश्वर नाथ रेणु
(ग) मन्नू भंडारी
(घ) शेखर जोशी
उत्तर :
(ख) फणीश्वरनाथ रेणु।

प्रश्न 6.
‘परती परिकथा’ किस कोटि का उपन्यास है?
(क) आंचलिक
(ख) राजनीतिक
(ग) ऐतिहासिक
(घ) धार्मिक
उत्तर :
(क) आंचलिक।

प्रश्न 7.
‘दीर्घतपा’ किस विया की रचना है?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) एकांकी
उत्तर :
(ख) उपन्यास।

प्रश्न 8.
‘कितने चौराहै’ के रचनाकार कौन हैं?
(क) शेखर जोशी
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) ममता कालिया
(घ) फणीश्वरनाथ रेणु
उत्तर :
(घ) फणीश्वर नाथ रेणु।

प्रश्न 9.
‘पल्दू बाबू रोड’ किस विधा की रचना है?
(क) ललित निबंध
(ख) कहानी
(ग) उपन्यास
(घ) नाटक
उत्तर :
(ग) उपन्यास।

प्रश्न 10.
‘मारे गए गुलफाम’ कहानी का दूसरा नाम है :
(क) ठेस
(ख) अग्निखोर
(ग) तीसरी कसम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 11.
‘मारे गए गुलफाम’ के रचनाकार हैं :
(क) फणीश्वरनाथ रेणु
(ख) ममता कालिया
(ग) मन्नू भंडारी
(घ) शेखर जोशी
उत्तर :
(क) फणीश्वरनाथ रेणु।

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प्रश्न 12.
‘लाल पान की बेगम’ किस विधा की रचना है ?
(क) नाटक
(ख) एकांकी
(ग) निबंध
(घ) कहानी
उत्तर :
(घ) कहानी।

प्रश्न 13.
‘लाल पान की बेगम’ के रचनाकार हैं :
(क) अमरकांत
(ख) मन्नू भंडारी
(ग) शेखर जोशी
(घ) फणीश्वरनाथ रेणु
उत्तर :
(घ) फणीश्वरनाथ रेणु।

प्रश्न 14.
‘संवादिया’ किस विधा की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) नाटक
(घ) निबंध
उत्तर :
(क) कहानी।

प्रश्न 15.
‘संवादिया’ के रचनाकार हैं :
(क) शेखर जोशी
(ख) फणीश्वर नाथ रेणु
(ग) मन्नू भंडारी
(घ) अमरकांत
उत्तर :
(ख) फणीश्वर नाथ रेणु।

प्रश्न 16.
‘तबे एकला चलो रे’ कहानी के रचनाकार हैं :
(क) रवीन्द्र नाथ ठाकुर
(ख) ममता कालिया
(ग) मन्नू भंडारी
(घ) फणीश्वर नाथ रेणु
उत्तर :
(घ) फणीश्वरनाथ रेणु।

प्रश्न 17.
‘ठुमरी’ किस विधा की रचना है ?
(क) गीत
(ख) नाटक
(ग) एकांकी
(घ) कहानी
उत्तर :
(घ) कहानी।

प्रश्न 18.
‘पागल’ किस विधा की रचना है?
(क) कहानी
(ख) इतिहास
(ग) नाटक
(घ) निबंध
उत्तर :
(क) कहानी।

प्रश्न 19.
‘अग्निखोर’ किस विधा की रचना है ?
(क) उपन्यास
(ख) कहानी
(ग) नाटक
(घ) रेखाचित्र
उत्तर :
(ख) कहानी।

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प्रश्न 20.
‘आदिम रात्रि की महक’ किस विधा की रचना है?
(क) संस्मरण
(ख) रिपोतार्ज
(ग) डायरी
(घ) कहानी
उत्तर :
(घ) कहानी।

प्रश्न 21.
फणीश्वरनाथ रेणु की किस कहानी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति मिली ?
(क) अग्निखोर
(ख) तीसरी कसम
(ग) ठुमरी
(घ) पागल
उत्तर :
(ख) तीसरी कसम।

प्रश्न 22.
फणीश्वरनाथ की किस कहानी पर फिल्म बनी ?
(क) ठुमरी
(ख) पागल
(ग) तौसरी कसम
(घ) ठेस
उत्तर :
(ग) तौसरी कसम।

प्रश्न 23.
फणीश्वरनाथ रेणु की कौन-सी रचना कालजयी रचना के रूप में स्वीकार की गई है ?
(क) मैला आँचल
(ख) परती परिकथा
(ग) दीर्घतपा
(घ) कितने चौराहे
उत्तर :
(क) मैला आँचल।

प्रश्न 24.
‘तीसरी कसम’ कहानी की पृष्ठभूमि में बिहार का कौन-सा जिला है ?
(क) मुंगेर
(ख) शेखपुरा
(ग) फारबिसगंज
(घ) पूर्णिया
उत्तर :
(घ) पूर्णिया।

प्रश्न 25.
फणीश्वर नाथ रेणु किस परंपरा के रचनाकार माने जाते हैं ?
(क) प्रसाद
(ख) निराला
(ग) पंत
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(घ) प्रेमचंद।

प्रश्न 26.
रेणु को किस उपाधि से सम्मानित किया गया?
(क) पद्यश्री
(ख) कर्पूरी ठाकुर सम्मान
(ग) मंगला प्रसाद पारितोषिक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) पद्यश्री।

प्रश्न 27.
हिरामन कितने साल से गाड़ी हाँकता है?
(क) पाँच
(ख) दस
(ग) पंद्रह
(घ) बीस
उत्तर :
(घ) बीस।

प्रश्न 28.
हिरामन को पक्का गाड़ीवान कौन मानता था?
(क) भाई
(ख) साधी
(ग) चोर-व्यापारी
(घ) दारोगा
उत्तर :
(ग) चोर-व्यापारी।

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प्रश्न 29.
‘तीसरी कसम’ का नायक कौन है?
(क) हीराबाई
(ख) हिरामन
(ग) पलटूदास
(घ) लालमोहर
उत्तर :
(ख) हिरामन।

प्रश्न 30.
‘चोरीबत्ती’ का अर्थ है :
(क) चोरी की बत्ती
(ख) चोर की बत्ती
(ग) टॉर्च
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) टॉर्च।

प्रश्न 31.
गाठों के बीच चुक्की-भुक्की लगाकर कौन बैठा था ?
(क) दारोगा
(ख) हिरामन
(ग) मुनीम
(घ) सेठ
उत्तर :
(ग) मुनीम।

प्रश्न 32.
हिरामन ने गाड़ी पर बैठे-बैठे किसे जुड़वाँ बाँध दिया ?
(क) सिपाही को
(ख) दारोगा को
(ग) बैलों को
(घ) गाँठों को
उत्तर :
(ग) बैलों को।

प्रश्न 33.
हिरामन ने निम्न में से कौन-सी कसम नहीं खाई?
(क) बैलगाड़ी नहीं चलाएंगे
(ख) चोर बाजारी का माल नहीं लादेंगे
(ग) बाँस नहीं लादेंगे
(घ) कंपनी की औरत की लदनी नहीं करेंगे
उत्तर :
(क) बैलगाड़ी नहीं चलाएंगे।

प्रश्न 34.
घर पहुँचकर हिरामन कितने दिन तक बेसुध पड़ा रहा ?
(क) चार
(ख) तीन
(ग) दो
(घ) एक
उत्तर :
(ग) दो।

प्रश्न 35.
मुनीम दारोगा को कितने रुपये रिश्वत में दे रहा था ?
(क) दो हजार
(ख) तीन हजार
(ग) चार हजार
(घ) पाँच हजार
उत्तर :
(घ) पाँच हजार।

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प्रश्न 36.
हिरामन ने किस शहर की लदनी छोड़ दी ?
(क) शेखपुरा
(ख) वेगूसराय
(ग) खरैहिया
(घ) फारबिसगंज
उत्तर :
(ग) खरैदिया।

प्रश्न 37.
‘आधीदारी’ का अर्थ है :
(क) सबको आधा-आधा
(ख) आधा मुनीम आधा सेठ का
(ग) आधा गाड़ीवाले आधा बैलवालेका
(घ) आधा दारोगा आधा सिपाहियों का
उत्तर :
(ग) आधा गाड़ीवाले आधा बैलवाले का।

प्रश्न 38.
हीराबाई पहले किस नौटंकी कंपनी में काम करती थी ?
(क) मथुरामोहन नौटंकी कंपनी में
(ख) रौता नौटंकी कंपनी में
(ग) बनारस नौटंकी कंपनी में
(घ) इनमें से किसी में नहीं
उत्तर :
(क) मथुरामोहन नौटंकी कंपनी में।

प्रश्न 39.
‘अहां’ का क्या अर्थ है?
(क) क्या
(ख) कहाँ
(ग) आप
(घ) अहा
उत्तर :
(ग) आप।

प्रश्न 40.
“औरत है या चंपा का फूल” – पंक्ति किस पाठ से ली गई हैं ?
(क) कर्मनाशा की हार
(ख) जाँच जारी है
(ग) तीसरी कसम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 41.
किसकी आवाज ने हिरामन को अचरज में डाल दिया ?
(क) अनदेखी औरत
(ख) गामीण औरत
(ग) बाष
(घ) गीत
उत्तर :
(क) अनदेखी औरत।

प्रश्न 42.
किसकी बोली को ‘फेनूगिलासी बोली’ कहा गया है?
(क) हिरामन
(ख) हीराबाई
(ग) लाल मोहन
(घ) रेणु
उत्तर :
(ख) हीराबाई।

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प्रश्न 43.
मधुरामोहन नौटंकी कंपनी में लैला कौन बनती थी ?
(क) सुलोचना
(ख) वहीदा रहमान
(ग) हीराबाई
(घ) छीतनबाई
उत्तर :
(ग) हीराबाई।

प्रश्न 44.
हिरामन ने कितने साल तक लगातार मेलों की लदनी लादी है?
(क) चार
(ख) पाँच
(ग) छ:
(घ) सात
उत्तर :
(घ) सात।

प्रश्न 45.
“कोई चोरी-चमारी का माल-वाल तो नहीं ?” – वक्ता कौन है?
(क) मुनौम
(ख) हिरामन
(ग) हीराबाई
(घ) दरोगा
उत्तर :
(ख) हिरामन।

प्रश्न 46.
“अहा ! मारो मत !” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) उसने कहा था
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) तीसरी कसम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 47.
“मेरा नाम भी हीरा है” – वक्ता कौन है?
(क) हिरामन
(ख) हीराबाई
(ग) हीरालाल
(घ) हीरा
उत्तर :
(ख) हीराबाई।

प्रश्न 48.
“भगवान जाने क्या लिखा है इस बार उसकी किस्मत में” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) उसने कहा था
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) तीसरी कसम
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 49.
“परी की आँखें खुल गई” – परी कौन है ?
(क) सरदारनी
(ख) सफ्रिया
(ग) अर्पणा
(घ) हीराबाई
उत्तर :
(घ) हीराबाई।

प्रश्न 50.
‘औरत अकेली’ – किसे कहा गया है ?
(क) अर्पणा को
(ख) सफिया को
(ग) फुलमति को
(घ) हीराबाई को
उत्तर :
(घ) हीराबाई को।

प्रश्न 51.
हिरामन को किससे पुरानी चिढ़ है?
(क) लालमोहर से
(ख) भाभी से
(ग) गाड़ीवान से
(घ) आसिन-कातिक के भोर के कुहासे से
उत्तर :
(घ) आसिन-कातिक के भोर के कुहासे से ।

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प्रश्न 52.
किसको अपनी दुलहिन का चेहरा याद नहीं ?
(क) पलटूदास को
(ख) लहना सिंह को
(ग) हिरामन को
(घ) लालमोहर को
उत्तर :
(ग) हिरामन को।

प्रश्न 53.
हिरामन ने किसका नाम कभी नहीं सुना ?
(क) हीराबाई का
(ख) पलदूदास का
(ग) लालमोहर का
(घ) फारबिसगंज का
उत्तर :
(क) हीराबाई का।

प्रश्न 54.
‘बिदागी’ का अर्थ क्या है ?
(क) विदा लेना
(ख) विदाई
(ग) बिना दाग का
(घ) नैहर या ससुराल जाती दुल्हन
उत्तर :
(ख) विदाई।

प्रश्न 55.
‘‘डस फूल में एक परी बैठी है'” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नौरंगिया
(ख) उसने कहा था
(ग) तीसरी कसम
(घ) कर्मनाशा की हार
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 56.
“उस फूल का क्या नाम है” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नन्हा संगीतकार
(ख) नमक
(ग) धावक
(घ) तीसरी कसम
उत्तर :
(घ) तीसरी कसम।

प्रश्न 57.
‘तेगछिया’ में तीन पेड़ हैं :
(क) तीन पीपल के
(ख) तीन वट के
(ग) तीन ताड़ के
(घ) दो जटामासी वट तथा एक चम्पा का
उत्तर :
(घ) दो जटामासी वट तथा एक चम्पा का।

प्रश्न 58.
हिरामन क्या कहकर बात में चाशानी डाल देता है?
(क) इस्स
(ख) जा रे जमाना
(ग) जा रे जवानी
(घ) डैम-फैट-लैट
उत्तर :
(ख) जा रे जमाना।

प्रश्न 59.
पर्व-पावन के दिन गाँव में कैसी गंध फैली रहती है?
(क) गोबर की गंध
(ख) पकवान की गंध
(ग) धान के पौधों की गंध
(घ) चम्पा के फूलों की गंध
उत्तर :
(ग) धान के पौधों की गंध।

प्रश्न 60.
हिरामन किससे डरता है ?
(क) हीराबाई से
(ख) भाभी से
(ग) मुनीम से
(घ) नेपाली दरवान से
उत्तर :
(ख) भाभी से।

प्रश्न 61.
हिरामन की शादी कब हुई थी ?
(क) जवानी में
(ख) बचपन में
(ग) चालीस वर्ष में
(घ) हीराबाई से मिलने के दो साल पहले
उत्तर :
(ख) बचपन में।

प्रश्न 62.
हिरामन की दुलहिन कब मरी ?
(क) गौने के बाद
(ख) गौने के पहले
(ग) पाँच साल पहले
(घ) दस साल पहले
उत्तर :
(ख) गौने के पहले।

प्रश्न 63.
हिरामन ने क्या तय कर लिया है ?
(क) दूसरी शादी करेगा
(ख) दूसरी शादी नहीं करेगा
(ग) हीराबाई से शादी करेगा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) दूसरी शादी नहीं करेगा।

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प्रश्न 64.
हीराबाई के दाँत हिरामन को कैसे लगते हैं ?
(क) तारों की पंक्ति
(ख) हीरों की पंक्ति
(ग) मोतियों की पंक्ति
(घ) नन्हीं कौड़ियों की पंक्ति
उत्तर :
(घ) नन्हीं कौडियों की पंक्ति।

प्रश्न 65.
किसकी गंध दो कोस दूर तक जाती है?
(क) बौड़ी की
(ख) हीराबाई की इत्र की
(ग) चम्पा की
(घ) धान के पौधों की
उत्तर :
(ग) चम्पा की।

प्रश्न 66.
हिरामन शादी को क्या समझता है ?
(क) बलाय
(ख) उपहार
(ग) वरदान
(घ) नई जिंदगी
उत्तर :
(क) बलाय।

प्रश्न 67.
तेगछिया के पास से किस नदी की धारा गुजरती है ?
(क) गंगा
(ख) यमुना
(ग) दामोदार
(घ) कजरी
उत्तर :
(घ) कजरी।

प्रश्न 68.
“शायद कुमारी ही है” – किसके बारे में कहा गया है?
(क) फूलमति
(ख) अर्पणा
(ग) सरदारनी
(घ) हीराबाई
उत्तर :
(घ) हीराबाई।

प्रश्न 69.
हिरामन ने अपनी सफरी झोली से क्या निकाला ?
(क) चूड़ा-दही
(ख) बोड़ी
(ग) गंजी
(घ) पैसे
उत्तर :
(ग) गंजी।

प्रश्न 70.
खाते हुए हीराबाई की तुलना हिरामन किससे करता है ?
(क) पालतू तोते से
(ख) कबूतर से
(ग) पहाड़ी तोते से
(घ) मैने से
उत्तर :
(ग) पहाड़ी तोते से।

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प्रश्न 71.
“बदमासी मत करो” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) उसने कहा था
(ख) चणल
(ग) तीसरी कसम
(घ) नमक
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 72.
हिरामन किसकी नज़रों से हीराबाई को बचाकर रखना चाहता है ?
(क) पलदू दास की नज़रों से
(ख) नेपाली दरवान की नजरों से
(ग) गाड़ीवानों की नज़रों से
(घ) दुनिया-भर की नज़रों से
उत्तर :
(घ) दुनिया-भर की नज़रों से।

प्रश्न 73.
हिरामन ने गाड़ीवानों को हीराबाई को किस अस्पताल की डॉक्टरनी बताया ?
(क) सिरपुर बाजार
(ख) कुड़मागाम
(ग) छत्तापुर पचीरा
(घ) ननकपुर
उत्तर :
(क) सिरपुर बाजार।

प्रश्न 74.
ननकपुर जानेवाली सड़क किस गाँव के बीच से निकलती है ?
(क) कुडामागाम
(ख) छत्तापुर-पचीरा
(ग) तेग्गिया
(घ) सिरपुर
उत्तर :
(ग) तेगछिया।

प्रश्न 75.
‘देहाती भुच्च सब’ – वक्ता कौन है ?
(क) लहना सिंह
(ख) हिरामन
(ग) हीराबाई
(घ) नेपाली दरबान
उत्तर :
(ख) हिरामन।

प्रश्न 76.
हीराबाई को किन दो चीजों का शौक है ?
(क) नाचने-गाने का
(ख) खाने-खिलाने का
(ग) गण्प मारने का
(घ) गीत और कथा सुनने का
उत्तर :
(घ) गीत और कथा सुनने का।

प्रश्न 77.
महुआ घटवारिन का वास कहाँ था ?
(क) परमान नदी के किनारे
(ख) कजरी नदी के किनारे
(ग) काशी नदी के किनारे
(घ) गंडक नदी के किनारे
उत्तर :
(क) परमान नदी के किनारे।

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प्रश्न 78.
किसकी माँ को ‘साच्छात राकसनी’ कहा गया है ?
(क) हीराबाई
(ख) फुलमती
(ग) सफ़िया
(घ) महुआ घटवारिन
उत्तर :
(घ) महुआ घटवारिन।

प्रश्न 79.
‘एक रात की बात सुनिए” – गद्यांश किस पाठ से उद्धुत है ?
(क) कर्मनाशा की हार
(ख) जाँच अभी जारी है
(ग) तीसरी कसम
(घ) नमक
उत्तर :
(ग) तौसरी कसम।

प्रश्न 80.
“खोई हुई सूरत कैसी भोली लगती है”‘ – किसकी सूरत के बारे में कहा गया है ?
(क) हीराबाई
(ख) फुलमती
(ग) सफ़िया
(घ) नौरंगिया
उत्तर :
(कं) हीराबाई।

प्रश्न 81.
“मेरा कलेजा धड़कता है” – वक्ता कौन है ?
(क) हिरामन
(ख) हीराबाई
(ग) महुआ घटवारिन
(घ) लहना सिंह
उत्तर :
(ग) महुआ घटवारिन।

प्रश्न 82.
“मेरा कलेजा धड़कता है” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) उसने कहा था
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) नमक
(घ) तीसरी कसम
उत्तर :
(घ) तीसरी कसम।

प्रश्न 83.
“सौदागर ने पूरा दाम चुका दिया था” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नमक
(ख) तीसरी कसम
(ग) चण्पल
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(ख) तीसरी कसम।

प्रश्न 84.
“मछली भी भला थकती है पानी में” – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) कर्मनाशा की हार
(ख) चप्पल
(ग) तीसरी कसम
(घ) नमक
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 85.
“उसके मन को किनारा मिल गया है” – पंक्ति किस पाठ से उद्धत है ?
(क) तीसरी कसम
(ख) चमल
(ग) नमक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) तीसरी कसम।

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प्रश्न 86.
“लगता है सौ मन बोझ लाद दिया किसी ने'” – वक्ता कौन है?
(क) लहना सिंह
(ख) हिरामन
(ग) सफिया
(घ) रंग्या
उत्तर :
(ख) हिरामन।

प्रश्न 87.
“तुम तो उस्ताद हो मीता” – वक्ता कौन है ?
(क) धुन्नीराम
(ख) मियां जानू
(ग) हीराबाई
(घ) हिरामन
उत्तर :
(ग) हीराबाई।

प्रश्न 88.
“कुछ भी हो, जनाना आखिर जनाना है” – वक्ता कौन है ?
(क) लाल मोहर
(ख) धुन्नीराम
(ग) पलटदास
(घ) हिरामन
उत्तर :
(ग) पलटदास।

प्रश्न 89.
‘तीसरी कसम’ में किसे ‘करमसांड़’ कहा गया है ?
(क) हिरामन को
(ख) लाल मोहर को
(ग) लहसनवा को
(घ) पलटदास को
उत्तर :
(क) हिरामन को।

प्रश्न 90.
लहसनवां किसका नौकर-गाड़ीवान है ?
(क) लालमोहर का
(ख) हिरामन का
(ग) पलटदास का
(घ) धुन्नीराम का
उत्तर :
(क) लालमोहर का।

प्रश्न 91.
‘तीसरी कसम’ का कौन-सा पात्र दास-बैस्नव, कीर्तनिया है ?
(क) हिरामन
(ख) धुन्नीराम
(ग) पलटदास
(घ) लालमोहर
उत्तर :
(ग) पलटदास।

प्रश्न 92.
अरे, पागल है क्या ? – वक्ता कौन है ?
(क) नेपाली दरवान
(ख) पलटदास
(ग) हिरामन
(घ) हीराबाई
उत्तर :
(घ) हीराबाई।

प्रश्न 93.
युन्नीराम और लहसनवां किसे छोटा आदमी और कमीना कहते हैं ?
(क) हिरामन को
(ख) पलटदास को
(ग) मियांजानू को
(घ) नेपानी दरवान को
उत्तर :
(ख) पलटदास को।

प्रश्न 94.
‘बेचारी की जान खतरे में है” – ‘बेचारी’ कौन है ?
(क) सफ़िया
(ख) सरदारनी
(ग) फुलमती
(घ) हीराबाई
उत्तर :
(घ) हीराबाई।

प्रश्न 95.
“बड़ी खेलाड़ औरत है”‘ – पंक्ति किस पाठ से ली गई है ?
(क) नन्हा कलाकार
(ख) कर्मनाशा की हार
(ग) तीसरी कसम
(घ) नमक
उत्तर :
(ग) तीसरी कसम।

प्रश्न 96.
‘किधर की गाड़ी आ रही है”‘ – पंक्ति किस पाठ से ली गई है ?
(क) नमक
(ख) उसने कहा था
(ग) चफल
(घ) तौसरी कसम
उत्तर :
(घ) तीसरी कसम।

प्रश्न 97.
“मैं तो उम्मीद खो चुकी थी” – वक्ता कौन है ?
(क) फुलमती
(ख) सफ़िया
(ग) हीराबाई
(घ) सरदारनी
उत्तर :
(ग) हीराबाई।

प्रश्न 98.
“कोई संवाद देना है घर” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) उसने कहा था
(ख) तीसरी कसम
(ग) नमक
(घ) कर्मनाशा की हार
उत्तर :
(ख) तीसरी कसम।

प्रश्न 99.
लहसनवां को नौटंकी में किसका पार्ट सबसे अच्छा लगा ?
(क) हीराबाई का
(ख) लखन का
(ग) रावण का
(घ) जोकर का
उत्तर :
(घ) जोकर का।

प्रश्न 100.
हीराबाई ने दुबारा किसे नहीं पहुचाना ?
(क) हिरामन को
(ख) लालमोहर को
(ग) लहसनवा को
(घ) पलटदास को
उत्तर :
(ख) लालमोहर को।

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प्रश्न 101.
सीमा के पार तराई में हिरामन की गाड़ी कितनी बार पकड़ी गई ?
(क) दो बार
(ख) तीन बार
(ग) चार बार
(घ) पाँच बार
उत्तर :
(घ) पाँच बार।

प्रश्न 102.
बायगाड़ी की गाड़ीवानी की है –
(क) हिरामन ने
(ख) हीराबाई ने
(ग) लहसनवा ने
(घ) रेणु ने
उत्तर :
(क) हिरामन ने।

प्रश्न 103.
हिरामन किस जमाने को नहीं भूल सकता ?
(क) पुराने जमाने को
(ख) गुलामी के जमाने को
(ग) कंट्रोल के जमाने को
(घ) आज के जमाने को
उत्तर :
(ग) कट्रोल के जमाने को।

प्रश्न 104.
हिरामन कौन-सी गाड़ी हाँकता है ?
(क) टमटम
(ख) मोटर गाड़ी
(ग) ठेला गाड़ी
(घ) बैल गाड़ी
उत्तर :
(घ) बैल गाड़ी।

प्रश्न 105.
कचराही बोली बोलना जानता था –
(क) हिरामन
(ख) लालमोहर
(ग) हीराबाई
(घ) पलटदास
उत्तर :
(ख) लालमोहर।

प्रश्न 106.
हिरामन के बैलों ने किसकी लाज रख ली –
(क) हिरामन की
(ख) बाघ की
(ग) गाड़ीवानों की
(घ) हीराबाई की
उत्तर :
(ग) गाड़ीवानों की।

प्रश्न 107.
क्या भाव पदुआ खरीदते हो महाजन – वक्ता कौन है –
(क) हिरामन
(ख) बनिया
(ग) हीराबाई
(घ) लहसनवा
उत्तर :
(क) हिरामन।

प्रश्न 108.
‘तीसरी कसम’ किस प्रकार की कहानी है ?
(क) सामाजिक
(ख) मनोवैज्ञानिक
(ग) आंचलिक
(घ) जासूसी
उत्तर :
(ग) आंचलिक

प्रश्न 109.
हिरामन ने सीमेंट और कपड़े लादकर पहुँचाया था –
(क) पूर्णिया से बिहार
(ख) जोगबनी से विराटनगर
(ग) बिराटनगर से फारबिसगंज
(घ) फारबिसगंज से नेपाल
उत्तर :
(ख) जोगबनी से बिराटनगर।

प्रश्न 110.
दारोगा ने किसके पेट में खोंचा मारा –
(क) हिरामन के
(ख) हीराबाई के
(ग) मुनीम के
(घ) नेपाली दरबान के
उत्तर :
(ग) मुनीम के।

प्रश्न 111.
मुनीम दारोगा को रिश्वत में दे रहा था –
(क) चार हजार रुपये
(ख) पाँच हजार रुपये
(ग) छ: हजार रुपये
(घ) सात हजार रुपये
उत्तर :
(ख) पाँच हजार रुपये।

प्रश्न 112.
हिरामन को किसका डर नहीं ?
(क) दारोगा का
(ख) हीराबाई का
(ग) जेल का
(घ) लेखक का
उत्तर :
जेल का।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम

प्रश्न 113.
हिरामन ने फैसला कर लिया ?
(क) हीराबाई को छोड़ने का
(ख) लहसनवा को पीटने का
(ग) नौ-दो-ग्यारह होने का
(घ) गाड़ीवानी छोड़ देने का
उत्तर :
(ग) नौ-दो-ग्यारह होने का।

प्रश्न 114.
हिरामन को परतीतत नहीं –
(क) मर्द और औरत के नाम में फर्क होता है
(ख) लहसुनवा चोर हो सकता है
(ग) मेला खत्म हो गया
(घ) हीराबाई गाली दे सकती है
उत्तर :
(क) मर्द और औरत के नाम में फर्क होता है।

प्रश्न 115.
हीराबाई ने परख लिया –
(क) मेला दूट रहा है
(ख) हिरामन बाल-बच्चेवाला आदमी है
(ग) हिरामन सचमुच हीरा है
(घ) हिरामन गाड़ीवानी छोड़ देगा
उत्तर :
(ग) हिरामन सचमुच हीरा है।

प्रश्न 116.
अब हिरामन ने तय कर लिया –
(क) गाड़ीवानी नहीं करेगा
(ख) हीराबाई से बात नहीं करेगा
(ग) मेले में ही रहेगा
(घ) शादी नहीं करेगा
उत्तर :
(घ) शादी नहीं करेगा।

प्रश्न 117.
हिरामन भेद जानता है –
(क) गप रसाने का
(ख) हीराबाई का
(ग) नौटककी कंपनी का
(ख) बैलगाड़ी बनाने का
उत्तर :
(क) गप रसाने का।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम

प्रश्न 118.
हिरामन का मन …….,बदल रहा है –
(क) हर दिन
(ख) पल-पल
(ग) हर घंटे
(घ) हर महीने
उत्तर :
(ख) पल-पल।

प्रश्न 119.
“डठिए, नींद तोड़िए” – वक्ता कौन है ?
(क) हीराबाई
(ख) पलटदास
(ग) दारोगा
(घ) हिरामन
उत्तर :
(घ) हिरामन।

प्रश्न 120.
हीराबाई
(क) फारबिसगंज का नाम भूल गई ?
(ख) बिराटनगर
(ग) छत्तापुर-पचीरा
(घ) ननकपुर
उत्तर :
(ग) छत्तापुर-पचीरा।

प्रश्न 121.
देहाती मुच्च सब-वक्ता कौन है ?
(क) हीराबाई
(ख) नेपाली दरबान
(ग) हिरामन
(घ) मुनीम
उत्तर :
(ग) हिरामन।

प्रश्न 122.
‘तुम तो उस्ताद हो’ – कौन, किससे कहता है ?
(क) नेपाली दरबान हिरामन से
(ख) मुनीम हिरामन से
(ग) हिरामन हीराबाई से
(घ) हीराबाई हिरामन से
उत्तर :
(घ) हीराबाई हिरामन से ।

प्रश्न 123.
एक नहीं, अब चार हिरामन – चार हिरामन किसे कहा गया है ?
(क) चार नौटंकीवाले को
(ख) चार जोकरों को
(ग) लालमोहर, घुन्रीराम, पलटदास और हिरामन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) लालमोहर, घुन्रीराम, पलटदास और हिरामन।

प्रश्न 124.
वह दास-बैस्नव है, कीर्तनिया है – ‘वह’ कौन है ?
(क) पलटदास
(ख) सूरदास
(ग) तुलसीदास
(घ) लहसनवां
उत्तर :
(क) पलटदास।

प्रश्न 125.
किसका नाम सुनते ही दारोगा ने तीनों को छोड़ दिया ?
(क) कलक्टर
(ख) मुनीम जी
(ग) हिरामन
(घ) हीराबाई
उत्तर :
(घ) हीराबाई।

प्रश्न 126.
बेचारी की जान खतरे में है – किसकी जान खतरे में है ?
(क) हीराबाई की
(ख) हिरामन की भाभी का
(ग) कंपनी की औरत की
(घ) गाय की
उत्तर :
(क) हीराबाई की।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम

प्रश्न 127.
नेपाली दरबान कहाँ खड़ा था –
(क) मेले में
(ख) चौराहे पर
(ग) एक रुपयावाले फाटक पर
(घ) अठन्नी वाले फाटक पर
उत्तर :
(ग) एक रुपया वाले फाटक पर।

प्रश्न 128.
‘पैंजनी’ का अर्थ है ?
(क) पायल
(ख) पाँच
(ग) पागल
(घ) पैर
उत्तर :
(क) पायल।

प्रश्न 129.
‘हिरामन की भाषा में ‘तुम’ को क्या कहा जाता है ?
(क) तू
(ख) अबे
(ग) तोहे
(घ) मोहें
उत्तर :
(ग) तोहें।

प्रश्न 130.
हिरामन का बड़ा भाई क्या करता है ?
(क) खेती करता है
(ख) माल ढोता है
(ग) बैलगाड़ी चलाता है
(घ) कुछ नहीं करता है
उत्तर :
(क) खेती करता है।

प्रश्न 131.
शायद वह तीसरी कसम खा रहा है – वह कौन-सी तीसरी कसम खा रहा है ?
(क) बॉस नहीं लादेगा
(ख) बाध नहीं लादेगा
(ग) चोरबाजारी का सामान नहीं लोदागा
(घ) कंपनी की औरत की लदनी नहीं करेगा
उत्तर :
(घ) कंपनी की औरत की लदनी नहीं करेगा।

WBBSE Class 10 Hindi तीसरी कसम Summary

लेखक – परिचय

फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना नामक गाँव में 4 मार्च, 1921 ई० को हुआ था । रेणु हिन्दी कथा साहित्य में ‘आंचलिक कथाकार’ के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्होंने सन् 1942 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक प्रमुख सेनानी की भूमिका निभाई । सन् 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रांति और राजनीति में सक्रिय सहयोग दिया । इन्होंने कथा साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोतार्ज तथा उपन्यास आदि विधाओं में भी लिखा। 11 अप्रैल, 1977 को इनका देहावसान हो गया ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम 1

इनकी कहानी ‘तीसरी कसम’ को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली तथा उसपर फिल्म भी बनाई गई। प्रसुख रचनाएँ –
उपन्यास : मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कलंकमुक्ति, जुलूस, पल्दू बाबू रोड । कहानी-संग्रह : ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी, मारे गए गुलफाम, लालपान की बेगम, ठेस, संवादिया, तबे एकला चलो रे, ठुमरी, पागल आदि ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions सहायक पाठ Chapter 1 तीसरी कसम

संस्भरण : श्रृणजल-धनजल, वन तुलसी की गंध, श्रुत अश्रुत पूर्व ।
रिपोतार्ज : नेपाली क्रांति-कथा ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Chapter 1 Question Answer – दीपदान

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1 : ‘दीपदान’ एकांकी के आधार पर पन्ना धाय की प्रमुख विशेषताओं को लिखें।
अथवा
प्रश्न 2 : ‘दीपदान’ एकांकी के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को लिखें।
अथवा
प्रश्न 3 : ‘दीपदान’ एकांकी में जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है उसका चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 4 : “नमक से रक्त बनता है, रक्त से नमक नहीं ” – के आधार पर पत्रा का चरित्र-चि:न
अथवा
प्रश्न 5 : “यहाँ का त्योहार आत्पबलिदान है” – के आधार पर पन्ना की चारित्रिक विशेषताओं को लगकें
अथवा
प्रश्न 6 : ‘थाय माँ पन्ना’ के पुत्र का क्या नाम था ? उसने अपने पुत्र को कहाँ और क्यों सुला ‘दीपदान’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए ।
अथवा
प्रश्न 7 : ‘मेरे महाराणा का नमक मेरे रक्त से भी महान् है’ – के आधार पर संबंधित चरित्र-चित्रण करें।
अथवा

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान

प्रश्न 8 : “आज मैने भी दीप-दान किया है। दीप-दान”। – पंक्ति के आधार पर पन्ना का ‘स्त्रचित्रण करें।
अधवा
प्रश्न 9 : “अपने जीवन का दीप मैंने रक्त की धारा पर तैरा दिया है” – पंक्ति के आधार पर प क? चरित्र-चित्रण करें।
अथवा.
प्रश्न 10 : “ऐसा दीप-दान भी किसी ने किया है”! – पंक्ति के आधार पर पत्रा की चा” जाक विशेषताओं को लिखें।
अथवा
प्रश्न 11 : “सारे राजपूताने में एक ही धाय माँ है, पत्ना ! सबसे अच्छी !”- गृ्यांश के आघहर पर पब्ना का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 12 : “महल में धाय माँ अरावली पहाड़ बनकर बैठ गई है” – कथन के आधार पर संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 13 :
सिद्ध कीजिए कि पत्रा के चरित्र में माँ की ममता, राजपूतानी का रक्त, राजभक्ति और आत्म-त्याग की भावना है ।
उत्तर :
‘धाय माँ पत्ना’ के पुत्र का क्या नाम चन्दन था।
पम्ना धाय ‘दौपदान’ एकांकी की प्रतिनिधि पात्रा है। सच कहा जाय तो वही इस एकांकी की नायिका है तथा एकाकी की संपूर्ण कथा उसके इर्द-गिर्द ही घूमती है। इस एकांकी में उसका चरित्र एक वीरांगना के रूप में प्रस्तुत है जा है। यह वह भारतीय नारी नहीं है जिसके बारे में प्रसाद जी ने कहा था –

“‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत पग-पग तल में।
पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।”

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान

पन्ना धाय में हमें एक साथ पृथ्वी की-सी क्षमता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र की-सी गंभीरता, चन्द्रमा की-सी शॉंतलता तथा पर्वतों के समान मानसिक उच्चता दिखाई पड़ती है।

पत्ना धाय केवल एक आदर्श धाय ही नहीं है बल्कि उसमें सच्ची देशभक्ति तथा कर्त्तव्य परायणता भी कूटकृट कर भरी है। इन्हीं गुणों के कारण वह चित्तौड़ के उत्तराधिकारी कुंवर उदय सिंह की रक्षा बनवीर से करने के लिए अपने पुत्र को बलिदान करने से भी नहीं हिचकती। यद्यपि रणवीर उसे धन का लालच देकर खरीदना चाहता है लैकिन पत्ना उसे दो दूक जवाब देती है –

“राजपूतानी व्यापार नहीं करती, महाराज ! वह या तो रणभूमि पर चढ़ती है या चिता पर।” इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पन्ना धाय ‘दीपदान’ एकांकी की प्रमुख पात्रा होने के साथ-साथ एक आदर्श भारतीय नारी का उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 14 : ‘दीपदान’ एकांकी के आघार पर बनवीर की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
प्रश्न 15 : “महाराज बनवीर नहीं कहा? मेरे कहने भर से तुम देवी हो गई” !- गद्यांश के आधार पर बनवीर का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 16 : “रक्त तो तलवार की शोमा है’ – कथन के आधार पर बनवीर का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 17 : ‘विश्राम मैं करूँ ? बनवीर ! जिसे राजलक्ष्मी को पाने के लिए दूर तक की यात्रा करनी है ” – कथन के आधार पर संबेधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 18 : “यदि मेरा नाम लेना है तो जयकार के साथ नाम लो” – पंक्ति के आधार पर बनवीर का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 19 : “चुप रह घाय ! बच्चे को पालने वाली – कथन के आधार पर संबंधित पात्र का चरित्रचिन्नण करें।
अध्रवा
प्रश्न 20 : “लोरियाँ सुनानेवाली एक साधारण दासी महाराणा से बात करती है ?”-क्थन के आधार पर संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 21 : “वह दैत्य बन गया है – संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 22: “सर्प की तरह उसकी भी दो जीभें हैं जो एक से नहीं कुझेगी” – कथन के आयार पर बनवीर का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 23 : “उसे दूसरा रक्त भी चाहिए” – संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 24 : “वह पशु से भी गया-बीता है” – कथन के आधार पर संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 25 : “विलासी और अत्याचारी राजा कभी निष्केटक राज नहीं करता” – संबंयित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 26 : आज की रात में ही वह अपने को पूरा महाराणा बना लेता चाहता है – कथन के आधार पर बनवीर का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर :
बनवीर ‘दीपदान’ एकांकी का दूसरा प्रमुख पात्र है। वह महाराजा साँगा के भाई पृथ्वौराज का दासपुत्र है। प्रकृति से वह कूर तथा विलासी है। उसके रक्त में विश्वासधात का जहर भरा हुआ है। ऐसे ही चरित्र के कारण भारत का मध्यकालीन इतिहास का पन्ना काले अक्षरों में लिखा गया है। बनवीर के चरित्र को निम्नांकित शीषकों के अंतर्गत रखा जा सकता है –

(क) विलासी प्रकृति – बनवीर की बिलासी प्रकृति का पता इसी से चलता है उसने रावल सरूप सिंह की रूपवती, नटखट बेटी सोना को अपने प्रेम-जाल में फांस लिया है। वह बनवीर की प्रकृति से बेखबर उसके झृं प्रम में पागल हो चुकी है। बनवीर के प्रेम को वह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानती है।

(ख) राजसत्ता का लालची – बनवीर के अंदर राजसत्ता का लालच इतना भर चुका है कि वह अपना विवेक खों बैठता है। राजसिंहासन पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है मौका देखकर वह राजदरबागियों तथा सैनके के भी लालच देकर अपनी ओर मिला लेता है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान

(ग) असभ्य – बनवीर असभ्य है। सत्ता-लालच में वह यह भी भूल गया है कि जिस पन्ना को पूरा महल घाइ गा कहकर पुकारता है, वह उसके साथ अत्यंत कूर तथा असभ्यता से पेश आता है।
WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान 1

विश्वासधाती – बनवौर को महाराणा विक्रमादित्य काफी प्रेम करते हैं। इतना कि उनकी आत्मोयता में वह आभल है। इतना ही नहीं, अंत-पुर की रानियाँ भी उनसे काफी स्नेह करती हैं इसलिए वह अंत पुर में बेरोक-टोक आबा सकता है। अपने स्वार्थ के लिए वह इतने सारे लोगों के साध विश्वासघात करता है।

(द) हत्यारा – बनबौर की सत्ता लोलुपता इतनी बढ़ जाती है कि वह रातो-रात ही राजा बन जाना चाहता है। इसके लिए वहृ वड्बंत्न रचकर नगर में दौप-दान का उत्सव कराता है। उसी शोर-शराबे के बीच वह महाराणा के कक्न मे जाकर अनकी हत्या कर देता है। महाराणा का उत्तराधिकारी कुवंर उदय सिंह है। इसलिए चह उसे भी अपने रासे से हटाने के निए उम्म की हत्या करने का निश्चय कर सेता है। इसकी आशंका महल की परिचारिका सामली को पहले ही हो जाती है। वह कत्रा से कहती है –

“मर्ष की तरह उसकी भी दो जीभें हैं जो एक से नहीं दुझेंगी। उसे दूसरा रक्त भी चाहिए।”
अंतः वह कुंवर उदय सिंह के धोखे में पन्ना धाय के पुत्र चंदन को हत्या कर देता है।
हैस प्रकारह्म कह सकते हैं कि बनवीर का वरित्र एक स्वार्थलोलुज, विश्वासघाती तथा हत्यारे का चरित्र है। सेकिन अमें चरित्र का यह काला पहलू हो पज्ञा धाब के चरिज् को और भी उज्जल बना देता है।

प्रश्न 27 : ‘दीपदान’ एकांकी के सोना का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 28 : “धाय माँ, पागलपर्त कहीं कम होता है”‘ – के आधार पर सोना का चरित्र-चित्रण करें। अथवा,
प्रश्न 29 : “शायद सामंब्त की बेटी बनुँ, शायद महाराज की बेटी बनूँ” – पंक्ति के आघार पर सोना का यरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 30 : “कुछ बहुकर ही बनूनीय” – कथन के आयार पर संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें। अथवा,
प्रश्न 31 : “यहाँ आग की लपटें नाचती हैं, सोना जैसी रावल की लड़कियाँ नहीं “- कथन के आजा पर सोना का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा

प्रश्न 32 :
“में रावल की बेटी हैँ, शायद सार्मंत की बेटी बनूं” – पंक्ति के आधार पर संबंधित पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर :
सोना ‘दीपदान’ एकांकी के प्रमुख पात्रों में से एक है। यद्यापि वह बहुत कम समय के लिए एकाकी में आती है होकित इतने समय में ही अपना प्रभाव छोड़ जाती है। म्षोता का चरित्र-वित्रण निम्नांकित शौर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है –

(क) रावल की पुत्री-सौना चित्तौड़ के महाराजा के अधौन रावल (सरदार) की पुत्री है। राजदरबार से गुड़े होने के कारण दछाँ के सभी लोगों से उसका संबंध परिवार की तरह हो गया है। इस बात का पता उसकी बातदीत से चलता है उनको (बनवीर) हमारा नाच बहुत अच्छा लगा। ओहो बनवीर। उन्हें श्री महाराजा बनवीर कहो।”

(ख) रुपवती एवं नटखट – सोना की उन्न सोलह वर्ष है। वह जितनी रुपवती है उतनी ही नटखट भी है। जितनी वेर वक वह एकांकी में उपस्थित रहती है उसके नटखटपन का अंदाजा हमें लगता रहता है। वह थोड़ी देर के लिए भी चुररकानहीं जानती –

“‘धाय माँ, पागलपन कहीं कम होता है? पहाड़ बढ़कर कभी छोटे हुए हैं ? नदियाँ आगे बढ़कर कभी लौटी हैं ? फूल खिलने के बाद कभी कली बने हैं ?'”

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(ग) अपनी किस्मत पर इठलाने वाली — सोना एक साधारण सरदार की पुत्री होकर भी जिस तरह वह बनवीर की कृपापात्र बनी है उसे वह अपनी किस्मत ही मानती है। उसकी सोच है कि यह उसका भाग्य ही है जिसके कारण वह इतना कुछ पा रही है –
“भाग्य तो सबके होता है धाय माँ ! ये नूपुर मेरे पैरों में पड़े हैं, तो यह भी इनका भाग्य है। मेरे आगमन का संदेश पहले ही पहुँचा देते हैं, तो यह भी इनका भाग्य है।’

(घ) बनवीर के प्रेम में पागल – सोना बनवीर के प्रेम में पागल है। वह बनवीर की कूटनीति को समझ नहीं पाती तथा उसके प्रेम को सच्चा मानती है जबकि पन्ना उसे सावधान करते हुए कहती है-
“‘आँधी में आग की लपट तेज ही होती है, सोना ! तुम भी उसी आँधी में लड़खड़ाकर गिरोगी। तुम्हारे ये सारे नूपुर बिखर जाएंगे। न जाने किस हवा का झोंका तुम्हारे इन गीतो की लहरों को निगल जाएगा।”

(ङ) सुनहरे भविष्य का सपना देखने वाली – सोना का यह विश्वास है कि आगे चलकर शायद उसकी किस्मत भी खुल जाएगी। वह आने वाले उन दिनों को याद करती हुई पन्ना से कहती है –
“मैं रावल की बेटी हूँ, शायद सामंत की बेटी हूँ, शायद महाराज की बेटी बनूँ ! कुछ बढ़कर ही बनूँगी। और तुम धाय माँ ? सिर्फ धाय माँ ही रहोगी।” इस प्रकार हम पाते हैं कि सोना का चरित्र इस एकांकी में बनवीर के चरित्र का प्रतिबिंब बनकर आया है। उसकी बातों से बनवीर के दुष्चक्र की गंध आती है। इन्हीं कारणों से वह एकांकी के प्रमुख पात्रों में अपना स्थान बनाती है।

प्रश्न 33 : ‘दीपदान’ एकांकी का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा
प्रश्न 34 : ‘दीपदान’ एकांकी के शीर्षक का औचित्य निर्धारित कीजिए।
अथवा

प्रश्न 35 :
‘दीपदान’ शीर्षक एकांकी की कथावस्तु को अपने में समेटे है – अपना विचार प्रस्तुत करें।
उत्तर :
‘दीपदान’ डॉ० रामकुमार वर्मा द्वारा रचित एक ऐतिहासिक एकांकी है। किसी भी रचना का शीर्षक उसके प्रमुख पात्र या घटना पर आधारित होता है। इस एकांकी में दीप-दान कई अर्थों में हमारे सामने आता है – पहले अर्थ में दीप-दान – जो चित्तौड़ का एक सास्कृतिक उत्सव है तथा इसमें तुलजा भवानी की अराधना कर दीप-दान किया जाता है।

दूसरे अर्थ में दीप-दान का आशय अपने कुलदीपक चंदन के बलिदान से है। एक ओर जब सारा चित्तौड़ तुलजा भवानी के लिए दीप-दान कर रहा है तो वहीं दूसरी और मातृभूमि तथा भावी राजा की रक्षा के लिए पत्ना अपने ही पुत्र चंदन को मातृभूमि की भेंट चढ़ा देती है – ” आज मैंने भी दीपदान किया है, दीपदान ! अपने जीवन का दीप मैने रक्त की धारा पर तैरा दिया है। ऐसा दीपदान भी किसी ने किया है।”

तीसरे अर्थ में जहाँ एक ओर राज्य की सुख-समृद्धि के लिए चित्तौड़ के लोग दीपदान करते हैं, पत्रा मातृभूमि के लिए अपने पुत्र का ही दीपदान करती है वहीं बनवीर भी है जो अपनी सत्ता लोलुपता के कारण अपने रास्ते के कॉंटे कुँवर उदयसिंह के धोखे में चंदन का दीप-दान करता है –

” आज मेरे नगर में स्त्रियों ने दीप-दान किया है। मैं भी यमराज को इस दीपक का दान करूँगा। यमराज ! लो इस दीपक को। यह मेरा दीप-दान है।’ इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि चाहे विषय की दृष्टि से हो, चाहे चित्तौड़ की संस्कृति की दृष्टि से हो या अपने कुल के दीप के दान करने की बात हो या फिर बनवीर द्वारा सत्ता पाने के लिए यमराज को दीपदान करने की बात हो हर दृष्टि से इस एकांकी का शौर्षक ‘दीपदान’ बिल्कुल सार्थक एवं उपयुक्त है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान

प्रश्न 36 :
‘दीपदान’ एकांकी के आधार पर कीरत बारी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर :
कीरत बारी ‘दीपदान’ एकांकी का गौण पात्र है लेकिन अपनी कर्तन्तन्यनिष्ठा, साहस तथा राजभक्ति से वह पाठको का दिल जीत लेता है। कीरत बारी यद्याप राजमहल में जूठी पत्तलें उठाता है लेकिन वह पक्का राजभक्त है। यह सच्चाई उसके इस कथन से झलकती है – “अन्नदाता ! प्यार कहने में जबान पर कैसे आवे ? वो तो दिल की बात है। मौके पे ही देखा जाता है और कहने को तो मैं कह चुका हूँ कि उनके लिए अपनी जान तक हाजिर कर सकता हूँ।”

जब कीरत बारी को पन्ना धाय से यह पता चलता है कि कुंवर जी की जान को खतरा है तो वह पन्ना धाय के कहने के अनुसार उसे जूठी पत्तलों की टोकरी में छिपाकर बाहर निकालने को तैयार हो जाता है। उसे यह पता है कि पकड़े जाने पर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा पर वह अपनी जान की परवाह नहीं करता।

इस प्रकार हम पाते हैं कि कीरत बारी एक अत्यंत ही छोटा आदमी है लेकिन अपने कार्य से वह आसमान की ऊँचाइयों को छूता है। पन्ना धाय भी उसके इस उपकार तथा राजभक्ति के बारे में कहती है – “तो जाओ कीरत! आज तुम जैसे एक छोटे आदमी ने चित्तौड़ के मुकुट को संभाला है। एक तिनके ने राज-सिंहासन को सहारा दिया है । तुम धन्य हो!” इस प्रकार हम पाते हैं कि कीरत बारी ‘दीपदान’ एकांकी का आदर्श पात्र है।

प्रश्न 37 :
“बनवीर की महत्वाकाष्था ने उसे हत्यारा बना दिया है” – इस कथन की पुष्टि अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर :
बनवीर ‘दीपदान’ एकांकी का खलनायक है। वह महाराज साँगा के भाई पृथ्वीराज का दासपुन्त है लेकिन उसमें राजसिंहासन पाने की महत्वाकांक्षा बुरी तरह घर कर चुकी है। अपने इस महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वह बड़े से बड़े जधन्य तथा अनैसिक काम कर सकता है। उसकी इस प्रवृत्ति ने उसे प्रकृति से क्रूर तथा विलासी बना दिया है।

राजसिंहासन पाने के लिए वह मौका देखकर राजदरबारियों तथा सैनिकों को अपनी ओर मिला लेता है ताकि वह महाराजा के उत्तराधिकारी कुंबर सिंह की हत्या कर रातो-रात राजा बन जाय। लेकिन पन्नाधाय तथा कीरत बारी के बलिदान से वह कुंवर की हत्या के बदले पत्रा धाय के पुत्र की हत्या कर देता है। बनवीर का यह कार्य इस बात को सिद्ध करता है कि वह स्वार्थलोलुप, विश्वासघाती तथा हत्यारा है। उसकी महत्वाकांक्षा ने ही उसे हत्यारा बना दिया है।

WBBSE Class 10 Hindi दीपदान Summary

सुप्रसद्धि एकांकीकार डॉ०० रामकुमार वर्मा का जन्म मध्यप्रदेश के सागर जिले के गोपालगंज नामक मुहल्ले में सन् 1905 में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी०ए०, एम० ए० तथा सन् 1940 में नागपुर विश्वविद्यालय से पी एच० डी० की उपाधि प्राप्त की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अध्यापन कार्य किया तथा सन् 1966 में अवकाश प्राप्त किया। इस महान साहित्यकार का निधन सन् 1990 में हो गया। डॉ० रामकुमार वर्मा की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान 2

एकांकी-संग्रह – ‘पृथ्वीराज की आँखें’, ‘रेशमी टाई’, ‘चारममित्रा’, ‘विभूति’, ‘सप्तकिरण’, रूपरंग’, ‘रजतरश्मि’, ॠतुराज’, ‘दीपदान’, ‘रिमझिम’, ‘इंद्रधनुष’, ‘पांचजन्य’, ‘कौमुद्महोत्सव’, ‘मयूर पंख’, ‘खट्टे-मीठे एकांकी’, ‘ललित-एकांकी’, ‘कैलेंडर का आखिरी पन्ना’, ‘जूही के फूल’।,

नाटक – ‘विजयपर्व’, ‘कला और कृपाण’, ‘नाना फड़नवीस’, ‘सत्य का स्वप्न’।
काव्य-संग्रह – ‘चित्ररेखा’, ‘चंद्रकिर’, ‘अंजलि’, ‘अभिशाप’, ‘रूपराशि’, ‘संकेत’, ‘एकलव्य’, ‘वीर हम्मीर’, ‘कुल ललना’, ‘चित्तौड़ की चिता’, ‘नूरजहाँ शुजा’, ‘निशीथ’, ‘जौहर’, ‘आकाश-गंगा’, ‘उत्तरायण’, ‘कृतिका’।
गद्यगीत-संग्रह – ‘हिमालय’।
आलोचना एवं साहित्य का इतिहास – ‘कबीर का रहस्यवाद’, इतिहास के स्वर’, ‘साहित्य समालोचना’, ‘साहित्य शास्त्र’, ‘अनुशीलन’, ‘समालोचना समुच्चय’, ‘हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास एवं हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास’।
संपादन – कबीर ग्रंथावली’।
पुरस्कार – पद्मभूषण (सन् 1963), साहित्य वाचस्पति (सन् 1968)

हिंदी की लघु नाटय परपरा को नया मोड़ देनेवाले डॉ० रामकुमार वर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य में एकांकी समाट के रूप में जाने जाते हैं। एकांकी साहित्य के विकास और वृद्धि में उन्होंने जो योगदान दिया इसके लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions एकांकी Chapter 1 दीपदान

शब्दार्थ

पृष्ठ संख्या – 160

  • संरक्षण = अच्छी तरह से पालन-पोषण करना, रक्षा करना।
  • धाय = दाई माँ।
  • रूपवती = सुंदर।
  • अन्त पुर = महल का वह भीतरी भाग जहाँ रानियाँ रहती थीं।
  • परिचारिका = सेविका, सेवा करनेवाली।
  • कूर = कठोर।
  • विलासी = ऐश करने वाला, अय्याश।
  • कक्ष = कमरा।
  • पार्श्व = पीछे ।
  • शैया = बिस्तर ।
  • सिरहाने = सिर की ओर।
  • नेपथ्य = रंगमंच का पिछला हिस्सा।
  • नृत्य धन्वनि = नाचने गाने की आवाज।
  • मृदंग = ढोल की तरह का एक वाद्य।
  • कड़खे = एक प्रकार का वाद्य।
  • कंकन-बंधन = विवाह के बंधन में बँधना।
  • रण चढ़ण = युद्ध में जाना।
  • पुत्र बधाई = पुत्र प्राप्ति की
  • बधाई = चाव = इच्छा ।
  • दिहाड़ा = दिन ।
  • रंक = दरिद्र। राव = राजा।
  • घर जातां = पलायन करना।
  • श्रम पलटतां = परिश्रम से भागना।
  • त्रिया = स्त्री।
  • पडंत = पड़ना ।
  • ताव = पलायन, तीव्र बुखार।

पृष्ठ संख्या – 161

  • ऐ = ये ।
  • तीनहु = तीनों ।
  • मँरण रा = मरण के समान ।
  • तुलजा भवानी = एक देवी ।
  • राजवंश = राज का वंश।
  • कुलदीपक = वंश का दीपक।

पृष्ठ संख्या – 162

  • कुंड = तालाब।
  • उद्यत = बेचैन
  • प्रस्थान = जाना।

पृष्ठ संख्या – 163

  • नुपुर-नाद = घुंघरू के स्वर।
  • अट्टहास = भयंकर हँसी।
  • मातृत्व = ममता।
  • झूल = आवरण।
  • चीर = वस्व।

पृष्ठ संख्या – 164

  • भवसागर = संसाररूपी सागर।
  • ज्ञात = मालूम।
  • उषा = रात्रि बीतने तथा प्रात: होने के बीच का समय।
  • अनुग्रह = कृपा।
  • मल्ल-कीड़ा = कुश्ती।
  • प्रलाप = रोना।
  • स्नेह = प्रेम ।
  • राजसेवा = राजा की सेवा।

पृष्ठ संख्या =165

  • आगमन = आने ।
  • संदेश = सूचना, समाचार ।
  • मौन = चुप ।
  • आप-से-आप = खुद, स्वंय।
  • सूर्यलोक = स्वर्गलोक।
  • विद्रोह = बागावत ।
  • राग-रंग = प्रेम और मस्ती।
  • जौहर = अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वियों का आग में कूदना।
  • आत्मबलिदान = अपने-आप को बलिदान करना।

पृष्ठ संख्या – 166

  • प्रतिध्वनि = ध्वनि की ध्वनि, गूँज।
  • जमाव = जमा होना
  • गुमसुम = चुपचाप

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पृष्ठ संख्या – 167

  • धावा = आक्रमण।
  • दाने = मोती।
  • यकायक = अचानक।
  • धमक = आवाज।

पृष्ठ संख्या – 168

  • सर्वनाश = सब कुछ नाश।
  • कुसमय = बुरा समय।

पृष्ठ संख्या – 169

  • कांड = घटना।
  • रच देता = अंजाम दे देता।
  • निष्कंट = बिना किसी काँटे / अवरोध के।

पृष्ठ संख्या – 170

  • सिसकी = घीरे-धीरे रोने की आवाज।
  • युक्ति = उपाय।

पृष्ठ संख्या – 171

  • चरन लागों = पैर पड़ता हूँ, चरण स्सर्श करता हूँ।
  • पैड़े = महल।
  • पैसारा = प्रवेश।
  • बारी = जूठी पत्तलें उठानेवाला।
  • बेखटके = बिना रोक-टोक के ।
  • मालमता = घन-दौलत।
  • ब्यालू = भोजन ।
  • उजियार = उजियाला ।
  • हर-भजन = ईश्वर का भजन।
  • चौर-छतर = सिंहासन एवं छत्र सगर जहान = सारी दुनिया।
  • बन्दगी = वंदना।
  • तीन तिरबाचा = तीन-पाँच।

पृष्ठ संख्या – 172

  • धूर = धूलि।
  • सरीखा = तरह ।
  • तरवार = तलवार ।
  • तरकीब = उपाय।
  • हुकुम करा = आदेश किया।

पृष्ठ संख्या – 173

  • जस = यश।

पृष्ठ संख्या – 174

  • सिर पर खून चढ़ना = बदले की भावना से भरा होना।

पृष्ठ संख्या = 175

  • वज = बिजली।
  • भीषण = भयंकर ।
  • प्रहार = चोट ।
  • मयार्दा = प्रतिष्ठा ।
  • धर्म = कर्त्तव्य ।
  • झरोखे = खिड़की।

पृष्ठ संख्या – 176

  • आखेट = शिकार।

पृष्ठ संख्या – 177

  • जागीरें = भू-संपत्ति।
  • धावा = हमला।
  • स्मरण = याद।

पृष्ठ संख्या – 178

  • शूल-सी = दर्द जैसा।
  • बेरूआ = पक्षी।
  • साँझ = शाम।
  • बाटडली जोही = रास्ता देखा।
  • मेड्या = मेड़ पर, खेत की सीमा पर बना मिट्टी का घेरा।

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पृष्ठ संख्या – 179

  • भारिया = भर गया ।
  • नैन = आँख।
  • भयी = हो गयी मुसकल = मुश्किल, कठिन।
  • घड़ी = समय ।
  • नित्रा = नौंद कपट = धोखा।
  • अंगरों = आग।
  • सेज = बिछावन ।
  • फूल-से = फूल की तरह कोमल ।
  • लाल = पुत्र।
  • मुख = चेहरा।
  • मघ्घ = शराब।

पृष्ठ संख्या – 180

  • मंगल-कामना = अच्छी भावना, इच्छा।
  • जागीर = संपत्ति।
  • रक्त = खून।

पृष्ठ संख्या – 181

  • चिता = लकड़ी का ठेर जिसपर लाश जलायी जाती है।
  • नारकी = नरक में जानेवाला।

पृष्ठ संख्या – 182

  • तीव्रता = तेजी।
  • चिर-निद्रा = हमेशा के लिए नींद में सो जाना, मृत्यु।
  • नराधम = नीच व्यक्ति।
  • कटार = एक प्रकार का चाकू ।
  • अबोध = भोला।
  • कंटक = काँटा।
  • मूच्छिंत = बेहोश।
  • मन्द = धीमी।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions कहानी Chapter 5 धावक to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Chapter 5 Question Answer – धावक

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भंबल दा की साइकिल के बारे में क्या प्रसिद्ध था?
उत्तर :
भंबल दा की साइकिल के बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि घंटी छोड़कर उसका सब कुछ बजता है।

प्रश्न 2.
भंबल दा अपनी विधवा बहन को कैसे सहायता देते थे ?
उत्तर :
भंबल दा अपनी विधवा बहन को 50 रु० (पचास रुपये) प्रतिमाह भेजकर उसकी सहायता किया करते थे।

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प्रश्न 3.
स्पोट्र्स का मैदान कैसा था ?
उत्तर :
स्सोदर्स का मैदान ज्यामितिक अल्पना से अलंकृत था।

प्रश्न 4.
औरतों से भंबल दा को विरक्ति क्यों हो गई थी?
उत्तर :
अपनी भाभी अर्थात् अशोक दा की पत्नी के उपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण भंबल दा को औरतों से विरक्ति हो गई थी ।

प्रश्न 5.
भंबल दा की जीवन के प्रति क्या धारणा थी ?
उत्तर :
भंबल दा की जीवन के प्रति यह धारणा थी कि जिंदगी शान की नहीं बल्कि सम्मान की होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
स्पोर्द्स का मैदान कैसा था?
उत्तर :
स्पोर्ट्स का मैदान ज्यामितिक अल्पना से अलंकृत (सजा) था।

प्रश्न 7.
मैदान में किसकी कमी थी?
उत्तर :
मैदान में भंबल दा की कमी थी।

प्रश्न 8.
लेखक ने हड़बड़ाकर किस पर नजर डाली?
उत्तर :
लेखक ने हड़बड़ाकर धावकों पर नजर डाली।

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प्रश्न 9.
लेखक ने खेल प्रारम्भ कराने के लिए क्या किया?
उत्तर :
लेखक ने खेल प्रारम्भ कराने के लिए पिस्तौल का घोड़ा दबा दिया।

प्रश्न 10.
स्पोर्द्स अधिकारी से भंबल दा ने क्या पूछा?
उत्तर :
स्योर्द्स अधिकारी से भंबल ने पूछा क्या सभी खिलाड़ियों को समान सुविधा देने का कोई कानून नहीं है?

प्रश्न 11.
भंबल दा को लोग क्या कहकर ललकार रहे थे ?
उत्तर :
भंबल दा को लोग, ‘बढ़े चलिए बम भोले भैया’ ” कहकर ललकार रहे थे।

प्रश्न 12.
भंबल दा धीरे-धीरे क्यों दौड़ रहे थे?
उत्तर :
भंबल दा थकान के प्रभाव से धीरे-धीरे दौड़ रहे थे।

प्रश्न 13.
भंबल दा को लंगी मारने पर लोग क्या कह कर चिल्ला रहे थे?
उत्तर :
भंबल दा को लंगी मारने पर लोग मारो-मारो कहकर चिल्ला रहे थे।

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प्रश्न 14.
भंबल दा हँसते हुए क्या कहते ?
उत्तर :
भंबल दा हँसते हुए कहते भला किसान-मजदूर को कसरत की क्या जरूरत।

प्रश्न 15.
लोग किसकी आयु को पाँच साल की कहते हैं?
उत्तर :
लोग स्सोर्ट्समैन और बीमा कम्पनी के एजेन्ट की आयु को पाँच साल का कहते हैं।

प्रश्न 16.
भंबल दा अपवाद क्यों थे?
उत्तर :
भबल दा 25 वर्षो से स्पोर्ट्स में भाग लेते आ रहे हैं, इसलिए अपवाद थे।

प्रश्न 17.
खेल अधिकारी, चाहकर भी भंबल दा को क्यों बैठा नहीं सकते थे?
उत्तर :
दर्शकों के जबर्दस्त समर्थन के कारण खेल अधिकारी चाहकर भी भंबल दा को बैठा नहीं सकते थे।

प्रश्न 18.
पिछली बार बाधा दौड़ में कितने प्रतियोगी थे?
उत्तर :
पिछली बार बाधा-दौड़ में महज चार प्रतियोगी थे।

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प्रश्न 19.
भंबल दा किसलिए दौड़ते थे?
उत्तर :
भंबल दा पुरस्कारों के लिए नहीं बल्कि अपने को तौलने के लिए दौड़ते थे।

प्रश्न 20.
भंबल दा को कैसी जिन्दगी प्यारी थी?
उत्तर :
भंबल दा को शान की नहीं सम्मान की जिन्दगी प्यारी थी।

प्रश्न 21.
भंबल दा के अनुसार शान की जिन्दगी कैसी होती है?
उत्तर :
भंबल दा के अनुसार शान की जिन्दगी दूसरों से अपने को ऊँचा दिखाने, कूरता और खुदगर्जी की होती है।

प्रश्न 22.
भंबल दा सम्मान को क्या मानते थे?
उत्तर :
भंबल दा सम्मान को परस्सर सौहार्द और समता का द्योतक मानते थे।

प्रश्न 23.
चीफ पर्सनल अफसर के रूप में अशोक दा क्या करते थे?
उत्तर :
चीफ पर्सनल अफसर के रूप में अशोक दा जायज को नाजायज और नाजायज को जायज किया करते थे।

प्रश्न 24.
भंबल दा को क्यों औरतों से विरक्ति हो गयी थी?
उत्तर :
भंबल दा को अपनी भाभी के आचरणों के कारण औरतों से विरक्ति हो गयी थी।

प्रश्न 25.
माँ ने लेखक को बुलाकर क्या कहा?
उत्तर :
माँ ने लेखक को बुलाकर भंबल दा की शादी के लिए कहा।

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प्रश्न 26.
‘धावक’ कहानी के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर :
‘धावक’ कहानी के रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न 27.
स्पोर्द्स के मैदान में किसकी कमी थी?
उत्तर :
स्पोटर्स के मैदान में भंबल दा की कमी थी।

प्रश्न 28.
‘बम भोले भैया’ के नाम से किसे जाना जाता है?
उत्तर :
भंबल दा को बम भोले भैया के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 29.
अजीब खब्ती आदमी है – ‘खब्ती आदमी’ किसे कहा गया है?
उत्तर :
भंबल दा को ‘खब्ती आदमी’ आदमी कहा गया है।

प्रश्न 30.
लेखक स्पोट्स के मैदान में किस बात पर चौकन्ना थे ?
उत्तर :
लेखक इस बात पर चौकन्ना थे कि कहीं सामान्य मजदूर-बाबू क्लास के लोग वी.आई.पी. की जगहों को न हधिया लें।

प्रश्न 31.
लोग भंबल दा के किस बात आश्वस्त थे?
उत्तर :
लोग भंबल दा के इस बात पर आश्वस्त थे कि खेल में दूसरे भले ही बेईमानी कर बैठें लेकिन भंबल दा कभी बेईमानी नहीं कर सकते।

प्रश्न 32.
लेखक भंबल दा की किस बात से कुढ़ते थे?
उत्तर :
अक्सर जब दौड़ समाप्त हो चुकी होती और धावक अपने प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पर खड़े होकर दर्शंको का अभिवादन कर रहे होते उस समय भी भंबल दा अपनी दौड़ पूरी करने के लिए ट्रैक पर दौड़ रहे होते थे।

प्रश्न 33.
अशोक दा हतबुद्धि कब हो गये थे?
उत्तर :
जब भंबल दा ने पुरस्कार लेने से इन्कार कर दिया था उस समय अशोक दा हत्बुद्धि हो गये थे।

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प्रश्न 34.
लेखक ने भंबल दा को अन्य धावकों की तरह क्या नहीं करते देखा ?
उत्तर :
लेखक ने भंबल दा को अन्य धावकों की तरह कभी दौड़ का अभ्यास करते नहीं देखा।

प्रश्न 35.
“भला किसान-मजदूर को कसरत की क्या जरूरत” – कथन किसका है?
उत्तर :
यह कथन भंबल दा का है।

प्रश्न 36.
लोग स्पोट्स मैन तथा बीमा कंपनी के एजेंट के बारे में क्या कहते हैं ?
उत्तर :
इनकी आयु पाँच साल होती है।

प्रश्न 37.
भंबल दा किसके अपवाद थे ?
उत्तर :
लोगों के अनुसार स्सोद्संमैन तथा बीमा कंपनी के एजेंट की आयु पाँच साल होती है – भंबल दा इस नियम के अपवाद थे।

प्रश्न 38.
किसने कभी नहीं खेलों के नियमों का उल्लंघन किया ?
उत्तर :
भंबल दा ने खेलों के नियमों का उल्लंघन कभी नहीं किया।

प्रश्न 39.
पिछली बार की बाधा दौड़ में कुल कितने प्रतियोगी थे?
उत्तर :
पिछली बार के बाधा दौड़ में कुल चार प्रतियोगी थे।

प्रश्न 40.
जब एक प्रतियोगी ने भंबल दा के बाधा दौड़ में द्वितीय आने को गलत बताकर माँ की कसम खाने को कहा तो भंबल दा ने क्या उत्तर दिया?
उत्तर :
“तुम्हारी माँ नहीं है शायद वरना तुम इस तुच्छ पुरस्कार के लिए माँ को दाँव पर नहीं लगाते मेरे भाई।”

प्रश्न 41.
भंबल दा के बड़े भाई का नाम क्या था?
उत्तर :
भंबल दा के बड़े भाई का नाम अशोक दा था।

प्रश्न 42.
भंबल दा तथा उनके भाई अशोक दा की उपलब्घियों में कितना अंतर था?
उत्तर :
भंबल दा तथा उनके भाई अशोक दा की उपलब्धियों में वर्षो का नहीं युगों का अंतर था। भंबल दा एक किरानी थे जबकि अशोक दा चीफ पर्सनल ऑफिसर थे ।

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प्रश्न 43.
भंबल दा की शिक्षा कहाँ तक हुई ?
उत्तर :
भंबल दा की शिक्षा मैट्रीक्यूलेशन तक हुई ची।

प्रश्न 44.
भंबल दा मैट्रीक्यूलेशन में कितनी बार फेल हुए थे ?
उत्तर :
भंबल दा मैट्रीक्यूलेशन में बार बार फेल हुए थे।

प्रश्न 45.
किसने काफी करीब से भंबल दा को देखा था ?
उत्तर :
लेखक ने भंबल दा को काफी करीब से देखा था।

प्रश्न 46.
“आदमी को शान से जीना चाहिए या तो इस दुनिया से कूच कर जाना चाहिए” – यह कथन किसका और किसके प्रति है?
उत्तर :
यह कथन भंबल दा के बड़े भाई अशोक दा का है तथा यह भंबल दा के प्रति है।

प्रश्न 47.
अशोक दा अक्सर भंबल दा से क्या कहा करते थे?
उत्तर :
अशोक दा अक्सर भंबल दा से यह कहा करते थे कि, ” आदमी को शान से जीना चाहिए या तो इस दुनिया से कूच कर जाना चाहिए। मेरा भाई मेरी गरिमा के अनुकूल होकर आता है तो उसका स्वागत है, वरना उसे यहाँ आने की जरूरत ही क्या है? माँ को मेरे पास छोड़ दे या उसे लेकर किसी दूसरे शहर घला जाय। मैं दूसरे को खैरात बाँटता हूँ. उन्हें भी ढाई सी भेज दिया करूँगा।

प्रश्न 48.
भंबल दा को कैसी जिंदगी चाहिए थी ?
उत्तर :
भंबल दा को शान की नहीं सम्मान की जिंदगी चाहिए थी।

प्रश्न 49.
भंबल दा के अनुसार शान क्या होती है?
उत्तर :
भंबल दा के अनुसार शान द्वारा अपने को ऊँचा दिखाने की क्रूरता तथा खुदगर्जी होती है।

प्रश्न 50.
भंबल दा के अनुसार सम्मान क्या होता है?
उत्तर :
भंबल दा के अनुसार सम्मान आपसी प्रेम तथा समता का प्रतीक होता है।

प्रश्न 51.
लेखक के सामने भंबल दा को लेकर क्या समस्या थी?
उत्तर :
लेखक के सामने भंबल दा को लेकर समस्या यह थी कि कैसे उन्हें बाकी सहकर्मियों से आगे बढ़ाकर शीर्ष पर ले जाएँ।

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प्रश्न 52.
लेखक भंबल दा को किस बात के लिए उकसा रहे थे ?
उत्तर :
लेखक भंबल दा को इस बात के लिए उकसा रहे थे कि वे ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट होकर किसी ट्रेड में विशेषता प्राप्त कर लें।

प्रश्न 53.
भंबल दा केवल परिवार ही नहीं, मुहल्ले तक में अपनी जड़ जमाए हुए थे – कैसे ?
उत्तर :
भंबल दा सबके गम, सबकी खुशी में शरीर होने वाले थे – चाहे वह बंगाली हो, गैर बंगाली हो, हिन्दू हो या फिर मुसलमान हो। जहाँ भी उनकी जरूरत होती थी- वे वहीं हाजिर हो जाते थे। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण भिंबल दा केवल अपने परिवार में ही नहीं, मुहल्ले तक में अपनी जड़े जमाए हुए थे।

प्रश्न 54.
किसकी शादी से भंबल दा की माँ टूट गई थी?
उत्तर :
भंबल दा के भाई अर्थात् अपने बड़े बेटे अशोक की शादी से भिंबल दा की माँ टूट गई थी।

प्रश्न 55.
माँ को कौन-सी चीज बुरी तरह सालती थी ?
उत्तर :
माँ को यह बात बुरी तरह सालती थी कि उनका एक बेटा (अशोक) उनकी छाया तक से बचता चलता है।

प्रश्न 56.
भंबल दा को सोया जानकर माँ क्या करती थीं?
उत्तर :
भिंबल दा को सोया जानकर माँ अपने दिल के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर तनहाइयों में डूब जाती थी।

प्रश्न 57.
अपने दर्द को झूठलाने के लिए माँ क्या करती थीं ?
उत्तर :
अपने दर्द को झूठलाने के लिए माँ अशोक दा की खूब प्रशंसा किया करती थीं।

प्रश्न 58.
परिवार का शुभचिंतक होने के नाते लेखक के सामने कौन-सा रास्ता बच रहा था?
उत्तर :
परिवार का शुभचिंतक होने के नाते लेखक के सामने एक ही रास्ता बच रहा था। वह रास्ता था – भिंबल दा तथा अशोक दा के बीच की कड़ी को जोड़ देना।

प्रश्न 59.
क्या भंबल दा का प्रमोशन हुआ ? क्यों ?
उत्तर :
नहीं, भंबल दा का प्रमोशन नहीं हो पाया क्योंकि वह गलत तरीके से प्रमोशन लेना नहीं चाहते थे।

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प्रश्न 60.
भंबल दा के विवाह के बारे में क्या मुश्किल थी ?
उत्तर :
भंबल दा के विवाह के बारे में मुश्किल यह थी कि वे उम्र के उस दौर में पहुँच रहे थे जहाँ मनचाही लड़कियाँ नहीं मिलती हैं।

प्रश्न 61.
लेखक ने भंबल दा से शादी के लिए किसे राजी क्या ?
उत्तर :
लेखक ने एक मास्टरनी को भंबल दा से शादी के लिए राजी किया।

प्रश्न 62.
लेखक ने जिसके साथ भंबल दा की विवाह तय किया – क्या वह विवाह हो पाया?
उत्तर :
लेखक ने जिसे भंबल दा के साथ विवाह के लिए राजी किया था उसके साथ विवाह नहीं हो पाया ।

प्रश्न 63.
मास्टरनी के सामने पड़ने से किसकी रूह काँपती थी और क्यों ?
उत्तर :
मास्टरनी के सामने पड़ने से लेखक की रूह काँपती थी। क्योकि उसका विवाह भंबल दा के साथ नहीं हो पाया।

प्रश्न 64.
भंबल दा ने अपना मकान कैसे बनवाया था?
उत्तर :
भंबल दा ने को-आपरेटिव और पी०एफ० के लोन से अपना मकान बनवाया था।

प्रश्न 65.
भंबल दा ने विवाह क्यों नहीं किया ?
उत्तर :
भंबल दा का मासिक वेतन साढ़े तीन सौ रुपये था। माँ के इलाज के बाद इतने पैसे नहीं बचते थे कि पत्ली का भी भार वहन कर सकते। यही कारण था कि भंबल दा ने विवाह नहीं किया।

प्रश्न 66.
कौन भंबल दा की पैसे की समस्या हल कर सकता था ?
उत्तर :
भंबल दा की भावी पत्नी पैसे की समस्या हल कर सकती थी।

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प्रश्न 67.
भंबल दा को किसका अहसानमंद बनना कुबूल न था?
उत्तर :
भावी पत्नी का अहसानमंद बनना भंबल दा को कुबूल न था।

प्रश्न 68.
किसने, किससे, किसके लिए शादी करने की कोशिश करने की बात लेखक से कही?
उत्तर :
भंबल दा की माँ ने लेखक से भबल दा की शादी के लिए कोशिश करने की बात कही।

प्रश्न 69.
पचीस वर्षो में पहली बार भंबल दा को कौन-सा पुरस्कार मिलने जा रहा था?
उत्तर :
पचीस वर्षो में पहली बार भंबल दा को विदूपक का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार मिलने जा रहा था।

प्रश्न 70.
भंबल दा को पहला स्ट्रोक कब हुआ?
उत्तर :
जिस दिन भंबल दा को विदूषक का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई उसी रात भंबल दा को पहला स्ट्रोक हुआ।

प्रश्न 71.
भंबल दा का मकान कहाँ था ?
उत्तर :
स्टेशन के पास ही भंबल दा का मकान था।

प्रश्न 72.
भंबल दा का मकान कितने कमरे का था?
उत्तर :
भंबल दा का मकान दो कमरे का था।

प्रश्न 73.
भंबल दा के कमरे की दशा कैसी थी?
उत्तर :
भंबल दा के कमरे की दशा काफी अस्त-व्यस्त थी। माँ काली के चित्र के सामने जली हुई धूप-काठियों की ढेर थी। मकड़े के जाले लटक रहे थे। पिछ्छले तीन महीने से कैलेण्डर का पन्ना नहीं बदला गया था तथा चमगादड़ों ने वहाँ अपना घर बना लिया था।

प्रश्न 74.
भंबल दा ने जो कागज भैया (अशोक दा) के नाम छोड़ा था उसमें क्या लिखा था?
उत्तर :
भंबल दा ने अपने भाई के लिए छोड़े गए कागज में लिखा – ”भैया, दौड़ में जीत उसी की होती है जो सबसे आगे निकल जाता है, चाहे लंगी मारकर हो, या गलत ट्रैक हथिया कर हो।… मुझे खुशी है कि मैने लंगी नहीं मारी, गलत ट्रैक नहीं पकड़ा।”

प्रश्न 75.
भंबल दा के पड़ोस के दूर-दूर खड़े लोग, औरतें, बच्चे लेखक तथा अशोक दा को किस नजर से देख रहे थे ?
उत्तर :
भंबल दा के पड़ोस के दूर-दूर खड़े लोग, औरतें, बच्ये तथा लेखक अशोक दा को अजूबा-सा देख रहे थे।

प्रश्न 76.
समाज का कामुक, कूर वर्ग किसका रस लेते आघाता नहीं है ?
उत्तर :
समाज का कामुक तथा क्रूर वर्ग सांड़-युद्ध, ग्लैडियेटर्स तथा ग्यूजिकल चेयर जैसे खेल की रस लेते अघाता नहीं है।

प्रश्न 77.
कुछ दिनों से एक नया कौन-सा रुचि-संस्कार जन्मा है ?
उत्तर :
पिछले कुछ दिनों से एक नया रुचि-संस्कार जो जन्मा है, वह है – लड़कियों, युवतियों की म्यूजिकल वेयर।

प्रश्न 78.
लेखक पिछले कई सालों से रस ले-लेकर क्या देख रहे हैं?
उत्तर :
लेखक पिछले कई सालों से रस ले-लेकर कामुक तथा क्रूर वर्ग की मानसिकता को देख रहे हैं।

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प्रश्न 79.
अपनी असमय मृत्यु के बारे में भंबल दा ने अशोक दा को पत्र में क्या लिखा ?
उत्तर :
अपनी असमय मृत्यु के बारे में भंबल दा ने अशोक दा को पत्र में लिखा कि, “मैं भी तुम्हारी तरह होता तो दीर्घायु होता। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, आठ साल ज्यादा जो लोगे यही न? जिस जुनून में जिया, उसकी तासीर का एक क्षम भी तुम्हारे ताम-झाम के सालों से उम्दी है।’

प्रश्न 80.
कौन भंबल दा की मृत्यु के विरोध का प्रदर्शन कर रहा था ?
उत्तर :
लोको का काला धुआँ काले पताके की तरह भंबल दा की मृत्यु का विरोध कर रहा था।

प्रश्न 81.
आर्थिक अभाव के बावजूद भंबल दा ने विधवा बहन के लिए क्या किया?
उत्तर :
आर्थिक अभाव के बावजूद प्रत्येक महीने पचास रुपये विधवा बहन को भेज देते थे।

प्रश्न 82.
भंबल दा कैसी जिंदगी जीना चाहते थे?
उत्तर :
भंबल दा ईमानदारी तथा सम्मान की जिंदगी जीना चाहते थे।

प्रश्न 83.
भंबल दा क्या थे?
उत्तर :
भंबल दा लोको में एक सामान्य किरानी थे।

प्रश्न 84.
भंबल दा के बड़े भाई क्या थे?
उत्तर :
भंबल दा के बड़े भाई लोको में चीफ पर्सनल मैनेजर थे।

प्रश्न 85.
खेल प्रतियोगिताओं से भंबल दा क्यों बहिष्कृत होते चले गए?
उत्तर :
बढ़ती उम्र के कारण भंबल दा खेल प्रतियोगिताओं से बहिष्कृत (बाहर) होते चले गए क्योंकि खेल के भी अपने नियम-कानून होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक होता है।

प्रश्न 86.
अशोक दा द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार को अस्वीकार करते समय भंबल दा ने क्या कहा था?
उत्तर :
अशोक दा द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार को अस्वीकार करते समय भंबल दा ने कहा था – “गलत पुरस्कार मैं नहीं लेता दादा ! इसे मेरी ओर से तुम रख लो, खानदान का नाम रौशन करने के लिए।”

प्रश्न 87.
भंबल दा द्वारा पुरस्कार अस्वीकार करने पर अशोक दा ने क्या कहा?
उत्तर :
भंबल दा द्वारा पुरस्कार अस्वीकार करने पर अशोक दा ने गुस्से से भरकर कहा- ‘“ अपनी करनी का पुरस्कार ले जाओ -शर्म काहे की ? खानदान में एक जोकर तो निकला।”

प्रश्न 88.
भंबल दा की साइकिल कैसी थी?
उत्तर :
भंबल दा की साइकिल खटारा थी।

प्रश्न 89.
अगर आप बगल वाली मेरी ट्रैक पर होते तो प्रथम आते …. के जवाब में भंबल दा ने क्या कहा?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति के जवाब में भंबल दा ने कहा कि, “यदि मैं दो साल पहले पैदा हुआ होता तो चीफ पर्सनल मैनेजर होता और दो साल बाद पैदा हुआ होता तो विधवा।”

प्रश्न 90.
जब भंबल दा के लिए पुरस्कार की घोषणा हुई तो लोगों ने क्या सोचा?
उत्तर :
जब भंबल दा के लिए पुरस्कार की घोषणा हुई तो लोगों ने सोचा कि शायद उन्हें बाघा-दौड़ के दूसरे स्थान या तीसरे स्थान का विशेष पुरस्कार दिया जा रहा होगा।

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प्रश्न 91.
खानदान में एक जोकर तो निकला – ‘जोकर’ शब्द का प्रयोग यहाँ किसके लिए किया गया है?
उत्तर :
‘जोकर’ शब्द का प्रयोग यहाँ भंबल दा के लिए किया गया है।

प्रश्न 92.
अपने प्रमोशन के बारे में भंबल दा ने अशोक दा से क्या कहा ?
उत्तर :
अपने प्रमोशन के बारे में भंबल दा ने अशोक दा से यह कहा कि मुझे केवल अपनी योग्यता का रिटर्न चाहिए कोई अवाई नहीं।

प्रश्न 93.
पीठ पर तुम्हारा छोड़ा हुआ बोझ था – किसकी पीठ पर किसका छोड़ा हुआ बोझ था?
उत्तर :
भंबल दा की पीठ पर अशोक दा का छोड़ा हुआ बोझ था क्योंकि वे परिवार को किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं देते थे।

प्रश्न 94.
ग्लैडियेटर्स किसे कहा जाता था?
उत्तर :
रोमन साम्राज्य में उन गुलामों को ग्लैडियेटर्स कहा जाता था जिन्हें अपनी मुक्ति के लिए हिंसक जानवरों से युद्ध करना होता था। जीत जाने पर उन्हें कैद से मुक्ति तथा हार जाने पर जीवन से मुक्ति मिल जाती थी। रोमन राजा तथा जनता के लिए यह मनोरंजन का एक प्रमुख साधन था।

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प्रश्न 95.
अशोक दा स्वस्थ रहने के लिए क्या करते थे?
उत्तर :
अशोक दा स्वस्थ रहने के लिए बुलबर्कर का अभ्यास करते, आसन तथा योगा करते थे।

प्रश्न 96.
भंबल दा किसलिए दौड़ते थे ?
उत्तर :
अपनी प्रकृति से धावक होने के कारण भंबल दा दौड़ते थे ।

प्रश्न 97.
लोग भंबल दा को किस बात पर आश्वस्त थे ?
उत्तर :
लोग भंबल दा की इस बात्तर आश्वस्त थे किस वे दौड़ में अवश्य भाग लेंगे ।

प्रश्न 98.
भंबल दा की पढ़ाई क्यों बाधित हो गयी थी ?
उत्तर :
मैट्रीक्युलेशन में बार बार फेल होने तथा घर-खर्च का बोझ सिर पर आ पड़ने के कारण।

प्रश्न 99.
भंबल दा किसमें भाग लेते थे ?
उत्तर :
दौड़ में ।

प्रश्न 100.
भंबल दा के अनुसार ‘सम्मान’ क्या होता है ?
उत्तर :
परस्सर सौहार्द और समता (बराबरी) का भाव ही सम्मान होता है।

प्रश्न 101.
भंबल दा की साइकिल के बारे में क्या प्रसिद्ध था ?
उत्तर :
उसकी घंटी छोड़कर सबकुछ बजता है ।

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प्रश्न 102.
भंबल दा किसके अपवाद थे ?
उत्तर :
भंबल दा अपने भाई अशोक दा के अपवाद थे ।

प्रश्न 103.
भंबल दा किन बातों पर हैसा करते थे?
उत्तर :
भंबल दा, अशोक दा के स्वस्थ रहने के लिए आसन तथा योगाभ्यास करने की बात पर हँसा करते थे

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: ‘धावक’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 2 : ‘धावक’ कहानी में निहित संदेश को लिखें।
अथवा
प्रश्न 3 : ‘धाबक’ कहानी के माध्यम से लेखक ने हमें क्या संदेश देना चाहा है?
अथवा
प्रश्न 4: ‘धावक’ कहानी का मूल भाव लिखते हुए उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालें।
अथवा
प्रश्न 5 : ‘धावक’ कहानी का मूल भाव लिखते हुए इसके शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालें।
अथवा
प्रश्न 6 : ‘थावक’ कहानी की समीक्षा करें।
अथवा
प्रश्न 7: ‘धावक कहानी की कथावस्तु को संक्षेप में लिखें।
उत्तर :
‘धावक’ कहानी के रचनाकार संजीव हैं। इनकी कहानियाँ अनुभवों तथा अपने आस-पास के जीते-जागते पात्रों की कहानियाँ हैं न कि किसी कल्पनालोक की उपज। कथाकार संजीव ने ‘धावक’ कहानी में एक ऐसे ही व्यक्ति भंबल दा की स्मृतियों को पिरोया है।

भंबल दा ‘धावक’ कहानी के नायक हैं। वे सच्चे अर्थों में खिलाड़ी है। कंपनी की ओर से आयोजित कोई भी क्रीड़ा प्रतियोगिता भंबल दा के बिना अधूरी है। भले ही भंबल दा किसी प्रतियोगिता में स्थान न बना पाते हों लेकिन वे खेल के नियमों का पूरा-पूरा पालन करते हैं। पुरस्कार पाने के लिए अन्य खिलाड़ियों की तरह उन्होंने कभी बेइमानी का सहारा नहीं लिया। अपनी इमानदारी, समाज-सेवा तथा पारिवारिक बोझ के कारण ही वे जिदगी की दौड़ में भी पिछड गये। लेकिन उन्हें इसका ज़रा-सा भी मलाल नहीं है।

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भंबल दा के विपरीत उनके बड़े भाई ने अपने साहब की लड़की से विवाह कर तथा पारिवारिक दायित्वों की उपेक्षा कर जीवन में काफी आगे निकल गए। भंबल दा केवल किरानी बनकर ही रह गए लेकिन अशोक दा चीफ पर्सनल मैनेजर तक पहुँच गए।

कम आय होने के कारण भंबल दा कभी विवाह के लिए राजी नहीं हुए। इस स्थिति में भी उन्होंने बहन को प्रतिमाह रूपये भेजने में कभी कोताही नहीं की।

धीरे – धीरे यह बोझ असहनीय हो गया तथा एक दिन भंबल दा इस दुनिया से उसी तरह चल बसे जिस प्रकार भारत में खिलाड़ी उम्र निकल जाने के बाद गुमनामी के अंधेरे में खो जाते है।

इस प्रकार कथाकार संजीव ने धावक भंबल दा के माध्यम से उन खिलाड़ियों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहा है जो सुविधा के अभाव में असमय ही जीवन के दौड़ से निकल जाते हैं। ऐसे खिलाड़ियों के प्रति समाज तथा देश की कुछ जिम्मेवारी होनी चाहिए यही संदेश इस कहानी में छिपा है।

जहाँ तक कहानी के शीर्षक की बात है – यह शीर्षक ही भंबल दा के सम्पूर्ण जीवन की कहानी कह देता है। एक ऐसे धावक की कहानी जो बेइमानी, दुनिया की चालाकी और अपने ही बोझ से जीवन में पीछे ही रह गया। सम्पूर्ण कहानी की पृष्ठभूमि में धावक ही छाया हुआ है। इसलिए हम ऐसा कह सकते हैं कि कहानी का शीर्षक अपने-आप में सर्वथा उपयुक्त है।

प्रश्न 8 : ‘धावक’ कहानी के आधार पर भम्बल दा का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 9 : ‘धावक’ कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 10 : ‘धावक’ कहानी के जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है, उसका चरित्न-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 11 : ‘चावक’ पाठ के प्रमुख पात्र की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन करें।
अथवा
प्रश्न 12 : पठित कहानी के आधार पर भंबल दा का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 13 : “भंबल ऐसे पुरस्कारों के लिए नहीं दौड़ता” – के आधार पर भंबल दा का चरित्रचित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 14 : ‘गलत पुरस्कार मै नहीं लेता दादा” – के आधार पर भंबल दा का चरित्र-चित्रण करें। अथवा
प्रश्न 15 : मगर मुझे खुशी और संतोष है कि मैंने लंगी नहीं मारी, गलत ट्रैक नहीं पकड़ा – के आधार पर भंबल दा का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 16 : जिस जुनून में जिया, उसकी तासीर का एक क्षण भी तुम्हारे तमाम ताम-झाम के सालों से उम्दा है। – के आधार पर भबल दा का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर :
भम्बल दा ‘धावक’ कहानी के मुख्य पात्र हैं। पूरी कहानी में उनके चरित्र का ताना-बाना लेखक संजीव ने कुछ इस तरह से बुना है कि पाठक चाहकर भी उनके व्यक्तित्व से अपने आपको अलग नहीं कर पाता।

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भम्बल दा का चरित्र-चित्रण निम्नांकित शीर्षको के अंतर्गत किया जा सकता है –

(क) आदतन खिलाड़ी – भम्बल दा की पहचान धावक के रूप में है। कोई भी दौड़ प्रतियोगिता हो, वह उनके बिना अधूरी लगती है। भले ही वे कभी अव्यल नहीं आ पाते लेकिन प्रतियोगिता में भाग लेना मानो उनकी आदत में शामिल थी। दौड़ में सबसे पीछे रह जाने पर भी वे अपनी दौड़ पूरा करके ही दम लेते। इतना ही नहीं, बाषा दौड़ और साइकिल रेस में भी वे अवश्य भाग लेते थे।

(ख) भावुक एवं माँ से अत्यंत प्रेम करने वाले – भम्बल दा भावुक होने के साथ-साथ माँ से अत्यंत प्रेम करने वाले हैं। एक बार बाधा दौड़ में बेईमानी होने पर किसी ने विश्वास दिलाने के लिए भम्बल दा को माँ की कसम खाने को कहा। जवाब में उन्होने जो कहा, वह उनके मातृप्रेम को दर्शाता है – “तुम्हारी माँ नहीं है शायद वरना तुम इस तुच्छ पुरस्कार के लिए माँ को दाँव पर नहीं लगाते मेरे भाई।”

(ग) समाज-सेवक – आर्थिक स्थिति से विपन्न होने के बावजूद भम्बल दा सबके दुःख-सुख में शरीक होते थे। अगर किसी को अस्पताल पहुँचाना है तो उनके कंधे एंबुलेंस की तरह हाजिर, श्रशान जाना हो तो उनके कंधे अर्थी के लिए हाजिर, कब्बिस्तान जाना हो या फिर किसी के लिए सामान का जुगाड़ करना हो- भम्बल दा हर जगह मौजूद रहते थे।

(घ) पारिवारिक जिम्मेवारियों को उठाने वाले – यद्धपि भम्बल दा की स्वयं की आर्थिक स्थिति काफी नाजुक है फिर भी वे शक्ति भर पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने की कोशिश करते हैं। भाई अशोक से किसी प्रकार की सहायता न पाने पर भी वे बहन की शादी करते हैं। जब वह विधवा हो जाती है और उसे बड़े भाई के यहाँ भी शरण नहीं मिलती, तब वे उसे प्रतिमाह पचास रुपये मदद के तौर पर भेजते हैं।

(ङ) स्वाभिमानी : भम्बल दा किसी भी स्थिति में अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते। यदि वे चाहते तो अपनी भावी पत्नी से आर्थिक सहायता ले सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इतना हीं नहीं, मरने के पहले उन्होने अपने स्वार्थी भाई के लिए एक संदेश भी छोड़ दिया, ” जिस जुनून में जिया, उसकी तासीर का एक क्षण भी तुम्हारे तमाम तामझाम के सालों से उम्दा है। हो सके तो चखकर कभी देखना।” इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि भम्बल दा का चरित्र एक स्वाभिमानी आदमी का चरित्र है जो टूटकर बिखर जाता है लेकिन पंगु व्यवस्था के सामने घुटने नहीं टेकता।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भंबल दा के भाई का क्या नाम था?
(क) अशोक
(ख) सुरेश
(ग) दिनेश
उत्तर :
(क) अशोक

प्रश्न 2.
माँ किसके साथ रहती थी ?
(क) अशोक दा के साथ
(ख) भंबल दा के साथ
(घ) राकेश
(ग) अपनी बेटी के साथ
उत्तर :
(ख) भंबल दा के साथ

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प्रश्न 3.
‘भम्बल दा को मैने काफी करीब से देखा है।’ – यह कौन-सा वाक्य है ?
(क) सरल वाक्य
(ख) मिश्र वाक्य
(ग) संयुक्त वाक्य
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) सरल वावय

प्रश्न 4.
‘धावक’ कहानी के रचनाकार कौन हैं ?
(क) कृष्णा सेबती
(ख) संजीव
(ग) शिवमूर्ति
(घ) चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
उत्तर :
(ख) संजीव।

प्रश्न 5.
‘तीस साल का सफरनामा’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है?
(क) गुलेरी की
(ख) प्रेमचंद की
(ग) संजीव की
(घ) शिवमूर्ति की
उत्तर :
(ग) संजीव की।

प्रश्न 6.
‘प्रेतमुक्ति’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) संजीव
(ख) कृष्णा सोबती
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) शिवमूर्ति
उत्तर :
(क) संजीव।

प्रश्न 7.
‘प्रेरणास्रोत और अन्य कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) संजीव
(ग) गुलेरी
(घ) जयशंकर प्रसाद
उत्तर :
(ख) संजीव।

प्रश्न 8.
‘ब्लैकहोल’ (कहानी-संग्रह) के लेखक कौन हैं ?
(क) कृष्णा सोबती
(ख) गुलेरी
(ग) शिवमूर्ति
(घ) संजीव
उत्तर :
(घ) संजीव।

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प्रश्न 9.
‘खोज’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है?
(क) शैल रस्तोगी की
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) संजीव की
(घ) पंत की
उत्तर :
(ग) संजीव की।

प्रश्न 10.
‘दस कहानियाँ’ के रचनाकार कौन हैं ?
(क) संजीव
(ख) निराला
(ग) डॉ० रामकुमार वर्मा
(घ) कृष्णा सोबती
उत्तर :
(क) संजीव।

प्रश्न 11.
‘गति का पहला सिद्धांत’ किसकी कृति है ?
(क) निराला की
(ख) प्रसाद् की
(ग) पंत की
(घ) संजीव की
उत्तर :
(घ) संजीव की।

प्रश्न 12.
‘गुफा का आदमी’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) शिवमूर्ति
(ख) संजीव
(ग) अनामिका
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर :
(ख) संजीव।

प्रश्न 13.
‘आरोहण’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) अनामिका
(ख) संजीव
(ग) कृष्णा सोबती
(घ) शैल रस्तोगी
उत्तर :
(ख) संजीव।

प्रश्न 14.
‘किशनगढ़ के अहेरी’ (उपन्यास) के रचनाकार कौन हैं ?
(क) प्रेमचंद
(ख) महादेवी वर्मा
(ग) संजीव
(घ) निराला
उत्तर :
(ग) संजीव।

प्रश्न 15.
‘सावधान! नीचे आग है’ के उपन्यासकार कौन हैं?
(क) प्रेमचंद
(ख) संजीव
(ग) जयशंकर प्रसाद
(घ) निराला
उत्तर :
(ख) संजीव।

प्रश्न 16.
‘धार’ (उपन्यास) के लेखक कौन हैं ?
(क) जयशंकर प्रसाद
(ख) (निराला)
(ग) अनामिका
(घ) संजीव
उत्तर :
(घ) संजीव।

प्रश्न 17.
‘रानी की सराय’ (किशोर उपन्यास) किसकी रचना है ?
(क) बंग महिला की
(ख) महादेवी वर्मा की
(ग) संजीव की
(घ) निराला की
उत्तर :
(ग) संजीव की।

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प्रश्न 18.
‘डायन और अन्य कहानियाँ’ (बाल-साहित्य) के रचनाकार कौन हैं?
(क) संजीव
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) निराला
(घ) प्रेमचंद
उत्तर :
(क) संजीव।

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से कौन-सा सम्मान कथाकार संजीव को प्राप्त नहीं हुआ है?
(क) प्रथम कथाक्रम सम्मान
(ख) अन्तर्रोश्टीय इन्दु शर्मा सम्मान
(ग) सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार
(घ) भिखारी ठाकुर सम्मान
उत्तर :
(ग) सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित में से कौन-सा सम्मान कथाकार संजीव को प्राप्त नहीं हुआ है ?
(क) भिखारी ठाकुर सम्मान
(ख) अकादमी अवार्ड
(ग) पहला सम्मान
(घ) श्री लाल शुक्ल स्मृति सम्मान
उत्तर :
(ख) अकादमी अवार्ई।

प्रश्न 21.
कथाकार संजीव का जन्म किस प्रदेश में हुआ था?
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) मध्य पदेशे
(ग) हिमाचल प्रदेश
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(क) उत्तर प्रदेश।

प्रश्न 22.
भंबल दा की कमी कहाँ खलती थी?
(क) घर में
(ख) स्पोट्स्स के मैदान में
(ग) आंफिस में
(घ) कवि सम्मेलन में
उत्तर :
(ख) स्पोर्स्स के मैदान में।

प्रश्न 23.
भंबल दा को लोग अन्य किस नाम से पुकारते थे?
(क) गोबर गणेश भैया
(ख) खिलाड़ी भैया
(ग) बम भोले भैया
(घ) धावक भैया
उत्तर :
(ग) बम भोले भैया।

प्रश्न 24.
“अजीब खब्ती आदमी है” – खब्ती किसे कहा गया है ?
(क) अशोक दा को
(ख) भंबल दा को
(ग) लेखक को
(घ) प्रबीण को
उत्तर :
(ख) भंबल दा को।

प्रश्न 25.
भंबल दा कोथाय – का अर्थ है ?
(क) भंबल दा मर गए
(ख) भंबल दा हार गए
(ग) भंबल दा कहाँ हैं
(घ) भंबल दा चले गए ?
उत्तर :
(ग) भंबल दा कहाँ हैं ?

प्रश्न 26.
‘नगणय प्राणी’ किसे कहा गया है ?
(क) भंबल दा को
(ख) प्रवीण को
(ग) लेखक को
(घ) अशोक दा का
उत्तर:
(क) भंबल दा को।

प्रश्न 27.
लेखक भंबल दा को कितने वर्षों से जानते हैं ?
(क) बीस
(ख) पच्चीस
(ग) तीस
(घ) पैंतीस
उत्तर :
(ख) पच्चीस।

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प्रश्न 28.
भंबल दा ने निम्नलिखित में से किस खेल में भाग नहीं लिया?
(क) कार-रेस
(ख) लौंग जम्प
(ग) हाई जम्य
(घ) हर्डल्स रेस
उत्तर :
(क) कार रेस।

प्रश्न 29.
भंबल दा ने निम्लिखित में से किस खेल में भाग नहीं लिया ?
(क) डिस्क शो
(ख) साइकिल रेस
(ग) म्यूजिकल चेयर
(घ) मील भर की दौड़
उत्तर :
(ग) म्यूजिकल चेयर।

प्रश्न 30.
मायूसी का भंबल दा पर क्या असर होता था?
(क) गुस्सा हो जाते थे
(ख) रूँआसे हो जाते थे
(ग) चेहरा लाल हो जाता
(घ) चेहरा सूज आता
उत्तर :
(घ) चेहरा सूज आता।

प्रश्न 31.
टका-सा भोथरा जवाब – क्या था?
(क) भाग जाओ
(ख) बाद में आना
(ग) नहीं बोलो
(घ) ठीक है, मत पार्टिसिपेट करो
उत्तर :
(घ) ठीक है, मत पार्टिसिपेट करो।

प्रश्न 32.
भंबल दा क्या नहीं कर सकते?
(क) बेईमानी
(ख) चोरी
(ग) साइकिल चलाना
(घ) सच बोलना
उत्तर :
(क) बेईमानी।

प्रश्न 33.
साइकिल-रेस में भंबल दा की चाल कैसी रहती?
(क) तेज
(ख) बहुत तेज
(ग) भोली
(घ) कम तेज
उत्तर :
(ख) भोली।

प्रश्न 34.
लोगों के अनुसार स्पोट्समैन और बीमा कं० के एजेण्ट की आयु कितनी होती है?
(क) पाँच साल
(ख) सात साल
(ग) दस साल
(घ) पंद्रह साल
उत्तर :
(क) पाँच साल।

प्रश्न 35.
‘आप यहाँ हैं’ (कहानी-संग्रह) के रचनाकार कौन हैं?
(क) संजीव
(ख) जयशंकर प्रसाद
(ग) कृष्णा सोबती
(घ) बंग महिला
उत्तर :
(क) संजीव।

प्रश्न 36.
लेखक ने किसे काफी करीब से देखा है?
(क) अशोक दा को
(ख) भंबल दा की माँ को
(ग) भबल दा को
(घ) जोगन मुण्डा को
उत्तर :
(ग) भंबल दा को।

प्रश्न 37.
अशोक दा भंबल दा से कितने वर्ष बड़े थे?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर :
(ख) दो

प्रश्न 38.
भंबल दा मैट्रीक्युलेशन में कितनी बार फेल हुए?
(क) एक बार
(ख) दो बार
(ग) तीन बार
(घ) चार बार
उत्तर :
(घ) चार बार।

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प्रश्न 39.
भंबल दा को कैसी जिंदगी चाहिए थी?
(क) शान की
(ख) गरीबी की
(ग) सम्मान की
(घ) अमीरी की
उत्तर :
(ग) सम्मान की।

प्रश्न 40.
किसने लेखक को बुलाकर कसकर डाँटा था?
(क) यशराज ने
(ख) अशोक दा ने
(ग) माँ ने
(घ) विधवा बहन ने
उत्तर :
(ख) अशोक दा ने।

प्रश्न 41.
भंबल दा की जवान बहन किस पर आश्रित थी?
(क) माँ, पर
(ख) अशोक दा पर
(ग) भंबल दा पर
(घ) किसी पर नहीं
उत्तर :
(ग) भंबल दा पर।

प्रश्न 42.
किसकी शादी से माँ पूरी तरह टूट गई थीं?
(क) अशोक दा की
(ख) बेटी की
(ग) भंबल दा की
(घ) लेखक की
उत्तर :
(क) अशोक दा की।

प्रश्न 43.
“माँ के लिए बेटा-बेटा ही होता है”‘ – गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नन्हा संगीतकार
(ख) धावक
(ग) चपल
(घ) नमक
उत्तर :
(ख) धावक।

प्रश्न 44.
“अपने दिल के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर फिर उन्हीं तनहाइयों में डूब जाती” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) चप्पल
(ख) नन्हा संगीतकार
(ग) धावक
(घ) नमक
उत्तर :
(ग) धावक।

प्रश्न 45.
“बात पानी में फेंके गए मुर्दे की तरह ही उतरा आयी” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) धावक
(ख) चपल
(ग) नन्हा संगीतकार
(घ) नमक
उत्तर :
(क) धावक।

प्रश्न 46.
“तुम्हें दूसरे के काम में दखल नही देना चाहिए” – वक्ता कौन है ?
(क) अशोक दा
(ख) भवस दा
(ग) माँ
(घ) सफिया
उत्तर :
(ख) भंबल दा।

प्रश्न 47.
“क्यों क्या किया है मैने’ = वक्ता कौन है ?
(क) सकिया
(ख) भंबल दा
(ग) अशोक दा
(घ) जेनको
उच्चर :
(ग) अशोक दा।

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प्रश्न 48.
“मास्टरनी के सामने पड़ने से तो अब्ष घेरी रुह ही काँपती है” – वक्ता कौन है ?
(क) गाँ
(ख) भंबल दा
(ग) अशोक दा
(घ) लेखक
उत्षर :
(घ) लेखक।

प्रश्न 49.
‘डन्हें औरतों से विरक्ति हो गई” – ‘उन्हें से कौन संकेतित है?
(क) मास्टर साहब
(ख) कस्टम आंकिसर
(ग) भंबल दा
(घ) रंगख्या
उत्तर :
(ग) भंबल दा।

प्रश्न 50.
भंबल दा का वेत्रन कितना था?
(क) दो सौ रुपये
(ख) ढाई सौ रुपये
(ग) तौन सौ रुपये
(घ) सढेतीन सौ रुपये
उत्तर :
(घ) साढे तीन सौ रुषये।

प्रश्न 51.
‘हमारा कलेजा घक-सा रह जाता है”‘- प्रस्तुत पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) चामल
(ख) नमक
(ग) नन्हा संगीतकार
(घ) धावक
उत्तर :
(घ) घावक।

प्रश्न 52.
“आज सुबह ही वे गुजर गए” – पंक्ति किस पाठ से उद्दृत है ?
(क) जावक
(ब) चमल
(ग) इनमें से कोई नहीं
(घ) नमक
उच्चर :
(क) धावक।

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प्रश्न 53.
“कल रात ही उन्हें दूसरा दौरा पड़ा था” – उन्हें से कौन संकेतित है?
(क) रंगख्या
(ख) सिल्ध बीवी
(ग) भंबल दा
(घ) अशोक दा
उत्तर :
(ग) अंबल दा।

प्रश्न 54.
‘आज सुबह ही वे गुज्रा गए'” – ‘वे’ कौन हैं?
(क) रंगख्या
(ख) सक्रिया
(ग) अशोक दा
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(घ) भंबल दा।

प्रश्न 55.
“लड़का लौट आता है”‘ = पंक्ति किस पाठ से ली गई है ?
(क) धावक
(ख) नमक
(ग) वणस
(घ) नन्हा सोगीतकार
उत्तर :
(क) हावक।

प्रश्न 56.
‘”मगर मुझे खुशी और संतोष है” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) धावक
(ख) नमक
(ग) चण्पल
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(क) धावक ।

प्रश्न 57.
‘एक छोटी-सी आयताकार जर्द-सी उठान’ – पंक्ति किस पाठ से उद्धत है?
(क) चप्पल
(ख) धावक
(ग) उसने कहा था
(घ) नमक
उत्तर :
(ख) धावक।

प्रश्न 58.
“माँ की मौत के समय विदेश में थे'” – यहाँ किसके बारे में कहा गया है?
(क) रंगय्या
(ख) सफिया
(ग) अशोक दा
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(ग) अशोक दा।

प्रश्न 59.
‘”मैं तुम्हारी तरह होता” – ‘मै’ कौन है?
(क) रमण
(ख) सफिया का भाई
(ग) अशोक दा
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(घ) भंबल दा

प्रश्न 60.
“आठ साल ज्यादा जी लोगे यही न?” – वक्ता कौन हैं?
(क) अशोक दा
(ख) लेखक
(ग) भंबल दा
(घ) रंगय्या
उत्तर :
(ग) भंबल दा।

प्रश्न 61.
“हो सके तो चखकर कभी देखना” – वक्ता कौन है ?
(क) सफिया
(ख) मास्टर साहब
(ग) लेखक
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(घ) भंबल दा।

प्रश्न 62.
“रूहें पनाह माँगती फिरेंगी” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) नमक
(ख) उसने कहा था
(ग) चपल
(घ) धावक
उत्तर :
(घ) धावक।

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प्रश्न 63.
“फिर गये कहाँ” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) नमक
(ख) चण्पल
(ग) धावक
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(ग) धावक।

प्रश्न 64.
“पता नहीं कितना कुछ हो सकता था”‘ – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) धावक
(ख) उसने कहा था
(ग) नमक
(घ) चप्यल
उत्तर :
(क) धावक।

प्रश्न 65.
“इतना सोचने का भी वक्त नहीं था मेरे लिए?” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) नमक
(ख) धावक
(ग) चप्पल
(घ) नन्ही संगीतकार
उत्तर :
(ध) धावक।

प्रश्न 66.
“मुझे जो भुगतना पड़ा उसे बताना मुनासिब नहीं?” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) धावक
(ख) नमक
(ग) चपल
(घ) नौबतखाने में इबादत
उत्तर :
(क) धावक।

प्रश्न 67.
“अभी भी माँ को बचाया जा सकता है”‘ – पंक्ति किस पाठ से उद्दुत है ?
(क) नमक
(ख) चपल
(ग) धावक
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(ग) धावक।

प्रश्न 68.
“इस बात को वे भूल न पाते’ – ‘वे’ से कौन संकेतित है?
(क) भंबल दा
(ख) लेखक
(ग) अशोक दा
(घ) बिस्मिल्ला खाँ
उत्तर :
(ग) अशोक दा।

प्रश्न 69.
‘इस बात को वे भूल न पाते” – पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?
(क) यतीद्र मिश्र
(ख) संजीव
(ग) प्रसाद
(घ) प्रेमघंद
उत्तर :
(घ) संजीव।

प्रश्न 70.
‘इसका अंजाम अच्छा होगा या बुरा” – पंक्ति किस पाठ से उद्धतत है?
(क) उसने कहा था
(ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) धावक
(घ) चपल
उत्तर :
(ग) धावक।

प्रश्न 71.
“गलत पुरस्कार मैं नहीं लेता दादा” – वक्ता कौन है?
(क) लेखक
(ख) रंगय्या
(ग) भंबल दा
(घ) अशोक दा
उत्तर :
(ग) भंबल दा।

प्रश्न 72.
‘गलत पुरस्कार मैं नहीं लेता'” – पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?
(क) संजीव
(ख) यतींद्र मिश्र
(ग) गुलेरी
(घ) रजिया सज्जाद जहीर
उत्तर :
(क) संजीव।

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प्रश्न 73.
‘तुप्हारी पुरस्कार-लिप्सा तुप्हीं को मुबारक” – ‘तुम्हीं’ से कौन संकेतित है?
(क) लेखक
(ख) भंबल दा
(ग) अशोक दा
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) अशोक दा।

प्रश्न 74.
“इसे मेरी ओर से तुम रख लो” – वक्ता कौन है?
(क) लहना सिंह
(ख) जेन
(ग) सफिया
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(घ) भंबल दा।

प्रश्न 75.
‘इसे मेरी ओर से तुम रख लो” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) चण्पल
(ख) नमक
(ग) धावक
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(ग) धावक।

प्रश्न 76.
‘कोई बोलता नहीं कुछ’ – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) धावक
(ख) नमक
(ग) चप्पल
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(ग) धावक।

प्रश्न 77.
“मगर हम जैसों का क्या कसूर” -वक्ता कौन है?
(क) सफिया
(ख) लहना सिंह
(ग) रंग्या
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(घ) भंबल दा।

प्रश्न 78.
“वह चुपचाप देखता आया है” = ‘वह’ कौन है?
(क) लेखक
(ख) रंगख्या
(ग) कामुक क्रूर वर्ग
(घ) कस्टम ऑफिसर
उत्तर :
(ग) कामुक क्रूर वर्ग।

प्रश्न 79.
”कुछ दिनों से एक नया रुचि-संस्कार जन्मा है'” – नया रुचि संस्कार क्या है?
(क) साँड़-युद्ध
(ख) ग्लैडियेटर्स-युद्ध
(ग) मुर्गे की लड़ाई
(घ) म्यूजिकल चेयर
उत्तर :
(घ) म्यूजिकल चेयर।

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प्रश्न 80.
“हम बच-बचकर निकल रहे थे” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
(क) नमक
(ख) उसने कहा था
(ग) चफल
(घ) धावक
उत्तर :
(घ) धावक।

प्रश्न 81.
“तुम्हें तो शुक्रुजार होना चाहिए” – वक्ता कौन है?
(क) सफिया
(ख) सिख बीबी
(ग) भंबल दा
(घ) लेखक
उत्तर :
(ग) भंबल दा।

प्रश्न 82.
“तुम्हें तो शुक्रगुजार होना चाहिए” – पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है ?
(क) धावक
(ख) चप्पल
(ग) नमक
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(क) घावक।

प्रश्न 83.
“जिसमें कुछ वर्षो पहले भाभी प्रथम आई थी” = भाभी कौन है ?
(क) सफिया की भाभी
(ख) सिख बीबी
(ग) अशोक दा की पत्नी
(घ) भंबल दा की माँ
उत्तर :
(ग) अशोक दा की पत्नी।

प्रश्न 84.
“शर्म काहे की” – वक्ता कौन है?
(क) सरदारनी
(ख) सफिया
(ग) सिख बीबी
(घ) अशोक दा
उत्तर :
(घ) अशोक दा।

प्रश्न 85.
“चाहे कुछ भी हो, कहीं भी पहुँच जाए” – वक्ता कौन है?
(क) लहना सिंह
(ख) कस्टम ऑफिसर
(ग) भंबल दा की माँ
(घ) लेखक
उत्तर :
(ग) भंबल दा की माँ।

प्रश्न 86.
‘बस एक ही चिंता थी” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) धूमकेतु
(ख) उसने कहा था
(ग) नमक
(घ) धावक
उत्तर :
(घ) धावक।

प्रश्न 87.
”खून हरहरा आया था'” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) उसने कहा था
(ख) नमक
(ग) चणल
(घ) धावक
उत्तर :
(घ) धावक।

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प्रश्न 88.
‘मगर वह होती कैसे'” – पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) धावक
(ख) नमक
(ग) चणल
(घ) धूमकेतु
उत्तर :
(ग) भंबल दा।

प्रश्न 89.
संजीव का जन्म हुआ था –
(क) 6 जुलाई 1947
(ख) 6 अगस्त 1950
(ग) 10 जुलाई 1958
(घ) 15 अगस्त 1957
उत्तर :
(क) 6 जुलाई 1947

प्रश्न 90.
संजीव विद्यार्थी थे –
(क) इतिहास के
(ख) साहित्य के
(ग) विज्ञान के
(घ) अंग्रेजी के
उत्तर :
(ग) विज्ञान के ।

प्रश्न 91.
संजीव ने किस रूप में कार्य किया –
(क) प्रोफेसर
(ख) डॉक्टर
(ग) वैज्ञानिक
(घ) रसायनज्ञ
उत्तर :
(घ) रसायनज्ञ।

प्रश्न 92.
संजीव किस प्रदेश में कार्यरत् थे ?
(क) उत्तर प्रदेश में
(ख) पश्चिम बंगाल में
(ग) उड़ीसा में
(घ) महाराष्ट्र में
उत्तर :
(ख) पश्चिम बंगाल में।

प्रश्न 93.
संजीव ने कितने उपन्यासों की रचना की ?
(क) चार
(ख) आठ
(ग) बारह
(घ) बीस
उत्तर :
(ख) आठ।

प्रश्न 94.
भंबल दा को लोग क्या कहते थे ?
(क) बड़े भइया
(ख) बमभोले भइया
(ग) मझले भइया
(घ) छोटे भइया
उत्तर :
(ख) बमभोले भइया।

प्रश्न 95.
“खब्ती आदमी” का अर्थ है –
(क) ईमानदारी
(ख) बेइमान
(ग) सनकी
(घ) चालाक
उत्तर :
(ग) सनकी।

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प्रश्न 96.
लेखक ने सोचना छोड़कर क्या किया?
(क) खेल शुरू किया
(ख) घोड़ा दबा दिया
(ग) चिल्लाना शुरू किया
(घ) समझाना शुरु किया
उत्तर :
(ख) घोड़ा दबा दिया।

प्रश्न 97.
भंबल दा खेलों से –
(क) सन्यास ले लिए
(ख) बहिष्कृत किये गये
(ग) शामिल किये गये
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) बहिष्कृत किये गये।

प्रश्न 98.
टका-सा भोथरा जवाब किसने दिया ?
(क) लेखक ने
(ख) खेल अधिकारी ने
(ग) भंबल दा ने
(घ) अशोक दा ने
उत्तर :
(ख) खेल अधिकारी ने।

प्रश्न 99.
बिना सारे चक्र पूरा किये कौन नहीं बैठता था ?
(क) अशोक दा
(ख) भंबल दा
(ग) लेखक
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) भंबल दा।

प्रश्न 100.
भीड़ क्या कहकर चीख पड़ी ?
(क) बाहर निकालो
(ख) मारो-मारो
(ग) उसे बुलाओ
(घ) आगे बढ़ो
उत्तर :
(ख) मारो-मारो।

प्रश्न 101.
स्पोर्ट्समैन की आयु होती है ?
(क) चार वर्ष की
(ख) पाँच वर्ष की
(ग) तीन वर्ष की
(घ) दस वर्ष की
उत्तर :
(ख) पाँच वर्ष की।

प्रश्न 102.
भंबल दा के प्रति दर्शकों का समर्थन था –
(क) मामूली
(ख) जबर्दस्त
(ग) हल्का
(घ) एकदम नहीं
उत्तर :
(ख) जबर्दस्त।

प्रश्न 103.
भंबल दा को जिन्दगी चाहिए –
(क) शान की
(ख) सम्मान की
(ग) अपमान की
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) सम्मान की।

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प्रश्न 104.
भंबल दा अशोक से कितने छोटे थे ?
(क) दो वर्ष
(ख) चार वर्ष
(ग) दस वर्ष
(घ) आठ वर्ष
उत्तर :
(क) दो वर्ष।

प्रश्न 105.
‘आदमी को शान से जीना चाहिए’ -किस का कथन है?
(क) अशोक दा का
(ख) भंबल दा का
(ग) लेखक का
(घ) लोगों का
उत्तर :
(क) अशोक दा का।

प्रश्न 106.
‘भूमिका और अन्य कहानियाँ’ किसकी कृति है ?
(क) गुलेरी की
(ख) प्रेमचंद की
(ग) यतीन्द्र मिश्र की
(घ) संजीव की
उत्तर :
(घ) संजीव की।

प्रश्न 107.
भंबल दा ड्यूटी के बाद पार्ट टाइम क्या करते थे ?
(क) समाज सेवा
(ख) मुनीमी
(ग) खेती
(घ) व्यवसाय
उत्तर :
(ख) मुनीमी।

प्रश्न 108.
‘कोल्हू के बैल की तरहे किसे कहा गया है ?
(क) अशोक दा को
(ख) भंबल दा को
(ग) शांति दा को
(घ) किसी को नहीं
उत्तर :
(ख) भंबल दा को।

प्रश्न 109.
माँ के लिए बेटा होता है ?
(क) पराया ही
(ख) बेटा ही
(ग) अपना ही
(घ) कुछ नहीं
उत्तर :
(ख) बेटा ही।

प्रश्न 110.
किसको एक ही चिंता थी ?
(क) लेखक को
(ख) भंबल दा को
(ग) अशोक दा को
(घ) माँ को
उत्तर :
(क) लेखक को।

प्रश्न 111.
लेखक को एक ही चिंता क्या थी?
(क) भंबल को जिताने की
(ख) अशोक दा से मेल की
(ग) माँ को बचाने की
(घ) कुछ भी नही
उत्तर :
(ग) माँ को बचाने की।

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प्रश्न 112.
भंबल दा को औरतों से क्या थी ?
(क) अनुरक्ति
(ख) विरक्ति
(ग) टकराव
(घ) इनमें से कुछ नहीं
उत्तर :
(ख) विरक्ति।

प्रश्न 113.
अशोक दा ने भंबल दा को क्या कहा ?
(क) पागल
(ख) जोकर
(ग) मूख
(घ) बेइमान
उत्तर :
(ख) जोकर।

प्रश्न 114.
“आप भंबल दा के भाई हैं” – किसका कथन है ?
(क) लेखक का
(ख) अधिकारी का
(ग) लड़के का
(घ) किसी का नहीं
उत्तर :
(ग) लड़के का।

प्रश्न  115.
भंबल दा का मकान था ?
(क) एक कमरे का
(ख) दो कमरे का
(ग) तीन कमरे का
(घ) चार कमरे का
उत्तर :
(ख) दो कमरे का।

प्रश्न 116.
भंबल दा का मकान था ?
(क) शहर के बीचों-बीच
(ख) स्टेशन के बगल में
(ग) धियेटर के सामने
(घ) नदी किनारे
उत्तर :
(ख) स्टेशन के बगल में।

प्रश्न 117.
“आदमी को शान से जीना चाहिए” – किसका कथन है ?
(क) अशोक दा
(ख) भंबल दा
(ग) लेखक
(घ) लोगों का
उत्तर :
(क) अशोक दा।

प्रश्न 118.
पिछली बार बाधा-दौड़ में कितने प्रतियोगी थे ?
(क) पाँच
(ख) चार
(ग) तीन
(घ) दो
उत्तर :
(ख) चार।

प्रश्न 119.
‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’ (कहानी-संग्रह) किसकी रचना है ?
(क) संजीव की
(ख) यतीन्द्र मिश्र की
(ग) महादेवी वर्मा की
(घ) प्रेमचंद की
उत्तर :
(क) संजीव की

प्रश्न 120.
बिना सारे चक्र (चक्कर) पूरा किए कौन नहीं बैठता था
(क) अशोक
(ख) लेखक
(ग) भंबल दा
(घ) रामदास
उत्तर :
(ग) भंबल दा।

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प्रश्न 121.
“हम दोनों टग ऑफ वार’ के दोनों ओर आजमाइश करते रहे हैं” – यह किसका कथन है ?
(क) कधाकार संजीव का
(ख) भंबल दा का
(ग) अशोक दा का
(घ) सफ़िया का
उत्तर :
भंबल दा का।

प्रश्न 122.
“गलत पुरस्कार मैं नहीं लेता” – यह किसका कथन है ?
(क) भंबल दा
(ख) संजीव
(ग) रमण
(घ) रंगस्या
उत्तर :
(क) भंबल दा।

प्रश्न 123.
भंबल दा की बहन उनसे कितनी छोटी या बड़ी थी ?
(क) 2 वर्ष छोटी
(ख) 4 वर्ष बड़ी
(ग) 1 वर्ष छोटी
(घ) चार वर्ष बड़ी
उत्तर :
(क) 2 वर्ष छोटी।

प्रश्न 124.
भंबल दा को किससे विरक्ति हो गई थी ?
(क) चाची से
(ख) भाभी से
(ग) नानी से
(घ) मामी से
उत्तर :
(ख) भाभी से।

प्रश्न 125.
‘धावक’ कहानी का मुख्य पात्र कौन है ?
(क) संजीव
(ख) अशोक
(ग) कुणाल
(घ) भंबल दा
उत्तर :
(घ) भंबल दा।

प्रश्न 126.
भंबल दा थे —
(क) धावक
(ख) गायक
(ग) कलाकार
(घ) साहित्यकार
उत्तर :
(क) धावक।

वस्तुनिष्ठ सह व्याख्यामूलक प्रश्नोत्तर

1. “आदमी को शान से जीना चाहिए या तो इस दुनियाँ से कूच कर जाना चाहिए”

प्रश्न :
प्रस्तुत कथन का वक्ता कौन है?
उत्तर :
प्रस्तुत कथन का वक्ता भंबल दा के भाई अशोक दा हैं।

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प्रश्न :
कथन की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
भंबल दा काफी संघर्ष करके केवल अप्रेष्टिससिप पा सके थे। बड़े ऑफिसार थे और भंबल दा उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं थे । यह बात अशोक दा को नागवार गुज़रती थी इसलिए वे अक्सर कहा करते थे कि आदमी को शान से जीना चाहिए या तो इस दुनिया से कूच कर जाना चाहिए।

2. ‘इसे मेरी ओर से तुम्हीं रख लो।’

प्रश्न :
प्रस्तुत अंश किस पाठ से उद्युत है ?
उत्तर :
प्रस्तुत अंश ‘धावक’ पाठ से उद्तृत है ।

प्रश्न :
वक्ता का नाम लिखते हुए प्रस्तुत अंश का स्रसंग आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पच्चीसवीं वर्ष गांठ पर भंबल दा को सर्वश्रेष्ठ धावक का नहीं बल्कि उनको सर्वश्रेष्ठ विदूषक का पुरस्कार दिया जा रहा था। इतना ही नहीं, पुरस्कार देते समय अशोक दा ने व्यंग्य किया – “अपनी करनी का पुरस्कार ले जाओ – शर्म काहे की ? खानदान में एक जोकर तो निकला।” इस अपमान को न सह पाने के कारण भंबल दा ने अशोक दा से कहा कि इसे मेरी ओर से तुम्हीं रख लो।

3. बमभोले भैया कहाँ हैं ?
अथवा
4. सचमुच भंबल दा या बमभोले भैया का कहीं अता-पता नहीं था।
अथवा
5. फिर गये कहाँ?
अथवा
6. अजीब खब्ती आदमी है।
अथवा
7. सूची में तो उनका नाम था।
अथवा

8. आज उन्हीं की कमी यूँ अखर रही थी मानो सारा मैदान सूना है।

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
भंबल दा का कहाँ अता-पता नहीं था?
उत्तर :
स्पोट्स मैदान में भंबल का कहीं अता-पता नहीं था।

प्रश्न :
‘अजीब खब्ती आदमी’ किसे कहा गया है?
उत्तर :
भंबल दा को अजीब खब्ती आदमी कहा गया है।

प्रश्न :
किस सूची में किसका नाम था?
उत्तर :
धावकों की सूची में भंबल दा का नाम था।

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प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पप्ट करें।
उत्तर :
भबल दा को उनके भोलेपन के कारण लोग बमभोले भैया भी कहा करते थे। एक बार लेखक स्पोट्स के मैदान में एक मील की दौड़ को शुरू करने वाले थे। सारे घाबक मैदान में आ चुके थे। स्टेडियम में लाउडसीकर से धावकों के नाम पुकारे जा रहे थे, दौड़ से संबंधित सारे निर्देश दुहराये जा रहे थे, लेकिन भंबल दा का कोई अता-पता नहीं था। उनके बगैर मैदान सूना लग रहा था क्योंकि वे लोगों के हीरो थे।

लेखक भी परेशान था क्योंकि धावकों की सूची में उनका नाम तो था लेकिन अभी तक वे मैदान में नजर नहीं आ रहे थे। लेखक घुंझलाहट में उन्हें खब्ती आदमी तक कह डालते हैं। कारण यह है कि उनका कोई ठिकाना नहीं। हो सकता है कि निकले हों स्पोर्स के मैदान के लिए और कहीं समाज-सेवा के काम में लग गए हों। भंबल दा के इस रवैये पर कबीर की यह उक्ति बिल्कुल सटीक बैठती है – “आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।”

9. धीरे-धीरे अधिकांश खेलों से बहिष्कृत होते गए भंबल दा।
अथवा
10. जब भी ऐसा होता मायूसी में उनका चेहरा और भी सूज आता।
अथवा
11. खेल का एक न्यूनतम मानक होता है।
अथवा
12. क्या सभी खिलाड़ियों-धावकों को समान सुविधा देने का कोई कानून नहीं है।
अथवा
13. साहबों के एक बर्बर मनोरंजन से अधिक इस स्पोट्स का कोई महत्व है?

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार संजीव हैं।

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प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
हरेक खेल के अपने कुछ नियम होते हैं जो उम्म, वजन आदि से जुड़े होते हैं। इन नियमों के अनुसार ही खिलाड़ियों का चयन किया जाता है। उम्र बढ़ते जाने के कारण भंबल दा धीरे-धीरे कई खेलों से बाहर होते जा रहे थे। लेकिन उनका भोला खिलाड़ी मन इन नियमों को मानने से इन्कार कर देता था। उनका यह कहना था कि खिलाड़ीखिलाड़ी में कोई किसी आधार पर कोई भेद-भाव नहीं किया जाना चाहिए। अगर ऐसा किया जाता है तो यह केवल साहबों के एक बर्बर मनोरंजन से अधिक कुछ नहीं है।

14. लोग उन्हें ललकार रहे होते।
अथवा
15. चलिए, चलिए जान।
अथवा
16. बढ़े चलिए, बढ़े चलिए।
अथवा
17. कभी-कभी तो हमें भी उनकी वास्तविक स्थिति का भ्रम हो जाता।
अथवा
18. दूसरे भले ही बेईमानी कर बैठें, भंबल दा नहीं कर सकते।
अथवा
19. बिना सारे चक्र पूरे किए वे बैठते कैसे?
अथवा
20. यह स्पोट्समैन के रुतबे के खिलाफ हो जाता न!

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा इसके रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
‘स्पोद्सम्समेन’ किसे कहा गया है?
उत्तर :
भंबल दा को स्योट्समैन कहा गया है।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
हालाँकि भंबल दा अपनी सुस्त चाल से सभी खेलों में अंतिम स्थान पर ही आते थे फिर भी वे लोगों के आकर्षण के केंद्र थे। उनकी कहुआ चाल के बावजूद दर्शंक चिल्ला-चिल्ला उनका हौसला बढ़ाते रहते थे। जब दौड़ समाप्त हो चुकी होती, प्रथम, द्वितीय एवं तीसरे स्थान पर आने वाले के नामों की घोषणा हो रही होती – फिर भी भंबल द अपना चक्र पूरा करने मे लगे रहते थे। दौड़ को पूरा किए ही बीच में छोड़ देना उनके स्पोर्टमैन के रुतबे के खिलाफ था। फिर भी भंबल दा में एक बड़ी खूबी थी कि उन्होंने बेईमानी कर कभी कोई स्थान पाने की कोशिश नहीं की।

21. घंटी छोड़कर उसका सब कुछ बजता है।

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा इसके रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत कथन का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
भंबल दा साइकिल रेस में भाग लेने से नहीं चूकते थे। साइकिल रेस के लिए खिलाड़ी अच्छी-अच्छी तथा कम वजन की साइकिलें लेकर आते थे। लेकिन भंबल दा इस अवसर पर भी अपनी खटारा साइकिल ही लेकर आते थे जिसके बारे में लोगों के बीच में यह प्रसिद्ध था कि उनकी साइकिल का घंटी छोड़कर सबकुछु बजता है। साइकिल रेस के लिए किसी से साइकिल उधार लेना उनके स्वाभिमान के खिलाफ था।

22. कभी अन्य धावकों की तरह रियाज करते नहीं देखा।
अथवा
23. पति-पत्नी दोनों ही ‘योगा’ करते।
अथवा
24. भला किसान-मजदूर को कसरत की क्या जरूरत?

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
पति-पत्नी से कौन संकेतिक है?
उत्तर :
अशोक दा और उनकी पत्नी संकेतित हैं।

प्रश्न :
कौन अपने को किसान-मजदूर कह रहा है?
उत्तर :
भंबल दा अपने को किसान-मजदूर कह रहे हैं।

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प्रश्न :
पंक्ति का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा खिलाड़ी थे फिर भी वे अन्य खिलाडियों की तरह कोई अभ्यास नहीं करते थे। उनका कहना था कि श्रम करके जीने वाले किसी किसान-मजदूर को कसरत या अभ्यास करने की कोई जरूरत नहीं है। इसके विपरीत उनके भाई अशोक दा का खेल से कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी दोनों पति-पत्नी अपने-आपको चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए योगा किया करते थे।

25. हम उन्हें चाहकर भी बैठा न पाते।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से उद्धत है?
उत्तर :
प्रस्तु गद्यांश ‘धावक’ पाठ से उद्धृत है।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
खेलों में अपनी सुस्त-चाल तथा ट्रैक जाम रखने के कारण भंबल दा को कई बार लोगों के व्यंग्यवाण तथा अफसरों की घुड़कियों को भी सहना पड़ता था। इसके बावजूद उन्होंने न तो कभी खेल के नियमों का उल्लंघन किया, न किसी का विरोध किया और सबसे बड़ी बात यह कि खेलों में भाग लेना भी नहीं छोड़ा। भंबल दा को दर्शकों का इतना जबर्दस्त समर्थन प्राप्त था कि खेल के अधिकारी उन्हें चाहकर भी कभी खेल से बिठाना तो दूर, उसके बारे में सोच भी नहीं पाए।

26. यूँ भंबल दा उसकी मुखरता की तुलना में मौन थे।
अथवा
27. आप माँ की कसम खा लीजिए।
अथवा
28. मैं अपना दावा छोड़ देता हूँ।
अथवा
29. तुम्हारी माँ नहीं है शायद।
अथवा
30. इस तुच्छ पुरस्कार के लिए माँ को दाँव पर नहीं लगाते मेरे भाई।
अथवा
31. तुम्हें शायद मालूम नहीं।
अथवा
32. भंबल ऐसे पुरस्कारों के लिए नहीं दौड़ता।
अथवा
33. मुझे तो सिर्फ अपने को तौलना था।
अथवा
34. और वह मैं कर चुका…..।

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प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
एक बार भंबल दा बाधा दौड़ में दूसरे स्थान पर आए लेकिन दूसरे प्रतियोगी ने उन्हें गलत बताया था। कहा कि वह दूसरे स्थान पर आया है। इतना ही नहीं, उसने कहा कि अगर भंबल दा माँ की कसम खाकर बोलें कि वे दूसरे स्थान पर आए हैं तो वे मान लेंगे। माँ की कसम की बात सुनते ही भंबल दा भावुक हो आए। उन्होने कहा कि शायद तुम्हारी माँ नहीं है वरना इस तुच्छ पुरस्कार के लिए तुम माँ को दाँव पर नही लगाते। इस तुच्छ पुरस्कार का मूल्य माँ से बढ़कर नहीं हो सकता।

35. आज दोनों की उपलब्धियों में वर्षों का नहीं, युगों का फासला था।

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा इसके रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
‘दोनों’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
दोनों से भंबल दा तथा अशोक दा संकेतित हैं।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा तथा अशोक दा सगे भाई थे। लेकिन दोनों की उपलब्धियों में काफी अंतर था। अशोक दा सहीगलत तरीके को अपना कर चीफ पर्सनल आंफिसर के पद तक पहुँच गए थे। जीवन की सारी सुख-सुविधाओं के साथसाथ रुतबा भी था। इसके विपरीत भंबल दा के जीवन की उपलब्धि केवल किरानी के पद तक सिमट कर रह गयी थी। पारिवारिक बोझ्न का वहन करने में ही वे जिंदगी की दौड़ में पीछे रह गए।

36. फिर तो देश-देशान्तर घूमने का एक क्रम ही चल पड़ा।

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘धावक’ है तथा रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
अशोक दा की शादी बड़े साहब की बेटी से हुई थी। स्कॉलरशिप पाने के कारण वे बड़े साहब को पसंद आ गए थे। शादी होते ही वे बड़े साहब के बंगले में रहने को आ गए थे। फिर बड़े साहब के पैसों से ही उन्होंने देश-विदेश की कई यात्रा भी कर डाली।

37. खैर उस बार फेल नहीं हुए।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति किस पाठ से उद्धुत है?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति ‘धावक’ पाठ से उद्दुत है।

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प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा मैट्रिक की परीक्षा में चार बार फेल हो चुके थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पाँचवीं बार परीक्षा दी और पास हो गए। अगर पाँचवीं बार भी वे पास नहीं हो पाते तो शायद फिर कभी पास नहीं कर पाते क्योंकि बढ़ते घर-खर्च के कारण वे अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते।

38. आदमी को शान से जीना चाहिए या तो इस दुनिया से कूच कर जाना चाहिए।
अथवा
39. मेरा भाई मेरी गरिमा के अनुकूल होकर आता है तो उसका स्वागत है।
अथवा
40. उसे यहाँ आने की जरूरत ही क्या है?
अथवा
41. उसे लेकर किसी दूसरे शहर चला जाय।
अथवा
42. उन्हें भी ढाई सौ भेज दिया करूँगा।

प्रश्न :
वक्ता कौन है?
उत्तर :
वक्ता भंबल दा के भाई अशोक दा हैं।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा तथा अशोक दा के पद, प्रतिष्ठा तथा हैसियत में जमीन-आसमान का अंतर था। वे चाहते थे कि उनका भाई भी ऊँचाइयों को छुए क्योंकि भंबल दा को इस फटेहाल में अपना भाई स्वीकार करने में उन्हें लज्जा आती थी। वे साफ-साफ शब्दों में कहते थे कि अगर जिंदगी शानदार न हो तो उससे अच्छा मर जाना है।

मेरा भाई भी अगर मेरी तरह की हैसियत लेकर मेरे पास आए तो मैं उसका स्वागत करूँगा। इस फटेहाली में उसे मेरे पास आने की जरूरत नहीं है। वह माँ को मेरे पास छोड़कर या उसे लेकर दूसरे शहर चला जाय। उसके खाना-खर्ची के लिए मैं उसे ढाई सौ रुपये हरेक महीने भेज दिया करूँगा।

43. भंबल दा को शान की नहीं, सम्मान की जिंदगी चाहिए थी।
अथवा
44. उनके अनुसार शान में दूसरे से अपने को ऊँचा दिखाने की कूरता और खुदगर्जी होती है।
अथवा
45. सम्मान उनके लिए परस्पर सौहार्द और समता का द्योतक था।

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प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
भंबल दा कैसा जीवन जीना चाहते थे?
उत्तर :
भंबल दा सीधे-सरल व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि वे शान की नहीं, सम्मान की जिंदगी जिएँ। जो शान की जिंदगी जीते हैं उनमें स्वार्थ की भावना होती है। दूसरों से अपने को ऊँचा दिखाने के लिए वे सही-गलत की परवाह भी नहीं करते हैं। जबकि सम्मान का जीवन इससे बिल्कुल अलग होता है। सम्मान में आपसी प्रेम तथा समानता की भावना होती है – उसमें खुदगर्जी नहीं होती है।

46. बंगाली हो या गैर-बंगाली, हिन्दू या दूसरे मजहबों को मानने वाला भंबल दा या बमभोले भैया सबकी खुशी-गमी में शरीक।
अथवा
47. किसी को अस्पताल पहुँचाना है, तो एंबुलेंस बनकर उनके कंधे हाजिर।
अथवा
48. कब्रिस्तान में जा रही मौन भीड़ में कंधे झुकाए चले जा रहे हैं।
अथवा
49. शादी का सामान जुगाड़ करना है तो कंधे सामान के लिए हाजिर।
अथवा
50. घूम-फिर कर सुस्त कोल्नू के बैल की तरह वहीं रह गए।

प्रश्न :
प्रस्तुत कथन किसके बारे में है?
उत्तर :
प्रस्तुत कथन ‘धावक’ कहानी के भंबल दा के बारे में है

प्रश्न :
संदर्भित व्यक्ति की विशेषताओं को लिखें।
उत्तर :
भंबल दा में मानवता तथा भाइचारे की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वे जाति, धर्म या भाषा के आधार पर किसी के साथ भेद्भाव नहीं करते थे। वे सबकी खुशी, सबके गम में शामिल होते थे। किसी को अस्पताल पहुँचाना हो तो एंबुलेंस का इतजार न कर अपने कंधे हाजिर कर देते थे।

किसी मुसलमान भाई की मौत पर उन्हें कंधे झुकाए जनाजे मे शामिल देखा जा सकता था। अगर किसी के घर में शादी हो तो सामानों की व्यवस्था का जिम्मा स्वयं ले लेते थे मानो उनके अपने सगे की शादी हो। उनका जीवन ऐसा था कि वे सबके लिए थे और सब उनके लिए थे।

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51. माँ के लिए बेटा-बेटा ही होता है।
अथवा
52. यह चीज बुरी तरह सालती कि उनका एक बेटा उनकी छाया तक से बचता चलता है।
अथवा
53. चाहे कुछ भी हो, कहीं भी पहुँच जाए, कहायेगा तो मेरा बेटा और तेरा भाई ही न!
अथवा
54. थ्रोड़ी देर बाद उनकी नाक ही माँ की बातों का उत्तर देने के लिए बची रहती।
अथवा
55. अपने दिल के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर फिर उन्हीं तनहाइयों में डूब जातीं।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
शादी के बाद अशोक दा ने परिवार की परवाह करना विल्कुल छोड़ दी थी। यहाँ तक कि वे माँ का भी ख्याल नहीं रखते थे। माँ को भी यह दर्द हमेशा टीसता रहता था कि उनका ही एक बेटा उनकी छाया से भी दूर भागता फिरता है। फिर भी उन्होंने कभी भी अशोक दा की निंदा नहीं की। उल्टे अपने मन तथा भंबल दा को दिलासा देने के लिए वह उसकी तारीफ ही करती थी।

चाहे कुछ भी हो वह तो उनका बेटा ही है और भंबल के लिए उसका बड़ा भाई। भंबल दा भी वास्तविकता जानते थे इसलिए वे माँ की हाँ में हाँ मिलाते हुए सो जाते। माँ की बातों का उत्तर केवल उनकी वजती नाक ही देती थी। भंबल दा को सोया जानकर माँ फिर अपने अकेलेपन में डूब जाती थी।

56. इसका अंजाम अच्छा होगा या बुरा, इतना सोचने का भी वक्त नहीं था मेरे लिए।
अथवा
57. बात पानी में फेंके गए मुरदे की तरह उतरा आई।
अथवा
58. तुम्हें दूसरे के काम में दखल नहीं देना चाहिए।
अथवा
59. क्यो क्या किया है मैने?
अथवा
60. मुझे जो भुगतना पड़ा। उसे बताना मुनासिब नहीं।
अथवा
61. मैने उनके मामले में रुचि लेना छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझी।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति का अशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लेखक ने सोचा कि किसी तरह भंबल दा का प्रमोशन कराकर ऑफिस सुपरिटेंडेंट बना दिया जाय। चाहे इसके लिए अच्छा या बुरा जो भी क्षेलना पड़े। लेकिन यह छिपी नहीं रह गई और उसी तरह उजागर हो गई जैसे मुर्दा पानी में उतरा जाता है। भबल ने इसके बारे में अशोक दा को फटकारते हुए कहा कि जैसे वे दूसरों के काम में दखल नहीं देते उसी प्रकार उन्हें भी नहीं देना चाहिए। इन सबके कारण लेखक को काफी कुछ भुगतना पड़ा वयोंकि यह सोच उन्हीं की थी। इतना सब कुछ भुगत लेने के बाद लेखक ने मन ही मन यह तय कर लिया कि अब वे कभी भंबल दा के किसी मामले में टांग नहीं अड़ाएँगे।

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60. मुझे आशा की नयी किरण दिखने लगी।
अथवा
61. उप्र उस दौर में पहुँच रही थी जहाँ वांछित लड़कियाँ नहीं मिल सकती थीं।
अथवा
62. हमने बूँढ़-ढाँढ़ कर एक मास्टरनी को राजी कर ही लिया।
अथवा
63. मास्टरनी के सामने पड़ने से अब मेरी तो रुह की काँपती है।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता लेखक हैं।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर :
एक बार भंबल दा की भाँ ने लेखक को बुलाकर उनकी शादी के बारे में कोशिश करने को कहा। लेखक को लगा कि यदि ऐसा हो पाया तो भंबल दा की जिंदगी दरे पर आ जाएगी। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं था क्योंकि भंबल उम की उस सीमा को छू रहे थे जहाँ मनचाही लड़की नहीं मिल सकती थी।

आखिरकार लेखक ने शादी के लिए एक मास्टरनी को राजी कर ही लिया। लेकिन किसी कारणवश यह शादी भी नहीं हो पाई। इसका खामियाजा भी लेखक को भुगतना पड़ा तथा वे उस मास्टरनी को अपना मुँह दिखाने के लायक भी नहीं रह गए। वे उसका सामना करने से कतराने लगे।

64. हमें तो लगा उनकी जवानी आयी ही नहीं और वे बुढ़ा भी गये।
अथवा
65. वे वहीं के वहीं ठहरे पड़े रहे।
अथवा
66. वक्त उनके कदमों के तले-तले तेजी से सरकता गया।
अथवा

67. उनका किशोर मन पच्चीस सालों से लगातार दौड़ता ही रहा।
प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति किसके बारे में कही गई है?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति भंबल दा के बारे में कही गई है।

प्रश्न :
कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा के जौवन के वर्ष इतनी तेजी से सरकते गए कि लगा किशोरावस्था के बाद सीधे बुढ़ापा ही आ गया। वे अपनी जगह पर ही बने रहे और समय कब उनके कदमों से नीचे सरक गया- यह पता ही न चला। कहने का भाव यह है कि बड़े भाई की उपेक्षा, घर-परिवार की जिम्मेवारियों के बोझ के नीचे उनका जीवन इस तरह गुजर गया कि जवानी के आने-जाने का पता ही न चला।

66. यदि मैं दो साल पहले पैदा हुआ होता तो चीफ पर्सनल पैदा हुआ होता।
अथवा
69. दो साल बाद पैदा होता तो विधवा।

प्रश्न :
वक्ता का नाम लिखें।
उत्तर :
वक्ता ‘धावक’ कहानी के नायक भंबल दा हैं।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का उद्देश्य लिखें।
उत्तर :
भंबल दा नियतिवादी थे। वे भाग्य में लिखे पर विश्षास करते थे। इसलिए प्रथम आने वाले धावक के यह कहने पर कि यदि वे उसके ट्रैक पर रहते तो प्रथम आ जाते । इसी के जवाब में उन्होंने कहा कि किस्मत से ज्यादा कुछ मिलने वाला नहीं है। यदि वे दो साल पहले जन्म लेते तो भाई की जगह पर्सनल ऑंकिसर होते और अगर दो वर्ष बाद पैदा होते तो अपनी बहन की तरह विधवा। उनका जन्म ही गलत समय में हुआ अन्यथा उन्हें यह सब क्यों भोगना पड़ता।

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70. क्यों न रजत-जयंती मना भी ली जाये आपकी?

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता लेखक हैं।

प्रश्न :
किसकी रजत जयंती मनाने की बात कही जा रही है?
उत्तर :
भंबल दा की रजत जयंती मनाने की बात कही जा रही है।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पच्चीस वर्षो तक लगातार खेलों में हिस्सा लेने के कारण एक बार लेखक ने कहा कि क्यों न पच्चीस वर्ष बीत जाने के उपलक्ष में आपकी रजत जयंती मना ली जाय। अब जाकर भंबल दा को पच्चीस वर्ष बीत जाने का अहसास हुआ। जब उन्होंने आइने में अपना चेहरा देखा तो चेहरों की झाइयाँ तथा अधपके बाल उनके उम्र की चुगली कर रहे थे।

71. मानो सबकुछ एकाएक उसी दिन हो गया था।

प्रश्न :
रचना का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘धावक’ है।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लेखक के यह याद दिलाने पर कि भंबल का खिलाड़ी-जीवन पच्चीस वर्षों का हो गया है- उन्हे अपनी उम्म के बीत जाने का अहसास हुआ। आइने में चेहरा देखने पर उन्हें लगा कि आज अचाजक ही चेहरों पर झाइयाँ आ गई हैं, बाल पकने शुरू हो गए हैं। आज तक उन्होंने इस ओर कभी ध्यान न दिया था कि इतनी उम बीत चुकी है और उसका असर चेहरे पर दिखाई पड़ने लगा है।

72. भंबल दा अचकचाकर बढ़े मंच की ओर।

प्रश्न :
रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
भंबल दा अचकचाकर मंच की ओर क्यों बढ़े?
उत्तर :
एक बार भंबल दा का नाम पुरस्कार के लिए घोषित किया गया तो अचानक उन्हें विश्धास नहीं हुआ। आज तक ऐसा नहीं हुआ था। अपना नाम सुनते ही वे अचकचाकर मंच की ओर बढ़े क्योंक घोषणा में केवल उनका नाम ही पुरस्कार के लिए पुकारा गया था। यह पुरस्कार किसके लिए दिया जा रहा है इसकी घोषणा नहीं की गयी थी।

73. अपनी करनी का पुरस्कार ले जाओ।
अथवा
72. शर्म काहे की?
अथवा
75. खानदान में एक जोकर तो निकला।

प्रश्न :
वक्ता तथा श्रोता का नाम लिखें।
उत्तर :
वक्ता अशोक दा तथा श्रोता भंबल दा हैं।

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प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा कभी किसी प्रतियोगिता में पुरस्कार नहीं पा सके। खेल के आयोजकों ने उन्हें विशेष पुरस्कार देने के बारे में सोचा क्योंकि उन्होंने कम से कम लोगों का मनोरंजन तो किया था। पुरस्कार देने का भार भंबल दा के बड़े भाई अशोक दा को सौंपा। जब भंबल दा ने पुरस्कार लेने से इनकार किया तो अशोक दा का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने भंबल दा पर व्यंग्य करते हुए कहा- ‘ अपनी करनी का पुरस्कार ले जाओ-शर्म काहे की? खानदान में एक जोकर तो निकला।”

76. गलत पुरस्कार मैं नहीं लेता दादा !
अथवा
77. तुम्हारी पुरस्कार-लिप्सा तुम्हीं को मुबारक!
अथवा
78. इसे मेरी ओर से तुम रख लो, खानदान का नाम रोशन करने के लिए।
अथवा

79. सारी कड़वाहट मवाद की तकरह शिष्ट लहजे में बह निकली थी।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता भबल दा हैं।

प्रश्न :
वक्ता और श्रोता में क्या संबंध है?
उत्तर :
वक्ता और श्रोता में भाई का संबंध है।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर :
जब विदूषक के लिए भंबल दा को पुरस्कार देने की घोषणा की गई तो उन्होने लेने से इनकार कर दिया। यह उनके स्वाभिमान को चोट पहुँचाने वाली बात थी। उन्होंने साफ शब्दों में अशोक दा से कहा कि वे गलत पुरस्कार लेने वालों में से नहीं हैं।

पुरस्कार पाने की चाहत उन्हें नहीं है, इसिलए यह पुरस्कार तुम्हीं रख लो ताकि इस पुरस्कार से खानदान का नाम रोशन हो सके। कहने का भाव यह है कि अशोक दा ने जो कुछ किया वह न केवल उनके लिए या भंबल दा के लिए बल्कि पूरे खानदान के लिए कलंक की बात थी।

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80. उस रात पहला स्ट्रोक हुआ था उन्हें।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ तथा रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
किस रात किसे स्ट्रोक हुआ और क्यों?
उत्तर :
विदूषक के लिए अपने ही भाई अशोक दा से पुरस्कार दिए जाने की बात से भंबल दा को गहरा मानसिक आयात लगा। वे सोच भी नहीं पा रहे थे कि क्या एक भाई अपने सगे भाई के साथ ऐसी दिल्लगी भी कर सकता है। इसी सोच तथा मानसिक आघात के कारण उसी रात को उन्हे पहला स्ट्रोक हुआ।

81. हवा में पुराने दिनों की ठहरी हुई गन्ध है।
अथवा
82. मकड़ी के जाले रह-रहकर कपड़ों और चेहरों पर लिपट रहे थे।
अथवा
83. कैलेण्डर पर पिछले तीन माह से तारीख बदली ही नहीं गयी थी।
अथवा
84. माँ के निधन के बाद समय जहाँ का तहाँ ठहरा पड़ा था।
अथवा
85. घर के इस कोटर में उनके पंखों की उदास फड़फड़ाहट इन दीवारों में ही घुटकर रह गयी होगी।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा रनाचाकर संजीव हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश में निहित भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
माँ की मृत्यु के काफी दिनों बाद अशोक दा और लेखक भंबल दा के कमरे में गए। उस कमरे की हवा में मानों ठहरे हुए समय की गंध भी घुलमिल गई थी। साफ-सफाई न होने के कारण मकड़े के जाले चारों और लटक रहे थे जो कपड़ों तथा चेहरों पर लिपट रहे थे।

पिछले तीन महीने से कैलेण्डर का पन्ना नहीं बदला गया था। ऐसा लग रहा था कि माँ की मृत्यु के बाद उस कमरे का समय ठहर-सा गया हो। कमरे के माहौल को देखकर यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं था कि कैसे माँ की सोच के उदास पंख फड़फड़ाकर इस कमरे की दीवारों में भी घुटकर रह गयी होगी। बाहर किसी ने उसकी आवाज न सुनी होगी।

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86. दूर-दूर खड़े लोग, औरतें, बच्चे हमें अजूबा-से देख रहे हैं।
अथवा
87. कोई बोलता नहीं कुछ।
अथवा
88. हम बच-बचकर निकल रहे थे।
अथवा
89. कम्बख्त लड़का भी हमें छोड़कर जाने कहाँ भाग गया है?
अथवा
90. लड़का लौट आता है।
अथवा
91. श्मशान घाट से आ रहे हैं न?
अथवा
92. हमारा कलेजा धक से रह जाता है।
अथवा
93. नहीं, क्यों क्या हुआ?
अथवा
94. आपको नहीं मालूम …. ?
अथवा
95. आज सुबह ही वे गुजर गए।

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प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘धावक’ है तथा रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पप्र करें।
उत्तर :
शायद भंबल दा की खराब तबीयत के बारे में सुनकर ही अशोक दा लेखक को साथ लेकर भंबल दा के घर पहुँचे। घर के आसपास के लोगों में एक घुप्पी-सी छायी थी। केवल सब उन्हें अजीब-सी नजरों से देख रहे थे। जिस लड़के ने उन दोनों को भंबल दा के घर तक पहुँचाया था, वह भी न जाने कहाँ चला गया था। थोड़ी देर बाद जब लड़का लौटकर आता है तथा इन दोनो से यह सवाल करता है कि शमशान घाट से आ रहे हैं? तो दोनों का कलेजा धक से रह जाता है।

भंबल तो सुबह ही गुजर गए थे तथा मुहल्ले वाले उनका दाह-संस्कार करने श्मशान ले गए थे। इन्हे भरोसा नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी भंबल दा इन्हें छोड़कर चले जाएँगे। और तो और मुहल्लेवालों ने भी अशोक दा को खवर देने की जरूरत नहीं समझी थी। इन सारी परिस्थितियों के कारण दोनों वहाँ के वातावरण में अपने-आपको उपेक्षित-सा महसूस कर रहे थे।

96. यह कागज छोड़ गए हैं भैया के नाम।
अथवा
97. ‘दौड़ में जीत उसी की होती है जो सबसे आगे निकल जाता है, चाहे लंगी मारकर हो या गलत ट्रैक हथिया कर।”
अथवा
98. पुरस्कार पाने का जुनून ही सवार रहता है उस समय।
अथवा

99. मुझे खुशी और संतोष है कि मैंने लंगी नहीं मारी, गलत ट्रैक नहीं पकड़ा।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से उद्धुत है?
उत्तर :
प्रस्तुत गद्यांश ‘धावक’ पाठ से उद्दृत है।

प्रश्न :
गद्यांश का अभिप्राय संदर्भ सहित स्पष्ट करें।
उत्तर :
वह लड़का जो लेखक तथा अशोक दा को भंबल दा के घर तक छोड़ आया था उसने एक चिट्री दी। यह चिट्ठी भंबल दा ने अशोक दा के लिए लिखी थी। चिट्ठी में भंबल दा ने लिखा था कि आजकल दौड़ में वही जीत पाता है जो सही-गलत की परवाह किए बिना आगे निकल जाता है। जब पुरस्कार पाने का जुनून सिर पर सवार हो तो फिर सहीगलत की किसे परवाह रह जाती है। लेकिन उनके लिए यह बात खुशी और संतोष की है कि उन्होंने पुरस्कार जीतने या दौड़ में आगे निकलने के लिए कभी गलत नहीं किया। न कभी किसी को लंगी मारी और न ही कभी गलत ट्रैक पकड़ा। लेकिन यही सब करने वाले व्यक्ति आज सफल माने जाते हैं।

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100. पीठ पर तुम्हारा छोड़ा हुआ बोझ था।
अथवा
101. उसे लेकर पूरी दौड़ दौड़नी थी मुझे।
अथवा
102. इनका हिसाब-किताब नहीं हुआ करता दौड़ के इतिहास में।
अथवा
103. तुम्हारे जैसे तेज-तर्रार लोग हम जैसों को ट्रैकों पर रेंगते हुए देखकर गुस्से से भर जाते हैं।
अथवा
104. मगर हम जैसों का क्या कसूर?
अथवा
105. तुम्हें तो शुकगुजार होना चाहिए।
अथवा
106.
तुम जैसे अव्घल आने वालों की विजय-लिप्सा हमारे पिछड़ने से तृप्त हो सकती है।
अथवा
107. यही कूर तृप्ति धीरे-धीरे तुम्हें उस दलदल में लिए चली जाती है, जो यह दौड़ दौड़ता नहीं।

प्रश्न :
प्रस्तुत कथन किसका अंश है?
उत्तर :
प्रस्तुत कथन भंबल दा द्वारा अशोक दा को लिखे गए पत्र का अंश है।

प्रश्न :
प्रस्तुत कथन का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा ने चिट्री में लिखा था कि अगर उनकी पीठ पर परिवार का बोझ नहीं होता तो वे भी जिंदगी की दौड़ में आगे निकल सकते थे। खैर, दौड़ में इन सब बातों को कोई अहमियत नहीं देता है। जो तेज दौड़ने वाले हैं वे धीमी चाल वालों को ट्रैक पर देखकर ही गुस्से तथा घृणा से भर जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि इन्हीं फिसड्डी लोगों के कारण वे विजयी होते हैं। जो सही तरीके को अपना कर दौड़नेवाले नहीं हैं – वे भला इसकी कीमत क्या समझ पाएँगे।

108. वह चुपचाप देखता आया है साँड़-युद्ध को।
अथवा
109. तप्त चटखारे ले-लेकर देखता आया है।
अथवा
110. आज वही दल म्यूजिकल चेयर जैसे खेल रचाता है।
अथवा
111. इसके नए-नए संस्करण करता है।
अथवा
112. कामुक कूर वर्ग उनका रस लेते हुए आघाता नहीं।
अथवा
113. पिछले कई सालों से मैं भी रस ले-लेकर इसी वर्ग की मानसिकता को देखता रहा हूँ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक

प्रश्न :
वक्ता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता लेखक हैं।

प्रश्न :
‘वह’ कौन है?
उत्तर :
वह कामुक क्रूर वर्ग है।

प्रश्न :
प्रस्तुत गय्यांश का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लेखक ने यह अनुभव किया है कि समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो सुख-सुविधाओं से पूर्ण है। उसकी कामुकता ही साँड़-युद्ध, ग्लैडियेटर्स से लेकर म्यूजिकल चेयर जैसे खेलों को जन्म देता है। वे खुद खेलों में शामिल नहीं होते बल्कि खेलों से अपनी कामुकता को शांत करते हैं। लेखक भी मजे लेकर कई सालों से कामुक-कूर वर्ग की इस मानसिकता को देखता आ रहा है।

114. कह नहीं सकता, तुम आओगे या नहीं।
अथवा
115. इस छोटे-से मकान पर हक मत जतलाना।
अथवा
116. हम दोनों ‘टग ऑफ वार’ के दोनों ओर शक्ति आजमाइश करते रहे हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत कथन किसका है?
उत्तर :
प्रस्तुत कथन भंबल दा का है।

प्रश्न :
‘हम दोनों’ से कौन संकेतित हैं?
उत्तर :
हम दोनों से भंबल दा और अशोक दा संकेतित हैं।

प्रश्न :
‘टग ऑफ वार’ क्या है ?
उत्तर :
‘टग ऑफ वार’ रस्साकशी (अपनी-अपनी ओर रस्सी खींचना) का खेल है।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
जब माँ की मृत्यु हुई तो उस समय भी अशोक दा विदेश में थे। भंबल दा इसलिए अपने पत्र में कहते हैं कि न जाने उसकी मृत्यु के समय भी आ पाएँगे या नहीं। अगर आ भी जाएँ तो छोटे-से मकान पर अपना हक नहीं जमाने को कहते हैं। शायद यह मकान भंबल दा जैसे किसी व्यक्ति के काम आ जाए।

जीवन भर दोनों रस्साकशी का खेल खेलते रहे- इस खेल में भी भंबल दा हार गए। आगे वे कहते हैं कि यदि वे भी तेज-तर्रार होते, गलत-सही की परवाह किए बिना दौड़ जीतने में लगे रहते तो उनकी भी उम लंबी होती। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इस रस्साकशी के खेल में भी भंबल दा अशोक दा से हार गए।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक

117. निश्चय ही मेरी सम्बद्धता अपने दल के साथ है।

प्रश्न :
वक्ता कौन है?
उत्तर :
वक्ता भंबल दा हैं।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा ने मृत्यु से पहले लिखे गए पत्र में लिखा था कि वे हमेशा उन लोगों के साथ हैं जो भले ही दौड़ में नहीं जीत पाए हों लेकिन कभी बेईमानी नहीं की, किसी को लंगी नहीं मारी और न ही कभी गलत ट्रैक पकड़।। वे इन लोगों के साथ हैं जो शान नहीं, सम्मान की जिंदगी जीना चाहते हैं।

118. मैं भी तुम्हारी तरह होता तो तुम्हारे जैसा दीर्घायु होता।
अथवा
119. आठ साल ज्यादा जी लोगे यही न?
अथवा
120. जिस जुनून में जिया, उसकी तासीर का एक क्षण भी तुम्हारे वर्षों के तमाम ताम-झाम के सालों से उम्दा है।
अथवा

121. हो सके तो चखककर कभी देखना।

प्रश्न :
रचता का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘धावक है।’

प्रश्न :
‘मैं’ और ‘तुम्हारी’ से कौन संकेतित हैं?
उत्तर :
‘मै’ से भंबल दा और ‘तुम्हारी’ से अशोक दा संकेतित हैं।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक

प्रश्न :
वक्ता इस बात को किस माध्यम से कहता है?
उत्तर :
वक्ता इस बात को पत्र के माध्यम से कहता है।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भंबल दा ने मृत्यु से पहले लिखे पत्र में अशोक दा को लिखा कि अगर वे भी गलत ट्रैक पकड़ते तो वे भी दीर्घायु होते। लेकिन गलत ट्र्क पकड़ने पर भी इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि आठ वर्ष ज्यादा जी लेंगे। उन्होने जितना भी जीवन जिया सम्मान के साथ जिया। उन्होंने जिस जुनून के साथ जिंदगी को जिया, उसमें जो संतुष्टि मिली, उसका एक क्षण भी तुम्हारे लिए दुर्लभ है। अगर अपनी ताम-झाम वाली जिंदगी से कभी फुरसत मिले तो उसे चखकर देखना- तब तुम्हें दोनों की जिंदगी के अंतर का पता चलेगा।

122. मगर इस बार भंबल दा इससे पहले ही आगे बढ़ गए हैं।
अथवा
123. लगता नहीं है कि भंबल दा नहीं रहे।
अथवा

124. लगता है दौड़ते हुए दृप्टि सीमा के पार चले गए हैं।

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार संजीव हैं।

प्रश्न :
कौन दृप्टिसीमा के पार चले गए हैं?
उत्तर :
भंबल दा दृश्शिसीमा के पार चले गए हैं।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पप्ट करें।
उत्तर :
जीवन में भंबल दा कभी प्रतियोगिता नहीं जीत पाए लेकिन इस बार की दौड़ में वे आशोक दा से आगे निकल गए। जन्म में भले ही वे दो वर्ष पीछे रह गए हों पर मृत्यु की दौड़ में उन्होंने अशोक दा को कम से कम आठ वर्ष पीछे छोड़ दिया। भंबल दा इस दुनिया से गुजर गए लेकिन लगता नहीं है कि वे नहीं रहे। ऐसा लगता है कि दौड़ दौड़ते हुए इतनी दूरी तक पहुँच गए हैं जो हमारी देखने की सीमा से परे है। इस बार वे सबसे आगे निकल गए हैं।

WBBSE Class 10 Hindi धावक Summary

लेखक – परिचय

कथाकार संजीव का जन्म 6 जुलाई सन् 1947, सुत्लानपुर (उत्तर प्रदेश) के बाँगरकलाँ गाँव में हुआ था।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक 1

इनकी शिक्षा-दीक्षा पध्चिम बगाल में हुई थी जहाँ से उन्होंने रसायन-शास में स्नातकोत्तर के समकक्ष डिग्री हासिल की। सेन्ट्रल ग्रोथ वर्क्स (इस्का) कुल्टी (पश्चिम बंगाल) में वर्षों रसायनज्ञ के रूप में कार्य करने के बाद फिलहाल स्वतन्न्र लेखन के कार्य से जुड़े हुए हैं। समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य के जाने-माने कथाकार हैं। वे अपने शोधपरक लेखन और वर्जित विषयों के अवगाहन के लिए विख्यात हैं। उनके आठ उपन्यास और सौ से अधिक कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त विविध विषयों और विविध विधाओं में वे लगातार लेखनरत हैं।

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प्रमुख रचनाएँ – तीस साल का सफरनामा, आप यहाँ हैं, भूमिका और अन्य कहानियाँ, दुनिया की सबसे हसीन औरत, प्रेतमुक्ति, प्रेरणास्तोत और अन्य कहानियाँ, ब्लैक होल, खोज, दस कहानियाँ, गति का पहला सिद्धान्त, गुफा का आदमी, आरोहण (कहानी-संग्रह), किशनगढ़ के अहेरी, सर्कस, सावधान! नीचे आग है, धार, पाँव तले की दूब, जंगल जहाँ शुरू होता है, सूत्रधार (उपन्यास), रानी की सराय (किशोर उपन्यास), डायन और अन्य कहानियाँ (बालसाहित्य)

सम्मान – प्रथम कथाक्रम सम्मान (1997), अन्तर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा सम्मान (2001) (लन्दन), भिखारी ठाकुर सम्पान (2004), पहला सम्मान (2005) । उन्हें श्रीलाल शुक्ल स्पृति सम्मान (2013) से सम्मानित किया गया है।

शब्दार्थ

पृष्ठ संख्या – 133

  • ध्वज = झंडे।
  • चूर्ण = पाउडर ।
  • अल्पना = जमीन पर चूने से बनाई गई कलाकृति।
  • अलंकृत = सजा हुआ।
  • उथलाथी = उमड़ती।
  • तमाम = अनेक।
  • चीफ गेस्ट = मुख्य अतिथि।
  • अगवानी = आगे बढ़कर स्वागत करना। रिसीव-लेने।
  • इंटरनेट = मनोरंजन।
  • चौकन्ना = सावधान।
  • बाबूक्लास = अधिकारी वर्ग।
  • हधिया = अधिकार।
  • नगण्य = सामान्य।
  • कोथाय = कहाँ हैं ?
  • धावक = दौड़ने वाले।
  • ऐन वक्त = सही समय।
  • खब्ती = सनकी, पागल।
  • अनचाहे = बिना चाहे।
  • अखर = महसूस।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 5 धावक

पृष्ठ संख्या – 134

  • लौंग जम्प = लम्बी कूद ।
  • हाई जम्प = ऊँची कूद।
  • जेबलिन थो = भाला फेंकना।
  • डिस्क थ्रो = पहिया फेंकना।
  • बहिष्कृत = बाहर।
  • मायूसी = निराशा।
  • न्यूनतम मानक = कम से कम नियम ।
  • पार्टीसिपेट = भाग लेना, हिस्सा लेना।
  • ललकार = चिल्ला कर पुकारना, हौसला बढ़ाना।
  • क्लांति = पकावट ।
  • आश्वस्त = निध्रिंत।
  • आक्रोश = गुस्सा।
  • बेकाबू = नियंत्रण से बाहर।
  • वी. आई. पी. = अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति।
  • ट्रैक = वह रास्ता जिस पर धावक दौड़ते हैं।
  • रूतबे = शान।
  • खिलाफ = विरुद्ध।
  • खटराग = पुरानी बातें।
  • रियाज = अभ्यास।
  • समग्रवत = पूरे तौर पर।
  • कस्बे = गाँव।

पृष्ठ संख्या – 135

  • बुलवर्कर = कसरत करने का यंत्र।
  • चरितार्थ = सही।
  • अपवाद = नियम के विरुद्ध।
  • घुड़कियाँ = धमकी।
  • फब्तियाँ = व्यंग्य।
  • प्रतिवाद = विरोध।
  • महज = केवल।
  • अतिक्रमण = पार करना।
  • शिनाख्त = पहचान।
  • मुखरता = वाचालपन, अधिक बोलना।
  • हुलिया = हालत, दशा।
  • तुच्छ = छोटे।
  • फासला = दूरी।
  • चौकियाँ = छलाँग।
  • अदनी = छोटी।
  • देशान्तर = देश के बाहर, विदेश।
  • क्रम = सिलसिला।
  • गृहत्याग = घर छोड़कर ।
  • जुगाड़ = व्यवस्था।
  • पापड़ें बेलना = कष्ट सहना।
  • गाहे-बेगाहे = जब-तब।
  • कूच = विदा।
  • गरिमा = प्रतिष्ठा।
  • खैरात = दान।

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पृष्ठ संख्या – 136

  • क्रूरता = कठोरता।
  • खुदर्गी = स्वार्थी ।
  • परस्सर = आपस में।
  • समता = बराबरी।
  • द्योतक = प्रतीक ।
  • सेलेक्शन = चुनाव।
  • सहकर्मियों = साथ काम करने वाले।
  • प्रत्यक्ष = सामने।
  • परोक्ष = पीछे।
  • ग्रेजुएसी = बी. ए. ।
  • पोस्ट ग्रेजुएसी = एम.ए.।
  • आश्रिता = निर्भर।
  • कदर = तरह ।
  • मज़हब = धर्म ।
  • शरीक = शामिल, सम्मिलित।
  • कसर = कोशिश।
  • मरखप कर = कठिनाई से।
  • सालती = लगती।
  • वार्ताएँ = बातचीत।
  • तनहाइयों = अकेलपना।
  • निरंतर = लगातार।
  • शुभचिन्तक = भला चाहने वाला।
  • लिहाज= कारण।
  • आत्मसात = अपनाना।
  • समकक्षप्राय = बराबरी का होना।
  • अंजाम = परिणाम।

पृष्ठ संख्या – 137

  • उतरा = ऊपर आ जाना।
  • जायज = सही।
  • नाजायज = गलत।
  • रिटर्न = बदले में।
  • एवार्ड = पुरस्कार।
  • अवाक् = आश्चर्यचकित।
  • संदर्भ = कौन-सी बात, किसके बारे मे कही जा रही है।
  • शीर्ष = ऊँचाई।
  • खटारा खड़काते = टूटी-फूटी साइकिल की आवाज के साथ।
  • रूचि = इच्छा।
  • बाँछित = मनचाही।
  • राजी = तैयार।
  • रूह = आत्मा।
  • आचरण = व्यवहार ।
  • विरक्ति = नफरत।
  • वहन = उठाना।
  • भावी = होने वाली ।
  • हल = समाधान, सुलझा।
  • अहसानमंद = उपकार को मानना।
  • कुबूल करना = मंजूर।
  • आशंका = बुरे होने का भय।
  • सांघातिक = बड़ी।
  • जोखिम् = खतरे।
  • निष्कृति = निकलने।
  • राह = रास्ता ।
  • तलाश = खोज।
  • प्रकरण = विषय।
  • तले = नीचे ।
  • सरकता = खिसकता।
  • नियतिवादी = भाग्यवादी, किस्मत को मानने वाला।

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पृष्ठ संख्या – 138

  • लहजे = तरीके
  • झांइयों = झुर्रियों।
  • जायजा = निरीक्षण।
  • अचकचाकर = हड़बड़ा कर
  • ग्रहण = लेने ।
  • विदूषक = जोकर, लोगों को हँसानेवाला।
  • खिसिया-सी = गुस्से की तरह।
  • तेवर = भुकुटि, भौंगों पर बल /लकीर पड़ जाना।
  • विद्रूण = कोध भरा चेहरा।
  • पुरस्कार-लिप्सा = पुरस्कार पाने का लालच।
  • मुबारक = बधाई।
  • मवाद = घाव से निकलने वाली पीव।
  • शिष्ट = सभ्य।
  • हतबुद्धि = बुद्धि का काम न करना।
  • दीर्घा = कतार।
  • स्ट्रोक = हंदय का आघात (हार्ट अटैक)।

पृष्ठ संख्या – 139

  • छहर = फैल।
  • गुम = गायब।
  • जर्द-सी = पीले रंग की।
  • निधन = मृत्यु।
  • स्मृतियों = यादों।
  • कोटर = वृक्ष के तने का खोखला भाग जिसमें पक्षी अपना घोंसला बना लेते हैं।
  • घुटकर = दबकर। पूर्व = पहले।
  • अजूबा-सा = अजीब-सी चीज।
  • वजूद = अस्तित्व।
  • शिनाख्त = पहचान।
  • गुजर गए = मगर गए।
  • जुनून = पागलपन।
  • अवान्तर = विषय से अलग।
  • शुक्रगुजार = अहसानमंद।
  • अव्वल = प्रथम।
  • विजय-लिप्सा = जीतने का लालच।
  • तृप्त = संतुष्ट।
  • रस = आनंद।
  • तप्त = गर्म।
  • आगात नहीं = संतुष्ट नहीं होता।
  • होड़ = प्रतियोगिता।
  • एक – दूजे = एक-दूसरे।
  • विभेद = अंतर।
  • छद्म = छल।

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पृष्ठ संख्या – 140

  • अस्वस्थ = बीमार ।
  • पनाह = आसरा ।
  • हक = अधिकार ।
  • आजमाइश = आजमाना।
  • अभिजात = उच्च वर्ग ।
  • दीर्घायु = लंबी उम्रवाला।
  • तासीर = असर।
  • तमाम = अनेक ।
  • उम्दा = अच्छा।
  • प्रतिवाद = विरोध।
  • परिदृश्य = दृश्य, नज़ारा।
  • दृष्टि सीमा = जहाँ तक दिखाई पड़े।

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Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions and रचना आत्मकथात्मक निबंध to reinforce their learning.

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पुस्तक की आत्मकथा

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • उपयोगिता
  • राम की जीवन गाथा
  • उपसंहार।

मैं हिन्दी-साहित्य का एक प्रमुख महाकाव्य हूँ, मेरी रचना तुलसीदास ने की थी । उस महापुरुष ने मेरी रचना कर हिन्दी-साहित्य को धन्य बनाया । मैं भी अन्य पुस्तकों की भाँति ही एक पुस्तक हूँ, लेकिन मेरा सौभाग्य इसी में है कि मेरे प्रमुख पात्र, मर्यादा एवं शील सम्पन्न प्रभु श्री रामचन्द्रजी हैं । मुझे कई बार पढ़ने के बाद भी पाठकगण बार-बार पढ़ना चाहते हैं। राम का नाम लेने से मुक्ति मिल सकती है, किन्तु मुझमें इस प्रकार की कोई शक्ति विद्यमान नहीं है जिससे मैं मनुष्यों को मोक्ष दे सकूँ । यह शक्ति तो प्रभु श्री रामचन्द्र जी में है, जो प्रत्येक युग में अवतार लेकर लोगों के दु:ख-दर्द का हरण करते हैं तथा अत्याचारियों का विनाश करते हैं। मेरे रचयिता के शब्दों में –

जब-जब होहि धरम की हानी, बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।
तब-तब धर प्रभु मनुज शरीरा, हरहि कृपा निधि सज्जन पीरा ।

मुझे सामान्य जन ही नहीं, बड़े-बड़े ॠषि-मुनि एवं ज्ञानी महात्मा जन भी अपने घर में श्रद्धा और भक्ति के साथ रखते हैं। वे लोग प्रभु श्री रामचन्द्रजी की गाथा पढ़ने एवं सुनने के लिए मुझे अपने पास रखते हैं। मेरी सुरक्षा के लिए वे मुझे लाल रंग के आवरण से हमेशा ढँककर रखते हैं तथा पढ़ते समय वे मुझे खोलकर एक रेहल नामक सुविधाजनक आसन पर रख देते हैं। यदि आपको मेरे सम्बन्ध में और अधिक जानकारी प्राप्त करनी है तो, आप उन महात्माओं से नि:संकोच पूछ सकते हैं जो लोग सदैव मुझे अपने पास रखते हैं।

मैं भर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र की जीवन-गाथा हूँ। इसीलिए लोग मुझे ‘रामचरित-मानस’ कहते हैं। श्री रामचन्द्र परमेश्वर हैं। शक्ति, शील और सौन्दर्य-उनकी तीन विभूतियाँ हैं।
मेरे रचयिता ने मुझे शंकर-पार्वती के संवाद के रूप में प्रस्तुत किया है। शिव पार्वती से कहते हैं :-

उमा कहौं मैं अनुभव अपना।
बिनु हरिभजन जगत सब सपना।।

श्रीराम भी शिव का पूजन करते हैं और कहते हैं :-

शिव द्रोही मम दास कहावा ।
सो नर मोहि सपनेहु नहि भावा ।।

श्री रामचन्द्रजी ने तो यहाँ तक कह डाला है कि-

शंकर प्रिय मम द्रोही शिव द्रोही ममदास ।
सो नर करहि कल्प-भर घोर नरक मँह वास ।

मुझसे अत्याचारी राजा भी भयभीत होते हैं, क्योंकि मैं उन्हें चेतावनी देते हुए यह कहती हूँ कि-

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी ।
सो नृप अवसि नरक अधिकारी ।

मेरे अन्दर वे तमाम गुण उपलब्ध हैं जिनका अनुकरण कर व्यक्ति एक आदर्श नागरिक बन सकता है। माता का पुत्र के साथ, पिता का पुत्र के साथ, भाई का भाई के साथ, स्वामी का सेवक के साथ, राजा का प्रजा के साथ, कैसा सम्बन्ध होना चाहिए इन सबका वर्णन मुझमें निहित है ।

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गंगा की करुण गाथा

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • गंगा के प्रदूषित होने के कारण
  • प्रदूषण से बचाने के उपाय
  • उपसंहार।

मैं गंगा हूँ – वही गंगा, जिसे भागीरथ ने स्वर्ग से धरती पर उतारा था और जिसमें सगर पुत्रों का उद्धार किया था। तब से लेकर आज तक मैं लोगों की आस्था तथा श्रद्धा का पात्र हूँ । पृथ्वी पर मेरा जन्म भूगोलवेताओं के अनुसार हिमालय की गोद से हुआ । गंगोत्री से लगभग 15 मील दूर गोमुख से मैं प्रकट होती हूँ । मेरे बारे में यह विश्वास आदिकाल से हो चला आ रहा है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होता। समय बदलने के साथ ही मेरी स्थिति में भी परिवर्तन आया। अब मेरा जल इतना प्रदूषित हो चुका है कि लोग गंगाजल की बजाय ‘मिनरल वाटर’ को अधिक महत्व देने लगे हैं।

आजकल मुझमें न जाने कितने ही प्रकार की गंदगी, दूषित जल और अनेक प्रकार के जहरीले पदार्थ बहा दिए जाते हैं । जैसे-जैसे कल-कारखानों, उद्योगों की संख्या बढ़ती जा रही है, मेरा जल प्रदूषित होता जा रहा है । मेरे तट के पास के कारखानों से टनों-टन कूड़ा-करकट तथा दूषित जल मेरी धारा में प्रतिदिन बहाए जा रहे हैं । जो लोग मुझमें स्नान करने आते हैं, जल को प्रदूषित करने में उनका भी कम योगदान नहीं हैं। वे मेरे जल में साबुन, गंदे कपड़े धोने, जानवरों को नहलाने तथा मरे जानवरों को बहाने के साथ लाश को भी बहा देते हैं। इससे मेरा जल दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होता जा रहा है ।

वैज्ञानिकों की गंभीर चेतावनी के बाद सन् 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी में गंगाजल के शुद्धिकरण की दिशा में लोगों को जागृत करने के लिए कदम उठाए । लेकिन उनकी मृत्यु के कारण कुछ समय के लिए यह कार्यक्रम थम-सा गया। 5 जनवरी, 1985 को राजीव गाँधी के समय में ‘केन्द्रीय गंगा प्रधिकरण’ की स्थापना की गई तथा 292 करोड़ रुपए का एक वृहत् कार्यक्कम बनाया गया । इस संदर्भ में पहला गंगा-शद्धिकरण का पहल कार्य हरिद्वार तथा ॠषिकेश और फिर वाराणसी में हुआ । मेरी शुद्धिकरण के प्रति केवल भारत-सरकार ही नहीं बल्कि कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का भी योगदान है । इसमें मुख्य रूप से नीदरलैण्ड, ब्रिटेन और फ्रांस सहयोगी हैं ।

यदि लोगों तथा सरकार का मेरे प्रति यह सहानुभूतिपूर्ण रवैया रहा तो निश्चय ही मैं अपनी खोई हुई गरिमा को फिर से पाने में सफल हो सकूंगी । लेकिन अपने लाभ के लिए मैं उद्योग-धंधों को भी नष्ट नहीं करना चाहती । ऐसी व्यवस्था की जाय जिससे कारखाने और उद्योग तो बने रहें लेकिन उनसे उत्पन्न प्रदूषण का खात्मा हो जाय । जिस दिन ऐसा होगा, उसी दिन मेरी करुण गाथा का अंत होगा लेकिन क्या कभी ऐसा हो पाएगा ?

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जल संरक्षण

प्रस्वावना :- धरतो पर जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने के लिये जल का संरक्षण और बचाव बहुत जरूरी होता है क्योंकि बिना जल के जीवन संभव नहीं है। पूरे बहाण्ड में एक अपवाद के रुप में धरती पर जीवन चक्र को जारी रखने मे जल मदद करता है क्योंकि धरती इकलौता अकेला ऐसा ग्रह है जहाँ पानी और जीवन दोनों मौनूद है।

जल का संरक्षण :- पानी की जररत हमारे जीवन भर है इसलिये इसको बचाने के लिये केवल हम ही जिम्मेदा है। संयुक्त राष्द्र के संचालन के अनुसार, ऐसा पाया गया है कि राजस्थान में लड़कियाँ स्कूल नहीं जाती है क्योकि उन्द पानी लाने के लिये लंबी दूरी तय करनी पड़ती है जो उनके पूरे दिन को खराब कर देती है इसलिये उन्हें किसी और का के लिये समय नहीं मिलता है। राश्रेय अपराध रिकार्डस्यूरो के सर्वेक्षण के अनुसार, ये रिकाई किया गया है कि लगभा 16,632 किसान (2,369 महिलाएँ) आत्महत्या के द्वारा अपने जीवन को समाप्त कर चुके हैं, हालांकि, 14.4 मामले सूखे के कारण घटित हुए हैं। इसलिये हम कह सकते हैं कि भारत और दूसरे विकासशील देशों में अशिक्षा, आत्महत्या लड़ाई और दूसरे सामाजिक मुद्दो का कारण भी पानी की कमी है। पानी की कमी वाले ऐसे क्षेत्रों में, भविष्य पीढ़ी के बच्हे अपने मूल शिक्षा के अधिकार और खुशी से जीने के अधिकार को प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

भारत के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, पानो की कमी के सभी समस्याओं के बारे में हमें अपने आपको जागरा क रखना चाहिये जिससे हम सभी प्रतिज्ञा ले और जल संरक्षण के लिये एक-साथ आगे आये। ये सही कहा गया है कि सभी लोगों का छोटा प्रयास एक बड़ा परिणाम दे सकता है जैसे कि बूंद-बूंद कर के तालाब, नदी और सागर बन सकता है।

जल को कैसे बचायें :-

रोजाना पानी को कैसे बचा सकते है उसके लिये हमने यहाँ कुछ बिन्दु आपके सामने प्रस्तुत किये हैं:

  • लोगों को अपने बागान या उद्यान में तभी पानी देना चाहिये जब उन्हे इसकी जरुरत हो।
  • कार को धोने के लिये पाइप की जगह बाल्टी और मग का इस्तेमाल करें।
  • हमें फलों और सब्जियों को खुले नल के बजाय भरे हुए पानी के बर्तन में धोना चाहिये।
  • बरसात के पानी को जमा करना शौच, उद्यानों को पानी देने आदि के लिये एक अच्छा उपाय है जिससे स्बच्छ जल को पीने और भोजन पकाने के उद्देश्य के लिये बचाया जा सकता है।
  • फुहारे से नहाने के बजाय बाल्टी और मग का प्रयोग करें।
  • हमें हर इस्तेमाल के बाद अपने नल को ठीक से बंद करना चाहिये।
  • जागरुकता फैलाने के लिये हमें जल संरक्षण से संबंधित कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिये।

निष्कर्ष :- धरती पर जीवन का सबसे जरूरी स्रांत जल है क्योंकि हमें जीवन के सभी कार्यों को निष्पादित करने के लिये जल की आवश्यकता है जैसे पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़ा धोने, फसल पैदा करने आदि के लिये। बिना इसको पद्निषि किये भविष्य की पीढ़ी के लिये जल की उचित आपूर्ति के लिये हमें पानी को बचाने की जरूरत है। हमें पानी की बर्बादी को रोकना चाहिये, जल का उपयोग सही ढंग से करें तथा पानी की गुणवत्ता को बनाए रखें।

WBBSE Class 10 Hindi रचना शैक्षिक निबंध

देशप्रेम

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • देशप्रेम की स्वाभाविकता
  • देश-प्रेम का महत्व
  • उपसंहार।

देशप्रेम वह पुण्य क्षेत्र है, अमल असीम त्याग से विलसित ।
आत्मा के विकास से जिसमें, मानवता होती है विकसित ।।

प्रस्तावना :- मनुष्य जिस देश अथवा समाज में पैदा होता है, उसकी उन्नति में सहयोग देना उसका प्रथम कर्त्रव्य है, अन्यथा उसका जन्म लेना व्यर्थ है। देशप्रेम की भावना ही मनुष्य को बलिदान और त्याग की प्रेरणा देती है । मनुष्य जिस भूमि पर जन्म लेता है, जिसका अन्न खाकर, जल पीकर अपना विकास करता है उसके प्रति प्रेम की भावना का उसके जीवन में सर्वोच्च स्थान होता है । इसी भावना से ओत-प्रोत होकर कहा गया है-

‘जननी जन्मभूमिश्च सवर्गादपि गरीयसी’ (अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।)

देशप्रेम की स्वभाविकता : मनुष्य तथा पशु आदि जीवधारियों की तो बात ही क्या, फूल-पौधों में भी अपने देश के लिए मिटने की चाह होती है । पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने पुष्प के माध्यम से इस अभिलाषा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है-

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृभूमि को शीश चढ़ाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक ।

अपने देश अथवा अपनी जन्मभूमि के प्रति प्रेम होना मनुष्य की एक स्वाभाविक भावना है ।
देश-प्रेम का महत्व :- देश-प्रेम विश्व के सभी आकर्षणों से बढ़कर है । यह एक ऐसा पवित्र तथा सात्विक भाव है जो मनुष्य को लगातार त्याग की प्रेरणा देता है । देश-प्रेम का संबंध मनुष्य की आत्मा से है । मानव की हार्दिक इच्छा रहती है कि उसका जन्म जिस भूमि पर हुआ है, वहीं पर वह मृत्यु को वरण करे । विदेशों में रहते हुए भी व्यक्ति अंत समय में अपनी मातृभूमि का दर्शन करना चाहता है।

देशप्रेम की भावना मनुष्य की उच्चतम भावना है । देश-प्रेम के सामने व्यक्तिगत लाभ का कोई महत्व नहीं है । जिस मनुष्य के मन में देश के प्रति अपार प्रेम और लगाव नहीं है, उस मानव के हृदय को कठोर, पाषाण-खंड कहना ही उपयुक्त होगा । इसीलिए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण के अनुसार –

भरा नहीं है जो भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं ।
हृदय नहीं पत्थर है वह, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।

जो मानव अपने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है तो वह अमर हो जाता है, कितु जो देश-प्रेम तथा मातृभूमि के महत्व को नहीं समझता, वह तो जीवित रहते हुए भी मृतक जैसा है-

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है ।
वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है ।।

केवल राष्ट्र हित में राजनीति करने वाला व्यक्ति ही देश-प्रेमी नहीं है । स्वस्थ व्यक्ति सेना में भर्ती होकर, मजदूर, किसान व अध्यापक अपना कार्य मेहनत, निष्ठा तथा लगन से करके और छात्र अनुशासन में रहकर देश-प्रेम का परिचय दे सकते हैं।

उपसंहार :- प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह अपना सब कुछ अर्पित करके भी देश की रक्षा तथा विकास में सहयोग दें । हम देश में कहीं भी रहें, किसी भी रूप में रहें, अपने कार्य को ईमानदारी से तथा देश के हित को सर्वोपार मानकर करें । आज जब देश अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे समय में प्रत्येक नागरारक का कर्त्तव्य है कि हम अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग करके देश के सम्मान की रक्षा तथा विकास के लिए तन-मन-धन का अर्पित कर दें ।
प्रत्येक नागरिक के लिए छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के ये शब्द आदर्श बन जाएँ –

जिएँ तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे या हर्ष ।
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष ।।

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विद्यार्थी और अनुशासन
अथवा
छात्र जीवन में अनुशासन का महत्व

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • अनुशासन न होने से उत्पन्न समस्या
  • अनुशासन से लाभ
  • विद्यार्थियो के लिये अनुशासन की अनिवार्यता
  • उपसंहार ।

अनु-शासन, इन दो शब्दों के मेल से ‘अनुशासन’ शब्द बना है । इसमें ‘अनु’ उपसर्ग का अर्थ है-पश्चात, बाद में साथ आदि । ‘शासन’ का अर्थ है नियम, विधान, कानून आदि । इस प्रकार दोनों के मेल से बने अनुशासन का सामान्य एवं व्यावहारिक अर्थ यह हुआ कि व्यक्ति जहाँ भी हो, वहाँ के नियमों, उपनियमों तथा कायदे-कानून के अनुसार शिष्ष आचरण करे । एक आदमी अपने घर में अपने छोटों या नौकर-चाकरों के साथ जिस तरह का व्यवहार कर सकता है वैसा घर के बाहर अन्य लोगों के साथ नहीं कर सकता । घर से बाहर समाज का अनुशासन भिन्न होता है ।

इसी तरह दफ्तर में आदमी को एक अलग तरह के माहौल में रहना और वहाँ के नियम-कानूनों का पालन करना होता है। इसी तरह मन्दिर का नियम-अनुशासन अलग होता है, बाजार एवं मेले का अनुशासन अलग हुआ करता है । ठीक इसी तरह एक छात्र जिस विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है, वहाँ उसे एक अलग तरह के माहौल में रहना पड़ता है। वहाँ का अनुशासन भी उपर्युक्त सभी स्थानों से सर्वथा भित्न हुआ करता है । अतः व्यक्ति जिस किसी भी तरह के माहौल मे हो, वहाँ के मान्य नियमों, सिद्धान्तों का पालन करना उसका कर्त्तव्य हो जाता है। इस कर्त्तव्य का निर्वाह करने वाला व्यक्ति ही अनुशासित एवं अनुशासनप्रिय कहलाता है ।

सन् 1974 ई० की समग्रक्रांति के प्रणेता जयप्रकाश नारायण तथा आपातकाल विरोधी आंदोलन के नेताओं ने शासन के विरुद्ध विद्यार्थी वर्ग का खुलकर प्रयोग किया। विरोधी आंदोलनों के परिणामस्वरूप मई, सन् 1977 ई० के बाद तो अनुशासनहीनता चारों ओर फैलती जा रही है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात आपातकाल से पहले तक का समय ऐसा था जब स्कूल-कॉलेजों में अनुशासन का पूर्ण रूप से पालन कर छात्रों में गुरुजनों के प्रति श्रद्धा का भाव था। वे निर्यमित रूप से एकाग्रचित होकर अध्ययन करते थे । अब तो छात्र आये दिन कोई न कोई उपद्रव खड़ा करते रहते है ।

अनुशासन तोड़ने पर शारीरिक दण्ड देना कानूनी अपराध है। तब विद्यार्थी को किस तरह डराकर रखा जाये ? तुलसीदास जी ने कहा है, ‘भय बिनु होय न प्रीति।’ जब भय नहीं तो विद्रोह होना स्वाभाविक है।

आज के स्वार्थपूर्ण, अस्वस्थ वातावरण में विद्यार्थियों को शांत और नियम में रहना अस्वाभाविक जान पड़ता है। अस्वस्थ प्रवृत्ति के विरुद्ध विद्रोह उसकी जागरूकता का परिचायक है। जिस प्रकार अग्नि, जल और अणुशक्ति का रचनात्मक तथा विध्वंसात्मक दोनों रूपों में प्रयोग सम्भव है, उसी प्रकार युवा- शक्ति का उपयोग भी ध्वंसात्मक और रचनात्मक दोनों रूपों में किया जा सकता है। युवा-शक्ति का रचनात्मक उपयोग ही राष्ट्र-हित में वांछनीय है । यह तभी सम्भव है जब शिक्षक की भूमिका गरिमापूर्ण हो तथा राजनीति को शिक्षा से दूर रखा जाये।

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शिक्षक दिवस

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • डा० सर्वप्त्नी राधाकृष्णन के जन्मोस्सब के रूप में
  • उपसंहार।

डॉ० सर्वपल्ती राधाकृष्णन पसिद्ध दार्शनिक, शिक्षा-शाखी एवं संस्कृत विधय के प्रकाण्ड विद्वान थे। सन् 1962 से 1967 ई. तक वे भारत के राश्रपति भौ रहे । राश्पति पद पर मतिष्डत होने से पहले वे शिक्षा जगत् से जुडेे हुए थे। मे दर्शनशाख के प्रोफेसर पद को अलकृत किया । सन् 1936 ई० से सन् 1939 ई. तक आवसफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वों टेशों के भर्म और दर्शन के स्पालिंडन प्रोफेसर पद को सम्मानित किया। सन् 1939 से सन् 1948 हं. तक काशी हिन्दू निश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। राप्रपति बनने के बाद इनके प्रशंसकों ने दनका जन्मदिन सार्वजनिक रूप से मनाना चाहा तो इन्होने जीवनपर्यन्त ख्यय शिक्षक रहने के कारण पाँच सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा गक्त की । तब से हर वर्ष पाँच सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

शिक्षकों को गरिमा प्रदान करने का दिन है – शिक्षक दिवस। शिक्षक राप्र के निर्माता और राप्र संस्कृति के संरक्षक Aी अध्वापक का पर्यायवाची शब्द गुरू है। उपनियद के अनुसार गु अर्थात् अंधकार और रू का अर्थ है निरोधक। अंकार का निरोध करने वाला गुरू कहा जाता है। वे शिक्षा द्वारा बालको के मन में सुसंस्कार डालते हैं तथा उनके अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर देश का अच्छा नागरिक वनाने का प्रयास करते है। राप्र के सम्पूर्ण विकास में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षक का कार्यक्षेत्र विस्तृत है। किन्तु यह दिवस प्राधमिक, माष्यमिक, उच्च तथा वरिष्ठ याध्यमिक शिक्षण संस्थाओं तक ही सीमित है।

पत्येक प्रादेशिक सरकार अपने स्तर पर शिक्षण के प्रति समर्षित और विद्यार्थियों के प्रति मेम रखने वाले शिक्षकों की सची तैदार करती है। ऐसे वरिष्ठ और योग्य शिक्षकों को मंत्रालय द्वारा 5 सितम्बर को सम्मानित किया जाता है

शिक्षक ज्ञान की कुंजी होते हैं। उनके प्रति सम्मान मदर्शिंत करने के लिये शिक्षक दिवस का अपना महत्व है। मगर आज शिक्षकों तथा छातो का रूप बदल गया है। आज शिक्षको का लक्ष्य सही दिशा और ज्ञान देने की अपेक्षा धन कमाना हो गया है। छात्र भी शिक्षक के महत्व को नहीं समझते । उनके हंदय में शिक्षक के प्रति श्रद्धा का भाव न रहकर, उन्हे उपहार देकर अपने नम्बर बढ़बाने की लालसा रखते हैं।

जिस मूल-भाव या उद्देश्य के लिये शिक्षक दिवस मनाया जाता है, वर्तमान समय में वह उद्देश्य लुप्त हो गया है। अब शिश्षक दिवस मनाने की औपचारिकता हो शेप बची है ।

यही वजह है कि आज शिक्षा का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। शिक्षा मात्र व्यवसाय बन कर रह गई है। शिक्षा का मुख्य उद्वेश्य शिक्षक और छात्र भूलते जा रहे हैं। आज शिक्षक को सम्मानित करना राजनीतिक दावपेंच के अतर्गत आ गया है। इसी वजह से अच्छे और अनुकरणीय शिक्षक इस सम्मान से वंचित रह जाते हैं। यदि शासकीय प्रशासन, निपक्ष भाव से योग्य शिक्षकों को ही सम्मानित करे और उन्हें पघ्यश्री जैसे अलंकारों से विभूषित करे तो शिक्षक दिवस की गरिमा बनी रह सकती है।

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हिन्दी दिवस

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • हिन्दी के अस्तित्व की सुरक्षा
  • हिन्दी की समद्धि
  • उपसंहार।

देश आजाद होने के पश्चात् संविधान सभा ने 14 सितम्बर, सन् 1949 ई० को हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया। संविधान के अनुच्छेद 343 में लिखा गया –
‘संघ की सरकारी भाषा देवनागरी लिषि हिन्दी होगी और संघ के सरकारी प्रयोजनों के लिये भारतीय अंकों का अतर्राध्रीय रूप होगा । अधिनियम के खण्ड दोमें लिखा गया कि इस संविधान के लागू होने के समय से 15 वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिये अंग्रेजी का प्रयोग सहायक भाषा के रूप में होता रहेगा। अनुच्छेद (ख) धारा तीन में व्यवस्था दी गई कि संसद उक्त पंद्रह वर्ष की कालावधि के पश्चात् विधि द्वारा अंग्रेजी भाषा का (अथवा) अंकों के देवनागरी रूप का ऐसे प्रयोजन के लिये प्रयोग उपबन्धित कर सकेगी जैसे की ऐसी विधि में उल्लेखित हो।

इसके साथ ही अनुच्छेद एक के अधीन संसद् की कार्यवाही हिन्दी अथवा अंग्रेजी में सम्पन्न होगी। 26 जनवरी, सन् 1965 ई० के बाद संसद की कार्यवाही केवल हिन्दी में ही निष्पादित होगी, बशर्ते संसद कानून बनाकर कोई अन्य व्यवस्था न करे।”

14 सितम्बर हिन्दी दिवस, हिन्दी के राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने का गौरवपूर्ण दिन है। हिन्दी दिवस, एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी के प्रचार के लिए प्रदर्शनी, गोष्ठी, मेला, सम्मेलन तथा समारोहों का आयोजन किया जाता है। यह दिन हिन्दी की सेवा करने वालों को पुरस्कृत करने का दिन है। सरकारी, अर्द्धसरकारी कार्यालयों तथा बड़े उद्योगिक क्षेत्रों में हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा के रूप में मनाकर हिन्दी के प्रति प्रेम प्रकट किया जाता है।

भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में हिन्दी जैसी लोकभाषा की उपेक्षा का अर्थ है लोकभावना की उपेक्षा । लोकभावना की उपेक्षा करके कोई लोकतन्त्र कैसे और कब तक टिक सकता है ? पिछले ढाई सौ वर्षों में भारत की तीन प्रतिशत आबादी भी अंग्रेजी नहीं सीख पाई। यदि अंग्रेजी सिखाई नहीं जा सकी तो क्या अंग्रेजी लादी जाती रहेगी ? यह कैसी विडम्बना है कि केवल दो प्रतिशत अंग्रेजीपरस्त लोग देश की 98 प्रतिशत जनता पर अपना भाषाई आधिपत्य जमाए हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है ।

हिन्दी के प्रति उनकी जो वचनबद्धता थी वे आज उसे भूल गये हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाकर भी हिन्दी का अपमान किया गया। अंग्रेजी सहायक भाषा होकर भी उन्नति, प्रगति और समृद्धि का सोपान बन गई। अंग्रेजी को आधुनिक जीवन के लिये अनिवार्य माना जाने लगा। आज तो स्कूल-कॉलेज सभी कुकुरमुत्ते की भाँति अंग्रेजी-माध्यम में बदलते जा रहे हैं। अंग्रेजी का प्रयोग न करने वाला पिछड़ा कहलाता है। हिन्दी बोलने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। अंग्रेजी बोलने वालों को हर क्षेत्र में वरीयता दी जाती है।

हिन्दी के चापलूस, स्वार्थी और भ्रष्ट अधिकारियों ने हिन्दी के विकास और समृद्धि के नाम पर अदूरदर्शिता और विवेकहीनता का परिचय दिया है। राजकीय कोष से हर वर्ष करोड़ों रुपये हिन्दी का उपकार करने के लिए खर्च किये जाते हैं, लेकिन यह सब केवल दिखावा है ।

परिणामस्वरूप हिन्दी समृद्धशाली होने के बावजूद अपने ही घर में अपने ही लोगों द्वारा हेय दृष्टि से देखी जा रही है। हिंदी भाषी बुद्धिजीवी तथा हिन्दी समर्थक अपने स्वार्थपूर्ति के चक्कर में हिन्दी के प्रति अपनी आवाज ठीक ढंग से नहीं उठाते। भारतेंदु आदि मनीषियों ने जो सपना देखा था वह साकार नहीं हो सका –

अपने ही घर में हो रहा अपमान हिंदी का,
पैरों तले रौंदा रहा सम्मान हिंदी का ।

हिन्दी-भाषी बुद्धिजीवी हिन्दी के पक्ष में लच्छेदार भाषण तो देते हैं, मगर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिये सक्रिय रूप से कोई कार्य नहीं करते। परिणामस्वरूप बृहत रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषा होकर भी इसे वह सम्मान प्राप्त नहीं हुआ, जिसकी वह अधिकारिणी थी। राष्ट्रभाषा हिन्दी होने के बावजूद सरकारी कार्य अभी भी अंग्रेजी में होते हैं। हिन्दी में पत्र-व्यवहार तो एक प्रकार से खत्म हो गया है। आज हिन्दी की पत्र-पत्रिकायें धन तथा पाठकों के अभाव में बंद होती जा रही हैं। आजादी के पहले जितनी पत्र-पत्रिकायें निकलती थीं उनकी तुलना में आज पत्र-पत्रिकाओं की संख्या नगण्य है।

अत: हिन्दी दिवस सिर्फ एक दिखावे का पर्व बनकर रह गया है। यह आवश्यक है कि हम हिंदी के प्रति प्रेम प्रकट करें तथा हिंदी के विकास के लिये पूर्ण रूप से अपना योगदान करें । भारतवासियों को यह शपथ लेनी होगी कि स्वतंत्रता के पृर्व हिन्दी को जो आश्वासन दिया गया था, उसे सच्चे अर्थों में पूरा करेंगे और इस बात का ध्यान रखेंगे कि उसकी सहायक भाषा बनकर कोई उसे निगल न ले। ऐसा करके ही हम सच्चे अर्थों में हिन्दी दिवस मना सकेंगे और हिन्दी के प्रति अपनी निष्ठा और श्रद्धा व्यक्त कर सकेंगे । यह निश्चित है कि हिन्दी भाषा की ज्वलंत प्राण-शक्ति सारे विरोधों को अनायास काट देगी और भारत-भारती के रूप में प्रतिष्ठित होगी । गोपाल सिंह ‘नेपाली’ के शब्दों में –

इस भाषा में हर मीरा को मोहन की माला जपने दो ।
हिन्दी है भारत की बोली तो अपने-आप पनपने दो ।

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जीवन में खेल का महत्व
अथवा
खेल जीवन की महत्वपूर्ण अंग है

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • खेल-कूद का जीवन में महत्व
  • खेल-कूद मनोरंजन का भी उत्कृष्ट साधन है
  • उपसंहार ।

मानव-जीवन परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ उपहार है और खेल जीवन के रस-प्राण है। खेल के बिना जीवन जड़ है। खेलमय जीवन में ही जागृति और उत्थान है। जैनेंद्र जी कहते हैं – “जीवन दायित्व का खेल है और खेल में जीवन दायित्व की प्राण-संजीवनी शक्ति है।”

वैदिक काल से ही मनुष्य की इच्छा रही है कि मेरा शरीर पत्थर के समान मजबूत हो और दिनोंदिन वह फूले-फले। इस इच्छा की पूर्ति निरोगी काया द्वारा हो सकती है जिसके लिये जरूरी है खेल।

गतिशीलता जीवन का लक्षण है और गतिशीलता निर्भर करती है स्वस्थ शरीर पर। जीवन भोग का कोश है। इंद्रियजनित इच्छा और सुख की तृप्ति के लिए चाहिए शक्ति। शक्ति के लिए जरूरी है आत्मविश्वास। आत्मविश्वास खेल द्वारा बढ़ता है। खेलों के कई रूप हैं, मनोविनोद तथा मनोविज्ञान के खेल और धनोपार्जन कराने वाले खेल। मनोरंजन वाले खेलों में हैं – ताश, शतरंज, कैरम, जादुई-करिश्मे आदि। व्यायाम के खंलों में हैं – एथेलेटिक्स, कुश्ती, निशानेबाजी, घूँसेबाजी, घुड़दौड़, साइक्लिंग, जूडो, तीरंदाजी, हॉंकी, वालीबॉल, फुटबॉल, टेनिस, क्रिकेट, कबड्डी, खा-खो आदि ।

धनोपार्जन के खेलों में सर्कस, जादू के खेल तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले खेल आते हैं। मनोरंजन के खेल मानसिक व्यायाम के साधन हैं। खेल मानसिक थकावट दूर कर जीवन में नवस्कूर्ति भर देता है । खेल-कूद से मनुष्य में पूरी तन्मयता से काम करने की भावना जागृत होती है। जब कोई खेलता है तो वह जीतने के लिये अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग करता है। इससे जीवन में किसी भी काम को करने के लिये खिलाड़ी प्रवृत्ति से काम करने का स्वभाव विकसित होता है।

खेल मनुष्य में सहनशीलता की भावना उत्पन्न करता है। खेलते वक्त लगी चांट उसे प्रतिशोध लेने की बजाय पीड़ा सहने की शक्ति देती है।

खेलने से व्यक्ति जीवन के संघर्ष में सफलता की शिक्षा भी पाता है। खेल में वह अपनी बुद्धि तथा शरीर से संघर्ष करता हुआ विजय प्राप्त करता है। यही स्वभाव उसको जीवन के संघर्षों में निर्भय होकर लड़ने तथा विजय पाने की शक्ति प्रदान करता है।

नैपोलियन को हराने वाले अंग्रेज नेल्सन ने कहा था – The war of waterloo was won in the fields of Eton, तात्पर्य यह है कि मैंने वाटरलू के युद्ध में जो सफलता पाई है उसका प्रशिक्षण ईटन के खेल के मैदान में मिला था।

अत: हम कह सकते हैं कि खेल के माध्यम से हम जीवन के सभी मूल्यों को प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त करते हैं। खेल नैतिकता का पाठ पढ़ाता है और शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ बनाता है। इसलिए जीवन में खेल का महत्वपूर्ण स्थान है। प्राय: कहा जाता है :-
“तेज होते हैं, पहिए तेल से, तेज होते हैं, बच्चे खेल से ।”

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मेरा प्रिय खेल

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • किकेट खेल का प्रारम्भ
  • किकेट खेल की विधि
  • भारत में किकेट
  • उपसंहार।

मानव-जीवन में खेल का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हमारे देश में अनेक प्रकार के खेल है। हॉकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, टेनिस, शतरंज, टेबल टेनिस, गोल्फ, पोलो, बिलियर्ड, क्रिकेट आदि। ये सारे खेल विश्व-भर में खेले जाते हैं। इन सारे खेलों में मेरा प्रिय खेल है क्रिकेट।

क्रिकेट और हॉकी वर्तमान समय में सबका प्रिय खेल है। इनके मैचों का सीधा प्रसारण दूरदर्शन पर भी दिखाया जाता है। क्रिकेट बैट, बॉल और स्टम्प का खेल है।

क्रिकेट के लिए मैदान चाहिए। खेल सीधा और आसान होने के बावजूद परिश्रम से भरा हुआ है। खेल के मैदान के बीचो-बीच चौकोर रेखा खींची जाती है, जिसके दोनों किनारों पर तीन-तीन स्टम्प लगाए जाते हैं और उनके ऊपर दो गिल्लियाँ रखी जाती हैं। दोनों दलों में 11-11 खिलाड़ी होते हैं। खेल आरम्भ करने के पहले टॉस होता है और जो टीम ठोस जीतती है वह अपनी इच्छानुसार गेंद फेंकना या बैटिंग चुनती है। खेल के नियमों को ध्यान में रखते हुए निर्णय देने के लिए अम्पायर की जरूरत होती है। जो आउट, नो बॉल, वाइड बॉल आदि का निर्णय देता है।

खेल प्रारम्भ होने पर बैटिंग करने वाले दल के दो खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं। वे पैड, हेलमेट, ग्लब्ज, बैट आदि लेकर आते हैं और दूसरी टीम के सभी खिलाड़ी बोलिंग और फिल्डिंग के लिए मैदान में उतरते हैं। बैटिंग करने वाले खिलाड़ी के पीछे एक खिलाड़ी विकेट-कीपर की हैसियत से खड़ा होता है। फिल्डिंग के लिए अन्य खिलाड़ी मैदान में चारों तरफ बिखर जाते हैं। उनमें से एक खिलाड़ी बॉलिंग करता है। गेंदबाजी क्रमानुसार टीम के अच्छे गेंदबाजों द्वारा बारी-बारी से की जाती है। खेल के लिए ओवर निश्चित होते हैं। उन ओवरों में जितनी गेदे फेंकी जाती हैं उनमें अधिक से अधिक रन बनाने की कोशिश की जाती है और दूसरी टीम, जो गेंदबाजी करती है उसे अधिक रन बनाकर मैच जीतना होता है।

क्रिकेट का आनंद ही कुछ अलग है। दर्शकों की नजर एक-एक गेंद पर होती है। हर चौके-छक्के पर लोग उछल पड़ते हैं। क्रिकेट का मौसम आने पर, मैं अपने दोस्तों के साथ मैदान में क्रिकेट खेलने जाता हूँ। भारत का जब भी मैच होता है, मैं सब काम छोड़कर मैच देखने लगता हूँ।

क्रिकेट देखते समय जब भारतीय टीम को हारते देखता हूँ तो मुझे बड़ा गुस्सा आता है और मन करता है कि मैं मैदान में उतर कर चौके-छक्के की बरसात कर दूँ।

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समाचार-पत्र की आत्मकथा

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • ज्ञानवर्धन
  • मनोरंजन
  • समाचार-पत्रों का दायित्व।
  • उपसंहार।

मैं समाचार-पत्र हूँ । मेरा आरम्भ सोलहवीं शताब्दी में चीन में हुआ था। ‘पीकिंग-गजट’ विश्व का पहला समाचार पत्र था । भारत का पहला समाचार-पत्र इण्डिया-गजट था जो अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था। हिन्दी का सबसे पहला समाचार-पत्र उदंत-मार्तड था, जो सन् 1826 ई० में कोलकाता में प्रकाशित हुआ था । अब तो विश्वभर में मैं छप रहा हूँ । केवल भारतवर्ष में ही लगभग 2,400 दैनिक समाचार-पत्र तथा 400 साप्ताहिक पत्र प्रकाशित होते हैं ।

आधुनिक समय में शिक्षा का उद्देश्य बदल गया है। पहले शिक्षा का जो स्वरूप था, आज की शिक्षा उससे बिल्कुल भिन्न है। आज केवल किताबी ज्ञान हासिल कर डिग्री प्राप्त करना ही जीवन का उद्देश्य बन गया है।

विनोबा भावे जी ने ‘जीवन और शिक्षण’ नामक निबंध में शिक्षा के मुख्य उद्देश्य पर व्यापक प्रकाश डाला है और आज की शिक्षण-प्रणाली की विकृतियों को उद्घाटित किया है।

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यावहारिक ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ जीवन जीने की कला की प्राप्ति करना भी है । किन्तु आज स्कूलों, कॉलेजों में केवल किताबी शिक्षा दी जाती है। बच्चे जब उस शिक्षा को प्राप्त कर जगत में निकलते है तब उन्हे सारी शिक्षा बेमानी लगती है।

अधिकतर बच्चों के लिये शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना रह गया है। इसी कारण वे न तो किताबी ज्ञान पूर्ण रूप से प्राप्त कर पाते हैं और न ही जगत् का व्यावहारिक ज्ञान हासिल कर पाते हैं। वास्तव में सरकार द्वारा अपनायी जाने वाली शिक्षा-पद्धति ही उचित नहीं है।

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शिक्षा और व्यवसाय
अथवा,
आधुनिक शिक्षाप्रणाली

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • आधुनिक शिक्षा का आरम्भ
  • दोष
  • शिक्षा की आवश्यकता
  • लाभ
  • सुधार
  • उपसंहार।

शिक्षा और व्यवसाय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा के बिना जीविकोपार्जन सम्भव नहीं है, व्यवसाय के ब्रिना शिक्षा बेकार है। अतः शिक्षा और व्यवसाय मानवीय प्रग्गति के सम्बल हैं।
प्राचीन युग में शिक्षा का अर्थ ज्ञानार्जन करना था। उस समय शिक्षा धनोपार्जन का माध्यम नहीं थी।
समय-परिवर्तन के साथ भारतीय जनता में अंग्रेजी के साथ-साथ आधुनिक विषय जैसे विज्ञान, वाणिज्य-शास्ख, अर्थशास्त्र आदि सीखने का प्रचलन चला। वर्तमान शिक्षा प्रणाली का इतिहास बहुत पुराना है। जब भारत पराधीन था, विदेशी शासकों ने अपने स्वार्थ के लिये अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति को भारत में प्रचालत किया था।मैकाले इसक प्रवर्तक थे। यह शिक्षा नीति भारतीय संस्कृति, परम्परा एवं राष्ट्रीय जीवन के विपरीत थी।

पिछले कुछ वर्षों में समाज की मान्यताओं, मूल्यों, आवश्यकताओं, समस्याओं और विचारधाराओं में बहुत परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों के साथ समाज का सामंजस्य होना आवश्यक है। इन परिवर्तनों के अनुरूप शिक्षा के स्वरूप, प्रणाली और व्यवस्था में परिवर्तन आया है। अब शिक्षा व्यवस्था को अधिक उपयोगी, व्यावहारिक तथा जीविकोपार्जन का माध्यम बनाया जा रहा है ।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली की महत्वपूर्ण देन है – बाबू संस्कृति अर्थात् कुसीं पर बैठकर काम करने की प्रवृत्ति और नागरिक संस्कृति अर्थात नगरों तथा महानगरों में रहकर ही काम करने की प्रवृत्ति। परिणामस्वरूप नगरों में जहाँ तेजी से बेकारी बढ़ी है वहीं गाँव का विकास उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा है।

व्यावसायिक शिक्षा व्यक्ति को सामाजिकता से परिचित कराती है। शिक्षा रोजगार पैदा नहीं करेगी, वह तों व्यक्ति को रोजगार प्राप्त करने में सहायता पहुँचाती है। व्यावसायिक शिक्षा से व्यक्ति का दृष्टिकोण व्यापक बनेगा।

व्यावसायिक शिक्षा की दृष्टि से देश में आई.आई.टी, तकनीकी शिक्षा, औद्यांगक प्रशिक्षण केंद्र, कृषि विश्शावद्यालयो तथा वैज्ञानिक संस्थानों का जाल बिछ गया है। व्यावसायिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये देश भर में कई स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को लागू किया गया है, ताकि अधिक से अधिक संख्या में छात्रों कां इसका लाभदायक फल मिल सके। देश में व्यावसायिक शिक्षा कार्यक्रम को तकनीकी और शैक्षणिक सहायता प्राप्त कराने के लिये जुलाई, सन् 1993 ई० में भोपाल में केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान की स्थापना की गई है।

किन्तु इन सारे पाठ्यक्रमों और शिक्षा-विधियों ने छात्रों पर अत्यधिक बोझ लाद दिया है। सभी विषयों के अधकचरे ज्ञान ने उसे रटंत-तोता बनाकर छोड़ दिया है।

व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् भी, प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होना छात्रों के लिये अति आवश्यक हो गया है। इन परीक्षाओं को पास करने के पश्चात् नौकरी न मिलना और अर्थाभाव की वजह से निजी व्यवसाय न कर पाने से युवाओं में कुण्ठा और निराशा का भाव भरता जा रहा है।

शिक्षा-प्रवेश की भेदभावपूर्ण नीति ने उच्च तकनीकी तथा वैज्ञानिक शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े वर्गों के लिए आसन सुरक्षित कर दिया है, इसी कारण योग्य छात्र बाहर की धूल फाँकने को मजबूर हो जाता है।

देश में बढ़ती बेरोजगारी, युवाओं में पनपती दुष्मवृत्तियाँ तथा असामाजिक कार्यों की तरफ झुकाव, देश को अराजकता की तरफ धकेल रहा है। हमारी शिक्षा का व्यवसाय के साथ सामंजस्य और संतुलन होना चाहिए और शिक्षा जीविकाकेन्द्रित होनी चाहिए ।

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राष्ट्र-निर्माण में युवा पीढ़ी का सहयोग

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • युवा पीढ़ी का कर्तव्य
  • युवा पीढ़ी का योगदान
  • उपसंहार ।

राष्र्र-निर्माण में युवा पीढ़ी का सहयोग राष्ट्र के प्रति उसके दायित्व की अनुभूति का ज्वलंत प्रमाण है। यही उसकी राष्ट्रवंदना, और राष्ट्र-पूजा है। यह सहयोग उसके राष्ट्र-प्रेम, देशभक्ति तथा मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को प्रकट करता है। राष्ट्र का प्रत्येक महान् कार्य युवकों के सहयोग के बिना अधूरा ही रह जाता है। निर्माण सदैव बलिदानों पर आधारित होता है। बलिदान की भावना युवा पीढ़ी में बलवती होती है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुखदेव, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, बिस्मिल जैसे सहस्तों युवकों ने राष्ट्र-निर्माण के लिये अपना जीवन बलिदान कर दिया। गांधीजी के नेतृत्व में लाखों नौजवानों ने स्वतंत्रता की लड़ाई में भागीदारी की। अपने जीवन को जेलों में सड़ाया, लेकिन स्वतंग्रता की माँग नहीं छोड़ी। इन्हीं वीरों को याद करते हुए दिनकर जी ने कहा था –

जो अगणित लघु दीप हमारे।
तूफानों में एवन विन्नारे ।
जल-जलकर बुझ गये किसी दिन।
माँगा नहीं स्ने मुँह खोल।
कलम आज उनकी जय बोल।

इसी प्रकार सन् 1974 ई० में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया, तब लाखों युवकों ने इंदिरा गाँधी की तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाई और जेल गये। युवा-देशभक्तों का राष्ट्र-निर्माण के विविध क्षेत्रों में सहयोग सदा स्मरणीय रहेगा।

युवा पीढ़ी समाचार-पत्रों के माध्यम से समय-समय पर अपने उच्च विचारों को अभिव्यक्ति देकर जन-जागरण का शंखनाद कर सकती है और देश की वैचारिक सम्पदा की अभिवृद्धि कर सकती है।

आज देश बढ़ती हुई जनसंख्या से परेशान है। देश के युवा वर्ग परिवार-नियोजन द्वारा देश की इस समस्या को कम कर सकते हैं।

दहेज की कुप्रथा की वजह से कई लड़कियों को अपनी जान गँवानी पड़ती है। अत: युवा पीढ़ी को देश की इस कुप्रथा को दूर करने के लिये बिना दहेज विवाह करने का प्रण लेना चाहिए ताकि देश की कुरीतियों का अंत हो सके और देश स्वस्थ, स्वच्छ और सुंदर बन सके ।

देश के प्रौढ़ व वयोवृद्ध वर्ग का यह नैतिक दायित्व है कि वह युवाओं का सही मार्गदर्शन करें। उनके सुखद जीवनयापन की अपेक्षित सुविधायें जुटायें और उनके भविष्य निर्माण के लिये सच्चे दिल से प्रयास करें। आज धर्म-गुरु व राजनीतिक नेता युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने में सबसे आगे हैं । अतः सामान्य जन को इस दिशा में गम्भीरता से सोचना चाहिये और युवा वर्ग के प्रति सामाजिक दायित्व का परिपालन करना चाहिये ।

भारतीय समाज अनेक पाखण्डों और कुप्रथाओं से ग्रस्त है। नई पीढ़ी इन कुप्रथाओं को दूर करने की प्रतिज्ञा कर ले तो देश को ऊँच-नीच के भेदभाव, नारी-शोषण, यौन-उत्पीड़न और बलात्कार के संकट से मुक्त किया जा सकता है। चोरी, छीना-झपटी, अपहरण, हत्या, पाखण्ड और अंधविश्वास से देश को मुक्ति दिलाई जा सकती है ।

गरीबों, बाल मजदूरों जैसे निरक्षर लोगों को साक्षर बनाकर युवा पीढ़ी देश में जागृति और नई चेतना का भाव भर सकते हैं।

आज युवा पीढ़ी का एक अंश आक्रोश, आंदोलन और हड़ताल द्वारा राष्ट्र को क्षति पहुँचा रही है। अत: युवाओं को ऐसे कार्यों से बचना चाहिये और अपने रचनात्मक कार्यों से राष्ट्र की उन्नति में सक्रिय योगदान करना चाहिये । जैनेंद्र जी ने कहा था “‘युवकों का उत्साह ताप बन कर न रह जाये, यदि उसमें तप भी मिल जाये तो और अधिक निर्माणकारी हो सकता है ।”

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विश्व पर्यावरण दिवस

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • अनेकानेक उद्योग-धन्धों के कारण
  • पर्यावरण को बचाने के उपाय
  • उपसंहार।

पूरे विश्व में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने और समस्या के समाधान के लिये हर वर्ष पाँच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य संस्थाओं द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण गोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं, जिसमें पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिये सुझाव प्रस्तुत किये जाते हैं।

पर्यावरण प्रदूषण से मानव अस्तित्व पर संकट आ गया है। औद्योगीकरण और नगरीकरण की वजह से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। कारण यह है कि विकास के लिये घने-घने वन-उपवन उजाड़ दिये गये हैं जिससे प्राकृतिक सम्पदा ही नहीं, पूरा वायुमण्डल प्रदूषित हो गया है।

भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण भी वनों को नष्ट किया जा रहा है। परिणामत: चट्टानों का खिसकना, भूमिकटाव से ग्रामों के अस्तित्व का लोप होना, अनियंत्रित वर्षा, सूखा, बाढ़ और निरंतर तापमान में वृद्धि हो रही है।

आज देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 1,880 लाख हेक्टेयर हिस्सा भू-क्षरण का शिकार है । सन् 1977 ई० के बाद आज तक खतरनाक भू-क्षरण वाले क्षेत्रों का विस्तार दुगुना हो गया है। जंगलों को काट कर समतल बनाया जा रहा है, जिसका परिणाम यह हुआ कि आपूर्ति क्षमता की तुलना में जलावन के लिये लकड़ी की माँक्ष गुना अधिक हो गयी है।

प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ करने का परिणाम यह है कि जीवन के लिये अति आवश्यक वस्तु, हवा भी जहरीली हो गई है। महानगरों में चलने वाले परिवहन के अनेक साधन दिन-प्रतिदिन वायु को और अधिक दूषित करते जा रहे हैं । औद्योगिक कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ तथा राख भी वायु को अत्यधिक प्रदूषित कर रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा लगाये गए अनुमान के अनुसार विश्व के लगभग आधे शहरों में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा हानिकारक स्तर तक पहुँच गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रदूषित जल से होने वाले निम्नलिखित रोग बतलाये हैं – हैजा, डायरिया, टायफाईड, पालियोमाईटिस, राउण्डवर्म, फाईलेरिया, मलेरिया, डेंगू फीवर आदि।

कभी बाढ़, कभी सूखा तथा तरह-तरह की बीमारियों की वजह यही पर्यावरण प्रदूषण है। अतः प्रकृति को प्रदूषण से बचाने के लिये पर्यावरण दिवस के दिन सबको प्रकृति की रक्षा करने का संदेश दिया जाता है तथा हर व्यक्ति से अपील की जाती है कि वह कम से कम एक पौधा अवश्य लगाये । वृक्षारोपण इस समस्या का मुख्य समाधान है।

हमें चाहिए कि गंदगी तथा जल-जमाव करके बीमारियों को जन्म न दें। वातावरण को स्वच्छ तथा साफ-सुथरा रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है। अत: पर्यावरण की सुरक्षा सभी को करनी चाहिए, ताकि मानव-जाति को नष्ट होने से बचाया जा सके । विश्व पर्यावरण दिवस हमें इसी जिम्मेदारी की याद दिलाता है ।

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विद्यार्थी-जीवन

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • विद्यार्थी जीवन की स्थिति
  • विद्यार्थी जीवन में ज्ञानार्जन, विद्या तथा चरिज्र का महत्व
  • विद्यार्थी के आवश्यक गुण
  • प्राचीन विद्यार्थी और आधुनिक विद्यार्थी
  • विद्यार्थी के कर्त्तव्य
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- विद्यार्थी ही देश के भावी कर्णधार हैं । विद्यार्थी-जीवन, मानव-जीवन का सबसे अधिक महत्वपूर्ण काल है । जन्म के समय बालक अबोध होता है । शिक्षा के द्वारा उसके जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है, उसकी बुद्धि विकसित की जाती है । जिस काल में वह पूर्ण मनोयोग से विद्याध्ययन करता है, उस काल को विद्यार्थी-जीवन कहते हैं ।

विद्यार्थी-जीवन की स्थिति :- विद्यार्थी-जीवन, मानव-जीवन का सर्वश्रेष्ठ काल है । इस काल में मनुष्य जो कुछ सीखता है वह आजन्म उसके काम आता है। विद्यार्थी-जीवन मानव के जीवन की ऐसी विशिष्ट अवस्था है, जिसमें उसे सही दिशा का बोध होता है । इसी कारण, इस काल को अत्यंत सावधानी से व्यतीत करना चाहिए ।

विद्यार्थी-जीवन में ज्ञानार्जन, विद्या तथा चरित्र का महतव :-विद्यार्थी का उद्देश्य केवल विद्या प्राप्त करना नहीं होता अपितु ज्ञान की वृद्धि, शारीरिक-मानसिक विकास एवं चारित्रिक सदगुणों की वृद्धि भी उसका लक्ष्य होता है । विद्याध्ययन का काल ही वह काल है जिसमें सहयोग, प्रेम, सत्यभाषण, सहानुभूति, साहस आदि गुणों का विकास किया जाता है । अनुशासन, शिष्टाचार आदि प्रवृत्तियाँ भी इसी समय जन्म लेती हैं।

विद्यार्थी-जीवन में विद्या के साथ ही चारित्रिक विकास का भी महत्वपूर्ण स्थान है । वरित्रहीन व्यक्ति अपने जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता । चरित्र के द्वारा ही विद्यार्थी में अनेक सद्गुणों का विकास होता है, अतः विद्यार्थी-जीवन मे चरित्र-निर्माण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया जाता है ।

विद्यार्थी के आवश्यक गुण :-प्राचीनकाल में आचार्यो ने विद्यार्थी के लिए आवश्यक गुणों की चर्चा इस प्रकार की है काकचेष्टा

वकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च ।
अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम् ।।

विद्यार्थी का प्रमुख कार्य विद्या का अध्ययन है । उसे श्रेष्ठ विद्या प्राप्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए । अपने से छोटे अथवा किसी भी वर्ग के पास यदि अच्छी विद्या है तो उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।

प्राचीन विद्यार्थी और आधुनिक विद्यार्थी :- प्राचीन काल में छात्र नगर के जीवन से दूर पविन्र आश्रमों में गुरू के संरक्षण में शिक्षा ग्रहण करता था। वह सादा जीवन बिताकर, गुरू की इच्छा से कार्य करता था। वह विद्वान, तपस्वी, योगी तथा सदाचारी होता था। उसके विचार उच्चकोटि के होते थे । आज का विद्यार्थी अपने इस बहुमूल्य जीवन के प्रति सजग और गंभीर नहीं रह गया है । आज तो वह पैसे के बल पर मात्र पैसे के लिए विद्या प्राप्त करता है । शिक्षा नौकरी का पर्याय बनकर रह गई है । विद्यार्थी के लिए स्वाध्याय एवं आत्मोन्नति का विशेष महत्व नहीं रहा है । विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता और स्वच्छंदता की प्रवृत्ति बढ़ रही है । उनमें विनयशीलता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है । अध्यापकों का अपमान, दिन-रात के लड़ाई-झगड़े, आंदोलन, हड़ताल ही मानों उनके जीवन का लक्ष्य बन गया है ।

विद्यार्थी के कर्त्तव्य :- भारत एक स्वतंत्र देश है । उसकी आजादी की रक्षा करना प्रत्येक विद्यार्थी का कर्त्तव्य है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम आदर्श विद्यार्थी बनें । हमारी शिक्षा का उद्देश्य अधिकाधिक ज्ञानार्जन होना चाहिए, केवल नौकरी पाना नहीं । केवल नौकरी प्राप्त करके हम न तो देश का और ना ही समाज का भला कर सकते हैं। शिक्षा नौकरीपरक न होकर रोजगारपरक होनी चाहिए । इस विशाल राष्ट्र की दृढ़ता एवं प्रगति के लिए विद्यार्थी को अत्यंत सबल, सक्षम और शिक्षित होना चाहिए । उसे अपनी संस्कृति तथा मूल्यों को अपनाना चाहिए तथा पाश्चात्य सभ्यता के अंधे अनुकरण से बचना चाहिए । गुणी और साहसी विद्यार्थी ही देश की रक्षा का भार उठाने में सक्षम होगा ।

उपसंहार :- विद्यार्थी को देश का सच्चा निर्माता तभी कहा जा सकता है, जब वह चारित्रिक, मानसिक, शारीरिक दृष्टि से पूर्ण समर्थ हो । विद्यार्थी को चाहिए कि अपने विद्यार्थी-जीवन को मौज-मस्ती का साधन न बनाकर उसे शिक्षा ग्रहण करने में लगाए । विद्यार्थी-जीवन की सफलता ही विद्यार्थी के उन्नति की आधारशिला है ।

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पुस्तकालय का महत्व

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पुस्तकालयो के प्रकार
  • महत्व
  • पुस्तकालय से लाभ- ज्ञान की प्राप्ति
  • मनोर जन का स्वस्थ साधन, दुर्लभ तथ्नो की प्राप्ति के साथन
  • पठन-पाठन में सहयोगी
  • भारत में पुस्तकालयों की सिर्थित
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- पुस्तकालय का अर्थ होता है पुस्तकों का घर, अर्थात् जहॉँ पुस्तकों को रखा जाता हो या संग्रह किया जाता हो । अतः पुस्तकों के उन सभी संग्रहालयों को पुस्तकालय कहा जा सकता है, जहाँ पुस्तकों का उपयोग पठन-पाठन के लिए किया जाता हो । पुस्तकों को ज्ञान-प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम माना गया है । पुस्तकें ज्ञान-राशि के अथाह भंडार को अपने में संचित किए रहती हैं । ज्ञान ही ईश्वर है तथा सत्य एवं आनंद है ।

केवल एक कमरे में पुस्तकें भर देने से ही वह पुस्तकालय नहीं बन जाती, अपितु यह ऐसा स्थान है जहाँ पुस्तकों के उपयोग आदि का सुनियोजित विधान होता है ।

पुस्तकाल्यों के प्रकार :- पुस्तकालय के विभिन्न प्रकार होते हैं । जैसे –

  • व्यक्तिगत पुस्तकालय
  • विद्यालय एवं महाविद्यालय के पुस्तकालय
  • सार्वजनिक पुस्तकालय
  • सरककारी पुस्तकालय आदि ।

व्यक्तिगत पुस्तकालय के अंतर्गत पुस्तकों के वे संग्रहालय आते हैं, जिनमें कोई-कोई व्यक्ति अपनी विशेष रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार पुस्तकों का संग्रह करता है । विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के अंतर्गत वे पुस्तकालय आते हैं, जिनमें क्वात्रों तथा शिक्षकों के पठन-पाठन हेतु पुस्तकों का संग्रह किया जाता है । कोई भी व्यक्ति इसका सदस्य बनकर इसका उपयोग कर सकता है । सरकारी पुस्तकालयों का प्रयोग राज्य कर्मचारियो एवं सरकारी अनुमति प्राप्त विशेष व्यक्तियों द्वारा किया जाता है ।

पुस्तकालयों का महत्व :- पुस्तकालय सरस्वती देवी की आराधना-मंदिर है । यह व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र तीनों के लिए महत्वपूर्ण है । पुस्तकें ज्ञान-प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन हैं । इनसे मनुष्यों के ज्ञान का विकास होता है तथा उनका दृष्टिकोण व्यापक होता है । एक ज्ञानी व्यक्ति ही समाज एवं राष्ट्र के साथ-साथ मानवता का कल्याण कर सकता है। प्रत्यक व्यक्ति अपनी रुचि एवं आवश्यकता के अनुसार पुस्तकें खरीद नहीं सकता।

कोई भी व्यक्ति आर्थिक रूप से इतना सशक्त नहीं होता कि वह मनचाही पुस्तकें खरीद सकें । बहुधा पैसा जुटा लेने पर भी पुस्तकें प्राप्त नहीं होती हैं, क्यांकि उनमें से कुछ का प्रकाशन बंद हो चुका होता है और उनकी प्रतियाँ दुर्लभ हो जाती हैं । पुस्तकालय में जिज्ञासु अपनी आवश्यकता एवम् प्रयोजन के अनुसार सभी पुस्तकों को प्राप्त कर लेता है तथा उनका अध्ययन करता है ।

पुस्तकालय से लाभ :- पुस्तकालय ज्ञान का भंडार होता है । विषयगत ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करने के लिए तथा उस विषय से संबंधित ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्य पुस्तकों के अध्ययन के लिए पुस्तकालय की आवश्यकता होती है ।

प्रत्येक मनुष्य के लिए मनोरंजन आवश्यक होता है तथा मनोरंजन के लिए पुस्तकों से अच्छा कोई साधन नहीं है । यह मनोरंजन के साथ-साथ संसार के अन्य विषयों की जानकारी भी बढ़ाती है ।

किसी भी विषय पर शोध एवं अनुसंधानात्मक कायों के लिए पुस्तकालयों में संग्रहित पुस्तकों से व्यक्ति उन दुर्लभ तथ्यों को प्राप्त कर सकता है जिनकी जानकारी उसे अन्य किसी प्रकार से नहीं हो सकती ।

पुस्तकालय छात्र तथा अध्यापक दोनों के पठन-पाठन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । शिक्षक तथा छात्र दोनों ही अपनी बौद्धिक शक्तियों एवं विषयगत ज्ञान के विस्तार की दृष्टि से पुस्तकालय में संग्रहित पुस्तकों से लाभान्वत होने हैं।

भारत में पुस्तकालयों की स्थिति :- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने गाँव-गाँव में पुस्तकालयों की स्थापना करने का एक अभियान चलाया था जो अनेक कारणों से असफल रहा । इन पुस्तकों की सामग्री राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए थी । उसमें ज्ञान, बौद्धिक विकास की सामग्री का अभाव था। अत: जन सामान्य ने इसकी ओर रुिि नहीं दिखलाई । सरकारी नीति की उदासीनता के कारण यह योजना असफल हो गई ।

उपसंहार :- पुस्तकालय ज्ञान का वह भंडार है जो हमें ज्ञान प्रदान करता है । ज्ञान की प्राप्ति से ही मनुष्य वास्तविक अर्थों में मनुष्य बनता है । ऐसे ही मनुष्यों से समाज या राष्ट्र का कल्याण होता है । अतः पुस्तकालय हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और आवश्यक है । आज सरकार तथा स्वयं सेवी सामाजिक संस्थाओं को संपूर्ण देश में अधिक से अधिक पुस्तकालयों की स्थापना करनी चाहिए।

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भूकम्प : एक प्राकृतिक प्रकोप

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • धन-जन की अपार क्षति
  • कहीं निर्माण-तो कहीं विनाश
  • उपसंहार।

सृष्टि के आरम्भ से ही मनुष्य का प्रकृति के साथ अदूट सम्बन्ध रहा है । प्रकृति के साथ मनुष्य के संघर्ष की कहानी भी सृष्टि के प्रारम्भ से ही चली आ रही है। प्रकृति अपने विभिन्न रूपों में मानव के सामने आती है । प्रकृति के मोहक तथा भयानक दोनों ही रूप हैं । जहाँ प्रकृति का मोहक रूप हमारा मन मोह लेता है, वहीं इसके रौद्र रूप के स्मरण मात्र से हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बाढ़, सूखा, अकाल, महामारी, भूकम्प आदि प्रकृति के रौद्र रूप हैं ।

भूकम्प शब्द ‘भू’ और कम्प’ इन दो शब्दों के योग से बना है । भू का सामान्य अर्थ है – भूमि और कम्प का – काँपना या हिलना-डुलना है । अत: जब भूमि काँप उठती है तो उसे भूकम्प कहते हैं । लेकिन समस्त पृथ्वी एक साथ नहीं काँपती। एक बार में पृथ्वी का कोई एक विशेष भाग ही काँपता है ।

जब पृथ्वी की सतह अचानक हिलती या कम्पित होती है तो उसे भूकम्प कहते हैं। सतह के कम्पन के साथ प्रकृति सर्वनाश करनेवाली जो प्रकोप प्रकट करती है, उसी को भूकम्प की संज्ञा दी जाती है। भूपटल का फटना भूकम्प का लक्षण है। ज्वालामुखी के उद्गार भी भूकम्प के कारण बनते हैं। भूमि की चट्टानों के असंतुलन से भी भूकम्प आ सकता है।

भूकम्प की उत्पत्ति सृष्टि के निर्माणकर्ता का मायावी कौतुक है। प्रकृति का माया रूपी हृदय जब डोलता है तो वह अपना प्रकोप प्रकट करता है।

जिस प्रकार जल-प्रलय प्रकृति का विनाशक ताण्डव है, उसी प्रकार भूकम्प उससे भी भयानक विनाशक विक्षोभ है। दो-चार सेकेंड के हल्के भूकम्प से ही छोटे भवन, दीर्घ प्रासाद और उच्च अट्टालिकाएँ काँपती हुई पृथ्वी के चरण चूमने लगती हैं। गाँव के गाँव नष्ट हो जाते हैं। शवों के ढेर लग जाते हैं। सभी चीजें नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। 20 अक्टूबर, सन् 1991 ई. को उत्तरकाशी में आये भूकम्प में 15,000 से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हुई और सहस्तों लोग घायल हुए। सन् 1993 के लातूर एवं उस्मानाबाद क्षेत्रों के विनाशकारी भूकम्प की चपेट में 81 गाँवों पर कहर बरपा जिसमें 25 से ज्यादा गाँव श्मशान में बदल गये ।

भूकम्प का प्रभाव नदियों पर भी पड़ता है। पहाड़ों के नीचे धँसने से, या चट्टानों, पत्थरों और गीली मिट्टी के जमाव से नदी का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। नदी का प्रवाह अवरुद्ध होने और पानी जमा होने से वह स्थान झील के रूप में परिणत हो जाता है। जलमग्न भवन भूकम्प के प्रकोप से बचकर भी प्रकृति की प्रकोप के चपेट में आ जाते हैं। सन् 1978 ई० में भूकम्प के कारण भूस्खलन से गंगोत्री मार्ग पर 500 मीटर ऊँचा मिट्टी-पत्थर का ढेर लग गया। गंगाजल अवरुद्ध हो गया। फलस्वरूप वहाँ झील बन गई।

भूकंप प्रकृति का क्षोभ ही नहीं वरदान भी है। 16 दिसम्बर, सन् 1880 को आये नैनीताल के भूकम्प से चाइना पीक के लिये एक सुगम मार्ग स्वयं ही बन गया था। इससे जगह-जगह झरने फूट पड़े थे। इस प्रकार भूकम्प ने नैनीताल के सौंदर्य को विस्तार दिया था ।

भूकम्प के प्राकृतिक प्रकोप विनाश के अमिट चिह्न पृथ्वी पर छोड़ जाते हैं। मनुष्य की स्मृति में भी आतंक के ऐसे अवशेष छोड़ जाते हैं जो सपने में भी उसे आतंकित कर जाते हैं। गुजरात और उड़ीसा के भूकंप ऐसे ही थे। प्रत्येक ध्वंस नये निर्माण का संदेश लेकर आता है। प्रकृति में नाश और निर्माण दोनों ही शक्तियाँ हैं।

इस प्रकार भूकम्प जब बस्तियों को नष्ट करता है तब मनुष्य फिर कुछ नया और सुंदर बनाने की चेष्टा करता है। प्रकृति का प्रकोप मनुष्य को फिर से कुछ नया और बेहतर बनाने की शक्ति प्रदान करता है। इस प्रकार भूकंप शाप भी है और वरदान भी ।

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राष्ट्रभाषा हिंदी

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी
  • हिन्दी ही क्यों
  • भारत की सांस्कृतिक भाषा हिन्दी
  • राष्ट्रभाषा से राजभाषा
  • विदेशों में हिन्दी
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक भाषा होती है, जिसमें उस देश के प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं तथा देश के अधिकांश लोग पारस्परिक व्यवहार में उस भाषा का प्रयोग करते हैं। उसी भाषा के माध्यम से उस देश के वैदेशिक सम्बन्ध संचालित होते हैं । राष्ट्रीय न्यायालयों के कार्य उसके ही प्रयोग से सम्पन्न किये जाते हैं । विश्वविद्यालयों में उच्चशिक्षा के लिये उसका ही प्रयोग होता है । जिस देश में एक से अधिक भाषाएँ प्रचलित होती हैं, उस देश की किसी एक भाषा को राजभाषा, सम्पर्क भाषा अथवा राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है ।

ऐसी भाषा के बोलनेसमझने वालों की संख्या सर्वाधिक होती है और अन्य लोगों द्वारा वह काफी सरलता से सीख ली जाती है । भारत में स्वतंत्रता-पूर्व शासकों की भाषा अंग्रेजी प्रशासन, शिक्षा, न्याय आदि की प्रमुख भाषा थी । किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया तथा हिन्दी के साथ-साथ कुछ समय के लिये अंग्रेजी को भी सरकारी कामकाज के लिये अस्थायी रूप में स्वीकार कर लिया गया था, ताकि इस बीच अहिन्दी भाषा- भाषी भी हिन्दी की जानकारी हासिल कर लें।

भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी :- भारत विश्व का सर्वाधिक विशाल गणतन्न्र है, जो संघात्मक होते हुए भी एकात्मक है । यहाँ पंजाब की भाषा पंजाबी, बंगाल की बंगला, केरल की मलयालम, उड़ीसा की उड़िया, असम की असमी, आंध की तेलगू तथा तमिलनाडु की भाषा तमिल है । ऐसी स्थिति में यह आवश्यक था कि किसी ऐसी भाषा की खोज की जाय जो उक्त सारे क्षेत्रों के बीच एकसूत्रता स्थापित कर सके । इस दृष्टि से राष्ट्रीय नेताओं ने खड़ी बोली हिन्दी को सर्वाधिक उपयोगी पाकर उसे ही भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया।

हिन्दी ही क्यों :- भारत द्वारा हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने के कई कारण हैं। यह लगभग हजार वर्षो से भारतीय जनता के बीच लोकप्रिय रही है । आज देश की लगभग आधी जनसंख्या अच्छी तरह हिन्दी लिख-बोल सकती है । वाणिज्य, तीर्थयात्रा, परिवहन आदि क्षेत्र में हिन्दी का प्रचार काफी अच्छा है । देश भर के तीर्थों में हिन्दी के जानकार पंडित, पुजारी तथा पण्डे हैं । रेलवे स्टेशनों के कुली हिन्दी बोल लेते हैं। भारत के बाहर श्रीलंका, बर्मा, गुयाना, मारीशस, फिजी, सुरीनाम आदि देशों में भी हिन्दी जानने वालों की काफी अच्छी संख्या है ।

इतनी अधिक लोकप्रियता के साथ-साथ हिन्दी को अपनाने का एक कारण यह भी है कि यह बहुत ही सरल भाषा है, इसे सीखने में विशेष असुविधा नहीं होती । इसकी देवनागरी लिपि भी सरल एवं वैज्ञानिक है । मराठी एवं नेपाली भाषाओं की लिपियाँ नागरी लिपि की ही प्रतिरूप हैं। अत: उन भाषा-भाषियों के लिए हिन्दी सीखना अत्यधिक सरल है । हिन्दी की यह भी एक विशेषता है कि संस्कृत की उत्तराधिकारिणी होने के कारण इसने भारत की प्राचीनतम परम्परा की अधिकांश विशेषताओं को अपने भीतर समेट लिया है । अपनी इन्हीं कतिपय विशिष्टताओं के कारण हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा बन सकी है ।

राष्ट्रभाषा से राजभाषा :- स्वतंत्र भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया तथा उसी क्षण से यह भी निश्चित हो गया कि 15 वर्षो बाद देश के सरकारी कामकाज हिन्दी में होने लगेंगे । किन्तु सन् 1965 में तमिलनाडु द्वारा विरोध किए जाने पर यह निश्चय किया गया कि जब तक सभी अहिन्दी भाषी प्रान्त हिन्दी में पत्र-व्यवहार करना स्वीकार न करें, तब तक उनके साथ अंग्रेजी में पत्र-व्यवहार किया जायेगा ।

गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब आदि ने तो हिन्दी में पत्र-व्यवहार आरंभ कर दिया तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार एवं राजस्थान ने हिन्दी को अपनी राजभाषा घोषित कर दिया । 1985 ई० में स्थिति यह रही कि केन्द्र सरकार के तथा संसद के सारे कार्य दोनों भाषाओं अर्थात् हिन्दी और अंग्रेजी में किए जाने लगे । सेवा आयोगों में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी भी परीक्षा का माध्यम मान ली गई।

उपसंहार :- राजनीतिक कारणों से यदा-कदा हिन्दी साम्राज्यवाद के नाम पर हिन्दी के विरोध की आवाज उठने लगती हैं तथापि हिन्दी का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है । देश की जनता राष्ट्रीय कर्त्तव्य एवं दायित्व के प्रति जागरूक है, अत: हिन्दी-विरोधियों का प्रभाव नगण्य है। हिन्दी चलचित्रों की व्यापक लोकप्रियता तथा अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी हिन्दी प्रेमियों के प्रयास जैसे साधनों से इसका प्रचार क्षेत्र सहजता से ही बढ़ता जा रहा है ।

सरकारी तथा गैरसरकारी संस्थाओं की चेष्टा से न्याय, औषधि, यांत्रिकी, वाणिजय आदि क्षेत्रों के लिए विभिन्न शब्दावरियों का निर्माणकार्य तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है । यह विश्वास सहज ही पनपता है कि इस शताब्दी के अन्त तक भारत अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा की विवशता से पूर्ण मुक्त हो जाएगा एवं राज्यों में राज्य की तथा केन्द्र में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का अक्षुण्ण स्थान प्राप्त हो सकेगा ।

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भारत में साक्षरता अभियान

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • पराधीन भारत में निरक्षरता
  • निरक्षरता एक अभिशाप है
  • स्वतंत्र भारत में निरक्षरता के दूरीकरण की चेष्टा
  • साक्षरता का महत्व
  • उपसंहार ।

प्रस्तावना :- देश के अगणित मनुष्य यदि अज्ञान के अंधकार में डूबे रहें, यदि मनुष्यत्व विकास के सभी सम्भव पथ अवरुद्ध हो जायँ, यदि अंशक्षा, अन्याय, अपमान तथा शोषण से जीवन संकुचित होता रहे, तब हमारा सब कुछ व्यर्थ हो जायेगा। ज्ञान-विज्ञान का प्रकाशमय जगत् सदा के लिये हमसे दूर हो जायेगा । किसी देश की उन्नति के मूल में उस देश की जनता की जागरुकता ही मुख्यत: हुआ करती है । वस्तुत: मानव के अंतर में अमित शक्ति सुप्त रहती है । जागृत रूप में यही शक्ति देश को आगे बढ़ाती है और यह शक्ति जागृत होती है शिक्षा के द्वारा।

पराधीन भारत में निरक्षरता :-अंग्रेजों के भारत में आने से पूर्व मंडप, टोल, चौपाल, वटवृक्षतल, मदरसा, पाठशाला आदि विभिन्न स्थानों में जो परंपरागत शिक्षादान की व्यवस्था थी, उनके द्वारा भी देश का काफी बड़ा भाग साक्षरता प्राप्त कर लेता था । पर अंग्रेजों के आगमन के बाद पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव से यहाँ का सब कुछ बदल गया। पराधीन भारत में शिक्षा का क्षेत्र बिल्कुल संकुचित हो गया । देश के विदेशी शासक यहाँ शिक्षा का प्रसार कतई नहीं चाहते थे ।

उनका एकमात्र उद्देश्य था देश का अबाध शोषण । गरीबी और निरक्षरता बहुत बढ़ गयी । प्रायः दो सौ वर्ष के अंग्रेजी शासन में पूरे देश में साक्षर लोगों की संख्या मात्र चौदह प्रतिशत ही रही । सन् 1930 में कानून द्वारा प्राइमरी शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया । किन्तु सरकार की उदासीनता के कारण यह कानून देश में तत्परतापूर्वक नहों लागू किया गया । फलत: निरक्षरता का परिणाम पूर्ववत् बना रहा।

निरक्षरता अभिशाप है :- निरक्षरता किसी भी देश के निवासियों के लिये एक अभिशाप है। देश के बहुसंख्यक लोग शिक्षा के अभाव में चरमहीनता और वंचना का जीवन बिताते हैं। वे समझ नहीं पाते कि सब कुछ होते हुए भी वे उनसे क्यों वंचित हैं, क्यों वे इतने निगृहीत हैं। अपने भाग्य की दुहाई देते रहते हैं। समाज के विभिन्न अंगों से उन पर अत्याचार होता है। उनका शोषण होता है । निरक्षरता के कारण, लगता है कि मनुष्यत्व का अधिकार ही गँवा बैठे है। उनमें गण-तंत्रात्मक बोध के साथ ही आत्मसम्मान की भावना भी लुप्त हो गयी है ।

स्वतन्त्र भारत में निरक्षरता के दूरीकरण की चेष्टा :-युग संचित इस अभिशाप से देशवासायों को मुक्त करने के लिये स्वतन्न्र भारत में शिक्षा की नवीन योजना बनाई गई है । देश की जनता में शिक्षा को अधिकाधिक व्यापक बनाने के लिये सरकार ने राधाकृष्णन , मुदालियर और कोठारी कमीशनों का गठन किया। आज देश से निरक्षरता उन्मूलन करना नितान्त आवश्यक हो गया है। इस दिशा में कार्य हो रहा है, पर अभी तक साक्षर लोगों की संख्या में आशानुरूप वृद्धि नहीं हुई है। शहरों में ही शिक्षित और साक्षर लोगों की संख्या अधिक है, गाँवों में बहुत कम । जनसंख्या की द्रुत वृद्धि को ध्यान में रखते हुए ही निरक्षरता दूरीकरण की व्यवस्था को भी अधिक गतिमुखर बनाना पडेगा।

उपसंहार :- देश की जनता को शिक्षा का अधिकार देना पड़ेगा । उनमें गणतान्त्रिक चेतना का संगार काना पडेगा। निरक्षरता के दूर होते ही आत्मनिर्भर हो जायगा देश । समृद्धि के दिगन्त उन्मोचित होंगे । चरिज्न-गतन ओर उन्नत जीवन-मान-—न लक्ष्यों की प्राप्ति शिक्षा के व्यापक प्रसार से ही हो सकेगी । केवल प्राइमरी और माध्यािव सतरों की शिक्षा को अनववार्य बना देने से ही काभ नहीं चलेगा । देश के अगणित व्यस्क लोगों को साक्षर बनाने की याँजना को भी वास्तविक रूप से लागू करना पड़ेगा । जब तक यह नहीं होता, तब तक अनवरत सक्रियतापूर्वक इस दिधा 4 लगी रहना पड़ेगा ।

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व्यायाम और स्वास्थ्य

भगवान बुद्ध ने कहा था – “हमारा कर्त्तव्य है कि हम अपने शरीर को स्वस्थ रखें अन्यथा हम अपने मा नो सक्षम और शुद्ध नहीं रख पाएँगे ।”

आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में इंसान को फुर्सत के दो पल भी नसीब नहीं हैं । घर से दफ्तर, दफ्तर से घग तो कभी घर ही तफ्तर बन जाता है यानि इंसान के काम की कोई सीमा नहीं है । वह हेमाश खुद को व्यस्त रखता है । इस व्यस्तता के कारण आज मानव शरीर तनाव, थकान, बीमारी इत्यादि का घर बनता जा रहा है । आज उसने हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ तो अर्जित कर ली हैं, किन्तु उसके सामने शारीरिक एवं मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने की चनौती ज़ा खड़ी हुई है।

यद्यपि चिकित्सा एवं आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में मानव ने अनेक प्रकार की बीमारियों पर विजय हासिल की है, कित्तु इगये उसे पर्याप्त मानसिक शान्ति मिल गईं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। तो क्या मनुष्य अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहा है ? यह ठीक है कि काम जरूरी है, लेकिन काम के साथ-साथ स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जाए, तो यहा सोने पेसहहागा वाली बात ही होगी । महात्मा गाँधी ने भी कहा है – “स्वास्थ्य ही असली धन है, सोना और चाँटी नहीं।”

सचमुच यदि व्यक्ति स्वस्थ न रहे तो उसके लिए दुनिया की हर खुशी निरर्थक होती है। रुपये के ढेर पर बैठ कर आदमी को तब ही आनन्द मिल सकता है, जब वह शारीरिक रूप से स्वस्थ्य हो। स्वास्थ्य की परिभाषा के अन्तर्गत केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ्य होना ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से स्वस्थ होना भी शामिल है । व्यक्ति शारीरि क रूप से स्वस्थ हां, किन्तु मानसिक परेशानियों से जूझ रहा हो, तो भी उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता । उसी व्यक्ति को स्नस्थ कहा जा सकता है, जो शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ हो । साइरस ने ठीक कहा है कि अच्छा स्वास्थ्य एवं अच्छी समझ, जीवन के दो सर्वोत्तम वरदान हैं।

व्यक्ति का शरीर एक यन्त्र की तरह है । जिस तरह यन्त्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसमें तेल-ग्रीस आर्ादि का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार मनुष्य को अपने शरीर को क्रियाशील एवं अन्य विकारों से दूर रखने के लिए शर्भाग क व्यायाम करना चाहिए । शिक्षा एवं मनोरंजन के दृष्टिकोण से भी व्यायाम का अत्यधिक महत्त्व है । शरीर के स्जस्थ रदने पर ही व्यक्ति कोई बात सीख पाता है अथवा खेल, नृत्य-संगीत एवं किसी प्रकार के प्रदर्शन का आनन्द उटा पाता है । अस्वस्थ व्यक्ति के लिए मनोरंजन का कोई महत्त्व नहीं रह जाता ।
जॉनसन ने कहा है – “उत्तम स्वास्थ्य के बिना संसार का कोई भी आनन्द प्राप्त नहीं किया जा सकता।”

देखा जाए तो स्वास्थ्य की दृष्टि से व्यायाम के कई लाभ हैं – इससे शरीर की मांसपेशियाँ एवं हड्डियाँ मजबूत होती हैं। रक्त का संचार सुचारु रूप से होता है । पाचन क्रिया सुदृढ़ होती है। शरीर को अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है और फेफड़े मज़बूत होते हैं । व्यायाम के दौरान शारीरिक अंगों के सक्रिय रहने के कारण शरीर की रोग प्रतिरोंधक क्षमता बढ़ती है । इस तरह व्यायाम मनुष्य के शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है ।
किसी कवि ने ठीक ही कहा है –

‘पत्थर-सी हों मांसपेशियाँ, लोहे-सी भुजदण्ड अभय ।
नस-नस में हो लहर आग की तभी जवानी पाती जय।’

इस तरह, स्वास्थ्य एवं व्यायाम का एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है । व्यायाम के बिना शरीर आलस्य, अकर्मन्यता एवं विभिन्न प्रकार की बीमारियों का घर बन जाता है । नियमित व्यायाम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से आवश्यक है । इस सन्दर्भ में हिप्पोक्रेट्स ने बड़ी महत्वपूर्ण बात कही है – “यदि हम प्रत्येक व्यक्ति को पोषण और व्यायाम की सही राशि दे सकते, जो न बहुत कम होती और न बहुत ज्यादा, तो हमें स्वस्थ रहने का सबसे सुरक्षित रास्ता मिल जाता ।” अत: हमें इनकी शिक्षा को जीवन में उतारने की कोशिश करनी चाहिए ।

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समय और उसका सदुपयोग

कबीर ने मृत्यु को अवश्यम्भावी बताकर जीवन के एक-एक पल का सदुपयोग करने की सीख देते हुए कहा है –

“‘काल करै सो आज कर, आज करै सो अब ।
पल में परलय होएगी, बहुरि करैगा कब ।।”

‘परीक्षा में तो अभी काफ़ी दिन बाकी हैं, कल से पढ़ना शुरू कर देंगे’, ऐसा सोचकर कुछ विद्यार्थी कभी नहीं पढ़ते, किन्तु परीक्षा नियत समय एवं तिथि पर ही होती है । परीक्षा के प्रश्नों को देखकर उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने समय का सदुपयोग किया होता, तो परीक्षा हॉल में यूँ ही खाली नहीं बैठना पड़ता । इसलिए कहा गया है – ” अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।” प्रसिद्ध लेखक मेसन ने समय की महिमामण्डित वर्णन करते हुए कहा है – “स्वर्ण के प्रत्येक कण की तरह ही समय का प्रत्येक क्षण भी मूल्यवान है।” प्लेटफॉर्म पर खड़ी रेलगाड़ी अपने यात्रियों की प्रतीक्षा नहीं करती और देर से पहुँचने वाले अफ़सोस करते रह जाते हैं।

इसी तरह, समय भी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता । अंग्रेजी में कहा गया है ‘Time and tide waits for none’ अर्थात् समय और समुद्र की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करते । मानव जीवन में समय की महत्ता को समझाने के लिए प्रकृति में भी उदाहरण भरे पड़े हैं । कभी-कभी बरसात के मौसम में वर्षा इतनी देर से शुरू होती है कि खेतों में लगी फसलें सूख जाती हैं। ऐसे में भला वर्षा होने का भी क्या लाभ। भक्त कवि तुलसीदास ने प्रकृति के इसी उदाहरण का उल्लेख करते हुए जीवन में समय की महत्ता को इस प्रकार से समझाया है –

“का बरखा जब कृषी सुखाने ।
समय चूकि पुनि का पछताने ।।

एक बार एक चित्रकार ने समय का चित्र बनाया, जिसमें एक अति सुन्दर व्यक्ति हँसता हुआ दोनों हाथ फैलाए खड़ा था । सामने से उसके केश सुन्दर दिख रहे थे, पर पीछे से वह बिल्कुल गंजा था । इस चित्र के माध्यम से चित्रकार यह सन्देश देना चाहता था कि समय जब आता है, तो आपकी ओर बाँहें फैलाए आता है । ऐसे में यदि आपने सामने से आते हुए समय के केश पकड़ लिए, तो वह आपके काबू में होगा, किन्तु यदि आपने उसे निकल जाने दिया, तो पीछे से आपके हाथ उसके गंजे सिर पर फिसलते रह जाएँगे और फिर वह आपकी पकड़ में नहीं आएगा। इसलिए समय को पहचानकर उसका सदुपयोग करना चाहिए । समय के सदुपयोग में ही जीवन की सफलता का रहस्य निहित है । राजा हो या रंक, मूर्ख हो या विद्वान्, समय किसी के लिए अपनी गति मन्द नहीं करता । इसलिए सबको जीवन में सफलता पाने के लिए समय का सदुपयोग करना ही पड़ता है। आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनकी सफलता का रहस्य जीवन के हर पल का सदुपयोग ही रहा है ।

जो व्यक्ति अपना निश्चित कार्यक्रम बनाकर, मानसिक वृत्तियों को स्थिर एवं संयमित करके कार्य करता है, उसे जीवन-संग्राम में अवश्य सफलता प्राप्त होती है । वैसे तो यह नियम प्रत्येक आयु वर्ग के व्यक्ति पर लागू होता है, किन्तु विद्यार्थी जीवन में इस नियम की सर्वाधिक महत्ता है। जो विद्यार्थी नियत समय में पूर्ण मनोयोग के साथ अपनी पढ़ाई करते हैं, उन्हें सफलता अवश्य मिलती है । इस तरह, समय का अपव्यय करना तो आत्महत्या के समान है ही, समय का दुरुपयोग भी उससे कुछ कम नहीं ।

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यदि मैं किसान होता

भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी सम्पन्नता मुख्यत: हमारे कृषि उत्पादन पर निर्भर करती है। इस लक्ष्य का प्राप्ति के लिये भारतीय कृषक की एक बड़ी भूमिका है । वास्तव में भारत कृषकों की भूमि है । हमारी $75 \%$ जनता गांवा में रहती है ।

भारतीय किसान का सर्वत्र सम्मान होता है । वही सम्पूर्ण भारतवासियों के लिए अन्न एवं सब्जियाँ उत्पन्न करता है । पूरा वर्ष भारतीय कृषक खेत जोतने, बीज बोने एवं फसल उगाने में व्यस्त रहता है। वास्तव में उसका जीवन अत्यन्त व्यस्त होता है, तथापि मुझमें भी एक किसान बनने की इच्छा जाग्रत होती है।

यदि में किसान होता तो अन्य किसानो की भांति ही रोज प्रातः तड़के उठता और अपने हल एवं बेल लेकर खंतों की ओर चला जाता, वहाँ घंटों खेत जोतता, तत्पश्चात नाश्ता करता । हमारे घर-परिवार के सदस्य मेरे लिए खेत पर ही खाना लाते । खाने के पश्चात पुनः अपने काम में व्यस्त हो जाता। मैं अपने खेतो में कृषि के प्रति कठोर परिश्रम करता और अपने परिश्रम के माध्यम से अधिक-से-अधिक फसल के उत्पादन का प्रयास करता जिससे अपने घर-परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए राष्ट्र के आर्थिक विकास में भी एक नागरिक की हैसियत से अपनी भूमिका पालन करता।

यदि मैं किसान होता तो अपने खलिहान में दो-चार दुधारु गाय, भैंस एवं बकरी जैसे पशुओं का पालन करता जिससे हमें शुद्ध दुग्ध की प्राप्ति होती जिसका उपयोग मैं अपने घर-परिवार के सदस्यों के लिए करता साथ ही उसका एक भाग बाजार में बिक्री कर कुछ नकद आय की उपार्जन भी करता । किसान होने के नाते मैं अपने घर के तथा खेत-खलिहान के आस-पास अधिक-से-अधिक पेड़-पौधे लगाकर प्रोदुछण-मुक्त पर्यावरण के संरक्षण में अपनी भागीदारी का पालन करता।

किसान बहुत सीधा-सादा जीवन जीता है । उसका पहनावा ग्रामोण होता है। वह घास फूस के झोपड़ा में रहता है. हालांकि बहुत से कृषकों के पक्के मकान भी हैं। उसकी सम्पत्ति कुछ बैल, हल एवं कुछ एकड़ धरती ही होती है। वह अधिकतर अभावों का जीवन जीता है । तथापि, एक किसान राष्ट्र की आत्मा होता है । हमारे दिवंगत प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था ‘जय जवान, जय किसान’ । उन्होंने कहा था कि कृषक राष्ट्र का अन्नदाता है। उसी पर कृषि उत्पादन निर्भर करता है । अतएव, एक किसान होने के नाते मैं उनके स्वप्नों को साकार करने की यथासभव प्रयास करता ।

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यदि मैं प्रधानमंत्री होता

यदि मैं प्रधानमंत्री होता-अरे ! यह मैं क्या सोचने लगा । प्रधानमंत्री बन पाना खाला जी का घर है क्या ? भारत जैसे महान् लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनना वास्तव में बहुत बड़े गर्व और गौरव की बात है, इस तथ्य से भला कौन इन्कार कर सकता है । प्रधानमंत्री बनने के लिए लम्बे और व्यापक जीवन-अनुभवों का, राजनीतिक कार्यों और गतिविधियों का प्रत्यक्ष अनुभव रहना बहुत ही आवश्यक हुआ करता है । प्रधानमंत्री बनने के लिए जनकार्यो और सेवाओं की पृष्ठभूमि रहना भी जरूरी है और इस प्रकार के व्यक्ति का अपना जीवन भी त्याग-तपस्या का आदर्श उदाहरण होना चाहिए ।

आज के युग में छोटे-बड़े प्रत्येक देश और उसके प्रधानमंत्री को कई तरह के राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय दबाबों, कूटनीतिजों के प्रहारों को झेलते हुए कार्य करना पड़ता है। अत: प्रधानमंत्री बनने के लिए व्यक्ति को चुस्त-चालक, कूटनीति प्रवण और दबाव एवं प्रहार सह सकने योग्य मोटी चमड़ी वाला होना भी बहुत आवश्यक माना जाता है । निश्चय ही मेरे पास ये सारी योग्यताएँ और ढिठाइयाँ नहीं हैं; फिर भी अक्सर मेरे मन-मस्तिष्क में यह बात मथती रहा करती है, रह-रहकर गुँज गूज उठा करती है कि यदि मैं प्रधान मंत्री होता, तो ?

यदि मैं प्रधानमंत्री होता, तो सब से पहले स्वतंत्र भारत के नागरिकों के लिए, विशेष कर नई पीढियों के लिए पृरी सख्ती और निष्ठुरता से काम लेकर एक राष्ट्रीय चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा एवं उपायों पर बल देता।

आज स्वतंत्र भारत में जो संविधान लागू है, उसमें बुनियादी कमी यह है कि वह देश का अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक अनुसूचित जाति, जन-जाति आदि के खानों में बाँटने वाला तो है, उसने हरेक के लिए कानून विधान भी अलग-अलग बना रखे हैं जबकि नारा समता और समानता का लगाया जाता है । यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो संविधान में सभी के लिए एक शब्द ‘भारतीय’ और समान संविधान-कानून लागू करवाता ताकि विलगता की सूचक सारी बाते स्वतः ही खत्म हो जाएँ । भारत केवल भारतीयों का रह जाए न कि अल्प-संख्यक, बहुसंख्यक आदि का ।

यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो सभी तरह की निर्माण-विकास योजनाएँ इस तरह से लागू करवाता कि वे राष्ट्रीय संसाधनों से ही पूरी हो सके । उनके लिए विदेशी धन एवं सहायता का मोहताज रह कर राष्ट्र की आन-बान को गिरवी न रखना पड़ता । दबावों में आकर इस तरह की आर्थिक नीतियाँ या अन्य योजनाएँ लागू न करने देना कि जो राष्ट्रीय स्वाभिमान के विपरीत तो होती ही हैं, निकट भविष्य में कई प्रकार की आर्थिक एवं सांस्कृतिक हानियाँ भी पहुँचाने वाली हैं।

यदि मैं प्रधानमंत्री होता, तो भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण कभी न होने देता। किसी भी व्यक्ति का भष्टाचार सामने आने पर उसकी सभी तरह की चल-अचल सम्पत्ति को तो छीन कर राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करता ही, चीन तथा अन्य कई देशों कौ तरह श्रष्ट कार्य करने वाले लोगों के हाथ-पैर कटवा देना, फाँसी पर लटका या गोली से उड़ा देने जैसे हूदयहीन कहेमाने जाने वाले उपाय करने से भी परहेज नहीं करता । इसी प्रकार तरह-तरह के अलगाववादी तत्वों को न तो उभरने देता और उभरने पर उनके सिर सख्वी से कुचल डालता । राष्ट्रीयहित, एकता और समानता की रक्षा, व्यक्ति के मान-सम्मान की रक्षा और नारी-जाति के साथ हो रहे अन्याय और अत्याचार का दमन मैं हर संभव उपाय से करता-करवाता।

इस तरह स्पष्ट है कि यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता, तो देश एवं जनता को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं शेक्षिक स्तर पर सुदृढ़ कर भारत को पूर्णत: खुशहाल देश बनाने का अपना सपना साकार करता, ताकि हमारा देश पुन: सौन की चिड़िया कहलाने लगे ।

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यदि मैं शिक्षक होता
अथवा,
एक शिक्षक का सपना

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • आदर्श शिक्षक
  • शिक्षा-प्रणाली में परिवर्तन
  • आदर्श शिक्षक के कर्तव्य
  • उपसंहार ।

शिक्षक होना सचमुच बहुत बड़ी बात हुआ करती है । शिक्षक की तुलना उस सृष्टिकर्ता बह्मा से भी कर सकते हैं। जैसे संसार के प्रत्येक प्राणी और पदार्थ को बनाना बह्या का कार्य है, उसी प्रकार उस सब बने हुए को संसार के व्यावहारिक ढाँच में ढालना, व्यवहार योग्य बनाना, सजा-संवार कर प्रस्तुत करना वास्तव में शिक्षक का ही काम हुआ करता है । यदि मैं शिक्षक होता, तो एक वाक्य में कहूँ तो हर प्रकार से शिक्षकत्व के गौरव, विद्या, उसकी शिक्षा, उसकी आवश्यकता और महत्त्व को पहले तो स्वयं भली प्रकार से जानने और हृदयंगम करने का प्रयास करता; फिर उस प्रयास के आलोक में ही अपने पास शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा से आने वाले विद्यार्थियों को सही और उचित शिक्षा प्रदान काता, जैसा कबीर कह गए हैं ;

”गुरु कुम्हार सिष कुम्भ है, गढ़ि-गढ़ि खोट ।
भीतर हाथ सहार दे, बहार बाहे चोट ।।”

अर्थात् जिस प्रकार एक कुम्हार कच्ची और गीली मीटी को मोड़-तोड़ और कुशल हाथों से एक साँचे में ढालकर घड़ा बनाया करता है उसी प्रकार मैं भी अपनी सुकुमार-मति से छात्रों का शिक्षा के द्वारा नव-निर्माण करता, उन्हें एक नये साँचे मे ढालता । जैसे कुम्हार, मिट्टी से घड़े का ढाँचा बना कर उसे भीतर से एक हाथ का सहारा दे और बाहर से ठोंक कर उसमें पड़े गर्त आदि को समतल बनाया करता है, उसे भीतर से एक हाथ का सहारा दे और बाहर से ठोक कर उसमें पड़े गर्त आदि को समतल बनाया करता है, उसी प्रकार मैं अपने छात्रों के भीतर यानि मन-मस्तिष्क में ज्ञान का सहारा देकर उनकी बाहरी बुराइयाँ भी दूर करके हर प्रकार से सुडौल, जीवन का भरपूर आनन्द लेने के योग्य बना देता । लेकिन सखेद स्वीकार करना पड़ता है कि मैं शिक्षक नहीं हूँ और जो शिक्षक हैं, वे अपने कर्त्तव्य का इस प्रकार गुरुता के साथ पालन करना नहीं चाहते।

यदि मैं शिक्षक होता तो न केवल स्वयं आदर्श शिक्षक बनता बल्कि अपने छात्रों को आदर्श गुरु की पहचान भी बताता। एक गुरु वे होते हैं, जिसके बीते हुए कल आपके आनेवाले कल के मार्गदर्शक बन सकते हैं। इसलिए किसी ऐसे आदर्श को खोजें जो आपको अपना शिष्य भी बना सके। एक अच्छा गुरु आपको सही राह दिखा सकता है लेकिन एक घटिया गुरु आपको गुमराह कर सकता है। याद रखें – “अच्छे गुरु आपकी प्यास नहीं बुझाते, बल्कि आपको प्यासा बनाएंगे। वे आपको जिज्ञासु बनाते है।”

एक राजा की कहानी है, जो किसी ऐसे व्यक्ति का सम्मान करना चाहता था जिसने समाज की उन्नति के लिए सबसे ज्यादा योगदान किया हो। हर तरह के लोग, जिनमें डॉक्टर और व्यवसायी भी आये थे, मगर राजा उनसे प्रभावित नहीं हुआ। अंत में एक बुजुर्ग इंसान आया, जिसके चेहरे पर चमक थी और उसने खुद के एक शिक्षक बताया। राजा ने अपने सिंहासन से उतर और युककर उस शिक्षक को सम्मानित किया। समाज के भविष्य को बनाने और संवारने में सबसे बड़ा योगदान शिक्षक का ही होता है – इस मूलमंत्र को मैं एक शिक्षक के रूप में सदैव याद रखता यदि में शिक्षक होता।

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छात्र जीवन में राजनीति

सूचना प्रौद्योगिकी के इस उन्नत युग में भी व्यावसायिक शिक्षा की अपेक्षित व्यवस्था अब तक भारत में नहीं हो पाई है। पारम्परिक शिक्षा प्राप्त कर तथा उच्च उपाधि प्राप्त करने के बावजूद अधिकतर छात्र किसी विशेष काम लायक नहीं रहते। इसके कारण शिक्षित बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारत में हर वर्ष लगभग पाँच लाख से अधिक छात्र अभियान्रिकी एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षाप्राप्त करते हैं। इनमें से सभी योग्य अभियन्ता नहीं होते। इसलिए उनको डिग्री के अनुरूप नौकरी नहीं मिल पाती। इस स्थिति में छात्रों का असन्तुष्ट होना स्वाभाविक ही है।

शिक्षा के निजीकरण के कारण उच्च शिक्षा प्रदान करने वाली शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ तो आ गई है, किन्तु इन संस्थानों में छात्रों का अत्यधिक शोषण होता है। यहाँ शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधनों का भी अभाव होता है। छात्रों द्वारा विरोध किए जाने पर उन्हें संस्थान से निकाले जाने की धमकी दी जाती है। निजी शिक्षण संस्थानों को चलाने वाले व्यवसायियों की पहुँच ऊपर तक होती है। इसलिए उनकी शिकायत का भी कोई परिणाम नहीं निकलता। अत: छात्रों के पास कुण्ठित होकर अपनी किस्मत को कोसने के अलावा और कोई रास्ता शेष नहीं बचता।

कुछ स्वर्थी राजनीतिक दल छात्रों को अपने साथ मिलाकर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे रहते हैं। इसलिए ये शिक्षण संस्थाओं में राजनीति को बढ़ावा देते हैं। इसके कारण देश के कुछ प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान राजनीति के अखाड़े का रूप लेते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में छात्रों की पढ़ाई बाधित तो होती ही है, इस स्थिति के कारण भी छात्रों में शिक्षा के प्रति असन्तोष की भावना उत्पन्न होती है।

इस तरह बेरोजगारी का डर, पारम्परिक शिक्षा का वर्तमान समय के अनुरूप न होना, व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करने वाली शिक्षण संस्थाओं का अभाव, शिक्षण संस्थाओं को राजनीति का केन्द्र बनाया जाना, शिक्षकों एवं कर्मचारियों का अपने कर्तव्यों से विमुख होना, निजी शिक्षण संस्थाओं की मनमानी, इत्यादि भारत में छात्र असन्तोष के कारण हैं। छात्र ही देश के भविष्य होते हैं। यदि उनका भला नहीं हो पाया, यदि वे बेरोजगारी का दंश झेल रहे हों, यदि उनके साथ नाइन्साफी हो रही हो, यदि उनके भविष्य से खिलवाड़ हो रहा हो, तो देश का भला कैसे हो सकता है! नि:सन्देह इसके कारण देश की आर्थिक ही नहीं, सामाजिक एवं राजनीतिक प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए समय रहते इस समस्या का निदान करना आवश्यक है।

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विश्व में कोरोना महामारी का कहर

पिछले कुछ महीनों में हमारी दुनिया एकदम बदल गई है । लाखों लोगों की जानें चली गई । लाखों लोग बीमार पड़े हुए हैं। इन सब पर एक नए कोरोना वायरस का कहर दूटा है और जो लोग इस वायरस के प्रकोप से बचे हुए हैं, उनका रहन सहन भी एकदम बदल गया है। ये वायरस दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर में पहली बार सामने आया था। उसके बाद से दुनिया में सब कुछ उलट-पुलट हो गया।

शुरुआत वुहान से ही हुई, जहां पूरे शहर की तालाबंदी कर दी गई। इटली में इतनी बड़ी तादाद में वायरस से लोग मरे कि बहां दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से पहली बार लोगों की आवाजाही पर इतनी सख़्त पाबंदी लगानी पड़ी। बिटेन की राजधानी लंदन में पब, बार और थिएटर बंद कर दिए गए। लोग अपने घरों में बंद हो गए। दुनिया भर में उड़ानें रद्द कर दी गई और बहुत से संबंध सोशल डिस्टेंसिंग के शिकार हो गए।

ये सारे कदम इसलिए उठाए गए ताकि नए कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोका जा सके और इससे लगातार बढ़ती जा रही मौतों के सिलसिले को थामा जा सके ।

प्रदूषण में भारी कमी : इन पाबंदियों का एक नतीजा ऐसा भी निकला है, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। अगर, आप राजधानी दिल्ली से पड़ोसी शहर नोएडा के लिए निकलें, तो पूरा मंजर बदला नज़र आता है। सुबह अक्सर नींद अलार्म से नहीं, परिंदों के शोर से खुलती है। जिनकी आवाज़ भी हम भूल चुके थे । चाय का मग लेकर ज़रा देर के लिए बालकनी में जाएं, तो नज़र ऐसे आसमान पर पड़ती है, जो अजनबी नज़र आता है। इतना नीला आसमान, दिल्लीएनसीआर में रहने वाले बहुत से लोगों ने जिंदगी में शायद पहली बार देखा हो। फ़लक पर उड़ते हुए सफ़ेद रूई जैसे बादल बेहद दिलकश लग रहे थे ।

सड़के बीरान तो थीं मगर मंज़र साफ़ हो गया था। सड़क किनारे लगे पौधे एकदम साफ़ और फूलों से गुलज़ार यमुना नदी तो इतनी साफ़ कि पूछिए ही मत। सरकार हज़ारों करोड़ ख़र्च करके भी जो काम नहीं कर पाई, लॉकडाउन के 21 दिनों ने वह कर दिखाया ।

प्रकृति के लिए वरदान ?: ऐसी ही तस्वीरें दुनिया के तमाम दूसरे शहरों में भी देखने को मिल रही थीं। इसमें शक नहीं कि नया कोरोना वायरस दुनिया के लिए काल बनकर आया है। इस नन्हें से वायरस ने लाखों लोगों को अपना निवाला बना लिया है। अमरीका जैसी सुपरपावर की हालत ख़राब कर दी है। इन चुनौतियों के बीच एक बात सौ फ़ीसद सच है कि दुनिया का ये लॉकडाउन प्रकृति के लिए बहुत मुफ़ीद साबित हुआ है। वातावरण धुल कर साफ़ हो चुका है। हालांकि ये तमाम क्रवायाद कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए हैं।

लॉकडाउन की वजह से तमाम फैैक्ट्रययां बंद हैं। यातायात के तमाम साधन बंद हैं। अंतराष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था को भारी धक्का लग रहा है । लाखों लोग बेरोज़गार हुए हैं। शेयर बाज़ार अंधे मुंह आ गिरा है। लेकिन अच्छी बात ये है कि कार्बन उत्सर्जन रुक गया। नाइट्रोजन डाइ आक्साइड उत्सर्जन कम हो रहा है। ब्रेटेन और स्सुन की भी कुछऐसी ही कहानी है ।

लॉकडाउन के बाद ? : कुछ लोगों का कहना है कि इस महामारी को पर्यावरण में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। अभी सब कुछ बंद है, तो कार्बन उत्सर्जन रुक गया है। लेकिन जब दुनिया फिर से पहले की तरह चलने लगी तो क्या ये कार्बन उत्सर्जन फिर से नहीं बढ़ेगा ? पर्यावरण में जो बदलाव हम आज देख रहे हैं क्या वे हमेशा के लिए स्थिर हो जाएंगे।

स्वीडन के एक जानकार और रिसर्चर किम्बर्ले निकोलस के मुताबिक़, दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 23 फ़ीसदी परिवहन से निकलता है। इनमें से भी निजी गाड़ियों और हवाई जहाज़ की वजह से दुनिया भर में 72 फीसदी कार्बन उत्सर्जन होता है। लोग ऑफ़िस का काम भी घर से कर रहे थे। अपने परिवार और दोस्तों को वक़्त दे पा रहे थे। निकोलस कहते हैं कि मुश्किल की इस घड़ी में हो सकता है लोग इसकी अहमियत समझें।

अगर ऐसा होता है तो मौजूदा पर्यावरण के हालात थोड़े परिवर्तन के साथ लंबे समय तक चल सकते हैं। वहीं निकोलस ये भी कहते हैं कि बहुत से लोगों के लिए हर रोज़ ऑफिस आना और दिल लगाकर काम करना ही जिंदगी का मक़सद होता है। इन दिनों उन्हें घर में बैठना बिल्कुल नहीं भा रहा होगा। वे इस लॉकडाउन को कैदन की तरह देख रहे होंगे। हो सकता है वे अभी ये प्लानिंग ही कर रहे हों कि जैसे ही लॉकडाउन हटेगा वे फिर से कहीं घूमने निकलेंगे।

लॉन्ग ड्राइव पर जाएंगे। अगर ऐसा होता है तो बहुत जल्द दुनिया के आब-ओ-हवा में ज़हर घुलने लगेगा। ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी महामारी के चलते कार्बनडाई ऑक्साइड का स्तर कम हुआ हो। इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। यहां तक कि औद्योगिक क्रांति से पहले भी ये बदलाव देखा गया था। जर्मनी की एक जानकार जूलिया पोंग्रात्स का कहना है कि यूरोप में चौदहवीं सदी में आई ब्लैक डेथ हो, या दक्षिण अमरीका में फैली छोटी चेचक। कोरोना वायरस की महामारी ने ना जाने कितनों से उनके अपनों को हमेशा के लिए जुदा कर दिया है।

हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत नकारात्म और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। ना जाने कितनों का रोज़गार खत्म हुआ है। अर्थव्यवस्था पटरी पर कब लौटेगी यह भी कहना मुश्किल है। लेकिन इस महामारी ने एक बात साफ़ कर दी कि मुश्किल घड़ी में सारी दुनिया एक साथ खड़ी होकर एक दूसरे का साथ देने के लिए तैयार है तो फिर क्या यही जज़्बा और इच्छा शक्ति हम पर्यावरण बचाने के लिए ज़ाहिर नहीं कर सकते ? हमें उम्मीद है, समय के इस अंधकार को हम स्वच्छ और हरे-भरे वातावरण से मिटा देंगे ।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 4 नमक

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions कहानी Chapter 4 नमक to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi Solutions Chapter 4 Question Answer – नमक

लघूत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
लाहौर से लौटते समय सफ़िया ने क्या निश्चय किया?
उत्तर :
मुहब्बत का तोहफा वह चोरी से नहीं ले जाएगी।

प्रश्न 2.
सफ़िया का भाई क्या था ?
उत्तर :
सफिया का भाई पुलिस अफसर था।

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प्रश्न 3.
सिख बीबी को देखकर साफिया क्यों हैरान रह गई थी ?
उत्तर :
सिख बीबी की शक्ल-सूरत साफिया की माँ से बहुत मिलती-जुलती थी इसलिए वह उन्हें देखकर हैरान रह गई थी।

प्रश्न 4.
‘नमक’ के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर :
रज़िया सज्जाद ज़हीर।

प्रश्न 5.
सफ़िया किस कहानी की पात्र है ?
उत्तर :
‘नमक’।

प्रश्न 6.
किसकी सूरत सिख बीबी से मिलती थी ?
उत्तर :
सफिया की माँ से।

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प्रश्न 7.
सिख बीबी का चेहरा कैसा था ?
उत्तर :
खुली किताब की तरह।

प्रश्न 8.
सिख बीबी ने कैसा दुपट्टा ओढ़ा था?
उत्तर :
सिख बीबी ने सफेद मलमल का वैसा दुप्टा ओढ़ा था जैसा उसकी अम्मा मुहर्रम में ओढ़ा करती थी।

प्रश्न 9.
सफ़िया कहाँ जा रही थी ?
उत्तर :
पाकिस्तान।

प्रश्न 10.
सफ़िया किससे मिलने पाकिस्तान जा रही थी ?
उत्तर :
सफ़िया अपने भाई-भाभी तथा उनके बच्चों से मिलने पाकिस्तान जा रही थी।

प्रश्न 11.
सिख बीबी ने किसे प्यारा शहर कहा ?
उत्तर :
लाहौर को।

प्रश्न 12.
कहाँ के लोग खूबसूरत, उम्दा खाने, नफीस कपड़ों के शौकीन, सैर-सपाटे के रसिया तथा जिंदादिली की तस्वीर होते हैं ?
उत्तर :
लाहौर (पाकिस्तान) के।

प्रश्न 13.
सफिया ने सिख बीबी से क्या पूछा?
उत्तर :
माता जी, आपको तो यहाँ आए बहुत साल हो गए होंगे ।

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प्रश्न 14.
आपको तो यहाँ आए बहुत साल हो गए होंगे – ‘आपको’ से कौन संकेतित है ?
उत्तर :
सिख बीबी।

प्रश्न 15.
सिख बीबी हिंदुस्तान कब आई थी ?
उत्तर :
हिंदुस्तान बनने के समय आई थी।

प्रश्न 16.
सिख बीबी मूलतः कहाँ की रहने वाली थी ?
उत्तर :
पाकिस्तान के लाहौर की।

प्रश्न 17.
सिख बीबी को किसकी बहुत याद् आती थी?
उत्तर :
लाहौर की।

प्रश्न 18.
सफ़िया सिख बीबी से कहाँ मिली थी ?
उत्तर :
कीर्तन में।

प्रश्न 19.
कीर्तन कितने बजे खत्म हुआ।
उत्तर :
ग्यारह बजे।

प्रश्न 20.
सफ़िया ने सिख बीबी से थीमे से क्या पूछा ?
उत्तर :
“आप लाहौर से कोई सौगात मँगाना चाहें तो मुझे हुक्म दीजिए।”

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प्रश्न 21.
सिख बीबी किस कपड़े का दुपट्टा ओढ़े थी ?
उत्तर :
सफेद बारीक मलमल का।

प्रश्न 22.
किसकी आँखों में नेकी, मुहब्बत और रहमदिली की रोशनी जगमगाया करती थी?
उत्तर :
सफ़िया की माँ की आँखों में।

प्रश्न 23.
सफ़िया की अम्मा मुहर्रम में कैसा दुपट्वा ओढ़ा करती थी ?
उत्तर :
सफेद बारीक मलमल का दुप्टा।

प्रश्न 24.
किसने, कई बार, किसे मुहब्बत से देखा?
उत्तर :
सफ़िया ने सिख बीबी को कई बार मुहल्यत से देखा।

प्रश्न 25.
कीर्तन के दौरान सफ़िया और सिख बीबी क्या करते रहे?
उत्तर :
आहिस्ता-आहिस्ता बातें।

प्रश्न 26.
सिख बीबी ने सफ़िया से लाहौर से क्या लाने को कहा ?
उत्तर :
लाहौरी नमक।

प्रश्न 27.
सफ़िया पाकिस्तान/लाहौर में कितने दिन रही ?
उत्तर :
पंद्रह दिन।

प्रश्न 28.
लाहौर से लौटते समय सफ़िया के सापने बड़ी समस्या क्या थी?
उत्तर :
दामी कागज में लिपटे सेर भर लाहौरी नमक को छिपाने की।

प्रश्न 29.
सिख बीबी ने किससे सफिया के बारे में पूछा?
उत्तर :
सफिया के घर की बहू से।

प्रश्न 30.
सफ़िया ने बड़े भाई से क्या पूछा?
उत्तर :
क्यों भैया, नमक ले जा सकते हैं?

प्रश्न 31.
नमक ले जाने के बारे में सफ़िया के बड़े भाई ने क्या कहा?
उत्तर :
लाहौर से नमक हिन्दुस्तान ले जाना गैरकानूनी है।

प्रश्न 32.
कौन-सी बात सफ़िया के बड़े भाई की समझ में नहीं आई और क्यों?
उत्तर :
जब नमक ले जाने के बारे में सफिया ने माँ का जिक्र किया तो यह बात सफ़िया के बड़े भाई की समझ़नें नें नहीं आई क्योंकि माँ तो बँटवारे के पहले ही मर चुकी थी।

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प्रश्न 33.
सफ़िया कितने बजे लाहौर से हिन्दुस्तान के लिए रवाना हुई?
उत्तर :
दिन में दो बजे।

प्रश्न 34.
कौन अपने-आप को सैयद कहता है ?
उत्तर :
सफ़िया।

प्रश्न 35.
सफ़िया ने सिख बीबी से क्या वादा किया था?
उत्तर :
लाहौरी नमक लाने का वादा।

प्रश्न 36.
सफ़िया जान देकर भी कौन-सा वादा पूरा करना चाहती है?
उत्तर :
लाहौरी नमक लाने का वादा।

प्रश्न 37.
सफ़िया ने नमक को कहाँ छुपाने के बारे में सोचा?
उत्तर :
कीनुओं को टोकरी में।

प्रश्न 38.
हिन्दुस्तान से सब लोग कौन-सा फल लाहौर ले जा रहे थे ?
उत्तर :
केला।

प्रश्न 39.
लाहौर से हिन्दुस्तान आने वाले कौन-सा फल ला रहे थे?
उत्तर :
कीनू।

प्रश्न 40.
सफ़िया किस कहानी को याद कर रही थी?
उत्तर :
उस शहजादे की कहानी को जिसमें वह रान चौर कर , हीरा छिपाकर देवों, भूतों तथा राक्षसी के सरहदो को पार कर जाता था।

प्रश्न 41.
लाहौर में सफ़िया के कितने भाई थे ?
उत्तर :
तोन भाई थे।

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प्रश्न 42.
सफ़िया के बाप की कब कहाँ थी?
उत्तर :
पांकिस्तान के लाहौर में।

प्रश्न 43.
सफ़िया के भतीजे-भतीजियाँ उससे क्या पूछते थे?
उत्तर :
फूफी जान, आप हिंदुस्तान में क्यों रहती हैं, जाएँ हमलोग नहीं आ सकते।

प्रश्न 44.
सफ़िया कितने समय बाद दुबारा लाहौर आ सकती थी?
उत्तर :
एक साल के बाद।

प्रश्न 45.
सफ़िया सपने में किन चीजों को देख रही थी ?
उत्तर :
इकबाल का मकबरा, लाहौर का किला, हवा मे रची-बसी मौलसिरी की खुशबू।

प्रश्न 46.
सफ़िया हिन्दुस्तान में कहाँ रहती थी?
उत्तर :
लखनऊ में।

प्रश्न 47.
पहले कस्टम अफसर ने सफ़िया को अपने बारे में क्या बताया?
उत्तर :
मेरा वतन देहली है जब पाकिस्तान बना था तभी आए चे, मगर हमारा वतन तो देहली ही हैं।

प्रश्न 48.
लाहौर से देहली (दिल्ली) तक का किराया सफिया को किसने दिया?
उत्तर :
सफ़िया के बड़े भाई ने।

प्रश्न 49.
सफिया लाहौर से दिल्ली किससे लौटी?
उत्तर :
रेलगाड़ी से ।

प्रश्न 50.
बहू ने सफ़िया के बारे में सिख बीबी को क्या बताया ?
उत्तर :
बहू ने सफ़िया के बारे में सिख बोबी को बताया कि ये मुसलमान हैं और कल ही अपने भाइयों से मिलने पाकिस्तान जा रही है।

प्रश्न 51.
सफ़िया ने कस्टमवालों को क्या दिखाने का निश्चय किया?
उत्तर :
लाहौरी नमक।

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प्रश्न 52.
कस्टम ऑफिसर ने नमक को सफिया के बैग में देते हुए क्या कहा?
उत्तर :
“मुहब्यत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।”

प्रश्न 53.
सफ़िया को स्टेशन तक कौन विदा करने आए थे?
उत्तर :
सफ़िया के बहुत से दोस्त, भाई तथा रिश्तेदार।

प्रश्न 54.
पाकिस्तानी पुलिस किस स्टेशन पर उतर गई।
उत्तर :
अटारी।

प्रश्न 55.
हिन्दुस्तानी पुलिस किस स्टेशन पर सवार हुई?
उत्तर :
अटारी।

प्रश्न 56.
बंगाली दिखने वाले कस्टम ऑफिसर से सफिया ने क्या कहा ?
उत्तर :
‘देखिए, मेरे पास नमक है थोड़ा-सा।’

प्रश्न 57.
बंगाली दिखनेवाले कस्टम ऑंफिसर किस वतन का था?
उत्तर :
द्वाका का।

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प्रश्न 58.
“हमारी जमीन, हमारे पानी का मजा ही कुछ और है'” – किसने, किससे कहा?
उत्तर :
बंगाली कस्टम ऑफिसर ने सफ़िया से कहा।

प्रश्न 59.
अमृतसर के पुल पर चढ़ती हुई सफ़िया क्या सोच रही थी?
उत्तर :
किसका वतन कहाँ है – वह कस्टम के इस तरफ से या उस तरफ।

प्रश्न 60.
सिख बीबी ने सफ़िया को लाहौर के बारे में क्या बताया?
उत्तर :
लाहौर बड़ा ही प्यारा शहर है। वहाँ के लोग कैसे खूबसूरत होते हैं, उम्दा खाने और नफीस कपड़ों के शौकीन, सैर-सपाटे के रसिया, जिंदादिली की तस्वीर।

प्रश्न 61.
लाहौर से सौगात मंगवाने के बारे में पूछने पर सिख बीबी ने क्या कहा?
उत्तर :
“अगर ला सको तो थोड़ा-सा लाहौरी नमक लाना।”

प्रश्न 62.
लाहौर से नमक ले जाने के बारे में सफिया ने किससे पूछने को सोचा ?
उत्तर :
अपने बड़े भाई से।

प्रश्न 63.
किस पर भावना के स्थान पर बुद्धि थीरे-धीरे हावी हो रही थी?
उत्तर :
सफिया पर।

प्रश्न 64.
भावना के स्थान पर बुद्धि के हावी होने का क्या अर्थ है?
उत्तर :
हरेक काम केवल भावनाओं में बहकर नहीं किया जा सकता। कभी-कभी भावना के स्थान पर बुद्धि से काम लेना अच्छा होता है।

प्रश्न 65.
कानून कब हैरान रह जाता है?
उत्तर :
मुहब्बत के आगे जब कस्टमवाले भी हार जाते हैं तब कानून हैरान रह जाता है।

प्रश्न 66.
सिख बीबी सफिया की ओर क्यों आकर्षित हुई?
उत्तर :
सिख बीबी भी लाहौर की थी और सफिया भी – इसलिए वह सफिया की ओर आकर्षित हुई।

प्रश्न 67.
कब सफिया के पैर तले की जमीन खिसकने लगी? क्यों?
उत्तर :
जब अमृतसर के कस्टम ऑफिसर ने सफिया को कुर्सी पर बिठाकर एक पुलिसवाले को ईशारा किया तब उसके पैर तले की जमीन खिसकने लगी। उसे लगा कि कस्टम औंकिसर उसे गिरफ्तार करवा देगा।

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प्रश्न 68.
‘नमक’ कहानी में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किस कवि का जिक्र है?
उत्तर :
रवीन्द्रनाध टैगोर का।

प्रश्न 69.
‘नमक’ कहानी में किन तीन कवियों का जिक्र है?
उत्तर :
इकबाल, रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा नजरूल इस्लाम।

प्रश्न 70.
अमृतसर में जाँच करने वाले कस्टम अधिकारी का नाम क्या है?
उत्तर :
सुनील दासगुप्त।

प्रश्न 71.
सुनील दासगुप्त को उसके किस मित्र ने कौन-सी किताब, कब दी थी?
उत्तर :
शमसुल इस्लाम ने सुनौल दास गुप्त के जन्मदिन पर सन् 1946 में।

प्रश्न 72.
सुनील दास गुप्त सफ़िया के किस प्रश्न का थोड़ा बुरा मान गए।
उत्तर :
वतन के बारे में पूछ्छे पर वे थोड़ा बुरा मान गए।

प्रश्न 73.
“हमारी जमीन, हमारे पानी का मजा ही कुछ और है” – हमारी जमीन का आशय किससे है?
उत्तर :
ढाका से।

प्रश्न 74.
जब सफ़िया अमृतसर के पुल पर चढ़ रही थी तब कस्टम अधिकारी सुनील दास गुप्त क्या कर रहे थे?
उत्तर :
पुल की सबसे निचली सीढ़ी के पास सिर झुकुकाए चुपचाप खड़े थे।

प्रश्न 75.
कस्टम अधिकारी सुनील दासगुप्त की उपहार स्वरूप प्राप्त पुस्तक के पहले सफ़े (पन्ना) पर क्या लिखा था?
उत्तर :
“शमसुल इस्लाम की तरफ से सुनील दासगुप्त को प्यार के साथ, ढाका 1961 ।”

प्रश्न 76.
सबसे पहले सफ़िया ने कहाँ नमक छिपाने का निश्चय किया?
उत्तर :
कीनुओं की टोकरी में।

प्रश्न 77.
“बाकी सब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा”‘ – किसके ठीक होने की बात कही जा रही है?
उत्तर :
हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आपसी संबंधों के ठीक होने की बात कही जा रही है।

प्रश्न 78.
पुलिसवाला सफ़िया को क्यों घूरता चला गया?
उत्तर :
कस्टमवाले सामान्य यात्री के लिए चाय नहीं मंगाते और न ही उनकी खातिरदारी करते हैं इसलिए पुलिसवाला सफ़्रिया को घूरता चला गया।

प्रश्न 79.
“इनके सामान का ध्यान रखिएगा” – कौन, किसके समान का ध्यान रखने को कह रहा है?
उत्तर :
अमृतसर के दो कस्टम अधिकारी एक-दूसरे से सफ़िया के सामान का ध्यान रखने को कह रहे हैं।

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प्रश्न 80.
सफ़िया को बचपन में सुनी कौन-सी कहानी याद आने लगी?
उत्तर :
शहजादों की कहानी।

प्रश्न 81.
किन दोनो के हाथों में भरी हुई बंदूके थीं?
उत्तर :
हिन्दुस्तानी तथा पाकिस्तानी पुलिस के हाथों में।

प्रश्न 82.
नमक की पुड़िया को कीनू की टोकरी की तह में रखने के बाद सफ़िया को कैसा महसूस हुआ?
उत्तर :
उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसने अपने किसी प्यारे को कझ की गहराई में उतार दिया हो।

प्रश्न 83.
सफ़िया किसे देखकर हैरान रह गई थी ?
उत्तर :
सफ़िया सिख बीबी (औरत) को देखकर हैरान रह गई थी।

प्रश्न 84.
नमक कहानी किस भारतीय-ऐतिहासिक घटना को आधार बनाकर लिखी गई है ?
उत्तर :
भारत-विभाजन की ऐतिहासिक घटना को आधार बनाकर लिखी गई हैं।

प्रश्न 85.
‘जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहिएगा”‘ – कौन किससे कहता है ?
उत्तर :
पाकिस्तानी कस्टम ऑंफिसर ने सफ्रिया से कहा ।

प्रश्न 86.
सफ़िया नमक क्यों ले जाना चाहती थी?
उत्तर :
सफ़िया ने सिख बीबी से लाहौरी नमक लाने का वायदा किया था इसलिए वह नमक ले जाना चाहती थी।

प्रश्न 87.
‘अदीब’ किसे कहते हैं ?
उत्तर :
लेखक/लेखिका को ही ‘अदीब’ कहते हैं।

प्रश्न 88.
सफ़िया ने नमक को कहाँ छुपाने के बारे में सोचा ?
उत्तर :
सफिया ने नमक को कीनू की टोकरी में हुपाने के बारे में सोचा ।

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प्रश्न 89.
सिख बीबी अपना मूल वतन किसे मानती है ?
उत्तर :
लाहौर को ।

प्रश्न 90.
सफ़िया को लाहौर और अमृतसर में अंतर क्यों नहीं प्रतीत हुआ ?
उत्तर :
जिमखाना की शामें, दोस्तों की मुहब्बत, भाइयों की खातिरदारियाँ और सुहाने मौसम के कारण सफ़िया को लाहौर और अमृतसर में अंतर नही प्रतीत हुआ ।

प्रश्न 91.
सिख बीबी ने कौन-सी सौगात मँगाई थी ?
उत्तर :
लाहौरी नमक।

प्रश्न 92.
सफ़िया के भाई ने अदीबों पर व्यंग्य क्यों किया ?
उत्तर :
अदीब दिमाग की बजाय दिल से सोचते हैं इसालिए सफ़िया के भाई ने अदीबों पर व्यग्य किया ?

प्रश्न 93.
सफ़िया को बचपन में सुनी कहानियाँ क्यों याद आने लगी ?
उत्तर :
सफ़िया को बचपन में सुनी कहानियाँ इसलिए याद आने लगी क्योंकि उसमें शहजादा अपनी रानों (जांघ) को चीर कर हीरे छिपा लेता था – और उसके सामने भी लाहौरी नमक छिपाने की समस्या थी।

प्रश्न 94.
‘हाँ, मेरा वतन ढाका है’ – यह कौन किससे कहता है ?
उत्तर :
सुनौल दास गुप्त, कस्टम ऑंफिसर सफ़िया से कहता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. ‘नमक’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 2. ‘नमक’ कहानी का मूल भाव अपने शब्दों में लिखें।
अथवा
प्रश्न 3. नमक कहानी के माध्यम से लेखिका ने हमें क्या संदेश देना चाहा है?
अथवा
प्रश्न 4. नमक’ कहानी को सारांश लिखते हुए उसके उद्केश्य पर प्रकाश डालें।
अथवा
प्रश्न 5. ‘नयक’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालें।
अथवा
प्रश्न 6. ‘नमक’ कहानी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की एकता का पाठ पडाने वाली कहानी है । अपने विचार लिखें।
अथवा
प्रश्न 7. “मुहष्बत को कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है”, के आधार पर ‘चमक’ कहानी की विशेषताओं तथा उदेश्य को लिखें।
अथवा
प्रश्न 8. नमक कहानी में व्यक्त लेखिका के विचारों को अपने शब्दों में लिखें।
आथवा
प्रश्न 9. नमक’ भारत-पाक विभाजन के बाद विस्थापित लोगों के दिलों को टटोलती मार्मिक कहानी है – समीक्षा करें।
अथवा
प्रश्न 10. ‘क्या सब कानून हुकूमत के ही होते है” के आधार पर ‘नमक’ कहानी में व्यक्त लेखिका के विचारों की लिखें।
अथवा
प्रश्न 11. “पेरी तरफ से कहिएगा कि लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा’- पंक्ति के आधार पर ‘नमक’ कहानी में व्यक्त लेखिका के संदेश को लिखें।
अशवा
प्रश्न 12. “एक जमीन थी, एक जबान थी, एक-सी सूरतें और लिबास, एकरस लबोलहजा और अंदाज” पैक्ति के आशार पर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालें।
अभवा

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 4 नमक

प्रश्न 13.
नमके कहानी की मार्मिकता पर अपने विवार व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
रज़िया सज्ज़ाद ज़हीर की कहानी ‘नमक’ भारत-पाकिस्तान के आम लोगों के संबंधों पर आधारित मर्मस्पर्शी कहानी है।
कहानी के प्रारंभ में सफ़िया सिख बीवी से एक कीर्तन में मिलती है। वह उसकी ओर सहज ही आकर्षित हो जाती है क्योकि उसका चेहरा बिल्कुल सफिया की माँ से मिलता है। वह भारत-विभाजन के पहले ही इस दुनिया से विदा हो चुकी है। सफिया के मुसलमान होने तथा उसके लाहौर जाने के बारे में घर की बहू से पता चलता है। सिख बीवी का वतन भी

बँटवारे के पहले लाहौर ही था लेकिन वे आज भी उसे वतन मानती है। लाहौर की वह जी भर प्रशंसा करती है। सफिया के यह पूछने पर कि क्या वह लाहौर से कुछ सौगात मँगवाना चाहेगी, सिख बीवी उसे लाहौरी नमक लाने को कहती है।

पंद्रह दिन लाहौर में अपने भाइयों तथा अपने पुरानों अजीजों के साथ वह हिन्दुस्तान आने की तैयारी करती है। समस्या एक ही है कि लाहौरी नमक को कैसे ले जाया जाय क्योंकि उसे पाकिस्तान से हिन्दुस्तान ले जाना कानूनन जुर्म है। वह तय करती है कि कीनुओं की टोकरी में उसे छिपाकर ले जएगी। लेकिन अंत में वह निश्चय करती है कि मुहब्बत के इस सौगात को छिपाकर नहीं कस्टम ऑफिसर को बताकर ले जाएगी।

लाहौर तथा अमृतसर-दोनों के ही कस्टम ऑफिसर सारी बातें जानने के बाद सफ़िया के साथ नरमी से पेश आते हैं तथा नमक ले जाने की इजाजत दे देते हैं। लाहौर के कस्टम ऑफिसर ने चलते वक्त कहा भी – “मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है। “बहुत कुछ यही हाल अमृतसर के कस्टम ऑंकिसर सुनील दास गुप्त का भी है।

सफ़िया अमृतसर के रेलवे प्लेटफार्म के पुल पर चढ़ती हुई सोचती है कि हमारे रहनुमाओं ने भले ही हिन्दुस्तानपाकिस्तान और बांग्लादेश को सरहदों में बाँट रखा हो लेकिन लोगों के दिल नहीं बैटे। लोगों के दिलों के बीच कोई सरहद नहीं है।

यह सही है कि बँटवारे के बाद पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध अच्छे नहीं रहे हैं। आज भी अच्छे नहीं हैं लेकिन आप लोगों के दिलों में कहीं कोई भेदभाव नहीं है। लोग आज भी अपने वतन की यादों की खुशबू में खोए रहते हैं। हमारा हिन्दुस्तान कभी भी धर्म या मजहब के खाने में नहीं बँटा था। भक्तिकाल के कवि तुलसीदास, जो वर्ण-व्यवस्था को मानने वाले तथा परम्मरा के अनुयायी थे, ने भी कहा था –

“माँगी के खाइबो, मसीत (मस्जिद) : में सोइबो।”
जहाँ तक दोनों देशों के आपसी संबंधों के रफ्ता-रफ्ता सुधरने की बात है, उसके आसार नजर नहीं आते। शिक्षा में भी साप्रदायिक घुसपैठ शुरू कर दी गई है। पाकिस्तान में इतिहास को भी तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। आए दिन उसकी आतंकबादी गतिविधियों के कारण हमें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में चाहे वह हिंदुस्तान हो या पाकिस्तान या फिर बांग्लादेश- विभाजन का दर्द उन्हें ही झेलना पड़ रहा है क्योंकि आम आदमी आजाद होकर भी सरहदों का गुलाम है –

सत्ता – परिवर्तन में सौदा करने पर कत्लेआम हुआ
हिसा – नफरत पर रखी गई आज़ादी की आधारशिला आज़ाद हुआ बस लाल किला।
लेखिका सफ़िया की इस कहानी के माध्यम से राष्ट्रीय एकता का संदेश देना ही मुख्य उद्देश्य है। उन्हें अपने उद्देश्य में पूरी-पूरी सफलता मिली। कहानी का शीर्षक ‘नमक’ भी अपने-आप में सार्थक है क्योंकि कहानी के केंद्रबिंदु में नमक हो है।

प्रश्न 14. नमक कहानी के प्रमुख पात्र का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 15. ‘गमक’ कहानी के जिस पात्र ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है उसका चरित्र-धित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 16. ‘नमक’ कहानी के आधार पर सफ़िया का चरित्र-चित्रण करें।
अथवा
प्रश्न 17. सफ़िया की चारित्रिक विशेषताओं को लिखें।
अथवा

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प्रश्न 18.
‘नमक’ कहानी के आधार पर लिखें कि सफ़िया के चरित्र की किन विशेषताओं ने आपको आकर्षित किया है।
उत्तर :
सफ़िया ‘नमक’ कहानी की मुख्य पात्र है। कहानी की लेखिका रजिया सज्जाद जहीर ने इस चरित्र की सृष्टि ही इस उद्देश्य से किया है कि पाठकों को भारत-पाकिस्तान एकता व धार्मिक एकता का पाठ पढ़ाया जा सके। इसीलिए सफिया के चरित्र ने हमें सबसे अधिक प्रभावित किया है। सफ़िया की चारित्रिक विशेषताओं को निम्नांकित शीर्षकों के अंतर्गत देखा जा सकता है-

(क) सभी धर्मों के प्रति समान भाव-सफिया के दिल में सभी धर्मों के प्रति समान आदर की भावना है। इसकी इस विशेषता का पता हमें उसके कीर्तन में शामिल होने से चलता है। वह वहाँ के माहौल में इस प्रकार घुल-मिल ज्ञाती है कि सिख बीवी उसे भी सिख ही समझ लेती है। घर की बहू के बताने पर वह यह जान पाती है कि सफ़िया मुसलमान है।

(ख) बड़ों के प्रति आदर की भावना – सफ़िया के दिल में अपनों से बड़ों के प्रति आदर की भावना है। सिख बीवी में अपनी माँ की छवि पाकर वह उनके साथ वैसा ही व्यवहार करती है जैसे वह उसकी अपनी माँ हो। इतना ही नहीं जब उसे पता चलता है कि सिख बीवी भी लाहौर से हैं तो उनसे निवेदन करती है कि – ” आप लाहौर से कोई सौगात मँगाना चाहें तो मुक्षे हुक्म दीजिए।”

(ग) वायदे को निभानेवाली – सफ़िया ने सिख बीवी से यह वायदा किया था कि वह सौगात के तौर पर पाकिस्तान से उनके लिए लाहौरी नमक लेकर आएगी। वहाँ जाकर उसे पता चलता है कि ऐसा करना कानून जुर्म है फिर भी वह काफी परेशानी झेलकर भी उनके लिए नमक लाती है। अपने किए गए वायदे को पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने को तैयार हो जाती है – “लेकिन फिर उस वायदे को क्या होगा जो हमने अपनी माँ से किया था? … फिर वायदा करके झुठलाने के क्या मायने? जान देकर भी वायदा पूरा करना होगा।

(घ) मुहब्यत के कानून को सबसे ऊपर मानने वाली – जब सफ़िया को अपने पुलिस अफसर भाई से यह पता चलता है कि वह अपने साथ लाहौरी नमक लेकर हिन्दुस्तान नहीं ले जा सकती तो उसका दिल बगावत कर उठता है। जब भाई उसे बार-बार इस बात को समझने की कोशिश करता है तो उसी पर बिगड़ पड़ती है- “अरे, फिर वही कानून-कानून कहे जाते हो! वया सब कानून हुकूमत के ही होते हैं, कुछ मुहब्बत, मुरौन्यत, आदमियत, इसानियत के नहीं होते?”

(ङ) सचचाई का साथ लेने वाली – सफ़िया बुरे वक्त में भी सच्चाई का साथ छोड़ने वाली नहीं है। नमक ले जाने के कानूनी अड़चन जानने के बाद भी वह निश्चय करती है कि वह नमक छिपाकर नहीं कस्टम वालों को बताकर ले जाएगी। वह नमक के बारे में पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान-दोनों के कस्टम आंफिसर को सच-सच बता देती है। दोनों उसकी सच्चाई से प्रभावित होकर कानून को नजर अदाज कर नमक ले जाने की इजाजत दे देते हैं।

कानून मुहब्बत से हार जाता है। पाकिस्तानी कस्टम ऑंफिसर तो यह कहता है – “‘मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।” इस प्रकार हम पाते हैं कि सफिया के चरित्र के माध्यम से लेखिका ने दोनों देशों के दिलों को टटोला है। अपने-पराए, देस-परदेश की प्रचलित धारणाओं पर सवाल खड़े किए हैं कि – ‘किसका वतन कहाँ है- वह कस्टम के इस तरफ है या उस तरफ।”

प्रश्न 19. नमक ले जाने के बारे में सफिया के मन में उत्पन्न द्वन्दू का वर्णन कीजिए।
अथवा
प्रश्न 20. “मुझे तो लाहौर का नमक चाहिए, मेरी माँ ने यही मेंगवाया है” – के आधार पर सफ़िया के मन में उत्पन्न द्वन्द्य का वर्णन कीजिए।
अथवा
प्रश्न 21. “तो मजबूरी है, छोड़ देंगे।”- पंक्ति के आधार पर सफिया के मानसिक द्वन्द्व के बारे में लिखें।
अथवा
प्रश्न 22. ‘लेकिन फिर उस वायदे का क्या होगा जो हमने अपनी माँ से किया था” – के आधार पर सफ़िया के मन में उत्पन्न द्वन्दू के बारे में लिखें।
अथवा
प्रश्न 23. “यही ठीक है, फिर देखा जाएगग” – के आधार पर सफ़िया के मानसिक दूंद का वर्णन करें। अथवा
प्रश्न 24. “वह अपना दिल चीरकर उसमें यह नमक छिपा लेती” – के आधार पर सफ़िया के मानसिक द्वंद्व का वर्णन करें
अथवा
प्रश्न 25. इतने कीनुओं के ढेर में भला कौन इसे देखेगा- के आधार पर सफिया के मानसिक द्वंद्व का वर्णन करें।
अथवा
प्रश्न 26. मानो उसने अपने किसी प्यारे को कब्र की गहराई में उतार दिया हो – पंक्ति के आधार पर सफ़िया के मानसिक दूंद्व का वर्णन करें।
अथवा
प्रश्न 27. छुपा के जाऊंगी? मैं तो दिखा के, जता के ले जाऊँगी – पंक्ति के आधार पर सफ़िया के मानसिक द्वंद्व का वर्णन करें।
अथवा
प्रश्न 28. मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा – प्रस्तुत कथन के आधार पर सफ़िया के मानसिक द्वंद्ध का वर्णन करें।
अथवा

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प्रश्न 29.
“जान देकर भी वायदा पूरा करना होगा” – पंक्ति के आधार पर लाहौरी नमक के बारे में सफ़िया के मानसिक दूंद्व का वर्णन करें।
उत्तर :
सफ़िया ने लाहौर आने से एक दिन पहले सिख बीवी से सौगात के तौर पर लाहौरी नमक लाने का वायदा किया था। लाहौर से लौटते समय उसके सामने सबसे बड़ी समस्या यह पैदा हो गई कि इस नमक को वह हिन्दुस्तान कैसे ले जाए। ऐसा करना कानूनन जुर्म था। सफिया के पुलिस ऑफिसर भाई ने उसे इसके बारे में समझाते हुए कहा कि, ‘ देखिए बाजी! आपको कस्टम से गुजरना होगा और अगर एक भी चीज ऐसी-वैसी निकल आई तो आपके सामान की चिंदी-चिंदी बिखेर देंगे कस्टमवाले।”

सफ़िया इस कानून को मानने को तैयार न थी। उसका तर्क था कि “क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं, कुछ मुहब्बत, मुरौव्वत, आदमियत, इंसायनित के नहीं होते ?’

फिर उसके मन में भय पैदा होता है तथा वह सोचती है कि अगर ऐसा है तो वह नमक छोड़ देगी। लेकिन दूसरे ही पल उसे अपने किए वायदे का ख्याल आता है। वह निश्चय करती है कि नमक को वह कीनुओं की टोकरी में छिपाकर ले जाएगी। उसने देखा था कि कस्टमवाले फलों की टोकरी की तलाशी नहीं लेते।

सोफिया जैसे ही कस्टम पर जाँच के लिए पहुँची उसने अचानक अपना फैसला बदल दिया- “मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा, नमक कस्टमवालों को दिखाएगी वह।” और वह ऐसा ही करती है। पाकिस्तान तथा हिन्दुस्तान दोनों के ही कस्टम ऑफिसर सफिया की पूरी कहानी सुनने के बाद उसे नमक ले जाने की इजाजत दे देते हैं। हुकूमत के कानून के ऊपर मुहब्बत, इंसानियत के कानून की जीत होती है तथा अमृतसर आते-आते उसका यह दूंद्व एक प्रश्न में बदल जाता है- ‘किसका वतन कहाँ है – वह कस्टम के इस तरफ है या उस तरफ।”

नमक को लेकर सफिया का द्वंद हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के आपसी संबंधों तथा दोनों देशों के हार्दिक पहलू को परतदर-परत उघाड़ देता है और एक सवाल भी छोड़ जाता है कि क्या अब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा?

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
सिख बीबी ने सफिया को लाहौर से क्या लाने के लिए कहा था?
(क) सेब
(ख) नमक
(ग) संतरा
(घ) पैसा
उत्तर :
(ख) नमक

प्रश्न 2.
‘मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।’ यह अंश किस कहानी से लिया गया है?
(क) धावक
(ख) उसने कहा था
(ग) नमक
(घ) सिरी उपमा जोग
उत्तर :
(ग) नमक।

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प्रश्न 3.
सफिया लाहौर ____ महीने में गई थी।
(क) मार्च
(ख) अप्रैल
(ग) फरवरी
(घ) अगस्त
उत्तर :
(क) मार्च।

प्रश्न 4.
‘नमक’ कहानी के रचनाकार कौन हैं ?
(क) गुलेरी
(ख) शिवमूर्ति
(ग) रजिया सज्जाद जहीर
(घ) कृष्णा सोबती
उत्तर :
(ग) रजजिया सज्जाद जहीर।

प्रश्न 5.
‘जर्द गुलाब’ (उर्दू कहानी-संग्रह) किसकी रचना है?
(क) कृष्णा सोबती की
(ख) रजजिया सज्जाद जहीर की
(ग) प्रेमचंद की
(घ) जयशंकर प्रसाद की
उत्तर :
(ख) रज़िया सज्जाद जहीर की।

प्रश्न 6.
किसे देखकर सफ़िया हैरान रह गई थी?
(क) लाहौर को
(ख) सिख बीबी को
(ग) कस्टम आंफिसर को
(घ) इकबाल को
उत्तर :
(ख) सिख बीबी को।

प्रश्न 7.
सिख बीबी की शक्ल किससे मिलती थी?
(क) सफिया की माँ से
(ख) सफ़िया की बहन से
(ग) सफिया की भाभी से
(घ) सफिया की बहू से
उत्तर :
(क) साफिया की माँ से।

प्रश्न 8.
भारी-भरकम जिस्म किसका था?
(क) कस्टम ऑंफिसर का
(ख) सफ़िया के भाई का
(ग) सिख बीबी का
(घ) सफ़िया की बहू का
उत्तर :
(ग) सिख बीबी का।

प्रश्न 9.
“चेहरा जैसे कोई खुली हुई किताब”‘ – यहाँ किसके चेहरे के बारे में कहा गया है?
(क) सफ़िया
(ख) सुनील दास गुप्त
(ग) इकवाल
(घ) सिख बीबी
उत्तर :
(घ) सिख बीबी।

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प्रश्न 10.
सफ़िया ने कई बार किसकी ओर मुहब्बत से देखा?
(क) सिख बीबी की ओर
(ख) भतीजे- भतीजी की ओर
(ग) भाई की ओर
(घ) कस्टम ऑफिसर की और
उत्तर :
(क) सिख बीबी की ओर ।

प्रश्न 11.
“जब हिन्दुस्तान बना था तभी आए थे” – वक्ता कौन है?
(क) सफिया
(ख) सुनील दासगुप्त
(ग) सिख बीबी
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ग) सिख बीबी।

प्रश्न 12.
कीर्तन कितने बजे खत्म हुआ?
(क) दस बजे
(ख) बारह बजे
(ग) नौ बजे
(घ) ग्यारह बजे
उत्तर :
(घ) ग्यारह बजे।

प्रश्न 13.
“साडा लाहौर” – वक्ता कौन है?
(क) सक्रिया
(ख) सिख बीबी
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) सिख बीबी।

प्रश्न 14.
“लाहौर बहुत याद आता है” – किसे लाहौर बहुत याद आता है?
(क) सफिया
(ख) सुनील दासगुप्त
(ग) बहू
(घ) सिख बौबी
उत्तर :
(घ) सिख बीबी।

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प्रश्न 15.
सिख बीबी ने किस रंग का दुपट्टा ओढ़ा था?
(क) लाल
(ख) नौला
(ग) पीला
(घ) सफेद
उत्तर :
(घ) सफेद्।

प्रश्न 16.
सफ़िया कहाँ जा रही थी?
(क) पाकिस्तान
(ख) अफगानिस्तान
(ग) डाका
(घ) हिन्दुस्तान
उत्तर :
(क) पाकिस्तान।

प्रश्न 17.
‘सफ़िया’ किस कहानी की पात्र है?
(क) चपल
(ख) नमक
(ग) ढाका
(घ) नन्हा संगीतकार
उत्तर :
(ख) नमक।

प्रश्न 18.
‘जिंदादिली की तस्वीर’ किसे कहा गया है?
(क) सिख्ब बीबी को
(ख) सफ़िया को
(ग) लाहौर वालों को
(घ) अमृतसर वालों को
उत्तर :
(ग) लाहौर वालों को।

प्रश्न 19.
“सब ठीक ही है” – वक्ता कौन है ?
(क) सफ़िया
(ख) सफ्रिया का भाई
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) सिख बीबी
उत्तर :
(घ) सिख बीबी।

प्रश्न 20.
सफ़िया पाकिस्तान में कितने दिन रही?
(क) दस
(ख) पन्द्रह
(ग) बीस
(घ) पचीस
उत्तर :
(ख) पन्द्रह।

प्रश्न 21.
मेरी माँ ने यही मँगवाया है – वक्ता कौन है?
(क) सफ़िया का भाई
(ख) सुनील दासगुप्त
(ग) सिख बीबी
(घ) सफ़िया
उत्तर :
(घ) सफिया।

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प्रश्न 22.
“मुझे तो लाहौर का नमक चाहिए” – वक्ता कौन है ?
(क) सिख बीबी
(ख) सफ्रिया
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) सफ़िया।

प्रश्न 23.
“आपको कस्टम से गुज़रना होगा” – वक्ता कौन है?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) सिपाही
(ग) सफ़िया का भाई
(घ) सिख बीबी
उत्तर :
(ग) सफ़िया का भाई।

प्रश्न 24.
‘वे तो बँटवारे से पहले ही मर चुकी थीं – ‘वे’ कौन हैं ?
(क) सिख बीबी
(ख) सफ्रिया की माँ
(ग) सफ़िया की बहन
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) सफ़िया की माँ 1

प्रश्न 25.
“आपलोगों के हिस्से में तो हमसे बहुत ज्यादा नमक आया है” – वक्ता कौन है ?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) सफ्रिया
(ग) सफ़िया का भाई
(घ) पुलिस
उत्तर :
(ग) सफिया का भाई।

प्रश्न 26.
“सिर्फ दो चीजें रह गई” – कौन-सी दो चीजें रह गई?
(क) टी० वी० और नमक
(ख) कीनू और नमक
(ग) संतरा और नमक
(घ) सूटकेस और बिस्तरबंद
उत्तर :
(ख) कीनू और नमक ।

प्रश्न 27.
माल्टे की तरह रंगीन और मीठा, संतरे की तरह नाजुक किसे कहा गया है?
(क) कीनू को
(ख) सिख बीबी को
(ग) सफ़िया को
(घ) लाहौरवालों को
उत्तर :
(क) कीनू को

प्रश्न 28.
‘हम अपने को सैयद कहते हैं” – वक्ता कौन है ?
(क) सफ्रिया का भाई
(ख) संफ्रिया
(ग) लाहौरवाले
(घ) अमृतसरवाले
उत्तर :
(ख) सफ़िया।

प्रश्न 29.
“एक समस्या थी” – समस्या क्या थी?
(क) कस्टमवालों को समझ्षाना
(ख) सिख बीबी को समझाना
(ग) सफ़िया को समझाना
(घ) लाहौरी नमक ले जाना
उत्तर :
(घ) लाहौरी नमक ले जाना।

प्रश्न 30.
बिछुड़ी हुई परदेसी बहन कौन है?
(क) सिख बीबी
(ख) संफ़िया
(ग) लेखिका
(घ) लाहौर की स्त्वियाँ
उत्तर :
(ख) सफ़िया।

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प्रश्न 31.
“फिर वायदा करके झुठलाने के क्या फायदे'” – किसने कहा?
(क) सफ्रिया ने
(ख) सिख बीबी ने
(ग) भतीजियों ने
(घ) बहुओं ने
उत्तर :
(क) सफ़िया ने।

प्रश्न 32.
सब लाहौर/पाकिस्तान से कौन-सा फल हिंदुस्तान ला रहे थे?
(क) आम
(ख) केला
(ग) लीची
(घ) कीनू
उत्तर :
(घ) कीनू।

प्रश्न 33.
हिन्दुस्तान से लोग पाकिस्तान कौन-सा फल सौगात के रूप में ले जा रहे थे?
(क) केले
(ख) कीनू
(ब) चीक्
(घ) नारंगी
उत्तर :
(क) केले।

प्रश्न 34.
रज़िया सज्जाद जहीर का जन्म कहाँ हुआ था?
(क) अमृतसर
(ख) लाहौर
(ग) अजमेर
(घ) अटारी
उत्तर :
(ग) अजमेर।

प्रश्न 35.
सफ़िया के बाप की कब्न कहाँ थी?
(क) अमृतसर में
(ख) अजमेर में
(ग) लखनऊ में
(घ) लाहौर में
उत्तर :
(घ) लाहौर में।

प्रश्न 36.
आप हिन्दुस्तान में क्यों रही हैं – वक्ता कौन है ?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) सिख बीबी
(ग) भतीजा-भतीजी
(घ) बहू.
उत्तर :
(ग) भतीजा-भतीजी।

प्रश्न 37.
सपने में सफिया ने किसका मकबरा देखा?
(क) पीर का
(ख) इकबाल का
(ग) मिर्जा गालिब का
(घ) नजरूल इस्लाम का
उत्तर :
(ख) इकबाल का।

प्रश्न 38.
‘यह हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा है”-वक्ता कौन है ?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) भाई
(ग) सफिया का दोस्त
(घ) सिख बीबी
उत्तर :
(ग) सफ़िया का दोस्त।

प्रश्न 39.
किसे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा कहा गया है?
(क) काजू को
(ख) किशमिश को
(ग) छुहारा को
(घ) कीनू को
उत्तर :
(घ) कीनू को।

प्रश्न 40.
लाहौरी नमक के बारे में सफ़िया ने क्या फैसला किया?
(क) वह नमक नहीं ले जाएगी
(ख) मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा
(ग) मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से ही जाएगा
(ब) वह सिख बीबी को दिया वचन वापस ले लेगी।
उत्तर :
(ख) मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा।

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प्रश्न 41.
“मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ ?” – वक्ता कौन है?
(क) सफ़िया
(ख) सिख बीबी
(ग) बहू
(घ) भतीजी
उत्तर :
(क) सफ़िया।

प्रश्न 42.
‘आप कहाँ के रहनेवाले हैं ?’ – ‘आप’ से कौन संकेतित है ?
(क) सफ़िया
(ख) सिख बीबी
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) सुनील दासगुप्त
डत्तर :
(ग) कस्टम ऑफिसर।

प्रश्न 43.
“मैं लखनऊ की हूँ” – कौन लखनऊ की है?
(क) सिख बीबी
(ख) सफ़िया
(ग) पोली
(घ) बहू
उत्तर :
(ख) सफ़िया।

प्रश्न 44.
‘वे लोग इधर आ गए हैं’ – ‘वे’ से कौन संकेतित है?
(क) सफिया के भाई
(ख) सफिया की बहन
(ग) सफ्रिया के पति
(घ) सफ़िया के ससुरालवाले
उत्तर :
(क) सफ़िया के भाई।

प्रश्न 45.
‘मगर हमारा वतन तो देहली ही है” – वक्ता कौन है?
(क) सिख बीबी
(ख) सफ़िया
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) सफिया का बड़ा भाई
उत्तर :
(ग) कस्टम ऑफिसर।

प्रश्न 46.
“जब पाकिस्तान बना था तभी आए थे” – वक्ता कौन है?
(क) बह
(ख) सफ्रिया
(ग) सिख बीबी
(घ) कस्टम ऑफिसर
उत्तर :
(घ) कस्टम ऑंकिसर।

प्रश्न 47.
कस्टम ऑफिसर ने सफ़िया से किसे अपना सलाम कहने को कहा?
(क) अब्बाजान को
(ख) इकबाल को
(ग) जामा मस्जिद्न की सीढ़ियों को
(घ) सिख बीबी को
उत्तर :
(ग) जामा मस्जिद् की सीढ़ियों को।

प्रश्न 48.
‘लाहौर अभी तक उनका वतन है”‘ – ‘उनका’ से कौन संकेतित है?
(क) सिख बीबी
(ख) जो बंटवारे के बाद भारत में रह गए
(ग) सफ़िया का भाई
(घ) इकबाल
उत्तर :
(क) सिख बीबी।

प्रश्न 49.
“इधर आइए ज़रा।” – वक्ता कौन है?
(क) सफ्रिया
(ख) सिख बीबी
(ग) पुलिस
(घ) सुनील दास गुप्त
उत्तर :
(घ) सुनील दास गुप्त।

प्रश्न 50.
किसके पैर तले की जमीन खिसकने लगी?
(क) सिख बीबी की
(ख) कस्टम ऑफिसर की
(ग) सफ़िया की
(घ) पुलिस की
उत्तर :
(ग) सफिया की

प्रश्न 51.
सुनील दास गुप्त को उपहार में मिली पुस्तक के बाईं ओर किसकी तस्वीर थी?
(क) नजरूल इस्लाम की
(ख) इकबाल की
(ग) टैगोर की
(घ) मिर्जा गालिब की
उत्तर :
(क) नजरूल इस्लाम की।

प्रश्न 52.
“अब उधर भी कुछ गोलमाल हो गया है” – ‘उधर’ से किसके बारे में कहा गया है?
(क) पाकिस्तान
(ख) हिन्दुस्तान
(ग) ढाका
(घ) लाहौर
उत्तर :
(ग) ढाका।

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प्रश्न 53.
‘हमारे यहाँ डाभ की क्या बात है’ – ‘हमारे यहाँ’ से अर्थ है?
(क) पाकिस्तान
(ख) हिन्दुस्तान
(ग) दाका
(घ) लाहौर
उत्तर :
(ग) ढाका।

प्रश्न 54.
“हमारी जमीन, हमारे पानी का मजा ही कुछ और है’ – ‘हमारी जमीन’ किसे कहा गया है?
(क) ढाका को
(ख) लाहौर को
(ग) लखनऊ को
(घ) श्रोलंका को
उत्तर :
(क) दाका को।

प्रश्न 55.
अमृतसर के पुल पर चढ़ते समय सफ़िया क्या सोच रही थी?
(क) अद वह कभी पाकिस्तान नहीं जाएगी
(ख) वह कभी नमक नहीं लाएगी
(ग) किसका वतन कहाँ है
(घ) लाहौर कहाँ खत्म हुआ
उत्तर :
(ग) किसका वतन कहाँ है?

प्रश्न 56.
‘नमक’ कहानी में किस महीने की सुहानी हवा के बारे में कहा गया है?
(क) मार्च
(ख) अप्रैल
(ग) मई
(घ) जून
उत्तर :
(क) मार्च।

प्रश्न 57.
सफ़िया का भाई क्या था?
(क) व्यापारी
(ख) वकील
(ग) पुलिस ऑफिसर
(घ) डॉक्टर
उत्तर :
(ग) पुलिस ऑंफिसर।

प्रश्न 58.
‘नमक’ कहानी का मुख्य विषय क्या है?
(क) लहौरी नमक की कहानी
(ख) हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की कहानी
(ग) हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के लोगों के आपसी संबंध की कहानी
(घ) पाकिस्तान से लाहौरी नमक लाना कठिन है
उत्तर :
(ग) हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के लोगों के आपसी संबंध की कहानी।

प्रश्न 59.
भारतीय कस्टम ऑफिसर कहाँ का था?
(क) भारत का
(ख) लाहौर का
(ग) दाका का
(घ) नेपाल का
उत्तर :
(ग) ढाका का ।

प्रश्न 60.
भाई और बहन के बीच कौन-सा मुद्दा कानूनी मुद्दा था?
(क) लाहौरी नमक का मुद्दा
(ख) पाकिस्तान के बंटवारे का मुद्धा
(ग) पाकिस्तान से लौटने का मुद्दा
(घ) कीनू ले जाने का मुद्दा
उत्तर :
(क) लाहौरी नमक का मुद्दा।

प्रश्न 61.
सफ़िया ने पहले नमक को कहाँ छिपाने का निश्चय किया?
(क) सूटकेस में
(ख) बिस्तर बंद में
(ग) कीनू की टोकरी में
(घ) हैंडबैग में
उत्तर :
(ग) कीनू की टोकरी में।

प्रश्न 62.
सफ़िया बचपन में किससे कहानियाँ सुना करती थी ?
(क) माँ से
(ख) बहन से
(ग) नानी से
(घ) दादी से
उत्तर :
(क) माँ से।

प्रश्न 63.
जामा मस्जिद कहाँ है?
(क) दिल्ली में
(ख) अज़मेर में
(ग) लखनऊ में
(घ) अमृतसर में
उत्तर :
(क) दिल्ली में ।

प्रश्न 64.
किसका नाम सुनकर सिख बीबी सफिया के पास आ बैठी ?
(क) कीर्तन का
(ख) प्रसाद का
(ग) नमक का
(घ) लाहौर का
उत्तर :
(घ) लाहौर का।

प्रश्न 65.
“देखिए बाजी”‘ – बाजी कौन है?
(क) सिख बीबो
(ख) सफ़िया
(ग) बहू
(घ) भतीजी
उत्तर :
(ख) सफ़िया।

प्रश्न 66.
‘वह हैरान होकर बोला” – ‘वह’ कौन है?
(क) पुलिस
(ख) कस्टम ऑफिसर
(ग) सुनील दासगुप्त
(घ) सफ़िया का भाई
उत्तर :
(घ) सफ़िया का भाई।

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प्रश्न 67.
“सिर्फ दो चीजें रह गई” – दो चीजें कौन थीं?
(क) संतरे और माल्टे
(ख) सूटकेस और बिस्तरबंद
(ग) कीनू और नमक की पुड़िया
(घ) कीनू और मेवे
उत्तर :
(ग) कीनू और नमक की पुड़िया।

प्रश्न 68.
“तो आप यहाँ कब आए?” – वक्ता कौन है?
(क) सफ़िया
(ख) सिख बीबी
(ग) भाई
(घ) कस्टम ऑंफिसर
उत्तर :
(क) सफ्रिया।

प्रश्न 69.
यही ठीक है फिर देखा जाएगा – वक्ता कौन है ?
(क) सिख बीबी
(ख) कस्टम ऑफिसर
(ग) सफ़िया
(घ) सुनील दासगुप्त
उत्तर :
(ग) सफ़िया।

प्रश्न 70.
“उसने एक आह भारी” – किसने आह भरी?
(क) सिख बीबी
(ख) सफ़िया
(ग) बहू
(घ) भतीजी
उत्तर :
(ख) सफ़िया।

प्रश्न 71.
“उसने सोचा कि वह ठीक राय दे सकेगा” – ‘वह’ से कौन संकेतित है?
(क) कस्टम ऑफिसर
(ख) सुनील दासगुप्त
(ग) सफ़िया का भाई
(घ) शमसुल इस्लाम
उत्तर :
(ग) सफ़िया का भाई।

प्रश्न 72.
“हो सकता है, साल भर बाद फिर आए” – पंक्ति किस पाठ से उद्धात है?
(क) चण्यल
(ख) नमक
(ग) धावक
(घ) नौबतखाने में इबादत
उत्तर :
(ख) नमक।

प्रश्न 73.
“हमें वहाँ से आए तो बहुत दिन हो गए” – वक्ता कौन है?
(क) सफ्रिया
(ख) सुनील दासगुप्त
(ग) सिख बीबी
(घ) शमसुल इस्लाम
उत्तर :
(ग) सिख बीबी।

प्रश्न 74.
“तो तुम कल चली जाओगी?” – वक्ता कौन है?
(क) सिख बीबी
(ख) भतौजी
(ग) सफ़िया का भाई
(घ) कस्टम ऑफिसर
उत्तर :
(ग) सफिया का भाई।

प्रश्न 75.
“अब कब आओगी?” – वक्ता कौन है?
(क) सफ़िया का भाई
(ख) सिख बीबी
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) सुनील दासगुप्त
उत्तर :
(क) सफ़िया का भाई।

प्रश्न 76.
”वह कुछ जाँच नहीं रही थी’ – वह कौन है?
(क) सफ़िया
(ख) वर्दी
(ग) सिख बीबी
(घ) नमक की पुड़िया
उत्तर :
(ख) वर्दी।

प्रश्न 77.
“लेकिन सिर्फ वही जानती है” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) चप्पल
(ख) नन्हा संगीतकार
(ग) नमक
(घ) धावक
उत्तर :
(ग) नमक।

प्रश्न 78.
“हीं, मेरा ढाका है।” – वक्ता कौन है?
(क) सुनील दास गुप्त
(ख) सफ़िया
(ग) सिख बीबी
(घ) कस्टम ऑफिसर
उत्तर :
(क) सुनील दास गुप्त।

प्रश्न 79.
“सफ़िया ने उसके पीछे चलना शुरू किया” – सफ़िया ने किसके पीछे चलना शुरू किया?
(क) भाई
(ख) सिख बीबी
(ग) सुनील दास गुप्त
(घ) भतीजी
उत्तर :
(ग) सुनील दास गुप्त।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 4 नमक

प्रश्न 80.
‘वह कस्टम के इस तरफ है या उस तरफ” – ‘वह’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(क) सफिया
(ख) सिख बीबी
(ग) वतन
(घ) जामा मस्जिद
उत्तर :
(ग) वतन।

प्रश्न 81.
‘”दो चाय लाओ, अच्छी वाली'” – प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
(क) चणल
(ख) नमक
(ग) नौबतखाने में इबादत
(घ) नन्हा संगीतकार
उत्तर :
(ख) नमक।

प्रश्न 82.
“अब क्या होगा” – प्रस्तुत पंक्ति किस पाठ से ली गई है?
(क) नमक
(ख) धावक
(ग) चपल
(घ) उसने कहा था
उत्तर :
(क) नमक।

प्रश्न 83.
“जब डिवीजन हुआ तभी आए” – वक्ता कौन है?
(क) सिख बीबी
(ख) सफिया
(ग) सुनील दास गुप्त
(घ) सफिया का भाई
उत्तर :
(ग) सुनील दास गुप्त।

प्रश्न 84.
‘मगर हमारा वतन ढाका है'” – वक्ता कौन है?
(क) सुनोल दास गुप्त
(ख) सफ़िया
(ग) सिख बीबी
(घ) सफ़िया का भाई
उत्तर :
(क) सुनील दास गुप्त।

प्रश्न 85.
“मैं तो कोई बारह-तेरह साल का था” – वक्ता कौन है?
(क) सिख बीबी
(ख) सफ़िया का भाई
(ग) सफ़िया का दोस्त
(घ) सुनील दास गुप्त
उत्तर :
(घ) सुनील दास गुप्त।

प्रश्न 86.
सफ़िया और सिख बीबी की पहली मुलाकात कहाँ हुई ?
(क) रेलगाड़ी में
(ख) सिनेमा हॉल में
(ग) कीर्त्तन में
(घ) लाहौर में
उत्तर :
(ग) कीर्त्तन में।

प्रश्न 87.
बंगाली-सा लगनेवाले कस्टम अधिकारी का नाम था ?
(क) अनिल कुमार गुप्ता
(ख) सुनील कुमार गुप्ता
(ग) सुनील दास गुप्ता
(घ) अनिल दास गुप्ता
उत्तर :
(ग) सुनील दास गुप्ता।

प्रश्न 88.
कीनू की टोकरी में क्या छिपाया गया ?
(क) नमक
(ख) चीनी
(ग) मोती
(घ) माला
उत्तर :
(क) नमक।

प्रश्न 89.
अटारी क्या है ?
(क) एक स्टेशन
(ख) एक शहर
(ग) सामान रखने की जगह
(घ) एक औजार
उत्तर :
(क) एक स्टेशन।

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प्रश्न 90.
पाकिस्तानी कस्टम ऑफिसर का वतन कहाँ था ?
(क) लाहौर में
(ख) सिंध में
(ग) अमृतसर में
(घ) दिल्ली में
उत्तर :
(घ) दिल्ली में।

प्रश्न 91.
भारतीय कस्टम ऑफिसर का वतन कहाँ था ?
(क) अमृतसर
(ख) लाहौर
(ग) द्वाका
(घ) दिल्ली
उत्तर :
(ग) द्वाका ।

प्रश्न 92.
‘नमक’ कहानी में किस नमक की चर्चा की गई है ?
(क) साधारण नमक
(ख) काला नमक
(ग) लाहौरी नमक
(घ) सेंधा नमक
उत्तर :
(ग) लाहौरी नमक ।

प्रश्न 93.
सफ़िया सौगात के तौर पर लाहौर से लाना चाहती थी –
(क) छुहारे
(ख) सेव
(ग) कीनू
(घ) लाहौरी नमक
उत्तर :
(घ) लाहौरी नमक।

प्रश्न 94.
‘मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा’ यहाँ किस तोहफे की बात हो रही है ?
(क) कीमती कपड़ों की
(ख) लाहौरी नमक की
(ग) कीनू की
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर :
(ख) लाहौरी नमक की।

प्रश्न 95.
“हमारी जमीन, हमारे पानी का मज़ा ही कुछ और ही है” – ‘हमारी जमीन’ किसे कहा गया है ?
(क) लाहौर को
(ख) अमृतसर को
(ग) ढाका को
(घ) श्रीलंका को
उत्तर :
(ग) दाका को ।

प्रश्न 96.
सफ़िया किसको देख कर हैरान रह गई थी ?
(क) सिख बीबी को
(ख) सुनील दास गुप्त को
(ग) मशहूर शायर इकबाल को
(घ) अपने भाई को
उत्तर :
(क) सिख बीबी को।

प्रश्न 97.
इकबाल का मकबरा किस शहर में है ?
(क) ढाका
(ख) लाहौर
(ग) दिल्ली
(घ) अमृतसर
उत्तर :
(ख) लाहौर।

प्रश्न 98.
“बे मुसलमान हैं” – किसके बारे में कहा गया है?
(क) सफ़िया
(ख) सफ़िया का भाई
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) सफिया के दोस्त
उत्तर :
(क) सफ़िया।

प्रश्न 99.
“लाहौर कितना प्यारा शहर है” – किसने कहा?
(क) संफ़िया
(ख) सिख बीबी
(ग) कस्टम ऑफिसर
(घ) सुनील दासगुप्त
उत्तर :
(ख) सिख बीब्री।

वस्तुनिष्ठ सह व्याख्यामूलक प्रश्नोत्तर

1. “आप अदीब ठहरीं और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा-सा तो जरूर घूमा हुआ होता है।”

प्रश्न :
बह किसका कथन है?
उत्तर :
यह कथन सफ़िया के पुलिस अफसर भाई का है।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति की प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
जब सफ़िया कानून की बात दरकिनार कर अपने भाई से कहती है कि ” क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं, कुछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत, इसानियत के नहीं होते ?” तो इसी के जवाब में भाई कहता है कि आप अदीब (लेखिका) ठहरीं और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा-सा तो जरूर घूमा हुआ होता है। कारण यह है कि अदीब दिमाग की बजाए दिल से ज्यादा काम लेते हैं।

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2. उन सिख बीबी को देखकर सफ़िया हैरान रह गई थी।
अथवा
3. वही भारी भरकम जिस्म, छोटी-छोटी चमकदार आँखें।
अथवा
4. चेहरा जैसे कोई खुली हुई किताब।

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रज़िया सज्जाद ज़हीर।

प्रश्न :
कौन, किसकी माँ से मिलती थी ?
उत्तर :
सिख बीबी की सूरत सफ़िया की माँ से मिलती थी।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
जब सफ़िया ने उस सिख बीबी को कीर्तन में देखा तो हैरानी से देखती रह गई थी। उसकी शक्ल-सूरत बिल्कुल उसकी माँ से मिलती थी जो कई साल पहले ही चल बसी थी। माँ की ही तरह उसका जिस्म भी भारी-भरकम, आँखे छोटी-छोटी पर चमकदार थीं। उनका चेहरा ऐसा था मानो खुली हुई किताब हो। कहने का भाव यह है कि कोई मी भाव उनके वेहरे पर आसानी से पढ़ा जा सकता था जैसे किसी खुली-किताब को पढ़ा जा सकता है।

5. उन्हें बताया गया ये मुसलमान हैं।
अथवा
6. कल ही सुबह लाहौर जा रही है।

प्रश्न :
किसे, किसके बारे में बताया गया?
उत्तर :
सिख बीबी को सफ़िया के बारे में बताया गया।

प्रश्न :
लाहौर कौन जा रही है?
उत्तर :
सफ़्रिया लाहौर/पाकिस्तान जा रही है।

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
जिस तरह सफ़िया सिख यीबी की तरफ आकर्षित हुई थीं ठीक उसी प्रकार सिख बीबी भी सफ़िया की ओर आकर्षित हुई। जब सफिया ने कई बार प्रेम की नजजरों से उनकी और देखा तो सिख बीबी ने घर की बहू से पूछा। बहू ने सिख बीबी को सफ़िया के बारे में बताया कि वह सिख नहीं मुसलमान है तथा कल ही अपने भाइयों से मिलने पाकिस्तान जा रही है। कीर्तन में शामिल होने के कारण सिख बीबी अभी तक सफ़िया को मुसलमान न समझजकर सिख ही समझ रही थीं।

7. उनका लाहौर कितना प्यारा शहर है।
अथवा
8. वहाँ के लोग कैसे खूबसूरत होते हैं।
अथवा
9. उम्दा खाने और नफीस कपड़ों के शौकीन।
अथवा
10. सैर-सपाटे के रसिया, जिंदादिली की तस्वीर।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
सिख बीवी भी मूलत: लाहौर की ही थीम। भारत-विभाजन के समय उन्हें लाहौर छोड़ना पड़ा था। जब उन्हें सफिया के लाहौर जाने के बारे में पता चला तो उन्होंने वहाँ की तारीफों के पुल बाँध दिए कि लाहौर बहुत ही प्यारा शहर है और वहाँ के लोग भी उतने ही प्यारे हैं। वहाँ के लोग खूबसूरत, अच्छे खाने-कपड़े के शौकान, घूमने-फिरने के शौकीन तथा दरिया दिल होते हैं। लाहौर छोड़ने के बावजूद उनके मन में लाहौर तथा वहाँ के लोगों के बारे में कोई कड़वाहट नहीं थी।

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11. वे आहिस्ता-आहिस्ता बातें करती रहीं।
अथवा
12. हाँ बेटी! जब हिन्दुस्तान बना था तभी आए थे।
अथवा
13. लाहौर बहुत याद आता है।
अध्रवा
14. हमारा वतन तो जी लाहौर ही है।
अथवा
15. फिर पलकों से कुछ सितारे दूटकर दूधिया आँचल में समा जाते हैं।
अथवा
16. बात आगे चल पड़ती, मगर घूम-फिरकर फिर उसी जगहु पर आ जाती।
अथवा
17. साडा लाहौर!

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है?
उत्तर :
प्रस्तुत गद्यांश ‘नमक’ पाठ से लिया गया है।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता सिख बीवी है।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
जब सिख बीवी को सफ़िया के भी लाहौर के होने का पता चला तो दोनों बातें करने में मशगूल हो गई। सिख बीवी ने बताया कि भ्रारत-विभाजन के समय उनन्हें लाहौर छोड़ना पड़ा लेकिन लाहौर आज भी उनकी यादों में बसा है। उन दिनों को याद कर आँस के कुछ कतरे उनके सफेद दुपट्टे पर टपक पड़ते हैं। इधर-उधर की बाते होतीं पर बात घूमफिर कर फिर लाहौर पर ही चली आती। वे आज भी इस बात को नहीं भूल पाती कि उनका वतन तो लाहैर ही है। लाहौर के प्रति उनके दिल में जो प्रेम है व इन शब्दों में झलक जाता है – ‘साडा लाहौर।’

18. आप लाहौर से कोई सौगात मँगाना चाहें तो पुझे हुक्म दीजिए।
अथवा
अगर ला सको तो थोड़ा-सा लाहौरी नमक लाना।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रजिया सज्जाद ज़ीर ।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
सिख बीवी का लाहौर के प्रति प्रेम देखकर साफियया के दिल में यह बात आती है कि वहाँ कोई का सौगात पाकर उन्हें बेइंतहा खुशी होगी। इसलिए वे सिख बीवी से कहती हैं कि अगर वे लाहौर से अपने लिए कोई सौगात मंगवाना चाहें तो बेहिचक कहें। लेकिन सफ़िया को आध्रर्य होता है जब सिख बेवी सफ़िया से कहती है – “अगर ला सको तो थोड़ासा लाहौरी नमक लाना।”

20. पंद्रह दिन बों गुजरे कि पता ही नहीं चला।

प्रश्न :
प्रस्तुत गय्यांश किस पाठ से लिया गया है?
उत्तर :
प्रस्तुत गद्यांश ‘नमक’ पाठ से लिया गया है।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाकिस्तान जाने के पहले सफिया ने मन ही मन यह सोचा होगा कि न जाने इतने वर्षों बाद उसके पंद्रह दिन कैसे गुजरेगे। लेकिन दोस्तों की मुहबत, जिमखाना में बिताई गई शामों, भाइयों की आवभगत में उसके पंद्रह दिन मानो कर्पूर की तरह उड़ गए। उसे पता ही न चला कि पंद्रह दिन कैसे बीत गए। भाइयों के मन में यह तमना भी थी कि बहन के लिए वे जिनता भी कर पाएँ वह करे। पता नहीं, वह फिर कब उन लोगों से मिल पाएगी।

21. एक समस्या थी।
अथवा
22. सबसे बड़ी समस्या थी – दामी कागज की एक पुड़िया।

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रजिया सज्जाद ज़हीर।

प्रश्न :
किसके लिए क्या समस्या थी?
उत्तर :
सफिया ने लाहीर से लौटने की तैयारी कर ली। सारे सामान पैक कर लिए। लेकिन सबसे बड़ी समस्या दामी कागज में लिपटे लाहौरी नमक की पुड़िया की जिसे लाने का वादा उसने सिख बीवी से किया था। समस्या इसिलए धी क्योकि पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में लाहौरी नमक लाने पर कानूनी रोक है। अगर वह उसे लाते समय कस्टम ऑफिसर से पकड़ी जाती तो इस जुर्म में उसकी गिरफ्तारी हो सकती थी और सज्ञा भी।

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23. उसने सोचा कि वह ठीक राय दे सकेगा।
अथवा
24. चुपके से पूछने लगी
अथवा
25. क्यों भैया, नमक ले जा सकते हैं ?

प्रश्न :
रचना का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘नमक’ है।

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
सिख बीवी के लिए सफ़िया पाकिस्तान से लाहौरी नमक ले जाना चाहती थी। उसने सिख बीवी से इसका वादा किया था। लेकिन उसे पता था कि ऐसा करना कानून जुर्म है। उसने सोचा कि इस बारे में वह अपने भाई से सलाह ले सकती है। वह पुलिस ऑफिसर तथा इस मामले में साफ़िया को सही राय दे सकता था। इसिलए उसने भाई से चुपके से पूछ्छा कि “क्यों भैया नमक ले जा सकते है?”

26. नमक तो नहीं ले जा सकते, गैरकानूनी है।
अथवा
27. यह तो आप बहुत ही गलत बात करेंगी।

प्रश्न :
प्रस्तुत गघ्यांश के रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रज़िया सज्जाद जाहीर।

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
साफ़िया को यह पता था कि पाकिस्तान से लाहौरी नमक हिन्दुस्तान ले जाना कानूनी अपराध है। इस बारे में उसने अपने भाई जो पुलिस अफसर था, से पूछा। भाई ने उसे कहा कि उसका ऐसा करना गैरकानूनी है। अगर वह ऐसा करेगी तो बहुत ही गलत करेगी तथाउसे इस जुर्म के लिए कस्टम ऑफिसर उसके साथ कार्रवाई भी कर सकते हैं।

28. आप लोगों के हिस्से में तो हमसे बहुत ज्यादा नमक आया है।
अथवा
29. मैं हिस्से-बखरे की बात नहीं कर रही हूँ।
अथवा
30. मुझे तो लाहौर का नमक चाहिए।
अथवा
31. मेरी माँ ने यही मँगवाया है।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश के रचनाकर का नाम लिखें।
उत्तर :
रज़िया सज्जाद जहीर।

प्रश्न :
गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
जब साफ़िया ने लाहौरी नमक ले जाने की बात कही तो उसके भाई ने कहा कि ऐसे नमक का खान तो हिन्दुस्तान के हिस्से में पाकिस्तान से ज्यादा आया है। साफ़िया ने उसकी यात काटते हुए कहा कि बँटवारे की बात से उसे कोई लेना-देना नहीं है। उसने अपनी माँ से यहाँ का लाहौरी नमक लाने का वादा किया है और उसे केवल यहीं का नमक चाहिए।

32. भाई की समझ में कुछ नहीं आया।
अथवा
33. माँ का जिक्र क्यों था ?
अथवा
34. वे तो बँटवारे से पहले ही मर चुकी थीं।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
उत्तर :
प्रस्तुत गद्यांश ‘नमक’ पाठ से लिया गया है।

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प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
जब साफ़िया ने कहा कि उसे अपनी माँ के लिए लाहौरी नमक ले जाना है तो यह बात उसके भाई को समझ से बाहर हो गई। माँ तो बँटवारे के पहले ही इस दुनिया से विदा ले चुकी थी। इसलिए भाई की समझ में यह नहीं आया कि वह किस माँ की बात कर रही है। फिर भी उसने बात को आगे नहीं बढ़ाया।

35. मैं क्या चोरी से ले जाऊँगी ?
अथवा
36. छुपा के ले जाऊँगी?
अथवा
37. मैं तो दिखा के, जता के लिए जाऊँगी।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता साफ़िया है।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का भाव स्पष्ट करें।
उत्चर :
सकिया को जब पुलिस अफसर भाई ने नमक ले जाने को जुर्म बताया तो साफिया ने कहा कि जुर्म तो तब होगा जब वह छिपा कर ले जाएगी। उसने कहा कि वह लाहौरौ नमक चोरी से या छिपाकर नहीं ले जाएगी वल्कि कस्टम ऑफिसर को दिखाकर ले जाएगी। अगर वह कस्टम ऑफिसर को दिखा-बताकर ले जाएगी तो तब तो यह जुर्म नहीं होगा।

38. अरे, फिर वही कानून-कानून कहे जाते हो!
अथवा
39. क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं।
अथवा
40. कुछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत, इंसानियत के नहीं होते?
अथवा
41. आखिर कस्टमवाले भी इंसान ही हैं, कोई मशीन तो नहीं होते।

प्रश्न :
वक्ता और श्रोता कौन हैं ?
उत्तर :
वक्ता सफ़िया और श्रोता उसका पुलिस अफसर भाई है।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
सफ़िया के पुलिस अफसर भाई ने जब उसे बार-बार यह समझाया कि यहाँ से नमक ले जाना कानूनी जुर्म है तो वह झल्ला उठी। उसे भाई को झिड़कते हुए कहा कि क्या सारे कानून सरकार के ही बनाए होते हैं। इससे भी अलग कानू है जिसे मुहब्बत, मुरौव्वत, आदमियत तथा इसानियत बनाती है। वह कानून सरकार या हुकूमत के बनाए कानून से भी ऊपर है। इस कानून को कस्टम ऑफिसर भी मानेंगे। क्योंकि वे भी इससान हैं, कोई मशीन नहीं। आखिर उनके सीने के अंदर भी दिल धड़कता है।

42. भावना के स्थान पर बुद्धि धीरे-धीरे उस पर हावी हो रही थी।
अथवा
43. तो मजबूरी है, छोड़ देंगे।
अथवा
44. लेकिन फिर उस वायदे का क्या होगा जो हमने अपनी माँ से किया था?
अथवा
45. हम अपने को सैयद कहते हैं।
अथवा
46. फिर वायदा करके झुठलाने के क्या मायने?
अथवा
47. जान देकर भी वायदा पूरा करना होगा। मगर कैसे ?

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘नमक’ तथा रचनाकार रज़िया सज्जाद ज़हीर हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
सफ़िया ने पुलिस ऑंफिसर भाई द्वारा समझाने पर कि पाकिस्तान से लाहौरी नमक से जाना कानूनी जुर्म है कुछ सोचने पर विवश हो गई। अभी तक वह भावना में बहकर भाई की बातो को मानने से इंकार कर रही थी लेकिन अवि

वह बुद्ध से काम लेने की सोच रही थी। एक बार उसने नमक ले जाने के अपने फैसले को रह करना चाहा लेकिन दूसरे ही पल उसे यह भी ध्यान आया कि सिख बीवी से किए गए वायदे का क्या होगा? वह सैयद है और सैयद अपने वादे से नहीं फिरा करते, चाहे उसे पूरा करने के लिए जान की कीमत क्यों न चुकानी पड़े। वह सिख बीवी से किए गए वायदे को पूरा तो करना चाहती थी लेकिन यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि वह यह कैसे करेगी?

48. यही ठीक है, फिर देखा जाएगा।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रबना ‘नमक’ है तथा रचनाकार रजियात सज्ज़ाद ज़ीर हैं।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
नमक ले जाने के बारे में साफिया ने सोच-विचार कर यह तय किया कि वह नमक को कीनू की टोकरी के नीचे छिपा कर ले जाएगी। आते समय उसने देखा था कि सब लोगों के सामानों की तो तलाशी ली जा रही थी लेकिन फलों की टांकरौ की तलाशी कोई कस्टम ऑफिसर नहीं ले रहा था। नमक को फलों की टोकरी में ही छिपाकर ले जाना अच्छा रहेगा। बाकी जो होगा सो देखा जाएगा।

49. उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसे अपने किसी प्यारे को कब्र की गहराई में उतार दिया हो।

प्रश्न :
पाठ का नाम लिखें।
उत्तर :
पाठ ‘नमक’ है।

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प्रश्न :
पंक्ति का अशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
काफी सोच-विचार कर साफिया ने लाहौरी नमक को टोकरी में कीनू के नीचे छिपा दिया। उसे कीनुओं के नीचे नमक की पुड़िया को इस तरह छिपाकर रखना बहुत ही बुरा लग रहा था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो उसने अपने किसी अजीज को कल में दफना दिया हो।

50. उन कहानियों को याद करती रही जिन्हें वह अपने बचपन में अम्मा से सुना करती थी।
अथवा
51. शहजादा अपनी रान चीरकर हीरा छिपा लेता था।
अथवा
52. देवों, खौफनाक भूतों तथा राक्षसों के सामने से होता हुआ सरहदों से गुजर जाता था।
अथवा
53. इस माने में ऐसी कोई तरकीब नहीं हो सकती थी।
अथवा
54. वह अपना दिल चीरकर उसमें यह नमक छिपा लेती।
अथवा
55. उसने एक आह भरी।

प्रश्न :
रचना तथा रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘नमक’ तथा रचनाकार रजिया सज्जाद ज्र है।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
सफिया अपने साथ लाहौरी नमक ले जाने के बारे में तरह-तरह के उपाय सोच रही धी लेकिन उसे कोई उपाय पसंद नहीं आ रहा था। इसी समय उसे उन कहानियों की याद आती है जिन्हें बचपन में अपनी माँ से सुना करती थी। उन कहानियों का नायक शहजादा हीरे को अपनी जाँघ चीरकर छिपा लेता था तथा देवों, भूतों तथा राक्षसों के सामने से उनकी सरहद पार कर जाता था।

उसे लग रहा था कि काश, वह भी उस शहजादे की तरह अगर दिल में नमक को छिपाकर कस्टम आंफिसर के सामने से सरहद (सीमा) पार कर जाती तो कितना अच्छा होता। लेकिन यह सब तो केवल किस्सेकहानियों में ही होता है। अपनी बेवशी पर उसने एक ठंडी आह भरी।

56. यह पाकिस्तान था।

प्रश्न :
प्रस्तुत पंक्ति किस पाठ से उद्दुत है?
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्ति ‘नमक’ पाठ से उद्धृत है।

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
साफ़िया पाकिस्तान में अपने भाई के घर में थी। रात के करीब डेढ़ बजे उसकी नींद खुली। उ गने पाया कि मार्च को सुहानी हवा खिड़की की गली से कमरे में आ रही है। रात चाँदनी और उंडी थी। खिडकी के बाहर चपा का एक वृक्ष सुहानी हवा में लहरा रहा था। कभी-कभी किसी के खाँसने, कुत्ते के भौंकने या चौकीदार की सीटी का आवाज से रात का सन्नाटा भंग होता था।

सारी प्रकृति, सारा वातावरण, मस्त हवा, चाँद की चाँदनी सब कुछ वैसा ही ॥ जैसा कि हिन्दुस्तान में। उसने सोचा कि प्रकृति अपनी ओर से किसी को अपना सब कुछ लुटाने में कोई भेदभाव नही करनी। वह सरहदों की सीमा को नहीं मानती। लेकिन इसान ने अपने को सरहदों मे क्यो केद कर रखा है।

57. नन्हें-नन्हें भतीजे- भतीजियाँ थीं जो उससे वही मासूमियत से पूछते।
अथवा
58. उन सबके और सफ़िया के बीच में एक सरहद थी।

प्रश्न :
रचना का नाम लिखें।
उत्तर :
रबना ‘नमक’ है।

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
पाकिस्तान सें साफिया अपने परिवारवालों के बीच बहुत अच्छा समय गुजार रही थी। भतोजे जीजियाँ भी काफी खुश थे। जब उन्होंने साफिया से पूछा कि ‘फूफीजान, आप हिंदुस्तान में क्यों रहती हैं, जहाँ हमल गण नहीं आ सकते, तो यह सुनकर उसे बड़ा दु:ख होता है। अब बच्चों को वह किस प्रकार समझाए कि उन सबके औ भाफिया के बीच एक सरहद है जो दोनों को एक नहीं होने देता।”

59. हो सकता है, साल भर बाद फिर आए।
अथवा
60. यह भी हो सकता था कि अब कभी न आ सके।

प्रश्न :
यहाँ किसके बारे में कहा जा रहा है?
उत्तर :
यहाँ साफ्रिया के बारे में कहा जा रहा है।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाहौर से हिन्दुस्तान लौटने के एक दिन पहले भाइयों तथा भतीजे भतीजियों से बिछ्युड़ने की व पना कर के साफ़िया दुखी हो जाती है। उसे लगता है कि अब एक साल के बाद ही फिर पाकिस्तान आने का वीज़ा मि ग पाएगा तो शायद वह आ सकेगी। फिर तो वक्त की बात है कि शायद वह फिर कभी दुबारा पाकिस्तान न आ सके।

61. यह हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा है।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता साफ़िया का दोस्त है।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाहौर से लौटने के एक दिन पहले साफिया के एक दोस्त ने उसे कीनू फल की टोकरी भंट की थी ताकि वह उसे अपने साथ हिन्दुस्तान ले जा सके। यह तोहफा देते समय उसने साफिया को यह कहा कि ‘ यह हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा है।’ कहने का भाव यह है कि यही फल पाकिस्तान से लोग सौगात के रूप में हिन्दुस्तान ले जाते हैं। उनके रिश्तो में भी कीनू की मिठास रची-बसी है।

62. उसने फैसला किया कि मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा।

प्रश्न :
किसने फैसला किया ?
उत्तर :
फैसला साफिया ने लिया।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश का आश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
भाई के मना करने पर साफिया ने यह तय किया था कि वह लाहौरी नमक को कीनुओं की टोकरी में छिपाकर ले जाएगी। पर अंतिम समय में उसके दिल ने कहा कि मुहब्बत के इस तोहफे को वह चोरी-छिपे हिन्दुस्तान नहीं ले जाएगी। मुहब्बत तो जताने की चीजद है न कि छिपाकर रखने की। इसलिए मुहब्यत के तोहफे को चोरी से ले जाना तो इंसानियत, आदमियत के नजरिये से हुकूमत के कानून के जुर्म से भी बड़ा है। अंत में उसने अपना पक्का निश्चय कर लिया कि वह इसे छिपाकर, चोरी से नहीं ले जाने वाली है।

63. वह कुछ जाँच नहीं रही थी।

प्रश्न :
प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से उद्धत है।
उत्तर :
प्रस्तुत गद्यांश ‘नमक’ पाठ से उद्दृत है।

प्रश्न :
‘वह’ शब्द किसके लिए आया है?
उत्तर :
‘वह’ शब्द कस्टम ऑफिसर की वर्दी के लिए आया है।

प्रश्न :
पंक्ति का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाहौर स्टेशन पर सामान की जाँच के बाद साफिया एक कस्टम आफिसर की ओर बढ़ी। वह उसे अपने हैंडबैग में रखे लाहौरी नमक के बारे में बताना चाहती थी। उस कस्टम ऑफिसर ने अपनी वर्दी पहन रखी थी लेकिन उसके दुबले-पतले शरीर, लंबा कद तथा उसकी खिचड़ी बालों के साथ वर्दी नहीं जँच रही थी। उसकी वर्दी उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खा रही थी।

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64. मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘नमक’ है तथा रचनाकार रज़िया सज़्जाद ज़ीर हैं।

प्रश्न :
प्रस्तु पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाहौर में साफिया ने कस्टम ऑफिसर से अपने हैंडबैग में लाहौरी नमक होने की न केवल बात कह दी। उसने नमक का पुड़िया भी निकालकर उसके सामने टेबल पर रख दिया। सफ़िया यह जानती थी कि ऐसा करना जुर्म है फिर भी ऐसा करने की उसने वजह भी बता दिया। पूरी कहानी सुनने के बाद नमक वापस उसके हैंडबैग में रख दिया और कहा कि मुहब्यत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून हैरान रह जाता है। कहने का भाव यह है कि जब दिल आपस में मिले हों, तो वहाँ कानून भी मुहब्बत से हार जाता है।

65. लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा।
अथवा
66. तो बाकी सब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा।

प्रश्न :
रचना का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना का नाम ‘नमक’ है।

प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाहौर के रेलवे प्लेटफार्म के कस्टम आंफिसर ने सफिया से पूरी कहानी सुनने के बाद नमक वापस उसके हैंडबैग में रख दिया। जब सफिया चलने लगी तो उसने सिख बीवी के लिए संदेश दिया के वे अभी भी लौहार को अपना वतन समझें और देहली मेरा वतन है। यदि सभी पाकिस्तानी-हिन्दुस्तानी के दिलो में यही भावना आ जाय तो दोनों देशों की कटुता धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। धीरे-धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

67. कुछ समझ में नहीं आता था कि कहाँ से लाहौर खत्म हुआ और किस जगह से अमृतसर शुरू हो गया।
अथवा
68. एक ज़मीन थी, एक जबान थी।
अथवा
69. एक-सी सूरतें और लिबास, एक-सा लबो-लहजा और अंदाज थे।
अथवा
70. गालियाँ भी एक ही-सी थीं जिन्हें दोनों बड़े प्यार से एक-दूसरे को नवाज रहे थे।
अथवा
71. बस मुश्किल सिर्फ इतनी थी कि भरी हुई बंदूकें दोनों के हाथों में थीं।

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘नमक’ है तथा इसके रचनाकार रज़िया सज्जाद जहीर है।

प्रश्न :
प्रस्तु गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर :
लाहौर स्टेशन पर कस्टम ऑफिसर ने सफिया के साथ जो मुहब्बत भरा व्यवहार किया था वह उसी के बारे में सोचती जा रही थी। सोचने के क्रम में लाहौर कहाँ खत्म हुआ और कहाँ से अमृतसर शुरु हुआ- यह उसे पता ही न चला।

आखिर पता भी कैसे चलता ? दोनों देशों के लोगों की जमीन एक, भाषा एक-सी, लिबास एक-सी, सूरतें भी एक-सी थीं। हाँ तक कि गालियाँ देने का अंदाज भी एक-सा था जिसका बड़े प्रेम से एक-दूसरे को दे रहे थे। अंतर केवल इतना ही था कि हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी दोनों ही पुलिसवलालों के हाथों में भरी हुई बंदूके थी। यही एक अंतर था जो दोनों देशों तथा देशवासियों को एक-दूसरे से अलग कर रहा था।

72. सफ़िया के पैरों तले की जमीन खिसकने लगी – अब क्या होगा?

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार रज़िया सज्जाद ज़ीर हैं।

प्रश्न :
सफिया के पैरों तले की जमीन क्यों खिसकने लगी?
उत्तर :
अमृतसर में सफिया ने कस्टम ऑफिसर से अपने पास नमक होने की बात कही। उसने सफिया की पूरी बात सुनी तथा उसे अपने साथ आने को कहा। प्लेटफार्म के एक सिरे पर के एक कमरे में सफिया को उसने कुर्सी पर बैठने को कहा। बाहर की तरफ देखर उसने एक पुलिसवाले को कुछ इशारा किया। सफिया ने सोचा कि उसे अवश्य ही लाहौर से नमक लाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाएगा। यह सोचकर ही उसके पैरों तले की जमौन खिसकने लगो। भयभीत होकर वह मन ही मन सोचने लगी कि न जाने अब क्या होने वाला है।

73. शमसुल इस्लाम की तरफ से सुनील दास गुप्त को प्यार के साथ।
अथवा
74. बचपन के दोस्त ने मुझे यह किताब दी थी।
अथवा
75. उस दिन मेरी सालगिरह थी।

प्रश्न :
रचना एवं रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचना ‘नमक’ है तथा रचनाकार रज़िया सज्जाद जहीर हैं।

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प्रश्न :
पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उतर :
अमृतसर का कस्टम ऑफिसर सफ़िया के साथ बहुत इज्जत के साथ पेश आया। उसने सफिया को चाय भी पिलाई। उराने सफ़िया को अपने दोस्त शमसुल इस्लाम की दी हुई एक किताब भी दिखाई। यह उसने उसके जन्म दिन पर दिया था। किताब बगाल के सुप्रसिद्ध कवि नजरूल इस्लाम की थी। यह सब उसने सफ़िया को इसलिए बताया व्योंकि उसका भी भानना था कि प्रेम तथा भाईचारा किसी सरहद से नहीं बँटा होता है । धर्म कोई भी हो वह जोड़न का काम करता है। कि तो झेने का । सरहद की यह दीवार तो हमने बनाई है।

76. पर नज़रुल और टैगोर को तो हमलोग बचपन से पढ़ते थे।

प्रश्न :
वक्ता कौन है?
उत्तर :
वक्ता कस्टम ऑफिसर सुनील दास गुप्त है।

प्रश्न :
पंक्ति में निहित आशय को स्पष्ट करें।
उत्तर :
कस्टम आफिसर सुनील दास गुप्त ने सफिया को यह बताया कि भारत-विभाजन से भले ही पाकिस्तान, हिन्दुस्तान और बांग्ला देश बने हों लेकिन विभाजन से पहले सब लोग बड़े प्रेम से रहते थे। जितना सम्मान टैगोर को दिया जाता था उःना ही नजरूल इस्लाम को। बच्चों को शुरू से ही शांति, प्रेम, भाईचारा का पठा पढ़ाया जाता था। उन्हें सभी धमो का दा दर करना सिखाया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे हम चीजों को भूलते जा रहे हैं।

77. हागरी जमीन, हमारे पानी का मज़ा ही कुछ और है।

प्रश्न :
वक्ता कौन है ?
उत्तर :
वक्ता कस्टम ऑंकिसर सुनील दास गुप्त है।

प्रश्न :
वक्ता के कथन का भाव स्पष्ट करें।
उत्तर :
अपना वतन, अपनी मातृभूमि सबको प्यारी होती है। सुनील दास गुप्त हिन्दुस्तान मे कस्टम ऑफिसर हैं लेकिन उा वा वतन ढाका है। डाभ की चर्धा करते हुए वे कहते हैं कि वैसे तो डाभ बंगाल में भी होता है लेकिन ढाका के डाण की बात हो कुछ और है। कहने का भाव यह है कि कोई दुनिया के किसी भी हिस्से में रहे लेकिन वह अपनी मातृभूमि से कटकर ॠहीं रह सकता। इसलिए वे अपनी मातृभूमि ढाका की प्रशंसा करते नहीं थकते।

78. रुफिया सोचती जा रही थी कि किसका वतन कहां है ?
अथवा
79. वह कस्टम के इस तरफ है या उस तरफ!

प्रश्न :
रचनाकार का नाम लिखें।
उत्तर :
रचनाकार रज़िया सज्ज़ाद जहीर हैं।

WBBSE Class 10 Hindi Solutions कहानी Chapter 4 नमक

प्रश्न :
पंक्ति में निहित भाव को स्पष्ट करें।
उत्तर :
सफिया पाकिस्तान से लौटकर जब अमृतसर स्टेशन के पुल पर चढ़ रही थी तो पाकिस्तान में बिताए अपने पद्रह दिन तथा दोनों देशों के कस्टम ऑंफिसर के अच्छे व्यवहार के बारे में ही सोच रही थी। वह साँच रही थी कि जिसे हम वतन कहते है – वह कहाँ है? वह कस्टम के इधर है या उधर। अगर कस्टम की बात छाड़ दे, सरहद की बात छोड़ दे तो फिर दानो देशों में अंतर ही क्या रह जाता है। आखिरकार आम लोग कब तक सरहदों की सीमा में कैद रहेंगे?

WBBSE Class 10 Hindi नमक Summary

लेखक – परिचय

रज़िया सज्जाद जहीर का जन्म 15 फरवरी, सन् 1917 को अज़मेर (राजस्थान) में हुआ था। ये मूल रूप से उर्दू की कहानीकार हैं। बी० ए० तक की शिक्षा घर पर प्राप्त की। इलाहाबाद से उर्दू में एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1947 से इन्होंने लखनऊ के करामत हुसैन गर्ल्स कॉलेज में पढ़ाने का कार्य शुरू किया। फिर सन् 1965 में सोवियत सूचना विभाग में इनकी नियुक्ति हुई। 18 दिसम्बर सन् 1979 को इन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
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प्रमुख रचनाएँ – जर्द गुलाब (उर्दू कहानी-संग्रह)
सम्मान – सोवियतभूमि नेहरू पुरस्कार, उत्तर प्रदेश का उर्दू अकादमी पुरस्कार, अखिल भारतीय लेखिका संघ पुरस्कार।

शब्दार्थ

पृष्ठ संख्या – 126

  • हैरान = आश्चर्यचकित।
  • कदर = तरह ।
  • जिस्म = शरीर ।
  • नेकी = भलाई, उपकार।
  • मुहब्बत = प्रेम ।
  • रहमदिली = दयावान।
  • बारीक = पतला।
  • मलमल = एक प्रकार का महीन कपड़ा (ढाके का मलमल विश्वप्रसिद्ध है)।
  • दुपट्टा = ओढ़नी।
  • अम्मा = माँ। मुहर्रम = मुसलमानों का एक त्यौहार जिसमें इमाम हुसैन तथा उनके परिवार की शहादत की याद में शोक
  • मनाया जाता है ।
  • उम्दा = अच्छा, स्वादिष्ट।
  • नफ़ीस = खूबसूरत।
  • रसिया = प्रेमी।
  • जिंदादिली = खुले दिल की।
  • आहिस्ता = धीरे।
  • वतन = देश।
  • साडा लाहौर = हमारा लाहौर।
  • दुआएँ = अर्शीवाद।
  • रूखसत = विदा।
  • सौगात = उपहार।
  • हुक्म = आदेश।

पृष्ठ संख्या – 127

  • हिचकिचाकर = असमंजस से ।
  • लाहौरी = लाहौर का।
  • गुजरे = बीत गए।
  • जिमखाना = व्यायामशाला।
  • खातिरदारियाँ = स्वागत।
  • परदेसी = दूसरे देश की।
  • अजीजों = चाहने वालों ।
  • दामी = कीमती।
  • सेर = लगभग एक किलो।
  • राय = सलाह।
  • गैरकानूनी = कानून के विरुद्ध।
  • हिस्से = भाग।
  • बखरे = बँटवारे।
  • जिक्र = उल्लेख।
  • नरमी = मुलायमी।
  • बाजी = दीदी कस्टम = चिंदी = टुकड़े।
  • जता = बतला
  • हुकूमत = सरकार।
  • मुरौवत = दया।
  • रवाना = जाना
  • कीनू = नारंगी और संतरे का मिला हुआ एक प्रकार का फल।
  • सैयद = मुसलमानों की एक जाति।

पृष्ठ संख्या =128

  • मायने = अर्थ।
  • तह = पेंदी ।
  • महसूस = अनुभव ।
  • उकड्रू = पैर मोड़कर बैठना
  • शहजादा = राजकुमार।
  • रान = जंघा, जांघ।
  • खौफनाक = भयानक।
  • सरहदों = सीमा।
  • तरकीब = उपाय।
  • आश्वस्त = निश्चित।
  • दोहर = चादर ।
  • तकरीबन = लगभग।
  • करीब = निकट।
  • घनाखत = घना पेड़।
  • अक्स = चेहरा।
  • दरख्त = पेड़।
  • आहट = आवाज।
  • लहका = हिला।
  • सगे = अपने।
  • बेशुमार = बेहद, बहुत अधिक ।
  • मासूमियत = भोलेपन।
  • इकबाल = उर्दू के प्रसिद्ध शायर, कवि।
  • मौलसिरी = एक खुशबूदार फूल का नाम।
  • बेजान = बिना प्राण के।

पृष्ठ संख्या – 129

  • दूब = घास।
  • रसीले = रस से भरे ।
  • मेवा = फल।
  • झिरझिरी = कंपकपाहट।
  • मेजें = टेबुलें।
  • इक्का-दुक्का = एकाष।
  • खिचड़ी बाल = सफेद और काले बाल मिले हुए।
  • ऐनक = चश्मा।
  • फरमाइए = कहिए।
  • लहजे = तरीके।
  • अजीजों = प्रिय लोगों।

पृष्ठ संख्या – 130

  • खातून = स्वी।
  • रफ्ता-रफ्ता = धीरे-धीरे ।
  • हसरत = चाहत, उम्मीद।
  • भिचे = किसे।
  • अटारी = हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच का एक स्थान/स्टेशन।
  • जबान = बोली। सूरतें = चेहरे ।
  • लिबास = वस्त्र।
  • लबोलहजा = बोलने का अंदाज।
  • नवाज रहे थे = आदान-प्रदान कर रहे थे/ले-दे रहे थे।

पृष्ठ संख्या – 131

  • सिरे = छोर ।
  • दाखिल = प्रवेश।
  • सफे = पन्ने।
  • फख = गर्व ।
  • डिवीजन = बंटवारा।
  • सालगिरह = जन्मदिन।
  • डाभ = हरा नारियल जिसका पानी पिया जाता है।

WBBSE Class 10 Hindi रचना साहित्यिक निबंध

Students should regularly practice West Bengal Board Class 10 Hindi Book Solutions and रचना साहित्यिक निबंध to reinforce their learning.

WBBSE Class 10 Hindi रचना साहित्यिक निबंध

निबन्ध-लेखन :

निबंध उस गद्य-रचना को कहते हैं जिसमें किसी विषय का वर्णन किया गया हो । निबंध के माध्यम से लेखक उस विषय के बारे में अपने विचारों और भावों को बड़े प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने की कोशिश करता है। एक श्रेष्ठ, सुगठित एवम् व्यवस्थित निबंध-लेखक को विषय का अच्छा ज्ञान होना चाहिए, उसकी भाषा पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अभिव्यक्ति होती है । इसलिए एक ही विषय पर हमें अलग-अलग तरीकों से लिखे गए निबंध मिलते हैं।

किसी एक विषय पर विचारों को कमबद्ध कर सुंदर, सुगठित और सुबोध भाषा में लिखी गई रचना को निबंध कहते हैं। अनेक विद्वानों ने निबंध शब्द की पृथक्-पृथक् व्याख्या की है –

  • निबंध अनियमित, असीमित और असंबद्ध रचना है ।
  • निबंध वह लेख है जिसमें किसी गहन विषय पर विस्तृत और पांडित्यपूर्ण विचार किया जाता है।
  • मन की उन्मुक्त उड़ान निबंध कहलाती है ।
  • मानसिक विश्व का बुद्धि-विलास ही निबंध है ।
  • सीमित समय और सीमित शब्दों में क्रमबद्ध विचारों की अभिव्यक्ति ही निबंध है ।

अच्छे निबंध की विशेषताएँ –

एक अच्छे/श्रेष्ठ निबंध की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  • निबंध की भाषा विषय के अनुरूप होनी चाहिए।
  • विचारों में परस्पर तारतम्यता होनी चाहिए।
  • विषय से संबंधित सभी पहलुओं पर निबंध में वर्चा की जानी चाहिए।
  • निबंध के अंतिम अनुच्छेद में ऊपर कही गई सभी बातों का सारांश होना चाहिए ।
  • वर्तनी शुद्ध होनी चाहिए तथा उसमें विराम-चिह्नों का उचित प्रयोग किया जाना चाहिए।
  • निबंध लिखते समय शब्दों की सीमा का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।
  • निबंध किसी निश्चित उद्देश्य तथा एक विषय को लेकर लिखा जाना चाहिए।
  • निबंध में लेखक का व्यक्तित्व प्रतिफलित होना आवश्यक है ।
  • निबंध अधिक विस्तृत न होकर संक्षेप में होना चाहिए ।
  • निबंध-लेखन विचारों की एक अखंड धारा होती है, उसका एक निश्चित परिणाम होना चाहिए।

प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से निबंध निम्नलिखित प्रकार के होते हैं –

  • वर्णनात्मक (माघ मेले का वर्णन, यात्रा का वर्णन, किसी त्योहार का वर्णन, विविध आयोजनों का वर्णन आदि)।
  • विवरणात्मक (ताजमहल, हिमालय आदि) ।
  • भावप्रधान (मेरी माँ, मेरा प्रिय मित्र आदि) ।
  • विचारप्रधान (समय नियोजन, सच्ची मित्रता, स्वदेश प्रेम आदि) ।

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निबंध-लेखन : पूर्व तैयारी :

निबंध लेखन से पूर्व विषय के विभिन्न बिंदुओं/पक्षों पर गहराई से विचार करना अपेक्षित है । विषय की निश्चित धारणा मन में बना लेनी चाहिए ताकि कोई आवश्यक बिंदु न छूटने पाए। इस दृष्टि से लेखक को अपने साथियों से चर्चा करके निबंध की रूपरेखा तैयार कर लेना उपयुक्त रहता है।

रूपरेखा-निर्माण के बाद विषय संबंधी सामग्री तथा विभिन्न स्रोतों का संचयन करना उपयोगी होता है । उद्धरणों, विषयानुकूल उदाहरण सूक्तियों, तर्कों, प्रमाणों का संकलन कर लेना चाहिए ताकि उनका उपयुक्त प्रयोग किया जा सके ।
निबंध लिखने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए ।

  • विभिन्न सोतों से विषय संबंधी जानकारी प्राप्त की जानी चाहिए।
  • छात्रों द्वारा अपने अध्यापक के साथ विषय पर चर्चा करने के उपरांत विषय की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए।
  • रूपरेखा के आधार पर निबंध लिखते समय छात्रों द्वारा यथा-प्रसंग अपने निजी अनुभवों का उल्लेख किया जाना चाहिए।

निबंध का गठन : निबंध के तौन अंग होते है – (क) प्रस्तावना या भूमिका (ख) विषय का प्रतिपादन (ग) उपसंहार ।

यह पहले से निश्चित कर लेना चाहिए कि जितनी जानकारी विषय के संबंध में है, उसमें से कितनी प्रस्तावना में रहनी चाहिए, कितनी निबंधों के मुख्य अंश में और कितनी उपसंहार में ।
(क) प्रस्तावना :- प्रस्तावना ऐसी हो जो पाठक के मन में निबंध के विषय के प्रति उत्सुकता उत्पन्न कर दे । प्रस्तावना लंबी नहीं होनी चाहिए । कुछ ही वाक्यों के बाद विषय पर पहुँच जाना चाहिए ।
(ख) विषय का प्रतिपादन :-विषय के प्रतिपादन की दृष्टि से तथ्यों, भावों और विचारों का तर्कसंगत रूप में संयोजन किया जाना चाहिए । साथ ही उनकी क्रमबद्धता और सुसंबद्धता का ध्यान रखा जाना अपेक्षित है ।
निबंध के मुख्य अंश में सभी बातें और सभी विचार अलग-अलग अनुच्छेदों में लिखने चाहिए। एक अनुच्छेद में सामान्यत: एक ही बात या विचार रखा जाए । बातों और विचारो को प्रस्तुत करने में एक निश्चित क्रम होना चाहिए । सभी अनुच्छेद आपस में संबद्ध होने चाहिए, जिससे विचारों की एक श्रृंखला बनी रहे । ऐसा करने से ही निबंध सुगठित होता है और उसमें कसावट आती है ।
जहाँ आवश्यकता हो उद्धरण वहीं देना चाहिए । उद्धरण गद्य तथा पद्य दोनों में हो सकते हैं।
निबंध की भाषा शुद्ध, प्रांजल और विषय के अनुकल होनी चाहिए । यदि भाषा में किसी प्रकार की शिथिलता या कमज़ोरी रह जाती है तो निबंध का वांछित प्रभाव पाठक पर नहीं पड़ता।
(ग) उपसंहार :- निबंध के अंत में, विषय-विवेचन के आधार पर निश्चित निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए । इसका अंत इस प्रकार लिखा जाए कि निबंध का पाठक पर स्थायी प्रभाव पड़े।

प्रारंभ में सामान्य और परिचित विषयों पर निबंध लिखने का अभ्यास करना चाहिए । फिर गंभीर विषयों पर निबंध लिखने चाहिए । यहाँ कुछ निबंधों के उदाहरण दिए गए हैं –

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सार्दित्यिक निबंध

मेरी प्रिय पुस्तक ‘श्रीरामचरितमानस’ :

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • श्री रामचरितमानस की विशेषताएँ
  • उपसंहार।

प्रस्तावना :- जिस प्रकार मनुष्य की आँखें आकाश में असंख्य तारों के होते हुए भी धुव तारे को ही खोजती हैं । उपवन में अनेक प्रकार के पुष्छों के होते हुए भी गुलाब का अपना महत्व है। उसी प्रकार हिंदी साहित्य में हजारों ग्रंथों के होते हुए भी ‘श्रीरामचरितमानस’ सबसे अधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। यही वह महान ग्रंथ है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को उचित दिशा प्रदान करता है। आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व इस महाकाव्य की रचना हुई तथा आज भी इस महान रचना का महत्व सर्वाधिक है। यह एक विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक एवं आध्यात्मिक ग्रंथ है । यही एकमात्र हिंदी का ऐसा ग्रंथ है जो हिंदी एवं अहिंदी भाषी सभी का प्रिय एवं सम्माननीय ग्रंथ है।’श्रीरामचरितमानस’ सदियों से एक महान ग्रंथ के रूप में स्वीकृत एवम् लोकप्रिय बना हुआ है।

‘श्रीरामचरितमानस’ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पावन चरित्र की झाँकी प्रस्तुत की गई है। महाकवि तुलसीदास ने संवत् 1631 में इसे लिखना प्रारंभ किया तथा यह महान प्रंथ संवत् 1633 में लिखकर पूरा हुआ। इस प्रंथ की रचना अवधी भाषा में हुई है । इसमें सात कांड हैं-बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।

तुलसीदास द्वारा रचित ‘श्रीरामचरितमानस’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसके अध्ययन से प्रत्येक व्यक्ति को संतुष्ट, सुखी तथा सर्वहितकारी जीवन व्यतीत करने में सहायता मिलती है।

श्रीरामचरितमानस सदाचार की शिक्षा देने वाला एक महाकाव्य है। इस ग्रंथ के प्रारंभ में ही कवि ने सदाचार के संबध मे कहा है कि, वे ही व्यक्ति वन्दनीय हैं जो दुःख सहकर भी दूसरों के दोषों को प्रकट नहीं करते –

जे सहि दुख परछिद्र दुरावा । वंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।

तुलसीदास जी का दृष्टिकोण व्यापक था । उन्होंने उसी व्यक्ति और वस्तु को सर्वश्रेष्ठ माना है, जिससे सबका हित होता हो, किसी एक का नहीं –

कीरति भनिति भूति भल सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ।।

‘श्रीरामचरितमानस’ में तुलसीदास ने जिन पात्रों की सृष्टि की है वे मानव-जीवन के आदर्श पात्र हैं।’श्रीरामचरितमानस’ में आदर्श भाई, आदर्श पत्नी, आदर्श पुत्र, आदर्श माता, आदर्श पिता, आदर्श सेवक, आदर्श राजा एवं आदर्श प्रजा को प्रस्तुत करके तुलसीदास जी ने उच्चस्तरीय मानव-आदर्श की कल्पना की है ।

‘श्रीरामचरितमानस’ में एक ऐसे राज्य की कल्पना की गई है जिसमें कोई किसी से वैर नहीं करता । जिसमें सभी प्रेम के साथ रहते हैं तथा अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। जहाँ सभी उदार हों, कोई भी निर्धन न हो, कोई भी अज्ञानी न हो, किसी को भी दु:ख न हो, किसी को रोग न हो। आजादी के बाद गाँधीजी ने भी भारत में ऐसे ही रामराज्य की कल्पना की थी ।

‘श्रीरामचरितमानस’ का स्थान हिंदी-साहित्य में ही नहीं, जगत् के साहित्य में निराला है । इसके जोड़ का ऐसा ही सर्वांगुंदर उत्तम काव्य के लक्षणों से युक्त भगवान की आदर्श मानव-लीला तथा उनके गुण, प्रभाव, रहस्य और प्रेम के गहन-तत्व को अत्यंत सरस, रोचक एवं ओजस्वी शब्दों में व्यक्त करने वाला कोई दूसरा ग्रन्थ हिंदी-भाषा में ही नही, कदाचित् संसार की किसी भी भाषा में आज तक नहीं लिखा गया ।
उपर्युक्त गुणों के कारण ही ‘श्रीरामचरितमानस’ मेरा सर्वाधिक प्रिय ग्रंथ है ।

मेरे प्रिय कवि : तुलसीदास
अथवा, लोकनायक तुलसीदास

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • तुलसीदास के जन्म की पृष्ठ-भूमि
  • तुलसीदास : एक लोकनायक के रूप में
  • तुलसीदास की निष्काम भक्ति-भावना
  • तुलसी की समन्वय साधना
  • तुलसी के दार्शनिक विचार
  • तुलसीकृत रचनाएँ
  • उपसंहार ।

राम छोड़कर और की जिसने करी न आस ।
रामचरितमानस-कमल, जय हो तुलसीदास ।। – जयशंकर प्रसाद

WBBSE Class 10 Hindi रचना साहित्यिक निबंध

प्रस्तावना :- मैंने हिंदी साहित्य के अंतर्गत कबीर, सूर, तुलसी, देव, घनानंद, बिहारी आदि अनेक कवियों का अध्ययन किया। आधुनिक कवि प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी वर्मा तथा दिनकर का भी अध्ययन किया है किंतु भक्तकवि तुलसीदास ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया । तुलसी के काव्य की अलौकिकता के समक्ष मैं सदैव नत-मस्तक होता रहा हूँ। उनकी भक्ति-भावना, समन्वयात्मक दृष्टिकोण तथा काव्य-सौष्ठव ने मुझे स्वाभाविक रूप से आकृष्ट किया है ।

तुलसीदास का जन्म ऐसी विषम परिस्थितियों में हुआ जब हिंदू समाज अशक्त होकर विदेशी चंगुल में फैंस चुका था। हिंदू समाज की संस्कृति और सभ्यता प्राय: विनष्ट हो चुकी थी तथा कहीं कोई आदर्श नहीं रह गया था । इस काल में मन्दिरों का विष्वंस हो रहा था, ग्रामों तथा नगरों का विनाश हुआ वहीं संस्कारों की भ्रष्टता भी चरम सीमा पर थी । तलवार के दबाव से हिंदुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था ।

लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास ने अंधकार के गर्त में डूबी हुई जनता के सामने भगवान राम का लोकमंगलकारी रूप प्रस्तुत किया । इससे जनता में आशा और शक्ति का संचार हुआ । युगद्रष्टा गोस्वामी तुलसीदास ने अपनेरामचरितमानस द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त विभिन्न मतों, संप्रदायों तथा धाराओं का समन्वय किया। उन्होंने उस युग को नवीन दिशा, नई गति तथा नवीन प्रेरणा प्रदान की । उन्होंने सच्चे लोकनायक के समान वैमनस्य की चौड़ी खाई को भरने का सफल प्रयास किया ।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके क्योंकि भारतीय समाज में नाना प्रकार की विरोधिनी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ, आचार-निष्ठा और विचार-पद्धतियाँ प्रचलित हैं । भगवान बुद्ध समन्वयकारी थे, गीता’ ने समन्वय की चेष्टा की और तुलसीदास समन्वयकारी थे।”

जब ईश्वर के सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों से संबंधित विवाद, दर्शन एवं भक्ति दोनों ही क्षेत्रों में प्रचलित था तो तुलसीदास ने कहा –

सगुनहिं अगुनहिं नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ।।

साहित्यिक क्षेत्र में भाषा, छंद, रस तथा अलंकार आदि की दृष्टि से भी तुलसी ने अनुपम समन्वय स्थापित किया। उस समय साहित्यिक क्षेत्र में विभिन्न भाषाएँ विद्यमान थीं । विभिन्न छन्दों में रचनाएँ की जाती थीं । तुलसी ने अपने काव्य में संस्कृत, अवधी तथा ब्रजभाषा का अद्भुत समन्वय किया ।

तुलसी के बारह प्रंथप्रामाणिक माने जाते हैं। ये प्रंथ हैं-श्रीरामचरितमानस’, विनय-पत्रिका, गीतावली, कवितावली’, ‘दोहावली’, रामललानहछू’, पार्वतीमंगल’, जानकीमंगल’, ‘बरवै रामायण’, ‘वैराग्य संदीपनी’, ‘श्रीकृष्णगीतावली’ तथा ‘रामाज्ञाप्रश्नावली’ । तुलसीदास की ये रचनाएँ विश्व-साहित्य की अनुपम एवम् अमूल्य निधि हैं।

उपसंहार :- तुलसी ने अपने युग और भविष्य, स्वदेश और विश्व तथा व्यक्ति और समाज आदि सभी के लिए महत्वपूर्ण सामग्री दी है । तुलसी को आधुनिक दृष्टि ही नहीं, प्रत्येक युग की दृष्टि मूल्यवान मानेगी, क्योंकि मणि की चमक अंदर से आती है बाहर से नहीं । वस्तुतः तुलसीदास हिंदी साहित्य के सर्वाधिक प्रतिभासंपन्न तथा युग को नवीन दिशा प्रदान करने वाले महान कवि हैं।

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कबीर दास
अथवा
मेरे प्रिय भक्त कवि

रूपरेखा :

  • जन्मकालीन परिस्थितियाँ
  • जीवन वृत्त
  • समाज सुधार ।
  • धार्मिक सिद्धान्त
  • हिन्दी साहित्य में कबीर का स्थान
  • उपसंहार।

महात्मा कबीर का जन्म संवत् 1456 में हुआ था । कबीर पंथियों ने इनके जन्म के सम्बन्ध में यह दोहा लिखा है –

चौदह सौ छण्पन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ भए ।
जेठ सुदी बरसाइत की, पूरनमासी प्रकट भए ।।

किंवदंती के अनुसार कबीर किसी विधवा बाह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । लोक-लाज के कारण वह इन्हें लहरतारा नामक तालाब के किनारे छोड़ आई थी । वहाँ से नीमा और नीरू नामक जुलाहा दम्पत्ति इन्हें ले आये, जिनके द्वारा इनका पालन-पोषण हुआ । कबीर के बाल्यकाल का विवरण अभी तक अज्ञात ही है पर इतना अवश्य है कि उनकी शिक्षा-व्यवस्था यथावत् नहीं हुई थी । उन्होंने स्वयं लिखा है –

मसि कागद छूऔ नहिं, कलम गही नहिं हाथ ।

संक्रांतिकाल में पथ-प्रदर्शन करने वाले किसी भी व्यक्ति को जहाँ जनता के अंधविश्वासों और मूर्खतापूर्ण कृत्यों का खण्डन करना पड़ता है, वहाँ उसे समन्वय का एक बीच का मार्ग भी निकालना पड़ता है । यही कार्य कबीर को भी करना पड़ा है । जहाँ इन्होंने पण्डितों, मौलवियों, पीरों, सिद्धों और फकीरों को उनके पाखण्ड और ढोंग के लिये फटकारा, वहाँ उन्होंने एक ऐसे सामान्य धर्म की स्थापना की जिसके द्वार सबके लिए खुल गये थे । एक ओर इन्होंने हिन्दुओं के तीर्थ, वृत्त, मठ, मन्दिर, पूजा आदि की आलोचना की तो दूसरी ओर मुसलमानों के रोजा, नमाज और मस्जिद की भी खूब निन्दा की। माला फेरने वाले पण्डित-पुजारियों के विषय में उन्होंने कहा-

माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर ।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।।
X X X X X X X X X X X X X
जप माला छापा तिलक, सरै न एको काम ।
मन काँचे नाचे वृथा, साँचे राँचे राम ।।

कबीर निर्गुणकारी थे, साकार भक्ति में उन्हें विश्वास नहीं था, इसलिए स्थान-स्थान पर उन्होंने मूर्ति-पूजा का विरोध किया-

पाहन पूजै हरि मिलें, तो, मैं पूजूँ पहार ।
चाकी कोई न पूजई, घीस खाय संसार ।।

कवि के लिए प्रतिभा, शिक्षा, अभ्यास ये तीनों बातें आवश्यक होती हैं। कबीर ने न तो कहीं शिक्षा प्राप्त की थी और न किसी गुरु के चरणों में बैठकर काव्य-शास्त्र का अभ्यास ही किया था, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वे ज्ञान से शून्य थे । भले ही उनमें परावलम्बी ज्ञान न रहा हो, परन्तु स्वावलम्बी ज्ञान की उनमें कमी नहीं थी । उन्होंने सत्संग से पर्याप्त ज्ञान संचय किया था। वे बहुश्रुत थे, उनके काव्य में विभिन्न प्रतीकों तथा अलंकारों की छटा दिखाई पड़ती है । उनके रूपक और उलटबांसियों के विरोधाभास तो अद्वितीय हैं। भाषा सधुक्कड़ी होने पर भी अभिव्यक्तिपूर्ण है।

कबीर को कोई-कोई विद्वान केवल समाज सुधारक और ज्ञानी मानते हैं, परन्तु कबीर में समाज-सुधारक, ज्ञानी और कवि, तीनों रूप मिलकर एकाकार हो गये हैं । वे सर्वप्रथम समाज-सुधारक थे, उसके पश्चात् ज्ञानी और उसके पश्चात् कवि । कबीर ने अपनी प्रखर भाषा और तीखी भावाभिव्यक्ति से साहित्यिक मर्यादाओं का अतिक्रमण भले ही कर दिया हो परन्तु उन्होंने जो काव्य-सृजन किया, उसके द्वारा साहित्य तथा धर्म में युगान्तर अवश्य उपस्थित हुआ ।

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महाकवि सूरदास
अथवा
मेरे प्रिय कवि

रूपरेखा :

  • भूमिका
  • जीवन-परिचय
  • साहित्य-सेवा
  • उपसंहार।

वात्सल्य भाव के अमर गायक महाकवि सूरदास मध्यकाल में चलने वाली सगुण भक्तिधारा के अन्तर्गत चलने वाली कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि थे। इन्हें हिन्दी-साहित्य-आकाश का सूर्य एवं एक अमर विभूति माना जाता है ।

महाकवि सूरदास का जन्म सम्वत् 1535 में एक निर्धन सारस्वत बाह्मण-परिवार में हुआ मान जाता है । इस बात में मत- भेद पाया जाता है कि सूरदास जन्मान्ध थे या नहीं । एक मत के लोग मानते है कि सूरदास जन्म से ही अन्धे थे ।

कविवर सूरदास गोस्वामी वल्लभाचार्य के परम शिष्य, उनके पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित ‘अष्टछाप’ के कवियों में सर्वप्रमुख कवि थे । उनके आदेश से श्रीनाथ जी के मन्दिर में स्वरचित पद गाकर भजन-कीर्तन किया करते थे।

सूरदास की रचनाओं की संख्या तेईस-चौबीस तक कही जाती है ; पर उपलब्ध और मुख्य तीन रचनाओं के नाम है – सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी । इन की कीर्ति का आधार स्तम्भ है – सूरसागर । सूरसागर में कवि ने श्रीमद्भगवत पुराण के दशम स्कन्ध के आधार पर कृष्ण-लीलाओं का गायन करते हुए भी अपनी अद्भुत मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है । इनमें राधा की परिकल्पना तो कवि की अपनी देन है ही, सूरसागर में संकलित ‘भ्रमरगीत’ को भी कवि ने अपनी मौलिक कल्पना से नया रूप-रंग प्रदान कर दिया है और भी अनेक मौलिक उद्भावनाओं से कृष्ण-जीवन को नया स्वरूप प्रदान किया है । सूरकाव्य में वात्सल्य रस प्रधान है।

वात्सल्य के बाद ‘सूरसागर’ का दूसरा प्रमुख रस है श्रृंगार । भृंगार के संयोग एवं वियोग दोनों पक्षों का वर्णन अत्यन्त सजीव एवं ताजगी लिए हुए है । भ्रमरगीत’ प्रसंग की रचना इन्होंने निर्गुण-निराकारवाद, ज्ञान-योग के खण्डन के लिए तो की ही थी, वियोग-शृंगार का उत्कर्ष दिखाना भी उसका उद्देश्य प्रतीत होत है । अपने लीला के पदों में कविवर सूरदास ने सख्यभाव का भी उत्कर्ष दिखाया है । सूरदास की दूसरी रचना ‘सूर सारावली के 1103 पदों में सूरसागर का सार संकलित किया गया है । हैँ, कृष्ण लीला के जो प्रसंग सूरसागर में नहीं आ पाए, कुछ ऐसे प्रसंग भी इसमें वर्णित हैं।

सूरदास का समस्त काव्य मनोविज्ञान का सुंदर अध्ययन है, विशेषकर वात्सल्य वर्णन । सूर के वात्सल्य वर्णन के बारे में डाँ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “यशोदा के वात्सल्य में सब कुछ है, जो माता शब्द को इतना महिमामय बनाए हुए है । यशोदा के बहाने सूरदास ने मातृ-हृदय का ऐसा स्वाभाविक, सरल और हुदयग्राही चित्र खींचा है कि आश्चर्य होता है। माता संसार का ऐसा पवित्र रहस्य है, जिसे कवि के अतिरिक्त किसी को व्याख्या करने का अधिकार नहीं । सूरदास जहाँ पुत्रवती जननी के प्रेम-पोषक हुदय को छूने में समर्थ हुए हैं, वहाँ वियोगिनी माता के करुणा विगलित हृदय को छूने में भी समर्थ हुए हैं ।’

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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

रूपरेखा :

  • जीवन वृत्त
  • काव्य की पृष्ठभूमि
  • रचनायें
  • काव्य की विशेषतायें
  • उपसंहार ।

वर्तमान काव्यधारा के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि श्री मैधिलीशरण गुप्त का जन्म संवत् 1943 में झाँसी जिले के चिरगाँव नामक स्थान में हुआ था । उनके पिता का नाम सेठ रामचरण था । वैष्णव भक्त होने के साथ-साथ सेठ जी का कविता के प्रति भी असीम अनुराग था । वे कनकलता के नाम से कविता किया करते थे । गुप्त जी का पालन-पोषण भक्ति एवम काव्यमय वातावरण में ही हुआ । वातावरण के प्रभाव से गुप्त जी बाल्यावस्था से ही काव्य रचना करने लगे थे ।

गुप्त जी की शिक्षा-व्यवस्था घर पर ही हुई । अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे झाँसी आये किन्तु वहाँ उनका मन न लगा। काव्य-रचना की ओर प्रारम्भ से ही उनकी प्रवृति थी । एक बार अपने पिता जी की उस कॉपी में, जिसमें वे कविता किया करते थे, अवसर पाकर एक छण्पय लिख दिया । पिता जी ने जब कॉपी खोली और उस छण्पय को पढ़ा, तब वे बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने मैथिलीशरण को बुलाकर महाकवि होने का आशीर्वाद दिया ।

गुप्त जी की प्रारम्भिक रचनायें कलकत्ता के ‘जातीय पत्र’ में प्रकाशित हुआ करती थी। पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने पर उनकी रचनायें सरस्वती’ में प्रकाशित होने लगीं । द्विवेदी जी ने समय-समय पर उनकी रचनाओं में संशोधन किया और उन्हें ‘सरस्वती’ में प्रकाशित कर उन्हे प्रोत्साहन दिया । द्विवेदी जी से प्रोत्साहन पाकर गुप्त जी की काव्य-प्रतिभा जाग उठी और शनै:-शनै: उसका विकास होने लगा । आज के हिन्दी साहित्य को गुप्त जी की काव्यप्रतिभा पर गर्व है ।

गुप्त जी अपने जीवन के प्रथम चरण से ही काव्य-रचना में प्रवृत्त रहे । राष्ट्र प्रेम, समाज प्रेम, राम, कृष्ण तथा बुद्ध सम्बन्धी पौराणिक आख्याओं एवं राजपूत, सिक्ख तथा मुस्लिम संस्कृति प्रधान ऐतिहासिक कथाओं को लेकर गुप्त जी ने लगभग चालीस काव्य-प्रन्थों की रचना की है । गुप्त जी ने मौलिक ग्नन्थों के अतिरिक्त बंगला के काव्य-ग्रन्थों का अनुपम अनुवाद भी किया है । अनुवादित रचनायें ‘मधुप’ के नाम से हैं।

उन्होंने फारसी के विश्व-विश्रुत कवि उमर खैयाम की रुबाइयों का अनुवाद भी अंग्रेजी के द्वारा हिन्दी में किया है । रंग में भंग, जयद्रथ वध, भारत भारती, शकुन्तला, वैतालिका, पद्मावती, किसान, पंचवटी, स्वदेशी संगीत, हिन्दू-शक्ति, सौरन्धी, वन वैभव, वक संहार, झंकार, अनघ, चन्द्रहास, तिलोत्तमा, विकट भट, मंगल घट, हिडिम्बा, अंजलि, अर्ध्य, प्रदक्षिणा और जय भारत उनके काव्य हैं। ‘साकेत’ पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से उन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक भीप्राप्त हुआ था। ‘जय भारत’ उनकी नवीनतम कृति थी।

गुप्त जी की ‘भारत-भारती’ में देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है । अंग्रेजी शासन के विरोध में होने के कारण यह पुस्तक कुछ समय तक जब्त भी रही थी । इसमें उन्होंने अतीत गौरव की भव्य झाँकी प्रस्तुत की है । भारतवर्ष की तत्कालीन दुर्दशा पर दुःख प्रकट करते हुए आपने लिखा है-

हम कौन थे क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी ।
आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्यायें सभी ।।

भारतवर्ष में स्री जाति चिरकाल से उपेक्षित रही है । गुप्त जी उनकी इस दशा पर दुःखी हो उठते हैं-

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ।

गुप्त जी की कविता की भाषा सरल और सुबोध है । उसे साधारण से साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है । गुप्त जी की कविता में कोमलता और माधुर्य का अभाव है । कहीं कहीं तो रुखा गद्य-सा जान पड़ता है । इनकी कविता की सफलता का रहस्य भाषा तथा भावों की सुबोधता है न कि उनका काव्य-सौन्दर्य । एक आलोचक का विचार है, कि गाँधी जी जो कुछ भी अपने भाषणों में कह देते थे, प्रेमचन्द जी उसे अपने उपन्यासों में और मैथिलीशरण उसे अपनी कविता में ज्यों का त्यों कुछ उलट-फेर करके उतार दिया करते थे ।

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उपन्यास-सम्राटप्रेमचन्द
अथवा,
मेरे प्रिय लेखक (मॉडल प्रश्न – 2007)

रूपरेखा :

  • प्रस्तावना
  • जीवन परिचय
  • साहित्य सेवा
  • रचनागत विशेषताएँ
  • उपसंहार ।

प्रेमचन्द का जन्म बनारस के निकट लमही नामक गाँव में सन् 1880 में हुआ था । उनके पिता मुंशी अजायब राय डाकखाने के एक साधारण लिपिक थे, अतः परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। प्रेमचन्द जी के बचपन का नाम धनपत राय था । इनकी साहित्यिक प्रतिभा से प्रभावित होकर द्याराम निगम नामक एक उर्दू लेखक ने इनका नाम प्रेमचन्द रखा ।

प्रेमचन्द जी महान कथा-शिल्पी थे । उपन्यास तथा कहानियों के अतिरिक्त उन्होंने नाटक, निबन्ध आदि भी लिखे । उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ उर्दू में लिखी गयीं, किन्तु कुछ समय बाद ही वे हिन्दी में लिखने लगे । यही कारण है कि प्रेमचन्द जी को हिन्दी तथा उर्दू भाषा-भाषियों में समान रूप से लोकप्रियता मिली । प्रेमचन्दजी के साहित्य को हम निम्न रूप में श्रेणीबद्ध कर सकते हैं :-

उपन्यास :- सेवासदन, कर्मभूमि, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, प्रेमाश्रय, वरदान, रंगभूमि, गबन तथा गोदान आदि।
कथा-संग्रह :- सप्त सरोज, प्रेम पचीसी, प्रेम प्रसूना, प्रेम पूर्णिमा, प्रेमतीर्थ, प्रेम प्रमोद, प्रेम द्वादशी, प्रेम प्रतिज्ञा, कफन, नवनिधि, पाँच फूल, मानसरोवर के 8 खण्ड आदि ।
नाटक :- प्रेम की वेदी, कर्बला, संग्राम, रूठी रानी ।
निबन्ध संग्रह :- कुछ विचार तथा निबन्ध-संग्रह ।
जीवनी :- कलम, त्याग और तलवार, दुर्गादास और महात्मा शेखसादी ।
बाल-साहित्य :- कुत्ते की कहानी, जंगल की कहानियाँ, रामचर्चा और मनमोदक ।
अनुवाद :- टाल्स्टाय की कहानियाँ, सुखदास, चाँदी की डिबिया, हड़ताल आदि ।
रचनागत विशेषताएँ :- प्रेमचन्द जी ने अपनी कला को जीवन के प्रति समर्पित किया, अतः उनके प्रत्येक शब्द और वाक्य में जीवन की अनुगूँज सुनाई देती है । उनकी रचनाएँ भारत के दीन-दु:खी किसानों, शोषित मजदूरों सामाजिक दुष्पवृत्तियों की शिकार अबलाओं की मर्मव्यथा का सजीव चित्र देकर पाठकों के हृदय में सच्ची सहानुभूति जगाती हैं तथा उनसे जटिल समस्याओं का निदान ढूँढ़ने की प्रेरणा देती हैं।
उपसंहार :- प्रेमचन्द जी हिन्दी साहित्य की अमर विभूति हैं । उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी का स्थान विश्व साहित्यकला शिल्पियों की प्रथम श्रेणी में प्रतिष्ठित हो चुका है । शोषितों, दलितों तथा दीन-दुखियों को कथानायक बनाकर एवं उनकी मूक व्यथा को वाणी प्रदान कर प्रेमचन्द जी ने जैसी लोकप्रियता अर्जित की है वह बाद के किसी भी हिन्दी लेखक को प्राप्त नहीं हो सकी ।